रविवार, 6 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-4 medical astrology

 ज्योतिष द्वारा रोग निदान की विद्या को चिकित्सा ज्योतिष भी कहा जाता है। इसे मेडिकल ऍस्ट्रॉलॉजी (Medical Astrology), नैदानिक ज्योतिषशास्त्र (Clinical Astrology) भी कहा जा सकता है। यदि समय रहते इनका चिकित्सकीय एवं ज्योतिषीय उपचार दोनों कर लिए जाएं तो इन्हें घातक होने से रोका जा सकता है। Cकाल पुरुष की कुंडली में हृदय का प्रतिनिधित्व कर्क और सिंह राशियां करती हैं और हृदय का मुख्य स्थान चतुर्थ भाव, नव ग्रहों में सूर्य सृष्टि का जीवनाधार है और यही हृदय की धड़कन का कारक है। यदि जन्मकुंडली में कर्क और सिंह राशियां, चतुर्थ भाव, सूर्य और चंद्र बलवान एवं शुभ ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों, तो व्यक्ति को हृदय रोग नहीं होता। इसके विपरीत यदि ये सभी कमजोर हों, तो व्यक्ति को निश्चय ही जीवन में हृदय संबंधी कोई न कोई रोग होगा।हदय के रोग का कारक ग्रह सूर्य है तो मंगल रक्त संचार को नियंत्रित करता है। शनि रोगों का द्योतक है।कुंडली में बहुत से ऐसे योग है जो कि लग्न के लिए अलग-अलग हैं परंतु मुख्यत: दिल की बीमारी सूर्य-शनि और दिल का दौरा शनि-मंगल देते हैं[05/10, 21:11] Acharya Rajesh: ज्योतिष द्वारा रोग निदान की विद्या को चिकित्सा ज्योतिष भी कहा जाता है। इसे मेडिकल ऍस्ट्रॉलॉजी (Medical Astrology), नैदानिक ज्योतिषशास्त्र (Clinical Astrology) भी कहा जा सकता है। यदि समय रहते इनका चिकित्सकीय एवं ज्योतिषीय उपचार दोनों कर लिए जाएं तो इन्हें घातक होने से रोका जा सकता है। Cकाल पुरुष की कुंडली में हृदय का प्रतिनिधित्व कर्क और सिंह राशियां करती हैं और हृदय का मुख्य स्थान चतुर्थ भाव, नव ग्रहों में सूर्य सृष्टि का जीवनाधार है और यही हृदय की धड़कन का कारक है। यदि जन्मकुंडली में कर्क और सिंह राशियां, चतुर्थ भाव, सूर्य और चंद्र बलवान एवं शुभ ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों, तो व्यक्ति को हृदय रोग नहीं होता। इसके विपरीत यदि ये सभी कमजोर हों, तो व्यक्ति को निश्चय ही जीवन में हृदय संबंधी कोई न कोई रोग होगा।हदय के रोग का कारक ग्रह सूर्य है तो मंगल रक्त संचार को नियंत्रित करता है। शनि रोगों का द्योतक है।कुंडली में बहुत से ऐसे योग है जो कि लग्न के लिए अलग-अलग हैं परंतु मुख्यत: दिल की बीमारी सूर्य-शनि और दिल का दौरा शनि-मंगल देता है कर्क राशि का शनि होता है तो जातक के लिये दूसरों की भावना को समझना बहुत मुश्किल की बात होती है। अक्सर आपका वास्ता उन लोगों से भी पडा होगा जिन लोगों के मन में अपने ही दोस्तों अपने ही बडे भाई या बडी बहिनों अथवा काम करने के बाद दी जाने वाली कमाई के प्रति नुक्ताचीनी करने के बाद राजनीतिक बल से तुरत ही विभूषित कर दिया जाता है,वास्तव में यह कोई जातक की कमी से नही होता है,यह बात तभी मानी जाती है जब जातक का जन्म चौदह फ़रवरी से चौदह मार्च के बीच में हुआ होता है। उस समय जलवायु के अन्दर बसन्ती बयार का चलना माना जाता है और मौसम की जवानी जातक के लिये सहायक होती है। राजनीति का एक खेल और समझा जा सकता है कि राजनीति तभी होती है जब पेट भरा हो,जब तक जातक को भूख लगी है वह रूखा सूखा ठंडा गर्म सभी प्रकार का भोजन बडे आराम से कल लेगा,जैसे ही पेट भरा और कोई भोजन वाली वस्तु सामने आयी तो उसके अन्दर कई तरह की राजनीति सामने आने लगेगी जैसे नमक कम या अधिक है,मिर्च कम या अधिक है कम पकाया गया है या जला दिया गया है आदि। इसी प्रकार की राजनीति का प्रभाव जातक के इस समय में जन्म लेने के बाद पडता हुआ देखा जाता है,जितने भी छिद्रान्वेषी पैदा हुये है अगर इतिहास को उठाकर देखा जाये तो इसी काल में पैदा होने वाले व्यक्ति मिलेंगे। लेकिन इस समय में जो जातक किसी कारण से कर्क के शनि से आच्छादित युति में पैदा हुये है,मलिन या गन्दी बस्तियों मे पैदा हुये है,पानी को पाटकर बनाये हुये घरों में पैदा हुये है,अथवा खेती किसानी या जनता से जुडे समाज में पैदा हुये है उनके दोस्त तो राजनीति में विराजमान मिलेंगे और वे उनकी