सोमवार, 14 जनवरी 2019

ग्रहों के अधीन है हर चीज

आसपास की हर वह वस्तु ( सजीव अथवा निर्जीव) जिसका हम पर या हमारे जीवन पर और हमारे रोजमर्रा के कार्य पर प्रभाव है हर वस्तु पर ग्रहण का किस तरह दखल है, यह हमें पहचानने की आवश्यकता है जी हां मित्रोंधरती पर भी ग्रह का अंश विद्यमान है और हमे उसे पहिचानने की आवश्यकता होती है। आप अपने कम्पयूटर की टेबिल पर विराजमान है और आप को यह समझना जरूरी है कि इस टेबिल के आसपास कौन कौन से ग्रह के अंश विद्यमान है। की बोर्ड केतु है और की बोर्ड के अन्दर लिखा जाने वाला कार्य बुध है

,की बोर्ड के अन्दर जो बिजली का प्रवाह है वह मंगल के रूप में है और की बोर्ड की बनावट को दर्शाने वाला सूर्य है,की बोर्ड की सजावट शुक्र है और की बोर्ड पर की जाने वाली मेहनत वह की दबाने से सम्बन्ध रखती हो या की बोर्ड की जानकारी के लिये जानी जाती हो। की बोर्ड को चलाने का तरीका ही गुरु है और की बोर्ड के अन्दर के पार्ट राहु के रूप में है जो अपनी भाषा से कम्पयूटर के अन्दर डाटा भेज कर अपने कार्य को बृहद गणना से पूरा करने के बाद सम्बन्धित प्रोग्राम को खोलकर सामने लाते है। की बोर्ड का तार भी केतु की श्रेणी मे आता है और कीबोर्ड का जैक भी केतु की श्रेणी में आता है। कम्पयूटर का हार्डवेयर केतु है,उसके अन्दर लगे पार्ट्स भी केतु की श्रेणी में आते है चलने वाली बिजली मंगल है और अन्दर जो डाटा चल रहा है वह राहु की श्रेणी में आता है। बनाये गये प्रोग्राम जो भी स्क्रीन पर आते है वे द्रश्य रूप में सूर्य की श्रेणी में आते है और स्क्रीन जो मनभावन कलर में और मन को अच्छी लगने वाली वालपेपर के रूप में सामने है वह शुक्र की श्रेणी में आता है। माउस भी केतु की श्रेणी में आता है लेकिन माउस के द्वारा किया जाने वाला कार्य जो कम्पयूटर को शक्ति देता है वह राहु की श्रेणी में आता है। सभी को मिलाकर गुरु और बुध की श्रेणी में इसलिये लिया जाता है क्यों कि बुध और राहु मिलकर असीमित विस्तार का रूप देते है,बुध और केतु मिलकर यंत्र का निर्माण करते है और मंगल उनके अन्दर बिजली की शक्ति देता है,सूर्य से ढांचा बनाया जाता है और शुक्र से उसका रूप सजाया जाता है। जो भी रंग हमे कम्पयूटर में दिखाई देते है वे सभी ग्रहों के अंश के रूप में दिखाई देते है। इसी तरह से प्रिंटर को भी समझा जा सकता है,प्रिंट करना बुध और शनि के अन्दर आता है कागज का रूप शनि चन्द्र के रूप में आता है कागज पर छपा हुआ मेटर केतु की श्रेणी में और कागज पर छपे मेटर से उत्पन्न होने वाला भाव राहु की श्रेणी में आता है,उसकी उपयोगिता और अनुपयोगिता को गुरु की श्रेणी में लाया जाता है। इसी तरह से जब हम अपनी बैठक में बैठ कर कोई टीवी प्रोग्राम देख रहे होते है तो टीवी भी बुध और राहु की श्रेणी में आता है उसके अन्दर चलने वाले प्रोग्राम बुध और गुरु की देन होती है और हमें क्या अच्छा लग रहा है वह उस समय के ग्रह के अनुसार मानसिक रूप से चन्द्रमा के द्वारा समझ में आता है सैटेलाइट से या केबिल से जो भी प्रोग्राम हमारे टीवी के अन्दर आ रहे होते है वे केतु के द्वारा राहु की देन होते है और जो भी कार्यक्रम हम पसंद करते है वह हमारे मन यानी चन्द्रमा के आधीन होते है। इसी लिये कोई प्रोग्राम हम सभी को एक साथ देखने में अच्छा लगता है वह उस समय की बुध और राहु की देन होती है जो चन्द्रमा पर अपना अधिकार दे रही होती है। कभी कभी हमें कोई प्रोग्राम अच्छा नही लगता है और कभी कभी हमे बेकार का प्रोग्राम भी अच्छा लगता है,बुध और सूर्य के मिलने पर हमे समाचार अच्छे लगते है और बुध शुक्र के मिलने पर हमे गाने अच्छे लगते है,शुक्र का प्रभाव जब मानसिक रूप से सूर्य को प्रभावित करता है तो हमें उत्तेजक द्रश्य अच्छे लगते है और बुध का प्रभाव जब गुरु के अनुसार होता है तो हमे धार्मिक और बुद्धि को बढाने वाले प्रोग्राम अच्छे लगते है। धन से सम्बन्धित प्रोग्राम हमारे दूसरे भाव के द्वारा समझ में आते है और खेल कूद के प्रोग्राम हमें हमारे पांचवे भाव के अनुसार अच्छे लगते है।जब भोजन की टेबिल पर बैठे होते है तो भी ग्रह हमारे आसपास ही होते है । पानी के रूप में चन्द्रमा हमारे आसपास होता है। रसों के रूप में शुक्र हमारे पास होता है वही शुक्र फ़लों के रूप में सजीव दिखाई देता है जब रस का बना हुआ ढांचा शुक्र और सूर्य का मिलावटी रूप होता है। मंगल के साथ होने पर फ़ल लाल रंग का मीठा होता है और गुरु के साथ होने पर पीला होता है। बनी हुई दाल गुरु और मंगल के साथ सूर्य से अपना संबध रखती है और बना हुये चावल चन्द्रमा मंगल और सूर्य के साथ हमारे साथ होते है। वेजेटेरियन खाना हमारे गुरु के अनुसार होता है और नानवेज खाना हमारे शनि और राहु के अनुसार माना जाता है,भोजन को ग्रहण करने के समय जो भी कारक चाहे वे प्लेटें हो चमचा हों या भोजन को मुंह तक पहुंचाने के लिये हाथों का प्रयोग होता हो या भोजन को करवाने के लिये किसी अन्य व्यक्ति का रूप सामने हो वह केतु के रूप में माना जाता है। भोजन जो किया जाता है उसका प्रभाव शक्ति के रूप में हस्तांतरित होता है,शक्ति अच्छी या बुरी राहु के रूप में खून यानी मंगल के अन्दर अपना स्थान बनाती है और जैसे जैसे मंगल खून के रूप में अपना प्रभाव शरीर पर देता है उसी प्रकार की शक्ति मन की शक्ति के रूप में समझने में आने लगती है। अगर तामसी भोजन किया होता है तो खून के अन्दर राहु का प्रभाव बद के रूप में शामिल हो जाता है और वह अपनी शक्ति से मन को गंदा करता है दिमाग मे कुत्सित विचार आने लगते है तथा कोई भी गलत कार्य करने के बाद जो सोच रह जाती है वह केवल चिन्ता को पैदा करती है इससे ह्रदय के ऊपर अधिक भार पडने से हाई या लो ब्लड प्रेसर का रूप सामने आने लगता है।जब हम कोई भी कार्य कर रहे होते है तो वह भी ग्रह के अनुसार ही सामने होता है। अगर गाडी की ड्राइव कर रहे है तो शुक्र केतु का रूप सामने होता है,और राहु जो सडक के रूप में होती है उस पर केतु शुक्र का आमना सामना होता रहता है। दिमागी विचार के रूप में गुरु अपनी शक्ति को देता रहता है और बुध के साथ राहु का दूसरा प्रभाव अगर चिन्ता के रूप में सामने होता है तो दिमाग सडक की वजाय अन्यत्र भटकने लगता है,इससे ही दुर्घटना होने के अन्देसे सामने आने लगते है। जब व्यक्ति चल कहीं रहा होता है और दिमाग कहीं भटक रहा होता है तो जो सामने होने को है उससे दिमाग अपने विस्तार रूपी केलकुलेशन को हटा देता है,और उसी समय ही दुर्घटना हो जाती है। शुक्र के ऊपर जो राहु का प्रभाव सामने आता है तो हमेशा दिमाग में सुन्दरता के प्रति विचार दिमाग में पनपते रहते है और शुक्र राहु का नशा भी जब व्यक्ति को परेशान करता है तो वह अपने चलने वाले कार्यों और विचारों को भूल कर एक अनौखी दुनिया में विचरण करने लगता है। उस विचरण के दौरान ही व्यक्ति के अन्दर जो भी लाभ हानि होती है,वह राहु और शुक्र के प्रति ही समझा जाता है। जब व्यक्ति को अपनी भूल का अहसास होता है तो वह काफ़ी कुछ खो बैठता है या काफ़ी कुछ राहु की कृपा से प्राप्त कर चुका होता है।हमारा पूरा जीवन ही ग्रह गणित में फ़ंसा है। जन्म से लेकर मौत तक ग्रह ही अपनी अपनी शक्ति से अपना अपना कार्य करवाते जाते है और हम आसानी से उन कार्यों को करते जाते है जब ग्रह अपना रूप अटकाने के लिये सामने लाते है तो हम अटक जाते है और जब ग्रह अपने अनुसार सही होते है तो हम उन्ही कार्यों को करते हुये आगे निकलते जाते है,जब हमारे कार्य पूरे होते है तो हम सुखी रहते है और जब हमारे कार्य पूरे नही होते है तो हम दुखी होते है। ग्रह गणित में रिस्ते नाते भी आते है,सूर्य से पिता या पुत्र को माना जाता है चन्द्रमा का विभिन्न रूप माता के सरीखे लोगों से सामने आने लगता है मंगल या तो भाई होता है या स्त्री जातक के लिये पति का रूप भी सामने लाता है बुध बहिन बुआ या बेटी के रूप में होती है और गुरु जो जीव के रूप में स्वयं भी होता है शुक्र पत्नी का कारक है स्त्री के लिये सजावटी कार्यों का कारक है शनि से कर्म का अन्दाज लिया जाता है या घर के बुजुर्ग लोगों के लिये भी शनिकी गिनती की जाती है। राहु को अन्दरूनी शक्ति के लिये जाना जाता है केतु के लिये केवल साधनो के रूप में ही जाना जाता है वैसे दोनो ही ग्रह छाया ग्रह के रूप में जाने जाते है केतु को नकारात्मक छाया और राहु को सकारात्मक छाया के लिये जाना जाता है। राहु केतु के बिना जीवन के अन्दर कोई भी कार्य पूरा नही होता है,कारण नही बनता है तब तक उसका निवारण भी नही बनता है कारण को बनाने वाला केतु होता है और निवारण के लिये अपनी शक्ति को देने वाला राहु होता है।आज इतना ही बाकी फिर मिलेंगे दोस्तों एक और नए लेख को लेकर जय माता दी खुश रहिए धानंद मे रहिए मस्त रहिए

रविवार, 13 जनवरी 2019

तुला♎लग्न के लिए घन कारक ग्रह

तुला लग्न के स्वामी शुक्र होते है  ये चर राशि है  तुला राशि में वायु तत्त्व की प्रधानता देखने को ,मिलती है । शूद्र वर्ण की ये राशि भचक्र की सातवें स्थान पर आने वाली राशि हैइस राशि  में चित्र स्वाति  और  विशाखा नक्षत्र  आते  तुला लगन मे जन्म लेने वाले जातको के लिये धन प्रदाता ग्रह मंगल है।धनेश मंगल की शुभाशुभ स्थिति से धन स्थान से संबंध जोडने वाले ग्रहों की स्थिति  योगायोग एवं मंगल तथा धन स्थान पर पडने वाले ग्रहों के द्रिष्टि संबंध से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति आय के स्त्रोतों तथा चल अचल संपत्ति का पता चलता है।  इसके अतिरिक्त लगनेश शुक्र पंचमेश शनि भाग्येश बुध ऐश्वर्य एवं वैभव को बढाने में पूर्ण सहायक होते है। वैसे तुला लगन के लिये गुरु सूर्य मंगल अशुभ है। शनि बुध शुभ होते है चन्द्र और बुध राजयोग कारक होते है,मंगल प्रधान मारकेश होकर भी मारक कार्य नही करता है।

