शनिवार, 17 अगस्त 2019

अंत जो गति सो मति

अंत जो गति सो मति
एक कहावत बहुत ही प्रसिद्द है जो आखिर में जो होना होता है वही बुद्धि बन जाती है.जातक का जन्म होता है उसकी बुद्धि के अनुसार उसका शरीर संसार बनने लगता है,लेकिन यह सब जीवन की आख़िरी सीढी पर जो कुछ जीवन में किया होता है उसके अनुसार प्रकट होने लगता है.जो शरीर की गति होनी होती वही बुद्धि शुरू से बन जाती है और अपने अपने समय पर अपने अपने कार्य करती रहती है.
एक जातिका जिसका जन्म तीस(30 )मार्च(3) उन्नीस सौ पचास(1950) में हुआ था की कुंडली के अनुसार मेष लगन है,चौथे भाव में चन्द्रमा है पंचम में वक्री शनि है,छठे भाव में वक्री मंगल है केतु भी विराजमान है,दसवे भाव में शुक्र विराजमान है ग्यारहवे भाव में गुरु विराजमान है,बारहवे भाव में सूर्य बुध और राहू विराजमान है.

इस कुंडली के अनुसार राहू ने अपना अधिकार जिन ग्रहों पर किया है वे है सूर्य राहू के साथ बारहवा है,बुध भी राहू के साथ बारहवा है राहू ने सूर्य और बुध की शक्ति को अपने अन्दर सोख लिया है,राहू की पंचम दृष्टि चौथे चन्द्रमा पर होने के कारण चन्द्रमा का बल भी राहू के पास है,छठे भाव में मंगल वक्री की शक्ति भी राहू ने अपने अन्दर सोख ली है और केतु ने भी मंगल को अपना असर देकर पूर्ण किया है,केतु ने अपना बल शुक्र को भी दिया है और शुक्र के बल को प्राप्त करने के बाद राहू की सहायता की है,राहू के दूसरे भाव का ग्रह राहू से लेता है और राहू से बारहवा ग्रह राहू को देता है वही प्रकार केतु के लिए देखा जाता है केतु से दूसरे भाव का ग्रह केतु से लेता है और केतु से बारहव ग्रह केतु को देता है.इस कुंडली में राहू से बारहवा ग्रह गुरु लाभ भाव में विराजमान है इसलिए राहू गुरु को अपनी शक्ति से प्राप्त किया गया प्रभाव गुरु को दे रहा है और केतु से बारहवा वक्री शनि केतु के प्रभाव में आने वाले सभी ग्रहों की शक्ति को ग्रहण कर रहा है,इस प्रकार से कुल फ़ायदा में रहने वाले ग्रह गुरु और केतु है.ग्यारहवा गुरु जातक के बड़े भाई के रूप में भी होता है और जातक के मित्रो की श्रेणी में भी आता है.पंचम शनि अगर मार्गी होता है तो मस्त मलंग संतान के रूप में माना जाता है और अगर वह वक्री होता है तो निश्चित रूप से पुत्र संतान के रूप में होता है और बुद्धिमान भी होता है.जातिका के लिए कार्यों से यह शनि बुद्धि वाले काम करने की औकात देता है जीवन के प्रति संतानके प्रति पति के प्रति लाभ वाले मामले के प्रति धन के प्रति कोइ भी दिक्कत नहीं हो पाती है,कुंडली में शुक्र का फल जो पति के रूप में है वह दोहरा मिलता है,इस दोहरे कारण के द्वारा अक्सर यह भी देखा जाता है की जातिका के कार्य या घर अथवा संपत्ति एक बार राहू केतु के कारणों से समाप्त हो गयी होती है,लेकिन राहू का असर बारहवे भाव में होने से और चन्द्रमा का राहू से ग्रसित होने के कारण मानसिक रूप से पुत्र के प्रति पुत्री के प्रति जो भी कार्य किये जाते है वे हमेशा दोहरे रूप में किये जाते है,और चिंता का कारण भी हमेशा जीवन के शुरुआत में पिता  के प्रति शादी के बाद पुत्र के प्रति और पुत्री के प्रति माने जाते है.लेकिन केतु की सीमा जीवन के आधे भाग तक ही मानी जाती है अगर राहू बारहवा है या लगन में है या दूसरे भाव में है.जीवन का दूसरा भाग जो उम्र की पचासवी साल से ऊपर जाता है वह धीरे धीरे राहू की सीमा में प्रवेश करता जाता है,उस समय में जातक अपने को राहू की सीमा मेजाने के कारण एकांत में ले जाना शुरू कर देता है वह अपने हाथ पैरो के काम को करने के बजाय मानसिक रूप से चिंतित होकर एकांत में रहना शुरू कर देता है,वह अपने सभी क्रियाओं को बंद सा करने लगता है,घर में परिवार में समाज में कोइ अगर मानसिक रूप से लगाव को लगाना भी चाहता है तो जातक अपने स्वभाव के अनुसार उससे दूर रहने की कोशिश करता है अगर किसी प्रकार से जबरदस्ती की जाये तो वह झल्लाहट से जबाब देता है एक दूसरे के प्रति शंका करने के बाद या किसी प्रकार का आक्षेप विक्षेप करने के बाद अगर जीवन साथी है तो उससे अगर घर के अन्य लोग भी है तो उनसे अपनी वार्ता को झल्लाहट भरे कारणों से ही पूर्ण रखने की कोशिश करता है,इस प्रकार से जातक से लोग धीरे धीरे अलग होना शुरू कर देते है जो घर के नए सदस्य होते है वे अपने मानसिक रूप से दूरिया बना लेते है या किसी प्रकार की शब्दों की या कार्यों की अथवा व्यवहार के शत्रुता को दिमाग में पाल लेते है,अपने घर के सदस्य होने के कारण वे दिखावा तो यही करते है की जातक उनके लिए एक घर का सदस्य है लेकिन मानसिक रूप से जातक का कोइ भी किया गया कार्य उन्हें अखरने लगता है सभी कामो के अन्दर कोइ न कोइ दिक्कत देखी जा सकती है इस प्रकार से टोका टोकी का काम शुरू हो जाता है और इस प्रकार से जातक का अपने में ही सिमट कर रहना या किसी प्रकार से घर परिवार से दूरिया बनाना या एक दूसरे के प्रति आने जाने वालो से बुराइया करना ही माना जाता है.
इस राहू का एक प्रभाव और भी देखा जाता है की जातक की उम्र के साठवी साल के बाद में जातक की पुराणी यादे तो जीवित रहने लगती है लेकिन जो भी कार्य वर्त्तमान में किये जाते है उन्हें वह भूलने लगता है,वह पिछली बाते बड़े आराम से बताता है लेकिन कल उसके साथ क्या हुआ है उसे नहीं पता होता है वह यहाँ तक राहू के घेरे में आजाता है कि उससे अगर पूंछा जाए कि कल क्या खाया था वह एक दम से मना कर देगा कि उसे कल खाना मिला ही नहीं था,कई बार तो राहू का भ्रम इतना भी देखा गया है कि जातक अगर चारपाई पर लेता है और वह अपने शरीर की कल्पना को मन के अंदर राहू चन्द्र की ग्रहण वाली नीति से लाकर अनुमान लगाना शुरू कर देता है कि वह लैट्रिन के लिए गया है और वह लैट्रिन वाले स्थान में ही लैट्रिन कर रहा है लेकिन शरीर लैट्रिन तक गया ही नहीं होता है केवल वह मानसिक रूप से लैट्रिन में गया होता है पता चलता है कि जातक ने लैट्रिन बिस्तर पर ही कर ली है.अक्सर जन्म से जिसका चन्द्रमा राहू से जुडा होता है उनके साथ ही इस प्रकार की बाते देखने में आती है.कारण उनकी जिन्दगी में जद्दोजहद की पराकाष्ठा रही होती है घर के बारे में घर के सदस्यों के बारे में घर के बाहर के बारे में पति के बारे में या पत्नी के बारे में अह जीवन भर चिंता को लेकर चला होता है वह चिंता के रूप इस राहू के कारण अक्सर भ्रम में डालने के लिए माने जाते है और यह बात धीरे धीरे याददास्त को समाप्त करने के लिए भी मानी जाती है.

बारहवे राहू वाले व्यक्ति के लिए जीवन के दूसरे आयाम के लिए एक उपाय बहुत ही कारगर हुआ है कि जातक को लहसुन की मात्रा को बढ़ा दिया जाए,सर में कपूर को मिलाकर नारियल का तेल मालिस में प्रयोग किया जाए और पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने का उपाय किया जाता रहे,सर्दी गर्मी से बचाकर रखा जाए.

सोमवार, 12 अगस्त 2019

अष्टम राहु यानी इन्फ़ेक्सन

आपने माया कैलेंडर का नाम तो सुना ही होगा2012इस वारे News Chanels पर काफी वार इस पर चर्चा की गई और माया कलेन्डर को सन दो हजार बारह के आगे नही लिखा गया है ओर कहा कि सन दो हजार बारह के आखिर मे
संसार का विनाश हो जायेगा.उस वक्त मुझे विनाश मनुष्य का नही समझ में नहीं आया आज 2019 हैं और आज मनुष्यता का जरूर समझ मे आ रहा है.अगर देखा जाये तो
संसार में जो मनुष्यता है वह रिस्तो पर निर्भर है,पिछले समय से राहु की गति के कारण लोग अपने अपने रिस्तो पर ही कनफ़्यूजन करने लगे है.राहु का वर्तमान का प्रभाव बहुत ही गहरा सदमा देने वाला माना जा सकता है.पहले जो भी लोग सामाजिक बन्धन मे बन्ध जाते थे उस बन्धन को आजीवन निभाने के लिये कृत्संकल्प हो जाते थे,सामाजिक वाणी उनके लिये एक प्रकार से अग्नि रेखा का के रूप मे मानी जाती थी लेकिन आज सामाजिक वाणी के साथ साथ सामाजिक मर्यादा का भी हनन हो चुका है.माता पिता बच्चे को पैदा करते है और उन्हे सीधा सा वही शिक्षा का क्षेत्र बताते है जहां से उसे बहुत ही अच्छी नौकरी या चालाकी के रास्ते बताये जाते हो.बच्चा जब शिक्षित हो जाता है तो वह अपनी माता पिता और परिवार की मर्यादा को भूल जाता है उसे लगता है कि यह सब बेकार है,वह जो कर रहा है वही सही है माता पिता जो कर रहे है वह बेकार की बात है. जब किसी प्रकार की चर्चा भी की जाये तो लोग कह देते है आधुनिक युग की बात है.जनरेशन गैप है इसे रोका नही जा सकता है.जब अधिक मर्यादा वाली बात को कर दिया जाये तो उसके लिये कई कारण भी सामने आजाते है,कभी कभी तो लोग अपने घरवार परिवार और समाज को यूं छोड कर चले जाते है जैसे वे इस समाज मे पैदा ही नही हुये हों वे कहीं बाहर से आये हों.

