रविवार, 6 अगस्त 2017

आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वादिक उपायों के द्वारा समाधान प्राप्त करें, आप हमें अपना जन्म की तारीख , समय और जन्म स्थान , के साथ हमारी फीस हमारे bank ac pnb babk 0684000100192356 ifc punb 0068400 मे जमा करानी होगी email maakaali46@gmail.com, Mo. 09414481324. 07597718725 paytm no 07597718725

स्त्री-पुरुष जीवन रथ के दो पहिए हैं।
स्त्री-पुरुष जीवन रथ के दो पहिए हैं।सृष्टि सृजन में दोनों का समान योगदान होता है। नारी जननी, माँ, बेटी, पत्नी, बहन, नानी, दादी बन समाज, परिवार को पोषित करती है। नारी को कई दैवीय रूपों में पूजा जाता है। ऐश्वर्य के लिए लक्ष्मी, शक्ति के लिए दुर्गा, ज्ञान के लिए सरस्वती।
संस्कृत का श्लोक है – "यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। वैदिक काल में गार्गी जैसी विदूषी स्त्री ने यज्ञवलक्य को शास्त्रार्थ में हरा दिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि उस ज़माने में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे। स्वतंत्रता-स्वच्छंदता थीमध्यकालीन युग में नारियों की दशा बरबस, बेचारी-सी हो गई। उसे पाँव की जूती मानने लगे और नारी परिवार-समाज की संकुचित सीमाओं में बँध कर रह गई। पुरुष प्रधान समाज में नारी के नारीत्व का हरण होने लगा।। अनादि काल से महिलायें तिरस्कार झेलती आयीं है। पति के रूप में प्राप्त पुरुष स्त्री को कामना के रूप में स्वीकार करने के बजाय अवमानना के रूप में प्रयोग करता है,जब कि प्रकृति ने स्त्री को निराकार और पुरुष को साकार रूप में इस संसार में उपस्थित किया है। निराकार और साकार का रूप समझे बिना स्त्री पुरुष कभी भी अपने को सामजस्यता में नही रख पायेंगे,पहले आपको बता देना चाहता हूँ कि साकार और निरकार का अर्थ क्या है ? इस संसार में धनात्मक कारक साकार है,और ऋणात्मक कारक निराकार है,पुरुष का अर्थ एक तरह से है – मर्दाना। प्रकृति का अर्थ है स्त्री। तो सृष्टि जिस तरह से है, उसे समझाने के लिए सृष्टि के सृजन के बीज को पुरुष कहा गया है। यह नर है, लेकिन उसकी जीवन-निर्माण में कोई सक्रिय भूमिका नहीं है। यह बिलकुल मनुष्य के जन्म जैसी है। पुरुष सिर्फ बीज डालता है, लेकिन बाकी सारा सृजन नारी द्वारा होता है। इसलिए, देवी मां या पार्वती या काली को प्रकृति कहा गया है। वह संपूर्ण सृजन करती हैं, लेकिन इस सृजन का बीज है शिव या पुरुष। इसे शिव-शक्ति या पुरुष-प्रकृति, या यिन-यैंग या और भी कई तरह से समझा जा सकता हैस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है।।दोनो का अनुपात समान रूप से प्रयोग में लाने पर जीवन बिना किसी अवरोध के चला करता है,और इनके अन्दर जरा सा भी अनुपात बिगाड लिया जाये तो जीवन कष्टकारक हो जाता है। एक स्त्री एक पुरुष का अनुपाती रूप धनात्मक शक्ति को ऋणात्मक शक्ति में विलीन करने के लिये काफ़ी है,एक पुरुष अगर कई ऋणात्मक शक्तियों की पूर्ति करने के लिये उद्धत होता है तो वह जानबूझ कर अपनी जीवन की गति को असमान्य करता है,या तो वह जीवन को कम करता है अथवा वह जीवन भर अभावों में जीता है। उसी प्रकार से अगर एक स्त्री अगर कई सकारात्मक कारकों को अपने जीवन में प्रयोग करती है तो वह अपने जीवन को जल्दी समाप्त करने की चाहत करती है साथ ही जीवन को बरबाद करने के अलावा और कुछ नही करना चाहती है। इस बात को समझने के लिये आपको कहीं नही जाना है केवल अपने आसपास के माहौल को देखना है,आप किसी विधवा स्त्री या विधुर को देखिये,उसके जीवन को देखिये,उसकी आयु को देखिये,एक महिला का पति अगर चालीस साल की उम्र में गुजर गया है तो वह महिला अपनी वास्तविक उम्र से बीस साल और अधिक जिन्दा रहती है,अगर एक पुरुष चालीस साल में विधुर हो गया है तो वह अपनी वास्तविक उम्र से बीस साल और अधिक जिन्दा रहता है,इस अधिक उम्र को प्राप्त करने का कारण क्या है। इसे कोई भी बालिग आराम से समझ सकता है। अगर पुरुष अधिक स्त्रियों की कामना करता है और अधिक से अधिक कई स्त्रियों के साथ समागम करता है तो उसकी उम्र हर पहलू में कम होती चली जाती है,वह चाहे कितना ही धनी हो,कितना ही खाने पीने वाला हो,उसके पास चाहे कितने ही शरीर को बलवान बनाने वाले तत्वों की अधिकता हो,वह अपनी उम्र को कम ही करेगा। उसी प्रकार से कोई स्त्री अगर एक से अधिक पुरुषों के साथ समागम करती है तो वह भी अपनी उम्र की एक एक सीढी कम करती चली जाती है। इस बात को समझने के बाद भी अगर कोई स्त्री या पुरुष अधिक स्त्री या पुरुष की कामना करता है तो वह, वास्तव में सोसाइट करने वाली बात ही करता है।स्त्री पुरुष को ईश्वर ने संसार में निर्माण के लिये भेजा है यह तो एक साधारण व्यक्ति भी जानता है,लेकिन भावनाओं की गति को पकड कर चलने के साथ ही अगर दोनो अपने अपने कार्यों को करते चले जाते है,और वे जीवन की गति को निर्बाध चलाने के लिये एक के बाद एक निर्बाध (Resistance) पैदा करते जाते है तो जीवन आराम से निकल जाता है। इस स्त्री और पुरुष की गति को अगर रोजाना के प्रयोग में ली जाने वाली बिजली से तुलना करें तो आराम से समझ में आ सकता है,फ़ेस और न्यूटल दो भाग में घरेलू बिजली प्रयोग में ली जाती है,फ़ेस को न्यूटल से सीधा जोडने पर फ़्यूज उड जाता है,और फ़ेस को किसी रजिस्टेंस के माध्यम से न्यूटल तक पहुंचाने से उस रजिस्टेंस से जीवन की भौतिकता में सुख भी प्राप्त किया जा सकता है,और फ़्यूज भी नही उडता है,बिजली की गति सामान्य भी रहती है। स्त्री को न्यूटल और पुरुष को फ़ेस समझे जाने पर दोनो की आपसी शक्ति को प्रकृति ने बच्चे रूपी रजिस्टेंस पैदा किये है,दोनो अपनी अपनी शक्ति को बच्चों के माध्यम से खर्च करें तो बच्चे तरक्की करते जायेंगे,और दोनो का जीवन भी सार्थक होता चला जायेगा। लेकिन दोनो के बीच बीच में होने वाले शार्ट सर्किट से भी बचना पडेगा। भगवान रूपी पावर हाउस,तार और खम्भों रूपी माता पिता,आन आफ़ करने वाले स्विच रूपी रोजाना के कार्य और व्यवसाय,इन्डीकेटर रूपी नाम और समाज में वेल्यू,एम सी बी रूपी भाग्य और भगवान के प्रति श्रद्धा भी ध्यान में रखनी जरूरी है।

