शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

गलत दानकरने से जीवन वर्वाद हो सकता है

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गलतदानकरने से जीवन वर्वाद हो सकता है
मित्रो यह संसार बहुत ही रहस्य्मय  है !  इस ने अपने सीने में न जाने कितने रहस्यों को दवा कर रखा है !  इंसान उन्हें अभी तक न तो खोज पाया है और न ही शायद उस के लिए यह इतना सम्भव  ही है ! और फिर यहाँ इस धरती पर जिस दिन यह रहस्य खुल जाएंगे , उस दिन होगा एक नए युग का आगाज़ !
और उस युग में होगा तो केवल और केवल सुख दुःख का कहीं नाम नहीं होगा !
निश्चित तौर पर दुखों का अंत हो ही जाएगा ! पर क्या यह संभव है ?
बस यही माया है ! और यहीं से शुरू होता है हमारा कार्य हमारा उसी विषय पर  आप से बात करना चाहता हूं !
 इस घरत पर ऐसे ऐसे लोगों का ऐसे ऐसे महापुरषों का आना हुआ कि हम यदि चाहें भी तो उन की देनो का कभी क़र्ज़ नहीं उतार पाएंगे ! उन का एहसान जीवन भर नहीं उतार पाएंगे !
चाहे उन सभी के कार्य -क्षेत्र और विषय अलग अलग ही क्यों न रहे  हों पर वो सभी बढ़ तो एक ही दिशा की  तरफ ही रहे थे  ! और वो दिशा थी मानव जीवन की भलाई 
 किसी ने न्यूटन  बन कर अपने नाम के सिद्धांत बना डाले और उन  सिद्धांतों से संसार को अचम्भे में डाल दिया ! तो  किसी ने आर्य भट्ट के नाम  से जन्म लेकर  अपने सिद्धांतों से संसार को अचम्भे में डाले रखा   !  कुछ लोगों की देन से मानव ने  चाँद -मंगल पर कदम रखने के सहस  जुटाए तो  कुछ की देन से आज मानव , इंसानी हृदय को शरीर से निकाल , उसे  टेबल पर रख,  उस का ऑपरेशन करने की सोच बैठा ! इन सब  देनो को देने वाले आज चाहे हमारे बीच में नहीं हैं परन्तु आज भी वो भगवान  की तरह  जिन्दा हैं इंसानी दिलों में !  और उन की कभी मौत नहीं होगी ! उन के कार्यों के लिए उन्हें संसार सदा याद रखेगा ! उन की शरीरिक मौत चाहे हो गई हो परन्तु आध्यात्मिक मौत कभी भी न होगी !
बस यही माया है !
एक शक्ति आकाश से किसी न किसी रूप में उतरती है और इस धरा पर अपना कार्य पूरा कर के चली जाती है ! फिर इस शक्ति के आलोप होते ही इंसान उसे   बस एक ही नाम से जानने को व्याकुल हो उठता है ! और वह नाम जो  वह उस शक्ति को  देता है ,  वह   कहलाता  है..केवल और केवल ..." भगवान 
बस यही माया है !
शक्तियों का संगम भूत में भी होता आया है , वर्तमान में भी हो रहा है और भविष्य में भी होता ही रहेगा !  पर हम फिर वहीँ  अपनी बात पर लौट कर  आते हैं ! इन शक्तियों की देन के तो इतने विषय बन जाएंगे की शायद हम गिन भी न पाएं ! हम तो बस  आप को केवल एक ही शक्ति का एहसास मात्र कराना चाहेंगे ! वह शक्ति जिसे हम सब  आज से नहीं बल्कि सनातन काल से युगों युगों से जानते भी आए है , जानते भी हैं और आगे भी जानते रहेंगे ! उस महान शक्ति का नाम है "आध्यात्म और फिर आध्यात्म से इतने विषय निकल आएँगे की शायद हम उन्हें भी न गिन पाएं !
बस यही माया है !
 तो आप को आज ऐसे विषय पर ले जाना चाहता हूं जो अपने आप में अत्यंत ही आलौकिक  है !और इतना ही नहीं वह बहुत रहस्य्मय भी है ! उस के रहस्य आज भी  अनसुलझे पड़े हैं ! जब कभी भी उस के रहस्यों की बात का आगाज़ होता है तो बस  इंसान केवल और केवल असमंजस्य की स्थिति में  अवाक् सा रह जाता है ! और फिर उस के होठों से केवल यही शब्द निकलता है  क्या ऐसा हो सक्ता है ?.क्या ऐसा संभव है ?
क्या इस धरा पर कोई ऐसी शक्ति हो भी  सक्ती है ?  क्या  है यह बात संभव कि किसी का केवल जन्म समय लेकर उस के भविष्य में होने वाली बेशुमार घटनाओं के बारे में जाना जा सके ?
शायद "हाँऔर फिर शायद .... "ना " भी ! ऐसे ही चलता आया है और चलता भी रहेगा ! चले भी क्यों न ? यह चलता रहेगा और तब तक चलता रहेगा जब तक इस धरा पर दो किस्म के इंसान रहेंगे ! एक वह जो आँख मूँद कर विश्वास कर लें और दूसरे वो जो हर बात का तर्क मांगे ! बिना तर्क के विश्वास न करें !
  हम नही कहते कि आप विश्वास करें हमारी बात पर और हम यह भी नही कहते कि आप विश्वास ही न करें हमारी बात पर ! यह तो तय करना केवल और केवल आप पर निर्भर करता है ! बातों का सिलसिला बढ़ा कर हम शायद अपने विषय से दूर चले जाएं ! इस लिए हम एक ही बात जानते हैं और बार बार कहते भी हैं कि .
अध्यात्म से बहुत सारे विषयों का जन्म हुआ ! सम्मोहन , आकर्षण ,पुनर्जन्म ,आत्मा , परमात्मा ,समाधि ,और ऐसे कितने ही विषयों के बाद एक सर्वोच्च शक्ति पर जा कर अध्यात्म खड़ा हो जाता है ! और उस सर्वोच्च और महा शाक्ति का नाम है ........भगवान..!....ईश्वर ...!  पर इस को भी फिर इंसान  वहां से खड़ा हो कर देखता है जहाँ से उस के मष्तिष्क पर रह रह कर दो ही बातें हथोड़े कि तरह प्रहार  करती हैं !..... पहली यह कि ...." वह है "......और दूसरी यह भी कि वह ..."नहीं है" !
बस यही माया है !
इसी कश्मकश के बीचो बीच हम अब चलेंगे उस शक्ती  की  तरफ ..जिस की  हालत बिलकुल ऐसी ही है जैसी हम ने ऊपर ईश्वर के होने न होने की  बताई है !
उस शक्ती का नाम है    .."ज्योतिष " !
हम यहाँ पर यह कह देना उचित समझते है कि अब हम यहाँ तनिक भी उस तरफ नहीं जाएंगे कि हम यह समझाएं आप को कि यह विषय .....उचित और सत्य है या फिर बिलकुल निराधार .. मित्रों
ईश्वर के पास जाने के लिए , या मोक्ष पाने के लिए , या फिर जीवन में सफलता को प्राप्त करने के लिए  केवल तीन ही मार्ग बताए गए हैं !
पहला मार्ग है आध्यात्म या ज्ञान मार्ग  ! यानि कि अपने ज्ञान को उस  सीमा तक  बढ़ा  लेना कि जहाँ पहुँच कर दुःख सुख के अनुभव से हमारी आत्मा विचलित न हो !   यानि  आत्मा- परमात्मा का पूर्ण ज्ञान पा लेना ! लेकिन यह मार्ग बहुत कठिन है ! यह तो बहुत बड़े महापुरुष  ही कर पाते हैं !
दूसरा मार्ग है  भक्ति मार्ग ! यानि मीरा की भांति  भक्ति में इतना डूब जाना कि जहर भी पीना पड़े तो मृत्यु न हो ! लेकिन यह भी कठिन मार्ग है !
तीसरा मार्ग है कर्म मार्ग !...जो सब से सरल और सुगम है ! कर्मो को इतना अच्छा बना लेना  कि एक देवता जैसी छवि हो जाए आप की.! अस्पताल या धर्मशालाएं   बनवा देना ........... ! ...कुआँ खुदवा देना  .......!... भूखों को भोजन खिला देना  इत्यादि कितने ही कर्म हैं जिन के करते भगवान को प्राप्त किया जा सके ! राजा हरीशचंद्र  की तरह !....और  सुगम मार्ग होने से आज संसार के अधिकतर लोग इसी रस्ते पर चल पड़े हैं ! और निश्चित ही इंसान का भला भी हुआ है ! और जीवों का भी भला हुआ है !
बस यही माया है !
लेकिन हमारा  रास्ता तो ज्योतिष है न , इस लिए  हम फिर वहीं चलते हैं !एक बार हमें एक सज्जन हमारे घर पर हमें कुंडली दिखलाने  आए  .! और हम से मिल कर बोले  कि .."अपने जीवन में  हम आचार्य जी बहुत  सा दान करते  आए  है परन्तु फिर भी परिवार में सभी भाइयों से अधिक परेशानी में हम ही हैं  कारोबार खत्म हो गया है मकान भी बिकने की कगार पर है ! क्या यही फल दिया है हमें  भगवान ने हमारे  दान पुण्य का ? हमारे दूसरे भाई जिन्हों ने कभी कोई दान ही नहीं किया वह हम से आज कहीं बहुत ही  आगे हैं  ! बताइए  ऐसा क्यों ? क्या गुनाह हुआ है हम से ?
 एक बार तो हम  भी सोच में ही पड़ कर  रह गए ! अब क्या जवाब दें उन को ? दान को शायद वो अमीर बनने का फार्मूला समझ बैठे थे  ! बस यही अज्ञान है , यही माया है ! इस से निकलना ही होगा !
हम ने  उन  को तसल्ली दी ! और  उन  को यह बतलाना उचित समझा कि दान करने के कुछ नियम हैं ! लालच ,  दान को अमीरी का फार्मूला समझ कर करना  जल्दी अमीर हो जाने की चाह रखते दान करना... मित्रों
हम फिर कहते हैं  कि दान करने  के लिए भी कुछ नियम हैं ज्योतिष में। आप कौन सा दान कर सक्ते हैं और कौन सा नहीं , इस के लिए भी  कुछ नियम हैं ज्योतिष में। । जो लोग इस नियम को नहीं मानते उन्हें भोगना पड़ता है तब दुखों  का दंश. 
ज्योतिष में आज एक नया विचार उभर कर   सामने आया है !
वो यह कि  " क्या  दान करने से जीवन की मुश्किलों से बाहर आया जा सक्ता है " ?
क्या जीवन में इस से कोई बदलाव लाया जा सक्ता है !
विज्ञान कहता है ..नहीं " !
पर आध्यात्म कहता है ......" हाँ 
ऐसा चल भी रहा है और चलता भी रहेगा ! यह फ़ासला तो यूँ ही बरकरार रहेगा ! यही माया है ! बस इसे ही नहीं जान पाया कोई  !
अब हम फिर अपनी बात पर वापिस लौट कर आते हैं !
हाँ.........!  हम ने फिर उन  सज्जन से बात की ! उन से कुछ जानकारियां लीं ! फिर अपने ज्ञान का भी उपयोग किया ! उन की कुंडली भी देखी ! और फिर हम यह देख कर तो दंग ही रह गए कि वो तो इतने बरसों से गलत दान ही करते आ रहे थे ! और ऐसा करते रहने के कारण ही आज वह सज्जन उस स्थिति में पहुँच चुके थे   उन से हमें हमदर्दी भी हो आई थी ! और एक जिज्ञासा भी की उन   के कष्टों को दूर करने का कोई उपाए अगर ज्योतिष में है तो वह हम उन   को बतला दें  ! पर न जाने हमें भीतर ही भीतर क्या हो गया था कि हम अपने मन की बात उन से करने का साहस   ही नहीं जुटा पा रहे थे  बस यही माया है ..
फिर हम ने   साहस कर के उन  को समझाने का निर्णय लिया ! हम ने उन से कुछ यूँ कहना शुरू किया .
एक बार जब रामसेतु बनाया जा रहा था तो हनुमान जी ने श्री राम जी से बताया कि.."हे  भगवन, ...जिस पत्थर पर आप का नाम लिख कर समुद्र में छोड़ दिया जाता है वो तैरने लगता है ।"  तब इस पर श्री राम जी ने कहा कि हनुमान जी यह आप का वहम है । तब हनुमान जी ने एक पत्थर पर श्री राम लिखा और समुद्र में छोड़ दिया। वो तैरने लगा। राम जी फिर मुस्कराए और बोले हम भी ऐसा क़र के देखते हैं। उन्हों ने भी एक पथर पर श्री राम लिखा और समुद्र में छोड़ दिया। वो पत्थर डूब गया। तब राम जी ने हनुमान जी से कहा की देखो हनुमान जी वो आप का वहम था ! देखो ..! हम ने भी पत्थर पर श्री " राम "  लिख कर ही समुद्र में आप के सामने छोड़ा पर वोह डूब गया !  कपवह पत्थर  नही तैरा !
इस पर तब हनुमान जी तनिक मुस्करा दिए !
फिर मुस्कराकर कहा  " हे प्रभु..! जिस को भला आप ही त्याग देंगे तो उसे डूबने से फिर कौन बचा सकता है ?"
और ठीक ऐसा ही नियम तो  वर्जित दान के सम्बन्ध में भी  लागु होता है।  यदि आप घर आई हुई लक्ष्मी का   यूँ ही त्याग  करते चले जाएंगे  तो वो फिर आप के पास आएगी ही क्यों ? या फिर आप के गृहस्थ में रहना चाहेगी ही क्यों ?
हमारी  बात सुन कर वो तनिक ठिठक से गए  !
लेकिन हम ने अपनी बात जारी रखी ! और उन्हें  बताना शुरू किया कि वास्तव में सत्य क्या है !
ज्योतिष कहता है कि ..जो ग्रह हमारी कुंडली में उच्च के होंगे या फिर बहुत ही अच्छी अवस्था के होंगे यदि हम उन्हीं का ही दान करते रहे ,उन्हें त्यागते रहे तो वो फिर हमें छोड़ कर ही तो जाएंगे ! क्यों करेंगे हमारा भला ?
दान तो केवल उन ग्रहों का ही किया जाए जो हमारी कुंडली में खराब हालात में हों या खराब घरों के स्वामी बन कर बैठे हों ! ज्योतिष तो यही कहता है ! और बस यही नियम है ! जो इसे समझ लेता है वह तो जीवन में कामयाब हो जाता है और जो नहीं समझ पाता वो बस डूबता और डूबता ही चला जाता है भंवर में...........एक अनजानी सी खाई में ....! 
और फिर शायद आप नहीं जानते  कि ऐसा सिलसिला लगातार जारी रहने से क्या हो सक्ता है !
शायद आप नहीं जानते कि लगातार  ऐसा सिलसिला जारी रहने से आप कंगाल हो  सक्ते हैं ..!
ज्योतिष के अनुसार यही ही तो है ..... " आप के जीवन को हिला देने वाला सत्य ..!"
परन्तु  वास्तव में  क्या यह संभव है ? ... इस में कई दलीलें ....कई तर्क हो सकते हैं ! पर एक बात तो निश्चित तौर पर सभी मानते ही हैं ! चाहे आध्यात्मिक धारा  के लोग हों या  फिर वैज्ञानिक धारा के ! एक बात तो सभी मानते भी हैं और मानेंगे भी कि प्रत्येक क्रिया के विपरीत एक प्रतिक्रिया होती ही है !
न्यूटन का दिया गया यह सिद्धांत कोई भी मानने से इंकार नहीं कर सक्ता कि जिस किसी दिशा में हम जितना बल लगाते हैं उतना ही प्रतिक्रिया के रूप में समान अनुपात का बल विपरीत दिशा में भी लौटता है ! बस एक यही नियम ही संसार का सब से बड़ा नियम है ! एक गेंद को  जितनेबल से हम किसी दीवार पर मारेंगे ठीक उसी बल से वो गेंद विपरीत दिशा में लौट कर आती ही है ! इस को सभी मानते ही हैं ! ज्योतिष इस से कहीं आगे निकल जाता है ! वो कहता है कि किसी भी गेंद को टकरा कर वापिस लौटने से नियम यहीं समाप्त कहाँ हो जाता है ? यदि उस गेंद को दीवार पर न मारा जाए पर बल तो लगाया ही जाएगा ! तब क्या होगा ? तब प्रतिबल का क्या होगा ? न्यूटन ने कहा था कि यदि हम अपनी एक ऊँगली हिलाते हैं तो पूरा ब्रह्माण्ड ही हिल जाता है ! प्रतिबल के कारण ! पर हमें दिखाई नहीं देता ! बस यही अध्यात्म है ...! यही ज्योतिष है ...और यही नियम **********
 यह अनियम है तो इस का प्रभाव भी होना निश्चित है !
पर आध्यात्म और ज्योतिष यहाँ संतुष्ट नहीं होता !
एक पानी के किसी तालाब में पानी में पत्थर फेंकने से पानी की लहर चारों तरफ गोलाकार चक्र  के रूप में पैदा होती है और फ़ैल जाती है ! फिर आप देखेंगे कि उसी तरह वह फैलती फैलती  निश्चल हो कर आलोप हो जाती है ! वास्तव में अपनी सीमाओं को छूने तक उस का बल कम हो कर इतना रह जाता है कि वो अपनी उसी वास्तविक शक्ती  से वापिस लौटता हमें दिखाई नहीं देता ! पर लौटता तो है ! वह लहर वापिस तो आती है ! अब समय और साधन कि विभन्नता के कारण उस का रूप बदल गया है और वह लहर  ठीक उसी रूप में न लौट कर किसी और रूप में उसी तालाब की गर्त में कहीं समा जाती है ! बस यही माया है ! यही आध्यात्म है ! यही नियम दान  के सम्बन्ध में है !
दान का प्रभाव हमारे जीवन में निश्चित ही होता है !अच्छा हो ..चाहे बुरा ! पर होता तो है उच्च के ग्रह का दान करते रहने से यह  दान आप के लिए हानिकारक होगा !
बुरे ग्रह का दान ले लेने से आप के लिए धीमे जहर की तरह होगा !दान का अधिकार तो केवल और केवल पात्र को ही है। जो ग्रह जन्म कुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, (स्वग्रही) उनसे संबंधित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
 सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिंह राशि में होने पर अपनी स्वराशि अका होता है अत:1/3/5/9/4 घर अमें हो
 लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें।
 गुड़, आटा, गेहूं, अतांबा आदि किसी को न दें। नहीं तो लाभ की जगह हानी होनी निश्चित है
 चंद्र वृष राशि में अउच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है। यदि आपकी जन्म कुंडली ऐसी स्थिति में हो अतो-1,2.4.6.8.9 घर में हो तो 
 दूध, चावल, चांदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें।हां कुंडली देखकर दांत दिए जा सकते हैं हां पहले घर में कुंडली देखकर दान किए जा सकते हैं
मंगल देव के बारे में कहा जाता है कि जितना मीठा बांटोंगे उतना ही अच्छा फल मिलेगा कुंडली में मंगल कहीं भी किसी भी भाव में हो आपको पूछने की जरूरत नहीं है मीठे का दान और पके हुए खाने का दान आप कभी भी कहीं भी किसी भी वक्त कर सकते हो यहां तक कि आप खून का दान भी कर सकते हो जिससे मंगल बहुत ही शुभ फल देता है बुध मिथुन राशि में तो स्वराशि तथा कन्या राशि में हो तो उच्च राशि का कहलाता है। यदि किसी जातक की जन्मपत्रिका में बुध शुभ फल देने वाली किसी स्थिति में है तो, उसे हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान कभी नहीं करना चाहिए।
हरे रंग के वस्त्र
हरे रंग के वस्त्र, वस्तु और यहां तक कि हरे रंग के खाद्य पदार्थों का दान में ऐसे जातक के लिए निषेध है। इसके अलावा इस जातक को न तो घर में मछलियां पालनी चाहिए और न ही स्वयं कभी मछलियों को कभी दाना डालना चाहिए। नहीं तोलेने के देने पड़ जाएंगे आपका व्यापार चौपट हो जाएगा कारोबार नष्ट हो जाएगा आपकी बहन बुआ बेटी को सुख की बजाय दुख झेलने पड़ेंगे इसी तरह बृहस्पति अगर कुंडली में अच्छे घरों में अपने पक्के घर में उच घर में शुभ फलदायक है तो गुरु ग्रह के दान कभी मत करें ग्रह
बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है। जिस जातक की कुण्डली में बृहस्पति ग्रह ऐसी स्थिति में हो तो, उसे पीले रंग के पदार्थ दान नहीं करना चाहिए। सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुओं आदि का दान नहीं करना चाहिए। इन वस्तुओं का दान करने से समाज में सम्मान कम होता है कुछ लोग कुत्ते को लड्डू भी खिला खिला कर अपना कारोबार घन मान सम्मान खराव कर रहे हैइसी तरह उपाय या दान पुन किसी अच्छे एस्ट्रोलॉजर को पूछ कर ही करें है मित्रों.! बातें और भी हैं आप से शेयर करने के लिए !
लेकिन आगे बढ़ने से पहले हमें आप कि टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा ! तभी हम आगे बढ़ पाएंगे !
प्रणाम ..!www.acharyarajesh.in

