आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
सोमवार, 11 फ़रवरी 2019
वक्री वुघ
रविवार, 10 फ़रवरी 2019
राहु तो राहु है
शनिवार, 9 फ़रवरी 2019
राहु परेशानियों का कारक
मित्रो पहले मैने राहु पर पोस्ट ङाली थी तो वहुँत से मित्र उपाय जानना चाहते है तो उस सम्वघ मे आप को थोङा वता रहा हु जैसे आप जानते ही हे कि राहु छाया ग्रह है, फिर भी उसे एक पूर्ण ग्रह के समान ही माना जाता है।
https://youtu.be/wAxNMKd-x8Yhttps://youtu.be/wAxNMKd-x8Y यह आद्र्रा, स्वाति एवं शतभिषा नक्षत्र का स्वामी है। राहु की दृष्टि पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पड़ती है। जिन भावों पर राहु की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है, वे राहु की महादशा में अवश्य प्रभावित होते हैं। राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है। राहु में राहु की अंतर्दशा का काल 2 वर्ष 8 माह और 12 दिन का होता है। इस अवधि में राहु से प्रभावित जातक को अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ सकता है।अगर कुंङली मे राहु खराव हैतो विष और जल के कारण पीड़ा हो सकती है। जहरीले भोजन, से स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। इसके ईलावा अपच, जहरीले जानवर से खतरा परस्त्री या पर पुरुष गमन की आशंका भी इस अवधि में बनी रहती है। अशुभ राहु की इस अवधि में जातक के किसी प्रिय से वियोग, समाज में अपयश, निंदा आदि की संभावना भी रहती है। किसी दुष्ट व्यक्ति के कारण उस परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। उपाय: भगवान शिव के रौद्र अवतार भगवान भैरव के मंदिर में रविवार को तेल का दीपक जलाएं। शराब का सेवन कतई न करें। लावारिस शव के दाह-संस्कार के लिए शमशान में लकड़िया दान करें। मंदे वोलो का प्रयोग न करें। राहु में बृहस्पति: राहु की महादशा में गुरु की अंतर्दशा की यह अवधि दो वर्ष चार माह और 24 दिन की होती है। राक्षस प्रवृत्ति के ग्रह राहु और देवताओं के गुरु बृहस्पति का यह संयोग सुखदायी होता है। जातक के मन में श्रेष्ठ विचारों का संचार होता है और उसका शरीर स्वस्थ रहता है। धार्मिक कार्यों में उसका मन लगता है। यदि कुंडली में गुरु अशुभ प्रभाव में हो, राहु के साथ या उसकी दृष्टि में हो तो उक्त फल का अभाव रहता है। ऐसी स्थिति में यह उपाय करने चाहिए। किसी अपंग छात्र की पढ़ाई या इलाज में सहायता करें। शैक्षणिक संस्था के शौचालयों की सफाई की व्यवस्था कराएं। शिव मंदिर में नित्य झाड़ू लगाएं। पीले रंग के फूलों से शिव पूजन करें। राहु में शनि: राहु में शनि की अंतदर्शा का काल 2 वर्ष 10 माह और 6 दिन का होता है। इस अवधि में परिवार में कलह की स्थिति बनती है। तलाक भाई, बहन और संतान से अनबन, नौकरी में या अधीनस्थ नौकर से संकट की संभावना रहती है। शरीर में अचानक चोट या दुर्घटना के दुर्योग, कुसंगति आदि की संभावना भी रहती है। साथ ही वात और पित्त जनित रोग भी हो सकता है। दो अशुभ ग्रहों की दशा-अंतर्दशा कष्ट कारक हो सकती है। इससे बचने के लिए निम्न उपाय अवश्य करने चाहिए। भगवान शिव की शमी के पत्रों से पूजा और शिव सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र के जप स्वयं, अथवा किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण से कराएं। जप के पश्चात् दशांश हवन कराएं जिसमें जायफल की आहुतियां अवश्य दें। नवचंडी का पूर्ण अनुष्ठान करते हुए पाठ एवं हवन कराएं। काले तिल से शिव का पूजन करें। राहु में बुध: राहु की महादशा में बुध की अंतर्दशा की अवधि 2 वर्ष 3 माह और 6 दिन की होती है। इस समय धन और पुत्र की प्राप्ति के योग बनते हैं। राहु और बुध की मित्रता के कारण मित्रों का सहयोग प्राप्त होता है। साथ ही कार्य कौशल और चतुराई में वृद्धि होती है। व्यापार का विस्तार होता है और मान, सम्मान यश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। उपाय: भगवान गणेश को शतनाम सहित दूर्वाकुंर चढ़ाते रहें। हाथी को हरे पत्ते, नारियल गोले या गुड़ खिलाएं।अगर हाथी मिले तो नदी मे जो वहाऐ कोढ़ी, रोगी और अपंग को खाना खिलाएं। पक्षी को हरी मूंग खिलाएं। राहु में केतु: राहु की महादशा में केतु की यह अवधि शुभ फल नहीं देती है। एक वर्ष और 18 दिन की इस अवधि के दौरान जातक को सिर में रोग, ज्वर, शत्रुओं से परेशानी, शस्त्रों से घात, अग्नि से हानि, शारीरिक पीड़ा आदि का सामना करना पड़ता है। रिश्तेदारों और मित्रों से परेशानियां व परिवार में क्लेश भी हो सकता है। उपाय: भैरवजी के मंदिर में ध्वजा चढ़ाएं। कुत्तों को रोटी, ब्रेड या बिस्कुट खिलाएं कौओं को खीर-पूरी खिलाएं। घर या मंदिर में गुग्गुल लोवान कपुर आदि का धूप करें। मुली का दान करेकुते को रोटी ङाले राहु में शुक्र: राहु की महादशा में शुक्र की प्रत्यंतर दशा पूरे तीन वर्ष चलती है। इस अवधि में शुभ स्थिति में दाम्पत्य जीवन में सुख मिलता है। वाहन और भूमि की प्राप्ति तथा भोग-विलास के योग बनते हैं। यदि शुक्र और राहु शुभ नहीं हों तो शीत संबंधित रोग, बदनामी और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इस अवधि में अनुकूलता और शुभत्व की प्राप्ति के लिए निम्न उपाय करें- गाय को हरा चारा खिलाये सांड को गुड़ या घास खिलाएं। शिव मंदिर में स्थित नंदी की पूजा करें और वस्त्र आदि दें। एकाक्षी श्रीफल की स्थापना कर पूजा करें। स्फटिक की माला धारण करें। राहु में सूर्य: राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा की अवधि 10 माह और 24 दिन की होती है, जो अन्य ग्रहों की तुलना में सर्वाधिक कम है। इस अवधि में शत्रुओं से संकट, शस्त्र से घात, अग्नि और विष से हानि, आंखों में रोग, राज्य या शासन से भय, परिवार में कलह आदि हो सकते हैं। सामान्यतः यह समय अशुभ प्रभाव देने वाला ही होता है। उपाय: इस अवधि में सूर्य को अघ्र्य दें। उनका पूजन एवं उनके मंत्र का नित्य जप करें। हरिवंश पुराण का पाठ या श्रवण करते रहें। चाक्षुषोपनिषद् का पाठ करें। सूअर को मसूर की दाल खिलाएं। राहु में चंद्र: एक वर्ष 6 माह की इस अवधि में जातक को असीम मानसिक कष्ट होता है। इस अवधि में जीवन साथी से अनबन, तलाक या मृत्यु भी हो सकती है। लोगों से मतांतर, आकस्मिक संकट एवं जल जनित पीड़ा की संभावना भी रहती है। इसके अतिरिक्त पशु या कृषि की हानि, धन का नाश, संतान को कष्ट और मृत्युतुल्य पीड़ा भी हो सकती है। उपाय: राहु और चंद्र की दशा में उत्पन्न होने वाली विषम परिस्थितियों से बचने के लिए माता की सेवा करें। माता की उम्र वाली महिलाओं का सम्मान और सेवा करें। प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का शुद्ध दूध से अभिषेक करें। चांदी की प्रतिमा या कोई अन्य वस्तु मौसी, बुआ या बड़ी बहन को भेंट करें। चांदी की चेन गले मे घारन करे अगर कुंङली मे चंद्र योगकारक है तो मोती घारन करे राहु में मंगल: राहु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा का यह समय एक वर्ष 18 दिन का होता है। इस काल में शासन व अग्नि से भय, चोरी, अस्त्र शस्त्र से चोट, शारीरिक पीड़ा, गंभीर रोग, नेत्रों को पीड़ा आदि हो सकते हंै। इस अवधि में पद एवं स्थान परिवर्तन तथा भाई को या भाई से पीड़ा की संभावना भी रहती है।हनुमान जी की उपासना करे यहथोङे कोमन उपाय वताऐ मेने आपको फिर भी आप किसी अच्छे ज्योतिषी को कुंङली दिखा कर उपाय करे हा मित्रो मुफ्त के चक्कर मे अपने जिवन से खिलवाङ मत करे कुंङली दिखा कर ज्योतिषी को उसकी दक्षिणा दे आचार्य राजेश 09414481324 07597718725
