आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
मंगलवार, 20 मार्च 2018
रत्न फिरोजा Gemstone
सोमवार, 12 मार्च 2018
लाल किताब ओर रत्न चयन
मित्रों रत्नों पर वात चल रही है मैंने अपनी पिछली पोस्ट रतनो पर ही लिखी थी जो आप लोगों द्वारा काफी पसन्द की गई यह पोस्ट भी रत्नों पर ही है लालं किताव में रतन पहनने के बारे में कई तरह के नियम बताए गए हैं।लाल किताब कहती है रत्न शुभ फल देने की शक्ति रखता है तो अशुभ फल देने की भी इसमें ताकत है। रत्नों के नाकारात्मक फल का सामना नहीं करना पड़े इसके लिए रत्नों को धारण करने से पहले कुछ सावधानियों का भी ध्यान रखना जरूरी होता है।
वैसे रतन पहने तो लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर ही पहने।लाल किताब के अनुसार रत्नों में मंदे, कमजोर एवं सोये हुए ग्रहों को नेक, बलशाली, एवं जगाने की क्षमता होती है। लेकिन जब तक सही ज्योतिषी सलाह ना मिले, तब रत्न धारण करने ने नुकसान हो सकता है।वैदिक ज्योतिष के समान लाल किताब भी भविष्य जानने की एक विधा है.लाल किताब में ग्रहों के योग और उनके फल के सम्बन्ध में अपनी मान्यताएं हैं यह ग्रंथ जन्म कुण्डली, हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का मिश्रण है और जिन व्यक्तियों को अपनी जन्म कुण्डली की सत्यता पर भरोसा ना हो तो वह लालकितावके ज्ञान के आधार पर अपने जीवन की बाधाओं का समाधान कर सकते हैं।ज्योतिष की इस विधा में भी लग्न कुंडली वनाई जाती हैप्रयुक्त कुण्डली बस्तुतः पारम्परिक जन्म कुण्डली ही है। जन्म कुण्डली में ग्रहों को यथा स्थान रहने दें, जिन राशियों वह हैं, उन्हें हटा दें। अब लग्न को 1(मेष) राशि मानते हुए दूसरे, तीसरे, आदि 12 भावों में क्रमशः 2(वृष), 3(मिथुन) आदि 12 राशि 12(मीन) तक लिख दें। यह कुण्डली लाल किताब का आधार है।
मित्रों ध्यान दें, लग्न कुण्डली में चाहे जो राशि हो लाल किताब की कुण्डली में सदैव मेष राशि ही रहती है। इसी प्रकार क्रमशः दूसरे में वृष, तीसरे में मिथुन आदि मीन तक बारहों राशियॉ रहती है। यह इन घरों की पक्की राशियॉ कहलाती हैं।
जो ग्रह शत-प्रतिशत शक्तिशाली होते हैं, वह उच्च के ग्रह कहे जाते हैं तथा जो ग्रह निर्बल होते हैं, वह नीचे के कहे जाते हैं। कुण्डली में इनके स्थान भी सुनिश्चित हैं, यथा
स्पष्ट ग्रह शुभता प्रदान करने में पूर्ण रुप से सहयोगी सिद्ध होता है। ज्योतिष शास्त्र के नियमों की तरह प्रत्येक ग्रह की अपनी दृष्टि विशेष होती है। सूर्य, चंद्र, गुरु तथा बुद्ध अपने से सातवें भाव को देखता है। गुरु, राहु, केतु अपने से पॉचवे, सातवें तथा नवे भाव को देखते हैं। मंगल चौथ, सातवे, आठवे भावों को तथा शनि अपने से तीसरे, सातवे तथा दसवे भाव को देखता है। प्रत्येक ग्रह सातवे भाव को अवश्य देखता है।लाल किताब से रत्न चयन करने के लिए यह परिचय पूर्ण नहीं कहा जा सकता तदापि यह भूमिका विषय को समझाने और व्यवहार में लाने की कुंजी अवश्य सिद्ध हो सकती है। किसी कुण्डली में यदि बलवान है, लाल किताब की भाषा में कहें कि यदि वह अपने पक्के ग्रहों में स्थित है तो उनसे संबंधित रत्न धारण किया जा सकता है। किताब सदैव उच्च अर्थात शत-प्रतिशत शक्तिशाली ग्रहों के रत्न धारण करने पर बल देती है। ऐसे योग कुण्डली में खेाजना बहुत ही सरल है। परन्तु यदि कुण्डली में शक्तिशाली ग्रह अथवा ग्रहों का अभाव हो तो सुप्त ग्रह तथा सुप्त भाव को बलवान करने का प्रयास करना चाहधि जितनी सरल है उतनी ही अधिक प्रभावशाली भी सिद्ध होगी। आवश्यता है कि इस ज्ञान को समझने की, उसमें अधिक खोज करने की, तदनुसार व्यवहार में लाने की ताकि अधिकारिक रुप से मानव कल्याण हो सके। अपने बुद्धि-विवेक से और आगे बढ़ाने का एक और प्रयास करके तो देखिये, कितने संतोष जनक परिणाम आपको मिलते हैं।तमाम वैदिक ज्योतिषी मित्रों को कहना चाहता हूं आप लाल किताब की निन्दा मत करें आप इस विघा को सिखे यदि किसी घर में कोई ग्रह सोया हुआ हो तो उस घर को और उस ग्रह के प्रभाव को जाग्रत करने के लिए उस घर का रत्न धारण करें। जैसे पहले घर को जगाने के लिए मंगल का रत्न, दूसरे घर को जगाने के लिए चंद्र का, तीसरे के लिए बुध का, चैथे के लिए चंद्र का, पांचवें के लिए सूर्य का, छठे के लिए राहु का, सातवें के लिए शुक्र का, आठवें के लिए चंद्र, नौवें के लिए गुरु का, दसवें के लिए शनि का, ग्यारहवें के लिए गुरु का एवं बारहवें घर को जगाने के लिए केतु का रत्न धारण किया जा सकता है। यदि दो ग्रह आपस में टक्कर के हों और उनमें शत्रु भाव उत्पन्न हो रहा हो तो दोनों ही ग्रहों के रत्न एक साथ ही पहनना चाहिए। किसी कुंडली में ग्रह यदि बलवान हों, लाल किताब की भाषा में कहें तो यदि वे अपने पक्के घरों में स्थित हों, तो उनसे संबंधित रत्न चयन किया जा सकता है। लाल किताब सदैव उच्च अर्थात शतप्रतिशत शक्तिशाली ग्रहों के रत्न धारण करने पर बल देती है। ऐसे योग किसी कुंडली में खोजना बहुत ही सरल है। परंतु यदि कुंडली में शक्तिशाली ग्रह अथवा ग्रहों का अभाव हो तो सुप्त ग्रह तथा सुप्त भाव को बलवान बनाने की प्रक्रिया अपनाएं। यह विधि जितनी सरल है उतनी ही प्रभावशाली भी। यदि कुंडली में चंद्र ग्रह सर्वाधिक बलशाली हो तो चंद्र का रत्न मोती धारण करवाया जा सकता है। इसके साथ-साथ सुप्त भाव तथा सुप्त ग्रह को भी बलवान कर लिया जाए तो परिणाम अधिक अच्छे होंगे। कुंडली में सर्वाधिक भाग्यशाली ग्रह उच्च भाग्य का द्योतक है। भाग्य के लिए सर्वोत्तम ग्रह के अनुरूप रत्न का चयन निम्न चार बातों को ध्यान में रखकर कर सकते हैं- जिस राशि में ग्रह उच्च का होता है और लाल किताब की कुंडली के अनुसार भी उसी भाव अर्थात राशि में स्थित होता है उससे संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है। यदि ग्रह अपने स्थायी भाव में स्थित हो तथा उसका कोई मित्र ग्रह उसके साथ हो अथवा उसको देखता हो तो उस ग्रह से संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है। नौ ग्रहों में से जो ग्रह श्रेष्ठतम भाव में स्थित हो, उस ग्रह से संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है। कुंडली के केंद्र अर्थात पहले, चैथे, सातवें तथा 10वें भाव में बैठा ग्रह भी भाग्यशाली रत्न इंगित करता है। यदि उक्त भाव रिक्त हों तो नौवां, नौवां रिक्त हो तो तीसरा, तीसरा रिक्त हो तो ग्यारहवां, ग्यारहवां रिक्त हो तो छठा और यदि छठा भाव भी खाली हो तो खाना 12 में बैठा ग्रह भाग्य ग्रह कहलाता है। इस ग्रह से संबंधित रत्न भी भाग्य रत्न कहलाता है। जब किसी भाव पर किसी भी ग्रह की दृष्टि नहीं हो अर्थात वह भाव किसी भी ग्रह द्वारा देखा नहीं जाता हो तो वह