 गुरु छठे भाव के मालिक होने से अशुभ फ़लदायक है। गुरु परमपापी है सूर्य व शुक्र भी पापी है,अति शुभ फ़लदायक शनि है। मंगल साहचर्य से मारक का कार्य करेगा। मंगल के कार्यों से अगर जातक को जोडा जाता है तो जातक अस्पताली कार्यों के प्रति निपुणता का प्रदर्शन करने के बाद धन को प्राप्त कर सकता है,मंगल ही इन्जीनियरिंग आदि के कार्यों से अपना सम्बन्ध जोडता है और मंगल ही तोडफ़ोड और पुराने सामान जो लोहे और मशीनरी आदि से सम्बन्ध रखते है से अपना सम्बन्ध बनाकर कर रखता है। मंगल भोजन के लिये भी जाना जाता है और मंगल होटल ढाबा और इसी प्रकार के कार्यों से जोडा जाता है। लेकिन तुला लगन में मंगल का आधिपत्य दूसरे भाव की वृश्चिक लगन से होने से भी जातक के लिये उन कार्यों के प्रति भी रुझान बढेगा जो कार्य गूढ होते है और जो कार्य कबाड से जुगाड बनाने वाले कारणों में जाने जाते है। धनेश मंगल ही सप्तमेश का कार्य करता है,अगर सप्तम स्थान जातक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करता है तो जातक को धनी बनने से कोई रोक नही सकता है। अक्सर सप्तम स्थान से मंगल की स्थिति अगर छ: यानी लगन से बारहवे स्थान में होती है तो जातक का जीवन साथी जातक के द्वारा कमाये गये धन को अपने अनुसार कर्जा दुश्मनी बीमारी और रोजाना के घर के खर्चों के बहाने खर्च कर लेगा और उसके पास कुछ भी नही बचेगा जितना जातक कमायेगा उससे अधिक जातक का जीवन साथी अपने कारणों से खर्च कर लेगा। इसके अलावा सप्तम से छठे स्थान में अगर गुरु किसी प्रकार से अपनी युति देता है तो जातक के द्वारा बनाये गये संबध भी जीवन साथी की बजह से बेकार होजाते है और उन सम्बन्धो की बजह से भी जातक को मुकद्दमा या पारिवारिक कारणों से खर्च करना पडता है। यह बाते संतान से सम्बन्धित रिस्तों में भी होते है और रोजाना के कार्यों के अन्दर भी माने जाते है। इसके अलावा अगर मंगल का स्थान सप्तम से अष्टम यानी जातक के दूसरे भाव में होता है तो जातक को अपने ही परिवार के कारण धन को खर्च करना पडता है और यह भी जीवन साथी के प्रति अपमान या मौत जैसे कारणों के लिये माना जाता है।जीवन साथी को जोखिम के कामों में अधिक मन लगने से भी जातक को धन के साथ कभी कभी शारीरिक क्षति मिलती है।तुला लगन में अगर शुक्र लगन में ही विराजमान हो शनि बुध की आपसी युति किसी भी प्रकार से हो तो जातक के लिये अपनी प्रसिद्धि का कारण बन जाता है,शुक्र लगन में होता है तो जातक को तुला राशि का पूरा प्रभाव मिलता है उसे धन को जायदाद को और जो भी धन के देने वाले कारक होते है के अन्दर बेलेंस बनाने की अभूतपूर्व क्षमता का विकास होता है,वह किसी भी प्रकार के धन और सम्पत्ति को बेलेंस बनाने के कामों में अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है अगर जातक पुरुष है तो वह महिलाओं के सानिध्य से और महिला है तो पुरुषों और सम्पत्ति के बल पर अपनी औकात को बनाता चला जाता है,बुध के भाग्य और खर्च करने के भावों का मालिक होने के कारण वह धन की स्थिति को जोडने घटाने के कामों मे और कई तरह की भाषाओं को जानने की बजह से भी अपनी योग्यता को बढाता चला जाता है उसे कमन्यूकेशन के साधनों से भी अच्छी कमाई होती है और वह अपने विस्तार को अधिक से अधिक बढाता हुआ अपने को प्रसिद्धि के रास्ते पर ले जाता है। शनि का आधिपत्य मकर और कुम्भ राशि पर होने से शनि सुख और बुद्धि का मालिक बन जाता है और कुंडली में जहां भी होता है वह सुख और बुद्धि वाले कामों को ही देता है। शनि कर्म का भी दाता है और भावों के अनुसार अपना फ़ल जातक को देता चला जाता है,अगर शनि लगन से छठे भाव में है तो जातक को रोजाना के कामों में और कर्जा दुश्मनी बीमारी से भी लाभ देने का कारक बना होता है। अगर शनि लगन से सप्तम स्थान में होता है तो वैसे तो शनि को मेष राशि का होने पर नीच का कहा जाता है लेकिन जातक धन के मामलो में अपने जीवन साथी की नीचता का लाभ उठाता है उसके पास वही साझेदार होते है जो अपनी नीचता के द्वारा जातक को लाभ देने के मामले में जाने जाते है। अक्सर इस स्थान का शनि जातक को उसी प्रकार के जीवन साथी को प्राप्त करने के लिये बल देता है जो अनैतिक कार्यों को करने वाले और अपने शरीर को किसी भी गलत कार्यों में लगा सकने में समर्थ होते है। यह बात अक्सर अच्छे कार्यों के लिये भी माना जाता है जैसे राजनीति आदि के कारणों में अपनी पहिचान बनाने के लिये और नीची बस्तियों में रहने वाले लोगों से ताल मेल बैठाकर उनसे अपने कार्यों को करवाने के लिये माने जाते है। शनि जब बुध के साथ अपनी युति रखता है तो जातक को कार्य के प्रति आकलन करने की अच्छी शक्ति अपने आप पैदा हो जाती है और अगर शनि का स्थान अष्टम में होता है तो जातक प्लास्टिक के कामों में और जमीन की खरीद बेच करने में अपनी योग्यता का अच्छा परिचय देता है और अन्दरूनी तरीके से धन कमाने के लिये अपने को छुपाकर रखता है,साधारण आदमी को पता नही चलता है कि जातक के पास कितनाधन कहां से आया है और कहां है। अक्सर इस प्रकार के कार्यों के अन्दर दवाइयों के व्यापार से भी जोड कर देखा जाता है,और कबाड आदि के कार्यों से भी मिलाकर देखा जाता है।शनि का स्थान अगर दूसरे भाव में है और बुध का स्थान अगर अष्टम में है तो जातक मंत्र विद्या में पारंगत होता है और जातक किसी भी जासूसी वाले कार्य में निपुण होता है। जातक को जमीन के अन्दर के तत्वों की पूरी जानकारी होती है वह अपने दिमाग से रत्न व्यवसाय का अच्छा व्यवसाय कर सकता है,और अन्दर से कुछ कार्य बाहर से कुछ दिखाई देने वाले कार्यों की बजह से भी जातक अपने को धन के क्षेत्र में ले जाता है,जातक रद्दी से रद्दी वस्तु का स्तेमाल करने की योग्यता रखता है,बेकार से बेकार आदमी को कार्य में लगाने की हिम्मत रखता है,जडी बूटी से अच्छी से अच्छी दवाई बनाकर बेचने की भी औकात रखता है।जातक का धन अक्सर उन्ही फ़सलों के उत्पादनों से सम्बन्धित होते है जो जमीन के अन्दर कन्द के रूप में पैदा होती है और उन फ़सलों के द्वारा जातक खुले रूप में या उन्हे परिष्कृत करने के बाद अच्छा धन कमा सकता है। जातक ज्योतिष विद्या और इसी प्रकार की भाषाओं से से अपनी जीविका को चलाने की हिम्मत रखता है। अगर शनि तीसरे स्थान में होता है तो जातक का ध्यान बडी मीडिया या पब्लिसिंग वाले कार्यों की तरफ़ ध्यान जाता है जातक को कानूनी कार्य करने का शौक होता है जातक लम्बी रेल यात्रा करने का शौकीन होता है और जातक के लिये कोई भी धर्म और भाग्य के कार्य करने और उन्हे बताने का अच्छा व्यवहारिक ज्ञान होता है। अगर पंचम स्थान में शनि होता है और लाभ स्थान का सूर्य होता है तो जातक अपने कार्यों से अपने इलाके का मसहूर व्यक्ति बन जाता है जातक को लोग अपने अपने अनुसार पहिचानने लगते है। तुला लगन में भाग्य स्थान यानी मिथुन राशि का बुध जातक को विदेशी भाषाओं और कानून के मामले में अपनी पहिचान देता है तथा किसी भी तरह के हाईकोर्ट जैसे मामले को वह चुटकी से निपटाने की औकात रखता है। विदेशी व्यापार और विदेशी कानून को वह आसानी से पहिचानने और करने के लिये अपनी बुद्धि का सही प्रयोग करता है। घर में परिवार में और शहर में वह अपने अनुसार जाना जाता है उसकी प्रसिद्धि अल्प प्रयत्न से होती है,उसे किसी प्रकार से अपनी पहिचान किसी को बताने की जरूरत नही पडती है। बुध का स्थान अगर सिंह राशि में होता है तो जातक के मित्र अधिकतर धनी वर्ग के होते है या बनिया स्वभाव के होते है उनसे जातक को किसी भी मुशीबत में अपने लिये सहायता मिलती रहती है और जातक को अपनी पुत्री बहिन या बुआ से काफ़ी सहायता मिलती है,उसी सहायता से जातक अपने को बलशाली बना लेता है। इस स्थान का बुध जातक को रिहायसी प्लाट आदि खरीदने और बेचने से धनवान बनाने में सहयोग करते है,अगर जातक किसी प्रकार से अपनी बडी बहिन या बडी बुआ से बनाकर चलता है तो जातक के पास अकूत धन बहिन या बुआ के भाग्य से पैदा होने लगता है। इस स्थान के बुध के लिये जातक की पहिचान होती है कि उसके सामने वाले दांतों में दाहिनी तरफ़ के दांत के ऊपर एक दांत और होता है जिसे दतूसर के नाम से जाना जाता है,अगर जातक किसी प्रकार से तामसी भोजन यानी शनि का प्रयोग करना शुरु कर देता है तो उसके पास धन की बढोत्तरी शुरु हो जाती है कारण बुध दतूसर और शनि तामसी भोजन दोनो का संयोग लक्ष्मी को बढाने के लिये जाने जाते है।

तुला लगन में मंगल अगर मेष राशि का होता है तो जातक के जीवन साथी के अन्दर शारीरिक बल की अच्छी क्षमता होती है वह जातक के जीवन को कमजोर होने पर भी एक प्रहरी की तरह से संभाल कर रखता है,जब भी जातक के लिये कोई कठिनायी दुश्मनी बीमारी आदि होती है तो वह अकेले ही अपने कार्यों से प्रयासों से जातक को बचा लेता है। जातक का जीवन साथी जुबान का पक्का होता है और जो भी कह देता है वह पूरा करके दिखाता है,इसी कारण से जातक के जीवन साथी से कभी कभी तनाव बना रहता है,इस स्थान का मंगल सप्तम का मंगल कहा जाता है और जातक के अन्दर एक से अधिक जीवन साथी बनाने की भी आदत पायी जाती है लेकिन अपनी तुला लगन की बुद्धि से वह दोनो के अन्दर किसी न किसी प्रकार से बेलेंस बनाकर जीवन में सहयोग लेने के लिये भी जाना जाता है। अक्सर तुला लगन के जातक की आदत भी दोहरी होती है एक अपने लिये और एक दूसरे लोगों के लिये वह अपने लिये कुछ और होता है और दूसरों के लिये कुछ और,इसी कारण से जातक के अक्सर दो नाम होते है एक घर का और एक बाहर का। तुला लगन के जातकों के लिये मंगल का स्थान नकारात्मक पहले होता है और सकारात्मक बाद में होता है। सकारात्मक के लिये जातक के जीवन साथी का सहयोग माना जाता है नकारात्मक होने के लिये इस लगन के जातकों के सम्मुख होने पर पता चलता है। जितनी वाहवाही इस लगन के जातकों की दूर से सुनाई देती है उतनी ही घटिया आदते इस लगन के अन्दरूनी भागों में मानी जाती है,अगर किसी प्रकार से गुरु का स्थान इस लगन से बारहवां होता है तो जातक जैसा घर पर होता है वैसा ही बाहर दिखाई देता हैगुरु के साथ अगर मंगल की युति होती है तो जातक का धन आने के बाद भी नही रुकता है उसका कारण है कि जैसे धन आता है वह किसी न किसी प्रकार से घटता ही जाता है,और जातक किसी को धन किसी प्रकार की सहायता के लिये देता है तो वह जातक को या तो वापस नही मिल पाता है और मिलता भी है तो वह किसी न किसी प्रकार की बुराई को देकर जाता है। वह बुराई अक्सर परिवार की तरफ़ या खुद के चालचलन की तरफ़ इशारा करती है। तुला लगन के ग्यारहवें भाव का मालिक सूर्य होता है,और पिता के स्थान का कारक जातक का बडा भाई माना जाता है,लेकिन जातक के पंचम में कुम्भ राशि होने से जातक की भाभी या जीजा दोहरी बात करने का कारक होता है और यही हाल जातक के बडे पुत्र और उसकी पुत्रवधू के लिये समझा जाता है। बडा भाई अपने अहम के कारण सूर्य की योग्यता को प्रदर्शित करता है,और जातक के साथ किसी न किसी प्रकार से मानसिक अलगाव ही बना रहता है। इसका एक कारण और भी होता है कि जातक की लगन का मालिक शुक्र होने से और बडे भाई की लगन का कारक सूर्य होने से जो भी कारण बनते है वे स्त्री सम्बन्धी राजनीति ही कहे जाते है। सूर्य और शुक्र के संयोग से जब तक बडा भाई जातक से बनाकर चलता है उसके पास पुत्र और धन की अधिकतता बनी रहती है,और बडे भाई या बडी बहिन का भाग्य बनता रहता है,सरकारी या इसी प्रकार के उपक्रमो से जातक के बडे भाई या बडी बहिन को फ़ायदा मिलता रहता है और समाज तथा उन्नतशील लोगों में नाम और प्रशंसा बनी रहती है। बडे भाई या बडी बहिन के भाव से दूसरे भाव में बुध की कन्या राशि तथा ग्यारहवे भाव से दसवें भाव में बुध की मिथुन राशि होती है। बडा भाई या बडी बहिन के लिये धन और भौतिक सुख के कारण बैंक बीमा फ़ायनेन्स अस्पताल या इसी प्रकार की संस्थायें रेडक्रास धन वाले क्षेत्र कर्जा दुश्मनी बीमारी या रोजाना के किये जाने वाले कार्य नाना या मामा परिवार की सम्पत्ति या इन्ही कारकों से मिलने वाला धन आदि माने जाते है,तथा दसवें भाव में मिथुन राशि के होने से पद गरिमा बुध प्रधान शासन करने वाले क्षेत्र कमन्यूकेशन और धन के क्षेत्र से सम्बन्ध रखने वाले लोगों से जान पहिचान कर्जा देने वाली दुश्मनी रखने वाले बीमारी पालने वाले लोगों के प्रति अपनी मानसिक भावना को प्रदर्शित करने वाले कारकों के प्रति माना जाता है। जातक का बडा भाई बुध से हमेशा अपने को जोड कर चलता है,बुध ही जातक के बडे भाई या बहिन के लिये कर्णधार के रूप में माने जाते है।

तुला लगन वालों के लिये अगर मंगल और सूर्य का परिवर्तन योग होता है यानी सूर्य मंगल के घर में और मंगल सूर्य के घर में विद्यमान होता है तो जातक के पास अकूत लक्ष्मी होती है। मंगल मेष राशि का होता तो ऊपर हम बताकर ही आये है लेकिन सूर्य अगर मेष राशि का होता है तो जातक राजनीति या सरकारी क्षेत्र में अपना नाम सेना इन्जीनियरिंग अस्पताल या इसी प्रकार के क्षेत्र में बनाकर चलता है। तुला लगन वाले जातकों के बारे में एक बात और मानी जाती है कि वे लडाई झगडे से दूर रहने वाले होते है और जो भी कार्य दुश्मन के प्रति करते है वह अन्दरूनी ही होता है और वे खुल कर कभी सामने नही आते है। अक्सर इस लगन के जातक पुराने विवादों को जल्दी से भूल जाते है और जो भी उन्हे समय पर प्रताणित करने की कोशिश करता है उससे वे अपने अनुसार केवल समयानुसार ही बदला लेने के लिये जाने जाते है हमेशा के लिये दुश्मनी पालकर चलना उनके वश की बात नही होती है। सूर्य चूंकि बडे भाई मित्रों और पुत्र वधू के रूप में सामने आने की युति देता है,और इस युति का अवसर जब भी जातक को मिलता है वे अपने अनुसार इन्ही कारकों से अपनी कर्जा दुश्मनी बीमारी निपटाने का कार्य करते है,सामाजिक व्यवस्था के प्रति जब इनके अन्दर कोई बदलाव मिलता है तो इनकी जल्दबाजी की आदत से इन्हे दिक्कत आजाती है,और किसी भी काम को जोखिम से करने के प्रति इन्हे अधिक लालसा रहती है किसी भी लम्बी यात्रा या किसी भी अस्पताली काम को अथवा किसी भी तकनीकी काम को यह जोखिम के रूप अक्समात अपने ऊपर धारण कर लेते है,किसी भी खरीद बेच के कामों के अन्दर यह अपने को अपने आप ही प्रवेश करा लेते है लेकिन ग्रह योग अगर किसी प्रकार से विपरीत होता है तो यह अपने दर्द को किसी को बताते भी नही है और अपने ही अन्दर उस दर्द को पीकर रह जाते है। तुला लगन के लिये माता यानी चन्द्रमा अगर किसी प्रकार से सहायक के रूप में होती है जैसे लगन में ही चन्द्रमा होता है तो जातक को माता की शिक्षा के द्वारा एक बनिया प्रकृति का व्यक्ति बना दिया जाता है और उसे जनता तथा जान पहिचान वाले लोगों के प्रति सामने आते ही बेलेंस करने की क्षमता का विकास हो जाता है और जो भी उन्हे धोखा देना चाहता है उससे यह अपने को बचा लेते है,उसी प्रकार से अगर चन्द्रमा मकर राशि का होता है तो जातक की माता का प्रभाव जातक के बचपन के कार्यों के प्रति समझा दिया जाता है और इस लगन के जातक अपने कार्यों को बचपन से ही समझने लगते है और उन्हे अपने परिवार आदि का भार सहन करने की आदत पड जाती है किसी भी कठिन परिस्थिति में वे अपने को चलाकर निकाल लेते है और उनके कोई भी कार्य अटकते नही है,लेकिन अपनी हठधर्मी और माता की मृत्यु के बाद वे अक्सर अपने को अकेला पाते है और जो भी उन्हे ममता देता है उसी की तरफ़ अपने को समेटते चले जाते है भले ही पहले दी जाने वाली ममता ही उनके लिये सर्वनाश के लिये अपने जाल को क्यों न बिछा कर बैठी हो। बारहवें भाव में कन्या राशि होने से या तो जातक के द्वारा कोई असमान्य स्थिति में कन्या आदि के लिये सहायता वाले कार्य किये जाते है अथवा वे किसी कन्या को पुत्री की तरह से मानने लगते है और जितना वे उस कन्या के प्रति खर्च करते जाते है उतना ही धन उनके लिये आगे से आगे बढता जाता है। इस लगन वाले जातकों के लिये यही सुझाव सबसे बढिया है कि वे जीते जागते बुध को अगर अपने माफ़िक बनाना चाहते है तो वे कन्या जाति को अपने सहायता वाले कारकों से फ़लीभूत करते रहे। इस लगन के जातकों की कुंडली में अगर सूर्य शुक्र और चन्द्रमा एक ही स्थान में होता है तो जातक के पास अकूत काला धन भी पाया जाता है। यही हाल तब और देखने को मिलता है जब सूर्य और शुक्र का आपसी परिवर्तन योग होताहै

