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मंगलवार, 20 मार्च 2018

रत्न फिरोजा Gemstone

मित्रों आज वात करते हैं फिरोजा रतन की ग्रहों के प्रभाव को वल देने के लिए या फिर उन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए ज्योतिष विज्ञान द्वारा विभिन्न प्रकार के रत्न प्रदान किए गए हैं। 
यह रत्न हमारे जीवन को सुधारने और यहां तक कि कई रोगों से लड़ने में भी सहायक सिद्ध होते हैं।या फिर समस्याओं दूर करने के लिए रत्नों का सहारा लिया जाता है।
वैसे पहले भी हम आपको कई रत्नों जैसे पुखराज, सफेद मोती आदि के बारे में बता चुके हैं इसी कड़ी में आज आपको बताएंगे 'फिरोजा' के बारे में। ये एक ऐसा रत्न है जो दुश्मनों से भी आपको विजय दिला सकता है और आपकी सारी समस्याएं भी सुलझ जाती है। ज्योतिष की मानें तो यह रत्न पूर्ण रूप से वैज्ञानिक हैं और निश्चित समय में काम करना आरंभ कर देते हैं।फिरोजा 16 वीं सदी के आसपास फ्रेंच भाषा के तुर्की (Turquois) से प्राप्त हुवा था। यह गहरे नीले रंग का रत्न है। इस के नाम मे बहोत सारे सहस्य है।  इसे पहनने से बीमारियों से भी छुटकारा पाया जा सकताहै फिरोजा नफरत को शांत कर निश्छल प्रेम बढ़ाता है। 

इस रत्न के विषय में माना जाता है कि स्वयं खरीदकर धारण करने की बजाय किसी से उपहार मिलने पर इसका असर ज्यादा होता है। किसी के प्रति अपना प्रेम प्रकट करना हो, तो उसे फिरोजा की बनी मुद्रिका भेंट करनी चाहिए। यह प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी, अथवा मित्र किसी को भी भेंट की जा सकती है। इसमें अनुराग का रंग चढ़ा होता है। अगर पहले से प्रेम अंकुरित है, तो वह पल्लवित होगा, पुष्पित होगा और अंत में फलित भी होगा। यदि पहले से कुछ न हो, तो तब भी प्रेम अंकुरित होने लगेगा। विवाहित युगल एक जैसी दो अंगूठियां फिरोजा की बनवाएं और प्रेमपूर्वक एक दूजे को पहनाएं, तो प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी। यदि किसी प्रकार का मतभेद है, तो वह समाप्त हो कर निकटता बढ़ेगी। दो मित्र, अथवा दो सहेलियां भी अपने प्रिय को फिरोजा की अंगूठी, अथवा लाॅकेट भेंट करें, तो मित्रता का रंग चोखा चढ़ेगा। फिरोजा में सात्विक किस्म की वशीकरण शक्ति होती है। एक विशेष प्रयोग के बारे में लिखा जा रहा है। तीन मित्र थे। तीनांे में से दो में किसी बात को ले कर मतभेद हो गया। एक ही शहर में रह कर दोनों ने पांच साल तक बोलचाल बंद रखी। तीसरे मित्र ने, जो दोनों का परम मित्र और शुभ चिंतक था, एक ही तरह की तथा एक ही वजन की तीन फिरोजा की अंगुठियां बनवायीं। अभिमंत्रित होने के बाद तीनों मित्रों ने अंगुठियां पहनीं। दोनों फिरोजा पहने रूठे मित्रों को आपस में हाथ मिलाते देर नहीं लगी।  इस परोपकारी रत्न के अनेक नाम हैंः संस्कृत में पेरोजक, पैरोज, व्योमाभ, नीलकंठक, फारसी में फिरोजा  फिरोजा फारस (नौशपुर नामक स्थान) तिब्बत, अफगानिस्तान, मिस्र, अमेरिका एवं तुर्की ईरान दक्षिण ऑस्ट्रेलिया. में चीन, ब्राजील, मेक्सिको, संयुक्त राज्य अमरीका, इंग्लैंड, बेल्जियम और भी बहोत  आदि देशों में पाया जाता है। इसका रंग गहरा नीला, आसमानी नीला और हरापन लिए होता है। शुद्ध नीले रंग की मांग अधिक होती है। तिब्बत में हरा रंग पसंद किया जाता है। गर्मी, तेज प्रकाश और पसीने से इसका रंग खराब हो सकता है। फिरोजा अपारदर्शक होते हुए भी अपने रंग की चमक के कारण सुंदर रत्नों की श्रेणी में आता है। फिरोजा का काठिन्य 5.6 से 6 तथा अपेक्षित गुरुत्व 2.6 से 2.8 तक होता है। रसायन शास्त्र के अनुसार यह एल्युमीनियम, लोहा, तांबा और फाॅस्फेट का यौगिक है। औषधीय गुण फिरोजा का शोधन करने के पश्चात भस्म, या पाक का औषधीय प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग अनुभवी चिकित्सक के मार्गदर्शन में ही करना उचित है। यह नेत्र एवं वाणी दोष, मुंह और गले के रोग, उदर शूल और पुराने विष का प्रभाव नष्ट करता है। अनिद्रा रोग में भी यह लाभदायक है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि फिरोजा के धारक के निकट बिच्छु नहीं आता। उसे बिजली और पानी का भय नहीं रहता है।फिरोजा रत्न को शुक्र और शनि का मिश्रित रत्न माना जाता है. ज्योतिष में शुक्र और शनि की युति लैला मजनू की जोड़ी के नाम से प्रसिद्द है.शुक्र प्रेम का कारक ग्रह माना जाता है  इस रत्न को धारण करने से शुक्र का शुभ फल प्राप्त होता है। यह राहु एवं केतु के अशुभ प्रभाव को भी दूर करता है फिरोज़ा कमाल का हीलर होता है। ऐसा माना जाता है कि फ़िरोज़ा स्वर्ग और पृथ्वी के बीच ऊर्जावान पुल का काम करता है। प्राचीन काल से ही यह सुरक्षा तथा अच्छे भाग्य जैसे अपने आकर्षण गुणों के लिए जाना जाता रहा है। ऐसा माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति फ़िरोज़ा उपहार में देता है तो इसके गुण सौ गुना बढ़ जाते हैं।: 
इसे धारण करने से रिश्तों में प्रगाढ़ता आती है और प्रेम का संचार होता है। यही नहीं भविष्य में आने वाले संकटों से भी निजात मिलता है जैसे भूत प्रेत बाधा और दैवी आपदा जैसी भयानक शक्तियां अपना सिर नहीं उठा पाती।
कुछ ज्योतिषियों का यह मानना है कि यह दो ग्रहों के शुभ प्रभाव को बढाता है | अन्य कोई ऐसा रत्न नहीं है जो दो ग्रहों को शांत करता हो शनि और बुध मिलकर व्यक्ति को नपुंसक बनाते हैं और फिरोजा नपुंसकता को नष्ट करता है  जुए और सट्टे की लत से छुटकारा दिलाता है, शराब छुडवाने के लिए भी फिरोजा पहना जा सकता है | इसे पहनने से व्यक्ति कूटनीति में सफलता प्राप्त कर सकता है |
हर किसी को यह रत्न लाभ नहीं देता परन्तु जिस किसी को यह रत्न माफिक आ जाए उसका हर शत्रु से बचाव करता है | परिवार को मुसीबत से बचाता है विशेष रूप से पति और पत्नी बीच , नफ़रत को नष्ट करता है और प्यार बढ़ाता है।
काला जादू या तांत्रिक क्रियाकलाप में फिरोजा बहुत काम आता है | यदि फिरोजा पहना है तो भूत प्रेत और बुरी नजर से बचाव करता है | इसके अतिरिक्त फिरोजा ग्रह स्थिति के अनुसार अपना प्रभाव दिखाता है | फिरोजा यदि असली मिल जाए तो बेहद आकर्षक यह रत्न जितना सुन्दर लगता है उतना ही यह प्रभाव भी देता है फिल्म उमराव जान के एक सीन में फारुख शेख रेखा के बालों में आहिस्ता-आहिस्ता ऊँगलियाँ फिरा रहे हैं। इस बेहद खूबसूरत और रोमांटिक सीन में रेखा की काली जुल्फों के साथ जिस चीज पर कैमरा फोकस कर रहा है वह फारुख शेख के हाथ की एक ऊँगली में जगमगा रहा नैशापुरी फिरोजा है। लखनऊ में शूटिंग के दौरान नवाब मीर जाफर अब्दुल्ला की ऊँगली से उतरवाकर फिल्म के निर्देशक मुजफ्फर अली ने यह अँगूठी खास तौर पर फारुख शेख को पहनाई थीमुजफ्फर अली शिया मुसलमान हैं और कहीं न कहीं वह यह जरूर दिखाना चाहते थे कि शियाओं की एक पहचान फिरोजा रत्न भी है क्योंकि चौथे खलीफा हजरत अली और आठवें इमाम रजा फिरोजे की अँगूठी पहनते थे। ईरान स्थित नौशापुर का फिरोजा सबसे बेहतरीन माना जाता है। इराक के नजफ में हजरत अली के रौजे और ईरान के मशद में इमाम रजा की कब्र से मस (छुआ) कर फिरोजा पहनना शियाओं में सवाब (पुण्य) माना जाता है।
फिरोजे का इस्तेमाल सोने के जेवरों में भी हमेशा से खूब होता आया है। इसकी नीली चमक पीले सोने में खूब फबती है। इसे जवाहरात की श्रेणी में दूसरे नंबर पर रखा गया है। इस पर न तो तेजाब का असर होता है और न आग में पिघलता है। इसे पहनने से दिल के मर्ज में फायदा होता है। तबीयत को राहत और ताजगी बख्शता है। आँखों की रोशनी बढ़ाता है और गुर्दे की पथरी निकालता है। साफ और खुली फिजा में इसका रंग और ज्यादा खिल जाता है।| यह राहु एवं केतु के अशुभ प्रभाव को भी दूर करता है जो भ्रम और मानसिक उलझनों को बढ़ाने वाला ग्रह है। इसे धारण करने से ऊपरी चक्कर, भूत-प्रेत बाधाओं से भी मुक्ति मिलती है। इस रत्न को आम तौर पर दायें हाथ की कनिष्ठा, अनामिका, या मध्यमा उंगली में शुक्रवार को सुबह स्नान करने के बाद धारण किया जाता है। शुक्रवार कुछ ज्योतिषी इसे बुधवार या शनिवार को धारण करने कि सलाह भी देते हैं.इसे लोग ब्रेसलेट में भी पहनते हैं. कहते हैं कि जब से सलमान खान ने इसे पहना, लाखो लोगों ने देखा-देखी इसे ख़रीदा (हालाँकि ब्रेसलेट में अक्सर नकली फ़िरोज़ा ही चलता है)
नोट : यह गुण आप लोगों की रुचि और ज्ञान के लिए लिख दिए जाते हैं, पर रत्न धारण कुंडली के सही विश्लेषण और अच्छे ज्योतिषी की सलाह पर ही धारण करने चाहिएं. कौन सा रत्न कब पहना जाए इसके लिए कुंडली का सूक्ष्म निरीक्षण जरूरी होता है।मैंने एक मामले में फ़िरोज़ा उतरवा कर ही उस जातक के लिए बहुत अच्छे परिणाम देखे हैं (उनके अनुभव मैंने कई बार शेयर भी किये हैं). उन के अटके हुए काम फ़िरोज़ा उतारने के बाद ही खुले !ज्योतिष में सभी को फिरोजा पहनने की सलाह नहीं दी जाती बल्कि कुछ खास लोगों को ही यह पहनाया जाता हैआज कल बाजार में नकली रत्न बहुत सारे आ रहे है, इसलिए रत्न लेने से पहले उसे पहले जाँच या परख कर के ही ख़रीदे ,रत्नों में अद्भूत शक्ति होती है. रत्न अगर किसी के भाग्य को आसमन पर पहुंचा सकता है तो किसी को आसमान से ज़मीन पर लाने की क्षमता भी रखता है. रत्न के विपरीत प्रभाव से बचने के लिए सही प्रकर से जांच करवाकर ही रत्न धारण करना चाहिए. ग्रहों की स्थिति के अनुसार रत्न धारण करना चाहिए. रत्न कुंडली दिखाकर ही पहने क्योंकी रत्नों का काम सूर्य से उर्जा लेकर उसे शरीर में प्रवाहित करना होता है ,अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान या कुंडली विश्लेषण हेतु संपर्क कर सकते  हैं या असली ओर लैवटैस्ट रतन रैना चाहते हैं तो भी आप हमारे नम्वरो पर वात कर सकते हैं 07597718725-09414481324 आचार्य राजेश

सोमवार, 12 मार्च 2018

लाल किताब ओर रत्न चयन

मित्रों रत्नों पर वात चल रही है मैंने अपनी पिछली पोस्ट रतनो पर ही  लिखी थी जो आप लोगों द्वारा काफी पसन्द की गई  यह पोस्ट भी रत्नों पर ही   है लालं किताव में रतन पहनने के बारे में कई तरह के नियम बताए गए हैं।लाल किताब कहती है रत्न शुभ फल देने की शक्ति रखता है तो अशुभ फल देने की भी इसमें ताकत है। रत्नों के नाकारात्मक फल का सामना नहीं करना पड़े इसके लिए रत्नों को धारण करने से पहले कुछ सावधानियों का भी ध्यान रखना जरूरी होता है। 

वैसे  रतन  पहने  तो लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर ही पहने।लाल किताब के अनुसार रत्नों में मंदे, कमजोर एवं सोये हुए ग्रहों को नेक, बलशाली, एवं जगाने की क्षमता होती है। लेकिन जब तक सही ज्योतिषी सलाह ना मिले, तब रत्न धारण करने ने नुकसान हो सकता है।वैदिक ज्योतिष के समान लाल किताब भी भविष्य जानने की एक विधा है.लाल किताब में ग्रहों के योग और उनके फल के सम्बन्ध में अपनी मान्यताएं हैं यह ग्रंथ जन्म कुण्डली, हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का मिश्रण है और जिन व्यक्तियों को अपनी जन्म कुण्डली की सत्यता पर भरोसा ना हो तो वह लालकितावके ज्ञान के आधार पर अपने जीवन की बाधाओं का समाधान कर सकते हैं।ज्योतिष की इस विधा में भी लग्न कुंडली वनाई जाती हैप्रयुक्त कुण्डली बस्तुतः पारम्परिक जन्म कुण्डली ही है। जन्म कुण्डली में ग्रहों को यथा स्थान रहने दें, जिन राशियों वह हैं, उन्हें हटा दें। अब लग्न को 1(मेष) राशि मानते हुए दूसरे, तीसरे, आदि 12 भावों में क्रमशः 2(वृष), 3(मिथुन) आदि 12 राशि 12(मीन) तक लिख दें। यह कुण्डली लाल किताब का आधार है।


मित्रों ध्यान दें, लग्न कुण्डली में चाहे जो राशि हो लाल किताब की कुण्डली में सदैव मेष राशि ही रहती है। इसी प्रकार क्रमशः दूसरे में वृष, तीसरे में मिथुन आदि मीन तक बारहों राशियॉ रहती है। यह इन घरों की पक्की राशियॉ कहलाती हैं।

जो ग्रह शत-प्रतिशत शक्तिशाली होते हैं, वह उच्च के ग्रह कहे जाते हैं तथा जो ग्रह निर्बल होते हैं, वह नीचे के कहे जाते हैं। कुण्डली में इनके स्थान भी सुनिश्चित हैं, यथा

