आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
मंगलवार, 17 जुलाई 2018
रविवार, 8 जुलाई 2018
कलम से
जाने कौन हाथ उठाता है
दुआ में
के जब भी देह
सांस लेती है
दुआ भर जाती है...
हवाओं में
न सूखे पत्ते है
न मिट्टी
लुभान की दुनिया
सिमटी है
कानों में पड़ते हर शब्द
जैसे नात बन गए है
सरकार की दुनिया लगती है
मुझमें मेरा मैं न रहकर
ये मौन में महक रहती है
जाने कौन हाथ उठाता है
दुआ में
के जब भी देह
सांस लेती है
दुआ भर जाती है...
हवाओं में
न सूखे पत्ते है
न मिट्टी
लुभान की दुनिया
सिमटी है
कानों में पड़ते हर शब्द
जैसे नात बन गए है
सरकार की दुनिया लगती है
मुझमें मेरा मैं न रहकर
ये मौन में महक रहती है
रविवार, 1 जुलाई 2018
राहु रतन गोमेद
गोमेद रत्न राहु की उर्जा तरंगों को अपनी उपरी सतह से आकर्षित करके अपनी निचली सतह से धारक के शरीर में स्थानांतरित कर देता है जिसके चलते जातक के आभामंडल में राहु का प्रभाव पहले की तुलना में बलवान हो जाता है तथा इस प्रकार राहु अपना कार्य अधिक बलवान रूप से करना आरंभ कर देते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि राहु का रत्न गोमेद किसी कुंडली में राहु को केवल अतिरिक्त बल प्रदान कर सकता है तथा गोमेद किसी कुंडली में राहु के शुभ या अशुभ स्वभाव पर कोई प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार यदि किसी कुंडली में राहु शुभ हैं तो गोमेद धारण करने से ऐसे शुभ राहु को अतिरिक्त बल प्राप्त हो जायेगा जिसके कारण जातक को राहु से प्राप्त होने वाले लाभ अधिक हो जायेंगें जबकि यही राहु यदि किसी जातक की कुंडली में अशुभ है तो राहु का रत्न धारण करने से ऐसे अशुभ राहु को और अधिक बल प्राप्त हो जायेगा जिसके चलते ऐसा अशुभ राहु जातक को और भी अधिक हानि पहुंचा सकता है। इस लिए राहु का रत्न गोमेद केवल उन जातकों को पहनना चाहिये जिनकी कुंडली में राहु शुभ रूप से कार्य कर रहे हैं तथा ऐसे जातकों को राहु का रत्न कदापि नहीं धारण करना चाहिये जिनकी कुंडली में राहु अशुभ रूप से कार्य कर रहें हैं।गोमेद का रंग हल्के संतरी भूरे रंग से लेकर, गहरे संतरी भूरे अथवा शहद के रंग जैसा या बहुत गहरा भूरा काले जैसा दिखने वाला रंग भी हो सकता है तथा संसार के विभिन्न भागों से आने वाले गोमेद विभिन्न रंगों के हो सकते हैं। यहां पर इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न जातकों के लिए गोमेद के भिन्न भिन्न रंग उपयुक्त हो सकते हैं जैसे किसी को हल्के रंग का गोमेद अच्छे फल देता है जबकि किसी अन्य को गहरे रंग का गोमेद अच्छे फल देता है। इसलिए गोमेद के रंग का चुनाव केवल अपने ज्योतिषी के परामर्श अनुसार ही करना चाहिए तथा अपनी इच्छा से ही किसी भी रंग का गोमेद धारण नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से ऐसा गोमेद लाभ की अपेक्षा हानि भी दे सकता है। रंग के साथ साथ अपने ज्योतिषी द्वारा सुझाये गये गोमेद के भार पर भी विशेष ध्यान दें तथा इस रत्न का उतना ही भार धारण करें जितना आपके ज्योतिषी के द्वारा बताया गया हो क्योंकि अपनी इच्छा से गोमेद का भार बदलने से कई बार यह रत्न आपको उचित लाभ नहीं दे पाता जबकि कई बार ऐसी स्थिति में आपका गोमेद आपको हानि भी पहुंचा सकता है।अलग अलग भावों के राहु के प्रभाव के लिये अलग अलग तरह के रंग के और प्रकृति के रत्न धारण करवाये जाते है,अधिकतर लोग गोमेद को राहु के लिये प्रयोग करवाते है,लेकिन गोमेद एक ही रंग और प्रकृति का नही होता यह जरूरी नही ऐक ही तरह का गोमेद पहनाया जाएगा,जैसे धन के भाव को राहु खराब कर रहा है,और अक्समात कारण बनने के बाद धन समाप्त हो जाता है,तो खूनी लाल रंग का गोमेद ही काम करेगा,अगर उस जगह पीला या गोमूत्र के रंग का गोमेद पहिन लिया जाता है,तो वह धार्मिक कारणों को करने के लिये और सलाह लेने का मानस ही बनाता रहेगा.
