मित्रों जो सम्मान मकर की संक्रांत को प्राप्त है वह मेष की संक्रांत को नही है..अतः लग्न व पंचम के सूर्य के मुकाबले दशम का सूर्य अधिक प्रभावी होने लगा...कुंडली विवेचन के दौरान नए अभ्यासी ज्योतिषियों बंधुओं को देखने मे आएगा कि दशम का सूर्य परोक्ष व अपरोक्ष रूप से सरकार से जातक को जोड़ता आया है..अगर इसी सूर्य को शनि का बल भी प्राप्त हो रहा हो,,तो छत्रभंग का निर्माण करते हुए यह तय करता है कि यदि जातक परिवार अथवा पिता से दूर रह पाएगा तो सत्ता में सीधे पैठ बना पाने के सक्षम होगा,,जितना जातक अपने भीतर भृत्य(सेवक) होने की भावना प्रबल करेगा,,उतनी तीव्रता से वह सत्ता की शक्ति प्राप्त करेगा...जितना अधिक वह अपने नैसर्गिक राजा होने के भाव को प्रदर्शित करेगा,,सत्ता व राजतंत्र से दूर होता जाएगा....इसी अनुपात में हम देखें तो पंचम पिता की हानि है..यह दशम से अष्ठम पड़ने वाला भाव है..पिता के लिए दुर्योग उत्पन करने वाला...ऐसे में पंचम का सूर्य पिता के साथ कोई बड़ी दुर्घटना तय कर देता है,,किन्तु स्वयं का भाव होने से ये भी देखने मे आता है कि जातक पिता के विभागों में पिता के बाद जुड़ जाता है..इस सूर्य पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव हो तो पिता के साथ कई बार बड़ी दुर्घटनाएं भी होती देखी गयी हैं..
दशम से किसी भी प्रकार सूर्य का संबंध बन रहा हो तो सूर्य का रत्न माणिक धारण करने से बचना चाहिए..इसका प्रभाव शनि को प्रभावित करता है,,परिणास्वरूप जो लाभ शनि के भाव दशम में बैठा सूर्य दे रहा होता है वह गड़बड़ाने लगता है....पंचम में सूर्य हो तो माणिक धारण करना शुभ फलदायी होता है..पर यहां भी पुरी कुंडली देखकर ही रत्न धारण करे क्योंकि रतन धारण करने के लिए आपकी जन्मकुंडली में बहुत से सुत्र देखने पड़ते हैं