दोस्ती से अपने लिये कार्य भी जुटा लेंगे लेकिन उनके लिये ही काट करने से नही चूकेंगे। यह द्रश्य तो जातक के बाहरी जीवन के लिये देखा जा सकता है लेकिन उनके शरीर में जो प्रभाव यह ग्रह युति देती है वह जातक के कठोर स्वभाव से जातक की जडता वाली बुद्धि से शिक्षा को कम लेने के कारण या सीखने के लिये पढने के बजाय करने वाली बुद्धि का प्रयोग करने से माना जाना बेहतर समझने का कारण बनता है। शनि को कंट्रोल करने के लिये प्राय: दो ग्रहों का उपयोग अदिक किया जाता है एक सूर्य और दूसरा मंगल। जब शनि की अष्टम द्रिष्टि में सूर्य या मंगल आजाते है तो वे शनि पर अपना अधिकार नही रख पाते है,और शनि अपने द्वारा सूर्य और मंगल को प्रताणित करता रहता है। शनि से अष्टम में जाकर सूर्य बेबस हो जाता है,साथ ही मंगल को जो गर्म लोहे के पिंड की भांति है अगर शनि की ठंडी पर्त में दबा दिया जायेगा तो वह अपनी गर्मी को कैसे प्रदान कर सकता है,उसी प्रकार से जब सूर्य की रोशनी को शनि के अन्धेरे में दबा दिया जायेगा तो सूर्य भी बेवस हो जायेगा। इस बेबसता को ही जातक के लिये ह्रदय वाली बीमारी के रूप में भी जाना जा सकता है,सबसे अधिक प्रभाव जातक की आंखों की रोशनी पर पडता है उसके बाद जातक की पाचन क्रिया बेकार हो जाती है और गले में हमेशा कफ़ की खडखडाहट सुनने को मिलती रहती है। सूर्य शनि के लिये कुछ करने से इसलिये असमर्थ होता है कि वह जातक के ग्यारहवें भाव में है और उसे इसी शनि से अपने रोजाना के कामों के लिये काम चलाना है,यह भाव साधारण व्यक्ति के लिये माना जाता है लेकिन जो राजनीति में है उनके लिये माना जाता है कि उन्हे उसी जनता की बदौलत ही सीट मिलती है और उसी जनता के प्रति कोई गलत काम करते है या गर्मी दिखाते है तो वह जनता बिदक गयी तो अगले चुनाव में उसकी हार भी मानी जा सकती है। व्यापारी या सरकारी नौकरी में विराजमान लोग भी इसलिये असमर्थ है कि उन्ही कर्मचारियों से उन्हे काम भी लेना है और उन्ही की बदौलत वे अपने कार्यों में सफ़ल है तो वे किसलिये इस शनि से पंगा लेने चले। ह्रदय की बीमारी में राहु शनि और केतु अगर सूर्य चन्द्र पर अपनी अष्टम द्रिष्टि डालता है तो वह जातक के लिये ग्रहों की युति के अनुसार खतरनाक माना जाता है।इस युति से जातक को अगर ह्रदय वाली बीमारी से बचना है तो जातक को अपने रोजाना के कार्यों को खुद ही करना चाहिये। हर काम में काम करने वाले को अपने आसपास नही रखना चाहिये,अक्सर गर्मी के दिनो में लोग बर्फ़ का पानी पीते है और ठंड के दिनों में ठंडे पानी से नहाते है अपने हाथों को ठंडे पानी में रखते है या गले को कानो को खोल कर चलते है उनके लिये इस ग्रह युति का प्रभाव ह्रदय रोग को पैदा करने के लिये माना जाता है। इस युति में जातक को मूली छाछ और स्विन्ग पूल में नहाने का शौक होता है,यह तीनो ही एक समय में प्रयोग करने का मतलब है कि ह्रदय रोग को बुलावा देना। और सूर्य शनि की युति यानी सुबह शाम में अगर इन कारकों का प्रयोग किया जाता है तो भी जातक को ह्रदय रोग की बीमारी से बचाया नही जा सकता है। इस युति वाले जातकों को कभी ठंडे कमरे में और अन्धेरे में नही सोना चाहिये,सोने वाले पलंग पर हमेशा गुलाबी रंग की चद्दर और कमरे के पर्दे गुलाबी रंग के होने चाहिये,पूजा में दीपक का जलाना भी जरूरी है,राहु की चीजे जैसे अगरबत्ती चलाना धूल वाली जगह पर नही जाना सुबह के समय झाडू लगाते समय नाक को बन्द रखना इस रोग में सहायता देने के लिये माना जाता है,इस युति वाले जातक को सूर्य का रत्न माणिक को भी पहिनना जरूरी है
लेकिन सामान्य माणिक इस शनि की युति को रोकने में असमर्थ मानी जाता है इसके लिये जातक को दोपहर के सूर्य का कारक स्टार या तुरका रूबी को ही पहिनना चाहिये,इस रूबी की खास पहिचान है कि किसी भी प्रकार की रोशनी में जाने पर इसमे से किरणे निकलती है जो प्रत्यक्ष रूप से साफ़ दिखाई देती है। अपने द्वारा किसी भी प्रकार की जानकारी के लिये फोन कर सकते है। अपनी संघ जन्म तारीख और समय के अनुसार अपनी बीमारी के लिये भी बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से पता कर सकते है।