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गलत दानकरने से जीवन वर्वाद हो सकता है


गलतदानकरने से जीवन वर्वाद हो सकता हैगलतदानकरने से जीवन वर्वाद हो सकता है
मित्रो यह संसार बहुत ही रहस्य्मय  है !  इस ने अपने सीने में न जाने कितने रहस्यों को दवा कर रखा है !  इंसान उन्हें अभी तक न तो खोज पाया है और न ही शायद उस के लिए यह इतना सम्भव  ही है ! और फिर यहाँ इस धरती पर जिस दिन यह रहस्य खुल जाएंगे , उस दिन होगा एक नए युग का आगाज़ !
और उस युग में होगा तो केवल और केवल सुख दुःख का कहीं नाम नहीं होगा !
निश्चित तौर पर दुखों का अंत हो ही जाएगा ! पर क्या यह संभव है ?
बस यही माया है ! और यहीं से शुरू होता है हमारा कार्य हमारा उसी विषय पर  आप से बात करना चाहता हूं !
 इस घरत पर ऐसे ऐसे लोगों का ऐसे ऐसे महापुरषों का आना हुआ कि हम यदि चाहें भी तो उन की देनो का कभी क़र्ज़ नहीं उतार पाएंगे ! उन का एहसान जीवन भर नहीं उतार पाएंगे !
चाहे उन सभी के कार्य -क्षेत्र और विषय अलग अलग ही क्यों न रहे  हों पर वो सभी बढ़ तो एक ही दिशा की  तरफ ही रहे थे  ! और वो दिशा थी मानव जीवन की भलाई 
 किसी ने न्यूटन  बन कर अपने नाम के सिद्धांत बना डाले और उन  सिद्धांतों से संसार को अचम्भे में डाल दिया ! तो  किसी ने आर्य भट्ट के नाम  से जन्म लेकर  अपने सिद्धांतों से संसार को अचम्भे में डाले रखा   !  कुछ लोगों की देन से मानव ने  चाँद -मंगल पर कदम रखने के सहस  जुटाए तो  कुछ की देन से आज मानव , इंसानी हृदय को शरीर से निकाल , उसे  टेबल पर रख,  उस का ऑपरेशन करने की सोच बैठा ! इन सब  देनो को देने वाले आज चाहे हमारे बीच में नहीं हैं परन्तु आज भी वो भगवान  की तरह  जिन्दा हैं इंसानी दिलों में !  और उन की कभी मौत नहीं होगी ! उन के कार्यों के लिए उन्हें संसार सदा याद रखेगा ! उन की शरीरिक मौत चाहे हो गई हो परन्तु आध्यात्मिक मौत कभी भी न होगी !
बस यही माया है !
एक शक्ति आकाश से किसी न किसी रूप में उतरती है और इस धरा पर अपना कार्य पूरा कर के चली जाती है ! फिर इस शक्ति के आलोप होते ही इंसान उसे   बस एक ही नाम से जानने को व्याकुल हो उठता है ! और वह नाम जो  वह उस शक्ति को  देता है ,  वह   कहलाता  है..केवल और केवल ..." भगवान 
बस यही माया है !
शक्तियों का संगम भूत में भी होता आया है , वर्तमान में भी हो रहा है और भविष्य में भी होता ही रहेगा !  पर हम फिर वहीँ  अपनी बात पर लौट कर  आते हैं ! इन शक्तियों की देन के तो इतने विषय बन जाएंगे की शायद हम गिन भी न पाएं ! हम तो बस  आप को केवल एक ही शक्ति का एहसास मात्र कराना चाहेंगे ! वह शक्ति जिसे हम सब  आज से नहीं बल्कि सनातन काल से युगों युगों से जानते भी आए है , जानते भी हैं और आगे भी जानते रहेंगे ! उस महान शक्ति का नाम है "आध्यात्म और फिर आध्यात्म से इतने विषय निकल आएँगे की शायद हम उन्हें भी न गिन पाएं !
बस यही माया है !
 तो आप को आज ऐसे विषय पर ले जाना चाहता हूं जो अपने आप में अत्यंत ही आलौकिक  है !और इतना ही नहीं वह बहुत रहस्य्मय भी है ! उस के रहस्य आज भी  अनसुलझे पड़े हैं ! जब कभी भी उस के रहस्यों की बात का आगाज़ होता है तो बस  इंसान केवल और केवल असमंजस्य की स्थिति में  अवाक् सा रह जाता है ! और फिर उस के होठों से केवल यही शब्द निकलता है  क्या ऐसा हो सक्ता है ?.क्या ऐसा संभव है ?
क्या इस धरा पर कोई ऐसी शक्ति हो भी  सक्ती है ?  क्या  है यह बात संभव कि किसी का केवल जन्म समय लेकर उस के भविष्य में होने वाली बेशुमार घटनाओं के बारे में जाना जा सके ?
शायद "हाँऔर फिर शायद .... "ना " भी ! ऐसे ही चलता आया है और चलता भी रहेगा ! चले भी क्यों न ? यह चलता रहेगा और तब तक चलता रहेगा जब तक इस धरा पर दो किस्म के इंसान रहेंगे ! एक वह जो आँख मूँद कर विश्वास कर लें और दूसरे वो जो हर बात का तर्क मांगे ! बिना तर्क के विश्वास न करें !
  हम नही कहते कि आप विश्वास करें हमारी बात पर और हम यह भी नही कहते कि आप विश्वास ही न करें हमारी बात पर ! यह तो तय करना केवल और केवल आप पर निर्भर करता है ! बातों का सिलसिला बढ़ा कर हम शायद अपने विषय से दूर चले जाएं ! इस लिए हम एक ही बात जानते हैं और बार बार कहते भी हैं कि .
अध्यात्म से बहुत सारे विषयों का जन्म हुआ ! सम्मोहन , आकर्षण ,पुनर्जन्म ,आत्मा , परमात्मा ,समाधि ,और ऐसे कितने ही विषयों के बाद एक सर्वोच्च शक्ति पर जा कर अध्यात्म खड़ा हो जाता है ! और उस सर्वोच्च और महा शाक्ति का नाम है ........भगवान..!....ईश्वर ...!  पर इस को भी फिर इंसान  वहां से खड़ा हो कर देखता है जहाँ से उस के मष्तिष्क पर रह रह कर दो ही बातें हथोड़े कि तरह प्रहार  करती हैं !..... पहली यह कि ...." वह है "......और दूसरी यह भी कि वह ..."नहीं है" !
बस यही माया है !
इसी कश्मकश के बीचो बीच हम अब चलेंगे उस शक्ती  की  तरफ ..जिस की  हालत बिलकुल ऐसी ही है जैसी हम ने ऊपर ईश्वर के होने न होने की  बताई है !
उस शक्ती का नाम है    .."ज्योतिष " !
हम यहाँ पर यह कह देना उचित समझते है कि अब हम यहाँ तनिक भी उस तरफ नहीं जाएंगे कि हम यह समझाएं आप को कि यह विषय .....उचित और सत्य है या फिर बिलकुल निराधार .. मित्रों
ईश्वर के पास जाने के लिए , या मोक्ष पाने के लिए , या फिर जीवन में सफलता को प्राप्त करने के लिए  केवल तीन ही मार्ग बताए गए हैं !
पहला मार्ग है आध्यात्म या ज्ञान मार्ग  ! यानि कि अपने ज्ञान को उस  सीमा तक  बढ़ा  लेना कि जहाँ पहुँच कर दुःख सुख के अनुभव से हमारी आत्मा विचलित न हो !   यानि  आत्मा- परमात्मा का पूर्ण ज्ञान पा लेना ! लेकिन यह मार्ग बहुत कठिन है ! यह तो बहुत बड़े महापुरुष  ही कर पाते हैं !
दूसरा मार्ग है  भक्ति मार्ग ! यानि मीरा की भांति  भक्ति में इतना डूब जाना कि जहर भी पीना पड़े तो मृत्यु न हो ! लेकिन यह भी कठिन मार्ग है !
तीसरा मार्ग है कर्म मार्ग !...जो सब से सरल और सुगम है ! कर्मो को इतना अच्छा बना लेना  कि एक देवता जैसी छवि हो जाए आप की.! अस्पताल या धर्मशालाएं   बनवा देना ........... ! ...कुआँ खुदवा देना  .......!... भूखों को भोजन खिला देना  इत्यादि कितने ही कर्म हैं जिन के करते भगवान को प्राप्त किया जा सके ! राजा हरीशचंद्र  की तरह !....और  सुगम मार्ग होने से आज संसार के अधिकतर लोग इसी रस्ते पर चल पड़े हैं ! और निश्चित ही इंसान का भला भी हुआ है ! और जीवों का भी भला हुआ है !
बस यही माया है !
लेकिन हमारा  रास्ता तो ज्योतिष है न , इस लिए  हम फिर वहीं चलते हैं !एक बार हमें एक सज्जन हमारे घर पर हमें कुंडली दिखलाने  आए  .! और हम से मिल कर बोले  कि .."अपने जीवन में  हम आचार्य जी बहुत  सा दान करते  आए  है परन्तु फिर भी परिवार में सभी भाइयों से अधिक परेशानी में हम ही हैं  कारोबार खत्म हो गया है मकान भी बिकने की कगार पर है ! क्या यही फल दिया है हमें  भगवान ने हमारे  दान पुण्य का ? हमारे दूसरे भाई जिन्हों ने कभी कोई दान ही नहीं किया वह हम से आज कहीं बहुत ही  आगे हैं  ! बताइए  ऐसा क्यों ? क्या गुनाह हुआ है हम से ?
 एक बार तो हम  भी सोच में ही पड़ कर  रह गए ! अब क्या जवाब दें उन को ? दान को शायद वो अमीर बनने का फार्मूला समझ बैठे थे  ! बस यही अज्ञान है , यही माया है ! इस से निकलना ही होगा !
हम ने  उन  को तसल्ली दी ! और  उन  को यह बतलाना उचित समझा कि दान करने के कुछ नियम हैं ! लालच ,  दान को अमीरी का फार्मूला समझ कर करना  जल्दी अमीर हो जाने की चाह रखते दान करना... मित्रों
हम फिर कहते हैं  कि दान करने  के लिए भी कुछ नियम हैं ज्योतिष में। आप कौन सा दान कर सक्ते हैं और कौन सा नहीं , इस के लिए भी  कुछ नियम हैं ज्योतिष में। । जो लोग इस नियम को नहीं मानते उन्हें भोगना पड़ता है तब दुखों  का दंश. 
ज्योतिष में आज एक नया विचार उभर कर   सामने आया है !
वो यह कि  " क्या  दान करने से जीवन की मुश्किलों से बाहर आया जा सक्ता है " ?
क्या जीवन में इस से कोई बदलाव लाया जा सक्ता है !
विज्ञान कहता है ..नहीं " !
पर आध्यात्म कहता है ......" हाँ 
ऐसा चल भी रहा है और चलता भी रहेगा ! यह फ़ासला तो यूँ ही बरकरार रहेगा ! यही माया है ! बस इसे ही नहीं जान पाया कोई  !
अब हम फिर अपनी बात पर वापिस लौट कर आते हैं !
हाँ.........!  हम ने फिर उन  सज्जन से बात की ! उन से कुछ जानकारियां लीं ! फिर अपने ज्ञान का भी उपयोग किया ! उन की कुंडली भी देखी ! और फिर हम यह देख कर तो दंग ही रह गए कि वो तो इतने बरसों से गलत दान ही करते आ रहे थे ! और ऐसा करते रहने के कारण ही आज वह सज्जन उस स्थिति में पहुँच चुके थे   उन से हमें हमदर्दी भी हो आई थी ! और एक जिज्ञासा भी की उन   के कष्टों को दूर करने का कोई उपाए अगर ज्योतिष में है तो वह हम उन   को बतला दें  ! पर न जाने हमें भीतर ही भीतर क्या हो गया था कि हम अपने मन की बात उन से करने का साहस   ही नहीं जुटा पा रहे थे  बस यही माया है ..
फिर हम ने   साहस कर के उन  को समझाने का निर्णय लिया ! हम ने उन से कुछ यूँ कहना शुरू किया .
एक बार जब रामसेतु बनाया जा रहा था तो हनुमान जी ने श्री राम जी से बताया कि.."हे  भगवन, ...जिस पत्थर पर आप का नाम लिख कर समुद्र में छोड़ दिया जाता है वो तैरने लगता है ।"  तब इस पर श्री राम जी ने कहा कि हनुमान जी यह आप का वहम है । तब हनुमान जी ने एक पत्थर पर श्री राम लिखा और समुद्र में छोड़ दिया। वो तैरने लगा। राम जी फिर मुस्कराए और बोले हम भी ऐसा क़र के देखते हैं। उन्हों ने भी एक पथर पर श्री राम लिखा और समुद्र में छोड़ दिया। वो पत्थर डूब गया। तब राम जी ने हनुमान जी से कहा की देखो हनुमान जी वो आप का वहम था ! देखो ..! हम ने भी पत्थर पर श्री " राम "  लिख कर ही समुद्र में आप के सामने छोड़ा पर वोह डूब गया !  कपवह पत्थर  नही तैरा !
इस पर तब हनुमान जी तनिक मुस्करा दिए !
फिर मुस्कराकर कहा  " हे प्रभु..! जिस को भला आप ही त्याग देंगे तो उसे डूबने से फिर कौन बचा सकता है ?"
और ठीक ऐसा ही नियम तो  वर्जित दान के सम्बन्ध में भी  लागु होता है।  यदि आप घर आई हुई लक्ष्मी का   यूँ ही त्याग  करते चले जाएंगे  तो वो फिर आप के पास आएगी ही क्यों ? या फिर आप के गृहस्थ में रहना चाहेगी ही क्यों ?
हमारी  बात सुन कर वो तनिक ठिठक से गए  !
लेकिन हम ने अपनी बात जारी रखी ! और उन्हें  बताना शुरू किया कि वास्तव में सत्य क्या है !
ज्योतिष कहता है कि ..जो ग्रह हमारी कुंडली में उच्च के होंगे या फिर बहुत ही अच्छी अवस्था के होंगे यदि हम उन्हीं का ही दान करते रहे ,उन्हें त्यागते रहे तो वो फिर हमें छोड़ कर ही तो जाएंगे ! क्यों करेंगे हमारा भला ?
दान तो केवल उन ग्रहों का ही किया जाए जो हमारी कुंडली में खराब हालात में हों या खराब घरों के स्वामी बन कर बैठे हों ! ज्योतिष तो यही कहता है ! और बस यही नियम है ! जो इसे समझ लेता है वह तो जीवन में कामयाब हो जाता है और जो नहीं समझ पाता वो बस डूबता और डूबता ही चला जाता है भंवर में...........एक अनजानी सी खाई में ....! 
और फिर शायद आप नहीं जानते  कि ऐसा सिलसिला लगातार जारी रहने से क्या हो सक्ता है !
शायद आप नहीं जानते कि लगातार  ऐसा सिलसिला जारी रहने से आप कंगाल हो  सक्ते हैं ..!
ज्योतिष के अनुसार यही ही तो है ..... " आप के जीवन को हिला देने वाला सत्य ..!"
परन्तु  वास्तव में  क्या यह संभव है ? ... इस में कई दलीलें ....कई तर्क हो सकते हैं ! पर एक बात तो निश्चित तौर पर सभी मानते ही हैं ! चाहे आध्यात्मिक धारा  के लोग हों या  फिर वैज्ञानिक धारा के ! एक बात तो सभी मानते भी हैं और मानेंगे भी कि प्रत्येक क्रिया के विपरीत एक प्रतिक्रिया होती ही है !
न्यूटन का दिया गया यह सिद्धांत कोई भी मानने से इंकार नहीं कर सक्ता कि जिस किसी दिशा में हम जितना बल लगाते हैं उतना ही प्रतिक्रिया के रूप में समान अनुपात का बल विपरीत दिशा में भी लौटता है ! बस एक यही नियम ही संसार का सब से बड़ा नियम है ! एक गेंद को  जितनेबल से हम किसी दीवार पर मारेंगे ठीक उसी बल से वो गेंद विपरीत दिशा में लौट कर आती ही है ! इस को सभी मानते ही हैं ! ज्योतिष इस से कहीं आगे निकल जाता है ! वो कहता है कि किसी भी गेंद को टकरा कर वापिस लौटने से नियम यहीं समाप्त कहाँ हो जाता है ? यदि उस गेंद को दीवार पर न मारा जाए पर बल तो लगाया ही जाएगा ! तब क्या होगा ? तब प्रतिबल का क्या होगा ? न्यूटन ने कहा था कि यदि हम अपनी एक ऊँगली हिलाते हैं तो पूरा ब्रह्माण्ड ही हिल जाता है ! प्रतिबल के कारण ! पर हमें दिखाई नहीं देता ! बस यही अध्यात्म है ...! यही ज्योतिष है ...और यही नियम **********
 यह अनियम है तो इस का प्रभाव भी होना निश्चित है !
पर आध्यात्म और ज्योतिष यहाँ संतुष्ट नहीं होता !
एक पानी के किसी तालाब में पानी में पत्थर फेंकने से पानी की लहर चारों तरफ गोलाकार चक्र  के रूप में पैदा होती है और फ़ैल जाती है ! फिर आप देखेंगे कि उसी तरह वह फैलती फैलती  निश्चल हो कर आलोप हो जाती है ! वास्तव में अपनी सीमाओं को छूने तक उस का बल कम हो कर इतना रह जाता है कि वो अपनी उसी वास्तविक शक्ती  से वापिस लौटता हमें दिखाई नहीं देता ! पर लौटता तो है ! वह लहर वापिस तो आती है ! अब समय और साधन कि विभन्नता के कारण उस का रूप बदल गया है और वह लहर  ठीक उसी रूप में न लौट कर किसी और रूप में उसी तालाब की गर्त में कहीं समा जाती है ! बस यही माया है ! यही आध्यात्म है ! यही नियम दान  के सम्बन्ध में है !
दान का प्रभाव हमारे जीवन में निश्चित ही होता है !अच्छा हो ..चाहे बुरा ! पर होता तो है उच्च के ग्रह का दान करते रहने से यह  दान आप के लिए हानिकारक होगा !
बुरे ग्रह का दान ले लेने से आप के लिए धीमे जहर की तरह होगा !दान का अधिकार तो केवल और केवल पात्र को ही है। जो ग्रह जन्म कुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, (स्वग्रही) उनसे संबंधित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
 सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिंह राशि में होने पर अपनी स्वराशि अका होता है अत:1/3/5/9/4 घर अमें हो
 लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें।
 गुड़, आटा, गेहूं, अतांबा आदि किसी को न दें। नहीं तो लाभ की जगह हानी होनी निश्चित है
 चंद्र वृष राशि में अउच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है। यदि आपकी जन्म कुंडली ऐसी स्थिति में हो अतो-1,2.4.6.8.9 घर में हो तो 
 दूध, चावल, चांदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें।हां कुंडली देखकर दांत दिए जा सकते हैं हां पहले घर में कुंडली देखकर दान किए जा सकते हैं
मंगल देव के बारे में कहा जाता है कि जितना मीठा बांटोंगे उतना ही अच्छा फल मिलेगा कुंडली में मंगल कहीं भी किसी भी भाव में हो आपको पूछने की जरूरत नहीं है मीठे का दान और पके हुए खाने का दान आप कभी भी कहीं भी किसी भी वक्त कर सकते हो यहां तक कि आप खून का दान भी कर सकते हो जिससे मंगल बहुत ही शुभ फल देता है बुध मिथुन राशि में तो स्वराशि तथा कन्या राशि में हो तो उच्च राशि का कहलाता है। यदि किसी जातक की जन्मपत्रिका में बुध शुभ फल देने वाली किसी स्थिति में है तो, उसे हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान कभी नहीं करना चाहिए।
हरे रंग के वस्त्र
हरे रंग के वस्त्र, वस्तु और यहां तक कि हरे रंग के खाद्य पदार्थों का दान में ऐसे जातक के लिए निषेध है। इसके अलावा इस जातक को न तो घर में मछलियां पालनी चाहिए और न ही स्वयं कभी मछलियों को कभी दाना डालना चाहिए। नहीं तोलेने के देने पड़ जाएंगे आपका व्यापार चौपट हो जाएगा कारोबार नष्ट हो जाएगा आपकी बहन बुआ बेटी को सुख की बजाय दुख झेलने पड़ेंगे इसी तरह बृहस्पति अगर कुंडली में अच्छे घरों में अपने पक्के घर में उच घर में शुभ फलदायक है तो गुरु ग्रह के दान कभी मत करें ग्रह
बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है। जिस जातक की कुण्डली में बृहस्पति ग्रह ऐसी स्थिति में हो तो, उसे पीले रंग के पदार्थ दान नहीं करना चाहिए। सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुओं आदि का दान नहीं करना चाहिए। इन वस्तुओं का दान करने से समाज में सम्मान कम होता है कुछ लोग कुत्ते को लड्डू भी खिला खिला कर अपना कारोबार घन मान सम्मान खराव कर रहे हैइसी तरह उपाय या दान पुन किसी अच्छे एस्ट्रोलॉजर को पूछ कर ही करें है मित्रों.! बातें और भी हैं आप से शेयर करने के लिए !
लेकिन आगे बढ़ने से पहले हमें आप कि टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा ! तभी हम आगे बढ़ पाएंगे !
प्रणाम ..!www.acharyarajesh.in

