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रविवार, 28 जनवरी 2018

राहु ओर रोग मे वाघा भाग _2

राहु एवं रोग निदान मेंवाघा भाग 2

देने वाला छायाग्रह है I अत: यदि रोगी क्री राहु की महादशा अंतर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा  चल रही हो, तो उसके शरीार में विद्यमान राहु की adrishya Paraवैगनी किरणे  उनकें उपच्चार में बाधायें उत्पनकरती हैं, आरोग्य मे वाघा  कर घोर निराशा  उत्पन्न करती हैं, व  साघय रोग  को असघ्य कर देती हैं। Prakriti ke Niyam ke anusar कोइ  भी वस्तु जिस रंग की होती हैं वह उस रंग की इसलिए दिखाई पड़ती है क्योंकि वह  सवकिरणो कोअपने में सोख कर केवल उसी रंग को परावर्तित कर देती हे, जिस -रंग की वह दिखाई दे रही होती है t लाल रंग का गुलाब पुष्प हमे लाल रंग का इसलिये दिखाई देता है, क्योंकि वह अन्य सभी रंगों क्रो अवशोषित कर केवल लाल रंग क्रो बिकर्थित कर देता है । यह प्रकृति न्यूटन के नियम, ‘Similar poles repel each other.’ अर्थात् "समान घुव एक दूसरे को विकर्षिव्र करते है' पर आधारित है । अत: जब रोगी व्यक्ति का एक्स-रे किया जाता है, तो इस सिद्घान्त के आधार पर शरीर में पहले से ही मौजूद पराबैंगनी किरणे एक्स किरणों को विकर्षित कर देती हैं, और एक्स-रे की 'रिपोर्ट' साभान्य आती है, तथा रोगी की आंतरिक खराबी या तकलीफ का पता नही चलता, जबकि रोगी उस पीड़ा को भोग रहा होता है । इस्री प्रकार शरीर मे मोजूद पराबैगनी किरणे 'पेथोलॉंजिकल' जांचों को भी शरीर की आंतरिक गडबड्रियों क्रो उजागर नही करने देती, अत: ऐसी जांचों का परिणाम हमेशा 'नॉर्मल' अर्थात् सामान्य आता है । ऐसी स्थिति में व्यक्ति एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास तथा एक डायब्वनोस्टिक्र लेब से दूसरी डायज्जनौस्टिक लेब मे जाता रहता है, पर न तो उसके रोग का ही सही निदान हो पाता है, और न किसी प्रकार की औषधियों या उपचार पद्धतियों से उसके रोग का समापन ही हो पाता है  जब व्यक्ति चिकित्सा बिज्ञान क्रो आजमाकर निराश हो जाता है, तो वह मंत्र-तंत्र अथवा ज्योतिष जैसे विज्ञानों की मदद लेता है । मंत्र-तंत्र विशेषज्ञ द्धारा मंत्र के निरन्तर जप से उत्पन्न मंत्रशक्तिमय किरणे और ब्रह्माण्ड से प्राप्त पराबैगनी किरणे, दोनो चूंकि एक ही तरंगन्देर्ध्व पर काम करती हैं, अत: पराबैगनी किरणे मंत्ररश्मियो क्रो भी रोक देती है, और मंत्र-तंत्र चिकित्सा से भी कोई बिशेष लाभ नहीं होता । मंत्ररस्मियां शरीर में
उपस्थित पराबैगनी किरणों से टकराती हैं, और समाप्त हो जाती है । ऐसे समय मे पीडित व्यक्ति ज्योतिषी देवज्ञ से परामर्श करता है जीवन मेंराहु की अन्तर्दशा पहले आती है, उसके बाद ही वृहस्पति (गुरु) की दशा का आगमन होता हे I राहु के समय के दौरान व्यक्ति धोखेबाजी और जालसाजी के ही संपर्क में आ पाता है, चाहे वे मंत्र-तंत्र. चिकित्सा, ज्योतिष किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो । और इस प्रकार व्यक्ति का समय व धन बर्बाद ही होता है
यद्यपि वह निराश हो चुका होता है, लेकिन समाधान की प्रबल आवश्यकता उसे एक के बाद दूसरा दरवाजा खटखटाने को बाध्य कर देती है I जब तक राहु का समय चल रहा होता है, तब तक वह लगातार यहां से वहां और इधर से उधर भटकता रहता है I इस समय के दौरान यदि यह किसी अच्छे ज्योतिषीके संपर्क में आ  भी जाता है, जो पराबैगनी किरणों का अवरोधक प्रभाव उपाय के द्वारा उसकी जन्मकुषडली का भलीभांति विश्लेषण करने  के वाद उसकी समस्या का समाधान कर सकता हो परन्तु राहु उसे सही ज्योतिषी से परामर्श लेने नहीं देता और वह गलत ज्योतिषीय निदान कर बैठता हे I ऐसे समय में  उदाहरण के लिये यदि  ईराक-अमेरिका युद्ध को देखें, तो हमे ज्ञात होगा कि जब 'स्कड' (Skud) नामक 'मिसाइल‘ या आग्नेयास्त्र चलाया जात्ता था, तो उसे 'पैट्रियांट' (Patriot) नामक आग्नेयास्त्र मारकर गिरा देता था । इसी प्रकार का विवरण रामायण, महाभारत व हमारे अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी है, जिसमे जब एक ओर से एक विनाशकारी वाण चलाया जाता था, तो उसे दूसरी ओर से एक विध्वंसक विपरीत वाण संधान द्वारा नष्ट कर दिया जाता था । एक प्रकार से देखा जाये, तो वर्तमान युग की मिसाइलें हमारी प्राचीन मिसाइलों (बाणों) का ही आधुनिक संस्करण है I
