शुक्रवार, 9 जून 2017

आओ ज्योतिष सीखे ,ज्योतिष वेद का ही अन्ग है,समय की परिभाषा को देने बाला ग्रन्थ है्पृथ्वी की दैनिक गति और उसके पर्याय घड़ी के 24 घंटे को समझने के बाद उस ब्रह्मांड को समझने की चेष्‍टा करें , जो ,महीने ऋतु , वर्ष, युग, मन्वंतर , सृष्टि , प्रलय का लेखा-जोखा और संपूर्ण जगत की गतिविधि को विराट कम्प्यूटर की तरह अपने-आपमें संजोए हुए है। निस्संदेह इन वर्णित संदर्भों का लेखा-जोखा विभिन्न ग्रहों की गतिविधियों पर निर्भर है। उसकी सही जानकारी आत्मविश्वास में वृद्धि करेगी , उसकी एक झलक मात्र से किसी का कल्याण हो सकता है , दिव्य चक्षु खुल जाएगा , आत्मज्ञान बढ़ेगा और संसार में बेहतर ढंग से आप अपने को नियोजित कर पाएंगे। भविष्‍य को सही ढंग से समझ पाना , उसमें अपने आपको खपाते हुए सही रंग भरना सकारात्मक दृष्टिकोण है। समय की सही जानकारी साधन और साध्य दोनो ही है। पहली दृष्टि में देखा जाए , तो घड़ी मात्र एक साधन है , किन्तु गंभीरता से देखें , तो वह मौन रहकर भी कई समस्याओं का इलाज कर देती है। इसी तरह ग्रहों के माध्यम से भविष्‍य की जानकारी रखनेवाला मौन रहकर भी अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त कर लेता है , पर इसके लिए एक सच्‍चे ज्‍योतिषी से आपका परिचय आवश्‍यक है। अति सामान्य व्यक्ति के लिए घड़ी या फलित ज्योतिष शौक का विषय हो सकता है , किन्तु जीवन के किसी क्षेत्र में उंचाई पर रहनेवाले व्यक्ति के लिए घड़ी और भविष्‍य की सही जानकारी की जरुरत अधिक से अधिक है। यह बात अलग है कि सही मायने में भविष्‍यद्रष्‍टा की कमी अभी भी बनी हुई है। ' दशा पद्धति' संपूर्ण जीवन के तस्वीर को घड़ी की तरह स्पष्‍ट बताता है। ग्रह ऊर्जा लेखाचित्र से यह स्पष्‍ट हो जाता है कि कब कौन सा काम किया जाना चाहिए। एक घड़ी की तरह ही ज्योतिष की जानकारी भी समय की सही जानकारी प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं , वरन् अप्रत्यक्षत: बहुत सारी सूचनाएं प्रदान करके , समुचित कार्य करने की दिशा में बड़ी प्रेरणा-स्रोत है। जो कहते हैं कि घड़ी मैंने यों ही पहन रखी है या ज्योतिषी के पास मैं यों ही चला गया था , निश्चित रुप से बहुत ही धूर्त्‍त या अपने को या दूसरों को ठगनेवाले होते हैं। यह सही है कि आज के व्यस्त और अनिश्चित संसार में हर व्यक्ति को एक अच्छी घड़ी या फलित ज्योतिष की जानकारी की आवश्यकता है। इससे उसकी कार्यक्षमता काफी हद तक बढ़ सकती है । जीवन के किसी क्षेत्र में बहुत ऊंचाई पर रहनेवाला हर व्यक्ति यह महसूस करता है कि महज संयोग के कारण ही वह इतनी ऊंचाई हासिल कर सका है , अन्यथा उससे भी अधिक परिश्रमी और बुद्धिमान व्यक्ति संसार में भरे पड़े हैं , जिनकी पहचान भी नहीं बन सकी है। उस बड़ी चमत्कारी शक्ति की जानकारी के लिए फुरसत के क्षणों में उनका प्रयास जारी रहता है। यही कारण है कि बडे बडे विद्वान भी जीवन के अंतिम क्षणों में सर्वशक्तिमान को समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को फलित ज्योतिष की जानकारी से कई समस्याओं को सुलझा पाने में मदद मिल सकती है , किन्तु इसके लिए अपने विराट उत्तरदायितव को समझते हुए समय निकालने की जरुरत है। अपनी कीमती जीवन-शैली में से कुछ समय निकालकर इस विद्या का ज्ञान प्राप्त करेंगे , तो इसके लिए भी एक घड़ी की आवश्यकता अनिवार्य होगी। आचार्य राजेश

आओ ज्योतिष सीखे ,ज्योतिष वेद का ही अन्ग है,समय की परिभाषा को देने बाला ग्रन्थ है्पृथ्वी की दैनिक गति और उसके पर्याय घड़ी के 24 घंटे को समझने के बाद उस ब्रह्मांड को समझने की चेष्‍टा करें , जो ,महीने ऋतु , वर्ष, युग, मन्वंतर , सृष्टि , प्रलय का लेखा-जोखा और संपूर्ण जगत की गतिविधि को विराट कम्प्यूटर की तरह अपने-आपमें संजोए हुए है। निस्संदेह इन वर्णित संदर्भों का लेखा-जोखा विभिन्न ग्रहों की गतिविधियों पर निर्भर है। उसकी सही जानकारी आत्मविश्वास में वृद्धि करेगी , उसकी एक झलक मात्र से किसी का कल्याण हो सकता है , दिव्य चक्षु खुल जाएगा , आत्मज्ञान बढ़ेगा और संसार में बेहतर ढंग से आप अपने को नियोजित कर पाएंगे। भविष्‍य को सही ढंग से समझ पाना , उसमें अपने आपको खपाते हुए सही रंग भरना सकारात्मक दृष्टिकोण है। समय की सही जानकारी साधन और साध्य दोनो ही है। पहली दृष्टि में देखा जाए , तो घड़ी मात्र एक साधन है , किन्तु गंभीरता से देखें , तो वह मौन रहकर भी कई समस्याओं का इलाज कर देती है। इसी तरह ग्रहों के माध्यम से भविष्‍य की जानकारी रखनेवाला मौन रहकर भी अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त कर लेता है , पर इसके लिए एक सच्‍चे ज्‍योतिषी से आपका परिचय आवश्‍यक है। अति सामान्य व्यक्ति के लिए घड़ी या फलित ज्योतिष शौक का विषय हो सकता है , किन्तु जीवन के किसी क्षेत्र में उंचाई पर रहनेवाले व्यक्ति के लिए घड़ी और भविष्‍य की सही जानकारी की जरुरत अधिक से अधिक है। यह बात अलग है कि सही मायने में भविष्‍यद्रष्‍टा की कमी अभी भी बनी हुई है। ' दशा पद्धति' संपूर्ण जीवन के तस्वीर को घड़ी की तरह स्पष्‍ट बताता है। ग्रह ऊर्जा लेखाचित्र से यह स्पष्‍ट हो जाता है कि कब कौन सा काम किया जाना चाहिए। एक घड़ी की तरह ही ज्योतिष की जानकारी भी समय की सही जानकारी प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं , वरन् अप्रत्यक्षत: बहुत सारी सूचनाएं प्रदान करके , समुचित कार्य करने की दिशा में बड़ी प्रेरणा-स्रोत है। जो कहते हैं कि घड़ी मैंने यों ही पहन रखी है या ज्योतिषी के पास मैं यों ही चला गया था , निश्चित रुप से बहुत ही धूर्त्‍त या अपने को या दूसरों को ठगनेवाले होते हैं। यह सही है कि आज के व्यस्त और अनिश्चित संसार में हर व्यक्ति को एक अच्छी घड़ी या फलित ज्योतिष की जानकारी की आवश्यकता है। इससे उसकी कार्यक्षमता काफी हद तक बढ़ सकती है । जीवन के किसी क्षेत्र में बहुत ऊंचाई पर रहनेवाला हर व्यक्ति यह महसूस करता है कि महज संयोग के कारण ही वह इतनी ऊंचाई हासिल कर सका है , अन्यथा उससे भी अधिक परिश्रमी और बुद्धिमान व्यक्ति संसार में भरे पड़े हैं , जिनकी पहचान भी नहीं बन सकी है। उस बड़ी चमत्कारी शक्ति की जानकारी के लिए फुरसत के क्षणों में उनका प्रयास जारी रहता है। यही कारण है कि बडे बडे विद्वान भी जीवन के अंतिम क्षणों में सर्वशक्तिमान को समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को फलित ज्योतिष की जानकारी से कई समस्याओं को सुलझा पाने में मदद मिल सकती है , किन्तु इसके लिए अपने विराट उत्तरदायितव को समझते हुए समय निकालने की जरुरत है। अपनी कीमती जीवन-शैली में से कुछ समय निकालकर इस विद्या का ज्ञान प्राप्त करेंगे , तो इसके लिए भी एक घड़ी की आवश्यकता अनिवार्य होगी। आचार्य राजेश

