आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शनिवार, 12 जनवरी 2019
राहु से विस्तार
शुक्रवार, 11 जनवरी 2019
वुघ का विस्तार
वुघ का विस्तार
कुंडली में ग्रहों की दशाएं जीवन में बहुत कुछ तय करती हैं. इसी तरह बुध ग्रह आपके बोलने-सुनने से लेकर आपके खूबसूरत दिखने पर असर डालता हैआपके दिमाग और आपकी खूबसूरती का कारक ग्रह है. कुंडली में बुध की स्थति तय करती है कि आप कैसा बोलते हैं,
कैसा व्यवहार करते हैं, आपका व्यक्तित्व और बुद्धि कैसी है..बुध के मामले में कई कारण ज्योतिष से समझ में आते है लेकिन बुध को प्राथमिक रूप से बहिन बुआ बेटी के रूप में देखा जाता है। बहिन की शादी अजनबी खानदान में करने के बाद विस्तार बढना शुरु हो जाता है यह विस्तार पारिवारिक विस्तार कहा जाता है। बहिन की शादी के बाद जब भानजी की शादी होती है तो वह और बडा विस्तार हो जाता है,मतलब कही तो रिस्तेदारी जायेगी,और परिवार का विस्तार बनता चला जायेगा,घर की बहू आती है वह भी किसी के घर की बेटी होती है और उस घर से जिसे हमने देखा नही है उससे जान पहिचान और आत्मीय रिस्ते बन जाते है,यह बुध का विस्तार कहा जाता है। इस बुध के दो साथी ग्रह भी है जैसे राहु के साथ होने पर ससुराल का सम्बन्ध और विस्तार बनना शुरु हो जाता है और केतु के साथ होने पर बहिन बुआ बेटी के रूप में विस्तार शुरु हो जाता है। इसी बुध के लिये अगर और अधिक आगे बढे तो विस्तार राहु के साथ आकाश तक जा पहुंचता है जिसकी कोई माप नही होती है और केतु के साथ जाने पर यह पाताल तक चला जाता है जिसकी भी कोई माप नही होती है.बुध को विस्तार के रूप में देखने पर इसे भाषाओं की जानकारी वाला ग्रह भी कहा जाता है कौन सी भाषा किस तरह के ज्ञान को कितने विस्तार को वर्णन कर रही है इसका अन्दाज भी नही लगाया जा सकता है। सूर्य के साथ बुध के मिलने से प्रकाश का विस्तार होना शुरु हो जाता है,शनि के साथ मिलने पर अन्धकार का विस्तार शुरु हो जाता है,गुरु के साथ मिलने पर हवा का विस्तार होना शुरु हो जाता है चन्द्रमा के साथ मिलने पर धरती के साथ विस्तार शुरु हो जाता है और मंगल के साथ मिलने पर हिम्मत का विस्तार शुरु हो जाता है.
गुरुवार, 10 जनवरी 2019
मन की साधना और ज्योतिष
शरीर रूपी ब्रह्माण्ड की तीन वृत्तियां है,परा,विराट और अपरा। परा ह्रदय से ऊपर का भाग कहा जाता है,विराट ह्रदय से नाभि पर्यंत का भाग कहा जाता है
और अपरा नाभि से नीचे का भाग कहा जाता है। चित्त वृत्ति की उपस्थिति इन तीनो ब्रह्माण्डो मे पायी जाती है,तथा द्रश्य वृत्ति केवल परा ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत ही आती है। चित्त वृत्ति के स्थिर रहने पर देखना श्रवण करना मनन करना सूंघना आदि सूक्ष्म रूप से महसूस किया जा सकता है,द्रश्य वृत्ति को अगर चित्त वृत्ति मे शामिल कर लिया जाये तो कर्म वृत्ति का उदय होना शुरु हो जाता है। अगर चित्त वृत्ति और द्रश्य वृत्ति मे भिन्नता पैदा हो जाती है तो कर्म वृत्ति का नही होना माना जाता है। जिसे साधारण भाषा मे अनदेखा कहा जाता है। चित्त वृत्ति को साधने की क्रिया को ही साधना के नाम से पुकारा जाता है,और जो अपनी चित्त वृत्ति को साधने मे सफ़ल हो जाते है वही अपने कर्म पथ पर आगे बढते चले जाते है और नाम दाम तथा संसार मे प्रसिद्धि को प्राप्त कर लेते है। चित्त वृत्ति को साधने मे जो रुकावटें आती है,उनमे सबसे बडी बाधा मानसिक भ्रम को मुख्य माना जाता है। उदाहरण के रूप मे बच्चे से अगर माता कहती है वह खिलौना उठाकर ले आओ,उसी समय पिता अगर बच्चे से कह देता है कि पढाई करो,बच्चे के दिमाग मे भ्रम पैदा हो जाता है कि वह खिलौना उठा कर लाये या पढाई करे,इस भ्रम के अन्दर अगर बच्चे से बाद मे पूंछा जाये कि पहले खिलौना उठाकर लायेगा या पढाई करेगा,बच्चा अगर माता से डरता है तो पहले खिलौना उठाकर लायेगा और पिता से डरता है तो माता की बात को अनसुना करने के बाद पढने बैठ जायेगा। इसी प्रकार से अगर किसी को कहा जाये कि अमुक काम को करना है,अमुक को नही,तो मानसिक धारणा के अन्दर उन दोनो कामो को करने के पहले उनके बीच का अर्थ निकालने मे मन लग जायेगा और वही समय मानसिक भ्रम का माना जायेगा। कारण जब समझ मे आयेगा तब तक या तो मना किये गये काम का रूप बदल चुका होगा या बताये गये काम का करना मुनासिब नही हो पायेगा। इसके अलावा एक और बात मानी जाती है कि किसी व्यक्ति से कह दिया जाये कि वह अमुक कार्य को अमुक तरीके से करो,और उसी समय दूसरा व्यक्ति उसी काम को पहले बताये गये व्यक्ति के तरीके से भिन्न हो जाता है तो भी मानसिक भ्रम की उत्पत्ति हो जाती है। इस भ्रम की स्थिति को बच्चो मे तो खेल कूद और मनोरंजन के साधन तथा नई नई चीजों को देखने के रूप मे मानी जाती है जो जिज्ञासा के नाम से जानी जाती है। वही बात अगर युवाओं मे देखी जाये तो उनकी भ्रम वाली स्थिति शादी विवाह करने अपनी नई दुनिया को बसाने तथा एक दूसरे के ज्ञान धन परिवार रहन सहन समाज मे चलने वाले कारणो को समाप्त करने आदि के प्रति भ्रम बनना माना जायेगा,जब व्यक्ति वृद्ध होता है तो उसके दिमाग मे युवाओ को बदलने वाले कारणो का भ्रम बना रहेगा,कि अमुक कार्य से उसे हानि हो सकती है अमुक वस्तु को खाने पीने से उसके अन्दर बुराई पैदा हो सकती है अमुक सम्बन्ध को बनने के बाद उसकी वैवाहिक जिन्दगी मे बरबादी का कारण बन सकता है या अमुक कार्य करने से बडी हानि या किसी को कष्ट भी पहुंच सकता है,इन भ्रमो के अलावा और भी कई प्रकार के भ्रम माने जाते है जो हर व्यक्ति के जीवन मे अपने अपने रूप मे उपस्थित होते है और उन भ्रमो के कारण ही प्रगति के पथ पर लोग या तो गलत रूप से आगे बढ जाते है या फ़िर कार्य मे तमाम बाधाये प्रस्तुत कर लेते है और कार्य पूरा नही हो पाता है उनके द्वारा पहले की गयी मेहनत बरबाद हो जाती है।ज्योतिष मे इस भ्रम नाम की बीमारी को पैदा करने वाला राहु है।राहु एक छाया ग्रह है जिसका प्रभाव उल्टे रूप मे पडता है। जैसे एक व्यक्ति को जंगल के रास्ते जाना है और उसे कोई पहले बता देता है कि रास्ते मे शेर मिल सकता है। व्यक्ति को भले ही शेर नही मिले लेकिन उसके दिमाग मे शेर का भय पैदा हो जायेगा कि शेर अगर मिल गया तो वह उसे मार भी सकता है या उसके शरीर को क्षति भी पहुंचा सकता है। वह व्यक्ति अपनी सुरक्षा के चक्कर मे अपने दिमाग का प्रयोग करेगा,और अपने को सतर्क करने के बाद ही जंगल का रास्ता तय करेगा। इस सोचने की क्रिया के अन्दर जो मुख्य भाव आया वह मृत्यु का भय,जीवन चलने का नाम है और मृत्यु समाप्ति का नाम है,जीवन का नाम सीधा है तो मृत्यु का नाम उल्टा है। यही राहु का कार्य होता है। उल्टा सोचने के कारण ही लोग अपने लिये सुरक्षा का उपाय करते है,उल्टा सोच कर ही लोग समय पर पढने का कार्य करते है या उल्टा सोच कर ही लोग किसी भी कार्य को समय से पहले करने की सोचते है या अपने जीवन के प्रति सजग रहने की बात करते है। जब इस प्रकार की बाते आती है तो राहु कुंडली मे अच्छी स्थिति मे होता है और जब राहु गलत भाव मे होता है तो वह बजाय सीधे रास्ते जाने के उल्टे रास्ते से जाने के लिये अपनी गति देने लगता है। जैसे कुंडली मे चन्द्रमा के साथ राहु किसी खराब भाव मे है तो वह मन के अन्दर एक छाया सी पैदा करे रहेगा। मन का एक स्थान मे रहना नही हो पायेगा। जब मन का बंटवारा कई स्थानो मे हो जायेगा तो याददास्त पर असर पडेगा। रास्ता चलते हुये जाना कहीं होगा तो पहुंच कहीं जायेंगे। करना कुछ होगा तो करने कुछ लगेंगे। किसी रखी हुयी वस्तु को भूल जायेंगे,या रखी कहीं थी खोजने कहीं लग जायेंगे,इस बीच मे बुराइयां भी बनने लगती है,जैसे वस्तु को आफ़िस मे रखा था और खोजने घर मे लगेंगे,फ़िर जब नही मिलेगी तो तरह तरह की शंकाओं के चलते जो भी पास मे रहा होगा उस पर झूठा आक्षेप लगाया जाने लगेगा। यह स्थिति राहु के भावानुसार मानी जायेगी,जैसे राहु धन स्थान मे है और चन्द्रमा से युति ले रहा है तो पर्स को रखा तो टेबिल की दराज मे आफ़िस में जायेगा और खोजा घर के अन्दर जायेगा,घर के किसी सदस्य पर आक्षेप लगेगा और बुराई अपमान आदि की बाते उस सदस्य के पल्ले पडेंगी। इसी प्रकार से लडके लडकियां जब बडे हो जाते है तो उनके अन्दर बडी शिक्षा मे जाने के बाद एक सोच पैदा हो जाती है कि वे अपने सहपाठी से नीचे क्यों है,उसका सहपाठी तो बडी और लक्जरी गाडी मे आता है,वह पैदल या बस से आता है,उसके पास कोई आजकल का चलने वाला साधन नही है,जबकि उसके साथी सभी साधनो से पूर्ण है। यह भाव अपने ही मन मे लाने के कारण पढाई लिखाई तो एक तरफ़ रखी रह गयी,अपने को और भी नीचे ले जाने के लिये सोच को पैदा कर लिया। मन के अन्दर माता पिता दादा दादी और परिवार को जिम्मेदार मान लिया गया,और उनके प्रति मन के अन्दर एक अजीब सी नफ़रत पैदा हो गयी। यह कारण अष्टम मे राहु के होने से और ग्यारहवे भाव के स्वामी से युति लेने के कारण बन जाती है। इसी प्रकार से जब राहु का गोचर पंचम भाव मे होता है या वह पांचवे भाव मे शुरु से ही बैठा होता है या चन्द्र मंगल की युति धन भाव मे होती है और राहु का स्थान पंचम मे होता है अथवा राहु का प्रभाव पंचम से शुक्र के साथ हो रहा होता है तो व्यक्ति के अन्दर बचपन मे मनोरंजन के साधनो का और वाहन सम्बन्धी कारण पैदा होता है,जवानी मे इश्क का भूत सवार हो जाता है और वह या तो अपने लिये नये नये लोगो पर छा जाने वाले कारण पैदा करने लगता है या अपनी दहसत से लोगो के अन्दर भय को पैदा करना शुरु कर देता है। इसी प्रकार से अन्य भाव मे विराजमान राहु अपनी विचित्रता से उल्टे काम करने के लिये अपना प्रभाव देने लगता है।