निम्न परिवारो की हालत यह है कि शाम को उनके घरो मे चूल्हा जले न जले लेकिन शराब का नशा जरूर करते हुये लोग मिलेंगे,उनके लिये अगर शराब का मिलना मुस्किल हो तो वे अन्य प्रकार के नशे करते मिलेंगे,जैसे खांसी की दवा का पीना कैमिकल भांग वाले  स्मेक को लेना और इसी प्रकार के अन्य नशे करने के बाद उन्हे जैसे रात गुजारने के लिये कोई स्थान चाहिये उन्हे घर से कोई मतलब नही होता है सडक पर कोई खाना बेचने वाला मिल गया तो वे उससे खाना उसी प्रकार से मांगते नजर आयेंगे जैसे वह मनुष्य नही होकर किसी भटकते हुये जानवर की श्रेणी मे आ गये हो,उनके घरो की औरतो का बहुत ही बुरा हाल है,वे कहने को तो अमुक की माता अमुक की बहिन और अमुक की पत्नी है लेकिन उन्हे यह संकोच नही है कि वे अन्य पुरुषो से सम्पर्क तो बना रही है लेकिन बदले मे मिलने वाली बीमारिया और इन्फ़ेक्सन आदि उन्हे आगे के जीवन केलिये कितना दुखदायी होगा वे किसी भी प्रकार से अपनी सेहत परिवार और समाज मे जिन्दा कैसे रह पायेंगी,उनकी सन्तान सब कुछ समझदारी से देखती है लेकिन वह कुछ तब तक नही कहती है जब तक वह बडी नही हो जाती है और जैसे ही वह बडी होती है अपने लिये एक स्त्री या पुरुष का चुनाव अपनी मर्जी से करने के बाद बिना शादी विवाह के जाकर अपने किराये या इसी प्रकार के किसी स्थान पर टिक जाते है बच्चे पैदा होने लगते है और जब  परिवार का भार बढने लगता है तो वे अपने अपने रास्तो पर चले जाते है माता अपने बच्चे को या तो अकेला छोड कर चली जाती है या पैदा होने के बाद उसे किसी अन्जान स्थान पर छोड देती है पिता किसी अन्य स्त्री को अपने लिये खोज लेता है और स्त्री अपने लिये किसी अन्य पुरुष को खोज लेती है.

मध्यम परिवारो मे अगर देखा जाये तो पुरुष और स्त्रियां दोनो ही नौकरी मे लगी होती है जब वे घर से बाहर होते है और उनके बच्चे अकेले घर मे होते है तो वे अपनी मर्जी से ही रहने खाना खाने आदि के लिये अपनी मानसिक धारणा को एकान्त का रखते ही है लेकिन जब वे कुछ बडे हो जाते है तो वे अपने माता पिता की हरकतो को देखने के बाद वही सब कुछ करने लगते है जो उनके माता पिता बच्चो को सोता हुआ समझ कर करते है.यही नही जब पिता को कोई अपनी पसन्द का कारण मिल जाता है तो पिता का हो सकता है कि वह रात को घर ही नही आता है और माता को भी देखा जाता है कि वह अपने लिये कोई भी कार्य अपने परिवार की  जरूरतो को पूरा करने के लिये या अपनी शौक को पूरा करने के लिये कर सकती है जो उसके लिये सामाजिक बन्धन मे कभी भी मान्य नही है,इस प्रकार का दगा पति पत्नी ही आपस मे करते है तो आगे बच्चे भी अपने माता पिता की बातो को दिमाग मे रखकर करने से नही चूकते है।उच्च वर्ग मे देखा जाता है कि माता पिता दोनो ही किसी न किसी नाम के लिये अपनी योग्यता को बनाने के लिये उस प्रकार के कारणो को पैदा करने लगते है कि उनके बच्चे कांच के महलो मे कैद हो रहे होते है उन्हे स्कूल जाने और घर आने से ही मतलब होता है किसको कितना दर्द है उन्हे पता ही नही होता है अगर किसी भडे बच्चे से पूंछ भी लो कि तुम्हारे दादा का क्या नाम है तो वह नही बता पायेगा,साथ ही अन्य रिस्तो की बाते भी उसे पतानही होंगी केवल वह जानता होगा उन्ही लोगो को जो माता या पिता के लिये विजनिश मे साझेदार होते है या किसी पार्टी आदि मे शामिल होने के लिये आये होते है.

यह राहु का इन्फ़ेक्सन कालपुरुष के अनुसार लोगो के अन्दर एक प्रकार से हवस जैसी हालत को बना रहा है किसी भी सोसियल साइट पर देखो लोग अपनी अपनी धारणा को किस प्रकार से प्रकट कर रहे है कोई भी किसी प्रकार से सामाजिक धारणा को नही समझना चाहता है,घरो के अन्दर अहम का भाव पैदा हो गया है भाई भाई को नही समझ रहा है पिता माता को नही समझ रहा है माता अन्य रास्ते पर जा रही है पुत्र अन्य रास्ते पर जा रहा है पुत्री अपने रास्ते पर जा रही है किसी को किसी से कोई मतलब नही रह गया है ऐसा लगता है जैसे एक जानवर ने अपने बच्चे को पालकर बडा कर दिया है और वह अपने कर्तव्य से दूर हो गया है,जो लोग अभी भी कुछ मर्यादा को लेकर चल रहे है उन्हे मर्यादा मे रहने नही दिया जा रहा है किसी न किसी कारण से उनके लिये अजीब से कारण पैदा किये जा रहे है,कि किसी भी प्रकार से मर्यादा मे चलने वाला व्यक्ति भी उन्ही के साथ साथ अपनी कार्य शैली को प्रयोग मे लाना शुरु कर दे.

शनिवार, 10 अगस्त 2019

अपने अच्छे जीवन के लिए क्या करु

अपनी ही एक पुरानी पोस्ट फिर से पोस्ट कर रहा हु जो मित्र ज्योतिष  सीख रहे हैं या ज्योतिषी है उनके लिए उपयोगी पोस्ट पढ़े और शेयर करे ताकि दुसरे भी लाभ उठा सकें

