आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
सोमवार, 11 जून 2018
रविवार, 10 जून 2018
भविष्यवाणी ओर ज्योतिष
मित्रों यथार्थ के बहुत करीब तक भविष्यवाणियां की जा सकती हैं लेकिन आवश्यकता है ज्योतिष के गूढ़ रहस्यों की जानकारी एवं ग्रहों की चाल समझने की। यदि भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी हमें वर्तमान में मिल जाए तो हम भविष्य के लिए बहुत कुछ तैयारियां कर सकते हैं।
भविष्य में होने वाली दुर्घटना को टाल सकते हैं अथवा उसके दुष्प्रभाव को कम कर सकते हैं। अधिकांशत: देखा गया है कि ज्योतिषी लोग अपनी विद्या का सही इस्तेमाल नहीं कर पाते या यूं कहें कि पूर्ण उपयोग नहीं कर पाते और सही भविष्यवाणी में कई बार चूक जाते हैं। सही मायने में देखा जाए तो ज्योतिष विद्या मनुष्य के पिछले कर्मों का दंड-पुरस्कार बताने वाला विज्ञान है। अव मन मे यह सवाल आएगा किभाग्य में जो लिखा है वह होना ही है तो उसे जानने से क्या लाभ? मित्रो उस जानकारी के आधार पर अपने भविष्य को सुधारा जा सकता है। कम से कम यह तो किया जा सकता है कि हम अपने किए हुए कर्मों का परिणाम भुगतने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें। दुखद संभावनाएं टाली नहीं जा सकतीं तो कम से कम उनसे निपटने की तैयारी तो कर ही सकते हैं।भविष्य को जान लेने के बाद उसे बदला भी जा सकता है। निचली अदालत में कोई जुर्म सिद्ध होने और सजा सुनाई जाने के बाद ऊंची अदालतों में अपील की जाती है। वहां भी अपराध सिद्ध हो जाए तो दो स्थितियां होती हैं। एक सजा बहाल रहे और दूसरे उसमें कुछ छूट मिल जाए या दंड का स्वरूप बदल जाए। निचली अदालतों में फांसी की सजा सुनाए लोगों को बड़ी अदालतों से अक्सर राहत मिलती है। उनकी फांसी अक्सर आजीवन कारावास में बदल जाती है। भाग्य में उलट-फेर की संभावना इसी तरह मौजूद रहती है। उस संभावना का उपयोग किया जाना चाहिए। चेतना के एक स्तर पर पहुंचने के बाद भावी घटनाओं का न केवल पूर्वाभास होता है बल्कि उन्हें नियंत्रित भी किया जा सकता है। उनकी दिशाधारा बदली जा सकती है।मेरा मानना है कि ‘ज्योतिषी को दुखद भविष्यवाणियां करने से बचना चाहिए। हो सकता है नियति का विधान किसी और तरह काम करे और होनी जिस रूप में दिखाई दे रही है, वह टल जाए लेकिन एक बार दुखद भविष्यवाणी कर दी गई और जातक ने उसे मान लिया तो दुख की आशंका और भी घनीभूत हो जाती है। वह संभावना टल रही हो तो भी वापस बुला ली जाती है।रोग, नुक्सान, मृत्यु, विग्रह आदि भविष्यवाणियों के सही होने में सिर्फ होनहार ही कारण नहीं है, उनकी घोषणा भी एक अंश में जिम्मेदार है जो दुर्घटनाओं के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि रचती है। इस तरह की घोषणाएं कभी-कभार जातक के मन में प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न करती हैं। वह उन्हें रोकने के लिए कमर कसता है, उन्हें टालता भी है लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। भाग्य को जान लेने के बाद उसे बदलने का उपक्रम किया जा सके तो यह ज्योतिष का सही उपयोग है। सवाल हो सकता है कि भाग्य को बदला कैसे जाए? मित्रों होनी को टालने अथवा नियति को बदलने वाले उपायों में तीन प्रमुख हैं-एक इच्छा शक्ति, दूसरा विनय और तीसरा नियति को समझने और तद्नुकूल अपने आपको ढाल लेने वाला ज्ञान। तीसरे उपाय को एक ही शब्द में ‘गुह्य ज्ञान’ भी कहा जा सकता है। अपने आपको बदलने और विश्व को अधिक सुंदर, उन्नत, व्यवस्थित बनाने के लिए समर्पण का मन बना लिया जाए तो नियति में बदलाव आने लगता है। तब प्रकृति एक अवसर देती है। जिन लोगों की नियति में बदलाव आया, उनके लिए नियति ने उद्देश्यपूर्ण उदारता ही बरती मित्र इच्छाशक्ति का उपयोग वुरी भावना से नहीं किया जा सकता। बदलने या सुधरने का ढोंग कर अपने लिए क्षमा नहीं बटोरी जा सकती है। बाहरी दुनिया में काम करने वाली न्याय व्यवस्था को झांसा देना कितना ही आसान हो, दिव्य प्रकृति में कोई झांसेबाजी नहीं चलती। वहां शुद्ध ईमानदारी और प्राथमिकता ही काम आती है
दूसरा आवश्यक गुण है ‘विनय’। अपने आपको परम चेतना के हवाले छोड़ देने और अकिंचन हो जाने की मन: स्थिति ही विनय है। उस स्थिति में अहंकार का नाम-निशान नहीं बचता। एक बार तो यह परवाह भी छोड़ देनी पड़ती है कि नियति से उदार परिवर्तन भी आएंगे। अपने आपको कठोर तथा और अधिक क्रूर परिवर्तनों के लिए भी उसी कृतज्ञ भाव से तैयार रखना पड़ताहै यह बात स्पष्ट है कि जन्म पत्रिका के माध्यम से हम आने वाले समय में अर्थात भविष्य में होने वाली घटनाओं के संबंध में महत्वपूर्ण बातों को जान सकते हैं। यदि हमारे साथ कोई दुर्घटना घटने वाली है तो हम उसके बचाव के उपाय कर सकते हैं और नहीं तो कम से कम उस दुर्घटना के प्रभाव को तो कम कर ही सकते हैं।
शुक्रवार, 8 जून 2018
क्या अंक ज्योतिष कारगर है?
मित्रो लेख थोङा लंवा खिच गया क्षमा चाहुगा माना जाता है जो अंक हमसे जुड़े होते हैं, वे हमारी किस्मत पर प्रभाव डालते हैं। क्या ऐसा सच में होता है? क्या अंक ज्योतिष कारगर है? या फिर हमें खुद की क्षमता को बढाने पर ध्यान देना चाहिए? : एक दिन कोई उद्योगपति मुझसे मिलने आए थे उन्होंने अपना विजिटिंग कार्ड दिया। थोड़ी देर बातें करते रहे विदा लेकर निकलते हुए जरा हिचकते हुए खड़े रहे। आखिर पूछ ही दिया : आचार्य जी मेरे साथ बात करते समय आप बीच बीच में ‘रमियान’ ‘रमियान’ कह रहे थे। उस मंत्र का क्या अर्थ है मैं चौंक उठा उनका दिया विजिटिंग कार्ड दिखाते हुए मैंने कहा : यही तो आपका नाम है कार्ड में Rhamean ही तो लिखा है ‘‘नहीं महाराज मेरा नाम रमन है। न्यूमरालॅजी के ज्योतिषी ने परामर्श दिया था कि मेरे नाम को अँग्रेजी में इस तरह लिखा जाए तो व्यवसाय में सफलता मिलेगी मैं अपनी हँसी रोक नहीं पाया। मनुष्य ने ही तो अंकों और अक्षरों को रूप दिया है। फिर वे कैसे मानव की किस्मत बना सकते हैं? बताइए, आप अपनी क्षमता के बूते पर उद्योग खड़ा करेंगे या अंकों पर विश्वास करके? नंबर क्या कर सकते हैं?अगर किसी ने कहा दिया कि अंक दो आपके लिए भाग्यशाली है तो क्या आप आँख मूँदकर उस पर विश्वास कर बैठेंगे ज्योतिषी के कहने पर अपना हाथ या पैर काट डालेंगे? कितनी मुरखो वाली वात हमने अपनी सुविधा के लिए दिन, वार और संख्याओं की व्यवस्था की थी। क्या ये सब चीजें हमारे जीवन को तय कर सकती हैं प्राणवान होकर आप लोग जो बेवकूफियाँ करते हैं उनके लिए बेजान ग्रहों को जिम्मेदार ठहराना कितनी बड़ी कायरता है। ग्रहों में जो स्पंदन होते हैं, उनका असर पृथ्वी पर पड़ सकता है। लेकिन जिन लोगों का मन संतुलित है, उन पर इन स्पंदन झेलने की ताकत हो सकती है कार्य आरंभ करने से पहले आप ज्योतिषी के पास जाएँगे। अगर वे कह दें कि कार्य में सफलता मिलेगी तो आप उसी पर विश्वास करते हुए पूरी क्षमता के साथ काम नहीं करेंगे। अगर वे कहें कि सफलता नहीं मिलेगी तब निराशा के मारे लगन के साथ काम नहीं करेंगे। तब ज्योतिषी के पास जाने का मतलब ही क्या है?आधे-अधूरे काम करेंगे तो सफलता कहाँ से मिलेगी इच्छित वस्तु को पाना हो तो अपनी क्षमता बढ़ा लीजिए। खेलने के लिए उतरने से पहले ही परिणाम पाने की इच्छा न करें। अपने काम की जिम्मेदारी स्वयं लेने की आदत डालें।फिर भी पुरी दुनियामे कितनी भाषा वोली जाती है ओर कितने तरह के अक्षर है इसलिए अंक ज्योतिष, रामशलाका, भैरव ज्ञान, नंदी नाड़ी, स्वर ज्योतिष, क्रिस्टल बॉल, रमल ज्योतिष जैसे उपाय चलन में आए। भविष्य जाने की इन विधाओं के बावजूद फलित ज्योतिष ज्यादा xलोकप्रिय रहा है, वजह उसकी समझ में आने वाला वैज्ञानिक आधार और लम्बी परंपरा वैदिक ज्योतिष भारतीय ज्योतिष विधि में सबसे प्रमुख है। यह वेद का हिस्सा है जिसे वेद की आंखें भी कहते हैं। इसमें जन्म कुण्डली के आधार पर भविष्य कथन किया जाता है। इस विधि से भविष्य जानने के लिए जन्म समय, जन्मतिथि एवं जन्म स्थान का ज्ञान होना आवश्यक होता है। महर्षि पराशर और जैमिनी दोनों ही समकालीन थे। इन दोनों ऋषियों ने वैदिक ज्योतिष के आधार पर भविष्य आंकलन की नई विधि को जन्म दिया।जैमिनी पद्धति दक्षिण भारत में अधिक प्रचलित है। यह पद्धति वैदिक ज्योतिष से मिलती-जुलती है परंतु इसके कुछ अपने सिद्धांत और नियम हैं। जो ज्योतिषशास्त्री जैमिनी और पराशरी ज्योतिष दोनों से मिलाकर भविष्य कथन करते हैं उन्हें परिणाम काफी सटीक मिलते हैं। प्रश्न कुण्डली प्रश्न पर आधारित ज्योतिषीय विधि है; जिन्हें अपनी जन्मतिथि, समय और स्थान का ज्ञान नहीं होता उनके लिए यह ज्योतिष विधि श्रेष्ठ मानी जाती है। इन विधियों की सच्चाई या विश्वसनीयता के बारे मे मेरा मानना यह हे ‘ कि ज्योतिष के रहस्य प्रामाणिक व्यक्ति के सामने ही खुल कर आते है, जो विद्या भूत भविष्य के बारे में सटीक जानकारी देती हो वह इतनी कमजोर और सहज नहीं हो सकती की जिस तिस के सामने उसके गूढ़ अर्थ उजागर हो जाएं। गणित या भूगोल जैसे प्रतिदिन काम आने वाले विषयों के बारे में आधिकारिक प्रवेश के लिए एक न्यूनतम अनुशासन होना जरूरी है। उसके बिना इन विद्याओं का क ख ग भी पता नहीं चलता इसलिए ज्योतिष जैसे गूढ़ विषय में अधिकार की शर्तें या पात्रता तो और भी गंभीर है। ईमानदारी और निस्वार्थ भावना पहली शर्त है, इसके बिना कोई व्यक्ति इस विषय का जानकार तो हो सकता है पर आधिकारिक विद्वान नहीं, की उसकी की हुई गवेषणा सही निकले। भविष्य जानने की अन्य विधाओं का भी अलग-अलग नियम है, उन पर भी गौर किया जाना चाहिए।आज ईतना ही । आचार्य राजेश 07597718725 09414481324
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गुरुवार, 7 जून 2018
पैसा और ज्योतिष
। दूसरे भाव और इसके अधिपति की स्थिति हमारे संग्रह किए जाने वाले धन के बारे में संकेत देती है। कुण्डली का चौथा भाव हमारे सुखमय जीवन जीने के बारे में संकेत देता है। पांचवा भाव हमारी उत्पादकता के बारे में बताता है, छठे भाव से ऋणों और उत्तरदायित्वों को देखा जाएगा। सातवां भाव व्यापार में साझेदारों को देखने के लिए बताया गया है। इसके अलावा ग्यारहवां भाव आय और बारहवां भाव व्यय से संबंधित है। वास्तव में हम एकादश व चतुर्थ भाव के ऑपरेटिंग फंक्शन में कंफ्यूज हो जाते हैं। जिस मकान वाहन आदि की बात आप कर रहे हैं ये मानसिक सुख का कारक हैं। भौतिकता भी तभी सुख देगी जब मन शांत होगा। लाल किताब या कालपुरुष की बात करें तो चतुर्थ भाव सुख का भाव है। ये चन्द्रमा के आधीन विषय है एक झोपडी में भी भी आप वही भौतिक सुख का एहसास कर सकते हैं जो आपको लाखों खर्च किए हुए बंगले में भी नहीं आये। .28 बंगले होकर भी विजय माल्या आज भगोड़ा घोषित है। क्योंकि उसने सुख को एकादश से पाने का प्रयास किया ,एकादश भाव चतुर्थ सुख के लिए मारक आठवां भाव वन जाता है.जैसे ही आपने अपने सुख को भौतिकता में खोजा आपने अपने सुख को ही समझ लीजिए आग लगा दी। एकादश भाव काल पुरुष में शनि का स्थान है व वायुकारक प्रभाव लिए होता है। शनि त्याग ,विछोह का कारक है व वायु का कोई आकार नहीं .वायुकोई स्थिरता नहीं फिर भला यहाँ से प्राप्त आधार स्थाई सुख का कारक कैसे होगा ??फिर ये तो अंत से एक कदम पहले का भाव हैयहाँ से प्राप्त आधार द्वादश मोक्ष को प्राप्त करने की सीढ़ी के रूप में देखा जाता है ,और जाहिर रूप से मोक्ष प्राप्ति के लिए चतुर्थ ,भौतिक सुख (एकादश से छठा ) शत्रु है पैसे से प्राप्त बड़े बड़े भौतिक सुखों को त्यागकर हमने कई लोग अंत में अध्यात्म की तलाश में भटकते देखे बड़े बड़े लोगों को वृद्धाश्रम में पाया .