यदि मंत्ररश्मियों क्रो 'स्कड' मिसाइल मान ले, तो राहु रश्मियां ‘पैट्रियॉट' का काम करती हे I यही कारण है, कि राहु की अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा में मंत्र-तंत्र का लाभ प्रतीत नहीं होता । वास्तव पे मंत्र तो अपना ज्योतिष विद्या उपायों फे बिना उसी प्रकार है, जिस प्रकार आत्मा के बिना शरीर । महर्षि पराशर ने उपायों पर बहुत अधिक बल दिया है । उन्होंने जो उपाय सुझाये, उनमें जरूरत्तमन्दो व याचकों को भोजन कराना, रत्न पहनना, यंत्र धारण करना, ग्रह विशेष के तांत्रोक्त मंत्र का जप करना व औषधीय ज़ड्रीडबूटियों से स्नान करना इत्यादि उपाय शामिल हैं I इन सभी का विस्तृत विवेचन किया है लाल किताब के अनुसार भी उपाय भी प्रभाव शाली है दान के पीछे तर्क यह है, कि इससे रोग क्रो आरोग्य न होने के लिये जिम्मेदार किरणों को विकर्षित किया जा सकता है तथा पीडित व्यक्ति को लाभ पहुंचाया जा सकता है ।हमारे महर्षिगण, जो उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे, उन्होंने विभिन्न तरंगदेथ्यों के प्रभाव का अध्ययन किया, और उसी आधार पर विभिन्न वस्तुओं की तरंगदेर्ध्व के निर्धारण मेँ समर्थ हुए तथा उन्होंने ऐप्ती विशिष्ट वस्तुओ का ही वितरण जरूरत्तमन्दो में करने का परामर्श दिया a दान की इस प्नब्रिज्या का दोहरा लाभ होता है
अर्थात् व्यक्ति पेट की क्षुधा को शांत करने के लिये कौन सा पाप नहीं कर सकता? अत: एक और भूखे व जरूरतमंद लोगों को भोजन कराकर, जहां व्यक्ति उन्हें चोरी, डकैती, हिंसा, छोना-झपटी, लूटमार व अन्य आपराधिक कृत्यों को करने से बचा सकता है, वही दूसरी ओर दान प्राप्त करने वाले की आत्मा का अवचेतन भाग, निश्चित रूप से दानी व्यक्ति को आशीर्वाद देता है, और उसकी तक्लीफ या पीडा कम होने जातीहै
अपने पास से पैसा निकालकर दूसरों पर खर्च करना बहुत मुश्किल है, परन्तु ऐसा करने वाला सदैव सुखी जीवन भोगता है लोक ओर परलोक के सुख पाता है
इस तथ्य पर पिछले लेखों  में पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है कि राहु की किरणे अदृश्य होतो हैं I वे मानवजाति को गुप्त रूप से प्रभावित करती हैं । अत: जब व्यक्ति की राहु की दशा या अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा चल रही होती  है, तब परावैगनी किरणे शरीर में विद्यमान होतो हैं I यदि व्यक्ति इस समय दोरान किसी रोग से पीडित होता है, तो शरीर में पहले से विद्यमान राहु की किरणे  में न तो दवाई क्रो काम करने देती हैं, और न ही रोगी को ऊन्य किसी "उपचार से ठीक होने देती हैं I शनि से संबंधित चर्चा के अन्तर्गत यह जा चुका है, किं रुनि विलम्ब का ग्रह है, रुकावट का ग्रह है,  और राहु के लिये "शनिवत राहु  राहु 'सूत्र का प्रयोग किया गया है , कि राहु शनि की भांति कार्य करता है । परन्तु राहु किरनें (परावैगनी किरणे) शनि की किरणों से ना केवल ज्यादा ताकतवर हें,ओर  अदुश्व भी हें, अत: यदि शनि विलम्ब का कारक हैं, तो उससे भी अदिक विलम्ब का कारक है जो अपनी अद्श्य प्रकृतिक्श  विलम्व के कारण रोग  का कारण भी पता  चलने नही देता  यदि शनि रुकावट का कारक है, तो राहु उ्स्से भी अघिक शक्तिशाली तथा अदृश्य वाघा का  जनक है यद्यपि शनि निराशा का ग्रह है, तो राहु घोर निराशा को  चरमशिखर घर पहुंचा

