गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

स्वर विघा का विज्ञान (स्वर योग)

स्वर विघा का विज्ञान (स्वर योग)

प्राण वायु मनुष्य के शरीर में श्वास लेने पर नासिका के माध्यम से प्रवेश करती है। नासिका में दो छिद्र होते हैं, जो बीच में एक पतली हड्डी के कारण एक दूसरे से अलग रहते हैं। मनुष्य कभी दाहिने छिद्र से और कभी बाँएँ छिद्र से श्वास लेता है। दाहिने छिद्र से श्वास लेते समय “दाहिना स्वर” तथा बाँएँ छिद्र से श्वास लेते समय “बाँयाँ स्वर” चलता है। अर्थात् श्वास-प्रश्वास की गति जिस नासिका छिद्र से प्रतीत हो, उस समय वही स्वर चलता समझें। यदि दोनों नासिका-छिद्रों से समान रुप से निःश्वास होता हो, तो उसे “मध्य स्वर” कहते हैं। यह स्वर प्रायः उस समय चलता है, जब स्वर परिवर्तन होने को होता है।सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है

, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।आप देखेंगे कि, बाएं हाथ का उपयोग करने वाले लोगों को दबा दिया जाता है! अगर कोई बच्चा बाएं हाथ से लिखता है, तो तुरंत पूरा समाज उसके खिलाफ हो जाता है माता पिता, सगे संबंधी, परिचित, अध्यापक सभी लोग एकदम उस बच्चे के खिलाफ हो जाते हैं। पूरा समाज उसे दाएं हाथ से लिखने को विवश करता है। दायां हाथ सही है और बायां हाथ गलत है। कारण क्या है? ऐसा क्यों है कि दायां हाथ सही है और बायां हाथ गलत है? बाएं हाथ में ऐसी कौन सी बुराई है, ऐसी कौन सी खराबी है? और दुनिया में दस प्रतिशत लोग बाएं हाथ से काम करते हैं। दस प्रतिशत कोई छोटा वर्ग नहीं है। दस में से एक व्यक्ति ऐसा होता ही है जो बाएं हाथ से कार्य करता है। शायद चेतनरूप से उसे इसका पता भी नहीं होता हो, वह भूल ही गया हो इस बारे में, क्योंकि शुरू से ही समाज, घर परिवार, माता पिता बाएं हाथ से कार्य करने वालों को दाएं हाथ से कार्य करने के लिए मजबूर कर देते हैं। ऐसा क्यों है?दायां हाथ सूर्यकेंद्र से, भीतर के पुरुष से जुड़ा हुआ है। बाया हाथ चंद्रकेंद्र से भीतर की स्त्री से जुड़ा हुआ है। और पूरा का पूरा समाज पुरुषकेंद्रित है।

हमारा बायां नासापुट चंद्रकेंद्र से जुड़ा हुआ है। और दायां नासापुट सूर्यकेंद्र से जुड़ा हुआ है।आप  इसे आजमा कर भी देख सकते हो। जब कभी बहुत गर्मी लगे तो अपना दायां नासापुट बंद कर लेना और बाएं से श्वास लेना और दस मिनट के भीतर ही हमको ऐसा लगेगा कि कोई अनजानी शीतलता हम्हें महसूस होगी।  यह बहुत ही आसान है। या फिर हम ठंड से कांप रहे हो और बहुत सर्दी लग रही है, तो अपना बायां नासापुट बंद कर लेना, और दाएं से श्वास लेना; दस मिनट के भीतर शरीर गर्म होने लगेगाहमारे योगाचार्य ने यह बात समझ ली और योगी कहते हैं और योगी ऐसा करते भी हैं प्रात: उठकर वे कभी दाएं नासापुट से श्वास नहीं लेते। क्योंकि अगर दाएं नासापुट से श्वास ली जाए, तो अधिक संभावना इसी बात की है कि दिन में व्यक्ति क्रोधित रहेगा, लड़ेगा झगड़ेगा, आक्रामक रहेगा शांत और थिर नहीं रह सकेगा। इसलिए योग के अनुशासन में यह भी एक अनुशासन है कि सुबह उठते ही सबसे पहले व्यक्ति को यह देखना होता है कि उसका कौन सा नासापुट क्रियाशील है। अगर बायां क्रियाशील है तो ठीक है, .वही ठीक क्षण होता है बिस्तर से बाहर आने का। अगर बायां नासापुट क्रियाशील नहीं है तो अपना दायां नासापुट बंद करना और बाएं से श्वास लेना। धीरे धीरे जब बायां नासापुट क्रियाशील हो जाए, तभी बिस्तर से बाहर पाव रखना।हमेशा सुबह उसी समय बिस्तर से बाहर आना जब बायां नासापुट क्रियाशील हो, और तब आप  पाओगे कि  पूरी की पूरी दिनचर्या में अंतर आ गया है। क्रोध कम  आएगा, चिड़चिडाहट कम होगी और अधिकाधिक शांत, थिर और ठंडे अनुभव करोगे। ध्यान में अधिक गहरे जा सकोगे। अगर लड़ना झगड़ना चाहते हो, तो उसके लिए दायां नासापुट अच्छा है। अगर प्रेमपूर्ण होना चाहते हो, तो उसके लिए बायां नासापुट एकदम ठीक है।और हमारी श्वास हर क्षण, हर पल बदलती रहती है पर हम कभी इस पर ध्यान नहीं देते आप इस पर ध्यान देकर देखना आधुनिक चिकित्साशास्त्र को इसे समझना होगा, क्योंकि रोगी के इलाज में इसका प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है। ऐसे बहुत से रोग हैं, ऐसी बहुत सी बीमारियां हैं, जिनके ठीक होने में चंद्र की मदद मिल सकती है। और ऐसे रोग भी हैं जिनके ठीक होने में सूर्य से मदद मिल सकती है। अगर इस बारे में ठीक ठीक मालूम हो, तो श्वास का उपयोग व्यक्ति. के इलाज के लिए किया जा सकता है। लेकिन आधुनिक चिकित्साशास्त्र की अभी तक इस तथ्य से पहचान नहीं हुई है।श्वास निस्तर परिवर्तित होती रहती है. चालीस मिनट तक एक नासापुट क्रियाशील रहता है, फिर चालीस मिनट दूसरा नासापुट क्रियाशील रहता है। भीतर सूर्य और चंद्र निरंतर बदलते रहते हैं। हमारा पेंडुलम सूर्य से चंद्र की ओर, चंद्र से सूर्य की ओर आताजाता रहता है। इसीलिए हमारी भावदशा अकसर ही बदलती रहती है। कई बार अकस्मात चिडचिडाहट होती है बिना किसी कारण के, अकारण ही। बात कुछ भी नहीं है, सभी कुछ वैसा का वैसा है, उसी कमरे में बैठे हो  कुछ भी नहीं हुआ है  अचानक चिड़चिड़ाहट आने लगती है।थोड़ा ध्यान देना। अपने हाथ को अपने नाक के निकट ले आना और उसे अनुभव करना. तुम्हारी श्वास बायीं ओर से दायीं ओर चली गयी होगी। अभी थोड़ी देर पहले तो सभी कुछ ठीक था, और क्षण भर के बाद ही सभी कुछ बदल गया, कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा। बस, लड़ने को, झगड़ने को और कुछ भी करने के लिए तैयार हो।ध्यान रहे, हमारा पूरा शरीर दो भागों में विभक्त है। हमारा मस्तिष्क भी दो मस्तिष्कों में विभाजित है। हमारे पास एक मस्तिष्क नहीं है; दो मस्तिष्क हैं, दो गोलार्ध हैं। बायीं ओर का मस्तिष्क सूर्य मस्तिष्क है, दायीं ओर का मस्तिष्क चंद्र मस्तिष्क हैआप  थोडी उलझन में पड़ सकते हो, क्योंकि ऐसे तो बायीं ओर सब कुछ चंद्र से संबंधित होता है, तो फिर दायीं ओर के मस्तिष्क का चंद्र से क्या संबंध! दायीं ओर का मस्तिष्क शरीर के बाएं हिस्से से जुड़ा हुआ है। बाया हाथ दायीं ओर के मस्तिष्क से जुड़ा हुआ है, दायां हाथ बायीं ओर के मस्तिष्क से जुड़ा हुआ है, यही कारण है। वे एक दूसरे से उलटे जुडे हुए हैं।दायीं ओर का मस्तिष्क कल्पना को, कविता को, प्रेम को, अंतर्बोध को जन्म देता है। मस्तिष्क का बाया हिस्सा बुद्धि को, तर्क को, दर्शन को, सिद्धांत को, विज्ञान को जन्म देता है।और जब तक व्यक्ति सूर्यऊर्जा और चंद्रऊर्जा के बीच संतुलन नहीं पा लेता है, अतिक्रमण संभव नहीं है। और जब तक बाया मस्तिष्क दाएं मस्तिष्क से नहीं मिल जाता है और उनमें एक सेतु निर्मित नहीं हो जाता है, तब तक सहस्रार तक पहुंचना संभव नहीं है। सहस्रार तक पहुंचने के लिए दोनों ऊर्जाओं का एक हो जाना आवश्यक है, क्योंकि सहस्रार परम शिखर है, आत्यंतिक बिंदु है। वहां न तो पुरुष की तरह पहुंचा जा सकता है, न ही वहा स्त्री की तरह पहुंचा जा सकता है। वहा एकदम शुद्ध चैतन्य की तरह होकर, समग्र और संपूर्ण होकर पहुंचना संभव होता है।पुरुष की कामवासना सूर्यगत है, स्त्री की कामवासना चंद्रगत है। इसीलिए स्त्रियों के मासिक धर्म का चक्र अट्ठाइस दिन का होता है, क्योंकि चंद्र का मास अट्ठाइस दिन में पूरा होता है। स्त्रियां चंद्रमा से प्रभावित होती हैं  चंद्र का वर्तुल अट्ठाइस दिन का होता है।और इसीलिए बहुत सी स्त्रिया पूर्णिमा की रात थोड़ depression का अनुभव करती हैं। याकहे कि असहज महसूस करती है जब पूर्णिमा की रात आए, तो अपन जैसे पूर्णिमा की रात समुद्र में ज्वार भाटा आने लगता है और समुद्र प्रभावित हो जाता है, ऐसे स्त्रियां भी उत्तप्त हो जाती हैं।क्या आपने कभी ध्यान दिया है? पुरुष खुली आंखों से प्रेम करना चाहता है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि प्रकाश भी पूरा चाहता है। अगर किसी तरह की बाधा न हो, तो पुरुष दिन में प्रेम करना पसंद करता है। और उन्होंने ऐसा करना शुरू भी कर दिया है    स्त्री अंधकार में प्रेम करना पसंद करती है, जहां थोड़ी भी रोशनी न हो और अंधेरे में भी वे अपनी आंखें बंद कर लेती हैं।चंद्रमा रात्रि में, अंधकार में चमकता है, उसे अंधकार से प्रेम है रात्रि से।इसीलिए स्त्रियां अश्लील साहित्य में उत्सुक नहीं हैपुरुष सूयोंमुन्धी होता है, उसे प्रकाश अच्छा लगता है। आंखें सूर्य का हिस्सा हैं, इसीलिए आंखें देखने में सक्षम होती हैं। आंखों का तालमेल सूर्य ऊर्जा के साथ रहता है। तो पुरुष आंखों से, दृष्टि से अधिक जुड़ा हुआ है। इसीलिए पुरुष को देखना अच्छा लगता है और स्त्री को प्रदर्शन करना अच्छा लगता है। पुरुषों को यह समझ में ही नहीं आता है कि आखिर स्त्रियां स्वयं को इतना क्यों सजाती  संवारती हैं?स्त्रियों में प्रदर्शन की प्रवृत्ति होती है वे चाहती हैं कोई उन्हें देखे। और यह एकदम ठीक भी है, क्योंकि इसी तरह से तो पुरुष और स्त्रियां एक दूसरे के अनुकूल बैठ पाते हैं पुरुष देखना चाहता है, स्त्री दिखाना चाहती है। वे एक दूसरे के अनुरूप हैं, यह एकदम ठीक है। अगर स्त्रियों को प्रदर्शन में उत्सुकता न होगी, तो वे दूसरी कई मुसीबत खड़ी कर देती हैं। और अगर पुरुष स्त्री को देखने में उत्सुक नहीं है, तो फिर स्त्री किसके लिए इतना श्रृंगार करेगी, आभूषण पहनेगी, सजेगी संवरेगी आखिर किसके लिए? फिर तो कोई भी उनकी तरफ नहीं देखेगा। प्रकृति में हर चीज एक दूसरे के अनुरूप होती है, उनमें आपस में सिन्क्रानिसिटी, लयबद्धता होती है।लेकिन अगर सहस्रार तक पहुंचना हो, तो द्वैत को गिराना होगा। परमात्मा तक पुरुष या स्त्री की भांति नहीं पहुंचा जा सकता है। परमात्मा तक तो सहज रूप में, शुद्ध अस्तित्व के रूप में ही पहुंचा जा सकता है, स्त्री और पुरुष के रूप में नहीं।सिर के शीर्ष भाग के नीचे की ज्योति पर संयम केंद्रित करने से समस्त सिद्धों के अस्तित्व से जुड्ने की क्षमता मिल जाती है।ऊर्जा को अगर ऊपर की ओर गतिमान करना है, तो इसकी विधि संयम है। पहली बात, अगर आप  पुरुष हो तो तुम्हें तुम्हारे सूर्य के प्रति तुम्हारे सूर्य ऊर्जा के केंद्र के प्रति, तुम्हारे काम केंद्र के प्रति, पूरी तरह होशपूर्ण होना होगा। तुम्हें मूलाधार में रहना होगा, अपने संपूर्ण चैतन्य को, अपनी पूरी ऊर्जा को मूलाधार पर बरसा देना होगा। जब मूलाधार पर पूरा होश आ जाता है तो  पाओगे कि ऊर्जा केंद्र की ओर उठ रही है, चंद्र की ओर बढ़ रही है।और जब ऊर्जा चंद्रकेंद्र की ओर गतिमान होगी तव आप  बहुत संतृप्ति, बहुत आनंदित अनुभव करोगे। सारी कामवासना के आनंद इसकी तुलना में कुछ भी नहीं हैं कुछ भी नहीं हैं। जब सूर्य ऊर्जा अपनी ही चंद्रऊर्जा में उतरती है, तो उस आनंद की सघनता उससे हजारों गुना अधिक होती है। तब सच में पुरुष और स्त्री का मिलन घटित होता है। बाहर किसी भी स्त्री से कितनी भी निकटता क्यों न हो, कितने भी करीब क्यों न हो, आप  अपने को पृथक और अलग ही अनुभव करते है बाहर का मिलन तो बस सतही और औपचारिक ही होता है दो सतह, दो परिधियां ही आपस में मिलती हैं। दो सतह एक दूसरे को स्पर्श करती हैं, बस इतना ही होता है। लेकिन जब सूर्यऊर्जा चंद्रऊर्जा की ओर गतिमान होती है, तब दो ऊर्जा केंद्रों की ऊर्जा आपस में मिल जाती है और जिस व्यक्ति के सूर्य और चंद्र एक हो जाते हैं, वह परम रूप से आनंदित और संतृप्त हो जाता है  और फिर वह हमेशा आनंदित और संतृप्त बना रहता है, क्योंकि इसको खोने का कोई उपाय ही नहीं है। यह आनंद और मिलन सनातन है।अगर आप  स्त्री हो तो अपनी संपूर्ण चेतना को हारा तक ले आना होगा, और तब तुम्हारी ऊर्जा सूर्य केंद्र की ओर बढ़ने लगेगी। प्रत्येक व्यक्ति में एक केंद्र निष्किय होता है और एक केंद्र सक्रिय होता है। सक्रिय केंद्र को निष्किय केंद्र के साथ जोड़ दो, तो निष्‍क्रिय केंद्र सक्रिय हो जाता है।और जब दोनों ऊर्जाओं का मिलन होता है जब सूर्यऊर्जा और चंद्रऊर्जा एक हो रहे होते हैं, तो ऊर्जा ऊपर की ओर उठती है। तब व्यक्ति ऊर्ध्वगमन की ओर बढ़ने लगता है।जिज्ञासु व्यक्ति अनुभवी स्वर साधक से स्वरोदय विज्ञान का अवश्य गहन अध्ययन करें। क्योंकि स्वर विज्ञान से न केवल रोगों से ही बचा जा सकता है, अपितु प्रकृति के अदृष्य रहस्यों का भी पता लगाया जा सकता है। मानव देह में स्वरोदय एक ऐसी आश्चर्यजनक, सरल, स्वावलम्बी, प्रभावशाली, बिना किसी खर्च वाली चमत्कारी विद्या होती है, जिसका ज्ञान और सम्यक् पालना होने पर किसी भी सांसारिक कार्यो में असफलता की प्रायः संभावना नहीं रहती। स्वर विज्ञान के अनुसार प्रवृत्ति करने से साक्षात्कार में सफलता, भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभ्यास, सामने वाले व्यक्ति के अन्तरभावों को सहजता से समझा जा सकता है। जिससे प्रतिदिन उपस्थित होने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों से सहज बचा जा सकता है। अज्ञानवश स्वरोदय की जानकारी के अभाव से ही हम हमारी क्षमताओं से अनभिज्ञ होते हैं। रोगी बनते हैं तथा अपने कार्यो में असफल होते हैं। स्वरोदय विज्ञान प्रत्यक्ष फलदायक है, जिसको ठीक-ठीक लिपीबद्ध करना संभव नहीं। केवल जनसाधारण के उपयोग की कुछ मुख्य सैद्धान्तिक बातों की आंशिक और संक्षिप्त जानकारी ही यहां दी गई है।