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019
स्वर विघा का विज्ञान (स्वर योग)
स्वर विघा का विज्ञान (स्वर योग)
प्राण वायु मनुष्य के शरीर में श्वास लेने पर नासिका के माध्यम से प्रवेश करती है। नासिका में दो छिद्र होते हैं, जो बीच में एक पतली हड्डी के कारण एक दूसरे से अलग रहते हैं। मनुष्य कभी दाहिने छिद्र से और कभी बाँएँ छिद्र से श्वास लेता है। दाहिने छिद्र से श्वास लेते समय “दाहिना स्वर” तथा बाँएँ छिद्र से श्वास लेते समय “बाँयाँ स्वर” चलता है। अर्थात् श्वास-प्रश्वास की गति जिस नासिका छिद्र से प्रतीत हो, उस समय वही स्वर चलता समझें। यदि दोनों नासिका-छिद्रों से समान रुप से निःश्वास होता हो, तो उसे “मध्य स्वर” कहते हैं। यह स्वर प्रायः उस समय चलता है, जब स्वर परिवर्तन होने को होता है।सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है
, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात् पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात् इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।आप देखेंगे कि, बाएं हाथ का उपयोग करने वाले लोगों को दबा दिया जाता है! अगर कोई बच्चा बाएं हाथ से लिखता है, तो तुरंत पूरा समाज उसके खिलाफ हो जाता है माता पिता, सगे संबंधी, परिचित, अध्यापक सभी लोग एकदम उस बच्चे के खिलाफ हो जाते हैं। पूरा समाज उसे दाएं हाथ से लिखने को विवश करता है। दायां हाथ सही है और बायां हाथ गलत है। कारण क्या है? ऐसा क्यों है कि दायां हाथ सही है और बायां हाथ गलत है? बाएं हाथ में ऐसी कौन सी बुराई है, ऐसी कौन सी खराबी है? और दुनिया में दस प्रतिशत लोग बाएं हाथ से काम करते हैं। दस प्रतिशत कोई छोटा वर्ग नहीं है। दस में से एक व्यक्ति ऐसा होता ही है जो बाएं हाथ से कार्य करता है। शायद चेतनरूप से उसे इसका पता भी नहीं होता हो, वह भूल ही गया हो इस बारे में, क्योंकि शुरू से ही समाज, घर परिवार, माता पिता बाएं हाथ से कार्य करने वालों को दाएं हाथ से कार्य करने के लिए मजबूर कर देते हैं। ऐसा क्यों है?दायां हाथ सूर्यकेंद्र से, भीतर के पुरुष से जुड़ा हुआ है। बाया हाथ चंद्रकेंद्र से भीतर की स्त्री से जुड़ा हुआ है। और पूरा का पूरा समाज पुरुषकेंद्रित है।
हमारा बायां नासापुट चंद्रकेंद्र से जुड़ा हुआ है। और दायां नासापुट सूर्यकेंद्र से जुड़ा हुआ है।आप इसे आजमा कर भी देख सकते हो। जब कभी बहुत गर्मी लगे तो अपना दायां नासापुट बंद कर लेना और बाएं से श्वास लेना और दस मिनट के भीतर ही हमको ऐसा लगेगा कि कोई अनजानी शीतलता हम्हें महसूस होगी। यह बहुत ही आसान है। या फिर हम ठंड से कांप रहे हो और बहुत सर्दी लग रही है, तो अपना बायां नासापुट बंद कर लेना, और दाएं से श्वास लेना; दस मिनट के भीतर शरीर गर्म होने लगेगाहमारे योगाचार्य ने यह बात समझ ली और योगी कहते हैं और योगी ऐसा करते भी हैं प्रात: उठकर वे कभी दाएं नासापुट से श्वास नहीं लेते। क्योंकि अगर दाएं नासापुट से श्वास ली जाए, तो अधिक संभावना इसी बात की है कि दिन में व्यक्ति क्रोधित रहेगा, लड़ेगा झगड़ेगा, आक्रामक रहेगा शांत और थिर नहीं रह सकेगा। इसलिए योग के अनुशासन में यह भी एक अनुशासन है कि सुबह उठते ही सबसे पहले व्यक्ति को यह देखना होता है कि उसका कौन सा नासापुट क्रियाशील है। अगर बायां क्रियाशील है तो ठीक है, .वही ठीक क्षण होता है बिस्तर से बाहर आने का। अगर बायां नासापुट क्रियाशील नहीं है तो अपना दायां नासापुट बंद करना और बाएं से श्वास लेना। धीरे धीरे जब बायां नासापुट क्रियाशील हो जाए, तभी बिस्तर से बाहर पाव रखना।हमेशा सुबह उसी समय बिस्तर से बाहर आना जब बायां नासापुट क्रियाशील हो, और तब आप पाओगे कि पूरी की पूरी दिनचर्या में अंतर आ गया है। क्रोध कम आएगा, चिड़चिडाहट कम होगी और अधिकाधिक शांत, थिर और ठंडे अनुभव करोगे। ध्यान में अधिक गहरे जा सकोगे। अगर लड़ना झगड़ना चाहते हो, तो उसके लिए दायां नासापुट अच्छा है। अगर प्रेमपूर्ण होना चाहते हो, तो उसके लिए बायां नासापुट एकदम ठीक है।और हमारी श्वास हर क्षण, हर पल बदलती रहती है पर हम कभी इस पर ध्यान नहीं देते आप इस पर ध्यान देकर देखना आधुनिक चिकित्साशास्त्र को इसे समझना होगा, क्योंकि रोगी के इलाज में इसका प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है। ऐसे बहुत से रोग हैं, ऐसी बहुत सी बीमारियां हैं, जिनके ठीक होने में चंद्र की मदद मिल सकती है। और ऐसे रोग भी हैं जिनके ठीक होने में सूर्य से मदद मिल सकती है। अगर इस बारे में ठीक ठीक मालूम हो, तो श्वास का उपयोग व्यक्ति. के इलाज के लिए किया जा सकता है। लेकिन आधुनिक चिकित्साशास्त्र की अभी तक इस तथ्य से पहचान नहीं हुई है।श्वास निस्तर परिवर्तित होती रहती है. चालीस मिनट तक एक नासापुट क्रियाशील रहता है, फिर चालीस मिनट दूसरा नासापुट क्रियाशील रहता है। भीतर सूर्य और चंद्र निरंतर बदलते रहते हैं। हमारा पेंडुलम सूर्य से चंद्र की ओर, चंद्र से सूर्य की ओर आताजाता रहता है। इसीलिए हमारी भावदशा अकसर ही बदलती रहती है। कई बार अकस्मात चिडचिडाहट होती है बिना किसी कारण के, अकारण ही। बात कुछ भी नहीं है, सभी कुछ वैसा का वैसा है, उसी कमरे में बैठे हो कुछ भी नहीं हुआ है अचानक चिड़चिड़ाहट आने लगती है।थोड़ा ध्यान देना। अपने हाथ को अपने नाक के निकट ले आना और उसे अनुभव करना. तुम्हारी श्वास बायीं ओर से दायीं ओर चली गयी होगी। अभी थोड़ी देर पहले तो सभी कुछ ठीक था, और क्षण भर के बाद ही सभी कुछ बदल गया, कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा। बस, लड़ने को, झगड़ने को और कुछ भी करने के लिए तैयार हो।ध्यान रहे, हमारा पूरा शरीर दो भागों में विभक्त है। हमारा मस्तिष्क भी दो मस्तिष्कों में विभाजित है। हमारे पास एक मस्तिष्क नहीं है; दो मस्तिष्क हैं, दो गोलार्ध हैं। बायीं ओर का मस्तिष्क सूर्य मस्तिष्क है, दायीं ओर का मस्तिष्क चंद्र मस्तिष्क हैआप थोडी उलझन में पड़ सकते हो, क्योंकि ऐसे तो बायीं ओर सब कुछ चंद्र से संबंधित होता है, तो फिर दायीं ओर के मस्तिष्क का चंद्र से क्या संबंध! दायीं ओर का मस्तिष्क शरीर के बाएं हिस्से से जुड़ा हुआ है। बाया हाथ दायीं ओर के मस्तिष्क से जुड़ा हुआ है, दायां हाथ बायीं ओर के मस्तिष्क से जुड़ा हुआ है, यही कारण है। वे एक दूसरे से उलटे जुडे हुए हैं।