एक जातिका का प्रश्न है कि अपने अच्छे जीवन के लिये वह क्या कर सकती है,उसक साथ जो भी हो रहा है वह सही नही है. यह कुंडली वृश्चिक लग्न की है और लगनेश मंगल चौथे भाव मे है इस मंगल को शास्त्रीय रूप से नीच का माना जाता है साथ मे शुक्र भी है जो बारहवे और सातवे भाव मा मालिक भी है.बारहवा खर्च का मालिक है और सातवा जो भी जीवन मे जद्दोजहद करने का कारण बनाने के लिये अपने प्रभाव प्रस्तुत करता है वैसे तो सीधी भाषा में इस भाव को जीवन साथी का भाव भी कहा जाता है लेकिन जैसे ही जातक खुद के प्रयास से कुछ करने की अपनी मर्जी को जाहिर करने लगता है वही पर सातवे भाव का फ़ल मिलना शुरु हो जाता है। उदाहरण के लिये अगर सातवे भाव को जीवन साथी का भाव कहा जाता है तो सातवा भाव साझेदार का भी होता है और सातवा भाव ही कोर्ट कचहरी मे मुकद्दमा आदि लडने वाले प्रतिद्वंदी का भी होता है। कुंडली मे अगर सप्तमेश और लगनेश का साथ होता है तो दोनो भावो का फ़ल मिश्रित हो जाता है देखना यह पडता है कि दोनो मे प्रभाव किस प्रकार का है.लगनेश मंगल मे पहला प्रभाव चन्द्रमा का है क्योंकि वह चन्द्रमा की राशि कर्क यानी चौथे भाव मे है,दूसरा प्रभाव शनि का है क्योंकि वह शनि की राशि मे है तीसरा प्रभाव उसके अन्दर नक्षत्र का जो धनिष्ठा मे विराजमान है और चौथा प्रभाव उस नक्षत्र के पद का है जो बुध का है,पांचवा प्रभाव शुक्र के साथ होने से शुक्र का भी मिश्रित प्रभाव मिला हुआ है,छठा प्रभाव बारहवे चंद्रमा का भी जो नवम पंचम गति से मंगल को अपना असर दे रहा है,सातवा प्रभाव अष्टम गुरु का है जो अपनी नवी द्रिष्टि से अपना असर दे रहा है आठवा प्रभाव गुरु चन्द्र की मिश्रित प्रणाली से मिल रहा है नवां प्रभाव गुरु चन्द्र और शुक्र की मिश्रित प्रणाली से मिल रहा है,तथा दसवा प्रभाव मिथुन तुला राशियों का भी इस प्रकार से मंगल के बल को देखने के लिये इन दस कारणो को देखना जरूरी है,यह सभी कारक जब मिश्रित किये जायेंगे तभी जातिका के जीवन के प्रति कुछ सही फ़लादेश करना उचित रहेगा।जातिका की योग्यता आदि के लिये इन दशो प्रभावों को समझने के लिये इस प्रकार से समझा जायेगा:-
चौथा भाव माता मन मकान का कारक है,मंगल जब इस भाव मे होता है तो साधारण रूप से मानसिक क्लेश का कारक कहा जाता है.घर मे होने वाले क्लेश को समझने के लिये मंगल जो भाई का कारक भी है और शुक्र के साथ होने से भाई की पत्नी के लिये भी माना जाता है इसलिये भाई की पत्नी के द्वारा घर मे क्लेश पैदा किया जाना जरूरी है.घर मे किसी न किसी प्रकार से धन की जद्दोजहद का रहना भी माना जाता है यानी प्रोग्रेस के समय मे भोजन की भी कमी का होना देखा जा सकता है.फ़ेफ़डे का कारक होने के कारण तथा ह्रदय पर असर देने के कारण जुकाम वाली बीमारिया और अधिक सर्दी जुकाम रहने से सिर मे चक्कर आना तथा जुकाम के कारण ही आंखो पर असर देने के लिये भी माना जा सकता है,अक्सर यह प्रभाव बायीं आंख पर अधिक होता है जैसे आंख से पानी का बहते रहना आदि.माता के साथ जब सप्तमेश साथ मे है तो शुक्र नानी का कारक भी हो जाता है यानी चौथे से चौथा भाव नानी का भी माना जाता है,नानी के घर मे भी इसी प्रकार का क्लेश माना जा सकता है नानी की बीमारियां भी इसी प्रकार की मानी जाती है,सप्तम दूसरे नम्बर के भाई बहिन के लिये भी माना जाता है सप्तम का मालिक शुक्र लगनेश के साथ होने से दूसरे नम्बर की बहिन के साथ भी इसी प्रकार का क्लेश देखा जा सकता है,मंगल को स्त्री की कुंडली मे पति के रूप मे भी देखा जा सकता है,इसी प्रकार के कारण पति के लिये भी माने जा सकते है और यही कारण पति की माँ यानी जातिका की सास के लिये भी माना जा सकता है.लेकिन इस भाव के मंगल के लिये यह भी माना जाता है कि जातिका भले ही छोटी हो लेकिन अपनी उम्र के अट्ठाइस साल के बाद उसे अपने घर के लिये बडप्पन की बाते ही करने को मिलेंगी,कारण इस उम्र तक उसने सभी प्रकार के कष्ट सहन कर लिये होते है और अनुभव के आधार पर वह किसी प्रकार के घर के झगडे निपटाने की कला का ज्ञाता हो जाता है.यही बात पति के लिये भी होगी नानी के लिये भी होगी और भाई के लिये भी होगी.अगर जातक किसी प्रकार से अपने घर से दूर चला जाता है यानी किसी प्रकार से शादी के बाद पति के साथ दूर चला जाता है तो बडा भाई घर मे औलाद या सेहत के मामले मे दुखी ही रहना माना जाता है। माता के भाव से ग्यारहवे भाव का मालिक गुरु होने के कारण बडे मामा को भी दुखी माना जा सकता है.जातिक की कुंडली से अष्टम भाव मे गुरु होने के कारण जातिका का ताऊ भी इसी प्रकार से दुखी माना जा सकता है और इस भाव से नवे भाव मे चन्द्रमा होने से जातिका की दादी के लिये भी यही बात जानी जा सकती है.शरीर मे गले के बाद वाले भाव मे मंगल के होने से जातिका को गर्दन की बीमारियां भी होती है जो शुक्र के साथ रहने से थाइराइड जैसी बीमारियों के बारे मे भी सूचित करता है। मंगल केन्द्र मे स्थापित है और लगन का मालिक होने से चौथे मे बैठने से तथा सप्तमेश के साथ होने से दसवे भाव में सप्तमेश और लगनेश मंगल की द्रिष्टि होने से मंगल का केन्द्र मे कब्जा है यह मंगल शुक्र के साथ होने से शरीर के केन्द्र को भी आहत करता है यानी नाभि वाली बीमारियां भी होती है.इस भाव का मंगल खून के अन्दर पतलापन पैदा करता है यानी पानी के भाव मे होने से और शनि की राशि मे होने से दिमाग मे शक की बीमारी को भी पैदा करता है,जो लोग जान पहिचान वाले होते उनके अन्दर भी जातिका के प्रति शक की बीमारी को पैदा करने के लिये माना जाता है.भाग्य के भाव को अपनी छठी नजर से देखने के कारण भाग्य भी काम नही करता है केतु की अष्टम द्रिष्टि होने के कारण वह उम्र की पच्चीसवी साल तक किसी न किसी प्रकार से कालेज के किसी व्यक्ति के साथ गलत सम्बन्धो के लिये भी जोडा जा सकता है,जैसे केतु की अष्टम नजर लगनेश पर पडने के कारण भी जाना जा सकता है.इस कारण से इस भाव के मंगल मे एक प्रकार से एक दूसरे से बदला लेने की भावना भी पैदा हो जाती है और इस भावना से मंगल जो भाई का कारक है और मंगल जो पति का कारक है बदला लेने के कारण जेल जाने के कारणो को भी बना सकता है.जेल जैसे स्थान मे रहना भी एक प्रकार से इस मंगल के कारण ही देखे जाते जब सूर्य से गयरहवा शनि राहु हो यानी एक ऐसी सरकारी संस्था जहां पिता काम करता हो और वह जेल जैसी संस्था को संभालने का काम करता हो तो भी जेल जैसी स्थिति को ही माना जा सकता है.
चौथे भाव को आठवा भाव नवे भाव से और छठा भाव ग्यारहवे भाव से अपनी नजर को रखता है,यानी ताऊ अपनी नजर से अपनी मालिकियत को मानता है और छठा भाव अपने लाभ का साधन मानता है इसलिये जातक को जब भी परेशानी होती है तो अपने ताऊ चाचा आदि से होती है और घर मे बंटवारे आदि जैसे कारण अधिकतर इन्ही लोगो के कारण चलते रहते है.अष्टम मे गुरु के होने से और छठे भाव मे बुध के होने से यह लोग जो भी अपनी कानूनी प्रक्रिया को करते है वह गुप्त रूप से करते है,एक तरफ़ तो वे अपने को इस प्रकार से जाहिर करते रहते है कि वे ही सच्चे हितैषी है लेकिन पीठ पीछे अपनी ही चलाने की बात करते है और गुरु के आगे केतु होने से जातिका के ताऊ आदि अपने चार प्रकार साधनो से अदालती कार्य आदि करते रहते है इस कारण से जातिका के घर मे भी तनाव रहता है.
सूर्य का शिक्षा स्थान मे होना और शनि राहु की सम्मिलित नजर सूर्य पर होने के कारण जातिका के पिता किसी बडे संस्थान को संभालने के लिये माने जा सकते है जो शिक्षा या राज्य के प्रति जाना जाता हो और सचिव जैसी हैसियत को रखता हो.
वर्तमान मे जातिका की दशा शनि की चल रही है और यह दशा जातिका को किये जाने वाले कार्यों से दिक्कत को देने के लिये मानी जाती है लेकिन इस मंगल की युति के कारण जातिका जितना कष्ट भोगेगी उतना ही उसे अपने पतले खून को मजबूत बनाने के लिये जाना जायेगा.
चन्द्रमा का मंगल के साथ योगात्मक प्रभाव होने के कारण जातिका की बुरे वक्त मे कोई न कोई अद्रश्य शक्ति सहायता के लिये आजायेगी.लेकिन जातिका जब मेहनत वाले काम करेगी तो ही यह सम्भव है हरामखोरी मे यह शक्ति खुद ही जातिका को परेशान करने से नही चूकेगी.
अप्रैल दो हजार पन्द्रह तक जातिका को बहुत मेहनत करने की जरूरत है इसके बाद जातिका को अक्समात ही प्रोग्रेस के रास्ते गुरु की सहायता से खुलने लगेंगे.मित्रो आप भी अपनी कुंडली दिखाना चाहते हैं तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं या आपकी कोई समस्या है ओर उपाय चाहते हैं तो हमारे नम्वरो पर सम्पर्क करें हमारी सेवा सशुल्क है आचार्य राजेश 7597718725/9414481324

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

मेरी शादी कव होगी?


मनुष्य का जन्म हो जाता है शिक्षा होजाती धन कमाने के रास्ते मिल जाते है लेकिन विवाह के बारे मे जीवन अनिश्चितता की तरफ़ ही रहता है। अगर कहा जाये कि धनी बनकर शादी जल्दी हो जाती है या सम्बन्ध अच्छा मिल जाता है तो गलत ही माना जा सकता है,खूब पढ लिख कर अगर सम्बन्ध अच्छा बन जाये पत्नी मन या पति मनचाहा मिल जाये तो भी गलत बात ही मानी जाती है,शादी सम्बन्ध हमेशा संस्कारों से पूर्व के कृत पाप पुन्य से और समाज आदि के द्वारा समर्थन से ही सही मिलते है। प्रस्तुत कुंडली वृश्चिक लगन की है.मंगल इस कुण्डली मे लगनेश है और सप्तमेश शुक्र बुध के साथ तीसरे भाव मे विद्यमान है,शुक्र को कुंडली के अष्टम मे बैठा राहु मारक द्रिष्टि से देख रहा है। राहु ने चन्द्रमा को भी ग्रहण दिया हुया है और अपनी नवी द्रिष्टि से सूर्य को भी ग्रहण दिया है। सूर्य चन्द्र को ग्रहण देने के बाद राहु से वक्री गुरु का सम्बन्ध भी बन गया है। वक्री गुरु ने भी सूर्य को असर दिया है। गुरु मार्गी होना ही सम्बन्ध का उत्तम रूप से फ़लदायी माना जाता है,गुरु के मार्गी होते ही जातक के अन्दर स्वार्थी भावना आजाती है वह सम्बन्ध को नफ़ा नुकसान के रूप मे सोचने लगता है,कारण वक्री गुरु का प्रभाव जीवन मे नर संतान नही देने अथवा देने के बाद भी नर संतान का सुख नही देने के लिये माना जाता है। शनि और मंगल के बारे मे भी अगर देखा जाये तो शनि भी कन्या राशि का होकर वक्री है और मंगल भी कन्या राशि मे वक्री हो गया है मंगल पौरुष का कारक है और शनि मेहनत करने वाले कामो का कारक है जातक के अन्दर जब पौरुष ही नही होगा तो वह मेहनत वाले कामो को नही कर पायेगा। इस प्रकार से जातक के अन्दर मेहनत वाले कामो को नही करने से दिमागी बुद्धि का विकास अधिक हो जायेगा और वह अपने को हर सीमा मे बुद्धिमान समझने की कोशिश करेगा जिस समाज या परिवार से वह शादी विवाह की बात को चलाने की कोशिश करेगा उसी समाज या परिवार से अति आधुनिकता मे होने के कारण या विदेशी परिवेश मे रहने या नियमो को अपनानेके कारण भी समाज या परिवार शादी विवाह के लिये हिचकिचायेगा।शुक्र के बारे मे भी कहा जाता है कि जब यह बुध के साथ मकर राशि का तीसरे भाव मे होता है तो जातक के पास शादी विवाह के प्रपोजल खूब आते है लगता भी है कि शादी हो जायेगी लेकिन बात किसी न किसी बात से टूट जाती है अक्सर सोच यह भी होती है कि पत्नी काम करने वाली हो और वह घर संभालने के साथ साथ कमाई भी करे। केतु जिन साधनो से परिवार को आगे बढाने की कोशिश करता है राहु उन्ही साधनो की पूर्ति से परिवार को छोटा करता चला जाता है। जातक के रिस्ते की दो बाते चलेंगी लेकिन एक बात इस साल मे अगर बैठ भी जाती है तो वह किसी न किसी बात से टूट भी सकती है इस कारण को दूर करने के लिये अपने को अपनी मर्यादा समाज और परिवार के बारे मे खुल कर बात करनी चाहिये,विदेशी नीति रीति या अधिक आधुनिकता है तो उसे त्यागने मे ही भलाई है.राहु के द्वारा सूर्य और चन्द्र को ग्रहण देने की नीति से दूर रहने के लिये जातक को अपने पूर्वजो के प्रति श्रद्धा रखकर महिने या साल मे उनके नाम से किसी न किसी धर्म स्थान पर उनकी मान्यता का ध्यान भी रखकर अपने जीवन के क्षेत्र को आगे बढाने का प्रयास करते रहना चाहिये.मित्रो आप को भी कोई परेशानी है तो आप अपनी  कुंडली दिखाकर उपाय चाहते हैं तो आप हम से संपर्क कर सकते हैं हमारी सेवा सशुल्क है 7597718725/941448132paytm no 7597718725