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

चंद्र ग्रह

: चंद्र ग्रह मित्रोंअसल में चंद्र कोई ग्रह नहीं बल्कि धरती का उपग्रह माना गया है। पृथ्वी के मुकाबले यह एक चौथाई अंश के बराबर है। पृथ्वी से इसकी दूरी 406860 किलोमीटर मानी गई है। चंद्र पृथ्वी की परिक्रमा 27 दिन में पूर्ण कर लेता है। इतने ही समय में यह अपनी धुरी पर एक चक्कर लगा लेता है। 15 दिन तक इसकी कलाएं क्षीण होती है तो 15 दिन यह बढ़ता रहता है। चंद्रमा सूर्य से प्रकाश लेकर धरती को प्रकाशित करता है। 

देव और दानवों द्वारा किए गए सागर मंथन से जो 14 रत्न निकले थे उनमें से एक चंद्रमा भी थे जिन्हें भगवान शंकर ने अपने सिर पर धारण कर लिया था।चंद्र को देव ग्रह माना गया है और जा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है कर्क राशि का यह स्वामी है। चंद्रमा के अधिदेवता अप्‌ और प्रत्यधिदेवता उमा देवी हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार चंद्रदेव महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र हैं। इनको सर्वमय कहा गया है। ये सोलह कलाओं से युक्त हैं। चंद्रमा का विवाह राजा दक्ष की सत्ताईस कन्याओं से हुआ। ये कन्याएं सत्ताईस नक्षत्रों के रूप में भी जानी जाती हैं, पत्नी रोहिणी से उनको एक पुत्र मिला जिनका नाम बुध है। पृथ्वी से जुड़े प्राणियों की प्रभा (ऊर्जा पिंडों) और मन को ग्रह प्रभावित करते हैं। प्रत्येक ग्रह में एक विशिष्ट ऊर्जा गुणवत्ता होती है, जिसे उसके ग्रहों की ऊर्जा किसी व्यक्ति के भाग्य के साथ एक विशिष्ट तरीके से उस वक्त जुड़ जाती है जब वे अपने जन्मस्थान पर अपनी पहली सांस लेते हैं। यह ऊर्जा जुड़ाव धरती के निवासियों के साथ तब तक रहता है जब तक उनका वर्तमान शरीर जीवित रहता है।ग्रह आद्यप्ररुपीय ऊर्जा के संचारक हैं। प्रत्येक ग्रह के गुण स्थूल जगत और सूक्ष्म जगत वाले ब्रह्मांड ्रुवाभिसारिता के समग्र संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं, जैसे नीचे वैसे ही ऊपरमाँ का सुख क्योंकि चन्द्र प्राण का कारक और मनुष्य रूप में माँ ही प्राण तुल्य है।जब किसी भी मनुष्य को किसी भी प्रकार से कष्ट होता है।तो उसे माँ ही याद आती है।और माँ को भी अपनी संतान के दुख का अभास हो जाता है।और अपनी संतान के दुख को दूर करने का प्रयत्न मन से वचन से और कर्म से करती है।यदि माँ मनसा, वाचा,कर्मणा अपनी संतान की रक्षा नहीं कर पाती तो तब इस स्थिति में माँ अपने हृदय से अपने प्राणों से प्यारी संतान की रक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करती है। और भगवान उस माँ की प्रार्थना को सुन लेते हैं।और उसकी संतान के प्राणों की पुनः रक्षा करते हैं।और प्रभु प्रार्थना उसका जीवन आनंदमय कर देती है। चन्द्र ग्रह का भी यही काम प्राणों की रक्षा करना है।मनुष्यों में माँ प्राण और नव ग्रहो में चन्द्र प्राण है। चन्द्र ग्रह शान्ति का प्रतीक है।सफेद रंग है।जल तत्व है।यदि किसी भी मनुष्य की जन्म कुण्डली में जीवन में चन्द्र ग्रह शुभ हो तो जातक बहुत शांत स्वभाव का,मातृ -सुख की प्राप्ति, प्रत्येक कार्य को बहुत स्थिर बुद्धि से करने वाला, जल संबंधित पानी, चाय-कोफी,जूस,फिनाइल - तेजाब कोल्ड ड्रिंक की एजेंसी कम्पनी, आईस क्रीम, आईस क्यूब की फैक्ट्री, दूध बेचने का काम शराब के ठेके का काम लेना, बेचना, खरीदना, इत्यादि ( लिक्विड ) का व्यापार करने वाला होता है।अगर आप की कुण्डली मे चन्द्र ग्रह की स्थिति उतम और यहाँ बताये हुआ कोई भी व्यपार, व्यवसाय आप करते है। तो आप अपने इस व्यपार मे बहुत लाभ कमा रहे है।या इनमे से कोई भी व्यपार करके आप धन, ऐश्वर्य, नाम कमाने वाले हो बस आप को अपने काम मे सत्य निष्ठा,ध्यान, स्थिरता, योग्यता, अपना व्यवहार और वाणी को उतम,और थोड़ा परिश्रम की अवश्यकता है। बाकी चन्द्र ग्रह अपना शुभ फल दे के आप की मेहनत को सफल करके ख्याति नाम प्राप्त करवायेगा।लेकिन ये व्यपार, व्यवसाय, प्रारम्भ करने से पहले आप को पता होना चाहिए। कि आप की जन्म कुण्डली मे चन्द्र ग्रह की स्थिति शुभ होनी चाहिए। और यदि चन्द्र ग्रह की स्थिति आप की जन्म पत्रिका में अशुभ हैं।तो आप को चन्द्र ग्रह से संबंधित कोई भी व्यपार, व्यवसाय नहीं करना चाहिए। यदि आप करेगे तो आप को लाभ नहीं हानि होगी। Modern Science भी इस बात को पूरी तरह से स्‍वीकार करता है कि पूर्णिमा व अमावस्‍या के समय जब चन्‍द्रमा, पृथ्‍वी के सर्वाधिक नजदीक होता है, तब पृथ्‍वी के समुद्रों में सबसे बड़े ज्‍वार-भाटा होते हैं और इतने बड़े ज्‍यार-भाटा का मूल कारण चन्‍द्रमा की गुरूत्‍वाकर्षण शक्ति ही है, जो कि मूल रूप से पृथ्‍वी के समुद्री जल काे ही सर्वाधिक आकर्षित करता है।सम्‍पूर्ण पृथ्‍वी पर लगभग 75% भू-भाग पर समुद्र का खारा जल है और इन्‍हे Scientists ने से भी सिद्ध किया है कि मनुष्‍य का शरीर भी लगभग 75% पानी से बना है तथा ये पानी भी लगभग उसी अनुपात में और उतना ही खारा है, जितना कि समुद्री जल। यानी सरलतम शब्‍दों में कहें तो हमारा शरीर लगभए एक छोटे समुद्र के समान है। तो जब चन्‍द्रमा के गुरूत्‍वाकर्षण का प्रभाव समुद्र के पानी पर पड़ता है, तो उसी मात्रा में वैसा ही प्रभाव मानव शरीर पर क्‍यों नहीं पड़ेेगा मानव का दिमाग मूल रूप से 80% पानी से बना होता है और हमारे भोजन द्वारा जीवन जीने के लिए जितनी भी उर्जा ये शरीर Generate करता है, उसकी 80% उर्जा का उपयोग केवल दिमाग द्वारा किया जाता है क्‍योंकि शरीर के काम करना बन्‍द कर देनेसो जाने, बेहोश हो जाने अथवा शिथिल हो जाने पर भी दिमाग यानी मन अपना काम करता रहता है। यानी मन, मनुष्‍य के शरीर का सबसे महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है, जिसकी वजह से ये तय होता है कि व्‍यक्ति जीवित है या नहीं। यदि व्‍यक्ति का मन मर जाए, तो शरीर जीवित होने पर भी उसे मृत समान ही माना जाता है, जिसे सामान्‍य बोलचाल की भाषा में कोमा की स्थिति कहते हैं और भारतीय फलित ज्‍योतिष के अनुसार मन का कारक ग्रह चन्‍द्रमा है।जिस प्रकार से जीवन मे लगन प्रभावी होती है उसी प्रकार से चन्द्र राशि भी जीवन मे प्रभावी होती है। चन्द्रमा एक तो मन का कारक है दूसरे जब तक मन नही है तब कुछ भी नही है,दूसरे चन्द्रमा माता का भी कारक है और माता के रक्त के अनुसार जातक का जीवन जब शुरु होता है तो माता का प्रभाव जातक के अन्दर जरूर मिलता है,हमारे भारत वर्ष मे जातक का नाम चन्द्र राशि से रखा जाता है यानी जिस भाव का चन्द्रमा होता है जिस राशि मे चन्द्रमा होता है उसी भाव और राशि के प्रभाव से जातक का नाम रखा जाता है मैने पहले भी कहा है कि चन्द्रमा मन का कारक है और जब मन सही है तो जीवन अपने आप सही होने लगता है जो सोच सोचने के बाद कार्य मे लायी जायेगी वह सोच अगर उच्च कोटि की है तो जरूर ही कार्य जो भी होगा वह उच्च कोटि का ही होगा,सूर्य देखता है चन्द्र सोचता है और शनि करता है बाकी के ग्रह हमेशा सहायता देने के लिये माने जाते है। कोई ग्रह समय पर मित्र बनकर सहायता देता है तो कोई ग्रह शत्रु बनकर एक प्रकार की शिक्षा के लिये अपना प्रयोग दे कर चला जाता है जो ग्रह आज शत्रु है तो कल वही ग्रह मित्र बनकर अपना प्रभाव प्रदर्शित करता है आदि बाते जरूर देखने मे आती है।मेरा यह सतत प्रयास रहा है कि आप ज्योतिष के अन्दर अन्धेरे मे नही रहे और आपको जितनी अच्छी ज्योतिष सीखने का कारण मिलेगा मुझे उतना ही आनन्द आयेगा कि भारत के ऋषियों मनीषियों की शोध की बाते आप तक पहुंची और आपने उन बातो को सीख कर अपने ग्यान को भी बढाया साथ मे उन लोगो की भी सहायता की जो आज के भौतिक युग मे केवल धन को ही महत्ता देते है और उस महत्ता के कारण जो वास्तव मे जरूरत वाले है उन्हे ज्योतिष का प्रभाव समझ मे नही आता है उसके बाद भी तामसी प्रवृत्ति के लोग उन्हे बरगलाते है और उन्हे हमारे ज्योतिष को जो वेद का छठा अंग है और सूर्य बनकर देख रहा है चन्द्रमा बनकर सोच रहा है मंगल बनकर पराक्रम दे रहा है बुध बनकर एक दूसरे को जोड रहा है गुरु बनकर रिस्ते स्थापित कर रहा है शुक्र बनकर जीवन को सजा रहा है शनि बनकर कार्य की तरफ़ बढा रहा है राहु बनकर आकस्मिक अच्छा कर रहा है और केतु बनकर साथ के सहायक कारको को प्रदान कर रहा है मित्रों चन्द्रमा राशि के अनुसार क्या क्या सोचने के लिये मन के अन्दर लहरो को उठाता है यह लहरे भावना के अनुसार किस प्रकार से ऊपर नीचे जाती है और जीवन मे सोच आना और सोच का जाना कैसे होता है। इतना ध्यान रखना है कि लगन शरीर है तो चन्द्र राशि सोच है,सूर्य लगन पिता की तरफ़ से मिले संस्कार है। वाकी आगे मित्रों अगर आप भी मुझसे अपनी कुंडली बनवाना क्या दिखाना चाहते हैं तो आप मुझसे संपर्क करें हमारे फोन नंबर पर पूरी जानकारी ले paid service 09414481324 07597718725

