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गुरुवार, 7 जून 2018

पैसा और ज्योतिष

Paisa…. कहाँ है पैसा कोई व्यक्ति अपने जीवन में कितना धनी हो पाएगा, यह उसकी कुंडली में लिखा होता है। आइए जानते हैं कुंडली में धन-योग को कैसे पहचानें? कुण्‍डली में दूसरे भाव को ही धन भाव कहा गया है
। दूसरे भाव और इसके अधिपति की स्थिति हमारे संग्रह किए जाने वाले धन के बारे में संकेत देती है। कुण्‍डली का चौथा भाव हमारे सुखमय जीवन जीने के बारे में संकेत देता है। पांचवा भाव हमारी उत्‍पादकता के बारे में बताता है, छठे भाव से ऋणों और उत्‍तरदायित्‍वों को देखा जाएगा। सातवां भाव व्‍यापार में साझेदारों को देखने के लिए बताया गया है। इसके अलावा ग्‍यारहवां भाव आय और बारहवां भाव व्‍यय से संबंधित है। वास्तव में हम एकादश व चतुर्थ भाव के ऑपरेटिंग फंक्शन में कंफ्यूज हो जाते हैं। जिस मकान वाहन आदि की बात आप कर रहे हैं ये मानसिक सुख का कारक हैं। भौतिकता भी तभी सुख देगी जब मन शांत होगा। लाल किताब या कालपुरुष की बात करें तो चतुर्थ भाव सुख का भाव है। ये चन्द्रमा के आधीन विषय है एक झोपडी में भी भी आप वही भौतिक सुख का एहसास कर सकते हैं जो आपको लाखों खर्च किए हुए बंगले में भी नहीं आये। .28 बंगले होकर भी विजय माल्या आज भगोड़ा घोषित है। क्योंकि उसने सुख को एकादश से पाने का प्रयास किया ,एकादश भाव चतुर्थ सुख के लिए मारक आठवां भाव वन जाता है.जैसे ही आपने अपने सुख को भौतिकता में खोजा आपने अपने सुख को ही समझ लीजिए आग लगा दी। एकादश भाव काल पुरुष में शनि का स्थान है व वायुकारक प्रभाव लिए होता है। शनि त्याग ,विछोह का कारक है व वायु का कोई आकार नहीं .वायुकोई स्थिरता नहीं फिर भला यहाँ से प्राप्त आधार स्थाई सुख का कारक कैसे होगा ??फिर ये तो अंत से एक कदम पहले का भाव हैयहाँ से प्राप्त आधार द्वादश मोक्ष को प्राप्त करने की सीढ़ी के रूप में देखा जाता है ,और जाहिर रूप से मोक्ष प्राप्ति के लिए चतुर्थ ,भौतिक सुख (एकादश से छठा ) शत्रु है पैसे से प्राप्त बड़े बड़े भौतिक सुखों को त्यागकर हमने कई लोग अंत में अध्यात्म की तलाश में भटकते देखे बड़े बड़े लोगों को वृद्धाश्रम में पाया .बड़ी बड़ी अभिनेत्रियों को फांसी खाते देखा कारण वही एकादश के पीछे की अंधी दौड़ ,,,, और इस दौड़ में वो नहीं दिखा जो सहज रूप से चतुर्थ में हासिल था ,चन्द्रमा का ठिकाना ,मानसिक सुख का आधार, ज्योतिष में हर ग्रह की १०८ गतियां हैं व हर भाव १०८ तरीके से प्रभाव देने के लिए माना जाता है हाँ अगर कई जातक पैसे को ही आधार मान कर प्रश्न कर रहे हैं तो सामूहिक रूप से जवाब देकर बताने का प्रयास करता हूँ। धन (पैसा )कमाने के आधार प्रत्येक कुंडली में अलग अलग होते हैं साधन अलग अलग होते हैं भाव भी अलग अलग होते है मात्र एक भाव को ही प्राप्ति के लिए देखा जाना सही निर्णय का आधार किसी भी गणक के लिए नहीं बन सकता धन यानि ध +न कुंडलियों मे सामान्यतः धन का आगमन वहीँ से होता है जहाँ वृश्चिक व धनु राशि होती है आठवें के रूप में वृश्चिक राशि से पैसा कमाने के साधनों पर रिस्क लिया जाता है ,,वो रिस्क शरीर का हो ,धन का हो ,ज्ञान का हो किसी भी चीज का हो सकता है रिस्क आयेगा तो स्वयं को साबित करने के लिए नवम भाग्य के रूप में धनु राशि को आपरेट करना ही होगा जब रिस्क लिया जाएगा तभी भाग्य को अपनी हैसियत दिखाने का मौका मिलेगा अब अगर हम आय (पैसा ) एकादश में ही सुख तलाश कर रहे हैं तो देखिये कि ये एकादश आठवें भाव का सुख (चतुर्थ ) भाव है। काल पुरुष के अनुसार आठवां यानि रिस्क का भाव ,आठवां यानि वृश्चिक राशि कर्म अर्थात दशम इस रिस्क का पराक्रम (तीसरा)तथा एकादश अर्थात इस आठवें का सुख (चतुर्थ) अतः ज्योतिषी व जातक दोनों को चाहिए कि पैसा खोज रहे हैं तो भाव से भ्रमित न होकर एकादश के त्रिकोण को खंगालें एकादश का त्रिकोण जाहिर रूप से इसे उत्पादन का सहयोग (पंचम का प्रभाव )देने के लिए तृतीय तथा इस तृतीय (पराक्रम )को उत्पादन (पंचम का प्रभाव) देने के लिए सप्तम को पकड़ें (सम्भवतः अब ईसे समझें कि सातवें दाम्पत्य भाव के लिए क्यों कहा जाता है कि जातक अपनी लक्ष्मी घर लाया है ) सीधी सी बात है कि सप्तम भाव एकादश का भाग्य भाव है। इस त्रिकोण की तलाश के बाद कालपुरुष का प्रभाव लिए वृश्चिक व धनु को खंगालने हेतु जो जातक व गणक ज्योतिष के महासागर में गोता लगाएगा ,वो शर्तिया खाली हाथ नहीं लौटेगा ईस के ईलावा धन प्राप्त करने के लिये जो नियम है उनके अनुसार वह ग्रह जो केन्द्र तथा त्रिकोण का स्वामी हो अथवा अन्य शुभ भावों का स्वामी हो तो वह धन पदवी आदि वांछित पदार्थों की उपलब्धि करवाता है। इसके अलावा जो भाव पापी है,और उनके स्वामी यदि केवल पाप प्रभाव में हों तो पापत्व के नाश के द्वारा धन की सृष्टि करते हैं। ग्रहों के द्वारा यह पता लग सकता है कि ग्रह की कीमत कितने रुपये की है,और एक ही लगन में अगर अलग अलग प्रकार के ग्रह हैं तो वे अलग अलग कीमत का बखान करेंगे,लेकिन उस ग्रह की कीमत तब और बढ जायेगी,जब वह साधारण बली से अति बली स्थिति में पहुंच जायेगा। किसी कुन्डली के धनेश की दशा में कोई भी बात कहने से पहले यह पता कर लेंगे कि कुन्डली का स्तर क्या है,यह बात शुभ धन दायक ग्रहों के योगों के द्वारा पता लगेगी। इन योगों की संख्या जितनी अधिक होती है उतना ही अधिक धन मिलता है। धन दायक योगों के लिये पहले शुक्र को देखना होगा,कि वह एक या एक से अधिक लगनों में बैठा है।लगन दूसरे भाव नवम भाव और एकादस भाव के बलवान स्वामियों की परस्पर युति अथवा द्रिष्टि द्वारा हो,नवम दसम के स्वामियों का सम्बन्ध,चौथे और पांचवें भाव के स्वामियों का सम्बन्ध शुभ सप्तमेश तथा नवमेश का संबन्ध पंचमेश और सप्तमेश का शुभ सम्बन्ध भी धन का कारक बनता है। तीन छ: आठ और बारह भावों के स्वामी अगर अपनी राशियों से बुरे भावों में बैठें और बुरे ही ग्रहों द्वारा देखे जावें तो भी धन की सृष्टि होती है। उदाहरण मेष राशि का बुध वृश्चिक राशि में अष्टम स्थान में है,और शनि के पाप प्रभाव में हो,तो बुध बहुत निर्बल हो जायेगा,कारण- वह अनिष्टदायक भाव में है, वह शत्रु राशि में स्थित है, वह शनि द्वारा द्रष्ट है, वह तृतीय स्थान से छठे स्थान में विराजमान है, वह छठे स्थान से तीसरा होकर बुरा है, तीनो लगनों के स्वामी आपस में युति कर लेते है तो भी धन दायक योग बन जाता है। शुक्र गुरु से बारहवें भाव में बैठ जावे तो भी धन दायक हो जाता है,चार या चार से अधिक भावों का अपने स्वामियों से द्र्ष्ट होने पर भी धनदायक योग बन जाता है। किसी ग्रह का तीनों लगनों से शुभ बन जाना भी धनदायक योग बना देता है,सूर्य या चन्द्र का नीच भंग हो जाना भी धनदायक बन जाता है। कोई उच्च का ग्रह शुभ स्थान में चला जाये,और जिस स्थान में वह उच्च का ग्रह गया उसका स्वामी भी उच्च में चला जाये तो भी धनदायक योग बन जाता है। शुभ भाव का स्वामी अगर बक्री हो जाये तो भी धनदायक योग बन जाता है,यदि यह सब कारण तीनों लगनों में आजाये तो शुभता कई गुनी बढ जाती है। आपका धन किस क्षेत्र से और कब आयेगा इस संसार में अपवादों को छोड़कर हर व्यक्ति धनवान होना चाहता है। धन व्यक्ति को सुख, आनंद, सुविधा और सामाजिक सुरक्षा देता है। आज दुनिया में धनवान लोगों की संख्या इतनी कम है कि उनकी सूची बनाई जा सकती है। इसकी तुलना में गरीब लोगों की संख्या अधिक है। कुछ लोगों की आय इतनी है कि वह समाज में सम्मान और आदर्श जिंदगी जीते हैं। लेकिन तीनों ही वर्ग को देखें तो पाएंगे कि सभी में समान रू प से धन पाने की चाह होती है। धन और आय के आधार पर लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जा सकता है अत्यधिक धनी, उच्च मध्यम वर्ग, मध्यम वर्ग, गरीब और बहुत गरीब। यह अंतर देखकर यह विचार आना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्यो प्रत्येक व्यक्ति अपना-अपना भाग्य लेकर जन्म लेता है। एक ही परिवार में जन्मे बच्चों की किस्मत भी अलग होती है। ऐसा जन्म के समय की ग्रह स्थितियों में भिन्नता के कारण होता है। जन्मकुंडली में कौन सी स्थितियां व्यक्ति को धनवान वनाती है व संसार में कुछ लोग अपने जीवन में जल्दी तरक्की कर जाते हैं जबकि कुछ लोगों को इसके लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। कई बार इतना संघर्ष करने के बावजूद सफलता नहीं मिल पाती है। कुछ बहुत ही अमीर घर में पैदा होते हैं और कुछ लोग बहुत ही गरीब घर में। कुछ अमीर घर में पैदा होकर धीरे-धीरे गरीब हो जाते हैं और कुछ लोग गरीब घर में पैदा होकर धीरे-धीरे अमीर हो जाते हैं। कुछ लोग बहुत अच्छा पढ़ लिखकर बेरोजगार रहते हैं और कुछ लोग थोड़ा पढ़े लिखे होने पर भी अच्छे काम काज में लग जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि बच्चे के जन्म के बाद घर में बहुत तरक्की हुई और सब कुछ अच्छा हो गया जबकि कुछ लोग कहते हैं कि जब से बच्चा पैदा हुआ मां बाप बीमार रहते हैं और घर में परेशानी आ गई है। कुछ लोग कहते हैं कि शादी के बाद पत्नी के आने से तरक्की और उन्नति होती गई जबकि कुछ लोग कहते हैं कि शादी के बाद दिन प्रतिदिन काम खराब हो रहा है। इस संसार में अधि¬कतर लोग चढ़ते हुए सूर्य को नमस्कार करते हैं। अगर आप अच्छे पद पर हैं या आपको सब प्रकार की सुख सुविधा है तो आपके अनेक मित्र होंगे, अगर कुछ नहीं तो आपको कोई पूछने वाला नहीं होगा। ज्योतिष में नवम स्थान को भाग्य एवं धर्म स्थान माना जाता है। जन्मपत्री देखते समय सभी विषयों पर विस्तार पूर्वक विचार करना चाहिए। सबसे पहले अपनी जन्मपत्री किसी अच्छे ज्योतिषी को दिखा कर अपनी समस्या का समाधान करे आप हम से भी सम्पर्क कर सकते है 07597718725। 09414481324

सोमवार, 21 मई 2018

कुंडली का फलकथन कैसे करें

किसी भी इंसान के जीवन में क्या होगा, कब होगा या उसका जीवन कैसा बीतेगा इसका कथन व्यक्ति की जन्मकुंडली में होता है। जन्मकुंडली के फल-कथन के माध्यम से ज्योतिष मनुष्य के कर्म, 

गति और भाग्य के बारे में कई बातें बता सकते हैं। इसमें भाव तथा ग्रहों के विश्लेषण का बहुत महत्व होता है।जन्म कुंडली का विश्लेषण करने से पूर्व किसी भी कुशल ज्योतिषी को पहले कुंडली की कुछ बातो का अध्ययन करना चाहिए. जैसे ग्रह का पूरा अध्ययन, भावों का अध्ययन, दशा/अन्तर्दशा, गोचर आदि बातों को देखकर ही फलकथन कहना चाहिए. आज इस लेख के माध्यम से हम कुंडली का अध्ययन कैसे किया जाए सीखने का प्रयास करेगें.

