शनिवार, 11 जनवरी 2020

#शेयर बाजार – स्टॉक मार्केट #2020 वस्तु बाजार का व्यापार-विमर्श एवं विश्लेषण 2


मित्रों अपनी पिछली पोस्ट में मैंने जनवरी से लेकर अगस्त तक के मंदा तेजी बाजार के बारे में ग्रह गोचर  को देखकर लिखा है उसको भी आप पढ़ सकते हैं इस पोस्ट में सितंबर से लेकर दिसंबर 2020 तक की मंदा -तेजी की जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं September 2020#शेयर बाजार – स्टॉक मार्केट #2020 वस्तु बाजार का व्यापार-विमर्श एवं विश्लेषण 2
 सितंबर के महीने में मंदड़िये बाज़ार पर हावी रहेंगे, जिसकी वजह से इस महीने में मंदी रह सकती है। हालांकि, निरंतर उतार-चढ़ाव तेजड़ियों को एक संतुलन बनाए रखने में मदद करेगा। सितंबर 2020 में, यूरेनस और मंगल ग्रह मेष राशि में, बृहस्पति, केतु और प्लूटो ग्रह धनु राशि में, शुक्र ग्रह कर्क राशि में, शनि ग्रह मकर राशि में, राहु ग्रह मिथुन राशि में और नेप्च्यून ग्रह कुंभ राशि में स्थित रहेंगे। इस महीने की 2 तारीख को भाद्रपद पूर्णिमांत, आश्विन अमात और कन्या संक्रांति है- ये तीनों ज्योतिषीय घटनाएँ एक शुभ योग बना रही हैं। इसलिए, पब्लिक सेक्टर, फार्मा सेक्टर, सरकारी बांड, इलेक्ट्रिकल समूह, चाय-कॉफी उद्योग, पेट्रोलियम खुदाई कंपनियां आदि के शेयर ग्राफ में उछाल आ सकता है।
हालाँकि इतने अनुकूल योग के बावजूद भी, शेयर बाज़ार के कई क्षेत्रों और उद्योगों के लिए यह समय अच्छा नहीं कहा जा सकता,10 तारीख तक बाजार में तेजी-मंदी का दौर चलता रहेगा। मंगल वक्री गति में 10 तारीख से आगे बढ़ना शुरू कर देगा। तेजड़िये बाजार में पैसा लगाना चाहेंगे लेकिन मंगल ग्रह पर बृहस्पति की दृष्टि उन्हें ऐसा करने का हौसला नहीं देगी। जल्द ही, तेजी की यह स्थिति फिजूल साबित होगी। बृहस्पति 13 तारीख से मार्गी गति शुरु करेगा, और सूर्य भी उसी दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में प्रवेश करेगा। इस ग्रह संयोजन से वस्तुओं में महंगाई बढ़ेगी। ऊनी कपड़ों (मोंटे कार्लो, लक्स इंड) के स्टॉक मांग में दिखाई देंगे। जैसे- कंप्यूटर सॉफ्टवेयर से संबंधित क्षेत्र और उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, ट्रेड मिल, समाचार पत्र, दूरसंचार, वनस्पति, कपास मिल, इत्र और सौंदर्य प्रसाधन क्षेत्रों के शेयर दरों में गिरावट आ सकती है। हालांकि, 18 तारीख से, इन क्षेत्रों में कुछ उतार-चढ़ाव के बाद तेजी देखी जाएगी, जहां ख़रीदार, स्टॉकहोल्डर और निवेशक अपने नुकसान की वसूली कर सकते हैं।विवेकपूर्ण निवेशक ऑटोमोबाइल और ऑटो सहायक कंपनियों के शेयरों में दिलचस्पी लेना शुरू कर देंगे। 16 तारीख को कन्या राशि में सूर्य के प्रवेश से बुध-सूर्य की युति बनेगी। मंदी सूचकांक को निचले स्तर पर ले आएगी। 21 तारीख तक किसी भी तरह की उत्साही खरीदारी में कमी देखी जाएगी। स्मार्ट व्यापारी हर गिरावट पर फ्रंट-रनर स्टॉक को खरीदते रहेंगे।  विशेष रूप से स्टील, ऑटोमोबाइल, आवास, गैस और पेट्रोलियम के शेयरों में तेजी देखने को मिलेगी।

तेजी की अपेक्षित की तारीख: 6, 7, 8, 10, 13, 14, 18, 20, 21, 23 और 27 सितंबर 2020

मंदी के लिए अपेक्षित तिथि: 6, 7, 8, 12, 14. 16. 19 और 28 सित 
October 2020
अक्टूबर 2020 का महीना गुरुवार से शुरू हो रहा है, और महीने की शुरुआत में ग्रहों की स्थिति शेयर बाजार को प्रभावित करेगी। इस महीने  के गोचर विश्लेषण आधार पर देखें, तो कई राशियों में ग्रहों की मौजूदगी शेयर बाज़ार को प्रभावित करेगी। महीने की शुरुआत में सूर्य कन्या राशि में स्थित होगा, मंगल ग्रह मीन राशि में, बुध ग्रह तुला राशि में, बृहस्पति और प्लूटो ग्रह धनु राशि में, शुक्र ग्रह सिंह राशि में, शनि ग्रह मकर राशि में, राहु वृषभ राशि में, यूरेनस मेष राशि में और नेपच्यून कुंभ राशि में स्थित होगा। इस महीने की 18 तारीख को सूर्य तुला राशि में और मंगल मकर राशि में गोचर करेगा। ग्रहों के हलचल की बात करें तो, 20 तारीख को बुध ग्रह पश्चिम दिशा में अस्त होगा, और 31 तारीख को पूर्व दिशा में उदय होगा।वक्री मंगल 4 तारीख को मीन राशि में प्रवेश करेगा। यह मंगल अन्य प्रमुख ग्रहों के साथ कई महत्वपूर्ण दृष्टियों का निर्माण करेगा। मंगल की दृष्टि सूर्य पर होगी और शनि ग्रह मंगल पर दृष्टि डालेगा। इससे बाजार में अस्थिरता पैदा होगी। इस दौरान प्लाइवुड, सीमेंट, आवासीय, रियल एस्टेट और भारी उद्योग सेक्टर के स्टॉक्स मांग में रहेंगे। 14 तारीख को बुध तुला राशि में वक्री गति शुरु करेगा और इस पर मंगल और शनि की दृष्टि होगी।

बीमा, बैंकिंग, एएमसी (एचडीएफसी एएमसी) और पेंट सेक्टर कंपनियों के शेयरों को खरीदने में दिलचस्पी दिखाकर तेजड़िये बाजार में हावी हो जाएंगे। एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर (वोल्टास) के शेयरों की मांग में कमी देखी जाएगा 17 तारीख को सूर्य तुला राशि में प्रवेश करेगा और बुध के साथ युति बनाएगा इस युति पर मंगल और शनि की दृष्टि भी होगी।18 तारीख से, शेयर बाजारों में मंदी देखी जा सकती है। इसके साथ, पूरा स्टॉक मार्केट एकतरफा गिरावट से गुजरेगा, जो वस्तुओं के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के शेयरों की कीमतों को प्रभावित करेगा। बैंकिंग, वित्त, भारी इंजीनियरिंग, तंबाकू, कॉस्मेटिक सामान, फार्मा सेक्टर, सार्वजनिक उद्यम, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, सूचना प्रौद्योगिकी, शिपिंग कॉरपोरेशन, परिवहन आदि के ग्राफ में बड़ी गिरावट देखी जाएगी। इसलिए, तेजड़ियों और खरीदारों को सलाह दी जाती है, कि वे अपने निवेश के बारे में सतर्क रहें और पहले अच्छी तरह से सोच-विचार करने के बाद ही कोई निर्णय लें।

उछाल प्राप्त करने से पहले सूचकांक मंदी प्रदर्शित करेगा। शुक्र 23 तारीख को अपनी नीच राशि कन्या राशि में प्रवेश करेगा। मंगल कन्या राशि से सात राशि आगे मीन राशि में गोचर करेगा। राइस (केआरबीएल), एफएमसीजी (आईटीसी, हिंदयूएनआई), ऊनी कपड़े (मोंटे कार्लो, लक्स इंडस्ट्रीज़) और नाइटवेयर्स (लवटेबल, पेज) के स्टॉक्स की मांग में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। शुक्र 31 तारीख को हस्त नक्षत्र में प्रवेश करेगा। इसलिए, पेय और बॉटलिंग स्टॉक (वरुण बेवरेजेज) में कमी आएगी।
तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 3, 6, 11, 12, 13, 18, 20, 21, 25 और 31 अक्टूबर 2020

मंदी के लिए अपेक्षित तिथि: 5, 7, 8, 14, 15, 24, 26 और 28
: November 2020
 2020  नवंबर मे पूरे  में बाज़ार में तेजी और मंदी का मिश्रण रहेगा।तुला राशि में स्थित बुध 3 तारीख को मार्गी गति शुरु करेगा। सूर्य और बुध की युति पर शनि और मंगल की दृष्टि पड़ेगी। सूचकांक में तेजी आने की संभावना है। ऑटोमोबाइल्स (मारुति), बैंकिंग, पेपर, केबल (फिनोलेक्स, स्टरलाइट) और रसद (गति, ब्लू डार्ट) के स्टॉक मांग में होंगे। 6 तारीख को सूर्य विशाखा नक्षत्र में प्रवेश करेगा। शेयर बाजार भविष्यवाणी 2020 के अनुसार इससे धातु, गैस, पेट्रोलियम और सीमेंट के शेयरों की मांग बढ़ेगी।

17 तारीख को शुक्र तुला राशि में प्रवेश करेगा और बुध के साथ युति बनाएगा। इस युति पर मंगल और शनि की दृष्टि होगी। तेजड़ियों के लिये  ग्रह मंगल आग में घी का काम करेगा। बृहस्पति 20 तारीख को मकर राशि में प्रवेश करेगा और यहां शनि के साथ उसकी युति होगी। बृहस्पति और शनि सूर्य द्वारा शासित उत्तरा आषाढ़ नक्षत्र के माध्यम से पारगमन करेंगे। इस दौरान तेजी जारी रहने की संभावना है।

21 तारीख को विशाखा नक्षत्र में बुध के आने से सराफा बाजार में मांग घट जाएगी। अप्रत्याशित राजनीतिक और प्राकृतिक घटनाओं के कारण बाजार में अशांति और अस्थिरता महसूस की जा सकती है। 23 से 27 तारीख के बीच तेजड़ियों की बाजार में दिलचस्पी कम होगी। हालांकि बाजार में सुधार आएगा और कुल मिलाकर बाजार की स्थिति ठीकठाक रहेगी।29 तारीख से, कूरियर कंपनी, शिपिंग कॉर्पोरेशन और फाइनेंस सेक्टर के स्टॉक की कीमतों में गिरावट आ सकती है।इन ग्रहों की गणना के परिणाम स्वरुप निवेशकों को मिश्रित परिणाम मिल सकते हैं, इसलिए आपको सलाह दी जाती है कि इस दौरान आप सोच-समझ कर कहीं भी अपने पैसे लगाएं। चाय, कॉफी, कहवा, हैवी इंजीनियरिंग, स्टील, लोहा, आवास और कोयला से संबंधित उद्योगों में उछाल देखी जाएगी। साथ ही, 9 तारीख से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और प्रौद्योगिकी से जुड़े क्षेत्रों में भी तेजी दिखाई देगी। गिरावट की बात करें, तो फार्मा सेक्टर, पीएसयू या पब्लिक सेक्टर यूनिट, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, सूचना प्रौद्योगिकी, शिपिंग, कॉर्पोरेशन आदि में मंदी देखी जा सकती है, हालांकि 19 तारीख से फार्मा सेक्टर, पीएसयू या पब्लिक सेक्टर यूनिट, मुद्रा बाजार और कोयला उद्योग में जबरदस्त वृद्धि देखी जाएगी।

तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 2, 7, 9, 15, 21, 25, 29 और 30 नवंबर 2020

मंदी की अपेक्षित तिथि: 1, 4, 6, 8, 10, 11, 16, 18, 22, 25, 29 और 30 नवंबर 2020 में 
December 2020
दिसंबर का महीना मंगलवार से शुरू होने वाला है। सबसे पहले अगर बात की जाये ग्रहों की स्थिति और उनके प्रभावों के बारे में तो, सूर्य वृश्चिक राशि में, मंगल ग्रह मीन राशि में, मकर राशि में, शनि और बृहस्पति तुला राशि में, शुक्र तुला राशि में, राहु वृषभ में, यूरेनस मेष राशि में, नेपच्यून कुंभ राशि में और प्लूटो धनु राशि में रहेगा। ग्रहों के गोचर के बारे में बात करें तो, 16 तारीख को सूर्य धनु राशि में गोचर करेगा, जबकि 18 तारीख को बुध धनु राशि में गोचर करेगा। 8 तारीख को ज्येष्ठा नक्षत्र में प्रवेश करेगा और इसी नक्षत्र में सूर्य के साथ इसकी युति बनेगी। सूर्य और बुध का संयोग भावनाओं में अस्थिरता पैदा करता है। व्यापारियों को सावधानीपूर्वक व्यापार या सट्टा लगाने की सलाह दी जाती है।  बुध अस्त की स्थिति तेजड़ियों को दबाव में रखेगी।
शुक्र 11 तारीख को स्थिर और जल तत्व की राशि वृश्चिक में प्रवेश करेगा। वृश्चिक राशि में शुक्र, सूर्य, बुध और केतु के मिलन से आईटी, सॉफ्टवेयर, फार्मा(Sun, Divis, Pfizer) और कपड़ा क्षेत्र की कंपनियों की मांग बढ़ेगी। मंगल 24 तारीख को मेष राशि में प्रवेश करेगा और वृश्चिक राशि में शुक्र और केतु के मिलन पर दृष्टि डालेगा। कॉपर (हिंदुस्तान कॉपर), एमसीएक्स कॉपर, गोल्ड एंड सिल्वर, फुटवियर (रिलैक्सो) और सुगर (ई.आई.डी पैरी) के शेयरों की मांग में तेजी देखी जाएगी। गोचर अनुसार, सूचकांक में तेजी का रुख तेजड़ियों को खुशी देगा।शेयर बाजार में तेजी और मंदी दोनों समान रूप से प्रबल होंगे और मिलेजुले परिणाम देंगे। चाय-कॉफी, हैवी इंजीनियरिंग, स्टील उद्योग, खनन सहयोग, फार्मा सेक्टर, मुद्रा बाजार, इंजीनियरिंग स्टील इंडस्ट्री, कोयला उद्योग, पेट्रोल, पब्लिक सेक्टर, बैंकिंग, परिवहन, हिंदुस्तान वनपति आदि के शेयरों में गिरावट देखी जा सकती है। इन भविष्यवाणियों के अनुसार, हम ये कह सकते हैं, कि इन क्षेत्रों से संबंधित शेयरों में अपने पैसे निवेश करने से पहले दो बार सोचना चाहिए।

तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 5, 7, 8, 12, 14, 15, 19, 23 और 26 दिसंबर 2020

मंदी की अपेक्षित तिथि: 1, 2, 6, 9, 13, 16, 20, 22, 28 और 29 दिसंबर 2020
सूचना
शेयर बाजार – स्टॉक मार्केट 2020 वस्तु बाजार का व्यापार-विमर्श एवं विश्लेषण के बारे में निकाला गया निष्कर्ष विशुद्ध रूप से ग्रह स्थितियों पर आधारित है। न तो लेखक  किसी भी नुकसान के लिए जिम्मेदारनही है। यह ज्योतिषीय निष्कर्ष स्टॉक मार्केट में व्यापार करने के लिए न तो निमंत्रण है और न ही सुझाव/सिफारिश है। निवेश करने से पहले पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से परामर्श करें। हो सकता है लेखक ने उल्लेखित शेयरों में निवेश किया हो।

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

#शेयर बाजार – स्टॉक मार्केट #2020 वस्तु बाजार का व्यापार-विमर्श एवं विश्लेषण 1

http://acharyarajesh.in/2020/01/08/6797/www.acharyarajesh.inमित्रों अपनी पिछली पोस्ट पर मैंने जनवरी से लेकर अप्रैल तक आपको मंदा तेजी के बारे में बताया था अब हम मई से लेकर अगस्त तक इस पोस्ट में हम चर्चा करेंगे 