दायीं ओर का मस्तिष्क कल्पना को, कविता को, प्रेम को, अंतर्बोध को जन्म देता है। मस्तिष्क का बाया हिस्सा बुद्धि को, तर्क को, दर्शन को, सिद्धांत को, विज्ञान को जन्म देता है।और जब तक व्यक्ति सूर्यऊर्जा और चंद्रऊर्जा के बीच संतुलन नहीं पा लेता है, अतिक्रमण संभव नहीं है। और जब तक बाया मस्तिष्क दाएं मस्तिष्क से नहीं मिल जाता है और उनमें एक सेतु निर्मित नहीं हो जाता है, तब तक सहस्रार तक पहुंचना संभव नहीं है। सहस्रार तक पहुंचने के लिए दोनों ऊर्जाओं का एक हो जाना आवश्यक है, क्योंकि सहस्रार परम शिखर है, आत्यंतिक बिंदु है। वहां न तो पुरुष की तरह पहुंचा जा सकता है, न ही वहा स्त्री की तरह पहुंचा जा सकता है। वहा एकदम शुद्ध चैतन्य की तरह होकर, समग्र और संपूर्ण होकर पहुंचना संभव होता है।पुरुष की कामवासना सूर्यगत है, स्त्री की कामवासना चंद्रगत है। इसीलिए स्त्रियों के मासिक धर्म का चक्र अट्ठाइस दिन का होता है, क्योंकि चंद्र का मास अट्ठाइस दिन में पूरा होता है। स्त्रियां चंद्रमा से प्रभावित होती हैं चंद्र का वर्तुल अट्ठाइस दिन का होता है।और इसीलिए बहुत सी स्त्रिया पूर्णिमा की रात थोड़ depression का अनुभव करती हैं। याकहे कि असहज महसूस करती है जब पूर्णिमा की रात आए, तो अपन जैसे पूर्णिमा की रात समुद्र में ज्वार भाटा आने लगता है और समुद्र प्रभावित हो जाता है, ऐसे स्त्रियां भी उत्तप्त हो जाती हैं।क्या आपने कभी ध्यान दिया है? पुरुष खुली आंखों से प्रेम करना चाहता है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि प्रकाश भी पूरा चाहता है। अगर किसी तरह की बाधा न हो, तो पुरुष दिन में प्रेम करना पसंद करता है। और उन्होंने ऐसा करना शुरू भी कर दिया है स्त्री अंधकार में प्रेम करना पसंद करती है, जहां थोड़ी भी रोशनी न हो और अंधेरे में भी वे अपनी आंखें बंद कर लेती हैं।चंद्रमा रात्रि में, अंधकार में चमकता है, उसे अंधकार से प्रेम है रात्रि से।इसीलिए स्त्रियां अश्लील साहित्य में उत्सुक नहीं हैपुरुष सूयोंमुन्धी होता है, उसे प्रकाश अच्छा लगता है। आंखें सूर्य का हिस्सा हैं, इसीलिए आंखें देखने में सक्षम होती हैं। आंखों का तालमेल सूर्य ऊर्जा के साथ रहता है। तो पुरुष आंखों से, दृष्टि से अधिक जुड़ा हुआ है। इसीलिए पुरुष को देखना अच्छा लगता है और स्त्री को प्रदर्शन करना अच्छा लगता है। पुरुषों को यह समझ में ही नहीं आता है कि आखिर स्त्रियां स्वयं को इतना क्यों सजाती संवारती हैं?स्त्रियों में प्रदर्शन की प्रवृत्ति होती है वे चाहती हैं कोई उन्हें देखे। और यह एकदम ठीक भी है, क्योंकि इसी तरह से तो पुरुष और स्त्रियां एक दूसरे के अनुकूल बैठ पाते हैं पुरुष देखना चाहता है, स्त्री दिखाना चाहती है। वे एक दूसरे के अनुरूप हैं, यह एकदम ठीक है। अगर स्त्रियों को प्रदर्शन में उत्सुकता न होगी, तो वे दूसरी कई मुसीबत खड़ी कर देती हैं। और अगर पुरुष स्त्री को देखने में उत्सुक नहीं है, तो फिर स्त्री किसके लिए इतना श्रृंगार करेगी, आभूषण पहनेगी, सजेगी संवरेगी आखिर किसके लिए? फिर तो कोई भी उनकी तरफ नहीं देखेगा। प्रकृति में हर चीज एक दूसरे के अनुरूप होती है, उनमें आपस में सिन्क्रानिसिटी, लयबद्धता होती है।लेकिन अगर सहस्रार तक पहुंचना हो, तो द्वैत को गिराना होगा। परमात्मा तक पुरुष या स्त्री की भांति नहीं पहुंचा जा सकता है। परमात्मा तक तो सहज रूप में, शुद्ध अस्तित्व के रूप में ही पहुंचा जा सकता है, स्त्री और पुरुष के रूप में नहीं।सिर के शीर्ष भाग के नीचे की ज्योति पर संयम केंद्रित करने से समस्त सिद्धों के अस्तित्व से जुड्ने की क्षमता मिल जाती है।ऊर्जा को अगर ऊपर की ओर गतिमान करना है, तो इसकी विधि संयम है। पहली बात, अगर आप पुरुष हो तो तुम्हें तुम्हारे सूर्य के प्रति तुम्हारे सूर्य ऊर्जा के केंद्र के प्रति, तुम्हारे काम केंद्र के प्रति, पूरी तरह होशपूर्ण होना होगा। तुम्हें मूलाधार में रहना होगा, अपने संपूर्ण चैतन्य को, अपनी पूरी ऊर्जा को मूलाधार पर बरसा देना होगा। जब मूलाधार पर पूरा होश आ जाता है तो पाओगे कि ऊर्जा केंद्र की ओर उठ रही है, चंद्र की ओर बढ़ रही है।और जब ऊर्जा चंद्रकेंद्र की ओर गतिमान होगी तव आप बहुत संतृप्ति, बहुत आनंदित अनुभव करोगे। सारी कामवासना के आनंद इसकी तुलना में कुछ भी नहीं हैं कुछ भी नहीं हैं। जब सूर्य ऊर्जा अपनी ही चंद्रऊर्जा में उतरती है, तो उस आनंद की सघनता उससे हजारों गुना अधिक होती है। तब सच में पुरुष और स्त्री का मिलन घटित होता है। बाहर किसी भी स्त्री से कितनी भी निकटता क्यों न हो, कितने भी करीब क्यों न हो, आप अपने को पृथक और अलग ही अनुभव करते है बाहर का मिलन तो बस सतही और औपचारिक ही होता है दो सतह, दो परिधियां ही आपस में मिलती हैं। दो सतह एक दूसरे को स्पर्श करती हैं, बस इतना ही होता है। लेकिन जब सूर्यऊर्जा चंद्रऊर्जा की ओर गतिमान होती है, तब दो ऊर्जा केंद्रों की ऊर्जा आपस में मिल जाती है और जिस व्यक्ति के सूर्य और चंद्र एक हो जाते हैं, वह परम रूप से आनंदित और संतृप्त हो जाता है और फिर वह हमेशा आनंदित और संतृप्त बना रहता है, क्योंकि इसको खोने का कोई उपाय ही नहीं है। यह आनंद और मिलन सनातन है।अगर आप स्त्री हो तो अपनी संपूर्ण चेतना को हारा तक ले आना होगा, और तब तुम्हारी ऊर्जा सूर्य केंद्र की ओर बढ़ने लगेगी। प्रत्येक व्यक्ति में एक केंद्र निष्किय होता है और एक केंद्र सक्रिय होता है। सक्रिय केंद्र को निष्किय केंद्र के साथ जोड़ दो, तो निष्क्रिय केंद्र सक्रिय हो जाता है।और जब दोनों ऊर्जाओं का मिलन होता है जब सूर्यऊर्जा और चंद्रऊर्जा एक हो रहे होते हैं, तो ऊर्जा ऊपर की ओर उठती है। तब व्यक्ति ऊर्ध्वगमन की ओर बढ़ने लगता है।जिज्ञासु व्यक्ति अनुभवी स्वर साधक से स्वरोदय विज्ञान का अवश्य गहन अध्ययन करें। क्योंकि स्वर विज्ञान से न केवल रोगों से ही बचा जा सकता है, अपितु प्रकृति के अदृष्य रहस्यों का भी पता लगाया जा सकता है। मानव देह में स्वरोदय एक ऐसी आश्चर्यजनक, सरल, स्वावलम्बी, प्रभावशाली, बिना किसी खर्च वाली चमत्कारी विद्या होती है, जिसका ज्ञान और सम्यक् पालना होने पर किसी भी सांसारिक कार्यो में असफलता की प्रायः संभावना नहीं रहती। स्वर विज्ञान के अनुसार प्रवृत्ति करने से साक्षात्कार में सफलता, भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभ्यास, सामने वाले व्यक्ति के अन्तरभावों को सहजता से समझा जा सकता है। जिससे प्रतिदिन उपस्थित होने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों से सहज बचा जा सकता है। अज्ञानवश स्वरोदय की जानकारी के अभाव से ही हम हमारी क्षमताओं से अनभिज्ञ होते हैं। रोगी बनते हैं तथा अपने कार्यो में असफल होते हैं। स्वरोदय विज्ञान प्रत्यक्ष फलदायक है, जिसको ठीक-ठीक लिपीबद्ध करना संभव नहीं। केवल जनसाधारण के उपयोग की कुछ मुख्य सैद्धान्तिक बातों की आंशिक और संक्षिप्त जानकारी ही यहां दी गई है।