सुप्त भाव कहलाता है। उदाहरण में ऐसे सुप्त भाव पहला तथा सातवां हैं। इन दोनों भावों को कोई भी ग्रह नहीं देख रहा है। इसके लिए यदि इन भावों को चैतन्य कर देने वाले ग्रहों का उपाय किया जाए तो ये भाव चैतन्य हो जाएंगे तथा इन से संबंधित विषय में व्यक्ति को आशातीत लाभ मिलने लगेगा। जब कोई ग्रह किसी अन्य ग्रह को नहीं देखता तो वह ग्रह सुप्त कहलाता है। सुप्त ग्रह कब जाग्रत होते हैं अर्थात आयु के किस वर्ष में फल देते हैं इसका विवरण भी लाल किताब में मिलता है। यदि उस वर्ष में खोज किए हुए ग्रह के उस रत्न का प्रयोग किया जाए तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यथा उपाय सहायता मिलती है। लाल किताब के अनुसार ग्रहों के कुप्रभावों को समाप्त करने के लिए, उन्हें अनुकूल बनाने के लिए नीचे दिए गए विवरण के अनुसार विभिन्न रत्नों को विभिन्न धातुओं में धारण करना चाहिए। जिस ग्रह को बलवान करना हो उस ग्रह का रत्न उसकी धातु के साथ जड़वा कर पहनना चाहिए। जन्म का ग्रह और जन्म समय का ग्रह यदि एक हो तो वह व्यक्ति के लिए हमेशा शुभ फल प्रदान करने वाला होता है। अतः उसका रत्न निःसंकोच धारण कर लेना चाहिए। जन्म दिन के ग्रह एवं जन्म समय के ग्रह का विवरण इस प्रकार है। इस प्रकार समस्याओं से पीड़ित जातकगण लाल किताब के अनुसार अपने भाग्यशाली रत्न का चयन कर प्रतिकूल ग्रहों के कुप्रभावों से अपनी रक्षा कर सकते हैं। लाल किताब के उपायों से कष्ट निवारण में सहायता मिलती है, यह एक निर्विवाद सत्य है। दिन समय ग्रह रविवार दिन का दूसरा प्रहर सूर्य सोमवार चांदनी रात चंद्र मंगलवार पूर्ण दोपहर मंगल बुधवार दिन का तीसरा प्रहार बुध गुरुवार दिन का प्रथम प्रहर गुरु शुक्रवार कालीरात शुक्र शनिवार रात्रि एवं अंधकारमय शनि गुरुवार शाम पूर्णशाम राहु रविवार प्रातः सूर्योदय से पूर्व केतु ग्रह रत्न धातु सूर्य माणिक्य सोना चंद्र मोती चांदी मंगल मूंगा तांबा बुध पन्ना सोना गुरु पुखराज सोना शुक्र हीरा चांदी शनि नीलम लोहा राहु गोमेद ऊपर धातु केतु लहसुनिया सोना या तांबात्रों ,आप सब जब भी रत्न धारण करे तो ऊपर लिखी बातों का अवश्य ध्यान करे .प्रत्येक जातक को अपनी ग्रह की महादशा के अनुसार और ग्रहो की मित्रता ,उच्च राशिगत ,नीच राशिगत ,अन्तर्दशा ,अन्य ग्रहो की दृष्टि इत्यादि बातो का गहन अध्ययन करके की सही रत्न का चुनाव करना चाहिए नहीं तो लाभ की जगह हानि का सामना करना पड़ सकता हैत्रों ,आप सब जब भी रत्न धारण करे तो ऊपर लिखी बातों का अवश्य ध्यान करे .प्रत्येक जातक को अपनी ग्रह की महादशा के अनुसार और ग्रहो की मित्रता ,उच्च राशिगत ,नीच राशिगत ,अन्तर्द सबशा ,अन्य ग्रहो की दृष्टि इत्यादि बातो का गहन अध्ययन करके की सही रत्न का चुनाव करना चाहिए नहीं तो लाभ की जगह हानि हो सकती है हमसे कुंडली दिखाने पर जातक को रत्न का सुझाव बड़ी ही सटिकता से दिया जाता है .अनेक जातको ने हमारे द्वारा लताऐं सही रत्न का चुनाव कर कई समस्यायों से निजात पाई है .यदि आप भी किसी भी समस्या से पीड़ित है तो मुझसे अवश्य संपर्क करे और पुरे विश्वास के बाद ही रत्न धारण करे क्योंकि आपका विश्वास ही आपकी सफलता की निशानी है .किसी के प्रति अविश्वास ही असफलता की प्रथम सीढ़ी है .
आपका जीवन शुभ हो ,मंगलमय हो ,स्वर्णमय हो ,तथास्तु
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गुरुवार, 8 मार्च 2018
लहसुनिया केतु रतन 🐈 Catseye
शुक्रवार, 2 मार्च 2018
ओपल रतन opal gemstone
ज्योतिष उस व्यक्ति की कुंडली का अध्ययन करता है और उसके लिए एक उपयुक्त और आकर्षण रत्न बताता है. आज हम ओपल रत्न और उससे संबंधित लाभ के बारे में बात करेंगे. इसे पहनने वाला कितना आनंद पा सकता है.ओपल या दूधिया पत्थर धातु से बना जैल है जो बहुत कम तापमान पर किसी भी प्रकार के चट्टान की दरारों में जमा हो जाता है, आमतौर पर चूना पत्थर, बलुआ पत्थर, आग्नेय चट्टान, मार्ल और बेसाल्ट के बीच पाया जा सकता है। ओपल शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ओपलस और यूनानी शब्द ओपैलियस से हुई है।ओपल रत्न शुक्र ग्रह के प्रभाव को बढ़ाने लिए धारण किया जाता है।ओपल रत्न शुक्र ग्रह के प्रभाव को बढ़ाने लिए धारण किया जाता है।हीरा
हीरा शुक्र का रत्न है। हीरा वे सभी व्यक्ति पहन सकते हैं जिनकी जन्म कुंडली में शुक्र अच्छे भावों का अधिपति होता है। इसके धारण करने से आयु वृद्धि जीवन रक्षा, स्वास्थ्य लाभ, व्यापार में लाभ एवं अन्य शुभ फल प्राप्त होते हैं। प्रमाणिक दुकान से ही असली हीरा गारंटी से खरीदना चाहिए।पर हीरा वोहोत ही ज्यादा मंहगा है इस लिए हर कोई नहीं पहन सकताओपल हीरे का ही प्रतिरूप है। हीरे की सामर्थ्य न होने पर ओपल भी हीरे सा फल देता है।नोट : बहुत से ज्योतिषी जेरकेन भी पहनने की सलाह देते हैं, पर जेरकेन बनाया जाता है, यह प्राकृतिक पत्थर नहीं है. कई सफ़ेद पुखराज भी पहनने की सलाह देते हैं, पर मैंने ओपल को ही प्रभावी पाया है. ओपल धवल से सफेद, भूरे, लाल, नारंगी, पीले, हरे, नीले, बैंगनी, गुलाबी, स्लेटी, ऑलिव, बादामी और काले रंगों में पाई जाती हैं। इन विविध रंगों में, काले रंग के खिलाफ लाल सबसे अधिक दुर्लभ है जबहैकि सफेद ओपल को शुक के लिए पहनाया जाता ओर कुंडली के हिसाब से ओर रंगो के पहनावे जाते हैं रंगों में भिन्नता लाल और अवरक्त तरंगदैर्ध्य के आकार और विकास के कारण आती हैओपल का सबसे बड़ा उत्पादक ऑस्ट्रेलिया है। इस देश में दुनिया का लगभग 97% ओपल पैदा होता है।
ओपल दृश्य स्पेक्ट्रम में हर रंग व्यक्त कर सकते हैं। कीमती ओपल के आंतरिक से परिवर्ती रंग झलकते हैं यह परस्पर क्रिया धातु से बने होने के कारण होती है, यह एक आंतरिक संरचना है।सफेद दूधिया पत्थर का इंग्लिश नाम ओपल लैटिन भाषा के ओपलुस से आया है, जिसका अर्थ ‘गहने सा’ है। एक अन्य जानकारी के अनुसार ओपल शब्द संस्कृति शब्द उपल से आया है, जिसका अर्थ होता है कीमती पत्थर।रंगो के खेल का प्रदर्शन करने वाले विभिन्न किस्मों के रत्न के अलावा, अन्य प्रकार के आम दूधिया ओपल, दूधिया नीले से हरे होते हैं, (जो गुणवत्ता में कभी कभी रत्न के समान हो सकते हैं)एक अनुमान के अनुसार लगभग ओपल रत्न ६० मीलियन वर्ष पुराने हैं, जब डायनासोर धरती पर घूमा करते थे।मध्य युग में, माना जाता था कि ओपल एक ऐसा पत्थर है जो बहुत भाग्यशाली है क्योंकि सभी भाग्यशाली गुणों वाले रत्न के सभी रंगों में से प्रत्येक रंग ओपल के महान स्पेक्ट्रम रंग में मौजूद हैं। यह भी कहा जाता था कि इसे ताजे तेज-पत्ते में लपेटकर हाथ में रखने से अदृश्य होने की शक्ति मिल जाती थी। पता नहीं यह वात कितनीसही है ओपल को पहनने से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं :रिश्तों में एकता के लिए ओपल रत्नर - ओपल रत्न शुक्र ग्रह का रत्न है जो ज्योतिष में रिश्तों की मज़बूती और लक्जरी पर शासन करने के लिए है. ओपल रत्न पहनने से रिश्तों में एकता और संतुष्टि आती है. ओपल रत्न पहनने से व्यक्ति जीवन में आकर्षण, कला, दया, संस्कृति और विलासिता से भरा जीवन जीता है.