कहा जाता है कि नशे के अन्दर क्षत्रिय दाढी वाला बाबा शमशान मे निवास करने वाला पागल जैसा लगने वाला व्यक्ति की बराबरी उसी व्यक्ति से की जा सकती है जो नितांत अकेला बैठा सोचता रहता है,जिसे दिन मे सोचने से फ़ुर्सत नही होती और रात को नींद उससे कोशो दूर होती है। वह जब कभी सो भी जाता है तो स्वप्न भी बहुत ही अजीब अजीब आते है जैसे मुर्दो के बीच मे रहना आसमान मे पानी की तरह से चलना,जंगल बीहड वीराने क्षेत्र मे चलना,खतरनाक जानवर देखना या ऐसा लगना कि वह अक्समात ही नीचे गिरता चला जा रहा है यह एक राहु की सिफ़्त का उदाहरण है जो बारहवे भाव अष्टम भाव या चौथे भाव मे बैठ कर अपनी स्थिति को दर्शाता है। जैसे लोग अपने मन को साधने के लिये शराब का सेवन करते है या राशि के अनुसार जो चौथे भाव मे होती है उसके अनुसार नशे को करने लगते है का फ़ल चौथे राहु के द्वारा देखा जाता है,शमशानी राशि अष्टम मे बैठा राहु जिसे वृश्चिक राशि के नाम से जाना जाता है उसके साथ भी दिमाग का बंटवारा एक साथ कार्यों मे बाहरी खर्चो मे घर के लोगो मे धन के मामले मे तथा मानसिक सोच मे जाने के लिये अपनी एक साथ युति को देता है,इस युति के कारण अक्सर लोग या तो बडा एक्सीडेंट कर लेते है या कोई भयंकर जोखिम को ले लेते है,या फ़िर किसी ऊंचे स्थान से कूद जाते है या वाहन आदि को चलाते समय कहीं जाना होता है कहीं चलते है और अपने साथ साथ दूसरो के लिये भी आफ़त का कारण बन जाते है।
राहु को साधने का तरीका आज के युग के लोग अपने को शराब आदि के कारणो मे ले जाते है कोई नींद की गोली लेता है,कोई अफ़ीम आदि के आदी हो जाते है कोई नशे के विभिन्न कारण अपने मन को साधने के लिये लेना शुरु कर देते है,यह प्रभाव उनके ऊपर इतनी शक्ति से हावी हो जाता है कि यह ईश्वर का दिया हुआ रूप बल शक्ति मन दिमाग सभी बरबाद होने लगते है और जो कार्य यह शरीर अपने परिवेश के अनुसार कर सकता था उससे दूर रखने के बाद अपनी लीला को एक दूसरो पर बोझ के नाम से समाप्त कर लेने मे जल्दबाजी भी करते है। राहु को साधने के लिये सबसे पहले अपनी चित्त वृत्ति को साधना जरूरी है,जब मन रूपी चित्त वृत्ति को साधने की क्षमता पैदा हो जाती है तो शरीर से जो चाहो वही कार्य होना शुरु हो जाता है क्योंकि कार्य को करने के अन्दर कोई अन्य कारण या मन की कोई दूसरी शाखा पैदा नही होती है।
चित्त वृत्ति को साधने के लिये महापुरुषो ने कई उपाय बताये है। पहला उपाय योगात्मक उपाय बताया है। जिसे त्राटक के नाम से जाना जाता है। एक सफ़ेद कागज पर एक सेंटीमीटर का वृत बना लिया जाता है उसे जहां बैठने के बाद कोई बाधा नही पैदा होती है उस स्थान पर ठीक आंखो के सामने वाले स्थान पर चिपका कर दो से तीन फ़ुट की दूरी पर बैठा जाता है,उस वृत को एक टक देखा जाता है उसे देखने के समय मे जो भी मन के अन्दर आने जाने वाले विचार होते है उन्हे दूर रखने का अभ्यास किया जाता है,पहले यह क्रिया एक या दो मिनट से शुरु की जाती है उसके बाद इस क्रिया को एक एक मिनट के अन्तराल से पन्द्रह मिनट तक किया जाता है। इस क्रिया के करने के उपरान्त कभी तो वह वृत आंखो से ओझल हो जाता है कभी कई रूप प्रदर्शित करने लगता है,कभी लाल हो जाता है कभी नीला होने लगता है और कभी बहुत ही चमकदार रूप मे प्रस्तुत होने लगता है। कभी उस वृत के रूप मे अजीब सी दुनिया दिखाई देने लगती है कभी अन्जान से लोग उसी प्रकार से घूमने लगते है जैसे खुली आंखो से बाहर की दुनिया को देखा जाता है। वृत को हमेशा काले रंग से बनाया जाता है। दो से तीन महिनो के अन्दर मन की साधना सामने आने लगती है और जो भी याद किया जाता है पढा जाता है देखा जाता है वह दिमाग मे हमेशा के लिये बैठने लगता है। ध्यान रखना चाहिये कि यह दिन मे एक बार ही किया जाता है,और इस क्रिया को करने के बाद आंखो को ठंडे पानी के छींटे देने के बाद आराम देने की जरूरत होती है,जिसे चश्मा लगा हो या जो शरीर से कमजोर हो या जो नशे का आदी हो उसे यह क्रिया नही करनी चाहिये।दूसरी क्रिया को करने के लिये किसी एकान्त स्थान मे आरामदायक जगह पर बैठना होता है जहां कोई दिमागी रूप से या शरीर के द्वारा अडचन नही पैदा हो। पालथी मारक बैठने के बाद दोनो आंखो को बन्द करने के बाद नाक के ऊपर अपने ध्यान को रखना पडता है उस समय भी विचारों को आने जाने से रोका जाता है,और धीरे धीरे यह क्रिया पहले पन्द्रह मिनट से शुरु करने के बाद एक घंटा तक की जा सकती है इस क्रिया के द्वारा भी अजीब अजीब कारण और रोशनी आदि सामने आती है उस समय भी अपने को स्थिर रखना पडता है। इस क्रिया को करने से पहले तामसी भोजन नशा और गरिष्ठ भोजन को नही करना चाहिये। बेल्ट को भी नही बांधना चाहिये। इसे करने के बाद धीरे धीरे मानसिक भ्रम वाली पोजीशन समाप्त होने लगती है तीसरी जो शरीर की मशीनी क्रिया के नाम से जानी जाती है,वह शब्द को लगातार मानसिक रूप से उच्चारित करने के बाद की जाती है उसके लिये भी पहले की दोनो क्रियाओं को ध्यान मे रखकर या एकान्त और सुलभ आसन को प्राप्त करने के बाद ही किया जा सकता है,नींद नही आये या मुंह के सूखने पर पानी का पीना भी जरूरी है। बीज मंत्र जो अलग अलग तरह के है उन्हे प्रयोग मे लाया जाता है,भूमि तत्व के लिये केवल होंठ से प्रयोग आने वाले बीज मंत्र,जल तत्व को प्राप्त करने के लिये जीभ के द्वारा उच्चारण करने वाले बीज मंत्र,वायु तत्व को प्राप्त करने के लिये तालू से उच्चारण किये जाने वाले बीज मंत्र और अग्नि तत्व को प्राप्त करने के लिये दांतो की सहायता से उच्चारित बीज मंत्र का उच्चारण किया जाता है साथ ही आकाश तत्व को प्राप्त करने के लिये गले से उच्चारण वाले बीज मंत्रो का उच्चारण करना चाहिये।ज्योतिष भगवत प्राप्ति और भविष्य को देखने की क्रिया के लिये दूसरे नम्बर की क्रिया के साथ तालू से उच्चारित बीज मंत्र को ध्यान मे चलाना चाहिये। जैसे क्रां क्रीं क्रौं बीजो का लगातार मनन और ध्यान को दोनो आंखो के बीच मे नाक के ऊपरी हिस्से मे ध्यान को रखकर किया जाना लाभदायी होता है।
गुरुवार, 3 जनवरी 2019
जन्म कुंडली में कैसे जाने अपने इष्ट देव को
भारतीय संस्कृति ज्ञान, कर्म और भक्ति का संगम है। इनकी अपनी अपनी महत्ता है
कोई ज्ञान के आधार पर अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढता है तो तो कोई कर्म को अपना माध्यम बनाता है तो कोई भक्ति भाव को आधार बनाकर मुक्ति पाना चाहता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति में भक्ति को सहज और शीघ्र प्राप्ति वाला मार्ग बताया गया है।
किसी जातक की कुंडली से इष्ट देव जानने के अलग-अलग सूत्र व सिद्धांत समय-समय पर ऋषि मुनियों ने बताये हे जेमिनी सूत्र के रचयिता महर्षि जेमिनी इष्टदेव के निर्धारण में आत्मकारक ग्रह की भूमिका को सबसे अधिक मह्त्वपूर्ण बताया है। कुंडली में लगना, लग्नेश, लग्न नक्षत्र के स्वामी एवं ग्रह जो सबसे अधिक अंश में हो चाहे किसी भी राशि में हो आत्मकारक ग्रह होता है।
अपना इष्ट देव चुनने में निम्न बातों का ध्यान देना चाहिए।
आत्मकारक ग्रह के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व उनकी अराधना करनी चाहिए।