बड़ी बड़ी अभिनेत्रियों को फांसी खाते देखा कारण वही एकादश के पीछे की अंधी दौड़ ,,,, और इस दौड़ में वो नहीं दिखा जो सहज रूप से चतुर्थ में हासिल था ,चन्द्रमा का ठिकाना ,मानसिक सुख का आधार, ज्योतिष में हर ग्रह की १०८ गतियां हैं व हर भाव १०८ तरीके से प्रभाव देने के लिए माना जाता है हाँ अगर कई जातक पैसे को ही आधार मान कर प्रश्न कर रहे हैं तो सामूहिक रूप से जवाब देकर बताने का प्रयास करता हूँ। धन (पैसा )कमाने के आधार प्रत्येक कुंडली में अलग अलग होते हैं साधन अलग अलग होते हैं भाव भी अलग अलग होते है मात्र एक भाव को ही प्राप्ति के लिए देखा जाना सही निर्णय का आधार किसी भी गणक के लिए नहीं बन सकता धन यानि ध +न कुंडलियों मे सामान्यतः धन का आगमन वहीँ से होता है जहाँ वृश्चिक व धनु राशि होती है आठवें के रूप में वृश्चिक राशि से पैसा कमाने के साधनों पर रिस्क लिया जाता है ,,वो रिस्क शरीर का हो ,धन का हो ,ज्ञान का हो किसी भी चीज का हो सकता है रिस्क आयेगा तो स्वयं को साबित करने के लिए नवम भाग्य के रूप में धनु राशि को आपरेट करना ही होगा जब रिस्क लिया जाएगा तभी भाग्य को अपनी हैसियत दिखाने का मौका मिलेगा अब अगर हम आय (पैसा ) एकादश में ही सुख तलाश कर रहे हैं तो देखिये कि ये एकादश आठवें भाव का सुख (चतुर्थ ) भाव है। काल पुरुष के अनुसार आठवां यानि रिस्क का भाव ,आठवां यानि वृश्चिक राशि कर्म अर्थात दशम इस रिस्क का पराक्रम (तीसरा)तथा एकादश अर्थात इस आठवें का सुख (चतुर्थ) अतः ज्योतिषी व जातक दोनों को चाहिए कि पैसा खोज रहे हैं तो भाव से भ्रमित न होकर एकादश के त्रिकोण को खंगालें एकादश का त्रिकोण जाहिर रूप से इसे उत्पादन का सहयोग (पंचम का प्रभाव )देने के लिए तृतीय तथा इस तृतीय (पराक्रम )को उत्पादन (पंचम का प्रभाव) देने के लिए सप्तम को पकड़ें (सम्भवतः अब ईसे समझें कि सातवें दाम्पत्य भाव के लिए क्यों कहा जाता है कि जातक अपनी लक्ष्मी घर लाया है ) सीधी सी बात है कि सप्तम भाव एकादश का भाग्य भाव है। इस त्रिकोण की तलाश के बाद कालपुरुष का प्रभाव लिए वृश्चिक व धनु को खंगालने हेतु जो जातक व गणक ज्योतिष के महासागर में गोता लगाएगा ,वो शर्तिया खाली हाथ नहीं लौटेगा ईस के ईलावा धन प्राप्त करने के लिये जो नियम है उनके अनुसार वह ग्रह जो केन्द्र तथा त्रिकोण का स्वामी हो अथवा अन्य शुभ भावों का स्वामी हो तो वह धन पदवी आदि वांछित पदार्थों की उपलब्धि करवाता है। इसके अलावा जो भाव पापी है,और उनके स्वामी यदि केवल पाप प्रभाव में हों तो पापत्व के नाश के द्वारा धन की सृष्टि करते हैं। ग्रहों के द्वारा यह पता लग सकता है कि ग्रह की कीमत कितने रुपये की है,और एक ही लगन में अगर अलग अलग प्रकार के ग्रह हैं तो वे अलग अलग कीमत का बखान करेंगे,लेकिन उस ग्रह की कीमत तब और बढ जायेगी,जब वह साधारण बली से अति बली स्थिति में पहुंच जायेगा। किसी कुन्डली के धनेश की दशा में कोई भी बात कहने से पहले यह पता कर लेंगे कि कुन्डली का स्तर क्या है,यह बात शुभ धन दायक ग्रहों के योगों के द्वारा पता लगेगी। इन योगों की संख्या जितनी अधिक होती है उतना ही अधिक धन मिलता है। धन दायक योगों के लिये पहले शुक्र को देखना होगा,कि वह एक या एक से अधिक लगनों में बैठा है।लगन दूसरे भाव नवम भाव और एकादस भाव के बलवान स्वामियों की परस्पर युति अथवा द्रिष्टि द्वारा हो,नवम दसम के स्वामियों का सम्बन्ध,चौथे और पांचवें भाव के स्वामियों का सम्बन्ध शुभ सप्तमेश तथा नवमेश का संबन्ध पंचमेश और सप्तमेश का शुभ सम्बन्ध भी धन का कारक बनता है। तीन छ: आठ और बारह भावों के स्वामी अगर अपनी राशियों से बुरे भावों में बैठें और बुरे ही ग्रहों द्वारा देखे जावें तो भी धन की सृष्टि होती है। उदाहरण मेष राशि का बुध वृश्चिक राशि में अष्टम स्थान में है,और शनि के पाप प्रभाव में हो,तो बुध बहुत निर्बल हो जायेगा,कारण- वह अनिष्टदायक भाव में है, वह शत्रु राशि में स्थित है, वह शनि द्वारा द्रष्ट है, वह तृतीय स्थान से छठे स्थान में विराजमान है, वह छठे स्थान से तीसरा होकर बुरा है, तीनो लगनों के स्वामी आपस में युति कर लेते है तो भी धन दायक योग बन जाता है। शुक्र गुरु से बारहवें भाव में बैठ जावे तो भी धन दायक हो जाता है,चार या चार से अधिक भावों का अपने स्वामियों से द्र्ष्ट होने पर भी धनदायक योग बन जाता है। किसी ग्रह का तीनों लगनों से शुभ बन जाना भी धनदायक योग बना देता है,सूर्य या चन्द्र का नीच भंग हो जाना भी धनदायक बन जाता है। कोई उच्च का ग्रह शुभ स्थान में चला जाये,और जिस स्थान में वह उच्च का ग्रह गया उसका स्वामी भी उच्च में चला जाये तो भी धनदायक योग बन जाता है। शुभ भाव का स्वामी अगर बक्री हो जाये तो भी धनदायक योग बन जाता है,यदि यह सब कारण तीनों लगनों में आजाये तो शुभता कई गुनी बढ जाती है। आपका धन किस क्षेत्र से और कब आयेगा इस संसार में अपवादों को छोड़कर हर व्यक्ति धनवान होना चाहता है। धन व्यक्ति को सुख, आनंद, सुविधा और सामाजिक सुरक्षा देता है। आज दुनिया में धनवान लोगों की संख्या इतनी कम है कि उनकी सूची बनाई जा सकती है। इसकी तुलना में गरीब लोगों की संख्या अधिक है। कुछ लोगों की आय इतनी है कि वह समाज में सम्मान और आदर्श जिंदगी जीते हैं। लेकिन तीनों ही वर्ग को देखें तो पाएंगे कि सभी में समान रू प से धन पाने की चाह होती है। धन और आय के आधार पर लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जा सकता है अत्यधिक धनी, उच्च मध्यम वर्ग, मध्यम वर्ग, गरीब और बहुत गरीब। यह अंतर देखकर यह विचार आना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्यो प्रत्येक व्यक्ति अपना-अपना भाग्य लेकर जन्म लेता है। एक ही परिवार में जन्मे बच्चों की किस्मत भी अलग होती है। ऐसा जन्म के समय की ग्रह स्थितियों में भिन्नता के कारण होता है। जन्मकुंडली में कौन सी स्थितियां व्यक्ति को धनवान वनाती है व संसार में कुछ लोग अपने जीवन में जल्दी तरक्की कर जाते हैं जबकि कुछ लोगों को इसके लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। कई बार इतना संघर्ष करने के बावजूद सफलता नहीं मिल पाती है। कुछ बहुत ही अमीर घर में पैदा होते हैं और कुछ लोग बहुत ही गरीब घर में। कुछ अमीर घर में पैदा होकर धीरे-धीरे गरीब हो जाते हैं और कुछ लोग गरीब घर में पैदा होकर धीरे-धीरे अमीर हो जाते हैं। कुछ लोग बहुत अच्छा पढ़ लिखकर बेरोजगार रहते हैं और कुछ लोग थोड़ा पढ़े लिखे होने पर भी अच्छे काम काज में लग जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि बच्चे के जन्म के बाद घर में बहुत तरक्की हुई और सब कुछ अच्छा हो गया जबकि कुछ लोग कहते हैं कि जब से बच्चा पैदा हुआ मां बाप बीमार रहते हैं और घर में परेशानी आ गई है। कुछ लोग कहते हैं कि शादी के बाद पत्नी के आने से तरक्की और उन्नति होती गई जबकि कुछ लोग कहते हैं कि शादी के बाद दिन प्रतिदिन काम खराब हो रहा है। इस संसार में अधि¬कतर लोग चढ़ते हुए सूर्य को नमस्कार करते हैं। अगर आप अच्छे पद पर हैं या आपको सब प्रकार की सुख सुविधा है तो आपके अनेक मित्र होंगे, अगर कुछ नहीं तो आपको कोई पूछने वाला नहीं होगा। ज्योतिष में नवम स्थान को भाग्य एवं धर्म स्थान माना जाता है। जन्मपत्री देखते समय सभी विषयों पर विस्तार पूर्वक विचार करना चाहिए। सबसे पहले अपनी जन्मपत्री किसी अच्छे ज्योतिषी को दिखा कर अपनी समस्या का समाधान करे आप हम से भी सम्पर्क कर सकते है 07597718725। 09414481324
शनिवार, 2 जून 2018
जन्म कुंडली मिलान
कुन्डली मिलान
हम सभी चाहते हैं कि वैवाहिक जीवन में सौहार्द एवं परस्पर सामंजस्य बना (Astrology for marriage compatibility) रहे। परंतु कई बार वैवाहिक जीवन में इस तरह गतिरोध उत्पन्न होने लगता है कि पति पत्नी के बीच दूरियां बढ़ती चली जाती हैं और सम्बन्ध विच्छेद तक हो जाता है।
इस तरह की स्थिति न आये और वैवाहिक जीवन सुखमय रहे इसके लिए हमारे समाज में कुण्डली मिलान (Marriage kundali matching) किया जाता है। ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि विवाह के संदर्भ में जब कुण्डली मिलान किया जाता है तब इसमें मुख्य रूप से अष्टकूट मिलान किया जाता है और इसी से निष्कर्ष निकाला जाता है कि जिन दो स्त्री-पुरूष की कुण्डली मिलायी जा रही है उनका वैवाहिक जीवन सफल रहेगा अथवा नहीं।
ज्योतिर्विद कहते हैं कि हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने अपनी साधना एवं योग शक्ति के आधार पर जिन सूत्रों एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया उन्हें अष्टकूट के नाम से जाना जाता है। अष्टकूटों में 36 गुणों का योग होता है। अष्टकूट (Asht Kuta) कौन-कौन से एवं कितने प्रकार के होते हैं तथा किस प्रकार वैवाहिक जीवन को प्रभावित करते हैं, आइये इसकी व्याख्या करते हैं।
1. वर्णकूट विचार: (Varna kuta Consideration)
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार राशियों के चार वर्ण होते हैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। राशियों में वर्ण विभाजन क्रमश: इस प्रकार से किया गया है, कर्क, वृश्चिक एवं मीन राशियों को ब्राह्मण वर्ण की श्रेणी में रखा गया है। सिंह, धनु एवं मेष राशियों का वर्ण क्षत्रीय होता है, कन्या, मकर एवं वृष राशियों को वैश्य वर्ण का नाम दिया गया है जबकि तुला, कुम्भ एवं मिथुन राशियों को शूद्र वर्ण की संज्ञा दी गयी है।
विवाह के सम्बन्ध में जब कुण्डली मिलायी जाती है तब राशिगत तौर पर पुरूष का वर्ण स्त्री के वर्ण से पहले होने पर वैवाहिक जीवन में तारतम्य बने रहने का संकेत मिलता है अर्थात राशिगत तौर पर यह स्थिति होने पर विवाह संस्कार सम्पन्न किया जा सकता है। उपरोक्त स्थिति के विपरीत अगर कन्या की राशि पुरूष की राशि से पहले हो तो इसे शुभ नहीं माना जाता है अत: इस स्थिति में ज्योतिषशास्त्र विवाह की आज्ञा नहीं देता है।
अगर कन्या (Bride) की राशि (Zodic Sign) "वैश्य" है और पुरूष (Groom) की राशि (Zodic Sign) "ब्राह्मण" है तो इस स्थिति में स्त्री अपने पति पर हावी नहीं रहती है अर्थात अपने पति की बातों को मानती व समझती है। कुण्डली मिलान करते समय अगर कन्या उच्च राशि यानी क्षत्रीय हो और पुरूष की राशि शूद्र हो तो इस स्थिति में शादी होने पर स्त्री अपने पति पर प्रभावी होती है यानी घर में पति की नहीं, पत्नी की कही चलती है। ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार राशियों के इस अनुलोम विवाह में वैवाहिक जीवन सुखमय रहने की संभावना कम रहती है अर्थात पति पत्नी में सामंजस्य की कमी रहती है इस तरह की समस्या से बचने के लिए ही कुण्डली (Birth Chart) में अष्टकूट (Astkut) मिलान करते समय राशियों के वर्ण (Cast) का विचार किया जाता है।
गुरुवार, 31 मई 2018
व्याख्या ज्योतिष की
विज्ञान एवं ज्ञान-प्रणाली के रूप में ज्योतिषशास्त्र सर्वथा अनूठा हैज्योतिषशास्त्र आधुनिक विज्ञान की तरह ही सर्वव्यापक अध्यात्मशास्त्र का एक भाग है । इसका यह कारण है
कि आधुनिक विज्ञान के समान अवलोकन, अनुमान और निष्कर्ष के आधार पर ज्योतिषशास्त्र की भी पुष्टि एवं पुनः पुष्टि की गर्इ है । तथापि ज्योतिषशास्त्र में अंतर्ज्ञान का प्रयोग तभी संभव है यदि ज्योतिषी उच्च आध्यात्मिक स्तर का हो ।ज्योतिषशास्त्र की जडें प्राचीन भारतीय वैदिक शास्त्रों में हैं । प्राचीन भारत के ऋषियों को हजारों वर्ष पहले ही हमारे ब्रह्मांड के ऐसे अनेक तथ्यों का पता था जो आधुनिक विज्ञान को निकट अतीत में ही ज्ञात हुए हैं । इन तथ्यों में से कुछ हैं:इस पर हम वाद में वात करेंगेज्योतिष आकाशीय ग्रहों की ताकत को मानवीय प्रकृति के अन्दर होने की जानकारी देता है,यह एक भविष्य कथन नही माना जाता है,ज्योतिष सिर्फ़ बताती है कि मनुष्य अपने में किस प्रकृति का है,वह कहां से आया है,और उसे कहां जाना है,ज्योतिष चरित्र को बताती है,और चरित्र ही जीवन का मुख्य क्षेत्र होता है,अगर मनुष्य अपने चरित्र को बदल देता है,तो वह अपने आगे जाने वाले क्षेत्र को बदल कर नया जीवन चालू करता है,ज्योतिष का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य के बारे में,कमजोरी के बारे में,चरित्र के बारे में खोजना होता है,साथ ही जो भी मनुष्य के लिये अहितकर है,उसके लिये उससे बचने के लिये सुझाव भी ज्योतिष के द्वारा दिया जाता है,ज्योतिष से बच्चों के प्रति उनकी जन्म कुन्डली से देख कर अभिभावकों को सचेत किया जाता है,कि वे किस तरह से जीवन में प्रगति की तरफ़ जा सकते है,किस तरह के लोगों के बीच उनका समानीकरण मिल सकता है.