रविवार, 3 फ़रवरी 2019
चंद्र ग्रह
शनिवार, 2 फ़रवरी 2019
् मंगल की वात करे
शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019
ज्योतिषी ओर राहु
कहा जाता है कि लोहा हमेशा लोहे को काटता है उसी प्रकार से जो भी कारण जीवन मे पैदा होते है वह राहु के द्वारा ही पैदा होते
है,राहु अगर तकनीकी पहलू मंगल की सहायता से दे दिया जाता है वह भी केन्द्र त्रिकोण मे तो राहु मंगल बजाय खराब असर देने के और अधिक बढोत्तरी देने लग जायेंगे और त्रिक भाव या पणफ़र भाव में राहु मंगल की युति को ले लिया गया तो समस्या बजाय घटने के और भी बढने लगेगी। राहु की सीमा नही है कितना कष्ट दे सकता है या कितनी ऊंचाई पर ले जा सकता है,जैसे हाथी का भरोसा नही है कि वह कब बल पूर्वक अच्छे काम करता है और कब बिगडने पर गली की गली साफ़ करने के लिये अपनी शक्ति को प्रयोग मे ला सकता है। राहु शुक्र की युति मिलने का समय आता है व्यक्ति के अन्दर प्रेम रोग का भूत सवार हो जाता है उसे अपनी दुनिया समझ मे ही नही आती है,अगर उसी युति को मंगल की सहायता से मिला लिया जाये तो वह भूत बजाय बिगाडने के ऊंची ऊंची पोजीसन भी दिलवा सकता है जितना है उससे करोडों गुना बढा भी सकता है। राहु गुरु की युति आती है आम आदमी भी अपने को शहंशाह समझने लगता है उसे लगता है कि उसके सामने उसकी बुद्धि के जैसा कोई नही है वह तर्क वितर्क से अपने प्रभाव देना शुरु कर देता है उसे एक गंदगी मे भी सोना नजर आने लगता है वह धर्म और शिक्षा के अलावा रिस्ते आदि मे अपनी सीमा को तादात से अधिक बढाने लगता है अगर साथ मे मंगल को लिया गया है तो वह इन्ही कारणो मे तकनीकी कारण देखने के बाद उस क्षेत्र मे अपने को नाम और यश के रास्ते ले जायेगा और मंगल की युति नही ली है या केवल शुक्र का सहारा लिया है तो धन और वैभव मे तो आगे बढ जायेगा सुरा सुन्दरी की प्राप्ति तो हो जायेगी लेकिन जैसे ही राहु गुरु का असर समाप्त हुआ उसके अपने ही लोग उसे ले डूबेंगे।कुछ भी अजब व गजब कर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर पाखण्ड फैलाकर लोगो की आस्था को बेचने वाले ज्योतिषियो के मानसिक विकार का फल है राहुज्योतिष के मामले में राहु अपनी चलाने के चक्कर में ग्रह और भावों को गलत बताकर भय देने के बाद पूंछने वाले से धन या औकात को छीनने का कार्य करता है.| आपने देखा होगा की कुछ लोग फेसबुक पर अपना नम्बर देते है और फिर बोलते है की आपका ये ग्रह खराब है ऐसा करे नही तो आपका बहुत बुरा होगा और इस दोष को दूर करने के लिय इतने हमे दें वो भी साक्षात राहू का ही कार्य कर रहे होते है |आपने कुछ ज्योतिष्यों के स्टेट्स पढ़े होंगे जिनमे वो लिखते है की वो हर रोज 200 २५० काल रिसीव करते है १०० से उपर कुंडलिया देखते है और मेसेज का पता ही नही कितने को जवाब देते है जहां तक हमे पता है की असलियत जीवन में ऐसा सम्भव नही है क्योंकि ऐसा किसी मानव के बस का कार्य तो होता नही उपर से facebook पर हर रोज कई पोस्ट भी करते है और उन पर आये पोस्ट का जवाब भी देते है , फिर भी वो अपनी कुटिलता का जाल फैलाकर लोगोंको को उलझा लेते है और ये सब भी राहू की ही करामात है | मिनटों में आपकी समस्या का हल करने वाले भी राहू के ही समान है | जिस प्रकार राहू ने छल कपट से अमृत का पान किया था इसी प्रकार इन लोगों का उद्देश्य भी अपने प्रपंच द्वारा लोगो को लूटना होता है जो लोग फेक id बनाकर फेसबुक पर है और अपनी असली pic की जगह किसी अन्य की pic लगाते है उनमे भी राहू की ही सिफत छुप्पी हुई होती है क्योंकि राहू ने भी रूप बदलकर अमृत पान किया था बिना किसी कारण के किसी की पोस्ट पर जाकर बकवास करना या अश्लील पोस्ट करना भी खराब राहू वाले के ही लक्ष्ण है | मित्रों राहू में अवगुण है तो इसमें गुण भी है इसिलिय कहा जाता है की जिसे राहू तारे उसे कौन मारे | जीवन में होने वाले अविष्कार राहू की ही दें होते है | अचानक से मिलने वाली सफलता भी राहू की ही दें है जैसे की अचानक से कोई आदमी किसी विशेष कारण से प्रसिद्ध हो जता है सभी न्यूज़ चैनल न्यूज़ पपेर में उसी की चर्चा होती है चाहे ये प्रिसिधि उसे किसी अच्छे या बुरे किसी भी कार्य के लिय मिली हो लेकिन राहू द्वारा दी गई ऐसी प्रसिधी ज्यादा दिन नही चलती और लोग कुछ ही दिनों में उसे भूल जाते है | राजनीति में किसी नेता को अचानक से मिलने वाली भारी भरकम सफलता के पीछे भी राहू ही होता है जैसा की आपको पता है की छल कपट राजनीति का अहम हिस्सा होता है |
गुरुवार, 31 जनवरी 2019
कुंडली कुंभ लग्न की
एक सज्जन का यह प्रश्न है।आकाश के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग को कुंभ राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्न कुंभ माना जाता है कुण्डली कुम्भ लगन की है और राशि कर्क है। राहु ,पंचम स्थान मे विराजमान है,चन्द्रमा छठे भाव मेकुंभ लग्न की कुंडली में मन का स्वामी चंद्र षष्ठ भाव का स्वामी होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता हैओर विराजमान है,शनि मंगल दोनो अष्टम स्थान मे विराजमान है,गुरु भाग्य भाव मे विराजमान हैसमस्त विश्व को प्रकाशित करने वाला सूर्य सप्तम भाव का स्वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है.,सूर्य कार्य भाव मे है और केतु बुध लाभ भाव मे विराजमान है,तथा शुक्र जो नवे भाव का मालिक है वह बारहवे भाव मे विराजमान है।
घर किस्मत का तभी पनपता,जीव उजाले बैठा हो,चार सात घर खाली होते जीव तन्हा रह जाता है"इस बात को इस कुंडली से समझा जा सकता है,किस्मत का मालिक शुक्र है और शुक्र बारहवे भाव मे जाकर उच्च का हो जाता है। बारहवा भाव आसमान का घर भी कहलाता है। लेकिन चार और सात दोनो खाली है इस प्रकार से किस्मत उच्च की होने के बावजूद भी जातक का जीवन तन्हा है वह अपने को अकेले में ही रखना पसन्द करता है। शनि और मंगल उसके अष्टम मे है इस बात के लिये कहा जाता है:-सालन सस्ता फ़ूस से बनता,रोज कमाना खाना है,जीव अहारी मरा जो खावे अष्टम शनिमंगल की बलिहारी"्आठवे घर को शमशान की उपाधि दी जाती है,अस्पताल का घर भी कहा जाता है,शनि को सडा हुआ भी कहा जाता है और मंगल को पकाने वाला भी कहा जाता है। फ़ूस का अर्थ पत्ते वाले ईंधन से है किसी वस्तु को पकाने के लिये अगर पत्तों को जलाया जाये तो वह अपनी गर्मी को पैदा नही कर पाता है,जब तक पत्ते जलाते रहो तब तक आग बनी रहती है और जैसे ही पत्ते खत्म हो गये आग भी खत्म हो गयी,शनि काले रंग की राख ही मिलती है। यह अर्थ अक्सर शमशानी खाने से भी जोडा जाता है जैसे मांस का भोजन,शनि को शिथिलता से भी जोडा जाता है और इस शनि की शिथिलता को दूर करने के लिये दवाइयों के रूप में मंगल को भी देखा जाता है जो शिथिलता को दूर करे। अक्सर इस युति वाले जातक को मरा हुआ मांस या जमीन के नीचे पैदा होने वाले कंद आदि खाने का शौक भी होता है। जातक को मंगल और शनि की शिफ़्त से शुगर या केंसर जैसी बीमारी भी हो जाती है। लेकिन बारहवा शुक्र जो किस्मत का मालिक है दोनो ग्रहों से अपनी युति को बनाकर बैठता है तो जातक को धन वाली कम्पनी मे या अस्पताल मे अथवा गुप्त रहस्यों को खोजने और सुलझाने मे सहायता भी मिलती है,शुक्र वैज्ञानिक बनाने के लिये भी अपनी तकनीक को देता है।