भक्ति और आध्यात्म से जुड़े अधिकांश लोगों के मन में हमेशा यह प्रश्न उठते रहता है मेरा इष्ट देव कौन है और हमें किस देवता की पूजा अर्चना करनी चाहिए। किसी भक्त के प्रिय हनुमान हे शिव जी हैं तो किसी के विष्णु तो कोई राधा कृष्ण का भक्त है तो कोई माता दुर्गा का। और कोई तो सभी देवी देवताओं का एक बाद स्मरण करता है। परन्तु एक उक्ति है कि "एक साधै सब सधै, सब साधै सब जाय"। जैसा की आपको पता है कि अपने अभीष्ट देवता की साधना तथा पूजा अर्चना करने से हमें शीघ्र ही मन चाहे फल की प्राप्ति होती है।
अब प्रश्न होता है कि देवी देवता हमें कैसे लाभ अथवा सफलता दिलाते हैं वस्तुतः जब हम किसी भी देवी-देवता की पूजा करते हैं तो हम अपने अभीष्ट देवी देवता को मंत्र के माध्यम से अपने पास बुलाते है और आह्वान करने पर देवी देवता उस स्थान विशेष तथा हमारे शरीर में आकर विराजमान होते है
वास्तव में सभी दैवीय शक्तियां अलग-अलग निश्चित चक्र में हमारे शरीर में पहले से ही विराजमान होती है आप हम पूजा अर्चना के माध्यम से ब्रह्माण्ड सेउपस्थित दैवीय शक्ति को अपने शरीर में धारण कर शरीर में पहले से विद्यमान शक्तियों को सक्रिय कर देते है और इस प्रकार से शरीर में पहले से स्थित ऊर्जा जागृत होकर अधिक क्रियाशील हो जाती है। इसके बाद हमें सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है। ज्योतिष के माध्यम से हम पूर्व जन्म की दैवीय शक्ति अथवा ईष्टदेव को जानकर तथा मंत्र साधना से मनोवांछित फल को प्राप्त करते है।
इष्ट देव को जानने की विधियों में भी विद्वानों में एक मत नहीं है। कुछ लोग नवम् भाव और उस भाव से सम्बन्धित राशि तथा राशि के स्वामी के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।
वहीं कुछ लोग पंचम भाव और उस भाव से सम्बन्धित राशि तथा राशि के स्वामी के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।
कुछ विद्वान लग्न लग्नेश तथा लग्न राशि के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।
त्रिकोण भाव में सर्वाधिक बलि ग्रह के अनुसार भी इष्ट देव का चयन किया जाता है।
महर्षि जैमिनी जैसे विद्वान के अनुसार कुंडली में आत्मकारक ग्रह के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करना बताया गया हे गण के द्वारा भी इष्ट देव का निर्धारण किया जाता है संसार का प्रत्येक जीव अपने अपने समय में अपने अपने गण को लेकर पैदा होता है। जो जिसका गण होता है उसी के अनुसार व्यक्ति के इष्ट को समझा जाता है.जन्म कुंडली में बारह राशिया है और लगन में जो राशि होती है उस राशि का मालिक ही व्यक्ति के गण का मालिक होता है उस मालिक के गण का प्रमुख देवता कौन सा है वह अपने अपने धर्म के अनुसार ही माना जाता है। उदाहरण के लिये कर्क लगन की कुंडली है और इस लगन का मालिक चन्द्रमा है,चन्द्रमा तीसरे भाव मे है और चन्द्रमा की राशि कन्या है.कन्या राशि का मालिक बुध है,बुध ही जातक का इष्टदेव का कारक है,बुध अगर तुला राशि का होकर चौथे भाव मे सूर्य और शुक्र के साथ बैठा है तो जातक के लिये माना जाता है कि जातक के पिता और माता ने मिलकर मनौती को मांग कर पुत्र को प्राप्त किया है वह मनौती जातक के पिता के ही इष्ट का दूसरा रूप रखने वाली देवी के लिये कहा जा सकता है। हर ग्रह का अलग अलग देवता होता इस बात को वैसे तो मतान्तर से भेद रखने वाली बाते मिलती है लेकिन सही रूप में जानने के लिये लाल किताब ने बहुत ही बारीकी से ग्रह और उसके देवता का वर्णन किया है। जैसे सूर्य से विष्णु को मानते है,चन्द्रमा से शिवजी को मानते है मंगल से हनुमान जी को भी मानते है और अगर मंगल बद होता है तो हनुमान जी की जगह पर भूत प्रेत पिशाच की सेवा करने के कारण मिलने लगते है,बुध को दुर्गा के लिये जाना जाता है गुरु को ब्रह्मा जी से जोडा गया है शुक्र को लक्ष्मी से जोड कर देखा गया है,शनि को भैरों बाबा के लिये पूजा जाता है और राहु को सरस्वती के लिये तथा केतु को गणेशजी के लिये समझा जाता है। लालकिताब के अनुसार जातक का इष्टदेव देवी दुर्गा ही मानी जायेगी। अगर कुंडली मे शनि की स्थिति मार्गी है तो देवी की मूर्ति की पूजा मे ध्यान लगाना फ़ायदा देने वाला माना जाता है शनि के वक्री होने पर मूर्ति की जगह पर दिमागी पूजा यानी मंत्र जाप आदि से फ़ल मिलना माना जा सकता है। इसी प्रकार से जैसे इस कुंडली मे बुध के साथ सूर्य भी है और शुक्र भी है शनि सामने होकर दसवे भाव मे विराजमान है.तुला राशि को पश्चिम की दिशा मानी जाती है,भारत मे चार दिशाओं में भगवान विष्णु के चार धाम है,पूर्व मे जगन्नाथ को विष्णु को रूप में उत्तर में बद्री विशाल को पश्चिम मे द्वारिकाधीश को और दक्षिण में भगवान विष्णु को राम के रूप मे पूजा जाता है.शुक्र और बुध तुला राशि के सूर्य के साथ है तो राधा और रुक्मिणी के साथ द्वारकाधीश की प्रतिमा को जाहिर करते है। सूर्य और शुक्र के साथ बुध की स्थिति पानी वाले भाव यानी चौथे भाव मे है इसलिये अष्टम भाव का राहु समुद्र के किनारे की बात को उजागर करता है,इसलिये इस कुन्डली मे द्वारिकाधीश के साथ राधा और रुक्मिणी की पूजा को करना और उन्हे मानना सही और फ़लदायी माना जा सकता है। राधा लक्ष्मी रूप मे और रुक्मिणी शक्ति के रूप मे अपना अपना फ़ल जातक को देने वाली है। लेकिन यहां एक शंका यह पैदा होती है कि अगर जातक इन्ही ग्रहों को लेकर इंग्लेंड मे पैदा हुआ है तो वह द्वारिकाधीश और राधा रुक्मिणी को कहां से प्राप्त करेगा। भारतीय भू-भाग पर पैदा होने के बाद तो चारो दिशाओं के सूर्य को विष्णु के रूप में मान भी लिया गया है। इंगेलंड मे इन ग्रहों के कारक बदल जायेंगे,इन कारकों में सूर्य के स्थान पर राज्य का मालिक या राजा होगा,और शुक्र तथा बुध के कारको में वह राजकीय धन और कानूनो का मालिक होगा। जहां लोग ईश्वर पर विश्वास रखते है वहां पर यह ग्रह ईश्वरीय शक्ति के रूप मे देखे जाते है और जहां मनुष्य केवल कर्म पर विश्वास रखता है वहां यह ग्रह मनुष्य रूप में स्थापित अधिकारियों के रूप मे काम करने लगते है।अव जैसे कन्या लग्न की कुंडली है चंद्र मीन राशि में है मीन राशि का स्वामी पंचम में मकर राशि मेअव देखें इनको इष्ट देव कौन होगा धर्म का क्षेत्र लगन पंचम और नवम में लगन खाली है अर्थ के क्षेत्र में केवल केतु का राज है,काम यानी पत्नी बच्चे आदि के क्षेत्र में शनि बुध शुक्र चन्द्र है,मोक्ष यानी शान्ति के क्षेत्र में सूर्य राहु है,इस प्रकार से जीवन मे केवल सूर्य राहु का कारण शांति प्रदान नही करने दे रहा है,केतु धन यानी अर्थ के क्षेत्र मे खालीपन दे रहा है काम के क्षेत्र मे जूझने के लिये ही शनि बुध शुक्र चन्द्र अपना प्रभाव दे रहे है.शुक्र को अगर भाग्य क्षेत्र मे स्थान दे दिया जाये तो और इष्ट के रूप मे लक्ष्मी आराधना की जाये तो दूसरा भाव और नवा भाव जाग्रत हो जायेगा,काम के क्षेत्र मे शुक्र का उच्च का होना और चन्द्रमा का सहयोग देना फ़लदायी हो जायेगा,अगर शुक्र की आराधना नही की जाती है तो सप्तम मे बैठा बुध बनते कामो को फ़ल देने के समय मे बरबाद कर देगा.ऐक उघारण ओर देखेमकर लग्न की कुण्डली है। प्रथम भाव में 10 गुरू
चतुर्थ भाव
दशम भाव में 7 तुला में पकेतू, चंद्र, मंगल
एकादश भाव में 8 मेंटट शनि
द्वादश भाव में सूर्य , शुक्र, बुध है कुंडली के अनुसार चन्द्र केतु मंगल की कारक माता काली आपकी इष्ट है जो आपको जीवन मे तकनीकी बिजली पावर आदि क्षेत्र मे सफ़लता देती है और आप लोगो के प्रति अपनी कटु नीति से दुखो को दूर करने की सोचते है,लेकिन पत्नी की गुस्से वाली नीति आपको तभी परेशान करने लगती है जब आप तामसी कारणो को खुद के प्रति प्रयोग करना शुरु कर देते है। मित्रों की चली अपनी जन्म कुंडली दिखाकर अंजाम इष्टदेव जान सकते हैं क्योंकिजो माया के पीछे भागते है उन्हे राम समझ मे नही आते है और जिन्हे राम समझ मे आते है उन्हे माया समझ मे नही आती है - (माया महा ठगिनी हम जानी,देखन मे लगे नई नई पर सूरत जानी पहिचानी,माया महा ठगिनी हम जानी)
रविवार, 30 दिसंबर 2018
जीते जी मरने की कला
प्रत्येक व्यक्ति अलग इंद्रिय से मरता है। किसी की मौत आंख से होती है, तो आंख खुली रह जाती है
—हंस आंख से उड़ा। किसी की मृत्यु कान से होती है। किसी की मृत्यु मुंह से होती है, तो मुंह खुला रह जाता है। अधिक लोगों की मृत्यु जननेंद्रिय से होती है, क्योंकि अधिक लोग जीवन में जननेंद्रिय के आसपास ही भटकते रहते हैं, उसके ऊपर नहीं जा पाते। हम्हारी जिंदगी जिस इंद्रिय के पास जीयी गई है, उसी इंद्रिय से मौत होगी। औपचारिक रूप से हम मरघट ले जाते हैं किसी को तो उसकी कपाल—क्रिया करते हैं, उसका सिर तोड़ते हैं। वह सिर्फ प्रतीक है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु उस तरह होती है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु सहस्रार से होती है।