गुरुवार, 8 जून 2017

क्या है ज्योतिष मित्रोंज्योतिष का अर्थ है.ज्योति यानी प्रकाश ,इस प्रकार ज्योतिषी का अर्थ हुआ जो प्रकाशमान हो .और दूसरों को भी अपने ज्ञान के प्रकाश से रास्ता दिखा सके.वर्तमान समय में ज्योतिषी वह व्यक्ति है जो ,धोती कुरता या कुरता पायजामा पहनता हो तिलक लगाता हो शिखा रखता हो और तमाम श्लोक, मंत्र गिना सकता हैउसका पहनावा और दिखावा निश्चित हो .चाहे उसके अन्दर मर्यादा ,आध्यात्म,आचरण और शुचिता हो, या न हो आचार्य वराहमिहिर ने ,जो की ज्योतिष के प्रणेता थे ,ने एक ज्योतिषी होने की तमाम शर्तें बताई है.जिनमे मूल रूप से आचरण और संस्कारों की बात ही कही गयी है वराहमिहिर ने कोई " ड्रेस कोड" नहीं बताया हैअहंकार तो सर्वथा त्याज्य है उनकी परिभाषा में जबकि वर्त्तमान समय के माननीय ज्योतिषी किसी व्यक्ति के भविष्य के बारे में ऐसे चुनौतियां देते हैं मानो उन्होंने ही उस व्यक्ति का जीवन नियत किया है और जनता यह समझती है ज्योतिषी तो स्वयं भगवान का सोलह कला युक्त अवतार है और वह उसके जीवन की तमाम समस्याओं को नष्ट कर देगा जनता और ज्योतिषी दोनों ही ज्योतिष जैसे महान पराविज्ञान के महत्व को समझे बिना इसका प्रयोग कर रहे हैं और असफलता की दशा में एक दूसरे पर दोषारोपण भी कर रहे हैं कहाँ हैं आध्यात्मिक और वैज्ञानिक ज्योतिषी और कहाँ है वह जनता जो इस बात को समझ सके ?हमें हमारी प्राचीन सभ्यता का गौरव है और इसी लिए हमें इसे सभ्यता की अर्वाचीन चुनौतियों से तराशना जरुरी हो जाता है| ज्योतिष शास्त्र भी हमारी वेदिक संस्कृति का एक अनमोल उपहार है| जब हम ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों का अवलोकन करते हैं तो हमें समयांतर पर शास्त्र में किये गए संशोधन नजर आते है| इससे यह प्रतिपादित होता है की संशोधित विचारों को शास्त्र में मान्यता देने में उस काल में कोई छोछ नहीं था| दुर्भाग्य वश जिस समयकाल में शास्त्रों की रचना हुई, हमारे महषींओं ने अपने शिष्यों की मेघा के अनुरूप अपने ज्ञान को सूत्रबद्ध किया| विचारों को मुद्रित करने के साधनों की मर्यादा, अपने ज्ञान को अनुचित हाथों में जाने से रोकने की चेष्ठा एवं कुछ हद तक वर्ण सम्बन्धी धारणाओं की वजह से सूत्रबध्ध ग्रंथों को जन-साधारण स्तर पर लोक-भोग्य स्वरूप में प्रकाशित नहीं किया जा सका| जब बाहरी जगत ने विज्ञान युग में प्रवेश किया, हमारी पुरातन ज्ञान की धरोहर को विदेशी शासन के दुर्व्यवहार से काफी क्षति हुई| इस संधिकाल में ज्योतिष शास्त्र भी अवरुद्ध हुआ| ज्योतिष भी मेघावी मनुष्यों के हाथों से निकल कर धीरे धीरे लालची, कूप-मुन्डको के हाथों का खिलौना बनाता जा रहा है| जो लोग अन्य व ऐसे लोग आज ज्योतिषी के मुखौटे पहन कर साधारण लोगों के ज्योतिष विषयक अज्ञान का भरपूर फायदा उठा रहें हैं| यह धन पीपसुओ ने ऐसे कई दुर्योगों को शास्त्रोमे घुसा दिया जिस का कोई शास्त्रोक्त प्रमाण न हो न ही कोई तार्किक समाधान|ऐसा इसलिए क्योंकि भारतवर्ष में ज्‍योतिष के क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कम लोग हैं, अधिकांश का आस्था‍वान चिंतन है , वे हमारे ऋषि महर्षियों को भगवान और ज्योतिष को धर्मशास्त्र समझते है, जबकि ऋषिमुनियों को वैज्ञानिक तथा ज्योतिष शास्त्र् को विज्ञान मानना चाहिएे हैं, जिसमे समयानुकूल बदलाव की आवश्यंकता है। इस प्रकार ज्योतिष विशेषज्ञों के साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोणवालों के लिए यह विज्ञान ही है ऐसी ही परिस्थितियों में हम यह मानने को मजबूर हो जाते हैं कि वास्तव में प्रकृति के नियम ही सर्वोपरि हैं। हमलोग पाषाण-युग, चक्र-युग, लौह-युग, कांस्य-युग ......... से बढ़ते हुए आज आई टी युग में प्रवेश कर चुकें हैं, पर अभी भी हम कई दृष्टि से लाचार हैं। नई-नई असाध्य बीमारियॉ ,जनसंख्या-वृद्धि का संकट, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा ,कहीं भूकम्प तो कहीं ज्वालामुखी-विस्फोट--प्रकृति की कई गंभीर चुनौतियों से जूझ पाने में विश्व के अव्वल दर्जे के वैज्ञानिक भी असमर्थ होकर हार मान बैठे हैं। यह सच है कि प्रकृति के इन रहस्यों को खुलासा कर हमारे सम्मुख लाने में इन वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिससे हमें अपना बचाव कर पाने में सुविधा होती है। प्रकृति के ही नियमो का सहारा लेकर कई उपयोगी औजारों को बनाकर भी हमने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों का झंडा गाडा है , किन्तु वैज्ञानिकों ने किसी भी प्रकार प्रकृति के नियमों को बदलने में सफलता नहीं पायी है। इसलिए मेरा मानना है ज्योतिष भी एक विज्ञान है पर अभी बहुत शोध बाकी है आचार्य राजेश

रविवार, 4 जून 2017

आओ ज्योतिष सीखे ग्रुप से वैदिक ज्योतिष वैदिक ज्योतिष भारतीय ज्योतिष ग्रहों के प्रभाव पर, प्राचीन भारतीय ऋषियों और संतों द्वारा प्राप्त ज्ञान पर आधारित एक प्राचीन विज्ञान है | यह विज्ञान पश्चिमी खगोलविदों और ज्योतिषो के पैदा होने के भी काफी लम्बे समय से पहले भारत में विकसित कर लिया गया था | १५०० ई.पू. ही इसकी जड़ों ने वेदों में कदम रख लिया था | .ज्योतिष की कार्यप्रणली हम सभी जानते है की वैदिक ज्योतिष का सम्बन्ध १२ घर १२ राशियाँ और नौ ग्रहों से है, लेकिन में यहाँ पर ज्योतिष की कार्यप्रणली के बारे में चर्चा करना चाहता हूँ ! चलो जानने की कोशिश करते है की ज्योतिष किन सिद्धांतो पर कार्य करता है और इसके पीछे छिपे क्या तथ्य है तथा लाखों लोग इस विज्ञानं से किस प्रकार जुड़े हुए है ! जहाँ तक में समझता हूँ ज्योतिष एक ऐसी कार्य प्रणली है जिसके द्वारा मनुष्यों को अपने पिछले जन्मो के कर्मो का फल प्राप्त होता है ! अच्छे कर्मो का अच्छा फल तथा बुरे कर्मो का बुरा फल ! मान लो यदि आपने अपने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये है तो इस जन्म में आप एक सुखी जीवन व्यतीत करेंगे ! कम परिश्रम से भी अधिक फल की प्राप्ति करेंगे, परन्तु यदि आपने यदि अपने पिछले जन्म में सिर्फ बुरे ही बुरे कर्म किये है तो अगला जन्म आपके बुरे कर्मो का फल देगा ! पूरा जीवन दुःख और परेशानियों से भरा और अधिक से अधिक महनत करने पर भी फल की प्रति नहीं होगी ! और यही कारण है की लाखों लोग जीवन भर संघर्ष करने पर भी कुछ प्राप्त नहीं कर पाते और दूसरी तरफ कम परिश्रमी लोग अपने जीवन में बैठे बीठाय बहुत कुछ हांसिल कर लेते है!