कर्क राशि का शनि होता है तो जातक के लिये दूसरों की भावना को समझना बहुत मुश्किल की बात होती है। अक्सर आपका वास्ता उन लोगों से भी पडा होगा जिन लोगों के मन में अपने ही दोस्तों अपने ही बडे भाई या बडी बहिनों अथवा काम करने के बाद दी जाने वाली कमाई के प्रति नुक्ताचीनी करने के बाद राजनीतिक बल से तुरत ही विभूषित कर दिया जाता है,वास्तव में यह कोई जातक की कमी से नही होता है,यह बात तभी मानी जाती है जब जातक का जन्म चौदह फ़रवरी से चौदह मार्च के बीच में हुआ होता है। उस समय जलवायु के अन्दर बसन्ती बयार का चलना माना जाता है और मौसम की जवानी जातक के लिये सहायक होती है। राजनीति का एक खेल और समझा जा सकता है कि राजनीति तभी होती है जब पेट भरा हो,जब तक जातक को भूख लगी है वह रूखा सूखा ठंडा गर्म सभी प्रकार का भोजन बडे आराम से कल लेगा,जैसे ही पेट भरा और कोई भोजन वाली वस्तु सामने आयी तो उसके अन्दर कई तरह की राजनीति सामने आने लगेगी जैसे नमक कम या अधिक है,मिर्च कम या अधिक है कम पकाया गया है या जला दिया गया है आदि। इसी प्रकार की राजनीति का प्रभाव जातक के इस समय में जन्म लेने के बाद पडता हुआ देखा जाता है,जितने भी छिद्रान्वेषी पैदा हुये है अगर इतिहास को उठाकर देखा जाये तो इसी काल में पैदा होने वाले व्यक्ति मिलेंगे। लेकिन इस समय में जो जातक किसी कारण से कर्क के शनि से आच्छादित युति में पैदा हुये है,मलिन या गन्दी बस्तियों मे पैदा हुये है,पानी को पाटकर बनाये हुये घरों में पैदा हुये है,अथवा खेती किसानी या जनता से जुडे समाज में पैदा हुये है उनके दोस्त तो राजनीति में विराजमान मिलेंगे और वे उनकी दोस्ती से अपने लिये कार्य भी जुटा लेंगे लेकिन उनके लिये ही काट करने से नही चूकेंगे। यह द्रश्य तो जातक के बाहरी जीवन के लिये देखा जा सकता है लेकिन उनके शरीर में जो प्रभाव यह ग्रह युति देती है वह जातक के कठोर स्वभाव से जातक की जडता वाली बुद्धि से शिक्षा को कम लेने के कारण या सीखने के लिये पढने के बजाय करने वाली बुद्धि का प्रयोग करने से माना जाना बेहतर समझने का कारण बनता है। शनि को कंट्रोल करने के लिये प्राय: दो ग्रहों का उपयोग अदिक किया जाता है एक सूर्य और दूसरा मंगल। जब शनि की अष्टम द्रिष्टि में सूर्य या मंगल आजाते है तो वे शनि पर अपना अधिकार नही रख पाते है,और शनि अपने द्वारा सूर्य और मंगल को प्रताणित करता रहता है। शनि से अष्टम में जाकर सूर्य बेबस हो जाता है,साथ ही मंगल को जो गर्म लोहे के पिंड की भांति है अगर शनि की ठंडी पर्त में दबा दिया जायेगा तो वह अपनी गर्मी को कैसे प्रदान कर सकता है,उसी प्रकार से जब सूर्य की रोशनी को शनि के अन्धेरे में दबा दिया जायेगा तो सूर्य भी बेवस हो जायेगा। इस बेबसता को ही जातक के लिये ह्रदय वाली बीमारी के रूप में भी जाना जा सकता है,सबसे अधिक प्रभाव जातक की आंखों की रोशनी पर पडता है उसके बाद जातक की पाचन क्रिया बेकार हो जाती है और गले में हमेशा कफ़ की खडखडाहट सुनने को मिलती रहती है। सूर्य शनि के लिये कुछ करने से इसलिये असमर्थ होता है कि वह जातक के ग्यारहवें भाव में है और उसे इसी शनि से अपने रोजाना के कामों के लिये काम चलाना है,यह भाव साधारण व्यक्ति के लिये माना जाता है लेकिन जो राजनीति में है उनके लिये माना जाता है कि उन्हे उसी जनता की बदौलत ही सीट मिलती है और उसी जनता के प्रति कोई गलत काम करते है या गर्मी दिखाते है तो वह जनता बिदक गयी तो अगले चुनाव में उसकी हार भी मानी जा सकती है। व्यापारी या सरकारी नौकरी में विराजमान लोग भी इसलिये असमर्थ है कि उन्ही कर्मचारियों से उन्हे काम भी लेना है और उन्ही की बदौलत वे अपने कार्यों में सफ़ल है तो वे किसलिये इस शनि से पंगा लेने चले। ह्रदय की बीमारी में राहु शनि और केतु अगर सूर्य चन्द्र पर अपनी अष्टम द्रिष्टि डालता है तो वह जातक के लिये ग्रहों की युति के अनुसार खतरनाक माना जाता है।इस युति से जातक को अगर ह्रदय वाली बीमारी से बचना है तो जातक को अपने रोजाना के कार्यों को खुद ही करना चाहिये। हर काम में काम करने वाले को अपने आसपास नही रखना चाहिये,अक्सर गर्मी के दिनो में लोग बर्फ़ का पानी पीते है और ठंड के दिनों में ठंडे पानी से नहाते है अपने हाथों को ठंडे पानी में रखते है या गले को कानो को खोल कर चलते है उनके लिये इस ग्रह युति का प्रभाव ह्रदय रोग को पैदा करने के लिये माना जाता है। इस युति में जातक को मूली छाछ और स्विन्ग पूल में नहाने का शौक होता है,यह तीनो ही एक समय में प्रयोग करने का मतलब है कि ह्रदय रोग को बुलावा देना। और सूर्य शनि की युति यानी सुबह शाम में अगर इन कारकों का प्रयोग किया जाता है तो भी जातक को ह्रदय रोग की बीमारी से बचाया नही जा सकता है। इस युति वाले जातकों को कभी ठंडे कमरे में और अन्धेरे में नही सोना चाहिये,सोने वाले पलंग पर हमेशा गुलाबी रंग की चद्दर और कमरे के पर्दे गुलाबी रंग के होने चाहिये,पूजा में दीपक का जलाना भी जरूरी है,राहु की चीजे जैसे अगरबत्ती चलाना धूल वाली जगह पर नही जाना सुबह के समय झाडू लगाते समय नाक को बन्द रखना इस रोग में सहायता देने के लिये माना जाता है,इस युति वाले जातक को सूर्य का रत्न माणिक को भी पहिनना जरूरी है लेकिन सामान्य माणिक इस शनि की युति को रोकने में असमर्थ मानी जाता है इसके लिये जातक को दोपहर के सूर्य का कारक स्टार या तुरका रूबी को ही पहिनना चाहिये,इस रूबी की खास पहिचान है कि किसी भी प्रकार की रोशनी में जाने पर इसमे से किरणे निकलती है जो प्रत्यक्ष रूप से साफ़ दिखाई देती है।
अपने द्वारा किसी भी प्रकार की जानकारी के लिये फोन कर सकते है।
अपनीजन्म तारीख और समय के अनुसार अपनी बीमारी के लिये भी बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से पता कर सकते है। आचार्य राजेश कुमार

