शनिवार, 7 दिसंबर 2019

क्यों काम नहीं करते हैं ज्योतिष के अनुसार किए उपाय?


क्यों काम नहीं करते हैं ज्योतिष के अनुसार किए उपाय?
मित्रों हमारा उद्देश्य किसी भी विद्वान को आहत करने का नहीं है, अतः अनजाने में भी यदि किसी को कष्ट हो तो बात प्रारंभ करने से पहले ही क्षमा चाहेंग हम उस आदमी को धोखा देने का असफल प्रयास कर रहे हैं, जो देवता तुल्य हमें सम्मान दे रहा है, अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन भी, क्या हमें ऐसा करके हमेशा के लिए उसकी नजरों से गिरने का काम करना चाहिए, केवल पैसे की भूख हमारी छवि को हमेशा के लिए समाप्त करने के साथ ज्योतिष शास्त्र की आस्था को भी राहत न मिलने पर समाप्त कर देती है सामान्य परेशान लोगों में से अधिकतर की शिकायत होती है कि ,उनकी समस्या के लिए वे बहुतेरे ज्योतिषियो ,तांत्रिकों ,पंडितों से संपर्क करते हैं किन्तु उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता या बहुत कम लाभ दृष्टिगोचर होता है ,तथा उनकी परेशानी यथावत रहती है अथवा केवल कुछ समय राहत देकर फिर वैसी ही हो जाती है |वे यहाँ वहां अपनी समस्या का समाधान पाने के चक्कर में घूमते रहते हैं पर कोई सही समाधान नहीं मिलता अंततः थक हारकर मान लेते हैं की जो किस्मत में होता है वाही होता है ,या कोई उपाय काम नहीं करता ,यह सब बेकार हैकुछ तो यहाँ वहां घूमते हुए खुद थोड़ी बहुत ज्योतिष समझने लगते हैं ,टोने -टोटके आजमाते आजमाते ,शाबर मंत्र ,तांत्रिक मंत्र आदि पढ़कर , थोड़े बहुत टोने -टोटके जान जाते हैं ,कुछ मंत्र जान जाते हैं ,कुछ पूजा पाठ ,स्तोत्र आदि जान जाते हैं ,फिर ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र की कुछ सडक छाप किताबों को पढ़कर ,नेट पर खोज कर अपनी समस्या का समाधान ढूंढते हुए खुद को ज्योतिषी और तांत्रिक मान लेते हैं |समस्या उनकी ख़त्म हो न हो ,उन्हें खुद राहत मिले या न मिले पर लोगों को उपाय जरूर लता ने लग जाते हैं और लोग भी ऐसे हैं यहां मुफ़्त का चाहते हैं वुखार भी क्यों ना होऐक तरफ मेरे जैसे ठग ज्योतिषी तांत्रिक आचार्य वन कर और लोगों को टोटके ,उपाय ,मंत्र बांटने लगते हैं ,धन लेकर उनके लिए अनुष्ठान ,क्रिया करने को कहने लगते हैं और फिर इसे व्यवसाय बना लूटने का धंधा बना लेते हैं |यह काम सोसल मीडिया ,इंटरनेट ,वेबसाईट के माध्यम से खूब होता है सामान्य लोग समझ नहीं पाते अथवा वास्तविक ज्योतिषी ,तांत्रिक ,पंडित और इन छद्म नामो वाले ज्योतिषी ,पंडित ,तांत्रिक में अंतर नहीं कर पाते ,अंततः वे खुद के धन का नुक्सान' हानि पाते हैं ,खुद की किस्मत को कोसते हैं अथवा ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र ,उपायों को ही बेकार मान लेते हैं |उनका विश्वास हिल जाता है ,कभी कभी भगवान् पर से भी विश्वास उठने लगता हएक समस्या लोगों की नासमझी से भी उत्पन्न होती है लोग कर्मकांड ,पूजा पाठ ,शादी विवाह ,कथा कराने वाले पंडित जी से .प्रवचन करने वाले व्यास या शास्त्री जी से ,भागवत ,रामायण कथा वाचकों से भविष्य जानने की कोशिश करते हैं और उपाय पूछते हैं उनकी विशेषज्ञता पूजा पाठ ,कर्मकांड ,प्रवचन ,कथा ,भाषण कला में है न की ज्योतिष ,तंत्र आदि भविष्य जानने वाली गूढ़ विद्याओं में इनके उपाय पूजा पाठ ,दान ,गौ ,नदी ,पीपल ,अनुष्ठान तक सीमित रहेंगे न की मूल समस्या को पकड़ वहां प्रतिक्रिया करने वाले उपायों पर आजकल ज्योतिष ,तंत्र को व्यसाय और लाभ का स्रोत मान ही अधिकतर लोग आकर्षित हो रहे |साधुओं ,मठाधीशों के आसपास भीड़ देखकर लोग आकर्षित हो रहेतो यह कितना लाभ पहुंचाएंगे सोचने की बात है जानने समझने की अतः रटे रटाये उपाय ,पूजा पाठ ,दान बता दिए |न क्षमता है समस्या पकड़ने की न रूचि है कुछ समझने में अतः अक्सर तीर तुक्के साबित होते हैं ,पर इनके प्रभामंडल के आगे व्यक्ति कुछ सोच भी नहीं पाता और अपने भाग्य को ही दोषी मानता रह जाता है |अब इतने बड़े आडम्बर वाले गुरु जी ,ज्योतिषी जी ,पंडित जी ,तांत्रिक अघोरी महाराज गलत थोड़े ही बोलेंगे ,हमारा ही भाग्य खराब है जो कोई उपाय काम नहीं कर रहा |ज्योतिष ,कर्मकांड ,पूजा पाठ ,साधना एक श्रम साध्य ,शोधोन्मुख कार्य है |इनमे समय ,एकाग्रता लगती है |गहन अध्ययन ,मनन ,चिन्तन और साधना करनी होती है |पुराने समय से देखें तो किसी गुरु के केवल एक दो शिष्य ही उनसे पर्याप्त ज्ञान ले पाते थे धीरे धीरे क्रमिक गुरु परम्परा में योग्य शिष्यों ,साधकों की कमी होती गयी ,जो थे वे चुपचाप अपनी साधना ,अध्ययन करते ,ज्ञान खोज में सुख पाते गुमनाम रहे और कम ज्ञान वाले अथवा स्वार्थी ,भौतिक लिप्सा युक्त शिष्यों की भरमार होती गयी |आज तक आते आते ,वास्तविक साधक खोजे नहीं मिलता ,सही गुरु की तलाश वर्षों करनी होती है जबकि हर गली और हर शहर में ढेरों गुरु और साधक मिल जाते हैं |बड़े बड़े नाम ,उपाधि वाले साधक ,ज्योतिषी ,गुरु मिल जाते हैं जिनके पास लाखों हजारों की भीड़ भी होती है ,अनुयायी होते हैं |फिर भी लोगों की समस्याएं बढती ही जा रही ,उनको सही उपाय नहीं मिल पा रहे ,वे भट

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

फलित ज्योतिष की अवधारणा


फलित ज्योतिष की अवधारणा को समझने के लिए समय रेखा और उस पर भूत वर्तमान और भविष्य के बिन्दुओं की मूल प्रकृति को समझना आवश्यक है.अपने नैसर्गिक गुणों के कारण अतीत निश्चित और अपरिवर्तनीय होता है जो वीत गया उसको वदला नही जा सकता ,वर्तमान प्रत्यक्ष होता है और भविष्य अनिश्चित और परिवर्तनीय होता है.जहाँ तक विज्ञान के भी जानने की बात है अपने पूर्ण रूप में अतीत(क्या होचुका हैऔर वर्तमान(क्या हो रहा है को भी जान नहीं पाया है तो भविष्य के बारे में वताना कठीन है को सही बताने का दावा करना विज्ञान और ज्योतिष दोनों के लिए कठिनाई भरा ही होगा.मगर इससे न तो विज्ञान मौसम,प्रगति, अर्थव्यवस्था और भविष्य में होने वाले परिवर्तनों के बारे में जानने के लिए होने वाले अनुसंधान रोकेगा और न ही ज्योतिष के आधार पर भविष्यवाणियां करना रुकेगा.मगर विज्ञान अपने एकत्र आंकडों के आधार पर अपनी भविष्यवाणियों को ज्यादा सशक्त आधार दे पा रहा है और ज्योतिष अपनी अवधारणाओं और उनके परिक्षण के अभाव में अतार्किक होता जारहा है.मेरा जोर इस बात पर है कि ज्योतिष के अंतर्भूत तत्वों के आधार पर निश्चित अवधारणाएं बना कर उनका वैज्ञानिक परिक्षण किया जावे.और प्रयोग प्रेक्षण और निष्कर्ष विधि से वर्तमान नियमों का परिक्षण किया जाेये और आवश्यक हो तो संशोधन किया जावे. भारतीय फलित ज्योतिष में चेतन और अचेतन की महत्वपूर्ण भूमिका है.क्योंकि चेतना के प्रकट होने के क्षण(जन्म)से ही जन्म कुंडली का निर्माण कर फलित निकाला जाता है.समस्त जड़ और अचेतन जगत तो वैसे ही अत्यंत सटीक वैज्ञानिक नियमों से संचालित होता है.अनु परमाणु और क्वार्क से लेकर विशाल गेलेक्सियाँ क्षणांश के लिए भी नियम नहीं तोड़ती.फिर भी हम उनके बारे में क्षणांश ही जान पाए है.इनके भविष्य के बारे में वैज्ञानिक नियमो से जाना जासकता है.पर जहाँ तक चेतन जगत का सवाल है उसके नियम अधिक जटिल है इतने जटिल कि हम उनके बारे में वैज्ञानिक तौर पर कुछ नहीं जानते है.अतः इसकी भविष्यवाणी किया जाना कठिन है.इसकारण से भी भविष्यवाणी और कठिन हो जाती है कि चेतना से संचालित होने वाली इकाइयों के पैरामीटर अनगिनत होते है.इन सब पैरामीटर को समाहित करते हुए नियम खोजना कठिन होता है. फिर शायद चेतना से संचालित इकाइयों के बारे में भविष्य वाणी किया जाना अवैज्ञानिक है. इसको उदहारण से समझा जा सकता है.एक जड़ वस्तु जैसे पत्थर आदि को गिराने या फेंकने पर उसकी प्रारंभिक सूचनाओं के आधार पर उसकी गति, तय की जाने वाली दूरी, प्रभाव आदि की सही सही भविष्य वाणी की जासकती है पर एक चेतन प्राणी जैसे कुत्ता आदि जानवर के व्यवहार के बारें में भविष्यवाणी कम सटीकता से की जा सकेगी.मानवीय चेतना का उच्चतम स्तर व्यवहार के बारे में सटीकता और कम हो जायेगी.और फिर समाज की सामूहिक चेतना के बारे में यह संभावना और कम हो जायेगी.यहाँ तक हम वर्तमान की बात कर रहे है फिर चेतन इकाइयों के भविष्य के बारे में जो अनिश्चित और परिवर्तनीय है कह पाना अति कठिन है.फिर निश्चित ही फलित वैज्ञानिक दायरे से दूर की वस्तु है. मानव सभ्यता के आरम्भ से लेकर आज तक कई जीनियस,प्रोफेट,भविष्यवक्ता और संत हुए है जिनकी भविष्यवाणी सटीकता तक सही हुई है. एडगर कैसी और जूल वर्न बीसवीं सदी के प्रसिद्द भविष्यवक्ता है.(एडगर कैसी के बारे में और उनकी सात प्रसिद्द भविष्यवानियों के बारे में लिंक जूल्स वर्न ने अपने फिक्शन में सटीक भविष्यवानियाँ की थी.नस्त्रदामस से आजतक के भविष्यवक्ताओं ने चेतन इकाइयों और उनसे प्रभावित घटनाओं के बारें में तन्द्रा में भविष्यवानियाँ की है.रमल,तेरोकार्ड शकुन, ओमेन और जन्म कुंडली ये सब माध्यम है भविष्य जानने के उपकरण है.इसका उपयोग करके लोग अवचेतनता और समाधि में जाकर भविष्यवाणी करते है.सपष्ट रूप से इन्हें अवैज्ञानिक कहा जासकता है. पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मानव जाति ने जितना समय बाहर के संसार का विज्ञान जानने के लिए बिताया है उससे कई गुना अधिक समय उसने अपने आंतरिक संसार और अवचेतन के अध्ययन के लिए दिया है. भारतीय ऋषियों ने सर्व प्रथम पृथवी के सापेक्ष खगोलीय गणनाओं के माध्यम से सटीक समय रेखा का पता लगाया.उस समय रेखा पर ग्रहों की स्थिति के आधार पर जन्म कुंडली का आविष्कार किया.ग्रहों की स्थिति के आधार पर ब्रह्मांड की उस तात्क्षणिक स्थिति को खोजा जो जातक के इस ब्रह्माण्ड में प्रथम चेतन क्षण को दर्शाता है.ऊर्जसके.कुलमिलाकर सबसे पहले भविष्यवानियों की आधारभूत अवधारणाओं का निर्माण भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने किया.और समय के साथ हुए अनुभविक प्रयोगों से भ्रगुसंहिता जैसे ग्रंथो को लिखा गया.अफसोस यह रहा की बाद में लोगों ने इसे चरम विद्या बनाकर इसके प्रगति के द्वार बंद कर दिए.आज ज्योतिष और उसकी भविष्यवानियाँ तो है पर भारतीय ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार लुप्त हो चुका है.भविष्यवक्ता यह घोषणा तो कर देते है की दूसरे भाव पर गुरु की पूर्ण दृष्टि व्यक्ति को धनवान बनाते है.पर गुरु की खगोलीय स्थिति का समग्र चित्र उनके मस्तिष्क में कभी नहीं बन पाता है.नहीं ऐसी कोई अवधारणा निर्मित कर परीक्षण करने का प्रयास होता है.उसके बिना ज्योतिष को विज्ञान कहने का दावा मजबूत आधार नहीं प्राप्त कर सकता है. मैं फिर भी इसे विज्ञान के रूप में मान कर इसकी गणनाओं और भविष्य कथनों का वैज्ञानिक आधार परिक्षण करना चाहा  रेखाओं के प्रवाह और दिशा के आधार पर वह परास निर्धारित की जो किसी भविष्यवक्ता को संभावना की दिशा बता सके ओर फिर दिशा से दशा वदली जा सके जय मा काली

रविवार, 1 दिसंबर 2019

राहु मंगल के बीच शनिदेव यानि तीखी मिर्चे का स्वाद


मीन लगन में गुरु दूसरा वक्री तीसरे केतु वृष राशि के चन्द्रमा चौथा मिथुन राशि का पंचम में मंगल कर्क राशि का और सप्तम मे कन्या का शनि अष्टम भाव मे सूर्य शुक्र बुध नवे भाव मे राहु के समय रसोई की व्याख्या अगर की जाये तो कुछ इस प्रकार से होगी। दूसरा भाव मुख का कारक है,तीसरा भाव खाने वाली चीज की बनावट का कारक है,चौथा भाव मुंह की अवस्था का कारक है पंचम भाव स्वाद का कारक है,छठा भाव रुचि का कारक है सप्तम भाव खाने वाले भोजन के रखने का स्थान है,अष्टम भाव भोजन मे मिलाये जाने वाले मशालो का कारक है नवम भाव भोजन के बाद मिलने वाले प्रभाव का कारक माना जाता है,दसवा भाव भोजन के करने का तरीका ग्यारहवा भाव भोजन के बाद मिलने वाले फ़र्क के लिये और बारहवा भाव भोजन के बाद मिलने सन्तुष्टि असंतुष्टि का कारक है। मीन राशि आराम का स्थान है,इस स्थान को सप्तम का शनि का जो कन्या राशि का है स्टील की प्लेट का कारक है,गुरु जो वक्री होकर प्लेट मे रखे सामान का कारक है,कारण मार्गी गुरु सम्पूर्णता का कारक है यानी जो प्लेट मे होना चाहिये वह पूरी तरह से पीली सामग्री से ही बना हुया होना चाहिये,लेकिन वक्री गुरु को केवल रखे सामान में ऊपरी पर्त के मामले मे ही जाना जायेगा,तीसरे केतु को तीन की संख्या में लम्बी वस्तु के रूप मे देखा जायेगा,उस वस्तु को दूसरे भाव मे ले जाने के पहले मुख की स्थिति में चौथा चन्द्रमा अपने अनुसार खाने के पहले लार को प्रकट करने वाला है,पंचम का मंगल गर्म तासीर से और तीखा स्वाद देने वाला है,छठे भाव का कारण भूख तो लगी है और भूख मे भोजन का समय नही है यानी शाम का समय है,लेकिन भोजन के लिये खाना जरूरी है,खाने मे तीन लोग साथ साथ है,पहले दो ही थे लेकिन एक बाद मे आ गया।

