आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
सोमवार, 13 मार्च 2017
मित्रों आज त्योहार 2 दिन होने लग गया है आखिर ऐसा क्योहै।आज होली है और होली परं यह बात मेरे ध्यान में आई है सोचा आप लोगों से शेयर करुपहले लोग जानते थे कि वसंत ऋतु में फागुन का महींना आता है और फागुन के आखिरी दिन पूर्णमासी को हिरणाकश्यम की बहन ने प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाकर जलाने का प्रयास किया था क्योंकि हिरणाकश्यम अपने बेटे प्रहलाद को मार डालना चाहता था और होलिका को वरदान था वह नहीं जलेगी । हुआ था उल्टा। होलिका जल गई और प्रहलाद बीच में खड़े रह गए । उसके दूसरे दिन हिरणाकश्यप मारा गया था । फागुन का अन्तिम दिन एक ही होगा, दो नहीं हो सकते।इसी प्रकार मकर संक्रान्ति 14 जनवरी को होती थी क्योंकि इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में जाते हैं । हमेशा से सुनते आए हैं कि भीष्मपितामह को इच्छामृत्यु का वरदान था और उन्होंने मकर संक्रान्ति के ही दिन अपने प्राण त्यागे थे । यदि आज वाले ज्योतिषी होते तो 14 की जगह 15 को संक्रान्ति बता देते तो भीष्म को एक दिन और शरसैया पर यानी वाणों की नोक पर लेटे रहना पड़ता ।रामचन्द्र जी लंका जीत कर अयोध्या लौटे तो वहां खुशियां मनाई गईं थी, दीपमालिका सजी थी और समय के साथ यह दीपावली का पर्व बन गया । यह पर्व क्वार के महीने में अमावस्या के दिन पड़ता है लेकिन अब इस अमावस्या को भी ज्योतिषी लोग इधर उधर खिसका देते है । ब होली, दीवाली और मकर संक्रान्ति इधर उधर खिसकते हैं तो स्वाभाविक है शेष सभी त्योहार अपनी जगह बदलेंगे । लेकिन जगह बदलने से उतनी तकलीफ नहीं जितनी दो दिन त्योहार मनाने से होती है मुस्लिम त्योहारों में ज्योतिष ज्ञान का अहंकार नहीं है । चांद दिखेगा तो त्योहार होगा और नहीं दिखेगा तो नहीं होगा । हिन्दू ज्योतिषी तो ग्रहों की चाल जानने का दम भरते हैं तब क्या आजकल उनकी चाल बदल गई है।हार दो दिन मनाने का कोई औचित्य नहीं, केवल पचाग वनाने वाले ज्योतिषियों का अहंकार है । हम जानते हैं कि त्योहार तिथियों के हिसाब से होते हैं और तिथ का आरम्भ सूर्योदय से होता है और उदया तिभि मानी जाती है । तब दो दिन एक ही तिथि हो ही नहीं सकती । यदि हिन्दू समाज के ज्योतिषी अपना अहंकार नहीं छोड़ेंगे तो त्योहारों के प्रति आस्था समाप्त हो जाएगी । आशा है वे ऐसा नहीं चाहेंगे हमारे त्यौहारों का एक ही दिन निश्चित हो और पूरा भारत मिलकर ब त्योहार मनाए ।परक्या हो रहा है उज्जैन से कुछ प्रचार निकल रहा है बनारस से कुछ निकल रहा है पंजाब में किसी दिन त्यौहार होता है तो उत्तर प्रदेश में उसके अगले दिन इसी तरह अलग अलग तरह से सारे त्योहार भी दो दिन में वट जाता है यह हमारे हिंदूओं मे ऐसा क्यों हो रहा है मेरी पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें send करें ताकि औरो तक यह मैसेज पहुंच सके. आचार्य राजेश
रविवार, 12 मार्च 2017
गुरुवार, 9 मार्च 2017
मित्रो आज की पोस्ट भी राहु पर ही है राहु खुफिया पाप तो केतु ज़ाहिरा पाप है। सूरज डूबने के बाद शाम मगर शनि की रात शुरू होने से पहले का वक्त राहु और रात खत्म होने के बाद सुबह मगर सूरज निकलने से पहले का वक्त केतु है। राहु सिर का साया तो केतु सिर के बिना धड़ (जिस्म) का साया है। लेकिन इन्सानी जिस्म में नाभि के ऊपर सिर की तरफ का हिस्सा राहु का राज्य और नाभि के नीचे पांव की तरफ के हिस्से पर केतु का राज होगा। राहु कुंडली के खाना नं 12 में आसमानी हद बृहस्पाति के साथ हुआ तो केतु खाना नं 6 पाताल के बुध का साथी हुआ। दोनों की मुश्तरका बैठक कुंडली का खाना नं 2 है। दोनों के बाहम मिलने की जगह शारा आम यानि जिस जगह दो तरफ से आकर रास्ता बन्द हो जाता हो, वहां दोनों ग्रहों का ज़रूर मंदा असर या दोनों मन्दे या पाप की वारदातें या नाहक तोहमत और बदनामी के वाक्यात या ग्रहस्थी के बेगुनाह धक्के लग रहे होंगे '' केतु कुत्ता हो पापी घड़ी का, चाबी राहु जा बनता हो। चन्द्र सूरज से भेद हो खुलता, ज़ेर शनि दो होता हो राहु केतु हमेशा बुध (घड़ी) के दायरे में घूमते हैं। अगर यह देखना हो कि राहु कैसा है तो चन्द्र का उपाय करें इऔर केतु की नीयत का पता लगाने के लिये सूरज का उपायें करें इस तरह दोनों ग्रहों का दिली पाप खुद व खुद पकड़ा जायेगा। यानि उस ग्रह के ताल्लुक के वाक्यात होने लगेगें। राहु और केतु में से अगर कोई भी खाना नं 8 में हो तो शनि भी उस वक्त खाना नं 8 में गिना जायेगा। यानि जैसा शनि वैसा ही फैसला समझा जायेगा। अगर राहु केतु दोनों खराब असर करना शुरू कर दें तो राहु 42 साल और केतु 48 साल तक और दोनो मुश्तरका 45 साल का मन्दा असर कर सकतें हैं। कुंडली में सूरज राहु मुश्तरका से सूरज ग्रहण और चन्द्र केतु मुश्तरका से चन्द्र ग्रहण होगा। लिहाज़ा ग्रहण से राहु केतु के मन्दे असर का ज़माना लम्बा हो सकता है। जिसके लिये ग्रहण के वक्त और वैसे भी पापी ग्रहों की चीज़ें नारियल वगैरह चलते पानी (्दरिया या नदी) में बहाते रहना फायदा होगा राहु चन्द्रमा का पात है। अंग्रेजी में इसकी संज्ञा ड्रैगन्स हेड (सांप के फन) से है। लाल किताब में इसे यही नाम दिया गया है। इसे शनि का एजेंट (प्रतिनिधि) कहा गया है शनि एक विशालकाय सांप है और राहु उसका फन राहु का रंग नीला माना गया है। नीला आकाश और नीला समुद्र राहु के अधिकार छेत्र में आते है। गुरु को हवा या पंख माना गया है जो ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर सतत प्रवाहमान है। द्वादश गुरु के साथ द्वादश में ही राहु भी हो तो वह गुरु से बलवत्तर हो जाता है। तब गुरु पूर्णतः सांसारिक मनुष्य बन जाता है। राहु उसे ऊंचाइयों पर नही जाने देता।है केतु से यदि राहु सूर्य से युक्त/दृस्ट हो तो वह जिस भाव में स्थित होता है उस भाव का फल विकृत कर देता है। इतना ही नही, उससे आगे वाले भाव को भी प्रभावित करके दूषित कर देता हैराहु मन्दे के वक्त इसका मन्दा असर राहु की कुल मियाद 42 साला उम्र के पूरा होने पर दूर होगा। फालतू धन दौलत, दुनियावी आराम व बरकत 42 के बाद फौरन बहाल हाेंगे। कड़कती हुई बिजली, भूचाल, आतिशी खेज़ मादा पाप की एजेन्सी में बदी का मालिक हर मन्दे काम में मौत का बहाना घड़ने वाली ताकत, ठगी, चोरी और अयारी का सरगना चोट मारके नीला रंग कर देने वाली गैबी लहर का नामी फ़रिशता कभी छिपा नही रहता। कुंडली में सूरज शुक्र मुश्तरका होंतो राहु अमूमन मन्दा असर देगा। अगर सूरज शनि मुश्तरका और मन्दे हों तो राहु नीच फल बल्कि मंगल भी मंगल बद ही होगा। अगर केतु पहले घरों में और राहु बाद के घरों में हो तो राहु का असर मन्दा और केतु सिफर होगा। अगर राहु अपने दुश्मन ग्रहों (सूरज, शुक्र, मंगल) को साथ लेकर केतु को देखे तो नर औलाद, केतु की चीज़ें, कारोबार या रिश्तेदार मतल्का केतु बर्बाद होंगे। सूरज की दृष्टि या साथ से राहु का असर न सिर्फ बैठा होने वाले घर पर मन्दा होगा बल्कि साथ लगता हुआ घर भी बर्बाद होगा। मन्दे राराहू कूटनीति का सबसे बड़ा ग्रह है राहू संगर्ष के बाद सफलता दिलाता है यह कई महापुरशो की कुंडलियो से सपष्ट है|राहू का 12 वे घर में बैठना बड़ा अशुभ होता है क्योकि यह जेल और बंधन का मालिक है 12वे घर में बैठकर अपनी दशा, अंतरदशा में या तो पागलखाने में या अस्पताल और जेल में जरूर भेजता हैराहू चन्द्र जब भी एक साथ किसी भी खाने में बैठे हुए हो तो चिंता का योग बनाते है| राहु के कारण व्यक्ति को निम्नांकित परेषानियों का सामना करना पड़ता हैं: – 1 नौकरी व व्यवसाय में बाधा हु के वक्त दक्षिण के दरवाज़े का साथ न सिफ माली नुक्सान देगा बल्कि इसका ताकतवार हाथी भी मामली चींटी से मरजाता है लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि वे सभी के लिए अशुभ फल देते हों। जिसका राहु अच्छा होता है उसे छप्पर फाड़कर देता है। राहु का राजनीति से भी खास लगाव है। राहु अच्छा हो और सटीक बैठ जाए तो नेता को मंत्री तक बना देता है। ओर सँतरी को कमीश्नर इसकी अनुकूलता में अकस्मात धन प्राप्ति के योग बनते हैं। लाटरी खुलना, पूर्वजों की वसीयत प्राप्त होना आदि अचानक धन लाभ राहू ग्रह कराता हैराहु को हाथी की उपाधि दी गई है। कुंडली के प्रत्येक भाव या खाने अनुसार राहु के शुभ-अशुभ प्रभाव को लाल किताब में विस्तृत रूप से समझाकर उसके उपाय बताए गए हैं।प्रत्येक भाव में राहु की स्थित और सावधानी के बारे में संक्षिप्त और सामान्य जानकारी।अगली पोस्ट मै करूगामित्राप भी अपनी कुंडली निकालें और देखें अगर आप की कुंडली में ऐसे योग हों तोआप किसी अच्छे ज्योतिषाचार्य से संपर्क करें और उपायों द्वारा बुरे योगों के दुशप्रभाव को कम करने का प्रयास करें और अपने जीवन को अधिक से अधिक खुशहाल बनायें। मित्रो अगर आप मुझसे अपनी कुंडली बनवाना क्या दिखाना चाहते हैं तो आप मुझसे संपर्क करें नंबर है0941448132407597718725