शनिवार, 12 जनवरी 2019

राहु से विस्तार

राहु का आकार धनात्मक रहता है या ऋणात्मक ही रहता है वह कभी धनात्मक और ऋणात्मक एक साथ नही होता है। वैसे ऋण की सीमा का कारक केतु है और धन की सीमा का कारक राहु है। यही बात गणित के परिधि और केन्द्र के बारे मे भी देखी जाती है केतु अगर केन्द्र है

 तो राहु परिधि है,वह किसी भी सीमा तक जायेगा लेकिन केतु के आमने सामने हमेशा ही रहेगा। बिना केतु के राहु का विस्तार नही हो सकता है जैसे बिना अभाव के पूर्ति का होना नही होता है। पूर्ति होगी तो अभाव होगा और अभाव होगा तो पूर्ति भी होगी। राहु से विस्तार की बात केवल इसलिये की जाती है क्योंकि राहु जिस भाव और ग्रह में अपना प्रवेश लेता है उसी के विस्तार की बात जीव के दिमाग में शुरु हो जाती है,कुंडली में जब यह व्यक्ति की लगन में होता है तो वह व्यक्ति को अपने बारे में अधिक से अधिक सोचने के लिये भावानुसार और राशि के अनुसार सोचने के लिये बाध्य कर देता है जो लोग लगातार अपने को आगे बढाने के लिये देखे जाते है उनके अन्दर राहु का प्रभाव कहीं न कहीं से अवश्य देखने को मिलता है। लेकिन भाव का प्रभाव तो केवल शरीर और नाम तथा व्यक्ति की बनावट से जोड कर देखा जाता है लेकिन राशि का प्रभाव जातक को उस राशि के प्रति जीवन भर अपनी योग्यता और स्वभाव को प्रदर्शित करने के लिये मजबूर हो जाता है। राहु विस्तार का कारक है,और विस्तार की सीमा कोई भी नही होती है,पौराणिक कथा के अनुसार राहु की माता का नाम सुरसा था,और जब हनुमान जी सीताजी की खोज के लिये समुद्र पार कर रहे थे तो देवताओं ने हनुमानजी की शक्ति की परीक्षा के लिये सुरसा को भेजा था । सुरसा को छाया पकड कर आसमानी जीवों को भक्षण करने की शक्ति थी,हनुमान जी की छाया को पकड कर जैसे ही सुरसा ने उन्हे अपने भोजन के लिये मुंह में डालना चाहा उन्होने अपने पराक्रम के अनुसार अपनी शरीर की लम्बाई चौडाई को सुरसा के मुंह से दो गुना कर लिया,आखिर तक जितना बडा रूप सुरसा अपने मुंह का बनाने लगी और उससे दोगुना रूप हनुमानजी बनाने लगे,जब कई सौ योजन का मुंह सुरसा का हो गया तो हनुमानजी ने अपने को एक अंगूठे के आकार का बनाकर सुरसा के पेट में जाकर और बाहर आकर सुरसा को माता के रूप में प्रणाम किया और सुरसा की इच्छा को पूरा होना कहकर सुरसा से आशीर्वाद लेकर वे लंका को पधार गये थे। पौराणिक कथाओं के ही अनुसार सुरसा को अहिन यानी सर्पों की माता के रूप में भी कहा गया है। जब कभी राहु के बारे में किसी की कुंडली में विवेचना की है तो कहने से कहीं अधिक बातें कुंडली में देखने को मिली है। राहु चन्द्रमा के साथ मिलकर अपना रूप जब प्रस्तुत करता है तो वह अपनी शक्ति और राशि के अनुसार अपने को कैमिकल के रूप में प्रस्तुत करता है। तरल राशि के प्रभाव में वह बहता हुआ कैमिकल बन जाता है गुरु रूपी हवा के साथ मिलकर वह गैस के रूप में अपनी योग्यता को प्रकट करने लगता है,शनि रूपी पत्थर के साथ मिलकर वह सीमेंट का रूप ले लेता है,और वही शनि अगर पंचम भाव में होता है तो अनैतिकता की तरफ़ ले जाने के लिये अपनी शक्ति को प्रदान करने लगता है। शुक्र के साथ आजाने से राहु का स्वभाव असीम प्यार मोहब्बत वाली बातें करने लगता है और बुध के साथ मिलकर वह केलकुलेशन के मामले में अपनी योग्यता को कम्पयूटर के सोफ़्टवेयर की तरह से सामने हाजिर हो जाता है। सूर्य के साथ मिलकर राज्य की तरफ़ उसका आकर्षण बढ जाता है और जब राहु और सूर्य दोनो ही बलवान होकर पंचम नवम एकादस में अपनी युति राज्य की कारक राशि में स्थान बनाते है तो बडा राजनीतिक बनाने में राहु का पहला प्रभाव ही माना जाता है। मिथुन राशि में राहु का प्रभाव व्यक्ति के अन्दर भाव के अनुसार प्रदर्शित करने की कला को देता है और धनु राहु में राहु अपनी नीचता को प्रकट करने के बाद बडे बडे अनहोनी जैसे कारण पैदा कर देता है और व्यक्ति की जीवनी को आजन्म और उसके बाद भी लोगों के लिये सोचने वाली बात को बनाने से नही चूकता है।राहु का असर तब और देखा जाता है जब व्यक्ति क नवें भाव में जाकर वह पुराने संस्कारों को तिलांजलि देने के कारकों में शामिल हो जाता है और जिस कुल या समाज में जातक का जन्म होता है जिन संस्कारों में उसकी प्राथमिक जीवन की शुरुआत होती है उन्हे भूलने और समझ मे नही आने के कारण जब वह धन भाग्य और न्याय वाली बातों तथा ऊंची शिक्षाओं अथवा अपने समाज के विपरीत समाज में प्रवेश करने के बाद उसे सोचने के लिये मजबूर होना पडता है। शनि के घर में राहु के प्रवेश होने के कारण तथा व्यक्ति की लगन में होने पर राहु शनि की युति अगर महिला की कुंडली में हो तो शरीर को ढककर चलने के लिये अपनी सोच को देता है और जब वह सप्तम स्थान में चन्द्रमा के साथ अपनी युति बना लेता है जो आजन्म जीवन साथी की सोच को समझने के प्रति असमर्थ बना देता है। राहु को अगर मंगल की युति मुख्यत युति मुख्य त्रिकोण में मिलती है तो जातक को आजीवन प्रेसर वाले रोग मिलते है। और खून के अन्दर कोई न कोई इन्फ़ेक्सन वाली बीमारी मिलती है,महिलाओं की कुंडली में राहु अगर दूसरे भाव में होता है तो अक्सर झाइयां मुंहासे और चेहरे को बदरंग बनाने से नही चूकता है तथा पुरुष के चेहरे वाली राशि में होता है तो जातक को दाडी बढाने और चेहरे पर तरह तरह के बालों के आकार बनाने में बडा अच्छा लगता है। लगन का मंगल राहु क्षत्रिय जाति से अपने को सूचित करता है,मंगल की सकारात्मक राशि वृश्चिक राशि में अपना प्रभाव देने के कारण वह मुस्लिम संप्रदाय से अपनी युति को जोडता है और चन्द्रमा की राशि कर्क को वह अपनी मोक्ष और धर्म के प्रति आस्थावान बनाता है। गुरु राहु मंगल की युति से जातक को सिक्ख सम्प्रदाय से जोडता है और केतु के साथ शनि के होने से वह ईशाई सम्प्रदाय से सम्बन्धित बात को भी बताता है,बुध के साथ केतु के होने से राहु व्यापार की कला में और खरीदने बेचने के कार्यों में कुशलता देता है।राहु को सम्भालने के लिये जातक को मंगल का सहारा लेना पडता है। मंगल तकनीक है तो राहु विस्तार अगर विस्तार को तकनीकी रूप में प्रयोग में लाया जाये तो यह अन्दरूनी शक्ति बडे बडे काम करती है। वैसे तो झाडी वाले जंगल को भी अष्टम राहु के लिये जाना जाता है लेकिन उन्ही झाडियों को औषिधि के रूप में प्रयोग करने की कला का अनुभव हो जाये तो जंगल की झाडियां भी तकनीकी कारणों से काम करने के लिये मानी जा सकती है। शनि के अन्दर राहु और केतु का प्रवेश हमेशा से माना जाता है,शनि को अगर सांप माना जाये तो राहु उसका मुंह है और केतु उसकी पूंछ जब भी शनि को कोई कारण जीवन के लिये पैदा करना होता है तो वह हमेशा के लिये समाप्त या हमेशा के लिये विस्तार करवाने के लिये राहु का प्रयोग करता है और उसे केवल झटका देकर बढाने या घटाने की बात होती है तो वह केतु का प्रयोग करता है। सूर्य को समाप्त करने के बाद जो सबसे पहले कारण पैदा होता है वह आसमान की तरफ़ जाने वाला प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने के लिये माना जाता है। जैसे सूर्य को लकडी के रूप में जाना जाता है और जब सूर्य (लकडी) मंगल (ताप) और गुरु (हवा) का सहारा लेकर जलाया जाता है तो राहु धुंआ के रूप में आसमान में ऊपर की ओर जाते हुये अपनी उपस्थिति को दर्शाता है।राहु को रूह का भी रूप दिया जाता है अगर यह अष्टम स्थान में वृश्चिक राशि का है तो यह शमशानी आत्मा के रूप में जाना जाता है.इस स्थान का राहु या तो कोई ऐसी बीमारी देता है जिससे जूझने के लिये जातक को आजीवन जूझना पडता है और धर्म अर्थ काम और मोक्ष के कारणों से दूर करता है या घर के अन्दर अपनी करतूतों से शमशानी क्रियायें आदि करने या खुद के द्वारा सम्बन्धित कारणों को समाप्त करने के बाद खाक में मिलाने के जैसा व्यवहार करता है,पैदा होने के पहले भी माता बीमार रहती है पिता को तामसी भोजनों पर विस्वास होता है और जातक के पैदा होने के बाद आठवीं साल की उम्र से कोई शरीर का रोग अक्समात लग जाता है जो आजीवन साथ नही छोडता है।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

वुघ का विस्तार

वुघ का विस्तार 

कुंडली में ग्रहों की दशाएं जीवन में बहुत कुछ तय करती हैं. इसी तरह बुध ग्रह आपके बोलने-सुनने से लेकर आपके खूबसूरत दिखने पर असर डालता हैआपके दिमाग और आपकी खूबसूरती का कारक ग्रह है. कुंडली में बुध की स्थति तय करती है कि आप कैसा बोलते हैं,

 कैसा व्यवहार करते हैं, आपका व्यक्तित्व और बुद्धि कैसी है..बुध के मामले में कई कारण ज्योतिष से समझ में आते है लेकिन बुध को प्राथमिक रूप से बहिन बुआ बेटी के रूप में देखा जाता है। बहिन की शादी अजनबी खानदान में करने के बाद विस्तार बढना शुरु हो जाता है यह विस्तार पारिवारिक विस्तार कहा जाता है। बहिन की शादी के बाद जब भानजी की शादी होती है तो वह और बडा विस्तार हो जाता है,मतलब कही तो रिस्तेदारी जायेगी,और परिवार का विस्तार बनता चला जायेगा,घर की बहू आती है वह भी किसी के घर की बेटी होती है और उस घर से जिसे हमने देखा नही है उससे जान पहिचान और आत्मीय रिस्ते बन जाते है,यह बुध का विस्तार कहा जाता है। इस बुध के दो साथी ग्रह भी है जैसे राहु के साथ होने पर ससुराल का सम्बन्ध और विस्तार बनना शुरु हो जाता है और केतु के साथ होने पर बहिन बुआ बेटी के रूप में विस्तार शुरु हो जाता है। इसी बुध के लिये अगर और अधिक आगे बढे तो विस्तार राहु के साथ आकाश तक जा पहुंचता है जिसकी कोई माप नही होती है और केतु के साथ जाने पर यह पाताल तक चला जाता है जिसकी भी कोई माप नही होती है.बुध को विस्तार के रूप में देखने पर इसे भाषाओं की जानकारी वाला ग्रह भी कहा जाता है कौन सी भाषा किस तरह के ज्ञान को कितने विस्तार को वर्णन कर रही है इसका अन्दाज भी नही लगाया जा सकता है। सूर्य के साथ बुध के मिलने से प्रकाश का विस्तार होना शुरु हो जाता है,शनि के साथ मिलने पर अन्धकार का विस्तार शुरु हो जाता है,गुरु के साथ मिलने पर हवा का विस्तार होना शुरु हो जाता है चन्द्रमा के साथ मिलने पर धरती के साथ विस्तार शुरु हो जाता है और मंगल के साथ मिलने पर हिम्मत का विस्तार शुरु हो जाता है.