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

शनिदेव पर तेल चढ़ाना

जब कोई भी ग्रह अपने खराब फ़ल को प्रदान करता है तो ज्योतिषी अपने अनुसार उस ग्रह के बारे मे उपाय बताने लगते है। इन्ही उपायों मे एक उपाय है
शनि पर तेल चढाना,इस उपाय का वास्तविक कारण और मिलने वाले फ़लो के बारे मे विस्तार से जानना जरूरी है।
शनि ग्रह कठोर और ठंडे स्वभाव के लिये कहा गया है,शनि की द्शा अन्तर्दशा मे शनि के गोचर मे साढे शाती के समय मे शनि अपने फ़लो को देता है,इन फ़लो मे वह जातक को कठोर जीवन जीने और विषम परिस्थितियों मे रहने तथा काम करने की बुद्धि को भी प्रदान करता है और स्वविवेक से जीवन जीने के लिये भी अपने अनुसार परिस्थिति को प्रदान करता है।लाखो किस्से कहानिया आपबीती आदि बाते पढने और सुनने को मिलती है। मैने  इसमे शनि की दशा को भी भोगा है अन्य ग्रहो के साथ की अन्तर्दशा को भी भोगा है साढेशाती भी भोगी है और शनि को नजदीक से पहिचाना भी है। शनि करके सिखाने वाला ग्रह है जैसे स्कूल कालेज मे पढा भी जाता है और करके सीखा भी जाता है प्रेक्टिकल नाम की शिक्षा करके सीखने की क्रिया ही मानी जाती है। केवल पढने से और देखने से कोई भी काम नही किया जा सकता है जब उस काम को करने के लिये मानस नही बने और काम को किया नही जायेगा वह किसी भी प्रकार से न तो दिमाग मे बैठेगा और न ही किये गये काम का उचित फ़ल ही मिल पायेगा। शनि की कठोरता को समझने के लिये किये जाने वाले काम का रूप और काम को करने के प्रति लगाव तथा काम करने के लिये प्रयोग की जाने वाली शक्ति का प्रयोग जानना जरूरी होता है। किसी काम को नही करने और बिना किये ही उसका फ़ल प्राप्त होने का मतलब है कि मन के अन्दर या शरीर के अन्दर कार्य करने की क्षमता का विकास नही हो पाया है और उस कारण को एक प्रकार से ऐसे भी जाना जाता है कि जो कार्य करना था उसके अन्दर अन्य कारको को सामने लाकर कार्य शक्ति का क्षीण हो जाना भी माना जाता है,यानी जो शक्ति कार्य करने मे लगानी थी उस शक्ति को अन्यत्र कहीं प्रयोग मे लाया गया है जो भी कार्य किया जा रहा है वह नही हो पा रहा है।शक्ति का प्रयोग करने के लिये
तथा शक्ति को प्रयोग करने के बाद फ़लाफ़ल का भेद जानने के लिये खुद पर नियंत्रण करना जरूरी है। मिट्टी पत्थर लोहा आदि सभी जमीनी तत्व है इन जमीनी तत्वो को अन्दर ही तैलीय तत्व भी विद्यमान है,जैसे सरसों का तेल मूंगफ़ली का तेल कोई हवा मे उडकर तो आता नही है जमीन के अन्दर की गर्मी और जमीन के तत्वो का वैज्ञानिक विकास सरसों के दाने मे तेल भी लाता है और मूंगफ़ली के अन्दर भी तेल की मात्रा को प्रदान करता है। संसार का कोई भी अनाज लिया जाये सभी के अन्दर तैलीय पदार्थ यानी वसा का उपस्थित होना जरूरी होता है,किसी भी जीव को देखा जाये सभी के अन्दर वसा का होना देखा जाता है बिना वसा के या तैलीय पदार्थ के जीवन का रहना नही माना जाता है और जितना तैलीय पदार्थ शरीर अनाज फ़ल वनस्पति मे होता है उतनी ही वह शक्तिशाली भी होती है और अधिक दिन तक चलने वाली भी होती है। साधारण रूप से वसा या तैलीय पदार्थ को कठोर काम करने और अधिक समय तक काम करने के लिये प्रयोग मे लाना उचित माना जाता है लेकिन यह उन्ही लोगो के लिये माना जाता है जो शरीर से श्रम करने वाले होते है अगर किसी एसी मे बैठने वाले व्यक्ति को अधिक वसा या तैलीय पदार्थ का सेवन अधिक करवा दिया जाये या उसके अन्दर वसा की मात्रा अधिक हो जायेगी तो काम नही करने शरीर मे गर्मी नही पैदा करने के कारण वसा शरीर मे जगह जगह जम जायेगी और जो भी शरीर का तंत्रिका तंत्र है उसके कार्यों में अवरोध का पैदा होना हो जायेगा फ़लस्वरूप ह्रदय सम्बन्धी बीमारी आदि का होना शुरु हो जायेगा।
जब शनि देव परेशान करते है तो मनुष्य को मेहनत करने का समय आता है,मेहनत करने का कारण भी जीवन के प्रति मिलने वाले फ़लो की प्राप्ति से जुडा होता है। जैसे पेड पौधे जीव जन्तु आहार विहार से तैलीय पदार्थो को प्राप्त करते रहते है वैसे ही मनुष्य भी आहार विहार और भोजन आदि से चिकनाई प्राप्त करता रहता है,शरीर मे जितनी चिकनाई को प्रयोग करने की क्षमता होती है उतना वह प्रयोग मे ले लेता है बाकी का हिस्सा उसे जहां खाली जगह मिलती है जमा कर लेता है,जब उसे कहीं जमा करने की जगह नही मिलती है तो वह खाल को बढाकर खाली जगह मे चर्बी को इकट्ठा कर देता है। यह बात अक्सर उन लोगो के अन्दर देखी जाती है जो बैठे रहते है दिमागी काम को करते है और ठंडे माहौल मे रहते है। यह चर्बी यानी वसा उन्हे शरीर के अन्दर अधिक ठंड से बचाने और शरीर का तापमान नियंत्रित करने के काम भी आता है,साथ ही भूख प्यास मे शरीर को मिलने वाली ऊर्जा को भी प्रदान करने के काम आता है जैसे समय कुसमय भोजन आदि नही मिलता है पानी नही मिलता है तो यह चर्बी अपनी पूर्ति से प्यास और भूख को पूर्ति मे लाती है। इस बात के लिये जीवो के अन्दर आप देख सकते है कि उत्तरी धुर्वीय प्रदेशो मे रहने वाले जीव सील वालरस आदि अपनी चर्बी की सहायता से बर्फ़ के जमे रहने तक बिना कुछ खाये पिये तापमान के प्रभाव को झेलते रहते है,ठंडे प्रदेश मे रहने वाले लोग जीवो का आहार करते रहते है कारण उन्हे वनस्पति की अपेक्षा जीव के अन्दर से अधिक वसा मिल जाती है और वे अपने जीवन को सुचारु रूप से चलाते रहते है इसलिये ही ठंडे प्रदेशो मे रहने वाले लोग मांसाहारी अधिक मात्रा मे होते है। इसी प्रकार से गर्म प्रदेशो मे भी चर्बी का प्रयोग प्यास को शांत रखने के लिये किया जाता है,जैसे रेगिस्तानी इलाको मे भी अधिक घी और तेल का प्रयोग किया जाता है साथ ही ऊंट इसका अच्छा उदाहरण है वह कई दिनो तक बिना पानी को पिये रह सकता है।मनुष्य के शरीर मे जब अधिक वसा एकत्रित हो जाती है तो वह कार्य करने मे आलस का भाव ले आता है वह और अधिक सुस्त होता चला जाता है उसे किसी प्रकार से भी काम करने का मन नही करता है,जब शरीर की ग्रंथिया शिथिल हो जाती है तो यह भी जरूरी है कि शरीर का तंत्र भी गडबडा जाता है,इस गडबड मे और आलस के अधिक आने से न तो शरीर ही काम करता है और न ही दिमाग ही काम करता है कारण दिमाग भी शरीर के अनुसार ही काम करता है जितना शरीर बिना चर्बी के होता है उतना ही वह गर्म भी होता है और कार्य करने के अन्दर उत्तेजना भी आती है कार्य के अन्दर फ़ुर्ती भी आती है लेकिन अधिक कमजोरी के कारण गुस्से की मात्रा भी बढ जाती है। अक्सर यह भी देखा होगा कि जो लोग अधिक भारी होते है और शरीर से बलवान होते है उन्हे गुस्सा आती ही नही है या आती है तो जरा सी देर के लिये आती है,जितना अधिक शरीर बलवान होता है भारी होता है बुद्धि की कमी आजाती है,जितना शरीर हल्का होता है बुद्धि भी उतना ही काम करती है। जब आलस आता है तो चर्बी को घटाने की जरूरत पडती है,उस चर्बी को मेहनत करने के द्वारा ही घटाया जा सकता है शरीर को चलाने फ़िराने से चर्बी घट सकती है इसी लिये जिन लोगो के पास कोई काम नही होता है या दिमागी काम को करने वाले होते है उन्हे योग व्यायाम आदि करने की सलाह दी जाती है विभिन्न हिस्सो की चर्बी को हटाने और य्ववस्थित रखने के लिये योगो के कई रूप बनाये गये है.जब शरीर मे चर्बी की मात्रा का फ़ैलाव अधिक हो जाता है तो काम नही बन पाते है और उन कामो के नही बनने का कारण यह भी होता है कि आलस का आना समय पर क्रिया को पूरा नही कर पाना उचित समय पर उचित काम को नही करपाना आदि। इस प्रकार की बाते होने पर शरीर को जो तैलीय पदार्थ सेवन करने के लिये कहे गये है उनके अन्दर कमी कर दी जाती है। अक्सर मनुष्य की भावना जोड कर रखने और नियमित रूप से हर वस्तु को प्रयोग करने की होती है,उसी प्रकार से घर के अन्दर रसोई के अन्दर तैलीय पदार्थ भी रखे जाते है जब घर के अन्दर रखे हुये है और पूडी बनाकर खाने की इच्छा होगी तो वह तो बनायी जायेंगी और मन के आजाने से कितने ही तेल की मात्रा शरीर मे बढी हुयी हो वह खायी भी जायेंगी,इस बात को लोगो ने धार्मिक पहलू मे जोडा और शनिवार के दिन तेल का दान करवाना शुरु कर दिया तथा शनिवार को तेल से बने पदार्थ आदि खाने से मना भी किया कर दिया। कई स्थानो पर तेल को दान मे लेने वाले नही मिलते है इसलिये धार्मिक भावना मे यह निश्चित कर दिया गया कि अमुक स्थान पर शनि के रूप मे काले पत्थर पर तेल को चढाया जाये,लोगो की आस्था के अन्दर यह बात घर कर गयी कि तेल को शनि पर चढाने से शनि का प्रभाव कम होता है,और लोग इस बात को लेकर चलने लग गये। लेकिन जब खुद के घर मे तेल नही हो और शरीर की अन्य कमी के कारण शरीर काम नही कर रहा हो तो मनोवैज्ञानिक आधार पर भी लोग खरीद कर तेल को चढाने लग गये,जो लोग शरीर से कमजोर है और उनके अन्दर चलने फ़िरने की हिम्मत नही है वे भी तेल को खरीद कर धार्मिक आस्था के चलते शनि के नाम से किसी भी स्थान पर तेल को चढाने लग गये। इस प्रकार से चालाक लोगो की अपनी चलने लगी और उन्होने शनि को तेल चढाने की क्रिया करवाना शुरु कर दिया।शनि के रूप मे किये जाने वाले दान पुण्य आदि के नाम से लोगो के लिये एक प्रकार से उद्योग बन गये और गली मे मुहल्ले मे शहर मे कई कई स्थान बना दिये गये,किसी को कोई स्थान नही मिला तो शनि का पेड शमी को बताकर उसके ऊपर ही तेल को चढाया जाने लगा,कई लोगो ने शनि के लिये काले अनाज को दान करवाना शुरु कर दिया कोई लोहे को दान करने के लिये कहने लगा और कोई अपने अपने मत से कई कारण बताकर समस्या को तो देखा नही लेकिन समस्या की पूर्ति के लिये अपनी वाहवाही के लिये शनि के लिये तेल को चढाना आदि बाते शुरु करवा दी,तथा एक प्रकार से भय का भी प्रदान करना शुरु कर दिया कि जो भी शनि के लिये उल्टा बोलता है जो भी शनि की बुराई करता है उसे शनि अपनी वक्र द्रिष्टि देकर बरबाद कर देते है। यह बात कहां साबित होनी थी और कहां उसे प्रयोग कर दिया। जो लोग अधिक मोटे हो जाते है उनका शरीर कोई काम नही करता है जो आलस से घिर जाते है जिन्हे केवल खाने और अपनी शारीरिक क्रियाओं को पूरा करने के लिये रोजाना की जरूरत के लिये धन और वस्तुओं की आवश्यकता होती है,वे अपनी चालाकी वाली वक्र द्रिष्टि से तलासा करते है कि कौन सा ऐसा काम किया जाये जिससे वे अधिक से अधिक साधन प्राप्त करने के लिये अधिक से अधिक चालाकी वाले काम करके अधिक से अधिक लोगो को अपनी वक्र द्रिष्टि से कोपभाजन बनाये। लेकिन यह बात भी शनि देव को प्रदान कर दी। जो लोग मेहनत करते है मजदूरी करते है अपने रोजाना के पेट पालने के उपक्रम करते है शरीर को तोडते है जिन लोगो के अन्दर किसी भी काम करने के लिये अद्भुत शरीर की शक्ति होती है उन्हे शनि के लोगो मे गिना जाने लगा,यह केवल लोगो के अन्दर गलत धारणा के लिये माना जा सकता है और यह धारणा केवल इसी लिये पैदा की जाने लगी कि कैसे भी अपनी वक्र द्रिष्टि से लोगो को निशाना बनाकर लूटा जा सके और अपनी पेट भराई को किया जाता रहे।
शनि को कार्य का रूप भी दिया गया है,जो कार्य करता है वह शनि के रूप मे माना जाता है,जबकि शनि वसा की अधिकता से कार्य करने के लिये कतई मजबूर है,कार्य को करने के लिये शक्ति देने के लिये मंगल को माना जाता है,मंगल की शक्ति से खून के अन्दर बल होगा तो वह अपने आप काम करने लगेगा वह किसी की सहारे की जरूरत को कभी प्रयोग मे नही लेगा,लेकिन शनि वाले व्यक्ति को सहारे की भी जरूरत होगी और अपने लिये जरूरतो को पूरा करने के लिये वह मंगल की सहायता के लिये भी भागेगा। जैसे ही वह अपनी वक्र द्रिष्टि देने मे कामयाब हो जायेगा वह अपने काम को चतुराई से करने भी लगेगा और अपना आक्षेप दूसरो पर देकर मेहनत करने वाले लोगो को शनि की उपाधि भी देने लगेगा। जिन लोगो मे शनि की अधिकता है और जो लोग काम नही कर पाते है जिनकी बुद्धि समय पर काम नही करती है जिन लोगो के अन्दर चतुराई की आदत नही है वे लोग शनि के उपाय करने के लिये तेल भी चढा सकते है और शनि की पूजा पाठ के लिये अपने शरीर के कई कारणो को समाप्त भी कर सकते है,इसलिये जरूरत होती है कि शरीर को मंगल की पूर्ति की जाये यानी शरीर को गर्म रखने के लिये और शरीर के अन्दर पैदा हुये तैलीय पदार्थो की कमी के लिये निश्चित समय पर योग किये जाये जो लोग खुले स्थान मे है वे लोग सुबह शाम की दौड लगाये,मेहनत वाले कामो को करने के बाद तेल जमीन और पत्थरो को दान करे लेकिन वह तेल वास्तविक तेल होना चाहिये यानी वह मनुष्य के शरीर से निकला हुआ तेल पसीने के रूप मे होना चाहिये,वह तेल खरीदा नही होना चाहिये वह घर के अन्दर से नही लेना चाहिये वह तेल मेहनत करने के बाद शरीर से पसीने के रूप मे निकाल कर दान करना चाहिये तब जाकर शनि देव प्रसन्न भी होंगे और दिमाग भी चलेगा,सभी काम चाहे वह शिक्षा का हो चाहे वह नौकरी का हो चाहे वह व्यापार का हो सभी पूरे होने लगेंगे। मित्रों मेरी तो यही कोशिश रहती है कि मैं आपको ज्योतिष के जो वैज्ञानिक तथ्य है, पहलू है। उस की जानकारी दू, और इस में फैले हुए अंधविश्वास को दूर कर सकें ।आचार्य राजेश