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

् मंगल की वात करे

मंगल को लेकर कई तरह की वाते व अंघविश्वास फेले है या फैलाऐ है अव कुछ मित्र पुछते 28 साल के वाद क्या मंगल दोष मंगल का बुरा प्रभाव समाप्त हो जाता है ? 

बहुत जिसका उत्तर बड़े धैर्य से समझने की जरुरत है ग्रहों की भी अपनी एक उम्र है और इसका तालमेल एक सुलझा हुआज्योतिष ही बैठा सकता है , नहीं तो बातें गड्ड-मड्ड हो जाती है। हर ग्रह की परिपक्व होने की एक उम्र होती है उस निश्चित समय के बाद वो अपना बुरा प्रभाव कुछ हद्द तक कम कर देता है यानि उग्रता कम हो जाती है। जैसे--- बृहस्पति 15से 20की उम्र को अपने दखल में लेता है , यही वक्त है जब शिक्षा ग्रहण का महत्वपूर्ण समय होता है। { यहाँ ये तर्क कि शिक्षा ग्रहण की कोई उम्र नहीं होती बेमानी है } आप समझिए इस तथ्य को कि शिक्षा का यही समय महत्वपूर्ण होता है। बाकी ज्यादा उम्र में सभी नहीं पढ़ते कोई कोई जिसकी ग्रह दशा इजाजत देती है वही बुढ़ापे में पढाई करते हैं। सूर्य का समय 22 साल की उम्र का। चन्द्रमा का समय है 24साल का वक्फा यानि ये peak टाइम कहलाता है। शुक्र का समय 25 से 27. मंगल का समय 28 से 31peak समय 28. का कहलाता है। बुध का समय 31 से 34peak समय 32 शनि 36 से 39peak समय 36 राहु 42 से 47peak समय 42का केतु का परिपक्व होने का समय 48 से 54peak 48का यानि यहाँ ग्रहो की जो उम्र लिखी हुई है उस उम्र के बाद ग्रह अपनी उग्रता खोता है अपने बुरे फल को देने में कमी आ जाती है। अब यहाँ इस तथ्य को ध्यान दे कि जिस ग्रह की जो उम्र यहाँ दी हुई है उसी दौरान विंशोत्तरी महादशा के के अनुसार उसी ग्रह की दशा-अन्तर्दशा आ जाए तो ग्रहो का अच्छा बुरा फल दोनों तीब्रता से मिलता है। अब लौटे मंगल की तरफ , जै एक ख़ास उम्र के बाद ग्रह परिपक्व होते हैं , यानि एक इंसान जब 40 की उम्र के बाद परिपक्व होता है तो बच्चो जैसी गलतियाँ नहीं करता , इसी तरह एक ख़ास उम्र के बाद ग्रह भी समझदार होते हैं , अब इसे जरा दूसरे तरीके से देखे कि एक बीस साल का लड़का जितना उग्र होगा तीस साल वाला उतना उग्र नहीं हो सकता और मंगल उग्रता का ही मुख्य ग्रह है , इसलिए जिनकी कुण्डली में मांगलिक दोष का सचमुच प्रभाव है वो 28 साल की उम्र के बाद विवाह करे तो मंगल का बुरा फल उनको कुछ कम मिलता है , इसे यूँ समझे कि चौबीस साल की उम्र का लड़का अगर मार कर सर फोड़ देगा तो -तीस साल वाला मारने को उठेगा मगर गालियाँ देकर ही शांत हो जाएगा , हाँ यहाँ एक बात है -मंगल के बुरे प्रभाव की वजह से शारीरिक हिंसा में ही कमी आएगी -अगर मंगल सचमुच बुरा फल देने वाला है तो - गालीगलौज और झगड़ा होता रहेगा सिर्फ शारीरिक हिंसा में कमी आएगी - अब कुंडली का गुरु अच्छा है तो और कमी आएगी -शनि मजबूत है तो झगड़ा होगा। मंगल का 28 के बाद मूल रूप से हिंसक होना कम हो जाता है मंगल की तासीर को समझे मंगल जोश का कारक है उतेजना का कारक है जव आदमी मेच्योर होता होता जाता है तो जोश के साथ होश भी आता है खुन की गर्मी नरम होने लगती है मित्रो मेरी यही कोशिश रहती है कि आप को ज्यादा से ज्यादा ज्ञान मिले ताकि आप अन्घविश्वास से रहित जीवन जीये आचार्य राजेश 09414481324 07597718725

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

ज्योतिषी ओर राहु

कहा जाता है कि लोहा हमेशा लोहे को काटता है उसी प्रकार से जो भी कारण जीवन मे पैदा होते है वह राहु के द्वारा ही पैदा होते 

है,राहु अगर तकनीकी पहलू मंगल की सहायता से दे दिया जाता है वह भी केन्द्र त्रिकोण मे तो राहु मंगल बजाय खराब असर देने के और अधिक बढोत्तरी देने लग जायेंगे और त्रिक भाव या पणफ़र भाव में राहु मंगल की युति को ले लिया गया तो समस्या बजाय घटने के और भी बढने लगेगी। राहु की सीमा नही है कितना कष्ट दे सकता है या कितनी ऊंचाई पर ले जा सकता है,जैसे हाथी का भरोसा नही है कि वह कब बल पूर्वक अच्छे काम करता है और कब बिगडने पर गली की गली साफ़ करने के लिये अपनी शक्ति को प्रयोग मे ला सकता है। राहु शुक्र की युति मिलने का समय आता है व्यक्ति के अन्दर प्रेम रोग का भूत सवार हो जाता है उसे अपनी दुनिया समझ मे ही नही आती है,अगर उसी युति को मंगल की सहायता से मिला लिया जाये तो वह भूत बजाय बिगाडने के ऊंची ऊंची पोजीसन भी दिलवा सकता है जितना है उससे करोडों गुना बढा भी सकता है। राहु गुरु की युति आती है आम आदमी भी अपने को शहंशाह समझने लगता है उसे लगता है कि उसके सामने उसकी बुद्धि के जैसा कोई नही है वह तर्क वितर्क से अपने प्रभाव देना शुरु कर देता है उसे एक गंदगी मे भी सोना नजर आने लगता है वह धर्म और शिक्षा के अलावा रिस्ते आदि मे अपनी सीमा को तादात से अधिक बढाने लगता है अगर साथ मे मंगल को लिया गया है तो वह इन्ही कारणो मे तकनीकी कारण देखने के बाद उस क्षेत्र मे अपने को नाम और यश के रास्ते ले जायेगा और मंगल की युति नही ली है या केवल शुक्र का सहारा लिया है तो धन और वैभव मे तो आगे बढ जायेगा सुरा सुन्दरी की प्राप्ति तो हो जायेगी लेकिन जैसे ही राहु गुरु का असर समाप्त हुआ उसके अपने ही लोग उसे ले डूबेंगे।कुछ भी अजब व गजब कर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर पाखण्ड फैलाकर लोगो की आस्था को बेचने वाले ज्योतिषियो के मानसिक विकार का फल है राहुज्योतिष के मामले में राहु अपनी चलाने के चक्कर में ग्रह और भावों को गलत बताकर भय देने के बाद पूंछने वाले से धन या औकात को छीनने का कार्य करता है.| आपने देखा होगा की कुछ लोग फेसबुक पर अपना नम्बर देते है और फिर बोलते है की आपका ये ग्रह खराब है ऐसा करे नही तो आपका बहुत बुरा होगा और इस दोष को दूर करने के लिय इतने हमे दें वो भी साक्षात राहू का ही कार्य कर रहे होते है |आपने कुछ ज्योतिष्यों के स्टेट्स पढ़े होंगे जिनमे वो लिखते है की वो हर रोज 200 २५० काल रिसीव करते है १०० से उपर कुंडलिया देखते है और मेसेज का पता ही नही कितने को जवाब देते है जहां तक हमे पता है की असलियत  जीवन में ऐसा सम्भव नही है क्योंकि ऐसा किसी मानव के बस का कार्य तो होता नही उपर से facebook पर हर रोज कई पोस्ट भी करते है और उन पर आये पोस्ट का जवाब भी देते है , फिर भी वो अपनी कुटिलता का जाल फैलाकर लोगोंको को उलझा लेते है और ये सब भी राहू की ही करामात है | मिनटों में आपकी समस्या का हल करने वाले भी राहू के ही समान है | जिस प्रकार राहू ने छल कपट से अमृत का पान किया था इसी प्रकार इन लोगों का उद्देश्य भी अपने प्रपंच द्वारा लोगो को लूटना होता है जो लोग फेक id बनाकर फेसबुक पर है और अपनी असली pic की जगह किसी अन्य की pic लगाते है उनमे भी राहू की ही सिफत छुप्पी हुई होती है क्योंकि राहू ने भी रूप बदलकर अमृत पान किया था  बिना किसी कारण के किसी की पोस्ट पर जाकर बकवास करना या अश्लील पोस्ट करना भी खराब राहू वाले के ही लक्ष्ण है | मित्रों राहू में अवगुण है तो इसमें गुण भी है इसिलिय कहा जाता है की जिसे राहू तारे उसे कौन मारे | जीवन में होने वाले अविष्कार राहू की ही दें होते है | अचानक से मिलने वाली सफलता भी राहू की ही दें है जैसे की अचानक से कोई आदमी किसी विशेष कारण से प्रसिद्ध हो जता है सभी न्यूज़ चैनल न्यूज़ पपेर में उसी की चर्चा होती है चाहे ये प्रिसिधि उसे किसी अच्छे या बुरे किसी भी कार्य के लिय मिली हो लेकिन राहू द्वारा दी गई ऐसी प्रसिधी ज्यादा दिन नही चलती और लोग कुछ ही दिनों में उसे भूल जाते है | राजनीति में किसी नेता को अचानक से मिलने वाली भारी भरकम सफलता के पीछे भी राहू ही होता है जैसा की आपको पता है की छल कपट राजनीति का अहम हिस्सा होता है |

