आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शुक्रवार, 10 अगस्त 2018
जन्म कुंडली का पहला भाव
शुक्रवार, 3 अगस्त 2018
बुधवार, 1 अगस्त 2018
Medical Astrology
मित्रो पहला सुख निरोगी काया वाद मे माया आज हमारा खानपान ऐसा है जिससे हर आदमी गोलीया खा रहा है मित्रो ज्योतिष मे भी रोग का पता लएस्ट्रोगाया जा सकता है
रोग निर्णय के लिऐ
किन ग्रहों का विचार करना है- रोग निर्णय के लिए जिन ग्रहों का विचार करना चाहिए वे हैं- (1) छठे भाव में स्थित ग्रह, (2) अष्टम भाव में स्थित ग्रह, (3) बारहवें भाव में स्थित ग्रह, (4) छठे भाव का स्वामी, (5) षष्ठेश से युति कर रहे ग्रह।
षष्ठेश रोग का स्वामी है इसलिए षष्ठेश की स्थिति का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानसागरी में षष्ठेश के विभिन्न भावों में फल का बहुत अच्छा वर्णन किया गया है। यदि सिर्फ रोग के संदर्भ में देखा जाए तो षष्ठेश लगन में आरोग्य देते हैं, द्वितीय भाव में व्याधि युक्त शरीर देते हैं, तृतीय भाव में षष्ठेश व्यक्ति को ल़डाई-झगडे़ करने की प्रवृति देते हैं, चतुर्थ भाव में जाने पर पिता को रोगी बनाते है, पंचम भाव में पुत्र के कारण कष्ट प्राप्त होता है, षष्ठेश छठे भाव में होकर आरोग्य देते हैं, शत्रु रहित और कष्टरहित जीवन देते हैं, सप्तम भाव में षष्ठेश पत्नी से कष्ट दिलाते हैं। अष्टम के संदर्भ में ग्रहों का वर्णन भी है। यदि षष्ठेश शनि हो तो संग्रहणी रोग होता है। मंगल हो तो अग्नी ओर जहरीले कीट से से खतरा, बुध हो तो विष दोष, चन्द्रमा हो तो कफ दोष, सूर्य हो तो जानवर से भय, बृहस्पति हो तो पागलपन और शुक्र हो तो नेत्र रोग होता है। नवें भाव में जाने पर लंगडापन देता है। दशम में माता से कष्ट और विरोध देता है, एकादश में शत्रु चोरादि से भय देता है और द्वादशभाव में व्यक्ति को अकर्मठ बना देता है।
ग्रहों का नैसर्गिक कारकत्व - तत्व आदि -
मेडिकल एस्ट्रोलॉजी में सटीक परिणाम पर पहुँचने के लिए ग्रहों के नैसर्गिक कारकत्व तत्व आदि पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। फलदीपिका के अनुसार सूर्य और मंगल तेज के अधिष्ठाता हैं और दृष्टि पर इनका अधिकार है। चन्द्रमा और शुक्र जल तत्व के होने के कारण रसेन्द्रिय के अधिष्ठाता हैं इसलिए शरीर मे हार्मोन ग्रंथियों पर इनका अधिकार है। बुध पृथ्वी तत्व के होने के कारण घ्राणेन्द्रिय हैं। बृहस्पति में आकाश तत्व प्रधान होने से वे श्रवणेन्द्रिय के अधिष्ठाता हैं। शनि, राहु और केतु वायु के अधिष्ठाता हैं इसलिए स्पर्श का विचार इनसे करना चाहिए। ग्रहों से होने वाले संभावित रोग की विवेचना में नैसर्गिक कारकत्व के साथ-साथ काल पुरूष की कुण्डली में उस ग्रह की राशि का विचार भी करें। उदाहरण के लिए सूर्य हड्डी के नैसर्गिक प्रतिनिधि हैं इसलिए हड्डी से जुडी बीमारियां सूर्य से देखी जाती हैं। कालपुरूष की कुण्डली में सूर्य की राशि पंचम भाव में आती है जो नाभि के आसपास का क्षेत्र है। इसलिए सूर्य से नाभि प्रदेश और कोख की बीमारियां दोनों देखी जानी चाहिए। इसी तरह सूर्य पित्त का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। इसलिए यदि सूर्य से रोग निर्धारण कर रहे हैं तो इन सभी बिन्दुओं पर ध्यान रखना की दशा -
