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सोमवार, 28 मई 2018

ज्योतिष का ज्ञान

वैदिक काल से ज्योतिष का प्रचलन रहा है। ज्योतिष वेद का छठां अंग भी कहा जाता है। समय की पहिचान बिना ज्योतिष के ज्ञान के नही हो सकती है। 

इसी प्रकार से आसमानी गह भी ज्योतिष से ही कालान्तर के लगातार ज्ञान को प्राप्त करने के कारण ही पहिचाने जाते है। जब तक ज्योतिष का ज्ञान नही था तब तक पृथ्वी स्थिर थी और सूर्य चन्द्रमा और तारे चला करते थे। जैसे ही ज्योतिष का ज्ञान होने लगा तो पता लगा कि सूर्य तो अपनी ही कक्षा मे स्थापित है बाकी के ग्रह चल रहे है। लेकिन ऋषियों और मनीषियों को बहुत पहले से ज्योतिष का ज्ञान था उन्हे प्रत्येक ग्रह के बारे मे जानकारी थी,यहां तक कि मंगल ग्रह के बारे मे भी उनका ज्ञान प्रचुर मात्रा मे था और उन्होने मंगल ग्रह की पूरी गाथा पहले ही लिख दी थी। पुराने जमाने से सुनता आया हूँ- "लाल देह लाली लसे और धरि लाल लंगूर,बज्र देह दानव दलन जय जय कपि शूर",इस दोहे को लिखा तो तुलसीदास जी है लेकिन उन्हे इस बारे मे कैसे पता लगा कि मंगल का रंग लाल है और जब मंगल को खुली आंख से देखा जाये तो लाल रंग का ही दिखाई देता है सूखा ग्रह है इसलिये बज्र की तरह से कठोर है,साथ ही ध्वजा पर लाल रंग का होना मंगल का उपस्थिति का कारण भी बनाता है,मंगल के देवता हनुमान जी के विषय मे उन्होने लिखा था। इस बात का सटीक पता तब और चला जब अमेरिका के नासा स्पेस से वाइकिंग नामका उपग्रह यान मंगल पर भेजा गया और उसने जब सन दो हजार में मंगल के ऊपर की कुछ तस्वीरे भेजी तो उसके अन्दर एक फ़ेस आफ़ मार्स के नाम से भी तस्वीर आयी। यह तस्वीर बिलकुल हनुमान जी की तस्वीर की तरह थी,इस तस्वीर को उन्होने सन दो हजार दो तक नही प्रसारित की,इसका भी कारण था,वे अपने को बहुत ही उन्नत और वैज्ञानिक भाषा मे दक्ष मानते थे और जब भी उनका कोई टूरिस्ट भारत आता था और भारत मे जब हनुमानजी के मंदिर को देखता तो वह मजाक करता था और "मंकी टेम्पिल" कह के चला जाता था। इस फ़ेस आफ़ मार्स ने अमेरिका के वैज्ञानिक धारणा को चौपट कर दिया और उन्हे यह पता लग गया कि भारत मे तो आदि काल से ही मंगल को हनुमान जी के रूप मे माना जा रहा है।विज्ञान जहाँ समाप्त हो जाता है वहाँ से ज्योतिष विज्ञान शुरु होता है !

जिस प्रकार से विज्ञान के अन्दर जो भी धारणा पैदा की जाती है उसके अनुसार रसायन शास्त्र भौतिक शास्त्र चिकित्सा शास्त्र आदि बनाये गये है। लेकिन जितनेी तत्व विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरते है उनके अन्दर केवल चार तत्व की मीमांसा ही की जा सकती है। बाकी का एक तत्व जो गुरु के रूप मे है वह विज्ञान न तो कभी प्रकट कर पाया है और न ही कभी अपनी धारणा से प्रकट कर सकता है। शरीर विज्ञान को ही ले लीजिये,सिर से लेकर पैर तक सभी अंगो का विश्लेषण कर सकता है,हड्डी से लेकर मांस मज्जा खून वसा धडकन की नाप आदि सभी को प्रकट कर सकता है कृत्रिम अंग बनाकर एक बार शरीर के अंग को संचालित कर सकता है। फ़ाइवर ब्लड को बनाकर कुछ समय के लिये खून की मात्रा को बढा सकता है लेकिन जो सबसे मुख्य बात है वह है प्राण वायु यानी गुरु की वह पैदा नही कर सकता है जब प्राण वायु को शरीर से जाना होता है तो वह चली जाती है और शरीर मृत होकर पडा रह जाता है उसके बाद शरीर वैज्ञानिक केवल पोस्ट्मार्टम रिपोर्ट को ही पेश कर सकता है कि ह्रदय रुक गया मस्तिष्क ने काम करना बन्द कर दिया अमुक चीज की कमी रह गयी और अमुक कारण नही बन पाया। नही समझ पाये आज तक कि गुरु क्या है लेकिन ज्योतिष शास्त्र मे सर्वप्रथम गुरु का विवेचन समझना पडता है गुरु जिस स्थान से शुरु होता है अपने अन्तिम समय तक केवल काल की अवधि तक ही सीमित रहता है उसे कोई पकड नही पाया अपने अनुसार पैदा नही कर पाया और न ही विज्ञान के अन्दर इतनी दम है कि वह भौतिक रूप से गुरु को प्रदर्शित कर सके। जिस दिन यह गुरु भौतिकता मे समझ मे आने लगेगा उस दिन विज्ञान की परिभाषा पराविज्ञान के रूप मे जानी जायेगी

शुक्रवार, 18 मई 2018

ज्योतिष ज्योतिषी और जातक

एस्ट्रोलॉजी एक विज्ञान है यह बात सुप्रीम कोर्ट ने भी कही है। जो लोग ज्योतिष के नाम पर 'भ्रामक' प्रचार कर जनता को मूर्ख बना रहे हैं उन पर रोक लगाई जानी चाहिएआज हमें प्रत्येक चैनलों पर 'भ्रामक' बातें सुनने को मिलती हैं। जैसे शनि ग्रह को ही लें। 