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

क्या है अंक13 का रहस्य कितना शुभ और कितना अशुभ

www.acharyarajesh.in
मित्रों धनतेरस के दिन यह मन में विचार आया कि हम लोग 13 अंक को अशुभ क्यों मानते हैं। एक तरफ तो हम धनतेरस के दिन खरीदारी करते हैं। घर में कुछ ना कुछ लेकर आते हैं 13 का अंक अगर देखें तो एकांत सूर्या का और चीन अंक गुरु का गुरु और सूर्य का मेल गुरु ज्ञान का कारक है और सूर्य रोशनी का जीवन देने का कारक है। हमारी आत्मा का कारक है या रोशनी है ज्ञान है तो इस अंक को राहु के साथ जोड़कर इस अंक के साथ नाइंसाफी की जाती है हम लोग पश्चिम की देखा देखी हर उस बात को मानना शुरू कर देते हैं। जो बात वहां के समाज में मानी हो हम अपने सनातन धर्म की संस्कृति को भूलकर दूसरों के विचारों को मानना शुरू कर देते हैं। और यह कुछ बात अंक तेरा की करते हैं मित्रों एक पोस्ट लिखने पर बहुत मेहनत होती है। अगर अच्छी लगे तो लाइक करें शेयर करें अगर कुछ कमी रह गए तो अपने विचार लिखें।
हमारे कुछ मित्र 13 अंक के बारे में बहुत बार बात करते है। 
 दुनिया के कई दूसरे देशों में 13 नंबर को अपशगुन मा्ना जाता है नम्बर तेरह को अक्सर बुरी नजर से देखा जाता है लोग अपने मकान के नम्बर को भी नम्बर को भी तेरह के साथ जोड कर नही रखना चाहते है किसी होटल आदि मे जाना हो तो आप देख सकते है नम्बर तेरह का कमरा बडी मुश्किल से देखने को मिलता है। हिब्रू ने भी बडी तन्मयता से इस नम्बर के बारे मे लिखा है कि एक नरकंकाल जो मनुष्यों के रूप की फ़सल को काट रहा है,नर कंकाल के हाथ में एक हंसिया है और वह मनुष्यों के सिर को काटने का उपक्रम कर रहा है। भारत में हमारे सिख मित्रों ने नंबर 13 को बहुत ही शुभ माना है क्योंकि गुरु नानक देव ने कहा था कि तेरा ही तेरा। लेकिन तेरा ही तेरा और 13 ही 13 में बहूत फर्क है । उन्होंने कुछ और कहा था ।
आपने कुछ और समझ लिया। उनके कहने का अर्थ था कि सब कुछ तेरा ही तेरा है। हमारा कुछ भी नहीं। लेकिन इस बात का 13 नंबर से कोई संबंध नहीं। लेकिन चाइना के साथ-साथ दूसरे कई देशों ने 13 नंबर को मनहूस या अपशगुन माना है।
उसका कारण यह है कि आदमी के शरीर में नौ छेद हैं; उन्हीं नौ छेदों से जीवन प्रवेश करता है। और उन्हीं नौ छेदों से जीवन बाहर जाता है। और चार अंग हैं। सब मिला कर तेरह। दो आंखें, दो नाक के स्वर, मुंह, दो कान, जननेंद्रिय, गुदा, ये नौ तो छिद्र है 
 और चार--दो हाथ और दो पैर। ये तेरह जीवन के भी साथी हैं और यही तेरह मृत्यु के भी साथी हैं। और यही तेरह तुम्हें जीवन में लाते हैं और यही तेरह तुम्हें जीवन से बाहर ले जाते हैं।
तेरह का मतलब यह पूरा शरीर। इन्हीं से तुम भोजन करते हो; इन्हीं से तुम जीवन पाते हो; इन्हीं से उठते-बैठते-चलते हो; ये ही तुम्हारे स्वास्थ्य का आधार हैं। और ये ही तुम्हारी मृत्यु के भी आधार होंगे। क्योंकि जीवन और मृत्यु एक ही चीज के दो नाम हैं। इन्हीं से जीवन तुम्हारे भीतर आता, इन्हीं से बाहर जाएगा। इन्हीं से तुम शरीर के भीतर खड़े हो। इन्हीं के साथ शरीर टूटेगा, इनके द्वारा ही टूटेगा।
यह बड़ी हैरानी की बात है, ये ही तुम्हें सम्हालते हैं, ये ही तुम्हें मिटाएंगे। भोजन तुम्हें जीवन देता है, शक्ति देता है। और भोजन की शक्ति के ही माध्यम से तुम अपने भीतर की मृत्यु को बड़ा किए चले जाते हो। भोजन ही तुम्हें बुढ़ापे तक पहुंचा देगा, मृत्यु तक पहुंचा देगा। आंख से, कान से, नाक से, जीवन की श्वास भीतर आती है, उन्हीं से बाहर जाती है। नौ द्वार और चार अंग।
तेरह ही जीवन के साथी, तेरह ही मौत के साथी। ये तेरह ही लाते हैं, ये तेरह ही ले जाते हैं।
तेरह की संख्या के कारण चीन में, और फिर धीरे-धीरे सारी दुनिया में, तेरह का आंकड़ा अपशकुन हो गया। वह चीन से ही फैला। पश्चिम में जहां तेरह का आंकड़ा अपशकुन है उनको पता भी नहीं कि क्यों अपशकुन है। उसका जन्म चीन में हुआ।तो आज तो हालत ऐसी है कि अमरीका में होटलें हैं जिनमें तेरह नंबर का कमरा नहीं होता; तेरह नंबर की मंजिल भी नहीं होती। क्योंकि कोई ठहरने को तेरह नंबर की मंजिल पर राजी नहीं है। तो बारह के बाद चौदह नंबर होता है। क्योंकि तेरह शब्द से ही घबड़ाहट पैदा होती है।
तेरह नंबर का कमरा नहीं होता; बारह नंबर के कमरे के बाद चौदह नंबर का आता है। होता तो वह तेरहवां ही है, लेकिन जो ठहरता है उसको नंबर चौदह याद रहता है; तेरह की उसे चिंता नहीं पकड़ती।
इसका जन्म हुआ चीन में, और बड़े अर्थपूर्ण कारण से यह विश्वास फैला। अगर तुम इन तेरह के प्रति सजग हो जाओगे, तो शरीर से तुम्हारा फासला बढ़ेगा। तुम देख पाओगे, मैं पृथक हूं, मैं अन्य हूं। शरीर अलग, मैं अलग।
और यह जो भीतर भिन्नता, इसकी न कोई मृत्यु है, न इसका कोई जीवन है। न यह कभी पैदा हुआ, न कभी यह मरेगा ।आज के ही दिन भारत मे जलियांवाला कांड हुआ था और जनरल डायर जिसकी वास्तविक जन्म तारीख तेरह ही थी,और उस दिन शुक्रवार का ही दिन था। वैसे इतिहासिक रूप से उसकी जन्म तारीख नौ अक्टूबर अठारह सौ चौसठ बताई गयी है,वास्तविक जन्म तारीख १३ नवम्बर १८६३ मिलती है.तुला राशि का सूर्य मंगल गुरु बुध था तथा वृश्चिक राशि का चन्द्रमा और राहु तथा वृष राशि का केतु गन पाइंट से भीड की हत्या करने के लिये एक दुरात्मा की तरह से काम करता है। अक्सर इस दिन पैदा होने वाले लोग मारक शक्ति को लेकर पैदा होते है लेकिन यह वही लोग होते है जो सामाजिक व्यवस्था से दूर होते है और मनमर्जी के अधिकारी भी माने जाते है धर्म कर्म संस्कार आदि जिनके वश की बात नही होती है। यह दिन कई देशो मे बहुत ही प्रसन्नता से मनाये जाता है और कई देशो मे यह भूतो का दिन माना जाता है लेकिन जहां संस्कार और विद्या का प्रयोग करना आता है उन स्थानो मे यह बहुत ही शुभता की द्रिष्टि से मनाया जाता है। मित्रों , संसार क्षण-भंगुर है। उस पर रोचक तथ्य यह टटहै कि क्षण के हजारवें अंश की भी गणना होती है। यह कालचक्र के रहस्यों से भरे खेल का हिस्सा मात्र है। समय की गति का अध्ययन करने वाले और इसके गूढ़ रहस्यों को समझने-समझाने वाले तमाम विज्ञान-शास्त्र नंबरों के इस खेल को और भी रोचक रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र को तो मनुष्य के जन्म के समय, तिथि और अन्य सबंधित टआंकड़ों की गणना मात्र से उसके संपूर्ण जीवनकाल की गणना करने में सक्षम माना गया है। 60 सेकंड का एक मिनट, 60 मिनट का एक घंटा, 12 घंटों का दिन, 12 घंटों की रात, 12 महीनों का एक साल। इस तरह 365-1/4 दिनों के एक साल में जीवन एक-एक सेकंड कर घटित होता है। रोचक बात यह है कि सटीक 12-12 घंटों के दिन-रात और 12 महीनों का कहे जाने के बावजूद एक साल का अंत सटीक 12 पर नहीं होता है। 13 पर होता है। क्योंकि एक साल 365+1/4 यानी 365 दिन + चौथाई दिन का होता है। इससे अंदाजा लगा सकते हैं आप अंक 13 के जलवे का 
जहां कुछ संस्कृतियों में 13 को नंबर ऑफ डेथ कहा गया है वहीं कुछ में इसे "नंबर ऑफ लाइफ" माना गया है। ब्राजील में कोपेरस धर्म को मानने वाले 13 को शुभ मानते हैं। वहां इसे नंबर ऑफ लाइफ माना जाता है। वे कहते हैं कि यह मानवता की रक्षा का परिचायक है। वे इसे नंबर ऑफ गॉड यानी भगवान का अंक मानते हैं। 
हमारे भारत में सिख मतावलंबी 13 को शुभ मानते हैं।  वैशाखी अप्रैल की 13 तारीख को मनाया जाता है।  इसी तरह इस्लाम, यहूदी, रोमन कैथोलिक धर्म में भी कुछ ऎसे विवरण मिलते हैं जो 13 को नंबर ऑफ गॉड यानी भगवान का अंक निरूपित करते हैं। शिया धर्म में रज्जब माह की 13 तारीख को पवित्र माना जाता है।
प्राचीन मिस्त्र सभ्यता में, जहां मौत के बाद भी जीवन की मान्यता थी, 13 को जीवन और मौत के बीच की कड़ी माना गया था। इसी तरह यदि अल्फाबेट से जोड़ कर देखें तो अल्फाबेट का 13वां लैटर है "एम"। दुनिया एम के ही इर्द-गिर्द घूमती है। मिस्र में तो मौत के बाद मरने वाले को आलीशान पिरामिड में ममी के रूप में सुरक्षित रखा जाता था। इस पिरामिड को कुल 13 दिन में ही बनाया जाता था। 
शैतान का अंक 
ईसाइ धर्म में ऎसे कुछ घटनाक्रमों का उल्लेख है, जिससे 13 का अंक इस धर्म को मानने वालों के लिए शैतान का अंक है । कहा जाता है कि उस दिन 13 तारीख थी जब ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था। उन्हें जिन लोगों ने सूली पर चढ़ाया था उनकी संख्या 13 थी। यही नहीं, ईसा मसीह ने खुद को सूली पर चढ़ाए जाने से पहले जो अंतिम भोजन किया था, जिसे लास्ट-सपर कहा गया है, उस मेज पर ईसा सहित कुल 13 लोग ही शामिल थे। लिहाजा ईसाई 13 को अशुभ मानते हैं।   
लेकिन कीरो कहते हैं बेहद शुभ है 13 अंक !
अ नुकूल योग होने पर 13 को बेहद करिश्माई अंक बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र और अंक शास्त्र में इसे कर्म का प्रतीक भी कहा गया है। यानी जैसा कर्म, वैसा फल। 13 का मूल अंक 4 है, जिसे निर्माण का प्रतीक भी बताया गया है। इस अंक को न्यूमेरोलोजी में पमास्टर-नंबर की पदवी दी गई है। कहा गया है की अनुकूल होने पर यह सबसे करिश्माई अंक साबित होता है पऔर इसे न केवल सौर मंडल बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का सहयोग मिलता अंक तेरह का योग चार मे आता है और चार का अंक भारतीय गणना के अनुसार केतु की परिभाषा मे आता है,केतु को साधनो का कारक और गणेश जी के रूप मे पूजा जाना भी माना जाता है  जो लोग तांत्रिक कारणो को समझते है और उनका प्रयोग करना जानते है वे लोग तांत्रिक वस्तुओं की स्थापना भी करते है,तेरह अप्रैल को यह तारीख और दिन आने से तथा सूर्य का बारहवा स्थान बदलने के बाद मेष राशि मे आने से भी यह दिन बहुत ही शुभ माना जाता है। इस दिन लोग केतु से सम्बन्धित तांत्रिक वस्तुओ को स्थापित करने से भी उनकी अद्रश्य शक्ति से सफ़लताओ का मिलना जाना जाता है। लोग आज के दिन दक्षिणावर्ती शंख हड्डी तथा नाखून से बनी वस्तुये केतकी जडी कांटे और वनस्पति जगत की तांत्रिक वस्तुये स्थापित करते है। आज के दिन नाव की कील से बने छल्ले शनि सम्बन्धित तकलीफ़ो जैसे जोडों के दर्द शरीर मे चर्बी का इकट्ठा हो जाना पेशाब वाली बीमारिया हो जाना आदि रोगो के लिये सही माने जाते है।