स्पष्ट ग्रह शुभता प्रदान करने में पूर्ण रुप से सहयोगी सिद्ध होता है। ज्योतिष शास्त्र के नियमों की तरह प्रत्येक ग्रह की अपनी दृष्टि विशेष होती है। सूर्य, चंद्र, गुरु तथा बुद्ध अपने से सातवें भाव को देखता है। गुरु, राहु, केतु अपने से पॉचवे, सातवें तथा नवे भाव को देखते हैं। मंगल चौथ, सातवे, आठवे भावों को तथा शनि अपने से तीसरे, सातवे तथा दसवे भाव को देखता है। प्रत्येक ग्रह सातवे भाव को अवश्य देखता है।लाल किताब से रत्न चयन करने के लिए यह परिचय पूर्ण नहीं कहा जा सकता तदापि यह भूमिका विषय को समझाने और व्यवहार में लाने की कुंजी अवश्य सिद्ध हो सकती है। किसी कुण्डली में यदि बलवान है, लाल किताब की भाषा में कहें कि यदि वह अपने पक्के ग्रहों में स्थित है तो उनसे संबंधित रत्न धारण किया जा सकता है। किताब सदैव उच्च अर्थात शत-प्रतिशत शक्तिशाली ग्रहों के रत्न धारण करने पर बल देती है। ऐसे योग कुण्डली में खेाजना बहुत ही सरल है। परन्तु यदि कुण्डली में शक्तिशाली ग्रह अथवा ग्रहों का अभाव हो तो सुप्त ग्रह तथा सुप्त भाव को बलवान करने का प्रयास करना चाहधि जितनी सरल है उतनी ही अधिक प्रभावशाली भी सिद्ध होगी। आवश्यता है कि इस ज्ञान को समझने की, उसमें अधिक खोज करने की, तदनुसार व्यवहार में लाने की ताकि अधिकारिक रुप से मानव कल्याण हो सके।  अपने बुद्धि-विवेक से और आगे बढ़ाने का एक और प्रयास करके तो देखिये, कितने संतोष जनक परिणाम आपको मिलते हैं।तमाम वैदिक ज्योतिषी मित्रों को कहना चाहता हूं आप लाल किताब की निन्दा मत करें आप इस विघा को सिखे  यदि किसी घर में कोई ग्रह सोया हुआ हो तो उस घर को और उस ग्रह के प्रभाव को जाग्रत करने के लिए उस घर का रत्न धारण करें। जैसे पहले घर को जगाने के लिए मंगल का रत्न, दूसरे घर को जगाने के लिए चंद्र का, तीसरे के लिए बुध का, चैथे के लिए चंद्र का, पांचवें के लिए सूर्य का, छठे के लिए राहु का, सातवें के लिए शुक्र का, आठवें के लिए चंद्र, नौवें के लिए गुरु का, दसवें के लिए शनि का, ग्यारहवें के लिए गुरु का एवं बारहवें घर को जगाने के लिए केतु का रत्न धारण किया जा सकता है। यदि दो ग्रह आपस में टक्कर के हों और उनमें शत्रु भाव उत्पन्न हो रहा हो तो दोनों ही ग्रहों के रत्न एक साथ ही पहनना चाहिए। किसी कुंडली में ग्रह यदि बलवान हों, लाल किताब की भाषा में कहें तो यदि वे अपने पक्के घरों में स्थित हों, तो उनसे संबंधित रत्न चयन किया जा सकता है। लाल किताब सदैव उच्च अर्थात शतप्रतिशत शक्तिशाली ग्रहों के रत्न धारण करने पर बल देती है। ऐसे योग किसी कुंडली में खोजना बहुत ही सरल है। परंतु यदि कुंडली में शक्तिशाली ग्रह अथवा ग्रहों का अभाव हो तो सुप्त ग्रह तथा सुप्त भाव को बलवान बनाने की प्रक्रिया अपनाएं। यह विधि जितनी सरल है उतनी ही प्रभावशाली भी। यदि कुंडली में चंद्र ग्रह सर्वाधिक बलशाली हो तो चंद्र का रत्न मोती धारण करवाया जा सकता है। इसके साथ-साथ सुप्त भाव तथा सुप्त ग्रह को भी बलवान कर लिया जाए तो परिणाम अधिक अच्छे होंगे। कुंडली में सर्वाधिक भाग्यशाली ग्रह उच्च भाग्य का द्योतक है। भाग्य के लिए सर्वोत्तम ग्रह के अनुरूप रत्न का चयन निम्न चार बातों को ध्यान में रखकर कर सकते हैं- जिस राशि में ग्रह उच्च का होता है और लाल किताब की कुंडली के अनुसार भी उसी भाव अर्थात राशि में स्थित होता है उससे संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है। यदि ग्रह अपने स्थायी भाव में स्थित हो तथा उसका कोई मित्र ग्रह उसके साथ हो अथवा उसको देखता हो तो उस ग्रह से संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है। नौ ग्रहों में से जो ग्रह श्रेष्ठतम भाव में स्थित हो, उस ग्रह से संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है।  कुंडली के केंद्र अर्थात पहले, चैथे, सातवें तथा 10वें भाव में बैठा ग्रह भी भाग्यशाली रत्न इंगित करता है। यदि उक्त भाव रिक्त हों तो नौवां, नौवां रिक्त हो तो तीसरा, तीसरा रिक्त हो तो ग्यारहवां, ग्यारहवां रिक्त हो तो छठा और यदि छठा भाव भी खाली हो तो खाना 12 में बैठा ग्रह भाग्य ग्रह कहलाता है। इस ग्रह से संबंधित रत्न भी भाग्य रत्न कहलाता है। जब किसी भाव पर किसी भी ग्रह की दृष्टि नहीं हो अर्थात वह भाव किसी भी ग्रह द्वारा देखा नहीं जाता हो तो वह सुप्त भाव कहलाता है। उदाहरण में ऐसे सुप्त भाव पहला तथा सातवां हैं। इन दोनों भावों को कोई भी ग्रह नहीं देख रहा है। इसके लिए यदि इन भावों को चैतन्य कर देने वाले ग्रहों का उपाय किया जाए तो ये भाव चैतन्य हो जाएंगे तथा इन से संबंधित विषय में व्यक्ति को आशातीत लाभ मिलने लगेगा। जब कोई ग्रह किसी अन्य ग्रह को नहीं देखता तो वह ग्रह सुप्त कहलाता है। सुप्त ग्रह कब जाग्रत होते हैं अर्थात आयु के किस वर्ष में फल देते हैं इसका विवरण भी लाल किताब में मिलता है। यदि उस वर्ष में खोज किए हुए ग्रह के उस रत्न का प्रयोग किया जाए तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यथा उपाय सहायता मिलती है। लाल किताब के अनुसार ग्रहों के कुप्रभावों को समाप्त करने के लिए, उन्हें अनुकूल बनाने के लिए नीचे दिए गए विवरण के अनुसार विभिन्न रत्नों को विभिन्न धातुओं में धारण करना चाहिए। जिस ग्रह को बलवान करना हो उस ग्रह का रत्न उसकी धातु के साथ जड़वा कर पहनना चाहिए। जन्म का ग्रह और जन्म समय का ग्रह यदि एक हो तो वह व्यक्ति के लिए हमेशा शुभ फल प्रदान करने वाला होता है। अतः उसका रत्न निःसंकोच धारण कर लेना चाहिए। जन्म दिन के ग्रह एवं जन्म समय के ग्रह का विवरण इस प्रकार है। इस प्रकार समस्याओं से पीड़ित जातकगण लाल किताब के अनुसार अपने भाग्यशाली रत्न का चयन कर प्रतिकूल ग्रहों के कुप्रभावों से अपनी रक्षा कर सकते हैं। लाल किताब के उपायों से कष्ट निवारण में सहायता मिलती है, यह एक निर्विवाद सत्य है। दिन समय ग्रह रविवार दिन का दूसरा प्रहर सूर्य सोमवार चांदनी रात चंद्र मंगलवार पूर्ण दोपहर मंगल बुधवार दिन का तीसरा प्रहार बुध गुरुवार दिन का प्रथम प्रहर गुरु शुक्रवार कालीरात शुक्र शनिवार रात्रि एवं अंधकारमय शनि गुरुवार शाम पूर्णशाम राहु रविवार प्रातः सूर्योदय से पूर्व केतु ग्रह रत्न धातु सूर्य माणिक्य सोना चंद्र मोती चांदी मंगल मूंगा तांबा बुध पन्ना सोना गुरु पुखराज सोना शुक्र हीरा चांदी शनि नीलम लोहा राहु गोमेद ऊपर धातु केतु लहसुनिया सोना या तांबात्रों ,आप सब जब भी रत्न धारण करे तो ऊपर लिखी बातों का अवश्य ध्यान करे .प्रत्येक जातक को अपनी ग्रह की महादशा के अनुसार और ग्रहो की मित्रता ,उच्च राशिगत ,नीच राशिगत ,अन्तर्दशा ,अन्य ग्रहो की दृष्टि इत्यादि बातो का गहन अध्ययन करके की सही रत्न का चुनाव करना चाहिए नहीं तो लाभ की जगह हानि का सामना करना पड़ सकता हैत्रों ,आप सब जब भी रत्न धारण करे तो ऊपर लिखी बातों का अवश्य ध्यान करे .प्रत्येक जातक को अपनी ग्रह की महादशा के अनुसार और ग्रहो की मित्रता ,उच्च राशिगत ,नीच राशिगत ,अन्तर्द सबशा ,अन्य ग्रहो की दृष्टि इत्यादि बातो का गहन अध्ययन करके की सही रत्न का चुनाव करना चाहिए नहीं तो लाभ की जगह हानि हो सकती है हमसे कुंडली दिखाने पर  जातक को रत्न का सुझाव बड़ी ही सटिकता से दिया जाता है .अनेक जातको ने हमारे द्वारा लताऐं सही रत्न का चुनाव कर कई समस्यायों से निजात पाई है .यदि आप भी किसी भी समस्या से पीड़ित है तो मुझसे अवश्य संपर्क करे और पुरे विश्वास के बाद ही रत्न धारण करे क्योंकि आपका विश्वास ही आपकी सफलता की निशानी है .किसी के प्रति अविश्वास ही असफलता की प्रथम सीढ़ी है .

आपका जीवन शुभ हो ,मंगलमय हो ,स्वर्णमय हो ,तथास्तु 

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गुरुवार, 8 मार्च 2018

लहसुनिया केतु रतन 🐈 Catseye

 मित्रों रत्नों की बात चल रही है और इसी लय को बरकरार रखते हुए आज हम आपको लहसुनिया रत्न से जुड़ी कुछ बातें बताने जा रहे हैं।लहसुनिया केतु का रत्‍न है जो कि बेहद चमकीला होता है।
 अपनी विशेष बनावट के कारण इसे अंग्रेजी में 'कैट्स आई' कहा जाता हलहसुनिया किस लिए पहना जाता है? लहसुनिया छाया ग्रह केतु का रत्न है और केतु को साधारणतय अशुभ ग्रह माना जाता है| 

फिर क्यों इस रत्न को धारण किया जाए ये एक प्रश्न है जो generally मन में उठ सकता है|नुकूल स्थिति में केतु धार्मिक प्रकृति, विरक्ति, ज्ञान, विभेदन क्षमता (power of discriminatio
n) और आध्यात्मिक ज्ञान आदि प्रदान करता है|
शास्त्र कहते हैं “कुजावत केतु शनिवत राहू” मतलब केतु, कुजा याने मंगल की तरह और राहू शनि की तरह आचरण करते हैं| परन्तु केतु मंगल से भी ज्यादा विध्वंसकारी हो सकता है अगर ये कुंडली में अशुभ स्थिति में हो या किसी और अशुभ ग्रह के साथ युत हो  लहसुनिया की जानकारी अति प्राचीनकाल से ही लोगों को थी  इसकी कुछेक विशेषता ने हमारे पूर्वजों को आकर्षित किया था, जो आज भी लोगों को आकृष्ट करती हैं। इसके विलक्षण गुण हैं-विडालाक्षी आंखें और इससे निकलने वाली दूधिया-सफेद, नीली, हरी या सोने जैसी किरणें। इसको हिलाने-डुलाने पर ये किरणें निकलती। यह पेग्मेटाइट, नाइस तथा अभ्रकमय परतदार पत्थरों में पाया जाता है और कभी-कभी नालों की तलछटों में भी मिल जाता है। यह भारत, चीन, श्रीलंका, ब्राजील और म्यांमार में मिलता है, लेकिन म्यांमार के मोगोव स्थान में पाया जाने वाला लहसुनिया श्रेष्ठ माना जाता है ज्योतिष के अनुसार केतु का प्रत्येक कुंडली में विशेष महत्व है तथा किसी कुंडली में केतु का बल, स्वभाव और स्थिति कुंडली से मिलने वाले शुभ या अशुभ परिणामों पर बहुत प्रभाव डाल सकती है। केतु के बल के बारे में चर्चा करें तो विभिन्न कुंडली में केतु का बल भिन्न भिन्न होता है जैसे किसी कुंडली में केतु बलवान होते हैं तो किसी में निर्बल जबकि किसी अन्य कुंडली में केतु का बल सामान्य हो सकता है। किसी कुंडली में केतु के बल को निर्धारित करने के लिय बहुत से तथ्यों का पूर्ण निरीक्षण आवश्यक है हालांकि कुछ  ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में केतु की किसी राशि विशेष में स्थिति ही केतु के कुंडली में बल को निर्धारित करती है जबकि वास्तविकता में किसी भी ग्रह का किसी कुंडली में बल निर्धारित करने के लिए अनेक प्रकार के तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक है  विभिन्न कारणों के चलते यदि केतु किसी कुंडली में निर्बल रह जाते हैं तो ऐसी स्थिति में केतु उस कुंडली तथा जातक के लिए अपनी सामान्य और विशिष्ट विशेषताओं के साथ जुड़े फल देने में पूर्णतया सक्षम नहीं रह पाते जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कुंडली में निर्बल केतु को ज्योतिष के कुछ उपायों के माध्यम से अतिरिक्त उर्जा प्रदान की जाती है जिससे केतु कुंडली में बलवान हो जायें तथा जातक को लाभ प्राप्त हो सकें केतु को किसी कुंडली में अतिरिक्त उर्जा प्रदान करने के उपायों में से उत्तम उपाय है केतु का रत्न लहसुनिया धारण करना जिसे धारण करने के पश्चात धारक को केतु के बलवान होने के कारण लाभ प्राप्त होने आरंभ हो जाते हैं लहसुनिया रत्न केतु की उर्जा तरंगों को अपनी उपरी सतह से आकर्षित करके अपनी निचली सतह से धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देता है जिसके चलते जातक के आभामंडल में केतु का प्रभाव पहले की तुलना में बलवान हो जाता है तथा इस प्रकार केतु अपना कार्य अधिक बलवान रूप से करना आरंभ कर देते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि केतु का रत्न लहसुनिया किसी कुंडली में केतु को केवल अतिरिक्त बल प्रदान कर सकता है तथा लहसुनिया किसी कुंडली में केतु के शुभ या अशुभ स्वभाव पर कोई प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार यदि किसी कुंडली में केतु शुभ हैं तो लहसुनिया धारण करने से ऐसे शुभ केतु को अतिरिक्त बल प्राप्त हो जायेगा जिसके कारण जातक को केतु से प्राप्त होने वाले लाभ अधिक हो जायेंगें जबकि यही केतु यदि किसी जातक की कुंडली में अशुभ है तो केतु का रत्न धारण करने से ऐसे अशुभ केतु को और अधिक बल प्राप्त हो जायेगा जिसके चलते ऐसा अशुभ केतु जातक को और भी अधिक हानि पहुंचा सकता है। इस लिए केतु का रत्न लहसुनिया केवल उन जातकों को पहनना चाहिये जिनकी कुंडली में केतु शुभ रूप से कार्य कर रहे हैं तथा ऐसे जातकों को केतु का रत्न कदापि नहीं धारण करना चाहिये जिनकी कुंडली में केतु अशुभ रूप से कार्य कर रहें हैं।संसार के विभिन्न भागों से आने वाले लहसुनिया विभिन्न रंगों के हो सकते हैं। यहां पर इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न जातकों के लिए लहसुनिया के भिन्न भिन्न रंग उपयुक्त हो सकते हैं जैसे किसी को हल्के रंग का लहसुनिया अच्छे फल देता है जबकि किसी अन्य को गहरे रंग का लहसुनिया अच्छे फल देता है। इसलिए लहसुनिया के रंग का चुनाव केवल अपने ज्योतिषी के परामर्श अनुसार ही करना चाहिए तथा अपनी इच्छा से ही किसी भी रंग का लहसुनिया धारण नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से ऐसा लहसुनिया लाभ की अपेक्षा हानि भी दे सकता है। रंग के साथ साथ अपने ज्योतिषी द्वारा सुझाये गये लहसुनिया के भार पर भी विशेष ध्यान दें तथा इस रत्न का उतना ही भार धारण करें जितना आपके ज्योतिषी के द्वारा बताया गया हो क्योंकि अपनी इच्छा से लहसुनिया का भार बदलने से कई बार यह रत्न आपको उचित लाभ नहीं दे पाता जबकि कई बार ऐसी स्थिति में आपका लहसुनिया आपको हानि भी पहुंचा सकत है उदाहरण के लिए अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये लहसुनिया के भार से बहुत कम भार का लहसुनिया धारण करने से ऐसा लहसुनिया आपको बहुत कम लाभ दे सकता है अथवा किसी भी प्रकार का लाभ देने में अक्षम हो सकता है जबकि अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये लहसुनिया के धारण करने योग्य भार से बहुत अधिक भार का लहसुनिया धारण करने से यह रत्न आपको हानि भी पहुंचा सकता है जिसका कारण यह है कि बहुत अधिक भार का लहसुनिया आपके शरीर तथा आभामंडल में केतु की इतनी उर्जा स्थानांतरित कर देता है जिसे झेलने तथा उपयोग करने में आपका शरीर और आभामंडल दोनों ही सक्षम नहीं होते जिसके कारण ऐसी अतिरिक्त उर्जा अनियंत्रित होकर आपको हानि पहुंचा सकती है। इसलिए सदा अपने ज्योतिषी के द्वारा बताये गये भार के बराबर भार का लहसुनिया ही धारण करें क्योंकि एक अनुभवी वैदिक ज्योतिषी तथा रत्न विशेषज्ञ को यह पता होता है कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको लहसुनिया रत्न का कितना भार धारण करना चाहिये।        लहसुनिया के       ज्योतिषीय फायदे पर उस से पहले हम इस के गुणों के वारे वात करें यह समझ लैना जरुरी है किआज के वैज्ञानिक युग में भी हम आस्थाओं को महत्व देते हैं इसलिए विस्वास रखना बहुत जरुरी है । पर इसका मतलब यह भी नहीं है कि रत्नों को अपने भाग्यावरोध हटाने का यंत्र समझकर कर्म न करें रत्न अलंकार होते हैं कर्म तो सर्वोपरि है ।यह दिमागी परेषानियां शारीरिक दुर्बलता, दुख, दरिद्रता, भूत आदि सू छुटकारा दिलाता है। लहसुनिया यदि अनुकूल हो तो यह धन दौलत में तीव्र गति से वृद्धि करता है। आकस्मित दुर्घटना, गुप्त शत्रु से भी रक्षा करता है। इसे धारण करने से रात्रि में भयानक स्वप्न नहीं आते है। असको लाकेट में पहनने से दमे से तथा श्वास नली की सूजन से आराम मिलता है। भूत-प्रेत ओर उपरी वाघा को भी यह रतन दुर कर आराम दिलाने की क्षमता रखता हैकहा जाता है कि इस रत्न को पहनने से छुपे हुए दुश्मन, अप्रत्याशित ख़तरे व रोग जीवन से दूर रहते हैं।लहसुनिया रत्न आप की अंतर्दृष्टि को बेहतर बनाने में व आप के पूर्वानुमानों में वृद्घि करता है। इस रत्न को पहनने से आप की सेहत अच्छी रहती है, भाग्योदय होता है व बच्चों से खुशियों की प्राप्ति होती है।घी में लहसुनिया की भस्मव अन्य जड़ी वूटीया मिलाकर खाने से पौरुष शक्ति बढती है। लहसुनिया धारण करने अजीर्ण, मधुमेह आदि रोगों में लाभ मिलता है। पीतल व लहसुनिया की भस्म को खाने से आंखों के रोग दूर हो जाते है।रत्नों से रोग उपचार करने के पहले उचित जानकार वैद्य या ज्योतिष ये सलाह ले लेना चाहिए.तु जिस भाव में बैठता है उस भाव के कारकत्व का नाश कर देता है और युति करने वाले ग्रह की शक्ति को भी क्षीण कर देता है| कुडंली के अतिसूक्ष्म परीक्षण के बाद अच्छी quality का लहसुनिया (Cats eye gemstone) रत्न धारण अति उत्तम साबित हो सकता है और केतु को अनुकूल बनाने में सक्षम होता है|
हमसे कुंडली दिखाने पर  जातक को रत्न का सुझाव बड़ी ही सटिकता से दिया जाता है .अनेक जातको ने हमारे द्वारा वताऐं सही रत्न का चुनाव कर कई समस्यायों से निजात पाई है .यदि आप भी किसी भी समस्या से पीड़ित है तो मुझसे अवश्य संपर्क करे और पुरे विश्वास के बाद ही रत्न धारण करे क्योंकि आपका विश्वास ही आपकी सफलता की निशानी है .किसी के प्रति अविश्वास ही असफलता की प्रथम सीढ़ी है 
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शुक्रवार, 2 मार्च 2018