जननेंद्रिय सबसे नीचा द्वार है। जैसे कोई अपने घर की नाली में से प्रवेश करके बाहर निकले। सहस्रार, जो हम्हारे मस्तिष्क में है द्वार, वह श्रेष्ठतम द्वार है। जननेंद्रिय पृथ्वी से जोड़ती है, सहस्रार आकाश से। जननेंद्रिय देह से जोड़ती है, सहस्रार आत्मा से। जो लोग समाधिस्थ हो गए हैं, जिन्होंने ध्यान को अनुभव किया है, जो बुद्धत्व को उपलब्ध हुए हैं,जो जिते जी मरे है उनकी मृत्यु सहस्रार से होती है।
उस प्रतीक में हम अभी भी कपाल—क्रिया करते हैं। मरघट ले जाते हैं, बाप मर जाता है, तो बेटा लकड़ी मारकर सिर तोड़ देता है। मरे—मराए का सिर तोड़ रहे हो! प्राण तो निकल ही चुके, अब काहे के लिए दरवाजा खोल रहे हो? अब निकलने को वहां कोई है ही नहीं। मगर प्रतीक, औपचारिक, आशा कर रहा है बेटा कि बाप सहस्रार से मरे; मगर बाप तो मर ही चुका है। यह दरवाजा मरने के बाद नहीं खोला जाता, यह दरवाजा जिंदगी में खोलना पड़ता है। जीते जी मरना पड़ता है इसी दरवाजे की तलाश में सारे योग, तंत्र की विद्याओं का जन्म हुआ। इसी दरवाजे को खोलने की कुंजियां हैं योग में, तंत्र में। इसी दरवाजे को जिसने खोल लिया, जिसने पे कला सीख ली वह परमात्मा को जानकर मरता है। जिते जी मरता है यह कहूं कि जीते जी मरने की कला सीख लेता है जान लेता है उसकी मृत्यु समाधि हो जाती है। इसलिए हम साधारण आदमी की कब्र को कब्र कहते हैं, फकीर की कब्र को समाधि कहते हैं—समाधिस्थ होकर जो मरा है।
प्रत्येक व्यक्ति उस इंद्रिय से मरता है, जिस इंद्रिय के पास जीया। जो लोग रूप के दीवाने हैं, वे आंख से मरेंगे; इसलिए चित्रकार, मूर्तिकार आंख से मरते हैं। उनकी आंख खुली रह जाती है। जिंदगी—भर उन्होंने रूप और रंग में ही अपने को तलाशा, अपनी खोज की। संगीतज्ञ कान से मरते हैं। उनका जीवन कान के पास ही था। उनकी सारी संवेदनशीलता वहीं संगृहीत हो गई थी। मृत्यु देखकर कहा जा सकता है—आदमी का पूरा जीवन कैसा बीता। अगर मृत्यु को पढ़ने का ज्ञान हो, तो मृत्यु पूरी जिंदगी के बाबत खबर दे जाती है कि आदमी कैसे जीया; क्योंकि मृत्यु सूचक है, सारी जिंदगी का सार—निचोड़ है—आदमी कहां जीया।
हरि हां, वाजिद, ज्यूं तीतर कूं बाज झपट ले जाहिंगे।।
जल्दी ही बाज तो आएगा, उसके पहले तैयारी कर लो। अगर सहस्रार पर पहुंच जाओ, तो फिर मौत का बाज हमे झपटकर नहीं ले जा सकता। फिर तो परमात्मा तलाशता आता है। अगर कोई किसी और इंद्रिय से मरे, तो वापिस लौट आना पड़ेगा देह में; क्योंकि बाकी सब द्वार देह में हैं। सहस्रार देह का द्वार नहीं है, आत्मा का द्वार है। सहस्रार ग्यारहवां द्वार है, बाकी दस द्वार शरीर के हैं। ग्यारहवें द्वार को तलाशो—हम्हारे भीतर है, बंद पड़ा है
बुधवार, 5 दिसंबर 2018
शिव ओर शिवलिग
शिव ओर शिवलिग. , ,मिञो् शिवलिंग, का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरुप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्द पुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो
उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है | वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्ष/धुरी ही लिंग हैhttps://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/8/8f/Shivling_in_Abu.JPG
पुराणो में शिवलिंग को कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंगशिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है | हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते है जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा, गणितीय सूत्र, कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि | अर्थ :- सम्पति, मतलब उसी प्रकार यहाँ लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी या प्रतीक है, लिङ्ग का यही अर्थ वैशेषिक शास्त्र में कणाद मुनि ने भी प्रयोग किया। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और पदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है | अब जरा आईंसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी
इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है अर्थात दो नही एक ही है पर वो दो हो कर स्रष्टि का निर्माण करता है। हमारे ऋषियो ने ये रहस्य हजारो साल पहले ही ख़ोज लिया था | हम अपने देनिक जीवन में भी देख सकते है कि जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोदिशाओं की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री)+ऊपर व निचे) होता है, फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा का प्रतिरूप, शांत जल में कंकर फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) का प्रतिरूप आदि।
स्रष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट के पश्चात् उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्त जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता भगवान शिव की जगह-जगह पूजा हो रही है, लेकिन पूजा की वात नहीं है। शिवत्व उपलब्धि की बात है। वह जो शिवलिंग हमने देखा है बाहर मंदिरों में, वृक्षों के नीचे, हमने कभी ख्याल नहीं किया, उसका आकार ज्योति का आकार है। जैसे दीये की ज्योति का आकार होता है। शिवलिंग अंतर्ज्योति का प्रतीक है। जव हम्हारे भीतर का दीया जलेगा तो ऐसी ही ज्योति प्रगट होती है, ऐसी ही शुभ्र! यही रूप होता है उसका। और ज्योति बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है। और धीरे धीरे ज्योतिर्मय व्यक्ति के चारों तरफ एक आभामंडल होता है; उस आभामंडल की आकृति भी अंडाकार होती है।
स.तो इस सत्य को सदियों पहले जान लिया था। लेकिन इसके लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं थे। लेकिन रूस में एक बड़ा वैज्ञानिक प्रयाग ची नहा है-किरलियान फोटोग्राफी। मनुष्य के आसपास जो ऊर्जा का मंडल होता है, अब उसके चित्र लिये जा सकते हैं। इतनी सूक्ष्म फिल्में बनाई जा चुकी हैं, जिनसे न केवल तुम्हारी देह का चित्र बन जाता है, बल्कि देह के आसपास जो विद्युत प्रगट होती है, उसका भी चित्र बन जाता है। और किरलियान चकित हुआ है, क्योंकि जैसे -जैसे व्यक्ति शांत होकर बैठता है, वैसे – वैसे उसके आसपास का जो विद्युत मंडल है, उसकी आकृति अंडाकार हो जाती है। उसको तो शिवलिंग का कोई पता नहीं है, लेकिन उसकी आकृति अंडाकार हो जाती है। शांत व्यक्ति जब बैठता है ध्यान तो उसके आसपास की ऊर्जा अंडाकार हो जाता है। अशांत व्यक्ति के आसपास की ऊर्जा अंडाकार नहीं होती, खंडित होती है, टुकड़े -टुकड़े होती है। उसमें कोई संतुलन नहीं होता। एक हिस्सा छोटा- कुरूप होती है।में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल तथा की देवता आदि मिल कर भी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शास्वत अंत न पा सके हमारे शरीर मे भी सात चक्रो की Akriti आकृति muladhar chakkar से यात्रा शुरू होती है शिवलिंग के अकार की तरह है बात करते हैं शिवलिंग पर जल सहित, भांग, धतूरा, बेलपत्र आदि चढ़ाने की। आपको जानकर हैरानी होगी कि शिवलिंग खुद में न्यूक्लियर रिएक्टर का सबसे बड़ा सिम्बल है। इसकी पौराणिक कथा तो ब्रह्मा और विष्णु के बीच एक शर्त से जुड़ी है। शिवलिंग ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधि है। जितने भी ज्योतिर्लिंग हैं, उनके आसपास सर्वाधिक न्यूक्लियर सक्रियता पाई जाती हैयही कारण है कि शिवलिंग की तप्तता को शांत रखने के लिए उन पर जल सहित बेलपत्र, धतूरा जैसे रेडियो धर्मिता को अवशोषित करने वाले पदार्थों को चढ़ाया जाता है।
आप देखेंगे कि कई ऐसी मान्यताएं केवल परंपरा व धर्म के नाम पर निभाई जाती हैं किंतु यदि उनकी गहराई से छानबीन की जाए Rajesh Kumar 07597718725 09414481324
रविवार, 2 दिसंबर 2018
शेयर बाजार ओर ज्योतिष
ज्योतिष का अच्छा ज्ञान होने के कारण मैंने अक्सर कुंडली (kundli, horoscope) और शेयर मार्किट में होने वाले फायदे और नुक्सान के संबंधों पर विशेष ध्यान दिया है. इसके साथ ही मुझे कई लोगों को स्टॉक मार्किट में ट्रेडिंग सिखाने का मौका मिला.