गर्भाधान कब और कैसे चार पुरुषार्थ सामने आते है,पहले धर्म उसके बाद अर्थ फ़िर काम और अन्त में मोक्ष, धर्म का मतलब पूजा पाठ और अन्य धार्मिक क्रियाओं से पूरी तरह से नही पोतना चाहिये,धर्म का मतलब मर्यादा में चलने से होता है,माता को माता समझना पिता को पिता का आदर देना अन्य परिवार और समाज को यथा स्थिति आदर सत्कार और सबके प्रति आस्था रखना ही धर्म कहा गया है,अर्थ से अपने और परिवार के जीवन यापन और समाज में अपनी प्रतिष्ठा को कायम रखने का कारण माना जाता है,काम का मतलब अपने द्वारा आगे की संतति को पैदा करने के लिये स्त्री को पति और पुरुष को पत्नी की कामना करनी पडती है,पत्नी का कार्य धरती की तरह से है और पुरुष का कार्य हवा की तरह या आसमान की तरह से है,गर्भाधान भी स्त्री को ही करना पडता है,वह बात अलग है कि पादपों में अमर बेल या दूसरे हवा में पलने वाले पादपों की तरह से कोई पुरुष भी गर्भाधान करले। धरती पर समय पर बीज का रोपड किया जाता है,तो बीज की उत्पत्ति और उगने वाले पेड का विकास सुचारु रूप से होता रहता है,और समय आने पर उच्चतम फ़लों की प्राप्ति होती है,अगर वर्षा ऋतु वाले बीज को ग्रीष्म ऋतु में रोपड कर दिया जावे तो वह अपनी प्रकृति के अनुसार उसी प्रकार के मौसम और रख रखाव की आवश्यकता को चाहेगा,और नही मिल पाया तो वह सूख कर खत्म हो जायेगा,इसी प्रकार से प्रकृति के अनुसार पुरुष और स्त्री को गर्भाधान का कारण समझ लेना चाहिये।गर्भाधान का समय शोध से पता चला है कि ज्योतिष से गर्भाधान के लिये एक निश्चित समय होता है। इस समय में स्त्री पुरुष के सहसवास से गर्भाधान होने के अस्सी प्रतिशत मौके होते है। इन समयों में एक बात और भी महत्वपूर्ण है कि स्त्री को रजस्वला होने के चौदह दिन तक ही यह समय प्रभावी होता है,उसके बाद का समय संज्ञा हीन हो जाता है,जो व्यक्ति अलावा संतान नही चाहते हों,उनके लिये भी यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण इसलिये होता है क्योंकि अगर इस समय को छोड दिया जाये तो गर्भाधान होने की कोई गुंजायश नही रहती है। लेकिन अपनी जन्म तिथि के अनुसार बिलकुल सही समय को जानने के लिये आप हम से सम्पर्क कर सकते है।समयानुसार प्रत्येक जन्म पत्री के द्वारा जिसके अन्दर सही समय और स्थान का नाम होना जरूरी है,से जन्म समय को निकालने के लिये आप सम्पर्क कर सकते है।समय निकालने की फ़ीस मात्र Rs.1100/- है.सम्पर्क करने के लिये maakaali46 jyotish Hanumagarh town 07597718725 09414481324पर सम्पर्क करें. गर्भाधान के समय ध्यान में सावधानियां ईश्वर ने जन्म चार पुरुषार्थों को पूरा करने के लिये दिया है। पहला पुरुषार्थ धर्म नामका पुरुषार्थ है,इस पुरुषार्थ का मतलब पूजा पाठ और ध्यान समाधि से कदापि नही मानना चाहिये। शरीर से सम्बन्धित जितने भी कार्य है वे सभी इस पुरुषार्थ में शामिल है। शरीर को बनाना ताकत देना रोग आदि से दूर रहना अपने नाम को दूर दूर तक प्रसिद्ध करना,अपने कुल समाज की मर्यादा के लिये प्रयत्न करना,अपने से बडे लोगों का मान सम्मान और व्यवहार सही रखना आदि बातें मानी जाती है। इसके बाद माता पिता का सम्मान उनके द्वारा दिये गये जन्म का सही रूप समझना अपने को स्वतंत्र रखकर किसी अनैतिक काम को नही करना जिससे कि उनकी मर्यादा को दाग लगे आदि बातें इस धर्म नाम के पुरुषार्थ में आती है शरीर के बाद बुद्धि को विकसित करने के लिये शिक्षा को प्राप्त करना,धन कमाने के साधनों को तैयार करना और धन कमाकर जीवन को सही गति से चलाना,उसके बाद जो भी भाग्य बढाने वाली पूजा पाठ रत्न आदि धारण करना आदि माना जाता है। इस पुरुषार्थ के बाद अर्थ नामका पुरुषार्थ आता है इसके अन्दर अपने पिता और परिवार से मिली जायदाद को बढाना उसमे नये नये तरीकों से विकसित करना,उस जायदाद को संभालना किसी प्रकार से उस जायदाद को घटने नही देना,जायदाद अगर चल है तो उसे बढाने के प्रयत्न करना,रोजाना के कार्यों को करने के बाद अर्थ को सम्भालना अगर कोई कार्य पीछे से नही मिला है तो अपने बाहुबल से कार्यों को करना नौकरी पेशा और साधनो को खोजना जमा पूंजी का सही निस्तारण करना जो खर्च किया गया है उसे दुबारा से प्राप्त करने के लिये प्रयोग करना,खर्च करने से पहले सोचना कि जो खर्च किया जा रहा है उसकी एवज में कुछ वापस भी आयेगा या जो खर्च किया है वह मिट्टी हो जायेगा,फ़िर रोजाना के कामों के अन्दर लगातार इनकम आने के साधनो को बनाना और उन साधनों के अन्दर विद्या और धन के साथ अपनी बुद्धि का प्रयोग करना और लगातार इनकम को लेकर अपने परिवार की उन जरूरतों को पूरा करना जो हमेशा के लिये भलाई दें,अर्थ नामके पुरुषार्थ के बाद काम नामका पुरुषार्थ आता है,पुरुष के लिये स्त्री और स्त्री के लिये पुरुष का होना एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करने के लिये माना जाता है,जिस प्रकार से आपके माता पिता ने संतान की इच्छा करने के बाद आपके शरीर को उत्पन किया है उसी प्रकार से अपनी इच्छा करने के बाद नये शरीरों को उत्पन्न करना पितृ ऋण को उतारना भी कहा जाता है। संतान की इच्छा करने के बाद ही सहसवास करना,कारण जो अन्न या भोजन किया जाता है वह चालीस दिन की खुराक सही रूप से खाने के बाद एक बूंद वीर्य या रज का निर्माण करता है,अगर व्यक्ति अपनी कामेच्छा से या किसी आलतू फ़ालतू कारणों में जाकर प्यार मोहब्बत के नाम पर या स्त्री भोग या पुरुष भोग की इच्छा से अपने वीर्य या रज को समाप्त कर लेता है तो शरीर में कोई नया कारण वीर्य और रज जो उत्पन्न करने के लिये नही बनता है.शरीर के सूर्य को समाप्त कर लेने के बाद शरीर चेतना शून्य हो जाता है,शराब कबाब आदिके प्रयोग के बाद जो उत्तेजना आती है और उस उत्तेजना के बाद संभोग में रुचि ली जाती है वह शरीर में विभिन्न बीमारियों को पैदा करने के लिये काफ़ी माना जाता है।भारतीय पद्धति में शरीर में वीर्य और रज को पैदा करने वाले कारक भारत में भोजन के रूप में चावल और गेंहूं को अधिक मात्रा में खाया जाता है,चावल को खाने के बाद शरीर में कामोत्तेजना पुरुषों के अन्दर अधिक बढती है और गेंहूं को खाने के बाद स्त्रियों में कामोत्तेजना अधिक बढती है,लेकिन वीर्य को बधाने के लिये ज्वार पुरुषों के लिये और मैथी रज बढाने के लिये स्त्रियों में अधिक प्रभाव युक्त होती है.प्रकृति ने जो अनाजों का निर्माण किया है उनके अन्दर जो तस्वीर बनाई है वह भी समझने के लिये काफ़ी है,जैसे चने के अन्दर पुरुष जननेन्द्रिय का रूप स्पष्ट दिखाई देता है,इसे खाने से पुरुष की जननेन्द्रिय की वृद्धि और नितम्बों का विकास स्त्री जातकों में होता है। गेंहूं को अगर देखा जाये तो स्त्री जननेन्द्रिय का निशान प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है,सरसों के अन्दर खून के रवों का निशान पाया जाता है,मूंग के अन्दर खून की चलित कणिकाओं का रूप देखने को मिलता है आदि विचार सोच कर भोजन को करना चाहिये. सन्तान की इच्छा के समय चिन्ता मुक्त रहना भी जरूरी है मानसिक चिन्ता से शरीर की गति बेकार हो जाती है,नींद और भोजन का कोई समय नही रह पाता है,नींद नही आने से और भोजन को सही समय पर नही लेने से शरीर की रक्त वाहिनी शिरायें अपना कार्य सुचारु रूप से नही कर पाती है,दिमागी प्रेसर अधिक होने से मानसिक भावना सेक्स की तरफ़ नही जा पाती है,स्त्री और पुरुष दोनो के मामले में यह बात समान रूप से लागू होती है। खुशी का वारावरण भी सन्तान की प्राप्ति के लिये जरूरी है,माहौल के अनुसार ही संभोग करने के बाद जो संतान पैदा होता है,वह उसी प्रकार की संतान के लिये मानी जाती है,जैसा माहौल संभोग के समय में था। मित्रों अगर आप मुझसे ज्योतिष सीखना चाहते हैं या अपनी कुंडली दिखाना जब बनवाना चाहते हैं या अच्छी क्वालिटी के रतन लेना चाहते हैं तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं07597718725 09414481324 आचार्य राजेश