इसके अलावा भी राहु के लिये गोमेद को कुंडली के हिसाब से ही पहनाया जाना बहुत जरूरी है,ऐसा करने से भी राहु अपनी सिफ़्त को कन्ट्रोल में रखता है।यदि धारणकर्ता को सूट किया तो दर-दर ठोकरें खाने वाले को राजमहल में पहुंचा दे। यदि सूट नहीं किया तो सिंहासन पर से उतरवाकर जंगल-जंगल भटका दे, समझिए उसे ही गोमेद कहते हैं। पं. नेहरू, इंदिरा गांधी गोमेद के ही कृपापात्र रहे हैं। तमाम रोगों में तो यह औषधि का कार्य करता है। यह तंत्र-मंत्रों की सिद्धियां व अलौकिक शक्तियों का प्रदाता होता है।ईस लिए मित्रोंकुंडली का सूक्ष्म विश्लेषण कर अनुकूल राहू के लिए गोमेद रत्न (Garnet gemstone) का धारण जातक को राजनीति में सफलता, धन सम्पदा, शारीक सुन्दरता आदि के साथ अचानक ऐश्वर्य (sudden fortunes) जैसे लाटरी या शेयर बाजार में अचानक लाभ आदि देने में समर्थ कर देता है|
खासकर राहू के रत्न गोमेद (Garnet gemstone) को कुंडली के गहन विश्लेषण के बाद ही धारण किया जाना चाहिये| कई बार राहू के साथ युति करने वाले ग्रहों को भी सशक्त करने के लिए गोमेद को दुसरे रत्नों के संयुक्ति (combination) से पहनना पड़ता है|
मैं स्वयं एक रत्न विशेषज्ञ (Gemologist) एवं ज्योतिषी हूँ, इसकर कोई भी रत्न निर्धारण से पूर्व बड़ी ही बारीकी और गहन विश्लेषण के बाद ही रत्नों को निर्धारित करता हूँ| अच्छी quality और अच्छे price के, मेरी अपनी लैब में चेक किये हुए गोमेद रत्न (Garnet gemstone) न केवल मैं उपलब्ध कराता हूँ अगर आप रतन मंगवाना चाहते हैं या कुंडली दिखाने या वनवाना चाहते हैं तो हमसे हमारी नम्वर पर वात करें हमारी service paid है 07597718725-09414481324
ज्योतिष शास्त्र में इसे राहू का रत्न माना जाता है। यह लाल रंग लिए हुए पीला एकदम गोमूत्र के रंग जैसा होता है। यह भी एक प्रभावशाली रत्न है जो राहू के दोषों को दूर करता हैगोमेद भी खानों से निकाला जाता है। भारत, ब्राजील और श्रीलंका में सबसे अच्छा गोमेद प्राप्त होता है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, दक्षिण अफ्रीका के साथ कई अन्य देशों में भी पाए जाते हैं।यह गारनेट समूह का रत्न है। जो कि कैल्शियम-एल्युमीनियम मिनरल है। इसका रसायनिक सूत्र Ca3Al2(SiO4)3 है। यह चमकदार लेकिन अपारदर्शी होता है। इसकी कठोरता 7 होती है। इसका घनत्व 4.65 होता है। ज्योतिष के अनुसार राहु का प्रत्येक कुंडली में विशेष महत्व है तथा किसी कुंडली में राहु का बल, स्वभाव और स्थिति कुंडली से मिलने वाले शुभ या अशुभ परिणामों पर बहुत प्रभाव डाल सकती है। राहु के बल के बारे में चर्चा करें तो विभिन्न कुंडली में राहु का बल भिन्न भिन्न होता है जैसे किसी कुंडली में राहु बलवान होते हैं तो किसी में निर्बल जबकि किसी अन्य कुंडली में राहु का बल सामान्य हो सकता है। किसी कुंडली में राहु के बल को निर्धारित करने के लिय बहुत से तथ्यों का पूर्ण निरीक्षण आवश्यक है हालांकि कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में राहु की किसी राशि विशेष में स्थिति ही राहु के कुंडली में बल को निर्धारित करती है जबकि वास्तविकता में किसी भी ग्रह का किसी कुंडली में बल निर्धारित करने के लिए अनेक प्रकार के तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक है। विभिन्न कारणों के चलते यदि राहु किसी कुंडली में निर्बल रह जाते हैं तो ऐसी स्थिति में राहु उस कुंडली तथा जातक के लिए अपनी सामान्य और विशिष्ट विशेषताओं के साथ जुड़े फल देने में पूर्णतया सक्षम नहीं रह पाते जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कुंडली में निर्बल राहु को ज्योतिष के कुछ उपायों के माध्यम से अतिरिक्त उर्जा प्रदान की जाती है जिससे राहु कुंडली में बलवान हो जायें तथा जातक को लाभ प्राप्त हो सकें। राहु को किसी कुंडली में अतिरिक्त उर्जा प्रदान करने के उपायों में से उत्तम उपाय है राहु का रत्न गोमेद धारण करना जिसे धारण करने के पश्चात धारक को राहु के बलवान होने
शुक्रवार, 29 जून 2018