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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

नवरात्रि 2020/शुभ मुहूर्त


भगवती को पूजने ,मनाने, एवं शुभ कृपा प्राप्त करने का सबसे उत्तम समय आश्विन शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक होता है। आश्विन मास में पड़ने वाले इस नवरात्र को शारदीय नवरात्र कहा जाता है। इस नवरात्र की विशेषता है कि हम घरों में कलश स्थापना के साथ-साथ पूजा पंडालों में भी स्थापित करके मां भगवती की आराधना करते हैं। मित्रों17अक्टूबर कल से नवरात्र प्रारंभ हो रहे है. इसके साथ ही प्रॉपर्टी, व्हीकल और अन्य चीजों की खरीदारी के लिए नवरात्र में हर दिन शुभ मुहूर्त रहेगा. देवी भागवत के अनुसार इस बार शनिवार को घट स्थापना होने से देवी का वाहन घोड़ा रहेगा. नवरात्रि का पहला दिन शनिवार होने के कारण मां दुर्गा घोड़े की सवारी करते हुए पृथ्वी पर आएंगी. जब मां दुर्गा की सवारी घोड़ा रहता है तब पड़ोसी देशों से युद्ध, गृह युद्ध, आंधी-तूफान और सत्ता में उथल-पुथल जैसी गतिविधियां बढ़ने की आशंका रहती है. साथ ही नवरात्र का आखिरी दिन रविवार होने से देवी भैंसे पर सवार होकर जाएंगी, इसके अशुभ फल के अनुसार देश में रोग और शोक बढ़ने की आशंका है.17 अक्टूबर को मां शैलपुत्री पूजा घटस्थापना,
18 अक्टूबर को मां ब्रह्मचारिणी पूजा,
19 अक्टूबर को मां चंद्रघंटा पूजा,
20 अक्टूबर को मां कुष्मांडा पूजा,
21 अक्टूबर को मां स्कंदमाता पूजा,
22 अक्टूबर षष्ठी मां कात्यायनी पूजा,
23 अक्टूबर को मां कालरात्रि पूजा,
24 अक्टूबर को मां महागौरी दुर्गा पूजा,
महा नवमी पूजा दुर्गा महाष्टमी पूजा,
25 अक्टूबर को मां सिद्धिदात्री पूजा
नवरात्रि पारणा विजय दशमी, 26 अक्टूबर को दुर्गा विसर्जन किया जाएगा।
इस बार सर्वार्थसिद्धि योग में नवरात्र शुरू हो रहा है. नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना शुभ मुहूर्त में होगी. ज्योतिष शास्त्र में इस योग को बेहद शुभ माना जाता है, जो पूजा उपासना में अभीष्ट सिद्धि देगा. साथ ही दशहरे तक खरीदारी के लिए त्रिपुष्कर, सौभाग्य और रवियोग जैसे खास मुहूर्त भी रहेंगे. इन शुभ संयोग में प्रॉपर्टी, व्हीकल, फर्नीचर, भौतिक सुख-सुविधाओं के सामान और अन्य तरह की मांगलिक कामों के लिए खरीदारी करना शुभ रहेगा
स्थापना का शुभ मुहूर्त
शारदीय नवरात्र का आरंभ 17 अक्टूबर आश्चिन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होगी. दुर्गा पूजा का आरंभ घट स्थापना से शुरू हो जाता है. घट स्थापना मुहूर्त का समय 17 अक्टूबर दिन शनिवार को प्रात: काल 06 बजकर 27 मिनट से 10 बजकर 13 मिनट तक है. घटस्थापना के लिए अभिजित मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बारह 29 मिनट तकरहेगा.अभिजीत मुहूर्त सभी शुभ कार्यों के लिए अति उत्तम होता है। चूंकि चित्रा नक्षत्र में कलश स्थापना प्रशस्त नहीं माना गया है। अतः चित्रा नक्षत्र की समाप्ति दिन में 2:20 बजे के बाद किया जा सकेगा।
स्थिर लग्न कुम्भ दोपहर 2:30 से 3:55 तक होगा साथ ही शुभ चौघड़िया भी इस समय प्राप्त होगी अतः यह अवधि कलश स्थापना हेतु अतिउत्तम है।
दूसरा स्थिर लग्न वृष रात में 07:06 से 09:02 बजे तक होगा परंतु चौघड़िया 07:30 तक ही शुभ है अतः 07:08 से 07:30 बजे के बीच मे कलश स्थापना किया जा सकता है
इस नवरात्रि के दौरान तीन स्वार्थ सिद्धि योग 18 अक्टूबर, 19 अक्टूबर और 23 अक्टूबर को बन रहा है। वहीं, एक त्रिपुष्कर योग 18 अक्टूबर को बन रहा है। नवरात्रि के दौरान गुरु व शनि स्वगृही रहेंगे जो बेहद ही शुभ फलदायी है। इस नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के साथ-साथ दुर्गा चालीसा का पाठ करना लाभकर होगा। इस दौरान झूठ, फरेब व व्यसन से बचना चाहिए। कन्या पूजन के साथ-साथ नौ वर्ष से नीचे की कन्याओं को उपहार भी देना चाहिए।