ओपल रतन opal gemstone

https://youtu.be/9VwaX00qRcwये सच है कि हर रत्न इस धरती पर मौजूद हर व्यक्ति को शोभा नहीं देता है. इसे पहनने के लिए ज्योतिष की सलाह आवश्यक है.
              ज्योतिष उस व्यक्ति की कुंडली का अध्ययन करता है और उसके लिए एक उपयुक्त और आकर्षण रत्न बताता है. आज हम ओपल रत्न और उससे संबंधित लाभ के बारे में बात करेंगे. इसे पहनने वाला कितना आनंद पा सकता है.ओपल या दूधिया पत्थर धातु से बना जैल है जो बहुत कम तापमान पर किसी भी प्रकार के चट्टान की दरारों में जमा हो जाता है, आमतौर पर चूना पत्थर, बलुआ पत्थर, आग्नेय चट्टान, मार्ल और बेसाल्ट के बीच पाया जा सकता है। ओपल  शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ओपलस और यूनानी शब्द ओपैलियस से हुई है।ओपल रत्न शुक्र ग्रह के प्रभाव को बढ़ाने लिए धारण किया जाता है।ओपल रत्न शुक्र ग्रह के प्रभाव को बढ़ाने लिए धारण किया जाता है।हीरा 

हीरा शुक्र का रत्न है। हीरा वे सभी व्यक्ति पहन सकते हैं जिनकी जन्म कुंडली में शुक्र अच्छे भावों का अधिपति होता है। इसके धारण करने से आयु वृद्धि जीवन रक्षा, स्वास्थ्य लाभ, व्यापार में लाभ एवं अन्य शुभ फल प्राप्त होते हैं। प्रमाणिक दुकान से ही असली हीरा गारंटी से खरीदना चाहिए।पर हीरा वोहोत ही ज्यादा मंहगा है इस लिए हर कोई नहीं पहन सकताओपल हीरे का ही प्रतिरूप है। हीरे की सामर्थ्य न होने पर ओपल भी हीरे सा फल देता है।नोट : बहुत से ज्योतिषी जेरकेन भी पहनने की सलाह देते हैं, पर जेरकेन बनाया जाता है, यह प्राकृतिक पत्थर नहीं है. कई सफ़ेद पुखराज भी पहनने की सलाह देते हैं, पर मैंने ओपल को ही प्रभावी पाया है. ओपल धवल से सफेद, भूरे, लाल, नारंगी, पीले, हरे, नीले, बैंगनी, गुलाबी, स्लेटी, ऑलिव, बादामी और काले रंगों में पाई जाती हैं। इन विविध रंगों में, काले रंग के खिलाफ लाल सबसे अधिक दुर्लभ है जबहैकि सफेद ओपल को शुक के लिए पहनाया जाता  ओर कुंडली के हिसाब से ओर रंगो के पहनावे जाते हैं  रंगों में भिन्नता लाल और अवरक्त तरंगदैर्ध्य के आकार और विकास के कारण आती हैओपल का सबसे बड़ा उत्पादक ऑस्ट्रेलिया है। इस देश में दुनिया का लगभग 97% ओपल पैदा होता है। 
ओपल दृश्य स्पेक्ट्रम में हर रंग व्यक्त कर सकते हैं। कीमती ओपल के आंतरिक से परिवर्ती रंग झलकते हैं यह परस्पर क्रिया धातु से बने होने के कारण होती है, यह एक आंतरिक संरचना है।सफेद दूधिया पत्थर का इंग्लिश नाम ओपल लैटिन भाषा के ओपलुस से आया है, जिसका अर्थ ‘गहने सा’ है। एक अन्य जानकारी के अनुसार ओपल शब्द संस्कृति शब्द उपल से आया है, जिसका अर्थ होता है कीमती पत्थर।रंगो के खेल का प्रदर्शन करने वाले विभिन्न किस्मों के रत्न के अलावा, अन्य प्रकार के आम दूधिया ओपल, दूधिया नीले से हरे होते हैं, (जो गुणवत्ता में कभी कभी रत्न के समान हो सकते हैं)एक अनुमान के अनुसार लगभग ओपल रत्न ६० मीलियन वर्ष पुराने हैं, जब डायनासोर धरती पर घूमा करते थे।मध्य युग में, माना जाता था कि ओपल एक ऐसा पत्थर है जो बहुत भाग्यशाली है क्योंकि सभी भाग्यशाली गुणों वाले रत्न के सभी रंगों में से प्रत्येक रंग ओपल के महान स्पेक्ट्रम रंग में मौजूद हैं। यह भी कहा जाता था कि इसे ताजे तेज-पत्ते में लपेटकर हाथ में रखने से अदृश्य होने की शक्ति मिल जाती थी। पता नहीं यह  वात कितनीसही है ओपल  को पहनने से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं :रिश्तों में एकता के लिए ओपल रत्नर - ओपल रत्न शुक्र ग्रह का रत्न है जो ज्योतिष में रिश्तों की मज़बूती और लक्जरी पर शासन करने के लिए है. ओपल रत्न पहनने से रिश्तों में एकता और संतुष्टि आती है. ओपल रत्न पहनने से व्यक्ति जीवन में आकर्षण, कला, दया, संस्कृति और विलासिता से भरा जीवन जीता है.संगीत, चित्रकला, नृत्य और थिएटर आदि जैसे कलात्मक क्षेत्रों में शामिल लोगों को ओपल रत्न के पहनने से अनगिनत लाभ प्राप्त हो सकते हैं.वित्तीय स्थिति में सुधार होता है।यौन शक्ति बढ़ती है।काल्पनिक रचनात्मक शक्ति में वृद्घि होती है।अच्छा एकाग्रता और मानसिक शांति को बढ़ावा देता हैशारीरिक तंदरुस्ती प्रदान करता है एवं बुरे स्वप्न को दूर रखता है। व्यक्ति को सफलता, लोकप्रियता एवं मान सम्मान दिलाता है।सके अलावा भी जो व्यक्ति नींद में चौंक जाता हो, भूत एवं पिशाच का डर लगता हो, जिस घर में पति-पत्नी का विवाद तथा घर में कलह का वातावरण रहता हो, - शारीरिक दृष्टि से कमजोर हो, प्रेमी या प्रेमिका या सामने वाले को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए, उसे ओपल धारण करना चाहिएटीवी, फिल्म, थिएटर और ऐसे में काम कर रहे कलाकारों को हमेशा प्रसिद्धि और मान्यता के लिए इस रत्न पहनना चाहिए.ओपल रत्न अगर चांदी में और प्रक्रियाओं अनुसार पहना वीनस की ताकत बढ़ जाती है और वहाँ से सांसारिक आनंद देता है. पहनने के धन, खुशी परिवार, बच्चों, प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त करने में सक्षम है. भारतीय फिल्म स्टार Ashwaria राय बच्चन हमेशा उसके दाहिने हाथ की एक उंगली में ओपल पहन रखा है  ओपल जीवन में महान परिवर्तन ला सकते हैं.ओपल धारण करने से आँखों के रोगों से राहत मिलती है. फायर ओपल धारण करने से शरीर के रक्त विकार तथा लाल रक्त कणिकाओं से संबंधित विकारों से छुटकारा मिलता है और मानसिक तनाव, उदासीनता और आलस्य दूर होता है. विचारों में स्पष्टता झलकती है.
काला ओपल धारण करने पर व्यक्ति विशेष को अस्थि मज्जा, प्रजनन अंगों, प्लीहा अथवा तिल्ली और अग्न्याशय से संबंधित विकारों में लाभ मिलता है. लाल रक्त कणिकाएँ और सफेद रक्त कणिकाओं का शुद्धिकरण होता है. काला ओपल पहनने से व्यक्ति की शारीरिक सुरक्षा भी होती है. बुरे सपने नहीं आते.किडनी की सवी रोगों पर ओपल का वोहोत अच्छा लाभ रहता है मैंने ऐसे लोग जिनकी किडनी काफी खराव हो चुकी थी उन लोगों पर भी इसका प्रयोग किया तो मुझे काफी सफलता मिली
सफेद ओपल 
धारण करने पर मस्तिष्क के दाएँ तथा बाएँ तंत्रिका तंत्र में संतुलन बना रहता है. सफेद रक्त कणिकाओं को ऊर्जा मिलती है. इसके अतिरिक्त ओपल सफेद , इसे पहनने से भाग्य में वृद्धि होती है. उत्साहवर्धन होता है. आत्मविश्वास में बढो़तरी होती है. मस्तिष्क का विकास होता है. मानसिक कार्य करने की शक्तियों का विकास होता है. व्यक्ति की दृढ़ इच्छा शक्ति का विकास होता है.यही कारण है कि  ज्योतिष के अनुसार, ओपल रत्न पहनने की सलाह उस व्यक्ति को दी जाती है जिसकी जन्म कुंडली या जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह को मजबूत बनाने के लिए कहा जाता है.रत्नों में अद्भूत शक्ति होती है. रत्न अगर किसी के भाग्य को आसमन पर पहुंचा सकता है तो किसी को आसमान से ज़मीन पर लाने की क्षमता भी रखता है. रत्न के विपरीत प्रभाव से बचने के लिए सही प्रकर से जांच करवाकर ही रत्न धारण करना चाहिए कुंडली में. ग्रहों की स्थिति के अनुसार रत्न धारण करना चाहिए.  रत्न पहनते समय मात्रा का ख्याल रखना आवश्यक होता है. अगर मात्रा सही नहीं हो तो फल प्राप्ति में विलम्ब होता है.ज्‍योतिषीय लाभ के लिए सफेद ऑस्‍ट्रेलियन ओपल ही पहनना चाहिए। इसकी चमक और सफेद रंग जितना साफ होगा ओपल उतना ही अच्‍छा माना जाता हैबेहतरीन ओपल उसकी स्‍पष्‍टता, शेप और क्‍वालिटी से पहचाना जाता है। यह चितना चमकदार, सपाट और एक रंग का होगा उतना ही अच्‍छा होता है। ज्‍योतिषी यह सलाह देते हैं कि वह सफेद ओपल सबसे अच्‍छा होता है जो दोनों ओर से स्‍पष्‍ट साफ दिखाई देता है।रत्‍नों और जेम स्‍टोन के बढ़ते चलन के कारण हर ज्‍वेलर के पास यह रत्‍न मिल जाएगा लेकिन यह जरूरी नहीं हो कि वह प्राकृतिक हो क्‍योंकि लगभग सभी जेमस्‍टोन के सेन्‍थेटिक रूप तैयार किए जा सके हैं।किसी भी रत्‍न को खरीदने से पहले उसकी शुद्धता की जांच अवश्‍य कर लेनी चाहिए। रत्‍नों को अपने जानने वाले डीलर से लें या फिर पहले उनके काम को अच्‍छी तरह से जांच ले फिर वहां से रत्‍नों की खरीदारी करें। रत्‍नों को अगर ज्‍योतिषीय रेमिडी के लिए पहनना हो तो रत्‍न सस्‍ता हो या महंगा उसकी शुद्धता के विषय में किसी अच्‍छी लैब का सर्टिफिकेट अवश्‍य देंखे और खुद भी इंटरनेट के माध्‍यम से और विशेषज्ञों से इसके विषय में जानकारी ले लें। अगर आपको असली ओपल रतन चाहिए तो आप हमसे असली वजह उच्च  क्वालिटी का कोई भी रतन लैबTester ओर  full guarantee ke sath wholesale rate per रतन मंगवा सकते हैं 07597718725-09414481324 आचार्य राजेश

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

पन्ना रत्न Emerald Gemstone

  https://youtu.be/rQW_ZCuNsrE Panna stone बुध का रत्न है| ज्योतिष में बुध एक सौम्य ग्रह माने जाते है जो बुद्धि के कारक हैं|  नवग्रहों में बुध युवराज हैं जो सदा कौमार्य evergreen ग्रह हैं| सूर्य के

 सर्वाधिक निकट होने के कारण ये एक अधीर और जल्दी बदलने वाला ग्रह है|andएक Astrologer और Gemologist की हैसियत से सबसे ज्यादा आम प्रश्न मुझसे पूछा जाता है की मैं कौन सा https://youtu.be/rQW_ZCuNsrE



रत्न धारण करूँ या कौन सा रत्न मुझे suit करेगा| ऐसा जातक जिसकी जन्मकुंडली में बुद्ध देवता शुभ किन्तु कमजोर होकर पड़े हों, पन्ना धारण कर सकता है। हालाँकि बुद्ध की अपनी को

ई धातु नहीं होती है इसलिए पन्ना रत्न को चांदी धातु में पहना जाता है। ऐसा करने का मुख्या कारण है की चन्द्रमा को माँ व् बुद्ध को माँ के गर्भ में पड़ा पुत्र मानते हैं, जहाँ बच्चा सबसे अधिक सुरक्षित होता है। कुछ 

ज्योतिषी (Astrologer) ऐसा भी मानते हैं की यदि बुद्ध, वृहस्पति अथवा सूर्य या मंगल के नक्षत्र में हो और सूर्य मंगल या वृहस्पति शुभ फलकारक हों तो सोने में भी धारण किया जा सकता है। मुख्यतः पन्ना पांच रंगों में पा

या जाता है, तोते के पंख का रंग, पानी का रंग, सरेस के फूल का रंग, मोर के पंख जैसा और हल्का संदुल फूल जैसा रंग। इसका मूल्य व् गुणवत्ता रंग, रूप, चमक, वजन, पारदर्शिता के आधार पर निर्धारित की जाती है।यहां पर इस 

बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न जातकों के लिए पन्ने के भिन्न भिन्न रंग उपयुक्त हो सकते हैं जैसे किसी को हल्के हरे रंग का पन्ना अच्छे फल देता है जबकि किसी अन्य को गहरे हरे रंग का पन्ना अच्छे फल देता है। इसलिए पन्ने के रंग का चुनाव केवल अपने ज्योतिषी के परामर्श अनुसार ही करना चाहिए तथा अपनी इच्छा से ही किसी भी रंग का पन्ना धारण नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से ऐसा पन्ना लाभ की अपेक्षा हानि भी दे सकता है। रंग के साथ साथ अपने ज्योतिषी द्वारा सुझाये गये पन्ने के भार पर भी विशेष ध्यान दें तथा इस रत्न का उतना ही भार धारण करें जितना आपके ज्योतिषी के द्वारा बताया गया हो क्योंकि अपनी इच्छा से पन्ने का भार बदलने से कई बार यह रत्न आपको उचित लाभ नहीं दे पाता जबकि कई बार ऐसी स्थिति में आपका पन्ना आपको हानि भी पहुंचा सकता है।उदाहरण के लिए अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये पन्ने के भार से बहुत कम भार का पन्ना धारण करने से ऐसा पन्ना आपको बहुत कम लाभ दे सकता है अथवा किसी भी प्रकार का लाभ देने में अक्षम हो सकता है जबकि अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये पन्ने के धारण करने योग्य भार से बहुत अधिक भार का पन्ना धारण करने से यह रत्न आपको हानि भी पहुंचा सकता है जिसका कारण यह है कि बहुत अधिक भार का पन्ना आपके शरीर तथा आभामंडल में बुध की इतनी उर्जा 

स्थानांतरित कर देता है जिसे झेलने तथा उपयोग करने में आपका शरीर और 




आभामंडल दोनों ही सक्षम नहीं होते जिसके कारण ऐसी अतिरिक्त उर्जा अनियंत्रित होकर आपको हानि पहुंचा सकती है। इसलिए सदा अपने ज्योतिषी के द्वारा बताये गये भार के बराबर भार का पन्ना ही धारण करें क्योंकि एक अनुभवी ज्योतिषी तथा रत्न विशेषज्ञ को यह पता होता है कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको पन्ना रत्न का कितना भार धारण करना चाहिये। अपने पन्ने के माध्यम से उत्तम फलों की  किया जाता है  तथा विशेष भिन्न-भिन्न लग्न कुंडलियों के उचित विश्लेशण के पश्चात् शुभ-अशुभ बुद्ध का निर्णय किया जाता है, बुद्ध की स्थिती का विश्लेषण किया जाता है जिसके बाद ही पन्ना धारण करने या न करने की सलाह दी जाती हे बुध बुद्धि, ज्ञान अक्लमंदी communication आदि का कारक है|

पीड़ित बुध कुंडली को किस तरह प्रतिकूल रूप से प्रभाव देने वाला   अगर बुध बुद्धि का कारक है तो पन्ना तो हरेक को suit करना चाहिये ! मगर ऐसा नहीं है|

बुध ग्रह एक neutral, भावुक, हर्षित एवं सदाबहार ग्रह है| ये हमारे श्वास प्रश्वास सम्बन्धी system, nervous system, वाणी आदि का भी कारक है|

संस्कृत में intellect को बुद्धि से जाना जाता है और बुध बुद्धि शब्द से ही उत्पन्न है| बुध वैसे तो शुभ ग्रह माना जाता है पर यदि ये कुंडली में अशुभ या क्रूर ग्रहों के साथ युति करे तो ये भी अशुभ तथा malefic हो जाता है|जन्म कुंडली में शक्तिहीन बुध को सशक्त करने के लिए पन्ना रत्न (Emerald gemstone) धारण किया जाता है|ज्योतिष के अनुसार बुध का प्रत्येक कुंडली में विशेष महत्व है तथा किसी कुंडली में बुध का बल, स्वभाव और स्थिति कुंडली से मिलने वाले शुभ या अशुभ परिणामों पर बहुत प्रभाव डाल सकती है। बुध के बल के बारे में चर्चा करें तो विभिन्न कुंडली में बुध का बल भिन्न भिन्न होता है जैसे किसी कुंडली में बुध बलवान होते हैं तो किसी में निर्बल जबकि किसी अन्य कुंडली में बुध का बल सामान्य हो सकता है। किसी कुंडली में बुध के बल को निर्धारित करने के लिय बहुत से तथ्यों का पूर्ण निरीक्षण आवश्यक है हालांकि कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में बुध की किसी राशि विशेष में स्थिति ही बुध के कुंडली में बल को निर्धारित करती है जबकि वास्तविकता में किसी भी ग्रह का किसी कुंडली में बल निर्धारित करने के लिए अनेक प्रकार के तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक है।कक विभिन्न कारणों के चलते यदि बुध किसी कुंडली में निर्बल रह जाते हैं तो ऐसी स्थिति में बुध उस कुंडली तथा जातक के लिए अपनी सामान्य और विशिष्ट विशेषताओं के साथ जुड़े फल देने में पूर्णतया सक्षम नहीं रह पाते जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कुंडली में निर्बल बुध को ज्योतिष के कुछ उपायों के माध्यम से अतिरिक्त उर्जा प्रदान की जाती है जिससे बुध कुंडली में बलवान हो जायें तथा जातक को लाभ प्राप्त हो सकें। बुध को किसी कुंडली में अतिरिक्त उर्जा प्रदान करने के उपायों में से उत्तम उपाय है बुध का रत्न पन्ना धारण करना जिसे धारण करने के पश्चात धारक को बुध के बलवान होने के कारण लाभ प्राप्त होने आरंभ हो जाते हैं।  पन्ना रत्न बुध की उर्जा तरंगों को अपनी उपरी सतह से आकर्षित करके अपनी निचली सतह से धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देता है जिसके चलते जातक के आभामंडल में बुध का प्रभाव पहले की तुलना में बलवान हो जाता है तथा इस प्रकार बुध अपना कार्य अधिक बलवान रूप से करना आरंभ कर देते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि बुध का रत्न पन्ना किसी कुंडली में बुध को केवल अतिरिक्त बल प्रदान कर सकता है तथा पन्ना किसी कुंडली में बुध के शुभ या अशुभ स्वभाव पर कोई प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार यदि किसी कुंडली में बुध शुभ हैं  कारक है तो पन्ना धारण करने से ऐसे शुभ बुध को अतिरिक्त बल प्राप्त हो जायेगा जिसके कारण जातक को बुध से प्राप्त होने वाले लाभ अधिक हो जायेंगें जबकि यही बुध यदि किसी जातक की कुंडली में अशुभ है तो बुध का रत्न धारण करने से ऐसे अशुभ बुध को और अधिक बल प्राप्त हो जायेगा जिसके चलते ऐसा अशुभ तथा अकारक बुध जातक को और भी अधिक हानि पहुंचा सकता है। इस लिए बुध का रत्न पन्ना केवल उन जातकों को पहनना चाहिये जिनकी कुंडली में बुध शुभ रूप से कार्य कर रहे हैं तथा ऐसे जातकों को बुध का रत्न कदापि नहीं धारण करना चाहिये जिनकी कुंडली में बुध अशुभ रूप से कार्य कर रहें हैं। अशुभ या पीड़ित बुध जातक को स्मृति हानि (memory loss), हकलाना, दिमागी अस्थिरता तथा अनिद्रा रोग आदि देता है| इस तरह का बुध मानसिक शक्ति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है|शारीरिक विकारों में अशुभ या पीड़ित बुध दीर्घकालीन पेचिश (chronic dysentery), अतिसार (diarrhoea), पेट के व्रण, ह्रदय रोग, भय, विक्षिप्त या पागलपन तक दे सकता हैख़ास तौर से जो लोग व्यापार में हैं, उनके लिए तो बुध का शुभ और अनुकूल होना अवश्यम्भावी है| और अगर बुध की कुंडली में ऐसी स्थिति नहीं है तो अच्छी quality का पन्ना (Emerald gemstone) धारण कर इसे सशक्त किया जा सकता है| पन्ना रत्न (Emerald gemstone) धारण बुद्धि और दिमागी ताकत को बढ़ा कर

 दिमागी अस्थिरता दूर करने में सक्षम होता है|पन्ना रत्न धारण अच्छी 

communication skills, अच्छा स्वास्थ्य तथा व्यापार के लिए अति उत्तम



 होता है| बाकी सब रत्नों की तरह से पन्ना भी कुंडली के अति सूक्ष्म 

निरीक्षण तथा विश्लेषण के बाद ही धारण किया जाना चाहिएमैं स्वयं एक रत्न विशेषज्ञ 

(Gemologist) एवं ज्योतिषी हूँ, इसलिये कोई भी रत्न निर्धारण से पूर्व बड़ी ही बारीकी और गहन विश्लेषण के बाद ही रत्नों को निर्धारित करता हूँ|उच्च कोटि का पन्ना जाम्बिया तथा स्कॉट्लैंड की खानों से निकला जाता है !जहां ये कई अशुद्धियों के साथ होते हैं। खानों से निकाल कर सबसे पहले उनकी अशुद्धि‍यां दूर की जाती है। इसके बाद इन्‍हें विभिन्‍न आकार में तराश कर बाजार में भेजा जाता है। वर्तमान में कोलम्‍बिया की खानों में सबसे अच्‍छा panna पाया जाता है। इसके बाद रूस और ब्राजील में मिलने वाले पन्‍ने सबसे बेहतर माने जाते हैं। मिश्र, नार्वे, भारत, इटली, आस्‍ट्रेलिया, अफ्रीका और आस्‍ट्रिया में भी पन्‍ने की खाने हैं।



भारत में यह मुख्‍यत: दक्षिण महानदी, हिमालय, सोमनदी व गिरनार में पाया जाता है। इसका रंग हलके तोतिये से लेकर गाड़े हरे रंग तक हो सकता है ! असली पन्ने में काले रंग के हलके रेशे होते हपन्‍ना ग्रेनाइट, पेग्‍मेटाइट व चूने के पत्‍थरों के मिश्रण से बनता है। इसका रासायनिक फार्मुला Be3Al2(SiO3)6 होता है। इसकी कठोरता 7.75 होती है और आपेक्षिक घनत्‍व 2.69 से 2.80 तक होता है। यह प्रकाश के परावर्तन की भी क्षमता रखता है इसकी परावर्तन क्षमता 1.57 से 1.58 के बीच होती है। ये एक पारदर्शक रत्‍न हैैयदि कुंडली में बुध ग्रह शुभ प्रभाव में हो तो पन्ना अवश्य धारण करनारे रंग के इस चमकीले रत्न का गुणगान सदियों से होता आ रहा है। इसे मरकत मणि, हरितमणि, एमराल्ड, पांचू आदि नामों से भी जाना जाता है। गरुड़ पुराण में इसके गुणों के संदर्भ में विस्तार से चर्चा की गई है।

पन्ना धारण करने से दिमाग की कार्य क्षमता तीव्र हो जाती है और जातक पढ़ाई , लिखाई, व्यापार जैसे कार्यो में सफलता प्राप्त करता है! विधार्थियों को अपनी कुंडली का निरिक्षण किसी अच्छे ज्योतिषी से करवाकर पन्ना अवश्य धारण करना चाहिए क्योकि हमारे शैक्षिक जीवन में बुध ग्रह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है ! अच्छी शिक्षा बुध की कार्यकुशलता पर निर्भर है! यदि आप एक व्यापारी है और अपने व्यापार में उन्नति चाहते है तो आप पन्ना धारण कर सकते है! हिसाब किताब के कामो से जुड़े जातको को भी पन्ना अवश्य धारण करना चाहिए क्योकि एक अच्छे गणितज्ञ की योग्यता बुध के बल पर निर्भर करती है! अभिनय और फ़िल्मी क्षेत्र से जुड़े जातको को भी पन्ना धारण करना चाहिए क्योकि बुध ग्रह इन क्षेत्रो से जुड़े जातको के जीवन में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है!जिन लोगों का हाजमा खराब रहता हो, उन्हें पन्ना अवश्य धारण करना चाहिए।

गर्भवती महिलाओं को पन्ना धारण करने से अधिक लाभ मिलता है।

जो लोग दमा रोग से पीड़ित है, उन्हें पन्ना रत्न पहनने से लाभ होता है

पन्ना पहनने से पौरूष शक्ति में वृद्धि होती है एंव स्वास्थ्य उत्तम होता है।पुराने समय में मिस्र, ऑस्ट्रिया और अफगानिस्तान में पन्ना रत्न के लिए खनन का कार्य होता था। एक बार जब स्पेनिश लोग दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप में पहुंचे तो वो सुंदर एवं बड़े आकार के पन्ना रत्न को देखकर हैरान हुए हैं, क्योंकि उन्होंने पहले इस तरह का रत्न नहीं देखा था। उन्होंने इस खूबसूरत रत्न के स्रोत का पता लगाने के लिए बहुत वर्ष व्यतीत किए। अंत स्पेनिश नागरिकों ने पन्ना के स्रोत का पता लगा लिया, आज हम उसको कोलंबिया के रूप में जानते हैं, जिसको सोमोंडोको के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ होता है कि हरे रत्नों का भगवान। पन्ना बहुत नाजुक रत्न है, इसलिए इसको मजबूती देने के लिए कुछ अन्य सामग्री को इसमें मिलाया जाता था। हालांकि, इसके बावजूद भी इस रत्न को आकार देना आसान कार्य नहीं है। इसकी कटिंग करते समय बहुत सावधानी बरतने की जरूरत पड़ती है।रत्न धारण करने के पहले कुंडली दिखाना जरूरी है। मित्रों किसी अच्छे विद्वान रतन एक्सपर्ट ज्योतिषी को कुंडली दिखाकर ही कोई रत्न पहने नोट-पन्ना रत्न किसी क्वालीफाईड ज्योतिषीय की देख-रेख में ही पहनना चाहिए न कि किसी झोला छाप ज्योतिषी या पण्डित की सलाह पर। क्योंकि रत्न एक विज्ञान  है आचार्य राजेश 07597718725-09414481324 



गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

Blue Sapphire शनी Ratan Neelam

मित्रों आज बात करते हैं नीलम रत्न की  रत्न प्रकृति की कोख से मिलने वाला एक मूल्यवान पत्थर है। पुराने समय से ही व्यक्ति का रत्नों के प्रति आकर्षण बना रहा है। आज भी ग्रहों के प्रभाव से बचने, रोगों के निवारण और कष्टों के निवारण के लिए व्यक्ति रत्न धारण करता है।
 यदि हम नीलम रत्न की बात करें तो यह बहुत ही शक्तिशाली रत्न है। यह गहरे नीले रंग का, हल्के नीले रंग का पारदर्शी, चमकदार और लोचदार रत्न होता है  जिस प्रकार शनि शक्तिशाली और लंबे समय तक असर दिखाने वाला ग्रह है, उसी प्रकार नीलम भी है। नीलम के विषय यह माना जाता है कि इसमें बनाने और बिगाड़ने दोनों तरह की शक्ति होती है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि जिसे यह रास आ जाए उसे राजा बना सकता है। अगर यह किसी को अशुभ प्रभाव देने लगे तो राजा को रंक बनाने में भी इसे देर नहीं लगती। पर मेरा मानना है कि ऐसा  सारे रत्नों पर यह  वात लागू होती है हीरे के बाद दूसरा सबसे सुंदर रत्न माना जाता है।कहा जाता है कि नीलम शुभ साबित हो तो मनुष्य के जीवन में खुशियों की बहार ला देता है। 

लेकिन अशुभ होने पर उल्टा हानी करेगा ही इस लिए मेरा मानना है कि कोई भी रतन अपनी कुंडली के अनुसार पहनने आप राशी या अंक ज्योतिष के हिसाब से मत पहने शनि ग्रह सबसे डरावना, सबसे अधिक रहस्मय और एक सख्त कार्य कारक (hard taskmaster) हैं जिन्हें “कर्माधिपति” (हमारे समस्त कर्मों के मालिक) के नाम से भी जाना जाता है|शनि ज्योतिष में क्रूर ग्रहों के क्रूरतम ग्रह तो जरूर माने जाते हैं मगर इनकी कृपा के बिना जीवन में कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता|एक सुढृढ़ और अच्छी तरह स्थित शनि जातक को नाम, यश, प्रभुत्व (authority), ज्ञान, अग्रणी बनने की प्रतिभा (ability to lead), अध्यात्म, विरक्ति, सब्र, position and power आदि देता है| नीलम रत्न  
(BlueSapphiregemstone) कुंडली में एक शक्तिहीन शनि को सुढृढ़ कर उसे positive बनाता है|मित्रोंनीलम ज्यादातर चर्चा में रहता है कि इसे धारण करते ही यह तुरंत ऐसा देगा या वैसा कर देगा। या तो अचानक धनवान बना देगा या फिर दरिद्र बना देगा। इस प्रकार की बहुत सारी भ्रांति है नीलम के बारे में। किताबों में सारी वकवास भरी पड़ी हैवैदिकज्योतिषशास्त्र के अनुसार। इसे संस्कृत में शनिप्रिय भी कहते हैं, जिसे बौद्ध भिक्षु मध्य एशिया ले गए थेजो बिगड़ कर शनिप्रिय से सपिर एवं सैपहाएर या सैफायर बन 