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

देवी देवताओं के आसनों ओर वाहनों आ्का रहस्य और विज्ञान

हिन्दू धर्म में सभी देवी-देवताओं का अलग-अलग वाहन होता है। इसके अलावा हिन्दू पुराणों में यह भी बताया गया है कि कौन से देवी-देवताओं को कौन सा भोजन या फूल सबसे प्रिय है। जिसके आधार पर हम उनकी आराधना करते है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि सभी भगवान का अलग-अलग वाहन क्यों होता है। तो आइए जानते है कि किस भगवान का वाहन क्या है और क्यों
हिन्दू देवी देवताओं में प्रत्येक देवी देवता के लिये एक निश्चित सवारी का दिखाया जाना एक प्रकार से साधना के प्रथम रूप का वर्णन किया जाना माना जाता है। जिस देवता या देवी की साधना की जाती है वह उसकी सवारी के अनुरूप ही माना जाता है।
दुर्गा की सवारी शेर को दिखा गया है,दुर्गा भक्ति के लिये अपनी प्रकृति को शेर की प्रकृति से जोड कर रखा जाता है। दुर्गा को शक्ति का स्वरुप माना जाता है। और मां की सवारी सिंह होता है, सिंह स्वयं शक्ति, बल, पराक्रम, और क्रोध का कारक होता है। शेर की यह सभी विशेषताएं मां दुर्गा के स्वभाव में मौजूद हैं। मां दुर्गा की हुंकार भी शेर की दहाड़ की ही तरह इतनी तेज है, जिसके आगे कोई भी आवाज सुनाई नहीं देती।दुर्गा की भक्ति को मन्दिर मे या घर के अन्दर नही किया जा सकता है उनकी भक्ति के लिये जंगल पहाड और निर्जन स्थान कन्दरा आदि को अपनाया जाता है।
भोलेनाथ बहुत शक्तिशाली होने के बावजूद बहुत शांत और संयमित रहते है। नंदी बैल भगवान शिव का वाहन है, उनके गणों में वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। बैल बहुत ताकतवर और शक्तिशाली होने के बावजूद शांत रहते हैं जो की भोलेनाथ के स्वभाव में दिखता है। इसके अलावा नंदी के चार पैर हिन्दू धर्म के चार स्तंभ, क्षमा, दया, दान और तप के प्रतीक हैं। नंदी सफेद रंग का बैल है जो स्वच्छता और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। इसी प्रकार से जब शिव की भक्ति को करना होता है तो अपने को इस टप्रकार के स्थान पर ले जाना होता है जहां केवल सन्नाटा हो कोई वनस्पति और जीवित कारक आसपास नही हो साथ ही बाघम्बर बिछाने और भभूत लपेटने का अर्थ भी एक प्रकार से यही माना जाता है कि शिव की साधना के लिये शव यानी मृत मानना जरूरी हो जाता है बिना अपने को मृत माने शिव की साधना नही हो पाती है,निराकार मे साकार का प्रवेश होना उन्ही लोगो के लिये देखा जा सकता है जो अपने को कुछ नही मानते जो अपने को अहम के अन्दर ले कर चलते है वे शिव भक्ति कभी नही कर सकते है।
मूषक का अर्थ चूहा होता है, भगवान गणेश को बुद्धि के देवता माना जाता है। और उनकी सवारी चूहा है, दरअसल चूहा हर चीज को कुतर देता है, बह बिना सोचे समझे हर कीमती चीज़ या अनमोल चीज को कुतर देता है, वह उसे नष्ट कर देता है। इसी तरह बुद्धिहीन और कुतर्की व्यक्ति भी बिना सोचे-समझे, अच्छे-बुरे हर काम में बाधा उत्पन्न करते हैं। श्री गणेश ने मूषक पर सवारी कर कुतर्कों और अहित चाहने वाले लोगों को वश में किया है। गणेश भक्ति के लिये अपने को चूहा की प्रकृति मे ले जाना पडता है जैसे चूहा अपने को सुरक्षित रखते हुये सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नही करता है वह किसी भी बडे अबलम्ब के किनारे चलने और अपनी सुरक्षा को रखते हुये चलता है,तथा एकान्त और ऐसे स्थान पर अपने निवास को बनाता है जो किसी आम जीव की पहुंच से दूर हो एक प्रकार और भी देखा जाता है कि गणेश भक्ति मे अक्सर बाधा आती है उन बाधाओ से बचने के लिये चूहा अपने निवास के आसपास या माहौल मे अपने को एक से अधिक रास्ते जिस प्रकार से प्रयोग करने की युक्ति को बनाकर चलता है उसी प्रकार से गणेश भक्ति को करने वाले लोग अपने को एक ही सिद्धान्त पर लेकर नही चल पाते है उनके लिये कई प्रकार के रास्ते बनाने पडते है और एक रास्ता बन्द हो जाने पर दूसरा रास्ता उन्हे अपने आप चुनना पडता है।
विष्णु को गरुण की पीठ पर सवार होता हुआ दिखाया गया है,भगवत् गीता में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु के भीतर ही समस्त सृष्टि का निवास है, वे सबसे ताकतवर हैं। गरुड़ देव को भी अधिकार और दिव्य शक्तियों से लैस दर्शाया गया है इस वाहन से शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति अपने को दूर गामी और ऊंचाई पर लेजाकर नजर सभी कारको पर रखे और सयंत होकर अपने को आसपास के माहौल मे रखकर एकात्मक रूप से वायु प्रधान होकर यानी निराकार होकर साकार को दिष्टि मे रखकर चलता रहे। विष्णु को शेष शैया पर होना और शेषनाग का समुद्र मे होना भी एक प्रकार से शिक्षा देने वाला होता है कि गहरे पानी यानी मन के अन्दर गहरे विचार पैदा करने के बाद भी अपने आसपास के माहौल को मुलायम और जीविन्त रखकर उन विचारो का एक से अधिक कारण पैदा करने के बाद ही रहा जा सकता है।
उसी प्रकार से कार्तिकेय जी की मोर के ऊपर सवार होने का कारण भी बताया गया है । मोर चंचलता का प्रतीक है और उसे अपना वाहन बनाना इस बात को दर्शाता है कि कार्तिकेय ने अपने मोरे रूपी चंचल मन को अपने वश में कर लिया है।ओर  मोर स्वयं द्रष्टा होता है वह अपने को सयंत रखकर भी जब मुदित होता है तो अपने पंखो को फ़ैला कर नाचना शुरु करता है और जगत कल्याण की भावना से यह समझा जाता है कि जीव की पूर्ति का साधन पानी बरसना तय होता है उसी प्रकार से जब किसी प्रकार की गलत शक्ति की आहट होती है तो मोर चिल्लाना शुरु कर देता है,इस कारण को सूक्ष्म रूप से समझे जाने पर पता चलता है कि सुन्दर और समृद्ध होने पर स्थिति को समझने की शक्ति भी होनी जरूरी होती है इसके साथ ही विष को भोजन करने के बाद भी मोर का कुछ नही बिगडता है कारण उसके अन्दर पराशक्तियों की इतनी गर्मी होती है कि वह मोर कंकडी जैसे पत्थर को खाकर भी अपने जीवन को चलाते रहने के लिये माना जाता है। सांकेतिक भाषा में हंस जिज्ञासा और पवित्रता का प्रतीक कहा जा सकता है।
ज्ञान की देवी सरस्वती को हंस से बेहतर और कोई वाहन मिल भी नहीं सकता था। मां सरस्वती का हंस पर विराजित होना इस बात को दर्शाता है कि ज्ञान के जरिए ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है।इसी प्रकार से सरस्वती का वाहन हंस भी पानी का राजा कहा जाता है वह अपने ही माहौल मे रहना पसंद करता है तथा वह भूखा रह सकता है लेकिन भोजन मे मोती ही उसकी क्रियाशैली मे माने जाते है,अपने को स्माधिस्थ भी रखता है और अपने कार्य को भी करता रहता है।
लक्ष्मी का वाहन उल्लू बताया जाता हैउल्लू शुभता और संपत्ति का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि अत्याधिक धन-संपदा को प्राप्त कर व्यक्ति उल्लू (बुद्धिहीन) हो जाता है। इसलिए देवी लक्ष्मी और उल्लू साथ-साथ चलते हैं। उल्लू दिन में नहीं देख पाता, वह रात का जीव है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि लक्ष्मी जी की कृपा व्यक्ति को अंधकार से मुक्त कर सकती है।
 इसका एक ही कारण होता है कि लक्ष्मी उसी के पास आती है जब संसार सोता है और उल्लू जागता है की नीति से अगर काम किया जाता है तो वह लक्ष्मी प्राप्त करने के लिये अपनी गति को बना लेता है। यानी जब सब सोते है तब उल्लू जागता है और जब सब जागते है तब उल्लू सोता है। उसी प्रकार से कमल के फ़ूल पर लक्ष्मी के विराजमान होने का भान यही माना जाता है कि जैसे ही सूर्य उगता है कमल का फ़ूल खिल जाता है यानी जैसे ही सूर्य उदय हो और व्यक्ति अपने को संसार मे फ़ैलाना शुरु कर दे यानी देर तक सोना और रात को देर से सोना भी व्यक्ति को अकर्मण्य बना देता है लक्ष्मी उसके पास नही रहती है।
इसी प्रकार से तकनीकी रूप बुद्धि को प्रदान करने वाले मंगल की सवारी मेढा को बताया गया है इस जीव की यह बात मानी जाती है कि तकनीकी रूप से बुद्धि को विकसित करने के लिये खोपडी मजबूत होनी चाहिये तथा दिमाग को सबल रखना चाहिये आदि बाते देवी देवताओं की सवारी से जोड कर देखी जा सकती है। आदि आचार्य राजेश

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

मैं अपने जीवन में रिचहोना चाहता हूँ। और पूरी तरह से मेरे सभी उद्देश्य कव पुरे होंगे

मैं अपने जीवन में रिचहोना  चाहता हूँ।  और पूरी तरह से मेरे सभी उद्देश्य कव पुरे होंगे