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

ज्योतिष की राय: ग्रहों की चाल देती है।मंदा तेजी व्यापार भविष्य

ज्यो
तिष की राय: ग्रहों की चाल देती है।मंदा तेजी व्यापार भविष्य
बुध14 अक्तूबर की सुबह 6 बजकर 30 पर तुला राशि पर गोचर करते हुए वक्री हो रहे हैं, पुनः 3 नवंबर की रात्रि 11 बजकर 15 पर इसी राशि पर भ्रमण करते हुए मार्गी होंगेउसके वाद  सिर्फ सूर्य अपना राशि परिवर्तन करता है, यानि कि कन्या राशि पर से निकलकर तुला राशि पर प्रवेश करता है। बुध की पोजीशन में दो तबदीलियां होती हैं-वह वक्री होता है तथा पश्चिम में अस्त होता है। आगामी 17 अक्‍टूबर, शनिवार को सूर्य तुला राशि में प्रवेश करने वाले हैं। इस दिन से ही नवरात्रि का भी आरंभ हो रहा है। इस बार मलमास के चलते नवरात्रि एक माह देर से शुरू होगी। मलमास समाप्ति के बाद यह पहला ग्रह है जो राशि बदलेगा। जब भी सूर्य का राशि परिवर्तन होता है, उसे संक्रांति के रूप में जाना जाता है। तुला राशि में सूर्य 16 नवंबर तक रहेंगे इस तरह सूर्य के राशि परिवर्तन के कारण बनने वाले ग्रह योग को देखने से मालूम देता है कि सप्ताह के दौरान जहां घटा-बढ़ी होती रहेगी, वहां एक लाइन भी शुरू हो सकती है, इसलिए मार्कीट को देख-परख कर काम करना चाहिए।
सप्ताह के दौरान बाजार में नर्मी तथा तेजी दोनों तरह का असर देखने को मिल सकता है इसलिए काम धीरज के साथ करना चाहिए तथा सौदा के साथ चिपके न रहना चाहिए। इस सप्ताह में 14, 19, 20 अक्तूबर खास दिन। 14 तथा 19 अक्तूबर दोनों दिन बाजार झटका के साथ एक तरफ चल सकता है।
तेल सोया, तेल मूंगफली, सरसों, अलसी, तोरिया, तिल, तेल, बिनौला, अरंडी, खल, सींगदाना, मेंथा, पिपरामैंट, अन्य तेल पदार्थों, वनस्पति इत्यादि में 14 अक्तूबर को तेजी का झटका, 15-16 नर्मी असर। फिर 19 को रेट जम्प कर सकते हैं।
 20 अक्तूबर शाम साढ़े पांच बजे के बाद रेट टूटने की आशा। काटन, पटसन, रूई, कपास, सन्न, सूत, सिल्क, स्टैपल, ऊनी, सूती, रेशमी कपड़े तथा यारन इत्यादि में 14, 19, 20 तारीखों को बाजार रुख पर नजर रखनी ठीक रहेगी। शेयर मार्कीट में 14 तथा 19 अक्तूबर दोनों दिन तेजी के झटके आने की आशा, बीच में 15, 16 को बाजार कमजोर रहेगा। सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात, बहुमूल्य पत्थरों, बहुमूल्य धातुओं, कापर इत्यादि में 14 अक्तूबर को एक तरफा झटका आ सकता है, 15, 16 तारीख को रेट कमजोर रहेंगे, 17-18 को बाजार की छुट्टी। 19 अक्तूबर तेजी का झटका आने पर 20 तारीख को भी तेजी रहेगी, अलबत्ता 20 अक्तूबर शाम  पांच बजे के बाद रेट झटका के साथ एक तरफ चल सकते हैं। गुड़, खांड, शक्कर तथा अन्य मीठी रसदार वस्तुओं तथा मिश्री इत्यादि में 14 तारीख को बाजार एक तरफ चलेगा, फिर 19, 20 अक्तूबर तेजी वाले दिन।
गेहूं, गवारा, मटर, मक्की, चने, जौ, बाजरा, अरहर, मूंग, माष तथा अन्य अनाज पदार्थों, दालों इत्यादि में  14, 19, 20 तारीखें तेजी वाली होंगी। बीच में 15, 16 को रेट नर्म चलेंगे। हाजिर मार्कीट में 15, 16 अक्तूबर को छोड़ कर बाकी दिनों में लवाल काफी एक्टिव नजर आएगा।18 तारीख से, शेयर बाजारों में मंदी देखी जा सकती है। इसके साथ, पूरा स्टॉक मार्केट एकतरफा गिरावट से गुजरेगा, जो वस्तुओं के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के शेयरों की कीमतों को प्रभावित करेगा। बैंकिंग, वित्त, भारी इंजीनियरिंग, तंबाकू, कॉस्मेटिक सामान, फार्मा सेक्टर, सार्वजनिक उद्यम, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, सूचना प्रौद्योगिकी, शिपिंग कॉरपोरेशन, परिवहन आदि के ग्राफ में बड़ी गिरावट देखी जाएगी। इसलिए, तेजड़ियों और खरीदारों को सलाह दी जाती है, कि वे अपने निवेश के बारे में सतर्क रहें और पहले अच्छी तरह से सोच-विचार करने के बाद ही कोई निर्णय लें। क्योंकि मित्रों  अक्टूबर से कार्तिक माह की शुरुआत हो रही है अत: व्यापारी को बढ़े भाव (बेचान) बोलकर घटे भाव ही खरीद करना लाभप्रद रहेगा।      
अत: भावों में बहुत उतार-चढ़ाव आएगा। अत: व्यापारी बंधु हर समय भावों को देखते हुए सतर्कतापूर्वक व्यापार करें। 
अत: जैसे ही बढ़े भाव मिलें, व्यापारी को लाभ उठा लेना चाहिए। यह लाभप्रद रहेगा।

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

कुण्डली में जन्म के सूर्यदेव पर सभी ग्रहों का गोचरजन्म कुंडली सेकुण्डली में जन्म के सूर्यदेव पर सभी ग्रहों का गोचरजन्म कुंडली सेकुण्डली में जन्म के सूर्यदेव पर सभी ग्रहों का गोचरजन्म कुंडली से

कुण्डली में जन्म के सूर्यदेव पर सभी ग्रहों का
गोचरजन्म कुंडली से भविष्य का फल बताते हुए गोचर के द्वारा समय तक पहुंचा जा सकता है| परन्तु ज्योतिष में कुछ ग्रह ऐसे है जो लम्बे समय तक एक ही राशि में टिके रहते है| ऐसे में उन ग्रहों का फल कब घटित होगा यह बताना बहुत मुश्किल हो जाता है। न्डली के ऊपर जब गोचर के ग्रह अपनी युति देते है,तो वर्तमान में चल रही गति विधियों के बारे में ज्ञान मिलता है,ज्योतिषी इस बात के सहारे ही अपनी ज्योतिष विद्या का मान रखते है,जब किसी भी जातक के सामने चलता हुआ वर्तमान और बीता हुआ भूत बखान किया जाता है,और जातक हर बात पर सही का टिक करता जाता है,तब जाकर भविष्य के बारे में कथन करना उपयुक्त माना जाता है,और की गयी भविष्यवाणियां खरी उतरती है,ग्रह गोचर में अपना फ़ल जो देता है,उसमे ध्यान यह भी रखना पडता है,कि जो ग्रह बक्री है,या अस्त है,वह जो भी फ़लादेश लिखा जा रहा है,विपरीत कथन माना जा सकता है,साथ ही जो भी खराब ग्रह खराब स्थान यानी छ: आठ या बारहवें भाव में है,वह बजाय गलत प्रभाव के अच्छा प्रभाव देगा,जब वह बक्री हो या अस्त हो.यही बात स्थान परिवर्तन के मामले में देखी जाती है,और फ़लकथन करते वक्त ध्यान रखा जाता है.प्रस्तुत है गोचर में कुन्डली के ग्रहों पर गुजरने के दौरान मिलने वाले फ़ल
सूर्य पर गोचर से विभिन्न ग्रहों के गुजरने का फ़ल:-
सूर्य पिता है,सूर्य जातक की आत्मा है और सूर्य ही पुत्र है,जब चन्द्र गोचर से जन्म के सूर्य से गुजरता है,तो पिता को अपमान सहना पडता है,शरीर का सूर्य वीर्य के नाम से जाना जाता है,किसी छलिया स्त्री से या किसी छलिया पुरुष से ठगा जाना और अपमान का सामना करना पड सकता है,इन किसी भी कारकों के अन्दर अपने वीर्य को बरबाद किया जा सकता है,सूर्य पिता है,और चन्द्र यात्रा है,पिता को यात्रा भी करनी पड सकती है,जातक के साथ भी यही हो सकता है.चन्द्रमा का सूर्य के ऊपर से गुजरना मात्र सवा दो दिन का माना जाता है,और प्रभाव भी अन्त की सवा दो घडी का होता है.सूर्य और चन्द्र मिलकर महिने का काला दिन भी माना जाता है,इस दौरान किसी भी तरह से किया गया तांत्रिक कार्य शरीर पर प्रभावी हो जाता है,इन दिनो जातक को शमशान यात्रा,किसी तांत्रिक के पास जाना,और किसी प्रकार से किसी दूसरे के प्रति की जाने वाली बुराई से बचना चाहिये,अन्यथा काया और आम में दाग आसानी से लग सकता है.अगर सूर्य कुन्डली में बलवान है,और चन्द्रमा कमजोर है तो जातक की अहम की मात्रा में भडकाव भी आ सकता है,जातक के दिमाग में उग्रता आने से वह किसी भी प्रकार से अपने को बरवाद भी कर सकता है.

मन्गल का सूर्य के ऊपर गोचर:-
मन्गल सूर्य की स्थिति वाली राशि में आता है,तो जातक को खून सम्बन्धी बीमारी से जूझना पड सकता है,पित्त की अधिकता से जातक को उल्टी या दस्त वाली बीमारी हो सकती है,भाई का पिता के साथ कोई जिद्दीपना हो सकता है,पति का पिता के साथ झगडा हो सकता है,हड्डी वाली बीमारियों के लिये किसी डाक्टर से मदद ली जा सकती है,पुलिस का सरकारी कार्यों में हस्तक्षेप हो सकता है,खुद के साथ भी पुलिस के साथ किसी बात को लेकर कानूनी मामला फ़ंस सकता है,इनकम टेक्स या किसी सरकारी कर के बारे में  छापा पड सकता है.

बुध का सूर्य के ऊपर गोचर:-
बुध भूमि का कारक माना जाता है,पिता को या खुद को किसी प्रकार की भूमि का लाभ हो सकता है,भूमि चाहे किराये से या किसी प्रकार से कुछ समय के लिये बैठने के लिये प्रदान की गयी हो,बुध हर हाल में सूर्य का मित्र है,जातक को किसी मित्र से मिलना भी होता है,सूर्य जातक है,तो बुध व्यापार भी है,जातक को कोई नया व्यापार सामने आ रहा हो,सूर्य जातक है तो बुध बहिन बुआ बेटी भी है,जातक के पास मिलने के लिये बहिन बुआ बेटी आ रही हो,बुध बक्री है,और गोचर से बुध अगर सूर्य से मिलने आ रहा है,तो लम्बे समय से पास में रहने वाली बहिन बुआ बेटी कही कुछ समय के लिये जा रही हो.

गुरु का सूर्य के ऊपर गोचर
सूर्य और गुरु दोनो मिलकर जीवात्मा संयोग कहलाता है,गुरु जीव और सूर्य आत्मा दोनो मिलकर महानता की तरफ़ अपने को ले जाते है,गुरु अगर कुन्डली में बलवान है तो जातक को इस समय में काफ़ी सफ़लता मिलती है,अगर धन के भाव का प्रभाव रखता है,तो धन की सफ़लता मिलती है,अगर भाई बहिन के भाव के प्रति अपनी भावना रखता है,तो उनका सहयोग मिलता है,घर और परिवार के प्रति भावना है,तो घर बनता है,और माता के लिये तथा सम्बन्धित जनता के लिये फ़ायदा देने वाला होता है,शिक्षा से जुडा हुआ तो शिक्षा मे सफ़लता देता है,कर्जा दुश्मनी बीमारी से जुडा हुआ है तो उसमे फ़ायदा देता है,जीवन साथी के भाव से जुडा है,तो जीवन साथी या साझेदार से फ़ायदा या सहायता दिलवाता है,अविवाहित लोगों की शादी का समय भी पास मे होता है,मृत्यु के भाव मे होता है,तो बैंक बीमा या किसी प्रकार से पुराना फ़ंसा हुआ धन दिलवाता है,नवे भाव का योगकारक होता है,तो भाग्य और धर्म की तरफ़ रुचि देता है,दसवें भाव का भाव कारक है,तो काम धन्धे और सरकारी कार्यों के अन्दर तरक्की के मार्ग खोलता है,ग्यारहवें भाव से अचल सम्पत्ति और मित्रो से फ़ायदा दिलवाता है,किसी बुद्धिमान का साथ देता है,और अगर बारहवें भाव का कारक बना हुआ है,तो हवाई यात्रायें या ध्यान समाधि की तरफ़ इशारा करता है.

शुक्र का सूर्य के ऊपर गोचर
शुक्र धन और भौतिक कारकों का सहायक माना जाता है,शुक्र ही पुरुष की कुन्डली में पत्नी का कारक होता है,और स्त्री की कुन्डली मे गहनो जेवरातो और सजावत वाली चीजो के बारे मे जाना जाता है,शुक्र को ही जमीनी कारकों से जोडा जाता है,शुक्र से ही फ़लो सब्जियों के लिये जो रस युक्त होती है,के बारे में अपना भाव बताता है,सूर्य स्वर्ण है,तो शुक्र जेवरात के बारे में भी अपनी राय बताता है,सूर्य के साथ जब शुक्र का गोचर होता है,तो जातक को धन की कमी अनुभव होती है,पत्नी बीमार होती है,खेती में सरकारी दखल होता है,गेहूं की पैदावार में बढोत्तरी होती है,गेहूं के भाव चढते है,फ़लो के प्रति सरकारी दखल होता है,गाय और दूध वाले जानवरों के अन्दर तेजी आती है.सरकारी मीडिया और सजावटी सामान की बिक्री के लिये नुमायश आदि का प्रोग्राम आदि बनता है.

शनि का सूर्य के ऊपर गोचर
शनि कार्य का दाता है,शनि जब गोचर से सूर्य के साथ गोचर करता है,तो कार्य में असंतोष पैदा होता है,जो भी काम करवाने वाले होते है,वे अधिकतर खुश नही रहते है,धन बेकार के कामों में खर्च होता रहता है,पिता पुत्र में आपसी विचारों में मतभेद हुआ करता है,शनि और सूर्य की इस युति में मंगल बद हो जाता है,जातक का काम सुबह और शाम का हो जाता है,उसे दिन और रात में किसी प्रकार का कार्य संतुष्ट नही कर पाता है,खाने पीने के लिये हमेशा मन किया करता है,शराब कबाब की तरफ़ मन आकर्षित होता है,और अगर जातक के अन्दर किसी प्रकार की बन्दिश हुआ करती है,तो वह दवाइयों और तामसी चीजों के प्रति अपने को लगा लेता है,अधिकतर इस काल में जातक का दिमाग सही दिशा में नही जा पाता है,मंगल के बद होने के कारण जातक का दिमाग लडाई झगडों की तरह जाता है.

राहु का सूर्य के ऊपर गोचर
पिता के प्रति माया मोह का चक्कर चालू हो जाता है,उसे हर किसी से धन प्राप्त करने और धन के प्रति ही सोच काम करती है,सरकारी कामों में सडक या बिजली वाले कामों का ठेका आदि लेने के लिये जातक का मन जाता रहता है,पिता का अपमान करने से जातक को कोई हिचक नही होती है,वह पुत्र के प्रति उतना वफ़ादार नही होता है जितना कि होना चाहिये,अक्सर उसके भार युक्त दिमाग के कारण पति या पत्नी में मतभेद हुआ करते है,राहु सूर्य को ग्रहण देता है,नाम के आगे कोई न कोई दाग जरूर लग जाता है.पिता को इस दौरान कोई चोट या हादसा होने की पूरी पूरी सम्भावना होती है.

केतु का सूर्य के ऊपर गोचर
केतु सन्यासी प्रवृत्ति दिमाग में देता है,पिता के अन्दर या जातक के अन्दर त्याग की भावना का उदय होना चालू हो जाता है,जातक को लोगों को उपदेश देने वाली बात मिलती है,अक्सर जातक को सरकारी कामो या पिता वाले कामो के लिये डाकिये की तरह से काम करना पडता है,किसी सामाजिक संस्था में कार्य कर्ता के रूप में भाग लेना पडता है.