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-3 medical astrology


मित्रों इससे पहले भी मैं तीन पोस्ट बीमारी पर कर चुका हूं उसको आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं ।और यह पोस्ट भी उसी पर आधारित है। अगर अच्छी लगे तो शेयर करें ,   
ज्योतिष में रोग बीमारी जानने का विधान है। जन्मपत्री में ग्रहों की स्थिति तथा गोचर का प्रभाव बीमारी और उसके समाधान के स्पष्ट संकेत देता है। जीवन यापन में सजगता तथा ग्रहों की शांति से इन बीमारियों से बचा जा सकता है।हृदय सीने में बायीं तरफ, कालपुरुष कुंडली के चौथे भाव को दर्शाता है। मस्तिष्क भी चौथे भाव का आधिपत्य रखता है। हृदय रोग के निर्धारण में मस्तिष्क की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

चन्द्रमा चौथे भाव का कारक ग्रह है। इसकी कमजोर और दूषित अवस्था होने पर हृदय रोग की आशंका बढ़ जाती है। चन्द्रमा की स्वामी राशि कर्क है। कर्क राशि का शुद्ध एवं बलवान अवस्था में होना मस्तिष्क की स्वस्थता का प्रतीक है। साथ ही हृदय रोग की आशंका में कमी लाता है। कर्क राशि की बलवान स्थिति  व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में आशातीत बढ़ोत्तरी करती है।
कालपुरुष कुंडली में हृदय होने का गौरव अनुराधा नक्षत्र को प्राप्त है। और अनुराधा नक्षत्र शनि से संबंधित है कर्क राशि का शनि अक्सर जनता से जोड कर रखता है जातक के अन्दर भावना भावुकता से पूर्ण नही होती है इसका कारण है कि मन का पत्थर हो जाना और मन का ठंडा हो जाना। कोई भी व्यक्ति अपने उद्गारों को प्रस्तुत करने में असमर्थ होता उसे केवल कार्य करने वाले लोगों से सम्पर्क करना ही अच्छा लगता है वह अधिक से अधिक भौतिक जायदाद को इकट्ठा करने के लिये अपने मन को लगाये रहता है,पारिवारिक माहौल में उसे दर्द नही होता है कि उसके अमुक सदस्य को अमुक पीडा है,पीडा निवारण के लिये वह केवल डाक्टरी सहायता को देने की बात करता है,उसे भावनात्मक रूप से समझ नही होती है कि वह जिससे बात कर रहा है उसके प्रति अगर वह दो शब्द प्रेम से बोल देता है तो उसकी पीडा कम हो जायेगी। इस प्रकार के लोगों के लिये सीधी सी पहिचान होती है कि जातक कर्क के शनि से आच्छादित है,उसे भावना से अधिक कार्य की चिन्ता है उसका मन उसी प्रकार से जमा हुआ है जैसे पानी को जमाकर बर्फ़ बना दिया जाये। इस प्रकार के व्यक्ति के ह्रदय में जडता पैदा हो जाती है,और जब कर्क राशि के शनि के साथ कमजोर सूर्य का प्रभाव होता है यानी जातक का जन्म आधीरात के समय होता है,और जातक का जन्म जहां होता है वह स्थान ठडे स्थान के रूप में है,जन्म का समय भी जुलाई और अगस्त के बीच में होता है,इस प्रकार की युति जब कुंडली के अन्दर मिलती है तो जातक के लिये कठोर ह्रदय की बीमारी के रूप में जाना जाता है,जातक अपनी पीडा को भी प्रकट नही कर सकता है वह किसी दुख को दूर करने के लिये अपने बाहुबल को ही प्रयोग में लाता है और जब उसका बाहुबल टूट जाता है तो वह सीधा अस्पताल में चला जाता है जहां डाक्टर उसके ह्रदय की ओपन हर्ट सर्जरी के द्वारा या तो उसके ह्रदय में जमा गंदगी को साफ़ करते है या बन्द धमनियों को खोल कर प्लास्टिक के वाल्व डालते है। उपरोक्त कुंडली में शनि के साथ सूर्य और बुध का होना इसी बात का संकेत देता है,सूर्य से ह्रदय बुध से धमनिया और प्लास्टिक तथा शनि से कार्य।इस प्रकार की ग्रह युति से बचने के लिये और अपनी रक्षा के लिये जातक को कभी भी वातानुकूलित स्थानों में काम नही करना चाहिये,कारण जातक को सूर्य की धूप की उपयोगिता जरूरी है सूर्य जातक के शरीर से पसीने को बहायेगा तो जातक के ह्रदय में जमा गन्दगी खून के साथ निकलकर साफ़ होती रहेगी,दूसरे जातक को अपने कामुक स्वभाव में कन्ट्रोल करके रखना चाहिये जिससे उसके शरीर का सूर्य यानी वीर्य या रज सुरक्षित रहे और शरीर की कमजोरी में वह काम आये,अति कामुकता से बचने के लिये जातक को आहार विहार और रोजाना के कार्यों पर बल देना चाहिये,राजनीति से सम्बन्धित कार्यों पर या जनता से जुडे कार्यों को कम से कम करना चाहिये जिससे जनता के दुख और दर्द को बार बार महसूस करने के लिये उसे अपने ह्रदय पर अधिक जोर नही डालना पडे। सूर्य और शनि की युति मे जातक के पास सुबह और शाम के ही काम अधिक होते है बाकी समय वह अपने दिमाग को प्लान बनाने के लिये प्रयोग में लाता है अधिक सोचने के कारण जातक का ह्रदय कभी अधिक उत्तेजित होता है और कभी धीमा होता है इस प्रकार से सांसो की गति कम या अधिक बार बार होने लगती है,इस गति के साथ ह्रदय का कार्य कभी अच्छा और कभी बुरा होने लगता है,जब ह्रदय की गति में अधिक परिवर्तन होता है तो वह ह्रदय को बन्द करने केलिये काफ़ी होता है,इसे ही हार्ट अटैक की बीमारी कहा जाता है,जातक को सूर्य शनि की युति में बुध की उपस्थिति के लिये नवग्रह का बना पेन्डल अपने सीने से लगाकर रखना चाहियेण यह पेन्डलके मघ्य मानिक्य ओर दूसरे रतन आसपास और रतन सही क्रम में लगे हो
,कारण सूर्य और शनि पिता पुत्र की तरह से है और जहां सूर्य की सीमा समाप्त होती है वही से शनि की सीमा शुरु हो जाती है,साथ ही बुध भी अपनी गति को सूर्य और शनि के साथ बराबरी की सीमा में बान्ध कर रखता है,इस प्रकार से कोई एक ग्रह का प्रभाव इन ग्रहो की युति में फ़र्क नही दे पाता है,नवग्रह का पेन्डल  जब ह्रदय पर लटकता है तो जातक के अन्दर चलने वाले विचारों में स्थिरता आती है वह सोचता भी है और करता भी इस प्रकार से व्यक्ति की जीवन की अवधि बढ जाती है,जो व्यक्ति राजनीति में है या जो व्यक्ति जनता के साथ जुडकर जनता वाले कार्य कर रहे है अथवा जो लोग जनता के साथ मिलकर खरीद बेच का कार्य चांदी चावल तथा खेती से पैदा होने वाली जिन्स के प्रति अपने काम कर रहे है,अथवा जो लोग हाउसिंग सोसाइटी को बनाकर चला रहे है अथवा मकान को बनाकर बेचने का काम कर रहे है पानी वाले कार्यों को कर रहे है पानी वाले जहाज या नाव अथवा बोटिंग वाले काम कर रहे है उनके लिये यह स्वास्तिक बहुत फ़लदायी होता देखा गया है। मित्रों अगर आप भी अपनी कोई समस्या का उपाय चाहते हैं अपनी कुंडली दिखाना का बनवाना चाहते हैं तो आप हमारी वेबसाइट पर या हमारे नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं आचार्य राजेश कुमार