कल सपने के बारे मे लिखा था,आज भी यही प्रश्न सामने है कि मै धनी बनना चाहता हूँ.सपना धन का,बहुत ही महत्वपूर्ण बात है,जिसे देखो इसी प्रकार का सपना लेकर चल रहा है.चौथा आठवा और बारहवा भाव इच्छाओं का कहलाता है लेकिन इच्छा पूर्ति के लिये इन तीनो भावो के ग्यारहवे भाव भी बली होने जरूरी है,इस जातक की कुंडली मे चौथे के ग्यारहवे यानी दूसरे भाव मे भी कोई ग्रह नही है,आठवे के ग्यारहवे में केवल सूर्य लगनेश और शुक्र जो तृतीयेश और कार्येश है विद्यमान है,बारहवे भाव के ग्यारहवे भाव मे भी कोई ग्रह नही है इस प्रकार से एक बात और भी जानी जा सकती है कि चौथा भाव खाली है,केवल आठवे भाव मे और बारहवे भाव मे ही मंगल और चन्द्रमा है। चन्द्रमा केवल सोच को देने वाला है और मंगल हिम्मत को देने वाला है.चौथा भाव पूर्वजो से प्राप्त सम्पत्ति की सोच से आगे बढने वाला होता है आठवा भाव खुद के द्वारा परिश्रम करने के बाद नौकरी या सेवा वाले काम करने के बाद प्राप्त करने वाले धन के प्रति सोच कर आगे बढने के लिये माना जाता है और दसवा भाव जो कार्य बडी विद्या को लेकर किये गये होते है के लिये माना जाता है। जातक की प्राथमिक विद्या में बुध वक्री होकर विराजमान है यानी प्राथमिक विद्या मे भी बदलाव हुया है ऊंची विद्या मे शनि विराजमान है जो केवल करके सीखने के लिये ही अपनी शक्ति को प्रदान करता है डिग्री लेने या अन्य प्रकार के कारण पैदा करने के बाद विशेषता हासिल करने के लिये नही माना जाता है,इसके बाद जो किसी विषय मे अलावा योग्यता के लिये देखा जाता है वह दूसरे भाव से देखना जरूरी है,लेकिन यह भाव भी खाली है.गुरु राहु की नवम पंचम युति को अक्सर फ़रेबी सम्बन्धो के लिये भी माना जा सकता है,जातक के दिमाग मे वही कारण पैदा होंगे जिससे वह फ़रेब से सम्बन्ध बनाकर धन कमाने के लिये अपनी इच्छाओं को पालेगा। धनु राशि का बुध अगर वक्री होता है तो वह उल्टे कानून बनाकर अपने कार्यों को लेकर चलने वाला होता है,केतु शनि और वक्री बुध की आपसी युति बन जाती है तो जातक कानून को अन्धेरे मे रखकर सत्ता या राजनीति का बल लेकर धन कमाने के लिये अपनी इच्छा को जाहिर करता है। लेकिन शनि जब भी किसी भी ग्रह को दसवी और चौथी नजर से देखता है तो वही ग्रह शनि की वक्र नजर से आहत हो जाते है। बारहवा चन्द्रमा नवी शनि से आहत है,छठे भाव के शुक्र और सूर्य दोनो ही इस शनि की दसवी नजर से आहत है। बारहवा भाव खर्च करने का मालिक भी है चन्द्रमा के बारहवे भाव मे होने से जातक मानसिक सोच को खर्च करने के लिये अपनी युति को देता है,इस चन्द्रमा की योग्यता से यह जिस भाव मे अपना गोचर करता है उसी को खर्च करने का मानस बना रहता है,जिस ग्रह के साथ रहता है उसी ग्रह की कारक वस्तुओ को खर्च करने के लिये माना जा सकता है। मंगल का प्रभाव भी इसी प्रकार से माना जाता है यह जिस भाव मे गोचर करता है उसी के प्रति अपनी मारक सोच रखता है,मीन राशि का मंगल होने के कारण अक्सर दिमागी झल्लाहट क भी प्रयोग करने के लिये माना जाता है,साथ ही यह मन्गल जन्म के जिस ग्रह के साथ अपना गोचर करेगा वह ग्रह भी मंगल की तपिस से नही बच पायेगा। राहु की सिफ़्त के अनुसार वह जिस भाव मे अपना गोचर करेगा उसी ग्रह या भाव से अपनी साझेदारी प्रकट करना शुरु कर देगा,वह साझेदारी किसी भी क्षेत्र से अच्छे या बुरे किसी भी कारण से हो सकती है केतु का स्वभाव अपनी उपस्थिति को देने है यह जिस भाव मे जिस ग्रह के साथ अपना गोचर करेगा वह अपनी उपस्थिति उसी भाव या राशि या ग्रह के अनुसार प्रदर्शित करना शुरु कर देगा। इस प्रकार से सूर्य और शुक्र के छठे भाव मे होने से साल के बारह महिनो मे जातक बारह प्रकार के कार्य सम्बन्धी बदलाओ को भी करेगा और जिस भी कार्य या स्थान मे हाथ डालने की कोशिश करेगा वह उसी से मानसिक और कार्य शत्रुता को अपने अन्दर बैठा लेगा.गुरु जो सम्बन्धो का कारक है जिस भाव राशि या ग्रह के साथ गोचर करेगा उसी भाव ग्रह के साथ व्यापारिक भाव पैदा कर लेगा,इस प्रकार से धन का कारक बुध जो वक्री है वह आयेगा तो लेकिन उल्टी गति से आकर वापस चला जायेगा। मित्रों आप भी अपनी कुंडली दिखाकर अपनी परेशानी का उपाय चाहते हैं तो आप हमारे नम्वरो पर सम्पर्क कर सकते हैं हमारी सेवा सशुल्क है आचार्य राजेश

रविवार, 28 जुलाई 2019

घनी(अमीर )बनने का स्वप्न

यह पोस्ट उन मित्रों के लिए जो  ज्योतिष सीख रहे हैं पोस्ट को पढ़ कर शेयर करें ताकि दुसरे भी लाभ ले सकें
घनी(अमीर )बनने का स्वप्न

जीवन स्वप्न के रूप मे ही समझा बेहतर होता है लोग अपने अपने अनुसार स्वप्न बुना करते है और उन स्वप्नो को पूरा करने के लिये अपनी अपनी युक्तियां लगाया करते है उद्देश्य केवल चार ही होते है जो पुरुषार्थ के रूप मे माना जाता है,धर्म अर्थ काम और मोक्ष यही चार पुरुषार्थ है। धर्म की तरफ़ जाने से जातक अपने आप को आगे दुनिया मे दिखाना चाहता है,वह दिखावा भले ही शरीर की बनावट से हो या शरीर के द्वारा किये जाने वाले करतबो से हो वह चाहे शरीर की विशेष क्रिया के द्वारा भगवान के प्रति अपने को दिखाना चाहता हो या वह अपने को खुद ही ईश्वर बनाकर दिखाने की चेष्टा मे हो। अर्थ के मामले मे जातक अपने को अधिक से अधिक धनी बनाने के लिये युक्तियां बनाया करता हो या अपने को हर प्रकार का साधन धन से प्राप्त करने की योजना मे लगा रहता हो,चमक दमक से अपने जीवन को सभी के सामने प्रस्तुत करने के लिये भी आर्थिक रूप से बढावा देने के लिये माना जाता हो,इसी प्रकार से काम नाम के पुरुषार्थ की बढोत्तरी के लिये वह लोगो से अपने कार्यों को सिद्ध करने की कला को प्रस्तुत करना जानता हो अपने साथ समाज को भी साथ लेकर चलने के लिये अपनी योजनाओ को बनाया करता हो या अकेले मे अपने जीवन साथी और पुत्र पुत्री आदि सन्तान के रूप मे अपने आप को आगे बढाने के लिये प्रयास रत हो आदि बाते काम नामक पुरुषार्थ की श्रेणी मे आती है इसी प्रकार से जब व्यक्ति इन तीनो प्रकार के पुरुषार्थो को या तो प्राप्त कर चुका हो या उनके प्रति लगाव खत्म हो गया हो अथवा इतना भोग लिया हो कि वह बुरा लगने लगा हो या फ़िर अपने परिवार समाज या रीति रिवाज घर परिवार मे वह किसी बात से हमेशा ही तरसता रहा हो इसी के नाम को मोक्ष का प्रकार का कहा जाता है। मोक्ष का मतलब होता है सन्तुष्ट हो जाना,घनु लग्न की कुंडली हैं इस कुंडली में चौथा आठवा और बारहवा भाव जीवन की संतुष्टि के लिये की जाने वाली इच्छाओं के लिये माना गया है।धनु लगन है,लगनेश गुरु चौथे भाव मे है,गुरु का पंचम नवम योग राहु से अष्टम भाव मे है और जातक का बारहवा भाव खाली है। जातक का यह त्रिकोण पूरा नही है केवल चन्द्रमा से इस त्रिकोण को महिने मे सवा दो दिन के लिये पूरा किया जाता है,यह कारण जातक की इच्छा की तृप्ति के लिये अपनी कमी को बता रहा है।इच्छा की तृप्ति क्यों पैदा हो रही है इस बात को जानने के लिये जातक के दादा पिता माता नाना आदि की इच्छाओं की तृप्ति के लिये भी देखना जरूरी है जातक के किस सम्बन्धी की इच्छा की तृप्ति हो रही है,इस बात का विवेचन इसलिये जरूरी होता है क्योंकि जातक को इच्छाओं की तृप्ति के लिये सोच केवल अपने परिवार से ही प्राप्त हुयी होती है वह अलग से लेकर नही आता है। दादा के लिये जातक के राहु को देखेंगे,राहु के बारहवे भाव मे शुक्र है,राहु के चौथे भाव मे मंगल वक्री है,राहु का अष्टम भाव खाली है,इसका मतलब है कि दादा की उन्नति के कारण उनके पिता थे और शादी के बाद दादा के जीवन को उनकी पत्नी यानी दादी ने सम्भाल लिया था (बारहवा शुक्र).दादा की मानसिक इच्छा एक व्यवसायिक स्थान बनाने की थी लेकिन वह व्यवसायिक स्थान निर्माण मे अधूरा रह गया (वक्री मंगल तुला राशि का),जातक के दादा मे रिस्क लेने जोखिम लेने पूर्वजो के ऊपर ही अपने को निर्भर करने जितना कमाना और उतना ही खर्च लेना की आदत से उनकी इच्छायें पूरी नही हो पायीं (राहु से अष्टम भाव खाली कुम्भ राशि). पिता के लिये देखने के लिये सूर्य की स्थिति को देखते है,सूर्य से बारहवे भाव मे गुरु है सूर्य से चौथे भाव मे राहु है और सूर्य से अष्टम में कोई भी ग्रह नही है,इस प्रकार से जातक के पिताजी तीन भाई और तीन भाइयों मे जातक के पिता का स्थान बडप्पन के स्थान मे होने से तथा जातक के पिता के द्वारा अपने परिवार का पालन पोषण शिक्षा विवाह शादी आदि करने मे अपने धन को लगाया गया,चौथे भाव मे राहु के होने से जो भी कमाया गया वह किसी न किसी कारण से आक्समिक रूप से खर्च कर दिया गया और अपने नाम को कमाने के चक्कर मे या सामाजिक मर्यादा को दिखाने के चक्कर मे सयंत नही रखा गया,पिता का भी अष्टम खाली होने के कारण पिता मे भी जोखिम लेने की आदत नही थी जो भी हो रहा है सीधे से होने और सीधे से चलने मे ही विश्वास था। जातक की माता के लिये देखते है तो चन्द्रमा के चौथे भाव मे गुरु है,जातक की माता पूजा पाठ धर्म कर्म आदि से पूर्ण थी और अपने घर मे ही सामाजिक संगठन आदि के लिये अपने अनुसार कार्य करती थी उनका ध्यान धर्म संस्कृति और लोगो के साथ उच्चता मे जाने का था बडे समुदाय के रूप मे उन्होने भी अपने पति के परिवार के लिये कार्यों मे योगदान दिया,तीन लोगो की परवरिस और उन्हे आगे बढाने की योग्यता प्रदान की,माता के अष्टम मे राहु होने से जातक की माता को अक्समात रिस्क लेने की आदत थी वह किसी भी प्रकार से अपने को सोच विचार कर कार्य करने के लिये नही जाना जाता है,सभी कुछ सामने होने के बाद भी वह केवल आकस्मिक सोच के कारण नही प्राप्त कर पायीं। यही बात जातक के नाना के लिये देखने पर केतु से बारहवे भाव मे चन्द्रमा के होने से जातक के नाना का प्रभाव धर्म और पराशक्तियों की सहायता से अच्छा था वे बडे धार्मिक स्थानो और धार्मिक लोगो के लिये अपने विचार सही रखते थे लेकिन उनके चौथे भाव मे सूर्य बुध शनि के होने से जातक के नाना के पास घर मे वही काम थे जो सुबह शाम किये जाते है और अक्सर उनके पास केवल पिता के दिये गये कार्य और सरकार आदि से मिलने वाली मामूली सहायता को ही माना जा सकता है उन्होने भी अपनी तीन सन्तानो को आगे बढाने पढाने लिखाने मे खर्च किया,केतु से अष्टम भाव खाली होने से भी जातक के नाना को भी रिस्क लेने और जोखिम लेने की आदत नही थी इस कारण से वे भी अतृप्त रह गये।