शनिवार, 3 जून 2017

आओ ज्योतिष सीखे ग्रुप से अध्याय 1 आज से शुरू करते हैं ज्योतिष सीखने की इच्छा अधिकतर लोगों में होती है। लेकिन उनके सामने समस्या यह होती है कि ज्योतिष की शुरूआत कहाँ से की जाये? कुछ जिज्ञासु मेहनत करके किसी ज्यातिषी को पढ़ाने के लिये राज़ी तो कर लेते हैं, लेकिन गुरूजी कुछ इस तरह ज्योतिष पढ़ाते हैं कि जिज्ञासु ज्योतिष सीखने की बजाय भाग खड़े होते हैं। बहुत से पढ़ाने वाले ज्योतिष की शुरुआत कुण्डली-निर्माण से करते हैं। ज़्यादातर जिज्ञासु कुण्डली-निर्माण की गणित से ही घबरा जाते हैं। वहीं बचे-खुचे “भयात/भभोत” जैसे मुश्किल शब्द सुनकर भाग खड़े होते हैं। अगर कुछ छोटी-छोटी बातों पर ग़ौर किया जाए, तो आसानी से ज्योतिष की गहराइयों में उतरा जा सकता है। ज्योतिष सीखने के इच्छुक नये विद्यार्थियों को कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए- शुरूआत में थोड़ा-थोड़ा पढ़ें। जब तक पहला पाठ समझ में न आये, दूसरे पाठ या पर न जायें। जो कुछ भी पढ़ें, उसे आत्मसात कर लें। बिना गुरू-आज्ञा या मार्गदर्शक की सलाह के अन्य ज्योतिष पुस्तकें न पढ़ें। शुरूआती दौर में कुण्डली-निर्माण की ओर ध्यान न लगायें, बल्कि कुण्डली के विश्लेषण पर ध्यान दें। शुरूआती दौर में अपने मित्रों और रिश्तेदारों से कुण्डलियाँ मांगे, उनका विश्लेषण करें। जहाँ तक हो सके हिन्दी के साथ-साथ ज्योतिष की अंग्रेज़ी की शब्दावली को भी समझें। अगर ज्योतिष सीखने के इच्छुक लोग उपर्युक्त बिन्दुओं को ध्यान में रखेंगे, तो वे जल्दी ही इस विषय पर अच्छी पकड़ बना सकते हैं। ज्‍योतिष के मुख्‍य दो विभाग हैं - गणित और फलित। गणित के अन्दर मुख्‍य रूप से जन्‍म कुण्‍डली बनाना आता है। इसमें समय और स्‍थान के हिसाब से ग्रहों की स्थिति की गणना की जाती है। दूसरी ओर, फलित विभाग में उन गणनाओं के आधार पर भविष्‍यफल बताया जाता है। इस शृंखला में हम ज्‍यो‍तिष के गणित वाले हिस्से की चर्चा बाद में करेंगे और पहले फलित ज्‍योतिष पर ध्यान लगाएंगे। किसी बच्चे के जन्म के समय अन्तरिक्ष में ग्रहों की स्थिति का एक नक्शा बनाकर रख लिया जाता है इस नक्शे केा जन्म कुण्डली कहते हैं। आजकल बाज़ार में बहुत-से कम्‍प्‍यूटर सॉफ़्टवेयर उपलब्‍ध हैं और उन्‍हे जन्‍म कुण्‍डली निर्माण और अन्‍य गणनाओं के लिए प्रयोग किया जा सकता है। पूरी ज्‍योतिष नौ ग्रहों, बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों और बारह भावों पर टिकी हुई है। सारे भविष्‍यफल का मूल आधार इनका आपस में संयोग है।अगर आप भ।मैं से कोई भी ज्योतिष सीखना चाहता है तो वह मुझसे संपर्क कर सकता हैफीस पुरे कोर्स की 2100है WhatsApp पर यह गरूप है 075977187250 9414481324

शुक्रवार, 2 जून 2017

राशिफल की वास्‍तविकता क्‍या है ?? जहां एक ओर ज्‍योतिष को बहुत ही सूक्ष्‍म तौर पर गणना करने वाला शास्‍त्र माना जाता है , वहीं दूसरी ओर पूरी जनसंख्‍या को 12 भागों में बांटकर उनकी राशि के आधार पर राशिफल के रूप में भविष्‍यवाणी करने का प्रचलन भी है। राशिफल के द्वारा दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटकर उनके बारे में भविष्‍यवाणी करने का प्रयास आमजनों को गुमराह करने के इलावा कुछ नहीं मेरे ख्याल सेराशिफल की शुरूआत उस वक्‍त की मानी जा सकती है , जब आम लोगों के पास उनके जन्‍म विवरण न हुआ करते हों पर अपने भविष्‍य के बारे में जानने की कुछ इच्‍छा रहती हो। पंडितो द्वारा रखे गए नाम में से उनकी राशि को समझ पाना आसान था, इसलिए ज्‍योतिषियों ने उनकी राशि के आधार पर गोचर के ग्रहों को देखते हुए भविष्‍यवाणी करने की परंपरा शुरू की हो। चूकि प्राचीन काल में अधिकांश लोगों की जन्‍मकुंडलियां नहीं हुआ करती थी , इसलिए राशिफल की लोकप्रियता निरंतर बढती गयी। गोचर तभी प्रभावशाली​ होगा जव आप अपनी जन्मतिथि के हिसाब से अपनी कुंडली वनाकरओर कुंडली के साथ गोचर को मिला कर भविष्य देखे ज्‍योतिष' मानता है कि भले ही किसी व्‍यक्ति के जन्‍मकालीन ग्रह उसके जीवन की एक रूप रेखा निश्चित कर देते हें , पर समय समय पर आनेवाले गोचर के ग्रह भी उसके दिलोदिमाग पर कम प्रभाव नहीं डालते - संभवतः परम्परागत ज्योतिष भी यही मानता है जन्‍मकुंडली को देखने से यह सटीक ढंग से कहा जा सकता है कि जातक के लिए कौन सी पंक्ति अधिक या कम प्रभावी होगी। इसके लिए इस बात को ध्‍यान में रखा जाता है कि गोचर के ग्रहों की खास स्थिति जातक की जन्‍मकुंडली के अनुकूल है या प्रतिकूल ?? - अर्थात केवल सूर्य राशि, चन्द्र राशि या लग्न राशि के आधार पर की गयी भविष्यवाणियों (जो पत्र पत्रिकाओं में छपती रहती हैं या टीवी पर वोली जाती है ) का बहुत अधिक महत्त्व नहीं है |आचार्य राजेश