संगीत, चित्रकला, नृत्य और थिएटर आदि जैसे कलात्मक क्षेत्रों में शामिल लोगों को ओपल रत्न के पहनने से अनगिनत लाभ प्राप्त हो सकते हैं.वित्तीय स्थिति में सुधार होता है।यौन शक्ति बढ़ती है।काल्पनिक रचनात्मक शक्ति में वृद्घि होती है।अच्छा एकाग्रता और मानसिक शांति को बढ़ावा देता हैशारीरिक तंदरुस्ती प्रदान करता है एवं बुरे स्वप्न को दूर रखता है। व्यक्ति को सफलता, लोकप्रियता एवं मान सम्मान दिलाता है।सके अलावा भी जो व्यक्ति नींद में चौंक जाता हो, भूत एवं पिशाच का डर लगता हो, जिस घर में पति-पत्नी का विवाद तथा घर में कलह का वातावरण रहता हो, - शारीरिक दृष्टि से कमजोर हो, प्रेमी या प्रेमिका या सामने वाले को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए, उसे ओपल धारण करना चाहिएटीवी, फिल्म, थिएटर और ऐसे में काम कर रहे कलाकारों को हमेशा प्रसिद्धि और मान्यता के लिए इस रत्न पहनना चाहिए.ओपल रत्न अगर चांदी में और प्रक्रियाओं अनुसार पहना वीनस की ताकत बढ़ जाती है और वहाँ से सांसारिक आनंद देता है. पहनने के धन, खुशी परिवार, बच्चों, प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त करने में सक्षम है. भारतीय फिल्म स्टार Ashwaria राय बच्चन हमेशा उसके दाहिने हाथ की एक उंगली में ओपल पहन रखा है ओपल जीवन में महान परिवर्तन ला सकते हैं.ओपल धारण करने से आँखों के रोगों से राहत मिलती है. फायर ओपल धारण करने से शरीर के रक्त विकार तथा लाल रक्त कणिकाओं से संबंधित विकारों से छुटकारा मिलता है और मानसिक तनाव, उदासीनता और आलस्य दूर होता है. विचारों में स्पष्टता झलकती है.
काला ओपल धारण करने पर व्यक्ति विशेष को अस्थि मज्जा, प्रजनन अंगों, प्लीहा अथवा तिल्ली और अग्न्याशय से संबंधित विकारों में लाभ मिलता है. लाल रक्त कणिकाएँ और सफेद रक्त कणिकाओं का शुद्धिकरण होता है. काला ओपल पहनने से व्यक्ति की शारीरिक सुरक्षा भी होती है. बुरे सपने नहीं आते.किडनी की सवी रोगों पर ओपल का वोहोत अच्छा लाभ रहता है मैंने ऐसे लोग जिनकी किडनी काफी खराव हो चुकी थी उन लोगों पर भी इसका प्रयोग किया तो मुझे काफी सफलता मिली
सफेद ओपल
धारण करने पर मस्तिष्क के दाएँ तथा बाएँ तंत्रिका तंत्र में संतुलन बना रहता है. सफेद रक्त कणिकाओं को ऊर्जा मिलती है. इसके अतिरिक्त ओपल सफेद , इसे पहनने से भाग्य में वृद्धि होती है. उत्साहवर्धन होता है. आत्मविश्वास में बढो़तरी होती है. मस्तिष्क का विकास होता है. मानसिक कार्य करने की शक्तियों का विकास होता है. व्यक्ति की दृढ़ इच्छा शक्ति का विकास होता है.यही कारण है कि ज्योतिष के अनुसार, ओपल रत्न पहनने की सलाह उस व्यक्ति को दी जाती है जिसकी जन्म कुंडली या जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह को मजबूत बनाने के लिए कहा जाता है.रत्नों में अद्भूत शक्ति होती है. रत्न अगर किसी के भाग्य को आसमन पर पहुंचा सकता है तो किसी को आसमान से ज़मीन पर लाने की क्षमता भी रखता है. रत्न के विपरीत प्रभाव से बचने के लिए सही प्रकर से जांच करवाकर ही रत्न धारण करना चाहिए कुंडली में. ग्रहों की स्थिति के अनुसार रत्न धारण करना चाहिए. रत्न पहनते समय मात्रा का ख्याल रखना आवश्यक होता है. अगर मात्रा सही नहीं हो तो फल प्राप्ति में विलम्ब होता है.ज्योतिषीय लाभ के लिए सफेद ऑस्ट्रेलियन ओपल ही पहनना चाहिए। इसकी चमक और सफेद रंग जितना साफ होगा ओपल उतना ही अच्छा माना जाता हैबेहतरीन ओपल उसकी स्पष्टता, शेप और क्वालिटी से पहचाना जाता है। यह चितना चमकदार, सपाट और एक रंग का होगा उतना ही अच्छा होता है। ज्योतिषी यह सलाह देते हैं कि वह सफेद ओपल सबसे अच्छा होता है जो दोनों ओर से स्पष्ट साफ दिखाई देता है।रत्नों और जेम स्टोन के बढ़ते चलन के कारण हर ज्वेलर के पास यह रत्न मिल जाएगा लेकिन यह जरूरी नहीं हो कि वह प्राकृतिक हो क्योंकि लगभग सभी जेमस्टोन के सेन्थेटिक रूप तैयार किए जा सके हैं।किसी भी रत्न को खरीदने से पहले उसकी शुद्धता की जांच अवश्य कर लेनी चाहिए। रत्नों को अपने जानने वाले डीलर से लें या फिर पहले उनके काम को अच्छी तरह से जांच ले फिर वहां से रत्नों की खरीदारी करें। रत्नों को अगर ज्योतिषीय रेमिडी के लिए पहनना हो तो रत्न सस्ता हो या महंगा उसकी शुद्धता के विषय में किसी अच्छी लैब का सर्टिफिकेट अवश्य देंखे और खुद भी इंटरनेट के माध्यम से और विशेषज्ञों से इसके विषय में जानकारी ले लें। अगर आपको असली ओपल रतन चाहिए तो आप हमसे असली वजह उच्च क्वालिटी का कोई भी रतन लैबTester ओर full guarantee ke sath wholesale rate per रतन मंगवा सकते हैं 07597718725-09414481324 आचार्य राजेश
शनिवार, 24 फ़रवरी 2018
पन्ना रत्न Emerald Gemstone
https://youtu.be/rQW_ZCuNsrE Panna stone बुध का रत्न है| ज्योतिष में बुध एक सौम्य ग्रह माने जाते है जो बुद्धि के कारक हैं| नवग्रहों में बुध युवराज हैं जो सदा कौमार्य evergreen ग्रह हैं| सूर्य के
सर्वाधिक निकट होने के कारण ये एक अधीर और जल्दी बदलने वाला ग्रह है|andएक Astrologer और Gemologist की हैसियत से सबसे ज्यादा आम प्रश्न मुझसे पूछा जाता है की मैं कौन सा https://youtu.be/rQW_ZCuNsrE
रत्न धारण करूँ या कौन सा रत्न मुझे suit करेगा| ऐसा जातक जिसकी जन्मकुंडली में बुद्ध देवता शुभ किन्तु कमजोर होकर पड़े हों, पन्ना धारण कर सकता है। हालाँकि बुद्ध की अपनी को
ई धातु नहीं होती है इसलिए पन्ना रत्न को चांदी धातु में पहना जाता है। ऐसा करने का मुख्या कारण है की चन्द्रमा को माँ व् बुद्ध को माँ के गर्भ में पड़ा पुत्र मानते हैं, जहाँ बच्चा सबसे अधिक सुरक्षित होता है। कुछ
ज्योतिषी (Astrologer) ऐसा भी मानते हैं की यदि बुद्ध, वृहस्पति अथवा सूर्य या मंगल के नक्षत्र में हो और सूर्य मंगल या वृहस्पति शुभ फलकारक हों तो सोने में भी धारण किया जा सकता है। मुख्यतः पन्ना पांच रंगों में पा
या जाता है, तोते के पंख का रंग, पानी का रंग, सरेस के फूल का रंग, मोर के पंख जैसा और हल्का संदुल फूल जैसा रंग। इसका मूल्य व् गुणवत्ता रंग, रूप, चमक, वजन, पारदर्शिता के आधार पर निर्धारित की जाती है।यहां पर इस
बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न जातकों के लिए पन्ने के भिन्न भिन्न रंग उपयुक्त हो सकते हैं जैसे किसी को हल्के हरे रंग का पन्ना अच्छे फल देता है जबकि किसी अन्य को गहरे हरे रंग का पन्ना अच्छे फल देता है। इसलिए पन्ने के रंग का चुनाव केवल अपने ज्योतिषी के परामर्श अनुसार ही करना चाहिए तथा अपनी इच्छा से ही किसी भी रंग का पन्ना धारण नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से ऐसा पन्ना लाभ की अपेक्षा हानि भी दे सकता है। रंग के साथ साथ अपने ज्योतिषी द्वारा सुझाये गये पन्ने के भार पर भी विशेष ध्यान दें तथा इस रत्न का उतना ही भार धारण करें जितना आपके ज्योतिषी के द्वारा बताया गया हो क्योंकि अपनी इच्छा से पन्ने का भार बदलने से कई बार यह रत्न आपको उचित लाभ नहीं दे पाता जबकि कई बार ऐसी स्थिति में आपका पन्ना आपको हानि भी पहुंचा सकता है।उदाहरण के लिए अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये पन्ने के भार से बहुत कम भार का पन्ना धारण करने से ऐसा पन्ना आपको बहुत कम लाभ दे सकता है अथवा किसी भी प्रकार का लाभ देने में अक्षम हो सकता है जबकि अपने ज्योतिषी द्वारा बताये गये पन्ने के धारण करने योग्य भार से बहुत अधिक भार का पन्ना धारण करने से यह रत्न आपको हानि भी पहुंचा सकता है जिसका कारण यह है कि बहुत अधिक भार का पन्ना आपके शरीर तथा आभामंडल में बुध की इतनी उर्जा
स्थानांतरित कर देता है जिसे झेलने तथा उपयोग करने में आपका शरीर और
आभामंडल दोनों ही सक्षम नहीं होते जिसके कारण ऐसी अतिरिक्त उर्जा अनियंत्रित होकर आपको हानि पहुंचा सकती है। इसलिए सदा अपने ज्योतिषी के द्वारा बताये गये भार के बराबर भार का पन्ना ही धारण करें क्योंकि एक अनुभवी ज्योतिषी तथा रत्न विशेषज्ञ को यह पता होता है कि आपकी कुंडली के अनुसार आपको पन्ना रत्न का कितना भार धारण करना चाहिये। अपने पन्ने के माध्यम से उत्तम फलों की किया जाता है तथा विशेष भिन्न-भिन्न लग्न कुंडलियों के उचित विश्लेशण के पश्चात् शुभ-अशुभ बुद्ध का निर्णय किया जाता है, बुद्ध की स्थिती का विश्लेषण किया जाता है जिसके बाद ही पन्ना धारण करने या न करने की सलाह दी जाती हे बुध बुद्धि, ज्ञान अक्लमंदी communication आदि का कारक है|
पीड़ित बुध कुंडली को किस तरह प्रतिकूल रूप से प्रभाव देने वाला अगर बुध बुद्धि का कारक है तो पन्ना तो हरेक को suit करना चाहिये ! मगर ऐसा नहीं है|
बुध ग्रह एक neutral, भावुक, हर्षित एवं सदाबहार ग्रह है| ये हमारे श्वास प्रश्वास सम्बन्धी system, nervous system, वाणी आदि का भी कारक है|
संस्कृत में intellect को बुद्धि से जाना जाता है और बुध बुद्धि शब्द से ही उत्पन्न है| बुध वैसे तो शुभ ग्रह माना जाता है पर यदि ये कुंडली में अशुभ या क्रूर ग्रहों के साथ युति करे तो ये भी अशुभ तथा malefic हो जाता है|जन्म कुंडली में शक्तिहीन बुध को सशक्त करने के लिए पन्ना रत्न (Emerald gemstone) धारण किया जाता है|ज्योतिष के अनुसार बुध का प्रत्येक कुंडली में विशेष महत्व है तथा किसी कुंडली में बुध का बल, स्वभाव और स्थिति कुंडली से मिलने वाले शुभ या अशुभ परिणामों पर बहुत प्रभाव डाल सकती है। बुध के बल के बारे में चर्चा करें तो विभिन्न कुंडली में बुध का बल भिन्न भिन्न होता है जैसे किसी कुंडली में बुध बलवान होते हैं तो किसी में निर्बल जबकि किसी अन्य कुंडली में बुध का बल सामान्य हो सकता है। किसी कुंडली में बुध के बल को निर्धारित करने के लिय बहुत से तथ्यों का पूर्ण निरीक्षण आवश्यक है हालांकि कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में बुध की किसी राशि विशेष में स्थिति ही बुध के कुंडली में बल को निर्धारित करती है जबकि वास्तविकता में किसी भी ग्रह का किसी कुंडली में बल निर्धारित करने के लिए अनेक प्रकार के तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक है।कक विभिन्न कारणों के चलते यदि बुध किसी कुंडली में निर्बल रह जाते हैं तो ऐसी स्थिति में बुध उस कुंडली तथा जातक के लिए अपनी सामान्य और विशिष्ट विशेषताओं के साथ जुड़े फल देने में पूर्णतया सक्षम नहीं रह पाते जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कुंडली में निर्बल बुध को ज्योतिष के कुछ उपायों के माध्यम से अतिरिक्त उर्जा प्रदान की जाती है जिससे बुध कुंडली में बलवान हो जायें तथा जातक को लाभ प्राप्त हो सकें। बुध को किसी कुंडली में अतिरिक्त उर्जा प्रदान करने के उपायों में से उत्तम उपाय है बुध का रत्न पन्ना धारण करना जिसे धारण करने के पश्चात धारक को बुध के बलवान होने के कारण लाभ प्राप्त होने आरंभ हो जाते हैं। पन्ना रत्न बुध की उर्जा तरंगों को अपनी उपरी सतह से आकर्षित करके अपनी निचली सतह से धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देता है जिसके चलते जातक के आभामंडल में बुध का प्रभाव पहले की तुलना में बलवान हो जाता है तथा इस प्रकार बुध अपना कार्य अधिक बलवान रूप से करना आरंभ कर देते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि बुध का रत्न पन्ना किसी कुंडली में बुध को केवल अतिरिक्त बल प्रदान कर सकता है तथा पन्ना किसी कुंडली में बुध के शुभ या अशुभ स्वभाव पर कोई प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार यदि किसी कुंडली में बुध शुभ हैं कारक है तो पन्ना धारण करने से ऐसे शुभ बुध को अतिरिक्त बल प्राप्त हो जायेगा जिसके कारण जातक को बुध से प्राप्त होने वाले लाभ अधिक हो जायेंगें जबकि यही बुध यदि किसी जातक की कुंडली में अशुभ है तो बुध का रत्न धारण करने से ऐसे अशुभ बुध को और अधिक बल प्राप्त हो जायेगा जिसके चलते ऐसा अशुभ तथा अकारक बुध जातक को और भी अधिक हानि पहुंचा सकता है। इस लिए बुध का रत्न पन्ना केवल उन जातकों को पहनना चाहिये जिनकी कुंडली में बुध शुभ रूप से कार्य कर रहे हैं तथा ऐसे जातकों को बुध का रत्न कदापि नहीं धारण करना चाहिये जिनकी कुंडली में बुध अशुभ रूप से कार्य कर रहें हैं। अशुभ या पीड़ित बुध जातक को स्मृति हानि (memory loss), हकलाना, दिमागी अस्थिरता तथा अनिद्रा रोग आदि देता है| इस तरह का बुध मानसिक शक्ति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है|शारीरिक विकारों में अशुभ या पीड़ित बुध दीर्घकालीन पेचिश (chronic dysentery), अतिसार (diarrhoea), पेट के व्रण, ह्रदय रोग, भय, विक्षिप्त या पागलपन तक दे सकता हैख़ास तौर से जो लोग व्यापार में हैं, उनके लिए तो बुध का शुभ और अनुकूल होना अवश्यम्भावी है| और अगर बुध की कुंडली में ऐसी स्थिति नहीं है तो अच्छी quality का पन्ना (Emerald gemstone) धारण कर इसे सशक्त किया जा सकता है| पन्ना रत्न (Emerald gemstone) धारण बुद्धि और दिमागी ताकत को बढ़ा कर