 मई
मई 2020 की शुरुआत में बाज़ार के खरीदारों, निवेशकों और शेयरधारकों के लिए लाभदायक परिणाम लेकर आने वाला है। महीने की शुरुआत में कई ग्रहों की बदलती स्थिति देखी जाएगी, मई के महीने में, ग्रह सूर्य, बुध और यूरेनस मेष राशि में पारगमन करेंगे। मंगल, बृहस्पति, शनि और प्लूटो एक साथ मकर राशि में भ्रमण करेंगे। चंद्रमा कर्क राशि से, शुक्र वृषभ से और राहु मिथुन राशि से होकर गुजरेगा। उग्र ग्रह मंगल, कुंभ राशि में प्रवेश करेगा और वृष राशि में मौजूद शुक्र पर दृष्टि डालेगा। इससे कपास, फैशन, आभूषण, घड़ियां (टाइटन), चांदी, पेंट (एशियन पेंट्स) और आतिथ्य (भारतीय होटल) क्षेत्र की कंपनियों की मांग को बढ़ावा मिलेगा।
, शनि 11 तारीख से वक्री गति में चलेगा। इसी दिन कृतिका नक्षत्र में प्रवेश करेगा। यह इस्पात (जेएसडब्ल्यू स्टील, टाटा स्टील), ऑटोमोबाइल्स (टीवीएस मोटर्स, मारुति), ऑटो सहायक (मदरसन), तेल, गैस और पेट्रोलिय (एचपीसीएल, बीपीसीएल, एमजीएल, आईजीएल) सेक्टर की कंपनियों के शेयरों में मांग पैदा करेगा।13 तारीख को बुध रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेगा। आईटी और सॉफ्टवेयर क्षेत्र की कंपनियों को 13 तारीख को शुक्र के वृष राशि में वक्री गति करने के चलते मांग में उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा। फैशन, प्रसाधन सामग्री (कॉस्मेटिक्स) और तेजी से बिकने वाली उपभोक्ता वस्तुओं (एफएमसीजी) के शेयरों में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। 16 तारीख को पश्चिम में बुध का उदय होगा। इससे बाजार में तेजी आएगी। राहु और बुध 20 तारीख को मृगशिरा नक्षत्र में शुक्र ग्रह के साथ युति बनाएंगे। शेयर बाजार में 28 तारीख तक अस्थिरता की स्थित होने की संभावना है। मुनाफे की चाह में लंबे समय तक बाजार में पैसा लगाने वाले व्यापारियों (Long side traders) को हर बढ़त पर मुनाफा कमाने की कोशिश करनी चाहिये। 29 तारीख को, शुक्र के वक्री होने और सूर्य और शुक्र पर उग्र ग्रह मंगल की दृष्टि होने के कारण स्पॉट एंड इक्विटी मार्केट का ग्राफ ऊपर की ओर जाएगा।शेयर बाज़ार में तेजी आने की संभावना है। स्टील, तेल, फार्मा, उर्वरक, चाय, कॉफी, भारी इंजीनियरिंग, सार्वजनिक क्षेत्र, पेट्रोलियम, रसायन, विद्युत समूह, तंबाकू, वाहन उद्योग, रिलायंस आदि से जुड़े क्षेत्र में उछाल आएगा। स्टॉक मार्केट इंडेक्स सभी रिकॉर्डों को पार करेगा और सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा। मंदड़ियों को किसी भी प्रकार के निवेश या खरीदारी से दूर रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने पर आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है।तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 2, 3, 4, 5, 6, 8, 12, 17, 18, 19, 20, 23, 24, 25, 26 और 31 मई 2020
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june2020/,में अगर जून महीने की बातe की जाये तो, गोचर-कुंडली का विश्लेषण करते हुए यह पता चलता है कि कई ग्रह किसी न किसी राशि में स्थित होंगे, और उनकी वह स्थिति शेयर बाज़ार और उसके विभिन्न तत्वों को प्रभावित कर सकती है। शुक्र के साथ सूर्य, वृषभ राशि में भ्रमण करेगा, वहीं बुध और राहु ग्रह मिथुन राशि में स्थित रहेंगे। चंद्रमा मिथुन राशि से अन्य राशियों में गोचर करेगा और मंगल ग्रह कुंभ राशि में गोचर करेगा जबकि शनि और बृहस्पति ग्रह दोनों वक्री अवस्था में मकर से गोचर करेंगे। उग्र ग्रह मंगल 3 तारीख को पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश करेगा। खाद्य तेलों, बुलियन (स्वर्ण और रजत), कपास, कपड़ा स्टॉक, एफएमसीजी स्टॉक और कच्चे तेल के शेयरों की मांग में तेजी देखी जाएगी।सूर्य ग्रह 7 तारीख को मृगशिरा नक्षत्र में राहु के साथ युति करेगा। इससे पेट्रोलियम, पेय पदार्थ, चावल, मोती, पानी और चांदी की मात्रा में कमी देखी जा सकती है। एक्वा कल्चर (अवंती फीड्स), चावल (केआरबीएल) और पेय पदार्थ स्टॉक (वरुण बेवरेज) की दरों में वृद्धि होने की संभावना है। सूर्य ग्रह 14 तारीख को मिथुन राशि में प्रवेश करेगा जहां यह बुध और राहु ग्रह के साथ युति बनाएगा। ग्रहों की इस युति से बाजार के वातावरण में बेचैनी देखी जा सकती है।बारिश उम्मीद से कम होगी। कीमतों में वृद्धि के कारण अनाजों के स्टॉक में अच्छी कमाई होगी। चीनी, चावल, गेहूं, खाद्य, धातु और इस्पात के शेयरों में तेजी देखने को मिलेगी। 18 तारीख को मीन राशि में मंगल के प्रवेश के कारण बाजार में तेजी जारी रहने की संभावना है। मंगल, सूर्य, राहु और बुध की युति पर दृष्टि डालकर उसे प्रभावित करेगा और शनि की दृष्टि मंगल पर होगी। बुध वक्री गति में आगे बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप, सट्टेबाजों को बैंकों (एचडीएफसी, आईसीआईसीआई और एसबीआई) के शेयरों को अपूर्ण-बिक्री (Short-selling) से बचना चाहिए। इस महीने ग्रह नक्षत्रों की चाल के अनुसार, शेयर बाजार में लंबे समय तक निवेश करके मुनाफा कमाने वाले व्यापारियों को लाभ प्राप्त होगा।22 तारीख को बुध ग्रह पश्चिम दिशा में अस्त होता हुआ दिखाई देगा। इसलिए, यह महीना लगभग सभी क्षेत्रों में उछाल पैदा करेगा। 18 जून को स्टॉक मार्केट इंडेक्स सभी शेयरों की नई दरों के कारण नई ऊंचाइयों को छूएगा। हालांकि, 14 तारीख को मंदी की भावनाएं देखी जाएंगी, जो फार्मा सेक्टर, पब्लिक सेक्टर, सरकारी ब्रांडों, विदेशी मुद्राओं, गोल्ड ब्रांड, रिलायंस इंडस्ट्री, वाहन, कपड़ा आदि को प्रभावित करेंगी।तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 4, 7, 9, 10, 15, 18, 21, 22, 23, 27 और 28 जून 2020मंदी के लिए अपेक्षित तिथि: 1, 2, 8, 14, 17, 20, 24 और 29 जून
July
Julyजुलाई के महीने में शेयर, स्टॉक और वस्तुओं के संबंध में मिश्रित परिणाम मिलेंगे। विभिन्न ग्रहों के राशियों में होने वाले गोचर बहुत सारे तत्वों और परिणामों को प्रभावित करेंगे, जिनसे या तो निवेशकों को बहुत अधिक लाभ कमाने में मदद मिलेगी या फिर उनके लिए कुछ चुनौतियाँ आ सकती हैं। जुलाई 2020 की शुरुआत में, नेप्च्यून, राहु, सूर्य और बुध मिथुन राशि में स्थित दिखाई देंगे, जबकि प्लूटो धनु राशि में होगा। 9 जुलाई को, बुध पूर्व में उदय होगा, जिसकी वजह से मिश्रित परिणाम मिलने की संभावना है।त्पादों (मैरिको, डाबर) और चावल (केआरबीएल) के शेयरों की मांग में वृद्धि देखी जाएगी। 12 तारीख को बुध मार्गी गति शुरू करेगा। बैंकिंग, पेपर (जेके, वेस्ट कोस्ट), रसद (ब्लू डार्ट) और बीमा (एलआईसी, जीआईसी) कंपनियों के शेयरों में शुरुआती अड़चन के बाद तेजी देखने को मिलेगी। जैसे ही सूर्य 16 तारीख को कर्क राशि में प्रवेश करेगा, यह शनि के साथ 180 डिग्री का संयोग बनाएगा। मंदड़ियों की दखलअंदाजी के बावजूद बाजार में तेजड़ियों का बोलबाला रहेगा।19 तारीख को सूर्य शत्रु ग्रह द्वारा शासित पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करेगा। धातु, इस्पात, पूंजीगत वस्तुओं (हैवेल्स) और उपभोक्ता वस्तुओं (गोदरेज कंज्यूमर, आईटीसी, डाबर) के स्टॉक्स मांग में बने रहेंगे।आईटी और सॉफ्टवेयर स्टॉक 23 तारीख को निवेशकों के प्रिय हो जाएंगे क्योंकि इस दिन शुक्र ग्रह मृगशिरा नक्षत्र में राहु के साथ युति करेगा। विवेकपूर्ण निवेशक हर गिरावट पर अच्छी गुणवत्ता वाले स्टॉक खरीदने के हर अवसर का उपयोग करेंगें। महीने के आखिरी सप्ताह में तेजी में कमी आएगी।उतार-चढ़ाव के साथ-साथ लौह और इस्पात उद्योग, वनपति उद्योग, तंबाकू उद्योग, सीमेंट उद्योग, कृषि, रबर उद्योग, खनन उद्योग, ट्रैक्टर ऑटोमोबाइल क्षेत्रों में बढ़ोतरी देखी जाएगी। स्टॉक मार्केट इंडेक्स में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 1, 4, 7, 8, 12, 13, 15, 19, 21, 24, 25, 27 और 29 जुलाई 2020मंदी के लिए अपेक्षित तिथि: 5, 6, 11, 14, 18, 22 और 26 जुलाई 2020

August

August2020के अगस्त महीने की शुरुआत में ग्रहों की कई दिलचस्प घटनाएं होंगी।हालांकि, ग्रहों की स्थिति और चाल आपको मिलेजुले परिणाम दिलवा सकती है। ग्रहों की स्थिति के बारे में बात करें तो कुंडली का विश्लेषण करने के बाद देखा जा सकता है कि महीने की शुरुआत में सूर्य और बुध ग्रह कर्क राशि में रहेंगे, मंगल ग्रह मीन राशि में, बृहस्पति और प्लूटो ग्रह धनु राशि में, शुक्र और राहु ग्रह मिथुन राशि में, यूरेनस ग्रह मेष राशि में और नेपच्यून ग्रह कुंभ राशि में रहेगा । 17 तारीख को सूर्य और मंगल क्रमशः सिंह और मेष राशि में गोचर कर रहे हैं, जबकि 18 तारीख को बुध सिंह राशि में प्रवेश करेगा। शुक्र मिथुन राशि में राहु के साथ प्रवेश करेगा और केतु और बृहस्पति की युति पर इसकी विपरीत दृष्टि होगी। और ग्रह मंगल शुक्र और राहु की युति पर दृष्टि डालेगा। बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी। समझदार व्यापारी हर बढ़त पर लाभ उठाएंगे। 4 तारीख को पुष्य नक्षत्र में बुध के आने से रजत-स्वर्ण में गिरावट देखने को मिलेगी। वाणिज्य और व्यापार का मुख्य ग्रह, बुध सूर्य के साथ अश्लेषा नक्षत्र में युति बनाएगा। गैस, खान (कोल इंडिया, वेदांता), किफायती आवास (आशियाना, एल्डेको) और सीमेंट (अल्ट्राटेक) सेक्टर के शेयरों में उछाल आएगा। हालांकि बाजार में तेजी की स्थिति की अचानक दिशा बदलने की संभावना है, क्योंकि मंगल मेष राशि में प्रवेश करके बुध पर दृष्टि डालकर बुध की स्थिति को कमजोर करेगा।14 तारीख से बैंकिंग और फाइनेंस, हिंदुस्तान लीवर, वनस्पती, और तंबाकू से संबंधित कंपनियों के स्टॉक की कीमतों में गिरावट आ सकती है, हालांकि जिन-जिन क्षेत्रों के शेयर मंगल, राहु और शनि द्वारा शासित होते है, उनके ग्राफ में निरंतर वृद्धि देखी जाएगी।कुल मिलाकर, 21 तारीख तक बाजार में तेजी देखने को मिल सकती है। 22 तारीख से, ग्रहों की स्थिति में परिवर्तन बाजार में मंदी की स्थिति को प्रभावित करेगा। खुदरा बाजार में 29 तारीख तक अपस्फीति का अनुभव होगा। महीने के अंतिम दिन शुक्र ग्रह का प्रवेश जल तत्व की राशि कर्क में होपर मंगल की दृष्टि होगी। यह संयोग तेजड़ियों के चहरों पर मुस्कानगा। यहां शुक्र लाएगा।
तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 4, 6, 8, 12, 17, 19, 24 और 31 अगस्त 2020मंदी की अपेक्षित तिथि: 1, 2, 5, 10, 12, 15, 18, 22, 23, 27 और 29 अगस्त 2020

सूचना


शेयर बाजार – स्टॉक मार्केट 2020 वस्तु बाजार का व्यापार-विमर्श एवं विश्लेषण के बारे में निकाला गया निष्कर्ष विशुद्ध रूप से ग्रह स्थितियों पर आधारित है। न तो लेखक नाwebsite किसी भी नुकसान के लिए जिम्मेदार है। यह ज्योतिषीय निष्कर्ष स्टॉक मार्केट में व्यापार करने के लिए न तो निमंत्रण है और न ही सुझाव/सिफारिश है। निवेश करने से पहले पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से परामर्श करें। हो सकता है लेखक ने उल्लेखित शेयरों में निवेश किया हो।


बुधवार, 8 जनवरी 2020

शेयर बाजार – स्टॉक मार्केट 2020 वस्तु बाजार का व्यापार-विमर्श एवं विश्लेषण

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मित्रों मेरी पिछली पोस्ट ग्रह गोचर पर थी उसको पढ़कर कई मेरे मित्रों ने शेयर मार्केट और वस्तु जींस की मंदा तेजी के बारे ग्रहों के बारे में क्या संबंध बन रहा है। किस महीने क्या होगा यह सब इस पोस्ट में लिखने की कोशिश की है। उम्मीद है। आपको पसंद आएगी मित्रों इस पोस्ट को पढ़कर लाइक करें, और शेयर जरूर करें, मित्रों इस पोस्ट में हम जनवरी से लेकर अप्रैल तक बात करेंगे और अगली पोस्ट में फिर मई से लेकर बाकी महीनों की तो आओ जनवरी से शुरुआत करते हैं।

Acharya Rajesh: 7597718725/9414481324

जनवरी

ग्रह गोचर के अनुसारजनवरी महीने की शुरुआत में, सूर्य ग्रह, बुध, बृहस्पति, शनि और केतु के साथ धनु राशि में स्थित रहेगा। वहीं मंगल ग्रह वृश्चिक राशि में रहेगा, राहु मिथुन राशि में रहेगा, शुक्र मकर राशि में रहेगा और चंद्रमा कुंभ राशि में रहेगा और यूरेनस मेष राशि में रहेगा।
साल के पहले दिन धनु राशि में पांच ग्रहों (सूर्य, बुध, बृहस्पति, शनि और केतु) का मिलन होगा। यह ग्रहों की यह युति तेजड़ियों के लिए अच्छी लग रही है। बुध साल 2020 के दूसरे दिन पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में प्रवेश करेगा और सूर्य के साथ इसी नक्षत्र में बुध की युति होगी। शुरू में मामूली गिरावट के बाद कमोडिटीज और स्वर्ण-रजत मार्केट में तेजी देखने को मिलेगी। अष्टम घर में कुंभ राशि में शुक्र के आगमन के साथ, कपड़ा (रेमंड), एफएमसीजी (एचयूएल, आईटीसी) और चीनी (ईआईडी) के शेयरों में उछाल देखने को मिल सकता है, जबकि कपास, चीनी और घी से संबंधित स्टॉक में भी तेजी देखने को मिलेगी। 13 वें दिन बुध के मकर राशि में प्रवेश करते ही स्वर्ण और रजत सट्टेबाजों के प्रिय बन जाएंगे।पौष पूर्णिमा का महीना शुभ रह सकता है, जबकि माघ अमांत के दौरान मकर संक्रांति का समय अशुभ परिणाम दे सकता है। इसलिए, शेयर बाज़ार 2020 की भविष्यवाणियों के अनुसार इस महीने के अंत में बाज़ार में तेजी देखी जा सकती है। 18 जनवरी तक इस ग्राफ में उतार-चढ़ाव होगा, लेकिन बैंकिंग, वित्त, तंबाकू, चाय-कॉफी और औद्योगिक क्षेत्रों में शेयर बाज़ार में एकतरफा तेज़ी देखी जाएगी। साथ ही, 16 जनवरी से पब्लिक सेक्टर के शेयरों में वृद्धि होगी, और रबर उद्योग, कोयला, औद्योगिक, ऑटो, लोहा, तेल और मोबाइल कंपनियों के शेयर बाज़ार में वृद्धि होगी।

15 तारीख को मकर राशि में बुध के साथ सूर्य की युति बनेगी, यह स्थिति आग में घी डालने का काम करेगी। गेहूं, गुड़, चीनी, कपास, कपड़ा और स्वर्ण-रजत की मांग में और वृद्धि होगी। पूंजीगत माल (क्रॉम्पटन ग्रीव्स) के स्टॉक डिमांड में रहेंगे। शनि 24 तारीख को मकर राशि में प्रवेश करेगा और बुध और सूर्य के साथ युति बनाएगा। इससे बाजार के माहौल में अस्थिरता पैदा होगी। व्यापारियों और सट्टेबाजों को प्रत्येक वृद्धि पर मुनाफे की उम्मीद करनी चाहिये। 31 तारीख को कुंभ राशि में शुक्र के साथ बुध की युति बनेगी और इन दोनों ग्रहों पर मंगल की दृष्टि होगी। ग्रहों की इस स्थिति से तेजड़ियों की अस्थिरता में वृद्धि होगी।रिलायंस इंडस्ट्री, कैपिटल, सेल, टिस्को, एसटीआई आदि में निरंतर वृद्धि देखी जाएगी। हालांकि, इलेक्ट्रिकल इंडस्ट्री, एल्युमीनियम, टी, कॉफी, इंडस्ट्रियल, हैवी इंजीनियरिंग, केमिकल्स, खाद आदि में मंदी का रुख रहेगा।

तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 1, 4, 6, 7, 11, 13, 14, 18, 19, 21 और 26 जनवरी 2020

मंदी के लिए अपेक्षित तिथि: 5, 12, 20, 27 और 29 जनवरी 2020
[08/01, 19:13]

फरवरी

फरवरी महीने की शुरुआत में शनि ग्रह की सूर्य के साथ मकर राशि में युति बनेगी। बुध, शुक्र और नेपच्यून कुंभ राशि में रहेंगे। चंद्रमा मेष राशि में यूरेनस के साथ संयोग करेगा, जबकि बृहस्पति, केतु और प्लूटो धनु राशि में रहेंगे।मंगल वृश्चिक राशि में गोचर करेगा जबकि राहु मिथुन राशि में भ्रमण करता रहेगा।

शुक्र 2 तारीख को मीन राशि में प्रवेश करेगा और इस पर शनि की दृष्टि होगी, जिसके परिणामस्वरूप बाजार में अस्थायी गिरावट आ सकती है। लेकिन धीरे-धीरे, घरेलू सामान (सिम्फनी, ब्लू स्टार) के शेयरों में एक मुद्रास्फीति देखी जाएगी और आईटी और सॉफ्टवेयर (टीसीएस, इन्फोसिस) कंपनियों पर गौर किया जाएगा। कच्चे तेल की कीमतों और दरों में वृद्धि देखी जाएगी। व्यापारियों को किसी भी तरह के झांसे में नहीं आना चाहिये, क्योंकि मांग बढ़ने की संभावना रहेगी। वैश्विक बाजार की स्थिति 12 फरवरी तक व्यापारियों और सटोरियों को बेचैन बनाए रखेगी।
17 तारीख को बुध ग्रह वक्री गति करेगा। मंदी का माहौल सूचकांक को गिरा देगा। हालांकि, 22 तारीख को बाजार और सूचकांक में तेजी देखी जाएगी। फार्मा (सन, फाइजर, डॉ. रेड्डीज), मीडिया और कैपिटल गुड्स (हैवेल्स) स्टॉक मार्केट 2020 गोचर के अनुसार मांग में रहेंगे। शुक्र मेष राशि में प्रवेश करेगा जहां बृहस्पति की दृष्टि भी उसपर होगी। एफएमसीजी, गेहूं, एडिबल्स, तेल, सरसोंं, ऊन और गुड़ के स्टॉक गिरने की संभावना है, जबकि सूचकांकों में तेजी का रुख रहेगा। क्यों किइस महीने में बृहस्पति, शनि और राहु की शुभ दृष्टि सिंह राशि पर पड़ेगी, जिस वजह से बाजार में तेजी का दौर आएगा। आयरन, स्टील, टी, कॉफी, बैंकिंग, हिंदुस्तान लीवर, ज्वैलरी, फर्टिलाइजर्स, हैवी इंजीनियरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, फार्मा, कॉस्मेटिक्स, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, टेक्नोलॉजी आदि के शेयरों में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।

तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 1, 3, 4, 8, 10, 11, 15, 17, 18, 22, 23, 24, 25, 27 और 28 फरवरी 2020

मंदी के लिए अपेक्षित तिथि: 2, 5 और 6 फरवरी 2020

मार्च
ग्रहों की स्थिति के अनुसार मार्च में शेयर बाज़ार में मिले- जुले परिणाम मिलने के आसार हैं। मार्च 2020 की शुरुआत में, सूर्य और नेपच्यून ग्रह कुंभ राशि में, प्लूटो और शनि ग्रह मकर राशि में, धनु राशि में बृहस्पति और मंगल ग्रह, कुंभ राशि में बुध ग्रह, मिथुन राशि में राहु ग्रह, मकर राशि में केतु ग्रह और मेष राशि में शुक्र और हर्षल ग्रह को देखा जाएगा। हिंदू कैलेंडर या पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमांत शेयर बाज़ार के लिए अनुकूल लगता है, जबकि चैत्र अमांत और मीन संक्रांति (मीन राशि में सूर्य का गोचर) प्रतिकूल परिणाम दे सकते हैं।

पिछले महीने की तरह इस महीने की शुरुआत में भी बाज़ार में तेजी देखी जा सकती है। 6 तारीख तक सभी क्षेत्रों में एकतरफा बढ़ोतरी रहेगी।10 तारीख को कुंभ राशि में स्थित बुध मार्गी गति प्रारंभ करेगा। यह बैंकिंग (एचडीएफसी), बीमा, कागज (वेस्ट कोस्ट, तमिल न्यूजप्रिंट, ट्राइडेंट), लॉजिस्टिक्स (ब्लू डार्ट) और टायर सेक्टर की कंपनियों के शेयरों में सकारात्मकता लाएगा।

निवेशक घरेलू सामान की कंपनियों (ब्लू स्टार, एम्बर, व्हर्लपूल) के शेयरों को प्राप्त करने में रुचि लेंगे। पावर, इलेक्ट्रिकल और गैस (IGL) क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों में 13 तारीख से वृद्धि होगी। यह 12 मार्च के बाद, रिलायंस समूह, सौंदर्य प्रसाधन, वाहन, औद्योगिक, मनोरंजन, टीवी चैनल आदि में मिश्रित परिणाम देखने को मिलेंगे। रिलायंस, समाचार पत्र और सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी के शेयरों में गिरावट आ सकती है। दूरसंचार और फार्मास्यूटिकल्स के क्षेत्र में भी मंदी का भाव देखा जा सकता है।18 से 20 के बीच फायदा होने की संभावना (प्रॉफिट बुकिंग) देखी जाएगी। मंगल 22 तारीख को अपनी उच्च राशि मकर में प्रवेश करेगा और यहां शनि से इसकी युति होगी। यह ग्रहीय संयोग वैश्विक स्तर पर एक असहज परिदृश्य पैदा करेगा। तेल, गेहूं, चावल और गुड़ जैसे खाद्य पदार्थों की मांग में वृद्धि और आपूर्ति की कमी के कारण तेजी देखने को मिल सकती है। 25 से 27 के बीच इंडिसेस में गिरावट देखी जा सकती है। निवेशकों का सोना खरीदने की ओर झुकाव रहेगा। 27 तारीख के बाद शेयर बाजार में सुधार की संभावना है।

तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 2, 3, 7, 8, 15, 16, 22, 24, 28, 29, और 30 मार्च 2020

मंदी के लिए अपेक्षित तिथि: 4, 5, 6, 11, 14, 18, 24 और 31 मार्च 2020

अप्रैल

अप्रैल 2020 का महीना निवेशकों के लिए आकर्षक रहेगा। महीने की शुरुआत में, विभिन्न ग्रहों की स्थिति शेयर बाज़ार को प्रभावित करती दिखेगी।अप्रैल के महीने में, ग्रहों की स्थिति इस तरह होगी - सूर्य मीन राशि में, मंगल, बृहस्पति, शनि और प्लूटो मकर राशि में। बुध और नेपच्यून कुंभ राशि में गोचर करेंगे। राहु और चंद्रमा संयुक्त रूप से मिथुन राशि में भ्रमण करेंगे जबकि शुक्र, वृषभ राशि में स्थित होगा।

महीने के मध्य में 13 तारीख को, सूर्य अश्विनी नक्षत्र और मेष राशि में प्रवेश करेगा। मंगल की मेष राशि में सूर्य पर चतुर्थ दृष्टि होगी जोकि पहले से ही मकर राशि में बृहस्पति और शनि के साथ युतु बना रहा है। कपास, नारियल, सरसों और बुलियन सकारात्मक खरीद के रुझान से गुजरेंगे। आईटी (टीसीएस) और एफएमसीजी (एचयूएल, नेस्ले और ब्रिटानिया) के शेयर हरे रंग के रहेंगे। 17 तारीख को, बुध रेवती नक्षत्र में आगे बढ़ेगा और इसपर शनि की दृष्टि होगी। ब्लू चिप निवेशकों की मांग में बढ़ोतरी होगी। स्मार्ट और विवेकपूर्ण निवेशक आईटी, सॉफ्टवेयर (इन्फोसिस, विप्रो), भारी उद्योगों (रिलायंस), बैंकों (एचडीएफसी) और रासायनिक क्षेत्रों के शेयरों को कम दरों पर खरीदने के लिए प्रेरित रहेंगे।

बुध 24 तारीख को मेष राशि में सूर्य से युति करेगा। इस संयोग पर उग्र ग्रह मंगल की दृष्टि भी होगी, जिसकी वजह से मुद्रास्फीति बढ़ेगी। इस समय सूचकांकों के ग्राफ में तेजी देखने को मिलेगी। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस महीने बाजार में तेजी रहेगी।महीने के अन्त में बुध के उदय के कारण, तेल, पेट्रोलियम, चमड़ा, बड़े मशीनों, लोहा, इस्पात, सीमेंट, ऊनी कपड़े, कोयला, ऑटोमोबाइल पार्ट्स, खनन, वनस्पती उद्योग, तंबाकू, परिवहन कंपनियां और इनसे संबंधित क्षेत्रों में तेजी देखी जाएंगी।

इस दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज के भी शेयरों में गिरावट देखी जा सकती है। फार्मा सेक्टर में कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी और 23 अप्रैल से शेयर बाज़ार में भी एकतरफा बढ़त देखने को मिलेगी। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि निवेशकों और खरीदारों को शानदार परिणाम देगा, और इस तरह से कार्य करने पर उन्हें लंबे समय लिए लाभ कमाने में मदद मिल सकती है
तेजी के लिए अपेक्षित तिथि: 8, 13, 14, 15, 20, 21, 22, 25, 26 और 28 अप्रैल 2020

मंदी के लिए अपेक्षित तिथि: 2, 6, 7, 11, 21 और 27 अप्रैल 2020

आगे अगली पोस्ट मै आचार्य राजेश

सूचना
शेयर बाजार – स्टॉक मार्केट 2020 वस्तु बाजार का व्यापार-विमर्श एवं विश्लेषण के बारे में निकाला गया निष्कर्ष विशुद्ध रूप से ग्रह स्थितियों पर आधारित है। न तो लेखक नाwebsite किसी भी नुकसान के लिए जिम्मेदार है। यह ज्योतिषीय निष्कर्ष स्टॉक मार्केट में व्यापार करने के लिए न तो निमंत्रण है और न ही सुझाव/सिफारिश है। निवेश करने से पहले पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से परामर्श करें। हो सकता है लेखक ने उल्लेखित शेयरों में निवेश किया हो।

रविवार, 5 जनवरी 2020

2020 ग्रह गोचर का प्रभाव ज्योतिषीय विश्लेषण

Q मित्रों आज वात करते हैं 2020 मैं ग्रहों के गोचर की

296 साल बाद 2020 में बनी है ग्रहों की ऐसी स्थिति,  साल के प्रारंभ में धनु राशि में सूर्य, बुध, बृहस्पति, शनि और केतु भी हैं।  ग्रहों की ऐसी स्थिति 296 साल पहले 1 जनवरी 1723 को बनी थी।अब अगले 500 सालों तक ग्रहों की ऐसी स्थिति नहीं बनेगी। सितारों की ये स्थिति देश में बड़े बदलाव होने का संकेत दे रही है।

कई सालों में बनती है ग्रहों की ऐसी स्थिति
नए साल की शुरुआत में बुध, शनि और बृहस्पति धनु राशि में सूर्य के साथ होने से अस्त हैं, जिससे इन 3 ग्रहों का शुभ और अशुभ असर कम हो जाएगा। इनके साथ ही सूर्य और केतु पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में रहेंगे। वहीं बुध और गुरू मूल नक्षत्र में एक साथ हैं। इस तरह एक ही नक्षत्र में ग्रहों की युति बहुत ही कम बनती है। राहु को छोड़कर सभी ग्रह वृश्चिक से कुंभ राशि तक रहेंगे।9 जनवरी 2020 - शुक्र का कुंभ राशि में गोचर
13 जनवरी 2020 - बुध का मकर राशि में गोचर
15 जनवरी 2020 - सूर्य का मकर राशि में गोचर 
24 जनवरी 2020 - शनि का मकर राशि मं गोचर
31 जनवरी 2020 - बुध का कुंभ राशि में गोचरजनवरी 2020 में विभिन्न ग्रहों के पांच गोचर हैं और इनमें सबसे बड़ा गोचर 24 जनवरी 2020 को है। ये गोचर है शनि ग्रह का। इस दिन शनि तकरीबन ढाई साल बाद अपनी स्वराशि मकर में प्रवेश करेगा। वैसे तो सभी ग्रहों के गोचर का अक्सर पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव जंतु प्राणी जलवायु वातावरण पर पड़ता है2020 में चल रही ठंड अभी तक के सारे रेकॉर्ड तोड़ सकती है। इन दिनों में चर्तुग्रही व पंचग्रही योग बन रहे हैं, जिसका असर जल्द ही कड़ाके की ठंड के रूप में नजर आएगा।शनि वर्ष गणना के अनुसार 30 साल बाद ग्रह-युति योग का भी संयोग बन रहा है। बृहस्पति वर्ष गणना से 12 साल बाद ग्रहों की ऐसी स्थिति बन रही है, जिनसे चतुर्ग्रही व पंचग्रही योग बनेंगे। इन परिवर्तनों का असर मौसम और जलवायु के साथ सामान्य जनजीवन पर भी दिखाई देगा।24 जनवरी 2020 से सूर्य व शनि पिता-पुत्र एक ही राशि में स्थित होने एवम  24 जनवरी 2020 को ही शनि का मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य व शनि की युति बनेगी। इस अवधि में पिता-पुत्र एक ही राशि में रहेंगे। इनका अच्छा असर न्याय, सामाजिक मूल्य का प्रभाव बढ़ेगा तथा प्राकृतिक विपदाओं में कमी आएगी।पंचागीय गणना के अनुसार इस वर्ष 2020 के जनवरी महीने में में ग्रहों का राशि व नक्षत्र परिवर्तन या प्रवेश की स्थिति बन रही है।

इस दौरान मौसम में परिवर्तन नजर आएगा। पूर्व-उत्तर में कहीं-कहीं बर्फ बारी तथा मावठे की बारिश होगी। इससे ठंड में तेजी आएगी।

24 दिसंबर से चंद्र योग में उक्त चार ग्रहों के साथ बुध की युति ।बुध को मौसम का कारक ग्रह माना जाता है। ऐसे में पंचग्रही युति योग में भीषण सर्दी के रूप में इसके प्रभाव देखने को मिलेंगे। सूर्य 15 जनवरी तथा बुध 17 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश करेंगे। उसके सात दिन बाद 24 जनवरी को शनि भी मकर राशि में प्रवेश कर जाएंगे। ऐसे में मकर राशि में सूर्य, बुध व शनि का त्रिग्रही युति योग बनेगा।

मौसम पर  कैसा होगा  प्रभाव 
  शीत ऋतु में चतुर्थ व पंचग्रही युति का प्रभाव मौसम में स्पष्टरूप से देखने को मिलेगा। जनवरी 2020 से मौसम में विचित्र परिवर्तन दिखाई देगा। पहाड़ों पर बर्फबारी के साथ मैदानी इलाकों में मघावट जैसी बारिश व ओला वृष्टि होगी।
पश्चिमोत्तर क्षेत्र में इसका सबसे अधिक प्रभाव नजर आएगा। पश्चिम उत्तर के क्षेत्र तथा राष्ट्रों में अत्यधिक ठंड पड़ेगी। इसका प्रभाव करीब 1 माह तक रहेगा। इस दौरान सर्दी पूर्व के कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ेगी। 17 मार्च 2020  के बाद ही स्थिति समान्य होगी।

यह स्थिति चतुर्ग्रही व पंचग्रही युति के रूप में दिखाई देगी। धनु राशि में पहले से गुरु, शनि व केतु मौजूद है। सूर्य के प्रवेश से चतुर्ग्रही युति योग बनेगा। धनु राशि में इन चार ग्रहों को मिथुन राशि स्थित राहु पर समसप्तक दृष्टि संबंध बनेगा।

इस दृष्टि से पूर्व तथा उत्तर दिशा के राज्यों में प्राकृतिक बदलाव होने की संभावनाएं हैं। बारीश, बर्फबारी और ओलावृष्टि के रूप में इसका असर भी दिखेगा। यह असर 30 जनवरी 2020 तक रहेगा। इसके बाद बदलाव होने लगेंगेचार ग्रहों का युति संबंध

ग्रह परिभ्रमणकाल में सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करते ही वहां मौजूद गुरु, शनि, केतु से चर्तुग्रही युति संबंध बनेगा, जो राहू से सम-सप्तक दृष्टि संबंध बनाएगा। यह स्थिति भी मौसम के परिवर्तन का संकेत करती है। धनु राशि पूर्वोत्तर की कारक राशि मानी जाती है, किंतु ग्रहों की दिशा व राशि का देशिक संबंध मिलकर क्षेत्र विशेष को टारगेट करता है, जिससे ऋतुकालीन प्रभाव अपनी प्रकृति बदलता है।

बुध, शनि व गुरु के अस्त होने से भी बढ़ेगा प्रभाव

मैदिनी ज्योतिष शास्त्र में जलवायु, पर्यावरण व प्रकृति के परिवर्तन का कारक ग्रह बुध को माना जाता है। बुध उस समय ठंडी हवा को सहयोग करेगा, उत्तरी ध्रुव पर बर्फबारी के क्षेत्रीय प्रभाव भी दिखाई देंगे। अर्थात उत्तर दिशा से संबंधित राज्यों व राष्ट्रों में इसका प्रभाव नजर आएगा। गुरु के अस्त होने से भी पूर्वोत्तर क्षेत्र में बर्फबारी  के योग बनेंगे।

ग्रहों के स्वभाव से देश के कई भागों में तो अच्छी वर्षा रहेगी, कुछ क्षेत्र कम वर्षा से तो कुछ अधिक वर्षा से प्रभावित होंगे। इस वर्ष जनवरी 2020 से लेकर दिसंबर 2020 तक देश के इन क्षेत्र या शहरों में ग्रहों के अनुसार कितनी बारिश होगी इसका पूरा पूरा अनुमान लगाया जा रहा है।

जनवरी
धनु लग्न में आरंभ हुआ है नया साल
- धनु राशि में पांच ग्रहों के होने से शिक्षा के क्षेत्र में विकास होगा। दलहन और तिलहन के दाम कम हो सकते हैं।
- देश हित के लिए कड़े कानून और फैसले होंगे, जिससे जनता की परेशानियां बढ़ सकती हैं।
- देश में उच्च पद पर स्थिति प्रशासनिक अधिकारियों के प्रति असन्तोष एवं आक्रोश की स्थितियां भी बन सकती हैं, लेकिन विद्रोह नहीं होगा।
- राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोप बढ़ेगा। वहीं पश्चिमी प्रदेशों में उपद्रव की होने की संभावना बनेगी।
- पांच ग्रहों का योग पड़ोसी देशों में लगे सीमान्त राज्यों में उत्पात और उपद्रव बढ़ाने वाला रहेगा।
- नया साल षष्ठी तिथि को प्रारम्भ हो रहा है। षष्ठी तिथि की सामान्य संज्ञा नन्दा है, इसका विशेष नाम कीर्ति है।
- नए साल की शुरुआत बुधवार को होने से फसलों का उत्पादन अच्छा होगा। निर्यात में बढ़ोत्तरी होगी।
- फल एवं सब्जियों के दाम पूरे साल अनुकूल रहेंगे, क्योंकि  बुध वाणिज्य और व्यापार का कारक ग्रह है।
- पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र होने से देश में जल, सिंचाई और नदियों से जुड़ी बड़ी योजनाओं पर फैसले हो सकते हैं। वहीं तैतिल करण होने से प्रशासन और सैनिकों के लिए पूरा साल श्रेष्ठ रहेगा।2 जनवरी 2020 को सूर्य, गुरु, शनि, केतु के साथ बुध का युति संबंध बनेगा। युति कृत बुध का प्रभाव इन बारह दिनों में विशेष तौर पर दिखाई देगा। यह समय पृथ्वी के ज्यादातर भागों पर अपना रौद्र प्रभाव छोड़ेगा।6 से 10 जनवरी, 20 से 24 जनवरी, 28 से 30 जनवरी तक देश के कई हिस्सों में शीतलहर, हिमपात, ओलावृष्टि हो सकती है।
15 जनवरी 2020 के बाद आंशिक राहत मिलेगी। सूर्य के उत्तरायण की अयन पद्धति में मकर राशि के प्रवेश काल से मौसम में ऊष्मा का प्रभाव बढ़ जाता है।
 29 मार्च 2020 से मंगल, शनि, गुरु की मकरराशि के उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में  तीन ग्रहों का  युक्ति  योग बन रहा है ।
  16 जून से 22 जून तक बुध, गुरु, शुक्र, शनि ,राहु तथा केतु वक्री रहेंगे इस प्रकार 37 दिनों तक 6 ग्रह वक्री रहेंगे । इन 37 दिनों में खाद्यान्नों में  तेजी एवं सत्ता में बिखराव के योग बन सकते हैं ।
24 सितम्बर 20 से राहु – मृगशिरा,  तथा केतु  -ज्येष्ठा  नक्षत्र में प्रवेश करेंगे जो गोचर भ्रमण के दौरान वृषभ एवं वृश्चिक राशि में रहेंगे।
19जून से 3 अगस्त 2020 तक बाढ़ से जनधन हानि, पशुहानि, पतन, संघर्ष, तनाव, तंगाई, वाहन दुर्घटनाएं आदि की योग बन सकते हैं ।
  29 मार्च 2020  से गुरु अतिचार गति से भ्रमण रत होकर  मकर राशि में प्रवेश करेंगे ।
  8 मई से 12 सितंबर 2020 तक शनि  वक्री गति से भ्रमण सील रहेंगे।
  11 मई से 22 जून सन 2020 तक शुक्र वक्री होकर भ्रमण करेंगे 
  16 मई से 15 सितंबर 2020 गुरु वक्री  रहेंगे। 
  15 जून से 8 सब 3 अगस्त  2020 तक मकर राशि में चतुष्य ग्रही चाल ।
दिनांक 28। ---_-----------_-------    -------_       अक्टूबर  2020  से 17  दिसंबर  2020 तक का समय संघर्ष, तनाव, दुर्घटना , आर्थिक मंदी आदि की ओर इंगित करता है  यह अवधि राजनैतिक क्षेत्र में संघर्ष एवं सत्ता संघर्ष की ओर इंगित करती है