शनि ग्रह का रत्‍न नीलम, जिसे अंग्रेजी में ‘ब्‍लू सेफायर’ कहते हैं वास्‍तव में उसी श्रेणी का रत्‍न है जिसमें माणिक रत्‍न आता है। ज्‍योतिष विज्ञान में इसे कुरूंदम समूह का रत्‍न कहते हैं। इस समूह में लाल रत्‍न को माणिक तथा दूसरे सभी को नीलम कहते हैं। इसलिए नीलम सफेद, हरे, बैंगनी, नीले आदि रंगों में प्राप्‍त होता है। सबसे अच्‍छा ब्‍लू सेफायर नीले रंग का होता है जैसे आसमानी, गहरा नीला, चमकीला नीला काला  आदि।माणिक, हीरा, पन्‍ना और पुखराज की तरह नीलम रत्न भी मिनरल डिपोजीशन से बना है। अत: यह भी बड़ी-बड़ी खानों से निकाला जाता है। सबसे अच्‍छा Blue Sapphire भारत में पाया जाता है। भारत के अलावा आस्‍ट्रेलिया, अमेरिका, अफ्रीका, म्‍यांमार और श्रीलंका में भी नीलम की खानें पाई 
शनि ग्रह का रत्‍न नीलम, जिसे अंग्रेजी में ‘ब्‍लू सेफायर’ कहते हैं ‍
माणिक्‍य और नीलम की वैज्ञानिक संरचना बिल्‍कुल एक जैसी है। वैज्ञानिक भाषा में कहें तो माणिक्‍य की तरह ही Neelam भी एक एल्‍युमीनियम ऑक्‍साइड है। एल्‍युमीनियम ऑक्‍साइड में आइरन, टाइटेनियम, क्रोमियम, कॉपर और मैग्‍नीशियम की शुद्धियां मिली होती हैं जि‍ससे इनमें नीला,पीला, बैंगनी, नारंगी और हरा रंग आता है। इन्‍हें ही Neelam कहा जाता है। इसमें ही अगर क्रोमियम हो तो यह क्रिस्‍टल को लाल रंग देता है जिसे रूबी या माणिक्‍य कहते हैं।माना जाता है कि मोर के पंख जैसे रंग वाला Neelam सबसे अच्‍छा माना जाता है। यह बहुत चमकीला और चिकना होता है। इससे आर-पार देखा जा सकता है। यह बेहद प्रभावशाली रत्‍न होता है तथा सभी रत्‍नों में सबसे जल्‍दी अपना प्रभाव दिखाता है।सदियों से ही नीलम को रोमांस व शानो-शौकत का प्रतीक माना जाता है। इससे लोभ व घृणा की भावना तो कम होती ही है साथ ही साथ जीवन खुशहाली से भर जाता है और हर पल पूर्ण होने का एहसास होता है। सदियों पहले जब यूनानी लोग अपनी ज़रूरत को पूरा करवाने के लिए “ओरेकल” के पास जाते थे तो वो नीलम ही पहन कर जाते थे। 
“ओरेकल” इस रत्न के बहुत बड़े प्रशंसक थे और केवल उसी की मदद करते थे जो इस अनमोल रत्न को धारण करके जाता था। नीलम को भूत-प्रेत सिद्धि के लिए भी पूजा जाता है। इसके बल से दैवीय शक्तियों व आत्माओं पर काबू पाया जाता है। नीलम धारण करने का मतलब यह ही नहीं कि आपका शुभ ही शुभ हो, नीलम का प्रभाव कभी-कभी नकारात्मकता की ओर भी चला जाता है। इसके प्रभाव से कई बार बहुत बड़े-बड़े बदलाव आते हैं जो विनाश की ओर भी ले जाते हैं। हालांकि नकली व असली दोनों ही रत्न उद्योग में नीलम का बड़ा महत्व है बहुतायत में समृद्धि, खुशहाली व अच्छा समय लेकर आता है।यदि नीलम और आप सही सिंक्रनाइज़ेशन में हैं, तो यह आ आपको सीधे शुभ  परिणामों के पथ की ओर ले जाता है, विशेष रूप सेआपकी कुंडली में  शनि कारक ओर शुभ हो  ज्योतिष के अनुसार शनि का प्रत्येक कुंडली में विशेष महत्व है तथा किसी कुंडली में शनि का बल, स्वभाव और स्थिति कुंडली से मिलने वाले शुभ या अशुभ परिणामों पर बहुत प्रभाव डाल सकती है। शनि के बल के बारे में चर्चा करें तो विभिन्न कुंडली में शनि का बल भिन्न भिन्न होता है
जैसेसे किसी कुंडली में शनि बलवान होते हैं तो किसी में निर्बल जबकि किसी अन्य कुंडली में शनि का बल सामान्य हो सकता है। किसी कुंडली में शनि के बल को निर्धारित करने के लिय बहुत से तथ्यों का पूर्ण निरीक्षण आवश्यक है हालांकि कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में शनि की किसी राशि विशेष में स्थिति ही शनि के कुंडली में बल को निर्धारित करती है जबकि वास्तविकता में किसी भी ग्रह का किसी कुंडली में बल निर्धारित करने के लिए अनेक प्रकार के तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक है। विभिन्न कारणों के चलते यदि शनि किसी कुंडली में निर्बल रह जाते हैं 

तो ऐसी स्थिति में शनि उस कुंडली तथा जातक के लिए अपनी सामान्य और विशिष्ट विशेषताओं के साथ जुड़े फल देने में पूर्णतया सक्षम नहीं रह पाते जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कुंडली में निर्बल शनि को ज्योतिष के कुछ उपायों के माध्यम से अतिरिक्त उर्जा प्रदान की जाती है जिससे शनि कुंडली में बलवान हो जायें तथा जातक को लाभ प्राप्त हो सकें। शनि को कि
सी कुंडली में अतिरिक्त उर्जा प्रदान करने के उपायों में से उत्तम उपाय है शनि का रत्न नीलम धारण करना जिसे धारण करने के पश्चात धारक को शनि के बलवान होने के कारण लाभ प्राप्त होने आरंभ हो जाते हैं।इस बीच आप अपनी सेहत, जीवन शक्ति और उत्साह में बढ़ावा दे सकते हैं।नीलम जीवन में अभिभावक के रूप में काम करता है क्योंकि यह आपको जादू टोना, भूत-प्रेत, विरोधियों आदि से बचाता है।नीलम रत्न आपकी कुशलता बढ़ाता है जिससे आप किसी भी कार्य को गम्भीरता से करने में सक्षम होते हैं। यदि नीलम अनुकूल पड़े तो धन-धान्य, सुख-संपत्ति, यश, मान-सम्मान, आयु, बुद्धि तथा वंश की वृद्धि करता है, रोग और दरिद्रता को दूर करता है, मुख की कांति और नेत्र की रोशनी को बढ़ाता है तथा इससे इंसान की अनेकों मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। नीलम धारण करने से अनेक प्रकार की बीमारियों पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके धारण करने से नेत्र रोग, उल्टी, हिचकी, पागलपन, दमा, खांसी, अजीर्ण, ज्वर आदि रोगों में लाभ मिलता है। 

- राजनीति में नीलम की अहम भूमिका है। नीलम धारण से पराजय विजय में बदल सकती है। शनि का रत्‍न नीलम धारण करने से व्‍यक्‍ति के विचारों में सकारात्‍मकता आती है। इस रत्‍न के प्रभाव में कोई व्‍यक्‍ति सही निर्णय ले पाने में सक्षम होता है। शनि का रत्‍न नीलम  मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है। नीलम रत्‍न धारण करने से कार्यक्षमता में भी सुधार आता है।नीलम रत्‍न के प्रभाव से जातक में आत्‍मविश्‍वास में बढ़ोत्तरी होती है। प्रोफेशन ही नहीं बल्कि पर्सनल लाइफ में भी वह व्‍यक्‍ति चुनौतियों से डटकर सामना कर पाता है और उसे इतनी शक्‍ति नीलम रत्‍न की चमत्‍कारिक ऊर्जा से प्राप्‍त होती है।नीलम रत्न शनि की उर्जा तरंगों को अपनी उपरी सतह से आकर्षित करके अपनी निचली सतह से धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देता है जिसके चलते जातक के आभामंडल में शनि का प्रभाव पहले की तुलना में बलवान हो जाता है तथा इस प्रकार शनि अपना कार्य अधिक बलवान रूप से करना आरंभ कर देते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि शनि का रत्न नीलम किसी कुंडली में शनि को केवल अतिरिक्त बल प्रदान कर सकता है तथा नीलम किसी कुंडली में शनि के शुभ या अशुभ स्वभाव पर कोई प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार यदि किसी कुंडली में शनि शुभ हैं तो नीलम धारण करने से ऐसे शुभ शनि को अतिरिक्त बल प्राप्त हो जायेगा जिसके कारण जातक को शनि से प्राप्त होने वाले लाभ अधिक हो जायेंगें जबकि यही शनि यदि किसी जातक की कुंडली में अशुभ है तो शनि का रत्न धारण करने से ऐसे अशुभ शनि को और अधिक बल प्राप्त हो जायेगा जिसके चलते ऐसा अशुभ शनि जातक को और भी अधिक हानि पहुंचा सकता है। 
        इस लिए शनि का रत्न नीलम केवल उन जातकों को पहनना चाहिये जिनकी कुंडली में शनि शुभ रूप से कार्य कर रहे हैं तथा ऐसे जातकों को शनि का रत्न कदापि नहीं धारण करना चाहिये जिनकी कुंडली में शनि अशुभ रूप से कार्य कर रहें हैं। नीलम के कुछ गुणों के बारे में चर्चा करें तो नीलम का रंग हल्के नीले रंग से लेकर, गहरे नीले या बैंगनी रंग तक हो सकता है तथा संसार के विभिन्न भागों से आने वाले नीलम विभिन्न रंगों के हो सकते हैं। यहां पर इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न जातकों के लिए नीलम के भिन्न भिन्न रंग उपयुक्त हो सकते हैं जैसे किसी को हल्के नीले रंग का नीलम अच्छे फल देता है जबकि किसी अन्य को गहरे लाल रंग का नीलम अच्छे फल देता है। इसलिए नीलम के रंग का चुनाव केवल अपने ज्योतिषी के परामर्श अनुसार ही करना चाहिए तथा अपनी इच्छा से ही किसी भी रंग का नीलम धारण नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से ऐसा नीलम लाभ की अपेक्षा हानि भी दे सकता है। रंग के साथ साथ अपने ज्योतिषी द्वारा सुझाये गये नीलम के भार पर भी विशेष ध्यान दें तथा इस रत्न का उतना ही भार धारण करें जितना आपके ज्योतिषी के द्वारा बताया गया हो क्योंकि अपनी इच्छा से नीलम का भार बदलने से कई बार यह रत्न आपको उचित लाभ नहीं दे पाता जबकि कई बार ऐसी स्थिति में आपका नीलम आपको हानि भी पहुंचा सकता है।उदाहरण के लिए अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये नीलम के भार से बहुत कम भार का नीलम धारण करने से ऐसा नीलम आपको बहुत कम लाभ दे सकता है अथवा किसी भी प्रकार का लाभ देने में अक्षम हो सकता है जबकि अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये नीलम के धारण करने योग्य 
भार से बहुत अधिक भार का नीलम धारण करने से यह रत्न आपको हानि भी पहुंचा सकता है जिसका कारण यह है कि बहुत अधिक भार का नीलम आपके शरीर तथा आभामंडल में शनि की इतनी उर्जा स्थानांतरित कर देता है जिसे झेलने तथा उपयोग करने में आपका शरीर और आभामंडल दोनों ही सक्षम नहीं होते जिसके कारण ऐसी अतिरिक्त उर्जा अनियंत्रित होकर आपको हानि पहुंचा सकती है। इसलिए सदा अपने ज्योतिषी के द्वारा बताये गये भार के बराबर भार का नीलम ही धारण करें क्योंकि एक अनुभवी वैदिक ज्योतिषी तथा रत्न विशेषज्ञ को यह पता होता है कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको नीलम रत्न का कितना भार धारण करना चाहिये।   आचार्य राजेश कुमार 07597718725-09414481324

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

Moti Rattan मोती रतन Gemology Jyotish

https://youtu.be/SSJXRyQmjtY


मित्रोंआज हम रत्नों में  मोती की बात करेंगे। जी हां... रत्नों की तरह ही ग्रहीय विघ्नों को हल करने वाला यह मोती ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक महत्वपूर्ण ज्योतिष उपाय है। यह अमूमन सफेद रंग का होता है 
और इसे चंद्रमा का कारक माना गयाहैचंद्रमा को ब्रह्मांड का मन कहा गया है. हमारे शरीर में भी चंद्रमा हमारे मन व मस्तिष्क का कारक है, विचारों की स्थिरता का प्रतीक है | मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा दोस्त या