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

राहु वृष राशि मे और वृश्चिक केतु के घेरे में


राहु वृष राशि में और वृश्चिक केतु के घेरे में
कुंडली मे राहु का गोचर जन्म के गोचर से कुछ अलग ही माना जाता है जन्म के समय का राहु तो व्यक्ति के अन्दर अपनी शक्ति के अनुसार सम्बन्धित भाव और राशि तथा ग्रहों का प्रभाव अजीवन देता है लेकिन गोचर का राहु अपने अनुसार कुछ अलग से ही अपने असर को प्रदान करता है। एक प्रसिद्धि आदमी बदनामी को झेलने लगता है और एक बदनाम आदमी प्रसिद्ध हो जाता है यह सब राहु का खेल ही माना जाता है।
कहा जाता है कि नशा आदमी को या तो बरबाद कर देता है या इतना आबाद कर देता है कि उसकी सात पुस्तो में कोई आबाद या बरबाद नही हुआ होता है। आदमी को कई प्रकार के नशे झेलने को मिलते है,कुंडली के बारह भावो के अनुसार नसे भी बारह भावो से जुडे होते है बदलती है तो केवल प्रकृति राशि ग्रहो के असर और ग्रहो की द्रिष्टि से नशे की लत बदल जाती है।मानसिक भ्रम देने का कारक राहु है और केतु साधन देने के लिये माना जाता है,जिस प्रकार का भ्रम पैदा होना है उसके लिये साधन देने का कार्य केतु करता है,बिना केतु के राहु असमर्थ है और बिना राहु के केतु बेकार है।गुरु के कुंडली मे गोचर के अनुसार यह अपनी मर्यादा को लेकर चलते है और शनि के इशारे से अपने कार्यों को पूरा करते है। अक्सर जब राहु राशि मे हो और केतु सप्तम मे हो तो बडे बडे अनर्थ करवा देता है। वर्तमान मे वृष राशि पर राहु का गोचर चल रहा है और वृश्चिक राशि पर केतु का गोचर चल रहा है। शनि का योगात्मक रूप राहु केतु तथा इन दोनो राशियों के लिये बरबाद करने के लिये और मिट्टी मे मिलाने के लिये अपने प्रभाव को देने लगा है। बाकी के ग्रह भी राहु केतु से नही बचते है और शनि भी अपनी शिफ़्त से सभी ग्रहों को कोई न कोई कारण देकर उसी प्रकार के कार्य करवाने के लिये अपनी गति को प्रदान कर रहा है जिससे राहु केतु के घेरे मे आकर उसी ग्रह के अनुसार अपनी स्थिति को इन दोनो स्थितियों से मुलाकात करवायी जा सके।
गुरु परिवार समाज धर्म और विद्या को देने वाला है सामाजिक ज्ञान और इसी प्रकार के कारणो को प्रदान करने वाला है। जब गुरु मार्गी होता है तो वह अपने स्वभाव से सभी भावो को राशियों को अपनी गति को देकर उपरोक्त कारणो पर चलने या उनसे लाभ हानि देने के लिये अपने प्रभाव को देता है तथा वक्री होकर अपने प्रभाव से जो भी उपरोक्त कारण है उनके अन्दर उल्टी गति को देने के लिये माना जाता है।
उदाहरण के लिये इस राशि वाले जातक अगर वृष राशि का है तो उसके ऊपर राहु का असर एक के तरह से काम करेगा,वह व्यक्ति अपने को भौतिक धन के मामले मे नामी ग्रामी बनना चाहता है वह चाहता है कि लोग उसे धनपति के रूप मे देखे और वह अपने को जहां भी जाये एक धनी व्यक्ति की हैसियत से दिखावा करे,लोग उसके प्रति अपने सम्मान को उसकी आज्ञा को उसके प्रति किये जाने वाले व्यवहार को धन के कारण ही उच्च का समझे,वह जो भी चाहे करे और जो भी चाहे खरीदे जिसे भी चाहे प्राप्त करे। इस बात के लिये उसके अन्दर एक प्रकार का नशा पैदा हो जाता है वह केवल हर बात को काम को इन्सान को व्यवहार को धन के रूप मे ही देखना पसन्द करता है उसे इस बात से कतई भरोसा होता है कि इन्सानियत की भी कीमत होती है व्यवहार मे भी केवल एक दूसरे की सहायता का कारण होता है या इन्सान का जन्म ही केवल लोगो की सहायता करने के लिये हुआ है। उसके लिये केवल सहायता का कारण भी पैदा होता है तो वह केवल अपनी सहायता को धन के रूप मे करना चाहता है उसे अपने धन की कीमत जब पता चलती है जब वृश्चिक का केतु अपना असर देकर असहनीय दर्द और कष्ट देना शुरु करता है,तब वह सोचता है कि वह धन के नशे के अन्दर कितना दुनियादारी को भूल गया था,वह अपने धन से बडे अस्पतालो के चक्कर लगाता है जगह जगह मारा मारा घूमता है और उस समय वह वृश्चिक का केतु मजे से उसका धन हरण भी करता है और वह अपने शरीर को भी बरबाद करता है। इस राशि के आठवें भाव मे गुरु होने से जो भी कारण बनेंगे वह गुप्त रूप मे बनेंगे,गुरु के मार्गी रहने तक तो समाज और परिवार के साथ धर्म तथा कानून का पालन करेगा जैसे ही गुरु वक्री अपना प्रभाव देगा वह कानून और समाज धर्म मर्यादा को त्याग कर उल्टे काम करना शुरु कर देगा जातक गुरु के वक्री होते ही गुप्त रूप से अपने कार्य व्यवहार को लेकर चलने लगेगा,जैसे वह शिक्षा मे है तो वह शिक्षा को छोड कर अपने जीवन को बनाने और जीवन साथी को खोज कर उसके साथ अपने जीवन को बिताने का सोचने लगेगा,वह अगर समझदार है तो अपने शिक्षा स्थान को भी छोड सकता है और अपने संभावित चाहने वाले व्यक्ति के साथ भाग भी सकता है। उसकी इस कार्य मे सहायता करने के लिये केतु अपना पूरा प्रभाव देगा,यानी जो भी साधन इस राहु को चाहिये केतु प्रदान करता रहेगा,जैसे मोबाइल को प्रदान करवाना,कम्पयूटर या लेपटाप को दिलवाना,संचार का कोई न कोई जरिया प्रदान करवाना आदि माना जाना भी उचित ही है। अगर इन साधनो से कोई कारण नही बनता है तो वह किन्ही दो व्यक्तियों से अपनी संचार व्यवस्था से अपने कार्यों को अंजाम देने की कोशिश करेगा। इस राहु का प्रभाव जो जातक के ऊपर डालता है वह सबसे पहले राहु से अपने सम्पर्क को बनाना राहु की तीसरी द्रिष्टि कर्क राशि पर होने से यानी जो व्यक्ति वायव्य दिशा का रहने वाला होगा तथा संचार के कारणो को अपने द्वारा प्रदर्शित करने के बाद बुद्धि स्थान को भ्रमित करने के लिये भी अपनी शक्ति को देगा,इस शक्ति से अगर व्यक्ति विद्या के क्षेत्र मे है तो वह अपनी विद्या वाली शक्ति के अन्दर भ्रम को पैदा करने के बाद अपनी याददास्त को खोने लगेगा या किसी प्रकार के अफ़ेयर आदि के चक्कर में आकर या जल्दी से धन कमाने की कोशिश को समझ कर अपने परिवार और समाज से दूरी प्राप्त करने की कोशिश करेगा। सातवी द्रिष्टि से यह सहयोग देने वाले साधनो संचार और सहयोग के लिये धन के साधन को तथा अपनी गुप्त मंत्रणा के लिये अपने सहयोगी को जो छुपे रूप में होगा उससे अपनी युति को प्राप्त करने लगेगा,सबसे बडा असर अपनी समाज की मर्यादा को समाप्त करने वाला होगा वह अपने पिता को भी बडी बुरी तरह से आहत कर सकता है,पिता की सामाजिक अवस्था को समाप्त करना और पिता की खानदानी स्थिति को बरबाद करने का झटका जातक देने से नही चूक सकता नोवी नजर मकर पर यहां शनि गोचर कर रहें हैंआने वाले  उन्हे कि18 महीने तक
वृष और वृश्चिक राशि वालो को जिनकी कुण्डली में भी राहु केतु यहां पर स्थित है।अपने को बहुत ही संभाल कर चलने की जरूरत है,वे किसी प्रकार के मानवीय संबन्ध को बिना विचारे नही बनाये,अपने लिये खोजे जाने वाले रोजगार मे किसी प्रकार की ऐसी नौकरी आदि का चुनाव नही करे जहां प्रलोभन देकर उनका आगे का शोषण किया जाये उन्हे किसी से भी राय लेने मे भी बहुत ही सोच समझ कर चलने की जरूरत है कि वे अपने को इतना किसी भी व्यक्ति पर निर्भर नही कर ले कि वह वक्त पर आकर अपनी आदत से शरीर समाज परिवार और स्थिति पर ग्रहण को लगा दे.यह समय इन दोनो राशियों के लिये बहुत ही कनफ़्यूजन और एक साथ दो दो रास्ते चुनाव करने के लिये माना जाता है जिससे शरीर धन हिम्मत पहिचान बुद्धि पति पत्नी के सम्बन्ध पारिवारिक और सामाजिक स्थिति को बरबाद करना भी माना जा सकता है,किसी भी समस्या के सुझाव के लिये समर्पक कर सकते हैं आचार्य राजेश 7597718725-9414481324

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

राहु केतु का राशि परिवर्तन! राहु केतु की उल्टी चाल

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राहु केतु का राशि परिवर्तन राहु केतु की उल्टी चाल
अकाश में ग्रहों की चाल लगातार नई नई स्थितियां पैदा करती रहती हैं, वहीं ज्योतिष के नौ ग्रह में होने वाले परिवर्तन हर किसी को काफी हद तक प्रभावित करते हैं। कभी ये परिवर्तन अत्यंत शुभ होती हैं, तो कभी अति विकराल..जी मित्रों आज हम राहु केतु के गोचर को लेकर ही चर्चा करेंगे मिथुन राशि में अपनी यात्रा को पूर्ण करने के बाद पाप ग्रह राहु अब वृष राशि में आया है.   23 सितम्बर 2020 को प्रात: 08:20 पर राहु ने मिथुन से वृषभ राशि में संचार किया और यह 12 अप्रैल 2022 तक इसी राशि में स्थित रहेगा। राहु हमेशा वक्री अवस्था में ही संचार करता है।  राहु का गोचर मानव जीवन पर बहुत अहम भूमिका निभाता है।राहु के लिए कहा गया है कि राहु अगर बिगड़ जाए तो जिंदगी नर्क सी बना देता है और सुधर जाए तो ताज भी पहना देता है।राहु का अशुभ प्रभाव-
अगर जातक की कुंडली के अशुभ भाव में राहु बैठा होता है तो बीमारी, नेगेटिविटी, परेशानियां और मानसिक तनाव होता है। कभी-कभी राहु के प्रभाव के कारण जातक की बुद्धि काम नहीं करती और वह गलत फैसले लेने लगता है।
कुंडली में शुभ भाव में राहु- जिस जातक की कुंडली में राहु हो उस जातक को सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है। ऐसे जातकों की किस्मत पलट जाती है और उन्हें समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।राहु के लिए ही कहा गया है कि राहु जिसे मारे तो फिर उसे कौन तारे और राहु जिसे तारे फिर उसे कौन मारे।  राहु अगर खराब फल दे तो मुक़द्दमों में अवश्य फंसवाता है और बिना बात की मानसिक परेशानियों में उलझा देता है। वहीं राहु का शुभ प्रभाव हो तो जातक को बहुत सारा धन और राजनीति में मान तथा सम्मान के साथ उच्च पद भी मिलता है।,दरअसल राहु प्रदर्शन कराने वाला होता है। यह गुब्बारे जैसा होता है, जो जगह अधिक घेरता है, जबकि अंदर से खाली होता है। ऐसे में राहु अति आत्मविश्वासी भी बनाता है जो बाद में परेशानी का कारण बनता है। वहीं यदि इसके कारण आने वाले अति आत्मविश्वास पर को व्यक्ति नियंत्रण में रखता है, तो यह व्यक्तित्व का काफी प्रसार करता है। राहु के चलते व्यक्ति बहिर मुखी हो जाता है अपनी बात को सबके सामने रखने में निपुण हो जाता है। वैसे यह भी देखा गया है कि कई बार व्यक्ति को इसके चलते कॅरियर में अच्छी उन्नति भी मिलती है। विज्ञापन, राजनीति, मार्केटिंग, सेल्स संबंधित क्षेत्र से जुडे लोगों को इस राहु से लाभ भी होता है। खैर हम गोचर की बात कर रहे हैं मित्रों मैं यहां उन एस्ट्रोलॉजर की तरह बकवास नहीं करूंगा जो किसी भी ग्रह के राशि परिवर्तन को लेकर सभी राशियों का फल बताना शुरू कर देते हैं बिना नक्षत्रों को देखें एक राशि में कितने नक्षत्र होते हैं।सभी ग्रहो के तीन तीन नक्षत्र होते हैं.गोचर में ग्रह जिस नक्षत्र में होता है उस नक्षत्र के अनुसार इनका फल भी परिवर्तित होता है। उदाहरण  मेष राशि को ही ले ले मेष राशि के अंदर 3 नक्षत्र आते हैं। अश्वनी, भरणी कृतिका अब इन तीनोंनक्षत्रो का फल मेष राशि के लोगों के लिए अलग- अलग होगा। ब्रह्मांड में स्थित ग्रह अपने-अपने मार्ग पर अपनी-अपनी गति से सदैव भ्रमण करते हुए एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते रहते हैं। जन्म समय में ये ग्रह जिस राशि में पाये जाते हैं वह राशि इनकी जन्मकालीन राशि कहलाती है जो कि जन्म कुंडली का आधार है। जन्म के पश्चात् किसी भी समय वे अपनी गति से जिस राशि में भ्रमण करते हुए दिखाई देते हैं, उस राशि में उनकी स्थिति गोचर कहलाती है।  वास्तविकता तो यह है कि किसी भी ग्रह का गोचर फल उस ग्रह की अन्य प्रत्येक ग्रह से स्थिति के आधार पर भी कहना चाहिए न कि केवल एक ग्रह की स्थिति से।राहू अगर हाथी है तो मंगल महावत है। लिहाजा अपनी उच्च राशि मे होते हुए भी राहू, मंगल के नक्षत्र मे गोचर करते हुए कम हानिकारक हो जाएगा। इस महामारी का कारक राहू ही है, शनि ओर केतु उसके सहायक हैं और गुरु इस सिस्टम मे कैटेलिस्ट यानी उत्प्रेरक की भूमिका मे है। राहु को अमूमन थोड़ा वाचाल प्रकृति का माना जाता है। लेकिन ज्योतिषीय गणना ये भी बताती है कि राहु बहुत बार काफी कुछ देकर भी जाता है, चाहे वो व्यक्ति विशेष की बात हो या फिर समाज, राष्ट्र और दुनिया की। बात करते हैं मित्रों इसका असर अगले 18 महीने तक देखने को मिल सकता है।  आने वाले 18 महीने में चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हो सकते हैं। आतंकवाद और नक्सलवाद पर रोकथाम हो सकती है। पशुधन, शाकाहार और ज्योतिष, अध्यात्म की तरफ लोगों का रुझान बढ़ सकता है। ज्योतिषी गणना से राहु और केतु के राशि परिवर्तन की विवेचना करें तो ये अनुमान लगाया जा सकता है कि राहु और केतु के राशि परिवर्तन से आंखों के रोग बढ़ सकते हैं। लेकिन जीभ, लार, मुख की सर्जरी सहित लाइलाज बीमारियों का उपचार मिल सकता है।ग्रहों की दिशाएं ऐसी गणना दिखा रही हैं कि आतंकवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, रंगभेद, क्षेत्रवाद, भाषावाद बहुत तेजी से फैल सकते हैं और उतनी ही तेजी से उनका खात्मा भी हो सकता है। विश्व के कई देश और सरकारें एकजुट होकर इन सब को समाप्त करने की कोशिश कर सकती हैं। इसकी शुरुआत फ्रांस या यूरोप के किसी देश से हो सकती है याकोरोना महामारी की वजह से बाजार में मंदी देखने को मिल रही है। नया साल लगते ही, यानी जनवरी के 2021 के अंत तक बाजार में रौनक देखने को मिल सकती है और धीरे धीरे मंदी पर काबू पाया जाने की उम्मीद लगा सकते हैं। शेयर बाज़ार, कमोडिटी एक्सचेंज में पूर्वानुमान बढ़ सकता है। पशुधन की ओर लोगों का रुझान बढ़ेगा।
बड़े अविष्कार आ सकते हैं सामने
अगले 18 महीनों में जब सूर्य मेष सिंह धनु नवांश में या बुध कन्या तुला वृश्चिक नवमांश में होगा, तो कोई बड़े आविष्कार भी दुनिया के सामने आ सकते हैं। केतु जब भी वृश्चिक राशि से गुजरता है तो कुछ ना कुछ बुराई को खत्म करता है। राहु-केतु के राशि परिवर्तन से अचानक लाभ, अचानक कष्ट या नुकसान देखने को मिल सकता है।
सत्ता पक्ष में बढ़ सकती है बेचैनी
प्रदेश व देश के विकास में सहायक होगा, तो सत्ता पक्ष में बेचैनी बढ़ाएगा। राहु में जहां शनि के गुण होते हैं तो केतु में मंगल के गुण है।राहु-केतु के बारे में प्राय: माना जाता है कि 'शनि वत राहु, कुज वत केतु' अर्थात राहु शनि के समान और केतु मंगल के समान फल देता है। परंतु यह अनुभव से जाना गया है कि ये दोनों ही ग्रह छाया ग्रह हैं और जिस राशि में होते हैं या गोचर में भ्रमण करते हैं, उसी के स्वामी ग्रहानुसार फल देते हैं। इन दोनों का राशि परिवर्तन कई लोगों के लिए राहत लेकर आएगा, तो कुछ  कों परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।भारत का अपने पड़ोसी देशों से तनाव बढ़ेगा युद्ध हो सकता है या युद्ध जैसे हालात पैदा हो सकते हैं मित्रों आज इतना ही अगर पोस्ट अच्छी लगे तो लाइक व शेयर जरूर किया करें धन्यवाद आचार्य राजेश

सोमवार, 7 सितंबर 2020

क्या है अधिकमास, कब आता है, जानिए इसका पौराणिक आधार सितंबर 2020 क्यों है खास , जानिए कब है नवरात्रि, दशहरा और दीपावली