हज्योतिष मात्र घटनाओं को ही बखान करती है,एक मनुष्य अपने सितारों पर शासन अपने द्वारा कर सकता है,शर्त यह है कि उसे पता हो कि जो सामने होने जा रहा है और उस से बचने का या उसे प्राप्त करने का रास्ता किस दिशा से या किस जानकारी से मिल सकता है,अगर मनुष्य अपने जीवन के ज्वार-भाटे के साथ बहता है,तो ज्योतिष की द्वारा जीवन प्रति जन्म कुन्डली बताती है,कि आगे क्या होने वाला है,एक चीज और है कि जन्म पत्री किसी की इच्छाओं को बखान सही तरीके से नही कर सकती है केवल अंदाज के द्वारा उस इच्छा को विभिन्न रास्तों से समझाया जा सकता है,एक चतुर आदमी अपने सितारों पर राज्य करता है,और के बेबकूफ़ आदमी सितारों के द्वारा शासित किया जाता है,ज्योतिष केवल सावधान करती है,अगर उसे सही तरीके से जाना जाय,ज्योतिष एक नक्शे की तरह से है,और जीवन के अलग अलग रास्तों पर जाने का संकेत देती है,अगर उन संकेतों को समझा जाये,जो उन रास्तों के चिन्हों को जानता है,वह जन्म कुन्डली को उसी तरह से पढ सकता है,जिस प्रकार से एक नक्शा जानने वाला निशान देख कर कह देता है,कि आगे रास्ता बन्द है,और जबरदस्ती जाने पर एक्सीडेन्ट हो सकता है.
हमेशा याद रखने वाली बात है,कि अच्छा और बुरा इन दो प्रकार के समयों का बखान करना भाग्य का बखान करना नही होता है,वह वास्तव में हमने अपने खुद के द्वारा क्या पैदा किया है उसकी जानकारी देना होता है,कुन्डली बताती है,कि हमने अपने पिछले समय में क्या प्राप्त किया है,और क्या नही,और जो प्राप्त किया है,वह आगे की जिन्दगी में हमारे साथ क्या प्रभाव देगा,और अगर किसी प्रकार से कुछ गलत किया है,और उस गलती से आगे की जिन्दगी में कुछ बुरा होने वाला है,तो उसे किस तरह से बदल कर हम अपने लिये अच्छा प्रभाव पैदा कर सकते है,ग्रह या सितारे प्रभाव को देते है,उन्हे रोकने वाला कोई नही है,रोकना केवल अपने प्रयासों से सम्भव है,कहावत है कि मनुष्य प्रत्येक प्रकार की शक्ति को श्रंखला से प्राप्त कर सकता है,अगर वह अपने को कंट्रोल करने का उपाय जानता है.
जीवन और प्रकृति का बखान मानव के लिये एक अटल सिद्धान्त के रूप में कार्य करता है,ग्रहों की आपसी युति जीवन के प्रति जो मंजिल बताती है,वह जन्म कुन्डली के द्वारा ही मालुम होती है,जन्म कुन्डली में जिस समय जन्म हुआ,उस समय की ग्रह स्थिति उनका स्थान और उनके द्वारा आपसी सम्बन्धों का विवेचन जो कहा जाता है,वह एक सामयिक घटना के अलावा कुछ नही माना जा सकता है,जन्म एक अहम के माफ़िक होता है,"मैं एक व्यक्ति हूँ",और मेरा जन्म इस तारीख को हुआ था,इसके अलावा और कुछ नही कहा जा सकता है,इस अहम का अन्त ही मौत के नाम से जानी जाती है,जन्म कुडली हर व्यक्ति के मंजिल पर पहुंचने की एक घडी मानी जाती है,जो मंजिल पर पहुंचने का समय बताती है.इस घडी के द्वारा यह भी पता चलता है,कि कब किस काम के द्वारा अच्छा किया गया है,और किस काम के द्वारा बुरा किया गया है,जो किया गया है,उसका मिलने वाला फ़ल कब और कैसे मिलेगा,प्रति ली जाने वाली सांस के द्वारा ग्रहों का असर शरीर में आता है,और प्रति सांस के द्वारा किये जाने वाला कार्य और सोचा जाने वाला विचार ग्रहों के द्वारा जीवन के रजिस्टर मे लिखा जाता है,और जब किये गये या सोचे गये कामों का फ़ल मिलने का समय आता है,अथवा जो बोया गया है,उसे काटने का समय आता है,तब व्यक्ति के पास सुख या दुख मिलना चालू हो जाता है,लेकिन प्रकृति का नियम कभी बदला नही जा सकता है,भगवान की चक्की में पिसता जरूर देर से है,लेकिन पीसा महीन जाता है.
इस ज्योतिष के तीन सिद्धान्त है,जो इस जादुई विद्या का प्रतिपादन करते है,पहला भाव के रूप में जाना जाता है,जैसे पहला भाव,दूसरा भाव आदि,दूसरा सिद्धान्त राशियां है,जैसे मेष राशि,वृष राशि आदि और तीसरा सिद्धान्त ग्रह बताये गये है,हर भाव जिन्दगी का एक डिपार्टमेंट है,राशि ब्रहमाण्ड का डिवीजन है,जो भाव के अन्दर स्थित होकर व्यक्ति का प्राथमिक उत्तेजना का बखान करता है,और व्यक्ति किस प्रकार से अपने जीवन के अन्दर अपना असर देगा,यह बताया जाता है,इसके अलावा ग्रह भगवान के द्वारा स्थापित किये गये दूत है,जो हर भाव और राशि में घूम घूम कर आत्मा की उन्नति और अवनति के लिये अपना कार्य करते रहते है.
ग्रह अपना भाव उसी तरह से प्रकट करते हैं,जिस प्रकार से एक एक्टर अपनी कला को स्टेज पर दिखाता है,और जिस राशि में ग्रह है,वह बताता है,कि यह एक्टर किस प्रकार का खेल दिखा सकता है,और भाव के द्वारा पता चलता है कि जो खेला जाता है,उस खेल की सेटिंग किस तरह से की गयी है,कितने समय का और कब खेला जायेगा,और किस प्रकार से उस खिलाडी से अपना सम्बन्ध बना कर रखेगा,हर ग्रह अपनी एक भिन्न शक्ति को रखता है,वह शक्ति नकारात्मक भी हो सकती है और सकारात्मक भी,ग्रह पूरी तरह से सकारात्मक है,और नकारात्मक भाव में या नकारात्मक राशि में,या नकारात्मक ग्रह द्वारा समर्थित है,तो वह भी जथा संगति तथा गुण को देगा,यह जरूरी बात है.कुन्डली केवल टेन्डेन्सी बताती है,यह बताने वाले के ऊपर निर्भर करता है,कि वह उस बखान को किस प्रकार से करेगा,कुन्डली को बखान करने के लिये ज्योतिषी में भी इच्छा शक्ति का होना जरूरी है.
सोमवार, 28 मई 2018
ज्योतिष का ज्ञान
वैदिक काल से ज्योतिष का प्रचलन रहा है। ज्योतिष वेद का छठां अंग भी कहा जाता है। समय की पहिचान बिना ज्योतिष के ज्ञान के नही हो सकती है।
इसी प्रकार से आसमानी गह भी ज्योतिष से ही कालान्तर के लगातार ज्ञान को प्राप्त करने के कारण ही पहिचाने जाते है। जब तक ज्योतिष का ज्ञान नही था तब तक पृथ्वी स्थिर थी और सूर्य चन्द्रमा और तारे चला करते थे। जैसे ही ज्योतिष का ज्ञान होने लगा तो पता लगा कि सूर्य तो अपनी ही कक्षा मे स्थापित है बाकी के ग्रह चल रहे है। लेकिन ऋषियों और मनीषियों को बहुत पहले से ज्योतिष का ज्ञान था उन्हे प्रत्येक ग्रह के बारे मे जानकारी थी,यहां तक कि मंगल ग्रह के बारे मे भी उनका ज्ञान प्रचुर मात्रा मे था और उन्होने मंगल ग्रह की पूरी गाथा पहले ही लिख दी थी। पुराने जमाने से सुनता आया हूँ- "लाल देह लाली लसे और धरि लाल लंगूर,बज्र देह दानव दलन जय जय कपि शूर",इस दोहे को लिखा तो तुलसीदास जी है लेकिन उन्हे इस बारे मे कैसे पता लगा कि मंगल का रंग लाल है और जब मंगल को खुली आंख से देखा जाये तो लाल रंग का ही दिखाई देता है सूखा ग्रह है इसलिये बज्र की तरह से कठोर है,साथ ही ध्वजा पर लाल रंग का होना मंगल का उपस्थिति का कारण भी बनाता है,मंगल के देवता हनुमान जी के विषय मे उन्होने लिखा था। इस बात का सटीक पता तब और चला जब अमेरिका के नासा स्पेस से वाइकिंग नामका उपग्रह यान मंगल पर भेजा गया और उसने जब सन दो हजार में मंगल के ऊपर की कुछ तस्वीरे भेजी तो उसके अन्दर एक फ़ेस आफ़ मार्स के नाम से भी तस्वीर आयी। यह तस्वीर बिलकुल हनुमान जी की तस्वीर की तरह थी,इस तस्वीर को उन्होने सन दो हजार दो तक नही प्रसारित की,इसका भी कारण था,वे अपने को बहुत ही उन्नत और वैज्ञानिक भाषा मे दक्ष मानते थे और जब भी उनका कोई टूरिस्ट भारत आता था और भारत मे जब हनुमानजी के मंदिर को देखता तो वह मजाक करता था और "मंकी टेम्पिल" कह के चला जाता था। इस फ़ेस आफ़ मार्स ने अमेरिका के वैज्ञानिक धारणा को चौपट कर दिया और उन्हे यह पता लग गया कि भारत मे तो आदि काल से ही मंगल को हनुमान जी के रूप मे माना जा रहा है।विज्ञान जहाँ समाप्त हो जाता है वहाँ से ज्योतिष विज्ञान शुरु होता है !