एक चैनल पर दिखाए गए प्रोग्राम से प्रेरित होकर यूपी के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी। ऐसी खबर समाचार पत्रों में छपी थी। मित्रोंज्योतिषशास्त्र ज्ञान की एक वृहद प्रणाली है, जिसमें नक्षत्रों और ग्रहों की स्थिति के आधार पर बहुत जटिल गणनाएं एवं उनके मध्य विद्यमान पारस्परिक संबंध तथा मानव-जीवन सहित पृथ्वी पर विभिन्न घटनाओं आदि की विशाल व्याख्याएं अंतर्भूत हैं । परन्तु आज ज्योतिषविषय के साथ यह कैसी खिलवाड़ हो रही है ऎसा लगता है कि कोई इसको देखने वाला या धनी धोरी बचा ही नहीं है पिछले कई वर्षों से हम देखते चले आ रहे हैं कि ज्योतिष विषय विशेषज्ञों की जहाँ देखो वहीं बाढ़ सी आ गई है,आज-कल टीवी पर प्रसारित कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा ज्योतिष को तवज्जो दी जाने लगी है, जिसकी वजह से ज्योतिषी भविष्‍यवाणी के बारे में जानकरी देते है कोई भी चैनल फ्री में किसी भी कार्यक्रम को पेश नहीं करता। अतः जो लाखों रुपए खर्च कर टीवी पर अपना प्रचार करवाते हैं वे जनता ‍से ही राशि लूटकर चैनल वालों को देते हैं। हमने देखा होगा कि एक लोकप्रिय कलाकार भी लॉकेट व यंत्रो का प्रचार करके उसको खरीदने के लिए लोगों को प्रेरित करते दिखाई देते हे।टी. वी. का सायद ही कोई चैनल होगा जिस पर ज्योतिषी अपनी दुकान चलाते न मिल जायें,कई ज्योतिष एक घंटे में, कई ग्यारह घंटों में तो कई एक सौ एक प्रतिशत काम होने की ग्यारंटी देते हैं। सो ऐसे ही ज्योतिषियों ने ज्योतिष का माखौल उडा़या है जिससे आम जनता का ज्योतिष पर से विश्वास उठ गया है। इस प्राचीनतम विद्या को बदनाम किया है। ऐसे लोगों पर अवश्य ही कार्रवाई होनी चाहिए। और ऐसे भ्रामक विज्ञापनों को समाचार पत्रों को भी नहीं छापना चाहिए। कोई भी ज्योतिष भगवान नहीं होता जो ग्यारंटी दें और वह पूरी हो जाएँ। सिर्फ और सिर्फ 'भ्रामक' प्रचार फैला कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। परन्तु जब इन तथा कथित ज्योतिषियों से कोई पत्रकार या बुद्धिजीबी व्यक्ति कोई बात सैद्दान्तिक या वैज्ञानिक तरीके से पूछने लगता है तो मुझे नहीं लगता कि कोई ज्योतिषी उनको उनकी ही भाषा में समुचित जबाब दे पाता है और जब जब इस प्रकार के मौके आये तब तब आज के ज्योतिषियों ने ज्योतिष को सर्मिन्दा ही किया, मुहतोड़ जबाब देने में अक्षम ही रहे । जिसका मुझे एक मुख्य कारण ये भी लगाकि जितने भी टी. बी. चैनल वाले लोग हैं बो कभी विषय विशेषज्ञों ( ज्योतिष विभागाध्यक्षों या जिन्होंने ज्योतिष विषय में ही महा विद्यालयों में विधिवत शिक्षा पाई हो ) को चैनलों पर नहीं लाये, चाहे कारण कोई भी रहा हो / जब देखो तब आपको अधिकांश ऎसे लोग ही टी. बी. पर ज्योतिष के बारे में चर्चा करते दिखाई देंगे जिन्होंने ज्योतिष की विधिवत शिक्षा नहीं पाई है। जो लोग इनकी ठगी के शिकार हो जाते हैं, बो फिर ज्योतिष के बारे मन चाही टिप्पड़ीं करते हैं, अब तो हद हो गई नाचने कूदने वाले लोग भी हनुमान चालीसा बेच कर लोगों के भाग्य बदलने में सक्षम हो गये हैं/ अरे भाई इन का हनुमान चालीसा  इतना प्रभाव शाली है तो खुद दो चार लाकिट पहन कर अरबपति क्यों नहीं बन जाते, सारे दिन किराये के तारीफदारों से क्यों उसकी तारीफ करबाते हवह सेवा या उत्पाद जिस का प्रचार इश्तिहारों के जरिए करना पड़े, कारोबार होता है. आजकल कथा कथितज्योतिषी अरबों रुपया अपने धंधे के प्रचारप्रसार पर फूंक रहे हैं. इस से साफ है कि वे एवज में खरबों रुपए कमा भी रहे हैं. न्यूज चैनल्स पर ज्योतिषी स्क्रीन पर बैठे लोगों को ग्रहनक्षत्रों की चाल और गणना किए विना ही  परेशानियों को दूर करने के उपाय बता रहे हैंकोई भी अखबार उठा लें ज्योतिष उस में जरूर मिलेगा. दैनिक राशिफल से ले कर वार्षिक भविष्यफल तक बताया जाता है. कहीं लोग विश्वास करने से इनकार न करने लगें, इस के लिए कुछ अखबार तो 2-3 तरह के भविष्य और राशिफल छाप रहे हैं. एक फलित ज्योतिष तो दूसरा अंक और तीसरा टेरो कार्ड वाला यानी कोई न कोई तो आप की परेशानियों के नजदीक होगा ही. ये भविष्यफल सट्टे के नंबर के सरीखे होते हैं. इन में से जो आप को माफिक बैठे, उसे मान लो.