पंचम राहु नौटंकी वाला गुरु नवें से करता है".पांचवे भाव मे राहु की नजर अगर पांचवी द्रिष्टि से गुरु पर पडती है तो जातक अक्सर व्यापार के मामले मे धन का ब्रोकर वाला कार्य करता है,यह कार्य लोगों के लिये किये जाने वाले मनोरंजन को भी व्यापारिक कारणो से जोड कर चलने वाला होता है। अपनी बाहरी जिन्दगी मे वह अपने जीवन की नैया को भाग्य के सहारे भी छोड कर अपने जीवन को लोगों के हित के लिये भी शुरु करने वाला होता है,लेकिन उसके लिये कोई भी जोखिम का काम नौटंकी करने जैसा ही होता है। यहां तक कि वह अपने आने वाली संतान के मामले मे भी दोहरी जिन्दगी को जीने की चाहत वाला माना जाता है इस प्रकार के जातक के कोई भी काम प्लान बनाकर सफ़ल नही हो पाते है वह जो भी काम रास्ता चलते करता है वह पूरा हो जाता है।शुक्र बारहवा सूर्य दसें में अन्धापन दे जाता है,कानूनी मसलों के कारण मन ही मन पछताता है"अगर शुक्र बारहवा हो और सूर्य दसवे भाव मे हो तो किसी न किसी प्रकार की बीमारी आंख सम्बन्धी हो जाती है,यह युति अक्सर शरीर मे पोषक तत्वों की कमी के कारण ह्रदय रोग को भी देने वाला होता है और शरीर मे खून के थक्के जमने की बीमारी भी देता है। किडनी वाले रोग भी देने के लिये यह सूर्य और शुक्र की युति अपना काम करती है। अधिक से अधिक खर्चा दवाइयों और अस्पताली कारणो मे ही होता रहता है।शुक्र बारहवां त्रिया हितकारी"बारहवे शुक्र के होने पर अगर जातक अपनी स्त्री से हित लगाकर चलता है तो वह जीवन मे दिक्कत नही उठाता है जितना वह अपनी स्त्री को परेशान करेगा उतना ही वह दुखी होगा,इसके अलावा भी अगर जातक मीडिया और सजावट वाले कामो को बिजली वाले कामो को लेकर चलता है तो वह जीवन मे धन के लिये भी दुखी नही हो पायेगा जैसे ही उसकी शादी होगी उसकी स्त्री जातक के सभी कष्टों को अपने पर झेलने के लिये तैयार हो जायेगी।
रविवार, 27 जनवरी 2019
ज्योतिषी भी उजाड़ देते हैं जिन्दगी।
ज्योतिषी भी उजाड़ देते हैं जिंदगी। कैसे देखें यह कुंडली एक कन्या की है,सिंह लगन है स्वामी सूर्य है,भाग्य के मालिक मंगल है पति का मालिक शनि है,पति के भाग्य का मालिक शुक्र है,धन और लाभ का मालिक बुध है,लगनेश सूर्य भाग्येश और चतुर्थेश मंगल लाभेश और धनेश बुध एक साथ ही भाग्य भाव मे विराजमान है.
मंगल स्वराशि मे है शुक्र भी स्वराशि मे है,चन्द्रमा स्वराशि मे है,शनि उच्च राशि मे जाकर वक्री हो गया है,राहु उच्च का है लेकिन लाभ भाव मे है और केतु भी उच्च राशि मे लेकिन पंचम मे जाकर अपना प्रभाव जीवन मे देने के लिये बैठ गया है। जातिका के पति भाव को राहु केतु शनि तीनो ने अपने अपने अनुसार बल दिया है।कन्या का विवाह विच्छेद केवल इसलिये हो गया है क्योंकि एक ज्योतिषी ने कन्या के पति को राय दे डाली कि यह कन्या भाग्यहीन है। इस कुंडली के अनुसार जब कन्या के भाग्य में भाग्य के मालिक विराजमान है,कन्या तीन तीन विषयों मे डिग्री लेकर बैठी है,कन्या के लगनेश सूर्य भाग्य के ही घर मे विराजमान है लाभ और धन के मालिक कन्या के भाग्य मे विराजमान है फ़िर उन ज्योतिषी जी को कैसे समझ मे आ गया कि कन्या भाग्य हीन है ? जिस दिन से कन्या ने जन्म लिया उसके पिता की दिनो दिन बढोत्तरी हो गयी,जिस दिन से कन्या ने जन्म लिया पिता की साख जनता मे बहुत अच्छी हो गयी,फ़िर कन्या कहां से भाग्य हीन हो गयी। इससे लगता है कि कन्या के पति ने अपने भाग्य को मिटाने के लिये कुचक्र पैदा किया और किसी अज्ञानीज्योतिषी से कहला दिया कि कन्या भाग्य हीन है। कन्या के पति भाव का मालिक शनि है शनि कन्या के तीसरे भाव मे वक्री है,वैसे तो शनि उच्च राशि का होकर तुला राशि मे विराजमान है,लेकिन नियम के अनुसार जब कोई ग्रह उच्च का होकर वकी हो जाता है तो वह नीच का फ़ल देने लगता है। पति के ग्यारहवे भाव मे केतु विराजमान है ग्यारहवा केतु धनु राशि का है,कहने को तो उच्च राशि मे है लेकिन पति के लाभ भाव को केतु अपनी शक्ति दे रहा है,और पति के पंचम मे विराजमान राहु का असर लेकर पति की व्यापारिक बुद्धि का उल्टा फ़ायदा लेकर पति को चंद रुपयों के लिये बनायी हुयी राय जो खुद ने ही प्रकाशित की होगी या किसी घटिया सोफ़्टवेयर से कुंडली को निकाल कर दिखा दिया होगा और कह दिया होगा कि उसकी पत्नी भाग्यहीन है। मित्रों इसलिए अपनी कुंडली कैसे सही ज्योतिषी जो पूरा ज्ञान रखता हो को ही दिखाएं मित्रों रतन भी अगर आप पहन रहे हैं तो किसी अच्छे रतन एक्सपर्ट ज्योतिषी को ही मिलकर ले अब पुखराज का ही उदाहरण लें पुखराज कई किस्मों में कई रंगों में मिलता है अब आपको कोई पुखराज बताता है तो आप अपने हिसाब से बाजार से लेकर पहन लेते हैं जो आपको उल्टा असर भी दे सकता है अब पुखराज कौन सा पहनना है यह अपने ज्योतिषी को पूछ कर दिखा कर ही लेओर देखें कुंडली कर्क राशि की है,चन्द्रमा का स्थान राहु से दूसरे भाव मे है यह कन्या डरने वाली है,लेकिन उसे दम देने के लिये मंगल जो नवे भाव का है ने राहु को कन्ट्रोल करने केलिये अपनी शक्ति दी है,अष्टम और पंचम का मालिक गुरु भी चौथे भाव मे वृश्चिक राशि का होकर वक्री है,वर्तमान मे राहु ने भी गुरु पर अपना असर दिया है और वह कनफ़्यूजन मे है,गुरु यानी रिस्ते को कनफ़्यूजन मे देकर बरबाद करने के लिये भी माना जा सकता है,गुरु का सम्बन्ध दसवे शुक्र से भी है शुक्र कार्य और तीसरे भाव का मालिक है,जातिका के पति भाव से शुक्र का स्थान चौथे भाव मे है,इस प्रकार से पति के दिमाग मे एक सात दो स्त्रियों का होना भी माना जा सकता है। कन्या का विवाह जहां होता है वहां की स्त्रियां अपने अनुसार कन्या के पैतृक परिवार की समृद्धि देख कर सहन नही कर पाती है। साथ ही मंगल का स्वराशि मे होने के कारण और सूर्य के साथ होने से मंगल का राहु हो पति भाव से पंचम मे स्वछन्द गति से अपने अनुसार हमेशा बदलने वाले रिस्तो को अपनाने के कारण और राहु से बारहवे शुक्र यानी स्त्री जाति को केवल भोग्या समझने के कारण वह कन्या के परिवार का अंकुश सहन नही कर पाया यह भी कारण हो सकता है,इसके अलावा भी राहु जो कन्या के परिवार से कन्ट्रोल किया गया है राहु ग्यारहवे भाव मे ज्योतिषी का रूप धारण कर लेता है और वह केवल लाभ के लिये अपने कार्यों को करता है साथ ही धर्म कर्म से