जिस प्रकार से विज्ञान के अन्दर जो भी धारणा पैदा की जाती है उसके अनुसार रसायन शास्त्र भौतिक शास्त्र चिकित्सा शास्त्र आदि बनाये गये है। लेकिन जितनेी तत्व विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरते है उनके अन्दर केवल चार तत्व की मीमांसा ही की जा सकती है। बाकी का एक तत्व जो गुरु के रूप मे है वह विज्ञान न तो कभी प्रकट कर पाया है और न ही कभी अपनी धारणा से प्रकट कर सकता है। शरीर विज्ञान को ही ले लीजिये,सिर से लेकर पैर तक सभी अंगो का विश्लेषण कर सकता है,हड्डी से लेकर मांस मज्जा खून वसा धडकन की नाप आदि सभी को प्रकट कर सकता है कृत्रिम अंग बनाकर एक बार शरीर के अंग को संचालित कर सकता है। फ़ाइवर ब्लड को बनाकर कुछ समय के लिये खून की मात्रा को बढा सकता है लेकिन जो सबसे मुख्य बात है वह है प्राण वायु यानी गुरु की वह पैदा नही कर सकता है जब प्राण वायु को शरीर से जाना होता है तो वह चली जाती है और शरीर मृत होकर पडा रह जाता है उसके बाद शरीर वैज्ञानिक केवल पोस्ट्मार्टम रिपोर्ट को ही पेश कर सकता है कि ह्रदय रुक गया मस्तिष्क ने काम करना बन्द कर दिया अमुक चीज की कमी रह गयी और अमुक कारण नही बन पाया। नही समझ पाये आज तक कि गुरु क्या है लेकिन ज्योतिष शास्त्र मे सर्वप्रथम गुरु का विवेचन समझना पडता है गुरु जिस स्थान से शुरु होता है अपने अन्तिम समय तक केवल काल की अवधि तक ही सीमित रहता है उसे कोई पकड नही पाया अपने अनुसार पैदा नही कर पाया और न ही विज्ञान के अन्दर इतनी दम है कि वह भौतिक रूप से गुरु को प्रदर्शित कर सके। जिस दिन यह गुरु भौतिकता मे समझ मे आने लगेगा उस दिन विज्ञान की परिभाषा पराविज्ञान के रूप मे जानी जायेगी
गुरुवार, 24 मई 2018
नशा और राहु
नशे की लत आज समाज को अंदर ही अंदर खोखला कर रही हैं। नशे रूपी दानव दिन प्रतिदिन विकराल होता जा रहा हैं। आज छोटे छोटे बच्चों से लेकर बडे बुजुर्ग तक नशे के शिकार बन चुके हैं। समाज में व्यापत अनेक अपराध नशे के कारण ही पनप रहे हैं। नशे का सबसे भयंकर रूप तब देखने को मिलता हैं जब किसी को इसकी लत पड जाती हैं। वह लाख प्रयत्न करने के बाद भी इस समस्या से बहार नही आ पाता।ज्योतिष शास्त्र कि सहायता द्वारा यह जाना जा सकता हैं, कि कौन व्यक्ति नशा कर सकता हैं, कौन नही और साथ ही यह भी जाना जा सकता हैं कि व्यक्ति किस प्रकार का नशा करेगा। ग्रहों की जिन परिस्थितियों के कारण व्यक्ति नशे का अभ्यस्त होता है सभी जानते हैं कि नशा खराब है..??? इससे शरीर, मन, धन, परिवार सब कुछ दाँव पर लग जाता है, मगर फिर भी लोग विशेषकर युवा बुरी तरह से इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं। आज हर दूसरा युवा किसी न किसी नशे को अपनाता है। प्रारंभ में शौक में किया गया नशा बाद में लत बनता जाता है और सारा करियर तक चौपट कर सकता है।यह सच है कि नशे का आदी बनने में वातावरण का भी हाथ होता है,ज्योतिष में राहु को नशे के रूप में माना जाता है। जब राहु की छाया चन्द्रमा पर पडती है तो मानसिक चिन्ता का रूप शुरु हो जाता है,मंगल के साथ राहु का रूप होने से खून के अन्दर मंगल की स्थिति के अनुसार कम या अधिक दबाब अधिक चिन्ताओं के कारण बन जाता है। बुध के साथ राहु की युति होने के कारण व्यक्ति का दिमाग असीम गणनाओं की तरफ़ चला जाता है,गुरु के साथ राहु की स्थिति होने के कारण हवा के अन्दर ही विषाक्त कणों का जाना शुरु हो जाता है और जातक के अन्दर कई तरह की वायु वाली बीमारियां होने से बेकार की चिन्तायें ही अपना घर बना लेती है,शुक्र के साथ राहु का आना खतरनाक माना जाता है,इस युति के कारण जातक का दिमाग किसी भी प्रकार से किसी भी उम्र में अनैतिक सम्बन्धों की तरफ़ चला जाता है,अक्सर इसी प्रकार के किस्से प्रेम करने और प्यार करने तथा प्यार भरी कहानी बनाने के लिये माना जाता है। अक्सर कोई सही ग्रह अगर राहु शुक्र की तरफ़ अपना इशारा कर लेता है तो यह नशा बडी बडी इमारते बनाने और चमक दमक की तरफ़ मन को ले जाने के लिये भी माना जाता है। स्त्री की कुंडली में अगर राहु मंगल का योग है तो वह किसी न किसी प्रकार से अपने को प्रेम सम्बन्धों की तरफ़ खींच कर ले ही जाता है वह सम्बन्ध जरूरी नही है कि गलत ही हो,अक्सर इस युति से बने सम्बन्ध कभी कभी खतरनाक भी हो जाते है और उन सम्बन्धो के कारण कई गृहस्थियां टूटी भी है और कितने ही लोगों ने अपने जीवन को इस युति के कारण बरबाद भी किया है,राजपूत कुल के लिये अक्सर मंगल राहु की युति को पूर्ण रूप से देखा जाता है,खून का नशा मानकर और किसी भी समस्या में जुझारू वृत्ति होने के कारण मंगल राहु की युति को समझना बहुत ही टेढी खीर मानी जाती है,कब किसके प्रति दुश्मनी बना कर किस प्रकार से अपने दाव का बदला लिया जाये यह समझना मुश्किल हो जाता है। अक्सर इस युति के कारण लोगों के द्वारा गांव शहर और देश तक उजडते देखे गये है।खून का नशा जब भी किसी पर हावी होता है तो वह अपनी चाल को दूसरे के प्रति बदले की नीयत से सामने लाने की कोशिश करता है,राजपूती खून के अन्दर यह नशा होने के कारण ही इस जाति को जुझारू जाति कहा जाता है,अक्सर शराब और तामसी कारणों को खून के अन्दर लगातार मिक्स करते रहने से भी खून के अन्दर जुझारू कारण पैदा होने लगते है,जैसे किसी नशेलची से अगर तकरार कर ली जाये और उसे भूल जाने की कोशिश की जाय तो यह असम्भव ही माना जा सकता है,इसका कारण है कि नशे को करने वाला व्यक्ति जब भी नशा उस पर हावी होगा उसकी अतीन्द्रिय अपना काम करना शुरु कर देती है और उसे जन्मों की बातें याद आने लगती है,जैसे ही उसे याद आता है कि अमुक ने उसके साथ अन्याय किया था वह अपनी जुझारू वृति को अपनाने केलिये प्रयास करना शुरु कर देता है,यही नशाखोरी के अन्दर किये जाने वाले अपराधों की श्रेणी में आजाता है। कारण साधारण आदमी तो अपनी बातो को भूल जाता है लेकिन नशे को करने वाला व्यक्ति उस बात को भूलता नही है जैसे ही साधारण आदमी किसी कारण से अपने रास्ते को भूला या नशा करने वाले के फ़न्दे में आया वह नशा करने वाले व्यक्ति का शिकार हो जाता है।राहु की द्रिष्टि कभी भी एक स्थान पर नही होती है वह अपने स्थान के अलावा तीसरे भाव पन्चम भाव सप्तम भाव और नवे भाव को देखता है। इसी प्रकार से मंगल के साथ बैठने वाला राहु मंगल की द्रिष्टि का भी अनुसरण करता है,जैसे मंगल अपने स्थान पर अपने स्थान से चौथे स्थान पर अपने स्थान से सप्तम स्थान पर और अपने स्थान से अष्टम स्थान को कन्ट्रोल करने की कोशिश करता है,इन दोनो की युति के कारण जब भी कोई शरारत मंगल और राहु की युति वाला व्यक्ति करता है तो वह अपनी तीसरे चौथे पांचवे सातवें आठवे और नवे भाव को आहत करता ही है। सबसे पहले वह अपनी आदतों के अनुसार अपने को नशेलची घोषित करता है यह उसके तीसरे भाव का कारण है और वह अपने जनता के बीच में ले जाता है सार्वजनिक स्थान में ले जाता है यह चौथे भाव का कारण बनता है उसके बाद पंचम भाव में ले जाने पर वह किसी से भी अपनी दोस्ती करने की कोशिश करता है,अपने आपको राजा समझता है यह पंचम भाव की बात होती है जो भी उसे समझाने की कोशिश करता है या बात करने की कोशिश करता है वह उसकी नजर में केवल दुश्मन ही समझ में आता है और जो भी वह कहता है लगने वाली बात के अनुसार ही कहता है इसलिये अच्छे लोग नशा करने वाले से बचते है,सबसे बडी बात जब मंगल और राहु की सम्मिलित द्रिष्टि आठवें भाव पर पडती है तो उसे अपमान करने कोई भी जोखिम लेने और किसी भी तरह से मौत को कारित करने में देर नही लगती है,उस समय उसका खून बह रहा हो या सामने वाले का उसे कोई दर्द नही महसूस होता है। यह केवल राहु की सीमा में रहने तक ही सीमित होता है जैसे ही चन्द्रमा का असर या मगल के डिग्री का असर समाप्त होता हैया किसी प्रकार का राहु विरोधी उपाय किया जाता है जातक अपने ही मूड में आजाता है और अपने पहले जैसे स्वभाव को प्रदर्शित करने लगता है।
सोमवार, 21 मई 2018
कुंडली का फलकथन कैसे करें
किसी भी इंसान के जीवन में क्या होगा, कब होगा या उसका जीवन कैसा बीतेगा इसका कथन व्यक्ति की जन्मकुंडली में होता है। जन्मकुंडली के फल-कथन के माध्यम से ज्योतिष मनुष्य के कर्म,
गति और भाग्य के बारे में कई बातें बता सकते हैं। इसमें भाव तथा ग्रहों के विश्लेषण का बहुत महत्व होता है।जन्म कुंडली का विश्लेषण करने से पूर्व किसी भी कुशल ज्योतिषी को पहले कुंडली की कुछ बातो का अध्ययन करना चाहिए. जैसे ग्रह का पूरा अध्ययन, भावों का अध्ययन, दशा/अन्तर्दशा, गोचर आदि बातों को देखकर ही फलकथन कहना चाहिए. आज इस लेख के माध्यम से हम कुंडली का अध्ययन कैसे किया जाए सीखने का प्रयास करेगें.
जन्म कुंडली में
सबसे पहले यह देखें कि ग्रह किस भाव में स्थित है और किन भावों का स्वामी है.
ग्रह के कारकत्व क्या-क्या होते हैं.
ग्रहों का नैसर्गिक रुप से शुभ व अशुभ होना देखेगें.
ग्रह का बलाबल देखेगें.
ग्रह की महादशा व अन्तर्दशा देखेगें कि कब आ रही है.
जन्म कालीन ग्रह पर गोचर के ग्रहों का प्रभाव.
ग्रह पर अन्य किन ग्रहों की दृष्टियाँ प्रभाव डाल रही हैं.
ग्रह जिस राशि में स्थित है उस राशि स्वामी की जन्म कुण्डली में स्थिति देखेगें और उसका बल भी देखेगें.
ग्रह की जन्म कुंडली में स्थिति के बाद जन्म कुंडली के साथ अन्य कुछ और कुंडलियों का अवलोकन किया जाएगा, जो निम्न हैं.
जन्म कुंडली के साथ चंद्र कुंडली का अध्ययन किया जाना चाहिए.
भाव चलित कुंडली को देखें कि वहाँ ग्रहों की क्या स्थिति बन रही है.
जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों के बलों का आंकलन व योगों को नवांश कुंडली में देखा जाना चाहिए.
जिस भाव से संबंधित फल चाहिए होते हैं उससे संबंधित वर्ग कुंडलियों का अध्ययन किया जाना चाहिए. जैसे व्यवसाय के लिए दशमांश कुंडली और संतान प्राप्ति के लिए सप्ताँश कुंडली. ऎसे ही अन्य कुंडलियों का अध्ययन किया जाना चाहिए.
वर्ष कुंडली का अध्ययन करना चाहिए जिस वर्ष में घटना की संभावना बनती हो.
ग्रहों का गोचर जन्म से व चंद्र लग्न से करना चाहिए.
अंत में कुछ बातें जो कि महत्वपूर्ण हैं उन्हें एक कुशल ज्योतिषी अथवा कुंडली का विश्लेषण करने वाले को अवश्य ही अपने मन-मस्तिष्क में बिठाकर चलना चाहिए.
जन्म कुंडली में स्थित सभी ग्रहो की अंशात्मक युति देखनी चाहिए और भावों की अंशात्मक स्थित भी देखनी चाहिए कि क्या है. जैसे कि ग्रह का बल, दृष्टि बल, नक्षत्रों की स्थिति और वर्ष कुंडली में ताजिक दृष्टि आदि देखनी चाहिए.
जिस समय कुंडली विश्लेषण के लिए आती है उस समय की महादशा/अन्तर्दशा/प्रत्यन्तर दशा को अच्छी तरह से जांचा जाना चाहिए.
जिस समय कुंडली का अवलोकन किया जाए उस समय के गोचर के ग्रहों की स्थिति का आंकलन किया जाना चाहिए.