राहु भ्रम देते हैं। इसलिए जब राहु की दशा चल रही होती है तब बहुत प्रयास के बाद भी सही निदान संभव नहीं हो पाता। यदि प्रत्यन्तरदशा हो तो सही निदान के लिए थोडा इंतजार करने की सलाह दी जाती चाहिए। राहु के बाद बृहस्पति की दशा में भ्रम दूर होते हैं और स्थिति साफ होती है। यह निश्चित किया जाना चाहिए कि राहु दशा का कितना समय बाकी है। यदि थो़डा समय बाकी है और इंतजार करना चाहिए। यदि राहु दशा की अवधि अधिक हो तो राहु की पूजा पाठ और उपाय करने के वाद ही निदान प्रक्रिया से कुछ हद तक सही परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। किसी ब़डी शल्य क्रिया या किसी प्रकार की खास थैरेपी अपनाने से पहले किसी आच्छे ज्योतिषी से सलाह अवश्य ली जानी चाहिए। राहु दशा में बडे़ निर्णय से पूर्व निश्चित रूप से दो बार जांच करानी चाहिए और उसके बाद कदम उठाना चाहिए।
कुछ खास युतियां -
रोग निर्णय में कुछ खास युतियां बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। शुक्र के साथ जब भी मंगल या राहु युति करते हैं तो शुक्र के नैसर्गिक कारक तत्वो में वृद्धि होती है। हिस्टीरिया जैसे रोगों में यह योग पाया गया है। यह महत्वपूर्ण है कि यही युति महान कलाकार भी बनाती है और लक्ष्य प्राप्त की ऊर्जा भी देती है। इसलिए किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले कुछ सावधानियां आवश्यक हैं। शुक्र किस भाव के स्वामी हैं और यह युति किस भाव में हो रही है, इस युति पर किन ग्रहों की दृष्टि है, इस सब बिन्दुओं पर ध्यान देकर सही निर्णय पर पहुँचा जा सकता है। बुध और शनि की युति भी महत्वपूर्ण है। प्राय: यह युति निराशाजनक प्रवृत्ति देती है। यदि इनका संबंध सप्तम या द्वादश भाव से हो तो व्यक्ति के वैवाहिक संबंधों में अजीब व्यवहार देखने को मिलता है। भारतीय समाज में लोग इस विषय में विशेषज्ञ सलाह लेने से हिचकिचाते हैं और समस्या वैसी ही बनी रहती है। अन्य भावों में युति या संबंध स्त्रायु तंत्र से संबंधित परेशानियों का संकेत है। बुध और राहु की युति त्वचा से जुडे़ बैक्टीरियल इंफेक्शन देती है। बुध इस युति से जितने अधिक पीङित होंगे रोग की तीव्रता उतनी ही अधिक होगी। जहां राहु बैक्टीरियल इंफेक्शन देते हैं वहीं केतु वायरल इंफेक्शन देते हैं। बुध और केतु की युति उनकी दशान्तर्दशा में हरपीज जैसी वाइरस जनित बीमारी देती है। चन्द्रमा मन हैं। अगर चन्द्र कमजोर और पीडत है तो चन्द्रमा व्याधियुक्त शरीर का कारण हो सकते हैं। चन्द्रमा यदि विष घटी या मृत्युभाग में हो तो कभी ना ठीक होने वाली बीमारियां हो सकती हैं। चन्द्रमा की पाप ग्रहों से युति मनोरोग देती है। कमजोर चन्द्रमा की युति शनि से