सोमवार, 6 मार्च 2017
मित्रो कल मैने राहू पर पोस्ट की थी थोडा ओर वात करते है ज्योतष में राहु को मायावी ग्रह के नाम से भी जाना जाता है तथा मुख्य रूप से राहु मायावी विद्याओं तथा मायावी शक्तियों के ही कारक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त राहु को बिना सोचे समझे मन में आ जाने वाले विचार, बिना सोचे समझे अचानक मुंह से निकल जाने वाली बात, क्षणों में ही भारी लाभ अथवा हानि देने वाले क्षेत्रों जैसे जुआ, लाटरी, घुड़दौड़ पर पैसा लगाना, इंटरनैट तथा इसके माध्यम से होने वाले व्यवसायों तथा ऐसे ही कई अन्य व्यवसायों तथा क्षेत्रों का कारक माना जाता है।यह अकेला ही ऐसा ग्रह है जो सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल भी बना सकता है तथा इसी लिए इस ग्रह को मायावी ग्रह के नाम से जाना जाता है। अगर आज के युग की बात करें तो इंटरनैट पर कुछ वर्ष पहले साधारण सी दिखने वाली कुछ वैबसाइटें चलाने वाले लोगों को पता भी नहीं था की कुछ ही समय में उन वैबसाइटों के चलते वे करोड़पति अथवा अरबपति बन जाएंगे। किसी लाटरी के माध्यम से अथवा टैलीविज़न पर होने वाले किसी गेम शो के माध्यम से रातों रात कुछ लोगों को धनवान बना देने का काम भी इसी ग्रह का है।इंटरनैट से जुड़े हुए व्यवसाय तथा इन्हें करने वाले लोग, साफ्टवेयर क्षेत्र तथा इससे जुड़े लोग, तम्बाकू का व्यापार तथा सेवन, राजनयिक, राजनेता, राजदूत, विमान चालक, विदेशों में जाकर बसने वाले लोग, अजनबी, चोर, कैदी, नशे का व्यापार करने वाले लोग, सफाई कर्मचारी, कंप्यूटर प्रोग्रामर, ठग, धोखेबाज व्यक्ति, पंछी तथा विशेष रूप से कौवा, ससुराल पक्ष के लोग तथा विशेष रूप से ससुर तथा साला, बिजली का काम करने वाले लोग, कूड़ा-कचरा उठाने वाले किसी जातक की कुण्डली में राहू की दशा या अंतरदशा चल रही हो तो उसे क्या समस्या आएगी। अपनी कुण्डली विश्लेषण के दौरान जातक का यह सबसे कॉमन सवाल होता है और किसी भी ज्योतिषी के लिए इस सवाल का जवाब देना सबसे मुश्किल काम होता है। इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि राहू की मुख्य समस्याएं क्या हैं और जातक का इस पर क्या प्रभाव पड़ता है। राहू क्या समस्या पैदा करता है, यह जानने से पूर्व यह जानने का प्रयास करते हैं कि राहू खुद क्या है। समुद्र मंथन की मिथकीय कथा के साथ राहू और केतू का संबंध जुड़ा हुआ है। देवताओं और राक्षसों की लड़ाई का दौर चल ही रहा था कि यह तय किया गया कि शक्ति को बढ़ाने के लिए समुद्र का मंथन किया जाए। अब समुद्र का मंथन करने के लिए कुछ आवश्यक साधनों की जरूरत थी, मसलन एक पर्वत जो कि मंथन करे, सुमेरू पर्वत को यह जिम्मेदारी दी गई, शेषनाग रस्सी के रूप में मंथन कार्य से जुड़े, सुमेरू पर्वत जिस आधार पर खड़ा था, वह आधार कूर्म देव यानी कछुए का था और मंथन शुरू हो गया यह कथा तो आप सभ जानते ही है दरअसल यह कथा हमारे भीतर की है यह साघको समझ मे ही आ सकती है क्योंकि कुंडली जागरण के लिए भी यह कथा मायने रखती है क्या ध्यान में जो डूबते हैं भीतर अलख लगाते हैं उनको भी जह समझ में आती है कुंडली साप के कृति की तरह हमारे शरीर में है मेरु पर्वत से यात्रा शुभ होती है नीचे से ऊपर की ओर राहु को जैसे सर्प कह दिया जाता है और कुंडली भी सर्प की तरह कुडंल मारे मारे भीतर वेठी हुई है और राहु अघेरे का भी का भी प्रतीक है यानि भीतर के अंधेरे में डूबना होगा। और मंथन भीतर जाकर मंथन करना होगा खैर यह बातें थोड़ी लंबी हो जाएंगी।पोस्ट तो फिर कभी यह मैं आपसे यह बातें शेयर करूंगा मिथकीय घटना के इतर देखा जाए तो राहू और केतू वास्तव में सूर्य और चंद्रमा के संपात कोणों पर बनने वाले दो बिंदू हैं। पृथ्वी पर खड़ा जातक अगर आकाश की ओर देखता है तो सूर्य और चंद्रमा दोनों ही पृथ्वी का चक्कर लगाते हुए नजर आत हैं। वास्तव में ऐसा नहीं है, लेकिन एक ऑब्जर्वर के तौर पर यह घटना ऐसी ही होती है। ऐसे में दोनों ग्रहों (यहां सूर्य तारा है और चंद्रमा उपग्रह इसके बावजूद हम ज्योतिषीय कोण से इन्हें ग्रह से ही संबोधित करेंगे) की पृथ्वी के प्रेक्षक के लिए एक निर्धारित गति है। चूंकि पृथ्वी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर केन्द्रित हो पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है, सो उत्तर की ओर बनने वाले संपात कोण को राहू (नॉर्थ नोड) और दक्षिण की ओर बनने वाले संपात कोण को केतू (साउथ नोड) कहा गया।कहानी के अनुसार राहू केवल सिर वाला भाग है। राहू गुप्त रहता है, राहू गूढ़ है, छिपा हुआ है, अपना भेष बदल सकता है, जो ढ़का हुआ वह सबकुछ राहू के अधीन है। भले ही पॉलीथिन से ढकी मिठाई हो या उल्टे घड़े के भीतर का स्पेस, कचौरी के भीतर का खाली स्थान हो या अंडरग्राउण्ड ये सभी राहू के कारकत्व में आते हैं। राहू की दशा अथवा अंतरदशा में जातक की मति ही भ्रष्ट होती है। चूंकि राहू का स्वभाव गूढ़ है, सो यह समस्याएं भी गूढ़ देता है। जातक परेशानी में होता है, लेकिन यह परेशानी अधिकांशत: मानसिक फितूर के रूप में होती है। उसका कोई जमीनी आधार नहीं होता है। राहू के दौर में बीमारियां होती हैं, अधिकांशत: पेट और सिर से संबंधित, इन बीमारियों का कारण भी स्पष्ट नहीं हो पाता है।कहानी के अनुसार राहू केवल सिर वाला भाग है। राहू गुप्त रहता है, राहू गूढ़ है, छिपा हुआ है, अपना भेष बदल सकता है, जो ढ़का हुआ वह सबकुछ राहू के अधीन है। भले ही पॉलीथिन से ढकी मिठाई हो या उल्टे घड़े के भीतर का स्पेस, कचौरी के भीतर का खाली स्थान हो या अंडरग्राउण्ड ये सभी राहू के कारकत्व में आते हैं। राहू की दशा अथवा अंतरदशा में जातक की मति ही भ्रष्ट होती है। चूंकि राहू का स्वभाव गूढ़ है, सो यह समस्याएं भी गूढ़ देता है। जातक परेशानी में होता है, लेकिन यह परेशानी अधिकांशत: मानसिक फितूर के रूप में होती है। उसका कोई जमीनी आधार नहीं होता है। राहू के दौर में बीमारियां होती हैं, अधिकांशत: पेट और सिर से संबंधित, इन बीमारियों का कारण भी स्पष्ट नहीं हो पाता राहू से पीडि़त व्यक्ति जब चिकित्सक के पास जाता है तो चिकित्सक प्रथम दृष्टया य निर्णय नहीं कर पाते हैं कि वास्तव में रोग क्या है, ऐसे में जांचें कराई जाती है, और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ऐसी मरीज जांच रिपोर्ट में बिल्कुल दुरुस्त पाए जाते हैं। बार बार चिकित्सक के चक्कर लगा रहे राहू के मरीज को आखिर चिकित्सक मानसिक शांति की दवाएं दे देते है राहू बिगड़ने पर जातक को मुख्य रूप से वात रोग विकार घेरते हैं, इसका परिणाम यह होता है कि गैस, एसिडिटी, जोड़ों में दर्द और वात रोग से संबंधित अन्य समस्याएं खड़ी हो जाती हैं।किसी भी जातक की कुण्डली में राहू की महादशा 18 साल की आती है। विश्लेषण के स्तर पर देखा जाए तो राहू की दशा के मुख्य रूप से तीन भाग होते हैं। ये लगभग छह छह साल के तीन भाग हैं। राहू की महादशा में अंतरदशाएं इस क्रम में आती हैं राहू-गुरू-शनि-बुध-केतू-शुक्र-सूर्य- चंद्र और आखिर में मंगल। किसी भी महादशा की पहली अंतरदशा में उस महादशा का प्रभाव ठीक प्रकार नहीं आता है। इसे छिद्र दशा कहते हैं। राहू की महादशा के साथ भी ऐसा ही होता है। राहू की महादशा में राहू का अंतर जातक पर कोई खास दुष्प्रभाव नहीं डालता है। अगर कुण्डली में राहू कुछ अनुकूल स्थिति में बैठा हो तो प्रभाव और भी कम दिखाई देता है। राहू की महादशा में राहू का अंतर अधिकांशत: मंगल के प्रभाव में ही बीत जाता है।