आइए अब भावों के विश्लेषण में महत्वपूर्ण तथ्यों की बात करें. जब भी किसी कुंडली को देखना हो तब उपरोक्त बातों के साथ भावों का भी अपना बहुत महत्व होता है. आइए उन्हें जाने कि वह कौन सी बाते हैं जो भावों के सन्दर्भ में उपयोगी मानी जाती है.
जिस भाव के फल चाहिए उसे देखें कि वह क्या दिखाता है.
उस भाव में कौन से ग्रह स्थित हैं.
भाव और उसमें बैठे ग्रह पर पड़ने वाली दृष्टियाँ देखें कि कौन सी है.
भाव के स्वामी की स्थिति लग्न से कौन से भाव में है अर्थात शुभ भाव में है या अशुभ भाव में है, इसे देखें.
जिस भाव की विवेचना करनी है उसका स्वामी कहाँ है, कौन सी राशि व भाव में गया है, यह देखें.
भाव स्वामी पर पड़ने वाली दृष्टियाँ देखें कि कौन सी शुभ तो कौन सी अशुभ है.
भाव स्वामी की युति अन्य किन ग्रहों से है, यह देखें और जिनसे युति है वह शुभ हैं या अशुभ हैं, इस पर भी ध्यान दें.
भाव तथा भाव स्वामी के कारकत्वों का निरीक्षण करें.
भाव का स्वामी किस राशि में है, उच्च में है, नीच में है या मित्र भाव में स्थित है, यह देखें.
भाव का स्वामी अस्त या गृह युद्ध में हारा हुआ तो नहीं है या अन्य किन्हीं कारणों से निर्बली अवस्था में तो स्थित नहीं है, इन सब बातों को देखें.
भाव, भावेश तथा भाव के कारक तीनों का अध्ययन भली - भाँति करना चाहिए. इससे संबंधित भाव के प्रभाव को समझने में सुविधा होती है.
उपरोक्त बातों के साथ हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि किसी भी कुंडली का सामान्य रुप से अध्ययन करने के लिए लग्न, लग्नेश, राशिश, इन पर पड़ने वाली दृष्टियाँ और अन्य ग्रहो के साथ होने वाली युतियों पर ध्यान देना चाहिए. इसके बाद नवम भाव व नवमेश को देखना चाहिए कि उसकी कुंडली में क्या स्थिति है क्योकि यही से व्यक्ति के भाग्य का निर्धारण होता है. लग्न के साथ चंद्रमा से भी नवम भाव व नवमेश का अध्ययन किया जाना चाहिए. इससे कुंडली के बल का पता चलता है कि कितनी बली है. जन्म कुंडली में बनने वाले योगो का बल नवाँश कुंडली में भी देखा जाना चाहिए. नवाँश कुंडली के लग्न तथा लग्नेश का बल भी आंकना जरुरी है.ओर जो चल रहा है वह केवल दशा और अन्तर्दशाओं का परिणाम है। इसके ज्ञान के लिए आपको लग्न के ज्ञान की आवश्यकता है, इसके अतिरिक्त आप जीवन मे चल रही घटना के लिए दशानाथ और अन्तर्दशानाथ को उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। पाराशर ऋषि ने कभी भी प्रत्यंतर को लेकर विशिष्ट व्याख्याएं नहीं दी हैं। वे प्रत्यन्तरनाथ को घटना के समय-काल का निर्धारण करने वाला मानते हैं।
मैंने बहुत सारे ज्योतिषियों को घटना के कारण जन्मपत्रिका मेें ढूंढते हुए देखा है जबकि आने वाली घटना की सूचना महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ ही दे देते हैं, षड्बल एवं षोड्शवर्ग घटना की तीव्रता का ज्ञान करने के उपकरण मात्र हैं, घटना अवश्य घटेगी। यह आप पर निर्भर है कि आप घटना के घटित होने से पूर्व पापकर्मो के क्षय के लिए उपाय कर पाते हैं या नहीं। दूसरे शब्दों में घटना की तीव्रता को आप नियंत्रित कर सकते हैं। आपको सबसे पहले लग्न का ज्ञान होना चाहिए और उसके बाद तत्कालीन अन्तर्दशा का।
अन्तर्दशा का महत्व : अन्तर्दशानाथ, महादशानाथ से बलवान होते हैं और व्यक्ति के वर्तमान समय का आकलन अन्तर्दशानाथ के आधार पर ही किया जा सकता है। मान लीजिए, षष्ठेश की दशा चल रही है तो उस समय जीवन की मुख्य धुरी रोग, रिपु, ऋण हो जाएंगे भले ही जन्मपत्रिका में कितने ही शुभ या राजयोग हों। वर्तमान परिस्थित के सही आकलन के लिए एक अन्तर्दशा पीछे जाना बहुत जरूरी है। जिस प्रकार हम बीमार होते ही तुरंत डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं, उसी प्रकार परेशानी आते ही कोई ज्योतिषी के पास नहीं जाता है। कई बार ऎसा होता है कि वर्तमान अन्तर्दशा तो शुभ है परंतु उससे ठीक पहले की अन्तर्दशा कठिन थी। कठिन परिस्थितियों को झेलते हुए जब तक व्यक्ति ज्योतिषी के पास जाता है, अन्तर्दशा बदल चुकी होती है परंतु अच्छे परिणाम ने अभी आहट नहीं दी है। मान लीजिए वर्तमान में कठिन अन्तर्दशा चल रही है और परिणामों की तीव्रता बहुत अधिक है। उस अन्तर्दशा से ठीक पहले चतुर्थेश या भाग्येश की दशा थी। इन दशाओं में उसने जमीन या मकान खरीदा होगा। यदि उसके चतुर्थेश या चतुर्थ भाव पीडत हैं तो परिणामों की तीव्रता का कारण वास्तु दोष भी एक कारण हो सकता है। अत: अन्तर्दशा का पूरा अध्ययन परिणामों के पूर्ण विश्लेषण में बहुत अधिक सहायक हो सकता है।कारकत्व : अन्तर्दशानाथ से मुख्य विषय का ज्ञान करने के पश्चात् हमें जो ग्रह अन्तर्दशानाथ हैं उनका कारकत्व और वह जिस भाव में स्थित हैं, उस भाव के कारकत्व का विश्लेषण करना है। सदा ग्रह और भाव के कारकत्वों को समझे वर्गकुण्डलियों में तभी जाएं जब मूल जन्मपत्रिका की आत्मा को आप पहले समझ लीजिए। ग्रह एवं भावों के कारकत्वों के विस्तृत अध्ययन के लिए कालिदास रचित उत्तर कालामृत सर्वश्रेष्ठ है। अष्टमेश की दशा में हम मृत्यु, मृत्युतुल्य कष्ट, कठिनाइयों को ही ढूंढ़ते हैं। अनुसंधान का भाव भी अष्टम भाव ही है। महान अनुसंधान करने वाले कई महापुरूषों ने अपना सबसे गहन अध्ययन अष्टमेश की दशा में ही किया। ऎसी कुण्डलियों में प्राय: अष्टम का संबंध लग्न से रहता है। यश और अपमान हम दशम भाव से देखते हैं परंतु इसका संबंध चतुर्थ भाव से भी है। जनता द्वारा दिया जाना वाला यश चतुर्थ भाव से देखा जाता है। नेता, अभिनेता की कुण्डली में इसे जनता द्वारा दिए जाने वाले प्यार और सम्मान के रूप में देखा जा सकता है परंतु आम व्यक्ति के लिए इसे किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा उसके लिए बनाए गए रूप में देखा जाना चाहिए। मान लीजिए किसी का कोई कोर्ट केस चल रहा है या कार्यस्थल पर कोई झग़डा है, जिसका निपटारा होना है। ऎसे में यदि चतुर्थेश की दशा है तो चतुर्थ भाव और चतुर्थेश की स्थिति के आधार पर निर्णय दिया जा सकता है। यदि चतुर्थेश बलवान है और चतुर्थ भाव पर शुभ प्रभाव है तो उस दशा में व्यक्ति के खिलाफ केस नहीं बनेगा और चीजें उसके पक्ष में होंगी। यदि ग्रहों के कारकत्व की बात करें तो केतु की दशा में अचानकता बनी रहती है। साथ ही मानसिक बेचैनी भी रहती है। भले ही केतु शुभ हों और अच्छे परिणाम भी दें परंतु अपने नैसर्गिक कारकत्व से जु़डे परिणाम भी देंगे। ग्रहों के कारकत्व का गहराई से अध्ययन भविष्यकथन में सटीक परिणाम देने में सहायक होता है।योगकारक-अयोगकारक का निर्णय : सही परिणाम तक पहुंचने के लिए आवश्यक है कि यह निर्णय लिया जाए कि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ योगकारक हैं या अयोगकारक। प्रत्यन्तर, सूक्ष्म और प्राण दशा से परिणाम लेते समय भी यह सुनिश्चित करना आवश्यक होता है। योगकारक-अयोगकारक का निर्णय करने का सूत्र बहुत ही विस्तृत रूप से लघुपाराशरी में समझाया गया है। लघु पाराशरी में इस विषय में कुछ महत्वपूर्ण सूत्र दिए गए हैं :
1. त्रिकोणेश सदा शुभ होगा भले ही वह नैसर्गिक रूप से अशुभ ग्रह हो।
2. केन्द्र में प़डने वाली राशि सम होती है भले ही वह नैसर्गिक रूप से शुभ हो या अशुभ।
3. द्वितीयेश व द्वादशेश की दूसरी राशि जिस स्थान में प़डती है, उसी स्थान के अनुसार अपना शुभ व अशुभ फल देंगे।
इन नियमों को उदाहरण से समझते हैं। कर्क लग्न के लिए पंचमेश हैं मंगल, अत: मंगल अति शुभ होंगेे, भले ही वे नैसर्गिक रूप से अशुभ ग्रह हैं। मंगल की दूसरी राशि मेष दशम भाव में आ रही है। नियमानुसार केन्द्र में प़डने वाली राशि सम हो जाएगी अत: दोनों राशियों के आधार पर मंगल की स्थिति इस प्रकार होगी :
अतिशुभ + सम = अति शुभ (त्रिकोणेश (केन्द्रेश होने अथवा होने के कारण) के कारण) योगकारक कर्क लग्न में ही दूसरे त्रिकोणेश बृहस्पति की दूसरी राशि छठे भाव में है अत: त्रिकोणेश होने से शुभ परंतु छठे भाव के स्वामी होने के कारण अशुभ। यहां एक तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है बृहस्पति नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह हैं अत: स्थिति इस प्रकार होगी :
अतिशुभ + अशुभ (नैसर्गिक शुभ) = सामान्य शुभ (त्रिकोणेश होने के कारण) कन्या लग्न में शनि पंचमेश होने के कारण शुभ हैं परंतु षष्ठेश होने के कारण अशुभ और साथ ही नैसर्गिक अशुभ होने के कारण स्थिति इस प्रकार होगी :
अतिशुभ + अशुभ + नैसर्गिक अशुभ = अशुभ इस प्रकार हर लग्न के लिए योगकारक-अयोगकारक का निर्णय करने से फलकथन में सहायता मिलती है। इन नियमों में कुछ अपवाद भी हैं जिन्हें ध्यान में रखना अति आवश्यक है। "भावार्थ रत्नाकर" नामक पुस्तक इस विषयां में बहुत अच्छी जानकारी देती है।
ऎसे बहुत से महत्वपूर्ण नियम भावार्थ रत्नाकर में उद्धत हैं।
महादशानाथ और अन्र्तदशानाथ में संबंध : इस अत्यंत महत्वपूर्ण विवेचन के लिए एक बार पुन: लघुपाराशरी की शरण में जाना होगा। लघुपाराशरी के अनुसार किसी भी दशा में पूर्णफल तभी मिलेंगे जब महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ समानधर्मी और संबंधी हों।
फल से तात्पर्य शुभ और अशुभ दोनों हैं। महत्वपूर्ण नियम यह है कि किसी भी ग्रह की महादशा में पहली अन्तर्दशा उसी ग्रह की होगी परंतु पूर्णफल देने में सक्षम नहीं होगी फिर भले ही वह योगकारक हो, अयोगकारक या मारक। फलकथन में इन बारीकियों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। मान लीजिए, किसी कुण्डली में शुक्र योगकारक हैं और उनकी महादशा शुरू होने वाली है। शुक्र महादशा में पहली अन्तर्दशा शुक्र की ही होगी और लगभग तीन वर्ष की होगी। ऎसी स्थिति में इस अवधि में बहुत अच्छे परिणाम कहना, कथन को गलत सिद्ध कर सकता है।
समानधर्मी से तात्पर्य है स्वाभाविक फल समान होना अर्थात् महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ दोनों ही योगकारक हों, अयोगकारक हों या मारक हों। यदि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ सहधर्मी होने के साथ-साथ संबंधी भी हुए तो दशा का पूरा फल प्राप्त होगा। संबंधी से तात्पर्य है किसी भी प्रकार का चतुर्विध संबंध। यदि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ सहधर्मी और संबंधी दोनों हुए तो श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त होंगे। परिणाम अच्छे या बुरे दोनों हो सकते हैं। वृहत पाराशर होरा शास्त्र में सभी ग्रहों की महादशा में सभी अन्तर्दशाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस विवरण से न सिर्फ कुछ विशेष परिणाम का ज्ञान होता है बल्कि बहुत से अचूक उपायों का भी ज्ञान होता है। स्पष्ट है कि शुभ महादशा में योगकारक अन्तर्दशाएं अति शुभ परिणाम देंगी और अयोगकारक एवं मारक दशाएं अपने पूरे परिणाम नहीं दे पाएंगी इसलिए शुभ महादशा का समय अच्छा बीतेगा।