जन्म कुंडली  में 

सबसे पहले यह देखें कि ग्रह किस भाव में स्थित है और किन भावों का स्वामी है.

ग्रह के कारकत्व क्या-क्या होते हैं.

ग्रहों का नैसर्गिक रुप से शुभ व अशुभ होना देखेगें.

ग्रह का बलाबल देखेगें.

ग्रह की महादशा व अन्तर्दशा देखेगें कि कब आ रही है.

जन्म कालीन ग्रह पर गोचर के ग्रहों का प्रभाव.

ग्रह पर अन्य किन ग्रहों की दृष्टियाँ प्रभाव डाल रही हैं.

ग्रह जिस राशि में स्थित है उस राशि स्वामी की जन्म कुण्डली में स्थिति देखेगें और उसका बल भी देखेगें.

ग्रह की जन्म कुंडली में स्थिति के बाद जन्म कुंडली के साथ अन्य कुछ और कुंडलियों का अवलोकन किया जाएगा, जो निम्न हैं.

जन्म कुंडली के साथ चंद्र कुंडली का अध्ययन किया जाना चाहिए.

भाव चलित कुंडली को देखें कि वहाँ ग्रहों की क्या स्थिति बन रही है.

जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों के बलों का आंकलन व योगों को नवांश कुंडली में देखा जाना चाहिए.

जिस भाव से संबंधित फल चाहिए होते हैं उससे संबंधित वर्ग कुंडलियों का अध्ययन किया जाना चाहिए. जैसे व्यवसाय के लिए दशमांश कुंडली और संतान प्राप्ति के लिए सप्ताँश कुंडली. ऎसे ही अन्य कुंडलियों का अध्ययन किया जाना चाहिए.

वर्ष कुंडली का अध्ययन करना चाहिए जिस वर्ष में घटना की संभावना बनती हो.

ग्रहों का गोचर जन्म से व चंद्र लग्न से करना चाहिए.

अंत में कुछ बातें जो कि महत्वपूर्ण हैं उन्हें एक कुशल ज्योतिषी अथवा कुंडली का विश्लेषण करने वाले को अवश्य ही अपने मन-मस्तिष्क में बिठाकर चलना चाहिए.

जन्म कुंडली में स्थित सभी ग्रहो की अंशात्मक युति देखनी चाहिए और भावों की अंशात्मक स्थित भी देखनी चाहिए कि क्या है. जैसे कि ग्रह का बल, दृष्टि बल, नक्षत्रों की स्थिति और वर्ष कुंडली में ताजिक दृष्टि आदि देखनी चाहिए.

जिस समय कुंडली विश्लेषण के लिए आती है उस समय की महादशा/अन्तर्दशा/प्रत्यन्तर दशा को अच्छी तरह से जांचा जाना चाहिए.

जिस समय कुंडली का अवलोकन किया जाए उस समय के गोचर के ग्रहों की स्थिति का आंकलन किया जाना चाहिए.

आइए अब भावों के विश्लेषण में महत्वपूर्ण तथ्यों की बात करें. जब भी किसी कुंडली को देखना हो तब उपरोक्त बातों के साथ भावों का भी अपना बहुत महत्व होता है. आइए उन्हें जाने कि वह कौन सी बाते हैं जो भावों के सन्दर्भ में उपयोगी मानी जाती है.

जिस भाव के फल चाहिए उसे देखें कि वह क्या दिखाता है.

उस भाव में कौन से ग्रह स्थित हैं.

भाव और उसमें बैठे ग्रह पर पड़ने वाली दृष्टियाँ देखें कि कौन सी है.

भाव के स्वामी की स्थिति लग्न से कौन से भाव में है अर्थात शुभ भाव में है या अशुभ भाव में है, इसे देखें.

जिस भाव की विवेचना करनी है उसका स्वामी कहाँ है, कौन सी राशि व भाव में गया है, यह देखें.

भाव स्वामी पर पड़ने वाली दृष्टियाँ देखें कि कौन सी शुभ तो कौन सी अशुभ है.

भाव स्वामी की युति अन्य किन ग्रहों से है, यह देखें और जिनसे युति है वह शुभ हैं या अशुभ हैं, इस पर भी ध्यान दें.

भाव तथा भाव स्वामी के कारकत्वों का निरीक्षण करें.

भाव का स्वामी किस राशि में है, उच्च में है, नीच में है या मित्र भाव में स्थित है, यह देखें.

भाव का स्वामी अस्त या गृह युद्ध में हारा हुआ तो नहीं है या अन्य किन्हीं कारणों से निर्बली अवस्था में तो स्थित नहीं है, इन सब बातों को देखें.

भाव, भावेश तथा भाव के कारक तीनों का अध्ययन भली - भाँति करना चाहिए. इससे संबंधित भाव के प्रभाव को समझने में सुविधा होती है.

उपरोक्त बातों के साथ हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि किसी भी कुंडली का सामान्य रुप से अध्ययन करने के लिए लग्न, लग्नेश, राशिश, इन पर पड़ने वाली दृष्टियाँ और अन्य ग्रहो के साथ होने वाली युतियों पर ध्यान देना चाहिए. इसके बाद नवम भाव व नवमेश को देखना चाहिए कि उसकी कुंडली में क्या स्थिति है क्योकि यही से व्यक्ति के भाग्य का निर्धारण होता है. लग्न के साथ चंद्रमा से भी नवम भाव व नवमेश का अध्ययन किया जाना चाहिए. इससे कुंडली के बल का पता चलता है कि कितनी बली है. जन्म कुंडली में बनने वाले योगो का बल नवाँश कुंडली में भी देखा जाना चाहिए. नवाँश कुंडली के लग्न तथा लग्नेश का बल भी आंकना जरुरी है.ओर जो चल रहा है वह केवल दशा और अन्तर्दशाओं का परिणाम है। इसके ज्ञान के लिए आपको लग्न के ज्ञान की आवश्यकता है, इसके अतिरिक्त आप जीवन मे चल रही घटना के लिए दशानाथ और अन्तर्दशानाथ को उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। पाराशर ऋषि ने कभी भी प्रत्यंतर को लेकर विशिष्ट व्याख्याएं नहीं दी हैं। वे प्रत्यन्तरनाथ को घटना के समय-काल का निर्धारण करने वाला मानते हैं। 

मैंने बहुत सारे ज्योतिषियों को घटना के कारण जन्मपत्रिका मेें ढूंढते हुए देखा है जबकि आने वाली घटना की सूचना महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ ही दे देते हैं,  षड्बल एवं षोड्शवर्ग घटना की तीव्रता का ज्ञान करने के उपकरण मात्र हैं, घटना अवश्य घटेगी। यह आप पर निर्भर है कि आप घटना के घटित होने से पूर्व पापकर्मो के क्षय के लिए उपाय कर पाते हैं या नहीं। दूसरे शब्दों में घटना की तीव्रता को आप नियंत्रित कर सकते हैं।  आपको सबसे पहले लग्न का ज्ञान होना चाहिए और उसके बाद तत्कालीन अन्तर्दशा का। 

अन्तर्दशा का महत्व : अन्तर्दशानाथ, महादशानाथ से बलवान होते हैं और व्यक्ति के वर्तमान समय का आकलन अन्तर्दशानाथ के आधार पर ही किया जा सकता है। मान लीजिए, षष्ठेश की दशा चल रही है तो उस समय जीवन की मुख्य धुरी रोग, रिपु, ऋण हो जाएंगे भले ही जन्मपत्रिका में कितने ही शुभ या राजयोग हों। वर्तमान परिस्थित के सही आकलन के लिए एक अन्तर्दशा पीछे जाना बहुत जरूरी है। जिस प्रकार हम बीमार होते ही तुरंत डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं, उसी प्रकार परेशानी आते ही कोई ज्योतिषी के पास नहीं जाता है। कई बार ऎसा होता है कि वर्तमान अन्तर्दशा तो शुभ है परंतु उससे ठीक पहले की अन्तर्दशा कठिन थी। कठिन परिस्थितियों को झेलते हुए जब तक व्यक्ति ज्योतिषी के पास जाता है, अन्तर्दशा बदल चुकी होती है परंतु अच्छे परिणाम ने अभी आहट नहीं दी है। मान लीजिए वर्तमान में कठिन अन्तर्दशा चल रही है और परिणामों की तीव्रता बहुत अधिक है। उस अन्तर्दशा से ठीक पहले चतुर्थेश या भाग्येश की दशा थी। इन दशाओं में उसने जमीन या मकान खरीदा होगा। यदि उसके चतुर्थेश या चतुर्थ भाव पीडत हैं तो परिणामों की तीव्रता का कारण वास्तु दोष भी एक कारण हो सकता है। अत: अन्तर्दशा का पूरा अध्ययन परिणामों के पूर्ण विश्लेषण में बहुत अधिक सहायक हो सकता है।कारकत्व : अन्तर्दशानाथ से मुख्य विषय का ज्ञान करने के पश्चात् हमें जो ग्रह अन्तर्दशानाथ हैं उनका कारकत्व और वह जिस भाव में स्थित हैं, उस भाव के कारकत्व का विश्लेषण करना है। सदा ग्रह और भाव के कारकत्वों को समझे वर्गकुण्डलियों में तभी जाएं जब मूल जन्मपत्रिका की आत्मा को आप पहले समझ लीजिए। ग्रह एवं भावों के कारकत्वों के विस्तृत अध्ययन के लिए कालिदास रचित उत्तर कालामृत सर्वश्रेष्ठ है। अष्टमेश की दशा में हम मृत्यु, मृत्युतुल्य कष्ट, कठिनाइयों को ही ढूंढ़ते हैं। अनुसंधान का भाव भी अष्टम भाव ही है। महान अनुसंधान करने वाले कई महापुरूषों ने अपना सबसे गहन अध्ययन अष्टमेश की दशा में ही किया। ऎसी कुण्डलियों में प्राय: अष्टम का संबंध लग्न से रहता है। यश और अपमान हम दशम भाव से देखते हैं परंतु इसका संबंध चतुर्थ भाव से भी है। जनता द्वारा दिया जाना वाला यश चतुर्थ भाव से देखा जाता है। नेता, अभिनेता की कुण्डली में इसे जनता द्वारा दिए जाने वाले प्यार और सम्मान के रूप में देखा जा सकता है परंतु आम व्यक्ति के लिए इसे किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा उसके लिए बनाए गए  रूप में देखा जाना चाहिए। मान लीजिए किसी का कोई कोर्ट केस चल रहा है या कार्यस्थल पर कोई झग़डा है, जिसका निपटारा होना है। ऎसे में यदि चतुर्थेश की दशा है तो चतुर्थ भाव और चतुर्थेश की स्थिति के आधार पर निर्णय दिया जा सकता है। यदि चतुर्थेश बलवान है और चतुर्थ भाव पर शुभ प्रभाव है तो उस दशा में व्यक्ति के खिलाफ केस नहीं बनेगा और चीजें उसके पक्ष में होंगी। यदि ग्रहों के कारकत्व की बात करें तो केतु की दशा में अचानकता बनी रहती है। साथ ही मानसिक बेचैनी भी रहती है। भले ही केतु शुभ हों और अच्छे परिणाम भी दें परंतु अपने नैसर्गिक कारकत्व से जु़डे परिणाम भी देंगे। ग्रहों के कारकत्व का गहराई से अध्ययन भविष्यकथन में सटीक परिणाम देने में सहायक होता है।योगकारक-अयोगकारक का निर्णय : सही परिणाम तक पहुंचने के लिए आवश्यक है कि यह निर्णय लिया जाए कि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ योगकारक हैं या अयोगकारक। प्रत्यन्तर, सूक्ष्म और प्राण दशा से परिणाम लेते समय भी यह सुनिश्चित करना आवश्यक होता है। योगकारक-अयोगकारक का निर्णय करने का सूत्र बहुत ही विस्तृत रूप से लघुपाराशरी में समझाया गया है। लघु पाराशरी में इस विषय में कुछ महत्वपूर्ण सूत्र दिए गए हैं : 

1. त्रिकोणेश सदा शुभ होगा भले ही वह नैसर्गिक रूप से अशुभ ग्रह हो। 

2. केन्द्र में प़डने वाली राशि सम होती है भले ही वह नैसर्गिक रूप से शुभ हो या अशुभ। 

3. द्वितीयेश व द्वादशेश की दूसरी राशि जिस स्थान में प़डती है, उसी स्थान के अनुसार अपना शुभ व अशुभ फल देंगे। 

इन नियमों को उदाहरण से समझते हैं। कर्क लग्न के लिए पंचमेश हैं मंगल, अत: मंगल अति शुभ होंगेे, भले ही वे नैसर्गिक रूप से अशुभ ग्रह हैं। मंगल की दूसरी राशि मेष दशम भाव में आ रही है। नियमानुसार केन्द्र में प़डने वाली राशि सम हो जाएगी अत: दोनों राशियों के आधार पर मंगल की स्थिति इस प्रकार होगी :