राहू में राहू के अंतर के बाद गुरु, शनि, बुध आदि अंतरदशाएं आती हैं। किसी जातक की कुण्डली में गुरु बहुत अधिक खराब स्थिति में न हो तो राहू में गुरू का अंतर भी ठीक ठाक बीत जाता है, शनि की अंतरदशा भी कुण्डली में शनि की स्थिति पर निर्भर करती है, लेकिन अधिकांशत: शनि और बुध की अंतरदशाएं जातक को कुछ धन दे जाती हैं। इसके बाद राहू की महादशा में केतू का अंतर आता है, यह खराब ही होता है, मैंने आज तक किसी जातक की कुण्डली में राहू की महादशा में केतू का अंतर फलदायी नहीं देखा है। राहू में शुक्र कार्य का विस्तार करता है और कुछ क्षणिक सफलताएं देता है। इसके बाद का दौर सबसे खराब होता है। राहू में सूर्य, राहू में चंद्रमा और राहू में मंगल की अंतरदशाएं 90 प्रतिशत जातकों की कुण्डली में खराब ही होती हैंराहू के आखिरी छह साल सबसे खराब होते हैं, इस दौर में जब जातक ज्योतिषी के पास आता है तब तक उसकी नींद प्रभावित हो चुकी होती है, यहां नींद प्रभावित का अर्थ केवल नींद उड़ना नहीं है, नींद लेने का चक्र प्रभावित होता है और नींद की क्वालिटी में गिरावट आती है। मंगल की दशा में जहां जातक बेसुध होकर सोता है, वहीं राहू में जातक की नींद हल्की हो जाती है, सोने के बावजूद उसे लगता है कि आस पास के वातावरण के प्रति वह सजग है, रात को देरी से सोता है और सुबह उठने पर हैंगओवर जैसी स्थिति रहती है। तुरंत सक्रिय नहीं हो पाता है।राहू की तीनों प्रमुख समस्याएं यानी वात रोग, दिमागी फितूर और प्रभावित हुई नींद जातक के निर्णयों को प्रभावित करने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि जातक के प्रमुख निर्णय गलत होने लगते हैं। एक गलती को सुधारने की कोशिश में जातक दूसरी और तीसरी गलतियां करता चला जाता है और काफी गहरे तक फंस जाता हैएकमात्र राहू की ही समस्याए ऐसी है जो दीर्धकाल तक चलती है। राहू के समाधान के लिए कोई एकल ठोस उपाय कारगर नहीं होता है। ऐसे में जातक को न केवल ज्योतिषी की मदद लेनी चाहिए, बल्कि लगातार संपर्क में रहकर उपचारों को क्रम को पूरे अनुशासन के साथ फॉलो करना चाहिए। मेरा निजी अनुभव यह है कि राहू के उपचार शुरू करने के बाद कई जातक जैसे ही थोड़ा आराम की मुद्रा में आते हैं, वे उपचारों में ढील करनी शुरू कर देते हैं, इसका नतीजा यह होता है कि जातक फिर से फिसलकर पहले पायदान पर पहुंच जाता है।अपने सालों के अनुभव में मुझे राहू की समस्या वाले जातक ही अधिक मिले हैं। सालों तक हजारो जातकों के राहू के उपचार करते करते मैंने एक पैटर्न बनाया है, जो राहू के बदलते स्वभाव और प्रभावों को नियंत्रित कर सकने मे कामयाब साबित हुआ है। ऐसे में प्रभावी उपचार जातक को राहू की पीड़ा से बहुत हद तक बाहर ले के जा सकते है इसके बावजूद भी मैंने हमेशा यही कहा है कि राहू की समस्या का 80 प्रतिशत समाधान गारंटी से होता है, राहू की समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं किया जा सकता, चाहें आप एक हजार ज्योतिषियों की सलाह ही क्यों न ले लें वाकी कुन्डली मे देख कर कौन सा लग्न है राहु कोन से भाव मे है कितने अ.श का है किसके नछत्तंर मे किसकी राशी मेहै या उप नछत्तर या किसके साथ युती है ओर दृश्टया यह सव वाते गोर करके ही फल देखे Acharya rajesh kumar 07597718725 09414481324 Paid services
रविवार, 5 मार्च 2017
लाल किताब और राहु मित्रों आज बात करते हैं कुंडली मेराहु देव की जब कुन्डली में राहु खराब होता है,तो दिमागी तकलीफ़ें बढ जाती है,बिना किसी कारण के दिमाग में पता नही कितनी टेन्सन पैदा हो जाती है,बिना किसी कारण के सामने वाले पर शक किया जाने लगता है,और जो अपने होते हैं वे पराये हो जाते है,और जो पराये और घर को बिगाडने वाले होते है,उन पर जानबूझ कर विश्वास किया जाता है,घर के मुखिया का राहु खराब होता है,तो पूरा घर ही बेकार सा हो जाता है,संतान अपने कारणो से आत्महत्या तक कर लेती है,पुत्र या पुत्र वधू का स्वभाव खराब हो जाता है,वह अपने शंकित दिमाग से किसी भी परिवार वाले पर विश्वास नही कर पाती है,घर के अन्दर साले की पत्नी,पुत्रवधू,मामी,भानजे की पत्नी,और नौकरानी इन सबकी उपाधि राहु से दी जाती है,कारण केतु का सप्तम राहु होता है,और राहु के खराब होने की स्थिति में इन सब पर असर पडना चालू हो जाता है,राहु के समय में इन लोगों का प्रवेश घर के अन्दर हो जाता है,और यह लोग ही घर और परिवार में फ़ूट डालना इधर की बात को उधर करना चालू कर देते है,साले की पत्नी घर में आकर पत्नी को परिवार के प्रति उल्टा सीधा भरना चालू कर देती है,और पत्नी का मिजाज गर्म होना चालू हो जाता है,वह अपने सामने वाले सदस्यों को अपनी गतिविधियों से परेशान करना चालू कर देती है,उसके दिमाग में राहु का असर बढना चालू हो जाता है,और राहु का असर एक शराब के नशे के बराबर होता है,वह समय पर उतरता ही नही है,केवल अपनी ही झोंक में आगे से आगे चला जाता है,उसे सोचने का मौका ही नही मिलता है,कि वह क्या कर रहा है,जबकि सामने वाला जो साले की पत्नी और पुत्रवधू के रूप में कोई भी हो सकता है,केवल अपने स्वार्थ के लिये ही अपना काम निकालने के प्रति ही अपना रवैया घर के अन्दर चालू करता है,उसका एक ही उद्देश्य होता है,कि राहु की माफ़िक घर के अन्दर झाडू लगाना और किसी प्रकार के पारिवारिक दखलंदाजी को समाप्त कर देना,गाली देना,दवाइयों का प्रयोग करने लग जाना,शराब और तामसी कारणो का प्रयोग करने लग जाना,लगातार यात्राओं की तरफ़ भागते रहने की आदत पड जाना,जब भी दिमाग में अधिक तनाव हो तो जहर आदि को खाने या अधिक नींद की गोलियों को लेने की आदत डाल लेना,अपने ऊपर मिट्टी का तेल या पैट्रोल डालकर आग लगाने की कोशिश करना,राहु ही वाहन की श्रेणी में आता है,उसका चोरी हो जाना,शराब और शराब वाले कामो की तरफ़ मन का लगना,शहर या गांव की सफ़ाई कमेटी का सदस्य बन जाना,नगर पालिका के चुनावों की तरफ़ मन लगना,घर के किसी पूर्वज का इन्तकाल हो जाना और अपने कामों की बजह से उसके क्रिया कर्म के अन्दर शामिल नही कर पाना आदि बातें सामने आने लगती है,जब व्यक्ति इतनी सभी बातो से ग्रसित हो जाता है,तो राहु के लिये वैदिक रीति से काफ़ी सारी बातें जैसे पूजा पाठ और हवन आदि काम बताये जाते है,जाप करने के लिये राहु के मन्त्रों को बताया जाता है,राहु के लिये गोमेद आदि को पहिनने के लिये रत्नोको पहनें का काम बताया जाता हैजो राहु को ओर भी वल देता हैराहु का पहला कार्य होता है झूठ बोलना और झूठ बोलकर अपनी ही औकात को बनाये रखना,वह किसी भी गति से अपने वर्चस्व को दूसरों के सामने नीचा नही होना चाहता है। अधिकतर जादूगरों की सिफ़्त में राहु का असर बहुत अधिक होता है,वे पहले अपने शब्दों के जाल में अपनी जादूगरी को देखने वाली जनता को लेते है फ़िर उन्ही शब्दों के जाल के द्वारा जैसे कह कुछ रहे होते है जनता का ध्यान कहीं रखा जाता है और अपनी करतूत को कहीं अंजाम दे रहे होते है,इस प्रकार से वे अपने फ़ैलाये जाल में जनता को फ़ंसा लेते है. राहु का कार्य अपने प्रभाव में लेकर अपना काम करना होता है,सम्मोहन का नाम भी दिया जाता है,जो लोग अपने प्रभाव को फ़ैलाना चाहते है वे अपने सम्मोहन को कई कारणों से फ़ैलाना भी जानते है,जैसे ही सम्मोहन फ़ैल जाता है लोगों का काम अपने अपने अनुसार चलने लगता है। जैसे पुलिस के द्वारा अक्सर शक्ति प्रदर्शन किया जाता है,उस शक्ति प्रदर्शन की भावना में लोगों के अन्दर पुलिस का खौफ़ भरना होता है,यही खौफ़ अपराधी को अपराध करने से रोकता है,यह खौफ़ नाम का सम्मोहन फ़ायदा देने वाला होता है। इसी प्रकार से अपने कार्यालय आफ़िस गाडी घर शरीर को सजाने संवारने के पीछे जो सम्मोहन होता है वह अपने को समाज में बडा प्रदर्शित करने का सम्मोहन होता है,अपने को बडा प्रदर्शित करना भी शो नामका सम्मोहन राहु की श्रेणी में आता है. राहु की जादूगरी से अक्सर लोग अपने को दुर्घटना में भी ले जाते है,जैसे उनके अन्दर किसी अच्छे या बुरे काम को करने का विचार लगातार दिमाग में चल रहा है,अथवा घर या कोई विशेष टेंसन उनके दिमाग में लगातार चल रही है,उस टेंशन के वशीभूत होकर जहां उनको जाना है उस स्थान पर जाने की वजाय अन्य किसी स्थान पर पहुंच जाते है,अक्सर गाडी चलाते वक्त जब इस प्रकार का कारण दिमाग में चलता है तो अक्समात ही अपनी गाडी या वाहन को मोडना या साइड में ले जाना या वचारों की तंद्रा में खो कर चलना दुर्घटना को जन्म देता है,राहु शराब के रूप में शरीर के खून में उत्तेजना देता है,मानसिक गति को भुलाने का काम करता है लेकिन शरीर पर अधिक दबाब आने के कारण शरीर के अन्दरूनी अंग अपना अपना बल समाप्त करने के बाद बेकार हो जाते है,यह राहु अपने कारणों से व्यक्ति की जिन्दगी को समाप्त कर देता है. लाटरी जुआ सट्टा के समय राहु केवल अपने ख्यालों में रखता है और जो अंक या कार्य दिमाग में छाया हुआ है उस विचार को दिमाग से नही निकलने देता है,सौ मे से दस को वह कुछ देता है और नब्बे का नुकसान करता है. ज्योतिष के मामले में राहु अपनी चलाने के चक्कर में ग्रह और भावों को गलत बताकर भय देने के बाद पूंछने वाले से धन या औकात को छीनने का कार्य करता है. वैसे राहु की देवी सरस्वती है और अपने समय पर व्यक्ति को सत्यता भी देती है लेकिन सरस्वती और लक्ष्मी में बैर है,जहां सरस्वती होती है वहां लक्ष्मी नही और जहां लक्ष्मी होती है वहां सरस्वती नही.