अन्तर्दशानाथ की स्थिति का विवेचन : दशा में आने वाले परिणाम दशानाथ की स्थिति पर आधारित होंगे। दशानाथ उच्चा, नीच, मित्र, शत्रु आदि जिस भी राशि में हैं परिणाम की विवेचना उसी आधार पर की जाती है। दशानाथ का षड्बल बहुत महत्वपूर्ण संकेत देता है। षड्बल में विभिन्न मापदण्डों पर ग्रह का बल तौला जाता है। यदि दशानाथ का षड्बल औसत से अच्छा है अर्थात् 1 रूपाबल या उससे अधिक तो दशानाथ फल देने में सक्षम हैं। पुन: स्पष्ट करना आवश्यक है कि फल शुभ या अशुभ दोनों हो सकते हैं। यदि दशानाथ का ष्ड्बल कम है तो वह पूर्ण परिणाम देने में सक्षम नहीं है। मान लीजिए, दशानाथ भाग्येश हैं परंतु षड्बल कम है तो शुभ परिणाम कहीं ना कहीं कम हो जाएंगे। षड्बल से विवेचना करते समय ग्रह का नैसर्गिक कारकत्व भी अवश्य देखना चाहिए। जिसकी कुण्डली में शुक्र का षड्बल अच्छा होता है, उसे सौन्दर्य की परख बहुत अच्छी होती है। अगर उस कुण्डली के लिए शुक्र षष्ठेश हैं तो शुक्र षष्ठेश के ही परिणाम देंगे परंतु उनका यह नैसर्गिक गुण भी अवश्य विद्यमान होगा। ग्रहों के नैसर्गिक गुणों एवं कारकत्वों को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। लघुपाराशरी के एक अन्य नियम की चर्चा यहां करना आवश्यक है। लघुपाराशरी के अनुसार एक ही ग्रह कारक और मारक दोनों हो सकता है। दूसरे भाव का स्वामी या दूसरे भाव में बैठा ग्रह धनदायक है तो मारक भी है। जब दशा में योगकारक ग्रह का साथ मिलेगा तो वह ग्रह धन प्रदान करेगा और जब मारक ग्रह का साथ मिलेगा तो वह मारक फल प्रदान करेगा। परन्तु काल परिस्थिति वाली वात भी यहां घ्यान में रखे
षोड्श वर्ग : वैदिक ज्योतिष का सबसे महत्वपूर्ण अंग है षोड्श वर्ग। दशानाथ की पूर्ण शक्ति समझने के लिए नवांश कुण्डली में उसकी स्थिति जरूर देखी जानी चाहिए। यदि ग्रह जन्मकुण्डली में मजबूत है परंतु नवांश कुण्डली में कमजोर है तो उसे कमजोर माना जाना चाहिए परंतु जन्मकुण्डली में नीच का ग्रह यदि नवांश कुण्डली में उच्चा का है तो वह फल देने में सक्षम है। नवांश कुण्डली के पश्चात् उस षोड्श वर्ग कुण्डली का अध्ययन करना चाहिए जिससे संबंधित भाव की दशा चल रही है। षोड्श वर्ग के अध्ययन को लेकर अभी भी बहुत असमंजस है। जो जन्मकुण्डली में नहीं है उसे षोड्श वर्ग में ना ढूंढे। चाहे पाप ग्रह उच्चा का हो और चाहे शुभ ग्रह नीच का, कभी भी अपने मूल संस्कार नहीं भूलते। फलकथन के प्रतिशत में अंतर आ सकता है परंतु पापग्रह पाप फल देने से नहीं चूकते और शुभ ग्रह शुभ फल देने से नहीं चूकते। मान लीजिए, जन्मपत्रिका का पंचम भाव पीडत है और संतान प्राप्त में दिक्कतें आ रही हैं तो जन्मपत्रिका के पंचमेश की स्थिति सप्तमांश कुण्डली में देखें।
यदि सप्तमांश कुण्डली में वह ग्रह सुदृढ़ स्थिति प्राप्त कर रहा है या शुभ ग्रहों से दृष्ट है तो इसका तात्पर्य है कि संतान प्राप्त की संभावनाएं हैं। संतान कब होगी इसके लिए पुन: जन्मपत्रिका का सहारा ही लेना होगा। इस तरह फलकथन की तकनीक को सरल रखने का प्रयास करना चाहिए। जब कोई ग्रह कई षोड्श वर्गो में उच्च या स्वराशि का हो तो वह ग्रह अति विशेष परिणाम देने में सक्षम हो जाता है। अत: जिस ग्रह की दशा चल रही है उसे षोड्श वर्ग सारिणी में देखें। यदि ग्रह 6 से अधिक वर्गो में उच्च या स्वराशि होता है तो फलकथन में इस तथ्य को भी शामिल करना चाहिए। गोचर : दशा जिस घटना का संकेत देती है, गोचर से उसकी पुष्टि की जा सकती है। साथ ही घटना की तीव्रता का आकलन भी गोचर के माध्यम से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए जब सप्तमेश की दशा चल रही हो उसी समय गोचरवश सप्तम भाव पर बृहस्पति और शनि का प्रभाव विवाह की संभावनाओं को प्रबल कर देता है। जिस समय मारकेश की दशा चल रही है उस समय लग्न पर बृहस्पति की अमृत दृष्टि जीवन रक्षा का संकेत देती है। यह अत्यंत आवश्यक है कि सिर्फ गोेचर के आधार पर परिणाम लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए। इससे गलती की संभावना बढ़ सकती है।विशेष नियमों का ज्ञान : कुछ विशेष नियमों का ज्ञान फल की सटीकता को कई गुणा बढ़ा सकता है। कालिदास जी की उत्तर कालामृत में ऎसे ही कुछ विशेष नियमों का उल्लेख है। उदाहरण के लिए शनि में शुक्र और शुक्र में शनि की दशा का विशेष नियम दिया है लेख काफी लंबा हो गया वाकी फिर आगे आचार्य राजेशआप अपनी कुंडली दिखाकर अपनी समस्या का समाधान चाहते हैं या कुंडली वनवाना चाहते हैं या वर्षफल वनवाना चाहते हैं या उच्च quality के रतन लैवटैस्ट मंगवाना चाहते हैं तो हम से हमारे फोन नम्वरो पर वात कर सकते हैं 07597718725-09414481324आप नोटअसली प्रामाणिक और रत्न प्रयोगशालाओं द्वारा प्रमाणित रत्न (सर्टिफिकेट सहित)सही ्wolesale कीमत खरीदने के लिए भी संपर्क कर सकते हैंहमारा रत्नों का wolesale का कारोबार है
रविवार, 20 मई 2018
: क्यो जरूरी है ज्योतिष की जानकारी ?
: क्योजरूरी है ज्योतिष की जानकारी ?
कहते हैं कि जानकारी ही बचाव है। हम बहुत-सा ऐसा ज्ञान प्राप्त भी करते रहते हैं जिसकी जीवन में कोई उपयोगिता नहीं रहती है। व्यर्थ ही समय और पैसा कई अन्य बातों में खर्च करते रहते हैं। हम ऐसी भी बातें सुनते या देखते रहते हैं जिससे हमारे जीवन में नकारात्मकता का विकास होता है। किताबी और प्रायोगिक ज्ञान को आप थ्योरी और प्रैक्टिकल नॉलेज समझे। जीवन में दोनों ही तरह का ज्ञान जरूरी है। किसी भी विषय या क्षेत्र में कार्य करने से पहले उसकी जानकारी हासिल करना जरूरी है, फिर उसके व्यावहारिक या प्रोयोगिक पक्ष को समझना भी जरूरी है। यदि आप जीवन में कोई-सा भी कार्य करने जा रहे हैं तो पहले उसकी अच्छे से जानकारी एकत्रित कर लें। आप अपने जीवन को सुंदर और सुखद बनाना चाहते हैं तो यह समझना जरूरी है कि हमारे लिए कौन-सा ज्ञान महत्वपूर्ण है और कौन-सा व्यर्थ। हालांकि बहुत से लोगों को यह जानकारी होगी ही। यदि है तो अपनी इस जानकारी को अपडेट करते रहें।ज्योतिष सीखना और ज्योतिष से काम करना कोई बुरी बात नही है.लेकिन ज्योतिष पर अंधविश्वास करके चलना और खुद के द्वारा अनुमान नही लगापाना बुरी बात है
.कोई भी कारण एक साथ नही बनता है,कारण समय से शुरु हो जाता है और समय आने पर कारण अपनी भूमिका अदा कर जाता है,जब कारण अपनी भूमिका अच्छे या बुरे प्रभाव मे अदा कर गया उसके बाद कारण को या कारक को या कारकत्व को दोष देना बेकार की बात ही मानी जायेगी। जन्म समय के ग्रह और गोचर के ग्रह आपसी सम्बन्ध से कारण पैदा करते है जो भी कारण पैदा होता है वह ग्रह राशि और भाव के अनुसार होता है,भाव हमारे अन्दर ही प्रकट होते है राशि का सीधा सा सिद्धान्त है कि वह एक क्षेत्र जिसके बारे मे भाव पैदा होगा उस भाव का फ़ल ग्रह के अनुसार मिलना जरूरी है। अच्छे भाव से अच्छे क्षेत्र से अगर ग्रह कारक को बल देगा तो कारकत्व अच्छा होगा और कार्य फ़ल की प्राप्ति भी अच्छी होगी लेकिन वही ग्रह बुरे भाव से बुरे क्षेत्र से बुरा फ़ल दे रहा होगा तो कारकत्व भी खराब होगा और फ़ल भी खराब मिलेगा।घटना का सही आकलन करना
घटना का सही आकलन करने के लिये ग्रह की चाल देखी जाती है कब ग्रह किस भाव से और राशि से घटना के लिये सामने आ रहा है उस समय जिस कारक के साथ घटना घटनी है उस कारक के पास कोई बल है कि नही अगर बल है तो ग्रह अपनी शक्ति से प्रभाव तो देगा लेकिन बल उसे कम या अधिक कर देगा। बुखार आने के लिये कारण पहले से शुरु हो जायेगा,इन्फ़ेक्सन भाव है और क्षेत्र उस भाव से जुडा हुआ है,जब इन्फ़ेक्सन वाला कारण बनेगा तो अन्दाज पहले से ही होने लगेगा,कही ऐसे क्षेत्र मे जाना पडेगा जहां इन्फ़ेक्सन वाले कारण मौजूद है,उस क्षेत्र मे जाकर उन्ही कारको को प्रयोग मे लाना पडेगा जिससे इन्फ़ेक्सन फ़ैले और जैसे ही इन्फ़ेक्सन शरीर मे घुसा बुखार का आना शुरु हो गया। अगर शरीर के अन्दर इन्फ़ेक्सन को रोकने के लिये जरूरी तत्व मौजूद है तो वह बुखार के कारको को समाप्त कर देंगे थोडा बहुत असर जरूर होगा लेकिन बुखार से बच जायेंगे। इतनी सी बात को समझने के लिये जन्म कुंडली में रोग के कारक ग्रह को देखेंगे,वह खून के कारक ग्रह मंगल के साथ कब मिल रहा है,अगर उस क्षेत्र मे राहु जो इन्फ़ेक्सन का कारक है अगर रोग के कारक ग्रह को बल दे रहा है तो खून का कारक ग्रह मंगल इन्फ़ेक्टेड होगा और रोग के होने के आसार समझ मे आजायेंगे,लेकिन उसी जगह पर अगर जीवन रक्षक ग्रह या सहायता देने वाले ग्रहों में गुरु या बुध या लगन पंचम नवम भाव का ग्रह मजबूती से अपनी सहायता दे रहा है वह किसी प्रकार के अन्य बन्धन मे नही है तो बुखार के कारण शरीर मे खून के अन्दर प्रवेश करेंगे उसी समय वह ग्रह का बल उन इन्फ़ेक्सन को समाप्त करने के लिये अपनी युति प्रदान करने लगेंगे,अगर कोई जीवन रक्षक ग्रह मंगल को बल दे रहा है तो बुखार के आते ही मंगल जो खून का कारक है वह डाक्टर के रूप मे उसी राहु को जो इन्फ़ेक्सन का कारक भी है और सही बल मिलने से दवाई का रूप भी ले लेगा तो समय पर सहायता मिल जायेगी और रोग से बचाव हो जायेगा। अगर नवम पंचम या लगन का ग्रह मजबूत नही है और रोग का कारक ग्रह अपने बल को कम भी नही कर सकता है और हमे पता है कि रोग का कारक ग्रह जरूर असर करेगा तो हम अपने अनुसार लगन पंचम या नवम के लिये बल देने वाले प्रयोग करना शुरु कर देंगे,यह बल भौतिक रूप मे इनके मालिको के लिये रत्नो का प्रयोग अथवा ग्रह से सम्बन्धित खाद्य पदार्थ के रूप मे अथवा वनस्पति के रूप मे होगी अथवा शरीर की सबसे बडी शक्ति ह्रदय जिव्हा और तालू के साथ होंठ तथा गले के एक विशेष बल के साथ प्रयोग करने पर मंत्र शक्ति का प्रयोग लेने लगेंगे,और इन ग्रहों का असर बढने लगेगा और कारक जो है वह अपना बुरा असर प्रदान नही कर पायेगा हम बच जायेंगे।पहले मानसिक गति बनती है
एक व्यक्ति का मन व्यथित है कि वह किसी भी काम मे सफ़ल नही हो पा रहा है वह जिस भी काम मे हाथ डालता है वह काम बेकार हो जाता है,उसकी रोजाना की जिन्दगी एक प्रकार से अस्त व्यस्त सी है और कभी कभी उसके मन मे आता है कि आत्म हत्या कर लेनी चाहिये। मन महिने में हर व्यक्ति का तीस घंटे के लिये व्यथित होता है वह अगर जाग्रत अवस्था मे है तो वह कारक के रूप मे और नींद की अवस्था मे है तो स्वप्न के रूप में व्यथा जरूर देता है। यह चन्द्रमा के द्वारा होता है चन्द्रमा जन्म के राहु के साथ गोचर के राहु के साथ और राहु जन्म के चन्द्रमा के साथ और गोचर के चन्द्रमा के जब जब अपनी युति को प्रदान करेगा तो मन मे व्यथा प्राप्त होगी,लेकिन गोचर का समय चन्द्रमा के लिये सवा दो घंटे में सत्रह मिनट के लिये ही होगा जबकि जन्म के चन्द्रमा के साथ राहु का गोचर पूरे चौवन महिने के लिये अपना असर देगा और इस साढे चार साल के अन्तराल मे जातक लगातार मानसिक व्यथा से जूझता रहेगा,इस व्यथा मे वह जो भी काम करेगा उसके लिये एक रास्ता नही दे पायेंगे हर काम मे दस अडचने उसके अपने मन के अनुसार मिलनी शुरु हो जायेंगी वह अपने विश्वास को अटल नही कर पायेगा। इस प्रकार से अगर एक साधारण व्यक्ति को कहा जाये कि वह ध्यान समाधि से अपने मन के ऊपर काबू रखे तो बेकार की बात है जब किसी काम खराब हो रहा हो तो वह काम की उलझन घर और बाहर की आफ़ते और खुद के जीवन मे अनियमिता के कारण कुछ भी करने मे असमर्थ सा हो जायेगा। इस समय मे देखा जाता है कि लोग अपने को चिन्ताओ के कारण नशे आदि मे ले जाते है,कुछ लोग अपने को भूल ही जाते है कि उनके पास कौन सी शक्ति है जो उन्हे उनके कारणो से बचा सकती है,शरीर मे कैमिकल बढने लगते है तरह तरह की बीमारी जैसे डायबटीज मोटापा झल्लाहट आदि जैसे कारण पैदा हो जाते है। इस मानसिक गति को सम्भालने के लिये अगर राहु का रूप तकनीकी रूप से मंगल के साथ जोड दिया जाये तो वह बडे प्रेम से दिये जाने वाले गलत प्रभाव को अच्छे प्रभाव मे बदलना शुरु कर देगा। मंगल के चार स्थान ही माने जाते है पहला धर्म स्थान मे दूसरा पुलिस थाने मे तीसरा अस्पताल मे और चौथा मानसिक बल में,इसके लिये जातक धर्म स्थान मे जाने लगे,उसके ऊपर जो आफ़ते आ रही है उनके लिये पुलिस की सहायता ले,अन्यथा अस्पताल मे जाकर मानसिक इलाज करवाये और भोजन मे बदलाव करे और