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

हदय रोग ओर ज्योतिषीय उपचार-2 medical Astrology

हदय रोग ओर ज्योतिषीय उपचार-www.acharyarajesh.in2 medical Astrology
मित्रों ज्योतिष और चिकित्सा का आपस में गहरा संबंध होता है। चिकित्सा से शरीर को रोग से मुक्त किया जाता है तो ज्योतिष से यह पता चल जाता है कि किस उम्र में किसे बीमारी घेर सकती है। ज्योतिष शरीर को निरोगी रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। 
शरीर पर चन्द्रमा का सीधा प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा 72 बीमारियों को नियंत्रित होती हैं। अगर चंद्रमा असंतुलित है तो आपको बीमारियां घेरेंगी। कुंडली में चंद्रमा के प्रभाव से बच नहीं सकते हैं। यदि चंद्रमा संतुलित रहे।           तो बीमारियों से बचा जा सकता है। 
शरीर के नौ साल्ट का नौ ग्रहों से संबंधित है शरीर में नौ प्रकार के साल्ट पाए जाते हैं, जो समान अनुपात में मिलते हैं। इनका सम्बंध नौ ग्रहों की उत्पत्ति से है। इसलिए ग्रहों का प्रभाव शरीर पर साफ पड़ता है।  साल्ट का असंतुलन नहीं होना चाहिए। स्वस्थ रहने के लिए ज्योतिष बेहद कारगर है। ज्योतिष यह बता सकने में सक्षम है कि एक बच्चे को किस आयु खंड में बीमारी घेर सकती है।  पृथ्वी पर जो कुछ है वह शरीर में है। अगर शरीर में 72 प्रतिशत जल है तो चन्द्रमा का भी इतना असर है। मित्रों हम बात हदयरोग पर कर रहे हैंअक्सर ह्रदय रोग इन स्थानो में अधिक पनपते है जहां पानी का इकट्ठा रहना माना जाता है जैसे हमेशा बहने वाली नदी के किनारे के स्थान समुद्री किनारों वाले स्थान तथा पहाडी घाटियों के बीच में या नीचे तलहटी में बसे हुये स्थान। इसके अलावा भी आज के जीवन की चलने वाली गतियों में मानव जाति के द्वारा की जाने वाली चिन्ता भी ह्रदय रोग का मुख्य कारण माना जा सकता है। चिन्ता के भी कारण तभी बनते है जब मानसिक गतियों का स्थिर नही रहना,जो भी काम किया जाता है उसके अन्दर किसी न किसी कमी के कारण अथवा किये जाने वाले काम के पूरे होने के समय में अचानक किसी भी प्रकार की कमी के कारण कार्य का बन्द हो जाना या काम की कीमत के मिलने के समय में अचानक काम की समाप्ति हो जाना भी ह्रदय रोग की मुख्य भूमिका मानी जाती है। ह्रदय का कारक चन्द्रमा है और चन्द्रमा को मन का कारक भी कहा जाता है,चन्द्रमा के साथ राहु के मिलने से मन के अन्दर आशंकायें बनी रहती है,और उन आशंकाओं या भ्रम से मन हमेशा उसी भ्रम के लिये चिन्ता मे बना रहता है,दूसरे चन्द्रमा के साथ मंगल होने से और चन्द्रमा तथा मंगल का साथ दु:स्थानों में होने से भी ह्रदय रोग की बीमारी का कारण जाना जाता है। ऊपर दी गई कुंडली में चन्द्रमा मंगल के साथ वृश्चिक राशि का है,इस राशि में विराजमान चन्द्रमा और मंगल अक्सर मृत्यु का कारण ह्रदय रोग से पीडित होने पर ही देते है।इसके लिये भी केतु की सहायता लेनी पडती है लेकिन इसके लिये लहसुनिया का रूप बदल जाता है,इस स्थान के चन्द्र मंगल वाली युति के जातकों को लहसुनिया स्लेटी रंग की जिसके अन्दर हल्की लालिमा हो को स्वर्ण में पहिना जाना ठीक रहता है।
ध्यान यह भी रखा जाता है कि इस स्थान पर चन्द्रमा का रूप या तो विधवा माता के रूप में हो जाता है अथवा माता का जन्म अपने भाई बहिनो में छोटे रूप मे होता है अथवा जातक के परिवार में ही ताई के रूप में माता का रूप होता है या ताई का जातक के साथ मानसिक रूप से अनबन का कारण भी बनता है,जातक का स्वभाव अपने ही भाई बहिनो के प्रति गलत बनता रहता है और जातक के अन्दर अपनी मानसिक द्वन्दता के कारण वह अपने ही लोगों के साथ तर्क करने के लिये अपने को हर समय तैयार रखता है जातक के अन्दर अपने ही भाई के साथ अपघात करने में कोई दिक्कत नही होती है वह किसी न किसी प्रकार से धन के रूप में समाज के रूप में परिवार के रूप में भाई के साथ घात करने के लिये अपनी मानसिकता को लगाये रखता हैजातक का मन रूपी चन्द्रमा जब शरीर से अधिक काम करने लगता है तो भी ह्रदय रोग के लक्षण मिलने लगते है,जैसे चन्द्रमा मिथुन राशि का होकर तीसरे भाव में आजाये,तो जातक अपने को भावुकता से काम करने वाला होता है वह अक्सर मन के अनुसार रोने लगता है मन के अनुसार हंसने लगता है मन के अनुसार रुष्ट हो जाता है मन के अनुसार गालिया देने लगता है और मन के अनुसार ही वह अपने को लेकर चलने वाला होता है अक्सर वे कलाकार जो नाटक आदि में काम करते है अपनी भावुकता से लोगों को हंसाने और रुलाने आदि का कार्य करते है उनके अन्दर इस प्रकार की बीमारी पायी जाती है,एक्टर अधिकतर इसी बीमारी का शिकार होते है,इसके साथ ही चन्द्रमा अगर कन्या राशि का होता तो जातक के अन्दर ह्र्दय की बीमारी का होना पाया जाता है,इसके लिये भी एक कारण बहुत ही चौंकाने वाला माना जाता है कि जातक अपनी छोटी उम्र में ही कामुकता की गिरफ़्त में आजाता है उसके द्वारा सोचे काम बन नही पाते है वह अपने किसी भी प्रयास में सफ़ल नही हो पाता है तो सीधा असर ह्रदय पर ही जाता है,वैसे भी छठा भाव चौथे का तीसरा है यानी अपने ह्रदय को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का कारण बनना,अपने रोजाना के कामों के अन्दर इस राशि वाले चन्द्रमा के लिये माना जाता है कि वह पानी वाले काम अधिक करता है जैसे साफ़ सफ़ाई करना लोगों के लिये सेवा वाले काम करना लोगों के प्रति अपनी भावनात्मक प्रस्तुति को देना आदि इसके अलावा चन्द्रमा जब अष्टम यानी वृश्चिक राशि का होता है तो जातक के अन्दर तकनीकी कला का विकास होना भी माना जाता है वह अक्सर रूहानी कार्यों के लिये अपने को लेकर चलने लगता है किसी भी क्षेत्र के कामो के अन्दर वह अपनी अन्तर्द्र्ष्टि को अधिक प्रयोग में लेने लगता है इस प्रकार से दिमाग में अधिक वजन पडता है और सांसों के अन्दर बदलाव आने लगता है तो भी जातक के ह्रदय पर असर पडना शुरु हो जाता है।
ईस प्रकार के चन्द्रमा वाले जातको को काले रंग की लहसुनिया को पहिनना चाहिये लेकिन यह लहसुनिया तांबे में पहिना जाना उचित है। तांबा मंगल की धातु है और इस धातु में अगर केतु को धारण किया जायेगा तो मानसिक गति जो बिगडती है उसके अन्दर कोई न कोई सहायक कारण बनने लगेगा और जातक के ह्रदय पर पडने वाले बोझ में कमी आजायेगी,इसके अलावा भी जातक को स्वभाव में परिवर्तन लाना जरूरी है जैसे तीसरे चन्द्रमा के लिये छोटी बहिन पर बुरा प्रभाव होगा जरूर लेकिन उसके लिये अगर पहले से ही सोच कर कार्य किये जायेंगे तोवह परेशानियों से बची रहेगी और दिमागी रूप में जातक के लिये ठीक रहेगा,इसके अलावा जातक को अपने कार्यों के अन्दर वे कार्य जो अक्समात हंसी या गमी की सीमा में आते हो नही करना चाहिये,उस स्वभाव मे कमी लानी चाहिये जिनके अन्दर आंखों में अधिक आंसू आते हो,इस बात को भी जान लेना आवश्यक है कि जिनके जल्दी आंसू आते है उनके लिये लो-ब्लड प्रेसर की बीमारी को जाना जाता है और जिनके आंसू आते ही नही है वे हाई-ब्लड प्रेसर के मरीज होते है।
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अपने बारे में जानने के लिये बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से अपने प्रश्न को जन्म विवरण के साथ भेज सकते है.मित्रोआपशुल्क हमारे बैंक अकाउंट में ,pnb0684000100192346 IFC punb0068400 में या ह हमारा पेटीएम नंबर 7597718725पर या हमारे phone pay Google pay no 9414481324पर भेज सकते हैं परचार्य राजेश कुमार