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

चंद्र ग्रहण 10/1/2020

https://youtu.be/bV7kSwr8i3w
https://youtu.be/bV7kSwr8i3wमित्रों दिसंबर में  सूर्य ग्रहण के बाद साल 2020 यानी नए साल का पहला ग्रहण 10 जनवरी को होगा। यह चंद्र ग्रहण होगा और यह 10 जनवरी की रात में 10 बजकर 37 मिनट से शुरू होगा और 11 जनवरी को 2 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। इस ग्रहण की कुल अवधि 4 घंटे 06 मिनट है। चंद्रग्रहण भारत, यूरोप, अफ्रीक, एशिया और आस्ट्रेलिया में देखा जाएगा।https://youtu.be/bV7kSwr8i3w
 ग्रहण शुरू होने का समय –  10 जनवरी 2020, 22:37 PM
ग्रहण समाप्त होने का समय – 11 जनवरी 2020, 02:42 AM
ग्रहणकी अवधि – 00:40
ग्रहण के दौरान चंद्रमा, मिथुन राशि में और पुनर्वसु नक्षत्र में होगा।इस चंद्र ग्रहण की अवधि कुल 4 घंटे से ज्यादा होगी। सबसे खास बात यह है कि यह भारत में भी दिखाई देगा।  सूतक भी ग्रहण लगने से 12 घंटे पहले शुरू हो जाएगा। इसके मुताबिक भारतीय समय के अनुसार 10 जनवरी की सुबह 10 बजे से ग्रहण का सूतक आरंभ हो जाएगा। सूतक से पहले ही  पूर्णिमा की पूजा के बाद सभी मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाएंगे।।
मित्रों इस ग्रहण के दौरान कई दुष्प्रभाव सामने आएंगे पहले सूर्य ग्रहण और अब चंद्र ग्रहण इससे कहीं ना कहीं महावारी कर लेगी इसका इलाज पूरे विश्व को ढूंढने से नहीं मिलेगा पूरे विश्व इस से ग्रसित होगा कहीं ना कहीं जलजला भूचाल तूफान ओलावृष्टि जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।
मित्रों ग्रहण के दौरान नकारात्मक शक्तियां ज्यादा हावी रहती हैं, मित्रों हमारी जन्म कुंडली के अंदर भी ग्रहण दोष पाया जाता है अतः इस चंद्रग्रहण पर हम उसके उपाय करके उस दोष को उसके द्वारा दी जाने वाली पीड़ा को कम कर सकते हैं मित्रों अगर कुंडली में चंद्र ग्रहण हो तो उसके कई दुष्परिणाम बुरे प्रभाव हमें देखने को मिलते यह दोष भाग्य कमजोर कर देते है ,बहुत ख़राब कर देते है लाइफ में हर चीज़ संघर्ष से बनती है या संघर्ष से मिलती है  हमारे चन्द्र ग्रह से वाहन का सुख सम्पति का सुख विशेष रूप से माता और दादी का सुख और घर का रूपया पैसा और मकान आदि सुख देखा जाता है.
  जन्म कुंडली में यदि चन्द्र राहू या केतु के साथ आ जाये तो वे शुभ फल नहीं देता है.ज्योतिष ने इसे चन्द्र ग्रहण माना है, यदि जन्म कुंडली में ऐसा योग हो तो चंद्रमा से सम्बंधित सभी फल नष्ट हो जाते है माता को कष्ट मिलता है घर में शांति का वातावरण नहीं रहता जमीन और मकान सम्बन्धी समस्या आती है.चन्द्र ग्रहण योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है,चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है,माँ के सुख में कमी आती है, कार्य को शुरू करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना लक्षण हैं, फोबिया,मानसिक बीमारी, डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया,इसी योग के कारण माने गए हैं, मिर्गी ,चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है.
—-चन्द्र+केतु ,सूर्य+राहू ग्रहण योग बनाते है..इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञन से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं 
कुंडली चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं । चूँकि चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी विशेष नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है  मित्रों आप की कुंडली में भी चंद्र ग्रहण दोष है तो आप मुझसे या किसी अच्छै astrologer से मिलकर  उपाय करें यह आपके लिए इस बेस्ट रहेगा https://youtu.be/bV7kSwr8i3wकुछ उपाय मैंने अपने यूट्यूब वीडियो में बताएं जिसका लिंक में जहां दे रहा हूं उसको ओपन करके सूने  उसको करके आप लाभ उठा सकते हैं

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

कुंडली मिलान कंप्यूटर बाबा से

 
जन्म, विवाह एवं मृ्त्यु ये तीनों ही जीवन के अति महत्वपूर्ण पडाव या कहें कि अंग माने गये हैं। बेशक जन्म और मृ्त्यु पर तो किसी का भी वश नहीं,किन्तु विवाह एक ऎसा माँगलिक कार्य है जिसके प्रति पुरातन एवं आधुनिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर यदि थोडी सी समझदारी दिखाई जाए तो जीवन को सुखपूर्वक व्यतीत किया जा सकता है। विवाह जिसका मर्म दो आत्माओं का स्वरैक्य है,जीवन में प्रेम, सहानुभूति,कोमलता,पवित्रता तथा भावनाओं का विकास है।आजकल समयाभाव के कारण विवाह की अत्यन्त जटिल विधि को भी बहुत थोडे समय में तुरत फुरत निपटाने की एक परम्परा ही चल पडी है। लेकिन इन सब में भी एक बात जो सबसे अधिक महत्व रखती है,वो है विवाह पूर्व लडका-लडकी की जन्म पत्रिका का मिलान किया जाना। इससे परिणय सूत्र में बँधने वाले वर-वधू के जन्मकालीन ग्रहों तथा नक्षत्रों में परस्पर साम्यता, मित्रता तथा संबंध पर विचार किया जाता है। शास्त्रों में मेलापक के दो भेद बताए गए हैं। एक ग्रह मेलापक तथा दूसरा नक्षत्र मेलापक। इन दोनों के आधार पर वर-वधू की शिक्षा, चरित्र,भाग्य,आयु तथा प्रजनन क्षमता का आकलन किया जाता है। नक्षत्रों के "अष्टकूट"(वर्ण,वश्य,तारा,योनि,ग्रह मैत्री,गण,भकुट,नाडी) तथा नौ ग्रह इत्यादि इस रहस्य को व्यक्त करते हैं।वैसे तो अक्सर ये भी देखने सुनने में आ जाता है कि कुण्डली मिलान के पश्चात भी पति-पत्नि में आपसी तनाव,गृ्हस्थ सुख में न्यूनता,सम्बन्ध विच्छेद रुपी दुष्परिणाम भोगने पड जाते हैं। आखिर ऎसा क्यूं होता है। इसका सबसे बडा कारण तो वो आधे अधूरे ज्योतिषी हैं, जो अपना अधकचरा ज्ञान लेकर सिर्फ गुण मिलान की संख्या को ही मेलापक की इतिश्री समझ लेते हैं। इन लोगों की नजर में यदि गुण संख्या 18 से कम हुई तो मिलान ठीक नहीं है ओर यदि संख्या 18 से अधिक हुई तो समझिये मिलान अच्छा है। गुण संख्या के अतिरिक्त मेलापक में ग्रह मिलान एवं अन्य बहुत सी बातें देखी जाती हैं,जिसका कि एक ज्योतिषी को पूर्णत: ज्ञान होना अति आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ गुणों के आधार पर मेलापक निष्कर्ष निकालता है तो समझिए वो ज्योतिषी नहीं बल्कि कोई घसियारा है,जिसने जीवन में ज्योतिष के नाम पर सिर्फ घास ही खोदी है एक ओर कारण जो कि इस विषय में उतरदायी है--वो है तकनीक पर अति निर्भरता।आजकल एक बात बहुत प्रचलन में आ गयी है कि शादी विवाह के मामले में कम्पयूटर से फ़टाफ़ट गुण मिलाकर शादी करने या नही कर देने के कारण कितने ही रिस्ते या तो शादी के बाद बिगड जाते है या जो रिस्ते कम्पयूटर से नही बनते है वे अपनी अपनी औकात को लेकर सभी प्रकार की शिक्षा को बेकार समझ कर एक तरफ़ कर दिये जाते है। हमेशा जरूरी नही है कि कम्पयूटर अपनी समझ को सही रूप में प्रकट करेगा।भई विज्ञान अभी इतना सूझवान नहीं हो पाया है कि कम्पयूटर जैसी मशीन के जरिये इन्सानी बुद्धि का काम ले सके। इसके जरिये सिर्फ कुंडली में ग्रह नक्षत्रों की स्थिति व गुण दोष ही स्पष्ट हो पाते हैं। विवाह के लिये जरूरी जन्मपत्री का वास्तविक मिलान नहीं हो पाता। कम्पयूटर के जरिये आप सिर्फ गुण मिलान की संख्या के बारे में जान सकते हैं,जीवन पर कुंडली का क्या प्रभाव रहेगा, यह बताने में अभी कंप्यूटर बाबा जी समर्थ नहीं हो पाये हैं। दरअसल यह तो एक ज्योतिष विद्वान के अनुभव आधारित ज्ञान में ही छिपा रहता है,जिसका स्थान कम्पयूटर कदापि नहीं ले सकता।

सबसे बडी बात जब और समझ में आती है जब कम्पयूटर से अष्टकूट गुण मिलान कर दिया जाता है और किसी न किसी प्रकार का नाडी भकूट वश्य आदि दोष लगाकर पत्रिका मिलान को कर दिया जाता है,राशि के अनुसार ही पत्री को मिलाया जाता है और नाम को दरकिनार कर दिया जाता है।

पिछले कुछ साल से यह प्रचलन काफ़ी बढा है उसके पहले शादी को नाम से मिला दिया जाता था और जो शादिया नाम से मिलाकर की गयी वे आज तक सलामत है और पूरी की पूरी वैवाहिक जिन्दगी को पूरा किया है। इसके साथ ही चाहे गुण पूरे छत्तिस मिले लेकिन दो माह बाद तलाक का मामला या तो अदालत में चला गया या फ़िर पत्नी या पति ने अपने ध्यान को दुष्कर्म की तरफ़ बढा दिया।

चन्द्रमा की वैसे तो चौसठ कलायें है और हर कला को कम्पयूटर से नही निकाला जा सकता है। इसका भी कारण है कि नक्षत्र भेद को दूर किया जा सकता है भकूट दोष को भी दूर किया जा सकता है लेकिन राशि भेद को सामने रखकर भी लोग एक दूसरे पर आक्षेप देने के लिये जाने जाते है।

कम्पयूटर अस्त चन्द्रमा से दूर रहेगा,वह तो केवल चन्द्रमा की गति को ही अपने केलकुलेशन में लायेगा। कम्पयूटर से अक्सर वक्री ग्रह का भेद भी नही बखान किया जाता है सूर्य और चन्द्रमा की गति पर भी निर्भरता नही दी जाती है।

जातक के जो भी नाम शुरु से प्रसिद्धि में चले गये होते है उनके बारे में दक्षिण भारत की नाडी प्रथा के अनुसार गणना करने पर अक्सर सही नाडी में ही देखे गये है और जो भी नाम से शादी विवाह मिलाये जाते है वे अक्सर सही और आजीवन साथ निभाने के लिये चलते देखे गये है।विवाह पश्चात वर एवम कन्या की परस्पर अनुकूलता तथा परिवारिक सामंजस्य हो,दोनों ही दीर्घायु हो,धन-संपत्ति एवम संतान का उत्तम सुख प्राप्त हो, इसी उद्देश्य से हमारे ऋषि-मुनिओं ने अपने ज्ञान एवम अनुसन्धान के आधार पर जन्मकुण्डली मेलापन की इस श्रेष्ठ पद्दति का विकास किया था। लेकिन शायद इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जहाँ एक ओर आधे अधूरे ज्योतिषी,गलत मिलान के परिणामस्वरूप भावी दम्पति के वैवाहिक जीवन से खिलवाड कर रहे हैं। वहीं कुछ विद्वान अपने अल्पज्ञान का परिचय देते हुए विवाह पूर्व कुण्डली मिलान के औचित्य को ही नकार रहे हैं। मैं इन लोगों से सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि मुहूर्त तथा विवाह इत्यादि जो कि वैदिक ज्योतिष के मुख्य अंग है---इनमें से यदि किसी एक भी अंग को अलग किया गया तो ये विधा ही पंगु हो जाएगी। अंगहीन तो मनुष्य भी किसी काम का नहीं रहता,फिर ये तो विधा है। जरूरत है तो सिर्फ उसे समझने की ओर ज्ञान को उसकी पूर्णता के साथ स्वीकार करने की।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

सप्ताह के सात दिनों का क्याहै रहस्य ?

www.acharyarajesh.inआचार्य राजेश कुमार
सप्ताह के सात दिनों का क्या रहस्य ?www.acharyarajesh.in




इतना तो सबको मालूम है कि सप्ताह के दिनों के नाम ग्रहों की संज्ञाओं के आधार पर रखे गए हैं अर्थात जो नाम ग्रहों के हैं, वही नाम इन दिनों के भी हैं. जैसे सूर्य के दिन का नाम रविवार, आदित्यवार, अर्कवार, भानुवार इत्यादि. शनिश्चर के दिन का नाम शनिवार, सौरिवार आदि. चाहे आप संस्कृ्त मे य़ा अन्य किसी भी भाषा में देख लें, साप्ताहिक दिनों के नाम सात ग्रहों के नाम पर भी आपको रखे मिलेंगें. संस्कृ्त में ग्रह के नाम के आगे वार या वासर या कोई ओर प्रयायवाची शब्द रख दिया जाता है. इससे यह सूचित होता है कि अमुक दिन का अमुक ग्रह है.पश्चिमी भाषाओं में भी, इसी प्रकार ग्रहों के नामों के साथ दिन का वाचक शब्द लगा दिया जाता है. जैसे कि लेटिन में सोमवार को Lunae, मंगलवार को Martis, बुधवार के लिए Mercurii इत्यादि.अब प्रश्न यह उत्पन होता है कि यह क्रम कैसे चला और अमुक दिन अमुक ग्रह का है—-इसका अभिप्राय क्या है?. ज्योतिष के ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन समय में ग्रहों का क्रम इस प्रकार माना जाता था—शनि, बृ्हस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा. अर्थात पृ्थ्वी की अपेक्षा शनि सबसे ऊपर या दूर माना जाता था और चन्द्रमा सबसे नीचे अर्थात नजदीक. इन ग्रहों को, जैसा कि सूर्य सिद्धान्त आदि ग्रन्थों से सिद्ध है, ज्योतिषियों नें दिनों का स्वामी माना है.
सूर्योदय से सूर्यादय तक के समय की संज्ञा दिन है. हमारे पूर्वजों नें इस काल को 60 भागों में विभक्त किया और एक-एक भाग का नाम घडी(घटी या घटिका) रखा. दूसरों नें उसे 24 भागों में बाँट दिया और एक एक भाग का नाम घंटा( Hour) रखा. फिर उन्होने एक-एक घंटे के समय को एक-एक ग्रह को बाँट दिया अर्थात उन्होने मान लिया कि एक-एक घंटा क्रमश: एक-एक ग्रह के आधिपत्य में रहता है. . सूर्यदेव को पूरे विश्व में सभी जगह(इस्लाम को छोडकर) ग्रहों का राजा ही माना गया है. इसलिए पहले दिन की पहली घडी या घंटे का स्वामी उन्होने सूर्य को ठहराया. अतएव पहले दिन को उन्होने सूर्य का दिन माना. इसी तरह यदि हम प्रत्येक ग्रह को एक-एक घंटे का स्वामी मानते चलें तो दिनों का वही क्रम होगा जो आजकल प्रचलित है. साठ घडी के हिसाब से रोहक्रम अर्थात नीचे से ऊपर की ओर चलना होगा. अंग्रेजी Hour या घंटे के हिसाब से चलें तो ऊपर से नीचे की ओर उतरना होगा. चाहे हम सूर्य से प्रारम्भ करें, चाहे शनि से, चाहे चन्द्रमा से क्रम वही होगा. घडियों की गणना में यदि हम सूर्य से चलें तो 61वीं घडी चन्द्रमा की होगी, 121वीं मंगल की इत्यादि. अर्थात सूर्य के दिन के अनन्तर चन्द्रमा का दिन आएगा, फिर मंगल का. इसी तरह अन्य भी समझिए. घंटों के हिसाब से 25वाँ चन्द्रमा का, 49वाँ मंगल का होगा. तदुनसार ही दिन भी होगा.अब प्रश्न यह है कि पहले पहल दिनों( Week Days) के नाम कब रखे गए और सबसे पहले किस जाति नें उसका प्रयोग किया. इसके बारे में फिर कभी किसी अन्य पोस्ट के माध्यम से जानकारी प्रदान की जायेगी… अपने मुद्दे पर वापस बात करते हैं समाज में देखा जाए , तो अधिकांश लोग मंगलवार और शनिवार को इस तरह के जैसे बाल कटवाना या जो बृहस्पतिवार को कपड़े का ना घोना मां अन्य दिनों को अन्य किसी प्रकार के कायों के लिए अशुभ मानते हैं। उनका ऐसा विश्वास है कि गलत दिनों में किया गया कार्य अनिष्टकर फल भी प्रदान कर सकता है। इसे कोरा अंधविश्वास ही कहा जा सकता है , क्योंकि भले ही ग्रहों के नाम पर इन वारों का नामकरण हो गया हो ,किन्तु सच्ची बात यह है कि ग्रहों की स्थिति से इन वारों का कोई संबंध है ही नहीं। न तो रविवार को सूर्य आकाश के किसी खास भाग में होता है ,और न ही इस दिन सूर्य की गति में कोई परिवर्तन होता है , और न ही रविवार को सूर्य केवल शुभ या अशुभ फल ही देता है। जब ऐसी बाते है ही नही तो फिर रविवार से सूर्य का कौन सा संबंध है ?आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रविवार से सूर्य का कोई संबंध है ही नहीं । रविवार से सूर्य का संबंध दिखा पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए न केवल कठिन वरन् असंभव कार्य है। सुविधा के अनुसार किसी भी बच्चे का कुछ भी नाम रखा जा सकता है , परंतु उस बच्चे में नाम के अनुसार गुण भी आ जाएं , ऐसा नििश्चत नहीं है। यथानाम तथागुण लोगों की संख्याय कम ही होती है , इस संयोग की सराहना की जा सकती है पर किसी व्यक्ति का कोई नाम रखकर उसके अनुरुप ही विशेषताओं को प्राप्त करने की इच्छा रखें तो यह हमारी भूल होगी । इस बात से आम लोग भिज्ञ भी हैं , तभी ही यह कहावत मशहूर है `
इसी तरहनाम हैं नाम घनीराम पास फुटी कोड़ी नहीं कभी-कभी पृथ्वीपति नामक व्यक्ति के पास कोई जमीन नहीं होती तथा दमड़ीलाल के पास करोड़ों की संपत्ति होती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि किसी नामकरण का कोई वैज्ञानिक अर्थ हो या नाम के साथ गुणों का भी संबंध हो , यह आवश्यक नहीं है। कोई व्यक्ति अपने पुत्र का नाम रवि रख दे तथा उसमें सूर्य की विशेषताओं की तलाश करे , उसकी पूजा कर सूर्य भगवान को खुश रखने की चेष्टा करे तो ऐसा संभव नहीं है। इस तरह न तो रविवार से सूर्य का , न सोमवार से चंद्र का , मंगलवार से मंगल का , बुधवार से बुध का , बृहस्पतिवार से बृहस्पति का , शुक्रवार से शुक्र का और न ही शनिवार से शनि का ही संबंध होता है।इसी तरह मंगलवार का व्रत करके सुखद परिस्थितियों में मन और शरीर को चाहे जिस हद तक स्वस्थ , चुस्त , दुरुस्त या विपरीत परिस्थितियों में शरीर को कमजोर कर लिया जाए , हनुमानजी या मंगल ग्रह का कितना भी स्मरण कर लिया जाए , हनुमान या मंगल पर इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता। पूजा करने से ये खुश हो जाएंगे , ऐसा विज्ञान नहीं कहता , किन्तु पुजारी ये समझ लें और बहुत आस्था के साथ पूजापाठ में तल्लीन हो जाएं , तो मनोवैज्ञानिक रुप से इसका भले ही कुछ लाभ उन्हें मिल जाए , वे कुछ क्षणों के लिए राहत की सॉस अवश्य ले लेते हैं।कभी कभी नामकरण विशेषताओं के आधार पर भी किया जाता है और कभी कुछ चित्रों और तालिकाओं के अनुसार किया जाता है। ऋतुओं का नामकरण इनकी विशेषताओं की वजह से है , इसे हम सभी जानते हैं। ग्रीष्मऋतु कहने से ही प्रचंड गमी का बोध होता है , वर्षा ऋतु से मूसलाधार बारिश का तथा शरदऋतु कहने से उस मौसम का बोध होता है , जब अत्यधिक ठंड से लोग रजाई के अंदर रहने में सुख महसूस करें। इसी तरह माह के नामकरण के साथ भी कुछ विशेषताएं जुड़ी हुई है। आिश्वन महीने का नामकरण इसलिए हुआ , क्योंकि इस महीने में अिश्वनी नक्षत्र में पूणिमा का चॉद होता है। बैशाख नाम इसलिए पड़ा , क्योंकि इस महीने में विशाखा नक्षत्र में पूणिमा का चॉद होता है।