तंत्र-विद्या : कितनी बुरी और कितनी भली
|तंत्र-विद्या को आम बोलचाल की भाषा में जादू-टोना समझ सकते हैं। यह विद्या महज एक टेक्नोलॉजी है। आज आप भारत में अपना मोबाइल फोन उठा कर जब चाहें अमेरिका में किसी से बात कर सकते हैं। तंत्र-विद्या भी कुछ ऐसा ही है - अंतर बस यही है कि इसमें आप सेलफोन के बिना ही अमेरिका में किसी से बात कर सकते हैं। यह थोड़ी ज्यादा उन्नत टेक्नोलॉजी है। वक्त के साथ जब आधुनिक टेक्नोलॉजी का और विकास होगा, तब उसके साथ भी ऐसा ही होगा। अभी ही मेरे पास एक ब्लू -टूथ मेकेनिज्म है, जिसमें किसी का नाम बोलने भर से मेरा फोन उसका नंबर डायल करने लगता है। एक दिन ऐसा आएगा, जब इसकी भी जरूरत नहीं रह जाएगी। बस, शरीर में एक छोटा-सा इम्प्लांट लगाने से सारा काम हो जाएगा।तंत्र-विद्या भी इसी तरह एक टेक्नोलॉजी है, लेकिन एक अलग स्तर की, पर है भौतिक ही। यह सब करने के लिए आप अपने शरीर, मन और ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी चाहे जो हो, आप अपने शरीर, मन और ऊर्जा का ही इस्तेमाल करते हैं। आम तौर पर आप अपनी जरूरतों के लिए दूसरे पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन एक सेलफोन या किसी टेक्नोलॉजी के उत्पादन के लिए जिन बुनियादी पदार्थों का उपयोग होता है, वे शरीर, मन और ऊर्जा ही होते हैंचूंकि लोगों ने ऐसे बुरे तांत्रिकों के बारे में सुन रखा है, जिन्होंने लोगों की जिंदगी बरबाद करने की कोशिश की या जिन्होंने लोगों को बीमार बनाया और मार डाला, इसलिए जब आप तंत्र-विद्या या जादू-टोने का नाम लेते हैं, तो वे समझते हैं कि यह हमेशा बुरा होता है। सामाजिक दृष्टि से संभव है आपने ऐसे ही लोगों को देखा हो। मगर तंत्र-विद्या बहुत ऊंची श्रेणी की भी होती है। शिव एक तांत्रिक हैं। जादू-टोना एक अच्छी और लाभकारी शक्ति हो सकता है। यह अच्छा है या बुरा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग कौन और किस मकसद से कर रहा है।
तंत्र-विद्या योग का सबसे निम्न रूप है, लेकिन लोग सबसे पहले यही करना चाहते हैं। वे कुछ ऐसा देखना या करना चाहते हैं, जो दूसरे नहीं कर सकते।
जब हम योग कहते हैं, तो किसी भी संभावना को नहीं छोड़ते | इसके अंदर सब कुछ है। अगर आप अपने दिमाग को इतना धारदार बना लें कि वह हर चीज को आरपार देख-समझ सके, तो यह भी एक प्रकार का तंत्र है । अगर आप अपनी सारी ऊर्जा को अपने दिल पर केंद्रित कर दें ताकि आपमें इतना प्यार उमड़ सके कि आप हर किसी को उसमें सराबोर कर दें, तो वह भी तंत्र है। अगर आप अपने भौतिक शरीर को जबरदस्त रूप से शक्तिशाली बना लें कि उससे आप कमाल के करतब कर सकें, तो यह भी तंत्र है। या अगर आप अपनी ऊर्जा को इस काबिल बना लें कि शरीर, मन या भावना का उपयोग किए बिना ये खुद काम कर सके, तो यह भी तंत्र है।
तो तंत्र कोई अटपटी या बेवकूफी की बात नहीं है। यह एक खास तरह की काबिलियत है। आप जो “बाजार” में घूमते जिन ढोंगी तांत्रिक बाबाओं को देखते हैं,, जो की आम जनता की आँखों में धुल झोंक के उन्हें ताबीज,यन्त्र बाँटते चलते हैं,,,,, मैं उनकी बात नहीं कर रहा | वह सच्चा तंत्र नहीं है | वह केवल ढोंग, छलवा हैतंत्र- शास्त्र से तात्पर्य उन गूढ़ साधनाओं से है जिनके द्वारा इस संसार को संचालित करने वाली विभिन्न दैवीय शक्तियों का आव्हान किया जाता है । तंत्र साधना के समय उच्चारित मंत्र, विभिन्न मुद्रायें एवं क्रियाएं अत्यंत व्यस्थित, नियमित एवं नियंत्रित तरीके से होती हैं । तंत्र में श्मशान, उजाड़ स्थान आदि को इसलिए चुना जाता है जिससे कि साधक का जीवन के अंतिम सत्य से साक्षात्कार हो सके तथा उसे ईश्वर की सार्वभौमिकता एवं जीवन की निरर्थकता का आभास हो। यह एक तरह की ऐसी विद्या है जो व्यक्ति के शरीर को अनुशासित बनाती है, शरीर पर खुद का नियंत्रण बढ़ाती है।
एक बार “माता पार्वतीजी” ने “परमपिता महादेव शिव” से प्रश्न किया की—— ” हे महादेव, कलयुग मे धर्म या मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग होगा ” ?