स्त्री-पुरुष जीवन रथ के दो पहिएस्त्री-पुरुष जीवन रथ के दो पहिए हैं। स्त्री-पुरुष जीवन रथ के दो पहिए हैं।सृष्टि सृजन में दोनों का समान योगदान होता है। नारी जननी, माँ, बेटी, पत्नी, बहन, नानी, दादी बन समाज, परिवार को पोषित करती है। नारी को कई दैवीय रूपों में पूजा जाता है। ऐश्वर्य के लिए लक्ष्मी, शक्ति के लिए दुर्गा, ज्ञान के लिए सरस्वती। संस्कृत का श्लोक है – "यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। वैदिक काल में गार्गी जैसी विदूषी स्त्री ने यज्ञवलक्य को शास्त्रार्थ में हरा दिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि उस ज़माने में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे। स्वतंत्रता-स्वच्छंदता थीमध्यकालीन युग में नारियों की दशा बरबस, बेचारी-सी हो गई। उसे पाँव की जूती मानने लगे और नारी परिवार-समाज की संकुचित सीमाओं में बँध कर रह गई। पुरुष प्रधान समाज में नारी के नारीत्व का हरण होने लगा।। अनादि काल से महिलायें तिरस्कार झेलती आयीं है। पति के रूप में प्राप्त पुरुष स्त्री को कामना के रूप में स्वीकार करने के बजाय अवमानना के रूप में प्रयोग करता है,जब कि प्रकृति ने स्त्री को निराकार और पुरुष को साकार रूप में इस संसार में उपस्थित किया है। निराकार और साकार का रूप समझे बिना स्त्री पुरुष कभी भी अपने को सामजस्यता में नही रख पायेंगे,पहले आपको बता देना चाहता हूँ कि साकार और निरकार का अर्थ क्या है ? इस संसार में धनात्मक कारक साकार है,और ऋणात्मक कारक निराकार है,पुरुष का अर्थ एक तरह से है – मर्दाना। प्रकृति का अर्थ है स्त्री। तो सृष्टि जिस तरह से है, उसे समझाने के लिए सृष्टि के सृजन के बीज को पुरुष कहा गया है। यह नर है, लेकिन उसकी जीवन-निर्माण में कोई सक्रिय भूमिका नहीं है। यह बिलकुल मनुष्य के जन्म जैसी है। पुरुष सिर्फ बीज डालता है, लेकिन बाकी सारा सृजन नारी द्वारा होता है। इसलिए, देवी मां या पार्वती या काली को प्रकृति कहा गया है। वह संपूर्ण सृजन करती हैं, लेकिन इस सृजन का बीज है शिव या पुरुष। इसे शिव-शक्ति या पुरुष-प्रकृति, या यिन-यैंग या और भी कई तरह से समझा जा सकता हैस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है।।दोनो का अनुपात समान रूप से प्रयोग में लाने पर जीवन बिना किसी अवरोध के चला करता है,और इनके अन्दर जरा सा भी अनुपात बिगाड लिया जाये तो जीवन कष्टकारक हो जाता है। एक स्त्री एक पुरुष का अनुपाती रूप धनात्मक शक्ति को ऋणात्मक शक्ति में विलीन करने के लिये काफ़ी है,एक पुरुष अगर कई ऋणात्मक शक्तियों की पूर्ति करने के लिये उद्धत होता है तो वह जानबूझ कर अपनी जीवन की गति को असमान्य करता है,या तो वह जीवन को कम करता है अथवा वह जीवन भर अभावों में जीता है। उसी प्रकार से अगर एक स्त्री अगर कई सकारात्मक कारकों को अपने जीवन में प्रयोग करती है तो वह अपने जीवन को जल्दी समाप्त करने की चाहत करती है साथ ही जीवन को बरबाद करने के अलावा और कुछ नही करना चाहती है। इस बात को समझने के लिये आपको कहीं नही जाना है केवल अपने आसपास के माहौल को देखना है,आप किसी विधवा स्त्री या विधुर को देखिये,उसके जीवन को देखिये,उसकी आयु को देखिये,एक महिला का पति अगर चालीस साल की उम्र में गुजर गया है तो वह महिला अपनी वास्तविक उम्र से बीस साल और अधिक जिन्दा रहती है,अगर एक पुरुष चालीस साल में विधुर हो गया है तो वह अपनी वास्तविक उम्र से बीस साल और अधिक जिन्दा रहता है,इस अधिक उम्र को प्राप्त करने का कारण क्या है। इसे कोई भी बालिग आराम से समझ सकता है। अगर पुरुष अधिक स्त्रियों की कामना करता है और अधिक से अधिक कई स्त्रियों के साथ समागम करता है तो उसकी उम्र हर पहलू में कम होती चली जाती है,वह चाहे कितना ही धनी हो,कितना ही खाने पीने वाला हो,उसके पास चाहे कितने ही शरीर को बलवान बनाने वाले तत्वों की अधिकता हो,वह अपनी उम्र को कम ही करेगा। उसी प्रकार से कोई स्त्री अगर एक से अधिक पुरुषों के साथ समागम करती है तो वह भी अपनी उम्र की एक एक सीढी कम करती चली जाती है। इस बात को समझने के बाद भी अगर कोई स्त्री या पुरुष अधिक स्त्री या पुरुष की कामना करता है तो वह, वास्तव में सोसाइट करने वाली बात ही करता है।स्त्री पुरुष को ईश्वर ने संसार में निर्माण के लिये भेजा है यह तो एक साधारण व्यक्ति भी जानता है,लेकिन भावनाओं की गति को पकड कर चलने के साथ ही अगर दोनो अपने अपने कार्यों को करते चले जाते है,और वे जीवन की गति को निर्बाध चलाने के लिये एक के बाद एक निर्