गुरुवार, 1 जून 2017

आओ ज्योतिष सीखें ग्रुप से कुंडली में फ़लादेश करने के तरीके भारतीय ज्योतिष में जो फ़लादेश किया जाता है उसके लिये कई तरह के तरीके अपने अपने अनुसार अपनाये जाते है,लेकिन मै जो तरीका प्रयोग में लाता हूँ वह अपने प्रकार का है. राशि चक्र में गुरु जहाँ हो उसे लगन मानना जरूरी है कुंडली का विश्लेषण करते वक्त गुरु जहाँ भी विराजमान हो उसे लगन मानना ठीक रहता है,कारण गुरु ही जीव का कारक है और गुरु का स्थान ही बता देता है कि व्यक्ति की औकात क्या है,इसके साथ ही गुरु की डिग्री भी देखनी जरूरी है,गुरु अगर कम या बहुत ही अधिक डिग्री का है तो उसका फ़ल अलग अलग प्रकार से होगा,उदाहरण के लिये कन्या लगन की कुण्डली है और गुर मीन राशि में सप्तम में विराजमान है तो फ़लादेश करते वक्त गुरु की मीन राशि को लगन मानकर गुरु को लगन में स्थापित कर लेंगे,और फ़लादेश गुरु की चाल के अनुसार करने लगेंगे। ग्रहों की दिशाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है कालचक्र के अनुसार राशियों के अनुसार दिशायें भी बताई जाती है,जैसे मेष सिंह और धनु को पूर्व दिशा की कारक और मिथुन तुला तथा कुम्भ को पश्चिम दिशा की कारक वृष कन्या और मकर को दक्षिण दिशा की कारक तथा कर्क वृश्चिक और मीन को उत्तर दिशा की कारक राशियों में माना जाता है। इन राशियों में स्थापित ग्रहों के बल और उनके द्वारा दिये गये प्रभाव को अधिक ध्यान में रखना पडेगा। ग्रहों की द्रिष्टि का ध्यान रखना जरूरी है ग्रह अपने से सप्तम स्थान को देखता है,यह सभी शास्त्रों में प्रचिलित है,साथ ग्रह अपने से चौथे भाव को अपनी द्रिष्टि से शासित रखता है और ग्रह अपने से दसवें भाव के लिये कार्य करता है,लेकिन सप्तम के भाव और ग्रह से ग्रह का जूझना जीवन भर होता है,इसके साथ ही शनि और राहु केतु के लिये बहुत जरूरी है कि वह अपने अनुसार वक्री में दिमागी बल और मार्गी में शरीर बल का प्रयोग जरूर करवायेंगे,लेकिन जन्म का वक्री गोचर में वक्री होने पर तकलीफ़ देने वाला ग्रह माना जायेगा. ग्रहों का कारकत्व भी समझना जरूरी है ग्रह की परिभाषा के अनुसार तथा उसके भाव के अनुसार उसका रूप समझना बहुत जरूरी होता है,जैसे शनि वक्री होकर अगर अष्टम में अपना स्थान लेगा तो वह बजाय बुद्धू के बहुत ही चालाक हो जायेगा,और गुरु जो भाग्य का कारक है वह अगर भाग्य भाव में जाकर बक्री हो जायेगा तो वह जल्दबाजी के कारण सभी तरह के भाग्य को समाप्त कर देगा और आगे की पुत्र संतान को भी नही देगा जिससे आने वाले वंश की क्षति का कारक भी माना जायेगा. जन्म के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनायें होती है जन्म के समय के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनाओं को बताने के लिये माना जाता है,अगर शनि जन्म से लगन में है और गोचर से शनि कर्म भाव में आता है तो खुद के कर्मों से ही कार्यों को अन्धेरे में और ठंडे बस्ते मे लेकर चला जायेगा। इसके बाद लगन का राहु गोचर से गुरु को अष्टम में देखता है तो जीवन को बर्फ़ में लगाने के लिये मुख्य माना जायेगा,जीव का किसी न किसी प्रकार की धुंआ तो निकलना ही है। गुरु के आगे और पीछे के ग्रह भी अपना अपना असर देते है गुरु के पीछे के ग्रह गुरु को बल देते है और आगे के ग्रहों को गुरु बल देता है,जैसी सहायता गुरु को पीछे से मिलती है वैसी ही सहायता गुरु आगे के ग्रहो को देना शुरु कर देता है,यही हाल गोचर से भी देखा जाता है,गुरु के पीछे अगर मंगल और गुरु के आगे बुध है तो गुरु मंगल से पराक्रम लेकर बुध को देना शुरु कर देगा,अगर मंगल धर्म मय है तो बुध को धर्म की परिभाषा देना शुरु कर देगा और और अगर मंगल बद है तो गाली की भाषा देना शुरु कर देगा,गुरु के पीछे शनि है तो जातक को घर में नही रहने देगा और गुरु के आगे शनि है तो गुरु घर बाहर निकलने में ही डरेगा। शनि चन्द्रमा की युति जन्म की साढेशाती शनि और चन्द्रमा का कुंडली में कही भी योगात्मक प्रभाव है तो जन्म से ही साढेशाती का समय माना जाता है,इस युति का सीधा सा प्रभाव है कि जातक अपने अनुसार काम कभी नही कर पायेगा,उसे स्वतत्र काम करने में दिक्कत होगी उसे खूब बता दिया जाये कि वह इस प्रकार से रास्ता पकड कर चले जाना लेकिन वह कहीं पर अपने रास्ते को जरूर भूल जायेगा,इसलिये कुंडली में गुरु के साथ चन्द्रमा की स्थिति भी देखनी जरूरी होती है,वैसे चन्द्रमा को माता का कारक भी मानते है,लेकिन अलग अलग भावों में चन्द्रमा का अलग अलग रूप बन जाता है,जैसे धन भाव में चन्द्रमा कुटुम्ब की माता,तीसरे भाव में चन्द्रमा पिता के बिना नही रहने वाली माता चौथे भाव में चन्द्रमा से बचपन के सभी कष्टों को दूर करने वाली माता,पंचम स्थान से स्कूल की अध्यापिका माता,छठे भाव में मौसी भी मानी जाती है और चाची भी मानी जाती है,सप्तम में माता के रहते पत्नी या पति के लिये विनासकारी माता,अष्टम में माता का स्थान ताई की नही बनेगी,नवे भाव में दादी का रूप यह चन्द्रमा ले लेता है,दसवें भाव में पिता से परित्याग की गयी माता,और ग्यारहवे भाव में जब तक स्वार्थ पूरा नही होता है तब तक की माता और बारहवें भाव में जन्म के बाद भूल जाने वाली माता के रूप में माना जाता है,इस चन्द्रमा के साथ जहां भी शनि होगा जातक के लिये वही स्थान फ़्रीज करने के लिये काफ़ी माना जायेगा। कुंडली का सूर्य पिता की स्थिति को बयान करता है गुरु को जीव की उपाधि दी गयी है तो सूर्य को पिता की उपाधि दी गयी है,उसी सूर्य को बाद में पुत्र की उपाधि से विभूषित किया गया है,लेकिन पिता के लिये नवा भाव ही देखना बेहतर तरीका होता है और पिता के ऊपर आने वाले कष्टों के लिये कुंडली के चौथे भाव में जब भी कोई क्रूर ग्रह गोचर करेगा या शनिका गोचर होगा पिता के लिये कष्ट का समय माना जायेगा। इसके अलावा राहु का गोचर पिता के लिये असावधानी से कोई दुर्घटना और केतु के गोचर से अचानक सांस वाली बीमारी या सांस की रुकावट वाली बीमारी को माना जायेगा,चन्द्रमा से जल से भय और मंगल से वाहन या अस्पताल या पुलिस से भय माना जायेगा। सूर्य और गुरु की युति से पिता पुत्र का एक जैसा हाल होगा,और जातक को जीवात्मा की उपाधि दी जायेगी,साथ ही अगर धर्म के भाव में स्थापित है तो ईश्वर अंश से अवतार माना जायेगा। राहु सूर्य और गुरु का साथ पुराने पूर्वज के रूप में जातक का जन्म माना जायेगा,और गुरु से तीन भाव पहले की राशि के काम करने के लिये जातक को वापस अपने परिवार में आने को माना जायेगा। सूर्य शुक्र का साथ बलकारी पिता और जातक के लिये भी बलकारी योग का रूप देगा,इसके अन्दर कितनी ही बलवान स्त्री क्यों न हो लेकिन जातक के वीर्य को अपनी कोख बडी मुश्किल से धारण कर पायेगी,जैसे ही पुत्र संतान का योग आयेगा,जातक की पत्नी किसी न किसी कारण से मिस कैरिज जैसे कारण पैदा कर देगी,लेकिन जैसे ही सूर्य का समय समाप्त होगा जातक के एक पुत्र की उत्पत्ति होगी। इसी प्रकार से सूर्य और चन्द्र का साथ जातक के जीवन में अमावस्या का योग पैदा करता है। जातक के बचपन में माता को पिता के कारणों से फ़ुर्सत ही नही मिल पायेगी,जो वह जातक का ध्यान रख सके। इसी तरह से चन्द्रमा और सूर्य का आमना सामना जातक के जीवन में पूर्णिमा का योग पैदा करेगा,जातक को छोड कर माता का दूर जाना कैसे भी सम्भव नही है और माता के लगातार साथ रहने के कारण जातक को किसी भी कष्ट का अनुभव नही होगा लेकिन वह अपने जीवन में माता जैसा सभी को समझने पर छला जरूर जायेगा,यहां तक कि उसकी शादी के बाद भी लोग उसे छलना नही छोडेंगे,उसकी पत्नी भी उसके साथ भावनाओं में छल करके उससे लाभ लेकर अपने मित्रों को देती रहेगी या अपने परिवार की भलाई का काम सोचती रहेगी अगर आप को नहीं दिखाना चाहते हैं या बनवाना चाहते हैं यहां ज्योति सीखना चाहते हैं तो हमारे नंबरों पर संपर्क करें 0759771872509414481324 आचार्य राजेश