 ‍165 साल बाद अद्भुत योग : 1 से 17 सितंबर तक श्राद्धपक्ष, नवरात्र 17 अक्टूबर से शुरूअघिक मास मलमास 18 सितंबर से शुरू होगा. क्या रहेंगे शुभ योग 
मित्रों शारदीय नवरात्र की शुरुआत पितृपक्ष की समाप्ति के बाद हो जाती है। मगर इस बार 165 साल बाद अद्भुत योग बना है। पितृ पक्ष की समाप्ति के बाद शारदीय नवरात्र शुरू नहीं होंगे, बल्कि एक महीने के बाद नवरात्रों की शुरुआत होगी। अश्विनी माह में श्राद्ध पक्ष 1 सितंबर से शुरू होकर, जो कि 17 सितंबर तक चलेगा। आमतौर पर पितृपक्ष के समाप्त होते ही अगले दिन नवरात्र आरंभ हो जाता है। पितृ अमावस्या के अगले दिन से ही प्रतिपदा के साथ शारदीय नवरात्र का आरंभ होना था, मगर इस बार नवरात्र की शुरुआत 17 अक्तूबर से होगी। 165 साल बाद लीप वर्ष और अधिक मास दोनों ही 1 साल में हो रहे हैं। चातुर्मास लगने से विवाह मुंडन कर्ण छेदन जैसे मांगलिक कार्य नहीं होते। इस काल में पूजन पाठ व्रत उपवास और साधना का विशेष महत्व होता है। इस दौरान देव सो जाते हैं, देवउठनी एकादशी के बाद देव जागृत होते हैं। इस साल 17 सितंबर को श्राद्ध समाप्त होंगे, इसके अगले दिन अधिक मास शुरू होगा जो 16 अक्तूबर तक चलेगा। इसके बाद 17 अक्तूबर से नवरात्रि व्रत उपवास रखे जाएंगे।
अचिकमास या मलमास कावैज्ञानिक आधार- 
  भारतीय हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिक मास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है। इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को पाटने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिक मास का नाम दिया गया है।अधिमास 18 सितंबर से शुरू होकर 16 अक्टूबर तक चलेगा। इसके कारण श्राद्ध अनुष्ठान के बाद तुरंत नवरात्र पूजन नहीं शुरू हो सकेंगे। नवरात्र 17 अक्टूबर से शुरू होंगे। इस क्रम में 26 अक्टूबर को दशहरा और 14 नवंबर को दीपावली होगी। इसके बाद 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास समाप्त होगा।अधिमास को ही मलमास भी पुकारते हैं, क्योंकि उस महीने में सूर्य की संक्रांति नहीं होती है। इसलिए यह महीना मलिन हो जाता है। मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने मलमास को अपना नाम पुरुषोत्तम माह दिया है। हर साल 24 एकादशियां होती हैं, पर इस साल मलमास के कारण 26 एकादशियां होंगी। अधिमास की पहली पुरुषोत्तमी एकादशी 27 सितंबर को और दूसरी 13 अक्टूबर को होगी। हैमल मास क्यों कहा गया?-
हिंदू धर्म में अधिक मास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। माना जाता है कि अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन होता है। इसलिए इस मास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृह प्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते हैं। मलिन मानने के कारण ही इस मास का नाम मल मास पड़ गया है।
पुरुषोत्तम मास का नाम क्यों और कैसे पड़ा-
अधिक मास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिक मास को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। इस विषय में एक बड़ी ही रोचक कथा पुराणों में पढ़ने को मिलती है। कहा जाता है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। चूंकि अधिक मास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ, तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार ना हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने उपर लें। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मल मास के साथ पुरुषोत्तम मास भी बन गया।
इसका महत्व क्यों है?-
हिंदू धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव पंचमहाभूतों से मिलकर बना है। इन पंचमहाभूतों में जल, अग्नि, आकाश, वायु और पृथ्वी सम्मिलित हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप ही ये पांचों तत्व प्रत्येक जीव की प्रकृति न्यूनाधिक रूप से निश्चित करते हैं। अधिक मास में समस्त धार्मिक कृत्यों, चिंतन-मनन, ध्यान, योग आदि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित इन पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। इस पूरे मास में अपने धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयासों से प्रत्येक व्यक्ति अपनी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति और निर्मलता के लिए उद्यत होता है। इस तरह अधिक मास के दौरान किए गए प्रयासों से व्यक्ति हर तीन साल में स्वयं को बाहर से स्वच्छ कर परम निर्मलता को प्राप्त कर नई उर्जा से भर जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किए गए प्रयासों से समस्त कुंडली दोषों का भी निराकरण हो जाता है।
 मित्रों18 सितंबर से शुरू हो रहे अधिक मास में 15 दिन शुभ योग रहेंगे। शुक्रवार, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और शुक्ल योग में शुरू हो रहे अधिक मास के आखिरी दिन 17 अक्टूबर तक खास मुहूर्त और योग बन रहे हैं। इस  दौरान सर्वार्थसिद्धि योग 9 दिन, द्विपुष्कर योग 2 दिन, अमृतसिद्धि योग 1 दिन और पुष्य नक्षत्र 2 दिन तक आ रहा है। पुष्य नक्षत्र भी रवि और सोम पुष्य होंगे।
अधिक मास में उपवास, पूजा- पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते हैं। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ- हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इसीलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है।
शुभ योग
शुरुआत 18 सितंबर को शुक्रवार, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और शुक्ल नाम के शुभ योग में होगी। ये दिन काफी शुभ रहेगा
सर्वार्थसिद्धि योग - ये योग सारी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला और हर काम में सफलता देने वाला होता है। अधिक मास में 9 दिन ये 26 सितंबर एवं 1, 4, 6, 7, 9, 11, 17 अक्टूबर 2020 को ये योग रहेगा।

द्विपुष्कर योग - द्विपुष्कर योग ज्योतिष में बहुत खास माना जाता है। इस योग में किए गए किसी भी काम का दोगुना फल मिलता है, ऐसी मान्यता है। 19 एवं 27 सितंबर को द्विपुष्कर योग रहेगा।​​​​​​​

अमृतसिद्धि योग - अमृतसिद्धि योग के बारे में ज्योतिष ग्रंथों की मान्यता है कि इस योग में किए गए कामों का शुभ फल दीर्घकालीन होता है। 2 अक्टूबर 2020 को अमृत सिद्धि योग रहेगा।

पुष्य नक्षत्र - अधिक मास में दो दिन पुष्य नक्षत्र भी पड़ रहा है। 10 अक्टूबर को रवि पुष्य और 11 अक्टूबर को सोम पुष्य नक्षत्र रहेगा। यह ऐसी तारीखें होंगी जब कोई भी आवश्यक शुभ काम किया जा सकता है

शनिवार, 15 अगस्त 2020

लाल किताब अनुसार ग्रहों के रुप और उपाय


नवग्रह कहे जाने वाले 9 ग्रह वैदिक ज्योतिष में बड़ा महत्व रखते हैं | इसमें सूर्य, चन्द्रमा के अलावा मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और राहु-केतु शामिल हैं | इनमें से राहू-केतु को छाया ग्रह (Planets) माना जाता है | आपको बता दूं कि इन सभी ग्रहों की प्रकृति एक-दूसरे से भिन्न होती है। कुछ बहुत शुभ होते हैं, तो कुछ आपके काम में रूकावट डालने का प्रयास करते हैं। अतः आज हम उसी पर चर्चा करेंगेग्रहों का प्रतिनिधित्व हमारे जीवन के साथ-साथ हमारे शरीर के विभिन्न अंगों पर भी होता है। ऋषियों ने भी मस्तक के बीच भगवान सूर्य का स्थान माना है। ज्योतिष विद्या के अनुसार भी मस्तिष्क पर सूर्य देव का अधिकार होता है। चिंतन और मनन, इन सभी का आधार सूर्य ग्रह को माना गया है सूर्य ग्रह से एक अंगुली नीचे चंद्रमा का स्थान माना गया है। चंद्रमा का नाता भावुकता और चंचलता से है, साथ ही मनुष्य की कल्पना शक्ति भी चंद्रमा के द्वारा ही संचालित होती है। ज्योतिष भी कहता है कि चंद्रमा को अपनी रोशनी के लिए सूर्य पर ही निर्भर रहना पड़ता है, इसलिए चंद्रमा हमेशा सूर्य के साये में ही रहता है। जब सूर्य का तेज रोशनी बनकर चंद्रमा पर पड़ता है तभी व्यक्ति के विचार, उसकी कल्पना और चिंतन में सुधार आता है। गरुड़ पुराण के अनुसार नेत्रों में मंगल ग्रह का निवास माना गया है। 
मंगल ग्रह शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और यह रक्त का संचालक माना गया है। बुध ग्रह को हृदय में स्थापित ग्रह माना गया है। बुध बौद्धिकता और वाणी का कारक ग्रह माना गया है। जब भी किसी व्यक्ति का व्यवहार, स्वभाव और वाचन शक्ति का पता लगाना हो तो बुध ग्रह की स्थिति को ही देखा जाता है। कामवासना और इच्छाशक्ति, इसका प्रतिनिधित्व शुक्र ग्रह द्वारा ही किया जाता है। शनि का स्थान नाभि में माना गया है। किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि और बृहस्पति, एक ही भाव में मौजूद हों तो ऐसा व्यक्ति वेदों, पुराणों और शास्त्रों का ज्ञाता होता है। राहु का स्थान मानव मुख में माना गया है। राहु जिस भाव में बैठा होता है उसी के अनुसार फल देता है। इसके साथ अगर मंगल का तेज मिल जाए तो ऐसा व्यक्ति क्रोधी तो होता है साथ ही उसकी वाणी में वीरता होती है। राहु के साथ अगर बुध की शक्ति मौजूद हो तो संबंधित जातक मधुर वाणी बोलता है, वहीं बृहस्पति की शक्ति हो तो वह अत्यंत ज्ञानवर्धक और शास्त्रों से जुड़ी बातें बोलेगा। अगर राहु के साथ शुक्र की शक्ति मिल जाए तो व्यक्ति बहुत रोमांटिक बातें करता है। केतु का स्थान कंठ से लेकर हृदय तक होता है। केतु ग्रह का संबंध गुप्त और रहस्यमयी कार्यों से भी होता है। गुरु गुरु हवा का कारक है जीव का कारक है प्राण का कारक है।इसी तरह ग्रहो के शुभफल के लिए हम 
कई प्रकार के रत्न आभूषण धातु तंत्र मंत्र यंत्र आदि उपाय को अपनाते हैं पर जब कोईअपाय काम नही कर रहे हा तो अपने निवास मे उस ग्रह के लिये एक सटीक उपाय और भी है जो अंजवाया हुआ है और काम भी सही करता है।यह उपाय किसी भी जाति धर्म या संस्कार वाला कर सकता है तथा किसी प्रकार की बन्दिस इस उपाय मे नही है। लाल किताब के अनुसार ग्रहों के अलग अलग देवता होते है,जैसे सूर्य के देवता विष्णु होते है चन्द्रमा के देवता शिवाजी होते है,मंगल के दो प्रकार के देवता होते है एक मंगल नेक के देवता हनुमान जी को माना गया है और मंगल बाद के देवता भूत प्रेत पिशाच माने जाते है बुध की देवी दुर्गा होती है गुरु के ब्रह्मा जी माने जाते है शुक्र की लक्ष्मी और शनि के देवता भी शिवजी माने जाते है लेकिन वे शासमशानी देवता भैरो के रूप में जाने जाते है राहू के देवता सर्प होते है केतु के देवता गणेश जी को भी माना गया है और जो भी देवताओं के वाहन होते है उन्हें भी केतु का देवता माना जाता है.उसी प्रकार से मिश्रित गढ़ों के देवताओं का रूप भी अलग अलग बन जाता है जैसे सूर्य और चन्द्र के देवता मिलकर पार्वती का रूप बन जाता है सूर्य और मंगल के देवता के रूप में भगवान राम को माना जाता है सूर्य और बुध के रूप में इंद्र को माना जाता है सूर्य और गुरु के बीच में विश्वामित्र को माना जाता है सूर्य और शुक्र के लिए विष्णु लक्ष्मी को माना जाता है सूर्य और शनि के लिए गायत्री को माना जाता है सूर्य और राहू के लिए राजा बलि को माना जाता है सूर्य और केतु के लिए अश्विनी कुमार को माना जाता है.इसी प्रकार से चन्द्र मंगल के लिए दक्षिण मुखी शिवजी को माना जाता है माता भद्रकाली को भी पूजा जाता है,चन्द्र और बुध के लिए सरस्वती को माना जाता है चन्द्र और गुरु के लिए पवन देवता को माना जाता है चन्द्र और शुक्र के लिए गाय को देवता के लिए माना जाता है चन्द्र और शनि के लिए अर्धनारीश्वर को माना जाता है चन्द्र और राहू के लिए स्थान देवता को तथा चन्द्र और केतु के लिए पार्वती सहित गणेश जी को माना जाता है,मंगल और बुध के लिए गरुण पर सवार विष्णु को माना जाता है मंगल और गुरु के लिए माता तारा को पूजा जाता है मंगल और शुक्र के लिए गरुण पर सवार गायत्री को माना जाता है मंगल और शनि के लिए ज्वालामुखी देवी को पूजा जाता है मंगल और राहू के लिए प्रेतात्मक शक्तियों को माना जाता है मंगल केतु के लिए काली और शाकिनी आदि की पूजा की जाती है,बुध और गुरु के लिए वैदिक पूजा को माना जाता है बुध और शुक्र के लिए कुलदेवी की पूजा की जाती है बुध और शनि के लिए कार्तिकेय को पूजा जाता है बुध और राहू के लिए सरस्वती का रूप माना जाता है बुध और केतु के लिए कार्तिकेय को पूजा जाता है.गुरु और शुक्र के लिए इन्द्रानी की पूजा की जाती है गुरु और शनि के लिए अमरनाथ को पूजा जाता है गुरु और राहू के लिए केदार नाथ का पूजन किया जाता है गुरु केतु के लिए बद्रीनाथ को पूजा जाता है.शुक्र और शनि के लिए भोमिया जी की पूजा की जाती है शुक्र और राहू के लिए गज लक्ष्मी को पूजा जाता है शुक्र और केतु के लिए गणेश जी के साथ लक्ष्मी को पूजा जाता है,शनि राहू के लिए भैरो को पूजा जाता है शनि केतु के लिए रूद्र की पूजा की जाती है.
इसी प्रकार से जो कष्ट मिलते है उनके लिए मिश्रित ग्रहों के प्रभाव को देखना चाहिए जैसे सूर्य और गुरु इकट्ठे हो और आर्थिक कष्ट हो रहा हो तो गुरु से सम्बंधित उपाय करने जरूरी होती है,जैसे पीली वस्तुओ का सेवन करना और सोने के आभूषण धारण करना या सोने के पात्रो में भोजन करना,सूर्य और शनि के इकट्ठे होने पर पुत्र की पैदाइस के बाद स्त्री का स्वास्थ्य खराब हो गया हो तो स्त्री के वजन के बराबर हरी वस्तुओ का दान करना चाहिए,जैसे वजन के बराबर का चारा गायो को खिलाना.इसी प्रकार से सूर्य और शनि के इकट्ठे होने पर अगर राज्य की तरफ से कोइ हानि मिल रही है या कार्य बंद हो रहा हो तो फ़ौरन सूर्य से सम्बंधित वस्तुओ को दान करना चाहिए जैसे गेंहू आदि इसी प्रकार से शनि के कारण अगर इज्जत में दिक्कत आ रही हो तो फ़ौरन लोहा तेल बादाम आदि दान करने चाहिए.
 चन्द्रमा और राहू अगर कुंडली में इकट्ठे है और माता या मन या मकान पर कोइ संकट आ रहा है वाहन के बार बार एक्सीडेंट आदि हो रहे है हो तो फ़ौरन राहू से सम्बन्धित चीजे पानी में बहानी चाहिए जैसे कोयला सरसों राख आदि,इसी प्रकार से शनि चन्द्र के इकट्ठे होने से अगर चलता हुआ व्यापार रुक रहा है तो शनि से सम्बंधित धुप व्यापार स्थान में रोजाना जलाने से ग्राहकी चलने लगती है यह धुप खुद भी बनायी जा सकती हैजैसे एक पाव काली मिर्च एक पाव लाख जिसकी चूड़ी आदि बनायी जाती है एक पाव गुग्गुल को लेकर बारीक पीस करदेसी घी और कपुर सभी को मिलाकर शाम के समय व्यापार स्थान में आग बनाकर धुप की तरह जलाकर रखना चाहिए.