होने पर डिप्रेशन की शिकायत देखी जाती है। व्यक्ति हालात का सामना नहीं कर पाता है और निराशा के गर्त में चला जाता है। चन्द्रमा और राहु प्राय: मानसिक या वहम जैसी बीमारी देते हैं। यह बहुत खतरनाक स्थिति होती है जब व्यक्ति भ्रमित रहता हैै तो ना तो वो अपनी स्थिति किसी को समझा पाता है ना ही उसकी असली स्थिति कोई समझ पाता है। - यदि लग्न और लग्नेश बलवान हैं तो व्यक्ति में परिस्थिति से ल़डने और जीतने की क्षमता आ जाती है। लग्नेश बलवान हों और छठा भाव भी रोग का संकेत दे रहा हो तो व्यक्ति को सही इलाज मिलता है उसके ठीक होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। यदि कोई बीमार है और गोचर में बृहस्पति लग्न या लग्नेश को देखते हैं तो व्यक्ति के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है। इस लिए रोग से संबंधित किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले लग्नऔर लग्नेश की स्थिति का अध्ययन अवश्य कर लेना चाहिए।
1 अष्टमेश जब छठे भाव या छठे भाव के स्वामी से संबंध करता है तो रोग का कारण पिछले जन्म के कर्म होते हैं।
2 इसी तरह अष्टम भाव में बैठे ग्रह का संबंध यदि छठें भाव से हो तो भी रोग का कारण गत जन्म के कर्म होते हैं। 3 पंचम और अष्टम बहुत बली हों तो पिछले जन्म के बहुत से अभुक्त कर्म शेष रहते हैं और रोग का कारण बनते हैं।
4 पंचम में अधिक अष्टक वर्ग बिन्दु का होना यह संकेत है कि गत जन्म के अभुक्त कर्म इस जन्म में पीछा कर रहे हैं। इसलिए पंचम भाव में कम अष्टक वर्ग बिन्दु का होना शुभ माना जाता है। बृहद् पाराशर होरा शास्त्र में वर्णन है कि यदि पंचम या पंचमेश का संबंध मंगल और राहु से होगा तो पिछले जन्म में सर्प के श्राप के कारण इस जन्म में संतान हानि होगी। गर्भ में संतान अपनी माता से नाल के माध्यम से जु़डा रहता है। इस नाल पर राहु का अधिकार है। सर्पदोष के कुछ मामलों में पाया गया है कि यह नाल बच्चो के गले में लिपट कर मृत्यु का कारण ब नी। सर्पाकृति होने के कारण फैलोपियन ट्यूब पर भी राहु का ही अधिकार है। कुछ मामलों फैलोपियन ट्यूब में इंफेक्शन या Blockage के कारण संतान ना होना पाया गया।
मित्रो शरीर में जो DNA है उसमें एक हिस्सा माता से प्राप्त होता है और दूसरा पिता से। इसी DNA में हमारा Genetic Code होता है जिससे माता-पिता की आदतें बीमारियां आदिहम तक पहुँचती हैं। DNA की सर्पाकृति है और सर्पाकृति पर राहु का अधिकार है। जेनेटिक बीमारियों में राहु की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। कई मामलों में देखा गया है कि बीमारी दो-तीन पीढ़ी तक दबी रहती है परन्तु फिर अचानक प्रकटहो जाती हैमैने ऐसी कई कुन्ङलीया देखी तो पाया कि जिस पीढ़ी में बीमारी प्रकट हुई है उन कुण्डलियों में छठें-आठवें भाव पर राहु का प्रभाव अधिक है। छठे, आठवें के स्वामी या तो राहु के नक्षत्र में होंगे या छठें-आठवें में बैठे ग्रह राहु के नक्षत्र या राहु के प्रभाव में होंगे