रविवार, 13 अक्टूबर 2019

ग्रहों के उपाय



मित्रों ज्योतिष मे ग्रहों का रूप अलग अलग बताया गया है,ग्रह प्रयक्ष और अप्रतक्ष रूप से अपना असर देते है।ज्योतिषी अपने अपने ज्ञान के अनुसार ग्रह के खराब होने के उपाय बतलाते है। अलग अलग ग्रहो के अलग अलग उपाय बताये जाते है,लोग अपनी अपनी कुंडली लेकर ज्योतिषियों के पास जाते है अपने बारे मे पूंछते है,ज्योतिषी द्वारा कुंडली को देखा जाता है जो भी ग्रह अपना खराब असर दे रहा होता है उसी के अनुसार गणना करने के बाद उपाय बता दिया जाता है। लेकिन उपाय हमेशा के लिये नही होते है,उपाय कुछ समय के लिये करने के लिये कहा जाता है। कारण ग्रह नुकसान का देने वाला होता है वही ग्रह कुछ समय बाद फ़ायदा देने के लिये भी माना जाता है,जो ग्रह फ़ायदा देता है वही ग्रह कुछ समय बाद नुकसान देने के लिये भी अपनी क्रिया को शुरु कर देता है। यह बात और भी मानी जा सकती है कि जैसे ड्राइवर अपनी योग्यता के सहारे ही गाडी को चलाता है,कभी कभी वही योग्यता भी खतरनाक बन जाती है और वही गाडी जो वह आराम से सम्भाल सकता है उसकी जान लेने के लिये भी अपना काम करती है। महावत जिस हाथी को चलाने की सामर्थ्य रखता है वही हाथी जब अपनी पर आता है तो पहले वह अपने महावत को ही मारता है,उसी प्रकार से जो सपेरा सांप को पालता है और सांपो के द्वारा ही अपने जीवन को चलाना जानता है कभी कभी वही सांप उसकी मौत का कारण बन जाता है,जो तांत्रिक अपने तंत्र से सभी को वश मे करने के बाद अपने द्वारा प्राप्त की गयी आसुरी शक्तियों का प्रयोग करता है लेकिन वही तांत्रिक अपने द्वारा पाली गयी आसुरी शक्तियों से ही मारा जाता है। तो यह जरूरी नही है कि जो कारक फ़ायदा दे रहा है वह नुकसान नही दे,इसलिये हमेशा ख्याल यह रखकर चलना चाहिये कि अगर आज सूर्य नुकसान दे रहा है तो वह हमेशा ही नुकसान देता रहेगा वह फ़ायदा भी देगा,लेकिन फ़ायदा के समय मे भी नुकसान वाला उपाय किया जाता रहा तो वह बजाय फ़ायदा के नुकसान भी देने लगेगा। इस बात के लिये लोगो को भ्रम मे डाल दिया जाता है कि यह सूर्य आजीवन परेशान करने वाला है और उसका उपाय आजीवन करना चाहिये।सबसे पहले जिन्दा ग्रहों का उपाय करना जरूरी होता है,पिता से बिगड गयी है तो समझ लीजिये सूर्य खराब है बेटा कहे मे नही चल रहा है और ऊल जलूल काम करने के बाद घर मे क्लेश को फ़ैला रहा है तो समझ लीजिये कि सूर्य खराब है,सभी ग्रह अपना खराब तभी देते है जब कोई न कोई खराब ग्रह उस ग्रह से अपनी युति लेता है जैसे बेटा घर मे क्लेश फ़ैला रहा है तो देखना यह पडेगा कि बेटे को शनि या राहु या केतु जैसे कारक साथ मे लेकर चलने की आदत तो नही पड गयी है,कही पिता के पास भी इसी प्रकार के कारक तो नही शुरु हो गये है। सूर्य के साथ शनि का मिलना हो गया होगा तो वह सूर्य की चमक को धीमा कर देगा जो सूर्य की गर्मी है उसे ठंडा कर देगा,इस शनि को दूर करने के लिये सूर्य के बल मे बढोत्तरी करनी पडेगी उसे शनि के कारको से दूर करना पडेगा,सूर्य जो शरीर मे बल का कारक है अपनी पहिचान को देने वाला है अगर वह शनि के तामसी कारणो मे मिल जायेगा तो शरीर की चमक समाप्त होने लगेगी,अगर शरीर मे कई प्रकार के रोग लग गये है तो भी सूर्य का धीमा हो जाना माना जायेगा.लेकिन सूर्य के खराब होने के पहले चन्द्रमा को भी देखना पडेगा जब तक चन्द्रमा पर कोई ग्रह अपना असर नही देगा सूर्य खराब नही हो सकता है,चन्द्र यानी मन पर कोई कारण नही आने पर सूर्य का खराब होना नही माना जाता है,जैसे मन मे किसी प्रकार की शंका आ गयी है और वह शंका समाप्त नही हो रही है जब तक मन की शंका को दूर नही किया जायेगा शरीर का सूर्य व्यवस्थिति नही हो सकता है। जैसे चन्द्रमा के साथ मंगल का प्रकोप शुरु हो जाये तो माता को गुस्सा आना शुरु हो जायेगा और माता जब गुस्सा करेगी तो पिता का दैनिक क्लेश के कारण तामसी कारणो मे जाना जरूरी हो जायेगा,उसी प्रकार से जब बेटे की मां घर मे क्लेश नही करेगी या बेटे पर अनावश्यक कारण नही थोपेगी बेटा तामसी कारणो मे नही जायेगा। यह उम्र और जलवायु के कारण भी होता है,जब तक इन सभी बातो का ख्याल नही किया जायेगा तब तक कोई भी कारण क्लेश का नही बनेगा। समस्या आने के पहले समस्या की हवा चलनी शुरु हो जाती है। जैसे कोई एक्सीडेंट होना है तो पहले एक्सीडेंट करने वाला कारण शुरु हो जायेगा फ़िर एक निश्चित स्थान पर दोनो कारण जब इकट्ठे होंगे तभी एक्सीडेंट होगा,बिना कारण की उत्पत्ति के एक्सीडेंट नही हो सकता है। राहु अब ही सूर्य के साथ गोचर करेगा उस समय पिता या पुत्र के प्रति अनावश्यक सोच का आना माना जायेगा,उस सोच का रास्ता नही मिलने पर शरीर मे कई प्रकार के रोग लगने शुरु हो जायेंगे वह रोग या तो चिन्ता से बाहर जाने के प्रति होंगे या अचानक आने वाली विपत्ति से बचने के लिये सोचे जाने वाले उपाय होंगे उपाय नही मिलने पर सूर्य अपने को समय के घेरे मे ले जाकर तामसी कारणो मे शुरु हो जायेगा उसे चिन्ता होगी कि अमुक समय पर अमुक कारण बन सकता है उतने समय के लिये वह अगर अपने को अपने से बाहर रखेगा तो वह बच सकता है या उस समय पर उसे कुछ भी कहने या सुनने अथवा कार्य को करने मे असमर्थ होना पडेगा इसलिये वह अपने को उस कारण से दूर रखकर ही चलना ठीक होगा इसलिये वह अपने शराब आदि तामसी कारणो मे लेकर चला जायेगा या अपनी समस्या से छुटकारा लेने के लिये किसी अनावश्यक कारण को पकडने और अपनी समस्या से दूर जाने का उपक्रम रचने लगेगा,उस समय अगर केतु का सहारा मिल जाता है और उसकी कार्य प्रणाली को सहायक बनकर हल कर दिया जाता है तो सूर्य डूबने से बच भी जायेगा और समस्या का अन्त भी हो जायेगा। बेटा अगर बाप से बनाकर चलता है तो दोनो का सूर्य हमेशा के लिये ही उदय रहेगा जैसे ही बाप बेटे मे किसी भी बात से अनबन हो गयी दोनो का सूर्य खतरे मे चला जायेगा,इसी प्रकार से जब तक सूर्य यानी सरकार के कानूनो और मर्यादाओ का पालन किया जाता रहेगा शरीर के सूर्य पर कोई दिक्कत नही आयेगी जैसे ही अहम के अन्दर आकर या शनि सम्बन्धित चतुराई को लाकर अपने को सरकार के समक्ष पेश किया गया सरकार शरीर के सूर्य पर कारावास या किसी प्रकार के दंड देने की प्रक्रिया से सूर्य को ग्रहण दे देगी। एक कहावत और भी सुनी होगी कि लोहा लोहे को ही काटता है इसी प्रकार से बाप बेटे की अनबन बाप और बेटे दोनो को ही काट देती है,इसलिये पहले अपने सूर्य को सही रखने के लिये अपने पिता और अपने पुत्र से कभी अनबन बनाकर नही रखना चाहिये इस प्रकार से जिन्दा ग्रह के साथ मित्रता करने के बाद चालीस प्रतिशत तक लाभ लिया जा सकता है बाकी का अपने कार्यों से रत्न धारण करने से और सूर्य वाली मर्यादा को निभाने से भी सूर्य अपना काम करता रहेगा।शनि को कुंडली मे बडे भाई की उपाधि से विभूषित किया गया है वही शनि बुजुर्ग की हैसियत से भी अपने को सामने रखता है। बडे भाई और पुत्र का साथ शनि सूर्य की युति मे लेकर जायेगा अगर इस कारण मे केवल केतु का सहारा लिया जाता रहेगा तो बडे भाई के द्वारा पुत्र को सहारा मिलता रहेगा और पुत्र अपनी मर्यादा से बाहर नही जायेगा लेकिन बीच मे शुक्र का आना हो गया तो सूर्य और शनि दोनो ही बरबाद हो जायेंगे,जैसे बडे भाई के द्वारा पुत्र को किसी प्रकार की सहायता दी जाती है वह सहायता तभी तक सही मानी जायेगी जब तक बीच मे लेन देन का कारण नही पैदा होता है यही बात इस प्रकार से भी मानी जा सकती है कि जब घर की औरतो मे सूर्य पैदा हो जायेगा तो एक दूसरे के प्रति राजनीति की बाते पैदा हो जायेंगीऔर कहा जाने लगेगा कि अमुक समय मे अमुक प्रकार की सहायता उन्हो ने नही की थी लेकिन हमने सहायता की थी इस प्रकार से मानसिक कष्ट का कारण पैदा होगा और हो सकता है सूर्य खराब हो जाये यानी पुत्र अपनी सहायता बडे भाई से लेना बन्द कर दे या बडा भाई अपनी दी जाने वाली सहायता को बन्द कर दे,इसी प्रकार से जब घर मे शादी सम्बन्ध वाले कारण बनते है और उस समय अगर सूर्य शनि की मान्यता को कायम नही रखा गया तो भी एक दूसरे के प्रति अनबन होने का कारण पैदा हो जायेगा और वह शादी सम्बन्ध होगा जरूर लेकिन जीवन मे आगे के लिये खतरनाक ही बन जायेगा वह किसी भी प्रकार से सूर्य की तरक्की का रास्ता इसलिये नही बन पायेगा क्योंकि जीवित ग्रह की सहायता नही मिलने पर सूर्य खुद को शनि वाले कारणो मे ले जाकर या तो अपनी मर्जी से शनि जो शराब कबाब आदि के कारणो मे या घर से मर्यादा से विपरीत कामो को करने के बाद शनि को ग्रहण करेगा इसलिये सबसे पहले जहां तक हो सके जिन्दा ग्रह को सम्मुख रखकर चलना ठीक होगा।

सभी ग्रहो से फ़ायदा लेने का अचूक उपाय जो ज्योतिष और पुराने जमाने से प्रयोग मे आता हुआ देखा गया है वह बहुत ही सुन्दर और बलकारी तथा खुद का और परिवार का नाम चलाने के लिये माना जाता रहा है,सूर्य को खराब नही होने देने के लिये घर के पिता और पुत्र का सम्मान अपने अपने स्थान पर रखना चाहिये तथा समय समय पर मिलने वाले कनफ़्यूजन को दूर करते रहना चाहिये,चन्द्रमा के उपाय के लिये घर के बुजुर्ग स्त्री सदस्यों का सम्मान करते रहना चाहिये और उनके आशीर्वाद को लेते रहना चाहिये बडी बहिन भी चन्द्रमा के अधिकार मे आजाती है लेकिन उसकी शादी के बाद केवल मर्यादा तक जी सीमित रहना चाहिये अन्यथा या तो बडी बहिन का जीवन चौपट हो जायेगा या खुद को कोई आगे बढने का रास्ता नही मिल पायेगा इसी प्रकार से बुध की सहायता के लिये बहिन बुआ बेटी का सम्मान करना और उनके लिये जो भी सहायता मिलती है देते रहना चाहिये बहिन बुआ बेटी से आजीवन का एक सम्पर्क का रास्ता मिलता है जैसे वह अनजाने लोगो के बीच मे शादी के बाद मे जाती है और उन अन्जाने लोगो से सम्पर्क का बनना एक प्रकार से बडे कमन्यूकेशन के रूप मे माना जाता है अगर अपनी तरफ़ से मान सम्मान तथा सम्पर्क को कायम रखा जाता है किसी भी मिलने वाली बुराई या भलाई मे मिल बैठ कर और आदर सम्मान से उस कारण को समझ लिया जाता है तो जो सम्पर्क बना है उससे भी और सम्पर्क को भी दुख मे सुख मे साथ लिया जा सकता है,साथ ही बहिन बुआ बेटी का सम्मान भी सुरक्षित रहेगा और अहम के कारण या एक दूसरे की प्रतिस्पर्धा के कारण उन्हे कष्ट भी नही होगा पारिवारिक जीवन भी सही चलता रहेगा। गुरु का साधने का सबसे अच्छा तरीका है किसी भी सम्बन्ध के प्रति आत्मीय लगाव होना चाहिये इसी बात को उच्च का गुरु यानी कर्क राशि का गुरु माना जाता है क्योंकि कर्क राशि चन्द्रमा की राशि है और इस राशि मे गुरु का आस्तित्व उच्च का हो जाता है यह इसलिये होता है कि सम्बन्ध को मानसिक रूप से इज्जत के रूप से देखा जाता है लेकिन जो लोग सम्बन्ध को केवल स्वार्थ हित तक ही सीमित रखते है वह व्यवहार के रूप मे आजाता है और वह अपने सम्बन्ध को आजीवन कायम नही रख पाते है। इसका परिणाम यह होता है कि जैसे ही काम निकला वे दूर हो जाते है और अपने या उनके आगे के कामो मे बाधा भी आजाती है साथ ही एक दूसरे के प्रति लोकरीति और आक्षेप विक्षेप भी मिलने लगते है। शुक्र के लिये भी यही माना जाता है कि जितना हो सके पति पत्नी को और पत्नी पति को अगर भौतिकता से दूर रखकर अपने को केवल इसी भावना मे लेकर चलते है कि उन्हे हाथ से हाथ मिलाकर जीवन की तरक्की मे आगे जाना है या जो भी काम करना है वह दोनो की रजामन्दी से ही होना है तो शुक्र अपने असर को देता रहेगा जैसे ही शुक्र के अन्दर कानून का भाव पैदा हो जाता है शुक्र खराब हो जाता है यह बात उन लोगो से सीखनी चाहिये जो अपने सम्बन्ध महिलाओ से केवल कामेक्षा की पूर्ति के लिये रखते है या जो लोग विवादित जमीन जायदाद को खरीदने या बेचने मे सम्बन्धित होते है उनके लिये खुद का जीवन भी बरबाद होना माना जाता है साथ ही जिससे वह सम्बन्ध स्थापित करते है उनका जीवन भी बरबाद होना माना जाता है,इसी प्रकार से शनि के लिये मैने ऊपर लिखा ही है जिसे शनि के बारे मे बेलेन्स करना आता है जो समय के साथ कार्य की योजना और महत्व को समझते है जो लोग बुजुर्गो से समय पर राय लेना जानते है और जो लोग अपने लिये हमेशा के लिये चलने वाले कार्य को पकडने की सोचते है भले ही वह कम फ़ायदा देने वाला हो लेकिन लगातार पकड कर चलने और आने वाली कमाई को निश्चित तरीके से समझने के लिये उनके अन्दर बुद्धि है तो वे आगे बढ जाते है,इसी बात को कहावत के रूप मे भी कहा जाता है कि पांच कमाओ लेकिन रोज कमाओ दाल रोटी खाओ लेकिन रोज खाओ,राहु केतु के लिये भी यही मान्यता होती है अक्सर राहु के आने से किसी भी ग्रह के साथ सामजस्य नही बन पाता है कनफ़्यूजन पैदा हो जाते है और उन कनफ़्यूजन को अगर मंगल की तकनीक से निकाल दिया जाता है या अचानक मिलने वाले मुसीबत के कारणो को तकनीकी रूप से प्रयोग मे लाया जाता है तो कनफ़्यूजन भी फ़ायदा देने वाला बन जायेगा लेकिन उसी कनफ़्यूजन मे रहकर और अधिक कनफ़्यूजन को बढा दिया जायेगा तो वही कनफ़्यूजन आगे के सभी रास्ते भी बन्द कर देगा और कोई भी दुर्घटना देने के लिये माना जायेगा। मित्रों ज्योतिष्  के ऐसे पोस्ट आप हमारै website www.acharyarajesh.in पर पढ़ सकते हैं

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

सिंह लग्न की कुंडली और उसकी विवेचना


कुंडली मे गुरु जीव का अधिकारी होता है सूर्य आत्मा का अधिकारी माना जाता है मंगल आत्मीय शक्ति को बढाने वाला होता है बुध आत्मीय प्रभाव को प्रसारित करने का कारक होता है शुक्र जीव को सजाने और आत्मा के भावो को प्रकट करने मे अपनी सुन्दरता को प्रकट करता है तो चन्द्रमा आत्मीय मन को सृजित करने का भाव पैदा करता है.शनि भौतिक रूप को प्रकट करता है और जीव के कर्म को करने के लिये अपनी योग्यता को प्रकट करता है। यूरेनस दिमाग के संचार को प्रकट करने और भौतिक संचार को बनाने बिगाडने का काम करता है प्लूटो मिट्टी को मशीन मे परिवर्तित करने का कार्य करता है नेपच्यून आत्मा के विकास का अधिकारी माना जाता है.समय के अनुसार जीव का रूप परिवर्तन होता रहता है जैसे आदिम युग मे जीव का रूप कुछ और होता था पाषाण युग मे कुछ था मध्य युग मे कुछ और था और वर्तमान मे कुछ और है तथा आने वाले भविष्य मे जीव का रूप कुछ हो जायेगा। जीव वही रहता है रूप परिवर्तन मे सहायक प्लूटो को मुख्य माना गया है,जो आधुनिकता से लेकर अति अधुनिकता को विकसित करने के लिये लगातार अपने प्रभाव को बढाता जा रहा है और हम क्या से क्या होते जा रहे है,लेकिन जीव के विकास की कहानी के साथ आत्मा का रूप नही बदल पाता है जीव कितना ही आधुनिक हो जाये आत्मा वही रहती है। जो भी कर्म किये जाते है उनका प्रभाव आत्मा पर उसी प्रकार से पडता रहता है जैसे एक चिट्टी विभिन्न डाकघरो मे जाकर डाकघर की उपस्थिति को दर्शाने के लिये अपने ऊपर उन डाकघरो की मुहर अपने चेहरे पर लगाकर प्रस्तुत करती है।