सम्बन्धित दो लोगो को अपने साथ लेकर चलता है पूजा पाठ कर्मकांड आदि के काम वह अपने अनुसार करवाता है साथ ही वह इन कार्यों के बदले मे वह अच्छे धन को प्राप्त करने के लिये अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है। उस ज्योतिषी ने कन्या परिवार से भी किसी पूजा या कर्मकांड के लिये धन की मांग की होगी और कन्या परिवार ने अपने प्रभाव के कारण उस ज्योतिषी को कन्ट्रोल करने के लिये अपनी शक्ति का प्रयोग किया होगा उस ज्योतिषी ने अपने कर्म कांड का हवाला देकर पति परिवार को अपने ग्रहण मे लिया होगा और पति के परिवार ने उस ज्योतिषी की बात को सही मानकर कन्या से छुटकारा करने के लिये तलाक लेने का कार्य रचा होगा। वक्री शनि की नजर पंचम केतु पर है,पति के द्वारा विदेशी कार्य किसी ब्रोकर से करवाये जा रहे होंगे,पिछले समय मे जन्म के केतु पर गोचर के राहु ने अपने कनफ़्यूजन को दिया,पति के किये जाने वाले कार्य और लाभ देने वाले विदेशी ब्रोकर से लाभ का आना बन्द हो गया,साथ ही पति भाव से ग्यारहवे राहु और जन्म के छठे चन्द्रमा से युति होने के कारण जो कार्य प्लान बनाकर किये जा रहे थे वह सभी कनफ़्यूजन मे चले गये और पति को यह लगने लगा कि उसकी शादी के बाद से ही सब कुछ उल्टा होने लगा है इसलिये भी पति ने ज्योतिषी से राय ली और पूरी पत्री की व्याख्या जाने बिना उस ज्योतिषी ने अपनी राय मे कह दिया कि उसकी पत्नी का भाग्य सही नही है इसलिये उसका कारोबार दिक्कत मे आ गया है।
जब तक विवाह भाव को सही नही देखा जाता है और विवाह तथा साझेदारी को स्पष्ट तरीके से विवेचना मे नही लाया जाता है कोई भी व्यक्ति हरगिज किसी सही नतीजे पर नही पहुंच सकता है। जब सूर्य मंग्ल बुध एक ही भाव मे है और भाग्य भाव मे है तपते हुये मंगल को सूर्य की रोशनी मिल जाती है तो वह अपने वास्तविक रूप मे आजाता है। बुध का साथ मिलने पर वह बुध जो कोमल प्रकृति का होता है दोनो के प्रभाव से कुम्हला जाता है। पति भाव से तीसरे भाव मे सूर्य मंगल के होने से यही कारण माना जाता है.सूर्य मंगल बुध अगर त्रिकोण मे है तो तीन भाई का योग होता है,कारण तीनो ही ग्रह पुरुष राशि मे होने के कारण पुरुषत्व को प्रकट करते है,सूर्य और मंगल मित्र है इसलिये दो भाई जातिका के आज्ञाकारी है और जो जातिका कहती है उसे करने को तैयार हो जाते है इस बात पर भी जातिका के पति को डर लगने लगा हो कि उसने कभी कोई ऐसी वैसी बात वैवाहिक जीवन के अन्दर पैदा की तो जातिका के दोनो भाई क्या से क्या कर सकते है। इसलिये भी कोई कारण नही मिलने पर जातिका के पति ने ज्योतिषी को लोभ देकर कन्या को भाग्यशाली करार दिलवाया हो। जातिका का एक भाई किसी एजेन्सी का कार्य करता है,अक्सर यह सम्बन्ध यात्रा के अन्दर बनते है और जो सम्बन्ध सिंह राशि के यात्रा मे बनते है वे अक्सर धोखा ही देने के लिये माने जाते है।चन्द्र गुरु की युति भी खतरनाक बन जाती है,पति का पिता धार्मिक हो सकता है,लेकिन जातिका की मां धर्म पर विश्वास करने वाली नही होती है,दोनो के सम्बध बनने का कारण चन्द्र गुरु की युति से भी मिलता है जातिका के माता पिता कहीं दूर से जाकर बसे हो और जो समबन्ध बना है वह अनजान लोगो का हो,साथ ही वक्री गुरु का एक प्रभाव यह भी देखा जाता है कि जब वक्री गुरु वक्री शनि के घेरे मे हो तो व्यक्ति जहां रहता है वहां की सभ्यता मर्यादा सामाजिकता आदि सभी विरोध करने वाला होता है,वह उल्टे कार्य करता है और उसके यह कार्य जातिका को सही नही लगे वह उसके अनुसार नही चली हो,इसके बाद भी गुरु चन्द्र की युति अगर कन्या की कुंडली मे मिलती है तो अपने आप ही कन्या की सास से नही बनती है,किसी न किसी बात पर बेकार का मनमुटाव बन जाता है यह प्रभाव गुरु के वक्री होने पर अपने आप ही नफ़रत का रूप ले लेता है। कन्या की सास डायबटीज की रोगी भी होती है और बीमार भी होती है वह बहू के स्थान पर नौकरानी चाहती है लेकिन तीन तीन डिग्री धारण करने वाली कन्या कैसे किसी की नौकरानी बन सकती है।इस प्रकार से कहा जा सकता है कि जातिका बहुत भाग्य शाली है लेकिन भाग्य को प्रयोग करने के लिये मर्द की जरूरत होनी चाहिये अगर कोई चालाक और झूठ पर अपनी गाडी चलाने वाला होगा तो वह ज्योतिषी की राय को ही मानेगा,कहा भी गया है कि पुरुषार्थ सितारों को चलाने वाला होता है और कामचोर को सितारे चलाते रहते है,पुरुषार्थी ज्योतिष से केवल अच्छे और बुरे समय को इसलिये पूंछते है कि उन्हे पहले से क्या तैयारी करनी है जबकि कामचोर केवल ज्योतिष को इसलिये पूंछते है कि वे बिना कार्य किये कैसे मुफ़्त का माल ले सकते है।
बुधवार, 23 जनवरी 2019
राहु का गोचर ओर राहु की माया
मित्रोंअक्सर लोगो का बहम होता है कि व्यक्ति पर भूत प्रेत पिशाच का साया है और वह उनके प्रभाव मे आकर अपनी जिन्दगी को या तो तबाह कर लेता है।पर होता है राहु का असर बिल्कुल उसके लक्षण ऐसे होते हैं जैसे कोई भूत प्रेत से ग्रस्त काया सीधा सा अर्थ है कि भूत कोई अन्जानी आत्मा नही है वह केवल अपने द्वारा किये गये प्रारब्ध यानी पूर्व के कर्मो का फ़ल है,पिशाच कोई खतरनाक आत्मा या द्रश्य रूप मे नरभक्षक नही है वह केवल अपने अन्दर की वासनाओं का कुत्सित रूप है। प्रेत का मतलब कोई खतरनाक यौनि नही है बल्कि स्थान विशेष पर किये गये कृत्यों का सूक्ष्म रूप है जो बडे आकार मे केवल सम्बन्धित व्यक्ति को ही द्रश्य होता है।इन सब कारणो को प्रदर्शित करवाने के लिये राहु को जिम्मेदार माना जाता है
यानी राहु का असर भी ऐसा होता है जेसे भूत प्रेत और हवा से ग्रस्त आदमी यह कुंडली मे जिस भाव मे जिस ग्रह के साथ गोचर करता है उसी ग्रह और भाव तथा राशि के अनुसार अपनी शक्ति का एक नशा पैदा करता जाता है और जीवन मे या तो अचानक बदलाव आना शुरु हो जाता है। एक अच्छा आदमी बुरा बन जाता है या एक बुरा आदमी अच्छा बन जाता है आदि बाते राहु से समझी जा सकती है।