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

हदय रोग ओर ज्योतिषीय उपचार medical Astrology





मित्रों मेरी पिछली पोस्ट भी बीमारी और रोग पर मैंने लिखी थी आज भी हम एक बीमारी एक रोग की बात करेंगे जिसमें हम लेंगे दिल की बीमारी हदयरोग  की हृदयरोग इन दिनों एक विकराल सेहत समस्या बनकर उभरा है। मित्रों हदय मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है । ह्रदय की बनावट कार्य प्राणी या वाल्वों में रक्त संचार की रुकावट या शिराओं संचार व्यवस्था में गड़बड़ी  होने से ह्रदय के कार्य करने में रुकावट पैदा होती है फलस्वरूप ह्रदय रोग उत्पन्न हो जाते हैं । शरीर की बीमारियों के मामले में अगर देखा जाये ग्रह अपनी सूचना को पहले से देते है अगर जातक सचेत होकर अपने ग्रहों को समझता रहे तो उन बीमारियों से बचा रहेगा। अक्सर ह्रदय रोग सबसे खतरनाक माना गया है  इस रोग से पीड़ित मरीजों की कुंडलियों का विश्लेषण और उनसे बातचीत करने पर पाया कि यदि हार्ट अटैक का कांबीनेशन आपकी कुंडली में है तो आपको अच्छे से अच्छा सर्जन या हृदय रोग विशेषज्ञ भी इस रोग से नहीं बचा सकता।  अस्पतालो में एक हार्ट स्पैशलिस्ट डाक्टर, एक किसान, एक फौजी, एक महिला, एक 12 साल का बच्चा जब बाईपास सर्जरी करवाते दिखे तो उन्होंने उन सभी तथ्यों की पुष्टि की जिनसे हार्ट प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए और फिर भी अच्छी सेहत, उचित रखरखाव और नियमित व्यायाम, योगासनों आदि के बावजूद हो गई।
यूं तो ज्योतिष शास्त्र की मैडीकल शाखा, बहुत विशाल तथा चिकित्सा विज्ञान की तरह ही कॉम्पलीकेटिड है लेकिन फिर भी हम एक कुंडली की उदाहरण देकर आप की सुविधा के लिए कुछ योग बता रहे हैं जो वे स्वयं अपनी कुंडली में देख सकते हैं या सुयोग्य ज्योतिषी को दिखा सकते हैं जिसे इस शाखा में पूर्ण अनुभव हो। वैसे तो बुखार आना भी खतरनाक है लेकिन ह्रदय रोग के कारण बनने के लिये ग्रह युतियों का ध्यान रखा जाये और वास्तविक जीवन के ग्रहों से बचा जाये तो इस रोग से बचा जा सकता है। जैसे बुध का स्थान मेष लगन में है और राहु बुध को ग्यारहवे भाव से देख रहा है साथ ही शनि भी कर्क राशि से बैठ कर अपनी युति को बुध के लिये प्रदान कर रहा है तो जातक के अन्दर पानी वाली बीमारी होगी शनि किसी भी प्रभाव को अपने दसवे स्थान को सप्लाई करता है,जैसे शनि इस कुंडली में पानी वाले भाव और राशि में है,यह अपने असर को सीधा दसवीं द्रिष्टि से बुध को देगा इस असर का रूप शनि के अनुसार होगा जैसे शनि की सिफ़्त ठंडी और गन्दी है तो यह लगन के बुध यानी सिर के स्नायु तन्त्र को ठंडा और गंदा प्रभाव देगा,लेकिन कब देगा इसके लिये जातक के कर्मफ़ल स्थान के बैठे राहु का असर जब बुध को मिलेगा। यानी जातक के रहने वाले स्थान में जहां शनि स्थापित है,वह पानी वाले नम और गन्दे स्थान के रूप में जाना जायेगा,तालाब या नदी वाले स्थान को पाट कर बनाया गया माना जायेगा,अथवा वह निम्न स्तरीय जीवन को जीने वाले लोगों के बीच में जाना जायेगा,उस स्थान पर रहने के कारण तथा किये जाने वाले कार्यों में किसी ऐसी जलवायु का होना जहां कैमिकल इफ़ेक्ट अधिक होगा वह जातक को अपने असर में लेगा और जातक की नाक हमेशा बहती रहेगी,धीरे धीरे यह असर सीधा फ़ेफ़डों पर जायेगा