अतिशुभ + सम = अति शुभ (त्रिकोणेश (केन्द्रेश होने अथवा होने के कारण) के कारण) योगकारक कर्क लग्न में ही दूसरे त्रिकोणेश बृहस्पति की दूसरी राशि छठे भाव में है अत: त्रिकोणेश होने से शुभ परंतु छठे भाव के स्वामी होने के कारण अशुभ। यहां एक तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है बृहस्पति नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह हैं अत: स्थिति इस प्रकार होगी :

अतिशुभ + अशुभ (नैसर्गिक शुभ) = सामान्य शुभ (त्रिकोणेश होने के कारण) कन्या लग्न में शनि पंचमेश होने के कारण शुभ हैं परंतु षष्ठेश होने के कारण अशुभ और साथ ही नैसर्गिक अशुभ होने के कारण स्थिति इस प्रकार होगी :

अतिशुभ + अशुभ + नैसर्गिक अशुभ = अशुभ इस प्रकार हर लग्न के लिए योगकारक-अयोगकारक का निर्णय करने से फलकथन में सहायता मिलती है। इन नियमों में कुछ अपवाद भी हैं जिन्हें ध्यान में रखना अति आवश्यक है। "भावार्थ रत्नाकर" नामक पुस्तक इस विषयां में बहुत अच्छी जानकारी देती है। 

 ऎसे बहुत से महत्वपूर्ण नियम भावार्थ रत्नाकर में उद्धत हैं।

महादशानाथ और अन्र्तदशानाथ में संबंध : इस अत्यंत महत्वपूर्ण विवेचन के लिए एक बार पुन: लघुपाराशरी की शरण में जाना होगा। लघुपाराशरी के अनुसार किसी भी दशा में पूर्णफल तभी मिलेंगे जब महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ समानधर्मी और संबंधी हों।

फल से तात्पर्य शुभ और अशुभ दोनों हैं। महत्वपूर्ण नियम यह है कि किसी भी ग्रह की महादशा में पहली अन्तर्दशा उसी ग्रह की होगी परंतु पूर्णफल देने में सक्षम नहीं होगी फिर भले ही वह योगकारक हो, अयोगकारक या मारक। फलकथन में इन बारीकियों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। मान लीजिए, किसी कुण्डली में शुक्र योगकारक हैं और उनकी महादशा शुरू होने वाली है। शुक्र महादशा में पहली अन्तर्दशा शुक्र की ही होगी और लगभग तीन वर्ष की होगी। ऎसी स्थिति में इस अवधि में बहुत अच्छे परिणाम कहना, कथन को गलत सिद्ध कर सकता है।

समानधर्मी से तात्पर्य है स्वाभाविक फल समान होना अर्थात् महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ दोनों ही योगकारक हों, अयोगकारक हों या मारक हों। यदि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ सहधर्मी होने के साथ-साथ संबंधी भी हुए तो दशा का पूरा फल प्राप्त होगा। संबंधी से तात्पर्य है किसी भी प्रकार का चतुर्विध संबंध। यदि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ सहधर्मी और संबंधी दोनों हुए तो श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त होंगे। परिणाम अच्छे या बुरे दोनों हो सकते हैं। वृहत पाराशर होरा शास्त्र में सभी ग्रहों की महादशा में सभी अन्तर्दशाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस विवरण से न सिर्फ कुछ विशेष परिणाम का ज्ञान होता है बल्कि बहुत से अचूक उपायों का भी ज्ञान होता है। स्पष्ट है कि शुभ महादशा में योगकारक अन्तर्दशाएं अति शुभ परिणाम देंगी और अयोगकारक एवं मारक दशाएं अपने पूरे परिणाम नहीं दे पाएंगी इसलिए शुभ महादशा का समय अच्छा बीतेगा।

अन्तर्दशानाथ की स्थिति का विवेचन : दशा में आने वाले परिणाम दशानाथ की स्थिति पर आधारित होंगे। दशानाथ उच्चा, नीच, मित्र, शत्रु आदि जिस भी राशि में हैं परिणाम की विवेचना उसी आधार पर की जाती है। दशानाथ का षड्बल बहुत महत्वपूर्ण संकेत देता है। षड्बल में विभिन्न मापदण्डों पर ग्रह का बल तौला जाता है। यदि दशानाथ का षड्बल औसत से अच्छा है अर्थात् 1 रूपाबल या उससे अधिक तो दशानाथ फल देने में सक्षम हैं। पुन: स्पष्ट करना आवश्यक है कि फल शुभ या अशुभ दोनों हो सकते हैं। यदि दशानाथ का ष्ड्बल कम है तो वह पूर्ण परिणाम देने में सक्षम नहीं है। मान लीजिए, दशानाथ भाग्येश हैं परंतु षड्बल कम है तो शुभ परिणाम कहीं ना कहीं कम हो जाएंगे। षड्बल से विवेचना करते समय ग्रह का नैसर्गिक कारकत्व भी अवश्य देखना चाहिए। जिसकी कुण्डली में शुक्र का षड्बल अच्छा होता है, उसे सौन्दर्य की परख बहुत अच्छी होती है। अगर उस कुण्डली के लिए शुक्र षष्ठेश हैं तो शुक्र षष्ठेश के ही परिणाम देंगे परंतु उनका यह नैसर्गिक गुण भी अवश्य विद्यमान होगा। ग्रहों के नैसर्गिक गुणों एवं कारकत्वों को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। लघुपाराशरी के एक अन्य नियम की चर्चा यहां करना आवश्यक है। लघुपाराशरी के अनुसार एक ही ग्रह कारक और मारक दोनों हो सकता है। दूसरे भाव का स्वामी या दूसरे भाव में बैठा ग्रह धनदायक है तो मारक भी है। जब दशा में योगकारक ग्रह का साथ मिलेगा तो वह ग्रह धन प्रदान करेगा और जब मारक ग्रह का साथ मिलेगा तो वह मारक फल प्रदान करेगा। परन्तु काल परिस्थिति वाली वात भी यहां घ्यान में रखे 

षोड्श वर्ग : वैदिक ज्योतिष का सबसे महत्वपूर्ण अंग है षोड्श वर्ग। दशानाथ की पूर्ण शक्ति समझने के लिए नवांश कुण्डली में उसकी स्थिति जरूर देखी जानी चाहिए। यदि ग्रह जन्मकुण्डली में मजबूत है परंतु नवांश कुण्डली में कमजोर है तो उसे कमजोर माना जाना चाहिए परंतु जन्मकुण्डली में नीच का ग्रह यदि नवांश कुण्डली में उच्चा का है तो वह फल देने में सक्षम है। नवांश कुण्डली के पश्चात् उस षोड्श वर्ग कुण्डली का अध्ययन करना चाहिए जिससे संबंधित भाव की दशा चल रही है। षोड्श वर्ग के अध्ययन को लेकर अभी भी बहुत असमंजस है। जो जन्मकुण्डली में नहीं है उसे षोड्श वर्ग में ना ढूंढे।  चाहे पाप ग्रह उच्चा का हो और चाहे शुभ ग्रह नीच का, कभी भी अपने मूल संस्कार नहीं भूलते। फलकथन के प्रतिशत में अंतर आ सकता है परंतु पापग्रह पाप फल देने से नहीं चूकते और शुभ ग्रह शुभ फल देने से नहीं चूकते। मान लीजिए, जन्मपत्रिका का पंचम भाव पीडत है और संतान प्राप्त में दिक्कतें आ रही हैं तो जन्मपत्रिका के पंचमेश की स्थिति सप्तमांश कुण्डली में देखें।

यदि सप्तमांश कुण्डली में वह ग्रह सुदृढ़ स्थिति प्राप्त कर रहा है या शुभ ग्रहों से दृष्ट है तो इसका तात्पर्य है कि संतान प्राप्त की संभावनाएं हैं। संतान कब होगी इसके लिए पुन: जन्मपत्रिका का सहारा ही लेना होगा। इस तरह फलकथन की तकनीक को सरल रखने का प्रयास करना चाहिए। जब कोई ग्रह कई षोड्श वर्गो में उच्च या स्वराशि का हो तो वह ग्रह अति विशेष परिणाम देने में सक्षम हो जाता है। अत: जिस ग्रह की दशा चल रही है उसे षोड्श वर्ग सारिणी में देखें। यदि ग्रह 6 से अधिक वर्गो में उच्च या स्वराशि होता है तो फलकथन में इस तथ्य को भी शामिल करना चाहिए। गोचर : दशा जिस घटना का संकेत देती है, गोचर से उसकी पुष्टि की जा सकती है। साथ ही घटना की तीव्रता का आकलन भी गोचर के माध्यम से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए जब सप्तमेश की दशा चल रही हो उसी समय गोचरवश सप्तम भाव पर बृहस्पति और शनि का प्रभाव विवाह की संभावनाओं को प्रबल कर देता है। जिस समय मारकेश की दशा चल रही है उस समय लग्न पर बृहस्पति की अमृत दृष्टि जीवन रक्षा का संकेत देती है। यह अत्यंत आवश्यक है कि सिर्फ गोेचर के आधार पर परिणाम लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए। इससे गलती की संभावना बढ़ सकती है।विशेष नियमों का ज्ञान : कुछ विशेष नियमों का ज्ञान फल की सटीकता को कई गुणा बढ़ा सकता है। कालिदास जी की उत्तर कालामृत में ऎसे ही कुछ विशेष नियमों का उल्लेख है। उदाहरण के लिए शनि में शुक्र और शुक्र में शनि की दशा का विशेष नियम दिया है लेख काफी लंबा हो गया वाकी फिर आगे आचार्य राजेशआप अपनी कुंडली दिखाकर अपनी समस्या का समाधान चाहते हैं या कुंडली वनवाना चाहते हैं या वर्षफल वनवाना चाहते हैं या उच्च quality के रतन लैवटैस्ट मंगवाना चाहते हैं तो हम से हमारे फोन नम्वरो पर वात कर सकते हैं 07597718725-09414481324आप नोटअसली प्रामाणिक और रत्न प्रयोगशालाओं द्वारा प्रमाणित रत्न (सर्टिफिकेट सहित)सही ्wolesale कीमत खरीदने के लिए भी संपर्क कर सकते हैंहमारा रत्नों का wolesale का कारोबार है

रविवार, 20 मई 2018

: क्यो जरूरी है ज्योतिष की जानकारी ?

: क्योजरूरी है ज्योतिष की जानकारी ?

कहते हैं कि जानकारी ही बचाव है। हम बहुत-सा ऐसा ज्ञान प्राप्त भी करते रहते हैं जिसकी जीवन में कोई उपयोगिता नहीं रहती है। व्यर्थ ही समय और पैसा कई अन्य बातों में खर्च करते रहते हैं। हम ऐसी भी बातें सुनते या देखते रहते हैं जिससे हमारे जीवन में नकारात्मकता का विकास होता है। किताबी और प्रायोगिक ज्ञान को आप थ्योरी और प्रैक्टिकल नॉलेज समझे। जीवन में दोनों ही तरह का ज्ञान जरूरी है। किसी भी विषय या क्षेत्र में कार्य करने से पहले उसकी जानकारी हासिल करना जरूरी है, फिर उसके व्यावहारिक या प्रोयोगिक पक्ष को समझना भी जरूरी है। यदि आप ‍जीवन में कोई-सा भी कार्य करने जा रहे हैं ‍तो पहले उसकी अच्छे से जानकारी एकत्रित कर लें। आप अपने ‍जीवन को सुंदर और सुखद बनाना चाहते हैं तो यह समझना जरूरी है कि हमारे लिए कौन-सा ज्ञान महत्वपूर्ण है और कौन-सा व्यर्थ। हालांकि बहुत से लोगों को यह जानकारी होगी ही। यदि है तो अपनी इस जानकारी को अपडेट करते रहें।ज्योतिष सीखना और ज्योतिष से काम करना कोई बुरी बात नही है.लेकिन ज्योतिष पर अंधविश्वास करके चलना और खुद के द्वारा अनुमान नही लगापाना बुरी बात है

.कोई भी कारण एक साथ नही बनता है,कारण समय से शुरु हो जाता है और समय आने पर कारण अपनी भूमिका अदा कर जाता है,जब कारण अपनी भूमिका अच्छे या बुरे प्रभाव मे अदा कर गया उसके बाद कारण को या कारक को या कारकत्व को दोष देना बेकार की बात ही मानी जायेगी। जन्म समय के ग्रह और गोचर के ग्रह आपसी सम्बन्ध से कारण पैदा करते है जो भी कारण पैदा होता है वह ग्रह राशि और भाव के अनुसार होता है,भाव हमारे अन्दर ही प्रकट होते है राशि का सीधा सा सिद्धान्त है कि वह एक क्षेत्र जिसके बारे मे भाव पैदा होगा उस भाव का फ़ल ग्रह के अनुसार मिलना जरूरी है। अच्छे भाव से अच्छे क्षेत्र से अगर ग्रह कारक को बल देगा तो कारकत्व अच्छा होगा और कार्य फ़ल की प्राप्ति भी अच्छी होगी लेकिन वही ग्रह बुरे भाव से बुरे क्षेत्र से बुरा फ़ल दे रहा होगा तो कारकत्व भी खराब होगा और फ़ल भी खराब मिलेगा।घटना का सही आकलन करना