रक्की,उन्नति रोकी तो नहीं जा रही? कहीं आप बुरे प्रभाव में तो नहीं?

कहीं आपकी तरक्की,उन्नति रोकी तो नहीं जा रही? कहीं आप बुरे प्रभाव में तो नहीं?

www.acharyarajesh.in कर पा रहे आप अच्छे पृष्ठभूमि से हैं। पर आप उसे भी बरकरार नहीं रख पा रहे जो बाप-दादाओं ने बनाया उसे भी नहीं संभल पा रहे ,जबकि आपमें सारी क्षमताएं और योग्यताएं हैं। आप अच्छी शिक्षा ,क्षमता ,योग्यता के बावजूद निम्न स्थिति में जीने को विवश हैं ,जबकि आपके आसपास अथवा परिवार में ही कोई अन्य लगातार उन्नति करता जा रहा ,हर तरफ विकास करता जा रहा अनावश्यक कभी रोग तो कभी हानि ,कभी कलह तो कभी लड़ाई झगड़े ,कभी कर्ज तो कभी दुर्घटनाएं ,कभी बच्चों की समस्याएं तो कभी माता -पिता की ,कभी नौकरी में समस्या तो कभी व्यवसाय में ,कभी पारिवारिक विवाद /मतभेद तो कभी मुकदमे लगातार कुछ न कुछ लगा ही रहता है ,जबकि आप यदि एकाग्र हो कर किसी भी क्षेत्र में जुट जाएँ तो आप सफल हो जायेंगे ,पर आप एकाग्र हो ही नहीं पा रहे ,पूरा समय लक्ष्य पर दे ही नहीं पा रहे इन सबके पीछे कुछ नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हो सकता है। आप माने या न माने पर ऐसा होता है।  विज्ञान भी नकारात्मक और सकारात्मक ऊर्जा को स्वीकार करता है। यह नकारात्मक ऊर्जा ग्रह दोष के कारण हो सकती है। वास्तु दोष के कारण हो सकती है। स्थान अथवा भूमि दोष के कारण हो सकती है। आपके यहाँ पित्र दोष के कारण हो सकती है। आपके कुलदेवता /देवी की असंतुष्टि के कारण हो सकती है। कहीं से आये भूत -प्रेत -ब्रह्म -जिन्न के कारण हो सकती है। किसी के द्वारा भेजे गए भूत-प्रेत के कारण हो सकती है। किसी के द्वारा आपके विरुद्ध किसी तांत्रिक से अभिचार कराने के कारण हो सकती है। आपके किसी नजदीकी द्वारा समय समय पर आपके विरुद्ध टोटके किये जाने के कारण हो सकती है। आपके व्यावसायिक प्रतिद्वंदी अथवा दुश्मन या विरोधी द्वारा आपके विरुद्ध अभिचार कराने के कारण हो सकती है। नौकरी के किसी सहकर्मी अथवा किसी परिचित द्वारा आपकी उन्नति न देख पाने से कोई क्रिया कराने के कारण हो सकती है। इन नकारात्मक या दूषित प्रभावों के कारण ,आपकी उन्नति रुक जाती है ,आपका पतन होने लगता है। स्वभाव में खराबी आ जाती है। व्यवहार व् बर्ताब बिगड़ने लगता है। समय पर कार्य में बाधा आती है। आपके निर्णय गलत होने लगते हैं। आलस्य और प्रमाद घेरने लगता है। निराशा और डिप्रेसन होने लगता है। कभी स्वभाव में उग्रता आती है कभी हीन भावना ,क्षोभ और वितृष्णा रहती है। बुरे स्वप्न आ सकते हैं।अशुभ लक्षण दिख सकते हैं ।रात में निंद का ना आना या भय सा महसूस हो सकता है। कभी ऐसा लग सकता है। की कमरे में आपके अतिरिक्त भी कोई है। किन्तु आपको दीखता नहीं कभी सोते समय कोई आपके ऊपर आ सकता है। लग सकता है। की कोई आपको दबा रहा है। कभी कोई  शक्ति अलग अलग चेहरे भी दिखा सकती है। या चेहराविहीन भी हो सकती है। बार बार घर परिवार अथवा खुद पर बीमारी आ सकती है।घर या कमरे से दुर्गन्ध महसूस हो सकती हैं।सीलन भरा वातावरण बन सकता है। बिना मतलब मुकदमे ,विवाद शुरू हो सकते है। पूरी म्र्हनत के बाद भी व्यवसाय दिन पर दिन कम हो सकता है।सारे प्रयास के बाद भी नौकरी नहीं लग रही या उपयुक्त नहीं मिल रही ।अगर ऐसा कुछ है तो आप नकारात्मक उर्जा से प्रभावि हैं।अगर आपके घर में जाते समय आपका सर भारी हो जाए अथवा आपके कार्य व्यवसाय की जगह पहुचते ही सर भारी हो जाए अथवा दोनों जगह सर भारी हो अनायास अशुभ लक्षण बार बार अथवा कभी लगे की दिमाग विचारशून्य हो गया है या सोचने समझने की क्षमता कम हो जाए कहीं ठीक से मन न लगे तनाव और मानसिक भारीपन महसूस हो |खुद पर से ही विश्वास कम हो जाए बेवजह कमजोरी महसूस हो कुछ करने का मन न करे आलस्य हो तो आप नकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित हो सकते हैं। और इनके द्वारा आपकी उन्नति रोकी जा रही है।इस प्रकार की नकारात्मक उर्जाओं का प्रभाव टोटकों से नहीं समाप्त किया जा सकता इस तरह की समस्याओं को सोसल मीडिया और टोटकों /उपायों की किताबों से पढ़कर अथवा नीम हकीम ज्योतिषी -तांत्रिक से सुनकर करके नहीं हटाया जा सकता ,क्योकि इन्हें तो खुद इनकी तकनिकी ,समय ,मुहूर्त ,पूर्ण क्रिया ,इसके विज्ञानं ,उर्जाओं की समझ नहीं होती न जानकारी होती है। यह खुद यहाँ वहां लिखे अथवा पोस्ट किये हुए उपाय अथवा टोटके उठाकर बता देते हैं। कैसे ,कब ,कहाँ ,किस तरह और क्यों किये जा रहे उपाय अथवा टोटके जानकारी नहीं होती ,इनके पीछे क्या विज्ञान कार्य करता है ,कैसे ऊर्जा समीकरण बनते और बनाये जाते हैं। इन्हें खुद नहीं पता इसीलिए लाखों लोग ऐसे उपाय ,टोटके करके कोई लाभ नहीं पाते और इनका विश्वास ज्योतिष और तंत्र से उठ जाता है ,इन्हें लगता है। सब ठग हैं। और केवल यह सब ठग विद्या है। वास्तव में यहाँ बस वास्तविक पकड़ की बात होती है ।तलवार की जहाँ जरुरत है। वहां सुई चुभोने से काम नहीं होता अपितु नकारात्मक ऊर्जा और उग्र हो अधिक नुक्सान करती है।किसी को छेड़कर अथवा लाठी मार के छोड़ दीजिये तो वह और उग्र हो प्रतिक्रिया करता है ऐसा ही कुछ नकारात्मक उर्जा के साथ होता है |ज्योतिषीय उपाय भी अगर पूर्ण और प्रभावी नहीं किये जाएँ तो कोई प्रभाव नहीं दे पाते टोटके केवल सामान्य परिस्थिति में ही प्रभाव डालते हैं। नकारात्मक ऊर्जा अगर शक्तिशाली हुई तो टोटकों पर उलटी ही प्रतिक्रिया सामने आती है ।यही सब कारण है की यहाँ वहां से लोग उपाय जानकर करते रहते हैं। और परेशान के परेशान ही रहते हैं।इस तरह की नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाब कोकाटने के लिए किसी अच्छे जानकार से ही परामर्श करना चाहिए, और उसके बताये मार्गों का ही अनुसरण करना चाहिए यहाँ वहां से उपाय देखकर और सुनकर नहीं करना चाहिए ,क्योकि इनका अपना विज्ञानं होता है और हर वस्तु ऊर्जा स्वरुप है ,जिसका उपयोग उचित ढंग से न होने पर या तो लाभ होगा नहीं अथवा नुकसान भी संभव है |तांत्रिक उपायों में तो और भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए नकारात्मक ऊर्जा पर सात्विक और सौम्य शक्तियों का बहुत प्रभाव नहीं पड़ता हाँ यह घर और व्यक्ति पर सकारात्मक ऊर्जा बढ़ा जरुर देती हैं जिससे नकारात्मकता की मात्रा का बैलेंस जरुर कम हो जाता है पर वह न समाप्त होती है न कम होती है जो अच्छे या शुभ परिणाम दीखते हैं वह सकारात्मकता बढने के कारण होते हैं।नकारात्मक ऊर्जा तो यथावत बनी ही रहती है और गाहे बगाहे अपना असर दिखाती ही रहती है। नकारात्मक उर्जाओं को हटाने के लिए उग्र शक्तियों का ही सहारा लेना पड़ता है। इसीलिए तांत्रिक और उग्र महाविद्याओं ,भैरवकाली, आदि के साधक इन कार्यों में अधिक सफल होते हैं। नकारात्मकता हटाने के लिए उग्र महाशक्तियों यथा काली ,बगलामुखी ,तारा ,काल भैरव ,नृसिंह ,दुर्गा ,आदि की साधना उपासना और हवन अधिक प्रभावी होते हैं इन नकारात्मक शक्तियों से किसी भी तरह प्रभावित व्यक्तयों को उपरोक्त उग्र शक्तियों के यन्त्र ,कवच में धारण करने चाहिए,स्पष्ट छाया या वायव्य बाधाओं से ग्रस्त व्यक्तियों को खुद  कवच धारण करना चाहिए, और किसी अच्छे तांत्रिक या महाविद्या साधक से संपर्क करना चाहिए,नोट कुछ लोग दो कश्तियों पर सवार होकर  समस्याओं का हल करना चाहते हैऐसे सज्जन कभी भी सफल नहीं हो पाते किसी जानकार योग्य से ही हल करवाएं एक पर भरोसा करके उसके कहे अनुसार ही उपाय करें  जय माता दी

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

मंत्र की शक्ति

मंत्र की शक्ति
मंत्र की अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र सत्ता है।मंत्र विद्या के रहस्य इस दुनिया के ऐसे अजूबे हैं कि जिनके समझ में आ गए, उनके लिए किसी दिव्य अनुदान से कम नहीं हैं हमारा भारतवर्ष इस क्षेत्र में सर्वोपरि था, क्योंकि यहां के साधक और महर्षि अपने आप में मंत्रमय थे, उनका पूरा जीवन मंत्र और उनके रहस्य को समझने-समझाने में बीत जाता था। वे शिष्यों को अपने साथ रखकर उन्हें पुत्रवत स्नेह देते थे और उन्हें मंत्र की मूल ध्वनि का ज्ञान कराते थे। यह परम्परा मौलिक रूप से बराबर आगे बढ़ती गयी, परन्तु मुगलकाल में इस पद्धति का ह्रास हुआ और उस समय फारसी कलमा तथा इसी प्रकार के मंत्रों का प्रचलन बढ़ा, फलस्वरूप मूल मंत्र और उसके रहस्य को समझने वाले महर्षि कम होते गए।मंत्र का अर्थ होता है जो मन से त्राण दिला दे यानी मन से मुक्त कर दे । मन से मुक्त होने का एक अर्थ ये भी है कि आप ध्यान की अवस्था मे प्रवेश कर गए।कई लोग ध्यान का अर्थ मन का एकाग्र होना मानते है पर ऐसा नही है। ध्यान का अर्थ न मन की एकाग्रता से है न चंचलता से ध्यान निर्विचार अवस्था है ।
अब मंत्र विज्ञान के बारे में बात करते है। मंत्र विज्ञान पे आज के समय मे भरोसा करना बहुत कठिन है क्योकि हमारे पास जब किसी चीज़ के सूत्र खो जाते है तब बड़ी कठिनाई होती है हमारे बस मंत्र बच गए है उसका विज्ञान खो गया है।
मंत्र का विज्ञान नाद के विज्ञान पे काम करता है। नाद का अर्थ हर अक्षर का हर शब्द का एक विशेष ध्वनि है जिसे नाद भी कहते है। वो ध्वनि हमारे मन पे हमारे शरीर पे एक विशेष प्रभाव डालती है। हमारे शरीर का कुछ विशेष हिस्सा कुछ विशेष शब्दो को बोलते हुए उसमे सम्मलित होता है। जैसे आप हुम् बोले तो आपके हृदय से लेकर आपके नाभि तक विशेष कंम्पन होगा। आप शांत होकर अगर ‘माँ ’ की ध्वनि करे तो आप पाएंगे आपके दोनों आंखों के बीच आपको हल्का कंम्पन महसूस होगा। जैसे आप बिना जीभ का प्रयोग किये ‘ह’ तो बोल सकते परंतु ‘ट’ नही बोल सकते है। इसी तरह हर अक्षर हर शब्द किसी न किसी तरह आपके शरीर के किसी विशेष हिस्से पे प्रभाव डालता है। कुछ विशेष शब्द आपके मन पे भी प्रभाव डालते है जैसे कोई आपको ‘ मूर्ख’ कहे आपका मन तुरंत गुस्से से भर जाएगा कोई आपको ’ सज्जन’ कहे आप तुरंत प्रसन्न हो जायेगे। इसी प्रकार मंत्र आपके मन पे भी प्रभाव डालता है।
अब आती है वो बात जिसपे विश्वास करना मुश्किल है यानी मंत्र से बहुत दूसरी परिस्थितिया भी बदली जा सकती है।अब उसको समझना बहुत कठिन है वो अनुभव का विषय है।पूरा अस्तित्व ध्वनियों का एक जटिल संगम है। उसमें से हमने कुछ ध्वनियों को पहचाना जो ब्रह्मांड के हर आयाम को खोलने वाली कुंजियों की तरह हैं। जब तक आप खुद चाभी नहीं बन जाते, वह आपके लिए नहीं खुलेगा। मंत्र बनने का मतलब है कि आप चाभी बन रहे हैं, चाभी बन कर ही आप ताले को खोल सकते हैं, जिस समय आप मंत्र का उच्चारण करते हैं, तब ध्वनि की जो विशिष्ट आन्दोलनयुक्त तरंगें निर्मित होती हैं, उन तरंगों का सीधा प्रभाव आपके मस्तिष्क में आता है।किन्हीं विशिष्ट ध्वनि-तरंगों को निर्मित कर पत्थर भी तोड़े जा सकते हैं। जैसे लेज़र किरणों से पेट की पथरी को तोड़कर ख़त्म कर देते हैं, इसी तरह ध्वनि की विशिष्ट तरंगों द्वारा किसी ठोस चीज़ को भी तोड़ा जा सकता है।
एक बार बादशाह अकबर के दरबार मेंमें तानसेन और बैजू बावरा में एक प्रतियोगिता करायी गयी। इस प्रतियोगिता में एक संगमरमर की शिला रखी गयी। प्रतियोगिता में शर्त यह रखी गयी कि जो अपने गायन से उस संगमरमर की शिला को तोड़ देगा वही जीतेगा।
हथौड़ी या छैनी से नहीं, डण्डे-भाले से भी नहीं, कण्ठ से निकली हुई ध्वनि तरंगों से और बैजू ने यह कर दिखाया। इटली वेफ संगीत की एक पद्घति है उसमें एक महिला होती है, उसको ‘सोपरानो’ कहते हैं। उसकी गायकी का कमाल यह है कि वह इतने तीव्र सप्तक में गा सकती है कि उसवे सामने रखे हुए काँच के गिलास को वह अपनी आवाज़ से तोड़ देती है। जो महिला ग्लास को तोड़ दे, उसे ‘बेस्ट सोपरानो’ माना जाता है। का सीधा संबंध उच्चारण से है। इसे 'ध्वनि विज्ञान' भी कहा जाता है। जो खोज हुई है उनके अनुसार, वह समय करीब ही है, जब ध्वनि विज्ञान ऋषियों जैसे ही काम करने लगेगा। कौत्स मुनि ने मंत्रों को अनर्थक माना है। अनर्थक यानि जिसका कोई अर्थ न हो। ध्वनि प्रवाह को, शब्द गुंथन को महत्व दिया जाना चाहिए। 'ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐं' आदि बीज मंत्रों के अर्थ से नहीं, ध्वनि से ही प्रयोजन सिद्ध होता है। संगीत का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर जो असाधारण प्रभाव पड़ता है, उससे समस्त विज्ञान जगत परिचित है।
निश्चित गति से शीशे के गिलास के पास ध्वनि पैदा करें, तो वह टूट जाएगा। पुल पर चलते हुए सैनिकों को कदम मिलाकर चलने की ध्वनि नहीं करने दी जाती, क्योंकि तालबद्धता से पुल गिर सकता है। इस ही ध्वनि विज्ञान के आधार पर मंत्रों की रचना हुई है। उनके अर्थों का उतना महत्व नहीं है, इसलिए कौत्स मुनि ने उन्हें 'अनर्थक' बताया है। 
ध्वनि की तरंगों में से बड़ी ऊर्जा, बड़ी शक्ति निकलती है। जिस समय आप मंत्र का उच्चारण करते हैं, तब मंत्र के द्वारा उत्पन्न की गयी ध्वनि तरंगों का सीधा प्रभाव आपवे मस्तिष्क की तीनों ग्रन्थियों हाइपोथेलेमस, पिट्यूटरी और पीनियल पर पड़ता है।
विशेषतः जब आप मंत्र की ध्वनि का गुंजन करते हैं, तब आप अंगूठे से कान बंद कर लेते हैं, ताकि बाहर की कोई आवाज़ भीतर जाये ही नहीं। इस तरह अंगूठे से कान बंद करके जब आप मंत्र का उच्चारण करते हैं, तब उसकी तरंगें सीधे आपके मस्तिष्क में पहुँच कर मस्तिष्क की सूक्ष्म संरचना को बदल सकती हैं।
मेडिकल साइन्स के पास हाइपरटेन्शन के कारणों को दूर करने की कोई दवा नहीं है। हाइपरटेन्शन का सबसे बड़ा कारण है ‘तनाव’। ऐसी कोई दवा मेडिकल साइन्स के पास नहीं है, जिसको खाने से आप तनावमुक्त हो सकें। अभी तक तो बनी नहीं है। अभी तक जितनी दवाएँ बनी हैं या बन रही हैं, वे केवल तनाव के कारण शरीर में आने वाले लक्षणों को दूर करने के काम आती हैं।
वास्तव में दवाओं में कुछ केमिकल्स ही होते हैं। उनमें से कुछ दवाएँ कैल्शियम के रूप में होती हैं। कुछ दवाएँ नसों में से रक्त-प्रवाह सुचारु रूप से बहे इसलिये दी जाती हैं या फिर कोई दवा रक्त में बन रहे क्लॉट्स को पिघला कर पतला कर देती है।
मेडिकल साइन्स ने अभी तक ऐसी कोई गोली नहीं बनायी है, जिसके सेवन से मस्तिष्क में तनाव ही न रहे। परंतु ऋषियों के पास ऐसी दवा है और उनकी इस दवा को हम मंत्र कहते हैं। मंत्र की उपयोगिता अनदेखे ईश्वर को ख़ु़श करने के लिये नहीं है। मेरी दृष्टि में मंत्र का उच्चारण यह कोई साधना भी नहीं है। मंत्र का उच्चारण  शरीर,  दिमाग़ और मन को संतुलित करने के लिये सर्वोत्तम उपाय है।शक्ति का स्फोट मंत्र शक्ति की ही प्रक्रिया है, लेकिन रहस्य में लिपटी हुई। अणु विस्फोट से उत्पन्न होने वाली भयावह शक्ति की जानकारी हम सभी को है। शब्द की एक शक्ति सत्ता है। उसके कंपन भी चिरंतन घटकों के सम्मिश्रण से बनते हैं। इन शब्द कंपन घटकों का विस्फोट भी अणु विखंडन की तरह ही हो सकता है। मंत्र, योग साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही विधि व्यवस्था रहती है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उसका उपात्मक, होमात्मक और दूसरे तप साधनों तथा कर्मकांडों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है, लगभग उसी अर्थ में संस्कृत में स्फोट का प्रयोग किया जाता है। मंत्र-साधना वस्तुतः शब्द शक्ति का विस्फोट ही है।