जो लोग दोनो को इकट्ठा करने के चक्कर में होते है वे या तो कुछ समय तक अपने झूठ को चलाकर चुप हो जाते है या फ़िर सरस्वती खुद उन्हे शरीर धन और समाज से दूर कर देती है,अथवा किसी लक्ष्मी के कारण से उन्हे खुद राहु के साये में जैसे जेल या बन्दी गृह में अपना जीवन निकालना पडता है. राहु अलग अलग भावों में अपनी अलग अलग शक्ति देता है,अलग अलग राशि से अपना अलग अलग प्रभाव देता है,तुला राशि के दूसरे भाव में अगर राहु विद्यमान है तो इस राशि वाला जातक विष जैसी वस्तुओं को आराम से सेवन कर सकता है,और मृत्यु भी इसी प्रकार के कारकों से होती है,उसके बोलने पर गालियों का समिश्रण होता है,मतलब जो भी बात करता है वह बिच्छू के जहर जैसी लगती है,अगर गुरु या कोई सौम्य ग्रह सहायता में नही है तो अक्सर इस प्रकार के लोग शमशान के कारकों के लिये मशहूर हो जाते है,चिता जलाने का काम घुऐ का रुप देता हैराहु गाने बजाने की विद्या के साथ में अपनी गति भी देता है और मनोरंजन के रूप में भी माना जाता है,जैसे किसी सिनेमा मनोरंजन के काम में महारत हासिल करना,भद्दी बातें कहकर अपने को मनोरंजन की दुनिया में शामिल कर लेना और उन बातों को मजाक में कह देना जो बातें अगर सभ्रांत परिवार में कही जायें तो लोग लड मर राहु खून की बीमारियां और इन्फ़ेक्सन भी देता है,जैसे मंगल नीच के साथ अगर मंगल की युति है तो जातक को लो ब्लड प्रेसर की बीमारी होगी,वही बात अगर उच्च के मंगल के साथ है तो हाई ब्लड प्रेसर की बीमारी होगी,और मंगल राहु के साथ गुरु भी कन्या राशि के साथ या छठे भाव के मालिक के साथ मिल गया है तो शुगर की बीमारी भी साथ में होगी. राहु मंगल गुरु अगर बारहवें भाव में है तो केतु अपने आप छठे भाव में होगा,जातक को समाज में कहा तो जायेगा कि वह बहुत विद्वान है लेकिन छुपे रूप में वह शराब मांस का शौकीन होगा,या फ़िर अस्पताल की नौकरी करता होगा या जेल के अन्दर खाना बनाने का काम करता होगा. तीसरे भाव का राहु अपने पराक्रम और चालाकी के लिये माना जायेगा इस प्रकार के व्यक्ति के अन्दर अपनी छा जाने वाली प्रकृति से कोई रोक नही सकता है,वह जिसके सामने भी बात करेगा,उस पर वह अपने कार्यों से बातों से और अपने शौक आदि से छा जाने वाली प्रकृति को अपनायेगा,इसके साथ बुद्धि के अन्दर केवल अपने को प्रदर्शित करने की कला का ही विकास होगा,उसका जीवन साथी अक्सर समाज से अलग और गृहस्थ जीवन कभी सुखी नही होगा। चौथे भाव का राहु शक की बीमारी को देता है रहने वाले स्थान को सुनसान रखने के लिये माना जाता है,मन के अन्दर आशंकाये हमेशा अपने प्रभाव को बनाये रखती है,यहां तक कि रोजाना के किये जाने वाले कामों के अन्दर भी शंका होती है,जो भी काम किया जाता है उसके अन्दर अपमान मृत्यु और जान जोखिम का असर रहता है,बडे भाई और मित्र के साथ कब अपघात कर दे कोई पता नही होता है,जो भी लाभ के साधन होते है उनके लिये हमेशा शंका वाली बातें ही होती है,माता के लिये अपमान और जोखिम देने वाला घर में रहते हुये अपने प्रयासों से कोई न कोई आशंका को देते रहना उसका काम हो जाता है,लेकिन बाहर रहकर अपने को अपने अनुसार किये जाने वाले कामों में वह सुरक्षित रखता है पिता के लिये कलंक देने वाला होता है. पंचम भाव का राहु संतान और बुद्धि को बरबार रखता है,जल्दी से जल्दी हर काम को करने के चक्कर में वह अपनी विद्या को बीच में तोड लेता है,नकल करने की आदत या चोरी से विद्या वाली बातों को प्रयोग करने के कारण वह बुद्धि का विकास नही कर पाता है,जब भी कभी विद्या वाली बात को प्रकट करने का अवसर आता है कोई न कोई बहाना बनाकर अपने को बचाने का प्रयास करता है पत्नी या जीवन साथी के प्रति वह प्रेम प्रदर्शित नही कर पाता है और आत्मीय भाव नही होने से संतान के उत्पन्न होने में बाधा होती है. छठा राहु बुद्धि के अन्दर भ्रम देता है,लेकिन उसके मित्रों या बडे भाई बहिनो के प्रयास से उसे मुशीबतों से बचा लिया जाता है,अपमान लेने में उसे कोई परहेज नही होता है,कोई भी रिस्क को ले सकता है,किसी भी कुये खाई पहाड से कूदने में उसे कोई डर नही लगता है,वह किसी भी कार्य को करने के लिये भूत की तरह से काम कर सकता है और किसी भी धन को बडे आराम से अपने कब्जे में कर सकता है,गूढ ज्ञान के लिये वह अपने को आगे रखता है,राहु को दवाइयों के रूप में भी माना जाता है,जो दवाइयां शरीर में एल्कोहल की मात्रा को बनाती है और जो दवाइयां दर्द आदि से छुटकारा देती है वे राहु की श्रेणी में आती है. राहु की आशंका कभी कभी बहुत बडा कार्य कर जाती है जैसे कि अपना प्रभाव फ़ैलाने के लिये कोई झूठी अफ़वाह फ़ैला कर अपना काम बना ले जाना. धर्म स्थान पर राहु का रूप साफ़ सफ़ाई करने वाले व्यक्ति के रूप में होता है,धन के स्थान में राहु का रूप आई टी फ़ील्ड की सेवाओं के रूप में माना जाता है,जहां असीमित मात्रा की गणना होती है वहां राहु का निवास होता है.बाहरी लोगों से और पराशक्तियों के प्रति उसे विश्वास होता है,अपने खुद के परिवार के लिये आफ़तें और शंकाये पैदा करता रहता है लालकिताब के अन्दर साधारण सा उपाय दिया गया है,कि घर के अन्दर सभी खोटे सिक्के और न प्रयोग में आने वाले बेकार के राहु वाले सामान जैसे कि झाडू और दवाइयों को बहते हुए पानी के अन्दर प्रवाहित कर देना चाहिये,इस छोटे से उपाय के बाद जब राहत मिल जाती है लाल किताब में वह सब है जो एक आदमी को बीमारियों से निजात दिला सकता है और छोटे से छोटे उपाय उसमें दिए गए हैं यहां तक कि लाल किताब की बुराई करने वाले ज्योतिषी भी उसी से उपाय बताते हैं लाल किताब एक जीवनदायिनी और मै इस को को किताब ना कहकर इसको नयमत कहूंगा इसको वख्शीश कहूंगा आचार्य राजेश
शुक्रवार, 3 मार्च 2017
Holli मित्रो कुछ मित्रो ने होली पर लिखने की माँग की है मित्रो फाल्गुन जहां हिन्दू नव वर्ष का अंतिम महीना होता है तो फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष की अंतिम पूर्णिमा के साथ-साथ वर्ष का अंतिम दिन भी होती है। फाल्गुनी पूर्णिमा का धार्मिक रूप से तो महत्व है ही साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक नजरिये से भी बहुत महत्व है। पूर्णिमा पर उपवास भी किया जाता है जो सूर्योदय से आरंभ कर चंद्रोदय तक रखा जाता है। वहीं इस त्यौहार की सबसे खास बात यह है कि यह दिन होली पर्व का दिन होता है जिसे बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है और तमाम लकड़ियों को इकट्ठा कर सभी प्रकार की नकारात्मकताओं की होली जलाई जाती है। दिवाली के बाद होली दूसरा बड़ा त्योहार होता है। होली को रंगों के त्योहार के नाम से भी जाना जाता है। होली का त्योहार दो दिन मनाया जाता है, एक दिन होलिका दहन के रुप में और अगले दिन धुलंडी के रुप में। पूरे देश में होली का आनंद इसी दिन लिया जाता है। भारत में इस साल होलिका दहन 12 मार्च को किया जाएगा और 13 मार्च को लोग रंगों के इस त्योहार का आनंद उठाएंगे। होली की कहानी का प्रतीक देखें तो हिरण्यकश्यप पिता है। पिता बीज है, पुत्र उसी का अंकुर है। हिरण्यकश्यप जैसी दुष्टात्मा को पता नहीं कि मेरे घर आस्तिक पैदा होगा, मेरे प्राणों से आस्तिकता जन्मेगी। इसका विरोधाभास देखें। इधर नास्तिकता के घर आस्तिकता प्रकट हुई और हिरण्यकश्यप घबड़ा गया। जीवन की मान्यताएं, जीवन की धारणाएं दांव पर लग गई 'हर बाप बेटे से लड़ता है। हर बेटा बाप के खिलाफ बगावत करता है। और ऐसा बाप और बेटे का ही सवाल नहीं है -हर 'आज' 'बीते कल' के खिलाफ बगावत है। वर्तमान अतीत से छुटकारे की चेष्टा करता है। अतीत पिता है, वर्तमान पुत्र है। हिरण्यकश्यप मनुष्य के बाहर नहीं है, न ही प्रहलाद बाहर है। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद दो नहीं हैं - प्रत्येक व्यक्ति के भीतर घटने वाली दो घटनाएं हैं। जब तक मन में संदेह है, हिरण्यकश्यप मौजूद है। तब तक अपने भीतर उठते श्रद्धा के अंकुरों को हम पहाड़ों से गिराऐगे, पत्थरों से दबाऐगे, पानी में डुबाऐगे, आग में जलाऐगे- लेकिन हम जला न पाऐगे। जहां संदेह के राजपथ हैं; वहां भीड़ साथ है। जहां श्रद्धा की पगडंडियां हैं; वहां ुहम एकदम अकेले हो जाते है एकाकी। संदेह की क्षमता सिर्फ विध्वंस की है, सृजन की नहीं है। संदेह मिटा सकता है, बना नहीं सकता। संदेह के पास सृजनात्मक ऊर्जा नहीं है। आस्तिकता और श्रद्धा कितनी ही छोटी क्यों न हो, शक्तिशाली होती है। प्रह्लाद के भक्ति गीत हिरण्यकश्यप को बहुत बेचैन करने लगे होंगे। उसे एकबारगी वही सूझा जो सूझता है- नकार, मिटा देने की इच्छा। नास्तिकता विध्वंसात्मक है, उसकी सहोदर है आग। इसलिए हिरण्यकश्यप की बहन है अग्नि, होलिका। लेकिन अग्नि सिर्फ अशुभ को जला सकती है, शुद्ध तो उसमें से कुंदन की तरह निखरकर बाहर आता है। इसीलिए आग की गोद में बैठा प्रह्लाद अनजला बच गया। उस परम विजय के दिन को हमने अपनी जीवन शैली में उत्सव की तरह शामिल कर लिया। फिर जन सामान्य ने उसमें रंगों की बौछार जोड़ दी। बड़ा सतरंगी उत्सव है। पहले अग्नि में मन का कचरा जलाओ, उसके बाद प्रेम रंग की बरसात करो। यह होली का मूल स्वरूप था। इसके पीछे मनोविज्ञान है अचेतन मन की सफाई करना। इस सफाई को पाश्चात्य मनोविज्ञान में कैथार्सिस या रेचन कहते हैं।कोथेरेपी का अनिवार्य हिस्सा होता है मन में छिपी गंदगी की सफाई। उसके बाद ही भीतर प्रवेश हो सकता है।होली जैसे वैज्ञानिक पर्व का हम थोड़ी बुद्धिमानी से उपयोग कर सकें तो इस एक दिन में बरसों की सफाई हो सकती है। फिर निर्मल मन के पात्र में, सद्दवों की सुगंध में घोलकर रंग खेलें तो होली वैसी होगी जैसी मीराबाई ने खेली थी : बिन करताल पखावज बाजै, अनहद की झनकार रे फागुन के दिन चार रे, होली खेल मना रे बिन सुर राग छत्तीसों गावै, रोम-रोम रस कार रे होली खेल मना रे Acharya Rajesh Kumar
गुरुवार, 2 मार्च 2017
मित्रो ज्योतिष यों तो हमेशा लोकप्रिय रहा है लेकिन इन दिनों इसके प्रति कुछ ज्यादा ही लगाव देखा जा रहा है। जब से टीवी पर ज्योतिष और चमत्कारों की चर्चाएं बढ़ी हैं तब से तो ज्योतिष का ग्लैमर ही कुछ विचित्र होता जा रहा है। लेकिन जिस अनुपात में ज्योतिष का वर्चस्व बढ़ा है उस अनुपात में ज्योतिषीय सच्चापन नहीं बढ़ पाया है। ज्योतिष ने सेवा से कहीं आगे बढ़कर धंधे का स्वरूप इख़्तियार कर लिया है। जब से ज्योतिष ने घंधे की चकाचौंध भरी गलियों में प्रवेश कर लिया है तभी से ज्योतिषी और इससे जुड़े सभी क्षेत्रों के लोगों से दैवत्व और दिव्यत्व ने पलायन किया है और इसके स्थान पर बिजनैस टेक्ट और मनी अर्निंग स्टंट फल-फूल रहा है। जब मन में मलीनता आ जाए और ईश्वरीय विद्याओं के जरिये व्यापार का भाव जग जाए तभी से प्राच्यविद्याएं अपना प्रभाव दिखाना छोड़ देती हैं। यही वजह है कि आज ज्योतिषियों की भारी भीड़ और चमक-दमक भरी दुकानों की बेतहाशा बढ़ती संख्या और बाजारों के बीच ज्योतिष से सच्चाई गायब है। भविष्यवाणियां खोटी निकलने लगी हैं और ज्योतिषियों में मत भिन्नता चरम पर है। आस्था और अनास्था के इसी भंवर के बीच वह आम आदमी है जिसकी ज्योतिष शास्त्र के प्रति श्रद्धा है और उसे अज्ञात और भावी के संकेत प्राप्त करने की आतुरता है। इसी श्रद्धा का दोहन ही तो आजकल के ज्योतिषी कर रहे हैं। अधिकतर ज्योतिषी या तो सच्चाई जान सकते नहीं अथवा सच्चाई कहने का अधिकार नहीं है। इन्हें लगता है कि जातक को अच्छी-अच्छी बातें नहीं कही जाएं तो पैसा कैसे निकलेगा। जबकि सच्चा ज्योतिषी वही है जो साफ-साफ बात कहे और उसकी प्रत्येक बात स्पष्ट विचारों से भरी हुई होनी चाहिए न कि अपने स्वार्थ के लिए चिकनी चुपड़ी या गोलमाल। ज्योतिषियों का दायित्व है कि ज्योतिष की साख को बढ़ाने के लिए पूरी प्रामाणिकता के साथ गणित और फलित बताएं और जीवन में शुचिता के साथ ही स्पष्टवादिता कायम रखें।ज्योतिष वैज्ञानिक रहस्यों से भरा गणना पर आधारित विज्ञान है जिसका दुनिया में कोई मुकाबला नहीं। विश्व ब्रह्माण्ड का संविधान वेद है और चारों ज्योतिष चारों वेदों का नेत्र है। ज्योतिष समष्टि और व्यष्टि के लिए कदम-कदम पर उपयोगी है। सकाम हित श्रेष्ठ रश्मियों और श्रेष्ठ समय में करने का ज्ञान यही ज्योतिष ही देता है। ज्योतिष पर निरन्तर शोध और अनुसंधान का नियमित क्रम बने रहना चाहिए। ज्योतिष की मान्यता तभी है जब फलित सटीक और स्पष्ट हो। आज अधिकतर ज्योतिषी जातक का कोई रिकार्ड अपने पास नहीं रखते। जबकि होना यह चाहिए कि वे जिस किसी की जन्मपत्री देखें, उसे कही गई बात को अंकित कर रखें और इसके निष्कर्षों पर चिन्तन करते रहें। इसी से अनुभवों का भण्डार समृद्ध होता है जिसका लाभ समाज को प्राप्त होता है। ज्योतिषियों को चाहिए कि वे आधे अधूरे ज्ञान और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर ज्योतिष का कोई काम न करें बल्कि जो कुछ कहें-लिखें, वह ज्योतिषीय ज्ञान और गणना के आधार पर सही और सटीक होना चाहिए। आज एक कुण्डली चार ज्योतिषी देखते हैं और चारों के कथन में भिन्नता होती है और यहीं से शुरू होता है ज्योतिष विज्ञान के प्रति अविश्वास का दौर। इस स्थिति को समाप्त करने की जरूरत है और इसके लिए यह जरूरी है कि ज्योतिष का पूरा पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण विधिपूर्वक लिया जाए ताकि जन विश्वास में कमी न आए। इसके साथ ही ज्योतिषियों को अपनी किसी भी प्रकार की गलती को भी स्वीकार करना होगा। इसी प्रकार पंचांगों में भी विभिन्नताओं को दूर करने की जरूरत है। ऐसे में ज्योतिषियों को चाहिए कि वे मिल-बैठ कर चिन्तन करें और ज्योतिष के आधारों को मजबूती दें। ज्योतिष को चमत्कार मानना भूल है क्योंकि यह गणनाओं पर आधारित विज्ञान है। ज्योतिषियों को यह भी चाहिए कि वे ज्योतिष कार्य संपादन में कम्प्यूटर और आधुनिक संचार सुविधाओं का इस्तेमाल करें और ज्योतिषीय अनुसंधानों पर विशेष ध्यान दें। ज्योतिष का विकास तभी संभव है जब इस क्षेत्र से जुड़े विद्वान उदारतापूर्वक आगे आएं और ज्योतिष की सेवा को सर्वोपरि रखकर राजनीति और दुराग्रहों तथा पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर सार्वभौम और व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए ज्योतिष के विकास पर ध्यान दें। आज देश में समाज-जीवन और सत्ता से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में रोजाना उतार-चढ़ावों और परिवर्तनों के साथ ही कई अप्रत्याशिक घटनाक्रम अचानक सामने आ जाते हैं। इन सारे हालातों में भावी के बारे में भविष्यवाणी करने में बहुसंख्य ज्योतिषी कतराते रहते हैं और चुप्पी साधे रहते हैं। कुछ दैवीय ऊर्जाओं से सम्पन्न ज्योतिषी जरूर हैं लेकिन वे ज्योतिष की सारी मर्यादाओं और विधाता के विधान में विश्वास रखते हैं। जबकि बहुसंख्य ज्योतिषी अपनी साख बचाने या अपने ज्ञान की अनभिज्ञता को छिपाने के लिए सम सामयिक हालातों पर भविष्यवाणी करने से घबराते हैं। आज देश में कितने ज्योतिषी हैं जो भौगोलिक, सामाजिक, राजनैतिक परिवर्तनों की सम सामयिक और समय पूर्व सटीक भविष्यवाणी कर सकने में समर्थ हैं। इसका जवाब देने का सामर्थ्य किसी में है नहीं। ज्योतिष के नाम पर अधिकांश लोग अधकचरा ज्ञान रखते हैं और अपना धंधा चलाने भर के लिए झूठी-सच्ची मनगढ़ंत बातों और गप्पों का सहारा लेकर जैसे-तैसे अपनी दुकानदारी चला रहे हैं। अगर देश के स्वनामधन्य ज्योतिषियों में इतना दम है तो वे उलुलजुलूल बातों और अपने बेतुके भ्रामक तर्कों की बजाय एकदम स्पष्ट, सटीक और भविष्यवाणी क्यों नहीं कर पा रहे हैं अथवा क्यों नहीं करना चाहते। अधिकांश ज्योतिषियों का धर्म, सदाचार और ईष्टबल से कोई मतलब नहीं रह गया है। सिर्फ प्रोफेशनल की तरह अपने आपको स्थापित कर देने मात्र से ज्योतिष का भला नहीं हो सकता। ‘लगा तो तीर, नहीं तो तुक्का’ वाली बातें अब लोगों को हजम नहीं हो पा रही हैं। जो लोग ज्योतिष क्षेत्र में अपने फन आजमा रहे हैं या जिनकी आजीविका का आधार ही ज्योतिष है उन सभी लोगों को चाहिए कि जनता का विश्वास अर्जित करें और इस बात के लिए अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करें कि इनकी वाणी से निकला अथवा इनके ज्योतिषीय ज्ञान से उपजी भविष्यवाणी निश्चय ही खरी निकलती है। अन्यथा इनके पास जमा ज्योतिषीय डिग्रियों और वैध-अवैध ढंग से हड़पे गए प्रमाण पत्रों, सम्मानों और पुरस्कारों का कोई अर्थ नहीं है।
रविवार, 26 फ़रवरी 2017