घटना का सही आकलन करने के लिये ग्रह की चाल देखी जाती है कब ग्रह किस भाव से और राशि से घटना के लिये सामने आ रहा है उस समय जिस कारक के साथ घटना घटनी है उस कारक के पास कोई बल है कि नही अगर बल है तो ग्रह अपनी शक्ति से प्रभाव तो देगा लेकिन बल उसे कम या अधिक कर देगा। बुखार आने के लिये कारण पहले से शुरु हो जायेगा,इन्फ़ेक्सन भाव है और क्षेत्र उस भाव से जुडा हुआ है,जब इन्फ़ेक्सन वाला कारण बनेगा तो अन्दाज पहले से ही होने लगेगा,कही ऐसे क्षेत्र मे जाना पडेगा जहां इन्फ़ेक्सन वाले कारण मौजूद है,उस क्षेत्र मे जाकर उन्ही कारको को प्रयोग मे लाना पडेगा जिससे इन्फ़ेक्सन फ़ैले और जैसे ही इन्फ़ेक्सन शरीर मे घुसा बुखार का आना शुरु हो गया। अगर शरीर के अन्दर इन्फ़ेक्सन को रोकने के लिये जरूरी तत्व मौजूद है तो वह बुखार के कारको को समाप्त कर देंगे थोडा बहुत असर जरूर होगा लेकिन बुखार से बच जायेंगे। इतनी सी बात को समझने के लिये जन्म कुंडली में रोग के कारक ग्रह को देखेंगे,वह खून के कारक ग्रह मंगल के साथ कब मिल रहा है,अगर उस क्षेत्र मे राहु जो इन्फ़ेक्सन का कारक है अगर रोग के कारक ग्रह को बल दे रहा है तो खून का कारक ग्रह मंगल इन्फ़ेक्टेड होगा और रोग के होने के आसार समझ मे आजायेंगे,लेकिन उसी जगह पर अगर जीवन रक्षक ग्रह या सहायता देने वाले ग्रहों में गुरु या बुध या लगन पंचम नवम भाव का ग्रह मजबूती से अपनी सहायता दे रहा है वह किसी प्रकार के अन्य बन्धन मे नही है तो बुखार के कारण शरीर मे खून के अन्दर प्रवेश करेंगे उसी समय वह ग्रह का बल उन इन्फ़ेक्सन को समाप्त करने के लिये अपनी युति प्रदान करने लगेंगे,अगर कोई जीवन रक्षक ग्रह मंगल को बल दे रहा है तो बुखार के आते ही मंगल जो खून का कारक है वह डाक्टर के रूप मे उसी राहु को जो इन्फ़ेक्सन का कारक भी है और सही बल मिलने से दवाई का रूप भी ले लेगा तो समय पर सहायता मिल जायेगी और रोग से बचाव हो जायेगा। अगर नवम पंचम या लगन का ग्रह मजबूत नही है और रोग का कारक ग्रह अपने बल को कम भी नही कर सकता है और हमे पता है कि रोग का कारक ग्रह जरूर असर करेगा तो हम अपने अनुसार लगन पंचम या नवम के लिये बल देने वाले प्रयोग करना शुरु कर देंगे,यह बल भौतिक रूप मे इनके मालिको के लिये रत्नो का प्रयोग अथवा ग्रह से सम्बन्धित खाद्य पदार्थ के रूप मे अथवा वनस्पति के रूप मे होगी अथवा शरीर की सबसे बडी शक्ति ह्रदय जिव्हा और तालू के साथ होंठ तथा गले के एक विशेष बल के साथ प्रयोग करने पर मंत्र शक्ति का प्रयोग लेने लगेंगे,और इन ग्रहों का असर बढने लगेगा और कारक जो है वह अपना बुरा असर प्रदान नही कर पायेगा हम बच जायेंगे।पहले मानसिक गति बनती है

एक व्यक्ति का मन व्यथित है कि वह किसी भी काम मे सफ़ल नही हो पा रहा है वह जिस भी काम मे हाथ डालता है वह काम बेकार हो जाता है,उसकी रोजाना की जिन्दगी एक प्रकार से अस्त व्यस्त सी है और कभी कभी उसके मन मे आता है कि आत्म हत्या कर लेनी चाहिये। मन महिने में हर व्यक्ति का तीस घंटे के लिये व्यथित होता है वह अगर जाग्रत अवस्था मे है तो वह कारक के रूप मे और नींद की अवस्था मे है तो स्वप्न के रूप में व्यथा जरूर देता है। यह चन्द्रमा के द्वारा होता है चन्द्रमा जन्म के राहु के साथ गोचर के राहु के साथ और राहु जन्म के चन्द्रमा के साथ और गोचर के चन्द्रमा के जब जब अपनी युति को प्रदान करेगा तो मन मे व्यथा प्राप्त होगी,लेकिन गोचर का समय चन्द्रमा के लिये सवा दो घंटे में सत्रह मिनट के लिये ही होगा जबकि जन्म के चन्द्रमा के साथ राहु का गोचर पूरे चौवन महिने के लिये अपना असर देगा और इस साढे चार साल के अन्तराल मे जातक लगातार मानसिक व्यथा से जूझता रहेगा,इस व्यथा मे वह जो भी काम करेगा उसके लिये एक रास्ता नही दे पायेंगे हर काम मे दस अडचने उसके अपने मन के अनुसार मिलनी शुरु हो जायेंगी वह अपने विश्वास को अटल नही कर पायेगा। इस प्रकार से अगर एक साधारण व्यक्ति को कहा जाये कि वह ध्यान समाधि से अपने मन के ऊपर काबू रखे तो बेकार की बात है जब किसी काम खराब हो रहा हो तो वह काम की उलझन घर और बाहर की आफ़ते और खुद के जीवन मे अनियमिता के कारण कुछ भी करने मे असमर्थ सा हो जायेगा। इस समय मे देखा जाता है कि लोग अपने को चिन्ताओ के कारण नशे आदि मे ले जाते है,कुछ लोग अपने को भूल ही जाते है कि उनके पास कौन सी शक्ति है जो उन्हे उनके कारणो से बचा सकती है,शरीर मे कैमिकल बढने लगते है तरह तरह की बीमारी जैसे डायबटीज मोटापा झल्लाहट आदि जैसे कारण पैदा हो जाते है। इस मानसिक गति को सम्भालने के लिये अगर राहु का रूप तकनीकी रूप से मंगल के साथ जोड दिया जाये तो वह बडे प्रेम से दिये जाने वाले गलत प्रभाव को अच्छे प्रभाव मे बदलना शुरु कर देगा। मंगल के चार स्थान ही माने जाते है पहला धर्म स्थान मे दूसरा पुलिस थाने मे तीसरा अस्पताल मे और चौथा मानसिक बल में,इसके लिये जातक धर्म स्थान मे जाने लगे,उसके ऊपर जो आफ़ते आ रही है उनके लिये पुलिस की सहायता ले,अन्यथा अस्पताल मे जाकर मानसिक इलाज करवाये और भोजन मे बदलाव करे और मानसिक बल को बढाये,दो बाते हर आदमी आराम से कर सकता है,धर्म स्थान पर जाना और मानसिक बल को बढाकर समस्या का समाधान करना,धर्म स्थान मे जाना भी और धर्म से सम्बन्धित जानकारी अधिक लगाव करना केवल उन्ही बातो के लिये जरूरी है जो जितने समय धर्म स्थान मे रहे उतने समय के लिये मन धर्म मय हो जाता है,और जब मन के अन्दर रीफ़्रेस जैसी बाते पैदा हो जाती है तो मन के अन्दर बल बढना शुरु हो जाता है तरीके सामने आने लगते है और काम बनने लगते है,उसी तरह से मन की मजबूती के लिये या तो राहु के जाप करना,कारण राहु जो भी दिक्कत देता है वह भ्रम के कारण देता है जातक भ्रम के अन्दर फ़ंस जाता है कि वह अगर इस काम को करता है तो वह नही बना तो मेहनत और धन दोनो बरबाद हो जायेंगे या जो भी रिस्ता किया जा रहा है उसके अन्दर तो यह कमी है अथवा जो भी कारण मन के अन्दर लाया जा रहा है वह कारण असत्य है या अमुक ने ऐसा किया था तो ऐसा हुआ था अमुक ने ऐसा नही किया तो ऐसा नही हुआ था,अथवा अमुक ने अमुक तरह का कार्य किया था तो ऐसा हुआ था और अमुक ने अमुक के साथ ऐसा नही किया था तो ऐसा नही हुआ था। इस प्रकार के कारणो से लोगो की आस्था एक विशेष स्थान विशेष व्यक्ति की तरफ़ चली जाती है और इसके फ़ल मे यह प्राप्त होता है कि जब अमुक के साथ अमुक समस्या थी तो उस समय मे और उसके सामने के समय मे बहुत अन्तर है,अमुक का व्यवहार और सामने वाला व्यवहार भी अलग है,इस प्रकार से या तो जो भी बात सामने लाई जा रही है वह असत्य हो जायेगी या और अधिक अन्धकार मे जाना हो जायेगा। जब देखे कि भ्रम बहुत अधिक बढ गये है और किसी प्रकार से भ्रम दूर नही हो रहे है तो आराम से जब भ्रम अधिक परेशान करते है वह समय शाम का होता है,सूर्यास्त के बाद और रात के पहले प्रहर में कारण सूर्यास्त के बाद शरीर आराम की मुद्रा मे होता है और रात के पहले प्रहर के बाद सोने का समय शुरु होता है उस समय मे अगर राहु के मन्त्र का जाप शुरु कर दिया जाये और एक काल की अवधि मे होंठ जीभ तालू गले को मंत्र के अनुसार हिलाया जाये तो शरीर मे प्रवाहित रक्त के अन्दर के विषैले तत्व फ़िल्टर होने लगते है इस कारण से सिर के पीछे स्थापित मेडुला आबलम्ब गेटा के अन्दर विचित्र तरह की शक्ति का अर्जन होने लगता है शरीर एक प्रकार से उत्साह मे आजाता है। अगर खुद नही किया जा सके तो किसी विद्वान की संगति का लाभ लिया जाये वह लाभ केवल संकल्प लिया जा सकता है,कारण जो मानसिक व्यथा संकल्प के समय मे होती है वह व्यथा संकल्प के साथ उस विद्वान के पास जाती है अगर वह विद्वान अपनी गति से ह्र्दय के अन्दर सहानुभूति या दया के रूप मे मंत्र का जाप करता है या करवाता है तो आराम मिलने मे कोई सन्देह नही होता है। जब मंत्र का जाप करवाया जाता है या किया जाता है तो शरीर मे तनाव की मात्रा कम होती है और सबसे पहला फ़ल नींद के रूप मे मिलता है,जैसे ही नींद पूरी होने लगती है शरीर से चिन्ताओ का कारण समाप्त होने लगता है और कार्य सफ़ल होने लगते है,यही कारण डाक्टरो ने अपने अनुसार मानसिक इलाज के लिये अपनाया है किसी भी डाक्टर के पास चले जाइये वह सबसे पहले नींद की दवा को देता है,नींद की दवा के साथ मानसिक बल बढाने के लिये भूख को खोलने के लिये दवा देता है,लेकिन यह कारण सामयिक तो बनता है जैसे ही शरीर से उस दवा के अनुसार साल्ट कम होते है फ़िर से वही कारण पैदा होने लगते है या तो उन्ही साल्ट्स के लिये आदी होना पडता है या फ़िर उन साल्ट को कम करने के लिये दूसरे साल्ट्स को प्रयोग मे लाना पडता है।

मानसिक व्यथा के शुरु होने से पहले ही यानी अठारह महिने पहले ही कारण बनने लगते है,अगर ज्योतिष की जानकारी है या ज्योतिषी से सामयिक परामर्श लिया जाता है तो कारण बनते ही उनका इलाज शुरु हो जाता है और समस्या के आने से पहले ही इलाज अगर हो जाता है तो समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाती है,जैसे किसी से कहासुनी हो गयी और पता है कि सामने वाला किसी भी तरह से बदला ले सकता है या कहासुनी के बदले शरीर को हानि दे सकता है समय भी विपरीत है तो पहले से ही या तो सामने वाले से क्षमा याचना करना सही होता है फ़िर भी नही मानता है तो कानूनी सहायता के लिये या अदालती मामले के लिये पहले से ही अगर जान माल की सुरक्षा की गुहार की गयी है,या किसी केश मे फ़ंसने से पहले ही अग्रिम जमानत की कार्यवाही कर ली गयी है तो बचाव हो सकता है।