इतने बड़े पैमाने परगलत ढ़ंग से  ज्योतिष का प्रचारप्रसार कभी नहीं हुआ था. सीधी सी बात यह है कि ठगी के इस धंधे में अब प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है अब हर कोई यह काम कर पैसा कमा रहा है. दिलचस्पी की बात यह है कि ज्योतिष के धंधे में अब महिलाएं भी तेजी से टआ रही हैं. इन्हें घर में बैठी रहने वाली महिला ग्राहकों को रिझाने में सहूलियत रहती है. वैसे भी, किसी कारोबार या ठगी पर अब पुरुषों का ही एकाधिकार नहीं रह गया है.नए जमाने के ये हाईटैक ज्योतिषी ऐरेगैरे नहीं हैं. ये पूरे आत्मविश्वास से बताते हैं कि आप की परेशानी का हल क्या है. मसलन, एक चैनल पर  ज्योतिषी टेबल पर लैपटौप ले कर बैठता है. कार्यक्रम शुरू होता है तो एंकर ज्योतिषी की ब्रह्मा तक पहुंच का बखान कर एकएक कर फोन सुनती है. एक फोन करने वाली जिसे कौलर कहा जाता है, पूछती है कि पंडितजी, मेरे बेटे का जन्म 20 अगस्त, 1993 की रात9-40ट बजे हुआ है. उस का कैरियर क्या होगा? उसे किस तरह की नौकरी मिलेगी?

पंडितजी की-बोर्ड के बटन खटखटा कर कुछ ही सैकंडों में कुंडली नाम के सौफ्टवेयर की कृपा से जन्मकुंडली बना कर धीरगंभीर आवाज में बताते हैं कि आप के बेटे को नौकरी किसी सौफ्टवेयर कंपनी में मिलेगी. उस का बुध थोड़ा कमजोर है, बेटे को कहे गणेश का पूजन करें.ओर कुछ उपाय जो हम यहां नहीं बता सकते आप हमें पर्सनली फोन पर पूछ ले फोन करने वाली मां यह सुन कर धन्य हो जाती है कि बेटे की नौकरी पक्की हो गई. . दूसरे कौलर बेटी की शादी को ले कर परेशान हैं. फोन करते हैं, पंडितजी तुरंत जन्मपत्री देखते हैं और बताते हैं कि आप की बिटिया को आंशिक मंगल है, लिहाजा, शादी में मामूली अड़चन आएगी. लेकिन ये उपाय करें. शादी जल्दी  हो जाएगी. फोन करने वाला पिता गद्गद हो जाता है कि जरा सी अड़चन है क्या हम आपको यहा पर नहीं बता सकते पर्सनली बात करें

इस तरह की ढेरों शाश्वत चिंताएं और परेशानियां टैलीविजन वाले पंडित को बताई जाती हैं. वह फुरती से ग्राहकों को निबटाता जाता है. उस का यह विज्ञापनीय कार्यक्रम सालछह महीने चलता है, फिर हैरानपरेशान लोग उस ज्योतिषी के स्क्रीन पर बताए गए फोन नंबरों पर संपर्क करते हैं और हजारों रुपए फीस के दे कर अपनी कथित समस्या का कथित हल निकलवाते हैं. अगर निर्मल बाबा छाप टोटकों से ग्राहक संतुष्ट नहीं होता तो ये तांत्रिक क्रियाओं के नाम पर भी पैसे ऐंठने में चूकते नहीं.  धड़ल्ले से ज्योतिषी और उन से विज्ञापनीय कार्यक्रम का  लेने वाले चैनल्स जिन्हें शुल्कोंसमाज से या लोगों के भले से कोई सरोकार नहीं.सव पैसे लूटने मे लगे हैं सब क्या है? .

धंधा बनाए रखने और बढ़ाने के लिए अब ये कथा कथित ज्योतिषी तरहतरह के नामों से संगठन बना कर शिविर लगाते हैं और ग्राहकों को पटाते हैं. ज्योतिष शिविरों में हर तरह के लोग आते हैं. एक शिविर में यह प्रतिनिधि गया और पूरे दिन नजारा देखा तो समझ आया कि किसी का दांपत्य कलह भरा है, किसी की पत्नी या पति कहीं अफेयर में फंस गया है तो कोई बेटी के गलत लड़के से प्रेमप्रसंग को ले कर तनाव में है. बेटे के जौब के बारे में जानने के लिए भी लोगों की भीड़ उमड़ती है. कोई असाध्य बीमारी से छुटकारा पाने के लिए शिविर में आया है तो कोई दफ्तर में बौस या सहकर्मी से तंग है. ऐसी ढेरों समस्याओं पर ज्योतिषियों ने निशुल्क परामर्श दिया लेकिन पुख्ता व गारंटीशुदा समाधान के लिए विजिटिंग कार्ड दे कर अपने दफ्तर में आने को कहा.

यह शिविर कहने को ही निशुल्क होते हैं, मकसद ग्राहकों की भीड़ इकट्ठा कर, बाद में उन्हें निचोड़ने का होता है और इस में वे कामयाब भी होते हैं. ये सभी ज्योतिषी पढ़ेलिखे और अधिकांश सरकारी पद पर सम्मानजनक नौकरी कर रहे थे और कुछ रिटायरमैंट के कगार पर थे जो आने वाले वक्त में मुफ्त की मलाई जीमने का इंतजाम कर रहे थे. इन का व्यक्तित्व और वाक्पटुता देख लोग प्रभावित थे पर यह नहीं सोच पा रहे थे कि यह शुद्ध ठगी है. लैपटौप और कंप्यूटर का दुरुपयोग करते ये ज्योतिषी किसी और का भले ही भविष्य न संवार पाएं, अपना भविष्य जरूर संवार चुके थे. 8-10 टेबलों पर बैठे इन ज्योतिषियों में कोई आपसी बैर नहीं था. इन की हालत अदालत के बाहर बैठे मुंशियों और दस्तावेज लेखकों जैसी थी कि जो जिस के पास आ गया वह उस का स्थायी ग्राहक हो कर रह गया. इस में कोई शक नहीं. और वे रहेंगी भी. लेकिन पढ़ेलिखे लोग ज्यादा आत्मविश्वास की कमी के शिकार हैं. उन के दिलोदिमाग में यह बात गहरे से बैठी है ज्योतिषियों के जरिए उन की समस्याएं हल कर इसलिए हमें कोई कोशिश नहीं करनी है. जबकि हकीकत यह है कि लोग अकर्मण्य और जीवन की वास्तविकताओं से भागने वाले हैं. वे बगैर मेहनत किए पैसा चाहते है