मित्रो आज बात करते हैं सूर्य देव की। जैसे क्या आप जानतेहै । सूर्य देव को सात घोड़े जो हमारे शास्त्रों मे लिखा है ।कि सात घोड़े सूर्य देव के रथ को खींचते हैं।न्यूटन ने इसकी खोज की न्यूटन प्रिज्म द्वारा सूर्य के प्रकाश को सलेश्न किया प्रिज्म काँच से बना एक उपकरण होता ह।ै न्यूटन के मतानुसार जब सूर्य की सफ़ेद किरण को इसके अंदर से गुजारा गया तो वो सात रंगों में विभाजित हो गई और उसने देखा कि लाल र.ग की किरन सबसे कम मुडती है बैंगनी सवसे अघिक मुडती है न्यूटन ने फिर से सात किरनो को उपकरन से निकाला तो किरने सफेद हो गई अतःजब सफेद प्रकाश से उत्पन्न सात रंग की किरने हुई तो इससे यह स्पष्ट होता है कि सूर्य ग्रहो का राजा है और जो सात र.ग की किरने ह।ै और जो बाकी ग्रहो की किरने ह।ै जानी सात रंग की किरने ओर वो उसकी सेना हुई पोप ने 1890 मे यह सिद्ब किया कि सूर्य के प्रकाश की कमी के कारण हडियो के रोग हो जाते हैं आपने देखा होगा कि बालकों को सर्दियों में यह रोग ज्यादा होते हैं और गर्मियों में यह रोग नामत्र के बराबर होते हैं हड्डियों में कैंलशिम की कमी के कारण यह रोग होता है आजकल हमरे घर भी अंधेरे वाले हो गए हैं जो उन लोगों को भी जे रोग हो जाते हैं जो ओरतेपर्दे में रहती है ड3हमारे शरीर के लिऐ जरुरी हैइसके दो तरीके हैं अपने शरीर को लेने के या भोजन के दॉरा या चमडी के दॉरा प्राकृतिक चिकित्सा में भी सूर्य की कितनों के द्वारा उपचार किया जाता है लःंदन के प्रसिद्ध डॉक्टर पॉल वरङन ने लिखा है अपने ऐक कृति में उन्होंने स्वामी विशुद्धनदा परमहंस जी का जिकृ दिया है कि वह सुरजी किरणों से बड़े-बड़े इलाज करते थे याहा तक की वह शुश्क वस्तु मैं भी उस में सुगंध पैदा कर देते है सूरजी किरनों के द्वारा और भी बहुत कुछ उसे कर सकते थे यह वाते आप से इस लिऐ कह रहा हूं कि आगे चलकर मैं इसी तरह की पोस्ट करुंगा आप की बीमारियों के बारे में कुंडली मेंदेख कर रोग को कैसे दूर किया जाऐ आचार्य राजेश07597718725 09414481324
शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017
कर्म और ज्योतिष व्यवसाय या कारोवार का मतलब घरवार चलाने के लिये मनुष्य को कर्म करना जरूरी होता है। बिना कर्म किये कोई भी इस जगत में नहीं रह सकता है,तो हम मनुष्य की बिसात ही क्या ,इसलिये मनुष्य को कर्म करना जरूरी है। मनुष्य अपने पिछले जीवन के कर्मों के अनुसार उन कर्म फ़ल का भुगतान लेने के लिये इस जन्म में आता है,और जो कर्म इस जीवन में किये जाते है उनको आगे के जीवन में प्राप्त करना होता है। कर्म की श्रेणियां भूतकाल के कर्मों के अनुसार ही बनती है,जैसे पिछले समय में अगर किसी से फ़ालतू में दासता का कर्म करवा कर जातक आया है तो उसे इस जीवन में जिससे दासता करवायी थी उसके प्रति दासता तो करनी ही पडेगी। उस दासता का रूप कुछ भी हो सकता है। अक्सर जब एक धनी व्यक्ति का पुत्र अपने कर्मों के अनुसार धन कमाने के बजाय धन को बेकार के कामों के अन्दर खर्च करने लगता है तो उसका मतलब यही होता है कि धनी व्यक्ति के परिवार में जन्म लेने के बावजूद भी दासता वाले काम करने है। लोग कहने लगते है कि बेचारा कितने धनी परिवार में पैदा हुआ था और भाग्य की बिडम्बना के कारण दासता के काम करने पड रहे है। यह भाग्य का लेख है कि काम तो करना ही पडेगा। कार्य के तीन रूप हैं,नौकरी करना व्यवसाय करवाना,और व्यवसाय के साथ नौकरी करना। व्यवसाय करने के साथ नौकरी करना भी एक साथ नही होता है। ग्रह और भाव नौकरी व्यवसाय और व्यक्ति के द्वारा जीवन मे किये जाने वाले जीविकोपार्जन के लिये प्रयासों का लेखा जोखा बतलाते है। ग्रहों के प्रभाव से अच्छे अच्छे व्यवसायी पलक झपकते धराशायी हो जाते और ग्रहों के ही प्रभाव से गरीब से गरीब कहां से कहां पहुंच जाते है। ग्रहों के बारे में ज्ञान हर किसी को नही होता है,और जो ग्रह और अपने जन्म के भाव को साथ लेकर चलता है और अपने ग्रह और भाव को पहिचान कर चलता है वह जीवन मे आने वाली समस्या को तुरत फ़ुरत मे समाधान कर लेता है,वह बुरे दिनों मे अपने व्यवसाय को स्थिर करने के बाद दूसरे कामों को निपटा लेता है,जबकि ग्रहों और भावों को नही जानने वाला समस्याओं के अन्दर फ़ंस कर और अधिक फ़ंसता चला जाता है। समझदार लोग वही होते है जो कल की सोच कर चलते है,और जो लोग आज मौज करो कल का क्या भरोसा के हिसाब से चलते है उनके लिये कोई चांस नही होता है कि वे आगे बढेंगे भी। आपको बताते है कि ग्रह किस राशि पर अपना प्रभाव कब गलत और कब सही डालते है। व्यवसाय के लिये कौन सी राशि "नाम राशि या जन्म राशि"? जन्म नाम को कई प्रकार से रखा जाता है,भारत में जन्म नाम को चन्द्र राशि से रखने का रिवाज है,चन्द्र राशि को महत्वपूर्ण इसलिये माना जाता है कि शरीर मन के अनुसार चलने वाला होता है,बिना मन के कोई काम नही किया जा सकता है यह अटल है,बिना मन के किया जाने वाला काम या तो दासता में किया जाता है या फ़िर परिस्थिति में किया जाता है। दासता को ही नौकरी कहते है और परिस्थिति में जभी काम किया जाता है जब कहीं किसी के दबाब में आकर या प्रकृति के द्वारा प्रकोप के कारण काम किया जाये। जन्म राशि के अनुसार चन्द्रमा का स्थान जिस राशि में होता है,उस राशि का नाम जातक का रखा जाता है,नामाक्षर को रखने के लिये नक्षत्र को देखा जाता है और नक्षत्र में उसके पाये को देखा जाता है,पाये के अनुसार एक ही राशि में कई अक्षरों से शुरु होने वाले नामाक्षर होते है। राशि का नाम तो जातक के घर वाले या पंडितों से रखवाया जाता है,लेकिन नामाक्षर को प्रकृति रखती है,कई बार देखा जाता है कि जातक का जो नामकरण हुआ है उसे कोई नही जानता है,और घर के अन्दर या बाहर का व्यक्ति किसी अटपटे नाम से पुकारने लग जाये तो उस नाम से व्यक्ति प्रसिद्ध हो जाता है। यह नाम जो प्रकृति के द्वारा रखा जाता है,ज्योतिष में अपनी अच्छी भूमिका प्रदान करता है। अक्सर देखा जाता है कि कन्या राशि वालों का नाम कन्या राशि के त्रिकोण में या लगन के त्रिकोण में से ही होता है,वह जातक के घर वालों या किसी प्रकार से जानबूझ कर भी नही रखा गया हो लेकिन वह नाम कुंडली बनाने के समय त्रिकोण में या नवांश में जरूर अपना स्थान रखता है। मैने कभी कभी किसी व्यक्ति की कुंडली को उसकी पचास साल की उम्र में बनाया है और पाया कि उसका नाम राशि या लगन से अथवा नवांश के त्रिकोण से अपने आप प्रकृति ने रख दिया है। कोई भी व्यवसाय करने के लिये नामाक्षर को देखना पडता है,और नामाक्षर की राशि का लाभ भाव का दूसरा अक्षर अगर सामने होता है तो लाभ वाली स्थिति होती है,अगर वही दूसरा अक्षर अगर त्रिक भावों का होता है तो किसी प्रकार से भी लाभ की गुंजायस नही रहती है। उदाहरण के लिये अगर देखा जाये तो नाम "अमेरिका" में पहला नामाक्षर मेष राशि का है और दूसरा अक्षर सिंह राशि का होने के कारण पूरा नाम ही लाभ भाव का है,और मित्र बनाने और लाभ कमाने के अलावा और कोई उदाहरण नही मिलता है,उसी प्रकार से "चीन" शब्द के नामाक्षर में पहला अक्षर मीन राशि का है और दूसरा अक्षर वृश्चिक राशि का होने से नामानुसार कबाड से जुगाड बनाने के लिये इस देश को समझा जा सकता है,वृश्चिक राशि का भाव पंचमकारों की श्रेणी में आने से चीन में जनसंख्या बढने का कारण मैथुन से,चीन में अधिक से अधिक मांस का प्रयोग,चीन में अधिक से अधिक फ़ेंकने वाली वस्तुओं को उपयोगी बनाने और जब सात्विकता में देखा जाये तो वृश्चिक राशि के प्रभाव से ध्यान समाधि और पितरों पर अधिक विश्वास के लिये मानने से कोई मना नही कर सकता है। उसी प्रकार से भारत के नाम का पहला नामाक्षर धनु राशि का और दूसरा नामाक्षर तुला राशि का होने से धर्म और भाग्य जो धनु राशि का प्रभाव है,और तुला राशि का भाव अच्छा या बुरा सोचने के बाद अच्छे और बुरे के बीच में मिलने वाले भेद को प्राप्त करने के बाद किये जाने वाले कार्यों से भारत का नाम सिरमौर रहा है। इसी तरह से अगर किसी व्यक्ति का नाम "अमर" अटल आदि है तो वह किसी ना किसी प्रकार से अपने लिये लाभ का रास्ता कहीं ना कहीं से प्राप्त कर लेगा यह भी एक ज्योतिष का चमत्कार ही माना जा सकता है।उदाहरणता"एयरटेल" यह नाम अपने मे विशेषता लेकर चलता है,और इस नाम को भारतीय ज्योतिष के अनुसार प्रयोग करने के लिये जो भाव सामने आते है उनके आनुसार अक्षर "ए" वृष राशि का है और "य" वृश्चिक राशि का है,वृष से वृश्चिक एक-सात की भावना देती है,जो साझेदारी के लिये माना जाता है,इस नाम के अनुसार कोई भी काम बिना साझेदारी के नही किया जा सकता है,लेकिन साझेदारी के अन्दर भी लाभ का भाव होना जरूरी है,इसलिये दूसरा शब्द "टेल" में सिंह राशि का "ट" प्रयोग में लिया गया है,एक व्यक्ति साझेदारी करता है और लाभ कमाता है,अधिक गहरे में जाने से वृष से सिंह राशि एक चार का भाव देती है,लाभ कमाने के लिये इस राशि को जनता मे जाना पडेगा,कारण वृष से सिंह जनता के चौथे भाव में विराजमान है। [24/02 11:15 am] Acharya Rajesh kumar: मित्रों अगर आप भी मुझसे अपनी कुंडली दिखाना जब बनवाना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें हमारे नंबर है 07597718725 09414481324 मां काली ज्योतिष रिसर्च सेंटर हनुमानगढ़ टाउन आचार्य राजेश मित्रों हमारी सारी सर्विस paid है
गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017
ज्योतिष ओर फल मित्रो फल कथन करते समय देश काल परिस्थतीक का भी महत्व एक लग्न और एक लग्न की डिग्री में महत्वपूर्ण व्यक्ति का जन्म एक स्थान में कभी नहीं होता। यदि किसी दूरस्थ देश में किसी दूसरे व्यक्ति का जन्म इस समय हो भी , तो आक्षांस और देशांतर में परिवर्तन होने से उसके लग्न और लग्न की डिग्री में परिवर्तन आ जाएगा। फिर भी जब जन्म दर बहुत अधिक हो , तो या बहुत सारे बच्चे भिन्न-भिन्न जगहों पर एक ही दिन एक ही लग्न में या एक ही लग्न डिग्री में जन्म लें , तो क्या सभी के कार्यकलाप , चारित्रिक विशेशताएं , व्यवसाय , शिक्षा-दीक्षा , सुख-दुख एक जैसे ही होंगे ? मेरी समझ से उनके कार्यकलाप , उनकी बौद्धिक तीक्ष्णता , सुख-दुख की अनुभूति , लगभग एक जैसी ही होगी। किन्तु इन जातकों की शिक्षा-दीक्षा , व्यवसाय आदि संदर्भ भौगोलिक और सामाजिक परिवेश के अनुसार भिन्न भी हो सकते हैं। यहॉ लोगों को इस बात का संशय हो सकता है कि ग्रहों की चर्चा के साथ अकस्मात् भौगोलिक सामाजिक परिवेश की चर्चा क्यो की जा रही है ? स्मरण रहे , पृथ्वी भी एक ग्रह है और इसके प्रभाव को भी इंकार नहीं किया जा सकता। आकाश के सभी ग्रहों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है , परंतु भिन्न-भिन्न युगों सत्युग , त्रेतायुग , द्वापर और कलियुग में मनुष्यों के भिनन-भिन्न स्वभाव की चर्चा है। मनुष्य ग्रह से संचालित है , तो मनुष्य के सामूहिक स्वभाव परिवर्तन को भी ग्रहों से ही संचालित समझा जा सकता है , जो किसी युग विशेष को ही जन्म देता है। लेकिन सोंचने वाली बात तो यह है कि जब ग्रहों की गति , स्थिति , परिभ्रमण पथ , स्वरुप और स्वभाव आकाश में ज्यो का त्यो बना हुआ है , फिर इन युगों की विशेषताओं को किन ग्रहों से जोड़ा जाए । युग-परिवर्तन निश्चित तौर पर पृथ्वी के परिवेश के परिवर्तन का परिणाम है। पृथ्वी पर जनसंख्या का बोझ बढ़ता जाना , मनुष्य की सुख-सुविधाओं के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों का तॉता लगना , मनुष्य का सुविधावादी और आलसी होते चले जाना , भोगवादी संस्कृति का विकास होना , जंगल-झाड़ का साफ होते जाना , उद्योगों और मशीनों का विकास होते जाना , पर्यावरण का संकट उपस्थित होना , ये सब अन्य ग्रहों की देन नहीं। यह पृथ्वी के तल पर ही घट रही घटनाएं हैं। पृथ्वी का वायुमंडल प्रतिदिन गर्म होता जा रहा है। आकाश में ओजोन की परत कमजोर पड़ रही है , दोनो ध्रुवों के बर्फ अधिक से अधिक पिघलते जा रहे हैं , हो सकता है , पृथ्वी में किसी दिन प्रलय भी आ जाए ,इन सबमें अन्य ग्रहों का कोई प्रभाव नहीं है। ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य की चिंतनधाराएं बदलती रहती हैं , किन्तु पृथ्वी के विभिन्न भागों में रहनेवाले एक ही दिन एक ही लग्न में पैदा होनेवाले दो व्यक्तियों के बीच काफी समानता के बावजूद अपने-अपने देश की सभ्यता , संस्कृति , सामाजिक , राजनीतिक और भौगोलिक परिवेश से प्रभावित होने की भिन्नता भी रहती है। संसाधनों की भिन्नता व्यवसाय की भिन्नता का कारण बनेगी समुद्र के किनारे रहनेवाले लोग , बड़े शहरों में रहनेवाले लोग , गॉवो में रहनेवाले संपन्न लोग और गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले लोग अपने देशकाल के अनुसार ही व्यवसाय का चुनाव अलग-अलग ढंग से करेंगे। एक ही प्रकार के आई क्यू रखनेवाले दो व्यक्तियों की शिक्षा-दीक्षा भिन्न-भिन्न हो सकती है , किन्तु उनकी चिंतन-शैली एक जैसी ही हो इस तरह पृथ्वी के प्रभाव के अंतर्गत आनेवाले भौगोलिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस कारण एक ही लग्न में एक ही डिग्री में भी जन्म लेनेवाले व्यक्ति का शरीर भौगोलिक परिवेश के अनुसार गोरा या काला हो सकता है। लम्बाई में कमी-अधिकता कुछ भी हो सकती है , किन्तु स्वास्थ्य , शरीर को कमजोर या मजबूत बनानेवाली ग्रंथियॉ , शारीरिक आवश्यकताएं और शरीर से संबंधित मामलों का आत्मविश्वास एक जैसा हो सकता है। सभी के धन और परिवार विशयक चिंतन एक जैसे माने जा सकते है सभी में पुरुषार्थ-क्षमता या शक्ति को संगठित करने की क्षमता एक जैसी होगी सभी के लिए संपत्ति , स्थायित्व और संस्था से संबंधित एक ही प्रकार के दृष्टिकोण होंगे। सभी अपने बाल-बच्चों से एक जैसी लगाव और सुख प्राप्त कर सकेंगे। सभी की सूझ-बूझ एक जैसी होगी। सभी अपनी समस्याओं को हल करने में समान धैर्य और संघर्ष क्षमता का परिचय देंगे। सभी अपनी जीवनसाथी से एक जैसा ही सुख प्राप्त करेंगे। अपनी-अपनी गृहस्थी के प्रति उनका दृष्टिकोण एक जैसा ही होगा। सभी का जीवन दर्शन एक जैसा ही होगा , जीवन-शैली एक जैसी ही होगी। भाग्य , धर्म , मानवीय पक्ष के मामलों में उदारवादिता या कट्टरवादिता का एक जैसा रुख होगा। सभी के सामाजिक राजनीतिक मामलों की सफलता एक जैसी होगी। सभी का अभीष्ट लाभ एक जैसा होगा। सभी में खर्च करने की प्रवृत्ति एक जैसी ही होगी। किन्तु शरीर का वजन , रंग या रुप एक जैसा नहीं होगा। संयुक्त परिवार की लंबाई , चौड़ाई एक जैसी न वास्तव में कुंडली में बनते योग को बांच कर उसे ही 100% मानने की भूल ही इस विवाद का कारण बनती है.जातक के जीवन में इस योग को 20% उसके सामाजिक व् पारिवारिक दशा पर निर्भर होना पड़ता है.20% जातक से जुड़े रक्त सम्बन्धियों का रोल इस योग में होता है ,20% उसका स्वयं का प्रयास अर्थात कर्म यहाँ प्रभावित करने वाला कारक बनता है,बाकि का 20% हम हासिल शाश्त्रों के सुझाये उपायों(जिनमे ज्योतिष आदि सामिल हैं) द्वारा इसे प्रभावित करते हैं.तब जाकर योग का वास्तविक प्रतिशत प्राप्त होने की गणना करना बेहतर निर्णय देने में सहायक बनता है. सामान योग में जन्मा जातक अफ्रीका के जंगलों में आदिवासी कबीले का मुखिया बनता है.यही योग अमेरिका में उसे बराक ओबामा भी बना सकता है.सरकारी विभाग से धन प्राप्ति का योग एक चपरासी की कुंडली में भी विराजमान होता है व् अधिकारी की भी.अत यह सव वाते फलकथन करते समय जरुर maakaali jyotish hanumangarh अर्चाय राजेश 07597718725 09414481324
मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017
कभी कभी किसी कारणवश जन्म तारीख और दिन माह वार आदि का पता नही होता है,कितनी ही कोशिशि की जावे लेकिन जन्म तारीख का पता नही चल पाता है,जातक को सिवाय भटकने के और कुछ नही प्राप्त होता है,किसी ज्योतिषी से अगर अपनी जन्म तारीख निकलवायी भी जावे तो वह क्या कहेगा,इसका भी पता नही होता है,इस कारण के निवारण के लिये आपको कहीं और जाने की जरूरत नही है,किसी भी दिन उजाले में बैठकर एक सूक्षम दर्शी सीसा लेकर बैठ जावें,और अपने दोनो हाथों बताये गये नियमों के अनुसार देखना चालू कर दें,साथ में एक पेन या पैंसिल और कागज भी रख लें,तो देखें कि किस प्रकार से अपना हाथ जन्म तारीख को बताता है। अपनी वर्तमान की आयु का निर्धारण करें हथेली मे चार उंगली और एक अगूंठा होता है,अंगूठे के नीचे शुक्र पर्वत,फ़िर पहली उंगली तर्जनी उंगली की तरफ़ जाने पर अंगूठे और तर्जनी के बीच की जगह को मंगल पर्वत,तर्जनी के नीचे को गुरु पर्वत और बीच वाली उंगली के नीचे जिसे मध्यमा कहते है,शनि पर्वत,और बीच वाली उंगले के बाद वाली रिंग फ़िंगर या अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत,अनामिका के बाद सबसे छोटी उंगली को कनिष्ठा कहते हैं,इसके नीचे बुध पर्वत का स्थान दिया गया है,इन्ही पांच पर्वतों का आयु निर्धारण के लिये मुख्य स्थान माना जाता है,उंगलियों की जड से जो रेखायें ऊपर की ओर जाती है,जो रेखायें खडी होती है,उनके द्वारा ही आयु निर्धारण किया जाता है,गुरु पर्वत से तर्जनी उंगली की जड से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें जो कटी नही हों,बीचवाली उंगली के नीचे से जो शनि पर्वत कहलाता है,से ऊपर की ओर जाने वाली रेखायें,की गिनती करनी है,ध्यान रहे कि कोई रेखा कटी नही होनी चाहिये,शनि पर्वत के नीचे वाली रेखाओं को ढाई से और बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलने वाली रेखाओं को डेढ से,गुणा करें,फ़िर मंगल पर्वत के नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली रेखाओं को जोड लें,इनका योगफ़ल ही वर्तमान उम्र होगी। अपने जन्म का महिना और राशि को पता करने का नियम अपने दोनो हाथों की तर्जनी उंगलियों के तीसरे पोर और दूसरे पोर में लम्बवत रेखाओं को २३ से गुणा करने पर जो संख्या आये,उसमें १२ का भाग देने पर जो संख्या शेष बचती है,वही जातक का जन्म का महिना और उसकी राशि होती है,महिना और राशि का पता करने के लिये इस प्रकार का वैदिक नियम अपनाया जा सकता है:- १-बैशाख-मेष राशि २.