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

मन की साधना और ज्योतिष

शरीर रूपी ब्रह्माण्ड की तीन वृत्तियां है,परा,विराट और अपरा। परा ह्रदय से ऊपर का भाग कहा जाता है,विराट ह्रदय से नाभि पर्यंत का भाग कहा जाता है 

और अपरा नाभि से नीचे का भाग कहा जाता है। चित्त वृत्ति की उपस्थिति इन तीनो ब्रह्माण्डो मे पायी जाती है,तथा द्रश्य वृत्ति केवल परा ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत ही आती है। चित्त वृत्ति के स्थिर रहने पर देखना श्रवण करना मनन करना सूंघना आदि सूक्ष्म रूप से महसूस किया जा सकता है,द्रश्य वृत्ति को अगर चित्त वृत्ति मे शामिल कर लिया जाये तो कर्म वृत्ति का उदय होना शुरु हो जाता है। अगर चित्त वृत्ति और द्रश्य वृत्ति मे भिन्नता पैदा हो जाती है तो कर्म वृत्ति का नही होना माना जाता है। जिसे साधारण भाषा मे अनदेखा कहा जाता है। चित्त वृत्ति को साधने की क्रिया को ही साधना के नाम से पुकारा जाता है,और जो अपनी चित्त वृत्ति को साधने मे सफ़ल हो जाते है वही अपने कर्म पथ पर आगे बढते चले जाते है और नाम दाम तथा संसार मे प्रसिद्धि को प्राप्त कर लेते है। चित्त वृत्ति को साधने मे जो रुकावटें आती है,उनमे सबसे बडी बाधा मानसिक भ्रम को मुख्य माना जाता है। उदाहरण के रूप मे बच्चे से अगर माता कहती है वह खिलौना उठाकर ले आओ,उसी समय पिता अगर बच्चे से कह देता है कि पढाई करो,बच्चे के दिमाग मे भ्रम पैदा हो जाता है कि वह खिलौना उठा कर लाये या पढाई करे,इस भ्रम के अन्दर अगर बच्चे से बाद मे पूंछा जाये कि पहले खिलौना उठाकर लायेगा या पढाई करेगा,बच्चा अगर माता से डरता है तो पहले खिलौना उठाकर लायेगा और पिता से डरता है तो माता की बात को अनसुना करने के बाद पढने बैठ जायेगा। इसी प्रकार से अगर किसी को कहा जाये कि अमुक काम को करना है,अमुक को नही,तो मानसिक धारणा के अन्दर उन दोनो कामो को करने के पहले उनके बीच का अर्थ निकालने मे मन लग जायेगा और वही समय मानसिक भ्रम का माना जायेगा। कारण जब समझ मे आयेगा तब तक या तो मना किये गये काम का रूप बदल चुका होगा या बताये गये काम का करना मुनासिब नही हो पायेगा। इसके अलावा एक और बात मानी जाती है कि किसी व्यक्ति से कह दिया जाये कि वह अमुक कार्य को अमुक तरीके से करो,और उसी समय दूसरा व्यक्ति उसी काम को पहले बताये गये व्यक्ति के तरीके से भिन्न हो जाता है तो भी मानसिक भ्रम की उत्पत्ति हो जाती है। इस भ्रम की स्थिति को बच्चो मे तो खेल कूद और मनोरंजन के साधन तथा नई नई चीजों को देखने के रूप मे मानी जाती है जो जिज्ञासा के नाम से जानी जाती है। वही बात अगर युवाओं मे देखी जाये तो उनकी भ्रम वाली स्थिति शादी विवाह करने अपनी नई दुनिया को बसाने तथा एक दूसरे के ज्ञान धन परिवार रहन सहन समाज मे चलने वाले कारणो को समाप्त करने आदि के प्रति भ्रम बनना माना जायेगा,जब व्यक्ति वृद्ध होता है तो उसके दिमाग मे युवाओ को बदलने वाले कारणो का भ्रम बना रहेगा,कि अमुक कार्य से उसे हानि हो सकती है अमुक वस्तु को खाने पीने से उसके अन्दर बुराई पैदा हो सकती है अमुक सम्बन्ध को बनने के बाद उसकी वैवाहिक जिन्दगी मे बरबादी का कारण बन सकता है या अमुक कार्य करने से बडी हानि या किसी को कष्ट भी पहुंच सकता है,इन भ्रमो के अलावा और भी कई प्रकार के भ्रम माने जाते है जो हर व्यक्ति के जीवन मे अपने अपने रूप मे उपस्थित होते है और उन भ्रमो के कारण ही प्रगति के पथ पर लोग या तो गलत रूप से आगे बढ जाते है या फ़िर कार्य मे तमाम बाधाये प्रस्तुत कर लेते है और कार्य पूरा नही हो पाता है उनके द्वारा पहले की गयी मेहनत बरबाद हो जाती है।ज्योतिष मे इस भ्रम नाम की बीमारी को पैदा करने वाला राहु है।राहु एक छाया ग्रह है जिसका प्रभाव उल्टे रूप मे पडता है। जैसे एक व्यक्ति को जंगल के रास्ते जाना है और उसे कोई पहले बता देता है कि रास्ते मे शेर मिल सकता है। व्यक्ति को भले ही शेर नही मिले लेकिन उसके दिमाग मे शेर का भय पैदा हो जायेगा कि शेर अगर मिल गया तो वह उसे मार भी सकता है या उसके शरीर को क्षति भी पहुंचा सकता है। वह व्यक्ति अपनी सुरक्षा के चक्कर मे अपने दिमाग का प्रयोग करेगा,और अपने को सतर्क करने के बाद ही जंगल का रास्ता तय करेगा। इस सोचने की क्रिया के अन्दर जो मुख्य भाव आया वह मृत्यु का भय,जीवन चलने का नाम है और मृत्यु समाप्ति का नाम है,जीवन का नाम सीधा है तो मृत्यु का नाम उल्टा है। यही राहु का कार्य होता है। उल्टा सोचने के कारण ही लोग अपने लिये सुरक्षा का उपाय करते है,उल्टा सोच कर ही लोग समय पर पढने का कार्य करते है या उल्टा सोच कर ही लोग किसी भी कार्य को समय से पहले करने की सोचते है या अपने जीवन के प्रति सजग रहने की बात करते है। जब इस प्रकार की बाते आती है तो राहु कुंडली मे अच्छी स्थिति मे होता है और जब राहु गलत भाव मे होता है तो वह बजाय सीधे रास्ते जाने के उल्टे रास्ते से जाने के लिये अपनी गति देने लगता है। जैसे कुंडली मे चन्द्रमा के साथ राहु किसी खराब भाव मे है तो वह मन के अन्दर एक छाया सी पैदा करे रहेगा। मन का एक स्थान मे रहना नही हो पायेगा। जब मन का बंटवारा कई स्थानो मे हो जायेगा तो याददास्त पर असर पडेगा। रास्ता चलते हुये जाना कहीं होगा तो पहुंच कहीं जायेंगे। करना कुछ होगा तो करने कुछ लगेंगे। किसी रखी हुयी वस्तु को भूल जायेंगे,या रखी कहीं थी खोजने कहीं लग जायेंगे,इस बीच मे बुराइयां भी बनने लगती है,जैसे वस्तु को आफ़िस मे रखा था और खोजने घर मे लगेंगे,फ़िर जब नही मिलेगी तो तरह तरह की शंकाओं के चलते जो भी पास मे रहा होगा उस पर झूठा आक्षेप लगाया जाने लगेगा। यह स्थिति राहु के भावानुसार मानी जायेगी,जैसे राहु धन स्थान मे है और चन्द्रमा से युति ले रहा है तो पर्स को रखा तो टेबिल की दराज मे आफ़िस में जायेगा और खोजा घर के अन्दर जायेगा,घर के किसी सदस्य पर आक्षेप लगेगा और बुराई अपमान आदि की बाते उस सदस्य के पल्ले पडेंगी। इसी प्रकार से लडके लडकियां जब बडे हो जाते है तो उनके अन्दर बडी शिक्षा मे जाने के बाद एक सोच पैदा हो जाती है कि वे अपने सहपाठी से नीचे क्यों है,उसका सहपाठी तो बडी और लक्जरी गाडी मे आता है,वह पैदल या बस से आता है,उसके पास कोई आजकल का चलने वाला साधन नही है,जबकि उसके साथी सभी साधनो से पूर्ण है। यह भाव अपने ही मन मे लाने के कारण पढाई लिखाई तो एक तरफ़ रखी रह गयी,अपने को और भी नीचे ले जाने के लिये सोच को पैदा कर लिया। मन के अन्दर माता पिता दादा दादी और परिवार को जिम्मेदार मान लिया गया,और उनके प्रति मन के अन्दर एक अजीब सी नफ़रत पैदा हो गयी। यह कारण अष्टम मे राहु के होने से और ग्यारहवे भाव के स्वामी से युति लेने के कारण बन जाती है। इसी प्रकार से जब राहु का गोचर पंचम भाव मे होता है या वह पांचवे भाव मे शुरु से ही बैठा होता है या चन्द्र मंगल की युति धन भाव मे होती है और राहु का स्थान पंचम मे होता है अथवा राहु का प्रभाव पंचम से शुक्र के साथ हो रहा होता है तो व्यक्ति के अन्दर बचपन मे मनोरंजन के साधनो का और वाहन सम्बन्धी कारण पैदा होता है,जवानी मे इश्क का भूत सवार हो जाता है और वह या तो अपने लिये नये नये लोगो पर छा जाने वाले कारण पैदा करने लगता है या अपनी दहसत से लोगो के अन्दर भय को पैदा करना शुरु कर देता है। इसी प्रकार से अन्य भाव मे विराजमान राहु अपनी विचित्रता से उल्टे काम करने के लिये अपना प्रभाव देने लगता है।

कहा जाता है कि नशे के अन्दर क्षत्रिय दाढी वाला बाबा शमशान मे निवास करने वाला पागल जैसा लगने वाला व्यक्ति की बराबरी उसी व्यक्ति से की जा सकती है जो नितांत अकेला बैठा सोचता रहता है,जिसे दिन मे सोचने से फ़ुर्सत नही होती और रात को नींद उससे कोशो दूर होती है। वह जब कभी सो भी जाता है तो स्वप्न भी बहुत ही अजीब अजीब आते है जैसे मुर्दो के बीच मे रहना आसमान मे पानी की तरह से चलना,जंगल बीहड वीराने क्षेत्र मे चलना,खतरनाक जानवर देखना या ऐसा लगना कि वह अक्समात ही नीचे गिरता चला जा रहा है यह एक राहु की सिफ़्त का उदाहरण है जो बारहवे भाव अष्टम भाव या चौथे भाव मे बैठ कर अपनी स्थिति को दर्शाता है। जैसे लोग अपने मन को साधने के लिये शराब का सेवन करते है या राशि के अनुसार जो चौथे भाव मे होती है उसके अनुसार नशे को करने लगते है का फ़ल चौथे राहु के द्वारा देखा जाता है,शमशानी राशि अष्टम मे बैठा राहु जिसे वृश्चिक राशि के नाम से जाना जाता है उसके साथ भी दिमाग का बंटवारा एक साथ कार्यों मे बाहरी खर्चो मे घर के लोगो मे धन के मामले मे तथा मानसिक सोच मे जाने के लिये अपनी एक साथ युति को देता है,इस युति के कारण अक्सर लोग या तो बडा एक्सीडेंट कर लेते है या कोई भयंकर जोखिम को ले लेते है,या फ़िर किसी ऊंचे स्थान से कूद जाते है या वाहन आदि को चलाते समय कहीं जाना होता है कहीं चलते है और अपने साथ साथ दूसरो के लिये भी आफ़त का कारण बन जाते है।

राहु को साधने का तरीका आज के युग के लोग अपने को शराब आदि के कारणो मे ले जाते है कोई नींद की गोली लेता है,कोई अफ़ीम आदि के आदी हो जाते है कोई नशे के विभिन्न कारण अपने मन को साधने के लिये लेना शुरु कर देते है,यह प्रभाव उनके ऊपर इतनी शक्ति से हावी हो जाता है कि यह ईश्वर का दिया हुआ रूप बल शक्ति मन दिमाग सभी बरबाद होने लगते है और जो कार्य यह शरीर अपने परिवेश के अनुसार कर सकता था उससे दूर रखने के बाद अपनी लीला को एक दूसरो पर बोझ के नाम से समाप्त कर लेने मे जल्दबाजी भी करते है। राहु को साधने के लिये सबसे पहले अपनी चित्त वृत्ति को साधना जरूरी है,जब मन रूपी चित्त वृत्ति को साधने की क्षमता पैदा हो जाती है तो शरीर से जो चाहो वही कार्य होना शुरु हो जाता है क्योंकि कार्य को करने के अन्दर कोई अन्य कारण या मन की कोई दूसरी शाखा पैदा नही होती है।

चित्त वृत्ति को साधने के लिये महापुरुषो ने कई उपाय बताये है। पहला उपाय योगात्मक उपाय बताया है। जिसे त्राटक के नाम से जाना जाता है। एक सफ़ेद कागज पर एक सेंटीमीटर का वृत बना लिया जाता है उसे जहां बैठने के बाद कोई बाधा नही पैदा होती है उस स्थान पर ठीक आंखो के सामने वाले स्थान पर चिपका कर दो से तीन फ़ुट की दूरी पर बैठा जाता है,उस वृत को एक टक देखा जाता है उसे देखने के समय मे जो भी मन के अन्दर आने जाने वाले विचार होते है उन्हे दूर रखने का अभ्यास किया जाता है,पहले यह क्रिया एक या दो मिनट से शुरु की जाती है उसके बाद इस क्रिया को एक एक मिनट के अन्तराल से पन्द्रह मिनट तक किया जाता है। इस क्रिया के करने के उपरान्त कभी तो वह वृत आंखो से ओझल हो जाता है कभी कई रूप प्रदर्शित करने लगता है,कभी लाल हो जाता है कभी नीला होने लगता है और कभी बहुत ही चमकदार रूप मे प्रस्तुत होने लगता है। कभी उस वृत के रूप मे अजीब सी दुनिया दिखाई देने लगती है कभी अन्जान से लोग उसी प्रकार से घूमने लगते है जैसे खुली आंखो से बाहर की दुनिया को देखा जाता है। वृत को हमेशा काले रंग से बनाया जाता है। दो से तीन महिनो के अन्दर मन की साधना सामने आने लगती है और जो भी याद किया जाता है पढा जाता है देखा जाता है वह दिमाग मे हमेशा के लिये बैठने लगता है। ध्यान रखना चाहिये कि यह दिन मे एक बार ही किया जाता है,और इस क्रिया को करने के बाद आंखो को ठंडे पानी के छींटे देने के बाद आराम देने की जरूरत होती है,जिसे चश्मा लगा हो या जो शरीर से कमजोर हो या जो नशे का आदी हो उसे यह क्रिया नही करनी चाहिये।दूसरी क्रिया को करने के लिये किसी एकान्त स्थान मे आरामदायक जगह पर बैठना होता है जहां कोई दिमागी रूप से या शरीर के द्वारा अडचन नही पैदा हो। पालथी मारक बैठने के बाद दोनो आंखो को बन्द करने के बाद नाक के ऊपर अपने ध्यान को रखना पडता है उस समय भी विचारों को आने जाने से रोका जाता है,और धीरे धीरे यह क्रिया पहले पन्द्रह मिनट से शुरु करने के बाद एक घंटा तक की जा सकती है इस क्रिया के द्वारा भी अजीब अजीब कारण और रोशनी आदि सामने आती है उस समय भी अपने को स्थिर रखना पडता है। इस क्रिया को करने से पहले तामसी भोजन नशा और गरिष्ठ भोजन को नही करना चाहिये। बेल्ट को भी नही बांधना चाहिये। इसे करने के बाद धीरे धीरे मानसिक भ्रम वाली पोजीशन समाप्त होने लगती है तीसरी जो शरीर की मशीनी क्रिया के नाम से जानी जाती है,वह शब्द को लगातार मानसिक रूप से उच्चारित करने के बाद की जाती है उसके लिये भी पहले की दोनो क्रियाओं को ध्यान मे रखकर या एकान्त और सुलभ आसन को प्राप्त करने के बाद ही किया जा सकता है,नींद नही आये या मुंह के सूखने पर पानी का पीना भी जरूरी है। बीज मंत्र जो अलग अलग तरह के है उन्हे प्रयोग मे लाया जाता है,भूमि तत्व के लिये केवल होंठ से प्रयोग आने वाले बीज मंत्र,जल तत्व को प्राप्त करने के लिये जीभ के द्वारा उच्चारण करने वाले बीज मंत्र,वायु तत्व को प्राप्त करने के लिये तालू से उच्चारण किये जाने वाले बीज मंत्र और अग्नि तत्व को प्राप्त करने के लिये दांतो की सहायता से उच्चारित बीज मंत्र का उच्चारण किया जाता है साथ ही आकाश तत्व को प्राप्त करने के लिये गले से उच्चारण वाले बीज मंत्रो का उच्चारण करना चाहिये।ज्योतिष भगवत प्राप्ति और भविष्य को देखने की क्रिया के लिये दूसरे नम्बर की क्रिया के साथ तालू से उच्चारित बीज मंत्र को ध्यान मे चलाना चाहिये। जैसे क्रां क्रीं क्रौं बीजो का लगातार मनन और ध्यान को दोनो आंखो के बीच मे नाक के ऊपरी हिस्से मे ध्यान को रखकर किया जाना लाभदायी होता है।