मेरी हमेशा भावना रही है कि जो कारण भौतिकता मे सामने आते है और जिन्हे हम वास्तव मे देखते है समझते है महशूश करते है उनके प्रति ही मै आपको बताऊँ कपोल कल्पित या सुनी सुनाई बात पर मुझे तब तक विश्वास नही होता है,जब तक प्रत्यक्ष रूप मे उसे प्रमाणित नही कर के देख लूँ। इस प्रमाणिकता के लिये कई बार जीवन को भी बडे जोखिम मे डाल चुका हूँ और राहु के प्रभाव को ग्रह के साथ गोचर के समय मिलने वाले प्रभाव को साक्षात रूप से समझकर ही लिखने और बताने का प्रयास करने का मेरा उद्देश्य रहा है। साथ ही राहु के प्रभाव को कम करने के लिये और उसके रूप को बदलने के लिये जितनी भी भावना रही है उनके अनुसार चाहे वह बदलाव चलने वाले प्रभाव को बाईपास करने से सम्बन्धित हो या बदलाव को अलग करने के लिये किये जाने वाले तांत्रिक कारणो से जुडे हो वह सभी अपने अपने स्थान पर कार्य जरूर करते है राहु एक मायावी ग्रह है वह जब किसी भी भाव मे अपना असर प्रदान करता है तो भाव के अनुसार उल्टी गति राहु के प्रभाव से भाव मे मिलनी शुरु हो जाती है इसके साथ ही राहु की गति उल्टी होती है वह अन्य ग्रहो के अनुसार सीधा नही चलता है उल्टे चलकर ही अपने प्रभाव को प्रदर्शित करता है,साथ ही जो भाव जीवन मे सहायक होता है उसके लिये वह अपने प्रभाव को देने के लिये सहायता वाले भाव के प्रति अपनी धारणा को पूर्व से ही बदलना शुरु कर देता है जैसे राहु को कोई बीमारी देनी है तो वह सबसे सहायता देने वाले डाक्टर या दवाई से दूरी पैदा कर देता है अगर समय पर डाक्टर की सहायता मिलनी है तो किसी न किसी बात पर डाक्टर के प्रति दिमाग मे क्षोभ पैदा कर देगा और उस डाक्टर से दूरी बना देगा,और जैसे ही बीमारी पैदा होगी उस डाक्टर की सहायता नही मिल पायेगी या जो दवाई काम आनी है वह पास मे नही होगी या उस दवाई को खोजने पर भी वह नही मिलेगी,अगर किसी प्रकार से मिल भी गयी तो वह दवाई पहले से ली गयी अन्य दवाइयों के असर मे आकर अपना वास्तविक प्रभाव नही दे पायेगी। राहु का मुख्य काम होता है वह घटना के पूर्व मे लगभग छत्तिस महिने पहले से ही अपने प्रभाव को देना शुरु कर देगा,जैसे बच्चे को पैदा होने के बाद किसी बडी बीमारी को देना है तो वह पहले माता पिता के अन्दर नौ महिने पहले से ही हाव भाव रहन सहन खानपान आदि मे बदलाव लाना शुरु करेगा उसके बाद के नौ महिने मे वह बीमारी वाले कारणो को माता पिता के अन्दर भरेगा उसके बाद वह उस बीमारी को बनाने वाले कारणो को मजबूत बनाने के लिये अपने प्रभाव को बच्चा पैदा करने वाले तत्वो के अन्दर स्थापित करेगा और जब आखिर के नौ महिने मे बच्चे का गर्भ मे आकर पैदा होने तक का समय होगा तो बच्चे के अन्दर वही सब बीमारी वाले तत्व समावेशित हो जायेंगे और बच्चा पैदा होने के बाद उसी बीमारी से जूझने लगेगा। जैसे बच्चे के पैदा होने के बाद अगर टिटनिस की बीमारी होनी है तो वह बीमारी बच्चे के अन्दर माता पिता के द्वारा उनके खून से मिलने वाली टिट्निस विरोधी कारको को शरीर मे नही आने देगा और खून के अन्दर कोई न कोई इन्फ़ेक्सन देकर अगर माता के द्वारा गर्भ समय मे टिटनिश का टीका भी लगवाया गया है या कोई दवाई ली गयी है तो उन तत्वो को वह शरीर से बाहर कर देगा,बाहर करने के लिये माता को कोई अजीब सी परेशानी होगी और वह उस परेशानी को दूर करने के लिये अन्य दवाइओं का प्रयोग करना शुरु कर देगी या किसी दवाई के गलत प्रभाव से बचने के लिये समयानुसार कोई डाक्टर उसे एंटीक बैटिक आदि को दे देगा और वह तत्व समाप्त हो जायेंगे। इसके साथ ही बच्चे के पैदा होने के बाद नाड छेदन के लिये कितनी ही जुगत से रखे गये सीजेरियन हथियार मे टिटनिश के जीवाणु विराजमान हो जायेंगे,अथवा कोई नाड छेदन करने वाला व्यक्ति अपने अन्दर बाहर से आने के बाद किसी प्रकार से उन जीवाणुओं के संयोग मे आ जायेगा आदि कारण देखे जा सकते है। इसी प्रकार से जब राहु अन्य प्रकार के कारण पैदा करेगा तो वह अपने अनुसार उसी प्रकार की भावना को व्यक्ति के खून के अन्दर अपने इन्फ़ेक्सन को भर देगा,अथवा भावनाये जो व्यक्ति के लिये दुखदायी या सुखदायी होती है उन्ही भावनाओ के अनुसार लोगो से वह अपना सम्पर्क बनाना शुरु कर देगा और वह भावनाये उस व्यक्ति को अगर अच्छी है तो उन्नति देगा और बुरी है तो वह भावनाये व्यक्ति को समाप्त करने के लिये कष्ट देने के लिये अथवा आहत करने के लिये अपने अनुसार प्रभाव देने लगेंगी। कहा जाता है कि राहु अचानक अपना प्रभाव देता है लेकिन उस अचानक बने प्रभाव मे भी राहु की गति के अनुसार ही सीधे और उल्टे कारको का असर सामने आता है। अगर व्यक्ति का एक्सीडेंट होना है तो कारक पहले से ही बनने शुरु हो जायेंगे,व्यक्ति के लिये राहु अपने प्रभाव से किसी ऐसे जरूरी काम को पैदा कर देगा कि वह व्यक्ति उसी आहत करने वाले स्थान पर स्वयं जाकर उपस्थिति हो जायेगा और कारक आकर उसके लिये दुर्घटना का कारण बना देगा। अगर जातक को केवल कष्ट ही देना है तो कारक शरीर या सम्बन्धित कारण को आहत करेगा फ़िर व्यक्ति के भाग्यानुसार सहायता करने वाले कारक उसके पास आयेंगे उसे सम्बन्धित सहायता को प्रदान करेंगे और व्यक्ति राहु के समय के अनुसार कष्ट भोगकर अपने किये का फ़ल प्राप्त करने के बाद जीवन को बिताने लगेगा। राहु की गति प्रदान करने का समय नाडी ज्योतिष से अठारह सेकेण्ड का बताया गया है और वह अपनी गति से अठारह सेकेण्ड मे व्यक्ति को जीवन या मृत्यु वाले कारण को पैदा कर सकता है। जिस समय राहु का कारण पैदा होता है व्यक्ति के अन्दर एक प्रकार की विचित्र सी सनसनाहट पैदा हो जाती है,और उस सनसनाहट मे व्यक्ति जो नही करना है उसके प्रति भी अपने बल को बढा लेता है और उस कृत्य को कर बैठता है जो उसे शरीर से मन से वाणी से या कर्म से बरबाद कर देता है मित्रोंराहु कुंडली मे बारह भावो मे गोचर का फ़ल अपने अनुसार देता है लेकिन भाव के लिये भी राशि का प्रभाव भी शामिल होता है। जैसे राहु कन्या राशि मे दूसरे भाव का फ़ल दे रहा है तो राहु के लिये तुला राशि का पूरा प्रभाव उसके साथ होगा लेकिन जन्म लेने के समय राहु का जो स्थान है उस स्थान और राशि का प्रभाव भी उसके साथ होगा और वह प्रभाव दूसरे भाव मे तुला राशि के प्रभाव मे मिक्स करने के बाद व्यक्ति को धन या कुटुम्ब या अपने पूर्व के प्राप्त कर्मो को अथवा अपने नाम चेहरे आदि पर अपना असर प्रदान करने लगेगा राहु जब विभिन्न ग्रहो के साथ विभिन्न भावो और राशि मे गोचर करता है तो राहु अपने जन्म समय के भाव और राशि के प्रभाव को साथ लेकर ग्रह और ग्रह के स्थापित भाव तथा राशि के प्रभाव मे अपने प्रभाव को शामिल करने के बाद अपना असर प्रदान करेगा लेकिन जो भी प्रभाव होंगे वह सभी उस भाव और राशि के साथ राहु के साथ के ग्रह हो जन्म समय के है को मिलाकर ही देगा। अगर राहु वृश्चिक राशि का है और वह कुंडली के दूसरे भाव मे विराजमान है तो वह दसवे भाव मे गोचर के समय मे वृश्चिक राशि के साथ दूसरे भाव का असर मिलाकर ही दसवे भाव की कर्क राशि मे पैदा करने के बाद अपने असर को प्रदान करेगा,जैसे वृश्चिक राशि शमशानी राशि है और राहु इस राशि मे शमशाम की राख के रूप मे माना जाता है यह जरूरी नही है कि वह शमशान केवल मनुष्यों के शमशान से ही सम्बन्धित हो वह बडी संख्या मे मरने वाले जीव जन्तुओं के स्थान से भी सम्बन्ध रख सकता है वह किसी प्रकार की वनस्पतियों के खत्म होने के स्थान से भी सम्बन्ध रख सकता है वह अपने अनुसार जलीय जीवो के समाप्त होने के स्थान स्थलीय जीवो के अथवा आसमानी जीवो के प्रति भी अपनी धारणा को लेकर चल सकता है। राहु वृश्चिक राशि के दूसरे भाव मे होने पर वह अपने कारणो को दसवे भाव मे जाने पर कर्क राशि के अन्दर जो भावना को पैदा करेगा वह धन के रूप मे कार्य करने के लिये शमशानी वस्तुओं को खरीदने बेचने का काम ही करेगा आदि बाते राहु के ग्रहो के साथ गोचर करने पर मिलती है और इन्ही बातो के अनुसार घटना और दुर्घटना का कारण जाना जाता है।