तगड़ी मुरगी हो तो ज्योतिषी एक एलबम निकालते हैं जिस में नामीगिरामी नेता, फिल्मकार, व्यापारी, उद्योगपति, प्रोफैसर, डाक्टर, पत्रकार और दूसरे लोग इन के साथ होते हैं. इस का वाजिब असर पड़ता है और लोग यही सोचते हैं कि कुछ न कुछ तो सच इस में होगा जो अपने क्षेत्र के कामयाब लोग इन के पास आते हैं. ज्योतिषियों के संगठन और विज्ञापन. ये शक्तिवर्धक दवाइयों की तरह हैं कि एक बार आजमा कर देखने में हर्ज क्या है. ये वैसे इश्तिहार हैं जिन्हें देख लोगों को खुदबखुद ही कमजोरी का एहसास होने लगता है.

हर्ज यह है कि इस से समाज पिछड़ रहा है. लोगों की मेहनत और कोशिश का श्रेय ठगी के खाते में ई कानून ऐसा नहीं है जो इन कुकुरमुत्ते से उगते इश्तिहारी ज्योतिषियों की गिरहबान पकड़े. अगर है भी तो लोग उस का सहारा लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. किसी डाक्टर की लापरवाही से मरीज मर जाए या खतरे में पड़ जाए तो उस की पिटाई कर दी जाती है, और अदालत का दरवाजा खटखटाया भी जाता है. डाक्टर चूंकि जानकार होता है इसलिए उसे चुनौती दलीलों के जरिए दी जा सकती है ज्योतिषी को नहीं क्योंकि उस की कोई जिम्मेदारी अपने कथित ज्ञान और विद्या के बाबत नहीं बनती और न ही ज्योतिष के कारोबार का कोई सबूत या वजूद होता है.ध्यान रहे ! ये ज्योतिष बो विषय है, जहाँ आज का विज्ञान फेल होता दिखाई देता है, वहाँ से ज्योतिष विषय प्रारम्भ होता है / उदाहरण स्वरूप देखें जब रोगी के बारे में चिकित्सक मौन हो जाता है, तब रोगी के घर वाले लोग रोगी के भविष्य के बारे में ज्योतिषी से सलाह लेते रहे हैं और आज भी लेते हैं / ये देश के कर्णधार नेता लोग चुनाव लड़ते हैं तोज्योतिषी से सलाह लेते हैं / बड़े बड़े कारोबारी लोग जब अपने कारोबार में अपने साइन्टिष्टों व सलाहकारों सहित फेल हो जाते हैं और कारोबार डूबने की स्थिति में आ जाता है, तब ज्योतिषियों से सलाह लेते हैं/ जब बैबाहिक जीवन में तलाक की नौवत आ जाती है या पति पत्नी में आपस में सामाजस्य नहीं बैठ पाता है, तब लोग ज्योतिषियों से सलाह लेते हैं क्यों ? जहाँ पर सैकेण्ड से भी छोटीं इकाई काम आतीं हों, जहाँ केवल सूर्योदय निकालने के लिए सायन्ठीटा और टेन ठीटा काम आते हों, जहाँ अक्षांश और देशान्तर के बिना गणित प्रारम्भ ही न हो पाता हो, जहाँ ध्वनि ( साउण्ड ) के नियमों को पूरी तरह काम में लेना पड़ता हो , जहाँ प्रकाश ( लाइट ) के नियमों का प्रयोग होता हो , जहाँ देश काल परिस्थिति को जानने के लिए भूगोल की जान कारी अति अनिवार्य हो , जहाँ जीव विज्ञान की जान कारी अनिवार्य हो ,  उस विषय को  ऎसे ब्यक्ति देख रहे हों , जिन्हों ने उपर्युक्त विषयों का कभी सिंगावलोकन भी न किया हो , जिन्हों ने हाई स्कूल भी विज्ञान  विषय ले कर उत्तीर्ण न कर पाया हो , बो लोग उस विषय के वारे में सिबाइ बेवेकूफ बनाने के और क्या करेंगे  आचार्य राजेश