शनिवार, 5 अगस्त 2017

.शनी वक्री वक्री शनिआचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वादिक उपायों के द्वारा समाधान प्राप्त करें, आप हमें अपना जन्म की तारीख , समय और जन्म स्थान , के साथ हमारी फीस हमारे bank ac pnb babk 0684000100192356 ifc punb 0068400 मे जमा करानी होगी email maakaali46@gmail.com, Mo. 09414481324. 07597718725 paytm no 07597718725शनिग्रह के बारे मे माना जाता है कि शनि ग्रह चाहे तो राजा बना दे या रंक। जिसकी जन्म कुण्डली में शनि बहुत अच्छी स थिति में होता है उसे शनि विशेष हानि नहीं पहुंचाता बल्कि लाभ देता है। जिन जातको की कुण्डली में शनि, नीच स्थिति पर होता है, उन्हें शनि से हानि होती है। परन्तु यह हानि जीवन भर नहीं रहती, क्योंकि हमारे जीवन में दशा और गोचर का भी महत्व होता है।सबसे पहले तो यह जान लें कि किसी भी वक्री ग्रह का व्यवहार उसके सामान्य होने की स्थिति से अलग होता है तथा वक्री और सामान्य ग्रहों को एक जैसा नही मानना चाहिए। किन्तु यहां पर यह जान लेना भी आवश्यक है कि अधिकतर मामलों में किसी ग्रह के वक्री होने से कुंडली में उसके शुभ या अशुभ होने की स्थिति में कोई फर्क नही पड़ता अर्थात अधिकतर मामलों में ग्रह के वक्री होने की स्थिति में उसके स्वभाव में कोई फर्क नहीं आता किन्तु उसके व्यवहार में कुछ बदलाव अवश्य आ जाते हैं। यहा स्वभाव ओर व्यवहार दोनो को समझने की आवश्यकता हैज्‍योतिष में हर ग्रह और राशि (नक्षत्रों के समूह) की प्रकृति के बारे में विस्‍तार से जानकारी दी गई है। ग्रहों के रंग, दिशा, स्‍त्री-पुरुष भेद, तत्‍व और धातु के अलावा राशियों के गुणों के बारे में भी बताया गया है। ग्रहों और राशियों की प्रकृति स्‍थाई होती है। इनके प्रभाव में कमी या बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन मूल प्रकृति में कभी बदलाव नहीं होता।जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि में जाता है तो यह माना जाता है कि इस राशि में ग्रह का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है और उच्‍च राशि में अपना सर्वाधिक प्रभाव देता है। अब प्रभावों में बढ़ोतरी हो या कमी, न तो ग्रह की और न ही राशि की प्रकृतिमें कोई बदलाव आता है। उदाहरण के लिए शनि यदि अपनी सामान्य गति से कन्या राशि में भ्रमण कर रहे हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि शनि कन्या से तुला राशि की तरफ जा रहे हैं, किन्तु वक्री होने की स्थिति में शनि उल्टी दिशा में चलना शुरू कर देते हैं अर्थात शनि कन्या से तुला राशि की ओर न चलते हुए कन्या राशि से सिंह राशि की ओर चलना शुरू कर देते हैं और जैसे ही शनि का वक्र दिशा में चलने का यह समय काल समाप्त हो जाता है, वे पुन: अपनी सामान्य गति और दिशा में कन्या राशि से तुला राशि की तरफ चलना शुरू कर देते हैं। वक्र दिशा में चलने वाले अर्थात वक्री होने वाले बाकि के सभी ग्रह भी इसी तरह का व्यवहार करते हैं। यानी उसका मुल स्वभाव वही रहेग पर व्यवहार मे फर्क होगा जब शनि कुंडली में मार्गी होता है तो शरीर से मेहनत करवाता है और जो भी काम करवाता है उसके अन्दर पसीने को निकाले बिना भोजन भी नहीं देता है और जब किया सौ का जाय तो मिलता दस ही है,इसके साथ ही शरीर के जोड़ जोड़ को तोड़ने के लिए अपनी पूरी की पूरी कोशिश भी करता है,रहने के लिए अगर निवास का बंदोबस्त किया जाए तो मजदूरों से काम करवाने की बजाय खुद से भी मेहनत करवाता है तब जाकर कोई छोटा सा रहने वाला मकान बनवा पाता है,जब कोई कार्य करने के लिए अपने को साधनों की तरफ ले जाता है तो साधन या तो वक्त पर खराब हो जाते है या साधन मिल ही नहीं पाते है,मान लीजिये किसी को घर बनवाने के लिए सामान लाना है,सामान लाते हुए घर के पास ही या तो साधन खराब हो जाएगा जिससे आने वाले सामान को घर तक लाना भी है और साधन भी ख़राब है या रास्ता ही खराब है उस समय मजदूरी से अगर उस सामान को लाया जाता है तो वह मजदूरी इतनी देनी पड़ती है जिससे मकान को बनवाने के लिए जो बजट है वह फेल हो रहा है इस लोभ के कारण सामान को खुद ही घर बनाने के स्थान तक ढोने के लिए मजबूर होना पड़ता है,इसके बाद अगर किसी बुद्धि का प्रयोग भी किया जाए तो कोई न कोई रोड़ा आकर अपनी कलाकारी कर जाता है,जैसे कोई आकर कह जाता है कि अमुक समय पर उसका वह काम करवा देगा लेकिन खुद भी नहीं आता है और भरोसे में रखकर काम को करने भी नहीं देता है,यह मार्गी शनि का कार्य होता है,इसी प्रकार से मार्गी शनि एक विषहीन सांप की भांति भी काम करता है,विषहीन सांप से कोई डरता नहीं है उसे लकड़ी से उछल कर हाथ से पकड़ कर शरीर को तोड़ने का काम करता है उसी जगह वक्री शनि बुद्धि से काम करने वाला होता है जैसे जातक को घर बनवाना है तो वह अपनी बुद्धि से साधनों का प्रयोग करेगा,पहले किसी व्यक्ति को नियुक्त कर देगा फिर उसे अपनी बुद्धि के अनुसार किये जाने वाले काम का मेहनताना देगा,जो मेहनताना दिया जा रहा है उसकी जगह पर वह दूसरा कोई काम बुद्धि से करेगा जिससे दिया जाने वाला मेहनताना आने भी लगेगा और दिया भी जाएगा जिससे खुद के लिए भी मेहनत नहीं करनी पडी और नियुक्त किये गए व्यक्ति के द्वारा काम भी हो गया,इस प्रकार से बुद्धि का प्रयोग करने के बाद जातक खुद मेहनत नहीं करता है दूसरो से बुद्धि से करवाकर धन को भी बचाता है,वक्री शनि का रूप जहरीले सांप की तरह से होता है वह पहले तो सामने आता ही नहीं है और अगर छेड़ दिया जाए तो वह अपने जहर का भी प्रयोग करता है और छेड़ने वाले व्यक्ति को हमेशा के लिए याद भी करता है,इस शनि के द्वारा मेहनत कास लोगों के लिए भी समय समय पर आराम करने और मेहनत करने के लिए अपने बल को देता है जैसे मार्गी शनि जब वक्री होता है तो मेहनत करने वाले लोग भी दिमागी काम को करने लगते है और जब वक्री शनि वाले जातको की कुंडली में वक्री होता है तो दिमागी काम की जगह पर मेहनत वाले काम करने की योजना को बनाकर परेशानी में डाल देता है.जब शनि अपने ही घर में वक्री होकर बैठा हो तो वह पैदा होने वाले स्थान से उम्र की दूसरे शनि वाले दौर में शनि का एक दौर पैंतीस साल का माना जाता है विदेश में फेंक देता है,जब कभी जातक को पैदा होने वाले स्थान में भेजता है और जल्दी ही वापस बुलाकर फिर से विदेश में अपनी जिन्दगी को जीने के लिए मजबूर कर देता है,इसके साथ ही शनि की आदत है कि वह कभी भी स्त्री जातक के साथ बुरा नहीं करता है वह हमेशा पुरुष जातक और अपने ऊपर धन बल शरीर बल बुद्धि बल रखने वाले लोगों पर बुरा असर उनके बल को घटाने और वक्त पर उनके बल को नीचा करने का काम भी करता है,घर में जितना असर पुत्र जातक को खराब देता है उतना ही अच्छा बल पुत्री जातक को देता है,लेकिन वक्री शनि से पुत्री जातक अपने देश काल और परिस्थिति से दूर रहकर विदेशी परिवेश को ही सम्मान और चलन में रखने के लिए भी माना जाता है. आचार्य राजेशDid you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.Love1 Share Tweet ShareNext Post्वक्री शुक्र्वक्री शुक्र© 2017 आचार्य राजेश कुमार. Site by Parav Singlaआचार्य जीकलम सेआओ ज्योतिष सीखेंसंपर्क


शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

रविवार, 2 जुलाई 2017

लाल किताब मे

http://acharyarajesh.in/2017/07/01/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ac-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95/