ज्योतिष भी राहु है

कहा जाता है कि लोहा हमेशा लोहे को काटता है उसी प्रकार से जो भी कारण जीवन मे पैदा होते है वह राहु के द्वारा ही पैदा होते है,राहु अगर तकनीकी पहलू मंगल की सहायता से दे दिया जाता है वह भी केन्द्र त्रिकोण मे तो राहु मंगल बजाय खराब असर देने के और अधिक बढोत्तरी देने लग जायेंगे और त्रिक भाव या पणफ़र भाव में राहु मंगल की युति को ले लिया गया तो समस्या बजाय घटने के और भी बढने लगेगी। राहु की सीमा नही है कितना कष्ट दे सकता है या कितनी ऊंचाई पर ले जा सकता है,जैसे हाथी का भरोसा नही है कि वह कब बल पूर्वक अच्छे काम करता है और कब बिगडने पर गली की गली साफ़ करने के लिये अपनी शक्ति को प्रयोग मे ला सकता है। राहु शुक्र की युति मिलने का समय आता है व्यक्ति के अन्दर प्रेम रोग का भूत सवार हो जाता है उसे अपनी दुनिया समझ मे ही नही आती है,अगर उसी युति को मंगल की सहायता से मिला लिया जाये तो वह भूत बजाय बिगाडने के ऊंची ऊंची पोजीसन भी दिलवा सकता है जितना है उससे करोडों गुना बढा भी सकता है। राहु गुरु की युति आती है आम आदमी भी अपने को शहंशाह समझने लगता है उसे लगता है कि उसके सामने उसकी बुद्धि के जैसा कोई नही है वह तर्क वितर्क से अपने प्रभाव देना शुरु कर देता है उसे एक गंदगी मे भी सोना नजर आने लगता है वह धर्म और शिक्षा के अलावा रिस्ते आदि मे अपनी सीमा को तादात से अधिक बढाने लगता है अगर साथ मे मंगल को लिया गया है तो वह इन्ही कारणो मे तकनीकी कारण देखने के बाद उस क्षेत्र मे अपने को नाम और यश के रास्ते ले जायेगा और मंगल की युति नही ली है या केवल शुक्र का सहारा लिया है तो धन और वैभव मे तो आगे बढ जायेगा सुरा सुन्दरी की प्राप्ति तो हो जायेगी लेकिन जैसे ही राहु गुरु का असर समाप्त हुआ उसके अपने ही लोग उसे ले डूबेंगे।

ज्योतिष समय की जानकारी देती है

सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त और सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय तक जो भी देश काल और परिस्थिति के अनुसार प्रभाव होते है ज्योतिष जानकारी देती है।कार्य और शरीर की समय सीमा के लिये ज्योतिष लाभदायी है। एक ग्रह के तीन सौ साठ कारण और एक भाव के तीस कारण एक राशि के एक सौ पचास कारण यह सब अगर देश काल और परिस्थिति से समझ मे आजाते है तो व्यक्ति दुख मे भी सुख का कारण निकाल सकता है और सुख मे भी दुख पैदा कर सकता है,बाकी के लिये एक ही बात कही जा सकती है-"खाना पीना सोना दुनिया मे तीन तत्व,एक दिन मर जाओगे धरि छाती पर हत्थ"।

सोमवार, 14 मई 2018

जुड़वां बच्चों का भविष्य

कल कुछ मित्र जुड़वां बच्चों के वारे जानकारी चाहतेथे कि एक ही मां की कोख से कुछ मिनट के अंतराल में जन्मे जुड़वां बच्चों के रंग, स्वभाव और भविष्य में कैसे अंतर आ जाता है?‌जुड़वां बच्चे जन्म लेते है  

          तो जन्म समय में सिर्फ ५ या १० मिनट का अंतर होता है यदि कुंडली देखी जाये तो दोनों के जन्म नक्षत्र, राशि, लग्न यहाँ तक कि पूरी कि पूरी कुंडली एक जैसी हुबहू होती है सिर्फ विंशोत्तरी दशा काल में कुछ अंतर रहता है  कृष्णमूर्ति जी ने यह विचार किया कि जब दोनों जुड़वाँ जन्म लेने वाले जातको की कुंडलिया एक सी है फलादेश भी एक ही है जब कि वास्तविकता कुछ और ही होती है दोने के रूप रंग , स्वाभाव, व्यव्हार, शिक्षा, विवाह, नौकरी आदि में असमानताए रहती है उन्होंने गहन अध्यन किया दिन रात ज्योतिष अनुसन्धान से उन्होंने आखिरकर ये खोज लिया कि जुड़वाँ जन्म लेने वाले बच्चो में ये असमानताए क्यों होती है !यदि दो जुड़वां बच्चों का जन्म समय एक ही मान लिया जाये तो क्या एक ही कुण्डली को दो बार देखने से अलग – अलग विश्लेषण या परिणाम प्राप्त होगा | यह धारणा बिलकुल गलत है की जुड़वाँ बच्चों का जन्म समय समान होता है |‌इसके अनुसार किसी भाव का फल भावेश अर्थात उसका स्वामी न करके, वह ग्रह जिस नक्षत्र में स्थित हैं, उसका उपनक्षत्र स्वामी करेगा अर्थात् उस भाव का फल उपनक्षत्रेश के आधार पर होगा। जैसे-किसी की जन्मपत्री में तुला लग्न में दशमेश चंद्र, उच्च या स्वगृही है तो उसे किसी कंपनी/सरकारी नौकरी में उच्च पद पर या प्रतिष्ठित व्यवसाय में होना चाहिए। परंतु वास्तव में वह व्यक्ति फुटपाथ पर मजदूरी कर रहा था, तब ऐसे में उसकी जन्मपत्री का अध्ययन किया तो यह पाया कि उसका उपनक्षत्र स्वामी, जन्मपत्री में नीच राशि में स्थित था, अत: उसे वास्तव में निम्न स्तर का रोजगार मिला। ठीक इस प्रकार जुड़वा बच्चों या समकक्ष में के.पी. ने उपनक्षत्र स्वामी का निर्माण राशियों को 4-4 मिनट में बांटकर सारणी तैयार कर किया तथा जुड़वा बच्चों के फल कथन में इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया तो बिल्कुल सटीक पाया गया। क्योंकि जुडवां बच्चों में 2-3 मिनट का ही अंतर रहता है या एक ही स्थान, समय में भी 2-3 मिनट का ही अंतर पाया जाता है। अत: के.पी. की उपनक्षत्रेश पद्धति इनपर बिल्कुल सही साबित हुई। गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार विश्व में जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय की अवधि में सबसे कम समय का अंतर एक मिनट का दर्ज हुआ है जो कि केसेंड्रा फ्लोरेस नामक अमरीकी महिला ने सेंट जोसफ हॉस्पिटल केलिफोर्निया में 9 जुलाई 2013 को 13:39 व् 13:40 बजे जुड़वाँ बच्चों को जन्म देने पर हुआ है | इसी प्रकार एक पंद्रह वर्ष तक की गयी एक जर्मन शोध के अनुसार जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय में औसत अवधि का अंतर 13.5 मिनट का पाया गया है जिस से साबित होता है कि ज्योतिष दृष्टिकोण से भी जुड़वाँ बच्चों का भविष्य व् जीवन एक समान नही हो सकता क्योंकि उनका जन्म समय जो ज्योतिष का आधार है, कभी एक समान नही होता |

इन सभी कारणों से चाहे वह जीवविज्ञान से सम्बन्धित हों, प्रकृति की रचना, कर्म सिद्धांत, पूर्व जन्म का परिणाम, भाग्य, हस्तरेखा या ज्योतिष विषय हो, यह निश्चित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन और भविष्य कभी दूसरे व्यक्ति के समान नही हो सकता चाहे वह जुड़वाँ ही क्यों न हों |इसे ऐसा भी समझ सकतेहै हमारे चारों तरफ ऊर्जाओं के क्षेत्र है, एनर्जी फील्डसस है और वह पूरे समय हमें प्रभावित कर रहे है। जैसे ही बच्चा जन्म लेता है तो वह जगत के प्रति, जगत प्रभावों के प्रति फंस जाता है। जन्मै को वैज्ञानिक भाषा में हम कहें एक्स पोजर, जैसे कि फिल्म को हम ऐक्सपोज करते है। कैमरे में, जरा सा शटर आप दबाते है एक क्षण के लिए कैमरे की खिड़की खुलती है और बंद हो जाती है। उस क्षण में जो भी कैमरे के समक्ष आ जाता है। वह फिल्मी पर अंकित हो जाता है। फिल्म ऐक्सपोज हो गई। अब दुबारा उस पर कुछ अंकित न होगा—और अब यह फिल्मज उस आकार को सदा अपने भीतर लिए रहेगी। वहींकुछ क्षण के अन्तर से यह फिर से  हो तो वो होता फ्लर्ट आ जाऐगा

जिस दिन मां के पेट में पहली दफा गर्भाधान होता है तो पहला एक्सापोजर होता है। जिस दिन मां के पेट से बच्चाे बाहर आता है, जन्म लेता है, उस दिन दूसरा एक्सिपोजर होता है। और वह दोनों एक्पोिजर संवेदनशील चित पर फिल्म की भांति अंकित हो जाते है। पूरा जगत उस क्षण में बच्चा अपने भीतर अंकित कर लेता है। और उसकी एम्पेतथीज, समानुभूति निर्मित हो जाती है।हर क्षण अलग है

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रविवार, 6 मई 2018

विपरीत राजयोग से असाधारण धनलाभ

मित्रों यह पोस्ट उन मित्रों के लिए जो ज्जयोतिष सिख रहे हैं या ज्योतिषी है शुभ भावों के स्वामी बली होते है,तो धन मिलता है,यह तो सभी जानते है,लेकिन ऐसा भी देखा गया है,कि जो भाव कुन्डली में अनिष्ट का संकेत करते है,और अगर उनके स्वामी अगर किसी प्रकार से कमजोर है

   तो भी धन शुभ भावों के स्वामियों से अधिक मिलता है.कुन्डली के ६,८,और १२ भाव अनिष्ट भाव माने जाते है,इन तीनो को त्रिक भी कहा जाता है,इन किसी भी स्थान का स्वामी किसी त्रिक में या अनिष्ट ग्रह से देखा जाता है,तोबहुत ही निर्बल हो जाता है,इस कारण से विपरीत राजयोग की प्राप्ति हो जाती है,माना जाता है कि छथा भाव ऋण का है,और किसी पर लाखों रुपयों का ऋण है,और किसी आदमी द्वारा अक्समात उस ऋण को उतार दिया जाता है,तो उसको एक तो ऋण से छुटकारा मिला और दूसरे धन का लाभ भी हुआ,इसी प्रकार से आठवां स्थान गरीबी का माना जाता है,यदि किसी की गरीबी का अक्समात निवारण हो जाये तो वह भी विपरीत राजयोग की गिनती मे ही गिना जायेगा.इसी प्रकार से बारहवां भाव भी व्यय का है,और किसी का व्यय रुक कर अगर बैंक में जमा होना चालू हो जाये तो भी इसी विपरीत राजयोग की गिनती में गिना जायेगा.गणित का नियम सभी को पता होगा कि दो नकारात्मक एक सकारात्मक का निर्माण करते है,और दो सकारात्मक भी एक सकारात्मक का निर्माण करते है,लेकिन एक नकारात्मक और एक सकारात्मक मिलकर नकारात्मक का ही निर्माण करेंगे,इसी प्रकार का भाव इस विपरीत राजयोग मे प्रतिपादित किया जाता है.

इसकी व्याख्या इस प्रकार से भी की जा सकती है:-आठवें भाव के स्वामी व्यय अथवा ऋण में हों,छठे भाव के स्वामी गरीबी या व्यय के स्थान में हो,और बारहवें भाव के स्वामी ऋण अथवा गरीबी में हों,अथवा अपने ही क्षेत्र में होकर अपने ही प्रभाव से परेशान हो,तो वह जातक धनी लोगो से भी धनी होता है.इसका विवेचन इस कुन्डली के द्वारा भी कर सकते है:- कन्या लगन की कुन्डली में बुध लगन में है,सूर्य केतु दूसरे भाव में तुला में है,गुरु शुक्र तीसरे भाव में वृश्चिक राशि में है,राहु शनि आठवें भाव में मेष राशि के है,मंगल चन्द्र नवें भाव में वृष राशि के है,इस कुन्डली में ऋण भाव के मालिक शनि मेष राशि के नीच भी है और गरीबी के भाव में भी विराजमान है तथा राहु से ग्रसित भी है,साथ ही सूर्य जो व्यय का मालिक है,से भी देखे जा रहे है,और कोई भी अच्छा ग्रह उसे नही देख रहा है,इसी प्रकार से सूर्य भी तुला का होकर नीच है,और केतु का साया भी है,अपने ही स्थान से तीसरे स्थान में है,राहु,शनि और केतु का पूरा पूरा ध्यान सूर्य के ऊपर है,और सूर्य के लिये कोई भी सहारा कही से नही दिखाई दे रहा है,यह उदाहरण विपरीत राजयोग का श्रेष्ठ उदाहरण माना जा सकता है.जातक लगनेश बुध के चलते बातो से कमा रहा है,पराक्रम में गुरु और शुक्र का बल है,गुरु ज्ञान है और शुक्र दिखावा है,मंगल चन्द्र नवें भाव से जो कि धन के मामले में परेशान जनता का उदाहरण है,को अपनी राय देकर मनमानी फ़ीस लेकर जनता को धन के कारणो जैसे कर्जा और धन के कारण चलने वाले कोर्ट केशो से फ़ायदा दिलवा रहा है,इधर शनि जो कि कमजोर होकर राहु का साथ लेकर बैठा है,सरकारी कारिन्दो की सहायता से मुफ़्त की जमीनो से और उनको खरीदने बेचने से भी धन की उपलब्धि करवा रहा है.