उनके इस प्रश्न के उत्तर मे महादेव शिव ने उन्हे समझते हुए जो भी व्यक्त किया तंत्र उसी को कहते हैं।
योगिनी तंत्र मे वर्णन है की कलयुग में लोग वेद में बताये गए नियमो का पालन नही करेंगे। इसलिए नियम और शुद्धि रहित वैदिक मंत्र का उच्चारण करने से कोई लाभ नही होगा। जो व्यक्ति वैदिक मंत्रो का कलयुग में उच्चारण करेगा उसकी व्यथा एक ऐसे प्यासे मनुष्य के समान होगी जो गंगा नदी के समीप प्यासे होने पर कुआँ खोद कर अपनी प्यास बुझाने की कोशिश में अपना समय और उर्जा को व्यर्थ करता है। कलयुग में वैदिक मंत्रो का प्रभाव ना के बराबर रह जाएगा। और गृहस्त लोग जो वैसे ही बहुत कम नियमो को जानते हैं उनकी पूजा का फल उन्हे पूर्णतः नही मिल पायेगा ।
महादेव ने बताया की वैदिक मंत्रो का पूर्ण फल सतयुग, द्वापर तथा त्रेता युग में ही मिलेगा.
तब माँ पार्वती ने महादेव से पुछा की कलयुग में मनुष्य अपने पापों का नाश कैसे करेंगे? और जो फल उन्हे पूजा अर्चना से मिलता है वह उन्हे कैसे मिलेगा?
इस पर “शिव जी” ने कहा की कलयुग में तंत्र साधना ही सतयुग की वैदिक पूजा की तरह फल देगा। तंत्र में साधक को बंधन मुक्त कर दिया जाएगा। वह अपने तरीके से इश्वर को प्राप्त करने के लिए अनेको प्रकार के विज्ञानिक प्रयोग करेगा।परन्तु ऐसा करने के लिए साधक के अन्दर इश्वर को पाने का नशा और प्रयोगों से कुछ प्राप्त करने की तीव्र इच्षा होनी चाहिए।तंत्र के प्रायोगिक क्रियाओं को करने के लिए एक तांत्रिक अथवा साधक को सही मंत्र, तंत्र और यन्त्र का ज्ञान जरुरी है। मंत्र एक सिद्धांत को कहते हैं। किसी भी आविष्कार को सफल बनाने के लिए एक सही मार्ग और सही नियमों की आवश्यकता होती है। मंत्र वही सिद्धांत है जो एक प्रयोग को सफल बनाने में तांत्रिक को मदद करता है। मंत्र द्वारा ही यह पता चलता है की कौन से तंत्र को किस यन्त्र में समिलित कर के लक्ष्य तक पंहुचा जा सकता है । मंत्र के सिद्ध होने पर ही पूरा प्रयोग सफल होता है।जैसे “क्रिंग ह्रंग स्वाहा” एक सिद्ध मंत्र है। श्रृष्टि में इश्वर ने हरेक समस्या का समाधान स्वयम दिया हुआ है। ऐसी कोई बीमारी या परेशानी नही जिसका समाधान इश्वर ने इस धरती पर किसी न किसी रूप में न दिया हो। तंत्र श्रृष्टि में पाए गए रासायनिक या प्राकृतिक वस्तुओं के सही समाहार की कला को कहते हैं।मंत्र और तंत्र को यदि सही से प्रयोग किया जाए तो वह प्राणियों के कष्ट दूर करने में सफल है। पर तंत्र के रसायनों को एक उचित पात्र को आवश्यकता होती है। ताकि साधारण मनुष्य उस पात्र को आसानी से अपने पास रख सके या उसका प्रयोग कर सके। इस पात्र या साधन को ही यन्त्र कहते हैं। एक ऐसा पात्र जो तंत्र और मन्त्र को अपने में समिलित कर के आसानी से प्राणियों के कष्ट दूर करे वही यन्त्र है। हवन कुंड को सबसे श्रेष्ठ यन्त्र मन गया है। “आसन”, इत्यादि भी यंत्र माने जाते है। कई प्रकार की आकृति को भी यन्त्र मन गया है,, जैसे “श्री यन्त्र”, “काली यन्त्र”, “महामृतुन्जय यन्त्र” इत्यादि यन्त्र” शब्द “यं” तथा “त्र” के मिलाप से बना है। “यं” को पुर्व में “यम” अर्थात “काल” कहा जाता था। इसलिए जो यम से हमारी रक्षा करे उसे ही यन्त्र कहा जाता है। इसी से समझा जा सकता है कि तंत्र को प्राचीनकाल के बुद्धिजीवियों ने कितने शोध के बाद आम आदमी के लिए प्रतिपादित किया |
शुक्रवार, 22 जून 2018
ग्रह से घोखा पोस्ट नंबर दो
समय के दो पहलू है. पहले प्रकार का समय व्यक्ति को ठीक समय पर काम करने के लिये प्रेरित करता है. तो दूसरा समय उस काम को किस समय करना चाहिए पहला समय मार्गदर्शक की तरह काम करता है.