इस दौरान मैंने उनकी कुंडली का भी अध्ययन किया और यह पाया की ग्रहों की दशा का असर, आपकी ट्रेडिंग और निवेशक के द्वारा लिए जाने वाले निर्णय पर पड़ता है. मेरे कई जातकोऔर साथी ट्रेडर्स, निवेशकों ने कई बार ऐसे स्टॉक्स (stocks), फ्यूचर या आप्शन (पुट और कॉल) ख़रीदे और नुक्सान उठाया जिनमें की सामान्य दशा में वह कभी भी ट्रेड नहीं करते. ऐसे में मेरे पास सलाह के लिए आने पर मुझे उनकी कुंडली (kundali, kundli, horoscope) देखने का मौका मिला और यह पाया की ज्यादातर ऐसे निर्णयों के लिए उनकी ग्रह दशा जिम्मेदार थी. भारतीय ज्योतिष (में नौ ग्रहों सत्ताईस नक्षत्रों बारह राशियों और कुंडली के बारह भावों या घर आदि की स्तिथियों के अनुसार व्यक्ति का भूत, भविष्य और वर्तमान का पता लगाया जा सकता है इसके साथ ही कुंडली में लग्न, भाव, दशा, महादशा आदि का विचार करके जातक (वह व्यक्ति जिसकी कुंडली का अध्ययन किया जा रहा है) को फायदा होगा या नुक्सान आदि का पता लगाया जा सकता है.गोचर की स्थिति पर भी शेयर बाजार की मंदी तेजी प्रभाव रखती है जैसे शेयर बाजार की तेजी शनि के वक्री होने के बाद होती है.शेयर बाजार की मन्दी शनि के मार्गी होने के दो माह बाद होती हैबुध वक्री,शनि मंगल का साथ शानि राहु का साथ शेयर बाजार को तेज रखता है.वक्री बुध शेयर बाजार में तेजी लाता हैबुध अस्त समय मे मन्दी का कारक होता है.सूर्य से बुध की युति में अस्त और उदय होने की स्थिति शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। जब बुध का अस्त पूर्व दिशा में होता है तब शेयर के भाव तेजी की तरफ होते हैं, किंतु जब बुध का अस्त पश्चिम दिशा में होता है, तब बाजार में मंदी का माहौल बनता है। इसी तरह जब बुध का उदय पूर्व दिशा में होता है, तब बाजार में तेजी का और जब पश्चिम दिशा में होता है, तब मंदी का माहौल बनता है। सूर्य का गोचर भ्रमण विभिन्न नक्षत्रों से होता है, तब तेजीकारक या मंदीकारक या मिश्रफल कारक नक्षत्रों के प्रभाव से शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव आते हैं। सूर्य को एक राशि का भ्रमण पूरा करने में एक माह लगता है। शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव में गोचर की भूमिका अहम होती है।मंगल के वक्री होने के समय सोने में तेजी आती है,धन का कारक शुक्र है बुध धन की छाप है,गुरु उसकी कीमत है,सूर्य राजकीय नियंत्रण है,मंगल उसका तकनीकी रूप से विकसित करने का काम है,चन्द्रमा प्रचलन में है,केतु खाली स्थान है और राहु भरने वाला कारक है,जिस ग्रह के साथ होगा उसे केतु खाली करेगा और राहु जिस स्थान और ग्रह के साथ होगा उसे उसी प्रभाव से भरेगा.दूसरे का चौथा पंचम,पंचम का चौथा अष्टम,अष्टम का चौथा ग्यारहवां भाव,धन के व्यापार से देखा जाता है,अगर केतु इन स्थानो मे है तो इन भावो को खाली करेगा और इसके विपरीत वाले भाव राहु के बल से भरने का काम करेंगे,बाकी के ग्रह अपने अपने अनुसार शक्ति देंगे.नकद पूंजी दूसरे भाव से पंचम की बुद्धि से व्यवसाय का रूप और स्थान लेकर अष्टम की जोखिम से लाभ वाले स्थान की पूर्ति और इनसे एक घर भी आगे निकल गये तो हानि का घर ही सामने आयेगाआप चाहे छत्तीस प्रकार की टेक्निकल एनालिसिस कर ले या दुनिया भर की रिसर्च, चार्ट्स आदि का अध्ययन कर ले, बड़े से बड़ा मार्किट एक्सपर्ट या टिप्स, सब चीज़े बेकार हो जाती है अगर आपकी किस्मत में पैसा नहीं लिखा है. जैसे ही आप ट्रेड लगाते है या निवेश करते है, आपका अपना अनुभव होगा की बाजार में ऐसी खबर आएगी जिससे की आपका शेयर या बाजार पलट जायेगा और आप घाटे या नुक्सान में चले जायेंगे. इसका एक कारण आपकी मनस्थिति है. नव ग्रहों का आपकी मनस्थिति पर ऐसा असर पड़ता है की आप मूर्खतापूर्ण निर्णय लेते है और बाद में पछताते है.
बुधवार, 28 नवंबर 2018
चुनाव को जीतने का तरीका
चुनाव को जीतने का तरीका
चुनाव के अन्दर प्रत्याशी बनने और चुनाव को जीतने मे बहुत जद्दोजहद करनी पडती है,कोई धन का बल लेकर चुनाव जीतना चाहता है कोई अपने बल और दादागीरी पर चुनाव जीतना चाहता है,किसी के पास दादागीरी और धन दोनों ही नही है तो वह भलमन्साहत से चुनाव जीतने की कवायद करता है।
लेकिन सभी कुछ होने के बाद भी जब व्यक्ति चुनाव हार जाता है,तो उसकी जनता ही नही अपनी खुद की आत्मा भी धिक्कारती है कि अमुक कारण का निवारण अगर हो जाता तो चुनाव जीता जा सकता था। चुनाव का जीतना और राज करना दोनो ही अलग अलग बातें है,एक साधारण और कम पढा लिखा आदमी भी चुनाव जीत सकता है,और बहुत पढा व्यक्ति भी किसी नेता की चपरासी के अलावा कुछ नही कर सकता है,यह सब आदमी के बस की बात नहीं,यह सब होता है सितारों का खेल,अगर सितारे माफ़िक हों तो सभी कुछ हो सकता है,और अगर सितारे बस में नही है और खिलाफ़ है तो वह बना बनाया काम भी बरबाद होते देर नहीं लगती है। कोई भी ज्योतिषी सितारे खराब है या अच्छे है बता सकता है,खिलाफ़ सितारों के लिये उपाय के अन्दर सितारों को माफ़िक करने का रत्न धारण करवा सकता है टोटका करवा सकता है,लेकिन सितारे तो ठहरे सितारे,अगर किसी प्रकार के टोटके से सितारे बस में हो जायें तो आदमी की मृत्यु भी आती है,ज्योतिषी की भी आती है,अगर कोई रत्न या टोटका काम करता होता तो मौत तो आती ही नहीं,महर्षियों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी,लेकिन किसी रत्न या टोटके से नही की थी,उन्होने सितारों पर बिना किसी यान के यात्रा की थी,उन्होने आज से हजार साल पहले बता दिया था कि अमुक सितारा किस प्रकार का है,अमुक सितारे का मालिक कौन है आदि।कौन खिलाफ़ है और कौन माफ़िक
जन्म कुंडली से पता किया जा सकता है कि सितारे माफ़िक है,या खिलाफ़,और खिलाफ़ है तो किस कारण से है,राज करने का सितारा अगर खराब है तो किस कारण से खराब है,खराबी सितारे के बैठने के स्थान पर है,या सितारा जहां बैठा है वहां पर किसी खराब सितारे की निगाह है,या पडौस में कोई खराब सितारा अपनी नजर रखकर की जाने वाली सभी हरकतें दुश्मनों को सप्लाई कर रहा है,अथवा समय आने पर कोई दुश्मन सितारा अपने राज करने के सितारे से आकर टकराने वाला है,अथवा सितारा जिस स्थान पर बैठा है,वहां पर राज करने के लिये ठंडे माहौल की जरूरत है,और राज करने के लिये टकराने के समय में कोई गर्म सितारा आकर अपने अनुसार गर्मी का माहौल पैदा करने वाला है।
चुनाव जीतने के तीन बल
इन सब कारणों का पता करने के बाद तीन बलों का सामजस्य बैठाना जरूरी है,वैसे तो यह तीन बल सभी काम के लिये उत्तम माने जाते है लेकिन राज करने वाले के लिये यह तीनो बल हमेशा जरूरी है,इन तीन बलों को पहिचानना बहुत जरूरी होता है,जो इन तीन बलों का सामजस्य बनाकर चल दिया है वह सबसे अधिक तरक्की के रास्ते पर चला गया,और जिसे इन तीनों बलों का सामजस्य नहीं करना आता है वह सब कुछ होते भी बरबाद होता चला जाता है,आइये आपको इन तीनों बलों का ज्ञान करवा देते हैं,अपनी कुंडली को खोल कर देखिये कि यह तीनों बल आपके किस किस भाव में अपनी शोभा बढा रहे है,और यह तीनो बल आपकी किन किन सफ़लता वाली कोठरियों के बंद तालों को खोल सकते है।
मानव बल
मानव बल संसार का पहला बल है,किसी भी स्थान पर आपको देखने से पता चलता है,कि जिसके साथ जितने हाथ ऊपर हो जाते वह ही अपनी प्रतिष्ठा को कायम कर लेता है,लेकिन मानव बल भी दो प्रकार का होता है,एक देह बल होता है और दूसरा जीव बल होता है,देह बल की गिनती की जाती है लेकिन जीव बल की गिनती नहीं की जा सकती है,दबाब में आकर देह बल तो साथ रहने की कसम खा लेता है,लेकिन जीव बल का ठिकाना नहीं होता है कि वह अपनी चाहत किसके साथ रखे है,शरीर का किस्सा है कि इसके अन्दर बारह प्रकार के जीव बल विद्यमान है,और जो जीव बल आपके जीव बल से सामजस्य रखता है वही आपको किनारे पर ले जा सकता है,देह बल तो कभी भी बिना जीव बल के दूर हो सकता है,किसी देह के अन्दर किसी प्रकार का जीव बल अपना स्थान बना सकता है,लेकिन जीव बल के अन्दर देह बल अपना कुछ प्रभाव नही दे सकता है। जब मनुष्य जन्म लेता है तो जीव बल एक ही स्थान पर रहता है,अन्य बल अपना प्रभाव बदल सकते है,लेकिन जीव बल कभी भी अपना स्थान नही बदलता है,केवल स्वभाव के अन्दर कुछ समय के लिये अपना बदलाव कर सकता है।भौतिक बल