शनिवार, 5 मई 2018

जन्म कुंडली और फलादेश

यह पोस्ट  उन मित्रों के लिए है जो ज्योतिष सिख रहे हैं  भारतीय ज्योतिष में जो फ़लादेश किया जाता है उसके लिये कई तरह के तरीके अपने अपने अनुसार अपनाये जाते है। 
,लेकिन मै जो तरीका प्रयोग में लाता हूँ वह अपने प्रकार का है. राशि चक्र में गुरु जहाँ हो उसे लगन मानना जरूरी है कुंडली का विश्लेषण करते वक्त गुरु जहाँ भी विराजमान हो उसे लगन मानना ठीक रहता है,कारण गुरु ही जीव का कारक है और गुरु का स्थान ही बता देता है कि व्यक्ति की औकात क्या है,इसके साथ ही गुरु की डिग्री भी देखनी जरूरी है,गुरु अगर कम या बहुत ही अधिक डिग्री का है तो उसका फ़ल अलग अलग प्रकार से होगा,उदाहरण के लिये कन्या लगन की कुण्डली है और गुर मीन राशि में सप्तम में विराजमान है तो फ़लादेश करते वक्त गुरु की मीन राशि को लगन मानकर गुरु को लगन में स्थापित कर लेंगे,और फ़लादेश गुरु की चाल के अनुसार करने लगेंगे। ग्रहों की दिशाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है कालचक्र के अनुसार राशियों के अनुसार दिशायें भी बताई जाती है,जैसे मेष सिंह और धनु को पूर्व दिशा की कारक और मिथुन तुला तथा कुम्भ को पश्चिम दिशा की कारक वृष कन्या और मकर को दक्षिण दिशा की कारक तथा कर्क वृश्चिक और मीन को उत्तर दिशा की कारक राशियों में माना जाता है। इन राशियों में स्थापित ग्रहों के बल और उनके द्वारा दिये गये प्रभाव को अधिक ध्यान में रखना पडेगा। ग्रहों की द्रिष्टि का ध्यान रखना जरूरी है ग्रह अपने से सप्तम स्थान को देखता है,यह सभी शास्त्रों में प्रचिलित है,साथ ग्रह अपने से चौथे भाव को अपनी द्रिष्टि से शासित रखता है और ग्रह अपने से दसवें भाव के लिये कार्य करता है,लेकिन सप्तम के भाव और ग्रह से ग्रह का जूझना जीवन भर होता है,इसके साथ ही शनि और राहु केतु के लिये बहुत जरूरी है कि वह अपने अनुसार वक्री में दिमागी बल और मार्गी में शरीर बल का प्रयोग जरूर करवायेंगे,लेकिन जन्म का वक्री गोचर में वक्री होने पर तकलीफ़ देने वाला ग्रह माना जायेगा. ग्रहों का कारकत्व भी समझना जरूरी है ग्रह की परिभाषा के अनुसार तथा उसके भाव के अनुसार उसका रूप समझना बहुत जरूरी होता है,जैसे शनि वक्री होकर अगर अष्टम में अपना स्थान लेगा तो वह बजाय बुद्धू के बहुत ही चालाक हो जायेगा,और गुरु जो भाग्य का कारक है वह अगर भाग्य भाव में जाकर बक्री हो जायेगा तो वह जल्दबाजी के कारण सभी तरह के भाग्य को समाप्त कर देगा और आगे की पुत्र संतान को भी नही देगा जिससे आने वाले वंश की क्षति का कारक भी माना जायेगा. जन्म के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनायें होती है जन्म के समय के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनाओं को बताने के लिये माना जाता है,अगर शनि जन्म से लगन में है और गोचर से शनि कर्म भाव में आता है तो खुद के कर्मों से ही कार्यों को अन्धेरे में और ठंडे बस्ते मे लेकर चला जायेगा। इसके बाद लगन का राहु गोचर से गुरु को अष्टम में देखता है तो जीवन को बर्फ़ में लगाने के लिये मुख्य माना जायेगा,जीव का किसी न किसी प्रकार की धुंआ तो निकलना ही है। गुरु के आगे और पीछे के ग्रह भी अपना अपना असर देते है गुरु के पीछे के ग्रह गुरु को बल देते है और आगे के ग्रहों को गुरु बल देता है,जैसी सहायता गुरु को पीछे से मिलती है वैसी ही सहायता गुरु आगे के ग्रहो को देना शुरु कर देता है,यही हाल गोचर से भी देखा जाता है,गुरु के पीछे अगर मंगल और गुरु के आगे बुध है तो गुरु मंगल से पराक्रम लेकर बुध को देना शुरु कर देगा,अगर मंगल धर्म मय है तो बुध को धर्म की परिभाषा देना शुरु कर देगा और और अगर मंगल बद है तो गाली की भाषा देना शुरु कर देगा,गुरु के पीछे शनि है तो जातक को घर में नही रहने देगा और गुरु के आगे शनि है तो गुरु घर बाहर निकलने में ही डरेगा। शनि चन्द्रमा की युति जन्म की साढेशाती शनि और चन्द्रमा का कुंडली में कही भी योगात्मक प्रभाव है तो जन्म से ही साढेशाती का समय माना जाता है,इस युति का सीधा सा प्रभाव है कि जातक अपने अनुसार काम कभी नही कर पायेगा,उसे स्वतत्र काम करने में दिक्कत होगी उसे खूब बता दिया जाये कि वह इस प्रकार से रास्ता पकड कर चले जाना लेकिन वह कहीं पर अपने रास्ते को जरूर भूल जायेगा,इसलिये कुंडली में गुरु के साथ चन्द्रमा की स्थिति भी देखनी जरूरी होती है,वैसे चन्द्रमा को माता का कारक भी मानते है,लेकिन अलग अलग भावों में चन्द्रमा का अलग अलग रूप बन जाता है,जैसे धन भाव में चन्द्रमा कुटुम्ब की माता,तीसरे भाव में चन्द्रमा पिता के बिना नही रहने वाली माता चौथे भाव में चन्द्रमा से बचपन के सभी कष्टों को दूर करने वाली माता,पंचम स्थान से स्कूल की अध्यापिका माता,छठे भाव में मौसी भी मानी जाती है और चाची भी मानी जाती है,सप्तम में माता के रहते पत्नी या पति के लिये विनासकारी माता,अष्टम में माता का स्थान ताई की नही बनेगी,नवे भाव में दादी का रूप यह चन्द्रमा ले लेता है,दसवें भाव में पिता से परित्याग की गयी माता,और ग्यारहवे भाव में जब तक स्वार्थ पूरा नही होता है तब तक की माता और बारहवें भाव में जन्म के बाद भूल जाने वाली माता के रूप में माना जाता है,इस चन्द्रमा के साथ जहां भी शनि होगा जातक के लिये वही स्थान फ़्रीज करने के लिये काफ़ी माना जायेगा। कुंडली का सूर्य पिता की स्थिति को बयान करता है गुरु को जीव की उपाधि दी गयी है तो सूर्य को पिता की उपाधि दी गयी है,उसी सूर्य को बाद में पुत्र की उपाधि से विभूषित किया गया है,लेकिन पिता के लिये नवा भाव ही देखना बेहतर तरीका होता है और पिता के ऊपर आने वाले कष्टों के लिये कुंडली के चौथे भाव में जब भी कोई क्रूर ग्रह गोचर करेगा या शनिका गोचर होगा पिता के लिये कष्ट का समय माना जायेगा। इसके अलावा राहु का गोचर पिता के लिये असावधानी से कोई दुर्घटना और केतु के गोचर से अचानक सांस वाली बीमारी या सांस की रुकावट वाली बीमारी को माना जायेगा,चन्द्रमा से जल से भय और मंगल से वाहन या अस्पताल या पुलिस से भय माना जायेगा। सूर्य और गुरु की युति से पिता पुत्र का एक जैसा हाल होगा,और जातक को जीवात्मा की उपाधि दी जायेगी,साथ ही अगर धर्म के भाव में स्थापित है तो ईश्वर अंश से अवतार माना जायेगा। राहु सूर्य और गुरु का साथ पुराने पूर्वज के रूप में जातक का जन्म माना जायेगा,और गुरु से तीन भाव पहले की राशि के काम करने के लिये जातक को वापस अपने परिवार में आने को माना जायेगा। सूर्य शुक्र का साथ बलकारी पिता और जातक के लिये भी बलकारी योग का रूप देगा,इसके अन्दर कितनी ही बलवान स्त्री क्यों न हो लेकिन जातक के वीर्य को अपनी कोख बडी मुश्किल से धारण कर पायेगी,जैसे ही पुत्र संतान का योग आयेगा,जातक की पत्नी किसी न किसी कारण से मिस कैरिज जैसे कारण पैदा कर देगी,लेकिन जैसे ही सूर्य का समय समाप्त होगा जातक के एक पुत्र की उत्पत्ति होगी। इसी प्रकार से सूर्य और चन्द्र का साथ जातक के जीवन में अमावस्या का योग पैदा करता है। जातक के बचपन में माता को पिता के कारणों से फ़ुर्सत ही नही मिल पायेगी,जो वह जातक का ध्यान रख सके। इसी तरह से चन्द्रमा और सूर्य का आमना सामना जातक के जीवन में पूर्णिमा का योग पैदा करेगा,जातक को छोड कर माता का दूर जाना कैसे भी सम्भव नही है और माता के लगातार साथ रहने के कारण जातक को किसी भी कष्ट का अनुभव नही होगा लेकिन वह अपने जीवन में माता जैसा सभी को समझने पर छला जरूर जायेगा,यहां तक कि उसकी शादी के बाद भी लोग उसे छलना नही छोडेंगे,उसकी पत्नी भी उसके साथ भावनाओं में छल करके उससे लाभ लेकर अपने मित्रों को देती रहेगी या अपने परिवार की भलाई का काम सोचती रहेगी अगर आप को नहीं दिखाना चाहते हैं या बनवाना चाहते हैं यहां ज्योति सीखना चाहते हैं तो हमारे नंबरों पर संपर्क करें 0759771872509414481324 आचार्य राजेश