शनिवार, 24 जून 2017

क्यों काम नहीं करते हैं ज्योतिष के अनुसार किए उपाय मित्रों हमारा उद्देश्य किसी भी विद्वान को आहत करने का नहीं है, अतः अनजाने में भी यदि किसी को कष्ट हो तो बात प्रारंभ करने से पहले ही क्षमा चाहेंग हम उस आदमी को धोखा देने का असफल प्रयास कर रहे हैं, जो देवता तुल्य हमें सम्मान दे रहा है, अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन भी, क्या हमें ऐसा करके हमेशा के लिए उसकी नजरों से गिरने का काम करना चाहिए, केवल पैसे की भूख हमारी छवि को हमेशा के लिए समाप्त करने के साथ ज्योतिष शास्त्र की आस्था को भी राहत न मिलने पर समाप्त कर देती है सामान्य परेशान लोगों में से अधिकतर की शिकायत होती है कि ,उनकी समस्या के लिए वे बहुतेरे ज्योतिषियो ,तांत्रिकों ,पंडितों से संपर्क करते हैं किन्तु उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता या बहुत कम लाभ दृष्टिगोचर होता है ,तथा उनकी परेशानी यथावत रहती है अथवा केवल कुछ समय राहत देकर फिर वैसी ही हो जाती है |वे यहाँ वहां अपनी समस्या का समाधान पाने के चक्कर में घूमते रहते हैं पर कोई सही समाधान नहीं मिलता अंततः थक हारकर मान लेते हैं की जो किस्मत में होता है वाही होता है ,या कोई उपाय काम नहीं करता ,यह सब बेकार हैकुछ तो यहाँ वहां घूमते हुए खुद थोड़ी बहुत ज्योतिष समझने लगते हैं ,टोने -टोटके आजमाते आजमाते ,शाबर मंत्र ,तांत्रिक मंत्र आदि पढ़कर , थोड़े बहुत टोने -टोटके जान जाते हैं ,कुछ मंत्र जान जाते हैं ,कुछ पूजा पाठ ,स्तोत्र आदि जान जाते हैं ,फिर ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र की कुछ सडक छाप किताबों को पढ़कर ,नेट पर खोज कर अपनी समस्या का समाधान ढूंढते हुए खुद को ज्योतिषी और तांत्रिक मान लेते हैं |समस्या उनकी ख़त्म हो न हो ,उन्हें खुद राहत मिले या न मिले पर लोगों को उपाय जरूर लता ने लग जाते हैं और लोग भी ऐसे हैं यहां मुफ़्त का चाहते हैं वुखार भी क्यों ना होऐक तरफ मेरे जैसे ठग ज्योतिषी तांत्रिक आचार्य वन कर और लोगों को टोटके ,उपाय ,मंत्र बांटने लगते हैं ,धन लेकर उनके लिए अनुष्ठान ,क्रिया करने को कहने लगते हैं और फिर इसे व्यवसाय बना लूटने का धंधा बना लेते हैं |यह काम सोसल मीडिया ,इंटरनेट ,वेबसाईट के माध्यम से खूब होता है सामान्य लोग समझ नहीं पाते अथवा वास्तविक ज्योतिषी ,तांत्रिक ,पंडित और इन छद्म नामो वाले ज्योतिषी ,पंडित ,तांत्रिक में अंतर नहीं कर पाते ,अंततः वे खुद के धन का नुक्सान' हानि पाते हैं ,खुद की किस्मत को कोसते हैं अथवा ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र ,उपायों को ही बेकार मान लेते हैं |उनका विश्वास हिल जाता है ,कभी कभी भगवान् पर से भी विश्वास उठने लगता हएक समस्या लोगों की नासमझी से भी उत्पन्न होती है लोग कर्मकांड ,पूजा पाठ ,शादी विवाह ,कथा कराने वाले पंडित जी से .प्रवचन करने वाले व्यास या शास्त्री जी से ,भागवत ,रामायण कथा वाचकों से भविष्य जानने की कोशिश करते हैं और उपाय पूछते हैं उनकी विशेषज्ञता पूजा पाठ ,कर्मकांड ,प्रवचन ,कथा ,भाषण कला में है न की ज्योतिष ,तंत्र आदि भविष्य जानने वाली गूढ़ विद्याओं में इनके उपाय पूजा पाठ ,दान ,गौ ,नदी ,पीपल ,अनुष्ठान तक सीमित रहेंगे न की मूल समस्या को पकड़ वहां प्रतिक्रिया करने वाले उपायों पर आजकल ज्योतिष ,तंत्र को व्यसाय और लाभ का स्रोत मान ही अधिकतर लोग आकर्षित हो रहे |साधुओं ,मठाधीशों के आसपास भीड़ देखकर लोग आकर्षित हो रहेतो यह कितना लाभ पहुंचाएंगे सोचने की बात है जानने समझने की अतः रटे रटाये उपाय ,पूजा पाठ ,दान बता दिए |न क्षमता है समस्या पकड़ने की न रूचि है कुछ समझने में अतः अक्सर तीर तुक्के साबित होते हैं ,पर इनके प्रभामंडल के आगे व्यक्ति कुछ सोच भी नहीं पाता और अपने भाग्य को ही दोषी मानता रह जाता है |अब इतने बड़े आडम्बर वाले गुरु जी ,ज्योतिषी जी ,पंडित जी ,तांत्रिक अघोरी महाराज गलत थोड़े ही बोलेंगे ,हमारा ही भाग्य खराब है जो कोई उपाय काम नहीं कर रहा |ज्योतिष ,कर्मकांड ,पूजा पाठ ,साधना एक श्रम साध्य ,शोधोन्मुख कार्य है |इनमे समय ,एकाग्रता लगती है |गहन अध्ययन ,मनन ,चिन्तन और साधना करनी होती है |पुराने समय से देखें तो किसी गुरु के केवल एक दो शिष्य ही उनसे पर्याप्त ज्ञान ले पाते थे धीरे धीरे क्रमिक गुरु परम्परा में योग्य शिष्यों ,साधकों की कमी होती गयी ,जो थे वे चुपचाप अपनी साधना ,अध्ययन करते ,ज्ञान खोज में सुख पाते गुमनाम रहे और कम ज्ञान वाले अथवा स्वार्थी ,भौतिक लिप्सा युक्त शिष्यों की भरमार होती गयी |आज तक आते आते ,वास्तविक साधक खोजे नहीं मिलता ,सही गुरु की तलाश वर्षों करनी होती है जबकि हर गली और हर शहर में ढेरों गुरु और साधक मिल जाते हैं |बड़े बड़े नाम ,उपाधि वाले साधक ,ज्योतिषी ,गुरु मिल जाते हैं जिनके पास लाखों हजारों की भीड़ भी होती है ,अनुयायी होते हैं |फिर भी लोगों की समस्याएं बढती ही जा रही ,उनको सही उपाय नहीं मिल पा रहे ,वे भटक भटक कर अंततः ज्योतिष ,तंत्र ,पूजा पाठ ,कर्मकांड ,साधना को अविश्वसनीय मान लेते हैं ,ज्योतिष गलत होती है ,न कर्मकांड अनुपयोगी हैं ,यहाँ समस्या केवल इतनी होती है की सही समस्या पर सही पकड़ नहीं होती और सही उपाय नहीं किये अथवा बताये गए होते |तंत्र ,मंत्र ,ज्योतिष ,पूजा पाठ ,कर्मकांड का अपना एक पूरा विज्ञान होता है और यह शत प्रतिशत प्रभावी होते हैं |इनके पीछे हजारों वर्षों का शोध होता है |इनकी अपनी तकनिकी ,ऊर्जा और प्रतिक्रियाएं होती हैं ,पर यह सब पकड़ने और जानने के लिए कई वर्षों तक समझना पड़ता है ,खुद शोध करना पड़ता है ,खुद परीक्षित करना होता है खुद प्रेक्टिकल करना होता है |जाहिर है इन सबमे कई वर्ष लगते हैं |तब जाकर कुछ हाथ लगना शुरू होता हैसमस्या यह होती है की ज्योतिषी गहन विश्लेष्ण नहीं करता ,सूक्ष्म अध्ययन नहीं करता ,रटे रटाये और सरसरी तौर पर कुंडली देख घिसे पिटे उपाय घुमा फिराकर बता दिया |सब जगह शनी ,राहू केतु को ही समस्या का कारण मान लिया |काल सर्प ,साढ़ेसाती ,मांगलिक दोष का हौवा खड़ा किया और उपाय बता दिए |अब सूक्ष्म विश्लेषण में समय लगेगा ,ज्ञान चाहिए ,अनुभव चाहिए |समय कौन खर्च करे उतने में दुसरे क्लाइंट को देखेंगे |वर्षों का खुद का शोध ,अनुभव है नहीं ,जो रटा रटाया है बता दिया| कब दान करना चाहिए ,कब किसका रत्न पहनना चाहिए ,कब किस तरह का क्या हवन ,जप ,मन्त्र ,शक्ति आराधना करनी चाहिए ,किस शक्ति उपाय का कहाँ क्या प्रभाव होगा और उसका अन्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह समझे बिन उपाय काम नहीं करेगे |कितनी शक्ति से कौन ग्रह प्रभावित कर रहा ,उसके लिए कितनी शक्ति का उपाय करना करना चाहिए ,इस उपाय से अन्य ग्रहों के संतुलन पर क्या प्रभाव होगा देखना आवश्यक होता है |आज भी वास्तविक ज्ञानी ज्योतिषी पैसा नहीं कमा पाता क्योकि उसे विश्लेष्ण को समय चाहिए ,अध्ययन को समय चाहिए ,शोध को समय चाहिए ,चिंतन मनन समझने को समय चाहिए |इनके बिन उसे संतुष्टि ही नहीं मिलेगी ,इसलिए अक्सर वह शांत और गुमनाम रह जाता हैइन सबका ठीक से विश्लेष्ण किये बिना उपाय बताना व्यक्ति को लाभ नहीं पहुचाता |जितनी शक्ति किसी समस्या के पीछे है उससे अधिक शक्ति अगर उसके विपरीत लगाईं जायेगी तभी वह समस्या समाप्त होगी |कम शक्ति लगाने पर समस्या समाप्त भी नहीं होगी ,और विपरीत प्रतिक्रया से और समस्या बढ़ा भी सकती है |सांप को छेड़ कर छोड़ देने पर वह काटेगा ही |कभी कभी समस्या किसी और कारण और उपाय किसी और का होने से भी उपाय काम नहीं करते या एक ही तरह की शक्ति ,देवता ,ऊर्जा से सभी को संतुलित करने का प्रयास भी काम नहीं करता |नकारात्मकता के उपयुक्त ऊर्जा लगाने पर ही परिणाम मिलता है |कभी कभी गलत उपाय एक नई समस्या उत्पन्न कर देते हैं |हर उपाय के पीछे ऊर्जा विज्ञानं होता है और अलग उर्जा असंतुलन उत्पन्न कर देती है |एक साथ कई उपाय करने से भी समस्या ठीक नहीं होती क्योकि कई तरह की उर्जायें असंतुलन उत्पन्न करती है और अलग अलग कार्य करती हैं जिससे उलझन बढने की सम्भावना होती है |कई शक्तियों का एक साथ प्रयोग भी असंतुलन उत्पन्न करता है ,कभी कभी प्रतिक्रिया भी मिलती है अधिक करने में गलतियों की सम्भावना भी अधिक होती है जिसके अधिक घातक दुस्परिनाम होते हैं हमारा सभी मित्रों से अनुरोध है कि जिस तरह हम बीमारी से ग्रस्त होने पर अच्छे डाक्टर का चुनाव करते हैं, वैसे ही जन्म कुंडली भी विद्वान को ही दिखाए,कुछ समय भी दे उसे उपचार के लिए,ज्योतिष उपाय अंग्रेजी दवा की भांति काम नहीं करते, फ्री सेवा लेने से बचें, तभी कल्याण सम्भव है आचार्य राजेश