ऊपर दी गई कुंडली सिंह लगन की है और सूर्य विद्या से प्राप्त बुद्धि के भाव मे विराजमान है,सूर्य का साथ देने के लिये बुध जो लगन का चेहरा और भौतिक प्राप्ति तथा कार्य के प्रभाव का नाम प्रस्तुत करने की भावना को भी देता है। सूर्य का प्रभाव धरती तक लाने के लिये सूर्य किरण ही जिम्मेदार होती है। बिना सूर्य किरण के सूर्य का प्रभाव धरती पर आ ही नही सकता है,बुध को किरण का रूप मानने पर यही पता चलता है कि बुध सूर्य की गरमी रोशनी जीवन की प्रस्तुति को धरती तक लाने के लिये संचार का काम करता है इसलिये बुध को संचार का ग्रह कहा गया है। पंचम भाव विद्या के भाव से दूसरा भाव होने से विद्या से प्राप्त बुद्धि को प्रयोग करने का भाव भी कहा गया है और जब इस भाव मे गुरु की धनु राशि का समागम होता है तो ऊंची शिक्षा वाली बुद्धि को प्राथमिक शिक्षा जैसा माना जाता है। कानून की कारक यह राशि विदेशो से भी सम्बन्ध रखती है धर्म और भाग्य से भी यह राशि जुडी होती है साथ ही यात्रा और धार्मिकता को फ़ैलाने या उस धार्मिकता से लोकहित के कार्य करने के लिये भी अपनी युति को प्रस्तुत करती है। इस राशि के प्रभाव को अगर पंचम मे लाया जाता है तो ऊंची जानकारी को खेल खेल मे प्रस्तुत करने की कला भी मानी जाते है,सूर्य भी हकीकत मे कालपुरुष की कुंडली के अनुसार इसी भाव का मालिक है,राज्य और राजनीति से भी सम्बन्ध रखता है। लेकिन उद्देश्य कुछ भी हो मतलब शिक्षा से ही होता है।पुराने जमाने की जो कहानी कही जाती है कि गुरुओं मे इतनी दम होती थी कि वे मिट्टी को चलाने फ़िराने लगते थे,वे कहानिया अविश्वसनीय लगती है,हम कभी कभी कह देते है कि यह सब कपोल कल्पित है,लेकिन आज जिधर भी नजर घुमाई जाती है उधर ही मरी हुयी मिट्टी दौड रही है जिस इंसान को देखो मरी मिट्टी से ही खेल रहा है काम कर रहा है उसी मिट्टी को प्रयोग मे लाकर कमा रहा खा रहा है उसी मिट्टी पर बैठ कर भागा जा रहा है उसी मिट्टी से एक दूसरे से संचार कर रहा है,लेकिन उस जमाने की बातें कपोल कल्पित लगती है ! पुराने गुरु पीले कपडे पहिन कर विद्या को प्रदान किया करते थे लेकिन आधुनिक गुरु कम कपडे पहिन कर कम काम करके अधिक बुद्धि का प्रयोग करके जो कारक पैदा कर रहे है उन्हे गुरु की उपाधि से दूर करने के बाद वैज्ञानिक की उपाधि दे रहे है,वास्तविकता भी है कि जब गुरु सुपर गुरु हो जाता है और मरी मिट्टी मे इतनी जान डाल देता है कि उसका जीवन बिना मरी मिट्टी के बेकार सा हो जाता है तो वह दिमाग को हर पल हर क्षण हर मौके पर दौडाने का काम भी करता है और अपने को वैज्ञानिक कहलाने लगता है। वैज्ञानिक शब्द की व्याख्या को देखा जाये तो वह व+ऐ+ज्ञान+इक से ही देखा जायेगा और इसे अगर विच्छेद करने के बाद जाना जाये तो वाममार्गी तांत्रिको से कम नही समझा जा सकता है। व को मुर्दा कहा जाता है ऐ की मात्रा लगाते है मुर्दे मे जान डालने की क्रिया बन जाती है और जो इस क्रिया को प्रयोग करना जानता हो उसे ज्ञानी की उपाधि दी जाती है लेकिन वह सिद्धान्त के ऊपर ही निर्भर है इसलिये इक यानी एक ही के प्रति समर्पित हो जाती है,तो कौन कहता है कि वैज्ञानिक तांत्रिक नही होता है। जीव यानी गुरु को अपने तंत्र से मरी हुयी मिट्टी मे जान डाल कर लोक हित मे प्रयोग किया जाने लगे और लोग उस मरी मिट्टी जिसमे जान डाल दी गयी है उसे प्रयोग मे लेकर अपने को धन्य समझ ले तथा अपनी आवश्यकताओ को पूरा करने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर कर दे तो जिसने उस मई मिट्टी मे जान डाल दी है वह किसी संत से कम कहा जा सकता है क्या ?

राहु फ़ैलाव देता है फ़ैलना भी सीमित नही होता है,असीमित होता है और जो व्यक्ति एक साधारण व्यक्ति से कई गुनी योग्यता सीखने की रखता हो तथा अपने को बजाय साधारण आदमी के अलग थलग दिखाने की औकात को रखता हो उसी को वक्री कहा जाता है। राहु हमेशा उल्टा चलता है,राहु को शक्ति के रूप मे देखा जाता है और जब यह राहु गुरु के साथ हो जाये तो खराब भाव मे जाकर यह जहरीली हवा बन जाता है लेकिन अच्छे भाव मे जाकर यह अमृत प्रदान करने वाली हवा भी बन जाता है और जिस व्यक्ति की कुंडली मे राहु लगन मे हो अच्छी राशि मे हो तो बात ही कुछ और होती है। लेकिन सीधा आदमी उल्टे को नही सुधार सकता है केवल उल्टा आदमी ही उल्टे को सुधार सकता है,उसी प्रकार से राहु को सुधार मे लाने के लिये गुरु को भी उल्टा कर दिया जाये तो राहु आसानी से सुधार मे लाया जा सकता है,इस कुंडली को भी देखिये राहु लगन मे है शिक्षा की राशि मे है और गुरु भी वक्री होकर राहु की गति मे बदल गया है साथ ही नवे भाव के मालिक मंगल का तकनीकी सहारा भी ले लिया है तो राहु को सुधार कर अच्छे रूप मे बदलना जाना जा सकता है। जो राहु दूसरो को डराने का काम करता है एक प्रकार से काली आंधी बनकर लोगो को परेशान करता है तो वह राहु वक्री गुरु के सानिध्य मे आकर और मंगल का साथ लेकर असीमित ज्ञान के क्षेत्र को दिखाने प्रकाश मे लाने के लिये और संसार को सामने रखने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर कर रहा है। इसी बात को अगर राहु को सिलीकोन माना जाये गुरु को सिलीकोन को तरीके से जोडना और सर्किट आदि बनाने के काम मे लिया जाये तथा मंगल को शक्ति की कारक बिजली के रूप मे देखा जाये तो यह कम्पयूटर का रूप धारण कर सकता है सर्किट बोर्ड पर लगे हुये आई सी कण्डेन्सर रजिस्टेंस ट्रांजिस्टर डायोड आदि की जानकारी भी देता है और उस के अन्दर अपने ज्ञान का प्रयोग करने के बाद लोगो के लिये उस मशीन का तैयार करना हो जाता है जिससे लोग अपने जीवन की जरूरतो को बाहरी लोगो से लिखने पढने से लेकर आने जाने तथा कितने ही प्रकार के कार्य करने के लिये स्वतंत्र हो सकते है। यह वक्री गुरु का ही काम है कि वह शनि प्लूटो यानी मरी हुयी मशीन को हार्डवेयर आदि डालकर उसे सिस्टम से चलाने की क्रिया मे राहु नामका सोफ़्टवेयर डालकर कई प्रकार की मशीनी श्रेणी मे बदल सकता है। अगर इसी जगह पर मार्गी गुरु होता तो वह दूसरे के द्वारा बनाये गये सामान को प्रयोग करने वाला होता लेकिन वक्री गुरु होने के कारण वह अपने द्वारा बनाये गये सामान को दूसरो के हित के लिये प्रयोग करने वाला बन जाता है।सिंह लगन का चौथा भाव वृश्चिक राशि का होता है यह राशि बहुत गूढ होती है कभी प्रकट रूप से सामने नही होती है जैसा कि मेष राशि का स्वभाव होता है कि उसके मन के अन्दर कुछ भी है वह सामने रख देती है इसलिय ही दूसरो के लिये बलि का बकरा बन जाती है उसी स्थान पर सिंह लगन का जातक अपने विचार बहुत गूढ रखता है और उस बुद्धि का प्रयोग करता है जो बुद्धि साधारण आदमी के पास नही होती है वह अपने भाव को प्रकट करने के लिये गूढ तंत्र का प्रयोग करता है उसे तकनीकी विद्या को प्राप्त करने की आदत होती है साथ ही वह अपने को इतने भेद की नीति के अन्दर रखता है कि मन के अन्दर क्या है जान लेने के लिये अपनी पूरी योग्यता को प्रस्तुत कर सकने के बाद भी यह जाहिर नही होने देता है कि आखिर मे उसकी मंशा क्या थी ? यह राशि तकनीकी राशि भी है और किसी भी प्रकार की तकनीक को दिमाग मे रखने और तकनीकी विद्या के प्रति हमेशा मन को लगाकर चलने के लिये भी मानी जा सकती है यह राशि तकनीक के अलावा दुनिया के भेद मृत्यु के बाद का जीवन पराशक्तियों और शमशानी सिद्धियों के प्रति भी जान लेने की भावना को रखती है। हकीकत मे इस भाव का मालिक चन्द्रमा होता है और जनता का मालिक भी चन्द्रमा होता है दिशाओं से यह दक्षिण पश्चिम दिशा की कारक भी कही गयी है इस प्रकार से जातक की मानसिक रुचि अन्तर की जानकारी के लिये भी मानी जा सकती है।यह राशि नकारात्मक मंगल की राशि भी कही गयी है सकारात्मक मंगल जीव के अन्दर की शक्ति कही जाती है और नकारात्मक मंगल जीव के मरने के बाद उसकी पराशक्ति का कारक होता है। सकारात्मक मंगल जीव के जिन्दा रहने तक साथ देने वाला होता है और नकारात्मक मंगल जीव के मरने के बाद उसकी शक्तियों को दूसरे लोगों के प्रति प्रयोग करने के लिये भी माना जाता है,अक्सर सामाजिक परिवेश मे इस मंगल को लोग भूत प्रेत तंत्र आदि के रूप मे कहते सुने जा सकते है।

यूरेनस इस राशि मे उपस्थित होता है तो जातक के मन के अन्दर एक तो उन शक्तियों को प्रकट करने की इच्छा होती है जो मरने के बाद की जानी जा सकती है दूसरे जातक के अन्दर मरी हुयी मिट्टी के अन्दर से यह जान लेने की कला का विकास भी होता है कि वह कैसे मरी किस अवयव की खराबी से मरी और उस मरी हुई शक्ति के अवयब को जांच लेने की और उसे बदल कर नया जीवन मरी हुयी मिट्टी को देने से भी जानी जा सकती है इस बात को अगर डाक्टरी रूप मे देखा जाता है तो एक प्राणी की मौत के पहले के जीवन को प्राप्त करने के लिये खराब हुये अवयब को बदलने का काम किया जाता है जबकि यूरेनस को संचार का ग्रह माने जाने पर जातक के अन्दर कमन्यूकेशन की चीजों के खराब होने पर उन्हे जांच लेने और उन्हे ठीक करने की क्रिया को जान लेने का कारण भी कहा जाता है इस कारण को अगर देखा जाये तो आज के जमाने मे इन्हे इन्फ़ोर्मेशन तकनीक का जानकार भी कहा जाता है और कम्पयूटर इंजीनियर के रूप मे भी देखा जाता है। नेपच्यून के इस भाव मे होने से यह भी देखा जाता है कि जातक के अन्दर राख से साख निकालने की क्षमता का होना भी होता है वह समझ सकता है कि जो कबाडा हो चुका है उस कबाडे से क्या क्या वस्तु निकाली जा सकती है जो काम की है और उस वस्तु को दूसरी वस्तुओं मे प्रयोग करने के बाद उन्हे काम मे लिया जा सकता है। नेपच्यून का रूप अक्सर आत्मा के रूप मे पाश्चात्य ज्योतिष मे प्रयोग मे लाया गया है लेकिन हमारी संस्कृति के अनुसार से मन के आगे नही मान सकते है मन और आत्मा मे भेद को समझने वाले लोग इस बात को समझ सकते है। जो आत्मा कबाड से जुगाड बनाकर उन्हे काम का सिद्ध कर सके वही एक अच्छे इंजीनियर की श्रेणी मे भी गिना जाता है।

सूर्य और बुध का पंचम भाव मे होना आत्मा का मिलन शिक्षा के क्षेत्र मे जाने का होता है यहा जातक अपनी उपस्थिति को शिक्षा के क्षेत्र मे ले जाने और वहीं से अपनी उन्नति को शुरु करने के लिये भी माना जाता है लेकिन यह बात तभी सिद्ध हो सकती है जब जातक के पुत्र संतान की प्राप्ति हो,उसके पहले सूर्य का उदय होना और सरकारी क्षेत्र मे अपने प्रभाव को दिखाने का कारण नही बनता है,सूर्य से तीसरे भाव मे केतु के होने से भी एक कारण यह भी माना जाता है कि कुम्भ राशि का केतु उन्ही लोगो से मित्रता को बनाता है जब वह मित्रता किसी भी प्रकार से कमन्यूकेशन के मामले मे हो पुरानी ज्योतिष के अनुसार बडे भाई की पत्नी या दोस्त की पत्नी के या बडी बहिन के पति के सहायक कार्यों से जोड कर भी देखा जाता है और  इस केतु को अक्सर सहायक के रूप मे भी माना जाता है चाचा भतीजे का सम्बन्ध भी कायम करता है जीवन के अन्दर एक व्यक्ति की सलाह और शिक्षा जातक को आगे बढाने के लिये भी मानी जाती है।यह केतु पत्नी के रूप मे भी सामने आता है और जातक को अपनी सहायता से आगे बढाने के लिये भी देखा जा सकता है। यह केतु मानसिक रूप से भीअपनी सहायता को देने वाला माना जाता है और जीवन मे जो भी सहायक कार्य है उन्हे करने के लिये भी देखा जा सकता है। संतान मे यह दूसरे नम्बर की संतान का रूप भी समझा जा सकता है और पुत्री संतान के प्रति भी अपनी भावना को रखता है।

जातक एक शिक्षक के रूप मे भी जाना जा सकता है जो लोगो को आधुनिक युग मे विभिन्न प्रकार की मशीनोको उपयोग मे लाने का रूप बताये,जो लोग विद्या से जुडे है उनके लिये कार्य करने का रूप भी प्रस्तुत करता है,साथ ही कालेज शिक्षा मे कार्य को करने का रूप भी दे सकता है जो राजनीति से सम्बन्धित विषयों की जानकारी कानूनी जानकारी और विदेशी परिवेश से जुडी जानकारी को प्रदान करना जानता हो,एक संत जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के बिना अपनी सहायता को सेवा के रूप मे लोगों को प्रदान करे भी माना जा सकता है। शनि अपनी नजर से की जाने वाली सेवा से जीवन यापन के लिये कार्य करना भी माना जाता है साथ ही प्लूटो के साथ होने से वह उतना धन नही इकट्ठा कर पाता है जो जीवन मे धन का मोह रखने वाले करते है और बिना उपयोग मे लाये मर जाते है। चन्द्रमा का ग्यारहवे भाव मे होना जातक को उतना ही लाभ दे पाता है जो अपने शरीर की पूर्ति कर ले और कहने के लिये तो उसके कोई भी काम नही बिगडते है जो भी कार्य होता है वह मित्रो की सहायता से पत्नी की सहायता से साथ मे चलने वाले दो लोगो से जो मित्रता की सीमा मे ही होते है के प्रति माना जा सकता है। आचार्य राजेश कुमार