इस प्रकार से जातक के लिये भी जातक की माता की तरह से ही बारहवे भाव के त्रिकोण को पूरा करने के लिये किये जाने वाले खर्चे जीवन को संयत बनाने के लिये आहार विहार और जो भी आकस्मिक प्राप्त होता है उसे छठे भाव को भरने के लिये जमा करने और रोजाना के कार्यों मे सोचने से अधिक कार्य करने अपने जीवन को खाने पीने और दोस्त आदि के लिये कार्य करने कमन्यूकेशन के साधनो को केवल काम तक ही सीमित करने के लिये अक्समात ही बीमार आदि होने से बचने के लिये अन्जान स्थान के रिस्क लेने वाले कारण अथवा गुपचुप रूप से शिक्षा वाले समय को गंवाने आदि के लिये माना जा सकता है। अगर जातक अष्टम राहु का उपयोग उसी प्रकार से करे जैसे बिजली को प्रयोग करने के लिये उसके उपयोग को जानना,अगर जातक अपने द्वारा किये जाने वाले खर्चो से अपने को संभाल कर रखे तो जातक को धनी बनाने से कोई नही रोक सकता है। मित्रों अगर आप अपनी कुंडली दिखाकर उपाय चाहते हैं तो ही आप संपर्क करें क्योंकि हमारी सारी सेवाएं सशुल्क  है

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

गगन लहरी योगगगन लहरी योग

गगन लहरी योग
यह पोस्ट उन मित्रों के लिए जो ज्योतिष सीख रहे हैं  पोस्ट को पढ़ कर शेयर करें ताकि दुसरे भी लाभ  ले सकें।   
 जब कुंडली मे सभी ग्रह एक तीन नौ और दसवे भाव मे इकट्ठे हो जायें तो गगन लहरी योग का निर्माण हो जाता है। ऐसा जातक गेंद की तरह से सारी उम्र एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता रहता है और एक गेंद की भांति उसका आस्तित्व एक स्थान पर नही बन पाता है। प्रस्तुत कुंडली मे सूर्य बुध पहले भाव मे है बुध आदित्य योग का निर्माण तो हो रहा है लेकिन बुध के वक्री होने पर वह खुद के द्वारा आदेश से काम नही करवा कर दूसरे के आदेश से काम करने वाला होता है,वह खुद कानूनो का पालन नही करने के बाद दूसरो को कानून का पालन करने का आदेश देता है,वह दूसरो को केवल कुछ शब्दो में सुनता है और उसका जबाब विस्तृत रूप मे लोगो को देता है,अक्सर कन्या संतान या बहिन बुआ से बनती नही है या होती ही नही है। पिता का कानूनी मामले मे या समाज संगठन मे वर्चस्व रहा होता है,पिता के खुद के लोग ही जड काटने के लिये माने जाते है पिता का कानून से काम करवाना या कानून का पालन करवाना या धन आदि के मामले मे दूसरो की सहायता करना और एक समय मे उसी धन आदि के लिये दूसरो पर कानून का इस्तेमाल करना आदि भी पाया जाता है। इस प्रकार के जातक अक्सर बोलने के लिये कार्य करने के लिये स्थान स्थान पर यात्रा करते रहते है,अक्सर राहु जिस ग्रह के साथ या जिस भाव मे होता है जातक को उसी क्षेत्र मे अपने नाम और यश कमाने के लिये योग्यता का निर्माण करना पडता है,या तो जातक मानसिक रूप से अपने को आकासीय कारणो मे विचरण करने के लिये माना जाता है या किसी प्रकार मीडिया या सम्पादन मे छुपे भेद खोलने के लिये काम करना पडता है या फ़िर यात्रा आदि के कामो मे उसे लगातार लगा रहना होता है नवे भाव के ग्रहो के अनुसार उसे अपने जीवन को चलाना पडता है,अगर नवे भाव मे कानून या धर्म से सम्बन्धित ग्रह होते है तो कानून और धर्म आदि के बारे मे बाते करता है और उन्ही के द्वारा कन्ट्रोल होकर चलने के लिये मजबूर होता है,इस कुंडली मे गुरु के वक्री होने पर जातक को अपने देश या माहौल से दूर रहकर दूसरे देश या माहौल के लिये ही काम करना होगा,एक समस्या या एक कारण को कई रूप मे विवेचन करने के लिये उसे काम करना होगा,उसे काम करने का एक संयत क्षेत्र नही मानना होगा वह केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति तक ही काम करेगा,इसके अलावा वह राहु के मीन राशि मे और शनि तथा शुक्र के साथ होने से विश्व की तीन बडी कम्पनियों के सानिध्य मे उन्ही के आदेश से अपने जीवन को निकालने वाला होगा। उसके खरी बोलने की आदत को यही काम करने वाली कम्पनिया या विचार राहु शनि शुक्र के रूप मे मंगल और चन्द्रमा को कन्ट्रोल करेंगे जैसे इस जातक के दसवे भाव मे मंगल और चन्द्रमा है जो जातक के लिये बेलेन्स बनाकर तकनीकी काम करने के लिये अपनी युति को देते है लेकिन जातक राहु शनि और शुक्र की युति से अपने खरे बोलने के प्रभाव को खुद के लिये व्यापारिक नीति से काम करने के लिये अपनी युति को प्रदान करने के बाद कन्ट्रोल करने के लिये माना जायेगा। अगर जातक किसी प्रकार के छोटी यात्रा वाले काम करता है या किसी प्रकार से किसी ऐसे संस्थान के लिये काम करता है जो दूसरो को कुछ समय के लिये या हमेशा के लिये बन्धन वाले या कानूनी कारण पैदा करते है उनके ऊपर भी ऊपर का अंकुश उसे अपने मर्जी से काम नही करने देगा। जातक को पैदा होने से लेकर मृत्यु पर्यंत तक इधर से उधर ही रहना होगा या आना जाना पडेगा। किसी भी प्रकार से उसे विदेश आदि जाने मे दिक्कत नही होगी,जहां लोग विदेश आदि मे जाने के लिये तमाक कानूनी कार्यवाही मे उलझे रहेंगे जातक एक ही प्रयास मे विदेश आदि जाने के लिये अपनी शक्ति का प्रयोग करने के माना जायेगा। मित्रों अगर आप भी अपनी कुंडली दिखाना चाहते हैं तो आप हमारे नम्वरो पर सम्पर्क कर सकते हैं हमारी सेवा सशुल्क है

सोमवार, 15 जुलाई 2019

चंद्र ग्रहण

चंद्र ग्रहण पर विशेषचंद्र ग्रहण पर विशेष
16-17 जुलाई को आषाढ़ पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण लगेगा। ग्रहण वाले दिन गुरु पूर्णिमा भी है।
यह ग्रहण खण्डग्रास चंद्र ग्रहण होगा। इससे अलावा इस ग्रहण में ही सावन महीने की शुरुआत भी होगी। 16 जुलाई की रात 1.31 बजे ग्रहण का स्पर्श होगा, मध्य तीन बजे व मोक्ष रात 4.30 बजे होगा। यह चंद्र ग्रहण भारत में कुल मिलाकर 2 घंटे 59 मिनट होगा। चंद्र ग्रहण धनु राशि और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में होगा।ज्योतिषीय दृष्टिकोण से लंबी अवधि तक दिखाई देने वाला यह चंद्रग्रहण भारत सहित पाकिस्तान, मध्य-एशिया और दक्षिण-अमेरिका के लिए विशेष रूप से अशुभ साबित हो सकता है। ग्रहण के समय चंद्रमा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में होकर धनु और मकर दोनों राशियों को प्रभावित करेंगे। अग्नि तत्व की राशि धनु के अंतिम अंशों से शुरू होकर यह चंद्रग्रहण मकर राशि के शुरुआती अंशों को पीड़ित करता हुआ बेहद तीव्र रूप से फल देने वाला होगाइस क्रम में चंद्रग्रहण के नौ घंटे पूर्व 16 जुलाई को सूतक लगने के कारण शाम 4:30 से मंदिरों के कपाट बंद हो जाएंगे। ग्रहण के दौरान नकारात्मक शक्तियां ज्यादा हावी रहती हैं, हमारे ज्योतिष शास्त्रों ने चंद्रमा को चौथे घर का कारक माना है. यह कर्क राशी का स्वामी है. चन्द्र ग्रह से वाहन का सुख सम्पति का सुख विशेष रूप से माता और दादी का सुख और घर का रूपया पैसा और मकान आदि सुख देखा जाता है.
  जन्म कुंडली में यदि चन्द्र राहू या केतु के साथ आ जाये तो वे शुभ फल नहीं देता है.ज्योतिष ने इसे चन्द्र ग्रहण माना है, यदि जन्म कुंडली में ऐसा योग हो तो चंद्रमा से सम्बंधित सभी फल नष्ट हो जाते है माता को कष्ट मिलता है घर में शांति का वातावरण नहीं रहता जमीन और मकान सम्बन्धी समस्या आती है.चन्द्र ग्रहण योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है,चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है,माँ के सुख में कमी आती है, कार्य को शुरू करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना लक्षण हैं, फोबिया,मानसिक बीमारी, डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया,इसी योग के कारण माने गए हैं, मिर्गी ,चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है.
—-चन्द्र+केतु ,सूर्य+राहू ग्रहण योग बनाते है..इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं ।।
कुंडली चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं । चूँकि चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी विशेष नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है  मित्रों आप की कुंडली में भी चंद्र ग्रहण दोष है तो आप मुझसे या किसी अच्छै astrologer से मिलकर कल उपाय करें यह आपके लिए इस बेस्ट रहेगा