दिमागी अस्थिरता दूर करने में सक्षम होता है|पन्ना रत्न धारण अच्छी
communication skills, अच्छा स्वास्थ्य तथा व्यापार के लिए अति उत्तम
होता है| बाकी सब रत्नों की तरह से पन्ना भी कुंडली के अति सूक्ष्म
निरीक्षण तथा विश्लेषण के बाद ही धारण किया जाना चाहिएमैं स्वयं एक रत्न विशेषज्ञ
(Gemologist) एवं ज्योतिषी हूँ, इसलिये कोई भी रत्न निर्धारण से पूर्व बड़ी ही बारीकी और गहन विश्लेषण के बाद ही रत्नों को निर्धारित करता हूँ|उच्च कोटि का पन्ना जाम्बिया तथा स्कॉट्लैंड की खानों से निकला जाता है !जहां ये कई अशुद्धियों के साथ होते हैं। खानों से निकाल कर सबसे पहले उनकी अशुद्धियां दूर की जाती है। इसके बाद इन्हें विभिन्न आकार में तराश कर बाजार में भेजा जाता है। वर्तमान में कोलम्बिया की खानों में सबसे अच्छा panna पाया जाता है। इसके बाद रूस और ब्राजील में मिलने वाले पन्ने सबसे बेहतर माने जाते हैं। मिश्र, नार्वे, भारत, इटली, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका और आस्ट्रिया में भी पन्ने की खाने हैं।
भारत में यह मुख्यत: दक्षिण महानदी, हिमालय, सोमनदी व गिरनार में पाया जाता है। इसका रंग हलके तोतिये से लेकर गाड़े हरे रंग तक हो सकता है ! असली पन्ने में काले रंग के हलके रेशे होते हपन्ना ग्रेनाइट, पेग्मेटाइट व चूने के पत्थरों के मिश्रण से बनता है। इसका रासायनिक फार्मुला Be3Al2(SiO3)6 होता है। इसकी कठोरता 7.75 होती है और आपेक्षिक घनत्व 2.69 से 2.80 तक होता है। यह प्रकाश के परावर्तन की भी क्षमता रखता है इसकी परावर्तन क्षमता 1.57 से 1.58 के बीच होती है। ये एक पारदर्शक रत्न हैैयदि कुंडली में बुध ग्रह शुभ प्रभाव में हो तो पन्ना अवश्य धारण करनारे रंग के इस चमकीले रत्न का गुणगान सदियों से होता आ रहा है। इसे मरकत मणि, हरितमणि, एमराल्ड, पांचू आदि नामों से भी जाना जाता है। गरुड़ पुराण में इसके गुणों के संदर्भ में विस्तार से चर्चा की गई है।
पन्ना धारण करने से दिमाग की कार्य क्षमता तीव्र हो जाती है और जातक पढ़ाई , लिखाई, व्यापार जैसे कार्यो में सफलता प्राप्त करता है! विधार्थियों को अपनी कुंडली का निरिक्षण किसी अच्छे ज्योतिषी से करवाकर पन्ना अवश्य धारण करना चाहिए क्योकि हमारे शैक्षिक जीवन में बुध ग्रह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है ! अच्छी शिक्षा बुध की कार्यकुशलता पर निर्भर है! यदि आप एक व्यापारी है और अपने व्यापार में उन्नति चाहते है तो आप पन्ना धारण कर सकते है! हिसाब किताब के कामो से जुड़े जातको को भी पन्ना अवश्य धारण करना चाहिए क्योकि एक अच्छे गणितज्ञ की योग्यता बुध के बल पर निर्भर करती है! अभिनय और फ़िल्मी क्षेत्र से जुड़े जातको को भी पन्ना धारण करना चाहिए क्योकि बुध ग्रह इन क्षेत्रो से जुड़े जातको के जीवन में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है!जिन लोगों का हाजमा खराब रहता हो, उन्हें पन्ना अवश्य धारण करना चाहिए।
गर्भवती महिलाओं को पन्ना धारण करने से अधिक लाभ मिलता है।
जो लोग दमा रोग से पीड़ित है, उन्हें पन्ना रत्न पहनने से लाभ होता है
पन्ना पहनने से पौरूष शक्ति में वृद्धि होती है एंव स्वास्थ्य उत्तम होता है।पुराने समय में मिस्र, ऑस्ट्रिया और अफगानिस्तान में पन्ना रत्न के लिए खनन का कार्य होता था। एक बार जब स्पेनिश लोग दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप में पहुंचे तो वो सुंदर एवं बड़े आकार के पन्ना रत्न को देखकर हैरान हुए हैं, क्योंकि उन्होंने पहले इस तरह का रत्न नहीं देखा था। उन्होंने इस खूबसूरत रत्न के स्रोत का पता लगाने के लिए बहुत वर्ष व्यतीत किए। अंत स्पेनिश नागरिकों ने पन्ना के स्रोत का पता लगा लिया, आज हम उसको कोलंबिया के रूप में जानते हैं, जिसको सोमोंडोको के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ होता है कि हरे रत्नों का भगवान। पन्ना बहुत नाजुक रत्न है, इसलिए इसको मजबूती देने के लिए कुछ अन्य सामग्री को इसमें मिलाया जाता था। हालांकि, इसके बावजूद भी इस रत्न को आकार देना आसान कार्य नहीं है। इसकी कटिंग करते समय बहुत सावधानी बरतने की जरूरत पड़ती है।रत्न धारण करने के पहले कुंडली दिखाना जरूरी है। मित्रों किसी अच्छे विद्वान रतन एक्सपर्ट ज्योतिषी को कुंडली दिखाकर ही कोई रत्न पहने नोट-पन्ना रत्न किसी क्वालीफाईड ज्योतिषीय की देख-रेख में ही पहनना चाहिए न कि किसी झोला छाप ज्योतिषी या पण्डित की सलाह पर। क्योंकि रत्न एक विज्ञान है आचार्य राजेश 07597718725-09414481324
गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018
Blue Sapphire शनी Ratan Neelam
मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018
Moti Rattan मोती रतन Gemology Jyotish
गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018
: भाग्यशाली रत्न या अमंगलकारी
शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017
जैमोलॉजी जैमोलॉजी वास्तव में एक विज्ञान है और इस पर अच्छा खासा काम हो रहा है। यह बात अलग है कि कीमती पत्थरों ने अपना यह स्थान खुद बनाया है। ठीक सोने, चांदी और प्लेटिनम की तरह। इसमें ज्योतिष का कोई रोल नहीं है। तीन प्रकार के रत्नो का प्रयोग आमतौर पर लोग करते है,शरीर के लिये परिवार और सन्तान के लिये तथा भाग्य के लिये,यही कारण प्राण रक्षा के लिये बुद्धि के विकास के लिये और समय पर कार्य हो जाने के लिये भी माना जाता है। आमतौर पर एक ही रत्न को लोग पहिनने की राय देते है,और उस रत्न के पहिनने के बाद कुछ सीमा मे फ़ायदा और कुछ सीमा मे नुकसान होने की बात से भी मना नही किया जा सकता है।पर यकीन मानिए भाग्य के साथ रत्नों का जुड़ाव मोहनजोदड़ो सभ्यता के दौरान भी रहा है। उस जमाने में भी भारी संख्या में गोमेद रत्न प्राप्त हुए हैं। यह सामान्य अवस्था में पाया जाने वाला रत्न नहीं है, इसके बावजूद इसकी उत्तरी पश्चिमी भारत में उपस्थिति पुरातत्ववेत्ताओं के लिए भी आश्चर्य का विषय रही। पता नहीं उस दौर में इतने अधिक लोगों ने गोमेद धारण करने में रुचि क्यों दिखाई, या गोमेद का रत्न के रूप में धारण करने के अतिरिक्त भी कोई उपयोग होता था, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में राहू की दशा भोग रहे जातक को राहत दिलाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है।