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

कुंडली कुंभ लग्न की

 एक सज्जन का यह प्रश्न है।आकाश के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग को कुंभ राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न कुंभ माना जाता है कुण्डली कुम्भ लगन की है और राशि कर्क है। राहु ,पंचम स्थान मे विराजमान है,चन्द्रमा छठे भाव मेकुंभ लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता हैओर  विराजमान है,शनि मंगल दोनो अष्टम स्थान मे विराजमान है,गुरु भाग्य भाव मे विराजमान हैसमस्त विश्व को प्रकाशित करने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है.,सूर्य कार्य भाव मे है और केतु बुध लाभ भाव मे विराजमान है,तथा शुक्र जो नवे भाव का मालिक है वह बारहवे भाव मे विराजमान है।

घर किस्मत का तभी पनपता,जीव उजाले बैठा हो,चार सात घर खाली होते जीव तन्हा रह जाता है"इस बात को इस कुंडली से समझा जा सकता है,किस्मत का मालिक शुक्र है और शुक्र बारहवे भाव मे जाकर उच्च का हो जाता है। बारहवा भाव आसमान का घर भी कहलाता है। लेकिन चार और सात दोनो खाली है इस प्रकार से किस्मत उच्च की होने के बावजूद भी जातक का जीवन तन्हा है वह अपने को अकेले में ही रखना पसन्द करता है। शनि और मंगल उसके अष्टम मे है इस बात के लिये कहा जाता है:-सालन सस्ता फ़ूस से बनता,रोज कमाना खाना है,जीव अहारी मरा जो खावे अष्टम शनिमंगल की बलिहारी"्आठवे घर को शमशान की उपाधि दी जाती है,अस्पताल का घर भी कहा जाता है,शनि को सडा हुआ भी कहा जाता है और मंगल को पकाने वाला भी कहा जाता है। फ़ूस का अर्थ पत्ते वाले ईंधन से है किसी वस्तु को पकाने के लिये अगर पत्तों को जलाया जाये तो वह अपनी गर्मी को पैदा नही कर पाता है,जब तक पत्ते जलाते रहो तब तक आग बनी रहती है और जैसे ही पत्ते खत्म हो गये आग भी खत्म हो गयी,शनि काले रंग की राख ही मिलती है। यह अर्थ अक्सर शमशानी खाने से भी जोडा जाता है जैसे मांस का भोजन,शनि को शिथिलता से भी जोडा जाता है और इस शनि की शिथिलता को दूर करने के लिये दवाइयों के रूप में मंगल को भी देखा जाता है जो शिथिलता को दूर करे। अक्सर इस युति वाले जातक को मरा हुआ मांस या जमीन के नीचे पैदा होने वाले कंद आदि खाने का शौक भी होता है। जातक को मंगल और शनि की शिफ़्त से शुगर या केंसर जैसी बीमारी भी हो जाती है। लेकिन बारहवा शुक्र जो किस्मत का मालिक है दोनो ग्रहों से अपनी युति को बनाकर बैठता है तो जातक को धन वाली कम्पनी मे या अस्पताल मे अथवा गुप्त रहस्यों को खोजने और सुलझाने मे सहायता भी मिलती है,शुक्र वैज्ञानिक बनाने के लिये भी अपनी तकनीक को देता है।पंचम राहु नौटंकी वाला गुरु नवें से करता है".पांचवे भाव मे राहु की नजर अगर पांचवी द्रिष्टि से गुरु पर पडती है तो जातक अक्सर व्यापार के मामले मे धन का ब्रोकर वाला कार्य करता है,यह कार्य लोगों के लिये किये जाने वाले मनोरंजन को भी व्यापारिक कारणो से जोड कर चलने वाला होता है। अपनी बाहरी जिन्दगी मे वह अपने जीवन की नैया को भाग्य के सहारे भी छोड कर अपने जीवन को लोगों के हित के लिये भी शुरु करने वाला होता है,लेकिन उसके लिये कोई भी जोखिम का काम नौटंकी करने जैसा ही होता है। यहां तक कि वह अपने आने वाली संतान के मामले मे भी दोहरी जिन्दगी को जीने की चाहत वाला माना जाता है इस प्रकार के जातक के कोई भी काम प्लान बनाकर सफ़ल नही हो पाते है वह जो भी काम रास्ता चलते करता है वह पूरा हो जाता है।शुक्र बारहवा सूर्य दसें में अन्धापन दे जाता है,कानूनी मसलों के कारण मन ही मन पछताता है"अगर शुक्र बारहवा हो और सूर्य दसवे भाव मे हो तो किसी न किसी प्रकार की बीमारी आंख सम्बन्धी हो जाती है,यह युति अक्सर शरीर मे पोषक तत्वों की कमी के कारण ह्रदय रोग को भी देने वाला होता है और शरीर मे खून के थक्के जमने की बीमारी भी देता है। किडनी वाले रोग भी देने के लिये यह सूर्य और शुक्र की युति अपना काम करती है। अधिक से अधिक खर्चा दवाइयों और अस्पताली कारणो मे ही होता रहता है।शुक्र बारहवां त्रिया हितकारी"बारहवे शुक्र के होने पर अगर जातक अपनी स्त्री से हित लगाकर चलता है तो वह जीवन मे दिक्कत नही उठाता है जितना वह अपनी स्त्री को परेशान करेगा उतना ही वह दुखी होगा,इसके अलावा भी अगर जातक मीडिया और सजावट वाले कामो को बिजली वाले कामो को लेकर चलता है तो वह जीवन मे धन के लिये भी दुखी नही हो पायेगा जैसे ही उसकी शादी होगी उसकी स्त्री जातक के सभी कष्टों को अपने पर झेलने के लिये तैयार हो जायेगी।

रविवार, 27 जनवरी 2019

ज्योतिषी भी उजाड़ देते हैं जिन्दगी।

  ज्योतिषी भी उजाड़ देते हैं जिंदगी।                                    कैसे देखें   यह कुंडली एक कन्या की है,सिंह लगन है स्वामी सूर्य है,भाग्य के मालिक मंगल है पति का मालिक शनि है,पति के भाग्य का मालिक शुक्र है,धन और लाभ का मालिक बुध है,लगनेश सूर्य भाग्येश और चतुर्थेश मंगल लाभेश और धनेश बुध एक साथ ही भाग्य भाव मे विराजमान है.

मंगल स्वराशि मे है शुक्र भी स्वराशि मे है,चन्द्रमा स्वराशि मे है,शनि उच्च राशि मे जाकर वक्री हो गया है,राहु उच्च का है लेकिन लाभ भाव मे है और केतु भी उच्च राशि मे लेकिन पंचम मे जाकर अपना प्रभाव जीवन मे देने के लिये बैठ गया है। जातिका के पति भाव को राहु केतु शनि तीनो ने अपने अपने अनुसार बल दिया है।कन्या का विवाह विच्छेद केवल इसलिये हो गया है क्योंकि एक ज्योतिषी ने कन्या के पति को राय दे डाली कि यह कन्या भाग्यहीन है। इस कुंडली के अनुसार जब कन्या के भाग्य में भाग्य के मालिक विराजमान है,कन्या तीन तीन विषयों मे डिग्री लेकर बैठी है,कन्या के लगनेश सूर्य भाग्य के ही घर मे विराजमान है लाभ और धन के मालिक कन्या के भाग्य मे विराजमान है फ़िर उन ज्योतिषी जी को कैसे समझ मे आ गया कि कन्या भाग्य हीन है ? जिस दिन से कन्या ने जन्म लिया उसके पिता की दिनो दिन बढोत्तरी हो गयी,जिस दिन से कन्या ने जन्म लिया पिता की साख जनता मे बहुत अच्छी हो गयी,फ़िर कन्या कहां से भाग्य हीन हो गयी। इससे लगता है कि कन्या के पति ने अपने भाग्य को मिटाने के लिये कुचक्र पैदा किया और किसी  अज्ञानीज्योतिषी से कहला दिया कि कन्या भाग्य हीन है। कन्या के पति भाव का मालिक शनि है शनि कन्या के तीसरे भाव मे वक्री है,वैसे तो शनि उच्च राशि का होकर तुला राशि मे विराजमान है,लेकिन नियम के अनुसार जब कोई ग्रह उच्च का होकर वकी हो जाता है तो वह नीच का फ़ल देने लगता है। पति के ग्यारहवे भाव मे केतु विराजमान है ग्यारहवा केतु धनु राशि का है,कहने को तो उच्च राशि मे है लेकिन पति के लाभ भाव को केतु अपनी शक्ति दे रहा है,और पति के पंचम मे विराजमान राहु का असर लेकर पति की व्यापारिक बुद्धि का उल्टा फ़ायदा लेकर पति को चंद रुपयों के लिये बनायी हुयी राय जो खुद ने ही प्रकाशित की होगी या किसी घटिया सोफ़्टवेयर से कुंडली को निकाल कर दिखा दिया होगा और कह दिया होगा कि उसकी पत्नी भाग्यहीन है। मित्रों इसलिए अपनी कुंडली कैसे सही ज्योतिषी जो पूरा ज्ञान रखता  हो को ही दिखाएं मित्रों रतन भी अगर आप पहन   रहे हैं तो किसी अच्छे रतन एक्सपर्ट ज्योतिषी को ही मिलकर  ले अब पुखराज का ही उदाहरण लें पुखराज कई किस्मों में कई रंगों में मिलता है अब आपको कोई पुखराज बताता है तो आप अपने हिसाब से बाजार से  लेकर पहन लेते हैं जो आपको उल्टा असर भी दे सकता है अब पुखराज कौन सा पहनना है यह अपने ज्योतिषी को पूछ कर दिखा कर ही लेओर देखें कुंडली कर्क राशि की है,चन्द्रमा का स्थान राहु से दूसरे भाव मे है यह कन्या डरने वाली है,लेकिन उसे दम देने के लिये मंगल जो नवे भाव का है ने राहु को कन्ट्रोल करने केलिये अपनी शक्ति दी है,अष्टम और पंचम का मालिक गुरु भी चौथे भाव मे वृश्चिक राशि का होकर वक्री है,वर्तमान मे राहु ने भी गुरु पर अपना असर दिया है और वह कनफ़्यूजन मे है,गुरु यानी रिस्ते को कनफ़्यूजन मे देकर बरबाद करने के लिये भी माना जा सकता है,गुरु का सम्बन्ध दसवे शुक्र से भी है शुक्र कार्य और तीसरे भाव का मालिक है,जातिका के पति भाव से शुक्र का स्थान चौथे भाव मे है,इस प्रकार से पति के दिमाग मे एक सात दो स्त्रियों का होना भी माना जा सकता है। कन्या का विवाह जहां होता है वहां की स्त्रियां अपने अनुसार कन्या के पैतृक परिवार की समृद्धि देख कर सहन नही कर पाती है। साथ ही मंगल का स्वराशि मे होने के कारण और सूर्य के साथ होने से मंगल का राहु हो पति भाव से पंचम मे स्वछन्द गति से अपने अनुसार हमेशा बदलने वाले रिस्तो को अपनाने के कारण और राहु से बारहवे शुक्र यानी स्त्री जाति को केवल भोग्या समझने के कारण वह कन्या के परिवार का अंकुश सहन नही कर पाया यह भी कारण हो सकता है,इसके अलावा भी राहु जो कन्या के परिवार से कन्ट्रोल किया गया है राहु ग्यारहवे भाव मे ज्योतिषी का रूप धारण कर लेता है और वह केवल लाभ के लिये अपने कार्यों को करता है साथ ही धर्म कर्म से सम्बन्धित दो लोगो को अपने साथ लेकर चलता है पूजा पाठ कर्मकांड आदि के काम वह अपने अनुसार करवाता है साथ ही वह इन कार्यों के बदले मे वह अच्छे धन को प्राप्त करने के लिये अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है। उस ज्योतिषी ने कन्या परिवार से भी किसी पूजा या कर्मकांड के लिये धन की मांग की होगी और कन्या परिवार ने अपने प्रभाव के कारण उस ज्योतिषी को कन्ट्रोल करने के लिये अपनी शक्ति का प्रयोग किया होगा उस ज्योतिषी ने अपने कर्म कांड का हवाला देकर पति परिवार को अपने ग्रहण मे लिया होगा और पति के परिवार ने उस ज्योतिषी की बात को सही मानकर कन्या से छुटकारा करने के लिये तलाक लेने का कार्य रचा होगा। वक्री शनि की नजर पंचम केतु पर है,पति के द्वारा विदेशी कार्य किसी ब्रोकर से करवाये जा रहे होंगे,पिछले समय मे जन्म के केतु पर गोचर के राहु ने अपने कनफ़्यूजन को दिया,पति के किये जाने वाले कार्य और लाभ देने वाले विदेशी ब्रोकर से लाभ का आना बन्द हो गया,साथ ही पति भाव से ग्यारहवे राहु और जन्म के छठे चन्द्रमा से युति होने के कारण जो कार्य प्लान बनाकर किये जा रहे थे वह सभी कनफ़्यूजन मे चले गये और पति को यह लगने लगा कि उसकी शादी के बाद से ही सब कुछ उल्टा होने लगा है इसलिये भी पति ने ज्योतिषी से राय ली और पूरी पत्री की व्याख्या जाने बिना उस ज्योतिषी ने अपनी राय मे कह दिया कि उसकी पत्नी का भाग्य सही नही है इसलिये उसका कारोबार दिक्कत मे आ गया है।
जब तक विवाह भाव को सही नही देखा जाता है और विवाह तथा साझेदारी को स्पष्ट तरीके से विवेचना मे नही लाया जाता है कोई भी व्यक्ति हरगिज किसी सही नतीजे पर नही पहुंच सकता है। जब सूर्य मंग्ल बुध एक ही भाव मे है और भाग्य भाव मे है तपते हुये मंगल को सूर्य की रोशनी मिल जाती है तो वह अपने वास्तविक रूप मे आजाता है। बुध का साथ मिलने पर वह बुध जो कोमल प्रकृति का होता है दोनो के प्रभाव से कुम्हला जाता है। पति भाव से तीसरे भाव मे सूर्य मंगल के होने से यही कारण माना जाता है.सूर्य मंगल बुध अगर त्रिकोण मे है तो तीन भाई का योग होता है,कारण तीनो ही ग्रह पुरुष राशि मे होने के कारण पुरुषत्व को प्रकट करते है,सूर्य और मंगल मित्र है इसलिये दो भाई जातिका के आज्ञाकारी है और जो जातिका कहती है उसे करने को तैयार हो जाते है इस बात पर भी जातिका के पति को डर लगने लगा हो कि उसने कभी कोई ऐसी वैसी बात वैवाहिक जीवन के अन्दर पैदा की तो जातिका के दोनो भाई क्या से क्या कर सकते है। इसलिये भी कोई कारण नही मिलने पर जातिका के पति ने ज्योतिषी को लोभ देकर कन्या को भाग्यशाली करार दिलवाया हो। जातिका का एक भाई किसी एजेन्सी का कार्य करता है,अक्सर यह सम्बन्ध यात्रा के अन्दर बनते है और जो सम्बन्ध सिंह राशि के यात्रा मे बनते है वे अक्सर धोखा ही देने के लिये माने जाते है।चन्द्र गुरु की युति भी खतरनाक बन जाती है,पति का पिता धार्मिक हो सकता है,लेकिन जातिका की मां धर्म पर विश्वास करने वाली नही होती है,दोनो के सम्बध बनने का कारण चन्द्र गुरु की युति से भी मिलता है जातिका के माता पिता कहीं दूर से जाकर बसे हो और जो समबन्ध बना है वह अनजान लोगो का हो,साथ ही वक्री गुरु का एक प्रभाव यह भी देखा जाता है कि जब वक्री गुरु वक्री शनि के घेरे मे हो तो व्यक्ति जहां रहता है वहां की सभ्यता मर्यादा सामाजिकता आदि सभी विरोध करने वाला होता है,वह उल्टे कार्य करता है और उसके यह कार्य जातिका को सही नही लगे वह उसके अनुसार नही चली हो,इसके बाद भी गुरु चन्द्र की युति अगर कन्या की कुंडली मे मिलती है तो अपने आप ही कन्या की सास से नही बनती है,किसी न किसी बात पर बेकार का मनमुटाव बन जाता है यह प्रभाव गुरु के वक्री होने पर अपने आप ही नफ़रत का रूप ले लेता है। कन्या की सास डायबटीज की रोगी भी होती है और बीमार भी होती है वह बहू के स्थान पर नौकरानी चाहती है लेकिन तीन तीन डिग्री धारण करने वाली कन्या कैसे किसी की नौकरानी बन सकती है।इस प्रकार से कहा जा सकता है कि जातिका बहुत भाग्य शाली है लेकिन भाग्य को प्रयोग करने के लिये मर्द की जरूरत होनी चाहिये अगर कोई चालाक और झूठ  पर अपनी गाडी चलाने वाला होगा तो वह ज्योतिषी की राय को ही मानेगा,कहा भी गया है कि पुरुषार्थ सितारों को चलाने वाला होता है और कामचोर को सितारे चलाते रहते है,पुरुषार्थी ज्योतिष से केवल अच्छे और बुरे समय को इसलिये पूंछते है कि उन्हे पहले से क्या तैयारी करनी है जबकि कामचोर केवल ज्योतिष को इसलिये पूंछते है कि वे बिना कार्य किये कैसे मुफ़्त का माल ले सकते है।