शुक्रवार, 28 जून 2019

कुछ करनी कुछ कर्म का फेर


मीन राशि की कुंडली है और गुरु वक्री होकर ग्यारहवे भाव मे मकर राशि का होकर बैठा है। मकर राशि के अन्दर अगर गुरु वक्री हो जाता है तो वह अपनी नीचता को दूर करने के बाद उच्चता मे आ जाता है। लेकिन जो अन्य ग्रह गुरु पर असर देने वाले होते है उनसे गुरु के स्वभाव मे परिवर्तन होना माना जाता है। चौथे भाव मे शनि विराजमान है और वह गुरु को अष्टम नजर से देख रहा है। माता के भाव से अष्टम मे गुरु होने से जातक को परदेशी या परदेश वास के लिये अपनी युति को देता है,साथ ही जातक के अन्दर अपने स्वभाव को वक्री करने के कारण जो भी कार्य समाज धर्म आदि होता है उससे अपने को केवल कर्म की मान्यता को मानने वाला भी होता है,चन्द्र लगनेश के द्वारा शनि केतु को छठे प्रभाव से देखने के कारण जातक की माता को अस्वस्थ माना जाता है। चौथा शनि अक्सर केतु के साथ होने से कंटक ढैया के नाम से भी जाना जाता है यह कंटक ढैया उन्ही कारको को प्रभावित करती है जो कारक ग्रह या भाव के रूप मे शनि की नजर में होते है। इस कुंडली मे शनि पहले तो अपने बैठने वाले स्थान को जडता दे रहा है,शनि एक पत्थर की भांति केतु की शक्ल मे लम्बा बनाकर शनि यानी ठंडी और निवास के स्थान मे केवल कमन्यूकेशन के कारणो से पूर्ण होने के बाद व्यक्ति को लम्बा लिटाने के लिये माना जाता है। शनि के साथ केतु होने से जिस कारक मे वह अपना असर देता है उसी कारक को नकारात्मक कर देता है,जैसे इस कुंडली मे शनि चौथे भाव मे है और वह चौथे भाव की कारक वस्तुओ जीवो को अपने अनुसार फ़्रीज कर रहा है,उन्हे सहारा देने के लिये शनि अपने पराक्रम को चौथे भाव से अपने तीसरे स्थान यानी छठे भाव को देख रहा है उस भाव मे शुक्र के स्थापित होने के कारण और शुक्र का राज्य की राशि मे स्थापित होने के कारण तथा सिंह राशि को सन्तान की कारक होने के कारण पुत्री सन्तान को या पुत्र की पत्नी को अपनी सेवा के लिये अपने को आगे पीछे खिसकाने को या अपने लिये कोई सहायता लेने के लिये जरूरत मे मानता है। यह स्थान शुक्र के छठे भाव मे होने के कारण नौकरानी के लिये भी माना जाता है,और जातक की माता के लिये नौकरानी की भी जरूरत पडती है इसके साथ ही यह स्थान बीमारी का होने के कारण और बीमारी के वक्त तीमारदारी करने के लिये भी अपनी गति को प्रदान करता के प्रति माना जाता है। शनि की निगाह छठे भाव के बाद अष्टम भाव मे भी है कारण एक पांच नौ किसी भी भाव के त्रिकोण की राशियों मे गिने जाते है और जो भी ग्रह इन भावो मे होते है सम्बन्धित भाव को उसी प्रकार से देखते है जैसे कि लगन पंचम और नवम को देखा जाता है। माता के भाव से पंचम में अष्टम भाव पंचम मे है जातक की माता को जीवन मे इस शनि और केतु के कारण अपमान जोखिम और परिवार को सम्भालने के काम तथा परिवार को किसी भी प्रकार की जोखिम से दूर रखने के कामो के लिये जाना जाता है,जातक के पिता की राशि मे राहु के होने से जातक के पिता के लिये केवल इतना ही माना जा सकता है कि वह या तो शिक्षा के क्षेत्र मे अपने को जोड कर रखता है या किसी प्रकार के मनोरंजन वाले क्षेत्र मे अपने को आगे बढाने और उसी के अन्दर अपने कार्यों को करने के लिये माना जाता है,अथवा वह सरकारी संस्थाओ मे अपने कार्यों को करना जानता है। इसके अलावा सूर्य के आगे शुक्र के होने से माता के अलावा भी किसी स्त्री जातक के साथ सम्बन्ध रहने और माता के प्रति बेरुखी अपनाने के लिये भी माना जाता है,माता के द्वारा किसी शिक्षा संस्थान मे कार्य करना भी माना जा सकता है।

शनि केतु का चौथे भाव मे होना जातक की माता के लिये अच्छा नही माना जा सकता है,कारण शनि का स्वभाव नीरस होता है और अगर मंगल लगन मे चन्द्रमा के साथ होता है तो जातक की सोच मे अधिक तामसी कारण होने अर्थात जरा सी बात मे गुस्सा होने की बात को भी माना जा सकता है,इस कारण से भी जातक की माता को मानसिक रूप से कष्ट मिलने की बात मिलती है,शनि केतु के एक साथ होने से और गुरु के वक्री होने के कारण अक्सर जातक को स्त्री सन्तान के रूप मे भी माना जाता है और जातक के अगर कोई भाई होता भी है तो वह अपने परिवार से दूर जाकर अपने घर के बारे मे केवल सोचने के अलावा और कोई सहायता नही कर पाता है। राहु के गोचर के कारण जब भी जातक का राहु का राहु बारहवे भाव से गोचर करने के बाद जैसे जैसे जातक के नवे भाव की तरफ़ बढता जाता है वैसे वैसे जातक के चौथे भाव को समाप्त करने की अपनी गति को प्रदान करने की तरफ़ चलता जाता है। जैसे चौथे भाव का कारक माता को माना जाता है तो राहु जब जातक के बारहवे भाव मे आयेगा तो वह अपनी नवी द्रिष्टि से जातक की माता को पारिवारिक सोच के अन्दर ले जायेगा इस प्रकार से जातक की माता को अपने परिवार और सन्तान के भाग्य के लिये सोच पैदा हो जाती है साथ ही जातक की माता को यह चिन्ता सताने लगती है कि उसके परिवार और समाज के साथ क्या कारण बनेंगे जिसके कारण से वह अपनी औकात को कैसे दूसरे के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश करेगा,इसके बाद राहु का गोचर जब जातक के ग्यारहवे भाव मे होता है तो जातक की माता के अष्टम भाव मे यह अपनी युति को प्रदान करता है,जातक की माता के सामने कार्यों मे या आने जाने के अन्दर अथवा किसी प्रकार से घर के अन्दर की कोई दुर्घटना या कोई इन्फ़ेक्सन वाली बीमारी के द्वारा अथवा घर के सजाये संवारे जाने के दौरान जातक की माता को शारीरिक कष्टो का सामना करना पडता है,जब राहु का गोचर जातक के दसवे भाव मे होता है तो पिता की कारक वस्तुओ या पिता के स्वभाव को अक्समात ही छठे शुक्र की युति से दिक्कत देने वाला बन जाता है अथवा जातक का कार्यों की तरफ़ या किसी प्रकार से अन्य जाति की स्त्री के साथ या किसी कार्य करने वाली महिला के साथ सम्बन्ध बन जाता है इस सम्बन्ध के कारण जातक अपनी माता की देखभाल केवल बहुत बडी दिक्कत मे ही कर पाता है और जातक की माता के शरीर मे जो जडता से अपने स्थान पर पडा होता है के अन्दर कोई न कोई इन्फ़ेक्सन जो पीठ वाले होते है अथवा कोई कारण जो बिछाने वाले कपडो से सम्बन्धित होते है खराब होने लगते है और जातक के कार्य के प्रति कोई भी समय वाले काम नही माने जाते है,इसके बाद जैसे ही राहु जातक के नवे भाव मे प्रवेश करता है वह कारण अगर दूसरी या तीसरी बार राहु के नवे भाव मे आने के कारण जातक की माता के लिये यह राहु अपनी अष्टम गति चौथे भाव मे देने के लिये शोक या मृत्यु सम्बन्धी कारणो को पैदा करने वाला माना जाता है। जैसे वर्तमान मे राहु इस कुंडली मे नवे भाव मे है और माता के घर को अष्टम द्रिष्टि से देख रहा है तथा केतु का तीसरे भाव मे होना और शनि का केतु के साथ वर्तमान मे सहायक होना जातक की माता के लिये मोक्ष को देने वाला भी माना जा सकता है शनि की नजर इस राहु पर आने वाले नवम्बर के महिने तीसरे सप्ताह तक है इसलिये जातक की माता के लिये सांस की बीमारिया होने या जातक की माता को अधिक सर्दी आदि के कारण यह राहु अपनी पूरी गति को प्रदान करने के बाद जातक की माता के लिये मृत्यु जैसे कारण पैदा करने के लिये माना जा सकता है। आने वाले नौ नवम्बर की रात 12:30 से 03:30 का समय जातक की माता के लिये बहुत ही खतरनाक माना जा सकता है।
जातक की माता की सुरक्षा के लिये एक उपाय बहुत ही कारगर है कि बेसन की रोटी पर सरसों का तेल चुपड कर थोडा सा गुड उस रोटी पर रखकर जातक की माता के ऊपर सात वार उसारा करने के बाद उसे किसी काले जानवर को खिलाने से इस प्रकार का खराब असर दूर किया जा सकता है। गुरु जो बेसन का कारक है और सरसों का तेल राहु की श्रेणी मे भी आता है तथा गुड मंगल के रूप मे जो अष्टम का रूप माना जाता है,को लेकर काले जानवर यानी राहु की श्रेणी के जीव को खिलाने से बुरा असर लालकिताब के अनुसार समाप्त किया माना जाता है। इसके अलावा राहु का नवे भाव मे होने से अगर तर्पण करवा दिया जाये तो भी जातक की माता को फ़ायदा मिलने की बात मानी जा सकती है।