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

राहु ओर रोग

: राहु एक छाया ग्रह है,जिसे चन्द्रमा का उत्तरी ध्रुव भी कहा जाता है,इस छाया ग्रह के कारण अन्य ग्रहों से आने वाली रश्मियां पृथ्वी पर नही आ पाती है,और जिस ग्रह की रश्मियां पृथ्वी पर नही आ पाती हैं,उनके अभाव में पृथ्वी पर तरह के उत्पात होने चालू हो जाते है,यह छाया ग्रह चिंता का कारक ग्रह कहा जाता है इस तरह राहु रोग निर्धारण मे वाघ खड़ी करता हैयह अदृश्य ग्रह है  इस के कारण ही इसे ‘मूत-पिशाच, गुप्त भेद, गुप्त मन्त्रणा, धोखेबाजी आदि का कारक माना जात्ता है I यह पेट के कीडों का भी कारक है विद्युत तरंगें तथा वायुमण्डल की अन्य तरंगें दृष्टिगोचर नहीं होती  तथापि उनका प्रभाव सर्वविदित है t अदृश्य तरंगो द्वारा किसी भी व्यथित के शरीर के भीतर विद्यमान रोग का पता चलाना आज आम वात  हो गयी है  यदि हम सूर्य किरणों की ओर ध्यान दे, तो दो किरणे, जो दृष्टिगोचर नहीं ढोती, उनका प्रभाव काफी समय से सिद्ध किया जा चुका है  तूर्य की साक्ष किरणों और आकाशीय ग्रहों का परस्पर क्यद्ध सम्बन्थ है और इस रहस्यमय ज्ञान से कैसे लाभ उठाया जा सकता है
हिंन्दू धर्म के अनुसार सूर्य के रथ में सात घोड़े हैं  इन्हीं सात घोडों पर अन्वेषण न्यूटन ने अपनी पुस्तक में किया और नोवल पुरस्कार प्राप्त किया । न्यूटन के अनुसार यदि हम सूर्य प्रकाश के स्पैवट्रम की और ध्यान दें, तो दो रंग, अवरक्त तथा पराबैगनी, अदृश्य होने के कारण नहीं देखे जा सकते किन्तु अवरक्त फोटोग्राफी तथा अदृश्य किरणों द्वारा व्यक्ति के शरीर के भीतरी मार्गों का फोटो लेना इन्हीं किरणो द्वारा सम्भव हे i सूर्य-किरण पद्धति के अनुसार, जो मी वस्तु जिस रंग की होती है; वह अन्य रंगीं को अपने मे सोख लेती है, लेकिन उस  रंग क्रो वापस करती है, जिस रंग की वह होती है l वह रंग हमारी ओर जाता है और हम उस
वस्तु का वही रंग मानते हैं  इस प्रणग्लो का ध्यान रखने हुए,किरणो का अध्ययन करे तो जब व्यक्ति की राहु की  कैतु की दशअन्तर दशा -प्रयन्तरदशा चल रही हो तो उस समय उस्नकै शरीर में राहु या कैतु की अट्टश्य किरणे पेहले सै ही ऐविद्यमान होती हैं, तथा  क्षरश्मि (X-I'ays) की अट्टश्य किरणों की वापिस कर देती हैं I अता  क्षरशि्म द्वारा खींचा क्या फोटो शरीर कै अन्दर‘की ठीक वस्तुस्थिति क्रो नहीं बता पाता और हमारी चिकित्सा प्रणाली कहती  है कि क्षरिश्म द्वारा प्राप्त फोटो में सभी कुछ ठीक है I लेकिन यदि सभी कुछ सामान्य है, तो फिर… व्यक्ति रुग्ग क्यों? यही स्थिति अन्य परीक्षणों की भी  होती है I अत यदि राहु  कैतु की अन्तर्दशा  प्रत्यन्तर्दशा चल  रही हो, तो उस समय सभी परीक्षण सही वस्तुस्थिति नहीं दर्शाते, और व्यक्ति कै रोग का निदान नहीं हो पाता ऐसी अवस्था में