मित्रो हमारे पास ऐसे जातक भी आते है जिनको काफी देर से रोग हे यानी सालो से रोग है ओर दवाई खा रहे है ओर आगे चलकर गृह दशा से ऐसे योग वनते है की रोग भयानक रुप ले सकता है मेरे कुन्ङली देख कर आगर उनको पाठ पुजा करानेकी सलाह दी जाती है पर वो कहते है कि आप हामे सरल उपाय वताऐ तव वहुँत हैरानी होती है ऐसी सोच रखने वालो पर सवकुछ होते हुऐ भी अमीर आदमी भी ऐसा करवा नही पाता यह भी तो पिछले जन्म के शायद कर्म ही है जिस ओलाद के लिऐ आदमी पैसे ईक्कठे करता है वाद मे रोगग्रस्त होने पर कोई सेवा नही करता तव पैसा भी काम नही आता खैर सभ कर्मो का खेल ही है मित्रो आप भी अगर अपनी कुन्ङली दिखा कर अपनी समस्या का हल चाहते है तो ईन नम्वरो पर सम्पर्क कर सकते है 09414481324 07597718725 मित्रो हमारी सेवा सशुल्क हैआचार्य राजेश
सोमवार, 30 जुलाई 2018
शनिवार, 28 जुलाई 2018
बुध ग्रह Mercury planet
सूर्य के सबसे निकटतम बुध ग्रह है। इसका हमारे जीवन में गहरा प्रभाव पड़ता है। पौराणिक चरित्रों में चंद्रमा के पुत्र हैं बुध। जिनकी माता का नाम रोहिणी और वे अथर्ववेद के ज्ञाता माने गए हैं।
उनका विवाह वैवस्वत मनु की पुत्री इला से हुआ। उन्हें बुध ग्रह का स्वामी माना गया है। देवों की सभा में बुध को राजकुमार कहा गया है। बुध सौरमंडल का सबसे छोटा और सूर्य के सबसे निकट स्थित ग्रह है। यह व्यक्ति को विद्वता, वाद-विवाद की क्षमता प्रदान करता है। यह जातक के दांतों, गर्दन, कंधे व त्वचा पर अपना प्रभाव डालता है।प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बुध का काफी महत्व है। बुध, बुद्धि का कारक है। सामाजिक जीवन में, पारिवारिक जीवन में, आध्यात्मिक जीवन में या किसी अन्य क्षेत्र में अच्छे बुध वाला व्यक्ति उत्तम निर्णय लेकर सदैव उचित कार्य करता है। जिस व्यक्ति का बुध अच्छा होता है, वह अपने कामों की ओर सभी का ध्यान आकर्षित करता है।जिस व्यक्ति का बुध अन्य सभी ग्रहों से पावरफुल हो तो वह जातक बुध प्रधान कहलाता है। ऐसे व्यक्ति के पास अच्छी सूझबूझ और निर्णय लेने की क्षमता होती है। अन्य लोग ऐसे व्यक्ति से सलाह-मशविरा करने आते हैं। ऐसे व्यक्ति किसी कम्पनी के प्रतिनिधि के रूप में, सलाहकार के रूप में अथवा समाज के अन्य क्षेत्र में अच्छे कार्य अपनी तार्किक विचारशक्ति के कारण करते हैं। वैसे प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बुध शुभ फलदायी होता है।लेकिन अगर कुंडली में बुध खराब प्रभाव में हो तो इंसान की जिंदगी में मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है.इंसान बीमारियों के चंगुल में फंस जाता है. शरीर की आभा खत्म होने लगती है.
-कर्ज से परेशान रहने लगता है और आर्थिक तौर पर बुरी तरह प्रभावित रहता है.
-बुध खराब होने पर पद प्रतिष्ठा, मान सम्मान, यश बल सबसे गिरावट आने लगती है.
-इंसान शिक्षा में कमजोर हो जाता है, सूंघने की शक्ति घट जाती है, अपनी बातों के जरिए प्रभावशाली नहीं बन पाता है.