गुरुवार, 30 मई 2019

वात करते हैं मोदी जी प्रधानमंत्री पद की शपथ के बारे में

30 मई को नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं, 30 मई को अपरा एकादशी भी है इसका अपना धार्मिक महत्व है. अखिर क्यों मोदी अपरा एकादशी के दिन शपथ ले रहे हैं? क्या ये एक संयोग है? एकदशी तिथि के दिन शपथ होना ही शुभ है। लेकिन इस समय रात 11 बजकर 3 मिनट तक रेवती नक्षत्र का होना आगामी समय में किसी बडे़ नेता को गंभीर बीमारी होने का संकेत दे रहा है।

मित्रों जैसा कि आप जानते हैं की हर ज्योतिषी जो टीवी पर आ रहा है या राजनेताओं के साथ जुड़े हुए हैं जरुरी नहीं है कि वह अच्छे  बहुत बढ़िया  हो जिसने  भी य शाम 7:00 बजे का मुहूर्त निकाला है वह ज्यादा बढ़िया नहीं है मेरी नजर में क्योंकिउस समय 30 मई के दिन गुरुवार शाम 7 बजे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की शपथ लेने जा रहे है l प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के समय वृश्चिक लग्न का उदय हो रहा है जो की संयोग से उनका जन्म लग्न और जन्म राशि भी है

 यह तो ठीक है वृश्चिक लग्न की कुंडली में गुरु पंचमेश है और उस पर सातवें भाव से दशमेश सूर्य और अष्टमेश बुध की दृष्टि से अच्छे फल मिलने की पूर्ण संभावना बनी हुई हैपर संप्तम का सुर्य के कारण अच्छे पलों में कमी आएगी आप देखें इस समय  सातवें भाव का स्वामी शुक्र 6भाव में है यह भाव के वारे सभी ज्योतिष मित्र अच्छी तरह से जानते हैं 8वे भाव का ग्रह संप्तम में है यह भी  ठीक नहीं ऐसा कौन सा समय है जिस पर  मोदी जी प्रधानमंत्री की क्योंकि स्शपथ लेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा वह समय है

 12:01 जो कि समय सिंह लग्न बन रहा है जो कि स्थिर लग्न भी है और सूर्य बुध दशम में है बृहस्पति सुखवा में है जोगी बहुत बढ़िया योग है और चंद्रमा से भी बृहस्पति नवम भाव में है 2 ग्रह को छोड़कर बाकी सारे ग्रह केंद्र से त्रिकोण से संवन्घ रख रहे है उस समय तो निर्धारित हो चुका है तो इस पर मोदी जी क्या उपाय कर सकते हैं मोदी जी को चाहिए कि वह अपने ईस्ट के सामने 12:01 से लेकर 12:15 तक मनसे शपथ ग्रहण करें तो उनके लिए बहुत अच्छा होगा

गुरुवार, 16 मई 2019

सोते समय सिर किस दिशा में होना चाहिए और इसका विज्ञानिक रहस्य क्या है? What Is The Best Direction To Sleep ?

https://youtu.be/5QlK8Oa_lmkसोते https://youtu.be/5QlK8Oa_lmk सिर किस दिशा में होना चाहिए और  इसका  विज्ञानिक रहस्य क्या है? What Is The Best Direction To Sleep ?          

अच्छी सेहत के लिए पौष्ट‍िक आहार, योग-ध्यान के साथ-साथ नियमित दिनचर्या भी जरूरी है. दिनचर्या में सही वक्त पर नींद लेना भी शामिल है. शास्त्रों में इस बारे में बताया गया है कि सोने का सही तरीका क्या होना चाहिए.
दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना बेहतर माना गया है. ऐसी स्थ‍िति में स्वाभाविक तौर पर पैर उत्तर दिशा में रहेगा. शास्त्रों के साथ-साथ प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, सेहत के लिहाज से इस तरह सोने का निर्देश दिया गया है. यह मान्यता भी वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है.सोते समय सिर किस दिशा में होना चाहिए और इसका विज्ञानिक रहस्य क्या है? What Is The Best Direction To Sleep ?उत्तर की ओर क्यों न रखें सिर?

दरअसल, पृथ्वी में चुम्बकीय शक्ति होती है. इसमें दक्षिण से उत्तर की ओर लगातार चुंबकीय धारा प्रवाहित होती रहती हैमित्रो इसको ऐसे समझे दरअसल.हमारा दिल शरीर के निचले आधे हिस्से में नहीं है, वह तीन-चौथाई ऊपर की ओर मौजूद है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ रक्त को ऊपर की ओर पहुंचाना नीचे की ओर पहुंचाने से ज्यादा मुश्किल है।जो रक्त शिराएं ऊपर की ओर जाती हैं, वे नीचे की ओर जाने वाली धमनियों के मुकाबले बहुत परिष्कृत हैं। वे ऊपर मस्तिष्क में जाते समय लगभग बालों की तरह होती हैं। इतनी पतली कि वे एक फालतू बूंद भी नहीं ले जा सकतीं। अगर एक भी अतिरिक्त बूंद चली गई, तो कुछ फट जाएगा और आपको हैमरेज (रक्तस्राव) हो सकता है।
ज्यादातर लोगों के मस्तिष्क में रक्तस्राव होता है। यह बड़े पैमाने पर आपको प्रभावित नहीं करता मगर इसके छोटे-मोटे नुकसान होते हैं। आप सुस्त हो सकते हैं, जो वाकई में लोग हो रहे हैं। 35 की उम्र के बाद आपकी बुद्धिमत्ता का स्तर कई रूपों में गिर सकता है जब तक कि आप उसे बनाए रखने के लिए बहुत मेहनत नहीं करते। आप अपनी स्मृति के कारण काम चला रहे हैं, अपनी बुद्धि के कारण नहीं।जब आपको रक्त से जुड़ी कोई समस्या होती है, मसलन एनीमिया या रक्त की कमी तो डॉक्टर हमें क्या सलाह देता है? आयरन या लौह तत्व। यह आपके रक्त का एक अहम तत्व है। आपने पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रों (मैगनेटिक फील्ड) के बारे में सुना होगा। कई रूपों में अपनी चुंबकीयता के कारण पृथ्वी बनी है। इसलिए इस ग्रह पर चुंबकीय शक्तियां शक्तिशाली हैं।अगर आप उत्तर की ओर सिर करते हैं और 5 से 6 घंटों तक उस तरह रहते हैं, तो चुंबकीय खिंचाव आपके दिमाग पर दबाव डालेगा।
जब शरीर क्षैतिज अवस्था में होता है, तो आप तत्काल देख सकते हैं कि आपकी नाड़ी की गति धीमी हो जाती है। शरीर यह बदलाव इसलिए लाता है क्योंकि अगर रक्त उसी स्तर पर पंप किया जाएगा, तो आपके सिर में जरूरत से ज्यादा रक्त जा सकता है और आपको नुकसान हो सकता है। अब अगर आप अपना सिर उत्तर की ओर करते हैं और 5 से 6 घंटों तक उसी अवस्था में रहते हैं, तो चुंबकीय खिंचाव आपके दिमाग पर दबाव डालेगा। अगर आप एक उम्र से आगे निकल चुके हैं और आपकी रक्त शिराएं कमजोर हैं तो आपको रक्तस्राव और लकवे के साथ स्ट्रोक हो सकता है।या अगर आपका शरीर मजबूत है और ये चीजें आपके साथ नहीं होतीं, तो आप उत्तेजित या परेशान होकर जाग सकते हैं क्योंकि सोते समय दिमाग में जितना रक्त संचार होना चाहिए, उससे ज्यादा होता है। ऐसा नहीं है कि एक दिन ऐसा करने पर आप मर जाएंगे। मगर रोजाना ऐसा करने पर आप परेशानियों को दावत दे रहे हैं। आपके साथ किस तरह की परेशानियां हो सकती हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि आपका शरीर कितना मजबूत है।

तो किस दिशा में सिर करके सोना सबसे अच्छा होता है? पूर्व सबसे अच्छी दिशा है। पूर्वोत्तर ठीक है। पश्चिम चलेगा। अगर कोई विकल्प नहीं है तो दक्षिण। उत्तर बिल्कुल नहीं। जब तक आप उत्तरी गोलार्ध में हैं, यही सही है – उत्तर के अलावा किसी भी दिशा में सिर करके सोया जा सकता है। दक्षिणी गोलार्ध में, दक्षिण की ओर सिर करके न रखें। सुबह उठते समय आप  अपनी दायीं तरफ घूमें और फिर बिस्तर से बाहर आएं, क्योंकि नींद से उठते समय मेटाबोलिक प्रक्रिया बहुत धीमी होती है। ऐसे में अचानक से बिस्तर छोड़ने पर दिल पर दबाव पड़ेगा।औरसुबह बिस्तर से उठने से पहले अपने हाथों को मसलें और अपनी हथेलियों को अपनी आँखों पर लगाएं। हथेलियों को मसलने से हाथों में स्थित सभी नाड़ियां सक्रीय हो जाती हैं और आपका सिस्टम जल्दी से सजग हो जाता है।पारंपरिक रूप से आपसे यह भी कहा जाता है कि सुबह उठने से पहले आपको अपनी हथेलियां रगड़नी चाहिए और अपनी हथेलियों को अपनी आंखों पर रखना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा करने पर आपको भगवान दिख सकते हैं। इसका संबंध भगवान के दिखने से नहीं है।हमारे हाथों में नाड़ियों का एक भारी जाल है। अगर  हम  अपनी हथेलियां रगड़ते हैं, तो सभी नाड़ियां सक्रिय हो जाती हैं और शरीर तत्काल सजग हो जाता है। सुबह जगने पर भी अगर आप  सुस्त महसूस करते हैं, तो ऐसा करके देखिए, आपका पूरा शरीर तत्काल सजग हो जाएगा। तत्काल आपकी आंखों और आपकी इंद्रियों के दूसरे पहलुओं से जुड़ी सारी नाड़ियां सजग हो जाती हैं। शरीर को हिलाने से पहले आपका शरीर और दिमाग दोनों सक्रिय होने चाहिए। आपको सुस्त नहीं उठना चाहिए, इसका मकसद यही है।

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...