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

जन्म कुंडली में कैसे जाने अपने इष्ट देव को

भारतीय संस्कृति ज्ञान, कर्म और भक्ति का संगम है। इनकी अपनी अपनी महत्ता है

 कोई ज्ञान के आधार पर अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढता है तो तो कोई कर्म को अपना माध्यम बनाता है तो कोई भक्ति भाव को आधार बनाकर मुक्ति पाना चाहता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति में भक्ति को सहज और शीघ्र प्राप्ति वाला मार्ग बताया गया है।

 किसी जातक की कुंडली से इष्ट देव जानने के अलग-अलग सूत्र व सिद्धांत समय-समय पर ऋषि मुनियों ने बताये हे जेमिनी सूत्र के रचयिता महर्षि जेमिनी इष्टदेव के निर्धारण में आत्मकारक ग्रह की भूमिका को सबसे अधिक मह्त्वपूर्ण बताया है। कुंडली में लगना, लग्नेश, लग्न नक्षत्र के स्वामी एवं ग्रह जो सबसे अधिक अंश में हो चाहे किसी भी राशि में हो आत्मकारक ग्रह होता है।

अपना इष्ट देव चुनने में निम्न बातों का ध्यान देना चाहिए।

आत्मकारक ग्रह के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व उनकी अराधना करनी चाहिए।

भक्ति और आध्यात्म से जुड़े अधिकांश लोगों के मन में हमेशा यह प्रश्न उठते रहता है मेरा इष्ट देव कौन है और हमें किस देवता की पूजा अर्चना करनी चाहिए। किसी भक्त के प्रिय हनुमान हे शिव जी हैं तो किसी के विष्णु तो कोई राधा कृष्ण का भक्त है तो कोई माता दुर्गा का। और कोई तो सभी देवी देवताओं का एक बाद स्मरण करता है। परन्तु एक उक्ति है कि "एक साधै सब सधै, सब साधै सब जाय"। जैसा की आपको पता है कि अपने अभीष्ट देवता की साधना तथा पूजा अर्चना करने से हमें शीघ्र ही मन चाहे फल की प्राप्ति होती है।

अब प्रश्न होता है कि देवी देवता हमें कैसे लाभ अथवा सफलता दिलाते हैं वस्तुतः जब हम किसी भी देवी-देवता की पूजा करते हैं तो हम अपने अभीष्ट देवी देवता को मंत्र के माध्यम से अपने पास बुलाते है और आह्वान करने पर देवी देवता उस स्थान विशेष तथा हमारे शरीर में आकर विराजमान होते है 

वास्तव में सभी दैवीय शक्तियां अलग-अलग निश्चित चक्र में हमारे शरीर में पहले से ही विराजमान होती है आप हम पूजा अर्चना के माध्यम से ब्रह्माण्ड सेउपस्थित दैवीय शक्ति को अपने शरीर में धारण कर शरीर में पहले से विद्यमान शक्तियों को सक्रिय कर देते है और इस प्रकार से शरीर में पहले से स्थित ऊर्जा जागृत होकर अधिक क्रियाशील हो जाती है। इसके बाद हमें सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है। ज्योतिष के माध्यम से हम पूर्व जन्म की दैवीय शक्ति अथवा ईष्टदेव को जानकर तथा मंत्र साधना से मनोवांछित फल को प्राप्त करते है।

इष्ट देव को जानने की विधियों में भी विद्वानों में एक मत नहीं है। कुछ लोग नवम् भाव और उस भाव से सम्बन्धित राशि तथा राशि के स्वामी के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।

वहीं कुछ लोग पंचम भाव और उस भाव से सम्बन्धित राशि तथा राशि के स्वामी के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।

कुछ विद्वान लग्न लग्नेश तथा लग्न राशि के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।

त्रिकोण भाव में सर्वाधिक बलि ग्रह के अनुसार भी इष्ट देव का चयन किया जाता है।

महर्षि जैमिनी जैसे विद्वान के अनुसार कुंडली में आत्मकारक ग्रह के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करना बताया गया हे गण  के द्वारा भी इष्ट देव का निर्धारण किया जाता है संसार का प्रत्येक जीव अपने अपने समय में अपने अपने गण को लेकर पैदा होता है। जो जिसका गण होता है उसी के अनुसार व्यक्ति के इष्ट को समझा जाता है.जन्म कुंडली में बारह राशिया है और लगन में जो राशि होती है उस राशि का मालिक ही व्यक्ति के गण का मालिक होता है उस मालिक के गण का प्रमुख देवता कौन सा है वह अपने अपने धर्म के अनुसार ही माना जाता है। उदाहरण के लिये कर्क लगन की कुंडली है और इस लगन का मालिक चन्द्रमा है,चन्द्रमा तीसरे भाव मे है और चन्द्रमा की राशि कन्या है.कन्या राशि का मालिक बुध है,बुध ही जातक का इष्टदेव का कारक है,बुध अगर तुला राशि का होकर चौथे भाव मे सूर्य और शुक्र के साथ बैठा है तो जातक के लिये माना जाता है कि जातक के पिता और माता ने मिलकर मनौती को मांग कर पुत्र को प्राप्त किया है वह मनौती जातक के पिता के ही इष्ट का दूसरा रूप रखने वाली देवी के लिये कहा जा सकता है। हर ग्रह का अलग अलग देवता होता इस बात को वैसे तो मतान्तर से भेद रखने वाली बाते मिलती है लेकिन सही रूप में जानने के लिये लाल किताब ने बहुत ही बारीकी से ग्रह और उसके देवता का वर्णन किया है। जैसे सूर्य से विष्णु को मानते है,चन्द्रमा से शिवजी को मानते है मंगल से हनुमान जी को भी मानते है और अगर मंगल बद होता है तो हनुमान जी की जगह पर भूत प्रेत पिशाच की सेवा करने के कारण मिलने लगते है,बुध को दुर्गा के लिये जाना जाता है गुरु को ब्रह्मा जी से जोडा गया है शुक्र को लक्ष्मी से जोड कर देखा गया है,शनि को भैरों बाबा के लिये पूजा जाता है और राहु को सरस्वती के लिये तथा केतु को गणेशजी के लिये समझा जाता है। लालकिताब के अनुसार जातक का इष्टदेव देवी दुर्गा ही मानी जायेगी। अगर कुंडली मे शनि की स्थिति मार्गी है तो देवी की मूर्ति की पूजा मे ध्यान लगाना फ़ायदा देने वाला माना जाता है शनि के वक्री होने पर मूर्ति की जगह पर दिमागी पूजा यानी मंत्र जाप आदि से फ़ल मिलना माना जा सकता है। इसी प्रकार से जैसे इस कुंडली मे बुध के साथ सूर्य भी है और शुक्र भी है शनि सामने होकर दसवे भाव मे विराजमान है.तुला राशि को पश्चिम की दिशा मानी जाती है,भारत मे चार दिशाओं में भगवान विष्णु के चार धाम है,पूर्व मे जगन्नाथ को विष्णु को रूप में उत्तर में बद्री विशाल को पश्चिम मे द्वारिकाधीश को और दक्षिण में भगवान विष्णु को राम के रूप मे पूजा जाता है.शुक्र और बुध तुला राशि के सूर्य के साथ है तो राधा और रुक्मिणी के साथ द्वारकाधीश की प्रतिमा को जाहिर करते है। सूर्य और शुक्र के साथ बुध की स्थिति पानी वाले भाव यानी चौथे भाव मे है इसलिये अष्टम भाव का राहु समुद्र के किनारे की बात को उजागर करता है,इसलिये इस कुन्डली मे द्वारिकाधीश के साथ राधा और रुक्मिणी की पूजा को करना और उन्हे मानना सही और फ़लदायी माना जा सकता है। राधा लक्ष्मी रूप मे और रुक्मिणी शक्ति के रूप मे अपना अपना फ़ल जातक को देने वाली है। लेकिन यहां एक शंका यह पैदा होती है कि अगर जातक इन्ही ग्रहों को लेकर इंग्लेंड मे पैदा हुआ है तो वह द्वारिकाधीश और राधा रुक्मिणी को कहां से प्राप्त करेगा। भारतीय भू-भाग पर पैदा होने के बाद तो चारो दिशाओं के सूर्य को विष्णु के रूप में मान भी लिया गया है। इंगेलंड मे इन ग्रहों के कारक बदल जायेंगे,इन कारकों में सूर्य के स्थान पर राज्य का मालिक या राजा होगा,और शुक्र तथा बुध के कारको में वह राजकीय धन और कानूनो का मालिक होगा। जहां लोग ईश्वर पर विश्वास रखते है वहां पर यह ग्रह ईश्वरीय शक्ति के रूप मे देखे जाते है और जहां मनुष्य केवल कर्म पर विश्वास रखता है वहां यह ग्रह मनुष्य रूप में स्थापित अधिकारियों के रूप मे काम करने लगते है।अव जैसे कन्या लग्न की कुंडली है चंद्र मीन राशि में है मीन राशि का स्वामी पंचम में मकर राशि मेअव देखें इनको इष्ट देव कौन होगा धर्म का क्षेत्र लगन पंचम और नवम में लगन खाली है अर्थ के क्षेत्र में केवल केतु का राज है,काम यानी पत्नी बच्चे आदि के क्षेत्र में शनि बुध शुक्र चन्द्र है,मोक्ष यानी शान्ति के क्षेत्र में सूर्य राहु है,इस प्रकार से जीवन मे केवल सूर्य राहु का कारण शांति प्रदान नही करने दे रहा है,केतु धन यानी अर्थ के क्षेत्र मे खालीपन दे रहा है काम के क्षेत्र मे जूझने के लिये ही शनि बुध शुक्र चन्द्र अपना प्रभाव दे रहे है.शुक्र को अगर भाग्य क्षेत्र मे स्थान दे दिया जाये तो और इष्ट के रूप मे लक्ष्मी आराधना की जाये तो दूसरा भाव और नवा भाव जाग्रत हो जायेगा,काम के क्षेत्र मे शुक्र का उच्च का होना और चन्द्रमा का सहयोग देना फ़लदायी हो जायेगा,अगर शुक्र की आराधना नही की जाती है तो सप्तम मे बैठा बुध बनते कामो को फ़ल देने के समय मे बरबाद कर देगा.ऐक उघारण ओर देखेमकर लग्न की कुण्डली है। प्रथम भाव में 10 गुरू

चतुर्थ भाव

दशम भाव में 7 तुला में पकेतू, चंद्र, मंगल

एकादश भाव में 8 मेंटट शनि 

द्वादश भाव में सूर्य , शुक्र, बुध है कुंडली के अनुसार चन्द्र केतु मंगल की कारक माता काली आपकी इष्ट है जो आपको जीवन मे तकनीकी बिजली पावर आदि क्षेत्र मे सफ़लता देती है और आप लोगो के प्रति अपनी कटु नीति से दुखो को दूर करने की सोचते है,लेकिन पत्नी की गुस्से वाली नीति आपको तभी परेशान करने लगती है जब आप तामसी कारणो को खुद के प्रति प्रयोग करना शुरु कर देते है। मित्रों की चली अपनी जन्म कुंडली दिखाकर अंजाम इष्टदेव जान सकते हैं क्योंकिजो माया के पीछे भागते है उन्हे राम समझ मे नही आते है और जिन्हे राम समझ मे आते है उन्हे माया समझ मे नही आती है - (माया महा ठगिनी हम जानी,देखन मे लगे नई नई पर सूरत जानी पहिचानी,माया महा ठगिनी हम जानी) 

रविवार, 30 दिसंबर 2018

जीते जी मरने की कला

प्रत्येक व्यक्ति अलग इंद्रिय से मरता है। किसी की मौत आंख से होती है, तो आंख खुली रह जाती है

—हंस आंख से उड़ा। किसी की मृत्यु कान से होती है। किसी की मृत्यु मुंह से होती है, तो मुंह खुला रह जाता है। अधिक लोगों की मृत्यु जननेंद्रिय से होती है, क्योंकि अधिक लोग जीवन में जननेंद्रिय के आसपास ही भटकते रहते हैं, उसके ऊपर नहीं जा पाते। हम्हारी जिंदगी जिस इंद्रिय के पास जीयी गई है, उसी इंद्रिय से मौत होगी। औपचारिक रूप से हम मरघट ले जाते हैं किसी को तो उसकी कपाल—क्रिया करते हैं, उसका सिर तोड़ते हैं। वह सिर्फ प्रतीक है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु उस तरह होती है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु सहस्रार से होती है।

जननेंद्रिय सबसे नीचा द्वार है। जैसे कोई अपने घर की नाली में से प्रवेश करके बाहर निकले। सहस्रार, जो हम्हारे मस्तिष्क में है द्वार, वह श्रेष्ठतम द्वार है। जननेंद्रिय पृथ्वी से जोड़ती है, सहस्रार आकाश से। जननेंद्रिय देह से जोड़ती है, सहस्रार आत्मा से। जो लोग समाधिस्थ हो गए हैं, जिन्होंने ध्यान को अनुभव किया है, जो बुद्धत्व को उपलब्ध हुए हैं,जो जिते जी मरे है उनकी मृत्यु सहस्रार से होती है।