जन्मकुंडली ओर आप का भविष्य

जब किसी ज्योतिषी से आप अपनी कुंडली बनवाते हैं; तो वह सॉफ्टवेर पर डालकर आपकी कुंडली बना देता हैं
।यह तरीका सरल  है ; और ज्योतिष के तमाम दशा, महादशा, अन्तर्दशा के साथ निकल आते है।परन्तु इस सॉफ्ट
वेर के द्वारा दी गयी फल गणना किसी काम की नहीं होती।चाहे वह परम्परागत ज्योतिष हो या लाल किताब में
।जिस प्रकार ऊंगलियों के निशान एक से नहीं होते, कुंडली भी एक सी नहीं होती।लग्न में ग्रहों की स्थिति एक जैसी भी हो, तो राशियों की स्थिति का अंतर होता है, वह एक जैसी हो; तो ग्रहों के उदय बल सहित 6 बलों का नात्र होता है, नक्षत्रों, वर्ण,गण आदि का अंतर होता है।फल गणना पर इनका गुणात्मक अंतर होता है।इन सबको सॉफ्टवेर से कण्ट्रोल नहीं किया जा सकता
ग्रह, राशि, नक्षत्र, इनकी दृष्टि, इनके बलाबल के अतिरिक्त कुंडली के प्रथम एवं द्वितीय पृष्ठ पर दिए गये दर्जनों प्रकार के आंकड़ों – का समावेश होता है।लाल किताब को लोग सरल समझते है; पर इसमें इतने प्रकार के चार्ट है कि उन सबकी संख्या कई दर्जन हो जाते है।बिना इन सबको मिलाये राशि, भाव और ग्रह के सहारे फल की घोषणा करने वाला ज्योतिषी झोला छाप डॉक्टरों की तरह होता है; जो कुछ पेटेंट दवाओं के सहारे अपनी दूकानदारी चलाता है।एक लाल किताब के विवरणों की विस्तार से व्याख्या करने और उनसे निकलने वाले नये तत्त्वों की व्याख्या में बड़े साइज़ के (11”x 18”) के 2100 पेज भी कम पड़ गये।इसे कोई भी व्यक्ति सरसरी नजर देखकर कैसे बता सकता है
होता यह है कि ये लोग चार्ट से दशा-महादशा – अन्तर्दशा को देखकर या कुंडली के ग्रहों की स्थिति देख कर फल एवं उपाय बता देते है।सरल काम है।कोई साधारण व्यक्ति भी कर सकता है, जो ज्योतिष का थोङा सा भी ज्ञान रखता हो 
पर न तो इस फल का कोई अर्थ है, न ही उपाय का।ऐसा उपाय आपको हानि में डाल सकता है
कुंडली में कोई ग्रह खराब हो रहा हो, तो ये लोग तुरंत उस ग्रह का दान करवा देते है या पानी में बहवा देते है।कुछ तो ऐसे भी होते है कि दान भी करवा देते है और रत्न भी फना देते है।जैसे- शनि की गड़बड़ी है, तो लोहे का छल्ला पहन लो और लोहा-तेल दान करो।अब एक तरफ लेना लेना बढ़ा दो, दूसरी तरफ उसे फेंको।यह कैसा उपाय है 
कभी-कभी आपके भाग्य का ग्रह ही किसी कारण वश बुरा प्रभाव देने लगता है।आजकल लालकिताब का बहुत जोर है।अपने को इस विद्या का पारंगत मानने वाले कई व्यक्तियों ने जातक से उसके भाग्य का ग्रह ही पानी में बहवा दिया।कई व्यक्ति सड़क पर आ गये।ऐसे मेरे ही नहीं; कई प्रसिद्ध ज्योतिषियों के अनुभव रहे है
जो ज्योतिषी यह नहीं जानता कि बुरा प्रभाव डालने वाले ग्रह की वस्तुएं घर में लाना या पहनना उसेक प्रभाव को और बढ़ाना है और शुभ ग्रहों या भाग्य के ग्रहों का दान देना (उच्च ग्रह उसके प्रभाव को कम करना है; वह जातक के लिए कितना हानिकारक हो सकता है, इसे समझा जा सकता है।
कोई शनि का भय दिखाता है, कोई राहु-केतु का; पर ग्रह कोई भी बुरा नहीं होता।कोई न रहे, तो हमारा जीवन ही नहीं रहेगा।कोई भी ग्रह, यदि गलत जगह, गलत राशि के साथ होता है या किसी शत्रु आदि की दृष्टि के दायरे में आता है, तो बुरा प्रभाव देने लगता है।ऊपाय कारण का किया जाता है, उस ग्रह का नहीं।यही 
शनि ही नहीं, बृहस्पति और चंद्रमा जैसे शुभ ग्रह भी व्यक्ति को बर्बाद कर देते है, यदि वे गलत जगह पर हों।लोग शनि को व्यर्थ ही बदनाम करते है।उससे भयानक तो बुध होता है; जो बुद्धि भ्रष्ट करके मनुष्य को दलदल में ढकेल देता हैइस तरह ग्रहों को अच्छा-बुरा कहना केवल भय पैदा करना है।
अतः ज्योतिषी चुनने में सावधानी बरतें।सस्ते के चक्कर में या टी.वी. पर विज्ञापन देखकर फँसे, तो अपना बहुत कुछ बर्बाद कर दे सकते है आज कल तो fb पर या whats up पर गरुप मे अपनी कुंङली  की  फोटो ङालते है ओर कुछ ज्योतिषी जो पुरा ज्ञान नही रखते उसकी व्याख्या  करने लग जाते है मित्रो ज्योतिषी  को चाहिऐ की कुंङली  पर पुरा समय ले सभी चार्ट  देखे कुंङली  पर मनन चिन्तन  करे फिर फल कथन करे तो सही होगा मित्रो मुफ्त के चक्कर  मे अपनी जिन्दगी  से खिलवाङ मत करे जय मा काली 07597718725 09414481324