मानव बल के बाद दूसरा नम्बर भौतिक बल का आता है,बिना मानव बल के भौतिक बल का कोई महत्व नही है,भौतिक बल के अन्दर घर द्वार सम्पत्ति सोना चांदी रुपया पैसा आदि आते है,भौतिक बल भी बारह प्रकार का होता है,और इन बारह प्रकार के भौतिक बलों को पहिचानने के बाद मानव बल और भी परिपूर्ण हो जाता है।
दैव बल
मानव बल और भौतिक बलों के अलावा जो सबसे आवश्यक बल है वह दैव बल कहलाता है,बिना दैव बल के न तो मानव बल का कोई आस्तित्व है और न ही भौतिक बल की कोई कीमत है,मानव बल और भौतिक बल समय पर फ़ेल हो सकता है लेकिन दैव बल इन दोनो बलों के समाप्त होने के बाद भी अपनी शक्ति से बचाकर ला सकता है। दैव बल के अन्दर जो बल आते हैं उनके अन्दर विद्या का स्थान सर्वोपरि है,विद्या के बाद ही शब्द शक्ति की पहिचान होती है,और शब्द शक्ति के पहिचानने के बाद उसी शरीर से या भौतिक बल से किसी प्रकार से भी प्रयोग किया जा सकता है,शब्द शक्ति से व्यक्ति की जीवनी बदल जाती है,शब्द शक्ति से माता बच्चे को आजन्म नहीं त्याग पाती है,और शब्द शक्ति के सुनने के बाद आहत को लेकर लोग अस्पताल चले जाते है।
तीनों बलों को प्राप्त करने का तरीका
इन तीनो बलों को केवल विद्या और शब्द शक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है,लेकिन अन्तर रूप से जीव बल का होना भी जरूरी है,केवल देह बल का घमंड नही करना चाहिये,देह तो कमजोर भी काम कर जाती है,लेकिन जीव बल कमजोर होने पर विद्या और भौतिक बल भी कमजोर हो जाते है। इन तीनो बलों का सामजस्य बैठाना ही एक समझदार की कला होती है,आइये आपको इन तीनो बलों को प्राप्त करने के तरीके बताता हूँ। भगवान गणेश मानव बल के देवता है,माता लक्ष्मी भौतिक बल की दाता है,और माता सरस्वती विद्या तथा शब्द बल की प्रदाता है,इन तीनों देव शक्तियों का उपयोग चुनाव में शर्तिया सफ़लता दिला सकती है। इन तीनो शक्तियों को प्राप्त करने के लिये आज के युग में गणेश जी के रूप में संगठनों के मुखिया,लक्षमी के रूप में धनिक लोगों का साथ,और सरस्वती मैया के रूप में कालेज और स्कूलों के अध्यापकों को साथ रखने का लाभ पूरी तरह से मिल सकता है। रिस्तेदारी में गणेशजी के रूप में साला,बहनोई,भान्जा,भतीजा चुनाव मे अन्दर काम आ सकते है,लक्ष्मी के रूप में हर घर की गृहणियां काम आ सकती है,इनके लिये पति को पत्नी का और पत्नी को पति का साथ लेना चाहिये,सरस्वती के रूप में बडे बूढे और घर के परिवार के रिस्तेदारों का साथ जरूरी है। ग्रहों के अन्दर केतु गणेशजी के शुक्र लक्ष्मी के और राहु सरस्वती का कारक है। जातियों के अन्दर केतु एस सी और एस टी के अन्दर,शुक्र महिला संगठनो और मीडिया के अन्दर,सरस्वती मुस्लिम और शब्द-धर्मी लोगों के साथ काम आ सकता है।
बिना राहु की सहायता के चुनाव नही जीता जा सकता है
जिस प्रकार से आसमान सभी के सिर पर छाया हुआ है और इसी आसमान से सूर्य भी उदय होता है तारे भी दिखाई देते है तथा चन्द्रमा का उदय होना और अस्त होना भी देखा जाता है.राहु सभी को धारण भी करता है और बरबाद भी करता है इसलिये राहु को विराट रूप मे देखा जाता है,महाभारत के युद्ध मे अर्जुन को मोह से दूर करने के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने विराटरूप का प्रदर्शन किया था जिसके द्वारा उन्होने दिखाया था कि संसार उनके मुंह के अन्दर समा भी रहा है और संसार की उत्पत्ति भी उन्ही के द्वारा हो रही है,इस रूप का नाम ही विराट रूप में देखा जाता है.राजनीतिक क्षेत्र मे एक प्रकार का प्रभाव जनता के अन्दर प्रदर्शित करना होता है जिसके अन्दर जनता के मन मस्तिष्क मे केवल उसी प्रत्याशी की छवि विद्यमान रहती है जिसका राहु बहुत ही प्रबल होता है,अक्सर राजनीतिक पार्टिया राहु को प्रयोग करती है उस राहु को वे अपने नाम से और नाम को समुदाय विशेष से जोड कर रखती है.अगर पार्टी समुदाय विशेष से जोड कर नही चलेगी या किसी भी समुदाय को अपने हित के लिये प्रयोग मे लाना चाहेगी तो वह कभी भी किसी भी समय समुदाय विशेष के रूठने पर या किसी भी बात के बनने से वह दूर हो सकता है तथा जीती हुयी जीत भी हार मे बदल सकती है.कोई भी पार्टी चाहे कि वह धन की बदौलत जीत हासिल कर ले यह नही हो सकता है कभी कभी आपने देखा होगा कि एक पार्टी लाखो करोडो खर्च करने के बाद भी जीत हासिल नही कर पाती है और एक बिना पैसे को खर्च किये पार्टी अपनी छवि को सुधारती चली जाती है,इस बात को प्रभाव मे लाने के लिये राहु को विशेष दर्जा दिया जाता है.राहु उल्टा चलता है और इस उल्टी गति को समाज मे फ़ैलाने के लिये लोग पहले जनता के अन्दर भय का माहौल भरते है और उसके बाद अपनी गतियों से जनता मे उल्टे कामो को दूर करने के लिये अपनी स्थिति को दर्शाते है और इसी प्रकार से जनता के अन्दर अपनी छवि को बनाकर अपनी उपस्थिति को प्रदान करते है परिणाम मे वे जीत कर सामने आजाते है.राहु कभी भी अपनी स्थिति को जीवन मे प्रदान कर सकता है सूर्य और राहु के अन्दर यह देखा जाता है कि सूर्य के अन्दर बल कितना है अगर सूर्य की रश्मिया तेज है तो राहु उन्हे चमकाने के लियेतोराहु उन्हे चमकाने के लिये अपनी गति को प्रदान करता है और राहु अगर मजबूत है और सूर्य की गति अगर धीमी है तो जरूरी होता है कि सूर्य अपनी स्थिति को नही दिखा पाता है इस बात को अक्सर देखा होगा कि जन्म लेने के समय यानी सूर्य उदय होने के समय राहु अपनी स्थिति को एक धुंधले प्रकाश के रूप मे सामने रखता है यह बात उन लोगों के लिये मानी जाती है जो अपने बचपने के कारण राजनीति से जुड तो जाते है लेकिन अपने को केवल एक दिशा विशेष से ही सामने ला पाते है अगर बीच का सूर्य यानी दोपहर का सूर्य जो जवानी के रूप मे माना जाता है और वह अपना प्रकाश राहु के द्वारा क्षितिज पर फ़ैला कर आया है तो लोग उस व्यक्ति पर चारों तरफ़ से आकर्षित होकर उसे ही देखने के लिये फ़िर से अपना प्रयास करने लगते है.राहु बुध के साथ मिलकर बोलने की क्षमता देता है तो राहु मंगल के साथ मिलकर अपनी शक्ति से जनता के अन्दर नाम कमाने की हैसियत देता है राहु सूर्य के साथ मिलकर राजकीय कानूनो और राजकीय क्षेत्र के बारे मे बडी नालेज देता है वही राहु गुरु के साथ मिलकर उल्टी हवा को प्रवाहित करने के लिये भी देखा जाता है,राहु शनि के साथ मिलकर मजदूर संगठनो का मुखिया बना कर सामने लाता है तो राहु शुक्र के साथ मिलकर लोगों के अन्दर चमक दमक से प्रसारित होने अपने को समाज मे दिखाने और अपने द्वारा मनोरंजक बातों के प्रति सामने रखने से माना जा सकता है.
राहु हर अठारह साल मे मानसिक गति को बदल देता है इस राहु के द्वारा ही दक्षिण का शासन भारत पर हुआ है और जो भी चलने वाली प्रथा समाज आदि है उनके प्रति भयंकर बदलाव देने के लिये अपनी शक्ति को देने वाला बना है.उपनी स्थिति को बनाकर सामने लाने के लिये पहले शासन करता है और वही केतु अपनी युति से राहु के द्वारा खर्च कर दिया जाता है,जैसे आपरेशन ब्लू स्टार को ही देख लीजिये,भाजपा का पतन भी देखा होगा कांग्रेस का अक्समात सफ़ाया भी देखा भाजपा पार्टीीी का फिर उठना यह सब राहु की ही करामात का परिणाम था.अक्सर लोग एक नशे के अन्दर आजाते है और उन्हे केवल अपने अहम के अलावा और कुछ नही दिखाई देता है वे समझते है कि वे ही अपने धन और बाहुबल से सब कुछ कर सकते है राहु उनकी शक्ति को अपने ही कारण बनवा कर उन्हे ग्रहण दे देता है,लेकिन जो सामाजिक मर्यादा से चलते है समाज को राजनीति से सुधारने के लिये अपने प्रयासो को करते है राहु उन्हे भी ग्रहण देता जरूर है पर कुछ समय बाद उन्हे उसी प्रकार से उगल कर बाहर कर देता है जैसे हनुमान जी लंका मे जाते समय सुरसा के पेट मे गये जरूर थे लेकिन अपने बुद्धि और पराक्रम के बल पर बाहर भी आ गये थे,वहां पर उनकी यह धारणा बिलकुल नही थी कि वे अपने काम के लिये जा रहे है या अपने ही हित के लिये कोई साधन बना रहे है,वे राम के कार्य के लिये जा रहे थे और राम कार्य ही उनके लिये सर्वोपरि था.यह भी इतिहास बताता है कि जब भी राहु ने राजनीतिक लोगो को ग्रहण दिया है वे कभी भी उस ग्रहण से नही निकल पाये है उनके साथ चलने वाले लोग ही उनके दुश्मन बनकर सामने आये है और उन्हे डुबोकर खुद को सामने करते देखे गये है.