-बुद्धिवान होने के अंहकार से ग्रसित हो जाता है
इसीलिए कहा जाता है ग्रह कोई भी हो, छोटा हो बड़ा हो. उसका प्रभाव किसी भी दूसरे ग्रह से कमतर नहीं आंका जा सकता है.कुंडली में बुध अगर कमजोर हो तो समस्याएं व्यापक हो जाती हैं. बुध के कमजोर होने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और वाणी में दोष आ जाता है. साथ ही बुध के कमजोर होने से इंसान की सुंदरता भी प्रभावित होती है
लाल किताब अनुसार बुध ग्रह के बुरे प्रभाव को शांत करने के लिए दुर्गा की पूजा करने की हिदायत दी गई है। यह कुंडली में बारहवें स्थान के स्वामी होने के साथ ही दलाली और व्यापार के कार्यों में मदद करते हैं।
कन्या और मिथुन राशि के स्वामी बुध के सूर्य, शुक्र और राहु मित्र, चंद्र शत्रु और मंगल, गुरु, शनि और केतु सम। लेकिन अकेले शुक्र के साथ बुध बैठकर बलशाली बन जाते हैं।यदि आप पर बुध ग्रह का अशुभ प्रभाव पड़ रहा है तो आपको व्यापार, दलाली, नौकरी आदि कार्यों में नुकसान उठाना पड़ेगा। आपकी सूंघने की शक्ति कमजोर हो जाएगी। समय पूर्व ही दांत खराब हो जाएंगे। आपके मित्रों से संबंध बिगड़ जाएंगे। संभोग की शक्ति क्षीण हो जाएगी। बहन, बुआ और मौसी किसी विपत्ति में है, तो भी आपका बुध ग्रह अशुभ प्रभाव वाला माना जाएगा।
इसके अलावा यदि आप तुतले बोलते हैं तो भी बुध ग्रह अशुभ माना जाएगा। व्यक्ति खुद ही अपने हाथों से बुध ग्रह को खराब कर लेता है, जैसे यदि आपने अपनी बहन, बुआ और मौसी से संबंध बिगाड़ लिए हैं तो बुध ग्रह विपरीत प्रभाव देने लगेगा।
कुंडली में यदि बुध ग्रह केतु और मंगल के साथ बैठा है तो यह मंदा फल देना शुरू कर देता है। शत्रु ग्रहों से ग्रसित बुध का फल मंदा ही रहता है। ऐसे में यह उपरोक्त सभी तरह के संकट खड़े कर देता है। आठवें भाव में बुध ग्रह शनि और चंद्र के साथ बैठा है तो पागलखाना, जेलखाना या दवाखाना किसी भी एक की यात्रा करा देता है। हालांकि बुध ग्रह को अच्छे प्रभाव देने वाला भी बनाया जा सकता है।आपकी बहन, मौसी और बुआ की स्थिति ठीक है तो यह माना जाएगा कि आपका बुध ग्रह भी ठीक है। यदि बुध ग्रह शुभ प्रभाव दे रहा है तो वह आपमें बोलने की क्षमता का विकास करेगा। आपको ज्ञानी और चतुर बनाएगा। आपकी देह सुंदर और सोच स्पष्ट होगी। आपकी बातों का असर होगा।
ऐसे में आपकी सूंघने की शक्ति गजब की होती है। व्यापार और नौकरी में किसी भी प्रकार की अड़चन नहीं आएगी और आप उन्नति करते जाएंगे। ईमानदारी और सच्चाई छोड़ देने से बुध ग्रह अपना शुभ प्रभाव छोड़ देता है।सामान्य उपाय :
यदि कुंडली में बुध ग्रह नीच का या शत्रु ग्रहों के साथ बैठा है तो आपको मां दुर्गा की भक्ति करना चाहिए। बेटी, बहन, बुआ और साली से अच्छे संबंध रखने चाहिए।* बुधवार के दिन गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए और साबूत हरे मूंग का दान करना चाहिएइसके अलवा नाक छिदवाना चाहिए जिससे बुध का बुरा असर जाता रहेगा।लाल किताब के किसी विशेषज्ञ को अपनी कुंडली की जांच कराएं, तभी उपाय करें क्योंकि कुंडली के प्रत्येक खाने के हिसाब से बुध के अलग प्रभाव और उपय होते हैं और घर को वास्तु अनुसार ठीक कराएं ।