इस तरह हर महीने की विशेषता भिन्न-भिन्न इसलिए हुई ,क्योंकि सूर्य की स्थिति प्रत्येक महीने आकाश में भिन्न-भिन्न जगहों पर होती है। ज्योतिषीय दृश्टी से भी हर महीने की अलग-अलग विशेषताएं हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में उजाले और अंधेरे का अनुपात बराबर बराबर होने के बावजूद एक को कृष्ण और दूसरे को शुक्ल पक्ष कहा गया है। दोनों पक्षों के मौलिक गुणों में कोई भी अंतर नहीं होता है। बड़ा या छोटा चॉद दोनो पक्षों में होता है। अष्टमी दोनों पक्षों में होती है। किन्तु ये नाम अलग ही दृिष्टकोण से दिए गए हैं । जिस पक्ष में शाम होने के साथ ही अंधेरा हो , उसे कृष्ण पक्ष और जिस पक्ष में शाम पर उजाला रहे , उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं।

शुक्ल पक्ष के आरंभ में चंद्रमा सूर्य के अत्यंत निकट होता है। प्रत्येक दिन सूर्य से उसकी दूरी बढ़ती चली जाती है 
सप्ताह के सात दिनों का क्या रहस्य ?
By acharyarajeshDecember 27, 2019No Comments


इतना तो सबको मालूम है कि सप्ताह के दिनों के नाम ग्रहों की संज्ञाओं के आधार पर रखे गए हैं अर्थात जो नाम ग्रहों के हैं, वही नाम इन दिनों के भी हैं. जैसे सूर्य के दिन का नाम रविवार, आदित्यवार, अर्कवार, भानुवार इत्यादि. शनिश्चर के दिन का नाम शनिवार, सौरिवार आदि. चाहे आप संस्कृ्त मे य़ा अन्य किसी भी भाषा में देख लें, साप्ताहिक दिनों के नाम सात ग्रहों के नाम पर भी आपको रखे मिलेंगें. संस्कृ्त में ग्रह के नाम के आगे वार या वासर या कोई ओर प्रयायवाची शब्द रख दिया जाता है. इससे यह सूचित होता है कि अमुक दिन का अमुक ग्रह है. पश्चिमी भाषाओं में भी, इसी प्रकार ग्रहों के नामों के साथ दिन का वाचक शब्द लगा दिया जाता है. जैसे कि लेटिन में सोमवार को Lunae, मंगलवार को Martis, बुधवार के लिए Mercurii इत्यादि.अब प्रश्न यह उत्पन होता है कि यह क्रम कैसे चला और अमुक दिन अमुक ग्रह का है—-इसका अभिप्राय क्या है?. ज्योतिष के ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन समय में ग्रहों का क्रम इस प्रकार माना जाता था—शनि, बृ्हस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा. अर्थात पृ्थ्वी की अपेक्षा शनि सबसे ऊपर या दूर माना जाता था और चन्द्रमा सबसे नीचे अर्थात नजदीक. इन ग्रहों को, जैसा कि सूर्य सिद्धान्त आदि ग्रन्थों से सिद्ध है, ज्योतिषियों नें दिनों का स्वामी माना है.
सूर्योदय से सूर्यादय तक के समय की संज्ञा दिन है. हमारे पूर्वजों नें इस काल को 60 भागों में विभक्त किया और एक-एक भाग का नाम घडी(घटी या घटिका) रखा. दूसरों नें उसे 24 भागों में बाँट दिया और एक एक भाग का नाम घंटा( Hour) रखा. फिर उन्होने एक-एक घंटे के समय को एक-एक ग्रह को बाँट दिया अर्थात उन्होने मान लिया कि एक-एक घंटा क्रमश: एक-एक ग्रह के आधिपत्य में रहता है. सूर्यदेव को पूरे विश्व में सभी जगह(इस्लाम को छोडकर) ग्रहों का राजा ही माना गया है. इसलिए पहले दिन की पहली घडी या घंटे का स्वामी उन्होने सूर्य को ठहराया. अतएव पहले दिन को उन्होने सूर्य का दिन माना. इसी तरह यदि हम प्रत्येक ग्रह को एक-एक घंटे का स्वामी मानते चलें तो दिनों का वही क्रम होगा जो आजकल प्रचलित है. साठ घडी के हिसाब से रोहक्रम अर्थात नीचे से ऊपर की ओर चलना होगा. अंग्रेजी Hour या घंटे के हिसाब से चलें तो ऊपर से नीचे की ओर उतरना होगा. चाहे हम सूर्य से प्रारम्भ करें, चाहे शनि से, चाहे चन्द्रमा से क्रम वही होगा. घडियों की गणना में यदि हम सूर्य से चलें तो 61वीं घडी चन्द्रमा की होगी, 121वीं मंगल की इत्यादि. अर्थात सूर्य के दिन के अनन्तर चन्द्रमा का दिन आएगा, फिर मंगल का. इसी तरह अन्य भी समझिए. घंटों के हिसाब से 25वाँ चन्द्रमा का, 49वाँ मंगल का होगा. तदुनसार ही दिन भी होगा.अब प्रश्न यह है कि पहले पहल दिनों( Week Days) के नाम कब रखे गए और सबसे पहले किस जाति नें उसका प्रयोग किया. इसके बारे में फिर कभी किसी अन्य पोस्ट के माध्यम से जानकारी प्रदान की जायेगी… अपने मुद्दे पर वापस बात करते हैं समाज में देखा जाए , तो अधिकांश लोग मंगलवार और शनिवार को इस तरह के जैसे बाल कटवाना या जो बृहस्पतिवार को कपड़े का ना घोना मां अन्य दिनों को अन्य किसी प्रकार के कायों के लिए अशुभ मानते हैं। उनका ऐसा विश्वास है कि गलत दिनों में किया गया कार्य अनिष्टकर फल भी प्रदान कर सकता है। इसे कोरा अंधविश्वास ही कहा जा सकता है , क्योंकि भले ही ग्रहों के नाम पर इन वारों का नामकरण हो गया हो ,किन्तु सच्ची बात यह है कि ग्रहों की स्थिति से इन वारों का कोई संबंध है ही नहीं। न तो रविवार को सूर्य आकाश के किसी खास भाग में होता है ,और न ही इस दिन सूर्य की गति में कोई परिवर्तन होता है , और न ही रविवार को सूर्य केवल शुभ या अशुभ फल ही देता है। जब ऐसी बाते है ही नही तो फिर रविवार से सूर्य का कौन सा संबंध है ?
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रविवार से सूर्य का कोई संबंध है ही नहीं । रविवार से सूर्य का संबंध दिखा पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए न केवल कठिन वरन् असंभव कार्य है। सुविधा के अनुसार किसी भी बच्चे का कुछ भी नाम रखा जा सकता है , परंतु उस बच्चे में नाम के अनुसार गुण भी आ जाएं , ऐसा नििश्चत नहीं है। यथानाम तथागुण लोगों की संख्याय कम ही होती है , इस संयोग की सराहना की जा सकती है पर किसी व्यक्ति का कोई नाम रखकर उसके अनुरुप ही विशेषताओं को प्राप्त करने की इच्छा रखें तो यह हमारी भूल होगी । इस बात से आम लोग भिज्ञ भी हैं , तभी ही यह कहावत मशहूर है `
इसी तरहनाम हैं नाम घनीराम पास फुटी कोड़ी नहीं कभी-कभी पृथ्वीपति नामक व्यक्ति के पास कोई जमीन नहीं होती तथा दमड़ीलाल के पास करोड़ों की संपत्ति होती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि किसी नामकरण का कोई वैज्ञानिक अर्थ हो या नाम के साथ गुणों का भी संबंध हो , यह आवश्यक नहीं है। कोई व्यक्ति अपने पुत्र का नाम रवि रख दे तथा उसमें सूर्य की विशेषताओं की तलाश करे , उसकी पूजा कर सूर्य भगवान को खुश रखने की चेष्टा करे तो ऐसा संभव नहीं है। इस तरह न तो रविवार से सूर्य का , न सोमवार से चंद्र का , मंगलवार से मंगल का , बुधवार से बुध का , बृहस्पतिवार से बृहस्पति का , शुक्रवार से शुक्र का और न ही शनिवार से शनि का ही संबंध होता है।इसी तरह मंगलवार का व्रत करके सुखद परिस्थितियों में मन और शरीर को चाहे जिस हद तक स्वस्थ , चुस्त , दुरुस्त या विपरीत परिस्थितियों में शरीर को कमजोर कर लिया जाए , हनुमानजी या मंगल ग्रह का कितना भी स्मरण कर लिया जाए , हनुमान या मंगल पर इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता। पूजा करने से ये खुश हो जाएंगे , ऐसा विज्ञान नहीं कहता , किन्तु पुजारी ये समझ लें और बहुत आस्था के साथ पूजापाठ में तल्लीन हो जाएं , तो मनोवैज्ञानिक रुप से इसका भले ही कुछ लाभ उन्हें मिल जाए , वे कुछ क्षणों के लिए राहत की सॉस अवश्य ले लेते हैं।
कभी कभी नामकरण विशेषताओं के आधार पर भी किया जाता है और कभी कुछ चित्रों और तालिकाओं के अनुसार किया जाता है। ऋतुओं का नामकरण इनकी विशेषताओं की वजह से है , इसे हम सभी जानते हैं। ग्रीष्मऋतु कहने से ही प्रचंड गमी का बोध होता है , वर्षा ऋतु से मूसलाधार बारिश का तथा शरदऋतु कहने से उस मौसम का बोध होता है , जब अत्यधिक ठंड से लोग रजाई के अंदर रहने में सुख महसूस करें। इसी तरह माह के नामकरण के साथ भी कुछ विशेषताएं जुड़ी हुई है। आिश्वन महीने का नामकरण इसलिए हुआ , क्योंकि इस महीने में अिश्वनी नक्षत्र में पूणिमा का चॉद होता है। बैशाख नाम इसलिए पड़ा , क्योंकि इस महीने में विशाखा नक्षत्र में पूणिमा का चॉद होता है।

इस तरह हर महीने की विशेषता भिन्न-भिन्न इसलिए हुई ,क्योंकि सूर्य की स्थिति प्रत्येक महीने आकाश में भिन्न-भिन्न जगहों पर होती है। ज्योतिषीय दृश्टी से भी हर महीने की अलग-अलग विशेषताएं हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में उजाले और अंधेरे का अनुपात बराबर बराबर होने के बावजूद एक को कृष्ण और दूसरे को शुक्ल पक्ष कहा गया है। दोनों पक्षों के मौलिक गुणों में कोई भी अंतर नहीं होता है। बड़ा या छोटा चॉद दोनो पक्षों में होता है। अष्टमी दोनों पक्षों में होती है। किन्तु ये नाम अलग ही दृिष्टकोण से दिए गए हैं । जिस पक्ष में शाम होने के साथ ही अंधेरा हो , उसे कृष्ण पक्ष और जिस पक्ष में शाम पर उजाला रहे , उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं।

शुक्ल पक्ष के आरंभ में चंद्रमा सूर्य के अत्यंत निकट होता है। प्रत्येक दिन सूर्य से उसकी दूरी बढ़ती चली जाती है और पूर्णमासी के दिन यह सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर पूर्ण प्रकाशमान देखा जाता है। इस समय सूर्य से इसकी कोणिक दूरी 180 डिग्री होती है। इस दिन सूर्यास्त से सूयोदय तक रोशनी होती है। इसके बाद कृष्ण पक्ष का प्रारंभ होता है। प्रत्येक दिन सूर्य और चंद्रमा की कोणिक दूरी घटने लगती है। इसका प्रकाशमान भाग घटने लगता है और कृष्ण पक्ष के अंत में अमावश तिथि के दिन सूर्य चंद्रमा एक ही विन्दु पर होते हैं। सूयोदय से सूर्यास्त तक अंधेरा ही अंधेरा होता है।इस तरह ऋतु , महीने और पक्षों की वैज्ञानिकता समझ में आ जाती है। भचक्र में सूर्य , चंद्रमा और नक्षत्र – सभी का एक दूसरे के साथ परस्पर संबंध है , किन्तु सप्ताह के सात दिनों का नामकरण ग्रहों के गुणों पर आधारित न होकर याद रख पाने की सुविधा से प्रमुख सात आकाशीय पिंडों के नाम के आधार पर किया गया लगता है , महीनें को दो हिस्सों में बॉटकर एक-एक पखवारे का शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष बनाया गया है। दोनो ही पक्ष सूर्य और चंद्रमा की वििभ्न्न स्थितियों के सापेक्ष हैं , किन्तु एक पखवारे को दो हिस्सों में बॉटकर दो सप्ताह में समझने की विधि केवल सुविधावादी दृिष्टकोण का परिचायक है। जब सप्ताह का निर्माण ही ग्रहों पर आधारित नहीं है , तो उसके अंदर आनेवाले सात अलग अलग दिनों का भी कोई वैज्ञानिक अर्थ नहीं है।

सौरमास और चंद्रमास दोनों की परिकल्पनाओं का आधार भिन-भिन्न है। पृथ्वी 365 दिन और कुछ घंटों में एक बार सूर्य की परिक्रमा कर लेती है। इसे सौर वर्ष कहतें हैं, इसके बारहवें भाग को एक महीना कहा जाता है। सौरमास से अभिप्राय सूर्य का एक रािश में ठहराव या आकाश में 30 डिग्री की दूरी तय करना होता है। चंद्रमास उसे कहते हैं , जब चंद्रमा एक बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है। यह लगभग 29 दिनों का होता है । बारह महीनों में बारह बार सूर्य की परिक्रमा करने में चंद्रमा को लगभग 354 दिन लगते हैं। इसलिए चंद्रवर्ष 354 दिनों का होता है। सौर वष्र और चंद्रवर्ष के सवा ग्यारह दिनों के अंतर को प्रत्येक तीन वषो के पश्चात् चंद्रवर्ष में एक अतिरिक्त महीनें मलमास को जोड़कर पाट दिया जाताहै।सौर वर्ष में भी 365 दिनों के अतिरिक्त के 5 घंटों को चार वषे बाद लीप ईयर वर्ष में फरवरी महीने को 29 दिनों का बनाकर समन्वय किया जाता है , किन्तु सप्ताह के सात दिन , जो पखवारे के 15 दिन , महीने के 30 दिन , चांद्र वर्ष के 354 दिन और सौर वर्ष के 365 दिन में से किसी का भी पूर्ण भाजक या अपवत्र्तांक नहीं है , के समन्वय या समायोजन का ज्योतिष शास्त्र में कहीं भी उल्लेख नहीं है , जिससे स्वयंमेव ही ज्योतिषीय संदर्भ में सप्ताह की अवैज्ञानिकता सिद्ध हो जाती है। अत: मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रविवार को सूर्य का , सोमवार को चंद्र का , मंगलवार को मंगल का , बुधवार को बुध का , बृहस्पतिवार को बृहस्पति का , शुक्रवार को शुक्र का तथ शनिवार को शनि का पर्याय मान लेना एक बहुत बड़ी गल्ती है। ग्रहों का सप्ताह के सातो दिनों से कोई लेना-देना नहीं है।