शुक्रवार, 23 जून 2017

तंत्र क्या ऊर्जा को एक नकारात्मक रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे किसी पर काला जादू करना या तंत्र करना ? आपको यह समझना होगा कि ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह न तो दैवी होती है, न शैतानी। आप उससे कुछ भी बना सकते हैं – देवता या शैतान। यह बिजली की तरह होती है। क्या बिजली दैवी या शैतानी, अच्छी या बुरी होती है? जब वह आपके घर को रोशन करती है, तो वह दिव्य होती है। एक वेद, अथर्ववेद सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के लिए ऊर्जाओं के इस्तेमाल को ही समर्पित है। अगर वह एक इलेक्ट्रिक चेयर बन जाती है, तो वह शैतानी होती है। यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि उस पल उसे कौन संचालित कर रहा है। असल में, पांच हजार साल पहले, अर्जुन ने भी कृष्ण से यही सवाल पूछा था‘उनका यह कहना है कि हर चीज एक ही ऊर्जा से बनी है और हरेक चीज दैवी है तो , ‘ईश्वर निर्गुण है, दिव्यता निर्गुण है। उसका अपना कोई गुण नहीं है।’ इसका अर्थ है कि वह बस विशुद्ध ऊर्जा है। आप उससे कुछ भी बना सकते हैं। जो बाघ आपको खाने आता है, उसमें भी वही ऊर्जा है और कोई देवता, जो आकर आपको बचा सकता है, उसमें भी वही ऊर्जा है। बस वे अलग-अलग तरीकों से काम कर रहे हैं। जब आप अपनी कार चलाते हैं, तो क्या वह अच्छी या बुरी होती है? वह आपका जीवन बना सकती है या किसी भी पल आपका जीवन समाप्त कर सकती है, है नअगर ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल है, तो नकारात्मक इस्तेमाल भी है। एक वेद, अथर्ववेद सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के लिए ऊर्जाओं के इस्तेमाल को ही समर्पित है। मगर मैंने यह देखा है कि अक्सर ये चीजें मनोवैज्ञानिक या ज़हनी होती हैं। यह थोड़ी-बहुत मात्रा में हो सकती मगर केवल दस फीसदी असली चीज होगी। बाकी आप खुद ही अपने आप को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसी कला ।ऐसा विज्ञान जरूर है, जहां कोई अपनी ऊर्जा का नकारात्मक इस्तेमाल करके किसी और को नुकसान पहुंचा सकता है। क्यों होता है यह भगवान शिव ने तंत्र विद्या का प्रयोग करने के लिए कई शर्तें निर्धारित की हैं। यदि कोई किसी की हत्या कर देता है, किसी की संपत्ति का हरण करता है, किसी की पत्नी का हरण करता है या कुछ और, तब ही तंत्र विद्या का प्रयोग किया जा सकता है। महिलाओं पर तंत्र विद्या का प्रयोग करने की मनाही है। लेकिन, कुछ लोग इन विद्याओं का दुरुपयोग करते हैं। यदि कभी किसी का मजाक उड़ाया गया हो या उसके मां-बाप आदि से किसी की दुश्मनी है, तब भी कुछ लोग तंत्र विद्या का प्रयोग कर देते हैं। कई बार किसी के शरीर पर दूसरी आत्माओं का प्रवेश कराने के लिए भी ऐसा होता है। पूर्व जन्म की दुश्मनी या जमीन-जायदाद के झगड़े में भी ऐसा किया जाता है। हर व्यक्ति के आस-पास एक सुरक्षा घेरा होता है जिसे तेज या औरा कहते हैं। कई बड़े संतों की चित्रों में यह तेज स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। कई बार कुछ गलत काम करने से यह तेज समाप्त हो जाता है। यदि आप किसी ठग या पथभ्रष्ट तांत्रिक के पास जाते हैं तो उसके गलत प्रयोग से यह हो सकता है। अक्सर लोग परेशान होने के बाद मदद के लिए किसी के पास जाते हैं। यदि वह व्यक्ति योग्य नहीं है तो वह आपको और परेशानी में डाल सकता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी चीजों से निपटने के लिए हजारों तरीके मौजूद हैं। हर एक तरीके की अपनी विशेषता है। फिर भी कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखें तो यह समस्या दूर हो सकती है। सुरक्षित रहें, अंधविश्वास से बचें। अपने ईष्ट में पूरा विश्वास रखें। एक भगवान ही है जिसकी ताकत के सामने किसी की नहीं चलती। यदि आपकी पुकार उसके पास पहुंच गई तो फिर आपकी परेशानी हर हाल में दूर होगी। भगवान की पूजा कर उनका कोई प्रतीक जैसी मौली, माला आदि पहन लें। इससे आपका विश्वास जगेगा। यदि इन चीजों पर आपका भरोसा नहीं है तो जैसे ही कोई अंदेशा हो, अपने ईष्ट का नाम मन में जपना शुरू कर दें। - किसी दूसरे का दिया हुआ कुछ नहीं खाएं। खास कर मीठा, पान, लौंग-ईलायची, ईत्र आदि से परहेज करें। कुंवारी लड़कियों को अपने बाल खुले नहीं रखने चाहिए। मासिक धर्म के खून लगे कपड़े को ऐसी जगह नहीं फेंकें जहां से कोई उसे उठा ले।अपने पहने गए कपड़ों, बाल, नाखून या किसी भी वस्तु को दूसरे के हाथों में किसी कीमत पर नहीं जाने दें। इसी कारण यह नियम है कि रात में कपड़ों को बाहर सूखने के लिए नहीं छोड़ा जाता है। किसी का उपहास ना करें। किसी को कटु वचन नहीं बोले यदि आप शादीशुदा महिला हैं तो जिस साड़ी में आपकी शादी हुई है, उसका एक धागा भी किसी के पास नहीं जाने दें। रुद्राक्ष धारण करना भीइन चीजो से बचाव का एक अच्छा उपाय है घर में गोमूत्र का छिड़काव करना भी अच्छा रहता है कुछ जड़ी बूटियोंऐसी होती है जिन को मिला कर घुनी या घुप वना ले जिसे से जला लें जिस को जलाने से घर में यह शक्तियां अपना असर नहीं कर पाती आचार्य राजेश