राहु का मुख्य उपाय आप अपनी कुंडली दिखा कर हमसे संपर्क करके आप प्राप्त कर सकते हैं
राहु के लिये कितने ही यज्ञ किये जाये राहु के लिये कितने ही रत्न धारण किये जाये लेकिन राहु कभी भी शांत नही होता है जिस प्रकार से एक शराबी का नशा दूर करने के लिये कितने ही उपाय किये जाये वह अपनी शराब का नशा दूर नही जाने देता है उसी प्रकार से राहु जो राजनीति का नशा देता है या किसी प्रकार से अपनी योग्यता को जाहिर करने के लिये अपने बल को देता है अगर राहु का तर्पण नही किया जाता है वह कभी भी अपने दुष्परिणामो को नही रोक सकता है.व्यक्ति के पास जब तक अपने पूर्वजो का बल नही है वह अपने आसपास के रहने वाले अद्रश्य शक्ति के कारणो पर विश्वास नही करता है जैसे स्थान देवता वास्तु देवता पास की नदी समुद्र गंवादेवी स्थान योगिनी समुदायिक शक्ति को प्रदान करने वाली गणयोगिनी राजलक्ष्मी के रूप मे सहायता करने वाली तारासुन्दरी आदि व्यक्ति की सहायक नही होती है तो राजनीति मे प्रवेश पाना बहुत ही मुश्किल ही नही असम्भव माना जाता है,अक्सर जो राजनीति मे ऊपर उठने के लिये अपने प्रयास करते है उनके आसपास कोई न कोई तांत्रिक जरूर देखा जाता है उस तांत्रिक के पास वह सब कारण बनाने के लिये योग्यता होती है जो व्यक्ति को आने वाले खतरे से दूर भी करती है और उसके द्वारा किये गये जरा से काम को बहुत ऊंचा करने के में विजय प्राप्ति हेतु बगलामुखी कवच और त्रिशक्ति कवच प्राप्त करके गले में धारण करें। इसके धारण से विरोधियों को नर्वस करने में सुविधा मिलेगी। माहौल भी मजबूत बनेगा। ग्रहों को कंट्रोल करना भी इनका काम है अधिक जानकारी हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं
सोमवार, 26 नवंबर 2018
कौन बनेगा प्रधानमंत्री 2019 में राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी
2019 मेदेश की राजनीति में क्या उथल-पुथल होगी,
अगले चुनाव में कौन प्रधानमंत्री बनेगा क्या कहती है पीएम मोदी की कुंडली ओर राहुल गांधी की पहले वात करते हैं नरेन्द्र मोदी जी की मित्रो बहुत ही सरल भाषा में दोनों की कुंडली का विश्लेषण कर रहा हूं आप खुद ही अंदाजा लगा सकते है कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा यहां मैं कोई भविष्यवाणी नहीं कर रहा सिर्फ ज्योतिषी नजर से कुंडलियों का विश्लेषण सरल भाषा में सिंपल भाषा में कर रहा हूं पूरा फल इतना नहीं कर रहा हूं मित्रों बस थोड़ा कुंडलीयोको आप समझे और पूरी पोस्ट को पढ़ें
अब बात की जी रही है पीएम मोदी की कुंडली की। पीएम मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न वृश्चिक राशि की है। साथ ही पीएम मोदी की कुंडली में चंद्रमा की महादशा चल रही है। जो वर्ष 2021 तक चलेगी। चंद्र अनुराधा नक्षत्र में बैठा है जो शनि का है शनि का संबंध दंसव भाव से हो रहा है दसवे घर में बैठे शनि, शुक्र का मेल इन्सान को एक अच्छा राजनेता वनाता है पीएम मोदी की कुंडली में चन्द्रमा की महादशा में बुध का अंतर चल रहा है, यह स्थिति 3 मार्च 2019 तक रहेगी।वुघ का संवघ भी दंसव से हो रहा है इसके ठीक बाद कुंडली में केतु का अतर आयेगा। इसके अतिरिक्त वृश्चिक लग्र के लिए बृहस्पति पंचमेश में होता है। यह स्थिति बहुत अच्छी मानी गई है। तो बता दें जिसका फायदा पीएम मोदी को 2019 चुनाव में होगा और एक बार पीएम नरेन्द्र मोदी के चलते बीजेपी को बहुमत या फिर सबसे अधिक सीट मिल सकती है।
पीएम मोदी के कारण ही बीजेपी को लाभ होगा। तो यहां बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलने का दावा कर सकता हु, बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनेगी और फिर से देश की सत्ता पीएम मोदी के हाथों में होगी।
अब बात करते हैं राहुल गांधी जी की कुंडली की कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की कुंडली बताती है कि वे दमदार नेतृत्व के साथ उभरेंगे, लेकिन कुछ कमियों से वे पीछे रह सकते हैं । जाने राहुल गांधी के कुंडली के ग्रहों के अनुसार क्या होगा उनका कराजनीतिक भविष्य(Rahul Gandhi) का जन्म भारत वर्ष के दिल्ली प्रदेश में दिनांक 18 जून 1970 को को रात्रि 9 बज कर 52 मिनट पर हुआ राहुल गाँधी जी के जीवन में अनेकों परिस्थितियों जैसे उतार-चढ़ाव दिखने को मिलते हैं आज बात करते हैं इस समय उनकी कुंडली में चंद्रमा की महादशा में शनि का अंतर चल रहा हैचन्द्रमा ( Moon) उनकी कुंडली में नीच राशि में छठे स्थान में बैठा है , साथ ही छठे भाव का स्वामी मंगल लग्न में और मिथुन लग्न होने से लग्न का स्वामी बुध ग्रह बनता है बारहवे स्थान में , मैंने हमेशा कहा है की अगर लग्न या दशम का बारहवे भाव से सम्बन्ध बन रहा है तो राजभंग योग का निर्माण होता है इनके कुंडली के 5 भाव में शुक्र (venus) भी नवमांश कुंडली में नीच का है अतः राजभंग योग के जितने कारण बन सकते है सब कुंडली में उपलब्ध है।
इस समय में उनके बारहवा और छठा (12th house और 6th House) भाव पूरी तरह से Active थे , साथ ही चन्द्रमा बुध के नक्षत्र में (12th house से connection ) और बुध चन्द्रमा के नक्षत्र में (6th house से connection) , चन्द्रमा आत्मकारक ग्रह भी है और हमेशा मैंने कहा है की दशा बहुत कड़वे अनुभवों वाली रहती है
राहुल गाँधी जी का वर्तमान समय ग्रहों के हिसाब से कुंडली में बैठे ग्रहो जैसे सर्व प्रथम कुंडली में बैठे वाणी करक गृह बुध को प्रबल व समाधान करना होगा और साथ ही राजनितिक का स्वामी शनि गृह जो कुंडली में नीच राशि का हे कुंडली में मे चंद्र भी नीच राशि का स्थित हैअव भारत की कुंडली
15/08/1947रात 12वजे अव मित्रों मोदी जी कुंडली राहुल गांधी जी कुंडली ओर भारत की कुंडली में आप देखेंगे की एक वात कोमन है कि सभी की चंद की माहादश चल रही है अभी उस समय मोदी की कुंडली राहुल गांधी की कुंडली पर काफी भारी दिखाई दे रही है यही बात मैं इस पोस्ट में समझाना चाहता था कि मोदी के सामने राहुल ही क्यों?
शनिवार, 24 नवंबर 2018
वक्री ग्रह
वक्री ग्रह
आज वक्री ग्रहों के बारे में बात करते हैकी बक्री.वक्री का सामान्य अर्थ उल्टा होता है वबक्री का अर्थ टेढ़ा..साधारण दृष्टि से देखें या कहेंतो सूर्य,बुध आदि ग्रह धरती से कोसों दूर हैं.भ्रमणचक्र मेंअपने परिभ्रमण की प्रक्रिया में भ्रमणचक्र के अंडाकारहोने से कभी ये ग्रह धरती से बहुत दूर चले जाते हैं
तो कभी नजदीक आ जाते हैं.जब जब ग्रह पृथ्वी केअधिक निकट आ जाता है तो पृथ्वी की गति अधिकहोने से वह ग्रह उलटी दिशा की और जाता महसूसहोता है.उदाहरण के लिए मान लीजिये की आप एक तेजरफ़्तार कार में बैठे हैं,व आपके बगल में आप ही की जानेकी दिशा में कोई साईकल से जा रहा है तो जैसेही आप उस साईकल सवार से आगे निकलेंगेतो आपको वह यूँ दिखाई देगा मानो वो आपसेविपरीत दिशा में जा रहा है.जबकि वास्तव में वहभी आपकी दिशा की और ही जा रहा होता है.आपकी गति अधिक होने से एकएक दूसरे को क्रोस करने के समय आगे आने के बावजूद वह
आपको पीछे यानि की उल्टा जाता दिखाई देता है.और जाहिर रूप से आप इस प्रभाव को उसी गाडी सवार ,या साईकिल सवार के साथ
महसूस कर पाते है जो आपके नजदीक होता है,दूर केकिसी वाहन के साथ आप इस क्रिया को महसूस
नहीं कर सकते. ज्योतिष की भाषा में इसे कहा जायेगा की साईकिल सवार आप से वक्री हो रहा है.यही ग्रहों का पृथ्वी से
वक्री होना कहलाता है.सीधे अर्थों में समझें की वक्री ग्रह पृथ्वी से अधिक निकट हो जाता है.अब निकट होने से क्या होता होगा भला?
यही होता है की ग्रह का असर ,ग्रह का प्रभाव बढ जाता है. कई ज्योतिषियों का इस विषय पर अलगअलग मत है.कहा यह भी जाता है की वक्री होने से ग्रह उल्टा असर देने लगता है.आप जलती हुई भट्टी से दूरबैठे हैं,जैसे ही आप भट्टी के निकट जाते हैं
तो आपको अधिक गर्मी लगने लगती है.क्यों?क्योंककिआपके और भट्टी के बीच की दूरी कम हो गयी है.भट्टी में तो आग तब भी उतनी ही थी जबआप उससे दूर थे,व अब भी उतनी ही है जब आप उसके नजदीक हैं.आग में कोई भी फर्क नहीं आया है बस नजदीक होने से हमें उसका प्रभाव अब प्रबलता से महसूस हो रहा है. एक अन्य उदाहरण लीजिये, आप किसी पंखे
से दूर बैठे हैं जहाँ पंखे की बहुत कम हवा आप तक आ रही है,आप अपनी कुर्सी उठा कर पंखे के निकट आ जाते हैं,अब आप पंखे की हवा को अधिक जोर से महसूस कर रहे
हैं.जबकि पंखा अब भी उसी स्पीड पर चल रहा है जिस पर पहले चल रहा था.प्रभाव में अंतर दूरी घटने से हुआ है,अवस्था में कोई फर्क नहीं आया है.इसी प्रकार यहमानना की वक्री होने से ग्रह अपना उल्टा असर देने लगेगा यह मान लेना है की भट्टी के निकट जाने से वह ठंडी हवा देने लगेगी,या निकट आने पर पंखा आग उगलने लगेगा.ग्रह के वक्री होने से उसके नैसर्गिक गुण में ,उसके व्यवहार में किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं आता अपितु उसके
प्रभाव में ,उसकी शक्ति में प्रबलता आ जाती है.देव गुरु ब्रह्स्पत्ति जिस कुंडली में वक्री हो जाते हैं वह जातक अधिक बोलने लगता है,लोगों को बिन मांगे सलाह देने लगता है.गुरु ज्ञान का कारक है,ज्ञान का ग्रह जब वक्री हो जाता है तो जातक अपनी आयु के अन्य जातकों से आगे भागने लगता है,हर समय उसका दिमाग नयी नयी बातों की और जाता है.सीधी भाषा में कहूँ
तो ऐसा जातक अपनी उम्र से पहले
बड़ा हो जाता है,वह उन बातों ,उन विषयों को आज जानने का प्रयास करने लगता है,सामान्य रूप से जिन्हें
उसे दो साल बाद जानना चाहिए.समझ लीजिये की एक टेलीविजन चलाने के किये उसे घर के सामान्य वाट के बदले सीधे हाई टेंसन से तार मिल जाती है.परिणाम क्या होगा?यही होगा की अधिक
पावर मिलने से टेलीविजन फुंक जाएगा.इसी प्रकार गुरु का वक्री होना जातक को बार बार अपने ज्ञान
का प्रदर्शन करने को उकसाता है.जानकारी ना होने के बावजूद वह हर विषय से छेड़ छाड़ करने की कोशिश करता है.अपने ऊपर उसे आवश्यकता से अधिक विश्वास होने लगता है जिस कारण वह ओवर कोंनफीडेंट अर्थातअति आत्म विश्वास का शिकार होकर पीछे रह
जाता है. कई जातक ऐसे देखे होंगे की जो हर जगहअपनी बात को ऊपर रखने का प्रयास करते हैं,जिन्हें
अपने ज्ञान पर औरों से अधिक भरोसा होता है,जो हरबात में सदा आगे रहने का प्रयास करते हैं,ऐसे जातक वक्री गुरु से प्रभावित होते हैं.जिस आयु में गुरुका जितना प्रभाव उन्हें चाहिए वो उससे अधिक
प्रभाव मिलने के कारण स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते.कई बार आपने बहुत छोटी आयु में बालक बालिकाओं को चरित्र से से भटकते हुए देखा होगा.विपरीत लिंगी की ओर उनका आकर्षण एक निश्चित आयु से पहले ही होने लगता है.कभी कारण सोचा है आपने इसबात का ?विपरीत लिंग की और आकर्षण एक
सामान्य प्रक्रिया है,शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन के बाद एक निश्चित आयु के बाद यह आकर्षण
होने लगना सामान्य सी कुदरती अवस्था है.शरीर में मंगल व शुक्र रक्त,हारमोंस,सेक्स ,व आकर्षण
को नियंत्रित करने वाले कहे गए हैं.इन दोनों में सेकिसी भी ग्रह का वक्री होना इस प्रभाव को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है. यही प्रभाव जाने अनजाने उन्हें उम्र से पहले वो शारीरिक बदलाव महसूस करने को मजबूर कर देता है जो सामान्य रूप सेउन्हें काफी देर बाद करना चाहिए था.शनि महाराज हर कार्य में अपने स्वभाव के अनुसार परिणाम को देर से देने,रोक देने ,या कहें सुस्त रफ़्तार में बदल देने को मशहूर हैं.कभी आपने किसी ऐसे बच्चे को देखा है जो अपने आयु वर्ग के बच्चों से अधिक सुस्त
है,जा जिस को आप हर बात में आलस करते पाते हैं.खेलने में ,शैतानियाँ करने में,धमाचौकड़ी मचाने में जिसvका मन नहीं लग रहा. उसके सामान्य रिफ़लेकसन
कहीं कमजोर तो नहीं हैं . जरा उस
की कुंडली का अवलोकन कीजिये,कहीं उसके लग्न में
शनि देव जी वक्री होकर तो विराजमान नहीं हैं.