उस प्रतीक में हम अभी भी कपाल—क्रिया करते हैं। मरघट ले जाते हैं, बाप मर जाता है, तो बेटा लकड़ी मारकर सिर तोड़ देता है। मरे—मराए का सिर तोड़ रहे हो! प्राण तो निकल ही चुके, अब काहे के लिए दरवाजा खोल रहे हो? अब निकलने को वहां कोई है ही नहीं। मगर प्रतीक, औपचारिक, आशा कर रहा है बेटा कि बाप सहस्रार से मरे; मगर बाप तो मर ही चुका है। यह दरवाजा मरने के बाद नहीं खोला जाता, यह दरवाजा जिंदगी में खोलना पड़ता है। जीते जी मरना पड़ता है इसी दरवाजे की तलाश में सारे योग, तंत्र की विद्याओं का जन्म हुआ। इसी दरवाजे को खोलने की कुंजियां हैं योग में, तंत्र में। इसी दरवाजे को जिसने खोल लिया, जिसने पे कला सीख ली वह परमात्मा को जानकर मरता है। जिते जी मरता है यह कहूं कि जीते जी मरने की कला सीख लेता है जान लेता है  उसकी मृत्यु समाधि हो जाती है। इसलिए हम साधारण आदमी की कब्र को कब्र कहते हैं, फकीर की कब्र को समाधि कहते हैं—समाधिस्थ होकर जो मरा है।

प्रत्येक व्यक्ति उस इंद्रिय से मरता है, जिस इंद्रिय के पास जीया। जो लोग रूप के दीवाने हैं, वे आंख से मरेंगे; इसलिए चित्रकार, मूर्तिकार आंख से मरते हैं। उनकी आंख खुली रह जाती है। जिंदगी—भर उन्होंने रूप और रंग में ही अपने को तलाशा, अपनी खोज की। संगीतज्ञ कान से मरते हैं। उनका जीवन कान के पास ही था। उनकी सारी संवेदनशीलता वहीं संगृहीत हो गई थी। मृत्यु देखकर कहा जा सकता है—आदमी का पूरा जीवन कैसा बीता। अगर  मृत्यु को पढ़ने का ज्ञान हो, तो मृत्यु पूरी जिंदगी के बाबत खबर दे जाती है कि आदमी कैसे जीया; क्योंकि मृत्यु सूचक है, सारी जिंदगी का सार—निचोड़ है—आदमी कहां जीया।

हरि हां, वाजिद, ज्यूं तीतर कूं बाज झपट ले जाहिंगे।।

जल्दी ही बाज तो आएगा, उसके पहले तैयारी कर लो। अगर  सहस्रार पर पहुंच जाओ, तो फिर मौत का बाज हमे झपटकर नहीं ले जा सकता। फिर तो परमात्मा तलाशता आता है। अगर कोई किसी और इंद्रिय से मरे, तो वापिस लौट आना पड़ेगा देह में; क्योंकि बाकी सब द्वार देह में हैं। सहस्रार देह का द्वार नहीं है, आत्मा का द्वार है। सहस्रार ग्यारहवां द्वार है, बाकी दस द्वार शरीर के हैं। ग्यारहवें द्वार को तलाशो—हम्हारे भीतर है, बंद पड़ा है

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

शिव ओर शिवलिग

शिव ओर शिवलिग.           ,                      ,मिञो् शिवलिंग, का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरुप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्द पुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो 

उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है | वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्ष/धुरी ही लिंग हैhttps://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/8/8f/Shivling_in_Abu.JPG


पुराणो में शिवलिंग को कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंगशिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है | हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते है जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा, गणितीय सूत्र, कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि | अर्थ :- सम्पति, मतलब  उसी प्रकार यहाँ लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी या प्रतीक है, लिङ्ग का यही अर्थ वैशेषिक शास्त्र में कणाद मुनि ने भी प्रयोग किया। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और पदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है | अब जरा आईंसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी 

इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है अर्थात दो नही एक ही है पर वो दो हो कर स्रष्टि का निर्माण करता है। हमारे ऋषियो ने ये रहस्य हजारो साल पहले ही ख़ोज लिया था | हम अपने देनिक जीवन में भी देख सकते है कि जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोदिशाओं की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री)+ऊपर व निचे) होता है, फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा का प्रतिरूप, शांत जल में कंकर फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) का प्रतिरूप आदि।

स्रष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट  के पश्चात् उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्त  जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता  भगवान शिव की जगह-जगह पूजा हो रही है, लेकिन पूजा की वात नहीं है। शिवत्व उपलब्धि की बात है। वह जो शिवलिंग हमने देखा है बाहर मंदिरों में, वृक्षों के नीचे, हमने कभी ख्याल नहीं किया, उसका आकार ज्योति का आकार है। जैसे दीये की ज्योति का आकार होता है। शिवलिंग अंतर्ज्योति का प्रतीक है। जव हम्हारे भीतर का दीया जलेगा तो ऐसी ही ज्योति प्रगट होती है, ऐसी ही शुभ्र! यही रूप होता है उसका। और ज्योति बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है। और धीरे  धीरे ज्योतिर्मय व्यक्ति के चारों तरफ एक आभामंडल होता है; उस आभामंडल की आकृति भी अंडाकार होती है।

स.तो इस सत्य को सदियों पहले जान लिया था। लेकिन इसके लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं थे। लेकिन  रूस में एक बड़ा वैज्ञानिक प्रयाग ची नहा है-किरलियान फोटोग्राफी। मनुष्य के आसपास जो ऊर्जा का मंडल होता है, अब उसके चित्र लिये जा सकते हैं। इतनी सूक्ष्म फिल्में बनाई जा चुकी हैं, जिनसे न केवल तुम्हारी देह का चित्र बन जाता है, बल्कि देह के आसपास जो विद्युत प्रगट होती है, उसका भी चित्र बन जाता है। और किरलियान चकित हुआ है, क्योंकि जैसे -जैसे व्यक्ति शांत होकर बैठता है, वैसे – वैसे उसके आसपास का जो विद्युत मंडल है, उसकी आकृति अंडाकार हो जाती है। उसको तो शिवलिंग का कोई पता नहीं है, लेकिन उसकी आकृति अंडाकार हो जाती है। शांत व्यक्ति जब बैठता है ध्यान तो उसके आसपास की ऊर्जा अंडाकार हो जाता है। अशांत व्यक्ति के आसपास की ऊर्जा अंडाकार नहीं होती, खंडित होती है, टुकड़े -टुकड़े होती है। उसमें कोई संतुलन नहीं होता। एक हिस्सा छोटा- कुरूप होती है।में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल तथा की देवता आदि मिल कर भी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शास्वत अंत न पा सके हमारे शरीर मे भी सात चक्रो की    Akriti आकृति muladhar chakkar से यात्रा शुरू होती है  शिवलिंग के अकार की तरह है बात करते हैं शिवलिंग पर जल सहित, भांग, धतूरा, बेलपत्र आदि चढ़ाने की। आपको जानकर हैरानी होगी कि शिवलिंग खुद में न्यूक्लियर रिएक्टर का सबसे बड़ा सिम्बल है। इसकी पौराणिक कथा तो ब्रह्मा और विष्णु के बीच एक शर्त से जुड़ी है। शिवलिंग ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधि है। जितने भी ज्योतिर्लिंग हैं, उनके आसपास सर्वाधिक न्यूक्लियर सक्रियता पाई जाती हैयही कारण है कि शिवलिंग की तप्तता को शांत रखने के लिए उन पर जल सहित बेलपत्र, धतूरा जैसे रेडियो धर्मिता को अवशोषित करने वाले पदार्थों को चढ़ाया जाता है।

आप देखेंगे कि कई ऐसी मान्यताएं केवल परंपरा व धर्म के नाम पर निभाई जाती हैं किंतु यदि उनकी गहराई से छानबीन की जाए  Rajesh Kumar 07597718725 09414481324

रविवार, 2 दिसंबर 2018

शेयर बाजार ओर ज्योतिष

ज्योतिष का अच्छा ज्ञान होने के कारण मैंने अक्सर कुंडली (kundli, horoscope) और शेयर मार्किट में होने वाले फायदे और नुक्सान के संबंधों पर विशेष ध्यान दिया है. इसके साथ ही मुझे कई लोगों को स्टॉक मार्किट में ट्रेडिंग सिखाने का मौका मिला.

 इस दौरान मैंने उनकी कुंडली का भी अध्ययन किया और यह पाया की ग्रहों की दशा का असर, आपकी ट्रेडिंग और निवेशक के द्वारा लिए जाने वाले निर्णय पर पड़ता है. मेरे कई जातकोऔर साथी ट्रेडर्स, निवेशकों ने कई बार ऐसे स्टॉक्स (stocks), फ्यूचर या आप्शन (पुट और कॉल) ख़रीदे और नुक्सान उठाया जिनमें की सामान्य दशा में वह कभी भी ट्रेड नहीं करते. ऐसे में मेरे पास सलाह के लिए आने पर मुझे उनकी कुंडली (kundali, kundli, horoscope) देखने का मौका मिला और यह पाया की ज्यादातर ऐसे निर्णयों के लिए उनकी ग्रह दशा जिम्मेदार थी. भारतीय ज्योतिष (में नौ ग्रहों सत्ताईस नक्षत्रों  बारह राशियों  और कुंडली के बारह भावों या घर  आदि की स्तिथियों के अनुसार व्यक्ति का भूत, भविष्य और वर्तमान का पता लगाया जा सकता है इसके साथ ही कुंडली में लग्न, भाव, दशा, महादशा आदि का विचार करके जातक (वह व्यक्ति जिसकी कुंडली का अध्ययन किया जा रहा है) को फायदा होगा या नुक्सान आदि का पता लगाया जा सकता है.गोचर की स्थिति पर भी शेयर बाजार की मंदी तेजी प्रभाव रखती है  जैसे शेयर बाजार की तेजी शनि के वक्री होने के बाद होती है.शेयर बाजार की मन्दी शनि के मार्गी होने के दो माह बाद होती हैबुध वक्री,शनि मंगल का साथ शानि राहु का साथ शेयर बाजार को तेज रखता है.वक्री बुध शेयर बाजार में तेजी लाता हैबुध अस्त समय मे मन्दी का कारक होता है.सूर्य से बुध की युति में अस्त और उदय होने की स्थिति शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। जब बुध का अस्त पूर्व दिशा में होता है तब शेयर के भाव तेजी की तरफ होते हैं, किंतु जब बुध का अस्त पश्चिम दिशा में होता है, तब बाजार में मंदी का माहौल बनता है। इसी तरह जब बुध का उदय पूर्व दिशा में होता है, तब बाजार में तेजी का और जब पश्चिम दिशा में होता है, तब मंदी का माहौल बनता है। सूर्य का गोचर भ्रमण विभिन्न नक्षत्रों से होता है, तब तेजीकारक या मंदीकारक या मिश्रफल कारक नक्षत्रों के प्रभाव से शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव आते हैं। सूर्य को एक राशि का भ्रमण पूरा करने में एक माह लगता है। शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव में गोचर  की भूमिका अहम होती है।मंगल के वक्री होने के समय सोने में तेजी आती है,धन का कारक  शुक्र है बुध धन की छाप है,गुरु उसकी कीमत है,सूर्य राजकीय नियंत्रण है,मंगल उसका तकनीकी रूप से विकसित करने का काम है,चन्द्रमा प्रचलन में है,केतु खाली स्थान है और राहु भरने वाला कारक है,जिस ग्रह के साथ होगा उसे केतु खाली करेगा और राहु जिस स्थान और ग्रह के साथ होगा उसे उसी प्रभाव से भरेगा.दूसरे का चौथा पंचम,पंचम का चौथा अष्टम,अष्टम का चौथा ग्यारहवां भाव,धन के व्यापार से देखा जाता है,अगर केतु इन स्थानो मे है तो इन भावो को खाली करेगा और इसके विपरीत वाले भाव राहु के बल से भरने का काम करेंगे,बाकी के ग्रह अपने अपने अनुसार शक्ति देंगे.नकद पूंजी दूसरे भाव से पंचम की बुद्धि से व्यवसाय का रूप और स्थान लेकर अष्टम की जोखिम से लाभ वाले स्थान की पूर्ति और इनसे एक घर भी आगे निकल गये तो हानि का घर ही सामने आयेगाआप चाहे छत्तीस प्रकार की टेक्निकल एनालिसिस कर ले या दुनिया भर की रिसर्च, चार्ट्स आदि का अध्ययन कर ले, बड़े से बड़ा मार्किट एक्सपर्ट या टिप्स, सब चीज़े बेकार हो जाती है अगर आपकी किस्मत में पैसा नहीं लिखा है. जैसे ही आप ट्रेड लगाते है या निवेश करते है, आपका अपना अनुभव होगा की बाजार में ऐसी खबर आएगी जिससे की आपका शेयर या बाजार पलट जायेगा और आप घाटे  या नुक्सान में चले जायेंगे. इसका एक कारण आपकी मनस्थिति है. नव ग्रहों का आपकी मनस्थिति पर ऐसा असर पड़ता है की आप मूर्खतापूर्ण निर्णय लेते है और बाद में पछताते है.