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

मल मास का वैज्ञानिक रहस्य

आचार्य राजेश

ईस बार मलमास 15 दिसंबर से आरंभ हो रहा है जो 14 जनवरी 2018तक रहेगा। मलमास के चलते दिसंबर के महीने में अब केवल 5 दिन और विवाह मुहूर्त रहेंगे जो कि 8, 9,12,13 व 14 दिसंबर है। इसके बाद अगले महीने 23 जनवरी के बाद ही शादियां होंगी। 15 दिसंबर को ग्रहों का राजा सूर्य रात 8:53 पर धनु राशि में प्रवेश करेगा। इसी के साथ मलमास प्रारंभ हो जाएगा। मलमास प्रारंभ होते ही सभी प्रकार के शुभकार्य मसलन शादी-विवाह, मुंडन, जनेऊ, गृह प्रवेश जैसे कार्यों पर रोक लग जाएगी। 15 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही मलमास समाप्त हो जाएगा और शुभ कार्य पुनः आरंभ हो जाएंगे। हालांकि 15 से 22 जनवरी के बीच शादियों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं होने के कारण शहनाईयों की गूंज 23 जनवरी से ही सुनाई देगी।भारतीय ज्योतिष गणनाओं के आधार पर मलमास अधिक मास या तेरहवें मास के रूप में वर्णित है। सूर्य 12 राशियों में साल भर भ्रमण करते हैं, इसी क्रम में 32 महीना 16 दिन 4 घड़ी के बाद सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती है। जिस माह में सूर्य की संक्रांति नहीं होती है वह मलमास, अधिक मास कहलाता है। यानि लगभग हर तीन वर्ष बाद मलमास पड़ता है.
मान्यता है कि मलमास का वर्ष 396 दिन का होता है, जबकि अन्य वर्ष 365 दिन 5 घंटे 45 मिनट और 12 सैकंड का होता है। धर्माचार्यों के अनुसार भारत में मलमास में केवल राजगीर ही पवित्र रहता है इसीलिए इस अवधि में राजगीर में तैंतीस कोटिदेवी-देवता निवास करते हैं।
इस अवधि में शादी-विवाह, मुंडन, उपनयन आदि को छोड़कर सभी तरह के शुभ कार्य केवल राजगीर में ही होते हैं। आखिर खर मास में क्यों नहीं होते वैवाहिक शुभ कार्य 
इस जगत की आत्मा का केंद्र सूर्य है। बृहस्पति की किरणें अध्यात्म नीति व अनुशासन की ओर प्रेरित करती हैं। लेकिन एक-दूसरे की राशि में आने से समर्पण व लगाव की अपेक्षा त्याग, छोड़ने जैसी भूमिका अधिक देती है। उद्देश्य व निर्धारित लक्ष्य में असफलताएं देती हैं। जब विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ आदि करना है तो उसका आकर्षण कैसे बन पाएगा? क्योंकि बृहस्पति और सूर्य दोनों ऐसे ग्रह हैं जिनमें व्यापक समानता हैं।
सूर्य की तरह यह भी हाइड्रोजन और हीलियम की उपस्थिति से बना हुआ है। सूर्य की तरह इसका केंद्र भी द्रव्य से भरा है, जिसमें अधिकतर हाइड्रोजन ही है जबकि दूसरे ग्रहों का केंद्र ठोस है। इसका भार सौर मंडल के सभी ग्रहों के सम्मिलित भार से भी अधिक है। यदि यह थोड़ा और बड़ा होता तो दूसरा सूर्य बन गया होता। पृथ्वी से 15 करोड़ किलोमीटर दूर सूर्य तथा 64 करोड़ किलोमीटर दूर बृहस्पति वर्ष में एक बार ऐसे जमाव में आते हैं कि सौर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के माध्यम से बृहस्पति के कण काफी मात्रा में पृथ्वी के वायुमंडल में पहुँचते हैं, जो एक-दूसरे की राशि में आकर अपनी किरणों को आंदोलित करते हैं।सूर्य जब बृहस्पति की राशि धनु या फिर मीन में होता है तो ये दोनों राशियां सूर्य की मलीन राशि मानी जाती है. वर्ष में दो बार सूर्य बृहस्पति की राशियों के संपर्क में आता है. प्रथम दृष्टा 15-16 दिसंबर से 14-15 जनवरी और द्वितीय दृष्टा 14 मार्च से 13 अप्रैल. द्वितीय दृष्टि में सूर्य मीन राशि में रहते हैं.
इस कारण धनु व मीन राशि के सूर्य को खरमास/मलमास की संज्ञा देकर व सिंह राशि के बृहस्पति में सिंहस्थ दोष दर्शाकर भारतीय भूमंडल के विशेष क्षेत्र गंगा और गोदावरी के मध्य (धरती के कंठ प्रदेश से हृदय व नाभि को छूते हुए) गुह्य तक उत्तर भारत के उत्तरांचल, उत्तरप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, राज्यों में मंगल कर्म व यज्ञ करने का निषेध किया गया है, जबकि पूर्वी व दक्षिण प्रदेशों में इस तरह का दोष नहीं माना गया है।