बुधवार, 21 जून 2017

तंत्रहमारे प्राचीन हिन्दु-शास्त्रों में कुंडलिनी साधना' का उल्लेख आता है। ऐसे प्राचीन ग्रंथों में साधना के कई मार्ग दिखाए गए हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने हमारे शरीर के भीतर छह चक्रों की खोज की थी। वे छह चक्र क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि तथा आज्ञा चक्र हैं। मूलाधार चक्र में एक सर्पिणी ढाई कुंडल मारकर बैठी रहती है, जिसे कुंडलिनी कहते हैं। हमारे मेरुदण्ड में तीन मुख्य नाडियाँ होती हैं, इडा, पिंगला और सुषुम्ना। जैसे-जैसे योगाभ्यास द्वारा जब कुंडलिनी जागृत होकर इन छह चक्रों का भेदन करती हुई आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे साधक को तरह-तरह की सिद्धियाँ प्राप्त होती जाती है। अंत में कुंडलिनी आज्ञा चक्र को भेदते हुए सहस्रार बिंदुजिसे कुछ साघक सातव चक्र पर पहुँच जाती है तो वहाँ साधक को आलौकिक ज्ञान की प्राप्ति होने लगती है. यही एक बार इंसान की ऊर्जा सहस्रार तक पहुँच जाती है, तो वह पागलों की तरह परम आनंद में झूमता है। अगर आप बिना किसी कारण ही आनंद में झूमते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी ऊर्जा ने उस चरम शिखर को छू लिया है।दरअसल, किसी भी आध्यात्मिक यात्रा को हम मूलाधार से सहस्रार की यात्रा कह सकते हैं। यह एक आयाम से दूसरे आयाम में विकास की यात्रा है, इसमें तीव्रता के सात अलग-अलग स्तर होते हैं।आपकी ऊर्जा को मूलाधार से आज्ञा चक्र तक ले जाने के लिए कई तरह की आध्यात्मिक प्रक्रियाएं और साधनाएं हैं, लेकिन आज्ञा से सहस्रार तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। कोई भी एक खास तरीका नहीं है। आपको या तो छलांग लगानी पड़ती है या फिर आपको उस गड्ढे में गिरना पड़ता है, जो अथाह है, जिसका कोई तल नहीं होता। इसे ही ‘ऊपर की ओर गिरना‘ कहते हैं। योग में कहा जाता है कि जब तक आपमें ऊपर की ओर गिरने’ की ललक नहीं है, तब तक आप वहां पहुँच नहीं सकते।यही वजह है कि कई तथाकथित आध्यात्मिक लोग इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि शांति ही परम संभावना है, क्योंकि वे सभी आज्ञा में ही अटके पडे़ हैं। वास्तव में शांति परम संभावना नहीं है। आप आनंद में मग्न हो सकते हैं, इतने मग्न कि पूरा विश्व आपके अनुभव और समझ में एक मजाक जैसा लगने लगता है। जो चीजें दूसरों के लिए बड़ी गंभीर है, वह आप के लिए एक मजाक होती है।लोग अपने मन को छलांग के लिए तैयार करने में लंबे समय तक आज्ञा चक्र पर रुके रहते हैं। यही वजह है कि आध्यात्मिक परंपरा में गुरु-शिष्य के संबधों को महत्व दिया गया है। उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि जब आपको छलांग मारनी हो, तो आपको अपने गुरु पर अथाह विश्वास होना चाहिए। 99.9 फीसदी लोगों को इस विश्वास की जरूरत पड़ती है, नहीं तो वे छलांग मार ही नहीं सकते। यही वजह है कि गुरु-शिष्य के संबंधों पर इतना महत्व दिया गया है, क्योंकि बिना विश्वास कोई भी कूदने को तैयार नहीं होगा।


सोमवार, 19 जून 2017

मां काली ज्योतिष की आज की पोस्ट कुछ मित्रों के प्रश्न है । इन पर पहले भी हम कई बार प्रकाश डाल चुके हैं। यह पोस्ट किसी बहस के लिए नहीं है। यह सूचना है और मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को उसके भविष्य को बताने या समस्या सुधारने के लिए बाध्य नहीं हूँ, जो मेरी विवशता को नहीं समझते। ज्योतिष के दो रूप है। एक नक्षत्र विज्ञान से सम्बन्धित है, जिसका स्वरुप पंचांगों में देखा जा सकता है। दूसरा रूप ‘होरा’ का है। इसमें भविष्य कथन किया जाता है। दोनों में जड़ के सूत्रों का सम्बन्ध है ; पर ‘ होरा’ एक अलग विद्या है। दोनों ही विद्या जटिल गणितीय सूत्रों पर आधारित है, जो अलजेब्रा और स्टैटिक्स से भी अधिक जटिल है। दोनों के विद्वान भी अलग-अलग होते है। जो एक विद्या का जानकार , आवश्यक नहीं कि दूसरे का भी हो। जिस प्रकार गणित , फिजिक्स , कैमेस्ट्री आदि के प्रयोगों के निष्कर्ष के गणितीय समीकरणों के हल का रिजल्ट उस प्रयोग कर्त्ता की योग्यता पर निर्भर करता है ; उसी प्रकार इन दोनों विद्याओं का रिजल्ट ज्योतिषी की योग्यता पर निर्भर करता है। एक बात तो साफ़ है कि ज्योतिषी के लिए गणित का मास्टर होना जरूरी है वरना वह न तो ‘होरा’ का विशेषज्ञ हो सकता है , न ही नक्षत्र ज्योतिष का। यह अत्यंत कठिन विद्या है और सटीक गणितीय कैलकुलेशन करने वाला ही इसे समझकर इसे सीख सकता है। पर वर्तमान युग में हाल क्या है? गली- गली चन्दन टिका माला पहनकर ज्योतिषी बैठे हुए है । सामान्य जनता इस विद्या के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानती ; इसलिए ये राशी , खानों और ग्रहों और कुंडली में पहले से बने महादशा के चार्ट को देखकर सामान्य जानकारियों को भुनाते हैं । जिसका आडम्बर जितना बड़ा है , वह उतना ही बड़ा ज्योतिषी कहलाता है। आईये इस विद्या को और इसके नाम पर की जा रही व्यवसायिक चालाकी को समझें – लगभग हर चैनल , हर अखबार , हर पत्रिका में राशिफल बताने वालों की भरमार है ; परन्तु शास्त्रीय निर्देश क्या है? प्रत्येक ज्योतिषी को यह निर्देश दिया गया है कि फल पूरी कुंडली का होता है । कभी भी किसी को एक खाना , एक ग्रह , लग्न या चन्द्रमा की राशि के अनुसार फल न बताएं । इनसे भ्रम पैदा होता है और जातक का नुक्सान हो सकता है। चलिए शास्त्र को छोडिये। यदि आप पढ़े-लिखे हैं और गणित एवं विज्ञान के बारें में थोड़ा भी जानते है , तो निम्नलिखित गणितीय स्थिति को देखें। जन्मकुण्डली में यदि लग्न राशि में चन्द्रमा कि राशि कर्क (4) है, तो इसकी १० परिवर्तित स्थितियां बनती है , जिनका फल सर्वथा विपरीत भी हो सकता है। एक खाली होने की स्थिति में , शेष 9 , यहाँ 9 में से कोई एक ग्रह होने की स्थिति में। प्रत्येक राशि 30 डिग्री की होती है। प्रत्येक डिग्री पर परिवर्तन होता है; क्योंकि इस एक राशि के भोगकाल में सभी ग्रहों का भोग काल माना जाता है। इसी आधार पर नवांश कुंडली बनाई जाती है । पर यह केवल इतना ही नहीं है। प्रत्येक डिग्री पर परिवर्तन होता है। इस प्रकार यह 10 x 30 = 300 परिस्थितियाँ हो गयी।इसके बाद यह भी देखा जाएगा कि सातवें खाने में क्या है? क्योंकि खाना – 7 की पूरी दृष्टि इस पर पडती है ; जो लग्न की तरह 300 प्रकार की हो सकती है। अब यह 300 x 300 = 90,000 हो गये। फिर यह मान्य सिद्धांत है कि 1, 4, 7, 10 इन चारों का प्रभाव ज्योतिष विद्या में मूल रूप से एक माना जाता है। फिर तीसरी, पांचवी, सातवीं , नवमी – ये चार दृष्टियाँ भी होती है । ग्रहों का शत्रु और मित्र का समीकरण होता है , उच्च और नीच स्थिति का समीकरण होता है। अब कोई कैसे एक राशि के आधार पर दिन, मास या वर्ष का फल बता सकता है? नक्षत्र ज्योतिष में भी सम्पूर्ण पृथ्वी पर राशियों के प्रभाव एक जैसे ही होते। एक राशी में तीन नछत्तर इसी कारण जन्म कुंडली में बनाने में स्थान का महत्त्व होता है। पर ऐसा होता है । लोग राशि से ही वर्ष भर का फल बताने लगते है। एक दूसरी समस्या महादशा चक्र की है। यह केवल यह बताता है कि आपकी उम्र का कौन सा समय किस ग्रह के प्रभाव में रहेगा; पर उसका प्रभाव क्या होगा, यह तो कुंडली की गणना के बाद ही पता चलेगा। लेकिन कोई इस गणना को नहीं करता। आपको समस्या हुई। आप न जाकर बताया। ज्योतिष ने महादशा चार्ट देखा और बताया कि आपकी फलाने ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा है। इसी के कारण ऐसा हो रहा है। उपाय बताया, तो अर्थ का अनर्थ हो गया। त्रुटी ज्योतिष विद्या में नहीं है।त्रुटी हममें है। कभी हम नकली होते है, कभी अनाड़ी होते है , कभी कामचोर और कभी बेईमान। इसके लिए जातक –जातिका भी जिम्मेदार होते है। शास्त्रों में निर्देश है कि ज्योतिष के पास जाएँ , तो फल-मिठाई-वस्त्र-दक्षिणा लेकर जाए अन्यथा आपका अभीष्ट पूरा नहीं होगा; हानि भी हो सकता अहि। स्पष्ट है कि वे विद्वान जानते थे कि तब ज्योतिष ध्यान नहीं देगा। आज की दशा यह है कि लोग जन्मदिन का डिटेल्स अपनी समस्या भेज देते है। कोई उपाय बता दीजिये। अब यदि बता दू , तो वह अनुमान का तीर-तुक्का होगा। हानि का पाप सिर चढ़ेगा। न बताऊं , तो ऐसे लोग कहने लगते है “ वे तो फीस मांगते है” न मांगे तो हम क्या करें? हम जानते है कि यह 1० घंटे का काम है। दिन में 12 घंटे लगे रहे , तो भी 5,,% व्यक्ति को भी नहीं बता सकते। क्योंकि ये प्रतिदिन 10-15 की संख्या में होते है और हमारे पास समय का हाल यह है कि जो फीस जमा करवाते है ; उनका फल भी समय पर नहीं जा पाता। कभी 14 दिन तो कभी महीना भी लग जाता है। वैसै भी कुछ मित्रों मेरे जो ज्योतिषी है और टीवी पर अपना प्रोग्राम करते हे वो नाराज़ हो ग्रे कि आप ऐसा ना कहे मित्रों एक तरफ हम ज्योतिष को विज्ञान कहते हैं फिर इसको सही से उसका प्रचार करना चाहिए ओर जो कमी है उसे दुर करना चाहिए मेरा किसी से कोई विशेष नहीं यह मेरी अपने विचार हैं