मानसिक बल को बढाये,दो बाते हर आदमी आराम से कर सकता है,धर्म स्थान पर जाना और मानसिक बल को बढाकर समस्या का समाधान करना,धर्म स्थान मे जाना भी और धर्म से सम्बन्धित जानकारी अधिक लगाव करना केवल उन्ही बातो के लिये जरूरी है जो जितने समय धर्म स्थान मे रहे उतने समय के लिये मन धर्म मय हो जाता है,और जब मन के अन्दर रीफ़्रेस जैसी बाते पैदा हो जाती है तो मन के अन्दर बल बढना शुरु हो जाता है तरीके सामने आने लगते है और काम बनने लगते है,उसी तरह से मन की मजबूती के लिये या तो राहु के जाप करना,कारण राहु जो भी दिक्कत देता है वह भ्रम के कारण देता है जातक भ्रम के अन्दर फ़ंस जाता है कि वह अगर इस काम को करता है तो वह नही बना तो मेहनत और धन दोनो बरबाद हो जायेंगे या जो भी रिस्ता किया जा रहा है उसके अन्दर तो यह कमी है अथवा जो भी कारण मन के अन्दर लाया जा रहा है वह कारण असत्य है या अमुक ने ऐसा किया था तो ऐसा हुआ था अमुक ने ऐसा नही किया तो ऐसा नही हुआ था,अथवा अमुक ने अमुक तरह का कार्य किया था तो ऐसा हुआ था और अमुक ने अमुक के साथ ऐसा नही किया था तो ऐसा नही हुआ था। इस प्रकार के कारणो से लोगो की आस्था एक विशेष स्थान विशेष व्यक्ति की तरफ़ चली जाती है और इसके फ़ल मे यह प्राप्त होता है कि जब अमुक के साथ अमुक समस्या थी तो उस समय मे और उसके सामने के समय मे बहुत अन्तर है,अमुक का व्यवहार और सामने वाला व्यवहार भी अलग है,इस प्रकार से या तो जो भी बात सामने लाई जा रही है वह असत्य हो जायेगी या और अधिक अन्धकार मे जाना हो जायेगा। जब देखे कि भ्रम बहुत अधिक बढ गये है और किसी प्रकार से भ्रम दूर नही हो रहे है तो आराम से जब भ्रम अधिक परेशान करते है वह समय शाम का होता है,सूर्यास्त के बाद और रात के पहले प्रहर में कारण सूर्यास्त के बाद शरीर आराम की मुद्रा मे होता है और रात के पहले प्रहर के बाद सोने का समय शुरु होता है उस समय मे अगर राहु के मन्त्र का जाप शुरु कर दिया जाये और एक काल की अवधि मे होंठ जीभ तालू गले को मंत्र के अनुसार हिलाया जाये तो शरीर मे प्रवाहित रक्त के अन्दर के विषैले तत्व फ़िल्टर होने लगते है इस कारण से सिर के पीछे स्थापित मेडुला आबलम्ब गेटा के अन्दर विचित्र तरह की शक्ति का अर्जन होने लगता है शरीर एक प्रकार से उत्साह मे आजाता है। अगर खुद नही किया जा सके तो किसी विद्वान की संगति का लाभ लिया जाये वह लाभ केवल संकल्प लिया जा सकता है,कारण जो मानसिक व्यथा संकल्प के समय मे होती है वह व्यथा संकल्प के साथ उस विद्वान के पास जाती है अगर वह विद्वान अपनी गति से ह्र्दय के अन्दर सहानुभूति या दया के रूप मे मंत्र का जाप करता है या करवाता है तो आराम मिलने मे कोई सन्देह नही होता है। जब मंत्र का जाप करवाया जाता है या किया जाता है तो शरीर मे तनाव की मात्रा कम होती है और सबसे पहला फ़ल नींद के रूप मे मिलता है,जैसे ही नींद पूरी होने लगती है शरीर से चिन्ताओ का कारण समाप्त होने लगता है और कार्य सफ़ल होने लगते है,यही कारण डाक्टरो ने अपने अनुसार मानसिक इलाज के लिये अपनाया है किसी भी डाक्टर के पास चले जाइये वह सबसे पहले नींद की दवा को देता है,नींद की दवा के साथ मानसिक बल बढाने के लिये भूख को खोलने के लिये दवा देता है,लेकिन यह कारण सामयिक तो बनता है जैसे ही शरीर से उस दवा के अनुसार साल्ट कम होते है फ़िर से वही कारण पैदा होने लगते है या तो उन्ही साल्ट्स के लिये आदी होना पडता है या फ़िर उन साल्ट को कम करने के लिये दूसरे साल्ट्स को प्रयोग मे लाना पडता है।
मानसिक व्यथा के शुरु होने से पहले ही यानी अठारह महिने पहले ही कारण बनने लगते है,अगर ज्योतिष की जानकारी है या ज्योतिषी से सामयिक परामर्श लिया जाता है तो कारण बनते ही उनका इलाज शुरु हो जाता है और समस्या के आने से पहले ही इलाज अगर हो जाता है तो समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाती है,जैसे किसी से कहासुनी हो गयी और पता है कि सामने वाला किसी भी तरह से बदला ले सकता है या कहासुनी के बदले शरीर को हानि दे सकता है समय भी विपरीत है तो पहले से ही या तो सामने वाले से क्षमा याचना करना सही होता है फ़िर भी नही मानता है तो कानूनी सहायता के लिये या अदालती मामले के लिये पहले से ही अगर जान माल की सुरक्षा की गुहार की गयी है,या किसी केश मे फ़ंसने से पहले ही अग्रिम जमानत की कार्यवाही कर ली गयी है तो बचाव हो सकता है।
ज्योतिष भी राहु है
कहा जाता है कि लोहा हमेशा लोहे को काटता है उसी प्रकार से जो भी कारण जीवन मे पैदा होते है वह राहु के द्वारा ही पैदा होते है,राहु अगर तकनीकी पहलू मंगल की सहायता से दे दिया जाता है वह भी केन्द्र त्रिकोण मे तो राहु मंगल बजाय खराब असर देने के और अधिक बढोत्तरी देने लग जायेंगे और त्रिक भाव या पणफ़र भाव में राहु मंगल की युति को ले लिया गया तो समस्या बजाय घटने के और भी बढने लगेगी। राहु की सीमा नही है कितना कष्ट दे सकता है या कितनी ऊंचाई पर ले जा सकता है,जैसे हाथी का भरोसा नही है कि वह कब बल पूर्वक अच्छे काम करता है और कब बिगडने पर गली की गली साफ़ करने के लिये अपनी शक्ति को प्रयोग मे ला सकता है। राहु शुक्र की युति मिलने का समय आता है व्यक्ति के अन्दर प्रेम रोग का भूत सवार हो जाता है उसे अपनी दुनिया समझ मे ही नही आती है,अगर उसी युति को मंगल की सहायता से मिला लिया जाये तो वह भूत बजाय बिगाडने के ऊंची ऊंची पोजीसन भी दिलवा सकता है जितना है उससे करोडों गुना बढा भी सकता है। राहु गुरु की युति आती है आम आदमी भी अपने को शहंशाह समझने लगता है उसे लगता है कि उसके सामने उसकी बुद्धि के जैसा कोई नही है वह तर्क वितर्क से अपने प्रभाव देना शुरु कर देता है उसे एक गंदगी मे भी सोना नजर आने लगता है वह धर्म और शिक्षा के अलावा रिस्ते आदि मे अपनी सीमा को तादात से अधिक बढाने लगता है अगर साथ मे मंगल को लिया गया है तो वह इन्ही कारणो मे तकनीकी कारण देखने के बाद उस क्षेत्र मे अपने को नाम और यश के रास्ते ले जायेगा और मंगल की युति नही ली है या केवल शुक्र का सहारा लिया है तो धन और वैभव मे तो आगे बढ जायेगा सुरा सुन्दरी की प्राप्ति तो हो जायेगी लेकिन जैसे ही राहु गुरु का असर समाप्त हुआ उसके अपने ही लोग उसे ले डूबेंगे।
ज्योतिष समय की जानकारी देती है
सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त और सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय तक जो भी देश काल और परिस्थिति के अनुसार प्रभाव होते है ज्योतिष जानकारी देती है।कार्य और शरीर की समय सीमा के लिये ज्योतिष लाभदायी है। एक ग्रह के तीन सौ साठ कारण और एक भाव के तीस कारण एक राशि के एक सौ पचास कारण यह सब अगर देश काल और परिस्थिति से समझ मे आजाते है तो व्यक्ति दुख मे भी सुख का कारण निकाल सकता है और सुख मे भी दुख पैदा कर सकता है,बाकी के लिये एक ही बात कही जा सकती है-"खाना पीना सोना दुनिया मे तीन तत्व,एक दिन मर जाओगे धरि छाती पर हत्थ"।
शुक्रवार, 18 मई 2018
ज्योतिष ज्योतिषी और जातक
एस्ट्रोलॉजी एक विज्ञान है यह बात सुप्रीम कोर्ट ने भी कही है। जो लोग ज्योतिष के नाम पर 'भ्रामक' प्रचार कर जनता को मूर्ख बना रहे हैं उन पर रोक लगाई जानी चाहिएआज हमें प्रत्येक चैनलों पर 'भ्रामक' बातें सुनने को मिलती हैं। जैसे शनि ग्रह को ही लें।
एक चैनल पर दिखाए गए प्रोग्राम से प्रेरित होकर यूपी के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी। ऐसी खबर समाचार पत्रों में छपी थी। मित्रोंज्योतिषशास्त्र ज्ञान की एक वृहद प्रणाली है, जिसमें नक्षत्रों और ग्रहों की स्थिति के आधार पर बहुत जटिल गणनाएं एवं उनके मध्य विद्यमान पारस्परिक संबंध तथा मानव-जीवन सहित पृथ्वी पर विभिन्न घटनाओं आदि की विशाल व्याख्याएं अंतर्भूत हैं । परन्तु आज ज्योतिषविषय के साथ यह कैसी खिलवाड़ हो रही है ऎसा लगता है कि कोई इसको देखने वाला या धनी धोरी बचा ही नहीं है पिछले कई वर्षों से हम देखते चले आ रहे हैं कि ज्योतिष विषय विशेषज्ञों की जहाँ देखो वहीं बाढ़ सी आ गई है,आज-कल टीवी पर प्रसारित कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा ज्योतिष को तवज्जो दी जाने लगी है, जिसकी वजह से ज्योतिषी भविष्यवाणी के बारे में जानकरी देते है कोई भी चैनल फ्री में किसी भी कार्यक्रम को पेश नहीं करता। अतः जो लाखों रुपए खर्च कर टीवी पर अपना प्रचार करवाते हैं वे जनता से ही राशि लूटकर चैनल वालों को देते हैं। हमने देखा होगा कि एक लोकप्रिय कलाकार भी लॉकेट व यंत्रो का प्रचार करके उसको खरीदने के लिए लोगों को प्रेरित करते दिखाई देते हे।टी. वी. का सायद ही कोई चैनल होगा जिस पर ज्योतिषी अपनी दुकान चलाते न मिल जायें,कई ज्योतिष एक घंटे में, कई ग्यारह घंटों में तो कई एक सौ एक प्रतिशत काम होने की ग्यारंटी देते हैं। सो ऐसे ही ज्योतिषियों ने ज्योतिष का माखौल उडा़या है जिससे आम जनता का ज्योतिष पर से विश्वास उठ गया है। इस प्राचीनतम विद्या को बदनाम किया है। ऐसे लोगों पर अवश्य ही कार्रवाई होनी चाहिए। और ऐसे भ्रामक विज्ञापनों को समाचार पत्रों को भी नहीं छापना चाहिए। कोई भी ज्योतिष भगवान नहीं होता जो ग्यारंटी दें और वह पूरी हो जाएँ। सिर्फ और सिर्फ 'भ्रामक' प्रचार फैला कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। परन्तु जब इन तथा कथित ज्योतिषियों से कोई पत्रकार या बुद्धिजीबी व्यक्ति कोई बात सैद्दान्तिक या वैज्ञानिक तरीके से पूछने लगता है तो मुझे नहीं लगता कि कोई ज्योतिषी उनको उनकी ही भाषा में समुचित जबाब दे पाता है और जब जब इस प्रकार के मौके आये तब तब आज के ज्योतिषियों ने ज्योतिष को सर्मिन्दा ही किया, मुहतोड़ जबाब देने में अक्षम ही रहे । जिसका मुझे एक मुख्य कारण ये भी लगाकि जितने भी टी. बी. चैनल वाले लोग हैं बो कभी विषय विशेषज्ञों ( ज्योतिष विभागाध्यक्षों या जिन्होंने ज्योतिष विषय में ही महा विद्यालयों में विधिवत शिक्षा पाई हो ) को चैनलों पर नहीं लाये, चाहे कारण कोई भी रहा हो / जब देखो तब आपको अधिकांश ऎसे लोग ही टी. बी. पर ज्योतिष के बारे में चर्चा करते दिखाई देंगे जिन्होंने ज्योतिष की विधिवत शिक्षा नहीं पाई है। जो लोग इनकी ठगी के शिकार हो जाते हैं, बो फिर ज्योतिष के बारे मन चाही टिप्पड़ीं करते हैं, अब तो हद हो गई नाचने कूदने वाले लोग भी हनुमान चालीसा बेच कर लोगों के भाग्य बदलने में सक्षम हो गये हैं/ अरे भाई इन का हनुमान चालीसा इतना प्रभाव शाली है तो खुद दो चार लाकिट पहन कर अरबपति क्यों नहीं बन जाते, सारे दिन किराये के तारीफदारों से क्यों उसकी तारीफ करबाते हवह सेवा या उत्पाद जिस का प्रचार इश्तिहारों के जरिए करना पड़े, कारोबार होता है. आजकल कथा कथितज्योतिषी अरबों रुपया अपने धंधे के प्रचारप्रसार पर फूंक रहे हैं. इस से साफ है कि वे एवज में खरबों रुपए कमा भी रहे हैं. न्यूज चैनल्स पर ज्योतिषी स्क्रीन पर बैठे लोगों को ग्रहनक्षत्रों की चाल और गणना किए विना ही परेशानियों को दूर करने के उपाय बता रहे हैंकोई भी अखबार उठा लें ज्योतिष उस में जरूर मिलेगा. दैनिक राशिफल से ले कर वार्षिक भविष्यफल तक बताया जाता है. कहीं लोग विश्वास करने से इनकार न करने लगें, इस के लिए कुछ अखबार तो 2-3 तरह के भविष्य और राशिफल छाप रहे हैं. एक फलित ज्योतिष तो दूसरा अंक और तीसरा टेरो कार्ड वाला यानी कोई न कोई तो आप की परेशानियों के नजदीक होगा ही. ये भविष्यफल सट्टे के नंबर के सरीखे होते हैं. इन में से जो आप को माफिक बैठे, उसे मान लो.