वनवासी अंचल में क्षीण चन्द्रमा अर्थात वृश्चिक राशि के चन्द्रमा (नीच राशि के चन्द्रमा) की अवधि भर ही टालने में अधिक विश्वास रखते हैं, क्योंकि चंद्रमा मन का अधिपति होता है तथा पृथ्वी से बहुत निकट भी है, लेकिन धनु संक्रांति खर मास यानी मलमास में वनवासी अंचलों में विवाह आयोजनों की भरमार देखी जा सकती है, किंतु सामाजिक स्तर पर उनका अनुसंधान किया जाए तो इस समय में किए जाने वाले विवाह में एक-दूसरे के प्रति संवेदना व समर्पण की अपेक्षा यौन विकृति व अपराध का स्तर अधिक दिखाई देता है।उत्तरभारत में यज्ञ-अनुष्ठान का बड़ा महत्व रहा है। इस महत्व पर संस्कार के निमित्त एक कथा इस प्रकार है कि पौष मास में ब्रह्मा ने पुष्य नक्षत्र के दिन अपनी पुत्री का विवाह किया, लेकिन विवाह समय में ही धातु क्षीण हो जाने के कारण ब्रह्मा द्वारा पौष मास व पुष्य नक्षत्र श्रापित किए गए।
इस तरह के विज्ञान की कई रहस्यमय बातों को कथानक द्वारा बताई जाने के पौराणिक आख्यानों में अनेक प्रसंग मिलते हैं, इसलिए धनु संक्रांति सूर्य पौष मास में रहने व मीन सूर्य चैत्र मास में रहने से यह मास व पुष्य नक्षत्र भी विवाह में वर्जित किया गया है।ह अधिक मास क्या है और क्यों आता है? यह जिज्ञासा स्वाभाविक है। अधिक मास से तात्पर्य है वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद आदि महीनों में किसी का दो बार उसी एक वर्ष में आ जाना यानी किसी वर्ष में दो आषाढ़ हो जाना या दो श्रावण हो जाना।
इस प्रकार उस वर्ष में बारह महीनों के बजाय तेरह महीने हो जाना यानी एक माह बढ़ जाना। यह घटना
(तेरह महीने आ जाने की) प्रति तीसरे वर्ष क्यों हो जाती है, यह जानना रोचक रहेगा। इसके पीछे के कुछ वैज्ञानिक कारण भी नजर आते हैं।
सूर्य-चंद्रमा हैं कारण
विज्ञानवेत्ता मानते हैं कि विश्वभर में वर्षगणना के कैलेंडर का महीनों वाला हिसाब विभिन्न धर्मों और विभिन्न क्षेत्रों में या तो सूर्य के या चंद्रमा के आधार पर होता है। इस प्रकार भारतीय कैलेंडर सूर्य, चंद्र तथा नक्षत्र तीनों को संतुलित करके चलता है, इसलिए इसे सौर-चांद्र वर्षमान या ल्यूनी सोलर कैलेंडर कहते हैं। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार सूर्य पूरे वर्ष मे 12 राशियों से गुजरता है. सूर्य का इन राशियों में भ्रमण 365 दिन में पूर्ण होता है. सूर्य के एक राशि में समय बिताकर दूसरी राशि में प्रवेश करने तक का काल सौर मास कहलाता है. अत: सूर्य की इस गति के आधार पर की जाने वाली वर्ष गणना सौर वर्ष कहलाती है. इसी प्रकार चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह होने से सूर्य के सापेक्ष गति बनाने के लिए 29 दिन 12 घंटे और 44 मिनट समय लेता है. चंद्रमा की गति का यह काल चंद्रमास कहलाता है.
इस अवधि के आधार पर पूरे वर्ष के दिनों की गणना करें तो एक चंद्रवर्ष 354 दिनों का होता है. जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का होता है. इस प्रकार चंद्रवर्ष में 11 दिन कम होते हैं. सनातन धर्म में प्राचीन ऋषि-मुनियों, ग्रह-नक्षत्रों और ज्योतिष विद्या के मनीषियों ने काल गणना त्रुटिरहित बनाने की दृष्टि से ही चंद्रवर्ष और सौरवर्ष की अवधि में इस अंतर को दूर करने के लिए 32 माह 16 दिन और चार घड़ी के अंतर से यानि हर तीसरे चंदवर्ष में एक ओर चंद्रमास जोड़कर 11 दिनों के अंतर को पूरा किया जाता है. सूर्य और चंद्र दोनों के समन्वय के कारण वर्ष में दिनों की गणना का जो अंतर आता है, वह प्रतिवर्ष लगभग ग्यारह दिन का होता है
इस प्रकार सूर्य और चंद्र दोनों की पूरी पड़ताल निरंतर रखने की वैज्ञानिक ललक का परिणाम है हर तीस महीनों के बाद एक अधिक मास की गणना द्वारा सौर-चांद्र गणना का समन्वय बिठाने क
े मार्ग की परिकल्पना।कि है2018 में 16 मई से अधिकमास शुरू होगा, जो 13 जून तक चलेगा। अधिकमास में ही 24 मई को गंगा दशहरा पर्व भी मनाया जाएगा। अधिकमास के कारण देवशयनी एकादशी 9 जुलाई को आएगी।