इसी प्रकार वक्री ग्रह कुंडली में आपने भाव व अपने नैसर्गिक स्वभाव के अनुसार अलग अलग परिणाम देते
हैं.अततः कुंडली की विवेचना करते समय ग्रहों की वक्रता का ध्यान देना अति आवश्यक है.अन्यथा जिस ग्रह को अनुकूल मान कर आप समस्या में नजरंदाज कर रहे हो होते हैं ,वही समस्या का वास्तविक कारण होता है,व आप उपाय दूसरे ग्रह का कर रहे होते हैं.परिणामस्वरूप समस्या का सही समाधान नहीं हो पाता.
फिर बता दूं की वक्री होने से ग्रह के
स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता,बस उसकी शक्ति बढ़जाती है.अब कुंडली के किस भाव को ग्रह
की कितनी शक्ति की आवश्यकता थी व वास्तव में वह कितनी तीव्रता से उस भाव को प्रभावित कर
रहा है,इस से परिणामो में अंतर आ जाता है व कुंडली का रूप व दिशा ही बदल जाती हैआप भी अपनी कुन्ङली अपने शहर के अच्छे ज्योतिषी को दिखा कर सलाह लेआप हम से भी सम्पर्क कर सकते है 07597718725 09414481324
सोमवार, 19 नवंबर 2018
रविवार, 18 नवंबर 2018
कुंडली विवेचन मे चतुर्थांशका महत्त्व
कुंडली विवेचन मे चतुर्थांश के बिना फ़लादेश करना उसी प्रकार से है जैसे गर्मी की ऋतु में दूर रेगिस्तान में मृग मारीचिका को जल समझ कर भागना। लगन कुंडली शरीर के लिये चन्द्र कुंडली मानसिक रूप से संसार के लिये नवमांश कुंडली जीवन साथी और जीवन की जद्दोजहद के लिये सप्तांश कुंडली संतान सुख के लिये होरा कुंडली धन सम्पत्ति के लिये देखी जाती है उसी प्रकार से चतुर्थांश कुंडली को भाग्य के लिये देखना बहुत जरूरी होता है। एक जातिका की कुंडली का विवेचन प्रस्तुत है,यह जातिका आगरा दिनांक 24 दिसम्बर 1978 को शाम 6 बजकर 30 मिनट पर पैदा हुयी है। जातिका की मिथुन लगन है और चन्द्र राशि कन्या है,
लेकिन जातिका का नाम तुला राशि से रखा गया है। इस कुंडली मे लगन को बल देने वाले ग्रह सूर्य मंगल और केतु है.सूर्य छोटे भाई बहिन का कारक है और मंगल चाचा और बडे भाई का कारक है,केतु जातिका की दादी और नानी के लिये माना जायेगा.जातिका के शरीर की पालन पोषण की जिम्मेदारी इन्ही तीनो पर है.लगनेश बुध छठे भाव मे है और बुध के साथ वक्री गुरु अपनी स्थिति को दे रहा है। लगनेश का स्थान वृश्चिक राशि मे होने के कारण जातिका को नौकरी और गूढ ज्ञान की अच्छी जानकारी है। शरीर का मालिक बुध छठे भाव मे होने के कारण जातिका को अनुवांशिक बीमारी से भी ग्रस्त माना जाता है। चन्द्र शुक्र और बुध तीनो ही राहु शनि सूर्य मंगल के बीच मे होने के कारण यह अनुवांशिक बीमारी माता के परिवार से मानी जा सकती है। वैसे ज्योतिष के अनुसार सूर्य हड्डियों का कारक होता है चन्द्रमा शरीर के पानी का कारक है,मंगल रक्त का कारक है,बुध स्नायु का और नसों का कारक है,गुरु शरीर की वायु का कारक है,शुक्र शरीर की सुन्दरता का कारक है शनि बाल खाल त्वचा का कारक है,राहु जिस ग्रह के साथ होता है उसी की बीमारी को देता है,केतु का असर जहां तक होता है वहां तक वह अपना असर सहायता के लिये देना माना जाता है। वैसे केतु को भी शरीर के जोड प्रयोग किये जाने वाले अंगो केलिये माना जाता है। राहु का शनि के साथ होने से जातिका को त्वचा की बीमारी है,शनि से आगे चन्द्रमा के होने से त्वचा में सफ़ेद रंग के दाग माने जाते है राहु शनि की तीसरी पूर्ण द्रिष्टि शुक्र पर पडने के कारण शरीर की सुन्दरता पर ग्रहण दिया हुआ है,इसी के साथ केवल राहु की पंचम द्रिष्टि मंगल और सूर्य पर पडने के कारण खून के अन्दर इन्फ़ेक्सन और शरीर के ढांचे में भी ग्रहण दिया माना जाता है यह राहु का प्रभाव जातिका के बडे और छोटे भाई बहिनो पर भी है। लेकिन एक बात का और भी सोचना जरूरी होता है कि राहु के पास वाले ग्रह और भाव अगर दिक्कत देने वाले होते है तो केतु के आसपास वाले ग्रह और भाव दिक्कतो से बचे रहने वाले भी माने जाते है। अगर राहु शरीर के प्रति अपनी सुन्दरता मे कमी देने का कारक है तो केतु उस सुन्दरता में अपनी योग्यता से उसे बुद्धिमान बनाने के लिये भी अपनी योग्यता को दे रहा है। सबसे अधिक प्रभाव जातिका के जीवन मे भाग्य के प्रति माना जा सकता है,
अगर चतुर्थांश की कुंडली को बनाया जाये तो इस प्रकार से कुंडली का निर्माण होगा जातिका के चतुर्थांश में कालपुरुष की दो त्रिक राशियां मीन और वृश्चिक जातिका के लगन और नवे भाव मे है,तथा तीसरी त्रिक राशि सप्तम यानी पति के स्थान मे है। इन तीनो त्रिक राशियों का प्रभाव जातिका के जीवन में आजीवन रहना निश्चित है।लगन कुंडली मे जैसे राहु का प्रकोप जातिका के प्रदर्शन यानी तीसरे भाव मे शनि के साथ है तो भाग्य मे भी राहु का प्रकोप बुध के साथ तीसरे भाव मे ही है। यहां शरीर की सुन्दरता पर असर देने वाले राहु और केतु दोनो ही है,गुरु के वक्री होने के कारण और बारहवे शनि से गुरु की युति होने के साथ साथ गुरु का प्रभाव मंगल और चन्द्र पर भी है। भाग्य मे चन्द्रमा का साथ मंगल के साथ होने से और चन्द्रमा से गुरु वक्री के साथ पंचम सम्बन्ध होने तथा चन्द्रमा से भाग्य में नवे भाव मे शनि के होने से माता के दोष से ही जातिका का भाग्य विदीर्ण होना माना जायेगा। माता के बारहवे भाव में बुध राहु के होने से झूठ बोलना और फ़रेब से अपना काम बनाने की युति रखना तथा बुध से सप्तम में वृश्चिक का केतु होना इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि कोई जायदाद जो मृत्यु के बाद किसी को मिलनी थी वह जायदाद झूठे कारण से खुद के लिये प्राप्त करने के कारण यह राहु का दोष बुध यानी लडकी पर स्थापित हो गया। यह एक प्रकार का अभिशाप भी कहा जाता है जो अन्तर्मन से दिया जाता है। चन्द्रमा के आगे शुक्र के होने से जातिका की माता ने अपने स्वार्थ के लिये व्यापार करने वाला स्थान या रहने वाला घर अथवा कोई सरकारी क्षेत्र का अधिकार झूठ से प्राप्त किया जाना भी मिलता है इस कारण से सन्तान यानी वक्री गुरु पर राहु का असर होने से और गुरु वक्री से आगे केतु के होने से सन्तान को सब कुछ प्राप्त होने के बाद भी कुछ नही होना माना जा सकता है,अक्सर चन्द्रमा से वक्री गुरु के पंचम मे होने से गुरु अपने पुरुष प्रभाव को छोड कर वक्री होने पर स्त्री प्रभाव को बली कर देता है और बजाय पुरुष सन्तान के स्त्री संतान का होना माना जाता है। इस प्रभाव से जातिका की माता को भी छठा केतु होने के कारण शरीर के जोडो और जननांग सम्बन्धी बीमारियां इन्फ़ेक्सन और गुदा सम्बन्धी बीमारियां भी परेशान करने के लिये मानी जा सकती है।
गुरु के वक्री होने से एक बात और भी समझी जा सकती है कि जो व्यक्ति अपनी चालाकी से किसी असहाय की सम्पत्ति को हडप कर उसे अपनी संतान के लिये प्रयोग मे लाना चाहते है समय की मार शुरु होते ही वह असहाय की हाय जातक के जीवन को तबाह करके रख देती है। चतुर्थांश में गुरु के अष्टम में वक्री होने के इस रूप को भली भांति समझा जा सकता है। जातिका पूर्ण रूप से दिमागी ताकत से पूर्ण है,जातिका को बुद्धि वाले काम करने की पूरी योग्यता है,जातक के सभी अंग सुरक्षित है लेकिन त्वचा पर सफ़ेद दाग होने से जातिका की शादी विवाह और सम्बन्धो के मामले मे दिक्कत है। इस गुरु के वक्री होने पर अक्सर जातक के सन्तान में पहले तो सन्तान सुख होता ही नही है और होता भी है तो केवल पुत्री सन्तान हो जाती है जो शादी के बाद अपने ससुराल जाकर माता पिता को अकेले छोड जाती है। गुरु की सिफ़्त के अनुसार अगर वक्री गुरु होता है तो वह जल्दबाजी का कारक भी होता है इस गुरु के आगे घर मे बजाय पुरुष वर्ग के चलने के स्त्री वर्ग की अधिक चलती है और वह अपनी ही सन्तान और परिवार को अधिक देखने के कारण तथा अन्य लोगों के साथ दुर्व्यवहार रखने से भी अपनी भाग्य की शैली को अन्धेरे मे डाल कर रखती है।
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