इतने बड़े पैमाने परगलत ढ़ंग से ज्योतिष का प्रचारप्रसार कभी नहीं हुआ था. सीधी सी बात यह है कि ठगी के इस धंधे में अब प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है अब हर कोई यह काम कर पैसा कमा रहा है. दिलचस्पी की बात यह है कि ज्योतिष के धंधे में अब महिलाएं भी तेजी से टआ रही हैं. इन्हें घर में बैठी रहने वाली महिला ग्राहकों को रिझाने में सहूलियत रहती है. वैसे भी, किसी कारोबार या ठगी पर अब पुरुषों का ही एकाधिकार नहीं रह गया है.नए जमाने के ये हाईटैक ज्योतिषी ऐरेगैरे नहीं हैं. ये पूरे आत्मविश्वास से बताते हैं कि आप की परेशानी का हल क्या है. मसलन, एक चैनल पर ज्योतिषी टेबल पर लैपटौप ले कर बैठता है. कार्यक्रम शुरू होता है तो एंकर ज्योतिषी की ब्रह्मा तक पहुंच का बखान कर एकएक कर फोन सुनती है. एक फोन करने वाली जिसे कौलर कहा जाता है, पूछती है कि पंडितजी, मेरे बेटे का जन्म 20 अगस्त, 1993 की रात9-40ट बजे हुआ है. उस का कैरियर क्या होगा? उसे किस तरह की नौकरी मिलेगी?
पंडितजी की-बोर्ड के बटन खटखटा कर कुछ ही सैकंडों में कुंडली नाम के सौफ्टवेयर की कृपा से जन्मकुंडली बना कर धीरगंभीर आवाज में बताते हैं कि आप के बेटे को नौकरी किसी सौफ्टवेयर कंपनी में मिलेगी. उस का बुध थोड़ा कमजोर है, बेटे को कहे गणेश का पूजन करें.ओर कुछ उपाय जो हम यहां नहीं बता सकते आप हमें पर्सनली फोन पर पूछ ले फोन करने वाली मां यह सुन कर धन्य हो जाती है कि बेटे की नौकरी पक्की हो गई. . दूसरे कौलर बेटी की शादी को ले कर परेशान हैं. फोन करते हैं, पंडितजी तुरंत जन्मपत्री देखते हैं और बताते हैं कि आप की बिटिया को आंशिक मंगल है, लिहाजा, शादी में मामूली अड़चन आएगी. लेकिन ये उपाय करें. शादी जल्दी हो जाएगी. फोन करने वाला पिता गद्गद हो जाता है कि जरा सी अड़चन है क्या हम आपको यहा पर नहीं बता सकते पर्सनली बात करें
इस तरह की ढेरों शाश्वत चिंताएं और परेशानियां टैलीविजन वाले पंडित को बताई जाती हैं. वह फुरती से ग्राहकों को निबटाता जाता है. उस का यह विज्ञापनीय कार्यक्रम सालछह महीने चलता है, फिर हैरानपरेशान लोग उस ज्योतिषी के स्क्रीन पर बताए गए फोन नंबरों पर संपर्क करते हैं और हजारों रुपए फीस के दे कर अपनी कथित समस्या का कथित हल निकलवाते हैं. अगर निर्मल बाबा छाप टोटकों से ग्राहक संतुष्ट नहीं होता तो ये तांत्रिक क्रियाओं के नाम पर भी पैसे ऐंठने में चूकते नहीं. धड़ल्ले से ज्योतिषी और उन से विज्ञापनीय कार्यक्रम का लेने वाले चैनल्स जिन्हें शुल्कोंसमाज से या लोगों के भले से कोई सरोकार नहीं.सव पैसे लूटने मे लगे हैं सब क्या है? .
धंधा बनाए रखने और बढ़ाने के लिए अब ये कथा कथित ज्योतिषी तरहतरह के नामों से संगठन बना कर शिविर लगाते हैं और ग्राहकों को पटाते हैं. ज्योतिष शिविरों में हर तरह के लोग आते हैं. एक शिविर में यह प्रतिनिधि गया और पूरे दिन नजारा देखा तो समझ आया कि किसी का दांपत्य कलह भरा है, किसी की पत्नी या पति कहीं अफेयर में फंस गया है तो कोई बेटी के गलत लड़के से प्रेमप्रसंग को ले कर तनाव में है. बेटे के जौब के बारे में जानने के लिए भी लोगों की भीड़ उमड़ती है. कोई असाध्य बीमारी से छुटकारा पाने के लिए शिविर में आया है तो कोई दफ्तर में बौस या सहकर्मी से तंग है. ऐसी ढेरों समस्याओं पर ज्योतिषियों ने निशुल्क परामर्श दिया लेकिन पुख्ता व गारंटीशुदा समाधान के लिए विजिटिंग कार्ड दे कर अपने दफ्तर में आने को कहा.
यह शिविर कहने को ही निशुल्क होते हैं, मकसद ग्राहकों की भीड़ इकट्ठा कर, बाद में उन्हें निचोड़ने का होता है और इस में वे कामयाब भी होते हैं. ये सभी ज्योतिषी पढ़ेलिखे और अधिकांश सरकारी पद पर सम्मानजनक नौकरी कर रहे थे और कुछ रिटायरमैंट के कगार पर थे जो आने वाले वक्त में मुफ्त की मलाई जीमने का इंतजाम कर रहे थे. इन का व्यक्तित्व और वाक्पटुता देख लोग प्रभावित थे पर यह नहीं सोच पा रहे थे कि यह शुद्ध ठगी है. लैपटौप और कंप्यूटर का दुरुपयोग करते ये ज्योतिषी किसी और का भले ही भविष्य न संवार पाएं, अपना भविष्य जरूर संवार चुके थे. 8-10 टेबलों पर बैठे इन ज्योतिषियों में कोई आपसी बैर नहीं था. इन की हालत अदालत के बाहर बैठे मुंशियों और दस्तावेज लेखकों जैसी थी कि जो जिस के पास आ गया वह उस का स्थायी ग्राहक हो कर रह गया. इस में कोई शक नहीं. और वे रहेंगी भी. लेकिन पढ़ेलिखे लोग ज्यादा आत्मविश्वास की कमी के शिकार हैं. उन के दिलोदिमाग में यह बात गहरे से बैठी है ज्योतिषियों के जरिए उन की समस्याएं हल कर इसलिए हमें कोई कोशिश नहीं करनी है. जबकि हकीकत यह है कि लोग अकर्मण्य और जीवन की वास्तविकताओं से भागने वाले हैं. वे बगैर मेहनत किए पैसा चाहते है
तगड़ी मुरगी हो तो ज्योतिषी एक एलबम निकालते हैं जिस में नामीगिरामी नेता, फिल्मकार, व्यापारी, उद्योगपति, प्रोफैसर, डाक्टर, पत्रकार और दूसरे लोग इन के साथ होते हैं. इस का वाजिब असर पड़ता है और लोग यही सोचते हैं कि कुछ न कुछ तो सच इस में होगा जो अपने क्षेत्र के कामयाब लोग इन के पास आते हैं. ज्योतिषियों के संगठन और विज्ञापन. ये शक्तिवर्धक दवाइयों की तरह हैं कि एक बार आजमा कर देखने में हर्ज क्या है. ये वैसे इश्तिहार हैं जिन्हें देख लोगों को खुदबखुद ही कमजोरी का एहसास होने लगता है.
हर्ज यह है कि इस से समाज पिछड़ रहा है. लोगों की मेहनत और कोशिश का श्रेय ठगी के खाते में ई कानून ऐसा नहीं है जो इन कुकुरमुत्ते से उगते इश्तिहारी ज्योतिषियों की गिरहबान पकड़े. अगर है भी तो लोग उस का सहारा लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. किसी डाक्टर की लापरवाही से मरीज मर जाए या खतरे में पड़ जाए तो उस की पिटाई कर दी जाती है, और अदालत का दरवाजा खटखटाया भी जाता है. डाक्टर चूंकि जानकार होता है इसलिए उसे चुनौती दलीलों के जरिए दी जा सकती है ज्योतिषी को नहीं क्योंकि उस की कोई जिम्मेदारी अपने कथित ज्ञान और विद्या के बाबत नहीं बनती और न ही ज्योतिष के कारोबार का कोई सबूत या वजूद होता है.ध्यान रहे ! ये ज्योतिष बो विषय है, जहाँ आज का विज्ञान फेल होता दिखाई देता है, वहाँ से ज्योतिष विषय प्रारम्भ होता है / उदाहरण स्वरूप देखें जब रोगी के बारे में चिकित्सक मौन हो जाता है, तब रोगी के घर वाले लोग रोगी के भविष्य के बारे में ज्योतिषी से सलाह लेते रहे हैं और आज भी लेते हैं / ये देश के कर्णधार नेता लोग चुनाव लड़ते हैं तोज्योतिषी से सलाह लेते हैं / बड़े बड़े कारोबारी लोग जब अपने कारोबार में अपने साइन्टिष्टों व सलाहकारों सहित फेल हो जाते हैं और कारोबार डूबने की स्थिति में आ जाता है, तब ज्योतिषियों से सलाह लेते हैं/ जब बैबाहिक जीवन में तलाक की नौवत आ जाती है या पति पत्नी में आपस में सामाजस्य नहीं बैठ पाता है, तब लोग ज्योतिषियों से सलाह लेते हैं क्यों ? जहाँ पर सैकेण्ड से भी छोटीं इकाई काम आतीं हों, जहाँ केवल सूर्योदय निकालने के लिए सायन्ठीटा और टेन ठीटा काम आते हों, जहाँ अक्षांश और देशान्तर के बिना गणित प्रारम्भ ही न हो पाता हो, जहाँ ध्वनि ( साउण्ड ) के नियमों को पूरी तरह काम में लेना पड़ता हो , जहाँ प्रकाश ( लाइट ) के नियमों का प्रयोग होता हो , जहाँ देश काल परिस्थिति को जानने के लिए भूगोल की जान कारी अति अनिवार्य हो , जहाँ जीव विज्ञान की जान कारी अनिवार्य हो , उस विषय को ऎसे ब्यक्ति देख रहे हों , जिन्हों ने उपर्युक्त विषयों का कभी सिंगावलोकन भी न किया हो , जिन्हों ने हाई स्कूल भी विज्ञान विषय ले कर उत्तीर्ण न कर पाया हो , बो लोग उस विषय के वारे में सिबाइ बेवेकूफ बनाने के और क्या करेंगे आचार्य राजेश
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