रविवार, 20 जनवरी 2019
राशिफल कहा सही बैठता है
https://youtu.be/sXMcp0IapGEभारतीय वैदिक ज्योतिष मूलरूप से नक्षत्र आधारित है कारण जब बालक का जन्म होता है तो सर्वप्रथम नक्षत्र के आधार पर उसके शुभ अशुभ का ज्ञान किया जाता ही फिर उसके अन्य संश्कारो के निर्धारण के लिए नक्षत्र के आधार पर ही मुहूर्त देखा जाता है कहा जाता है कि ग्रह से बडा नक्षत्र होता है और नक्षत्र से भी बडा नक्षत्र का चरण जब विवाह कि बात आती है
तो वर बधू का मेलापक भी नक्षत्र के आधार पर ही किया जाता है जब भी किसी शुभ कार्य के लिए मुहूर्त का निर्धारण करना होता है तब भी नक्षत्रों को ही प्राथमिकता प्रदान की जाती है कुंडली में भविष्य के फलादेश के लिए भी सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली विंशोत्तरी दशा का निर्धारण भी नक्षत्रों के आधार पर ही होता है फिर फलादेश के लिए नक्षत्रों का प्रयोग क्यों नहीं !तिष जगत में आज नक्षत्रों का चलन सिर्फ मुहूर्त निर्धारण तक ही सीमित हो गया है, ज्योतिषी राशियों के आधार पर ही फलादेश कर रहे है नतीजा फ़लादेश असफल हो रहे हैंज्योतिष की किताबों में आपको ग्रहों, राशियों और भावों के बारे में विस्तार से जानकारी मिल जाएगी। इससे अधिक देखने पर हम पाते हैं कि राशियों को नक्षत्रों के अनुसार विशिष्टता दी गई है। चंद्रमा भी नक्षत्रों पर से गुजरते हुए हमें रोज के बदलावों की जानकारी देता है। ज्योतिष की प्राचीन और नई पुस्तकों में यह तो दिया गया है कि अमुक नक्षत्र में चंद्रमा के विचरण का फलां फल है, लेकिन कहीं यह नहीं बताया गया है कि नक्षत्र का नैसर्गिक स्वभाव क्या है या उस पर किसी ग्रह के स्वामित्व का वास्तविक अर्थ क्या है।
पाराशर ऋषि ने नक्षत्र चार के आधार पर ही दशाओं का विभाजन किया लेकिन नक्षत्रों के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी। इसी तरह प्रोफेसर केएस कृष्णामूर्ति ने केवल चंद्रमा के नक्षत्र चार से बाहर आकर हर भाव और ग्रह के नक्षत्रों तक उतरकर विशद् विश्लेषण पेश किया, लेकिन उन्होंने ने भी कहीं नक्षत्रों की निजी विशिष्टताओं के बारे में स्पष्ट नहीं किया गया है। जबकि वृहत्त संहिता और दूसरी एकाध प्राचीन पुस्तक में नक्षत्रों के स्वरूप का वर्णन तक मिलता है। इन नक्षत्रों के स्वरूप के आधार पर ही उनके गुण भी बताए गए हैं। जब नक्षत्र के बारे में इतनी सटीक जानकारी उपलब्ध है तो उनके निजी या एकांगिक गुणों के बारे में कहीं स्पष्ट नहीं किया जाना कुछ खल जाता है। नक्षत्रों में विचरण को दौरान अगर चंद्रमा के स्वभाव में नियमित रूप से परिवर्तन आता है तो क्या अन्य ग्रहों पर भी ऐसे प्रभाव का अध्ययन जरूरी नहीं है।पहले पता करते हैं कि नक्षत्र हैं क्या?
हमने देखा कि बारह राशियां भचक्र के 360 डिग्री को बराबर भागों में बांटती हैं। इस तरह आकाश के हमने बारह बराबर टुकड़े कर दिए। तारों का एक समूह मिलकर नक्षत्र बनाता है। ऐसे सत्ताईस नक्षत्रों की पहचान की गई है। इससे आकाश को बराबर भागों में बांटा गया है। हर नक्षत्र के हिस्से में आकाश का 13 डिग्री 20 मिनट भाग आता है। जब हम चंद्रमा के दैनिक गति की बात करते हैं कि इसमें नक्षत्रों की विशेष भूमिका होती है। राशि वही हो और नक्षत्र बदल जाए तो चंद्रमा का स्वभाव भी बदल जाता है। इसी तरह हर ग्रह के स्वभाव में भी नक्षत्र चार के दौरान बदलाव आता है। चूंकि नक्षत्रों का स्वामित्व ग्रहों को ही दिया गया है। ऐसे में स्वभाव में परिवर्तन भी ग्रहों के अनुसार ही मान लिया जाता है। जबकि हकीकत में यह नक्षत्र की नैसर्गिक प्रवृत्ति के अनुसार होना चाहिए।अव आप देख सकते हैं राशि फल कहा सही वैठता है
शनिवार, 19 जनवरी 2019
बच्चों की पढ़ाई को लेकर माता-पिता की चिंता
कते। विद्या हमेशा झुक कर, नम्रता से आप को उस विद्या के लायक बनना पडेगा। इसके बाद ही आप विद्या के पात्रबनेगे। और आपको गुरू की कृपा मिलेगी और आप समस्त संसार में अपनी विद्या से ख्याति, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे। यदि हम अपनी पढाई को सही उतम करना चाहते हो तो आप को माँ सरस्वती की अराधना, पूजा करना शुरू कर दो। जिस दिन आप के बच्चों का जन्म दिन हो उस समय गरीब विद्याथियो को पुस्तक, कोपी, पैंसिल, पैंन दान करना चाहिए। यदि आप किसी गरीब, जरूरतमंद छात्र, छात्राओ को विद्या का दान उन्हे पढाते हो। और उन्हें ट्यूशन पढाने का कोई मूल्य नहीं लेते तो निश्चित ही आप आने वाले समय में बहुत उच्च,शिक्षा ग्रहण कर पाओगे। सरस्वती माँ पूजा पाठ से आप के उपर प्रसन्न हो या ना हो लेकिन यदि आप किसी गरीव को फ्री में ट्यूशन पढाते हो या पङाने मे उसकी फीस देते है तो आप के उपर माँ सरस्वती की कृपा बनी रहेंगी। और आप बिना रूकावट, बाधा के अपनी पढाई पूरी कर पाओगे। इस में कोई शक नहीं है।यदि आप अपने बच्चों से किसी भी शिक्षित व्यक्ति जैसे की अध्यापक, लेक्चरार, प्रोफेसर, या विघवान जिनके पास आप ट्यूशन पढते हो उन्हें अपने बच्चों के हाथ से पैन दिलवाऐ। यह उपाय करवा के आप अपने बच्चों की पढाई में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हो। और उनके उज्ज्वल भविष्य बनाने में आप का बहुत बड़ा हाथ हो सकता है। विद्या वाला मनुष्य देश विदेश कहीं भी जाये उसका विद्या के कारण मान सम्मान माँ सरस्वती की कृपा से प्राप्त होता है। यदि आप भी सरस्वती की कृपा अपने उपर या अपनी संतान के ऊपर चाहते हो तो माँ शारदा देवी सरस्वती के इस बारह नाम का पाठ अपने घर परिवार में करें और अपने बच्चों से भी करवाये। जब भी आप अपने बच्चों को पढाने बैठे तो इस स्त्रोत का पाठ करवाये फिर आप अपने बच्चों को पुस्तक पढने के लिए कहिये। जब भी किसी भी समय आप के बच्चे पुस्तक के प्रशन याद करने बैठेगे। उस समय इस स्त्रोत का पाठ करके या करवा के आप को शीध्र अपने प्रशन के उतर याद हो जायेगे। आप का पढाई में मन लगेगा ज्यादा समय आप अपनी पढाई में लगा सकोगे। जिसके कारण आप का परीक्षा फल पहले के मुकाबले बहुत अच्छा रहेगा। आप अपने जीवन मे सद्बुद्धि, सत्संग, सद्मार्ग, उच्च पद, प्रतिष्ठा, और माँ सरस्वती की कृपा से उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाओगे। माँ सरस्वती के वीज मंत्र का जाप वच्चे से करवाऐ या वच्चे के नाम से माता पिता मे से कोई भी कर सकता है वच्चो को मिट्टी मे खेलने से ना रोके वच्चो को केसर का टीका माथे पर लगाते रहे ओर थोङा केसर दुघ मे ङाल कर दुघ पिने को दे अखरोट ओर वादाम गिरी भी वच्चो को लाभ देगी वरहमी शंखपुश्पी जेसी जङी वुटी वाली दवा किसी योग्य चिकित्सक की सलाह से दे किसी अच्छे ज्योतिषी को कुंङली दिखा कर समाघान करवाऐ आचार्य राजेश 09414481324 07597718725 माँ काली ज्योतिष hanumaangarh or dabwali
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