जो मेरे हिसाब से गलत है इंटरनेट और किताबों में रत्नों के बारे में विशद जानकारी देने वालों की कमी नहीं है। इसके वारे मेरी पोस्ट इसकी वास्तविक आवश्यकता के बारे में है। मैं एक ज्योतिष विद्यार्थी होने के नाते रत्नों को पहनने का महत्व बताने नहीं बल्कि इनकी वास्तविक आवश्यकता बताने का प्रयास करूंगा। वास्तव में दो विधाओं में उलझा है रत्न विज्ञान वर्तमान दौर में हस्तरेखा और परम्परागत ज्योतिष एक-दूसरे में इस तरह घुलमिल गए हैं कि कई बार एक विषय दूसरे में घुसपैठ करता नजर आता है। रत्नों के बारे में तो यह बात और भी अधिक शिद्दत से महसूस होती है। हस्तरेखा पद्धति ने हाथ की सभी अंगुलियों के हथेली से जुड़े भागों पर ग्रहों का स्वामित्व दर्शाया है। ऐसे में कुण्डली देखकर रत्न पहनने की सलाह देने वाले लोग भी हस्तरेखा की इन बातों को फॉलो करते दिखाई देते हैं। जैसे बुध के लिए बताया गया पन्ना हाथ की सबसे छोटी अंगुली में पहनने, गुरु के लिए पुखराज तर्जनी में पहनने और शनि मुद्रिका सबसे बड़ी अंगुली में पहनने की सलाहें दी जाती हैं। बाकी ग्रहों के लिए अनामिका तो है ही, क्योंकि यह सबसे शुद्ध है। मुझे इस शुद्धि का स्पष्ट आधार नहीं पता लेकिन शुक्र का हीरा, मंगल का मूंगा, चंद्रमा का मोती जैसे रत्न इसी अंगुली में पहनने की सलाह दी जाती है। अब रत्न किसे पहनाना आवश्यक है, इन सब बातों को लेकर कालान्तर में मैंने कुछ तय नियम बना लिए… अब ये कितने सही है कितने गलत यह तो नहीं बता सकता, लेकिन इससे जातक को धोखे में रखने की स्थिति से बच जाता हूं।वास्तव में जैम स्टोन से किस ग्रह का उपचार कैसे किया जाए इस बारे में कई तरह के मत हैं। कोई ग्रह के कमजोर होने पर रत्न पहनाने की सलाह देता है तो कोई केवल कारक ग्रह अथवा लग्नेश संबंधी ग्रह का रत्न पहनने की सलाह देता है। ऐसे में किसे क्या पहनाया जाए, यह बताना टेढ़ी खीर है। यहां के.एस. कृष्णामूर्ति को कोट करूं तो स्पष्ट है कि लग्नेश या नवमेश अथवा इनसे जुड़े ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कई दूसरे ग्रह जो फौरी तौर पर कुण्डली में बहुत स्ट्रांग पोजिशन में दिखाई भी दें तो उनसे संबंधित उपचार नहीं कराए जा सकते। मैं उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। तुला लग्न के जातक की कुण्डली में लग्न का अधिपति हुआ शुक्र, कारक ग्रह हुआ शनि और नवमेश हुआ बुध। अब कृष्णामूर्ति के अनुसार जब तक शनि का संबंध शुक्र या बुध से न हो तो उससे संबंधित उपचार नहीं किए जा सकते, यानि उपचार प्रभावी नहीं होगा, लेकिन परम्परागत ज्योतिष के अनुसार तुला लग्न के जातक को शनि संबंधी रत्न प्रमुखता से पहनाया जा सकता है। यह शरीर पंच भूतों से बना है और इन्ही के अधिकार मे सम्पूर्ण जीवन का विस्तार होता है। इन पंचभूतो मे किसी भी भूत की कमी या अधिकता जीवन के विस्तार मे अपने अपने प्रकार से दिक्कत देने के लिये अपना प्रभाव देने लगते है। ग्रहों के दो प्रकार सूर्य और चन्द्रमा के साथ देखे जाते है,जैसे मेष राशि का स्वामी मंगल है तो वह लगनेश के लिये मूंगा को पहिनने का कारक बनता है जो शरीर और प्राण रक्षा के लिये अपना प्रभाव देता है,लेकिन उसका असर धन के प्रति सही नही माना जा सकता है जैसे मंगल और शुक्र मे आपस मे नही बनती है,उसी प्रकार से बुध के साथ भी मंगल की नही बनती है,चन्द्रमा के साथ बराबर का असर रहता है सूर्य के साथ उसकी बहुत अधिक बढोत्तरी हो जाती है गुरु के साथ होने से अहम की मात्रा बढ जाती है और शनि के साथ मिलने से कसाई जैसी प्रकृति बन जाती है। तो मूंगा मेष लगन वालो के लिये धन व्यवहार कार्य जीवन साथी उन्नति के साधनो मे तो गलत असर देगा और शरीर मन आयु के साथ भलाई करेगा,अहम ज्ञान और शांति के साधनो मे बढोत्तरी करने से दिक्कत देने वाला बनेगा। अगर शनि लगन मे ही विराजमान है तो वह सिर दर्द की बीमारी देगा और जो भी सोचा जाता है उसके लिये अपनी तर्क शक्ति के विकास होने से तर्क वितर्क करने से होते हुये कार्य को भी बिगाडने की कोशिश करेगा। कार्य तकनीकी बन जायेगा और जो भी कार्य होगा वह मनुष्य शक्ति के अन्दर ही माना जायेगा जैसे शरीर विज्ञान मे रुचि,जो भी कार्य किया जायेगा उसके अन्दर नये नये आविष्कार होने के कारण कार्यों के अन्दर कठिनाई आने लगेगी,एक भाई को बहुत ही कठिनाई केवल इसलिये हो जायेगी कि वह परिवार मे सामजस्य बनाने की कोशिश करेगा और तामसी कारण बढ जाने से परिवार मे अशान्ति का माहौल बना रहेगा। युवावस्था मे अपनी ही चलाने के कारण घर के लोगो से दूरिया बन जायेंगी और विरोधी युवावस्था के बाद हावी हो जायेंगे,दुश्मनी अधिक बन जायेगी और जो भला भी करना चाहेंगे वे डर की बजह से दूर होते चले जायेंगे नाक पर गुस्सा होगा,यानी जरा सी बात का बतंगड बनाने में देर नही लगेगी। यही मंगल जब राहु पर गोचर से अपना असर दिखायेगा या जन्म के समय से ही राहु के सानिध्य मे होगा तो मूंगा का असर दिमाग को पहिया की तरह से घुमाने से बाज नही आयेगा,क्या कहना है किससे कैसे बात करनी है यह सोच विचार बिलकुल ही खत्म हो जायेगी,पारिवारिक कारणो मे भी अक्सर पैतृक सम्पत्ति के पीछे नये नये विवाद बनते जायेंगे और घर के सदस्य ही किसी न किसी प्रकार की घात लगाने लगेंगे,व्यवहार भी तानाशाही जैसा बन जायेगा,जो भी बात की जायेगी वह हुकुम जैसी होगी,इस बात का असर भाई पर भी जायेगा और वह अधिक चिन्ता के cc कारण या आन्तरिक दुश्मनी से दुर्घटना का शिकार भी हो जायेगा,अगर व्यक्ति का बडा भाई भी है तो उसकी चलेगी नही या मूंगा को धारण करने के बाद वह घर से अलग हो जायेगा,अधिक सोच के कारण से व्यक्ति के अन्दर ब्लड प्रेसर की बीमारी पैदा हो जायेगी। किसी प्रकार से मंगल की युति कुंडली मे केतु से है तो स्त्री जातक के लिये परेशानी का कारण बन जायेगा यानी पति का व्यवहार बिलकुल सन्यासी जैसा हो जायेगा,वह अकेला बैठ कर जाने क्या क्या सोचने लगेगा और दूर रहकर ही अपने जीवन को बिताने का कारण सोचने लगेगा,पति का इन्तजार पत्नी को और पत्नी का इन्तजार पति को रहेगा दोनो कभी इकट्ठे नही रह पायेंगे और रहेंगे भी तो जैसे कुत्ते बिल्ली लडते है वैसे आपस के विचारों की लडाई शुरु हो जायेगी,केतु के साथ मंगल के होने से कुंडली में मंगल दोष भले ही नही हो लेकिन मूंगा को पहिनने के बाद जबरदस्ती मे मंगली दोष को पैदा कर लिया जायेगा,शादी मे देरी हो जायेगी,घर मे किसी को भी मानसिक बीमारी पैदा हो सकती है लो ब्लड प्रेसर की बीमारी भी पैदा हो सकती है। अगर दो तीन भाई है तो एक तो किसी प्रकार से अनैतिक कार्यों की तरफ़ भागने लगेगा,और दूसरा किसी प्रकार से घर को त्याग कर ही चला जायेगा,कई बार लोगों के द्वारा अनर्गल बयान दिये जाते है कि अमुक पत्थर के पहिनते ही उन्हे आशातीत लाभ हो गया,अमुक ज्योतिषी ने अमुक रत्न दिया था उससे उन्हे बहुत लाभ हो गया,लेकिन यह क्यों नही सोचा जाता है कि ज्योतिषी केवल तत्व की मीमांशा का ही हाल देता है कभी भी ज्योतिषी केवल रत्न पहिने के बाद आराम मिलना नही बोलता है,रत्न एक यंत्र की तरह से है,रत्न का मंत्र रत्न की विद्या की तरह से है और रत्न का कब प्रयोग करना है कैसे प्रयोग करना है कैसे उसे सम्भालना है आदि की जानकारी तंत्र है। केवल रत्न के पहिनने से कोई लाभ नही होता है ऐसा मैने अपने ज्योतिषीय जीवन मे नही देखा है,वैसे अपने श्रंगार के लिये कितनी ही अंगूठिया पहिने रहो हार मे कितने ही रत्न जडवा दो लेकिन इस मान्यता मे रत्न पहिन लिया जाये कि केवल रत्न ही काम करेगा यह असम्भव बात ही मिलती है।