ऐसै समय में न तो मन्त्र ही प्रभाक्शाली होते हैं, और न किसी भी दिव्यात्मा कै द्वारा दिया क्या आशीर्वाद ही काम करता है यांदे वह व्यक्ति स्वयं ही दिव्यात्मा हो, तो उसका दिया हुआ शाप भी काम नहीं करता है राहु की दशा में मंत्र जप भी निष्कलं अनुभव होता है । ऐसा क्यो होता है ? ऐसा इसलिए होता हैं, कि जब मन्त्र का जप करते है, तो उस समय मन्त्र ध्वनि से विशेष किरणे बनती हैं, और वे कार्य सिद्धि के लिए
आगे बढती हैं, लेकिन वे किरणे राहु की किरणों से टकराती हैं ओंर
निष्किथ ही जाती हैं I राहु की अन्तर्दशा में यह होता रहता है, और उस
समय उपाय का लाभ इसीलिए प्रतीत नहीं होता है  वास्तव में मन्त्र तो .
राहु एवं रोग निर्धारण में त्रुटि अपना कार्य कर ही रहा होता है  मन्त्र जप न करने क्री स्थिति मे जो और भी हानि होती, उसका सही अनुमान लगाना सम्भव नहीं हो पाता 1968 मेँ गैस्टन और मेनाकर ने एक निबन्ध प्रकाशित किया, जिसमे उन्होंने पीनियल ग्रंथि को फोटोरिसेप्टर (प्रकाश संवेदी केन्द्र) के रूप में सिद्ध किया  यह खोज मानवीय मस्तिष्क में पीनियल नामक महत्त्वपूर्ण ग्रंथि के बिषय में थी  पीनियल ग्रंथि का प्रकाश से सम्बन्ध हैं 1 बिकान्सिन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एचएस. स्सीडर ने अपने अनुसंधान के द्वारा बताया, कि रोशनी का पीनियल पर प्रभाव पड़ता है  पीनियल ग्रंथि से एक हॉर्मोन निकलता है, जो सिरोटोनिन कहलाता हे  मन्द और शीतल प्रकाश में खाव की मात्रा अधिक होती हे  इसी कारण गीता में कहा गया हैं -या निशा सर्वभूतानामू त्तस्याम जाग्रति संयमी' ' -अर्थात् जिस समय संसार सो रखा होगा  उस रात्रि के समय में योगी पुरुष जागते रहते है और साधना में संलग्न रहते हैं I क्योकि अरात्रि मे क्री गई उपासना मे सिंरोटोनिन का स्राव अथिक होता है, और योगी पुरुष रात्रि क्रो ही उपासना करतेहै  तीत्मा प्रकाश में इस रस का स्राव कम हो जाता है . जिस प्रकार माचिस की तीली में अग्नि रहती है, लेकिन रगढ़ने पर ही वह प्राप्त होती हे I इस्री प्रकार पीनियल ग्रंथि में दिव्य शक्तियां हैं, लेकिन अंधकार में अभ्यास से ही वे प्राप्त हो सकती हैं ।
परोक्ष दर्शन क्री यह प्रक्रिया एक्स और गामा किरणों की तरह होती है I 'एक्स-किरण जिस प्रकार शरीर की भीतरी संरचना तथा गामा किरण  इस्पप्ल जेसी कठोर वस्तु की आन्तरिक बनावट का भी भेद खोल देती हैं, इसी प्रकार पीनियल ग्रथि को रश्मियों के माध्यम से सामने बैठे व्यक्ति के बिषय मे कुछ भी बताया जा सकता है I वृक्षों में भी सिरोटोनिन से मिलतान्तुलता एक स्राव 'मिलटोनिन' पाया जाता हैं  यह हार्मोन क्ले, पीपल तथा बरगद जैसे पेडों मे स्वाभाविक मात्रा मे माया जाता है ।इस लिए धार्मिक कार्यो तथा विवाह के समय क्ले के तने और पत्तों का प्राय: प्रयोग किया जाता था I पीपल के वृक्ष को मी इसीलिए पवित्र मानते हैं । गीता में श्रीकृष्ण ने पैडो मे स्वयं क्रो अश्वत्थ्व(पीफ्त) बताया है I स्मरण रहे, कि पीनियल ग्रंथि आज्ञा चक्र के घास होती है I आज इतना ही वाकी अगले लेख में आचार्य राजेश


महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...