बुधवार, 28 नवंबर 2018

चुनाव को जीतने का तरीका

चुनाव को जीतने का तरीका
चुनाव के अन्दर प्रत्याशी बनने और चुनाव को जीतने मे बहुत जद्दोजहद करनी पडती है,कोई धन का बल लेकर चुनाव जीतना चाहता है कोई अपने बल और दादागीरी पर चुनाव जीतना चाहता है,किसी के पास दादागीरी और धन दोनों ही नही है तो वह भलमन्साहत से चुनाव जीतने की कवायद करता है। 

लेकिन सभी कुछ होने के बाद भी जब व्यक्ति चुनाव हार जाता है,तो उसकी जनता ही नही अपनी खुद की आत्मा भी धिक्कारती है कि अमुक कारण का निवारण अगर हो जाता तो चुनाव जीता जा सकता था। चुनाव का जीतना और राज करना दोनो ही अलग अलग बातें है,एक साधारण और कम पढा लिखा आदमी भी चुनाव जीत सकता है,और बहुत पढा व्यक्ति भी किसी नेता की चपरासी के अलावा कुछ नही कर सकता है,यह सब आदमी के बस की बात नहीं,यह सब होता है सितारों का खेल,अगर सितारे माफ़िक हों तो सभी कुछ हो सकता है,और अगर सितारे बस में नही है और खिलाफ़ है तो वह बना बनाया काम भी बरबाद होते देर नहीं लगती है। कोई भी ज्योतिषी सितारे खराब है या अच्छे है बता सकता है,खिलाफ़ सितारों के लिये उपाय के अन्दर सितारों को माफ़िक करने का रत्न धारण करवा सकता है टोटका करवा सकता है,लेकिन सितारे तो ठहरे सितारे,अगर किसी प्रकार के टोटके से सितारे बस में हो जायें तो आदमी की मृत्यु भी आती है,ज्योतिषी की भी आती है,अगर कोई रत्न या टोटका काम करता होता तो मौत तो आती ही नहीं,महर्षियों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी,लेकिन किसी रत्न या टोटके से नही की थी,उन्होने सितारों पर बिना किसी यान के यात्रा की थी,उन्होने आज से हजार साल पहले बता दिया था कि अमुक सितारा किस प्रकार का है,अमुक सितारे का मालिक कौन है आदि।कौन खिलाफ़ है और कौन माफ़िक
जन्म कुंडली से पता किया जा सकता है कि सितारे माफ़िक है,या खिलाफ़,और खिलाफ़ है तो किस कारण से है,राज करने का सितारा अगर खराब है तो किस कारण से खराब है,खराबी सितारे के बैठने के स्थान पर है,या सितारा जहां बैठा है वहां पर किसी खराब सितारे की निगाह है,या पडौस में कोई खराब सितारा अपनी नजर रखकर की जाने वाली सभी हरकतें दुश्मनों को सप्लाई कर रहा है,अथवा समय आने पर कोई दुश्मन सितारा अपने राज करने के सितारे से आकर टकराने वाला है,अथवा सितारा जिस स्थान पर बैठा है,वहां पर राज करने के लिये ठंडे माहौल की जरूरत है,और राज करने के लिये टकराने के समय में कोई गर्म सितारा आकर अपने अनुसार गर्मी का माहौल पैदा करने वाला है।

चुनाव जीतने के तीन बल
इन सब कारणों का पता करने के बाद तीन बलों का सामजस्य बैठाना जरूरी है,वैसे तो यह तीन बल सभी काम के लिये उत्तम माने जाते है लेकिन राज करने वाले के लिये यह तीनो बल हमेशा जरूरी है,इन तीन बलों को पहिचानना बहुत जरूरी होता है,जो इन तीन बलों का सामजस्य बनाकर चल दिया है वह सबसे अधिक तरक्की के रास्ते पर चला गया,और जिसे इन तीनों बलों का सामजस्य नहीं करना आता है वह सब कुछ होते भी बरबाद होता चला जाता है,आइये आपको इन तीनों बलों का ज्ञान करवा देते हैं,अपनी कुंडली को खोल कर देखिये कि यह तीनों बल आपके किस किस भाव में अपनी शोभा बढा रहे है,और यह तीनो बल आपकी किन किन सफ़लता वाली कोठरियों के बंद तालों को खोल सकते है।

मानव बल
मानव बल संसार का पहला बल है,किसी भी स्थान पर आपको देखने से पता चलता है,कि जिसके साथ जितने हाथ ऊपर हो जाते वह ही अपनी प्रतिष्ठा को कायम कर लेता है,लेकिन मानव बल भी दो प्रकार का होता है,एक देह बल होता है और दूसरा जीव बल होता है,देह बल की गिनती की जाती है लेकिन जीव बल की गिनती नहीं की जा सकती है,दबाब में आकर देह बल तो साथ रहने की कसम खा लेता है,लेकिन जीव बल का ठिकाना नहीं होता है कि वह अपनी चाहत किसके साथ रखे है,शरीर का किस्सा है कि इसके अन्दर बारह प्रकार के जीव बल विद्यमान है,और जो जीव बल आपके जीव बल से सामजस्य रखता है वही आपको किनारे पर ले जा सकता है,देह बल तो कभी भी बिना जीव बल के दूर हो सकता है,किसी देह के अन्दर किसी प्रकार का जीव बल अपना स्थान बना सकता है,लेकिन जीव बल के अन्दर देह बल अपना कुछ प्रभाव नही दे सकता है। जब मनुष्य जन्म लेता है तो जीव बल एक ही स्थान पर रहता है,अन्य बल अपना प्रभाव बदल सकते है,लेकिन जीव बल कभी भी अपना स्थान नही बदलता है,केवल स्वभाव के अन्दर कुछ समय के लिये अपना बदलाव कर सकता है।भौतिक बल
मानव बल के बाद दूसरा नम्बर भौतिक बल का आता है,बिना मानव बल के भौतिक बल का कोई महत्व नही है,भौतिक बल के अन्दर घर द्वार सम्पत्ति सोना चांदी रुपया पैसा आदि आते है,भौतिक बल भी बारह प्रकार का होता है,और इन बारह प्रकार के भौतिक बलों को पहिचानने के बाद मानव बल और भी परिपूर्ण हो जाता है।

दैव बल
मानव बल और भौतिक बलों के अलावा जो सबसे आवश्यक बल है वह दैव बल कहलाता है,बिना दैव बल के न तो मानव बल का कोई आस्तित्व है और न ही भौतिक बल की कोई कीमत है,मानव बल और भौतिक बल समय पर फ़ेल हो सकता है लेकिन दैव बल इन दोनो बलों के समाप्त होने के बाद भी अपनी शक्ति से बचाकर ला सकता है। दैव बल के अन्दर जो बल आते हैं उनके अन्दर विद्या का स्थान सर्वोपरि है,विद्या के बाद ही शब्द शक्ति की पहिचान होती है,और शब्द शक्ति के पहिचानने के बाद उसी शरीर से या भौतिक बल से किसी प्रकार से भी प्रयोग किया जा सकता है,शब्द शक्ति से व्यक्ति की जीवनी बदल जाती है,शब्द शक्ति से माता बच्चे को आजन्म नहीं त्याग पाती है,और शब्द शक्ति के सुनने के बाद आहत को लेकर लोग अस्पताल चले जाते है।

तीनों बलों को प्राप्त करने का तरीका
इन तीनो बलों को केवल विद्या और शब्द शक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है,लेकिन अन्तर रूप से जीव बल का होना भी जरूरी है,केवल देह बल का घमंड नही करना चाहिये,देह तो कमजोर भी काम कर जाती है,लेकिन जीव बल कमजोर होने पर विद्या और भौतिक बल भी कमजोर हो जाते है। इन तीनो बलों का सामजस्य बैठाना ही एक समझदार की कला होती है,आइये आपको इन तीनो बलों को प्राप्त करने के तरीके बताता हूँ। भगवान गणेश मानव बल के देवता है,माता लक्ष्मी भौतिक बल की दाता है,और माता सरस्वती विद्या तथा शब्द बल की प्रदाता है,इन तीनों देव शक्तियों का उपयोग चुनाव में शर्तिया सफ़लता दिला सकती है। इन तीनो शक्तियों को प्राप्त करने के लिये आज के युग में गणेश जी के रूप में संगठनों के मुखिया,लक्षमी के रूप में धनिक लोगों का साथ,और सरस्वती मैया के रूप में कालेज और स्कूलों के अध्यापकों को साथ रखने का लाभ पूरी तरह से मिल सकता है। रिस्तेदारी में गणेशजी के रूप में साला,बहनोई,भान्जा,भतीजा चुनाव मे अन्दर काम आ सकते है,लक्ष्मी के रूप में हर घर की गृहणियां काम आ सकती है,इनके लिये पति को पत्नी का और पत्नी को पति का साथ लेना चाहिये,सरस्वती के रूप में बडे बूढे और घर के परिवार के रिस्तेदारों का साथ जरूरी है। ग्रहों के अन्दर केतु गणेशजी के शुक्र लक्ष्मी के और राहु सरस्वती का कारक है। जातियों के अन्दर केतु एस सी और एस टी के अन्दर,शुक्र महिला संगठनो और मीडिया के अन्दर,सरस्वती मुस्लिम और शब्द-धर्मी लोगों के साथ काम आ सकता है।

बिना राहु की सहायता के चुनाव नही जीता जा सकता है
जिस प्रकार से आसमान सभी के सिर पर छाया हुआ है और इसी आसमान से सूर्य भी उदय होता है तारे भी दिखाई देते है तथा चन्द्रमा का उदय होना और अस्त होना भी देखा जाता है.राहु सभी को धारण भी करता है और बरबाद भी करता है इसलिये राहु को विराट रूप मे देखा जाता है,महाभारत के युद्ध मे अर्जुन को मोह से दूर करने के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने विराटरूप का प्रदर्शन किया था जिसके द्वारा उन्होने दिखाया था कि संसार उनके मुंह के अन्दर समा भी रहा है और संसार की उत्पत्ति भी उन्ही के द्वारा हो रही है,इस रूप का नाम ही विराट रूप में देखा जाता है.राजनीतिक क्षेत्र मे एक प्रकार का प्रभाव जनता के अन्दर प्रदर्शित करना होता है जिसके अन्दर जनता के मन मस्तिष्क मे केवल उसी प्रत्याशी की छवि विद्यमान रहती है जिसका राहु बहुत ही प्रबल होता है,अक्सर राजनीतिक पार्टिया राहु को प्रयोग करती है उस राहु को वे अपने नाम से और नाम को समुदाय विशेष से जोड कर रखती है.अगर पार्टी समुदाय विशेष से जोड कर नही चलेगी या किसी भी समुदाय को अपने हित के लिये प्रयोग मे लाना चाहेगी तो वह कभी भी किसी भी समय समुदाय विशेष के रूठने पर या किसी भी बात के बनने से वह दूर हो सकता है तथा जीती हुयी जीत भी हार मे बदल सकती है.कोई भी पार्टी चाहे कि वह धन की बदौलत जीत हासिल कर ले यह नही हो सकता है कभी कभी आपने देखा होगा कि एक पार्टी लाखो करोडो खर्च करने के बाद भी जीत हासिल नही कर पाती है और एक बिना पैसे को खर्च किये पार्टी अपनी छवि को सुधारती चली जाती है,इस बात को प्रभाव मे लाने के लिये राहु को विशेष दर्जा दिया जाता है.राहु उल्टा चलता है और इस उल्टी गति को समाज मे फ़ैलाने के लिये लोग पहले जनता के अन्दर भय का माहौल भरते है और उसके बाद अपनी गतियों से जनता मे उल्टे कामो को दूर करने के लिये अपनी स्थिति को दर्शाते है और इसी प्रकार से जनता के अन्दर अपनी छवि को बनाकर अपनी उपस्थिति को प्रदान करते है परिणाम मे वे जीत कर सामने आजाते है.राहु कभी भी अपनी स्थिति को जीवन मे प्रदान कर सकता है सूर्य और राहु के अन्दर यह देखा जाता है कि सूर्य के अन्दर बल कितना है अगर सूर्य की रश्मिया तेज है तो राहु उन्हे चमकाने के लियेतोराहु उन्हे चमकाने के लिये अपनी गति को प्रदान करता है और राहु अगर मजबूत है और सूर्य की गति अगर धीमी है तो जरूरी होता है कि सूर्य अपनी स्थिति को नही दिखा पाता है इस बात को अक्सर देखा होगा कि जन्म लेने के समय यानी सूर्य उदय होने के समय राहु अपनी स्थिति को एक धुंधले प्रकाश के रूप मे सामने रखता है यह बात उन लोगों के लिये मानी जाती है जो अपने बचपने के कारण राजनीति से जुड तो जाते है लेकिन अपने को केवल एक दिशा विशेष से ही सामने ला पाते है अगर बीच का सूर्य यानी दोपहर का सूर्य जो जवानी के रूप मे माना जाता है और वह अपना प्रकाश राहु के द्वारा क्षितिज पर फ़ैला कर आया है तो लोग उस व्यक्ति पर चारों तरफ़ से आकर्षित होकर उसे ही देखने के लिये फ़िर से अपना प्रयास करने लगते है.राहु बुध के साथ मिलकर बोलने की क्षमता देता है तो राहु मंगल के साथ मिलकर अपनी शक्ति से जनता के अन्दर नाम कमाने की हैसियत देता है राहु सूर्य के साथ मिलकर राजकीय कानूनो और राजकीय क्षेत्र के बारे मे बडी नालेज देता है वही राहु गुरु के साथ मिलकर उल्टी हवा को प्रवाहित करने के लिये भी देखा जाता है,राहु शनि के साथ मिलकर मजदूर संगठनो का मुखिया बना कर सामने लाता है तो राहु शुक्र के साथ मिलकर लोगों के अन्दर चमक दमक से प्रसारित होने अपने को समाज मे दिखाने और अपने द्वारा मनोरंजक बातों के प्रति सामने रखने से माना जा सकता है.

 राहु हर अठारह साल मे मानसिक गति को बदल देता है इस राहु के द्वारा ही दक्षिण का शासन भारत पर हुआ है और जो भी चलने वाली प्रथा समाज आदि है उनके प्रति भयंकर बदलाव देने के लिये अपनी शक्ति को देने वाला बना है.उपनी स्थिति को बनाकर सामने लाने के लिये पहले शासन करता है और वही केतु अपनी युति से राहु के द्वारा खर्च कर दिया जाता है,जैसे आपरेशन ब्लू स्टार को ही देख लीजिये,भाजपा का पतन भी देखा होगा कांग्रेस का अक्समात सफ़ाया भी देखा भाजपा पार्टीीी का फिर  उठना यह  सब राहु की ही करामात का परिणाम था.अक्सर  लोग एक नशे के अन्दर आजाते है और उन्हे केवल अपने अहम के अलावा और कुछ नही दिखाई देता है वे समझते है कि वे ही अपने धन और बाहुबल से सब कुछ कर सकते है राहु उनकी शक्ति को अपने ही कारण बनवा कर उन्हे ग्रहण दे देता है,लेकिन जो सामाजिक मर्यादा से चलते है समाज को राजनीति से सुधारने के लिये अपने प्रयासो को करते है राहु उन्हे भी ग्रहण देता जरूर है पर कुछ समय बाद उन्हे उसी प्रकार से उगल कर बाहर कर देता है जैसे हनुमान जी लंका मे जाते समय सुरसा के पेट मे गये जरूर थे लेकिन अपने बुद्धि और पराक्रम के बल पर बाहर भी आ गये थे,वहां पर उनकी यह धारणा बिलकुल नही थी कि वे अपने काम के लिये जा रहे है या अपने ही हित के लिये कोई साधन बना रहे है,वे राम के कार्य के लिये जा रहे थे और राम कार्य ही उनके लिये सर्वोपरि था.यह भी इतिहास बताता है कि जब भी राहु ने राजनीतिक लोगो को ग्रहण दिया है वे कभी भी उस ग्रहण से नही निकल पाये है उनके साथ चलने वाले लोग ही उनके दुश्मन बनकर सामने आये है और उन्हे डुबोकर खुद को सामने करते देखे गये है.