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-6 मेडिकल एस्ट्रोलॉजी

https://wp.me/p8Sg50-1IH
स्वास्थ्य मनुष्य के लिए ईश्वर का दिया हुआ सबसे अमूल्य और दिव्य उपहार है। अपने शरीर को स्वस्थ रखना मनुष्य का कर्तव्य है अन्यथा मनुष्य अपने मन और अपनी सोच को शुद्ध व पवित्र नहीं रख सकता।
        यह स्वास्थ्य मनुष्य की पूँजी है। शरीर स्वस्थ होता है तो मनुष्य सभी कार्य उत्साह से करता है। यदि यही शरीर रोगी हो जाए या अपंग हो तो मनुष्य अपने स्वयं के कार्य करने में असमर्थ हो जाता है तो घर-परिवार व भाई-बन्धुओं के प्रति अपने कर्त्तव्यों को चाहकर भी पूरा नहीं कर सकता। मित्रों पिछली पोस्ट में हमने कुछ चर्चा हदयरोग पर की यह पोस्ट भी उसी पर आधारित है आप खुद पढ़े और शेयर करे ताकि दुसरे भी लाभ ले सकें आचार्य राजेश
     तरबूज शायद आप सभी ने खाया होगा। देखने में गोल काले और हरे रंग का होता है,धारियां भी होती है हरे पर काली और काले पर सफ़ेद,बैरायटी में छोटे छोटे और सफ़ेद रंग के भी होते है। तरबूजों की खेती को गर्मी के दिनों किया जाता है और अक्सर नदियों के किनारे या खेतों में इसकी फ़सल पैदा की जाती है। शनि मंगल को अगर मिट्टी के रूप में देखे तो वह पकी ईंट के रूप में माना जायेगा। लाल पत्थर जिसे अंग्रेजी में लिगनाइट के रूप में जाना जाता है और सीमेन्ट फ़ैक्टरी जिसे सीमेन्ट बनाने के लिये प्रयोग में लेती है को भी आपने देखा होगा,अगर आपका टूर कभी जोधपुर की तरफ़ लगा हो तो सभी मकान लाल पत्थर से ही बने है,आगरा से आगे तातपुर का लालपत्थर काफ़ी मसहूर है। यह पत्थर तो अष्टम शनि मंगल की निशानी है और गर्मी के मौसम में आने वाली पीली आन्धी बारहवें शनि मंगल की निशानी है था तरबूज चौथे शनि मंगल की निशानी है। शनि मंगल के साथ अगर चन्द्रमा जुड जाता है तो वह शनि मंगल को पानी के आकार में बदल देता है,वह पानी का आकार अगर पृथ्वी के नीचे से निकलता है तो अष्टम में जाना जाता है और मंगल की अधिकता में वह ज्वालामुखी का लावा बन जाता है अन्यथा वह शनि की अधिकता में लाल पत्थर ही बन कर रह जाता है। छठे भाव का चन्द्रमा अस्पताली पानी अष्टम का चन्द्रमा कुये का पानी और बारहवा चन्द्रमा आसमानी पानी यानी बरसात के लिये जाना जाता है। यह सब बातें तो बाह्य वातावरण के लिये बतायी गयी है लेकिन शरीर के अन्दर जब इन्हे देखा जाये तो छठा मन्गल शनि और चन्द्रमा अस्पताल में बीमारी के दौरान चन्द्रमा जो ह्रदय का मालिक है और शनि मंगल जो ह्रदय में जमने वाले खून के थक्के के रूप में है को दूर करने के लिये आपरेशन के दौरान मौत देने के लिये माना जाता है,यह जानबूझ कर उम्र की तीसवीं साल से गलत कार्यो को करने से गलत आचार विचार और व्यवहार रखने से सामने आता है,मंगल खून का कारक है और शनि गन्दगी का कारक है चन्द्रमा जो मन का कारक है वह मारकाट फ़रेब ठगी लूटपाट के कामो में लगा रहता है तो कभी डर से कभी उल्टा सीधा खानपान से शरीर में बीमारी को पैदा करने वाला माना जाता है। मकान में दबने से जमीन के नीचे काम करते वक्त दबने से ट्रेन दुर्घटना में मरने से तथा सिर के बल गिरने के बाद सिर के फ़टने से जो मौत होती है वह अष्टम शनि मंगल के रूप में जाना जाता है,यह कारक अक्सर जननांग के अन्दर केंसर आदि के लिये भी जाना जाता है। शनि मंगल चन्द्रमा के साथ जब बारहवें भाव में होता है तो जातक के लिये सडक दुर्घटना में वायुयान की दुर्घटना में ऊंचे स्थान से गिरने पर और हवाई कारणों से सिर के फ़टने से मौत का होना माना जाता है,यह सिर के केंसर का रूप भी होता है और यह हाईपर टेन्सन रखने वालों के लिये भी माना जाता है।इस प्रकार की ग्रह युति से बचने के लिये पहले गलत कार्यों के प्रति सोच को बन्द कर दिया जाये,आज की जरूरत के लिये किसी के कल को नही खराब किया जाये,जोर जबरदस्ती से चोरी से फ़रेबी से डकैती आदि के कारणो से दूर रहा जाये,तो छठे भाव के मंगल शनि और चन्द्रमा से मुक्ति मिल सकती है,गुप्त रूप से किसी की हत्या करना जानवरों के शरीर को भोजन के रूप में प्रयोग करना मैथुन में अनैतिकता को लाना आदि बाते अष्टम शनि मन्गल और चन्द्रमा की युति से जानी जाती है,जल्दी से गुस्सा हो जाना किसी की जायदाद को जबरदस्ती हथिया लेना धर्म स्थान पर जबरदस्ती कब्जा कर लेना,जेल या बन्धन में किसी बडी सजा को भुगतना,अपने ही खून के साथ गलत सम्बन्ध बनाना आदि बारहवें शनि मन्गल और चन्द्रमा की निशानी है,इन कारणॊ से बचने के लिये इन कारणों से बचना चाहिये। इसके अलावा शनि मंगल चन्द्रमा की युति से बचने के लिये पहाडी स्थानों की यात्रा अगर शनि मंगल चन्द्रमा छठे भाव में है तो और गर्म प्रदेशों की यात्रा अगर शनि मंगल चन्द्रमा अष्टम में है तो और शनि मंगल चन्द्रमा के लिये संयुक्त रूप में मंत्र जाप तथा दक्षिण पूर्व की देवी यात्रा जो माता कामाख्या काली और तारापीठ के नाम से जानी जाती है की जाये तो लाभ मिलता है,इसके अलावा नीलम मूंगा मोती का बना हुआ पेन्डल अगर बारहवें भाव में है तो और छठे भाव के लिये इन रत्नों को उंगलियों में धारण करना तथा दान करना अगर अष्टम भाव में है तो भी लाभदायक रहता है,रत्नो की अनुपस्थिति में इन ग्रहों की कारक वस्तुओं को प्रयोग में लाया जाता है,जैसे शनि के लिये राई मन्गल के लिये मिर्ची और चन्द्रमा के लिये चापड छठे भाव के चन्द्रमा के लिये प्रयोग कर सकते है,शनि के लिये खेजडी की जड मंगल के लिये नीम की जड और चन्द्रमा के लिये बिदारीकंद की जड को आठवें भाव के लिये प्रयोत में ले सकते है,शनि के लिये सिर के बाल मंगल के लिये शक्कर के बने बतासे और चन्द्रमा के लिये बारिस के जल को प्रयोग कर सकते है।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-5 medical astrology

https://wp.me/p8Sg50-1IH   
मित्रोंआज की पोस्ट भी हम हदयरोग पर ही करेंगे हमारीकिसी विषय पर हमारी पिछली पोस्ट है आप पढ़ सकते हैं
 मित्रों हमारे ऋषि-मुनि कह गए हैं, 'पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख जेब में हो माया।' यदि काया अर्थात शरीर रोगी है तो आप धन कैसे कमाएंगे। यदि पहले से ही अपार धन है तो वह किसी काम का नहीं। धन से कोई रोग नहीं मिटता है। शरीर स्वस्थ और सेहतमंद है तभी तो आप जीवन का आनंद ले सकेंगे। घुमना-फिरना, हंसी-मजाक, पूजा-प्रार्थना, मनोरंजन आदि सभी कार्य अच्छी सेहत वाला व्यक्ति ही कर सकता है। अत: इसे समझना जरूरहै। एक कहावत जब से होश सम्भाला है सुनता आया हूँ संसार में सबसे बलवान पानी है,और सबसे कमजोर गाय है। सन्तान के लिये माता का ह्रदय है और पति पत्नी के लिये आपसी सामजस्य है,इनकी मजबूती के लिये वैदिक काल से ही इनकी मजबूती का कारण बताने की बातें चलती आयी है। पानी की रक्षा नही की जायेगी,फ़ालतू में बहते हुये पानी को नही संभाला गया तो एक दिन प्यास से जीवन की हानि हो सकती है,गाय को नही सम्भाला गया और इसी प्रकार से दुर्दशा होती रही तो एक दिन आने वाली पीढी दूध के बिना बहुत कमजोर हो जायेगी,माता का ह्रदय अगर सन्तान ने नही समझा तो उसे बुढापे में माता के आक्रोस रूपी श्राप को अपनी सन्तान के द्वारा झेलना पडेगा,पति और पत्नी के बीच का सामजस्य नही बना तो एक दिन गृहस्थी बरबाद होनी निश्चित है। लगनेश का कमजोर होना इन सभी बातों के लिये जिम्मेदार माना जाता है,लगन को शरीर का मालिक बताया गया है और जो राशि लगन में है उसके मालिक को लगनेश कहा जाता है,लगनेश अगर बीमारी के भाव मे है या अपमान के भाव मे है या अपने को दुनियादारी के भाव से दूर रखकर बैठा है तो उपरोक्त सभी कारणॊं को झेलना तो पडेगा ही। लगनेश के कमजोर होते ही बाकी के ग्रह वह चाहे मित्र हो या शत्रु हों,सभी शरीर पर अपने आप हावी होने लगेंगे और रास्ते के छोटे छोटे पत्थर भी दुश्मन बनने लगेंगे। जिन्हे अपना समझा गया है वे ही अपने आप पराये होने लगेंगे जिनसे कुछ प्राप्त करने की आशा की जायेगी वे ही पास से और ले जायेंगे,यह सब लगनेश की कमजोरी से से ही जाना जाता है। ऊपर दी गई कुंडली में लगनेश बीमारी कर्जा दुश्मनी नौकरी के भाव में विराजमान है,यही भाव माता के दिखावे का है,यही भाव पिता के पूर्वजों का है,यही भाव पुत्र वधू के अपमान का है,यही भाव बडे भाई और मित्रों के लिये अपमान देने का है। इस भाव के कारकों में माता की छोटी बहिन पिता के द्वारा पूजे जाने वाले देवताओं और धर्म तथा पिता के द्वारा प्रयोग में लिये गये भाग्य के कारणों को भी जाना जाता है। प्राप्त की गयी विद्या का प्रयोग प्रयोग किये जाने वाले वाहन का बाहरी प्रदर्शन और मेक अपने मेक अप के सामान और पहने जाने वाले कपडों को रखा जाने वाला स्थान,कार्य करने के बाद जो धन आदि प्राप्त हुया है उसके लिये प्रयोग में लाये जाने वाले जोखिम का स्थान कार्य के बाद प्राप्त की गयी पूंजी को जमा करने वाली बैंक आदि का नाम और स्थान सी भाव से जाना जाता है। इस भाव से जीवन साथी के लिये खर्च करने का कारण जीवन साथी के आराम करने का स्थान,जीवन साथी के द्वारा यात्रा आदि करने का कारण भी इसी भाव से जाना जाता है। उपरोक्त कारणों में जाते ही जातक के लिये जमा ताकत को खर्च करना या जमा ताकत को प्रयोग में नही लिया जाना अथवा रोजाना के कार्यों में जमा ताकत को खर्च करते जाना आदि के लिये भी जाना जाता है। इस भाव का एक रूप पानी वाले साधन के लिये बाहरी बनावट और मकान में जिसमें रहते है उसकी बाहरी बनावट सजावट और नाम आदि के लिये भी जाना जाता है। लगनेश की शक्ति इन सभी बातों के अन्दर कमजोर होने की बात ही मानी जा सकती है। जब लगनेश कमजोर है तो रहने वाले स्थान में राहु रूपी इन्फ़ेक्सन का पैदा होना आमवात है। उपरोक्त कुंडली में राहु का स्थान कर्क राशि में चौथे भाव में है,यहां राहु पीने वाली पानी के अन्दर इन्फ़ेक्सन पैदा करने के लिये जाना जायेगा उसका कारण दसवे भाव में सूर्य के होने से पानी के अन्दर लकडी पत्ते जीवाश्मो के जाने से ही होगा। इस इन्फ़ेक्सन का प्रभाव सीधा ह्रदय पर तब पडना चालू होगा जब जुकाम खांसी फ़ेफ़डों के इन्फ़ेक्सन कफ़ का अधिक बनना आदि पाया जायेगा। इसके अलावा रहने वाले मकान में उत्तर दिशा में शौचालय का निर्माण किया जायेगा और दक्षिण दिशा में रोशनी का प्रयोग किया जायेगा। कार्य करने का स्थान सरकारी होगा तो भी राहु का इन्फ़ेक्सन बैठने वाले स्थान में एसी आदि के लगे होने और सरकारी ठेकों से की जाने वाली सफ़ाई आदि के लिये जिम्मेदार माना जायेगा। यह तब और अधिक प्रभावी होगा जब सरकारी कार्यालयों में शिक्षा चिकित्सा वाहनो अन्य सरकारी विभागों के लिये भवनों की देख रेख का काम सडक और पुल आदि के निर्माण के काम किये जाते होंगे। इसके अलावा जो लोग वाहनों की देख रेख करने वाले होंगे और पेट्रोल डीजल गैस आदि के घेरे में रहते होंगे। जो लोग ट्रेफ़िक पुलिस में काम करते होंगे या दिन भर सडकों पर अपने कार्यों को करने के लिये बाध्य होंगे। स्कूली शिक्षा को देने वाले होंगे या स्कूलों में ही अपने निवास को बनाये रखने वाले होंगे। इस राहु का सीधा असर मंगल पर जा रहा है और जातक को अस्पताली कारणों से पीने वाली दवाइयों को जिनके अन्दर खांसी आदि से दूर रहने के लिये एल्कोहल आदि का प्रयोग करना पडता होगा भी ह्रदय की धमनियों को कम करने या अधिक फ़ुलाने के लिये मानना पडेगा। एक कहावत और भी कही जाती है कि "झगडे की जड हांसी और रोगों की जड खांसी",अर्थात झगडे का कारण हंसना होता है और रोगों के पनपने का कारण खांसी का बढना होता है। राहु और कमजोर लगनेश के कारण इस कुंडली में सूर्य जो कार्य स्थान में है कमजोर हो गया है।इस युति से बचाव का रास्ता अपने को उपरोक्त कार्यों में जाने के बाद जलवायु से सुरक्षित रखना,इसके अलावा अगर इस प्रकार के कार्य करने को मिल रहे है और उन कार्यों के बाद शरीर में जुकाम आदि का प्रभाव कम नही हो रहा है तो उस प्रकार के कार्यों को बन्द करने के बाद दूसरे कार्यों को करने का उपाय सोचना चाहिये। पहला सुख जब निरोगी काया, के अनुसार कार्य तो और भी मिल जायेंगे लेकिन लोभ के कारण इन कार्यों को करने के बाद शरीर का सत्यानाश हो गया तो आगे कार्य भी नही कर पाओगे और दुनिया से जल्दी कूच करने का बहाना भी बन जायेगा। राहु से बचने के लिये केतु का उपाय उसी प्रकार से कारगर है जैसे तेजाब की बाल्टी से किसी वस्तु को निकालने के लिये संडासी का प्रयोग,बिजली के तार को पकडने के लिये इन्सूलेटेड प्लास की जरूरत,राहु के लिये केतु का उपाय किया जाता है और केतु के लिये राहु के उपाय अगर दोनो में से कोई एक जीवन में शैतानी करने के लिये अपनी शक्ति का प्रयोग कर रहा हो तो। जब चौथे भाव में राहु है तो दसवें भाव में केतु का होना जरूरी है,यह उसी प्रकार से है जैसे कोई समस्या बनी है तो समस्या का समाधान भी उसकी उल्टी दिशा में समस्या के ठीक 180 की डिग्री में होगा। केतु के लिये रहने वाले स्थान में कुत्ता पालना,शरीर की सेवा के लिये नौकर का रखना,आफ़िस आदि में प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं को नंगे हाथों से नही पकड कर पकडने वाले साधनों से पकडना। जो भी इन्फ़ेक्टेड स्थान है वहां से भोजन पानी वायु के लिये शुद्ध स्थान का प्रयोग करना आदि उपाय किये जा सकते है,राहु को कन्ट्रोल में रखने के लिये और लगनेश को बली करने के लिये चौथे भाव के राहु के विरुद्ध में स्थापित केतु की राशि के अनुसार के रंग की लहसुनिया,लगनेश की लगन के अनुसार रंग का रत्न और भाग्य के रत्न को आपस में मिलाकर प्रयोग करना जरूरी होता है। मित्रों आप में से बहुत से लोग फोन पर मेरे से रत्नों के बारे में पूछते हैं कि मैं कौन सा रतन पर मित्रों रतन का चुनाव करने के लिए कुंडली को बहुत गहराई से देखना पड़ता है जांच ना पड़ता है अतः आप अपनी कुंडली अगर आप मुझसे दिखाना चाहते हैं या बनवाना चाहते हैं अगर आपको कोई समस्या है तो उसका उपाय चाहते हैं तो आप मुझसे मेरे नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं । आचार्य राजेश