जबकि जबकि दूसरा पल-पल का ध्यान रखते हुए आपकी कुंडली दशा अंतर्दशा ग्रहों की चाल और ग्रह से मिलने वाले फल को पहचान कर उसका उपचार करकेे कैसे आगे बढ़ा जाए यह जानकारी देता है कहते हैं समय बड़ा बलवान होता है उस समय को पहचानेका काम ज्योतिष ही कर सकता है अक्सर भ्रम कनफ़्यूजन धोखा फ़रेब चीटिंग अफ़वाह भटकाव नशा बेबजह आदि शब्द राहु के अनुसार ही कहे गये है,जो है उसके प्रति जो नही है उसके भी प्रति राहु अपने अपने स्थान से अपना अपना प्रकार प्रकट करता है साथ ही अगर व्यक्ति की सोच केन्द्रित नही है तो वह अपने सोचने वाले घेरे को लगातार बढाता जाता है और यही सोच उसे जीवन मे धोखा आदि देने के लिये मानी जाती है.लगन मे राहु के होने से जीवन के साथ ही धोखा होता है धन भाव मे होने से धन आदि की चीटिंग और खुद की आंखो के सामने धूल झोंकने वाली बात कही जाती है,तीसरे भाव मे नाटकीय ढंग से अपने विचार प्रकट करने के बाद स्वांग बनाकर ठगने वाली बात मानी जाती है,चौथे भाव मे मानसिक रूप से भावना आदि से ठगी की जाती है पंचम भाव मे मनोरंजन का नशा देकर या लाटरी सट्टॆ खेलकूद मे दिमाग मे लगा कर बुद्धि को भ्रम मे डाला जाता है,छठे भाव से कोई बीमारी नही होने पर बीमारीका भ्रम होनाया वहम होना सातवे भाव मे जीवन साथी और साझेदारी के प्रति तादात से अधिक विश्वास कर लेना और जब भ्रम टूटे तो कही कुछ नही होना जीवन साथी से ही अक्सर धोखा दिलवा देना आठबे भाव मे उन शक्तियों के प्रति भम रहना जो शक्तिया न तो देखी गयी है और न ही उनके प्रति कभी विश्वास किया गया है इस भाव के राहु के द्वारा अक्सर गूढ कारणो की खोज के प्रति भ्रम ही बना रहता है और रेत के पहाड से हीरे की कणी निकालने जैसा होता है और जब रेत का पहाड़ बहुत जाता है तो कुछ पल्ले नहीं आता नवे भाव के राहु से खुद के खानदान और पूर्वजो के प्रति ही भ्रम बना रहना दसवे भाव मे काम के होते हुये भी और काम के करते हुये भी कभी काम पूरा नही होना ग्यारहवे भाव के प्रति चाहे पीछे से हानि ही हो रही हो लेकिन भ्रम से उसी काम को करते जाना जब पता लगना तब तक दिवालिया हो जाना या किसी मित्र पर इतना विश्वास करते जाना कि वह जीवन के हर क्षेत्र से सब कुछ बरबाद कर रहा है लेकिन फ़िर भी उसके प्रति विश्वास को बनाये रखना बाद मे दगा बाजी का रूप दे देना बारहवे भाव से जीवन के प्रति हमेशा डर लगा रहना आक्स्मिक चल देना हवाई किले बनाते रहना और खुद की स्थिति को जमीन पर आने ही नही देना जबकि है कुछ नही फ़िर भी सब कुछ होने का आभास होते रहना और जब हकीकत का पर्दा उठे तो कही कुछ नही आदि की बाते मानी जाती है.paid service 09414481324
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गुरुवार, 21 जून 2018
चंन्द्र ग्रह पोस्ट 4
चंद्र ग्रह पोस्ट नंबर 4
जीवन के शुरु होते ही सुख दुख पाप पुण्य हारी बीमारी लाभ हानि आदि अच्छे और बुरे परिणाम सामने आने लगते है,सुख को महसूस करने के बाद दुखों से डर लगने लगता है हानि को समझ कर लाभ को ही अच्छा माना जाता है,जीवन के शुरु होने के बाद मौत से डर लगने लगता है। यही बात कुंडली में समझी जा सकती है,ग्रह की प्रकृति हानिकारक है
या लाभ को प्रदान कराने वाली है। अगर ग्रह हानि देने वाला है तो उसे लाभदायक बनाने के प्रयत्न किये जाते है और लाभदायक तो लाभदायक है ही। खराब ग्रह के बारे में लालकिताब में लिखा है,-"बसे बुराई जासु तन,ताही को सम्मान,भलो भलो कहि छोडिये खोटिन को जप दान",बुराई करने से तात्पर्य है अनुभव करवाना,अगर किसी बुरी वस्तु का अनुभव ही नही होगा तो उसके अच्छे या बुरे होने का मतलब भी समझ में नही आयेगा,कई बार कई कारकों को हम सुनकर या पढकर या दूर से समझ कर ही त्याग देने से मतलब रखते है,जब कहा जाता है कि अमुक वस्तु जहरीली है और उसे अगर खा लिया गया तो मौत हो सकती है,और जब भी उस वस्तु को सामने देखा जाता है तो उससे केवल सुनकर या पढकर या दूर से समझ कर ही दूर रहने में भलाई समझी जाती है और जब कोई अपना या ना समझ व्यक्ति उस वस्तु की तरफ़ आमुख होता है तो उससे वही कहा जाता है जो हमने सुना या पढा या समझा