बुधवार, 29 नवंबर 2017

गंड मूल का सच ओर वैज्ञानिक आधार

वैसे तो बच्चे का जन्म किसी के भी घर में खुशियों को लाने वाला होता है, लेकिन अगर बच्चे का जन्म ‘गण्ड-मूल नक्षत्र’ में हुआ हो; तो लोगों की खुशियाँ ये सुनते ही काफ़ूर हो जाती हैं। क्या होते हैं गण्ड-मूल नक्षत्र? इनकी संख्या कितनी होती है? क्या ये वाकई इतने खतरनाक होते हैं? आज तक आप इन्हीं सब सवालों से जूझते आये होंगे। आइये, आज हम इन्हीं के बारे में बात करते हैं संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं। जैसे मार् इसी प्रकार गंड-मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से नाजुक और दुष्परिणाम देने वाले होते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य के लिए इन नक्षत्रों की शांति जरूरी है। मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं।
क्या हैं गंड मूल नक्षत्र
ये आप भी जानते हैं कि नक्षत्रों की संख्या 27 होती है; इनमें से ही 6 नक्षत्र गण्ड-मूल नक्षत्र माने जाते हैं, जो कि अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती हैं। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इन 6 गण्ड-मूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में जन्म लेने पर जातक को ‘गण्ड-मूल दोष’ से युक्त मान लिया जाता है; जबकि सच्चाई कुछ और है, जिससे हर कोई नावाकिफ़ है। इसी बात का फ़ायदा धूर्त ज्योतिषी और ढोंगी पण्डित उठाते हैं।सच तो ये है कि ये नक्षत्र पूरी तरह से खराब नहीं होते, बल्कि इनका एक छोटा सा अंश ही दोषयुक्त होता है। संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं। जैसे मार्ग संधि (चौराहे-तिराहे), दिन-रात का संधि काल, ऋतु, लग्र और ग्रह के संधि स्थल आदि को शुभ नहीं मानते हैं। इसी प्रकार गंड-मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से नाजुक और दुष्परिणाम देने वाले होते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य  लिए इन नक्षत्रों की शांति जरूरी है। मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं।राशि और नक्षत्र दोनों जब एक स्थान पर समाप्त होते हैं तब यह स्थित गण्ड नक्षत्र कहलाती है और इस समापन स्थिति से ही नवीन राशि और नक्षत्र के प्रारम्भ होने के कारण ही यह नक्षत्र मूल संज्ञक नक्षत्र कहलाते हैं।राशि चक्र में ऐसी तीन स्थितियां होती हैं जब राशि और नक्षत्र दोनों एक साथ समाप्त होते हैं। यह स्थिति ‘गंड नक्षत्र’ कहलाती है। इन्हीं समाप्ति स्थल से नई राशि और नक्षत्र की शुरूआत होती है। लिहाजा इन्हें ‘मूल नक्षत्र’ कहते हैं। इस तरह तीन नक्षत्र गंड और तीन नक्षत्र मूल कहलाते हैं। गंड और मूल नक्षत्रों को इस प्रकार देखा जा सकता है।
कर्क राशि जल राशि व अश्लेषा नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं। यहीं से मघा नक्षत्र और सिंह राशिअग्न का उद्गम होता है। लिहाजा अश्लेषा गंड और मघा मूल नक्षत्र है।
वृश्चिक राशि में ज्येष्ठा नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं, यहीं से मूल नक्षत्र और धनु राशि की शुरूआत होने के कारण ज्येष्ठा ‘गंड’ और ‘मूल’ का नक्षत्र होगा।
मीन राशि और रेवती नक्षत्र का एक साथ समाप्त होकर यहीं से मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरूआत होने से रेवती, गंड तथा अश्विनी मूल नक्षत्र कहलाते हैं।
उक्त तीन गंड नक्षत्र अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती का स्वामी ग्रह बुध है तथा तीन मूल नक्षत्र मघा, मूल व अश्विनी का स्वामी ग्रह केतु हैसच तो ये है कि ये नक्षत्र पूरी तरह से खराब नहीं होते, बल्कि इनका एक छोटा सा अंश ही दोषयुक्त होता है। अश्विनी, मघा और मूल की प्रारम्भिक 2 घटी तथा रेवती, आश्लेषा और ज्येष्ठा की अन्तिम 2 घटी ही दोषयुक्त होती हैं। चूँकि 1 घटी 24 मिनट की होती है, इसलिए प्रत्येक नक्षत्र में 48 मिनट और इनकी सन्धि के दौरान कुल 96 मिनट अर्थात्‌ 1 घण्टा 36 मिनट ही दोषपूर्ण होते हैं। जबकि  कुछ पण्डित लोग दोनों नक्षत्रों के दौरान अर्थात्‌ पूरे ्2 दिनों (48 घण्टे) के दौरान हुये जन्म को खराब बता कर लोगों को डराते हैं और पूजा-पाठ का जाल फ़ैलाकर उन्हें लूटते हैं।ज्योतिष में कुछ विशेष आधारों पर राशि और नक्षत्र को तीन-२ चक्रों में विभाजित किया गया है। ये चक्र एक विशेष सन्धि-स्थल पर आपस में जुड़े होते हैं। इस तरह इन तीन सन्धि-स्थलों पर जो 6 नक्षत्र आपस में जुड़ते हैं, उन्हें ही ‘गण्ड-मूल नक्षत्र’ कहा जाता है। चूँकि सन्धि या संक्रमण काल को सामान्य रूप से अशुभ या कष्टकारक माना जाता है, अत: ऐसा माना जाता है कि गण्ड-मूल दोष में उत्पन्न बच्चे पर कुछ ना कुछ नकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ता है।चूँकि नक्षत्र का प्रभाव नकारात्मक है, इसलिए 27 दिन पश्चात्‌ पुन: उसी नक्षत्र के आने पर किसी विद्वान ब्राह्मण को बुलवा कर आप् शान्ति के लिए पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा आदि करने में कोई बुराई नहीं है; परन्तु 27 दिन तक पिता को अपने बच्चे का मुँह ना देखने देना एक बेकार की बात ही है। लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि ये शान्ति वगैरह तभी करवायें, जब बच्चे का जन्म उस विशेष 2 घटी में ही हुआ हो मतलव जल और आग का एक साथ मिलने का समय । वरना मेरे इस लेख को लिखने का कोई फ़ायदा नहीं होगा।शतपथ ब्राह्मण और तैत्तरीय ब्राह्मण नामक ग्रंथ में बताया गया है कि कुछ स्‍थितियों में यह दोष अपने आप समाप्त हो जाता है और इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति खुद के लिए भाग्यशाली होते हैं।व्यक्ति का जन्म अगर वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुंभ लग्न में हो, तब मूल नक्षत्र में जन्म होने पर भी इसका अशुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
गंडमूल नक्षत्र में जन्म लेने पर भी अगर लड़के का जन्म रात में और लड़की का जन्म दिन में हो, तब मूल नक्षत्र का प्रभाव समाप्त हो जाता है। गंडमूल नक्षत्र मघा के चौथे चरण में जन्म लेने वाला बच्चा धनवान और भाग्यशाली होतागंडमूल दोष 28 साल बाद अपने आप समाप्त हो जाता है। ऐसा हमारे जातक शास्त्रों में लिखा है E3। है।Gandmool गंडमूल दोष के बारे में यह article यदि आपको पसंद आया हो, तो इसे like और दूसरों को share करें। आप Comment box में Comment जरुर करें, ताकि यह जानकारी और लोगों तक भी पहुंच सके।
चलते-२ एक बात अवश्य कहूँगा कि बेवजह घबरायें नहीं। आपका बच्चा भी अन्य बच्चों की तरह भाग्यशाली है। उसका भविष्य उसकी कुण्डली के अन्य योगों पर निर्भर करेगा, ना कि केवल ‘गण्ड-मूल दोष’ में बँधकर रह जायेगा। हमेशा की तरह खुश रहिये।


महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

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