मनुष्य जब भ्रम मे चला जाता है तो उसके लिये ध्यान को भंग करना जरूरी होता है यह मनोवैज्ञानिक कारण है,जब किसी के सामने अपनी समस्या को बताया जाता है तो वह समस्या को सुनता है समस्या की शुरुआत का समय सितारों से निकाला जाता है,समस्या के अन्त का समय भी सितारों से निकाला जाता है,अगर सितारा जो गलत फ़र्क दे रहा है तो उस सितारे के लिये रत्न का पहिना जाना उत्तम माना जाता है,सबसे पहले अच्छे रत्न की पहिचान करना जरूरी होता है,इसे कोई जानने वाला ही पहिचान करवा सकता है वैसे आजकल रत्न परीक्षणशाला बन गयी है और रत्न का परीक्षण करने के लिये रत्नो की कठोरता रत्न के अन्दर की कारकत्व वाली स्थिति को बताया जाता है,जब प्रयोगशाला बन गयी है तो प्रयोगशाला से किन किन तत्वो का निराकरण मिलता है उसके बारे मे रत्न का व्यवसाय करने वालो के लिये जानकारी भी मिल गयी है कि मशीन से कितना और क्या बताया जा सकता है,आजकल की वैज्ञानिक सोच को समझने वाले लोग यह भी समझते है कि रत्न जो भूमि के नीचे से प्राप्त होता है की परिस्थितिया भी सर्दी गर्मी बरसात पर निर्भर होकर और जीवांश के मिश्रण से ही बनी होती है मारे शरीर के चारों ओर एक आभामण्डल होता है, जिसे वे AURA कहते हैं। ये आभामण्डल सभी जीवित वस्तुओं के आसपास मौजूद होता है। मनुष्य शरीर में इसका आकार लगभग 2 फीट की दूरी तक रहता है। यह आभामण्डल अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करता है। हर व्यक्ति का आभामण्डल कुछ लोगों को सकारात्मक और कुछ लोगों को नकारात्मक प्रभाव होता है, जो कि परस्पर एकदूसरे की प्रकृति पर निर्भर होता है। विभिन्न मशीनें इस आभामण्डल को अलग अलग रंगों के रूप में दिखाती हैं । वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है। वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं। आचार्य राजेश
जैमोलॉजी जैमोलॉजी वास्तव में एक विज्ञान है और इस पर अच्छा खासा काम हो रहा है। यह बात अलग है कि कीमती पत्थरों ने अपना यह स्थान खुद बनाया है। ठीक सोने, चांदी और प्लेटिनम की तरह। इसमें ज्योतिष का कोई रोल नहीं है। तीन प्रकार के रत्नो का प्रयोग आमतौर पर लोग करते है,शरीर के लिये परिवार और सन्तान के लिये तथा भाग्य के लिये,यही कारण प्राण रक्षा के लिये बुद्धि के विकास के लिये और समय पर कार्य हो जाने के लिये भी माना जाता है। आमतौर पर एक ही रत्न को लोग पहिनने की राय देते है,और उस रत्न के पहिनने के बाद कुछ सीमा मे फ़ायदा और कुछ सीमा मे नुकसान होने की बात से भी मना नही किया जा सकता है।पर यकीन मानिए भाग्य के साथ रत्नों का जुड़ाव मोहनजोदड़ो सभ्यता के दौरान भी रहा है। उस जमाने में भी भारी संख्या में गोमेद रत्न प्राप्त हुए हैं। यह सामान्य अवस्था में पाया जाने वाला रत्न नहीं है, इसके बावजूद इसकी उत्तरी पश्चिमी भारत में उपस्थिति पुरातत्ववेत्ताओं के लिए भी आश्चर्य का विषय रही। पता नहीं उस दौर में इतने अधिक लोगों ने गोमेद धारण करने में रुचि क्यों दिखाई, या गोमेद का रत्न के रूप में धारण करने के अतिरिक्त भी कोई उपयोग होता था, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में राहू की दशा भोग रहे जातक को राहत दिलाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है।जो मेरे हिसाब से गलत है इंटरनेट और किताबों में रत्नों के बारे में विशद जानकारी देने वालों की कमी नहीं है। इसके वारे मेरी पोस्ट इसकी वास्तविक आवश्यकता के बारे में है। मैं एक ज्योतिष विद्यार्थी होने के नाते रत्नों को पहनने का महत्व बताने नहीं बल्कि इनकी वास्तविक आवश्यकता बताने का प्रयास करूंगा। वास्तव में दो विधाओं में उलझा है रत्न विज्ञान वर्तमान दौर में हस्तरेखा और परम्परागत ज्योतिष एक-दूसरे में इस तरह घुलमिल गए हैं कि कई बार एक विषय दूसरे में घुसपैठ करता नजर आता है। रत्नों के बारे में तो यह बात और भी अधिक शिद्दत से महसूस होती है। हस्तरेखा पद्धति ने हाथ की सभी अंगुलियों के हथेली से जुड़े भागों पर ग्रहों का स्वामित्व दर्शाया है। ऐसे में कुण्डली देखकर रत्न पहनने की सलाह देने वाले लोग भी हस्तरेखा की इन बातों को फॉलो करते दिखाई देते हैं। जैसे बुध के लिए बताया गया पन्ना हाथ की सबसे छोटी अंगुली में पहनने, गुरु के लिए पुखराज तर्जनी में पहनने और शनि मुद्रिका सबसे बड़ी अंगुली में पहनने की सलाहें दी जाती हैं। बाकी ग्रहों के लिए अनामिका तो है ही, क्योंकि यह सबसे शुद्ध है। मुझे इस शुद्धि का स्पष्ट आधार नहीं पता लेकिन शुक्र का हीरा, मंगल का मूंगा, चंद्रमा का मोती जैसे रत्न इसी अंगुली में पहनने की सलाह दी जाती है। अब रत्न किसे पहनाना आवश्यक है, इन सब बातों को लेकर कालान्तर में मैंने कुछ तय नियम बना लिए… अब ये कितने सही है कितने गलत यह तो नहीं बता सकता, लेकिन इससे जातक को धोखे में रखने की स्थिति से बच जाता हूं।वास्तव में जैम स्टोन से किस ग्रह का उपचार कैसे किया जाए इस बारे में कई तरह के मत हैं। कोई ग्रह के कमजोर होने पर रत्न पहनाने की सलाह देता है तो कोई केवल कारक ग्रह अथवा लग्नेश संबंधी ग्रह का रत्न पहनने की सलाह देता है। ऐसे में किसे क्या पहनाया जाए, यह बताना टेढ़ी खीर है। यहां के.