शुक्रवार, 27 जुलाई 2018
भयानक सजा मंगल की
सोमवार, 23 जुलाई 2018
गुरु और बुध
गुरु ओर वुघ
लालकिताब में गुरु को सूर्य से भी अधिक महत्व दिया गया है,सूर्य सौर मंडल के ग्रहों का राजा है,तो गुरु को देवताऒ का का गुरु कहा गया है
,भारतीय परम्परा के शासक भी गुरु के शासन में रहा करते थे,ज्योतिष के अनुसार ग्रहों को कालपुरुष के नौ अंगों का रूप बताया गया है,इस अंग विभाजन में गुरु को शरीर की गर्दन का प्रतिनिधि माना जाता है,कालपुरुष ने गर्दन को गुरु के रूप में अपने हाथ में पकड रखा हो,फ़िर अन्य ग्रहों की बिसात ही क्या रह जाती है,लालकिताब ने गुरु को आकाश का रूप दिया है,जिसका कोई आदि और अन्त नही है,गुरु ही भौतिक और आध्यात्मिक जगत का विकास करता है,उसके ऊपर अपनी निगरानी रखता है,ज्योतिष के अनुसार गुरु को धनु और मीन राशि का स्वामी बताया है,लालकिताब के अनुसार गुरु को नवें और बारहवें भाव का स्वामी बताया गया है,लालकिताब के अनुसार ही गुरु को भचक्र की बारह राशियों के अनुसार बारहवें भाव को राहु और गुरु की साझी गद्दी बताया गया है,बारहवे भाव में गुरु और राहु अगर टकराते है,तो राहु गुरु पर भारी पडता है,और गुरु के साथ राहु के भारी पडने के कारण जो गुर संसार को ज्ञान बांटने वाला है,वह एक साधारण सा मनुष्य बन कर अपना जीवन चलाता है,गुरु के भी मित्र और शत्रु होते है,गुरु जो आध्यात्मिक है ,उसे भौतिक कारणों को ही गौढ मानने वाले लोग जो शुक्र के अनुयायी होते है,उनसे नही पटती है,और अक्सर आध्यात्मिक व्यक्ति की भौतिक कारणों को ही गौढ मानने वाले लोगों के साथ नही बनती है,इसी को शत्रुता कहते है,बुध जो वाणी का राजा है,और अपने भाव को वाणी के द्वारा ही प्रकट करने की योग्यता रखता है,की आध्यात्मिक सिफ़्त रखने वाले गुरु से नही पटती है,लेकिन वही बुध अगर किसी प्रकार से गुरु के मुंह पर विराजमान होता है,जो गुरु के मुखारबिन्दु से आध्यात्मिक बातों का निकलना चालू हो जाता है,यह बात बुध के कुन्डली के दूसरे भाव में विराजमान होने पर ही मिलती है,बुध जब पंचम में होता है,तो भी गुरु के घर पर जाकर शिक्षात्मक बातों को प्रसारित करने में अपना मानस रखता है,और गुरु का मित्र बन जाता है,नवें भाव में गुरु का मित्र केवल आध्यात्मिक बातों को प्रसारित करने के लिये भौतिक साधनो के द्वारा या गाने बजाने के साधनो के द्वारा कीर्तन भजन और अन्य साधनो मे अपनी गति गुरु को देकर गुरु का सहायक बन जाता है,ग्यारहवें भाव में जाकर वह गुरु के प्रति वफ़ादार दोस्त की भूमिका अदा करता है,इस लिये वह हर तरह से गुरु का शत्रु नही रहता है,जबकि वैदिक ज्योतिष में गुरु का शत्रु ही बुध को माना गया है.
महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां
‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...
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