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

तारे और ग्रह

 रात में आकाश में कई पिण्ड चमकते रहते हैं, इनमें से अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते हैं और एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा (Star) कहा गया। पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्ड के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे – यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है जिसका अर्थ इधर-उधर घूमने वाला है। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया।
हमारे लिये आकाश में सबसे चमकीला पिण्ड सूरज है, फिर चन्द्रमा और उसके बाद रात के तारे या ग्रह। तारे स्वयं में एक सूरज हैं। ज्यादातर, हमारे सूरज से बड़े ओर चमकीले, पर इतनी दूर हैं कि उनकी रोशनी हमारे पास आते आते बहुत क्षीण हो जाती है इसलिये दिन में नहीं दिखायी पड़ते पर रात में दिखायी पड़ते हैं। कुछ प्रसिद्ध तारे इस प्रकार हैं:
सबसे प्रसिद्ध तारा, ध्रुव तारा (Polaris या North star) है। यह इस समय पृथ्वी की धुरी पर है इसलिये अपनी जगह पर स्थिर दिखायी पड़ता है। ऐसा पहले नहीं था या आगे नहीं होगा। ऐसा क्यों है, इसके बारे में आगे चर्चा होगी।
तारों में सबसे चमकीला तारा व्याध (Sirius) है। इसे Dog star भी कहा जाता है क्योंकि यह Canis major(बृहल्लुब्धक) नाम के तारा समूह का हिस्सा है।
मित्रक (Alpha Centauri), नरतुरंग (Centaurus) तारा समूह का एक तारा है। यदि सूरज को छोड़ दें तो तारों में यह हमसे सबसे पास है। प्रकाश की किरणें 1 सेकेन्ड मे 3x(10)8 मीटर की दूरी तय करती हैं। एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है जो कि प्रकाश की किरणें एक साल में तय करती हैं। इसकी हमसे दूरी लगभग 4.3 प्रकाश वर्ष है। वास्तव में यह एक तारा नहीं है पर तीन तारों का समूह है जो एक दूसरे के तरफ चक्कर लगा रहें हैं, इसमें Proxima Centauri हमारे सबसे पास आता है।
ग्रह और चन्द्रमा, सूरज नहीं हैं। यह अपनी रोशनी में नहीं चमकते पर सूरज की रोशनी को परिवर्तित करके चमकते हैं। तारे टिमटिमाते हैं पर ग्रह नहीं। तारों की रोशनी का टिमटिमाना, हवा में रोशनी के अपवर्तन (refraction) के कारण होता है। यह तारों की रोशनी पर ही होता है क्योंकि तारे हमसे बहुत दूर हैं और इनके द्वारा आती रोशनी की किरणें हम तक पहुंचते पहुंचते समान्तर हो जाती हैं पर ग्रहों कि नहीं।प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
पहले के ज्योतिषाचार्य वास्तव में उच्च कोटि के खगोलशास्त्री थे और अपने देश के खगोलशास्त्री दुनिया में सबसे आगे। अपने देश में तो ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ चक्कर लगाती हैप्राचीन भारत में अन्य प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:
याज्ञवल्क्य ईसा से दो शताब्दी पूर्व हुऐ थे। उन्होने यजुर्वेद पर काम किया था। इसलिये यह कहा सकता है कि अपने देश ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ घूमती है। यूरोप में इस तरह से सोचना तो 14वीं शताब्दी में शुरु हुआ।
आर्यभट्ट (प्रथम) (476-550) ने 'आर्य भटीय' नामक ग्रन्थ की रचना की। इसके चार खंड हैं– गीतिकापाद, गणितपाद, काल क्रियापाद, और गोलपाद। गोलपाद खगोलशास्त्र (ज्योतिष) से सम्बन्धित है और इसमें 50 श्लोक हैं। इसके नवें और दसवें श्लोक में यह समझाया गया है कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ घूमती है।
भास्कराचार्य (1141-1185) ने 'सिद्धान्त शिरोमणी' नामक पुस्तक चार भागों में लिखी है– पाटी गणिताध्याय या लीलावती (Arithmetic), बीजागणिताध्याय (Algebra), ग्रह गणिताध्याय (Astronomy), और गोलाध्याय। इसमें प्रथम दो भाग स्वतंत्र ग्रन्थ हैं और अन्तिम दो सिद्धांत शिरोमणी के नाम से जाने जाते हैं। सिद्धांत शिरोमणी में पृथ्वी के सूरज के चारो तरफ घूमने के सिद्धान्त को और आगे बढ़ाया गया है।
यूरोप में खगोल शास्त्र
यूरोप के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:
टौलमी (90-168) नाम का ग्रीक दर्शनशास्त्री दूसरी शताब्दी में हुआ था। इसने पृथ्वी को ब्रम्हाण्ड का केन्द्र माना और सारे पिण्डों को उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हुये बताया। इस सिद्धान्त के अनुसार सूरज एवं तारों की गति तो समझी जा सकती थी पर ग्रहों की नहीं।
कोपरनिकस (1473-1543) एक पोलिश खगोलशास्त्री था, उसका जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ। यूरोप में सबसे पहले उसने कहना शुरू किया कि सूरज सौरमंडल का केन्द्र है और ग्रह उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हैं।
केपलर (1571-1630) एक जर्मन खगोलशास्त्री था, उसका जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था। वह गैलिलियो के समय का ही था। उसने बताया कि ग्रह सूरज की परिक्रमा गोलाकार कक्षा में नहीं कर रहें हैं, उसके मुताबिक यह कक्षा अंड़ाकार (Elliptical) है। यह बात सही है।
गैलिलियो (1564-1642) एक इटैलियन खगोलशास्त्री था उसे टेलिस्कोप का आविष्कारक कहा जाता है पर शायद उसने बेहतर टेलिस्कोप बनाये और सबसे पहले उनका खगोलशास्त्र में प्रयोग कियाटौलमी के सिद्धान्त के अनुसार शुक्र ग्रह पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाता है और वह पृथ्वी और सूरज के बीच रहता है इसलिये वह हमेशा बालचन्द्र (Crescent) के रूप में दिखाई देगा। कोपरनिकस के मुताबिक शुक्र सारे ग्रहों की तरह सूरज के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है इसलिये चन्द्रमा की तरह उसकी सारी कलायें (phases) होनी चाहिये। गैलिलियो ने टेलिस्कोप के द्वारा यह पता किया कि शुक्र ग्रह की भी चन्द्रमा की तरह सारी कलायें होती हैं इससे यह सिद्ध हुआ कि ग्रह – कम से कम शुक्र तो – सूरज की परिक्रमा कर रहे हैं। गैलिलियो ने सबसे पहले ग्रहों को सूरज का चक्कर लगाने का प्रयोगात्मक सबूत दिया। पर उसे इसका क्या फल मिला। चर्च ने यह कहना शुरू कर दिया कि यह बात ईसाई धर्म के विरूद्ध है और गैलिलियो को घर में नजरबन्द कर दिया गया।भौतिक शास्त्र में हर चीज देखी नहीं जा सकती है और किसी बात को सत्य केवल इसलिये कहा जाता है कि उसको सिद्धान्तों के द्वारा समझाया जा सकता है। यदि पृथ्वी को सौरमंडल का केन्द्र मान लिया जाय तो किसी भी तरह से इन ग्रहों की गति को नहीं समझा जा सकता है पर यदि सूरज को सौरमंडल का केन्द्र मान लें तो इन ग्रहों और तारों दोनों की गति को ठीक प्रकार से समझा जा सकता है। इसलिए यह बात सत्य मान ली गयी कि सूरज ही हमारे सौरमंडल के केन्द्र में है जिसके चारों तरफ पृथ्वी एवं ग्रह घूम रहे हैं। Iपृथ्वी की गतियॉं
हमारी पृथ्वी की बहुत सारी गतियां हैं:
पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक चक्कर लगा रही है। इसलिये दिन और रात होते हैं।
पृथ्वी सूरज के चारों तरफ एक साल में एक चक्कर लगाती है। यदि हम उस तल (plane) की कल्पना करें जिसमें पृथ्वी और सूरज का केन्द्र, तथा उसकी परिक्रमा है तो पायेंगे कि पृथ्वी की धुरी, इस तल से लगभग साढ़े 23 डिग्री झुकी है पृथ्वी के धुरी झुके रहने के कारण अलग-अलग ऋतुयें आती हैं। हमारे देश में गर्मी के दिनों में सूरज उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है और जाड़े में दक्षिणी गोलार्द्ध में चला जाता है। यानी कि साल के शुरू होने पर में सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है पर वहां से चलकर उत्तरी गोलार्द्ध और फिर वापस दक्षिणी गोलार्द्ध के उसी विन्दु पर पहुंच जाता है।
पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और पृथ्वी की धुरी लगभग 25700 साल में एक बार घूमती है। इस समय हमारी धुरी सीधे ध्रुव तारे पर है इसलिये ध्रुवतारा हमको घूमता नहीं दिखाई पड़ता है और दूसरे तारे घूमते दिखाई देते हैं। हजारों साल पहले हमारी धुरी न तो ध्रुव तारा पर थी और न हजारों साल बाद यह ध्रुव तारा पर होगी। तब ध्रुवतारा भी रात में पूरब की तरफ से उदय होगा और पश्चिम में अस्त होता दिखायी देगा।
हमारा सौरमंडल एक निहारिका में है जिसे आकाश गंगा कहा जाता है। इसका व्यास लगभग 1,00,000  प्रकाश वर्ष है। हमारी पृथ्वी आकाश गंगा के केन्द्र से लगभग 30,000 प्रकाश वर्ष दूर है और हमारा सौरमंडल भी इस आकाश गंगा के चक्कर लगा रहा है और हमारी पृथ्वी भी उसके चक्कर लगा रही है।
हमारी आकाश गंगा और आस-पास की निहारिकायें भी एक दूसरे के पास आ रही हैं। यह बात डाप्लर सिद्धान्त से पता चलती है। हमारी पृथ्वी भी इस गति में शामिल है।
मुख्य रूप से हम पृथ्वी की पहली और दूसरी गति ही समझ पाते हैं, तीसरी से पांचवीं गति हमारे जीवन से परे है। वह केवल सिद्धान्त से समझी जा सकती है, उसे देखा नहीं जा सकता है। हमारे विषय के लिये दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।तारा समूह
ब्रम्हाण्ड में अनगिनत तारे हैं और अनगिनत तारा समूह। कुछ चर्चित तारा समूह इस प्रकार हैं:सप्त ऋषि (Great/ Big bear or Ursa Major): यह उत्तरी गोलार्ध के सात तारे हैं। यह कुछ पतंग की तरह लगते हैं जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली लाईन को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है।ध्रुवमत्स्य/ अक्षि (Little Bear or Ursa Minor): यह सप्त ऋषि के पास उसी शक्ल का है इसके सबसे पीछे वाला तारा ध्रुव तारा है।कृतिका (कयबचिया) Pleiades: पास-पास कई तारों का समूह है हमारे खगोलशास्त्र में इन्हें सप्त ऋषि की पत्नियां भी कहा गया है।
मृगशीर्ष (हिरन- हिरनी) Orion: अपने यहां इसे हिरण और ग्रीक में इसे शिकारी के रूप में देखा गया है पर मुझे तो यह तितली सी लगती है।बृहल्लुब्धक (Canis Major): इसकी कल्पना कुत्ते की तरह की गयी पर मुझे तो यह घन्टी की तरह लगता है। व्याध (Sirius) इसका सबसे चमकीला तारा है। अपने देश में इसे मृगशीर्ष पर धावा बोलने वाले के रूप में देखा गया जब कि ग्रीक पुराण में इसे Orion (शिकारी) के कुत्ते के रूप में देखा गया।
शर्मिष्ठा (Cassiopeia): यह तो मुझे कहीं से सुन्दरी नहीं लगती यह तो W के आकार की दिखायी पड़ती है और यदि इसके बड़े कोण वाले भाग को विभाजित करने वाली रेखा को उत्तर दिशा में ले जायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचेगी।महाश्व (Pegasus): इसकी कल्पना अश्व की तरह की गयी पर यह तो मुझे टेनिस के कोर्ट जैसा लगता है।
जाहिर है मैं इन सब तारा समूह के सारे तारे देख कर आकृतियों कि कल्पना नहीं कर रहा हूं, पर इन तारा समूह के कुछ खास तारों को ले कर ही कल्पना कर रहा हूं।
राशियां (Signs of Zodiac)
यह तो थे आकाश पर कुछ मुख्य तारा समूह। इन सब का नाम हमने कभी न कभी सुना है। इनके अलावा बारह तारा समूह जिन्हें राशियां कहा जाता है उनका नाम हम अच्छी तरह से जानते हैं। इन सब को छोड़ कर, किसी तारा समूह के लिये तो खगोलशास्त्र की पुस्तक ही देखनी पड़ेगी। बारह तारा समूह, जिन्हें राशियां कहा जाता है, उनके नाम तो हम सब को मालुम हैं पर साधरण व्यक्ति के लिये इन्हें आकाश में पहचान कर पाना मुश्किल है। यह बारह राशियां हैं,मेष से लेकर मीन तकइन 12 तारा समूहों को ही क्यों इतना महत्व दिया गया? इसके लिये पृथ्वी की दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।
यदि पृथ्वी, सूरज के केन्द्र और पृथ्वी की परिक्रमा के तल को चारो तरफ ब्रम्हाण्ड में फैलायें, तो यह ब्रम्हाण्ड में एक तरह की पेटी सी बना लेगा। इस पेटी को हम 12 बराबर भागों में बांटें तो हम देखेंगे कि इन 12 भागों में कोई न कोई तारा समूह आता है। हमारी पृथ्वी और ग्रह, सूरज के चारों तरफ घूमते हैं या इसको इस तरह से कहें कि सूरज और सारे ग्रह पृथ्वी के सापेक्ष इन 12 तारा समूहों से गुजरते हैं। यह किसी अन्य तारा समूह के साथ नहीं होता है इसलिये यह 12 महत्वपूर्ण हो गये हैं। इस तारा समूह को हमारे पूर्वजों ने कोई न कोई आकृति दे दी और इन्हें राशियां कहा जाने लगा मित्रों यदि आप किसी आखबार या टीवी पर राशिचक्र को देखें या सुने तो पायेंगें कि वे सब मेष से शुरू होते हैं, यह अप्रैल-मई का समय है। क्या आपने कभी सोचा हैकि यह राशि चक्र मेष से ही क्यों शुरू होते हैं? चलिये पहले हम लोग विषुव अयन (precession of equinoxes) को समझते हैं, उसी से यह भी स्पष्ट होगा।
विषुव अयन (precession of equinoxes)
विषुव अयन और राशि चक्र के मेष राशि से शुरू होने का कारण पृथ्वी की तीसरी गति है। साल के शुरु होते समय (जनवरी माह में) सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है और वहां से उत्तरी गोलार्द्ध जाता है। साल के समाप्त होने (दिसम्बर माह) तक सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से होकर पुनः दक्षिणी गोलार्द्ध पहुचं जाता है। इस तरह से सूरज साल में दो बार भू-मध्य रेखा के ऊपर से गुजरता है। इस समय को विषुव (equinox) कहते हैं। यह इसलिये कि, तब दिन और रात बराबर होते हैं। यह सिद्धानतः है पर वास्तविकता में नहीं, पर इस बात को यहीं पर छोड़ देते हैं। आजकल यह समय लगभग 20 मार्च तथा 23 सितम्बर को आता है। जब यह मार्च में आता है तो हम (उत्तरी गोलार्द्ध में रहने वाले) इसे महा/बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) कहते हैं तथा जब सितम्बर में आता है तो इसे जल/शरद विषुव (fall/Autumnal Equinox) कहते हैं। यह उत्तरी गोलार्द्ध में इन ऋतुओं के आने की सूचना देता है।
विषुव का समय भी बदल रहे है। इसको विषुव अयन (Precession of Equinox) कहा जाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घन्टे में एक बार घूमती है। इस कारण दिन और रात होते हैं। पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और यह धुरी 25,700 साल में एक बार घूमती है। यदि आप किसी लट्टू को नाचते हुये उस समय देखें जब वह धीमा हो रहा हो, तो आप देख सकते हैं कि वह अपनी धुरी पर भी घूम रहा है और उसकी धुरी भी घूम रही है। विषुव का समय धुरी के घूमने के कारण बदल रहा है। इसी लिये pole star भी बदल रहा है। आजकल ध्रुव तारा पृथ्वी की धुरी पर है और दूसरे तारों की तरह नहीं घूमता। इसी लिये pole star कहलाता है। समय के साथ यह बदल जायगा और तब कोई और तारा pole star बन जायगा।
पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 25,700 साल में एक बार घूमती है। वह 1/12वें हिस्से को 2141 या लगभग 2150  साल में तय करती है। वसंत विषुव के समय सूरज मेष राशि में ईसा से 1650 साल पहले (1650BC) से, ईसा के 500 साल बाद (500 AD) तक लगभग 2150 साल रहा। अलग-अलग सभ्यताओं में, इसी समय खगोलशास्त्र या ज्योतिष का जन्म हुआ। इसीलिये राशिफल मेष से शुरु हुआ पर अब ऐसा नहीं है। इस समय वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में है। यह लगभग ईसा के 500 साल बाद (500 AD) से शुरु हुआ। यह अजीब बात है कि विषुव के बदल जाने पर भी हम राशिफल मेष से ही शुरु कर रहें है – तर्क के हिसाब से अब राशिफल मीन से शुरु होने चाहिये, क्योंकि अब विषुव के समय सूरज, मेष राशि में न होकर, मीन राशि में है।
ईसा के 500 साल (500 AD) के 2150 साल बाद तक यानि कि 27वीं शताब्दी (2650 AD) तक, वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में रहेगा। उसके बाद वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, कुम्भ राशि में चला जायगा। यानि कि तब शुरु होगा कुम्भ का समय। अब आप हेयर संगीत नाटक के शीर्षक गीत Aquarius की पंक्ति ‘This is the dawning age of Aquarius’ का अर्थ समझ गये होंगे। अकसर लोग इस अर्थ को नहीं समझते – ज्योतिष में भी कुछ ऐसा हो रहा है।यदि आप किसी आखबार या टीवी पर राशिचक्र को देखें या सुने तो पायेंगें कि वे सब मेष से शुरू होते हैं, यह अप्रैल-मई का समय है। क्या आपने कभी सोचा हैकि यह राशि चक्र मेष से ही क्यों शुरू होते हैं? चलिये पहले हम लोग विषुव अयन (precession of equinoxes) को समझते हैं, उसी से यह भी स्पष्ट होगा।
विषुव अयन (precession of equinoxes)
विषुव अयन और राशि चक्र के मेष राशि से शुरू होने का कारण पृथ्वी की तीसरी गति है। साल के शुरु होते समय (जनवरी माह में) सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है और वहां से उत्तरी गोलार्द्ध जाता है। साल के समाप्त होने (दिसम्बर माह) तक सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से होकर पुनः दक्षिणी गोलार्द्ध पहुचं जाता है। इस तरह से सूरज साल में दो बार भू-मध्य रेखा के ऊपर से गुजरता है। इस समय को विषुव (equinox) कहते हैं। यह इसलिये कि, तब दिन और रात बराबर होते हैं। यह सिद्धानतः है पर वास्तविकता में नहीं, पर इस बात को यहीं पर छोड़ देते हैं। आजकल यह समय लगभग 20 मार्च तथा 23 सितम्बर को आता है। जब यह मार्च में आता है तो हम (उत्तरी गोलार्द्ध में रहने वाले) इसे महा/बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) कहते हैं तथा जब सितम्बर में आता है तो इसे जल/शरद विषुव (fall/Autumnal Equinox) कहते हैं। यह उत्तरी गोलार्द्ध में इन ऋतुओं के आने की सूचना देता है।
विषुव का समय भी बदल रहे है। इसको विषुव अयन (Precession of Equinox) कहा जाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घन्टे में एक बार घूमती है। इस कारण दिन और रात होते हैं। पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और यह धुरी 25,700 साल में एक बार घूमती है। यदि आप किसी लट्टू को नाचते हुये उस समय देखें जब वह धीमा हो रहा हो, तो आप देख सकते हैं कि वह अपनी धुरी पर भी घूम रहा है और उसकी धुरी भी घूम रही है। विषुव का समय धुरी के घूमने के कारण बदल रहा है। इसी लिये pole star भी बदल रहा है। आजकल ध्रुव तारा पृथ्वी की धुरी पर है और दूसरे तारों की तरह नहीं घूमता। इसी लिये pole star कहलाता है। समय के साथ यह बदल जायगा और तब कोई और तारा pole star बन जायगा।
पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 25,700 साल में एक बार घूमती है। वह 1/12वें हिस्से को 2141 या लगभग 2150  साल में तय करती है। वसंत विषुव के समय सूरज मेष राशि में ईसा से 1650 साल पहले (1650BC) से, ईसा के 500 साल बाद (500 AD) तक लगभग 2150 साल रहा। अलग-अलग सभ्यताओं में, इसी समय खगोलशास्त्र या ज्योतिष का जन्म हुआ। इसीलिये राशिफल मेष से शुरु हुआ पर अब ऐसा नहीं है। इस समय वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में है। यह लगभग ईसा के 500 साल बाद (500 AD) से शुरु हुआ। यह अजीब बात है कि विषुव के बदल जाने पर भी हम राशिफल मेष से ही शुरु कर रहें है – तर्क के हिसाब से अब राशिफल मीन से शुरु होने चाहिये, क्योंकि अब विषुव के समय सूरज, मेष राशि में न होकर, मीन राशि में है।
ईसा के 500 साल (500 AD) के 2150 साल बाद तक यानि कि 27वीं शताब्दी (2650 AD) तक, वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में रहेगा। उसके बाद वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, कुम्भ राशि में चला जायगा। यानि कि तब शुरु होगा कुम्भ का समय। अब आप हेयर संगीत नाटक के शीर्षक गीत Aquarius की पंक्ति ‘This is the dawning age of Aquarius’ का अर्थ समझ गये होंगे। अकसर लोग इस अर्थ को नहीं समझते – ज्योतिष में भी कुछ ऐसा हो रहा है।पुराने समय के ज्योतिषाचार्य बहुत अच्छे खगोलशास्त्री थे।पर समय के वदलते कुछ लोगो ने उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि किसी व्यक्ति के पैदा होने के समय सूरज जिस राशि पर होगा, उस आकृति के गुण उस व्यक्ति के होंगे। इसी हिसाब से उन्होंने राशि फल निकालना शुरू कर दिया। हालांकि इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि आप ज्योतिष को उसी के तर्क पर परखें, तो भी राशी फल  गलत बैठती है।
यदि ज्योतिष का ही तर्क लगायें तो – विषुव अयन के समय सूरज की स्थिति बदल जाने के कारण – जो गुण ज्योतिषों ने मेष राशि में पैदा होने वाले लोगों को दिये थे वह अब मीन राशि में पैदा होने वाले व्यक्ति को दिये जाने चाहिये। यानी कि, हम सबका राशि फल एक राशि पहले का हो जाना चाहिये