रविवार, 21 जून 2020

क्या तीसरा विश्व युद्धहोगा। क्या भारत ओर चीन के मघ्य युद्ध होगा?(2)

क्या सितम्बर 2020 के बाद भारत मे होंगे युद्ध जैसे हालात

मित्रों मेरी पिछली पोस्ट जरुर पढ़े

मित्रों प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों जैसे वाराह मिहिर तथा अंय संहिता ज्योतिषियों ने भारत की प्राचीन राशि मकर बताई थी 20 वीं सदी के महान ब्रिटिश पाॅमिस्ट काउंट लुई हेमन कीरो में भी 1925 मे प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘वल्र्ड प्रैडिक्शन’ मे भारत की राशि मकर बताई है लगभग हजार वर्ष पहले भारत विदेशी
मुस्लिम आक्रांताओं का गुलाम हो गया और 15 अगस्त 1947 को वृष लग्न मे भारत विदेशी गुलामी से मुक्त हुआ। भारतीय ज्योतिष मे किसी भी देश या व्यक्ति के पूर्वजंम का ज्ञान नवम भाव से और अगले जंन्म का ज्ञान पंचम भाव से होता है। वृष राशि मकर राशि से पंचम राशि है।  भारतीय ज्योतिष मे बृहस्पति को धर्म और अध्यात्म का कारक ग्र्रह माना गया है तथा राहू को दैत्यों, राक्षसों, मुस्लिमों, मलेच्छों नास्तििििक धर्म विरोधी तथा दुर्भाग्य, नर संहार का कारक ग्रह माना गया है। भारत के इतिहास मे वृष मिथुन और धनु राशियो ंकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दुर्भाग्यवश भारत के जमांक मे धर्म गुरू की राशि धनु  भारत की प्राचीन राशि मकर से धनु 12 भाव की राशि है। जो विनाश का भाव है मिथुन राशि भारत की राशि मकर से छठे भाव की राशि है। जो रोग व शत्रु का भाव है। भारत के इतिहास मे वृष मिथुन वृश्चिक और धनु राशियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। राहू विनाश का कारक ग्रह है। केतु मोक्ष अलौकिकता तथा नई उत्पति का कारक ग्रह है। साथ ही केतु मे कई विनाशकारी शक्तियां भी है। भारत के लंबे इतिहास का ज्योतिषीय अध्ययन करने पर यह तथ्य प्रकृट हुआ है। जब-जब वृष वृश्चिक या मिथुन व धनु राशि मे राहू या केतु का गोचर हेाता है। तब तब भारत मे विनाशकारी घटनायें घटित होती है। राहू-केतु के विनाशकारी प्रभाव का  भारत के इतिहास मे आश्चर्यजनक विनाशकारी घटनायें:-
1. तराईन का द्वितीय युद्ध-24 मार्च सन् 1192 ग्राम तराईन जिला हनुमानगढ राजस्थान। वृष लग्न मिथुन मे केतु, सिंह मे मंगल, वक्री, धनु मे राहू, व शनि वक्री, कुंभ मे बुध, मीन मे सूर्य व गुरू शुक्र व चन्द्र।
2. पानीपत का प्रथम युद्ध-3 अप्रैल सन 1526। मिथुन मे केतु धनु मे राहू, मीन मे बुध सूर्य, मेष मे चन्द्र, सूर्य व मंगल, वृष मे शुक्र व बृहस्पति।
3. पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी 1761। पानीपत, हरियाणा। मकर लग्न 29 अंश। मकर मे सूर्य मंगल, कुंभ मे शुक्र व बुध, मीन मे शनि, मेष मे चन्द्र 4 अंश, वृष मे राहू व तथा वृश्चिक मे केतु।
4. खानवा का युद्ध-16 मार्च 1527। मेष मे चन्द्र, 23 अंश, वृष मे गुरू, मिथुन मे केतु, वृश्चिक मे मंगल, धनु मे राहू, कुंभ मे बुध, मीन मे सूर्य शुक्र व शनि।
5. बक्सर का युद्ध-22 अक्टूबर 1764। वृश्चिक लग्न मकर मे मंगल, मीन मे राहू, मेष मे शनि, वक्री, मिथुन मे गुरू, सिंह मे शुक्र, कन्या मे बुध व केतु तुला मे सूर्य।  
6. तैमूर का हमला- 17 फरवरी 1398। दिल्ली। मकर लग्न, वृष मे केतु, सिंह मे गुरू, कन्या मे मंगल, वृश्चिक मे शुक्र व राहू, धनु मे सूर्य शुक्र व शनि।  
7. भारत की स्वतंत्रता। 15 अगस्त 1947 रात्रि 12 बजे दिल्ली। वृष लग्न मे राहू मिथुन मे मंगल। कर्क मे सूर्य चन्द्र शुक्र, शनि व बुध, तुला मे गुरू, व वृश्चिक मे केतु।
7. राम मंदिर विध्वंस-5 मई 1528। दोपहर बाद, अयोध्या। कर्क लग्न मे गुरू व चन्द्र, वृश्चिक मे राहू, मीन मे शुक्र, मेष मे सूर्य व शनि, वृष मे मंगल बुध व केतु। 
8. बाबरी मस्जिद विघ्वंस-6 दिसम्बर 1992। दोपहर-12.30। अयोध्या। कुंभ लग्न, मेष लग्न मे चन्द्र 5 अंश, वृष मे केतु, कर्क मे मंगल कन्या मे गुरू, वृश्चिक मे सूर्य बुध व राहू, मकर मे शुक्र व शनि। 
9. भारत-पाक युद्ध 1947। 22 अक्टूबर 1947 प्रातः-4.00। कशमीर, कन्या लग्न तुला मे शुक्र, बुध, सूर्य, वृश्चिक मे गुरू व केतु, वृष मे राहू, कर्क मे मंगल व शनि। उ. षाढा-3।
10. भारत-पाक युद्ध 1965। 1 सितम्बर 1965। प्रातः-4.00। छम्ब व अखनूर (जम्मू) कर्क लग्न लग्न मे बुध, सिंह मे सूर्य, कन्या मे नीच का शुक्र  तुला मे मंगल, व चन्द्र, वृश्चिक मे केतु कुंभ मे वक्री शनि वृष मे राहू।। 
11. सोमनाथ मंदिर विध्वंस- 8 जनवरी 1026। दोपहर-3.30 जिला सोमनाथ, काठियावाड़ गुजरात। वृष मे चन्द्र व केतु। वृश्चिक में राहू, धनु मे बुध, मकर मे सूर्य व शुक्र, कुंभ मे मंगल, मीन मे शनि। मेष मे मंगल।
12. 1857 की गदर 10 मई 1857 मीन मे  राहू 14 अंश कन्या मे केतु 14 अंश नवांश मे वृष मे केतु व वृश्चिक मे राहू था।
श्रीमती इन्दिरा गाधी की हत्या-31 अक्टूबर 1984। 7.30 प्रातः। दिल्ली। तुला लग्न मे नीच का सूर्य बुध व शनि, वृश्चिक मे शुक्र व केतु धनु मे मंगल व गुरू मकर मे चन्द्र व वृष मे राहू। 
13. भारतमंत्री नरेन्द्र मोदी-जं 17 सितम्बर 1950। प्रातः-11.05 मिनट, मेहसाना गुजरात। वृश्चिक लग्न मे नीच का चन्द्र व मंगल, कुंभ मे वक्री गुरू मीन मे राहू, सिंह मे सूर्य व शनि, कन्या मे सूर्य बुध व केतु, कन्या गत केतु का राशि स्वामी बुध केतु से युत है।
घटना     तिथि   राहू केतु की स्थिति
1. सोमनाथ मंदिर विध्वंस   8 जनवरी 1025  वृष मे केतु वृश्चिक मे राहू 
2. राम मंदिर विध्वंस   5 मई 1528  वृष मे केतु वृश्चिक मे राहू 
3. पानीपत का तृतीय युद्ध   14 जनवरी 1761  वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
4. तैमूर का हमला    17 फरवरी 1398  वृष मे केतु वृश्चिक मे राहू 
5. 1857 की गदर    10 मई 1857  नवांश मे वृष मे केतु व वृश्चिक मे राहू 
6. भारत की आजादी   15 अगस्त 1947  वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
7. भारत पाक युद्ध 1947   22 अक्टूबर 1947 वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
8. भारत पाक युद्ध 1965   1 सितम्बर 1965  वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
9. बाबरी मस्जिद विघ्वंस   6 दिसम्बर 1992  वृष मे केतु वृश्चिक मे राहू
10. श्रीमती इन्दिरा गंाधी की हत्या  31 अक्टूबर 1984 वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
मिथुन गत राहू या केतु और धनु
मे राहू या केतु की घटनायें घटना  तिथि   राहू केतु की स्थिति
1. पृथ्वीराज चैहान की पराजय  24 मार्च 1192  मिथुन मे केतु, धनु मे राहू
2. पानीपत का प्रथम युद्ध   3 अप्रैल सन 1526 मिथुन मे केतु धनु मे राहू।
3. खानवा का युद्ध     16 मार्च 1527  मिथुन मे केतु धनु मे राहू।
भारत का भविष्य:-
गत 7 मार्च 2019 से जब से राहू मिथुन मे और धनु मे केतु आया है। तब से भारत मे भयानक बेरोजगारी, आर्थिक मंदी कानून व्यवस्था की असफलता एन.आर.सी. मुददे पर देश व्यापी व्यापक विरोध आंदोलन और जनवरी 2020 से देश मे आया कोरोना महामारी अभूतपूर्व संकट लंबा लाॅकडाउन अर्थ व्यवस्था का फेल हो जाना प्रवासी भारतीयों का लाखों की संख्या मे वापस पलायन तथा करीब 10 करोड़ भारतीय श्रमिकों का बेरोजगार पैदल या अंय साधनों द्वारा मूल निवास का पलायन करोड़ों भारतीयों का बेरोजगार हो जाना आदि दुर्भाग्य पूर्ण धटनायें घट रही। इतिहास अपने आप का दोहरा रहा है। ठीक सब कुछ वैसा ही हो रहा है। जैसा आज से 74 साल पहले देश मे घटा था आजादी की प्राप्ति देश का बटवारा, करीब डेढ से दो करोड़ आबादी का पलायन भयानक बेरोजगारी व आर्थिक मंदी व दंगों मे करीब 20 लाख लोगांे की हत्या। 25 सितम्बर 2020 को राहू वृष और केतु वृश्चिक राशि मे प्रवेश करेगा जो आगामी डेढ साल तक रहेगा भारत के राहू वृष राशि मे तथा केतु वृश्चिक राशि है।  राहू ने ही भारत का विभाजन किया राहू स्वयं ही खंडित देह या विकृत शरीर का प्रतीक है। धु्रव नाड़ी के अनुसार जब राहू से राहू या केतु का गोचर होता है। राहू या केतु से केतु या राहू का गोचर होता तों जीवन मे भारी दुर्भाग्य संकट आती हैं। और अनेक अशुभ घटनायें घटती है। 1947 मे इसी गोचर मे भारी रक्तपात करवाया था संभव हो कि इस बार यह नरसंहार कोरोना वायरस के कारण होगा आने वाले दुर्भाग्य के स्वरूप का वर्णन करना अभी संभव नही है। पर विनाश निश्चित है। 25 जनवरी 2020 से शनि ने आगामी ढाई साल के लिये मकर राशि मे प्रवेश किया है। जो भारत की राशि है।   मई 2020 से शनि वक्री है । शनि श्रमिकों का भी कारक है। अतः श्रमिकों को भारी दुर्भाग्य और दुःख सामना करना पडे़गा। शनि आयु कारक भी है। अतः शनि भारी संख्या मे अकाल मौतें देगा। 
प्रधानमंत्री मोदी की कुण्डली:-
वृष का राहू प्रधनमंत्री की लग्न व चन्द्र लग्न से निकलेगा राहू ना केवल उनके लग्नेश से निकलेगा बल्कि अपने शत्रु ग्रह मंगल से भी निकलेगा। दुर्भाग्यवश उनका चन्द्रमा ना केवल भाग्येश है। बल्कि नीच का भी जो उन्हे भारी निराशा देगा उन्हे कई क्षेत्रों मे भारी असफलता व दुर्भाग्य भी देगा संभव हो कि यह संकट कोरोना के विस्तार के कारण आये। मंगल राहू-योग व चन्द्र राहू योग मोदी जी के जीवन मे अनेक विपत्तियां दुर्भाग्य व पराजय देगा
! मित्रों अगर हम आगे देखेंगे कि 2022जनफरी फ़रवरी के आसपास कुछ बड़ी ताकतवर देशों में तनाव रहेगा जिससे युद्ध जैसी स्थितियां बनेंगी। यह तो मैं पक्का नहीं कह सकता कि युद्ध होगा या नहीं पर तनाव जरूर रहेगा पूरे विश्व में डर का माहोल बना सकता है दोस्तो  यह अनुमान है हकीकत में क्या होता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा  मां जगदम्बा विश्व की रक्षा करे

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