सात दिनों का सप्ताह मानकर पक्ष को लगभग दो हिस्सों में बॉटकर सात दिनों के माध्यम से सातो ग्रहों को याद करने की चेष्टा की गयी होगी। लोग कभी यह महसूस नहीं करें कि ग्रहों का प्रभाव नहीं होता ।शायद इसी शाश्वत सत्य के स्वीकर करने और कराने के लिए ऋषि मुनियो द्वारा सप्ताह के सात दिनों को ग्रहों के साथ जोड़ना एक बड़े सूत्र के रुप में काम आया हो। एक ज्योतिषी होने के नाते सप्ताह के इन सात दिनों से मुझे अन्य कुछ सुविधाएं प्राप्त हैं। आज मंगलवार को चंद्रमा सिंह रािश में स्थित है , तो बिना पंचांग देख ही यह अनुमान लगाना संभव है कि आगामी मंगलवार को चंद्रमा वृिश्चक राशि में , उसके बाद वाले मंगलवार को कुंभ राशि में तथ उसके बादवाले मंगलवार को वृष राशि में या उसके अत्यंत निकट होगा।मानकर इसे 4 भागों में बॉट दिया गया हो तो हिसाब सुविधा की दृिष्ट से अच्छा ही है। मंगलवार को स्थिर राशि में चंद्रमा है तो कुछ सताहों तक आनेवाले मंगलवार को चंद्रमा स्थिर राशि में ही रहेगा। कुछ दिनों बाद चंद्रमा द्विस्वभाव राशि में चला जाएगा तो फिर कुछ सप्ताहों तक मंगलवार को चंद्रमा द्विस्वभाव राशि में ही रहेगा।आचार्य राजेश कुमार
सप्ताह के सात दिनों का क्या रहस्य ?
By acharyarajeshDecember 27, 2019No Comments


इतना तो सबको मालूम है कि सप्ताह के दिनों के नाम ग्रहों की संज्ञाओं के आधार पर रखे गए हैं अर्थात जो नाम ग्रहों के हैं, वही नाम इन दिनों के भी हैं. जैसे सूर्य के दिन का नाम रविवार, आदित्यवार, अर्कवार, भानुवार इत्यादि. शनिश्चर के दिन का नाम शनिवार, सौरिवार आदि. चाहे आप संस्कृ्त मे य़ा अन्य किसी भी भाषा में देख लें, साप्ताहिक दिनों के नाम सात ग्रहों के नाम पर भी आपको रखे मिलेंगें. संस्कृ्त में ग्रह के नाम के आगे वार या वासर या कोई ओर प्रयायवाची शब्द रख दिया जाता है. इससे यह सूचित होता है कि अमुक दिन का अमुक ग्रह है. पश्चिमी भाषाओं में भी, इसी प्रकार ग्रहों के नामों के साथ दिन का वाचक शब्द लगा दिया जाता है. जैसे कि लेटिन में सोमवार को Lunae, मंगलवार को Martis, बुधवार के लिए Mercurii इत्यादि.अब प्रश्न यह उत्पन होता है कि यह क्रम कैसे चला और अमुक दिन अमुक ग्रह का है—-इसका अभिप्राय क्या है?. ज्योतिष के ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन समय में ग्रहों का क्रम इस प्रकार माना जाता था—शनि, बृ्हस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा. अर्थात पृ्थ्वी की अपेक्षा शनि सबसे ऊपर या दूर माना जाता था और चन्द्रमा सबसे नीचे अर्थात नजदीक. इन ग्रहों को, जैसा कि सूर्य सिद्धान्त आदि ग्रन्थों से सिद्ध है, ज्योतिषियों नें दिनों का स्वामी माना है.
सूर्योदय से सूर्यादय तक के समय की संज्ञा दिन है. हमारे पूर्वजों नें इस काल को 60 भागों में विभक्त किया और एक-एक भाग का नाम घडी(घटी या घटिका) रखा. दूसरों नें उसे 24 भागों में बाँट दिया और एक एक भाग का नाम घंटा( Hour) रखा. फिर उन्होने एक-एक घंटे के समय को एक-एक ग्रह को बाँट दिया अर्थात उन्होने मान लिया कि एक-एक घंटा क्रमश: एक-एक ग्रह के आधिपत्य में रहता है. सूर्यदेव को पूरे विश्व में सभी जगह(इस्लाम को छोडकर) ग्रहों का राजा ही माना गया है. इसलिए पहले दिन की पहली घडी या घंटे का स्वामी उन्होने सूर्य को ठहराया. अतएव पहले दिन को उन्होने सूर्य का दिन माना. इसी तरह यदि हम प्रत्येक ग्रह को एक-एक घंटे का स्वामी मानते चलें तो दिनों का वही क्रम होगा जो आजकल प्रचलित है. साठ घडी के हिसाब से रोहक्रम अर्थात नीचे से ऊपर की ओर चलना होगा. अंग्रेजी Hour या घंटे के हिसाब से चलें तो ऊपर से नीचे की ओर उतरना होगा. चाहे हम सूर्य से प्रारम्भ करें, चाहे शनि से, चाहे चन्द्रमा से क्रम वही होगा. घडियों की गणना में यदि हम सूर्य से चलें तो 61वीं घडी चन्द्रमा की होगी, 121वीं मंगल की इत्यादि. अर्थात सूर्य के दिन के अनन्तर चन्द्रमा का दिन आएगा, फिर मंगल का. इसी तरह अन्य भी समझिए. घंटों के हिसाब से 25वाँ चन्द्रमा का, 49वाँ मंगल का होगा. तदुनसार ही दिन भी होगा.अब प्रश्न यह है कि पहले पहल दिनों( Week Days) के नाम कब रखे गए और सबसे पहले किस जाति नें उसका प्रयोग किया. इसके बारे में फिर कभी किसी अन्य पोस्ट के माध्यम से जानकारी प्रदान की जायेगी… अपने मुद्दे पर वापस बात करते हैं समाज में देखा जाए , तो अधिकांश लोग मंगलवार और शनिवार को इस तरह के जैसे बाल कटवाना या जो बृहस्पतिवार को कपड़े का ना घोना मां अन्य दिनों को अन्य किसी प्रकार के कायों के लिए अशुभ मानते हैं। उनका ऐसा विश्वास है कि गलत दिनों में किया गया कार्य अनिष्टकर फल भी प्रदान कर सकता है। इसे कोरा अंधविश्वास ही कहा जा सकता है , क्योंकि भले ही ग्रहों के नाम पर इन वारों का नामकरण हो गया हो ,किन्तु सच्ची बात यह है कि ग्रहों की स्थिति से इन वारों का कोई संबंध है ही नहीं। न तो रविवार को सूर्य आकाश के किसी खास भाग में होता है ,और न ही इस दिन सूर्य की गति में कोई परिवर्तन होता है , और न ही रविवार को सूर्य केवल शुभ या अशुभ फल ही देता है। जब ऐसी बाते है ही नही तो फिर रविवार से सूर्य का कौन सा संबंध है ?
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रविवार से सूर्य का कोई संबंध है ही नहीं । रविवार से सूर्य का संबंध दिखा पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए न केवल कठिन वरन् असंभव कार्य है। सुविधा के अनुसार किसी भी बच्चे का कुछ भी नाम रखा जा सकता है , परंतु उस बच्चे में नाम के अनुसार गुण भी आ जाएं , ऐसा नििश्चत नहीं है। यथानाम तथागुण लोगों की संख्याय कम ही होती है , इस संयोग की सराहना की जा सकती है पर किसी व्यक्ति का कोई नाम रखकर उसके अनुरुप ही विशेषताओं को प्राप्त करने की इच्छा रखें तो यह हमारी भूल होगी । इस बात से आम लोग भिज्ञ भी हैं , तभी ही यह कहावत मशहूर है `
इसी तरहनाम हैं नाम घनीराम पास फुटी कोड़ी नहीं कभी-कभी पृथ्वीपति नामक व्यक्ति के पास कोई जमीन नहीं होती तथा दमड़ीलाल के पास करोड़ों की संपत्ति होती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि किसी नामकरण का कोई वैज्ञानिक अर्थ हो या नाम के साथ गुणों का भी संबंध हो , यह आवश्यक नहीं है। कोई व्यक्ति अपने पुत्र का नाम रवि रख दे तथा उसमें सूर्य की विशेषताओं की तलाश करे , उसकी पूजा कर सूर्य भगवान को खुश रखने की चेष्टा करे तो ऐसा संभव नहीं है। इस तरह न तो रविवार से सूर्य का , न सोमवार से चंद्र का , मंगलवार से मंगल का , बुधवार से बुध का , बृहस्पतिवार से बृहस्पति का , शुक्रवार से शुक्र का और न ही शनिवार से शनि का ही संबंध होता है।इसी तरह मंगलवार का व्रत करके सुखद परिस्थितियों में मन और शरीर को चाहे जिस हद तक स्वस्थ , चुस्त , दुरुस्त या विपरीत परिस्थितियों में शरीर को कमजोर कर लिया जाए , हनुमानजी या मंगल ग्रह का कितना भी स्मरण कर लिया जाए , हनुमान या मंगल पर इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता। पूजा करने से ये खुश हो जाएंगे , ऐसा विज्ञान नहीं कहता , किन्तु पुजारी ये समझ लें और बहुत आस्था के साथ पूजापाठ में तल्लीन हो जाएं , तो मनोवैज्ञानिक रुप से इसका भले ही कुछ लाभ उन्हें मिल जाए , वे कुछ क्षणों के लिए राहत की सॉस अवश्य ले लेते हैं।
कभी कभी नामकरण विशेषताओं के आधार पर भी किया जाता है और कभी कुछ चित्रों और तालिकाओं के अनुसार किया जाता है। ऋतुओं का नामकरण इनकी विशेषताओं की वजह से है , इसे हम सभी जानते हैं। ग्रीष्मऋतु कहने से ही प्रचंड गमी का बोध होता है , वर्षा ऋतु से मूसलाधार बारिश का तथा शरदऋतु कहने से उस मौसम का बोध होता है , जब अत्यधिक ठंड से लोग रजाई के अंदर रहने में सुख महसूस करें। इसी तरह माह के नामकरण के साथ भी कुछ विशेषताएं जुड़ी हुई है। आिश्वन महीने का नामकरण इसलिए हुआ , क्योंकि इस महीने में अिश्वनी नक्षत्र में पूणिमा का चॉद होता है। बैशाख नाम इसलिए पड़ा , क्योंकि इस महीने में विशाखा नक्षत्र में पूणिमा का चॉद होता है।

इस तरह हर महीने की विशेषता भिन्न-भिन्न इसलिए हुई ,क्योंकि सूर्य की स्थिति प्रत्येक महीने आकाश में भिन्न-भिन्न जगहों पर होती है। ज्योतिषीय दृश्टी से भी हर महीने की अलग-अलग विशेषताएं हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में उजाले और अंधेरे का अनुपात बराबर बराबर होने के बावजूद एक को कृष्ण और दूसरे को शुक्ल पक्ष कहा गया है। दोनों पक्षों के मौलिक गुणों में कोई भी अंतर नहीं होता है। बड़ा या छोटा चॉद दोनो पक्षों में होता है। अष्टमी दोनों पक्षों में होती है। किन्तु ये नाम अलग ही दृिष्टकोण से दिए गए हैं । जिस पक्ष में शाम होने के साथ ही अंधेरा हो , उसे कृष्ण पक्ष और जिस पक्ष में शाम पर उजाला रहे , उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं।

शुक्ल पक्ष के आरंभ में चंद्रमा सूर्य के अत्यंत निकट होता है। प्रत्येक दिन सूर्य से उसकी दूरी बढ़ती चली जाती है और पूर्णमासी के दिन यह सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर पूर्ण प्रकाशमान देखा जाता है। इस समय सूर्य से इसकी कोणिक दूरी 180 डिग्री होती है। इस दिन सूर्यास्त से सूयोदय तक रोशनी होती है। इसके बाद कृष्ण पक्ष का प्रारंभ होता है। प्रत्येक दिन सूर्य और चंद्रमा की कोणिक दूरी घटने लगती है। इसका प्रकाशमान भाग घटने लगता है और कृष्ण पक्ष के अंत में अमावश तिथि के दिन सूर्य चंद्रमा एक ही विन्दु पर होते हैं। सूयोदय से सूर्यास्त तक अंधेरा ही अंधेरा होता है।इस तरह ऋतु , महीने और पक्षों की वैज्ञानिकता समझ में आ जाती है। भचक्र में सूर्य , चंद्रमा और नक्षत्र – सभी का एक दूसरे के साथ परस्पर संबंध है , किन्तु सप्ताह के सात दिनों का नामकरण ग्रहों के गुणों पर आधारित न होकर याद रख पाने की सुविधा से प्रमुख सात आकाशीय पिंडों के नाम के आधार पर किया गया लगता है , महीनें को दो हिस्सों में बॉटकर एक-एक पखवारे का शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष बनाया गया है। दोनो ही पक्ष सूर्य और चंद्रमा की वििभ्न्न स्थितियों के सापेक्ष हैं , किन्तु एक पखवारे को दो हिस्सों में बॉटकर दो सप्ताह में समझने की विधि केवल सुविधावादी दृिष्टकोण का परिचायक है। जब सप्ताह का निर्माण ही ग्रहों पर आधारित नहीं है , तो उसके अंदर आनेवाले सात अलग अलग दिनों का भी कोई वैज्ञानिक अर्थ नहीं है।

सौरमास और चंद्रमास दोनों की परिकल्पनाओं का आधार भिन-भिन्न है। पृथ्वी 365 दिन और कुछ घंटों में एक बार सूर्य की परिक्रमा कर लेती है। इसे सौर वर्ष कहतें हैं, इसके बारहवें भाग को एक महीना कहा जाता है। सौरमास से अभिप्राय सूर्य का एक रािश में ठहराव या आकाश में 30 डिग्री की दूरी तय करना होता है। चंद्रमास उसे कहते हैं , जब चंद्रमा एक बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है। यह लगभग 29 दिनों का होता है । बारह महीनों में बारह बार सूर्य की परिक्रमा करने में चंद्रमा को लगभग 354 दिन लगते हैं। इसलिए चंद्रवर्ष 354 दिनों का होता है। सौर वष्र और चंद्रवर्ष के सवा ग्यारह दिनों के अंतर को प्रत्येक तीन वषो के पश्चात् चंद्रवर्ष में एक अतिरिक्त महीनें मलमास को जोड़कर पाट दिया जाता है।

सौर वर्ष में भी 365 दिनों के अतिरिक्त के 5 घंटों को चार वषे बाद लीप ईयर वर्ष में फरवरी महीने को 29 दिनों का बनाकर समन्वय किया जाता है , किन्तु सप्ताह के सात दिन , जो पखवारे के 15 दिन , महीने के 30 दिन , चांद्र वर्ष के 354 दिन और सौर वर्ष के 365 दिन में से किसी का भी पूर्ण भाजक या अपवत्र्तांक नहीं है , के समन्वय या समायोजन का ज्योतिष शास्त्र में कहीं भी उल्लेख नहीं है , जिससे स्वयंमेव ही ज्योतिषीय संदर्भ में सप्ताह की अवैज्ञानिकता सिद्ध हो जाती है। अत: मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रविवार को सूर्य का , सोमवार को चंद्र का , मंगलवार को मंगल का , बुधवार को बुध का , बृहस्पतिवार को बृहस्पति का , शुक्रवार को शुक्र का तथ शनिवार को शनि का पर्याय मान लेना एक बहुत बड़ी गल्ती है। ग्रहों का सप्ताह के सातो दिनों से कोई लेना-देना नहीं है।

सात दिनों का सप्ताह मानकर पक्ष को लगभग दो हिस्सों में बॉटकर सात दिनों के माध्यम से सातो ग्रहों को याद करने की चेष्टा की गयी होगी। लोग कभी यह महसूस नहीं करें कि ग्रहों का प्रभाव नहीं होता ।शायद इसी शाश्वत सत्य के स्वीकर करने और कराने के लिए ऋषि मुनियो द्वारा सप्ताह के सात दिनों को ग्रहों के साथ जोड़ना एक बड़े सूत्र के रुप में काम आया हो। एक ज्योतिषी होने के नाते सप्ताह के इन सात दिनों से मुझे अन्य कुछ सुविधाएं प्राप्त हैं। आज मंगलवार को चंद्रमा सिंह रािश में स्थित है , तो बिना पंचांग देख ही यह अनुमान लगाना संभव है कि आगामी मंगलवार को चंद्रमा वृिश्चक राशि में , उसके बाद वाले मंगलवार को कुंभ राशि में तथ उसके बादवाले मंगलवार को वृष राशि में या उसके अत्यंत निकट होगा।मानकर इसे 4 भागों में बॉट दिया गया हो तो हिसाब सुविधा की दृिष्ट से अच्छा ही है। मंगलवार को स्थिर राशि में चंद्रमा है तो कुछ सताहों तक आनेवाले मंगलवार को चंद्रमा स्थिर राशि में ही रहेगा। कुछ दिनों बाद चंद्रमा द्विस्वभाव राशि में चला जाएगा तो फिर कुछ सप्ताहों तक मंगलवार को चंद्रमा द्विस्वभाव राशि में ही रहेगा।

मैं वैज्ञानिक तथ्यों को सहज ही स्वीकार करता हूं। पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग और करण की चर्चा रहती है। ये सभी ग्रहों की स्थिति पर आधारित हैं। किसी ज्योतिषी को बहुत दिनों तक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया जाए , ताकि महीने और दिनों के बीतने की कोई सूचना उसके पास नहीं हो । कुछ महीनों बाद जिस दिन उसे आसमान को निहारने का मौका मिल जाएगा , केवल सूर्य और चंद्रमा की स्थिति को देखकर वह समझ जाएगा कि उस दिन कौन सी तिथि है , कौन से नक्षत्र में चंद्रमा है , सामान्य गणना से वह योग और करण की भी जानकारी प्राप्त कर सकेगा , किन्तु उसे सप्ताह के दिन की जानकारी कदापि संभव नहीं हो पाएगी , ऐसा इसलिए क्योंकि सूर्य , चंद्रमा या अन्य ग्रहों की स्थिति के सापेक्ष सप्ताह के सात के दिनों का नामकरण नहीं है।