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-4 medical astrology

 ज्योतिष द्वारा रोग निदान की विद्या को चिकित्सा ज्योतिष भी कहा जाता है। इसे मेडिकल ऍस्ट्रॉलॉजी (Medical Astrology), नैदानिक ज्योतिषशास्त्र (Clinical Astrology) भी कहा जा सकता है। यदि समय रहते इनका चिकित्सकीय एवं ज्योतिषीय उपचार दोनों कर लिए जाएं तो इन्हें घातक होने से रोका जा सकता है। Cकाल पुरुष की कुंडली में हृदय का प्रतिनिधित्व कर्क और सिंह राशियां करती हैं और हृदय का मुख्य स्थान चतुर्थ भाव, नव ग्रहों में सूर्य सृष्टि का जीवनाधार है और यही हृदय की धड़कन का कारक है। यदि जन्मकुंडली में कर्क और सिंह राशियां, चतुर्थ भाव, सूर्य और चंद्र बलवान एवं शुभ ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों, तो व्यक्ति को हृदय रोग नहीं होता। इसके विपरीत यदि ये सभी कमजोर हों, तो व्यक्ति को निश्चय ही जीवन में हृदय संबंधी कोई न कोई रोग होगा।हदय के रोग का कारक ग्रह सूर्य है तो मंगल रक्त संचार को नियंत्रित करता है। शनि रोगों का द्योतक है।कुंडली में बहुत से ऐसे योग है जो कि लग्न के लिए अलग-अलग हैं परंतु मुख्यत: दिल की बीमारी सूर्य-शनि और दिल का दौरा शनि-मंगल देते हैं[05/10, 21:11] Acharya Rajesh: ज्योतिष द्वारा रोग निदान की विद्या को चिकित्सा ज्योतिष भी कहा जाता है। इसे मेडिकल ऍस्ट्रॉलॉजी (Medical Astrology), नैदानिक ज्योतिषशास्त्र (Clinical Astrology) भी कहा जा सकता है। यदि समय रहते इनका चिकित्सकीय एवं ज्योतिषीय उपचार दोनों कर लिए जाएं तो इन्हें घातक होने से रोका जा सकता है। Cकाल पुरुष की कुंडली में हृदय का प्रतिनिधित्व कर्क और सिंह राशियां करती हैं और हृदय का मुख्य स्थान चतुर्थ भाव, नव ग्रहों में सूर्य सृष्टि का जीवनाधार है और यही हृदय की धड़कन का कारक है। यदि जन्मकुंडली में कर्क और सिंह राशियां, चतुर्थ भाव, सूर्य और चंद्र बलवान एवं शुभ ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों, तो व्यक्ति को हृदय रोग नहीं होता। इसके विपरीत यदि ये सभी कमजोर हों, तो व्यक्ति को निश्चय ही जीवन में हृदय संबंधी कोई न कोई रोग होगा।हदय के रोग का कारक ग्रह सूर्य है तो मंगल रक्त संचार को नियंत्रित करता है। शनि रोगों का द्योतक है।कुंडली में बहुत से ऐसे योग है जो कि लग्न के लिए अलग-अलग हैं परंतु मुख्यत: दिल की बीमारी सूर्य-शनि और दिल का दौरा शनि-मंगल देता है कर्क राशि का शनि होता है तो जातक के लिये दूसरों की भावना को समझना बहुत मुश्किल की बात होती है। अक्सर आपका वास्ता उन लोगों से भी पडा होगा जिन लोगों के मन में अपने ही दोस्तों अपने ही बडे भाई या बडी बहिनों अथवा काम करने के बाद दी जाने वाली कमाई के प्रति नुक्ताचीनी करने के बाद राजनीतिक बल से तुरत ही विभूषित कर दिया जाता है,वास्तव में यह कोई जातक की कमी से नही होता है,यह बात तभी मानी जाती है जब जातक का जन्म चौदह फ़रवरी से चौदह मार्च के बीच में हुआ होता है। उस समय जलवायु के अन्दर बसन्ती बयार का चलना माना जाता है और मौसम की जवानी जातक के लिये सहायक होती है। राजनीति का एक खेल और समझा जा सकता है कि राजनीति तभी होती है जब पेट भरा हो,जब तक जातक को भूख लगी है वह रूखा सूखा ठंडा गर्म सभी प्रकार का भोजन बडे आराम से कल लेगा,जैसे ही पेट भरा और कोई भोजन वाली वस्तु सामने आयी तो उसके अन्दर कई तरह की राजनीति सामने आने लगेगी जैसे नमक कम या अधिक है,मिर्च कम या अधिक है कम पकाया गया है या जला दिया गया है आदि। इसी प्रकार की राजनीति का प्रभाव जातक के इस समय में जन्म लेने के बाद पडता हुआ देखा जाता है,जितने भी छिद्रान्वेषी पैदा हुये है अगर इतिहास को उठाकर देखा जाये तो इसी काल में पैदा होने वाले व्यक्ति मिलेंगे। लेकिन इस समय में जो जातक किसी कारण से कर्क के शनि से आच्छादित युति में पैदा हुये है,मलिन या गन्दी बस्तियों मे पैदा हुये है,पानी को पाटकर बनाये हुये घरों में पैदा हुये है,अथवा खेती किसानी या जनता से जुडे समाज में पैदा हुये है उनके दोस्त तो राजनीति में विराजमान मिलेंगे और वे उनकी दोस्ती से अपने लिये कार्य भी जुटा लेंगे लेकिन उनके लिये ही काट करने से नही चूकेंगे। यह द्रश्य तो जातक के बाहरी जीवन के लिये देखा जा सकता है लेकिन उनके शरीर में जो प्रभाव यह ग्रह युति देती है वह जातक के कठोर स्वभाव से जातक की जडता वाली बुद्धि से शिक्षा को कम लेने के कारण या सीखने के लिये पढने के बजाय करने वाली बुद्धि का प्रयोग करने से माना जाना बेहतर समझने का कारण बनता है। शनि को कंट्रोल करने के लिये प्राय: दो ग्रहों का उपयोग अदिक किया जाता है एक सूर्य और दूसरा मंगल। जब शनि की अष्टम द्रिष्टि में सूर्य या मंगल आजाते है तो वे शनि पर अपना अधिकार नही रख पाते है,और शनि अपने द्वारा सूर्य और मंगल को प्रताणित करता रहता है। शनि से अष्टम में जाकर सूर्य बेबस हो जाता है,साथ ही मंगल को जो गर्म लोहे के पिंड की भांति है अगर शनि की ठंडी पर्त में दबा दिया जायेगा तो वह अपनी गर्मी को कैसे प्रदान कर सकता है,उसी प्रकार से जब सूर्य की रोशनी को शनि के अन्धेरे में दबा दिया जायेगा तो सूर्य भी बेवस हो जायेगा। इस बेबसता को ही जातक के लिये ह्रदय वाली बीमारी के रूप में भी जाना जा सकता है,सबसे अधिक प्रभाव जातक की आंखों की रोशनी पर पडता है उसके बाद जातक की पाचन क्रिया बेकार हो जाती है और गले में हमेशा कफ़ की खडखडाहट सुनने को मिलती रहती है। सूर्य शनि के लिये कुछ करने से इसलिये असमर्थ होता है कि वह जातक के ग्यारहवें भाव में है और उसे इसी शनि से अपने रोजाना के कामों के लिये काम चलाना है,यह भाव साधारण व्यक्ति के लिये माना जाता है लेकिन जो राजनीति में है उनके लिये माना जाता है कि उन्हे उसी जनता की बदौलत ही सीट मिलती है और उसी जनता के प्रति कोई गलत काम करते है या गर्मी दिखाते है तो वह जनता बिदक गयी तो अगले चुनाव में उसकी हार भी मानी जा सकती है। व्यापारी या सरकारी नौकरी में विराजमान लोग भी इसलिये असमर्थ है कि उन्ही कर्मचारियों से उन्हे काम भी लेना है और उन्ही की बदौलत वे अपने कार्यों में सफ़ल है तो वे किसलिये इस शनि से पंगा लेने चले। ह्रदय की बीमारी में राहु शनि और केतु अगर सूर्य चन्द्र पर अपनी अष्टम द्रिष्टि डालता है तो वह जातक के लिये ग्रहों की युति के अनुसार खतरनाक माना जाता है।इस युति से जातक को अगर ह्रदय वाली बीमारी से बचना है तो जातक को अपने रोजाना के कार्यों को खुद ही करना चाहिये। हर काम में काम करने वाले को अपने आसपास नही रखना चाहिये,अक्सर गर्मी के दिनो में लोग बर्फ़ का पानी पीते है और ठंड के दिनों में ठंडे पानी से नहाते है अपने हाथों को ठंडे पानी में रखते है या गले को कानो को खोल कर चलते है उनके लिये इस ग्रह युति का प्रभाव ह्रदय रोग को पैदा करने के लिये माना जाता है। इस युति में जातक को मूली छाछ और स्विन्ग पूल में नहाने का शौक होता है,यह तीनो ही एक समय में प्रयोग करने का मतलब है कि ह्रदय रोग को बुलावा देना। और सूर्य शनि की युति यानी सुबह शाम में अगर इन कारकों का प्रयोग किया जाता है तो भी जातक को ह्रदय रोग की बीमारी से बचाया नही जा सकता है। इस युति वाले जातकों को कभी ठंडे कमरे में और अन्धेरे में नही सोना चाहिये,सोने वाले पलंग पर हमेशा गुलाबी रंग की चद्दर और कमरे के पर्दे गुलाबी रंग के होने चाहिये,पूजा में दीपक का जलाना भी जरूरी है,राहु की चीजे जैसे अगरबत्ती चलाना धूल वाली जगह पर नही जाना सुबह के समय झाडू लगाते समय नाक को बन्द रखना इस रोग में सहायता देने के लिये माना जाता है,इस युति वाले जातक को सूर्य का रत्न माणिक को भी पहिनना जरूरी है
लेकिन सामान्य माणिक इस शनि की युति को रोकने में असमर्थ मानी जाता है इसके लिये जातक को दोपहर के सूर्य का कारक स्टार या तुरका रूबी को ही पहिनना चाहिये,इस रूबी की खास पहिचान है कि किसी भी प्रकार की रोशनी में जाने पर इसमे से किरणे निकलती है जो प्रत्यक्ष रूप से साफ़ दिखाई देती है। अपने द्वारा किसी भी प्रकार की जानकारी के लिये फोन कर सकते है। अपनी संघ जन्म तारीख और समय के अनुसार अपनी बीमारी के लिये भी बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से पता कर सकते है।

कर्क राशि का शनि होता है तो जातक के लिये दूसरों की भावना को समझना बहुत मुश्किल की बात होती है। अक्सर आपका वास्ता उन लोगों से भी पडा होगा जिन लोगों के मन में अपने ही दोस्तों अपने ही बडे भाई या बडी बहिनों अथवा काम करने के बाद दी जाने वाली कमाई के प्रति नुक्ताचीनी करने के बाद राजनीतिक बल से तुरत ही विभूषित कर दिया जाता है,वास्तव में यह कोई जातक की कमी से नही होता है,यह बात तभी मानी जाती है जब जातक का जन्म चौदह फ़रवरी से चौदह मार्च के बीच में हुआ होता है। उस समय जलवायु के अन्दर बसन्ती बयार का चलना माना जाता है और मौसम की जवानी जातक के लिये सहायक होती है। राजनीति का एक खेल और समझा जा सकता है कि राजनीति तभी होती है जब पेट भरा हो,जब तक जातक को भूख लगी है वह रूखा सूखा ठंडा गर्म सभी प्रकार का भोजन बडे आराम से कल लेगा,जैसे ही पेट भरा और कोई भोजन वाली वस्तु सामने आयी तो उसके अन्दर कई तरह की राजनीति सामने आने लगेगी जैसे नमक कम या अधिक है,मिर्च कम या अधिक है कम पकाया गया है या जला दिया गया है आदि। इसी प्रकार की राजनीति का प्रभाव जातक के इस समय में जन्म लेने के बाद पडता हुआ देखा जाता है,जितने भी छिद्रान्वेषी पैदा हुये है अगर इतिहास को उठाकर देखा जाये तो इसी काल में पैदा होने वाले व्यक्ति मिलेंगे। लेकिन इस समय में जो जातक किसी कारण से कर्क के शनि से आच्छादित युति में पैदा हुये है,मलिन या गन्दी बस्तियों मे पैदा हुये है,पानी को पाटकर बनाये हुये घरों में पैदा हुये है,अथवा खेती किसानी या जनता से जुडे समाज में पैदा हुये है उनके दोस्त तो राजनीति में विराजमान मिलेंगे और वे उनकी दोस्ती से अपने लिये कार्य भी जुटा लेंगे लेकिन उनके लिये ही काट करने से नही चूकेंगे। यह द्रश्य तो जातक के बाहरी जीवन के लिये देखा जा सकता है लेकिन उनके शरीर में जो प्रभाव यह ग्रह युति देती है वह जातक के कठोर स्वभाव से जातक की जडता वाली बुद्धि से शिक्षा को कम लेने के कारण या सीखने के लिये पढने के बजाय करने वाली बुद्धि का प्रयोग करने से माना जाना बेहतर समझने का कारण बनता है। शनि को कंट्रोल करने के लिये प्राय: दो ग्रहों का उपयोग अदिक किया जाता है एक सूर्य और दूसरा मंगल। जब शनि की अष्टम द्रिष्टि में सूर्य या मंगल आजाते है तो वे शनि पर अपना अधिकार नही रख पाते है,और शनि अपने द्वारा सूर्य और मंगल को प्रताणित करता रहता है। शनि से अष्टम में जाकर सूर्य बेबस हो जाता है,साथ ही मंगल को जो गर्म लोहे के पिंड की भांति है अगर शनि की ठंडी पर्त में दबा दिया जायेगा तो वह अपनी गर्मी को कैसे प्रदान कर सकता है,उसी प्रकार से जब सूर्य की रोशनी को शनि के अन्धेरे में दबा दिया जायेगा तो सूर्य भी बेवस हो जायेगा। इस बेबसता को ही जातक के लिये ह्रदय वाली बीमारी के रूप में भी जाना जा सकता है,सबसे अधिक प्रभाव जातक की आंखों की रोशनी पर पडता है उसके बाद जातक की पाचन क्रिया बेकार हो जाती है और गले में हमेशा कफ़ की खडखडाहट सुनने को मिलती रहती है। सूर्य शनि के लिये कुछ करने से इसलिये असमर्थ होता है कि वह जातक के ग्यारहवें भाव में है और उसे इसी शनि से अपने रोजाना के कामों के लिये काम चलाना है,यह भाव साधारण व्यक्ति के लिये माना जाता है लेकिन जो राजनीति में है उनके लिये माना जाता है कि उन्हे उसी जनता की बदौलत ही सीट मिलती है और उसी जनता के प्रति कोई गलत काम करते है या गर्मी दिखाते है तो वह जनता बिदक गयी तो अगले चुनाव में उसकी हार भी मानी जा सकती है। व्यापारी या सरकारी नौकरी में विराजमान लोग भी इसलिये असमर्थ है कि उन्ही कर्मचारियों से उन्हे काम भी लेना है और उन्ही की बदौलत वे अपने कार्यों में सफ़ल है तो वे किसलिये इस शनि से पंगा लेने चले। ह्रदय की बीमारी में राहु शनि और केतु अगर सूर्य चन्द्र पर अपनी अष्टम द्रिष्टि डालता है तो वह जातक के लिये ग्रहों की युति के अनुसार खतरनाक माना जाता है।इस युति से जातक को अगर ह्रदय वाली बीमारी से बचना है तो जातक को अपने रोजाना के कार्यों को खुद ही करना चाहिये। हर काम में काम करने वाले को अपने आसपास नही रखना चाहिये,अक्सर गर्मी के दिनो में लोग बर्फ़ का पानी पीते है और ठंड के दिनों में ठंडे पानी से नहाते है अपने हाथों को ठंडे पानी में रखते है या गले को कानो को खोल कर चलते है उनके लिये इस ग्रह युति का प्रभाव ह्रदय रोग को पैदा करने के लिये माना जाता है। इस युति में जातक को मूली छाछ और स्विन्ग पूल में नहाने का शौक होता है,यह तीनो ही एक समय में प्रयोग करने का मतलब है कि ह्रदय रोग को बुलावा देना। और सूर्य शनि की युति यानी सुबह शाम में अगर इन कारकों का प्रयोग किया जाता है तो भी जातक को ह्रदय रोग की बीमारी से बचाया नही जा सकता है। इस युति वाले जातकों को कभी ठंडे कमरे में और अन्धेरे में नही सोना चाहिये,सोने वाले पलंग पर हमेशा गुलाबी रंग की चद्दर और कमरे के पर्दे गुलाबी रंग के होने चाहिये,पूजा में दीपक का जलाना भी जरूरी है,राहु की चीजे जैसे अगरबत्ती चलाना धूल वाली जगह पर नही जाना सुबह के समय झाडू लगाते समय नाक को बन्द रखना इस रोग में सहायता देने के लिये माना जाता है,इस युति वाले जातक को सूर्य का रत्न माणिक को भी पहिनना जरूरी है लेकिन सामान्य माणिक इस शनि की युति को रोकने में असमर्थ मानी जाता है इसके लिये जातक को दोपहर के सूर्य का कारक स्टार या तुरका रूबी को ही पहिनना चाहिये,इस रूबी की खास पहिचान है कि किसी भी प्रकार की रोशनी में जाने पर इसमे से किरणे निकलती है जो प्रत्यक्ष रूप से साफ़ दिखाई देती है।
अपने द्वारा किसी भी प्रकार की जानकारी के लिये फोन कर सकते है।
अपनीजन्म तारीख और समय के अनुसार अपनी बीमारी के लिये भी बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से पता कर सकते है। आचार्य राजेश कुमार