बुधवार, 23 जनवरी 2019

राहु का गोचर ओर राहु की माया

राहु का गोचर ओर  राहु की माया
मित्रोंअक्सर लोगो का बहम होता है कि व्यक्ति पर भूत प्रेत पिशाच का साया है और वह उनके प्रभाव मे आकर अपनी जिन्दगी को या तो तबाह कर लेता है।पर होता है राहु का असर  बिल्कुल उसके लक्षण ऐसे होते हैं जैसे कोई भूत प्रेत से ग्रस्त काया सीधा सा अर्थ है कि भूत कोई अन्जानी आत्मा नही है वह केवल अपने द्वारा किये गये प्रारब्ध यानी पूर्व के कर्मो का फ़ल है,पिशाच कोई खतरनाक आत्मा या द्रश्य रूप मे नरभक्षक नही है वह केवल अपने अन्दर की वासनाओं का कुत्सित रूप है। प्रेत का मतलब कोई खतरनाक यौनि नही है बल्कि स्थान विशेष पर किये गये कृत्यों का सूक्ष्म रूप है जो बडे आकार मे केवल सम्बन्धित व्यक्ति को ही द्रश्य होता है।इन सब कारणो को प्रदर्शित करवाने के लिये राहु को जिम्मेदार माना जाता है 

यानी राहु का असर भी ऐसा होता है जेसे भूत प्रेत और हवा से ग्रस्त आदमी यह कुंडली मे जिस भाव मे जिस ग्रह के साथ गोचर करता है उसी ग्रह और भाव तथा राशि के अनुसार अपनी शक्ति का एक नशा पैदा करता जाता है और जीवन मे या तो अचानक बदलाव आना शुरु हो जाता है। एक अच्छा आदमी बुरा बन जाता है या एक बुरा आदमी अच्छा बन जाता है आदि बाते राहु से समझी जा सकती है।
मेरी हमेशा भावना रही है कि जो कारण भौतिकता मे सामने आते है और जिन्हे हम वास्तव मे देखते है समझते है महशूश करते है उनके प्रति ही मै आपको बताऊँ कपोल कल्पित या सुनी सुनाई बात पर मुझे तब तक विश्वास नही होता है,जब तक प्रत्यक्ष रूप मे उसे प्रमाणित नही कर के देख लूँ। इस प्रमाणिकता के लिये कई बार जीवन को भी बडे जोखिम मे डाल चुका हूँ और राहु के प्रभाव को ग्रह के साथ गोचर के समय मिलने वाले प्रभाव को साक्षात रूप से समझकर ही लिखने और बताने का प्रयास करने का मेरा उद्देश्य रहा है। साथ ही राहु के प्रभाव को कम करने के लिये और उसके रूप को बदलने के लिये जितनी भी भावना रही है उनके अनुसार चाहे वह बदलाव चलने वाले प्रभाव को बाईपास करने से सम्बन्धित हो या बदलाव को अलग करने के लिये किये जाने वाले तांत्रिक कारणो से जुडे हो वह सभी अपने अपने स्थान पर कार्य जरूर करते है राहु एक मायावी  ग्रह है वह जब किसी भी भाव मे अपना असर प्रदान करता है तो भाव के अनुसार उल्टी गति राहु के प्रभाव से भाव मे मिलनी शुरु हो जाती है इसके साथ ही राहु की गति उल्टी होती है वह अन्य ग्रहो के अनुसार सीधा नही चलता है उल्टे चलकर ही अपने प्रभाव को प्रदर्शित करता है,साथ ही जो भाव जीवन मे सहायक होता है उसके लिये वह अपने प्रभाव को देने के लिये सहायता वाले भाव के प्रति अपनी धारणा को पूर्व से ही बदलना शुरु कर देता है जैसे राहु को कोई बीमारी देनी है तो वह सबसे सहायता देने वाले डाक्टर या दवाई से दूरी पैदा कर देता है अगर समय पर डाक्टर की सहायता मिलनी है तो किसी न किसी बात पर डाक्टर के प्रति दिमाग मे क्षोभ पैदा कर देगा और उस डाक्टर से दूरी बना देगा,और जैसे ही बीमारी पैदा होगी उस डाक्टर की सहायता नही मिल पायेगी या जो दवाई काम आनी है वह पास मे नही होगी या उस दवाई को खोजने पर भी वह नही मिलेगी,अगर किसी प्रकार से मिल भी गयी तो वह दवाई पहले से ली गयी अन्य दवाइयों के असर मे आकर अपना वास्तविक प्रभाव नही दे पायेगी। राहु का मुख्य काम होता है वह घटना के पूर्व मे लगभग छत्तिस महिने पहले से ही अपने प्रभाव को देना शुरु कर देगा,जैसे बच्चे को पैदा होने के बाद किसी बडी बीमारी को देना है तो वह पहले माता पिता के अन्दर नौ महिने पहले से ही हाव भाव रहन सहन खानपान आदि मे बदलाव लाना शुरु करेगा उसके बाद के नौ महिने मे वह बीमारी वाले कारणो को माता पिता के अन्दर भरेगा उसके बाद वह उस बीमारी को बनाने वाले कारणो को मजबूत बनाने के लिये अपने प्रभाव को बच्चा पैदा करने वाले तत्वो के अन्दर स्थापित करेगा और जब आखिर के नौ महिने मे बच्चे का गर्भ मे आकर पैदा होने तक का समय होगा तो बच्चे के अन्दर वही सब बीमारी वाले तत्व समावेशित हो जायेंगे और बच्चा पैदा होने के बाद उसी बीमारी से जूझने लगेगा। जैसे बच्चे के पैदा होने के बाद अगर टिटनिस की बीमारी होनी है तो वह बीमारी बच्चे के अन्दर माता पिता के द्वारा उनके खून से मिलने वाली टिट्निस विरोधी कारको को शरीर मे नही आने देगा और खून के अन्दर कोई न कोई इन्फ़ेक्सन देकर अगर माता के द्वारा गर्भ समय मे टिटनिश का टीका भी लगवाया गया है या कोई दवाई ली गयी है तो उन तत्वो को वह शरीर से बाहर कर देगा,बाहर करने के लिये माता को कोई अजीब सी परेशानी होगी और वह उस परेशानी को दूर करने के लिये अन्य दवाइओं का प्रयोग करना शुरु कर देगी या किसी दवाई के गलत प्रभाव से बचने के लिये समयानुसार कोई डाक्टर उसे एंटीक बैटिक आदि को दे देगा और वह तत्व समाप्त हो जायेंगे। इसके साथ ही बच्चे के पैदा होने के बाद नाड छेदन के लिये कितनी ही जुगत से रखे गये  सीजेरियन हथियार मे टिटनिश के जीवाणु विराजमान हो जायेंगे,अथवा कोई नाड छेदन करने वाला व्यक्ति अपने अन्दर बाहर से आने के बाद किसी प्रकार से उन जीवाणुओं के संयोग मे आ जायेगा आदि कारण देखे जा सकते है। इसी प्रकार से जब राहु अन्य प्रकार के कारण पैदा करेगा तो वह अपने अनुसार उसी प्रकार की भावना को व्यक्ति के खून के अन्दर अपने इन्फ़ेक्सन को भर देगा,अथवा भावनाये जो व्यक्ति के लिये दुखदायी या सुखदायी होती है उन्ही भावनाओ के अनुसार लोगो से वह अपना सम्पर्क बनाना शुरु कर देगा और वह भावनाये उस व्यक्ति को अगर अच्छी है तो उन्नति देगा और बुरी है तो वह भावनाये व्यक्ति को समाप्त करने के लिये कष्ट देने के लिये अथवा आहत करने के लिये अपने अनुसार प्रभाव देने लगेंगी। कहा जाता है कि राहु अचानक अपना प्रभाव देता है लेकिन उस अचानक बने प्रभाव मे भी राहु की गति के अनुसार ही सीधे और उल्टे कारको का असर सामने आता है। अगर व्यक्ति का एक्सीडेंट होना है तो कारक पहले से ही बनने शुरु हो जायेंगे,व्यक्ति के लिये राहु अपने प्रभाव से किसी ऐसे जरूरी काम को पैदा कर देगा कि वह व्यक्ति उसी आहत करने वाले स्थान पर स्वयं जाकर उपस्थिति हो जायेगा और कारक आकर उसके लिये दुर्घटना का कारण बना देगा। अगर जातक को केवल कष्ट ही देना है तो कारक शरीर या सम्बन्धित कारण को आहत करेगा फ़िर व्यक्ति के भाग्यानुसार सहायता करने वाले कारक उसके पास आयेंगे उसे सम्बन्धित सहायता को प्रदान करेंगे और व्यक्ति राहु के समय के अनुसार कष्ट भोगकर अपने किये का फ़ल प्राप्त करने के बाद जीवन को बिताने लगेगा। राहु की गति प्रदान करने का समय नाडी ज्योतिष से अठारह सेकेण्ड का बताया गया है और वह अपनी गति से अठारह सेकेण्ड मे व्यक्ति को जीवन या मृत्यु वाले कारण को पैदा कर सकता है। जिस समय राहु का कारण पैदा होता है व्यक्ति के अन्दर एक प्रकार की विचित्र सी सनसनाहट पैदा हो जाती है,और उस सनसनाहट मे व्यक्ति जो नही करना है उसके प्रति भी अपने बल को बढा लेता है और उस कृत्य को कर बैठता है जो उसे शरीर से मन से वाणी से या कर्म से बरबाद कर देता है मित्रोंराहु कुंडली मे बारह भावो मे गोचर का फ़ल अपने अनुसार देता है लेकिन भाव के लिये भी राशि का प्रभाव भी शामिल होता है। जैसे राहु कन्या राशि मे दूसरे भाव का फ़ल दे रहा है तो राहु के लिये तुला राशि का पूरा प्रभाव उसके साथ होगा लेकिन जन्म लेने के समय राहु का जो स्थान है उस स्थान और राशि का प्रभाव भी उसके साथ होगा और वह प्रभाव दूसरे भाव मे तुला राशि के प्रभाव मे मिक्स करने के बाद व्यक्ति को धन या कुटुम्ब या अपने पूर्व के प्राप्त कर्मो को अथवा अपने नाम चेहरे आदि पर अपना असर प्रदान करने लगेगा राहु जब विभिन्न ग्रहो के साथ विभिन्न भावो और राशि मे गोचर करता है तो राहु अपने जन्म समय के भाव और राशि के प्रभाव को साथ लेकर ग्रह और ग्रह के स्थापित भाव तथा राशि के प्रभाव मे अपने प्रभाव को शामिल करने के बाद अपना असर प्रदान करेगा लेकिन जो भी प्रभाव होंगे वह सभी उस भाव और राशि के साथ राहु के साथ के ग्रह हो जन्म समय के है को मिलाकर ही देगा। अगर राहु वृश्चिक राशि का है और वह कुंडली के दूसरे भाव मे विराजमान है तो वह दसवे भाव मे गोचर के समय मे वृश्चिक राशि के साथ दूसरे भाव का असर मिलाकर ही दसवे भाव की कर्क राशि मे पैदा करने के बाद अपने असर को प्रदान करेगा,जैसे वृश्चिक राशि शमशानी राशि है और राहु इस राशि मे शमशाम की राख के रूप मे माना जाता है यह जरूरी नही है कि वह शमशान केवल मनुष्यों के शमशान से ही सम्बन्धित हो वह बडी संख्या मे मरने वाले जीव जन्तुओं के स्थान से भी सम्बन्ध रख सकता है वह किसी प्रकार की वनस्पतियों के खत्म होने के स्थान से भी सम्बन्ध रख सकता है वह अपने अनुसार जलीय जीवो के समाप्त होने के स्थान स्थलीय जीवो के अथवा आसमानी जीवो के प्रति भी अपनी धारणा को लेकर चल सकता है। राहु वृश्चिक राशि के दूसरे भाव मे होने पर वह अपने कारणो को दसवे भाव मे जाने पर कर्क राशि के अन्दर जो भावना को पैदा करेगा वह धन के रूप मे कार्य करने के लिये शमशानी वस्तुओं को खरीदने बेचने का काम ही करेगा आदि बाते राहु के ग्रहो के साथ गोचर करने पर मिलती है और इन्ही बातो के अनुसार घटना और दुर्घटना का कारण जाना जाता है।