एस. कृष्णामूर्ति को कोट करूं तो स्पष्ट है कि लग्नेश या नवमेश अथवा इनसे जुड़े ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कई दूसरे ग्रह जो फौरी तौर पर कुण्डली में बहुत स्ट्रांग पोजिशन में दिखाई भी दें तो उनसे संबंधित उपचार नहीं कराए जा सकते। मैं उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। तुला लग्न के जातक की कुण्डली में लग्न का अधिपति हुआ शुक्र, कारक ग्रह हुआ शनि और नवमेश हुआ बुध। अब कृष्णामूर्ति के अनुसार जब तक शनि का संबंध शुक्र या बुध से न हो तो उससे संबंधित उपचार नहीं किए जा सकते, यानि उपचार प्रभावी नहीं होगा, लेकिन परम्परागत ज्योतिष के अनुसार तुला लग्न के जातक को शनि संबंधी रत्न प्रमुखता से पहनाया जा सकता है। यह शरीर पंच भूतों से बना है और इन्ही के अधिकार मे सम्पूर्ण जीवन का विस्तार होता है। इन पंचभूतो मे किसी भी भूत की कमी या अधिकता जीवन के विस्तार मे अपने अपने प्रकार से दिक्कत देने के लिये अपना प्रभाव देने लगते है। ग्रहों के दो प्रकार सूर्य और चन्द्रमा के साथ देखे जाते है,जैसे मेष राशि का स्वामी मंगल है तो वह लगनेश के लिये मूंगा को पहिनने का कारक बनता है जो शरीर और प्राण रक्षा के लिये अपना प्रभाव देता है,लेकिन उसका असर धन के प्रति सही नही माना जा सकता है जैसे मंगल और शुक्र मे आपस मे नही बनती है,उसी प्रकार से बुध के साथ भी मंगल की नही बनती है,चन्द्रमा के साथ बराबर का असर रहता है सूर्य के साथ उसकी बहुत अधिक बढोत्तरी हो जाती है गुरु के साथ होने से अहम की मात्रा बढ जाती है और शनि के साथ मिलने से कसाई जैसी प्रकृति बन जाती है। तो मूंगा मेष लगन वालो के लिये धन व्यवहार कार्य जीवन साथी उन्नति के साधनो मे तो गलत असर देगा और शरीर मन आयु के साथ भलाई करेगा,अहम ज्ञान और शांति के साधनो मे बढोत्तरी करने से दिक्कत देने वाला बनेगा। अगर शनि लगन मे ही विराजमान है तो वह सिर दर्द की बीमारी देगा और जो भी सोचा जाता है उसके लिये अपनी तर्क शक्ति के विकास होने से तर्क वितर्क करने से होते हुये कार्य को भी बिगाडने की कोशिश करेगा। कार्य तकनीकी बन जायेगा और जो भी कार्य होगा वह मनुष्य शक्ति के अन्दर ही माना जायेगा जैसे शरीर विज्ञान मे रुचि,जो भी कार्य किया जायेगा उसके अन्दर नये नये आविष्कार होने के कारण कार्यों के अन्दर कठिनाई आने लगेगी,एक भाई को बहुत ही कठिनाई केवल इसलिये हो जायेगी कि वह परिवार मे सामजस्य बनाने की कोशिश करेगा और तामसी कारण बढ जाने से परिवार मे अशान्ति का माहौल बना रहेगा। युवावस्था मे अपनी ही चलाने के कारण घर के लोगो से दूरिया बन जायेंगी और विरोधी युवावस्था के बाद हावी हो जायेंगे,दुश्मनी अधिक बन जायेगी और जो भला भी करना चाहेंगे वे डर की बजह से दूर होते चले जायेंगे नाक पर गुस्सा होगा,यानी जरा सी बात का बतंगड बनाने में देर नही लगेगी। यही मंगल जब राहु पर गोचर से अपना असर दिखायेगा या जन्म के समय से ही राहु के सानिध्य मे होगा तो मूंगा का असर दिमाग को पहिया की तरह से घुमाने से बाज नही आयेगा,क्या कहना है किससे कैसे बात करनी है यह सोच विचार बिलकुल ही खत्म हो जायेगी,पारिवारिक कारणो मे भी अक्सर पैतृक सम्पत्ति के पीछे नये नये विवाद बनते जायेंगे और घर के सदस्य ही किसी न किसी प्रकार की घात लगाने लगेंगे,व्यवहार भी तानाशाही जैसा बन जायेगा,जो भी बात की जायेगी वह हुकुम जैसी होगी,इस बात का असर भाई पर भी जायेगा और वह अधिक चिन्ता के cc कारण या आन्तरिक दुश्मनी से दुर्घटना का शिकार भी हो जायेगा,अगर व्यक्ति का बडा भाई भी है तो उसकी चलेगी नही या मूंगा को धारण करने के बाद वह घर से अलग हो जायेगा,अधिक सोच के कारण से व्यक्ति के अन्दर ब्लड प्रेसर की बीमारी पैदा हो जायेगी। किसी प्रकार से मंगल की युति कुंडली मे केतु से है तो स्त्री जातक के लिये परेशानी का कारण बन जायेगा यानी पति का व्यवहार बिलकुल सन्यासी जैसा हो जायेगा,वह अकेला बैठ कर जाने क्या क्या सोचने लगेगा और दूर रहकर ही अपने जीवन को बिताने का कारण सोचने लगेगा,पति का इन्तजार पत्नी को और पत्नी का इन्तजार पति को रहेगा दोनो कभी इकट्ठे नही रह पायेंगे और रहेंगे भी तो जैसे कुत्ते बिल्ली लडते है वैसे आपस के विचारों की लडाई शुरु हो जायेगी,केतु के साथ मंगल के होने से कुंडली में मंगल दोष भले ही नही हो लेकिन मूंगा को पहिनने के बाद जबरदस्ती मे मंगली दोष को पैदा कर लिया जायेगा,शादी मे देरी हो जायेगी,घर मे किसी को भी मानसिक बीमारी पैदा हो सकती है लो ब्लड प्रेसर की बीमारी भी पैदा हो सकती है। अगर दो तीन भाई है तो एक तो किसी प्रकार से अनैतिक कार्यों की तरफ़ भागने लगेगा,और दूसरा किसी प्रकार से घर को त्याग कर ही चला जायेगा,कई बार लोगों के द्वारा अनर्गल बयान दिये जाते है कि अमुक पत्थर के पहिनते ही उन्हे आशातीत लाभ हो गया,अमुक ज्योतिषी ने अमुक रत्न दिया था उससे उन्हे बहुत लाभ हो गया,लेकिन यह क्यों नही सोचा जाता है कि ज्योतिषी केवल तत्व की मीमांशा का ही हाल देता है कभी भी ज्योतिषी केवल रत्न पहिने के बाद आराम मिलना नही बोलता है,रत्न एक यंत्र की तरह से है,रत्न का मंत्र रत्न की विद्या की तरह से है और रत्न का कब प्रयोग करना है कैसे प्रयोग करना है कैसे उसे सम्भालना है आदि की जानकारी तंत्र है। केवल रत्न के पहिनने से कोई लाभ नही होता है ऐसा मैने अपने ज्योतिषीय जीवन मे नही देखा है,वैसे अपने श्रंगार के लिये कितनी ही अंगूठिया पहिने रहो हार मे कितने ही रत्न जडवा दो लेकिन इस मान्यता मे रत्न पहिन लिया जाये कि केवल रत्न ही काम करेगा यह असम्भव बात ही मिलती है।मनुष्य जब भ्रम मे चला जाता है तो उसके लिये ध्यान को भंग करना जरूरी होता है यह मनोवैज्ञानिक कारण है,जब किसी के सामने अपनी समस्या को बताया जाता है तो वह समस्या को सुनता है समस्या की शुरुआत का समय सितारों से निकाला जाता है,समस्या के अन्त का समय भी सितारों से निकाला जाता है,अगर सितारा जो गलत फ़र्क दे रहा है तो उस सितारे के लिये रत्न का पहिना जाना उत्तम माना जाता है,सबसे पहले अच्छे रत्न की पहिचान करना जरूरी होता है,इसे कोई जानने वाला ही पहिचान करवा सकता है वैसे आजकल रत्न परीक्षणशाला बन गयी है और रत्न का परीक्षण करने के लिये रत्नो की कठोरता रत्न के अन्दर की कारकत्व वाली स्थिति को बताया जाता है,जब प्रयोगशाला बन गयी है तो प्रयोगशाला से किन किन तत्वो का निराकरण मिलता है उसके बारे मे रत्न का व्यवसाय करने वालो के लिये जानकारी भी मिल गयी है कि मशीन से कितना और क्या बताया जा सकता है,आजकल की वैज्ञानिक सोच को समझने वाले लोग यह भी समझते है कि रत्न जो भूमि के नीचे से प्राप्त होता है की परिस्थितिया भी सर्दी गर्मी बरसात पर निर्भर होकर और जीवांश के मिश्रण से ही बनी होती है मारे शरीर के चारों ओर एक आभामण्डल होता है, जिसे वे AURA कहते हैं। ये आभामण्डल सभी जीवित वस्तुओं के आसपास मौजूद होता है। मनुष्य शरीर में इसका आकार लगभग 2 फीट की दूरी तक रहता है। यह आभामण्डल अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करता है। हर व्यक्ति का आभामण्डल कुछ लोगों को सकारात्मक और कुछ लोगों को नकारात्मक प्रभाव होता है, जो कि परस्पर एकदूसरे की प्रकृति पर निर्भर होता है। विभिन्न मशीनें इस आभामण्डल को अलग अलग रंगों के रूप में दिखाती हैं । वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है। वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं। आचार्य राजेश
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