और सांस वाली बीमारी स्नोफ़ीलिया जुकाम का बना रहना कानों के अन्दर सुरसुराहट का रहना आदि असर देखइसके लिये जातक को तत्वो के रूप में मंगल जो शनि की सिफ़्त को गर्म करेगा,सूर्य जो राहु के कैमिकल इफ़ेक्ट को कम करेगा तथा शुक्र जो जातक के लगन के बुध को अपने कन्ट्रोल में लायेगा के लिये मूंगा माणिक और कुंडली के हिसाब से यंत्र लगाकर  पेन्डल पहिना जाना चाहिये साथ ही जातक को ऐसे स्थानों के निवास से दूर रहना चाहिये उन कामो से बचना चाहिये जो अपने द्वारा वायु में कैमिकल इफ़ेक्ट को पैदा करते हों।
वैसे तो इस पेंडेंट की कीमत बाजार में स्टोन को खरीदने फ़िर उसे बनवाने में हजारों रुपयें में मानी जाती है लेकिन इसे मेटल में बनवा कर और थोक की कीमत में ले् इसे लेने के लिये नीचे लिखें हमारे फोन नंबरों पर आप बात कर सकते हैं,इसे बनाने में माणिक लगभग सवा पांच रत्ती मूंगा पांच से छ: रत्ती और यंत्र का प्रयोग  लाया जाता है।अपने बारे में शरीर के रोगों के बारे में भी आप मेरी बेव साइट से सम्पर्क कर सकते है।ह्रदय रोग के लिये बहुत से कारण और भी बनते है जिनके लिये अगर विस्तृत रूप में कुंडली का विवेचन किया जाये तो कारण मिलने लगते है। इस कुंडली में जो मेष लगन की है और शनि पानी वाले भाव कर्क राशि में विराजमान है,साथ ही राहु छठे भाव में जो बीमारी का भाव माना जाता है में विराजमान है,राहु अपनी उल्टी द्रिष्टि से पानी वाले भाव में बैठे शनि को देख रहा है,तथा शनि और राहु के बीच में चौथे भाव का मालिक चन्द्रमा है,शनि और राहु को पाप ग्रह की उपाधि दी गयी है,दो पाप ग्रह के बीच में बैठा चन्द्रमा ह्रदय रोग की बीमारी का संकेत दे रहा है। इस संकेत से जाना जा सकता है कि जातक का निवास ठंडे और गन्दे स्थान में है तथा वह जो रोजाना के कार्य करता है उसके अन्दर किसी न किसी प्रकार की गन्दगी वाली बात है जो रहने वाले स्थान में वायु को गन्दा कर रही है। छठे भाव को उत्तर पश्चिम दिशा का कारक कहा जाता है जो पश्चिमी दिशा से लगे कोने में रहने वाले स्थान के रूप में भी जाना जाता है राहु का दु:स्थान में जाने का मतलब है कि कोई गन्दा प्रभाव देने वाली वस्तु या कारक उस स्थान पर स्थापित है अधिकतर मामले में इस स्थान पर अगर घर का टायलेट है तो वह भी गन्दी श्रेणी में आयेगा अथवा उस स्थान पर कचडा आदि डालने की जगह अथवा रहने वाले मकान के इस दिशा में कोई गन्दा कारक स्थापित है,इन कारणों से ह्रदय रोग की सम्भावना बढ जाती है और चन्द्रमा बाधित हो जाता है।क्सर एक उपाय बहुत ही कारगर सिद्ध माना जाता है कि जब चन्द्रमा राहु से या शनि से पीडित हो तो केतु का उपाय फ़लदायी हो जाता है,इस उपाय के लिये केतु को सूर्य की या मंगल की धातु में स्थापित करने के बाद उस धातु में मंत्रों से पूरित ताबीजी रूप देकर लहसुनिया को स्थापित कर दिया जाता है इस ताबीजी रूप में बने लहसुनिया को गले में धारण करने से इस प्रकार के ग्रह योग से बने ह्रदय रोग में सहायता मिलती है। पंचम भाव का चन्द्रमा शिक्षा वाले कार्यों के लिये मनोरन्जन वाले कार्यों के लिये और जल्दी से धन कमाने वाले कार्यों के लिये जाना जाता है,शनि जो पानी वाले स्थान में बैठ कर अपना रूप कागज के रूप में भी लेता है और वाहन के रूप में भी जो पानी के अन्दर चलाये जाते है का रूप धारण कर लेता है,चान्दी चावल और उन ठोस कारकों का रूप लेता है जो पानी से अधिक पैदा होते है,अथवा जनता के बीच में रहकर अपने कार्यों को करना भी माना जाता है,साथ ही कार्य करने वाले स्थान के रूप में भी जाना जाता है,जैसे राहु के छठे भाव में होना यानी कार्य स्थान के पास में या तो सार्वजनिक टायलेट का होना या कार्यस्थान के पास में किसी प्रकार की अस्पताली गंदगी का इकट्ठा होना अथवा सफ़ाई कर्मचारियों के द्वारा कचडे को इकट्ठा करने वाला स्थान होना आदि भी माना जाता है इन स्थानों से भी बचने के उपाय करने चाहिये।
मुझसे सम्पर्क करने के लिये आप मेरे फ़ोन नम्बर पर अथवा मेरी बेव साइट www.acharyarajesh.in पर अपनी जन्म तारीख आदि से अपने शरीर में रोग आदि की जानकारी के लिये पता कर सकते है.रत्नो के लिये और रत्न से सम्बन्धित जानकारी के लिये भी अपनी शंका को पता कर् सकते है। आगे,,,,,,,आचार्य राजेश कुमार 