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-3 medical astrology


मित्रों इससे पहले भी मैं तीन पोस्ट बीमारी पर कर चुका हूं उसको आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं ।और यह पोस्ट भी उसी पर आधारित है। अगर अच्छी लगे तो शेयर करें ,   
ज्योतिष में रोग बीमारी जानने का विधान है। जन्मपत्री में ग्रहों की स्थिति तथा गोचर का प्रभाव बीमारी और उसके समाधान के स्पष्ट संकेत देता है। जीवन यापन में सजगता तथा ग्रहों की शांति से इन बीमारियों से बचा जा सकता है।हृदय सीने में बायीं तरफ, कालपुरुष कुंडली के चौथे भाव को दर्शाता है। मस्तिष्क भी चौथे भाव का आधिपत्य रखता है। हृदय रोग के निर्धारण में मस्तिष्क की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

चन्द्रमा चौथे भाव का कारक ग्रह है। इसकी कमजोर और दूषित अवस्था होने पर हृदय रोग की आशंका बढ़ जाती है। चन्द्रमा की स्वामी राशि कर्क है। कर्क राशि का शुद्ध एवं बलवान अवस्था में होना मस्तिष्क की स्वस्थता का प्रतीक है। साथ ही हृदय रोग की आशंका में कमी लाता है। कर्क राशि की बलवान स्थिति  व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में आशातीत बढ़ोत्तरी करती है।
कालपुरुष कुंडली में हृदय होने का गौरव अनुराधा नक्षत्र को प्राप्त है। और अनुराधा नक्षत्र शनि से संबंधित है कर्क राशि का शनि अक्सर जनता से जोड कर रखता है जातक के अन्दर भावना भावुकता से पूर्ण नही होती है इसका कारण है कि मन का पत्थर हो जाना और मन का ठंडा हो जाना। कोई भी व्यक्ति अपने उद्गारों को प्रस्तुत करने में असमर्थ होता उसे केवल कार्य करने वाले लोगों से सम्पर्क करना ही अच्छा लगता है वह अधिक से अधिक भौतिक जायदाद को इकट्ठा करने के लिये अपने मन को लगाये रहता है,पारिवारिक माहौल में उसे दर्द नही होता है कि उसके अमुक सदस्य को अमुक पीडा है,पीडा निवारण के लिये वह केवल डाक्टरी सहायता को देने की बात करता है,उसे भावनात्मक रूप से समझ नही होती है कि वह जिससे बात कर रहा है उसके प्रति अगर वह दो शब्द प्रेम से बोल देता है तो उसकी पीडा कम हो जायेगी। इस प्रकार के लोगों के लिये सीधी सी पहिचान होती है कि जातक कर्क के शनि से आच्छादित है,उसे भावना से अधिक कार्य की चिन्ता है उसका मन उसी प्रकार से जमा हुआ है जैसे पानी को जमाकर बर्फ़ बना दिया जाये। इस प्रकार के व्यक्ति के ह्रदय में जडता पैदा हो जाती है,और जब कर्क राशि के शनि के साथ कमजोर सूर्य का प्रभाव होता है यानी जातक का जन्म आधीरात के समय होता है,और जातक का जन्म जहां होता है वह स्थान ठडे स्थान के रूप में है,जन्म का समय भी जुलाई और अगस्त के बीच में होता है,इस प्रकार की युति जब कुंडली के अन्दर मिलती है तो जातक के लिये कठोर ह्रदय की बीमारी के रूप में जाना जाता है,जातक अपनी पीडा को भी प्रकट नही कर सकता है वह किसी दुख को दूर करने के लिये अपने बाहुबल को ही प्रयोग में लाता है और जब उसका बाहुबल टूट जाता है तो वह सीधा अस्पताल में चला जाता है जहां डाक्टर उसके ह्रदय की ओपन हर्ट सर्जरी के द्वारा या तो उसके ह्रदय में जमा गंदगी को साफ़ करते है या बन्द धमनियों को खोल कर प्लास्टिक के वाल्व डालते है। उपरोक्त कुंडली में शनि के साथ सूर्य और बुध का होना इसी बात का संकेत देता है,सूर्य से ह्रदय बुध से धमनिया और प्लास्टिक तथा शनि से कार्य।इस प्रकार की ग्रह युति से बचने के लिये और अपनी रक्षा के लिये जातक को कभी भी वातानुकूलित स्थानों में काम नही करना चाहिये,कारण जातक को सूर्य की धूप की उपयोगिता जरूरी है सूर्य जातक के शरीर से पसीने को बहायेगा तो जातक के ह्रदय में जमा गन्दगी खून के साथ निकलकर साफ़ होती रहेगी,दूसरे जातक को अपने कामुक स्वभाव में कन्ट्रोल करके रखना चाहिये जिससे उसके शरीर का सूर्य यानी वीर्य या रज सुरक्षित रहे और शरीर की कमजोरी में वह काम आये,अति कामुकता से बचने के लिये जातक को आहार विहार और रोजाना के कार्यों पर बल देना चाहिये,राजनीति से सम्बन्धित कार्यों पर या जनता से जुडे कार्यों को कम से कम करना चाहिये जिससे जनता के दुख और दर्द को बार बार महसूस करने के लिये उसे अपने ह्रदय पर अधिक जोर नही डालना पडे। सूर्य और शनि की युति मे जातक के पास सुबह और शाम के ही काम अधिक होते है बाकी समय वह अपने दिमाग को प्लान बनाने के लिये प्रयोग में लाता है अधिक सोचने के कारण जातक का ह्रदय कभी अधिक उत्तेजित होता है और कभी धीमा होता है इस प्रकार से सांसो की गति कम या अधिक बार बार होने लगती है,इस गति के साथ ह्रदय का कार्य कभी अच्छा और कभी बुरा होने लगता है,जब ह्रदय की गति में अधिक परिवर्तन होता है तो वह ह्रदय को बन्द करने केलिये काफ़ी होता है,इसे ही हार्ट अटैक की बीमारी कहा जाता है,जातक को सूर्य शनि की युति में बुध की उपस्थिति के लिये नवग्रह का बना पेन्डल अपने सीने से लगाकर रखना चाहियेण यह पेन्डलके मघ्य मानिक्य ओर दूसरे रतन आसपास और रतन सही क्रम में लगे हो
,कारण सूर्य और शनि पिता पुत्र की तरह से है और जहां सूर्य की सीमा समाप्त होती है वही से शनि की सीमा शुरु हो जाती है,साथ ही बुध भी अपनी गति को सूर्य और शनि के साथ बराबरी की सीमा में बान्ध कर रखता है,इस प्रकार से कोई एक ग्रह का प्रभाव इन ग्रहो की युति में फ़र्क नही दे पाता है,नवग्रह का पेन्डल  जब ह्रदय पर लटकता है तो जातक के अन्दर चलने वाले विचारों में स्थिरता आती है वह सोचता भी है और करता भी इस प्रकार से व्यक्ति की जीवन की अवधि बढ जाती है,जो व्यक्ति राजनीति में है या जो व्यक्ति जनता के साथ जुडकर जनता वाले कार्य कर रहे है अथवा जो लोग जनता के साथ मिलकर खरीद बेच का कार्य चांदी चावल तथा खेती से पैदा होने वाली जिन्स के प्रति अपने काम कर रहे है,अथवा जो लोग हाउसिंग सोसाइटी को बनाकर चला रहे है अथवा मकान को बनाकर बेचने का काम कर रहे है पानी वाले कार्यों को कर रहे है पानी वाले जहाज या नाव अथवा बोटिंग वाले काम कर रहे है उनके लिये यह स्वास्तिक बहुत फ़लदायी होता देखा गया है। मित्रों अगर आप भी अपनी कोई समस्या का उपाय चाहते हैं अपनी कुंडली दिखाना का बनवाना चाहते हैं तो आप हमारी वेबसाइट पर या हमारे नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं आचार्य राजेश कुमार

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

हदय रोग ओर ज्योतिषीय उपचार-2 medical Astrology

हदय रोग ओर ज्योतिषीय उपचार-www.acharyarajesh.in2 medical Astrology
मित्रों ज्योतिष और चिकित्सा का आपस में गहरा संबंध होता है। चिकित्सा से शरीर को रोग से मुक्त किया जाता है तो ज्योतिष से यह पता चल जाता है कि किस उम्र में किसे बीमारी घेर सकती है। ज्योतिष शरीर को निरोगी रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। 
शरीर पर चन्द्रमा का सीधा प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा 72 बीमारियों को नियंत्रित होती हैं। अगर चंद्रमा असंतुलित है तो आपको बीमारियां घेरेंगी। कुंडली में चंद्रमा के प्रभाव से बच नहीं सकते हैं। यदि चंद्रमा संतुलित रहे।           तो बीमारियों से बचा जा सकता है। 
शरीर के नौ साल्ट का नौ ग्रहों से संबंधित है शरीर में नौ प्रकार के साल्ट पाए जाते हैं, जो समान अनुपात में मिलते हैं। इनका सम्बंध नौ ग्रहों की उत्पत्ति से है। इसलिए ग्रहों का प्रभाव शरीर पर साफ पड़ता है।  साल्ट का असंतुलन नहीं होना चाहिए। स्वस्थ रहने के लिए ज्योतिष बेहद कारगर है। ज्योतिष यह बता सकने में सक्षम है कि एक बच्चे को किस आयु खंड में बीमारी घेर सकती है।  पृथ्वी पर जो कुछ है वह शरीर में है। अगर शरीर में 72 प्रतिशत जल है तो चन्द्रमा का भी इतना असर है। मित्रों हम बात हदयरोग पर कर रहे हैंअक्सर ह्रदय रोग इन स्थानो में अधिक पनपते है जहां पानी का इकट्ठा रहना माना जाता है जैसे हमेशा बहने वाली नदी के किनारे के स्थान समुद्री किनारों वाले स्थान तथा पहाडी घाटियों के बीच में या नीचे तलहटी में बसे हुये स्थान। इसके अलावा भी आज के जीवन की चलने वाली गतियों में मानव जाति के द्वारा की जाने वाली चिन्ता भी ह्रदय रोग का मुख्य कारण माना जा सकता है। चिन्ता के भी कारण तभी बनते है जब मानसिक गतियों का स्थिर नही रहना,जो भी काम किया जाता है उसके अन्दर किसी न किसी कमी के कारण अथवा किये जाने वाले काम के पूरे होने के समय में अचानक किसी भी प्रकार की कमी के कारण कार्य का बन्द हो जाना या काम की कीमत के मिलने के समय में अचानक काम की समाप्ति हो जाना भी ह्रदय रोग की मुख्य भूमिका मानी जाती है। ह्रदय का कारक चन्द्रमा है और चन्द्रमा को मन का कारक भी कहा जाता है,चन्द्रमा के साथ राहु के मिलने से मन के अन्दर आशंकायें बनी रहती है,और उन आशंकाओं या भ्रम से मन हमेशा उसी भ्रम के लिये चिन्ता मे बना रहता है,दूसरे चन्द्रमा के साथ मंगल होने से और चन्द्रमा तथा मंगल का साथ दु:स्थानों में होने से भी ह्रदय रोग की बीमारी का कारण जाना जाता है। ऊपर दी गई कुंडली में चन्द्रमा मंगल के साथ वृश्चिक राशि का है,इस राशि में विराजमान चन्द्रमा और मंगल अक्सर मृत्यु का कारण ह्रदय रोग से पीडित होने पर ही देते है।इसके लिये भी केतु की सहायता लेनी पडती है लेकिन इसके लिये लहसुनिया का रूप बदल जाता है,इस स्थान के चन्द्र मंगल वाली युति के जातकों को लहसुनिया स्लेटी रंग की जिसके अन्दर हल्की लालिमा हो को स्वर्ण में पहिना जाना ठीक रहता है।
ध्यान यह भी रखा जाता है कि इस स्थान पर चन्द्रमा का रूप या तो विधवा माता के रूप में हो जाता है अथवा माता का जन्म अपने भाई बहिनो में छोटे रूप मे होता है अथवा जातक के परिवार में ही ताई के रूप में माता का रूप होता है या ताई का जातक के साथ मानसिक रूप से अनबन का कारण भी बनता है,जातक का स्वभाव अपने ही भाई बहिनो के प्रति गलत बनता रहता है और जातक के अन्दर अपनी मानसिक द्वन्दता के कारण वह अपने ही लोगों के साथ तर्क करने के लिये अपने को हर समय तैयार रखता है जातक के अन्दर अपने ही भाई के साथ अपघात करने में कोई दिक्कत नही होती है वह किसी न किसी प्रकार से धन के रूप में समाज के रूप में परिवार के रूप में भाई के साथ घात करने के लिये अपनी मानसिकता को लगाये रखता हैजातक का मन रूपी चन्द्रमा जब शरीर से अधिक काम करने लगता है तो भी ह्रदय रोग के लक्षण मिलने लगते है,जैसे चन्द्रमा मिथुन राशि का होकर तीसरे भाव में आजाये,तो जातक अपने को भावुकता से काम करने वाला होता है वह अक्सर मन के अनुसार रोने लगता है मन के अनुसार हंसने लगता है मन के अनुसार रुष्ट हो जाता है मन के अनुसार गालिया देने लगता है और मन के अनुसार ही वह अपने को लेकर चलने वाला होता है अक्सर वे कलाकार जो नाटक आदि में काम करते है अपनी भावुकता से लोगों को हंसाने और रुलाने आदि का कार्य करते है उनके अन्दर इस प्रकार की बीमारी पायी जाती है,एक्टर अधिकतर इसी बीमारी का शिकार होते है,इसके साथ ही चन्द्रमा अगर कन्या राशि का होता तो जातक के अन्दर ह्र्दय की बीमारी का होना पाया जाता है,इसके लिये भी एक कारण बहुत ही चौंकाने वाला माना जाता है कि जातक अपनी छोटी उम्र में ही कामुकता की गिरफ़्त में आजाता है उसके द्वारा सोचे काम बन नही पाते है वह अपने किसी भी प्रयास में सफ़ल नही हो पाता है तो सीधा असर ह्रदय पर ही जाता है,वैसे भी छठा भाव चौथे का तीसरा है यानी अपने ह्रदय को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का कारण बनना,अपने रोजाना के कामों के अन्दर इस राशि वाले चन्द्रमा के लिये माना जाता है कि वह पानी वाले काम अधिक करता है जैसे साफ़ सफ़ाई करना लोगों के लिये सेवा वाले काम करना लोगों के प्रति अपनी भावनात्मक प्रस्तुति को देना आदि इसके अलावा चन्द्रमा जब अष्टम यानी वृश्चिक राशि का होता है तो जातक के अन्दर तकनीकी कला का विकास होना भी माना जाता है वह अक्सर रूहानी कार्यों के लिये अपने को लेकर चलने लगता है किसी भी क्षेत्र के कामो के अन्दर वह अपनी अन्तर्द्र्ष्टि को अधिक प्रयोग में लेने लगता है इस प्रकार से दिमाग में अधिक वजन पडता है और सांसों के अन्दर बदलाव आने लगता है तो भी जातक के ह्रदय पर असर पडना शुरु हो जाता है।
ईस प्रकार के चन्द्रमा वाले जातको को काले रंग की लहसुनिया को पहिनना चाहिये लेकिन यह लहसुनिया तांबे में पहिना जाना उचित है। तांबा मंगल की धातु है और इस धातु में अगर केतु को धारण किया जायेगा तो मानसिक गति जो बिगडती है उसके अन्दर कोई न कोई सहायक कारण बनने लगेगा और जातक के ह्रदय पर पडने वाले बोझ में कमी आजायेगी,इसके अलावा भी जातक को स्वभाव में परिवर्तन लाना जरूरी है जैसे तीसरे चन्द्रमा के लिये छोटी बहिन पर बुरा प्रभाव होगा जरूर लेकिन उसके लिये अगर पहले से ही सोच कर कार्य किये जायेंगे तोवह परेशानियों से बची रहेगी और दिमागी रूप में जातक के लिये ठीक रहेगा,इसके अलावा जातक को अपने कार्यों के अन्दर वे कार्य जो अक्समात हंसी या गमी की सीमा में आते हो नही करना चाहिये,उस स्वभाव मे कमी लानी चाहिये जिनके अन्दर आंखों में अधिक आंसू आते हो,इस बात को भी जान लेना आवश्यक है कि जिनके जल्दी आंसू आते है उनके लिये लो-ब्लड प्रेसर की बीमारी को जाना जाता है और जिनके आंसू आते ही नही है वे हाई-ब्लड प्रेसर के मरीज होते है।
अधिक जानकारी के लिए फोन कर सकते है।
अपने बारे में जानने के लिये बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से अपने प्रश्न को जन्म विवरण के साथ भेज सकते है.मित्रोआपशुल्क हमारे बैंक अकाउंट में ,pnb0684000100192346 IFC punb0068400 में या ह हमारा पेटीएम नंबर 7597718725पर या हमारे phone pay Google pay no 9414481324पर भेज सकते हैं परचार्य राजेश कुमार

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...