या दूर से देखा। ग्रह कुंडली में जब सही तरह से मान्यता के रूप में देखा जाये तो जीवन के चार पुरुषार्थों में चारों ही अपने अपने स्थान पर सही माने जाते है। धर्म के रूप में शरीर परिवार और पुरानी वंशावली के प्रति मान्यता को समझा जाता है,अर्थ के रूप में मिला हुआ जो परिवार और हमारे कुटुम्ब ने हमे दिया है,हमारे द्वारा रोजाना के कार्यों से जो प्राप्त होता है और जो हमारे वंश से या हमारी उच्च शिक्षा के बाद प्राप्त होता है के प्रति माना जा सकता है। काम के रूप में हमारे से छोटे बडे भाई बहिन हमारे जीवन में कदम से कदम मिलाकर साथ चलने वाले लोग एवं वे लोग जिनके लिये हम आजीवन अपनी जद्दोजहद को जारी रखते है,चाहे वह पति पत्नी के रूप में हो,या संतान के रूप में या फ़िर संतान की संतान के प्रति हो,जब सही मायनों में हमने जीवन को समझ लिया है और तीनो पुरुषार्थों को पूरा कर लिया है तो बाकी का बचा एक मोक्ष यानी शांति नामका पुरुषार्थ अपने आप ही अपनी उपस्थिति को उत्पन्न कर देगा बात चंद्र ग्रह की चल रही है और चन्द्रमा के लिये केवल शनि ही पल्ले पडा है। जैसे कर्क और सिंह के सप्तम के स्वामी शनि होता है एक सकारात्मक होता है एक नकारात्मक होता है वैसे ही शनि की दोनो राशियों के लिये भी सूर्य और चन्द्रमा ही सप्तम के स्वामी भी होते है और सकारात्मक और नकारात्मक का प्रभाव देते है। चन्द्रमा का रूप जब शनि की राशि मकर से सप्तम का होता है तो वह केवल सोच को पैदा करने के लिये ही अपना फ़ल देता है तथा सप्तम का स्वामी जिस भाव मे होता है उसी भाव का फ़ल भी प्रदान करता है। राशि भी अपना फ़ल प्रदान करती है और सप्तम के स्वामी पर जो भी ग्रह अपनी नजर देते है उन ग्रहों का असर भी सप्तम के स्वामी पर पडता है आगे पीछे के ग्रहो का प्रभाव भी बहुत अदर देता है जिस तरह एक मकान में सभी सदस्यों का अपना अपना प्रभाव होता है उसी तरह हमारी कुंडली में प्रत्येक ग्रह का अपना अपना प्रभाव एक सदस्य के कभी घर घर नहीं बनता उसी तरह एक ग्रह के फल से कभी फल कथन कुंडली में नहीं किया जा सकता अब यहां मैं चंद्र की कुछ बुराइयां जब चंद्र अशुभ होता है उसके बारे में आपको बताऊंगा फिर भी पूरी कुंडली देखकर ही यह समझना चाहिए कि चंद्र शुभ है या अशुभ है और उसके फल को ज्ञात करना चाहिएचन्द्रमा खराब होने की निशानी होती है कि मन की सोच बदल जाती है झूथ बोलना आजाता है,चलता हुआ रास्ता भूला जाता है माता बीमार रहने लगती है जुकाम और ह्रदय वाली बीमारिया शुरु हो जाती है वाहन जो भी पास मे है सभी किसी न किसी कारण से बन्द हो जाते है बडी या छोटी बहिन भी दिक्कत मे आजाती है घर मे पानी मे कही न कही से गन्दगी पैदा हो जाती है भोजन करते समय पसीना अधिक निकलने लगता है किसी भी काम को करते समय खांसी आने लगती है गले मे ठसका लगने लगता है चावल को मशाले वाले पदार्थो मे मिलाकर खाने का जी करने लगता है। घर मे कन्या संतति की बढोत्तरी होने लगती है,कोई बहिन बुआ बेटी विधवा जैसा जीवन जीने लगती है,पडौसी नाली के लिये और घर मे आने वाली पानी के लिये लडने लगते है,मूत्र रोग पैदा हो जाते है,घर मे सुबह शाम की सफ़ाई भी नही हो पाती है,पानी का सदुपयोग नही किया जाता है घर मे पानी का साधन खुले मे नही होकर अन्धेरे मे कर दिया जाता है,पानी को बेवजह बहाना शुरु कर दिया जाता है,लान मे लगी घास सूख जाती है अधिक पानी वाले पेड नही पनप पाते है घर के एक्वेरियम मे मछलिया जल्दी जल्दी मरने लगती है,जुकाम वाले रोगो से पीडा होने पर सिर हमेशा तमकता रहता है अच्छे काम को करने के समय भी बुरा काम अपने आप हो जाता है मन की गति कन्ट्रोल नही होने पर एक्सीडेन्ट हो जाता है पुलिस और कानूनी क्षेत्र का दायरा बढने लगता है घर के अन्दर दवाइयों का अम्बार लगने लगता है। आंखो से अपने आप ही आंसू आने लगते है,आसपास के लोग तरह तरह की बाते करने लगते है हितू नातेदार रिस्तेदार सभी कुछ न कुछ कहते हुये सुने जाते है जिन लोगो के साथ अच्छा काम किया है वह भी अपनी जीभ से उसे उल्टा बताने लगते है जो अधिक चाहने वाले होते है उनके अन्दर भी बुराइया आने लगती है आदि बाते देखने को मिलती है।