 दुश्मन है |माता लक्ष्मी के आशीर्वाद से भरपूर मोती रत्न पहनने से आप लक्ष्मी को अपने द्वार पर आमंत्रित करेंगे। अगर आप की कुंडली में चंद्रमा कमज़ोर है, तो उस को सबल बनाने में आप की मदद करेगा। इस के अलावा अनिद्रा व मधुमेह को नियंत्रण में लाने में भी यह मदद करता है। मोती रत्न आप की याददाश्त को बल देता है। आप के मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है। इस के अलावा मोती यौन जीवन में शक्ति प्रदान करने के लिए भी जाना जाता है एवं आप के वैवाहिक जीवन को सुंदर बनाता है।कदली, सीप, भुजंग मुख, स्वाती एक, गुण तीन| 
जैसी संगत बैठियें, तेसोई फल दीन ||
अर्थात स्वाती नक्षत्र के समय बरसात की एक बूंद घोघे के मुख में समाती है तब वह मोती बन जाता है. वही बूंद केले में जा कर कपूर और साँप के मूह में जा कर हाला हाल विष बनती है |मोती रत्न की सरंचना कैल्शियम कार्बोनेट + एक प्रकार का जैविक तत्व(aragonite/calcite –
crystallised form of calcium carbonate)Conchiolin (गोंद की तरह सीप के सतहों पर जैविक पदार्थ) + जल का सम्मिश्रण है जो एक प्रकार का घोंघा (oyster) सीप के अन्दर उत्पन्न करता है|इस जैविक पदार्थ जिसे nacre कहते हैं इसे लपेटते लपेटते बहुत समय बाद मोती का निर्माण
ण होता है| इस पदार्थ की असाधारण ठोसपन व सघनता के कारण इसे तोडना अति कठिन होता है | मोती हलके गुलाबी छटा के साथ सफ़ेद के रंगतों में, सिल्वर, cream, सुनहरा, हरा, नीला और काला तक
रसायनिक दृष्टि से इसमे , केल्षीयम, कार्बन और आक्सीज़न,यह तीन तत्व पाए जाते है. आयुर्वेद के अनुसार मोती में 90% चूना होता है, इसलिए कैल्शियम् की कमी के कारण जो रोग उत्पन्न होते है उनमें लाभ करता है. नेत्र रोग, स्मरण शक्ति को बढ़ाने के लिए, पाचन शक्ति को तेज़ करने के लिए व हृदय को बल देने के लिए मोती धारण करना चाहिए | सामान्यत: चंद्रमा क्षीण होने पर मोती पहनने की सलाह दी जाती है मगर हर लग्न के लिए यह सही नहीं है। ऐसे लग्न जिनमें चंद्रमा शुभ स्थानों (केंद्र या‍ त्रिकोण) का स्वामी होकर निर्बल हो,ऐसे में ही मोती पहनना लाभदायक होता है। अन्यथा मोती भयानक डिप्रेशन, निराशावाद और आत्महत्या तक का कारक बन सकता है।सामान्य तोर पर लोग मोती रत्न पहन लेते है , जब उनसे पूछा जाता है की यह रत्न आपने क्यों पहना तो 95 प्रतिशत लोगो का जबाब होता है की  मुझे गुस्सा बहुत आता है , गुस्सा शांत रहे इसलिए पहना है” यह बिलकुल गलत है ! मोती रत्न चन्द्रमा ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है , और यह ग्रह आपकी जन्मकुंडली में शुभ भी हो सक्ता है और अशुभ भी ! यदि चंद्रमा शुभ ग्रहों के साथ शुभ ग्रहों की राशि में और शुभ भाव में बैठा होगा तो निश्चित ही मोती रत्न आपको फायदा पहुचाएगा इसके विपरीत कुंडली में अशुभ होने पर नुसकान भी पंहुचा सकता है |मोती, कुंडली में यदि चंद्र शुभ प्रभाव में हो तो मोती अवश्य धारण करना चाहिए | चन्द्र मनुष्य के मन को दर्शाता है, और इसका प्रभाव पूर्णतया हमारी सोच पर पड़ता है| हमारे मन की स्थिरता को कायम रखने में मोती अत्यंत लाभ दायक सिद्ध होता है| इसके धारण करने से मात्री पक्ष से मधुर सम्बन्ध तथा लाभ प्राप्त होते है! मोती धारण करने से आत्म विश्वास में बढहोतरी भी होती है | हमारे शरीर में द्रव्य से जुड़े रोग भी मोती धारण करने से कंट्रोल किये जा सकते है जैसे ब्लड प्रशर और मूत्राशय के रोग , लेकिन इसके लिए अनुभवी ज्योतिष की सलाह लेना अति आवशयक है, क्योकि कुंडली में चंद्र अशुभ होने की स्तिथि में मोती नुक्सान दायक भी हो सकता है | पागलपन जैसी बीमारियाँ भी कुंडली में स्थित अशुभ चंद्र की देंन होती है , इसलिए मोती धारण करने से पूर्व यह जान लेना अति आवशयक है की हमारी कुंडली में चंद्र की स्थिति क्या है ? छोटे बच्चो के जीवन से चंद्र का बहुत बड़ा सम्बन्ध होता है क्योकि नवजात शिशुओ का शुरवाती जीवन , उनकी कुंडली में स्थित शुभ या अशुभ चंद्र पर निर्भर करता है! यदि नवजात शिशुओ की कुंडली में चन्द्र अशुभ प्रभाव में हो तो बालारिष्ठ योग का निर्माण होता है | फलस्वरूप शिशुओ का स्वास्थ्य बार बार खराब होता है, और परेशानिया उत्त्पन्न हो जाती है , इसीलिए कई अक्सर छोटे बच्चो के गले में मोती धारण करवाते है | कुंडली में चंद्रमा के बलि होने से न केवल मानसिक तनाव से ही छुटकारा मिलता है वरन् कई रोग जैसे पथरी, पेशाब तंत्र की बीमारी, जोड़ों का दर्द आदि से भी राहत मिलती है।लंग्स से जुडी समस्या, अस्थमा, माइग्रेन, साइनस की समस्या, शीत रोग तथा मानसिक रोगों में भी मोती धारण करने से लाभ होता है तथा मानसिक अस्थिरता से व्यक्ति एकाग्रता की और बढ़ने लगता है स्थूल रूप में कहा जाये तो मोती धारण करने से पीड़ित या कमजोर चन्द्रमाँ के सभी दुष्प्रभावों में लाभ व सकारात्मक परिवर्तन होता है। परंतु आब यहाँ सबसे विशेष बात यही है के प्रत्येक व्यक्ति को मोती धारण नहीं करना चाहिए मोती धारण करना सभी व्यक्तियों के लिए शुभ हो ऐसा बिलकुल भी आवश्यक नहीं है अधिकांश लोग की सोच होती है के मोती तो सौम्य प्रवर्ति का रत्न है और इसे धारण करने से तो मानसिक शांति मिलती है इसलिए हमें भी मोती धारण कर लेना चाहिए पर यहाँ यह बड़ी विशेष बात है के बहुतसी स्थितियों में मोती आपके लिए मारक रत्न का कार्य भी कर सकता है और मोती धारण करने पर बड़े स्वास्थ कष्ट, बीमारियां, दुर्घटनाएं और संघर्ष बढ़ सकता है इसलिए अपनी इच्छा से बिना किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के मोती नहीं धारण करना चाहिए, वास्तव में कुंडली में चन्द्रमाँ कमजोर होने पर मोती धारण की सलाह केवल उन्ही व्यक्तियों को दी जाती है जिनकी कुंडली में चन्द्रमाँ शुभ कारक ग्रह होता है, क्योंकि मोती धारण करने से कुंडली में चन्द्रमाँ की शक्ति बहुत बढ़ जाती है और ऐसे में यदि चन्द्रमाँ कुंडली का अशुभ फल देने वाला ग्रह हुआ तो मोती पहनना व्यक्ति के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होगा इसलिए किसी योग्य ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण कराने के बाद की मोती धारण करना चाहिए और यदि चन्द्रमाँ आपकी कुंडली का शुभ कारक ग्रह है तो निःसंदेह मोती धारण से बहुत शुभ परिणाम प्राप्त होंगे।मोती रत्न धारण करने से उदर रोग भी ठीक होता है जिस जातक का बलिष्ठ चन्द्रमा हो , सुख और समृद्धि प्रदान कर रहा हो , माता की लम्बी आयु वाले व्यक्तिओ को चन्द्र की वास्तुओ का दान नही लेना चाहिए  ना ही मोती किसी से दान में या free में लेकर पहने  द्रव्य से जुड़े व्यावसायिक और नोकरी पेशा लोगों को मोती अवश्य धारण करना चाहिए , जैसे दूध और जल पेय आदि के व्यवसाय से जुड़े लोग , लेकिन इससे पूर्व कुंडली अवश्य दिखाए |दि चंद्रमा लग्न कुंडली में अशुभ होकर शुभ स्थानों को प्रभावित कर रहा हो तो ऐसी स्थिति में मोती धारण न करें। बल्कि सफेद वस्तु का दान करें, शिव की पूजा-अभिषेक करें, हाथ में सफेद धागा बाँधे व चाँदी के गिलास में पानी पिएँ।मोती अनेक रंग रूपों में मिलते हैं। इनकी कीमत भी इनके रूप-रंग तथा आकार पर आंकी जाती है। इनका मूल्य चंद रुपए से लेकर हजारों रुपए तक हो सकता है। प्राचीन अभिलेखों के अध्ययन से पता चलता है कि फारस की खाड़ी से प्राप्त एक मोती छ: हजार पाउंड में बेचा गया था। फिर इसी मोती को थोड़ा चमकाने के बाद 15000 पाउंड में बेचा गया। संसार में आज सबसे मूल्यवान मोती फारस की खाड़ी तथा मन्नार की खाड़ी में पाए जाते हैं। वैसे तो बसरा मोती सर्वधिक प्रचलित है किन्तु यह समुद्रतट पर बनने वाला प्राकृतिक रत्न है जापान के मिकीमोतो कोकिची ने मोती से कल्चर मोती उत्पादन की तकनीक का आविष्कार किया था। इस आविष्कार करेंबाजार के 80 फीसदी भाग पर जापानियों का दबदबा है, जिसके बाद ऑस्ट्रेलिया और चीन का स्थान आता है। कल्चर मोती 25 रुपये से 100 रुपये रत्ती तक मिल जाते हैं |मोती  यह रत्न, बाकी रत्नों से कम समय तक ही चलता है क्योंकि यह रत्न रूखेपन, नमी तथा एसिड से अधिक प्रभावित हो जाता है।मोती रत्न चन्द्रमा की उर्जा तरंगों को अपनी उपरी सतह से आकर्षित करके अपनी निचली सतह से धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देता है जिसके चलते जातक के आभामंडल में चन्द्रमा का प्रभाव पहले की तुलना में बलवान हो जाता है तथा इस प्रकार चन्द्रमा अपना कार्य अधिक बलवान रूप से करना आरंभ कर देते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि चन्द्रमा का रत्न मोती किसी कुंडली में चन्द्रमा को केवल अतिरिक्त बल प्रदान कर सकता है तथा मोती किसी कुंडली में चन्द्रमा के शुभ या अशुभ स्वभाव पर कोई प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा शुभ हैं तो मोती धारण करने से ऐसे शुभ चन्द्रमा को अतिरिक्त बल प्राप्त हो जायेगा जिसके कारण जातक को चन्द्रमा से प्राप्त होने वाले लाभ अधिक हो जायेंगें जबकि यही चन्द्रमा यदि किसी जातक की कुंडली में अशुभ है तो चन्द्रमा का रत्न धारण करने से ऐसे अशुभ चन्द्रमा को और अधिक बल प्राप्त हो जायेगा जिसके चलते ऐसा अशुभ चन्द्रमा जातक को और भी अधिक हानि पहुंचा सकता है। इस लिए चन्द्रमा का रत्न मोती केवल उन जातकों को पहनना चाहिये जिनकी कुंडली में चन्द्रमा शुभ रूप से कार्य कर रहे हैं तथा ऐसे जातकों को चन्द्रमा का रत्न कदापि नहीं धारण करना चाहिये जिनकी कुंडली में चन्द्रमा अशुभ रूप से कार्य कर रहें हैं।मोती के कुछ गुणों के बारे में चर्चा करें तो मोती का रंग श्वेत रंग से लेकर, हल्के पीले, हल्के नीले अथवा हल्के काले रंग तक हो सकता है तथा संसार के विभिन्न भागों से आने वाले मोती विभिन्न रंगों के हो सकते हैं। यहां पर इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न जातकों के लिए मोती के भिन्न भिन्न रंग उपयुक्त हो सकते हैं जैसे किसी को हल्के पीले रंग का मोती अच्छे फल देता है जबकि किसी अन्य को श्वेत रंग का मोती अच्छे फल देता है। इसलिए मोती के रंग का चुनाव केवल अपने ज्योतिषी के परामर्श अनुसार ही करना चाहिए तथा अपनी इच्छा से ही किसी भी रंग का मोती धारण नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से ऐसा मोती लाभ की अपेक्षा हानि भी दे सकता है। रंग के साथ साथ अपने ज्योतिषी द्वारा सुझाये गये मोती के भार पर भी विशेष ध्यान दें तथा इस रत्न का उतना ही भार धारण करें जितना आपके ज्योतिषी के द्वारा बताया गया हो क्योंकि अपनी इच्छा से मोती का भार बदलने से कई बार यह रत्न आपको उचित लाभ नहीं दे पाता जबकि कई बार ऐसी स्थिति में आपका मोती आपको हानि भी पहुंचा सकता है।   उदाहरण के लिए अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये मोती के भार से बहुत कम भार का मोती धारण करने से ऐसा मोती आपको बहुत कम लाभ दे सकता है अथवा किसी भी प्रकार का लाभ देने में अक्षम हो सकता है जबकि अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये मोती के धारण करने योग्य भार से बहुत अधिक भार का मोती धारण करने से यह रत्न आपको हानि भी पहुंचा सकता है जिसका कारण यह है कि बहुत अधिक भार का मोती आपके शरीर तथा आभामंडल में चन्द्रमा की इतनी उर्जा स्थानांतरित कर देता है जिसे झेलने तथा उपयोग करने में आपका शरीर और आभामंडल दोनों ही सक्षम नहीं होते जिसके कारण ऐसी अतिरिक्त उर्जा अनियंत्रित होकर आपको हानि पहुंचा सकती है। इसलिए सदा अपने ज्योतिषी के द्वारा बताये गये भार के बराबर भार का मोती ही धारण करें क्योंकि एक अनुभवी वैदिक ज्योतिषी तथा रत्न विशेषज्ञ को यह पता होता है कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको मोती रत्न का कितना भार धारण करना चाहिए यह व्यक्ति की आयु, भार तथा कुंडली में चन्द्रमाँ की स्थिति का पूरा विश्लेषण करने पर मोती के भार को निश्चित किया जाता है  सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि विचार किए बिना किसी भी प्रकार का रत्न पहनना उचित नही है, क्योंकि यह आप के जीवन पर प्रभाव डालता है। आप उस रत्न को धारण करें, जो आप की जन्म कुंडली के अध्ययन के बाद सुझाया जाए। हो सकता है कि हर रत्न आप के लिये अनुकूल न हो, इसलिए आप रत्न से प्राप्त होने वाले लाभों से वंचित रह जाएंगे। रत्न को, उस के उत्तम गुणों के बावजूद, पहले आप की कुंडली की ग्रहीय दशा के साथ जोड़ कर देखा जाता है। इस से फायदा भी ज़्यादा होता है और संभावित नकारात्मक प्रभावों से भी आप बच सकते हैं। आप  अपनी कुंडलीकी विवेचना अध्ययन करने  के वाद ही रतन घारन करें आचार्य राजेश कुमार 07597718725-09414481324



गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

: भाग्यशाली रत्न  या अमंगलकारी

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भाग्यशाली रत्न  या अमंगलकारी 
रत्नों के बारे में किताबों में सामग्री भरी पड़ी है | असली रत्न की पहचान से लेकर रत्नों के प्रयोग और प्रभाव दुष्प्रभाव का वर्णन किताबों में  दिया गया है | तक़रीबन हर जगह एक ही बात को घुमा फिराकर लिख दिया जाता हैं | पर सब कोरी बकवास और बे सिर पैर की बातें लिखी है  सबसे पहले जिन्हें रत्नों के विषय में सामान्य ज्ञान भी नहीं है 
उनके लिए किताबों में पढ़कर रतन खरीदना बहुत भारी पड़ सकता है क्योंकि किताबों में ऐसी बातें लिखी हुई है जो असली रतन को ना लैकर आप नकली रतन खरीदना ज्यादा पसंद करोगे जो रतन असली होते हैं वह प्रकृति उसमें कोई न कोई दोष जरूर छोड़ देती है जैसे कहीं ना कहीं थोड़ा बहुत क्ट या रंग कहीं से हल्का या उस में कुछ ना कुछ होगा जो नकली रतन