शनिवार, 25 जून 2016

मित्रो जन्म कुंडली का विश्लेषण करने से पूर्व किसी भी कुशल ज्योतिषी को पहले कुंडली की कुछ बातो का अध्ययन करना चाहिए. जैसे ग्रह का पूरा अध्ययन, भावों का अध्ययन, दशा/अन्तर्दशा, गोचर आदि बातों को देखकर ही फलकथन कहना चाहिए. आज हम कुंडली का अध्ययन कैसे किया जाए सीखने का प्रयास करेगें. जन्म कुंडली में ग्रह को समझने के लिए कुछ बातों पर विचार किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं. सबसे पहले यह देखें कि ग्रह किस भाव में स्थित है और किन भावों का स्वामी है. ग्रह के कारकत्व क्या-क्या होते हैं. ग्रहों का नैसर्गिक रुप से शुभ व अशुभ होना देखेगें. ग्रह का बलाबल देखेगें. ग्रह की महादशा व अन्तर्दशा देखेगें कि कब आ रही है. जन्म कालीन ग्रह पर गोचर के ग्रहों का प्रभाव. ग्रह पर अन्य किन ग्रहों की दृष्टियाँ प्रभाव डाल रही हैं. ग्रह जिस राशि में स्थित है उस राशि स्वामी की जन्म कुण्डली में स्थिति देखेगें और उसका बल भी देखेगें. ग्रह की जन्म कुंडली में स्थिति के बाद जन्म कुंडली के साथ अन्य कुछ और कुंडलियों का अवलोकन किया जाएगा, जो निम्न हैं. जन्म कुंडली के साथ चंद्र कुंडली का अध्ययन किया जाना चाहिए. भाव चलित कुंडली को देखें कि वहाँ ग्रहों की क्या स्थिति बन रही है. जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों के बलों का आंकलन व योगों को नवांश कुंडली में देखा जाना चाहिए. जिस भाव से संबंधित फल चाहिए होते हैं उससे संबंधित वर्ग कुंडलियों का अध्ययन किया जाना चाहिए. जैसे व्यवसाय के लिए दशमांश कुंडली और संतान प्राप्ति के लिए सप्ताँश कुंडली. ऎसे ही अन्य कुंडलियों का अध्ययन किया जाना चाहिए. वर्ष कुंडली का अध्ययन करना चाहिए जिस वर्ष में घटना की संभावना बनती हो. ग्रहों का गोचर जन्म से व चंद्र लग्न से करना चाहिए. अंत में कुछ बातें जो कि महत्वपूर्ण हैं उन्हें एक कुशल ज्योतिषी अथवा कुंडली का विश्लेषण करने वाले को अवश्य ही अपने मन-मस्तिष्क में बिठाकर चलना चाहिए. जन्म कुंडली में स्थित सभी ग्रहो की अंशात्मक युति देखनी चाहिए और भावों की अंशात्मक स्थित भी देखनी चाहिए कि क्या है. जैसे कि ग्रह का बल, दृष्टि बल, नक्षत्रों की स्थिति और वर्ष कुंडली में ताजिक दृष्टि आदि देखनी चाहिए. जिस समय कुंडली विश्लेषण के लिए आती है उस समय की महादशा/अन्तर्दशा/प्रत्यन्तर दशा को अच्छी तरह से जांचा जाना चाहिए. जिस समय कुंडली का अवलोकन किया जाए उस समय के गोचर के ग्रहों की स्थिति का आंकलन किया जाना चाहिए. आइए अब भावों के विश्लेषण में महत्वपूर्ण तथ्यों की बात करें. जब भी किसी कुंडली को देखना हो तब उपरोक्त बातों के साथ भावों का भी अपना बहुत महत्व होता है. आइए उन्हें जाने कि वह कौन सी बाते हैं जो भावों के सन्दर्भ में उपयोगी मानी जाती है. जिस भाव के फल चाहिए उसे देखें कि वह क्या दिखाता है. उस भाव में कौन से ग्रह स्थित हैं. भाव और उसमें बैठे ग्रह पर पड़ने वाली दृष्टियाँ देखें कि कौन सी है. भाव के स्वामी की स्थिति लग्न से कौन से भाव में है अर्थात शुभ भाव में है या अशुभ भाव में है, इसे देखें. जिस भाव की विवेचना करनी है उसका स्वामी कहाँ है, कौन सी राशि व भाव में गया है, यह देखें. भाव स्वामी पर पड़ने वाली दृष्टियाँ देखें कि कौन सी शुभ तो कौन सी अशुभ है. भाव स्वामी की युति अन्य किन ग्रहों से है, यह देखें और जिनसे युति है वह शुभ हैं या अशुभ हैं, इस पर भी ध्यान दें. भाव तथा भाव स्वामी के कारकत्वों का निरीक्षण करें. भाव का स्वामी किस राशि में है, उच्च में है, नीच में है या मित्र भाव में स्थित है, यह देखें. भाव का स्वामी अस्त या गृह युद्ध में हारा हुआ तो नहीं है या अन्य किन्हीं कारणों से निर्बली अवस्था में तो स्थित नहीं है, इन सब बातों को देखें. भाव, भावेश तथा भाव के कारक तीनों का अध्ययन भली - भाँति करना चाहिए. इससे संबंधित भाव के प्रभाव को समझने में सुविधा होती है. उपरोक्त बातोंके साथसाथ हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि किसी भी कुंडली का सामान्य रुप से अध्ययन करने के लिए लग्न, लग्नेश, राशिश, इन पर पड़ने वाली दृष्टियाँ और अन्य ग्रहो के साथ होने वाली युतियों पर ध्यान देना चाहिए. इसके बाद नवम भाव व नवमेश को देखना चाहिए कि उसकी कुंडली में क्या स्थिति है क्योकि यही से व्यक्ति के भाग्य का निर्धारण होता है. लग्न के साथ चंद्रमा से भी नवम भाव व नवमेश का अध्ययन किया जाना चाहिए. इससे कुंडली के बल का पता चलता है कि कितनी बली है. जन्म कुंडली में बनने वाले योगो का बल नवाँश कुंडली में भी देखा जाना चाहिए. नवाँश कुंडली के लग्नतथा लग्नेश का बल भी देखना चाहिए हम जव कोई पोस्ट गरुप मे करते है तो कुछ मित्र लग्न कुन्ङली की फोटो भेजते है कि हमारे वारे मे वताऐ यह कहैगे की हमारा तो ऐक ही प्रशन है मित्रो आपका जिवन अनमोल है थोङी सी दक्षिणा वचाने के चक्कर मे आप भटकते है ऐसा ना करे जव तक सही ढंग से आपकी कुंङली कोई ज्योतिषी नही देखेगा तव तक कुछ नही वता सकता जो वताते है वो गलत है मेरी वात से आगर दुख हुआ हो तो मुझे माफ करना आप मुझ से ईन नम्वर पर वात कर सकते है चेट या मैसज ना करे घन्यावाद आचार्य राजेश



महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...