बुधवार, 31 मई 2017

आओ ज्योतिष सीखे ग्रुप से ज्योतिष शास्त्र एक बहुत ही वृहद ज्ञान है। इसे सीखना आसान नहीं है। ज्योतिष शास्त्र को सीखने से पहले इस शास्त्र को समझना आवश्यक है। सामान्य भाषा में कहें तो ज्योतिष माने वह विद्या या शास्त्र जिसके द्वारा आकाश स्थित ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति, परिमाप, दूरी इत्या‍दि का निश्चय किया जाता है। हमें यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ज्योतिष भाग्य या किस्मत बताने का कोई खेल-तमाशा नहीं है। यह विशुद्ध रूप से एक विज्ञान है। ज्योतिष शास्त्र वेद का अंग है। ज्योतिष शब्द की उत्पत्ति 'द्युत दीप्तों' धातु से हुई है। इसका अर्थ, अग्नि, प्रकाश व नक्षत्र होता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ज्योतिर्मय सूर्यादि ग्रहों की गति, ग्रहण इत्यादि को लेकर लिखे गए वेदांग शास्त्र का नाम ही ज्योतिष है। छः प्रकार के वेदांगों में ज्योतिष मयूर की शिखा व नाग की मणि के समान सर्वोपरी महत्व को धारण करते हुए मूर्धन्य स्थान को प्राप्त होता है। सायणाचार्य ने ऋग्वेद भाष्य भूमिका में लिखा है कि ज्योतिष का मुख्य प्रयोजन अनुष्ठेय यज्ञ के उचित काल का संशोधन करना है। यदि ज्योतिष न हो तो मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, ऋतु, अयन आदि सब विषय उलट-पुलट हो जाएँ। ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य आकाशीय-चमत्कारों से परिचित होता है। फलतः वह जनसाधारण को सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, ग्रहों की स्थिति, ग्रहों की युति, ग्रह युद्ध, चन्द्र श्रृगान्नति, ऋतु परिवर्तन, अयन एवं मौसम के बारे में सही-सही व महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है। इसलिए ज्योतिष विद्या का बड़ा महत्व है् : अगर आप भी मुझसे वैदिक ज्योतिष सीखना चाहते हैं वह WhatsApp पर मैंने ग्रुप बनाए हैं जिसमें ज्योतिष ज्योतिष की पूरी जानकारी और अच्छी तरह से आपको फ़लादेश करना सिखाया जाएगा अगर आप ज्योतिष सीखना चाहते हैं मुझे ग्रुप ज्वाइन कर सकते हैं और इसमें आपको फीस2100 देकर रजिस्ट्रेशन करवाना होगा यह हमारे बैंक अकाउंट में जमा होगी Rajeshkumar pnb bank ac no 0684000100192346 ifc punb 0068400 hanumangarh townbranch 07597718725 [29/05 7:55 am] Acharya Rajesh kumar: किसी के जन्‍मांग चक्र या जन्‍मकुंडली को देखने से हमें जातक के बारे में बहुत जानकारियां मिल जाती है , ये रही एक व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली ... जन्‍मुकंडली में सबसे ऊपर मौजूद अंक हमें जातक के लग्‍न की जानकारी देता है , इस कुंडली में 5 अंक सिंह राशि का सूचक है , इसलिए जन्‍म लग्‍न सिंह हुआ , इसका अर्थ यह है कि जातक का जन्‍म उस वक्‍त हुआ , जब आसमान में 120 डिग्री से 150 डिग्री का उदय हो रहा था , जो भचक्र की पांचवी राशि है। चंद्रमा 9 अंक में मौजूद है , इसलिए चंद्रराशि धनु हुई। सूर्य 1 अंक में मौजूद है , इसलिए सूर्य राशि मेष हुई। सूर्य 1 अंक में है , इसका अर्थ यह भी है कि जातक का जन्‍म 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य हुआ है। लग्‍न से चौथे खाने में मौजूद सूर्य से हमें यह जानकारी मिल रही है कि जातक का जन्‍म रात 10 के वाद हुआे हुआ होगा। सूर्य से पहले चंद्र की स्थिति होने से हमें जानकारी मिल रही है कि जातक का जन्‍म कृष्‍ण पक्ष में हुआ है। सूर्य से चार खाने चंद्रमा की स्थिति से मालूम हो रहा है कि जातक का जनम षष्‍ठी के आसपास का है। मान लो अभी शनि कन्‍या राशि में यानि 6 अंक में चल रहा है , जबकि जन्‍मकुंडली में 12 अंक में शनि है। इसका अर्थ यह है कि शनि ने अपना आधा या डेढ या ढाई या साढे तीन चक्र पूरा किया है। इस हिसाब से जातक का जन्‍म लगभग 15 वर्ष या 45 वर्ष या 75 वर्ष पहले हुआ होगा। मान लो अभी बृहस्‍पति मीन राशि में यानि 12 अंक में चल रहा है , जबकि जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति 4 अंक में है। इसका अर्थ यह है कि जातक का जन्‍म लगभग 8 या 20 या 32 या 44 या 56 या 68 या 80 वर्ष पहले हुआ है। शनि और बृहस्‍पति दोनो की संभावना 44 के आसपास बनती है , इस हिसाब से जातक की उम्र 44 के आसपास होने का पता चल जाता है। इसी प्रकार बिना पंचांग के ही अन्‍य जन्‍मकुंडली से भी जातक के बारे में ये दसों जानकारियां प्राप्‍त की जा् सकती है

रविवार, 28 मई 2017

आओ ज्योतिष सीखे ग्रुपसे ज्‍योतिष' को अच्‍छी तरह समझने के लिए जन्‍मकुंडली में एक ग्रह की दूसरे से कोणिक दूरी और उनकी अपनी गति के साथ साथ राशिश की सापेक्षिक गति को भी जानना आवश्‍यक होता है , इसलिए सबसे पहले जन्‍मकुंडली में एक ग्रह से दूसरे की कोणिक दूरी के बारे में जानना आवश्‍यक है। वैसे तो इसकी जानकारी के लिए जातक के जन्‍म के समय के पंचांग की आवश्‍यकता पडती है, चूंकि आसमान का फैलाव 360 डिग्री तक का है , इसलिए किसी भी ग्रह की स्थिति 360 डिग्री तक ही होती है। पंचांग से किन्‍हीं भी दो ग्रहों के मध्‍य की डिग्री के अंतर को देखना आसान होता है। चूंकि सूर्य पूरे सौरमंडल की उर्जा का स्रोत है , ज्‍योतिष' ग्रहों की शक्ति को निकालने के लिए सभी ग्रहों की सूर्य से कोणिक दूरी पर ही धन देता है। पिछले पाठ में बताया गया था कि चंद्रमा की शक्ति का निर्धारण करने के लिए उसके आकार का ध्‍यान रखा जाता है , वह भी इसलिए कि सूर्य से दूरी के घटने बढने से उसके आकार में घटत बढत होती रहती है , इसी आधार पर चंद्रमा की शक्ति भी घटती बढती है। चंद्र की तरह ही सभी ग्रह सूर्य से ही ऊर्जा लेते हैं , इसलिए उनकी शक्ति का निर्धारण भी हम सूर्य से दूरी के आधार पर ही करते हैं। वैसे तो पंचांग को देखकर सूर्य से सभी ग्रहों की दूरी निकाली जा सकती है , पर यदि पंचांग न हो तो , जन्‍मकुंडली को देखकर भी हम बुध और शुक्र के अलावे अन्‍य ग्रहों जैसे मंगल , बृहस्‍पति और शनि की सूर्य से दूरी और उसकी गत्‍यात्‍मक शक्ति का आकलन कर सकते हैं। पिछले पाठ में बताया गया है और हम भी आसमान में देखा करते हैं कि चंद्रमा की कोणिक दूरी ज्‍यों ज्‍यों सूर्य से बढती जाती है , त्‍यों त्‍यों उसका आकार बढता है और वह मजबूत होता जाता है। जन्‍मकुंडली में भी सूर्य के सामने होने पर चंद्रमा पूर्णिमा का होता है , जबकि सूर्य के साथ होने पर अमावस्‍या का होता है। पर मंगल , बृहस्‍पति और शनि के साथ विपरीत स्थिति होती है। जन्‍मकुंडली में ये तीनों ग्रह सूर्य के साथ हो तो अधिक शक्ति संपन्‍न होते हैं और जैसे जैसे सूर्य से इनकी दूरी बढती जाती है , अपेक्षाकृत शक्ति‍ में कमी आती है। सूर्य के सामने वाले जगहों पर तो ये शक्तिहीन हो जाते हैं और इनकी गति तक वक्री हो जाती है। पुन: आगे बने पर जैसे जैसे वे सूर्य की दिशा में प्रवृत्‍त होते उनकी शक्ति बढने लगती है , क्रमश: मार्गी होने लगते हैं और सूर्य के समीप आते आते पुन: उसकी शक्ति बढ जाती है।मंगल , बृहस्‍पति या शनि जिस जिस भाव के स्‍वामी होते हैं , उससे संबंधित सुख या दुख उनकी शक्ति‍ के अनुरूप ही जातक को मिल पाता है। यदि मंगल मजबूत हो , तो मेष और वृश्चिक राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि मंगल के कमजोर होने पर मेंष और वृश्चिक राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। मंगल सामान्‍य हो तो मेष और वृश्चिक राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है। इसी प्रकार यदि बृहस्‍पति मजबूत हो , तो धनु और मीन राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि बृहस्‍पति के कमजोर होने पर धनु और मीन राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। बृहस्‍पति सामान्‍य हो तो धनु और मीन राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है। इसी तरह यदि शनि मजबूत हो , तो मकर और कुंभ राशि से संबंधित मामलों को जातक अपने जीवन में सुखद पाता है , जबकि शनि के कमजोर होने पर मकर और कुंभ राशि से संबंधित मामले जातक के जीवन में कष्‍टकर होते हैं। शनि सामान्‍य हो तो मकर और कुंभ राशि से संबंधित जबाबदेही रहा करती है। Acharya Rajesh kumar: अगर आप भी मुझसे वैदिक ज्योतिष सीखना चाहते हैं वह WhatsApp पर मैंने ग्रुप बनाए हैं जिसमें ज्योतिष ज्योतिष की पूरी जानकारी और अच्छी तरह से आपको फ़लादेश करना सिखाया जाएगा अगर आप ज्योतिष सीखना चाहते हैं यह ग्रुप ज्वाइन कर सकते हैं और इसमें आपको फीस2100 देकर रजिस्ट्रेशन करवाना होगा यह हमारे बैंक अकाउंट में जमा होगी Rajeshkumar pnb bank ac no 0684000100192346 ifc punb 0068400 hanumangarh townbranch 07597718725 अवघी 3महीना ओर जव तक सीखना चाहो तव तक