रविवार, 18 जून 2017

नक्षत्र,राशि तथा ग्रहो का आपसी संबंध--- ताराओ का समुदाय अर्थात तारों का समूह नक्षत्र कहलाता हैं |विभिन्न रूपो और आकारो मे जो तारा पुंज दिखाई देते हैं उन्हे नक्षत्रो की संज्ञा दी गयी हैं | सम्पूर्ण आकाश को 27 भागो मे बांटकर प्रत्येक भाग का एक नक्षत्र मान लिया गया हैं | पृथ्वी अपना घूर्णन करते समय जब एक नक्षत्र से दूसरे पर जाती हैं या होती हैं तो इससे यह पता चलता हैं की हमारी पृथ्वी कितना चल चुकी हैं अब चूंकि नक्षत्र अपने नियत स्थान मे स्थिर रहते हैं धरती पर हम यह मानते हैं की नक्षत्र गुज़र रहे हैं | गणितीय दृस्टी से कहे तो जिस मार्ग से पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती हैं उसी मार्ग के आसपास ही “नक्षत्र गोल”मे समस्त ग्रहो का भी मार्ग हैं,जो क्रांतिव्रत से अधिक से अधिक सात अंश का कोण बनाते हुये चक्कर लगाते हैं |इस विशिष्ट मार्ग का आकाशीय विस्तार “राशि” हैं जिसके 12 भाग हैं और प्रत्येक भाग 30 अंशो का हैं | यह 12 राशि भाग धरती से देखने पर जैसे नज़र आते हैं उसी आधार पर इनके नाम रखे गए हैं |इस प्रकार मेष से लेकर मीन तक राशिया मानी गयी हैं | रशिपथ एक अंडाकार वृत की तरह हैं जिसके 360 अंश हैं | इन अंशो को 12 भागो मे बांटकर(प्रत्येक 30 अंश) राशि नाम दिया गया हैं | अब यदि 360 अंशो को 27 से भाग दिया जाये तो प्रत्येक भाग 13 अंश 20 मिनट का होता हैं जिसे गणितिय दृस्टी से एक “नक्षत्र” माना जाता हैं |प्रत्येक नक्षत्र को और सूक्ष्म रूप से जानने के लिए 4 भागो मे बांटा गया हैं (13 अंश 20 मिनट/4=3 अंश 20 मिनट) जिसे नक्षत्र के चार चरण कहाँ जाता हैं | इस प्रकार सरल भाषा मे कहे तो पूरे ब्रह्मांड को 12 राशि व 27 नक्षत्रो मे बांटा गया हैं जिनमे हमारे 9 ग्रह भ्रमण करते रहते हैं | अब यदि इन 27 नक्षत्रो को 12 राशियो से भाग दिया जाये तो हमें एक राशि मे सवा दो नक्षत्र प्राप्त होते हैं अर्थात दो पूर्ण नक्षत्र तथा तीसरे नक्षत्र का एक चरण कुल 9 चरण, यानि ये कहाँ जा सकता हैं की एक राशि मे सवा दो नक्षत्र होते हैं या नक्षत्रो के 9 चरण होते हैं | हर राशि का एक स्वामी ग्रह होता हैं जिसे हम राशि स्वामी कहते हैं इस प्रकार कुल मिलाकर यह कहाँ जा सकता हैं की एक राशि जिसका स्वामी कोई ग्रह हैं उसमे 9 नक्षत्र चरण अर्थात सवा दो नक्षत्र होते हैं | किस राशि मे कौन से नक्षत्र व नक्षत्र चरण होते हैं और उनके स्वामी ग्रह कौन होते हैं इसको ज्ञात करने का एक सरल तरीका इस प्रकार से हैं | सभी 27 नक्षत्रो को क्रमानुसार लिखकर उनके स्वामियो के आधार पर याद करले | अब नक्षत्र चरण के लिए निम्न सूत्र याद करे | [नक्षत्र चरण – राशिया 4 4 1- { मेष,सिंह,धनु } 3 4 2 – { वृष,कन्या,मकर } 2 4 3- { मिथुन,तुला,कुम्भ } 1 4 4- { कर्क,वृश्चिक,मीन } आरंभ के 3 नक्षत्र केतू,शुक्र व सूर्य ग्रह के हैं ज़ो क्रमश; मेष,सिंह व धनु राशि मे ही आएंगे | इसके बाद तीसरा नक्षत्र (शेष 3 चरणो की वजह से ),चौथा व पांचवा नक्षत्र सूर्य,चन्द्र व मंगल के हैं जो क्रमश; वृष, कन्या व मकर राशि मे ही आएंगे |अब अगले(शेष)नक्षत्र मंगल,राहू व गुरु के हैं जो मिथुन,तुला व कुम्भ राशि मे ही आएंगे तथा अंत मे गुरु(शेष),शनि व बुध के नक्षत्र कर्क,वृश्चिक व मीन राशि मे ही आएंगे | जन्म नक्षत्र का व्यक्तित्व पर प्रभाव-- आकाश मंडल में 27 नक्षत्र और अभिजीत को मिलाकर कुल 28 नक्षत्र होते हैं। राशियों पर 27 नक्षत्रों का ही प्रभाव माना गया है। जन्म के समय हम किस नक्षत्र में जन्में हैं, उसका स्वामी कौन है व उसकी जन्म कुंडली में किस प्रकार की स्थिति है। जन्म के समय का नक्षत्र उदित है या अस्त, वक्री है या मार्गी किन ग्रहों की दृष्टि युति संबंध है व राशि स्वामी का संबंध कैसा है।नक्षत्र स्वामी का राशि स्वामी में बैर तो नही जन्म कुंडली में उन दोनों ग्रहों की स्थिति किस प्रकार है। यह सब ध्यान में रखकर हमारे बारे में जाना जा सकता है ज्योतिषशास्त्र के अन्तर्गत बताया गया है कि नक्षत्रों की कुल संख्या२7 है विशेष परिस्थिति में अभिजीत को लेकर इनकी संख्या २८ हो जाती है। गोचरवश नक्षत्र दिवस परिवर्तित होता रहता है। ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार हर नक्षत्र का अपना प्रभाव होता है। जिस नक्षत्र में व्यक्ति का जन्म होता है उसके अनुरूप उसका व्यक्तित्व, व्यवहार और आचरण होता है।