रविवार, 20 जनवरी 2019

राशिफल कहा सही बैठता है

https://youtu.be/sXMcp0IapGEभारतीय वैदिक ज्योतिष मूलरूप से नक्षत्र आधारित है कारण जब बालक का जन्म होता है तो सर्वप्रथम नक्षत्र के आधार पर उसके शुभ अशुभ का ज्ञान किया जाता ही फिर उसके अन्य संश्कारो के निर्धारण के लिए नक्षत्र के आधार पर ही मुहूर्त देखा जाता है कहा जाता है कि ग्रह से बडा नक्षत्र होता है और नक्षत्र से भी बडा नक्षत्र का चरण जब विवाह कि बात आती है

 तो वर बधू का मेलापक भी नक्षत्र के आधार पर ही किया जाता है जब भी किसी शुभ कार्य के लिए मुहूर्त का निर्धारण करना होता है तब भी नक्षत्रों को ही प्राथमिकता प्रदान की जाती है कुंडली में भविष्य के फलादेश के लिए भी सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली विंशोत्तरी दशा का निर्धारण भी नक्षत्रों के आधार पर ही होता है  फिर फलादेश के लिए नक्षत्रों का प्रयोग क्यों नहीं !तिष जगत में आज नक्षत्रों का चलन सिर्फ मुहूर्त निर्धारण तक ही सीमित हो गया है, ज्योतिषी राशियों के आधार पर ही फलादेश कर रहे है नतीजा फ़लादेश असफल हो रहे हैंज्‍योतिष की किताबों में आपको ग्रहों, राशियों और भावों के बारे में विस्‍तार से जानकारी मिल जाएगी। इससे अधिक देखने पर हम पाते हैं कि राशियों को नक्षत्रों के अनुसार विशिष्‍टता दी गई है। चंद्रमा भी नक्षत्रों पर से गुजरते हुए हमें रोज के बदलावों की जानकारी देता है। ज्‍योतिष की प्राचीन और नई पुस्‍तकों में यह तो दिया गया है कि अमुक नक्षत्र में चंद्रमा के विचरण का फलां फल है, लेकिन कहीं यह नहीं बताया गया है कि नक्षत्र का नैसर्गिक स्‍वभाव क्‍या है या उस पर किसी ग्रह के स्‍वामित्‍व का वास्‍तविक अर्थ क्‍या है।


पाराशर ऋषि ने नक्षत्र चार के आधार पर ही दशाओं का विभाजन किया लेकिन नक्षत्रों के बारे में विस्‍तार से जानकारी नहीं दी। इसी तरह प्रोफेसर केएस कृष्‍णामूर्ति ने केवल चंद्रमा के नक्षत्र चार से बाहर आकर हर भाव और ग्रह के नक्षत्रों तक उतरकर विशद् विश्‍लेषण पेश किया, लेकिन उन्‍होंने ने भी कहीं नक्षत्रों की निजी विशिष्‍टताओं के बारे में स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है। जबकि वृहत्त संहिता और दूसरी एकाध प्राचीन पुस्‍तक में नक्षत्रों के स्‍वरूप का वर्णन तक मिलता है। इन नक्षत्रों के स्‍वरूप के आधार पर ही उनके गुण भी बताए गए हैं। जब नक्षत्र के बारे में इतनी सटीक जानकारी उपलब्‍ध है तो उनके निजी या एकांगिक गुणों के बारे में कहीं स्‍पष्‍ट नहीं किया जाना कुछ खल जाता है। नक्षत्रों में विचरण को दौरान अगर चंद्रमा के स्‍वभाव में नियमित रूप से परिवर्तन आता है तो क्‍या अन्‍य ग्रहों पर भी ऐसे प्रभाव का अध्‍ययन जरूरी नहीं है।पहले पता करते हैं कि नक्षत्र हैं क्‍या?

हमने देखा कि बारह राशियां भचक्र के 360 डिग्री को बराबर भागों में बांटती हैं। इस तरह आकाश के हमने बारह बराबर टुकड़े कर दिए। तारों का एक समूह मिलकर नक्षत्र बनाता है। ऐसे सत्‍ताईस नक्षत्रों की पहचान की गई है। इससे आकाश को बराबर भागों में बांटा गया है। हर नक्षत्र के हिस्‍से में आकाश का 13 डिग्री 20 मिनट भाग आता है। जब हम चंद्रमा के दैनिक गति की बात करते हैं कि इसमें नक्षत्रों की विशेष भूमिका होती है। राशि वही हो और नक्षत्र बदल जाए तो चंद्रमा का स्‍वभाव भी बदल जाता है। इसी तरह हर ग्रह के स्‍वभाव में भी नक्षत्र चार के दौरान बदलाव आता है। चूंकि नक्षत्रों का स्‍वामित्‍व ग्रहों को ही दिया गया है। ऐसे में स्‍वभाव में परिवर्तन भी ग्रहों के अनुसार ही मान लिया जाता है। जबकि हकीकत में यह नक्षत्र की नैसर्गिक प्रवृत्ति के अनुसार होना चाहिए।अव आप देख सकते हैं राशि फल कहा सही वैठता है

शनिवार, 19 जनवरी 2019

बच्चों की पढ़ाई को लेकर माता-पिता की चिंता

मित्रो हमारे पास हर रोज ऐसे माता पिता अपनी वच्चो की पङाई की समस्या से परेशानी लेकर कि आचार्य जी आप हमे कोई उपाय वतऐ पढाई में कमजोर बच्चों के लिऐ अक्सर सुनने में आता की हमारे बच्चे पढाई में कमजोर है।हम अपने बच्चों को पढाई करवाने के लिए बहुत मेहनत करते है।दिन रात उन्हें खुद पढाते है।और ट्यूशन भी भेजते हैं।लेकिन परीक्षा में कम नम्बर या पास नहीं होते। या किसी भी नौकरी के लिए या उच्च पढाई के लिए तैयारी करते है। लेकिन वहां भी विफल हो जाते है।सफलता हाथ नहीं लगती। तब इस स्थिति मे हमें क्या करना चाहिए। बहुत मानसिकता बनी रहती है।इस चिंता को दूर करने के लिए हम कुछ उपाय आप को बताने जा रहे है धन कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था में कमा सकता है। वो उसका भाग्य है।कि उसकी कमाई कम हो या ज्यादा हो। लेकिन विद्या हर मनुष्य के भाग्य में नहीं होती। चाहे आप किसी धनवान व्यक्ति के घर आप का जन्म हुआ। और अपने धन के द्वारा पदवी ( डिग्री ). प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन आप उस पदवी का ज्ञान कहा से लायेगे एक कहावत बोली जाती है।कि धन से आप पुस्तक खरीद सकते है लेकिन विद्या ज्ञान कभी नहीं खरीद स
कते। विद्या हमेशा झुक कर, नम्रता से आप को उस विद्या के लायक बनना पडेगा। इसके बाद ही आप विद्या के पात्रबनेगे। और आपको गुरू की कृपा मिलेगी और आप समस्त संसार में अपनी विद्या से ख्याति, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे। यदि हम अपनी पढाई को सही उतम करना चाहते हो तो आप को माँ सरस्वती की अराधना, पूजा करना शुरू कर दो। जिस दिन आप के बच्चों का जन्म दिन हो उस समय गरीब विद्याथियो को पुस्तक, कोपी, पैंसिल, पैंन दान करना चाहिए। यदि आप किसी गरीब, जरूरतमंद छात्र, छात्राओ को विद्या का दान उन्हे पढाते हो। और उन्हें ट्यूशन पढाने का कोई मूल्य नहीं लेते तो निश्चित ही आप आने वाले समय में बहुत उच्च,शिक्षा ग्रहण कर पाओगे। सरस्वती माँ पूजा पाठ से आप के उपर प्रसन्न हो या ना हो लेकिन यदि आप किसी गरीव को फ्री में ट्यूशन पढाते हो या पङाने मे उसकी फीस देते है तो आप के उपर माँ सरस्वती की कृपा बनी रहेंगी। और आप बिना रूकावट, बाधा के अपनी पढाई पूरी कर पाओगे। इस में कोई शक नहीं है।यदि आप अपने बच्चों से किसी भी शिक्षित व्यक्ति जैसे की अध्यापक, लेक्चरार, प्रोफेसर, या विघवान जिनके पास आप ट्यूशन पढते हो उन्हें अपने बच्चों के हाथ से पैन दिलवाऐ। यह उपाय करवा के आप अपने बच्चों की पढाई में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हो। और उनके उज्ज्वल भविष्य बनाने में आप का बहुत बड़ा हाथ हो सकता है। विद्या वाला मनुष्य देश विदेश कहीं भी जाये उसका विद्या के कारण मान सम्मान माँ सरस्वती की कृपा से प्राप्त होता है। यदि आप भी सरस्वती की कृपा अपने उपर या अपनी संतान के ऊपर चाहते हो तो माँ शारदा देवी सरस्वती के इस बारह नाम का पाठ अपने घर परिवार में करें और अपने बच्चों से भी करवाये। जब भी आप अपने बच्चों को पढाने बैठे तो इस स्त्रोत का पाठ करवाये फिर आप अपने बच्चों को पुस्तक पढने के लिए कहिये। जब भी किसी भी समय आप के बच्चे पुस्तक के प्रशन याद करने बैठेगे। उस समय इस स्त्रोत का पाठ करके या करवा के आप को शीध्र अपने प्रशन के उतर याद हो जायेगे। आप का पढाई में मन लगेगा ज्यादा समय आप अपनी पढाई में लगा सकोगे। जिसके कारण आप का परीक्षा फल पहले के मुकाबले बहुत अच्छा रहेगा। आप अपने जीवन मे सद्बुद्धि, सत्संग, सद्मार्ग, उच्च पद, प्रतिष्ठा, और माँ सरस्वती की कृपा से उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाओगे। माँ सरस्वती के वीज मंत्र का जाप वच्चे से करवाऐ या वच्चे के नाम से माता पिता मे से कोई भी कर सकता है वच्चो को मिट्टी मे खेलने से ना रोके वच्चो को केसर का टीका माथे पर लगाते रहे ओर थोङा केसर दुघ मे ङाल कर दुघ पिने को दे अखरोट ओर वादाम गिरी भी वच्चो को लाभ देगी वरहमी शंखपुश्पी जेसी जङी वुटी वाली दवा किसी योग्य चिकित्सक की सलाह से दे किसी अच्छे ज्योतिषी को कुंङली दिखा कर समाघान करवाऐ आचार्य राजेश 09414481324 07597718725 माँ काली ज्योतिष hanumaangarh or dabwali