शुक्रवार, 26 मई 2017

आओ ज्योतिष सीखे ग्रुप से भारत में ज्योतिष का अपना एक विशेष स्थान है बाकी दुनिया में ज्योतिष को किस नज़र से देखते है इसका मुझे जायदा पता नहीं है ! लेकिन इतना ज़रूर लगता है चुकी ये जिज्ञासा देता है एक कोतुहल दिमाग में पैदा करता है ! इसे विज्ञानं की श्रेणी में रखा गया है ! यह भी गणना पे आधारित है इसलिए मुझे लगता है की विश्व में सभी ज़गह इसका अपना महत्व होगा ! नाम देखने का तरीका एवं बनाने का तरीका हो सकता है ! देश और स्थान के अनुसार हो !ये बहस का मुद्दा नहीं है आज तो हम इसके लग्न को केसे बनाया जाता है वो भी बिना जादा समय और गणना के ! में समय और गणना की बात इस लिए कर रहा हु क्योकि जब कम्पूटर का इतना उपियोग नहीं होता था ! उस समय ये एक उबाऊ प्रक्रिया लगती थी ! अब ये सारी गणनाए रेडीमेड कम्पूटर में मिल जाती है ! आपको सिर्फ समय दिन ज़गह और नाम कम्पूटर को बताना या उसपे लिखना होता है ! आपकी कुण्डली इस्क्रीन पे आ जाती है ! कुंडली में बारह घर होते है इन बारह घरो से ही सारी गणनाए की जाती है हर घर का अपना अपना महत्व होता है ! इसमें लग्न में क्या नंबर आया है ! उस पे कोन सा ग्रह विराजित है और ये किस आधार पर आधारित है ! में बहुत ही थोड़े से शब्दों में बताऊंगा क्योकि लग्न का कुंडली में बहुत ही महत्व है ! लग्न से व्यक्तित्व/शरीर की संरचना/स्वभाव/आदते एवं लग्न के बाद की सारी गणनाए लग्न पे ही आधारित होती है इस लिए ज्योतिष में लग्न सबसे महत्त्व पूण घर होता है! सबसे पहले लग्न ही कुंडली में आता है ! लग्न में कोन सा ग्रह आएगा ये केसे निर्धारित होता है ये बताता हू भारतीय ज्योतिष में गणनाए सूर्य उदय से सूर्य उदय तक की लिजाती है सूर्य उदय से सूर्य अस्त तक की गढ़ना साधारण तया नहीं ली जाती है !सूर्य उदय के समय सूर्य किस नंबर की राशि में है सबसे पहले ये देखा जाता है ! मान लीजिये सूर्य उदय के समय सूर्य 5 नंबर की राशी में है तो लग्न में 5 नंबर डाल देते है यानि की लग्न सिंह हुई लग्न में 5 नंबर डाला जायेगा और सूर्य लिखा जायेगा !या फिर मान ले की सूर्य 8नंबर की राशी में है तो लग्न वृश्चिक होगी तब लग्न में 8नंबर डालेगा और सूर्य लिखा जायेगा ! ये लग्न साधारण तया दो से ढाई घंटे तक चलती है !आधा घंटा ऊपर नीचे हो सकती है ये उस दिन के नझत्रो की चाल पे आधारित होगा !उसके पश्चात अगला नंबर डल जाएगा यानि सूर्य उदय के समय अगर मान ले की सिंह लग्न थी तो फिर 6नंबर यानि की कन्या राशि आजायेगी सिंह राशी सूर्य के साथ एक घर पीछे बारहवे घर में होगी और लग्न में 6नंबर डाला होगा और लग्न कन्या हो जाएगी अगर उस समय कन्या राशी में कोई ग्रह होगा तो वो ग्रह लिख दिया जायेगा मान ले की उस दिन उस समय कन्या राशी में मंगल एव बुध हो तो मंगल बुध लिख देगे !इस प्रकार 24 घटे में 12लग्न बन जाती है जो की समय और दिन पे आधारित होती है अब ये सब बहुत आसान हो गया है कम्पूटर पे समय दिन साल ज़गह और नाम डाल दीजये लग्न सहित कुंडली बन जाती है! मुझ से करीब करीब हर इन्सान ये पूछ ही लेता है लग्न क्या होता है इसको बदला नहीं जा सकता क्या ! तब मेरे मन में ये ख्याल आया की लग्न पे कुछ लिखू लग्न के महत्व को निचे दिए आधार के द्वारा और समझा जा सकता है जब शुरू शुरू मेनेें कुंडली देखनी शुरू किया तो मुझे ये समझने में दिक्कत आ रही थी की किन ग्रहों को आप आधार माने ! कई ज्योतिषियों की गड़ना मे इस त्रुटी को साफ़ देखा जा सकता है वो सीधे भाव पर बेठे ग्रहों के आधार से उस भाव के बारे में बोलना या लिखना शुरू कर देते है जिसके बारे में कुंडली दिखाने वाला आया है जेसे की तीसरे भाव का उधारण देकर बताता हु तीसरे भाव से साधारणतया भाई बहन पुरषार्थ पराक्रम के बारे में बताया जाता है किसी ने पूछा की मेरी भाइयो से केसी रहेगी उन्होंने तीसरे भाव में बेठे ग्रहों को देखा और बताना शुरू कर दिया या फिर तीसरे भाव के गृह स्वामी की इस्थिति देखी और उसके अनुसार बता दिया ये साधाण प्रेक्टिस की बात कर रहा हू पर इससे साधारण तया अनुमानित या आंशिक ही फलादेश मिलता है !लेकिन अगर आप उपरोक्त ग्रहों को लग्नाधिपति और लग्न में बेठे ग्रहों से मिलाकर या फिर उनसे सामंजस्य बिठा कर फलादेश बतायेगे तो मेरे अनुभव से कही सटीक और सही बता पाएंगे आपकी कही हुई बात ज्यादा पुख्ता साबित होगी ! मेरे हिसाब से किसी भी भाव का फलादेश बताने में इन दी हुई बातो का ध्यान रख लिया जाए तो देखने और दिखाने वाले दोनों को ही मज़ा आ जाएगा उदहारण के लिए में फिर तीसरे भाव को ही ले रहा हु मे अगर तीसरे भाव का फलादेश बता रहा हू तो सबसे पहले में देखूगा तीसरा भाव साधारण तया से किस किस का है ! ये तो में ऊपर बता चुका हु फिर किस राशि का है ये देखूगा जेसे की तीसरा भाव मिथुन राशि का हें ! फिर देखूगा तीसरे भाव में कोन सा गृह बेठा है या फिर कोन कोन से ग्रह बेठे है फिर देखूगा की उन पर किन किन ग्रहों की द्रष्टी पड़ रही है फिर इन सभी उपरोक्त बातो (ग्रहों की) का लग्नाधिपती और लग्न में बेठे ग्रहों के साथ केसा सामंजस्य बेठ रहा है देखने के पश्चात ही तीसरे भाव की भविष्यवाणी करूगा या फिर उनके स्वभाव के बारे में दिखाने वाले के साथ केसा रहेगा के बारे में बता पाउँगा ! ये मेरे अपने विचार है अगर हो सके तो इन्हें अजमा के देखे फलादेश देने में संतुष्टी मिलेगी और दिखाने वाले का विश्वाश भी बढेगा आज से में सोच रहा हु की योग के बारे में भी लिखू ! यै क्या होते है केसे बनते है इनका जीवन या फिर ये कहू जिस कुंडली में जितने योग होते है उनपर भविष्यवाणी करना उतना मुश्किल होता है !खेर इस सब पर हम आने वाले समय पे धीरे धीरे समझेगे लेकिन में ऐक बात ज़रूर कहता हूँ की कुंडली में योग का बहुत महत्व है इसके बिना कुंडली को समझाना समझना भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है चलिए धीरे धीरे चर्चा करेगे समझेगे समझायेगे !लेकिन अब एक बात करने की कोशिश ज़रूर करेगे वो ये की जब भी पेजे आज में जिस योग के बारे में लिख रहा हूँ वह जीवन के लिए अती महत्वपूण योग यह योग है किसी इन्सान की शादी का ना होना ये भी एक प्रकार का श्राप है ! लेकिन दुनिया में है ऐसे लोग जिनका विवाह नही होता जीवन इस श्राप को भोगता है वो इसके बारे में कुझ भी बोले कोई भी दलील दे इसे कोई भी कुंडली विशेषग्य कुंडली का दुर्भाग्य ही मानेगा !यह योग कुंडली में ग्रहों एवम ग्रहों के द्रष्टि संबंध किसी विशेष स्थान पर होने से बनता है जब सप्तम भाव,सप्तमेश तथा शुक्र तीनो पीडित हो तथा निर्बल हो और इनमे किसी पर भी कोई शुभ युति अथवा द्रष्टि न हो तो मनुष्य को पत्नी की प्राप्ति नहीं होती !यहाँ बिलकुल स्पष्ट है की विवाह के तीनो अंग (फेक्टर्स )निर्बल होने से विवाह नहीं होगा लग्न में गोचर का महत्व कुंडली में गोचर का महत्व उतना ही होता है जितना की कुंडली देखते वक्त लग्न कुंडली में बेठे ग्रहों का पहले में आप को बताता हूँ गोचर होता क्या हैं असल में गोचर उसे कहते है जितने समय का आप अपनी कुंडली का फलादेश निकालते है उतने समय तक ग्रहों की स्तिथि किस राशि में केसी हैं उसे साधारण तया गोचर कहते हैं याने की लग्न हुई ज़न्म के समय में ग्रहों की स्तिथि की किस घर और किस भाव में ग्रह बेठे है और गोचर हुआ आज की स्तिथि में ग्रहों की राशी और किन भावो में बेठे हैं इसे साधारण तया चन्द्र की चाल से तथा लग्न की उत्पत्ति से निकालते हैं क्योकी ग्रहों में सबसे तेज चाल चन्द्र की होती है यह दो से ढाई दिन में अपनी राशि बदल लेता है और लग्न भी दो से ढाई घंटे में बदल जाती हैं साधारण तया !अब में अपने ज्ञान के अनुसार आगे लिख रहा हूँ क्योकि ज़्यादातर ज्योतिष कुंडली के लग्न चक्र को देख कर फलादेश निकाल देते है लेकिन इसमें मेरे अनुमान से फलादेश अनुमानित या फिर संभावित ही आयेगा आप एक अंदाज का ही फलादेश निकाल पायेगें !फलादेश जायदा सही निकालने के लिए इस सूत्र को लगाना की किसी भी कुंडली को विचारते समय लग्न कुंडली के साथ साथ गोचर भी बना लेना कुंडली में ग्रह कितना ही अच्छा हो अगर शनी तुला राशि में बेठे हैं तो साधारण तय ज्योतिषी शनी की महादशा को बहुत बढिया मान कर बताना शुरू कर देते है ज़ब्की दिखाने वाला इंसान बार बार उनकी बात काट कर कहता हैं की गुरूजी ऐसा तो नहीं हो रहा है या फिर दिखाने वाला इंसान गुरूजी के बताये समय के आगे पीछे आकर कहता हैं की आपने तो कहा था की यहाँ से अच्छा समय सुरु हो जायेगा लेकिन ऐसा तो कुछ नहीं हुआ आप उसको कुछ न कुछ बहाना बना कर दस पन्द्रह दिन के लिए टाल देते हैं लेकिन बार बार उसके आने से परेसान भी होते है आपकी साक या सम्मान में जो कमी आती है वो भी कम नही होती लेकिन इस सबसे बड़ी बात ये होती हैं की उस इन्सान का इस विज्ञान या फिर इस ज्ञान से भरोसा उठ जाता हैं और ये मेरा मानना हैं की यही वो जाने अन जाने में आप को कही श्राप देता है जो उस समय तो आप को सही समझ में नहीं आता लेकिन धीरे धीरे सब समझ में आ जाता है कुंडली देखते समय कुछ बातो का ध्यान रख ले तो परिणाम बहुत अच्छे आ जायेगे मेरा मानना है किसी भी कुंडली को देखते समय लग्न चक्र के साथ साथ गोचर चक्र का भी ध्यान रखो या फिर उसे भी बना लो उसके पश्चात उस महादशा का या फिर जिस ग्रह की भविष्यवाणी कर रहे हो उसका लग्न से केसा संबन्ध बन रहा है लग्न की स्तिथि गृहकी स्तिथि महादशा की स्तिथि का गोचर की स्तिथि के साथ मिलाकर उनमे सामंजस बनाकर सामंजस केसा बन रहा हैं उसके हिसाब से फलादेश बतावोगे तो ज्यदा सटीक और सुखद आयेगा अब अगर ऊपर वाली स्थिति के अनुसार शनि तुला राशि में बेठे है और गोचर में भी शनि तुला राशि में या फिर अपनी खुद की राशि मकर या कुम्भ राशि में बेठे है अथवा किसी मित्र ग्रह की राशि में है तो ऊपर आपके ही दिए अनुसार फलादेश आयेगा शनि की महादशा आते ही दिखाने वाले इंसान के अच्छे दिन सुरु हो जायेगे लेकिन अगर शनि गोचर में किसी शत्रु राशि में बेठे है तो फिर शनि के फलादेश उतने अच्छे नहीं आयेगे इसलिए गोचर और लग्न कुंडली में सामंज्यस बिठाकर बताने पर फलादेश जायदा सटिक आयेगा और देखने वाले और दिखाने वाले दोनों ही को मज़ा आयेगा आपकी ख्याति बढेगी वो अलग यही वो जाने अनजाने में आप को दुआ देता हैं जिसका असर उस समय तो आपको नहीं समज आ्येग उसके अलावा गृह के , अंश वर्क उच्च निच आदी भी देखें योगिनी दशा अष्टवरग षोडस चार्ट नछत्तर आदि का भी फलादेश करते समय अघ्यन करना चाहिए