ज्योतिषी जी से पूंछो तो वह कहने लगेंगे कि मोती की माला पहिन लो चन्द्र मणि को पहिन लो चांदी को पहिन लो चांदी को दान मे दे दो,चन्द्रमा के जाप कर लो,यह सब खूब करो लेकिन जो कल किया है उसे आज भुगतने के लिये ज्योतिषी जी अपने सामान के साथ सहायता नही दे पायेंगे,कितने ही मंत्र बोल लो लेकिन मंत्र भी तब तक काम नही करेगा जब तक चित्त वृत्ति सही काम नही करेगी,घर मे रखी चांदी को या खरीद कर दान मे देने से किसी और का भला हो सकता है बिना चित्त वृत्ति बदले खुद का भला तो हो नही सकता है,मोती की माला भी तभी काम करेगी जब चित्त वृत्ति बदलेगी,अगर आज से चित्त वृत्तिको बदलने की हिम्मत है तो कल अपने आप ही सही होने लगेगा नही मानो तो अंजवा कर देख लो। चन्द्रमा का काम तुरत फ़ल देना होता है वह आज धन के भाव मे रहकर धन को देगा लेकिन जैसे ही वह खर्चे के भाव मे जायेगा तो धन को खर्च भी करवा लेगा,जो भी कारक उसके साथ होगा उसी के अनुसार वैसे ही काम करने लगेगा जैसे पानी मे मिठाई मिला दो तो मिठाई जैसा काम करने लगेगा गर्मी मे रख तो गर्म हो जायेगा फ़्रिज मे रख तो ठंडा हो जायेगा,मिर्ची मिला तो कडवा हो जायेगा जहर मिला तो जहरीला हो जायेगा,लेकिन चित्त वृति नही बदलती है तो वह जहरीला पानी मार सकता है और चित्त वृत्ति बदली है तो वह किसी जहरीले जानवर के काटने पर उसे बचा भी सकता है,मिर्ची वाला पानी सब्जी मे दाल मे भोजन के काम आ सकता है गर्म पानी चाय मे काम आ सकता है और ठंडा पानी शर्बत मे काम आ सकता है,लेकिन यह सब होगा तभी जब चित्त वृत्ति को बदल लो,बिना चित्त वृत्ति को बदले कुछ भी नही हो सकता है। चन्द्रमा भावुकता कारक है,अधिक भावना मे आकर यह रोना भी शुरु कर देता है और जब प्रहसन पर आये तो हँसना भी चालू कर देता है,जब गम की श्रेणी मे आजाये तो अकेला बैठ कर सोचने के लिये भी मजबूर कर सकता है,डरने की कारकता मे चला जाये तो थरथर कांपने भी लगता है। यह सब कारण अच्छी और बुरी भावना को साथ लेकर चलने से ही होता है,अन्यथा नही होता है।जब मन के अन्दर बदले की भावना नही पैदा होगी तो किसी से बैर भाव भी नही होगा और जब बैर भाव नही होगा तो लोग अच्छा ही सोचेंगे जो मन की भावनाये है उनका अच्छा और बुरा रूप दोनो सोच कर निकालेंगे तो हो ही नही सकता है कि कोई बुराई मान ले। लेकिन यह भी ध्यान रखना है कि फ़ूल और तलवार का रूप भी दिमाग से समझना पडेगा अन्यथा तलवार का काम काटना होता है और फ़ूल का काम सुन्दर भावना को देना होता है,कसाई तलवार की भाषा को समझता है और सन्त फ़ूल की भावना को समझता है।जैसे ही मन की भावना बदली मोती की माला भी काम करने लगेगी,लोगो को एक गिलास पानी पिलाने से भी चांदी के दान से बडा फ़ल मिलने लगेगा,एक सफ़ेद कपडा पहिनने से भी चन्द्रमणि का फ़ल मिलने लगेगा। यह सब कल की बुराई को आज निकालने पर कल अच्छाई से ही मुकाबला होगा इसमे कोई दोराय नही है,अक्सर जिस राशि मे चन्द्रमा होता है उस राशि मे व्यक्ति की पहुंच पर ही सोच को देने के लिये और लोगो के अन्दर जानकारी देने के लिये माना जा सकता है,जब तक व्यक्ति चन्द्रमा तक नही पहु़ंचता है तब तक वह जनता के बारे मे सोचता है जैसे ही वह चन्द्रमा की सीमा को लांघ जाता है जनता उसके बारे मे सोचने लगती है मित्रोंज्योतिष अपने रूप में कालचक्र को देखने वाली है। ज्योतिष मनुष्य की गुलाम नही है वह जो है उसे ही बखान करना जानती है। ग्रह को अपने भाव से प्रकट करना सभी की आदत है,भाव को ग्रह से जोडना भी अपने अपने भाव के बात है,भाव को बदला जा सकता है,ग्रह को भाव में रूप के अनुसार अनुमान लगाकर बताया जा सकता है,मनुष्य अपनी गति को बदल सकता है लेकिन ग्रह अपनी गति को नही बदल सकता है। जिस पृथ्वी पर हम टिके है उसकी गति को अगर दूर से देख लें तो घिग्घी बंध जायेगी,किस शक्ति से हम धरती पर टिके है उसकी गति कितनी भयानक है यह हम धरती की परिक्रमा करने की चाल से समझ सकते है।आज आज इतना ही आचार्य राजेश
गुरुवार, 14 जून 2018
राशिफल की वास्तविकता क्या है