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

#सुर्य ग्रहण(Surya Grahan)Solar Eclipse


मित्रों साल का आखिरी ग्रहण लगने में अब कुछ ही दिन शेष रह गये हैं। ये वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा। 26 दिसंबर को लगने जा रहे ग्रहण में सूर्य के बीच के भाग को चंद्रमा पूरी तरह से ढक देगा। जिस कारण सूर्य एक आग की अंगूठी की तरह दिखाई देगा। भारत में वलयाकार सूर्य ग्रहण दक्षिण भाग कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के हिस्सों में दिखाई देगा जबकि देश के बाकी हिस्सों में आंशिक सूर्य ग्रहण का नजारा दिखा जा सकेगा।
कहां दिखेगा आंशिक सूर्य ग्रहण: आंशिक सूर्य ग्रहण नई दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, बंगलौर, कोलकाता, चेन्नई, अहमदाबाद, सूरत, पुणे, जयपुर, लखनऊ, कानपुर, नागपुर, इन्दौर, ठाणे, भोपाल, विशाखापट्टनम, पटना, लुधियाना, आगरा, रियाद, कराची, कुआलालम्पुर में लगेगा।
 मंगलौर, कोयम्बटूर, ऊटी, शिवगंगा, तिरुवनन्तपुरम, टेलिचेरी, अल होफुफ, सिंगापुर में दिखेगा।
 भारत में ग्रहण काल का प्रारंभ 26 दिसंबर को सुबह 8 बजकर 05 मिनट पर हो जायेगा। हर शहर के समय में इसका थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है। ग्रहण का परमग्रास 9 बजकर 31 am पर होगा जबकि ग्रहण का समाप्ति काल 10 बजकर 57 a m. पर होगा। इस तरह ग्रहण की कुल अवधि लगभग 2 घंटे 40 मिनट की होगी।
ग्रहण सूतक काल: सूतक काल की बात करें तो इसका प्रारंभ 25 दिसंबर की शाम को 5 बजकर 27 मिनट पर हो जायेगा। जिसकी समाप्ति 26 दिसंबर सुबह 10 बजकर 57 मिनट पर ग्रहण की समाप्ति के साथ होगी। भारत में सूतक काल का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक काल लगते ही किसी भी तरह के शुभ कार्य नहीं किये जाते और ना ही किसी नये काम की शुरुआत। यहां तक की मंदिरों के कपाट भी सूतक में बंद कर दिये जाते हैं। पूजा पाठ के कार्य भी इस दौरान निषेध माने गये है। लेकिन सूतक में मन ही मन आप अपने ईष्ट देव की अराधना कर सकते हैं। गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्ग लोगों को सूतक काल में विशेष ध्यान रखना होता है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण कब होता है? ये ग्रहण तब घटित होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है। लेकिन चंद्रमा इस दौरान पृथ्वी को पूरी तरह से अपनी छाया में नहीं ले पाता और सूर्य का बाहरी हिस्सा प्रकाशित रह जाता है। इसी घटना को वलयाकार सूर्य ग्रहण कहा गया है। इस ग्रहण के समय सूर्य एक आग की अंगूठी की तरह दिखाई देता हैज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं . .पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र  सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .अब ग्रहण क्या होता है ?राहु व केतु का सूर्य या चन्द्र के साथ युति करना आमतौर पर ग्रहण मान लिया जाता है .किन्तु वास्तव में सूर्य ग्रहण मात्र राहु से बनता है व चन्द्र ग्रहण केतु द्वारा .ज्योतिष में बड़े जोर शोर से इसकी चर्चा होती है .बिना सोचे समझे इस दोष के निवारण बताये जाने लगते हैं .बिना यह जाने की ग्रहण दोष बन रहा है तो किस स्तर का और वह क्या हानि जातक के जीवन में दे रहा है! या दे सकता है .बात अगर आकड़ों की करें तो राहु केतु एक राशि का भोग १८ महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे .वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है .यानी दुनिया की एक तिहाई आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है .अब कई ज्योतिषियों द्वारा राहु केतु की दृष्टि भी सूर्य चन्द्र पर हो तो ग्रहण दोष होता है .हम जानते हैं की राहु केतु अपने स्थान से पांच सात व नौवीं दृष्टि रखते हैं .यानी आधे से अधिक आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है .अब ये आंकड़ा कम से कम मुझे तो विश्वसनीय नहीं लगता मित्रों .इसी लिए फिर से स्पष्ट कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी जब दोनों ग्रह  एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है ,और इस टर्मिनोलॉजी के अनुसार संसार के लगभग दस प्रतिशत से कम जातक ही ग्रहण दोष का कुफल भोगते हैं .हाँ आंकड़ा अब मेरी पसंद का बन रहा है. अन्य प्रकार की युतियाँ कुछ असर डाल सकती है जिनके बारे में आगे जिक्र करूँगा।किन्तु किसी भी भ्रमित करने वाले ज्योतिषी से सावधान रहें जो ग्रहण दोष के नाम पर आपको ठग रहा है .दोष है तो उपाय अवश्य है किन्तु यह बहुत संयम के साथ करने वाला कार्य है .मात्र  तीस सेकंड में टी .वी पर बिना आपकी कुंडली देखे ग्रहण दोष सम्बन्धी यंत्र आपको बेचने वाले ठगों से सचेत रहें ,शब्दों पर मित्रों से थोडा रिआयत चाहूँगा ,बेचने  वाले नहीं अपितु भेड़ने वाले महा ठगों से बचना दोस्तों.एक पाठक का पैसा भी बचा तो जो भी प्रयास आज तक ब्लॉग के जरिये कर रहा हूँ ,समझूंगा काम आया .   जैसा की हमें ज्ञात है सूर्य हमारी कार्य करने की क्षमता का ग्रह है,हमारे सम्मान ,हमारी प्रगति का कारक है यह जगतपिता है,इसी की शक्ति से समस्त ग्रह चलायमान है,यह आत्मा कारक और पितृ कारक है,पुत्र राज्य सम्मान पद भाई शक्ति दायीं आंख चिकित्सा पितरों की आत्मा शिव और राजनीति का कारक है..राहु के साथ जब भी यह ग्रहण दोष बनाता है तो देखिये इसके क्या परिणाम होते हैं राहु की आदत को समझने के लिये केवल छाया को समझना काफ़ी है। राहु अन्दरूनी शक्ति का कारक है,राहु सीमेन्ट के रूप में कठोर बनाने की शक्ति रखता है,राहु शिक्षा का बल देकर ज्ञान को बढाने और दिमागी शक्ति को प्रदान करने की शक्ति देता है,राहु बिजली के रूप में तार के अन्दर अद्रश्य रूप से चलकर भारी से भारी मशीनो को चलाने की हिम्मत रखता है,राहु आसमान में बादलों के घर्षण से उत्पन्न अद्रश्य शक्ति को चकाचौन्ध के रूप में प्रस्तुत करने का कारक होता है,राहु जड या चेतन जो भी संसार में उपस्थित है और जिसकी छाया बनती है उसके अन्दर अपने अपने रूप में अद्रश्य रूप में उपस्थित होता है।.राहु जाहिर रूप से बिना धड का ग्रह  है ,जिस के पास स्वाभाविक रूप से दिमाग का विस्तार है .यह सोच सकता है,सीमाओं के पार सोच सकता है .बिना किसी हद के क्योंकि यह बादल है ..जिस कुंडली में यह सूर्य को प्रभावित करता है वहाँ जातक बिना कोई सार्थक प्रयास किये ,कल्पनाओं के घोड़े  पर सवार रहता है .बार बार अपनी बुद्धि बदलता है .आगे बढने के लिए हजारों तरह की तरकीबों को आजमाता है किन्तु एक बार भी सार्थक पहल उस कार्य के लिए नहीं करता, कर ही नहीं पाता क्योंकि प्लान को मूर्त रूप देने वाला धड उसके पास नहीं है .अब वह खिसियाने लगता है .पैतृक  धन  बेमतलब के कामों में लगाने लगता है .आगे बड़ने की तीव्र लालसा के कारण चारों तरफ हाथ डालने लगता है और इस कारण किसी भी कार्य को पूरा ही नहीं कर पाता .हाथ में लिए गए कार्य को (किसी भी कारण) पूरा नहीं कर पाता ,जिस कारण कई बार अदालत आदि के चक्कर उसे काटने पड़ते हैं 

.सूर्य की सोने जैसी चमक होते हुए भी धूम्रवर्णी  राहु के कारण उसकी काबिलियत समाज के सामने मात्र लोहे की रह जाती है. उसकी क्षमताओं का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता .अब अपनी इसी आग को दिल में लिए वह इधर उधर झगड़ने लगता है.पूर्व दिशा उसके लिए शुभ समाचारों को बाधित कर देती है .पिता से उसका मतभेद बढने लगता है .स्वयं को लाख साबित करने की कोशिश भी उसे परिवार की निगाह में सम्मान का हक़दार नहीं होने देती .घर बाहर दोनों जगह उसकी विश्वसनीयता पर आंच आने लगती है सूर्य के साथ राहु का होना भी पितामह के बारे में प्रतिष्ठित होने की बात मालुम होती है ,जातक के पास कानून से विरुद्ध काम करने की इच्छायें चला करती है,पिता की मौत दुर्घटना में होती है,या किसी दवाई के रियेक्सन या शराब के कारण होती है,या वीमारी सेजातक के जन्म के समय पिता को चोट लगती है,जातक को नर  सन्तान भी कठिनाई से मिलती है,पत्नी के अन्दर गुप चुप रूप से सन्तान को प्राप्त करने की लालसा रहती है,पिता के किसी भाई को जातक के जन्म के बाद मौत जैसी स्थिति होती है।.वहीँ दूसरी और केतु (जिस के पास सिर नहीं है ) से सूर्य की युति होने पर  जातक बिना सोचे समझे कार्य करने लगता है .यहां वहां मारा मारा फिरता है .बिना लाभ हानि की गणना किये कामों में स्वयं को उलझा देता है .लोगों के बहकावे में तुरंत आ जाता है . मित्र ही उसका बेवक़ूफ़ बनाने लगते हैं केतु और सूर्य का साथ होने पर जातक और उसका पिता धार्मिक होता है,दोनो के कामों के अन्दर कठिनाई होती है,पिता के पास कुछ इस प्रकार की जमीन होती है,जहां पर खेती नही हो सकती है,नाना की लम्बाई अधिक होती है,और पिता के नकारात्मक प्रभाव के कारण जातक का अधिक जीवन नाना के पास ही गुजरता है या नाना से ख़र्च में मदद मिलती है इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय  कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं . चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं .चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी  राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी ख़ास नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है. ध्यान दीजिये की राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है .(यहाँ कुंडली में लग्नेश की स्थिति व कारक होकर गुरु का लग्न को प्रभावित करना समीकरणों में फर्क उत्पन्न करने में सक्षम है).जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बना रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण  ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है .ध्यान दें की सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकारप की दुश्वारियों का कारण बनता है . अतः एक ज्योतिषी की जिम्मेदारी है की जब भी किसी कुंडली का अवलोकन करे तो इस दोष पर लापरवाही ना करे .उचित मार्गदर्शन द्वारा क्लाइंट को इस के उपचारों से परिचित कराये .किस दोष के कारण जातक को सदा जीवन में किन किन स्थितियों में क्या क्या सावधानियां रखनी हैं ताकि इस का बुरा प्रभाव कम से कम हो , इन बातों से परिचित कराये . यहां पर कुछ उपाय वता रहा हु जो आप कर सकते हैं अगर असल में आपकी कुंडली में ग्रहन  दोष हो तो पहले यह कुंडली दिखाकर जानकारी हासिल कर ले कोशिश करूँगा की कभी भविष्य में इन योगों को कुंडलियों का उदाहरण देकर बताऊँ .उपाय :- 1) यह योग जन्मपत्रिका के जिस भाव में हो, उतनी ही मात्रा में सूर्य के शत्रु ग्रहो (शनि, राहू और केतु) का समान ले, और ग्रहण अवधि में मध्यकाल में अपने सिर से सात बार एंटीक्लॉक वाइज उसारा करके किसी भी नदी के तेज बहते जल में प्रवाहित दे। जैसे की इस पत्रिका में यह युति सप्तम भाव में है तो इसलिए जातक या जातिका को  700 ग्राम जौ को दुघ का छींटा लगाकर 700 ग्राम सरसो का तेल, 700 ग्राम साबुत बादाम, 700 ग्राम लकड़ी के कोयले, 700 ग्राम सफ़ेद व काले तिल मिलेजुले, 7 नारियल सूखे जटावले और बजने वाले तथा 70 सिगरेट बगैर फ़िल्टर वाली ले। 
2) कम से कम 60 ग्राम का शुद्ध चांदी का हाथी जिसकी सूंड नीचे की और हो, अपने घर पर लाकर चांदी या स्टील की कटोरी में गंगाजल भरकर उसमे खड़ा करके अपने बेड रूम में रखें। ध्यान रखे की इस हाथी पर सूर्य की रौशनी न पहुँचे। 
3) सूर्य की किरणें सीधे अपने सिर पर न पड़ने दे अर्थात अपना सिर ढक कर रखें।
4) अपने पुश्तैनी मकान की दहलीज के नीचे चांदी का पतरा या तार बिछाए। 
5) राहु से सम्बंधित कोई भी वस्तु अपने घर पर न रखें और न ही उनका सेवन/ग्रहण करे। जैसे कि : नीला और सलेटी रंग, तलवार, अभ्रक, खोटे सिक्के (जो आज चलन में नही है), बंद घड़ियाँ, बारिश में भीगी लकड़ी, जंग लगा लोहा, ख़राब बिजली का समान, रद्दी, लकड़ी के कोयले, धुँआ, टूटे-फूटे खिलौने, टूटी-फूटी चप्पलें, टूटे-फूटे बर्तन, खली डिब्बे, टूटा हुआ शिक्षा, ससुराल पक्ष, मूली या इससे बनी  वस्तु, जौ या इससे बनी कोई वस्तु, नारियल (कच्चा या पक्का) या इससे बनी कोई भी वस्तु, नीले जीव, नीले फूल या नीले रंग के कोई भी वस्तु आदि।   
6) अपने घर की छत, सीढ़ियों के नीचे का स्थान और लेट्रिंग-बाथरूम सदा साफ़ रखें। 
7) लाल और नीले कलर का कॉम्बिनेशन या ये दोनों कलर अलग अलग कभी भी धारण न करे। 
8) अपने जीवन में कभी भी मांस-मदिरा, बीयर, तम्बाकू आदि का सेवन न करें। आशा करता हु आप को लेख पसंद आया होगा मित्रों आप भी अपनी कुंडली दिखाना चाहते हैं या अपनी समस्या का हल चाहते हैं तो आप समर्पक करें हमारी फीस हमारे bank ac में जमा करानी होगी अघिक जानकारी के लिए हमारे नम्वरो पर वात करें 7597718725-9414481324 आचार्य राजेश कुमार

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

जीवन में भटकाव के कारतत्व


मित्रों ऊपर दी गई कुंडली  मीन लगन की है और लगनेश गुर पंचम भाव मे केतु के साथ है,लगनेश का केतु के साथ होने का अर्थ जीवन मे भटकाव के अलावा और कुछ भी प्राप्त नही होता है जिस भाव का केतु होता है उसी भाव के फ़लो मे जातक को भटकाने का काम करता है वह चाहे अच्छे रूप मे हो या खराब रूप में। गुरु का स्थान पंचम मे होने से विद्या और बुद्धि के क्षेत्र मे है,जल्दी से धन कमाने के क्षेत्र मे है खेलकूद और रोजाना की जिन्दगी मे असीमित लालसाओं तथा प्राप्तियों के प्रति चिन्ता करने के क्षेत्र मे है। ग्यारहवे भाव में स्थित राहु भी गुरु को अपनी युति प्रदान कर रहा है। केतु का भटकाव नौकरी के लिये जल्दी से जल्दी धन कमाकर अपने को समाज मे प्रदर्शित करने के लिये शादी और कार्य करने वाली पत्नी की प्राप्ति के लिये गुरु केतु की तीसरी द्रिष्टि सप्तम मे होने से है,और सप्तम मे स्थापित शुक्र जो हिम्मत देने का भी मालिक है और अपमान करने के साथ साथ रोजाना की जिन्दगी मे जोखिम भी लेने के लिये माना जा सकता है। गुरु केतु की पंचम द्रिष्टि नवे भाव पर है और नवे मे होने से जातक का जो भी ऊंचे शिक्षा का क्षेत्र है वह भी बाधित हो गया है और धन आदि कमाने के चक्कर मे तथा शिक्षा के क्षेत्र मे जाने से अपनी वास्तविक कार्यप्रणाली को बदलने के भी उत्तरदायी है। गुरु कर्क राशि का उच्च का है इसलिये जीवन मे उन्नति साधारण मार्ग से अपने को इज्जत और मान मर्यादा मे रखकर चलने से भी मानी जायेगी केतु के साथ होने से और गुरु केतु के द्वारा अष्टम स्थान पर चन्द्र सूर्य बुध को व्यापारिक बल देने के कारण जातक को धन सम्बन्धी काम जैसे व्यापारिक धन को जोखिम से बचाना सरकारी कारणो से धन की बरबादी को बचाना व्यापारिक कानूनो के प्रयोग से जनता को धन सम्बन्धी बचाव का रास्ता देना आदि कारण जातक के लिये वास्तविक उद्देश्य का रास्ता बताते है लेकिन राहु पिछले चौवन महिने से जातक के दुसरे भाव तीसरे भाव और अब चोथे भाव मे गोचर करने से जातक के अन्दर एक प्रकार का जल्दी से कमाने और धन की जरूरत को पूरा करने के लिये तथा छोटी सी उमर मे ही लोगो के लिये आदर्श बनने का भूत सवार कर रहा है। इस राहु के कारण जातक अपनी वास्तविक मर्यादा को भूल गया है वह अपने को कभी तो इतना व्यस्त कर लेता है कि खाने पीने सोने और मौज मस्ती से दूर चला जाता है,घर मे एक प्रकार का सन्नाटा प्रदान करने के लिये पिता के लिये माता के लिये सेहत सम्बन्धी कष्ट प्रदान करने का कारण चिन्ता से देने के लिये और जो भी कारण शिक्षा सम्बन्धित है वह केवल कनफ़्यूजन मे लेकर उन्हे समय से नही पूरा करने की बात से भी माने जाते है। जातक केवल घर की प्राथमिक अवस्थाओ को पूरा करने के बाद चाहता तो वह अपने वास्तविक उद्देश्य जो ऊपर धन सम्बन्धी कारणो की शिक्षा के लिये बताई गयी है एक चार्टेड एकाउन्टेन्ट की हैसियत से जीवन को निकालने के लिये प्रकृति ने जो साधन बुद्धि और ज्ञान दिया था वह प्रयोग नही करके केवल धन के प्रति सोचने और अपने को बेकार के कनफ़्यूजन मे ले जाकर समय और सेहत के साथ मूल्यवान समय को बरबाद करने का कारण ही तो जातक को मिल रहा है दोस्ती के भाव मे राहु के होने से जो भी जातक के दोस्त है वह जातक को कभी तो राजकीय सेवा मे जाने के लिये कभी स्कूली काम करवाकर बिना किसी लाभ के भटकाने के लिये कभी कुछ और कभी कुछ करने का भूत सवार करने के बाद जातक के टारगेट से दूर जाने का उपक्रम करने के लिये अपनी शक्ति को प्रदान कर रहा है।गुरु से शनि की स्थिति छठे भाव मे होने से जातक के लिये कहा जा सकता है कि जातक का जीवन कठिन से कठिन मेहनत करने के बाद जो भी प्राप्त करेगा वह धन ग्यारहवे मंगल के प्रभाव के कारण जिस पर मित्र भाव के राहु का असर है अचानक खर्च करने के कारको मे अपना सब कुछ खर्च कर देगा और फ़िर वृष राशिका मंगल अपने कारको से परिवार की जिम्मेदारी के प्रभाव को साथ मे लाकर जातक को कर्जा दुश्मनी बीमारी से ग्रस्त करने के कारको को पैदा करेगा।
शुक्र जो मंगल के घेरे मे है साथ ही मित्र भाव के राहु के घेरे मे है जातक की शादी के बाद उसके मित्रो का प्रभाव पारिवारिक जीवन पर भी जायेगा और शुक्र जो पत्नी के रूप मे है जातक की अन्देखी के कारण वह अपने वैवाहिक जीवन को नही सम्भाल पायेगा जैसे ही शुक्र को मौका मिलेगा वह धन या खानपान के प्रभाव से अथवा उत्तेजना मे अपने को गुप्त रूप से परिवार के साथ विश्वासघात करने के लिये अपने असर को प्रदान करेगा।
जातक का यह कारण जातक के दादा से शुरु हुआ है जैसे जातक के दादा दो भाई थे और दोनो मे एक की ही पारिवारिक वंशावली आगे चली,दो दादिया एक दादा के रही घर का परिवार का जो भी संचालन था वह किसी धर्म या शिक्षा या घरेलू व्यापारिक कारण से बरबाद होता रहा जातक के दादा या पिता अपने परिवार को पैत्रिक माना जाता है को छोड कर दूसरी जगह पर जाकर बसे और उस बसावट मे न्याय आदि के कारण अपने पूर्वजो के प्रति धारणा जो चलनी चाहिये थी वह नही मिल पायी और पिता के कारणो से जातक को आजीवन भटकाव का रास्ता सामने मिल गया। जातक के पिता का रूप दो बहिने और दो भाई के रूप मे माना जाता है। मित्रों अगर आप भी अपनी कुंडली हमको दिखाना जब बनवाना चाहते हैं! तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं! मित्रों हमारी सारी सेवाएं  paid हैं!