 होगा वह चमकदार गहरे रंग का और एकदम से साफ जो आपको देखने में बहुत अच्छा लगेगा क्योंकि रत्नों को गर्म करके treatment की,या जाता है जिससे रतन चमकदार साफ ओर गहरे रंग में लाया जाता है ऐसा करने से रतन अपना असली कुदरती महत्त्व को खो  देते हैं 
: ब्रह्मांड में नौ ग्रह हैं जिनका महत्वपूर्ण प्रभाव जातक पर पड़ता है। इन ग्रहों से निकली रश्मियों को एकत्रित करने की क्षमता नवरत्नों में पाई जाती है, अतः ये रत्न ही प्रमुख रत्न हुए। अन्य रत्न अल्पमात्रा में इन रश्मियों को एकत्रित करने में सक्षम हैं, अतः वे उपरत्न कहलाए। प्रश्न: रत्न, उपरत्न, कृत्रिम रत्न व रंगीन कांच में क्या अंतर है? उत्तर: चारों में अंतर उनकी ग्रह रश्मियों को अवशोषित करने की क्षमता पर आधारित है। रत्न सब से अधिक रश्मियां ग्रहण करते हैं। उनके बाद उपरत्न और फिर कृत्रिम रत्न। रंगीन कांच न के बराबर रश्मियां ग्रहण करता है।  ओर कांच तो नुकसान भी कर सकता है अच्छे रत्नों का प्रभाव निश्चय ही अधिक होता है क्योंकि ये रत्न रश्मियों को ज्यों की त्यों अवशोषित करने में सक्षम होते ह प्रश्न: यदि कोई व्यक्ति अच्छा रत्न धारण करने में सक्षम नहीं हो तो क्या वह उपाय से वंचित रह जाएगा? उत्तर: जैसे कोई गरीब व्यक्ति अपना डाॅक्टरी इलाज नहीं करा पाता है वैसे ही वैदिक रत्न धारण करने में असमर्थ व्यक्ति रत्न के उपाय से वंचित रह जाता है। जिस प्रकार डाॅक्टरी इलाज में भी कम मूल्य की दवाइयां होती हैं जिनका सेवन कर या फिर परहेज या संयम द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है, उसी प्रकार,असली रत्न कम कीमत में भी मील जाते हैं जिसका प्रभाव भी महंगे रत्नों जैसे ही होता है  प्रश्न: क्या रत्न को धातु विशेष में पहनना आवश्यक है? उत्तर: धातु रत्न की क्षमता को कम या अधिक कर देती है। अतः उपयुक्त धातु में ही रत्न धारण करना उचित है। जैसे नीलम, गोमेद व लहसुनिया पंचधातु में, मोती चांदी में, हीरा प्लैटिनम में व अन्य रत्न स्वर्ण में धारण करने चाहिए। प्रश्न: रत्न खो जाए, टूट जाए या उसमें दरार आ जाए तो क्या करना चाहिए? उत्तर: रत्न का टूटना या उसमें दरार आना अशुभ माना गया है। ऐसे में  नया, बड़ा तथा अच्छी गुणवत्ता का रत्न धारण करना चाहिए। यदि रत्न खो जाए तो इसे शुभ माना गया है। ऐसे में समझना चाहिए कि ग्रह दोष दूर हुआ। रत्न का पाना अशुभ है। माना जाता है कि दूसरे के ग्रह कष्ट पाने वाले को प्राप्त हो रहे हैं। रतन का दान लैना भी अशुभ माना जाता है प्रश्न: सवाए में रत्न पहनने का क्या अर्थ है? उत्तर: सवाए में रत्न पहनने का अर्थ है उसका निर्दिष्ट भार से अधिक होना। यदि पांच रत्ती का रत्न बताया गया हो तो उससे अधिक अर्थात साढ़े पांच, छह या सात रत्ती का रत्न धारण करना चाहिए। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि केवल सवा पांच रत्ती का रत्न ही धारण करना है, पौने छह रत्ती का नहीं। पौने छह रत्ती का रत्न लगभग सवा पांच कैरेट और सवा पांच रत्ती का पौने पांच कैरेट के बराबर होता है। अतः पौना या सवाया मापक इकाई पर निर्भर करता है।रती भी पक्की ओर कच्ची होती है  प्रश्न: कौन सा रत्न कब तक धारण करना चाहिए? उत्तर: कुछ रत्न जीवनपर्यंत पहन सकते हैं, कुछ रत्नों को समयानुसार परिवर्तित करना चाहिए, और कुछ रत्न आपको बिल्कुल नहीं पहनने चाहिए। यह आपकी कुंडली  में ग्रह स्थिति के अनुसार ही जाना जा सकता है। योगकारक या शुभस्थ ग्रहों के रत्न सर्वदा धारण किए जा सकते हैं। किंतु मारक या अशुभ स्थान में स्थित ग्रहों के रत्न धारण नहीं करने चाहिए। अन्य ग्रहों क रतन जन्मकुंडली के अनुसार चायन करने चाहिएे किसी भी रत्न को दूध में ना डालें. अंगूठी को जल से एक बार धोकर पहनें. रत्न को दूध में डालकर रात भर ना रखें. कई रत्न दूध को सोख लेते हैं और दूध के कण रत्नों में समा कर रत्न को विकृत कर देते हैं. अपने मन की संतुष्टि के लिए अपने ईष्ट देवी की मूर्ति से स्पर्श करा कर रत्न धारण कर सकते हैं.असल में रत्न स्वयं सिद्ध ही होते है। रत्नों में अपनी अलग रश्मियाँ होती है और कुशल ज्योतिष ही सही रत्न की जानकारी देकर पहनाए तो रत्न अपना चमत्कार आसानी से दिखा देते है। माणिक के साथ मोती, पुखराज के साथ मोती, माणिक मूँगा भी पहनकर असीम लाभ पाया जा सकता है। फिर भी किसी कुशल ज्योतिष की ही सलाह लें तभी इन रत्नों के लाभ  पा सकते है। कुछ लोग सोचते हैं की रतन पहनते ही चमत्कार हो जाएगा ऐसा सोचना मुर्खतापूर्ण है रतन 10-या15दिन पहनने के वाद सोचते हैं यह रतन तो वेकार  है कोई लाभ नहीं हुआअपने लक्ष्य के अनुसार उनका लाभ प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि ये रत्न जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करते किस प्रकार हैं। हम अपने आस-पास व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न रत्न पहने हुए देखते हैं। ये रत्न वास्तव में कार्य कैसे करते हैं और हमारी जन्मकुंडली में बैठे ग्रहों पर क्या प्रभाव डालते हैं और किस व्यक्ति को कौन से विशेष रत्न धारण करने चाहिये, ये सब बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। रत्नों का प्रभाव: रत्नों में एक प्रकार की दिव्य शक्ति होती है। वास्तव में रत्नों का जो हम पर प्रभाव पड़ता है वह ग्रहों के रंग व उनके प्रकाश की किरणों के कंपन के द्वारा पड़ता है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने अपने प्रयोगों, अनुभव व दिव्यदृष्टि से ग्रहों के रंग को जान लिया था और उसी के अनुरूप उन्होंने ग्रहों के रत्न निर्धारित किये। जब हम कोई रत्न धारण करते हैं तो वह रत्न अपने ग्रह द्वारा प्रस्फुटित प्रकाश किरणों को आकर्षित करके हमारे शरीर तक पहुंचा देता है और अनावश्यक व हानिकारक किरणों के कंपन को अपने भीतर सोख लेता है। अतः रत्न ग्रह के द्वारा ब्रह्मांड में फैली उसकी विशेष किरणों की ऊर्जा को मनुष्य को प्राप्त कराने में एक विशेष फिल्टर का कार्य करते हैं।जितने भी रत्न है वे सब किसी न किसी प्रकार के पत्थर है। चाहे वे पारदर्शी हो, या अपारदर्शी, सघन घनत्व के हो या विरल घनत्व के, रंगीन हो या सादे…। और ये जितने भी पत्थर है वे सब किसी न किसी रासायनिक पदार्थों के किसी आनुपातिक संयोग से बने हैं। विविध भारतीय एवं विदेशी तथा हिन्दू एवं गैर हिन्दू धर्म ग्रंथों में इनका वर्णन मिलता है।यहां एक ओर व साफ करुंगा की रतन ओर उपरत्नों की न रसयानिक आनुपातिका अलग होती है वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है।
वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं।
प्राचीन संहिता ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है, उसमें एकल तत्व मात्र 108 ही बताए गए हैं। इनसे बनने वाले यौगिकों एवं पदार्थों की संख्या 39000 से भी ऊपर बताई गई हैं। इनमें कुछ एक आज तक या तो चिह्नित नहीं हो पाए है, या फिर अनुपलब्ध हैं। इनका विवरण, रत्नाकर प्रकाश, तत्वमेरू, रत्न वलय, रत्नगर्भा वसुंधरा, रत्नोदधि आदि उदित एवं अनुदित ग्रंथों में दिया गया है।मैंने अपने अनुभव में देखा है की 80 % लोगों ने गलत रत्न डाला होता है । ध्यान रहे की अगर बुरे घरों के रत्न डाले जाएँ तो वो नुक्सान भी कर सकते हैं । अति आवश्यक है की मारक घरों के रत्न न डाले जाएँ क्योंकि उनसे नुक्सान हो सकता है । जहाँ तक हो सके पाप ग्रहों के रत्नों से बचना चाहिए क्योंकि वह नुक्सान कर सकते हैं और वह नुक्सान सेहत, कारोबार, शादी किसी भी क्षेत्र में हो सकता है ।  मित्रों अगर आप अपनी कुंडली दिखाकर रतन पहनना चाहतें हैं या रतन रैना चाहते हैं या कुंडली वनवाना चाहते हैं तो समर्पक करें  आचार्य राजेश

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

जैमोलॉजी जैमोलॉजी वास्‍तव में एक विज्ञान है और इस पर अच्‍छा खासा काम हो रहा है। यह बात अलग है कि कीमती पत्‍थरों ने अपना यह स्‍थान खुद बनाया है। ठीक सोने, चांदी और प्‍लेटिनम की तरह। इसमें ज्‍योतिष का कोई रोल नहीं है। तीन प्रकार के रत्नो का प्रयोग आमतौर पर लोग करते है,शरीर के लिये परिवार और सन्तान के लिये तथा भाग्य के लिये,यही कारण प्राण रक्षा के लिये बुद्धि के विकास के लिये और समय पर कार्य हो जाने के लिये भी माना जाता है। आमतौर पर एक ही रत्न को लोग पहिनने की राय देते है,और उस रत्न के पहिनने के बाद कुछ सीमा मे फ़ायदा और कुछ सीमा मे नुकसान होने की बात से भी मना नही किया जा सकता है।पर यकीन मानिए भाग्‍य के साथ रत्‍नों का जुड़ाव मोहनजोदड़ो सभ्‍यता के दौरान भी रहा है। उस जमाने में भी भारी संख्‍या में गोमेद रत्‍न प्राप्‍त हुए हैं। यह सामान्‍य अवस्‍था में पाया जाने वाला रत्‍न नहीं है, इसके बावजूद इसकी उत्‍तरी पश्चिमी भारत में उपस्थिति पुरातत्‍ववेत्‍ताओं के लिए भी आश्‍चर्य का विषय रही। पता नहीं उस दौर में इतने अधिक लोगों ने गोमेद धारण करने में रुचि क्‍यों दिखाई, या गोमेद का रत्‍न के रूप में धारण करने के अतिरिक्‍त भी कोई उपयोग होता था, यह स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में राहू की दशा भोग रहे जातक को राहत दिलाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है।जो मेरे हिसाब से गलत है इंटरनेट और किताबों में रत्‍नों के बारे में विशद जानकारी देने वालों की कमी नहीं है। इसके वारे मेरी पोस्‍ट इसकी वास्‍तविक आवश्‍यकता के बारे में है। मैं एक ज्‍योतिष विद्यार्थी होने के नाते रत्‍नों को पहनने का महत्‍व बताने नहीं बल्कि इनकी वास्‍तविक आवश्‍यकता बताने का प्रयास करूंगा। वास्तव में दो विधाओं में उलझा है रत्‍न विज्ञान वर्तमान दौर में हस्‍तरेखा और परम्‍परागत ज्‍योतिष एक-दूसरे में इस तरह घुलमिल गए हैं कि कई बार एक विषय दूसरे में घुसपैठ करता नजर आता है। रत्‍नों के बारे में तो यह बात और भी अधिक शिद्दत से महसूस होती है। हस्‍तरेखा पद्धति ने हाथ की सभी अंगुलियों के हथेली से जुड़े भागों पर ग्रहों का स्‍वामित्‍व दर्शाया है। ऐसे में कुण्‍डली देखकर रत्‍न पहनने की सलाह देने वाले लोग भी हस्‍तरेखा की इन बातों को फॉलो करते दिखाई देते हैं। जैसे बुध के लिए बताया गया पन्‍ना हाथ की सबसे छोटी अंगुली में पहनने, गुरु के लिए पुखराज तर्जनी में पहनने और शनि मुद्रिका सबसे बड़ी अंगुली में पहनने की सलाहें दी जाती हैं। बाकी ग्रहों के लिए अनामिका तो है ही, क्‍योंकि यह सबसे शुद्ध है। मुझे इस शुद्धि का स्‍पष्‍ट आधार नहीं पता लेकिन शुक्र का हीरा, मंगल का मूंगा, चंद्रमा का मोती जैसे रत्‍न इसी अंगुली में पहनने की सलाह दी जाती है। अब रत्‍न किसे पहनाना आवश्‍यक है, इन सब बातों को लेकर कालान्‍तर में मैंने कुछ तय नियम बना लिए… अब ये कितने सही है कितने गलत यह तो नहीं बता सकता, लेकिन इससे जातक को धोखे में रखने की स्थिति से बच जाता हूं।वास्‍तव में जैम स्‍टोन से किस ग्रह का उपचार कैसे किया जाए इस बारे में कई तरह के मत हैं। कोई ग्रह के कमजोर होने पर रत्‍न पहनाने की सलाह देता है तो कोई केवल कारक ग्रह अथवा लग्‍नेश संबंधी ग्रह का रत्‍न पहनने की सलाह देता है। ऐसे में किसे क्‍या पहनाया जाए, यह बताना टेढ़ी खीर है। यहां के.एस. कृष्‍णामूर्ति को कोट करूं तो स्‍पष्‍ट है कि लग्‍नेश या नवमेश अथवा इनसे जुड़े ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कई दूसरे ग्रह जो फौरी तौर पर कुण्‍डली में बहुत स्‍ट्रांग पोजिशन में दिखाई भी दें तो उनसे संबंधित उपचार नहीं कराए जा सकते। मैं उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। तुला लग्‍न के जातक की कुण्‍डली में लग्‍न का अधिपति हुआ शुक्र, कारक ग्रह हुआ शनि और नवमेश हुआ बुध। अब कृष्‍णामूर्ति के अनुसार जब तक शनि का संबंध शुक्र या बुध से न हो तो उससे संबंधित उपचार नहीं किए जा सकते, यानि उपचार प्रभावी नहीं होगा, लेकिन परम्‍परागत ज्‍योतिष के अनुसार तुला लग्‍न के जातक को शनि संबंधी रत्‍न प्रमुखता से पहनाया जा सकता है। यह शरीर पंच भूतों से बना है और इन्ही के अधिकार मे सम्पूर्ण जीवन का विस्तार होता है। इन पंचभूतो मे किसी भी भूत की कमी या अधिकता जीवन के विस्तार मे अपने अपने प्रकार से दिक्कत देने के लिये अपना प्रभाव देने लगते है। ग्रहों के दो प्रकार सूर्य और चन्द्रमा के साथ देखे जाते है,जैसे मेष राशि का स्वामी मंगल है तो वह लगनेश के लिये मूंगा को पहिनने का कारक बनता है जो शरीर और प्राण रक्षा के लिये अपना प्रभाव देता है,लेकिन उसका असर धन के प्रति सही नही माना जा सकता है जैसे मंगल और शुक्र मे आपस मे नही बनती है,उसी प्रकार से बुध के साथ भी मंगल की नही बनती है,चन्द्रमा के साथ बराबर का असर रहता है सूर्य के साथ उसकी बहुत अधिक बढोत्तरी हो जाती है गुरु के साथ होने से अहम की मात्रा बढ जाती है और शनि के साथ मिलने से कसाई जैसी प्रकृति बन जाती है। तो मूंगा मेष लगन वालो के लिये धन व्यवहार कार्य जीवन साथी उन्नति के साधनो मे तो गलत असर देगा और शरीर मन आयु के साथ भलाई करेगा,अहम ज्ञान और शांति के साधनो मे बढोत्तरी करने से दिक्कत देने वाला बनेगा। अगर शनि लगन मे ही विराजमान है तो वह सिर दर्द की बीमारी देगा और जो भी सोचा जाता है उसके लिये अपनी तर्क शक्ति के विकास होने से तर्क वितर्क करने से होते हुये कार्य को भी बिगाडने की कोशिश करेगा। कार्य तकनीकी बन जायेगा और जो भी कार्य होगा वह मनुष्य शक्ति के अन्दर ही माना जायेगा जैसे शरीर विज्ञान मे रुचि,जो भी कार्य किया जायेगा उसके अन्दर नये नये आविष्कार होने के कारण कार्यों के अन्दर कठिनाई आने लगेगी,एक भाई को बहुत ही कठिनाई केवल इसलिये हो जायेगी कि वह परिवार मे सामजस्य बनाने की कोशिश करेगा और तामसी कारण बढ जाने से परिवार मे अशान्ति का माहौल बना रहेगा। युवावस्था मे अपनी ही चलाने के कारण घर के लोगो से दूरिया बन जायेंगी और विरोधी युवावस्था के बाद हावी हो जायेंगे,दुश्मनी अधिक बन जायेगी और जो भला भी करना चाहेंगे वे डर की बजह से दूर होते चले जायेंगे नाक पर गुस्सा होगा,यानी जरा सी बात का बतंगड बनाने में देर नही लगेगी। यही मंगल जब राहु पर गोचर से अपना असर दिखायेगा या जन्म के समय से ही राहु के सानिध्य मे होगा तो मूंगा का असर दिमाग को पहिया की तरह से घुमाने से बाज नही आयेगा,क्या कहना है किससे कैसे बात करनी है यह सोच विचार बिलकुल ही खत्म हो जायेगी,पारिवारिक कारणो मे भी अक्सर पैतृक सम्पत्ति के पीछे नये नये विवाद बनते जायेंगे और घर के सदस्य ही किसी न किसी प्रकार की घात लगाने लगेंगे,व्यवहार भी तानाशाही जैसा बन जायेगा,जो भी बात की जायेगी वह हुकुम जैसी होगी,इस बात का असर भाई पर भी जायेगा और वह अधिक चिन्ता के cc कारण या आन्तरिक दुश्मनी से दुर्घटना का शिकार भी हो जायेगा,अगर व्यक्ति का बडा भाई भी है तो उसकी चलेगी नही या मूंगा को धारण करने के बाद वह घर से अलग हो जायेगा,अधिक सोच के कारण से व्यक्ति के अन्दर ब्लड प्रेसर की बीमारी पैदा हो जायेगी। किसी प्रकार से मंगल की युति कुंडली मे केतु से है तो स्त्री जातक के लिये परेशानी का कारण बन जायेगा यानी पति का व्यवहार बिलकुल सन्यासी जैसा हो जायेगा,वह अकेला बैठ कर जाने क्या क्या सोचने लगेगा और दूर रहकर ही अपने जीवन को बिताने का कारण सोचने लगेगा,पति का इन्तजार पत्नी को और पत्नी का इन्तजार पति को रहेगा दोनो कभी इकट्ठे नही रह पायेंगे और रहेंगे भी तो जैसे कुत्ते बिल्ली लडते है वैसे आपस के विचारों की लडाई शुरु हो जायेगी,केतु के साथ मंगल के होने से कुंडली में मंगल दोष भले ही नही हो लेकिन मूंगा को पहिनने के बाद जबरदस्ती मे मंगली दोष को पैदा कर लिया जायेगा,शादी मे देरी हो जायेगी,घर मे किसी को भी मानसिक बीमारी पैदा हो सकती है लो ब्लड प्रेसर की बीमारी भी पैदा हो सकती है। अगर दो तीन भाई है तो एक तो किसी प्रकार से अनैतिक कार्यों की तरफ़ भागने लगेगा,और दूसरा किसी प्रकार से घर को त्याग कर ही चला जायेगा,कई बार लोगों के द्वारा अनर्गल बयान दिये जाते है कि अमुक पत्थर के पहिनते ही उन्हे आशातीत लाभ हो गया,अमुक ज्योतिषी ने अमुक रत्न दिया था उससे उन्हे बहुत लाभ हो गया,लेकिन यह क्यों नही सोचा जाता है कि ज्योतिषी केवल तत्व की मीमांशा का ही हाल देता है कभी भी ज्योतिषी केवल रत्न पहिने के बाद आराम मिलना नही बोलता है,रत्न एक यंत्र की तरह से है,रत्न का मंत्र रत्न की विद्या की तरह से है और रत्न का कब प्रयोग करना है कैसे प्रयोग करना है कैसे उसे सम्भालना है आदि की जानकारी तंत्र है। केवल रत्न के पहिनने से कोई लाभ नही होता है ऐसा मैने अपने ज्योतिषीय जीवन मे नही देखा है,वैसे अपने श्रंगार के लिये कितनी ही अंगूठिया पहिने रहो हार मे कितने ही रत्न जडवा दो लेकिन इस मान्यता मे रत्न पहिन लिया जाये कि केवल रत्न ही काम करेगा यह असम्भव बात ही मिलती है।मनुष्य जब भ्रम मे चला जाता है तो उसके लिये ध्यान को भंग करना जरूरी होता है यह मनोवैज्ञानिक कारण है,जब किसी के सामने अपनी समस्या को बताया जाता है तो वह समस्या को सुनता है समस्या की शुरुआत का समय सितारों से निकाला जाता है,समस्या के अन्त का समय भी सितारों से निकाला जाता है,अगर सितारा जो गलत फ़र्क दे रहा है तो उस सितारे के लिये रत्न का पहिना जाना उत्तम माना जाता है,सबसे पहले अच्छे रत्न की पहिचान करना जरूरी होता है,इसे कोई जानने वाला ही पहिचान करवा सकता है वैसे आजकल रत्न परीक्षणशाला बन गयी है और रत्न का परीक्षण करने के लिये रत्नो की कठोरता रत्न के अन्दर की कारकत्व वाली स्थिति को बताया जाता है,जब प्रयोगशाला बन गयी है तो प्रयोगशाला से किन किन तत्वो का निराकरण मिलता है उसके बारे मे रत्न का व्यवसाय करने वालो के लिये जानकारी भी मिल गयी है कि मशीन से कितना और क्या बताया जा सकता है,आजकल की वैज्ञानिक सोच को समझने वाले लोग यह भी समझते है कि रत्न जो भूमि के नीचे से प्राप्त होता है की परिस्थितिया भी सर्दी गर्मी बरसात पर निर्भर होकर और जीवांश के मिश्रण से ही बनी होती है मारे शरीर के चारों ओर एक आभामण्डल होता है, जिसे वे AURA कहते हैं। ये आभामण्डल सभी जीवित वस्तुओं के आसपास मौजूद होता है। मनुष्य शरीर में इसका आकार लगभग 2 फीट की दूरी तक रहता है। यह आभामण्डल अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करता है। हर व्यक्ति का आभामण्डल कुछ लोगों को सकारात्मक और कुछ लोगों को नकारात्मक प्रभाव होता है, जो कि परस्पर एकदूसरे की प्रकृति पर निर्भर होता है। विभिन्न मशीनें इस आभामण्डल को अलग अलग रंगों के रूप में दिखाती हैं । वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है। वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं। आचार्य राजेश