राहु वक्री साथ वालो को भी करें वक्री

वक्री राहु साथ वाले ग्रह को भी कर दे बक्री      छाया ग्रह के रुप में जाना जाने वाला राहु ग्रह पूर्व जन्मों के कर्म बंधन को दर्शाता है। राहु जिस ग्रह के साथ युति में होता है वैसा ही कर्मबंधन अर्थात दोष होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राहु सिर है। शरीर की अन्य इंद्रियों के अभाव के चलते इसमें अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता है, इसलिए इसे यह धर्म के विपरीत कार्य करता है। सामान्य रूप से लोगों में यह मान्यता है कि राहु हमेशा ही जातक को खराब फल देता है। बल्कि ऐसा नहीं है।

ऐक)कहावत बहुत ही मशहूर है,-"संगति ही गुण ऊपजे संगति ही गुण जाय,बांस फ़ांस और मीशरी एकहि भाव बिकाय",संगति का असर बडा ही अनौखा है,एक बांस की लकडी मिश्री के साथ तौल में मिश्री के भाव मे ही बिकती है.यह बात राहु की संगति के लिये भी मानी जाती है जिस भाव मे जाये उसका उल्टा फ़ल देने लगता है और जिस ग्रह को द्रिष्टि दे दे वही ग्रह वक्री का फ़ल देने लगे.गुरु के साथ आते ही अच्छा भला विद्वान आदमी छिछोरे काम करने लगे और शनि के साथ आने से अच्छा भला सेवा करने वाला आदमी हुकुम चलाने लगे.बुध के साथ आजाये तो बजाय बोलने के प्रदर्शन करने लगे,मंगल के साथ आजाये तो बजाय मेहनत करके शक्ति को पैदा करके दवाई खाकर या शराब पीकर शक्ति को बताने लगे,चन्द्रमा के साथ आजाये तो अच्छी भली सोच बदल कर कन्फ़्यूजन पैदा कर दे और सूर्य के साथ आजाये तो पिता को बेटे की हुकूमत मे चलना पडे और राज्य करने वाला बेईमान का रूप धारण करले यह सब राहु की संगति का परिणाम देखा जाता है.मतलब सीधे को उल्टा करना और उल्टे को सीधा करना इसका काम है.कई बार देखा है कि मारक अपनी शक्ति लेकर मारने के लिये जातक को अपना असर देता है लेकिन राहु की संगति मिलते ही मारने वाला बचाने के लिये भागने लगता है और बचाने वाला मारने के लिये अपने प्रयास करने लगता है।भाव का असर भी देखने मे बहुत ही अजीब सा लगता है अगर राहु लगन मे बैठ जाये तो उल्टा काम और बोलने चालने मे प्रदर्शन मे सभी कार्यो मे उल्टा फ़ल प्रदान करने लगता है आदमी है तो औरत वाली हरकते करने लगता है और औरत है तो आदमी वाले व्यवहार करने लगता है.राहु धन मे बैठ जाता है तो बजाय देने के लेने लगता है तीसरे भाव मे आजाये तो समझ कर चलने बोलने आदि की कला को बदल कर लडने झगडने और अपने को छुपाकर चलने मे अपना रूप प्रदर्शित करने लगे,चौथे भाव मे आजाये तो बजाय सोचकर बोलने और सोचकर चलने के कनफ़्यूजन को पैदा करदे,जो कुछ सीखा जा रहा था उसे करना शुरु कर दे और जब भी मौका मिले तो बजाय पानी के शराब के लिये अपना रुख जाहिर करने लगे,जो घर बरबाद हो गया था उसे आबाद करने लगे और जो आबाद है उसे बरबाद करने लगे,पंचम मे जाकर बजाय सीखने और याद करने के लोगो को याद करवाने लगे और छठे भाव मे जाकर जब कर्जा लेने की युति बने तो लोगो को कर्जा देने लगे,बजाय दुश्मनी की घात को पास लाने के दुश्मनो का ही विनाश करने लगे,सप्तम मे आजाये तो पत्नी का रूप पति की तरह हो जाये और पति महोदय बजाय शेर के बिल्ली होकर म्याऊँ की आवाज मे बोलने लग जायें आठवे भाव मे जाने से मौत को बचाने के बजाय मौत को ही गले लगाने लग जाये,नवे भाव मे जाते ही बजाय भाग्य को दूसरे से पूंछने के खुद ही भाग्य को बताने लग जाये दसवे भाव मे जाकर जैसे ही राहु अपनी गति को शुरु करे तो बजाय काम करने के सोने लग जाये और जो सो रहे हो उन्हे जगाकर काम करवाना शुरु कर दे,लाभ के भाव मे जाते ही जहां लाभ होता है वहां से लाभ की बजाय हानि देने के लिये तैयार हो जाये और जहां पर काम के बदले मे काम का मेहनताना मिलना था वहां अपनी जेब से भरना पड जाये यही हाल बारहवे भाव का है जब शांति का समय आये तो डर दिमाग मे भर जाये और जब कोई अपनी आत्मा को संतुष्टि देने लग जाये तो भूत प्रेत का असर सामने आने लग जाये किसी ने जीवन भर मेहनत करने के बाद पूजा पाठ करने से लोगो का भला करने के बाद गति प्राप्त करने के लिये धर्म किये थे लेकिन मरने के समय राहु का गोचर अगर बारहवे भाव मे हो गया तो अंत समय मे कोई ऐसा काम हो जाये कि अधोगति को प्राप्त करने के बाद नरक योनि मे भटकने के लिये मजबूर होना पडे.

यही बात राशि के अनुसार भी मानी जाती है,मेष मे राहु के होने से बजाय शरीर की शक्ति के दिमागी शक्ति का प्रयोग करने लगे या मानसिक सोच से काम करने लगे वृष राशि मे जाते ही बजाय चुप रहने के बकर बकर करने लग जाये मिथुन राशि मे जाने से बजाय बोलने के दिखाने लग जाये कर्क राशि मे जाकर बजाय पानी के शराब का आदी बना दे और सिंह राशि मे जाकर बजाय राज्य करने के झाडू लगवाने की कला को पैदा करदे,कन्या राशि मे जाकर सेवा करने की बजाय लोगो से सेवा करवाने लग जाये तुला राशि का होने पर बजाय तौल कर बोलने के अनर्गल बोलना शुरु कर दे,वृश्चिक राशि मे जाकर बजाये दवाई देने के भभूत देने लग जाये,अस्पताल मे बजाय जीवन दान देने के जीवन को खरीदना बेचना शुरु कर दिया जाये,धनु मे जाते ही बाप दादा की औकात को दूर रखकर मन के अनुसार काम कर लिये जाये,मकर मे जाने के बाद बजाय काम करने के सोने और खाली बैठ कर जीवन को गुजार दिया जाये,कुम्भ मे जाने से मित्रता को स्वार्थ की भावना से देखा जाये और बजाय बडे भाई की सहायता लेने के देनी पड जाये,मीन राशि का होने पर धर्म स्थान की बजाय पाप स्थान मे जाने का मन करने लगे।

वह तोमंगल की फ़ेरी जीवन मे अच्छी मानी जाती है जैसे ही राहु अपनी हरकतो को उल्टा करना शुरु कर देता है वह अपनी तकनीक से राहु की हरकत से अपने अनुसार फ़ायदा वाली बातो को करने लगता है.इसी लिये कहा है कि राहु हाथी है तो मंगल हाथी को संभालने वाला अंकुश और आज के जमाने मे राहु बिजली है तो मंगल उसका तकनीकी बटन मंगल को क्षत्रीय ग्रह कहा जाता है जो रक्त का प्रतिनिधित्व करता है वहीं राहु बुद्धि को भ्रमित करने वाला ग्रह है।राहू रहस्य का कारक ग्रह है और तमाम रहस्य की परतें राहू की ही देन होती हैं | राहू वह झूठ है जो बहुत लुभावना लगता है | राहू झूठ का वह रूप है जो झूठ होते हुए भी सच जैसे प्रतीत होता है | राहू कम से कम सत्य तो कभी नहीं है |

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

हवन द्वारा रोग का नाश

मित्रो हवन द्वारा वङे से वङा रोग भी कट सकता है। मानसिक पीङा पागलपन वहमी होना यह सव रोग चन्द्र मा की देन हो सकते है क्योंकि चंद्रमा का मन से सीधा संबंध है। अतः मानसिक रोगों, मनोविकृतियों, मन में संचित विषों आदि उष्णताओं का शमन चंद्र गायत्री से होता है। 