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

क्यों काम नहीं करते हैं ज्योतिष के अनुसार किए उपाय?


क्यों काम नहीं करते हैं ज्योतिष के अनुसार किए उपाय?
मित्रों हमारा उद्देश्य किसी भी विद्वान को आहत करने का नहीं है, अतः अनजाने में भी यदि किसी को कष्ट हो तो बात प्रारंभ करने से पहले ही क्षमा चाहेंग हम उस आदमी को धोखा देने का असफल प्रयास कर रहे हैं, जो देवता तुल्य हमें सम्मान दे रहा है, अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन भी, क्या हमें ऐसा करके हमेशा के लिए उसकी नजरों से गिरने का काम करना चाहिए, केवल पैसे की भूख हमारी छवि को हमेशा के लिए समाप्त करने के साथ ज्योतिष शास्त्र की आस्था को भी राहत न मिलने पर समाप्त कर देती है सामान्य परेशान लोगों में से अधिकतर की शिकायत होती है कि ,उनकी समस्या के लिए वे बहुतेरे ज्योतिषियो ,तांत्रिकों ,पंडितों से संपर्क करते हैं किन्तु उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता या बहुत कम लाभ दृष्टिगोचर होता है ,तथा उनकी परेशानी यथावत रहती है अथवा केवल कुछ समय राहत देकर फिर वैसी ही हो जाती है |वे यहाँ वहां अपनी समस्या का समाधान पाने के चक्कर में घूमते रहते हैं पर कोई सही समाधान नहीं मिलता अंततः थक हारकर मान लेते हैं की जो किस्मत में होता है वाही होता है ,या कोई उपाय काम नहीं करता ,यह सब बेकार हैकुछ तो यहाँ वहां घूमते हुए खुद थोड़ी बहुत ज्योतिष समझने लगते हैं ,टोने -टोटके आजमाते आजमाते ,शाबर मंत्र ,तांत्रिक मंत्र आदि पढ़कर , थोड़े बहुत टोने -टोटके जान जाते हैं ,कुछ मंत्र जान जाते हैं ,कुछ पूजा पाठ ,स्तोत्र आदि जान जाते हैं ,फिर ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र की कुछ सडक छाप किताबों को पढ़कर ,नेट पर खोज कर अपनी समस्या का समाधान ढूंढते हुए खुद को ज्योतिषी और तांत्रिक मान लेते हैं |समस्या उनकी ख़त्म हो न हो ,उन्हें खुद राहत मिले या न मिले पर लोगों को उपाय जरूर लता ने लग जाते हैं और लोग भी ऐसे हैं यहां मुफ़्त का चाहते हैं वुखार भी क्यों ना होऐक तरफ मेरे जैसे ठग ज्योतिषी तांत्रिक आचार्य वन कर और लोगों को टोटके ,उपाय ,मंत्र बांटने लगते हैं ,धन लेकर उनके लिए अनुष्ठान ,क्रिया करने को कहने लगते हैं और फिर इसे व्यवसाय बना लूटने का धंधा बना लेते हैं |यह काम सोसल मीडिया ,इंटरनेट ,वेबसाईट के माध्यम से खूब होता है सामान्य लोग समझ नहीं पाते अथवा वास्तविक ज्योतिषी ,तांत्रिक ,पंडित और इन छद्म नामो वाले ज्योतिषी ,पंडित ,तांत्रिक में अंतर नहीं कर पाते ,अंततः वे खुद के धन का नुक्सान' हानि पाते हैं ,खुद की किस्मत को कोसते हैं अथवा ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र ,उपायों को ही बेकार मान लेते हैं |उनका विश्वास हिल जाता है ,कभी कभी भगवान् पर से भी विश्वास उठने लगता हएक समस्या लोगों की नासमझी से भी उत्पन्न होती है लोग कर्मकांड ,पूजा पाठ ,शादी विवाह ,कथा कराने वाले पंडित जी से .प्रवचन करने वाले व्यास या शास्त्री जी से ,भागवत ,रामायण कथा वाचकों से भविष्य जानने की कोशिश करते हैं और उपाय पूछते हैं उनकी विशेषज्ञता पूजा पाठ ,कर्मकांड ,प्रवचन ,कथा ,भाषण कला में है न की ज्योतिष ,तंत्र आदि भविष्य जानने वाली गूढ़ विद्याओं में इनके उपाय पूजा पाठ ,दान ,गौ ,नदी ,पीपल ,अनुष्ठान तक सीमित रहेंगे न की मूल समस्या को पकड़ वहां प्रतिक्रिया करने वाले उपायों पर आजकल ज्योतिष ,तंत्र को व्यसाय और लाभ का स्रोत मान ही अधिकतर लोग आकर्षित हो रहे |साधुओं ,मठाधीशों के आसपास भीड़ देखकर लोग आकर्षित हो रहेतो यह कितना लाभ पहुंचाएंगे सोचने की बात है जानने समझने की अतः रटे रटाये उपाय ,पूजा पाठ ,दान बता दिए |न क्षमता है समस्या पकड़ने की न रूचि है कुछ समझने में अतः अक्सर तीर तुक्के साबित होते हैं ,पर इनके प्रभामंडल के आगे व्यक्ति कुछ सोच भी नहीं पाता और अपने भाग्य को ही दोषी मानता रह जाता है |अब इतने बड़े आडम्बर वाले गुरु जी ,ज्योतिषी जी ,पंडित जी ,तांत्रिक अघोरी महाराज गलत थोड़े ही बोलेंगे ,हमारा ही भाग्य खराब है जो कोई उपाय काम नहीं कर रहा |ज्योतिष ,कर्मकांड ,पूजा पाठ ,साधना एक श्रम साध्य ,शोधोन्मुख कार्य है |इनमे समय ,एकाग्रता लगती है |गहन अध्ययन ,मनन ,चिन्तन और साधना करनी होती है |पुराने समय से देखें तो किसी गुरु के केवल एक दो शिष्य ही उनसे पर्याप्त ज्ञान ले पाते थे धीरे धीरे क्रमिक गुरु परम्परा में योग्य शिष्यों ,साधकों की कमी होती गयी ,जो थे वे चुपचाप अपनी साधना ,अध्ययन करते ,ज्ञान खोज में सुख पाते गुमनाम रहे और कम ज्ञान वाले अथवा स्वार्थी ,भौतिक लिप्सा युक्त शिष्यों की भरमार होती गयी |आज तक आते आते ,वास्तविक साधक खोजे नहीं मिलता ,सही गुरु की तलाश वर्षों करनी होती है जबकि हर गली और हर शहर में ढेरों गुरु और साधक मिल जाते हैं |बड़े बड़े नाम ,उपाधि वाले साधक ,ज्योतिषी ,गुरु मिल जाते हैं जिनके पास लाखों हजारों की भीड़ भी होती है ,अनुयायी होते हैं |फिर भी लोगों की समस्याएं बढती ही जा रही ,उनको सही उपाय नहीं मिल पा रहे ,वे भट

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

फलित ज्योतिष की अवधारणा


फलित ज्योतिष की अवधारणा को समझने के लिए समय रेखा और उस पर भूत वर्तमान और भविष्य के बिन्दुओं की मूल प्रकृति को समझना आवश्यक है.अपने नैसर्गिक गुणों के कारण अतीत निश्चित और अपरिवर्तनीय होता है जो वीत गया उसको वदला नही जा सकता ,वर्तमान प्रत्यक्ष होता है और भविष्य अनिश्चित और परिवर्तनीय होता है.जहाँ तक विज्ञान के भी जानने की बात है अपने पूर्ण रूप में अतीत(क्या होचुका हैऔर वर्तमान(क्या हो रहा है को भी जान नहीं पाया है तो भविष्य के बारे में वताना कठीन है को सही बताने का दावा करना विज्ञान और ज्योतिष दोनों के लिए कठिनाई भरा ही होगा.मगर इससे न तो विज्ञान मौसम,प्रगति, अर्थव्यवस्था और भविष्य में होने वाले परिवर्तनों के बारे में जानने के लिए होने वाले अनुसंधान रोकेगा और न ही ज्योतिष के आधार पर भविष्यवाणियां करना रुकेगा.मगर विज्ञान अपने एकत्र आंकडों के आधार पर अपनी भविष्यवाणियों को ज्यादा सशक्त आधार दे पा रहा है और ज्योतिष अपनी अवधारणाओं और उनके परिक्षण के अभाव में अतार्किक होता जारहा है.मेरा जोर इस बात पर है कि ज्योतिष के अंतर्भूत तत्वों के आधार पर निश्चित अवधारणाएं बना कर उनका वैज्ञानिक परिक्षण किया जावे.और प्रयोग प्रेक्षण और निष्कर्ष विधि से वर्तमान नियमों का परिक्षण किया जाेये और आवश्यक हो तो संशोधन किया जावे. भारतीय फलित ज्योतिष में चेतन और अचेतन की महत्वपूर्ण भूमिका है.क्योंकि चेतना के प्रकट होने के क्षण(जन्म)से ही जन्म कुंडली का निर्माण कर फलित निकाला जाता है.समस्त जड़ और अचेतन जगत तो वैसे ही अत्यंत सटीक वैज्ञानिक नियमों से संचालित होता है.अनु परमाणु और क्वार्क से लेकर विशाल गेलेक्सियाँ क्षणांश के लिए भी नियम नहीं तोड़ती.फिर भी हम उनके बारे में क्षणांश ही जान पाए है.इनके भविष्य के बारे में वैज्ञानिक नियमो से जाना जासकता है.पर जहाँ तक चेतन जगत का सवाल है उसके नियम अधिक जटिल है इतने जटिल कि हम उनके बारे में वैज्ञानिक तौर पर कुछ नहीं जानते है.अतः इसकी भविष्यवाणी किया जाना कठिन है.इसकारण से भी भविष्यवाणी और कठिन हो जाती है कि चेतना से संचालित होने वाली इकाइयों के पैरामीटर अनगिनत होते है.इन सब पैरामीटर को समाहित करते हुए नियम खोजना कठिन होता है. फिर शायद चेतना से संचालित इकाइयों के बारे में भविष्य वाणी किया जाना अवैज्ञानिक है. इसको उदहारण से समझा जा सकता है.एक जड़ वस्तु जैसे पत्थर आदि को गिराने या फेंकने पर उसकी प्रारंभिक सूचनाओं के आधार पर उसकी गति, तय की जाने वाली दूरी, प्रभाव आदि की सही सही भविष्य वाणी की जासकती है पर एक चेतन प्राणी जैसे कुत्ता आदि जानवर के व्यवहार के बारें में भविष्यवाणी कम सटीकता से की जा सकेगी.मानवीय चेतना का उच्चतम स्तर व्यवहार के बारे में सटीकता और कम हो जायेगी.और फिर समाज की सामूहिक चेतना के बारे में यह संभावना और कम हो जायेगी.यहाँ तक हम वर्तमान की बात कर रहे है फिर चेतन इकाइयों के भविष्य के बारे में जो अनिश्चित और परिवर्तनीय है कह पाना अति कठिन है.फिर निश्चित ही फलित वैज्ञानिक दायरे से दूर की वस्तु है. मानव सभ्यता के आरम्भ से लेकर आज तक कई जीनियस,प्रोफेट,भविष्यवक्ता और संत हुए है जिनकी भविष्यवाणी सटीकता तक सही हुई है. एडगर कैसी और जूल वर्न बीसवीं सदी के प्रसिद्द भविष्यवक्ता है.(एडगर कैसी के बारे में और उनकी सात प्रसिद्द भविष्यवानियों के बारे में लिंक जूल्स वर्न ने अपने फिक्शन में सटीक भविष्यवानियाँ की थी.नस्त्रदामस से आजतक के भविष्यवक्ताओं ने चेतन इकाइयों और उनसे प्रभावित घटनाओं के बारें में तन्द्रा में भविष्यवानियाँ की है.रमल,तेरोकार्ड शकुन, ओमेन और जन्म कुंडली ये सब माध्यम है भविष्य जानने के उपकरण है.इसका उपयोग करके लोग अवचेतनता और समाधि में जाकर भविष्यवाणी करते है.सपष्ट रूप से इन्हें अवैज्ञानिक कहा जासकता है. पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मानव जाति ने जितना समय बाहर के संसार का विज्ञान जानने के लिए बिताया है उससे कई गुना अधिक समय उसने अपने आंतरिक संसार और अवचेतन के अध्ययन के लिए दिया है. भारतीय ऋषियों ने सर्व प्रथम पृथवी के सापेक्ष खगोलीय गणनाओं के माध्यम से सटीक समय रेखा का पता लगाया.उस समय रेखा पर ग्रहों की स्थिति के आधार पर जन्म कुंडली का आविष्कार किया.ग्रहों की स्थिति के आधार पर ब्रह्मांड की उस तात्क्षणिक स्थिति को खोजा जो जातक के इस ब्रह्माण्ड में प्रथम चेतन क्षण को दर्शाता है.ऊर्जसके.कुलमिलाकर सबसे पहले भविष्यवानियों की आधारभूत अवधारणाओं का निर्माण भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने किया.और समय के साथ हुए अनुभविक प्रयोगों से भ्रगुसंहिता जैसे ग्रंथो को लिखा गया.अफसोस यह रहा की बाद में लोगों ने इसे चरम विद्या बनाकर इसके प्रगति के द्वार बंद कर दिए.आज ज्योतिष और उसकी भविष्यवानियाँ तो है पर भारतीय ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार लुप्त हो चुका है.भविष्यवक्ता यह घोषणा तो कर देते है की दूसरे भाव पर गुरु की पूर्ण दृष्टि व्यक्ति को धनवान बनाते है.पर गुरु की खगोलीय स्थिति का समग्र चित्र उनके मस्तिष्क में कभी नहीं बन पाता है.नहीं ऐसी कोई अवधारणा निर्मित कर परीक्षण करने का प्रयास होता है.उसके बिना ज्योतिष को विज्ञान कहने का दावा मजबूत आधार नहीं प्राप्त कर सकता है. मैं फिर भी इसे विज्ञान के रूप में मान कर इसकी गणनाओं और भविष्य कथनों का वैज्ञानिक आधार परिक्षण करना चाहा  रेखाओं के प्रवाह और दिशा के आधार पर वह परास निर्धारित की जो किसी भविष्यवक्ता को संभावना की दिशा बता सके ओर फिर दिशा से दशा वदली जा सके जय मा काली

रविवार, 1 दिसंबर 2019

राहु मंगल के बीच शनिदेव यानि तीखी मिर्चे का स्वाद


मीन लगन में गुरु दूसरा वक्री तीसरे केतु वृष राशि के चन्द्रमा चौथा मिथुन राशि का पंचम में मंगल कर्क राशि का और सप्तम मे कन्या का शनि अष्टम भाव मे सूर्य शुक्र बुध नवे भाव मे राहु के समय रसोई की व्याख्या अगर की जाये तो कुछ इस प्रकार से होगी। दूसरा भाव मुख का कारक है,तीसरा भाव खाने वाली चीज की बनावट का कारक है,चौथा भाव मुंह की अवस्था का कारक है पंचम भाव स्वाद का कारक है,छठा भाव रुचि का कारक है सप्तम भाव खाने वाले भोजन के रखने का स्थान है,अष्टम भाव भोजन मे मिलाये जाने वाले मशालो का कारक है नवम भाव भोजन के बाद मिलने वाले प्रभाव का कारक माना जाता है,दसवा भाव भोजन के करने का तरीका ग्यारहवा भाव भोजन के बाद मिलने वाले फ़र्क के लिये और बारहवा भाव भोजन के बाद मिलने सन्तुष्टि असंतुष्टि का कारक है। मीन राशि आराम का स्थान है,इस स्थान को सप्तम का शनि का जो कन्या राशि का है स्टील की प्लेट का कारक है,गुरु जो वक्री होकर प्लेट मे रखे सामान का कारक है,कारण मार्गी गुरु सम्पूर्णता का कारक है यानी जो प्लेट मे होना चाहिये वह पूरी तरह से पीली सामग्री से ही बना हुया होना चाहिये,लेकिन वक्री गुरु को केवल रखे सामान में ऊपरी पर्त के मामले मे ही जाना जायेगा,तीसरे केतु को तीन की संख्या में लम्बी वस्तु के रूप मे देखा जायेगा,उस वस्तु को दूसरे भाव मे ले जाने के पहले मुख की स्थिति में चौथा चन्द्रमा अपने अनुसार खाने के पहले लार को प्रकट करने वाला है,पंचम का मंगल गर्म तासीर से और तीखा स्वाद देने वाला है,छठे भाव का कारण भूख तो लगी है और भूख मे भोजन का समय नही है यानी शाम का समय है,लेकिन भोजन के लिये खाना जरूरी है,खाने मे तीन लोग साथ साथ है,पहले दो ही थे लेकिन एक बाद मे आ गया।

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...