 मित्रों आप मुझसे अपनी कुंडली दिखाकर अपनी समस्या का समाधान पा सकतेैैंैैैैैैंैैैैंैैैंैैैैंैैंैैैैंैैैंैैैआप हमारेेेे न पर 7597718725-9414481324पर वाात कर सकते हैै




जैमोलॉजी जैमोलॉजी वास्‍तव में एक विज्ञान है और इस पर अच्‍छा खासा काम हो रहा है। यह बात अलग है कि कीमती पत्‍थरों ने अपना यह स्‍थान खुद बनाया है। ठीक सोने, चांदी और प्‍लेटिनम की तरह। इसमें ज्‍योतिष का कोई रोल नहीं है। तीन प्रकार के रत्नो का प्रयोग आमतौर पर लोग करते है,शरीर के लिये परिवार और सन्तान के लिये तथा भाग्य के लिये,यही कारण प्राण रक्षा के लिये बुद्धि के विकास के लिये और समय पर कार्य हो जाने के लिये भी माना जाता है। आमतौर पर एक ही रत्न को लोग पहिनने की राय देते है,और उस रत्न के पहिनने के बाद कुछ सीमा मे फ़ायदा और कुछ सीमा मे नुकसान होने की बात से भी मना नही किया जा सकता है।पर यकीन मानिए भाग्‍य के साथ रत्‍नों का जुड़ाव मोहनजोदड़ो सभ्‍यता के दौरान भी रहा है। उस जमाने में भी भारी संख्‍या में गोमेद रत्‍न प्राप्‍त हुए हैं। यह सामान्‍य अवस्‍था में पाया जाने वाला रत्‍न नहीं है, इसके बावजूद इसकी उत्‍तरी पश्चिमी भारत में उपस्थिति पुरातत्‍ववेत्‍ताओं के लिए भी आश्‍चर्य का विषय रही। पता नहीं उस दौर में इतने अधिक लोगों ने गोमेद धारण करने में रुचि क्‍यों दिखाई, या गोमेद का रत्‍न के रूप में धारण करने के अतिरिक्‍त भी कोई उपयोग होता था, यह स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में राहू की दशा भोग रहे जातक को राहत दिलाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है।जो मेरे हिसाब से गलत है इंटरनेट और किताबों में रत्‍नों के बारे में विशद जानकारी देने वालों की कमी नहीं है। इसके वारे मेरी पोस्‍ट इसकी वास्‍तविक आवश्‍यकता के बारे में है। मैं एक ज्‍योतिष विद्यार्थी होने के नाते रत्‍नों को पहनने का महत्‍व बताने नहीं बल्कि इनकी वास्‍तविक आवश्‍यकता बताने का प्रयास करूंगा। वास्तव में दो विधाओं में उलझा है रत्‍न विज्ञान वर्तमान दौर में हस्‍तरेखा और परम्‍परागत ज्‍योतिष एक-दूसरे में इस तरह घुलमिल गए हैं कि कई बार एक विषय दूसरे में घुसपैठ करता नजर आता है। रत्‍नों के बारे में तो यह बात और भी अधिक शिद्दत से महसूस होती है। हस्‍तरेखा पद्धति ने हाथ की सभी अंगुलियों के हथेली से जुड़े भागों पर ग्रहों का स्‍वामित्‍व दर्शाया है। ऐसे में कुण्‍डली देखकर रत्‍न पहनने की सलाह देने वाले लोग भी हस्‍तरेखा की इन बातों को फॉलो करते दिखाई देते हैं। जैसे बुध के लिए बताया गया पन्‍ना हाथ की सबसे छोटी अंगुली में पहनने, गुरु के लिए पुखराज तर्जनी में पहनने और शनि मुद्रिका सबसे बड़ी अंगुली में पहनने की सलाहें दी जाती हैं। बाकी ग्रहों के लिए अनामिका तो है ही, क्‍योंकि यह सबसे शुद्ध है। मुझे इस शुद्धि का स्‍पष्‍ट आधार नहीं पता लेकिन शुक्र का हीरा, मंगल का मूंगा, चंद्रमा का मोती जैसे रत्‍न इसी अंगुली में पहनने की सलाह दी जाती है। अब रत्‍न किसे पहनाना आवश्‍यक है, इन सब बातों को लेकर कालान्‍तर में मैंने कुछ तय नियम बना लिए… अब ये कितने सही है कितने गलत यह तो नहीं बता सकता, लेकिन इससे जातक को धोखे में रखने की स्थिति से बच जाता हूं।वास्‍तव में जैम स्‍टोन से किस ग्रह का उपचार कैसे किया जाए इस बारे में कई तरह के मत हैं। कोई ग्रह के कमजोर होने पर रत्‍न पहनाने की सलाह देता है तो कोई केवल कारक ग्रह अथवा लग्‍नेश संबंधी ग्रह का रत्‍न पहनने की सलाह देता है। ऐसे में किसे क्‍या पहनाया जाए, यह बताना टेढ़ी खीर है। यहां के.एस. कृष्‍णामूर्ति को कोट करूं तो स्‍पष्‍ट है कि लग्‍नेश या नवमेश अथवा इनसे जुड़े ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कई दूसरे ग्रह जो फौरी तौर पर कुण्‍डली में बहुत स्‍ट्रांग पोजिशन में दिखाई भी दें तो उनसे संबंधित उपचार नहीं कराए जा सकते। मैं उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। तुला लग्‍न के जातक की कुण्‍डली में लग्‍न का अधिपति हुआ शुक्र, कारक ग्रह हुआ शनि और नवमेश हुआ बुध। अब कृष्‍णामूर्ति के अनुसार जब तक शनि का संबंध शुक्र या बुध से न हो तो उससे संबंधित उपचार नहीं किए जा सकते, यानि उपचार प्रभावी नहीं होगा, लेकिन परम्‍परागत ज्‍योतिष के अनुसार तुला लग्‍न के जातक को शनि संबंधी रत्‍न प्रमुखता से पहनाया जा सकता है। यह शरीर पंच भूतों से बना है और इन्ही के अधिकार मे सम्पूर्ण जीवन का विस्तार होता है। इन पंचभूतो मे किसी भी भूत की कमी या अधिकता जीवन के विस्तार मे अपने अपने प्रकार से दिक्कत देने के लिये अपना प्रभाव देने लगते है। ग्रहों के दो प्रकार सूर्य और चन्द्रमा के साथ देखे जाते है,जैसे मेष राशि का स्वामी मंगल है तो वह लगनेश के लिये मूंगा को पहिनने का कारक बनता है जो शरीर और प्राण रक्षा के लिये अपना प्रभाव देता है,लेकिन उसका असर धन के प्रति सही नही माना जा सकता है जैसे मंगल और शुक्र मे आपस मे नही बनती है,उसी प्रकार से बुध के साथ भी मंगल की नही बनती है,चन्द्रमा के साथ बराबर का असर रहता है सूर्य के साथ उसकी बहुत अधिक बढोत्तरी हो जाती है गुरु के साथ होने से अहम की मात्रा बढ जाती है और शनि के साथ मिलने से कसाई जैसी प्रकृति बन जाती है। तो मूंगा मेष लगन वालो के लिये धन व्यवहार कार्य जीवन साथी उन्नति के साधनो मे तो गलत असर देगा और शरीर मन आयु के साथ भलाई करेगा,अहम ज्ञान और शांति के साधनो मे बढोत्तरी करने से दिक्कत देने वाला बनेगा। अगर शनि लगन मे ही विराजमान है तो वह सिर दर्द की बीमारी देगा और जो भी सोचा जाता है उसके लिये अपनी तर्क शक्ति के विकास होने से तर्क वितर्क करने से होते हुये कार्य को भी बिगाडने की कोशिश करेगा। कार्य तकनीकी बन जायेगा और जो भी कार्य होगा वह मनुष्य शक्ति के अन्दर ही माना जायेगा जैसे शरीर विज्ञान मे रुचि,जो भी कार्य किया जायेगा उसके अन्दर नये नये आविष्कार होने के कारण कार्यों के अन्दर कठिनाई आने लगेगी,एक भाई को बहुत ही कठिनाई केवल इसलिये हो जायेगी कि वह परिवार मे सामजस्य बनाने की कोशिश करेगा और तामसी कारण बढ जाने से परिवार मे अशान्ति का माहौल बना रहेगा। युवावस्था मे अपनी ही चलाने के कारण घर के लोगो से दूरिया बन जायेंगी और विरोधी युवावस्था के बाद हावी हो जायेंगे,दुश्मनी अधिक बन जायेगी और जो भला भी करना चाहेंगे वे डर की बजह से दूर होते चले जायेंगे नाक पर गुस्सा होगा,यानी जरा सी बात का बतंगड बनाने में देर नही लगेगी। यही मंगल जब राहु पर गोचर से अपना असर दिखायेगा या जन्म के समय से ही राहु के सानिध्य मे होगा तो मूंगा का असर दिमाग को पहिया की तरह से घुमाने से बाज नही आयेगा,क्या कहना है किससे कैसे बात करनी है यह सोच विचार बिलकुल ही खत्म हो जायेगी,पारिवारिक कारणो मे भी अक्सर पैतृक सम्पत्ति के पीछे नये नये विवाद बनते जायेंगे और घर के सदस्य ही किसी न किसी प्रकार की घात लगाने लगेंगे,व्यवहार भी तानाशाही जैसा बन जायेगा,जो भी बात की जायेगी वह हुकुम जैसी होगी,इस बात का असर भाई पर भी जायेगा और वह अधिक चिन्ता के cc कारण या आन्तरिक दुश्मनी से दुर्घटना का शिकार भी हो जायेगा,अगर व्यक्ति का बडा भाई भी है तो उसकी चलेगी नही या मूंगा को धारण करने के बाद वह घर से अलग हो जायेगा,अधिक सोच के कारण से व्यक्ति के अन्दर ब्लड प्रेसर की बीमारी पैदा हो जायेगी। किसी प्रकार से मंगल की युति कुंडली मे केतु से है तो स्त्री जातक के लिये परेशानी का कारण बन जायेगा यानी पति का व्यवहार बिलकुल सन्यासी जैसा हो जायेगा,वह अकेला बैठ कर जाने क्या क्या सोचने लगेगा और दूर रहकर ही अपने जीवन को बिताने का कारण सोचने लगेगा,पति का इन्तजार पत्नी को और पत्नी का इन्तजार पति को रहेगा दोनो कभी इकट्ठे नही रह पायेंगे और रहेंगे भी तो जैसे कुत्ते बिल्ली लडते है वैसे आपस के विचारों की लडाई शुरु हो जायेगी,केतु के साथ मंगल के होने से कुंडली में मंगल दोष भले ही नही हो लेकिन मूंगा को पहिनने के बाद जबरदस्ती मे मंगली दोष को पैदा कर लिया जायेगा,शादी मे देरी हो जायेगी,घर मे किसी को भी मानसिक बीमारी पैदा हो सकती है लो ब्लड प्रेसर की बीमारी भी पैदा हो सकती है। अगर दो तीन भाई है तो एक तो किसी प्रकार से अनैतिक कार्यों की तरफ़ भागने लगेगा,और दूसरा किसी प्रकार से घर को त्याग कर ही चला जायेगा,कई बार लोगों के द्वारा अनर्गल बयान दिये जाते है कि अमुक पत्थर के पहिनते ही उन्हे आशातीत लाभ हो गया,अमुक ज्योतिषी ने अमुक रत्न दिया था उससे उन्हे बहुत लाभ हो गया,लेकिन यह क्यों नही सोचा जाता है कि ज्योतिषी केवल तत्व की मीमांशा का ही हाल देता है कभी भी ज्योतिषी केवल रत्न पहिने के बाद आराम मिलना नही बोलता है,रत्न एक यंत्र की तरह से है,रत्न का मंत्र रत्न की विद्या की तरह से है और रत्न का कब प्रयोग करना है कैसे प्रयोग करना है कैसे उसे सम्भालना है आदि की जानकारी तंत्र है। केवल रत्न के पहिनने से कोई लाभ नही होता है ऐसा मैने अपने ज्योतिषीय जीवन मे नही देखा है,वैसे अपने श्रंगार के लिये कितनी ही अंगूठिया पहिने रहो हार मे कितने ही रत्न जडवा दो लेकिन इस मान्यता मे रत्न पहिन लिया जाये कि केवल रत्न ही काम करेगा यह असम्भव बात ही मिलती है।मनुष्य जब भ्रम मे चला जाता है तो उसके लिये ध्यान को भंग करना जरूरी होता है यह मनोवैज्ञानिक कारण है,जब किसी के सामने अपनी समस्या को बताया जाता है तो वह समस्या को सुनता है समस्या की शुरुआत का समय सितारों से निकाला जाता है,समस्या के अन्त का समय भी सितारों से निकाला जाता है,अगर सितारा जो गलत फ़र्क दे रहा है तो उस सितारे के लिये रत्न का पहिना जाना उत्तम माना जाता है,सबसे पहले अच्छे रत्न की पहिचान करना जरूरी होता है,इसे कोई जानने वाला ही पहिचान करवा सकता है वैसे आजकल रत्न परीक्षणशाला बन गयी है और रत्न का परीक्षण करने के लिये रत्नो की कठोरता रत्न के अन्दर की कारकत्व वाली स्थिति को बताया जाता है,जब प्रयोगशाला बन गयी है तो प्रयोगशाला से किन किन तत्वो का निराकरण मिलता है उसके बारे मे रत्न का व्यवसाय करने वालो के लिये जानकारी भी मिल गयी है कि मशीन से कितना और क्या बताया जा सकता है,आजकल की वैज्ञानिक सोच को समझने वाले लोग यह भी समझते है कि रत्न जो भूमि के नीचे से प्राप्त होता है की परिस्थितिया भी सर्दी गर्मी बरसात पर निर्भर होकर और जीवांश के मिश्रण से ही बनी होती है मारे शरीर के चारों ओर एक आभामण्डल होता है, जिसे वे AURA कहते हैं। ये आभामण्डल सभी जीवित वस्तुओं के आसपास मौजूद होता है। मनुष्य शरीर में इसका आकार लगभग 2 फीट की दूरी तक रहता है। यह आभामण्डल अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करता है। हर व्यक्ति का आभामण्डल कुछ लोगों को सकारात्मक और कुछ लोगों को नकारात्मक प्रभाव होता है, जो कि परस्पर एकदूसरे की प्रकृति पर निर्भर होता है। विभिन्न मशीनें इस आभामण्डल को अलग अलग रंगों के रूप में दिखाती हैं । वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है। वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं। आचार्य राजेश

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