सोमवार, 22 मई 2017

आओ ज्योतिष सीखें ज्योतिषमान जागृत जगत की एक ज्योति का नाम ही जीवन है। ज्योति का पर्याय ज्योतिष है अथवा ज्योतिस्वरूप ब्रह्म की व्याख्या का नाम ज्योतिष है। वेदरूप ज्योतिष ब्रह्मरूप ज्योति का ज्योतिष है जिसका द्वितीय नाम संवत्कर ब्रह्म या महाकाल है। ब्रह्म सृष्टि के मूल बीजाक्षरों या मूल अनन्त कलाओं को एक-एक कर जानना वैदिक दार्शनिक ज्योतिष कहा जाता है। इसका दूसरा स्वरूप लौकिक ज्योतिष है जिसे खगोलीय या ब्रह्माण्डीय़ ज्योतिष कहा जाता है। व्यक्त या अव्यक्त इन दोनों के आकार, दोनों की कलायें एक समान हैं। वैदिक दर्शन के लिए यह वेदांगी ज्योतिष दर्शन सूर्य के समान प्रकाश देने का काम करता है इसी कारण इसे ब्रह्मपुरुष का चक्षु कहा गया है। ज्योतिषशास्त्र की व्युत्पत्ति ‘‘ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रम’’ की गई है। अर्थात् सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिषशास्त्र कहा जाता है । भारतीय ज्योतिषशास्त्र की परिभाषा के स्कन्ध-त्रय-होरा, सिद्धान्त और संहिता अथवा स्कन्ध पंच होरा, सिद्धान्त, संहिता, प्रश्न और शकुन ये अंग माने गये हैं।यदि विराट पंचस्कन्धात्मक परिभाषा का विश्लेषण किया जाये तो आज का मनोविज्ञान, जीवविज्ञान, पदार्थ विज्ञान, रसायन विज्ञान एवं चिकित्साशास्त्र इत्यादि इसी के अन्तर्भूत हो जाते हैं। बिना आँख के जैसे दृश्य जगत का दर्शन असम्भव है वैसे ही ज्योतिष के बिना ज्ञान के विश्वकोश वेद भगवान् का दर्शन भी असम्भव है। ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा।’ का उद्घोष करने वाले वेद ने भारतीय संस्कृति को विश्व की सर्वप्रथम संस्कृति माना है। यदि हम इस प्राचीनतम श्रेष्ठ संस्कृति से पुनः जुड़ना चाहते हैं तो हमें ज्योतिष का ज्ञान अनिवार्य रूप से प्राप्त करना होगा। हमें हमारी संस्कृति से जोड़ने का सेतु ज्योतिष ही है। यदि हमारे सभी देशवासी अपनी संस्कृति से जुड़ गये तो धरती पर देवत्व का अवतरण करके रहेंगे। ज्योतिष ज्ञान सबका मंगल करे। विकृत मान्यताओं से उबारे। इसी लक्ष्य को लेकर ‘आओ ज्योतिषसिखे ग्रुप बनाया इससे आप उन प्रारम्भिक सोपानों पर तो चढ़ ही सकते हैं जो हममें अमित शक्ति का प्रादुर्भाव कर सकते हैं। इस ज्योतिष ग्रुप’ में भारतीय ज्योतिष का इतिहास व प्रमुख ज्योतिर्विदों एवं उनकी कृतियों का परिचय जिससे हमें यह स्पष्ट ज्ञान हो जाये कि ऋग्वेद की रचना से लेकर अब तक हमने इस विज्ञान के द्वारा विश्व को क्या-क्या दिया ? ज्योतिष के प्रायः सभी अंगों का इस ‘गरुप में सिखेगे जटिल गणनाओं पर अधिक ध्यान न देते हुए ज्योतिष के व्यावहारिक स्वरूप का जनसाधारण को परिचय कराना ही प्रस्तुत ‘गरुप’ का उद्देश्य है। आचार्य राजेश

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...