अंतरात्मा की शांति, चित्त की एकाग्रता, पारिवारिक क्लेश, द्वेष, वैमनस्य, मानसिक उत्तेजना, क्रोध, अंतर्कलह आदि को शांत करके शीतल मधुर संबंध उत्पन्न करने के लिए भी चंद्र गायत्री विशेष लाभप्रद होती है। चंद्र गायत्री का मंत्र इस प्रकार है- ॐ भूर्भुवः स्वः क्षीर पुत्राय विऽहे, अमृत तत्वाय धीमहि तन्नः चंद्रः प्रचोदयात्। इस मंत्र द्वारा रोगानुसार विशेष प्रकार से तैयार की गई हवन सामग्री से नित्यप्रति कम-से-कम चौबीस बार हवन करने एवं संबंधित सामग्री के सूक्ष्म कपड़छन पाउडर को सुबह-शाम लेते रहने से शीघ्र ही मनोविकृतियों से छुटकारा मिल जाता है। हवन करने वाले का चित्त स्थिर और शांत हो जाता है। मानसिक दाह, उद्वेग, तनाव आदि विकृतियाँ उसके पास फटकती तक नहीं। सर्वप्रथम मस्तिष्क रोग की सर्वमान्य विशेष हवन सामग्री यहाँ दी जा रही है। इसके साथ ही पूर्वके लेखो मे मैने हवन सामग्री वताई थी को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन करना चाहिए। विस्तृत जानकारी आप हमे फोन करके ले सकते है हवन सामग्री में जो वनौषधियाँ बराबर मात्रा में मिलाई जाती हैं, वे हैं, अगर, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गुग्गल, चिरायता, गिलोय एवं असगंध। (1) मस्तिष्क रोगों की विशेष हवन सामग्री- (1) देशी बेर का गूदा (पल्प) (2) मौलश्री की छाल (3) पीपल की कोपलें (4) इमली के बीजों की गिरी (5) काकजंघा (6) बरगद के फल (7) खरैटी (बीजबंद) बीज (8) गिलोय (9) गोरखमुँडी (10) शंखपुष्पी (11) मालकंगनी (ज्योतिष्मती) (12) ब्राह्मी (13) मीठी बच (14) षतावर (15) जटामाँसी, (16) सर्पगंधा।ओर केसर ;-) इन सभी सोलह चीजों के जौकुट पाउडर को हवन सामग्री के रूप में प्रयुक्त करने के साथ ही सभी चीजों को मिलाकर सूक्ष्मीकृत चूर्ण को एक चम्मच सुबह एवं एक चम्मच शाम को घी-शक्कर या जल के साथ रोगी व्यक्ति को नित्य खिलाते रहना चाहिए।मघुमह रोगी को शक्कर ना दे मस्तिष्कीय रोगों में समिधाओं का भी अपना विशेष महत्व है। अतः जहाँ तक संभव हो क्षीर एवं सुगंधित वृक्ष अर्थात् वट, पीपल, गूलर, बेल, देवदार, खैर, शमी का प्रयोग करना चाहिए। चंद्रमा की समिधा-पलाश है। यदि यह मिल सके, तो सर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए। उद्विग्न-उत्तेजित मन-मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करने में उससे पर्याप्त सहायता मिलती है। ( तनाव ‘स्ट्रेस’ एवं हाइपर टेन्शन की विशेष हवन सामग्री- तनाव से छुटकारा पाने के लिए निम्नलिखित अनुपात में औषधियों की जौकुट सामग्री मिलाई जाती है- (1) ब्राह्मी-1 ग्राम, (2) शंखपुष्पी-1 ग्राम, (3) शतावर-1 ग्राम, (4) सर्पगंधा-1 ग्राम, (5) गोरखमुँडी-1 ग्राम, (6) मालकाँगनी-1 ग्राम, (7) मौलश्री छाल-1 ग्राम, (8) गिलोय-1 ग्राम, (9) सुगंध कोकिला-1 ग्राम, (1) नागरमोथा-2 ग्राम, (11) घुड़बच-5 ग्राम, (12) मीठी बच-5 ग्राम, (13) तिल-1 ग्राम, (14) जौ-1 ग्राम, (15) चावल-1 ग्राम, (16) घी 1 ग्राम, (17) खंडसारी गुड़-5 ग्राम, (18) जलकुँभी (पिस्टिया)-1 ग्राम। इस प्रकार से तैयार की गई विशेष हवन सामग्री से चंद्र गायत्री मंत्र के साथ हवन करने से तनाव एवं उससे उत्पन्न अनेकों बीमारियाँ तथा हाइपरटेंशन से प्रयोक्ता को शीघ्र लाभ मिलता है। यहाँ इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उक्त सामग्री में क्रमाँक (1) अर्थात् ब्राह्मी से लेकर क्रमाँक (12) अर्थात् मीठी बच तक की औषधियों का महीन बारीक पिसा एवं कपड़े द्वारा छना हुआ चूर्ण सम्मिश्रित रूप से एक-एक चम्मच सुबह एवं शाम को जल या दूध के साथ रोगी को सेवन कराते रहना चाहिए। (3) दबाव-अवसाद-’डिप्रेशन’ आदि मानसिक रोगों की विशेष हवन सामग्री- (1) अकरकरा, (2) मालकाँगनी, (ज्योतिष्मती) (3) विमूर (4) मीठी बच, (5) घुड़बच, (6) जटामाँसी, (7) नागरमोथा, (8) गिलोय, (9) तेजपत्र, (1) सुगंध कोकिला, (11) जौ, तिल, चावल, घी, खंडसारी गुड़। उक्त औषधियों से तैयार हवन सामग्री से हवन करने के साथ ही (नं 1) से (नं 1) तक की औषधियों का बारीक पिसा हुआ चूर्ण रोगी को सुबह शाम एक-एक चम्मच जल या दूध के साथ नित्य खिलाते रहने से शीघ्र लाभ मिलता है। इसके साथ ही डिप्रेशन या दबाव से पीड़ित व्यक्ति को शीघ्र स्वस्थ एवं सामान्य स्थिति में लाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके मन के अनुकूल बातें की जाएँ। (4) मिर्गी-अपस्मार या ‘फिट्स’ की विशेष हवन सामग्री- मिर्गी एवं इससे संबंधित रोगों पर निम्नलिखित औषधियों से बनाई गई हवन सामग्री से यजन करने पर यह रोग समूल नष्ट हो जाता है। (1) छोटी इलायची, (2) अपामार्ग के बीज, (3) अश्वगंधा, (4) नागरमोथा, (5) गुरुचि, (6) जटामाँसी, (7) ब्राह्मी, (8) शंखपुष्पी, (9) चंपक, (10) मुलहठी, (11) गुलाब के फूल ;-) मोती पिश्ठी आदि मित्रो मेरे पास अनुभव ओर ज्ञान की कमी नही है पर आप मेरी पोस्ट से लाभ ले सके यही मेरा मकसद है वाकी मेरा मुझ मे कुछ नही सव माता रानी की देन है आचार्य राजेश 07597718725 09414481324

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

तुला ♎ लग्न भाग 2

तुला लगन मे सूर्य राहु बुध

सन्तान की पैदाइस मे तुला लगन का महत्व अक्सर चौथे नम्बर की सन्तान के बारे मे जाना जाता है.इससे पता उल्टी रीति से कुंडली को देखा जाता है,कि कितने बडे भाई बहिन है और सीधी गणना करने से कितने छोटे भाई बहिन है इस बात का पता किया जाता है। बडे भाई बहिनो के लिये उल्टी रीति से देखने पर तुला लगन मे नवे भाव से देखने पर बुध की मिथुन राशि आती है और इस राशि का मालिक बुध है 

जो स्त्री ग्रह के रूप मे जाना जाता है,और सबसे बडी बहिन होने के लिये अपनी गति को देता है.इसके पहले सूर्य की सिंह राशि आती है जिसका मालिक सूर्य होने से पुरुष ग्रह की शक्ति को देखकर माना जाता है कि बडी बहिन के बाद एक बडा भाई होता है,फ़िर तुला लगन को अगर पुरुष ग्रह अपनी पूर्ण युति से देखते है तो इस राशि के मालिक शुक्र के दो रूप मिलते है  शुक्र अगर किसी स्त्री ग्रह के साथ होता है तो पुरुष संतति और शुक्र अगर पुरुष ग्रह के साथ होता है तो स्त्री संतति के कारण को समझा जा सकता है। जातक की लिंग प्रकृति को निर्धारण करने के कारको मे लगनेश का बहुत ही महत्व होता है। इसके अलावा भी अगर लगनेश को अधिक स्त्री ग्रह देखते है तो वह स्त्री रूप मे और पुरुष ग्रह अधिक द्रिष्टि देते है तो पुरुष रूप में समझा जाता है। जैसे लगन के मालिक को अगर पुरुष ग्रह अपनी शक्ति मे अन्य पुरुष ग्रहो की शक्ति को शामिल करने के बाद देता है तो वह रूप पुरुष सन्तति के रूप मे गिना जाता है। इसके उदाहरण के लिये अगर तुला लगन का मालिक दूसरे भाव मे है और उसे शनि अपनी द्रिष्टि से देख रहा है तो यह समझना जरूरी है कि पहले तो शुक्र पुरुष राशि के प्रभाव मे है जैसे तुला लगन की दूसरी राशि वृश्चिक है और इस राशि का मालिक मंगल है,मंगल के प्रभाव से शुक्र का रूप पुरुष रूप मे परिवर्तित होता है इसके बाद अगर बारहवे दसवे आठवे छठे भाव मे गुरु विराजमान है तो पुरुष ग्रह की द्रिष्टि से और भी लगनेश को पुरुष ग्रहो का बल मिल जाता है,साथ ही गुरु के साथ अगर पुरुष ग्रहो जैसे सूर्य मंगल का प्रभाव शामिल हो जाता है तो वह सन्तति पुरुष सन्तति के रूप मे सामने आती है। लेकिन यह भी ध्यान रखने वाली बात होती है कि किसी प्रकार से गुरु या मंगल वक्र हो जाता है तो बजाय पुरुष संतति के स्त्री संतति के बारे मे जाना जा सकता है।तुला लगन मे जब राहु विराजमान हो जाता है तो जातक के जीवन असमान्य स्थितिया हमेशा बनी रहती है,उसके कार्य के बारे मे कुछ नही कहा जा सकता है उसके विवाह सम्बन्धो के बारे मे भी कुछ नही कहा जा सकता है,उसके जीवन के बारे मे भी कुछ नही कहा जा सकता है। इस लगन मे राहु होने का मतलब होता है कि केतु का स्थान सप्तम मे अपने आप आजयेगा,सूर्य के साथ होने पर राहु का प्रभाव बडे भाई के कारक ग्रह पर होने के कारण बडे भाई के जीवन मे ग्रहण की युति बन जायेगी और केतु जो सप्तम स्थान मे बैठा होगा उसकी युति से बडे भाई का जो पुत्र होगा वह विदेशी मान्यता के अनुरूप माना जायेगा। लगन तुला होगी लेकिन सूर्य और राहु के होने से कुण्डली बडे भाई की मानी जायेगी और बुध के साथ होने पर वह बडी बहिन से भी मिलती जुलती होगी। तुला लगन की कुंडली को या तो चन्द्रमा की लगन से या लगनेश की लगन से मान्यता गिनने पर फ़लादेश मे त्रुटि रहने की सम्भावना कम हो जायेगी।तुला लगन का राहु और सूर्य बडे भाई के जीवन मे उसके सप्तम मे बैठा केतु ही उसके जीवन को बरबाद करने वाला माना जायेगा कारण उस लगन के केतु का प्रभाव अगर किसी प्रकार से चन्द्रमा से हो गया है तो वह बडे भाई की पत्नी के रूप मे हमेशा अपनी झूठी तरफ़दारी से अपने को आगे बढाने की कोशिश करेगा और उसकी पत्नी हमेशा अपने पुत्र और दामाद के लिये ही अपने जीवन को समर्पित कर देगा। इस लगन के जातक की भाभी के लिये केतु को गिना जायेगा। केतु की द्रिष्टि जिन ग्रहो भावो को अपनी गिरफ़्त मे ले रही होगी वही भाव और ग्रह अपनी युति मे केतु जैसा बर्ताव करना शुरु कर देंगे,इसके अलावा केतु जिन ग्रहों भावो से षडाष्टक योग बना रहा होगा जिन भावो को का असर केतु के लिये द्वादस का गोचर और जन्म के हिसाब से होगा उनके लिये वह हमेशा दिक्कत देने वाला होगा। अगर केतु से पंचम मे चन्द्रमा यानी जातक के ग्यारहवे भाव मे चन्द्रमा है तो केतु की चन्द्र की युति से चन्द्र ग्रहण योग बन जायेगा और जातक की भाभी की माता ग्रहण के कारण विधवा भी हो सकती है या परित्यक्ता भी हो सकती है साथ ही केतु से पंचम भाव मे चन्द्रमा होने से भाभी की माता प्राथमिक शिक्षा वाले कार्यों मे भी हो सकती है और राज्य से भी किसी न किसी प्रकार का लाभ उसे चन्द्रमा से नवे भाव मे केतु होने से मिल रहा होगा।इस केतु का असर जातक के बडे भाई पर असीमित रूप मे पड रहा होगा,जैसे सप्तम के केतु को दूसरे नम्बर का लडका कहा जाता है,जातक के बडे भाई का लडका दूसरे नम्बर का होगा उसके पहले अगर राहु के साथ बुध है तो और सूर्य भी उसे साथ दे रहा है तो किसी न किसी प्रकार से जातक की भाभी को पहली सन्तान का या तो गर्भपात करवा दिया जाता है या वह पैदा होने के बाद भी टिक नही पाती है। केतु के पंचम में चन्द्रमा के होने से यह भी जाना जाता है कि जातक की भाभी की माँ के गुजरने के बाद जातक की भाभी की पुत्री का राज घर पर होगा और उस राज में जो भी जातक की भाभी की जायदाद आदि होगी वह जातक की भाभी के बाद जातक के बडे भाई के दामाद के कब्जे मे चली जायेगी।जिस प्रकार से केतु का असर जातक के दूसरे भाव मे होगा उसी प्रकार का असर जातक के बडे भाई की पुत्र वधू के साथ मिलेगा। कारण वही कारक तो जातक के बडे भाई की पत्नी के रूप मे केतु अपने रूप को जाहिर करेगा और वही रूप बडे भाई के बडे पुत्र के लिये जो दूसरे नम्बर का होगा उसके लिये माना जायेगा। जातक को जातक की भाभी हमेशा अपमान देने और अपमानित करने की द्रिष्टि से देखेगी तो जातक के बडे भाई का पुत्र भी अपनी पत्नी को अपमान और अपमानित करने वाली नजर से देखेगा। अक्सर यह कारण लांछन लगाने और झूठी चोरी आदि लगाने के कारको मे जाना जायेगा। कोई भी कार्य हो जातक के द्वारा जो भी किया जायेगा वह कितना ही अच्छा हो या अच्छे के लिये किया जाये लेकिन उसके अन्दर भी अपमान और झूठे इल्जाम लगाये जाने के कारण जातक को मानसिक रूप से सटप्रताणित करने का काम ही जातक की भाभी का और बाद मे जातक के बडे भाई की पुत्र वधू के लिये किया जायेगा

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