, वहीं दूसरी ओर पूरी जनसंख्या को 12 भागों में बांटकर उनकी राशि के आधार पर राशिफल के रूप में भविष्यवाणी करने का प्रचलन भी है। राशिफल के द्वारा दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटकर उनके बारे में भविष्यवाणी करने का प्रयास आमजनों को गुमराह करने के इलावा कुछ नहीं मेरे ख्याल सेराशिफल की शुरूआत उस वक्त की मानी जा सकती है , जब आम लोगों के पास उनके जन्म विवरण न हुआ करते हों पर अपने भविष्य के बारे में जानने की कुछ इच्छा रहती हो। पंडितो द्वारा रखे गए नाम में से उनकी राशि को समझ पाना आसान था, इसलिए ज्योतिषियों ने उनकी राशि के आधार पर गोचर के ग्रहों को देखते हुए भविष्यवाणी करने की परंपरा शुरू की हो। चूकि प्राचीन काल में अधिकांश लोगों की जन्मकुंडलियां नहीं हुआ करती थी , इसलिए राशिफल की लोकप्रियता निरंतर बढती गयी। https://youtu.be/sXMcp0IapGEगोचर तभी प्रभावशाली होगा जव आप अपनी जन्मतिथि के हिसाब से अपनी कुंडली वनाकरओर कुंडली के साथ गोचर को मिला कर भविष्य देखे ज्योतिष’ मानता है कि भले ही किसी व्यक्ति के जन्मकालीन ग्रह उसके जीवन की एक रूप रेखा निश्चित कर देते हें , पर समय समय पर आनेवाले गोचर के ग्रह भी उसके दिलोदिमाग पर कम प्रभाव नहीं डालते – संभवतः परम्परागत ज्योतिष भी यही मानता है जन्मकुंडली को देखने से यह सटीक ढंग से कहा जा सकता है कि जातक के लिए कौन सी पंक्ति अधिक या कम प्रभावी होगी। इसके लिए इस बात को ध्यान में रखा जाता है कि गोचर के ग्रहों की खास स्थिति जातक की जन्मकुंडली के अनुकूल है या प्रतिकूल ?? – अर्थात केवल सूर्य राशि, चन्द्र राशि या लग्न राशि के आधार पर की गयी भविष्यवाणियों (जो पत्र पत्रिकाओं में छपती रहती हैं या टीवी पर वोली जाती है ) का बहुत अधिक महत्त्व नहीं है |आचार्य राजेश
सोमवार, 11 जून 2018
महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां
‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...
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https://youtu.be/hb9Ouf_rST4 मित्रों आज बात करेंगे बुध और शनि की युति जब एक ही भाव में एक साथ हो या किसी भी तरह की युति बन रही है, तो कल क्य...
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लक्ष्मी योग शुभ ग्रह बुध और शुक्र की युति से बनने वाला योग है।बुध बुद्धि-विवेक, हास्य का कारक है तो शुक्र सौंदर्य, भोग विलास कारक है।अब ये द...
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जब किसी के जीवन में अचानक परेशानियां आने लगे, कोई काम होते-होते रूक जाए। लगातार कोई न कोई संकट, बीमारी बनी रहे तो समझना चाहिए कि उसकी कुंडली...
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दशम भाव ज्योतिष भाव कुडंली का सबसे सक्रिय भाव है| इसे कर्म भाव से जाना जाता है क्यूंकि ये भाव हमारे समस्त कर्मों का भाव है| जीवन में हम सब क...
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https://youtu.be/I6Yabw27fJ0 मंगल और राहूजब राहु और मंगल एक ही भाव में युति बनाते हैं, तो वह मंगल राहु अंगारक योग कहलाता है। मंगल ऊर्जा का स...
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मालव्य योग को यदि लक्ष्मी योगों का शिरोमणी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं। मालव्य योग की प्रशंसा सभी ज्योतिष ग्रन्थों में की गई है। यह योग शुक्...
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https://youtu.be/9VwaX00qRcw ये सच है कि हर रत्न इस धरती पर मौजूद हर व्यक्ति को शोभा नहीं देता है. इसे पहनने के लिए ज्योतिष की सलाह आवश्यक ह...
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आचार्य राजेश ईस बार मलमास 15 दिसंबर से आरंभ हो रहा है जो 14 जनवरी 2018तक रहेगा। मलमास के चलते दिसंबर के महीने में अब केवल 5 दिन और विवाह मुह...
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मित्रों आज वात करते हैं फिरोजा रतन की ग्रहों के प्रभाव को वल देने के लिए या फिर उन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए ज्योतिष विज्ञान द्वारा विभि...