राहु का मुख्य उपाय आप अपनी कुंडली दिखा कर हमसे संपर्क करके आप प्राप्त कर सकते हैं

राहु के लिये कितने ही यज्ञ किये जाये राहु के लिये कितने ही रत्न धारण किये जाये लेकिन राहु कभी भी शांत नही होता है जिस प्रकार से एक शराबी का नशा दूर करने के लिये कितने ही उपाय किये जाये वह अपनी शराब का नशा दूर नही जाने देता है उसी प्रकार से राहु जो राजनीति का नशा देता है या किसी प्रकार से अपनी योग्यता को जाहिर करने के लिये अपने बल को देता है अगर राहु का तर्पण नही किया जाता है वह कभी भी अपने दुष्परिणामो को नही रोक सकता है.व्यक्ति के पास जब तक अपने पूर्वजो का बल नही है वह अपने आसपास के रहने वाले अद्रश्य शक्ति के कारणो पर विश्वास नही करता है जैसे स्थान देवता वास्तु देवता पास की नदी समुद्र गंवादेवी स्थान योगिनी समुदायिक शक्ति को प्रदान करने वाली गणयोगिनी राजलक्ष्मी के रूप मे सहायता करने वाली तारासुन्दरी आदि व्यक्ति की सहायक नही होती है तो राजनीति मे प्रवेश पाना बहुत ही मुश्किल ही नही असम्भव माना जाता है,अक्सर जो राजनीति मे ऊपर उठने के लिये अपने प्रयास करते है उनके आसपास कोई न कोई तांत्रिक जरूर देखा जाता है उस तांत्रिक के पास वह सब कारण बनाने के लिये योग्यता होती है जो व्यक्ति को आने वाले खतरे से दूर भी करती है और उसके द्वारा किये गये जरा से काम को बहुत ऊंचा करने के  में विजय प्राप्ति हेतु बगलामुखी कवच और त्रिशक्ति कवच प्राप्त करके गले में धारण करें। इसके धारण से विरोधियों  को नर्वस करने में सुविधा मिलेगी। माहौल भी मजबूत बनेगा। ग्रहों  को कंट्रोल करना भी इनका काम है  अधिक जानकारी हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं

सोमवार, 26 नवंबर 2018

कौन बनेगा प्रधानमंत्री 2019 में राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी

2019 मेदेश की राजनीति में क्या उथल-पुथल होगी, 

अगले चुनाव में कौन प्रधानमंत्री बनेगा क्या कहती है पीएम मोदी की कुंडली ओर राहुल गांधी की पहले वात करते हैं नरेन्द्र मोदी जी की  मित्रो बहुत ही सरल भाषा में दोनों की कुंडली का विश्लेषण कर रहा हूं आप खुद ही अंदाजा लगा सकते है कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा यहां मैं कोई भविष्यवाणी नहीं कर रहा सिर्फ ज्योतिषी नजर से कुंडलियों का विश्लेषण सरल भाषा में सिंपल भाषा में कर रहा हूं पूरा फल इतना नहीं कर रहा हूं मित्रों बस थोड़ा कुंडलीयोको आप समझे और पूरी पोस्ट को पढ़ें

अब बात की जी रही है पीएम मोदी की कुंडली की। पीएम मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न वृश्चिक राशि की है। साथ ही पीएम मोदी की कुंडली में चंद्रमा की महादशा चल रही है। जो वर्ष 2021 तक चलेगी। चंद्र अनुराधा नक्षत्र में बैठा है जो शनि का है शनि का संबंध दंसव भाव से हो रहा है दसवे घर में बैठे शनि, शुक्र का मेल इन्सान को एक अच्छा राजनेता वनाता  है  पीएम मोदी की कुंडली में चन्द्रमा की महादशा में बुध का अंतर चल रहा है, यह स्थिति 3 मार्च 2019 तक रहेगी।वुघ का संवघ भी दंसव से हो रहा है इसके ठीक बाद कुंडली में केतु का अतर आयेगा।  इसके अतिरिक्त वृश्चिक लग्र के लिए बृहस्पति पंचमेश में होता है। यह स्थिति बहुत अच्छी मानी गई है। तो बता दें  जिसका फायदा पीएम मोदी को 2019 चुनाव में होगा और एक बार पीएम नरेन्द्र मोदी के चलते बीजेपी को बहुमत या फिर सबसे अधिक सीट मिल सकती है।

पीएम मोदी के कारण ही बीजेपी को लाभ होगा। तो यहां बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलने का दावा कर  सकता हु,  बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनेगी और फिर से देश की सत्ता पीएम मोदी के हाथों में होगी। 

  अब बात करते हैं राहुल गांधी जी की कुंडली की कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की कुंडली बताती है कि वे दमदार नेतृत्व के साथ उभरेंगे, लेकिन कुछ कमियों से वे पीछे रह सकते हैं । जाने राहुल गांधी के कुंडली के ग्रहों के अनुसार क्या होगा उनका कराजनीतिक भविष्य(Rahul Gandhi) का जन्म भारत वर्ष के दिल्ली प्रदेश में दिनांक 18 जून 1970 को को रात्रि 9 बज कर 52 मिनट पर हुआ राहुल गाँधी जी के जीवन में अनेकों परिस्थितियों जैसे उतार-चढ़ाव दिखने को मिलते हैं आज बात करते हैं इस समय उनकी कुंडली में चंद्रमा की महादशा में शनि का अंतर चल रहा हैचन्द्रमा ( Moon) उनकी कुंडली में नीच  राशि में छठे स्थान में बैठा है , साथ ही छठे भाव का स्वामी मंगल लग्न में और मिथुन लग्न होने से लग्न का  स्वामी बुध ग्रह बनता है बारहवे स्थान में , मैंने हमेशा कहा है की अगर लग्न या दशम का बारहवे भाव से सम्बन्ध बन रहा है तो राजभंग  योग का निर्माण होता है इनके कुंडली के 5 भाव में शुक्र (venus) भी नवमांश कुंडली में नीच का है अतः राजभंग योग के जितने कारण बन सकते है सब कुंडली में उपलब्ध है।

इस समय में उनके बारहवा और छठा (12th house और 6th House) भाव पूरी तरह से Active थे , साथ ही चन्द्रमा बुध के नक्षत्र में (12th house से connection ) और बुध चन्द्रमा के नक्षत्र में (6th house से connection) , चन्द्रमा आत्मकारक ग्रह भी है और हमेशा मैंने कहा है की दशा बहुत कड़वे अनुभवों वाली रहती है

राहुल गाँधी जी का वर्तमान समय ग्रहों के हिसाब से   कुंडली में बैठे ग्रहो जैसे सर्व प्रथम कुंडली में बैठे वाणी करक गृह बुध को प्रबल व समाधान करना होगा और साथ ही राजनितिक का स्वामी शनि गृह जो कुंडली में नीच राशि का हे कुंडली में  मे चंद्र भी नीच राशि का स्थित हैअव भारत की कुंडली 

15/08/1947रात 12वजे अव मित्रों मोदी जी कुंडली राहुल गांधी जी कुंडली ओर भारत की कुंडली में आप देखेंगे की एक वात कोमन है कि सभी की चंद की माहादश चल रही है अभी उस समय मोदी की कुंडली राहुल गांधी की कुंडली पर काफी भारी दिखाई दे रही है यही बात मैं इस पोस्ट में समझाना चाहता था कि मोदी के सामने राहुल ही क्यों?  

शनिवार, 24 नवंबर 2018

वक्री ग्रह

वक्री ग्रह

आज वक्री ग्रहों के बारे में बात करते हैकी बक्री.वक्री का सामान्य अर्थ उल्टा होता है वबक्री का अर्थ टेढ़ा..साधारण दृष्टि से देखें या कहेंतो सूर्य,बुध आदि ग्रह धरती से कोसों दूर हैं.भ्रमणचक्र मेंअपने परिभ्रमण की प्रक्रिया में भ्रमणचक्र के अंडाकारहोने से कभी ये ग्रह धरती से बहुत दूर चले जाते हैं

तो कभी नजदीक आ जाते हैं.जब जब ग्रह पृथ्वी केअधिक निकट आ जाता है तो पृथ्वी की गति अधिकहोने से वह ग्रह उलटी दिशा की और जाता महसूसहोता है.उदाहरण के लिए मान लीजिये की आप एक तेजरफ़्तार कार में बैठे हैं,व आपके बगल में आप ही की जानेकी दिशा में कोई साईकल से जा रहा है तो जैसेही आप उस साईकल सवार से आगे निकलेंगेतो आपको वह यूँ दिखाई देगा मानो वो आपसेविपरीत दिशा में जा रहा है.जबकि वास्तव में वहभी आपकी दिशा की और ही जा रहा होता है.आपकी गति अधिक होने से एकएक दूसरे को क्रोस करने के समय आगे आने के बावजूद वह

आपको पीछे यानि की उल्टा जाता दिखाई देता है.और जाहिर रूप से आप इस प्रभाव को उसी गाडी सवार ,या साईकिल सवार के साथ

महसूस कर पाते है जो आपके नजदीक होता है,दूर केकिसी वाहन के साथ आप इस क्रिया को महसूस

नहीं कर सकते. ज्योतिष की भाषा में इसे कहा जायेगा की साईकिल सवार आप से वक्री हो रहा है.यही ग्रहों का पृथ्वी से

वक्री होना कहलाता है.सीधे अर्थों में समझें की वक्री ग्रह पृथ्वी से अधिक निकट हो जाता है.अब निकट होने से क्या होता होगा भला?

यही होता है की ग्रह का असर ,ग्रह का प्रभाव बढ जाता है. कई ज्योतिषियों का इस विषय पर अलगअलग मत है.कहा यह भी जाता है की वक्री होने से ग्रह उल्टा असर देने लगता है.आप जलती हुई भट्टी से दूरबैठे हैं,जैसे ही आप भट्टी के निकट जाते हैं

तो आपको अधिक गर्मी लगने लगती है.क्यों?क्योंककिआपके और भट्टी के बीच की दूरी कम हो गयी है.भट्टी में तो आग तब भी उतनी ही थी जबआप उससे दूर थे,व अब भी उतनी ही है जब आप उसके नजदीक हैं.आग में कोई भी फर्क नहीं आया है बस नजदीक होने से हमें उसका प्रभाव अब प्रबलता से महसूस हो रहा है. एक अन्य उदाहरण लीजिये, आप किसी पंखे

से दूर बैठे हैं जहाँ पंखे की बहुत कम हवा आप तक आ रही है,आप अपनी कुर्सी उठा कर पंखे के निकट आ जाते हैं,अब आप पंखे की हवा को अधिक जोर से महसूस कर रहे

हैं.जबकि पंखा अब भी उसी स्पीड पर चल रहा है जिस पर पहले चल रहा था.प्रभाव में अंतर दूरी घटने से हुआ है,अवस्था में कोई फर्क नहीं आया है.इसी प्रकार यहमानना की वक्री होने से ग्रह अपना उल्टा असर देने लगेगा यह मान लेना है की भट्टी के निकट जाने से वह ठंडी हवा देने लगेगी,या निकट आने पर पंखा आग उगलने लगेगा.ग्रह के वक्री होने से उसके नैसर्गिक गुण में ,उसके व्यवहार में किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं आता अपितु उसके

प्रभाव में ,उसकी शक्ति में प्रबलता आ जाती है.देव गुरु ब्रह्स्पत्ति जिस कुंडली में वक्री हो जाते हैं वह जातक अधिक बोलने लगता है,लोगों को बिन मांगे सलाह देने लगता है.गुरु ज्ञान का कारक है,ज्ञान का ग्रह जब वक्री हो जाता है तो जातक अपनी आयु के अन्य जातकों से आगे भागने लगता है,हर समय उसका दिमाग नयी नयी बातों की और जाता है.सीधी भाषा में कहूँ

तो ऐसा जातक अपनी उम्र से पहले

बड़ा हो जाता है,वह उन बातों ,उन विषयों को आज जानने का प्रयास करने लगता है,सामान्य रूप से जिन्हें

उसे दो साल बाद जानना चाहिए.समझ लीजिये की एक टेलीविजन चलाने के किये उसे घर के सामान्य वाट के बदले सीधे हाई टेंसन से तार मिल जाती है.परिणाम क्या होगा?यही होगा की अधिक

पावर मिलने से टेलीविजन फुंक जाएगा.इसी प्रकार गुरु का वक्री होना जातक को बार बार अपने ज्ञान

का प्रदर्शन करने को उकसाता है.जानकारी ना होने के बावजूद वह हर विषय से छेड़ छाड़ करने की कोशिश करता है.अपने ऊपर उसे आवश्यकता से अधिक विश्वास होने लगता है जिस कारण वह ओवर कोंनफीडेंट अर्थातअति आत्म विश्वास का शिकार होकर पीछे रह

जाता है. कई जातक ऐसे देखे होंगे की जो हर जगहअपनी बात को ऊपर रखने का प्रयास करते हैं,जिन्हें

अपने ज्ञान पर औरों से अधिक भरोसा होता है,जो हरबात में सदा आगे रहने का प्रयास करते हैं,ऐसे जातक वक्री गुरु से प्रभावित होते हैं.जिस आयु में गुरुका जितना प्रभाव उन्हें चाहिए वो उससे अधिक

प्रभाव मिलने के कारण स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते.कई बार आपने बहुत छोटी आयु में बालक बालिकाओं को चरित्र से से भटकते हुए देखा होगा.विपरीत लिंगी की ओर उनका आकर्षण एक निश्चित आयु से पहले ही होने लगता है.कभी कारण सोचा है आपने इसबात का ?विपरीत लिंग की और आकर्षण एक

सामान्य प्रक्रिया है,शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन के बाद एक निश्चित आयु के बाद यह आकर्षण

होने लगना सामान्य सी कुदरती अवस्था है.शरीर में मंगल व शुक्र रक्त,हारमोंस,सेक्स ,व आकर्षण

को नियंत्रित करने वाले कहे गए हैं.इन दोनों में सेकिसी भी ग्रह का वक्री होना इस प्रभाव को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है. यही प्रभाव जाने अनजाने उन्हें उम्र से पहले वो शारीरिक बदलाव     महसूस करने को मजबूर कर देता है जो सामान्य रूप सेउन्हें काफी देर बाद करना चाहिए था.शनि महाराज हर कार्य में अपने स्वभाव के अनुसार परिणाम को देर से देने,रोक देने ,या कहें सुस्त रफ़्तार में बदल देने को मशहूर हैं.कभी आपने किसी ऐसे बच्चे को देखा है जो अपने आयु वर्ग के बच्चों से अधिक सुस्त

है,जा जिस को आप हर बात में आलस करते पाते हैं.खेलने में ,शैतानियाँ करने में,धमाचौकड़ी मचाने में जिसvका मन नहीं लग रहा. उसके सामान्य रिफ़लेकसन

कहीं कमजोर तो नहीं हैं . जरा उस

की कुंडली का अवलोकन कीजिये,कहीं उसके लग्न में

शनि देव जी वक्री होकर तो विराजमान नहीं हैं.

इसी प्रकार  वक्री ग्रह कुंडली में आपने भाव व अपने नैसर्गिक स्वभाव के अनुसार अलग अलग परिणाम देते

हैं.अततः कुंडली की विवेचना करते समय ग्रहों की वक्रता का ध्यान देना अति आवश्यक है.अन्यथा जिस ग्रह को अनुकूल मान कर आप समस्या में नजरंदाज कर रहे हो होते हैं ,वही समस्या का वास्तविक कारण होता है,व आप उपाय दूसरे ग्रह का कर रहे होते हैं.परिणामस्वरूप समस्या का सही समाधान नहीं हो पाता.

 फिर बता दूं की वक्री होने से ग्रह के

स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता,बस उसकी शक्ति बढ़जाती है.अब कुंडली के किस भाव को ग्रह

की कितनी शक्ति की आवश्यकता थी व वास्तव में वह कितनी तीव्रता से उस भाव को प्रभावित कर

रहा है,इस से परिणामो में अंतर आ जाता है व कुंडली का रूप व दिशा ही बदल जाती हैआप भी अपनी कुन्ङली  अपने शहर के अच्छे  ज्योतिषी  को दिखा कर सलाह लेआप हम से भी सम्पर्क  कर सकते है 07597718725  09414481324

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...