ज्येष्ठ-वृष राशि ३.आषाढ-मिथुन राशि ४.श्रावण-कर्क राशि ५.भाद्रपद-सिंह राशि ६.अश्विन-कन्या राशि ७.कार्तिक-तुला राशि ८.अगहन-वृश्चिक राशि ९.पौष-धनु राशि १०.माघ-मकर राशि ११.फ़ाल्गुन-कुम्भ राशि १२.चैत्र-मीन राशि इस प्रकार से अगर भाग देने के बाद शेष १ बचता है तो बैसाख मास और मेष राशि मानी जाती है,और २ शेष बचने पर ज्येष्ठ मास और वृष राशि मानी जाती है। हाथ में राशि का स्पष्ट निशान भी पाया जाता है प्रकृति ने अपने द्वारा संसार के सभी प्राणियों की पहिचान के लिये अलग अलग नियम प्रतिपादित किये है,जिस प्रकार से जानवरों में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार उम्र की पहिचान की जाती है,उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दाहिने या बायें हाथ की अनामिका उंगली के नीचे के पोर में सूर्य पर्वत पर राशि का स्पष्ट निशान पाया जाता है। उस राशि के चिन्ह के अनुसार महिने का उपरोक्त तरीके से पता किया जा सकता है। पक्ष और दिन का तथा रात के बारे में ज्ञान करना वैदिक रीति के अनुसार एक माह के दो पक्ष होते है,किसी भी हिन्दू माह के शुरुआत में कृष्ण पक्ष शुरु होता है,और बीच से शुक्ल पक्ष शुरु होता है,व्यक्ति के जन्म के पक्ष को जानने के लिये दोनों हाथों के अंगूठों के बीच के अंगूठे के विभाजित करने वाली रेखा को देखिये,दाहिने हाथ के अंगूठे के बीच की रेखा को देखने पर अगर वह दो रेखायें एक जौ का निशान बनाती है,तो जन्म शुक्ल पक्ष का जानना चाहिये,और जन्म दिन का माना जाता है,इसी प्रकार अगर दाहिने हाथ में केवल एक ही रेखा हो,और बायें हाथ में अगर जौ का निशान हो तो जन्म शुक्ल पक्ष का और रात का जन्म होता है,अगर दाहिने और बायें दोनो हाथों के अंगूठों में ही जौ का निशान हो तो जन्म कृष्ण पक्ष रात का मानना चाहिये,साधारणत: दाहिने हाथ में जौ का निशान शुक्ल पक्ष और बायें हाथ में जौ का निशान कृष्ण पक्ष का जन्म बताता है। जन्म तारीख की गणना मध्यमा उंगली के दूसरे पोर में तथा तीसरे पोर में जितनी भी लम्बी रेखायें हों,उन सबको मिलाकर जोड लें,और उस जोड में ३२ और मिला लें,फ़िर ५ का गुणा कर लें,और गुणनफ़ल में १५ का भाग देने जो संख्या शेष बचे वही जन्म तारीख होती है। दूसरा नियम है कि अंगूठे के नीचे शुक्र क्षेत्र कहा जाता है,इस क्षेत्र में खडी रेखाओं को गुना जाता है,जो रेखायें आडी रेखाओं के द्वारा काटी गयीं हो,उनको नही गिनना चाहिये,इन्हे ६ से गुणा करने पर और १५ से भाग देने पर शेष मिली संख्या ही तिथि का ज्ञान करवाती है,यदि शून्य बचता है तो वह पूर्णमासी का भान करवाती है,१५ की संख्या के बाद की संख्या को कृष्ण पक्ष की तिथि मानी जाती है। जन्म वार का पता करना अनामिका के दूसरे तथा तीसरे पोर में जितनी लम्बी रेखायें हों,उनको ५१७ से जोडकर ५ से गुणा करने के बाद ७ का भाग दिया जाता है,और जो संख्या शेष बचती है वही वार की संख्या होती है। १ से रविवार २ से सोमवार तीन से मंगलवार और ४ से बुधवार इसी प्रकार शनिवार तक गिनते जाते है। जन्म समय और लगन की गणना सूर्य पर्वत पर तथा अनामिका के पहले पोर पर,गुरु पर्वत पर तथा मध्यमा के प्रथम पोर पर जितनी खडी रेखायें होती है,उन्हे गिनकर उस संख्या में ८११ जोडकर १२४ से गुणा करने के बाद ६० से भाग दिया जाता है,भागफ़ल जन्म समय घंटे और मिनट का होता है,योगफ़ल अगर २४ से अधिक का है,तो २४ से फ़िर भाग दिया जाता है। इस तरह से कोई भी अपने जन्म समय को जान सकता है।
शनिवार, 18 फ़रवरी 2017
कुंडली का आठवां भाव मौत का भाव कहलाता है.बहुत सी गणानाओ का प्रयोग ज्योतिष से उम्र की लम्बाई के लिये किया जाता है लेकिन कुछ गणनाये बहुत ही सटीक मानी जाती है,उन गणनाओ के बारे मे आपको बताने की कोशिश कर रहा हूँ,आशा है आप इस प्रकार की गणना से और भी कुण्डलियों की गणना करेंगे और मुझे लिखेंगे.यह कुंडली एक स्वर्गीय सज्जन की है,अधिक शिक्षित होने के कारण तथा अपने ऊपर बहुत भरोसा होने के कारण धर्म कर्म पूजा पाठ परिवार समाज भाई बन्धु से सभी से एलर्जी थी,उनका कहना था कि जो वे करते है वही होता है ईश्वर तो केवल लोगों को बहलाने का तरीका है,उनकी बातों को सुनकर उस समय तो बहुत बुरा लगा था लेकिन प्रकृति की मीमांसा को समझने के बाद खुद पर सयंम रखना जरूरी समझ कर कुछ नही कहा,उन्हे केवल एक बात जरूर समझा दी थी कि मृत्यु दुनिया का सबसे बडा सत्य है जिसे लोग झुठला सकते है,केवल ज्योतिष को अंजवाने के लिये उन्हे तीन बातें मैने बतायी थी जो उनके दिमाग के अन्दर घर कर गयीं और वे जीवन के अंत मे ईश्वर के प्रति नरम रुख का प्रयोग करने लग गये थे. मैने पहले बताया कि आठवे भाव से आयु का विचार किया जाता है,जीवन मे जो योग शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले होते है उन्हे अरिष्ट योग के नाम से जाना जाता है.जो मुख्य अरिष्ट योग बनते है उनके अन्दर एक तो जब चन्द्रमा कमजोर होकर पाप ग्रह (सूर्य मंगल शनि राहु केतु) या छठे आठवे बारहवें भाव के स्वामी के साथ या तो उनसे द्रष्ट हो अथवा आठवें स्थान मे चला गया हो तब पैदा होता है या चारो केन्द्र स्थानो १,४,७,१०, चन्द्र मंगल सूर्य शनि बैठे हों,या लगन मे चन्द्रमा बारहवे शनि नवे सूर्य आठवें मंगल हो या चन्द्रमा पाप ग्रह से युत होकर १,४,६,८,१२ भाव मे हो.इसके साथ ही इस प्रकार के अरिष्ट योग की समाप्ति भी ग्रहों के द्वारा देखनी जरूरी होती है कि राहु शनि मंगल अगर ३,६,११ मे विराजमान हो तो अरिष्ट भंग योग कहलाता है गुरु और शुक्र अगर केन्द्र यानी १,४,७,१० मे विराजमान हो तो भी अरिष्ट भंग योग बन जाता है. आयु की लम्बाई नापने का सबसे उत्तम तरीका इस प्रकार से है:- सबसे पहले केन्द्र की राशियों की गणना करना,उन्हे जोडना. त्रिकोण की राशियों का जोड. केन्द्र मे और त्रिकोण मे स्थित ग्रहों के अंको का जोड,ग्रहों के अंको को सीधे सीधे दिनो के नाम के अनुसार जोड लेते है जैसे सूर्य का १ चन्द्रमा का २ मंगल का ३ बुध का ४ गुरु का ५ शुक्र का ६ शनि का ७ राहु का ८ केतु का ९. इन सबका योगफ़ल करने के बाद १२ से गुणा किया जाता है और १० से भाग देने के बाद कुल संख्या से १२ घटा दिया जाता है,यह आयु प्रमाण माना जाता है. लेकिन आयु प्रमाण को एक ही रीति से सटीक नही माना जाता है इसे तीन बार सटीकता के लिये देखा जाता है. उदाहरण के लिये आप उपरोक्त कुंडली को समझने की कोशिश करे. केन्द्र मे कन्या धनु मीन और मिथुन राशिया है,उनकी संख्या ६+९+१२+३=३० होती है.त्रिकोण की राशिया पंचम और नवम भाव मे मकर और वृष है उनकी संख्या को भी मिलाया जाता है १०+२=१२,३०+१२=४२ संख्या राशियों का जोड कहलाया.इसके बाद ग्रहो का जोड करना है,लगन मे चन्द्रमा चौथे मे शनि नवे मे सूर्य दसवे मे शुक्र बुध है.इनकी संख्या २+७+१+६+४=२० होती है.राशियों की संख्या और ग्रहों की संख्या को जोडा तो ४२+२०=६२ योगफ़ल आया.इस संख्या मे १२ का गुणा किया तो ७४४ योग आया,इस योग मे १० का भाग दिया तो योगफ़ल ७४.४ आया इसमे से १२ को घटाया तो कुल आयु ६२.४ साल की आयी. दूसरा प्रकार कुंडली के अन्दर जिन राशियों मे ग्रह विद्यमान है उन राशियों के ध्रुवांक जोडकर देखने पर भी आयु का प्रमाण मिलता है,राशियों के ध्रुवांक मेष का १० वृष का ६ मिथुन का २० कर्क का ५ सिंह का ८ कन्या का २ तुला का २० वृश्चिक का ६ धनु का १० मकर का १४ कुम्भ का ३ और मीन का १० होता है.उपरोक्त कुंडली में जिन राशियों ग्रह विद्यमान है वे इस प्रकार से है-मेष वृष मिथुन सिंह कन्या धनु और कुम्भ.राशियों के ध्रुवांक १०+६+२०+८+१०+३=५७ साल. तीसरा प्रकार इस प्रकार से है कुंडली के केन्द्र की राशियों का जोड करने के बाद जिस राशि मे मंगल और राहु विद्यमान है उन राशियों की संख्या का योग केन्द्र की राशियों के योग से घटाने पर तथा उसमे तीन का गुणा करने पर जो आयु बनती है उसे देखना जरूरी होता है,जैसे उपरोक्त कुंडली मे केन्द्र का ३० है मंगल और राहु जिस राशि मे विराजमान है वह कुम्भ है जिसकी संख्या ११ है,३०-११=१९ की संख्या को तीन से गुणा करने पर जोड ५७ साल का आया. उपरोक्त कुंडली जिस जातक की है वह उम्र की ५७ साल मे बीमार हुया और लगातार बीमारी से जूझने के बाद ६२ साल और ३ महिने का का समय पूरा होते ही चल बसा.
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