ज्योतिष भविष्य में होने वाली घटनाओं तथा कार्यों की जानकारी प्राप्त करने की विद्या को ज्योतिष कहा जाता है । ज्योतिष के मुख्य दो आधार हैं नक्षत्र ज्ञान एंव सामुद्रिक शास्त्र । ज्योतिष शास्त्र के जानकारों द्वारा कई प्रकार की विधियों से भविष्य की जानकारियों का पता लगाने का प्रयास करा जाता है परन्तु नक्षत्र ज्ञान व सामुद्रिक शास्त्र के अतिरिक्त सभी विधियां अनुमानों पर आधारित होती हैं जिनका कोई ठोस प्रमाण नहीं होता । नक्षत्र ज्ञान व सामुद्रिक शास्त्र ज्योतिष विद्या के मुख्य स्तम्भ माने जाते हैं जिनके द्वारा किसी भी इन्सान के भविष्य की जानकारी सरलता से प्राप्त करी जा सकती है । ज्योतिष का उदय भी इन दोनों के कारण ही हुआ है । ज्योतिष में नक्षत्र ज्ञान सूर्य की कक्षा में भ्रमण करने वाले ग्रहों की स्थिति का ज्ञात होना एंव उनके प्रभाव से इन्सान के जीवन में होने वाले कार्यों तथा घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने की विद्या है । ज्योतिष ने कुल नौ ग्रहों को इंसानी जीवन के लिए प्रभावशाली माना है तथा इन नव ग्रहों की गणना से ही ज्योतिष की प्रत्येक भविष्यवाणी करी जाती है । ज्योतिष में सर्व प्रथम ग्रहों की स्थिति ज्ञात की जाती है जो वर्तमान में बहुत सरल कार्य है क्योंकि कम्प्यूटर ने ग्रहों की स्थिति स्पष्ट करने के अतिरिक्त ज्योतिष कुंडली बनाना तथा सभी प्रकार की गणना करना सरल कर दिया है । कोई भी कम्प्यूटर से अपनी ज्योतिष कुंडली सरलता से बना सकता है । नव ग्रह की गणना करना जितना सरल कार्य है ज्योतिष की भविष्य वाणी उतनी ही कठिन है क्योंकि ग्रहों का प्रभाव तथा उनकी शक्ति की परख हुए बगैर किसी भी प्रकार की भविष्य वाणी नादानी है । ग्रहों का प्रभाव इन्सान पर उनके द्वारा प्राप्त उर्जा से होता है तथा ग्रहों की दूरी व गति के कारण प्रतिपल उनके प्रभाव में परिवर्तन होता रहता है । हमारे सौर मंडल में सूर्य ही उर्जा का मुख्य श्रोत है जिसकी किरणें पूरे संसार को उर्जा प्रदान करती हैं परन्तु दूसरे ग्रहों से टकराकर किरणों के प्रभाव में परिवर्तन हो जाता है तथा उन्हें रश्मियाँ कहकर पुकारा जाता है । सभी ग्रहों की रश्मियों का प्रभाव भिन्न है जो इन्सान के शरीर व मस्तिक को प्रभावित करती हैं विभिन्न प्रभाव से इंसानी सोच व कार्य क्षमता भी विभिन्न प्रकार की होती है । सूर्य की उर्जा मस्तिक की याददास्त शक्ति को प्रभावित करती है इसी प्रकार चन्द्रमा मन को, मंगल भावनाओं को, बुध ग्रह बुद्धि को, गुरु विवेक को, शुक्र कल्पना शक्ति को, शनी इच्छा शक्ति को प्रभावित करते हैं । राहू केतु की नकारात्मक उर्जा सम्पूर्ण मस्तिक को प्रभावित करती है जो इन्सान के लिए संतुलित रूप में अति आवश्यक उर्जा है क्योंकि बुद्धि में नकारात्मक उर्जा ना हो तो किसी बुरे कार्य अथवा धोखे की परख करने की क्षमता नहीं होती जिसके फलस्वरूप कोई भी इन्सान मूर्ख बना कर अपना स्वार्थ सिद्ध कर सकता है । बुद्धि मानसिक तंत्र में जानकारियां प्राप्त करने की मुख्य भूमिका अदा करती है इसलिए सभी ग्रहों में बुद्ध ग्रह का नैसर्गिक बल सदा समान रहता है बाकि सभी ग्रहों का नैसर्गिक बल प्रतिपल कम व अधिक होता रहता है । सभी उर्जाएं संतुलित हों तो इन्सान सुख पूर्वक जीवन निर्वाह करता है परन्तु उर्जाओं का असंतुलन जीवन नर्क समान बना देता है । ज्योतिष द्वारा भविष्य जानने का कार्य कुछ महान आविष्कारकों के कारण सफल हो सका जिन्होंने नक्षत्र ज्ञान प्राप्त करके ज्योतिष शास्त्र की रचना की तथा ग्रहों के प्रभाव से संसार को अवगत कराया । ज्योतिष का दूसरा आधार सामुद्रिक शास्त्र इन्सान की शरीर की बनावट तथा हस्त रेखा विज्ञान उसके भविष्य को ज्ञात करने की ज्योतिष विद्या है । सभी इंसानों के शरीर की बनावट तथा रेखाओं में स्पष्ट अंतर होता है जो ग्रहों से प्राप्त उर्जा के प्रभाव से है और रेखाओं को देखकर अनुमान लगाया जाता है कि किस ग्रह के प्रभाव से इस इन्सान पर होने वाला असर इसके जीवन को प्रभावित करके सफल होने में बाधा उत्पन्न कर रहा है । ज्योतिष से कारणों का पता लगाकर निवारण करने की किर्या इन्सान को सफल जीवन प्रदान करे इसलिए असफल इन्सान ज्योतिष द्वारा अपने भविष्य की जानकारी और निवारण के लिए प्रयास करते रहते हैं । इन्सान द्वारा अपने जीवन सुधार के लिए ज्योतिष का सहारा लेना स्वाभाविक कार्य है तथा इसके लिए वह ज्योतिषियों के चक्कर लगाता है जहाँ उसे सिवाय लूट के कुछ प्राप्त नहीं होता क्योंकि नब्बे प्रति शत ज्योतिष के नाम पर सिर्फ लूट होती है । कोई भी विद्या बेकार नहीं होती परन्तु उसकी सम्पूर्ण जानकारी के बगैर उसका प्रयोग गलत अंजाम देता है इसलिए किसी भी निर्णय के लिए सावधानी आवश्यक होती है । किसी कार्य की सफलता के लिए गलत प्रकार के ज्योतिष शास्त्रियों के चक्कर में फंसकर नुकसान उठाने से अच्छा है खुद पर तथा अपनी कार्य क्षमता पर विश्वास किया जाए क्योंकि ज्योतिषी सिर्फ कुछ कारणों का अनुमान लगा सकता है परन्तु कार्य एवं कार्य की सफलता इन्सान को अपने परिश्रम से ही प्राप्त करनी पडती है । ज्योतिष द्वारा भविष्य के विषय में ऐसा होगा सोचना या कहना उचित हो सकता है परन्तु ऐसा ही होगा यह कहना सर्वदा अनुचित है क्योंकि जो होगा वह सिर्फ प्राकृति को ज्ञात है किसी इन्सान का खुद को प्राकृति का ज्ञाता समझना मूर्खता का कार्य है । आचार्य राजेश

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...