रविवार, 29 सितंबर 2019

Diseases ज्योतिष द्वारा रोग की पहिचान

Diseases  ज्योतिष द्वारा रोग की पहिचान

ज्योतिष शास्त्र भविष्य दर्शन की आध्यात्मिक विद्या है। भारतवर्ष में चिकित्साशास्त्र (आयुर्वेद) का ज्योतिष से बहुत गहरा संबंध है। होमियोपैथ की उत्पत्ति भी ज्योतिष शास्त्र  के आधार पर ही हुआ है I जन्मकुण्डली व्यक्ति के जन्म के समय ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रह नक्षत्रों का मानचित्र होती है, जिसका अध्ययन कर जन्म के समय ही यह बताया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति को उसके जीवन में कौन-कौन से रोग होंगे। चिकित्सा शास्त्र व्यक्ति को रोग होने के पश्चात रोग के प्रकार का आभास देता है।चन्द्रमा के प्रकाश और वायु से धरती पर रोगो को पैदा करने वाले कारक और निवारण के कारक पैदा होते है। जब चन्द्रमा और वायु के कारक गुरु का किसी खराब ग्रह से योगात्मक प्रभाव मिलता है तो चराचर जगत के साथ साथ वनस्पतियों मे भी उनके खराब गुण ही विद्यमान हो जाते है। इसके लिये कहा भी गया है कि ऋतु के अनुसार भोजन लेने से और जो भोजन ऋतु के हिसाब से नही लिया जा सकता है के परित्याग से रोगो का पैदा होना नही मिलता है लेकिन जब जब राहु गुरु चन्द्रमा के साथ साथ अपना प्रभाव देगा वह भाव के अनुसार रोग को पैदा करने के लिये माना जायेगा। मन का कारक चन्द्रमा है और मन के रोगी होने पर शरीर रोगी हो जाता है और मन के प्रसन्न रहने पर शरीर रोग से दूर रहता है। उसी प्रकार से गुरु वायु का और प्राण वायु को संचालित करने का काम करता है जैसे ही गुरु का मिलना राहु या इसी प्रकार के ग्रह शनि केतु मंगल आदि ग्रहों के रोगी भाव के ग्रह के साथ युति लेने से रोग की शुरुआत हो जाती है। चन्द्रमा के लिये शीतकाल का समय बहुत ही अच्छा माना जाता है और इसी लिये देखा होगा कि शरद ऋतु की पूर्णिमा का चन्द्रमा रोगो से लडने की शक्ति को रखता है और लोग इस शरदीय पूर्णिमा को नदियों मे सरोवरो मे स्नान भी करते है और खीर आदि बनाकर रात को चन्द्रमा के सामने रखते है सुबह को उसका सेवन करते है जिससे चन्द्रमा के द्वारा दिये गये रोग निदान की शक्ति को ग्रहण किया जाता है। एक बात और भी देखी होगी कि पूर्णिमा के दिन मन भी बहुत प्रसन्न रहता है और अमावस्या के दिन मन की गति भी बहुत कमजोर मानी जाती है,जो काम अमावस्या को शुरु करने पर नही हो पाता है वह पूर्णिमा के दिन शुरु करने से पूरा हो जाता है। राजस्थान मे देखा भी गया है कि अमावस्या को मेहनत का काम करने वाले कारीगर इमारतो का काम करने वाले ठेकेदार काम को बन्द ही रखते है और काम को इसलिये नही करते है कि वे मानते है कि यह दिन उनके पूर्वजो का है और पूर्वजो के लिये वे काम नही करते है इसके पीछे जो वैज्ञानिक कारण सामने आता है वह केवल यही है कि मेहनत के काम को करने के बाद अगर अमावस्या को किया जाता है तो वह काम अगर खराब हो जाता है तो दुबारा से करना पडेगा और किये गये काम की मेहनत के साथ साथ उसका फ़ल भी खराब हो जायेगा। इसी प्रकार से समुद्र के अन्दर होने वाले बदलाव को भी इन्ही तिथियों मे देखा जा सकता है। रोगो की वृद्धि और कमी भी इन्ही तिथियों मे देखी जा सकती है। चन्द्रमा का रोगो से बहुत सम्बन्ध होता है इस बात को एक प्रकार से और भी देखा जा सकता है कि अगर रात को बच्चा जन्म लेता है तो बच्चे की आंखे नीली या कालिमा लिये होती है जबकि दिन को जन्म लेने वाले बच्चे की आंखो की पुतली का रंग बिलकुल सफ़ेद होता है यही बात अगर आप कर्क के चन्द्रमा और वृश्चिक के चन्द्रमा से देखेंगे तो कर्क के चन्द्रमा मे जन्म लेने वाले जातक की दांतो की पहिचान बहुत ही सुन्दर व चमकीली होती है जबकि चन्द्रमा के वृश्चिक राशि मे होने से दांतो की पहिचान गन्दी और पायरिया आदि से ग्रस्त तथा टेढी मेढी होती है,उसी प्रकार से मीन के चन्द्रमा मे जातक के दांत लम्बे होते है वृष के चन्द्रमा के दांत चौडे और सामने के चौकोर होते है।
"ज्योतिष के अनुसार यह भी कहा जाता है कि दवाई रत्न ग्रह नक्षत्र तारा आदि जब भाग्य सही होता है तो वह सभी सफ़ल हो जाते है और जब दुर्भाग्य का समय होता है तो वे सभी बेकार हो जाते है" इसलिये रोगो के लिये और इलाज के लिये सबसे पहले भाग्य का देखना जरूरी होता है और भाग्य सही नही है तो किसी भी प्रकार से रोग भी ठीक नही होता है और रोगी को कष्ट भी मिलता है।"जब  यदि देवयोग से शनि रोग का कारक बनता हो, जो जातक को लम्बे समय तक पीड़ित रखता है। यह और एक दर्द भी है कि राहु जब किसी रोग का जनक होता है, तो बहुत समय तक तो उस रोग की जांच (डायग्नोसिस) ही नहीं हो पाती है। डाक्टर यह समझ ही नहीं पाता है कि जातक को क्या बीमारी है? और ऐसी स्थिति में रोग अपेक्षाकृत अधिक अवधि तक चलता है।
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी रोगों से अवश्य पीड़ित होता है। कुछ व्यक्ति कुछ विशेष समय में अथवा माह में ही प्रतिवर्ष बीमार हो जाते है। ये सभी तथ्य प्रायः जन्म पत्रिका में ग्रहों की भावगत एवं राशिगत स्थितियों और दशा, अन्तर्दशा पर निर्भर करते हैं। इसके अतिरिक्त कई बीमारियां ऐसी हैं, जो होने पर बहुत कम दुष्प्रभाव डाल पाती हैं, जबकि कुछ बीमारियां ऐसी हैं, जो जब भी जातक विशेष को होती हैं, तो बहुत नुकसान पहुंचाती है। कई बार ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है कि बीमारी होती तो हैं लेकिन उसकी पहचान भली प्रकार से नहीं हो पाती है। उन सभी प्रकार के तथ्यों का पता जातक की कुंडली को देखकर लगाया जा सकता है।आयुर्वेद शास्त्र में अनिष्ट ग्रहों का विचार कर रोग का उपचार विभिन्न रत्नों का उपयोग और रत्नों की भस्म का प्रयोग कर किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोगों की उत्पत्ति अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से एवं पूर्वजन्म के अवांछित संचित कर्मो के प्रभाव से बताई गई है। अनिष्ट ग्रहों के निवारण के लिए पूजा, पाठ, मंत्र जप, यंत्र धारण, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न धारण आदि साधन ज्योतिष शास्त्र में उल्लेखित है।
ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव दूर करने के लिये रत्न धारण करने की बिल्कुल सार्थक है। इसके पीछे विज्ञान का रहस्य छिपा है और पूजा विधान भी विज्ञान सम्मत है। ध्वनि तरंगों का प्रभाव और उनका वैज्ञानिक उपयोग अब हमारे लिये रहस्यमय नहीं है। इस पर पर्याप्त शोध किया जा चुका है और किया जा रहा है। आज के भौतिक और औद्योगिक युग में तरह-तरह के रोगों का विकास हुआ है। रक्तचाप, डायबिटीज, कैंसर, ह्वदय रोग, एलर्जी, अस्थमा, माईग्रेन आदि औद्योगिक युग की देन है। इसके अतिरिक्त भी कई बीमारियां हैं, जिनकी न तो चिकित्सा शास्त्रियों को जानकारी है और न उनका उपचार ही सम्भव हो सका है। आचार्य राजेश

शनिवार, 28 सितंबर 2019

संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात


 हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----` संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात ´। मित्रों ज्योतिष भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। इस बात को एक उदाहरण की सहायता से अच्छी तरह समझाया जा सकता है। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो , तो उन कमजोरियों के कारण , जिनका चंद्रमा स्वामी है ,बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है , उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा। उसे उन बच्चों के साथ अधिकांश समय व्यतीत करना चाहिए , जिन बच्चों का जन्म पूर्णिमा के आसपास हुआ हो। उन बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा होजाएगा। इसके विपरीत यदि उन्हें अमावस्या के निकट जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ ही रखा जाए तो बालक अधिक दब्बू किस्म का हो जाएगा। इसी प्रकार अधिक उच्छृंखल बच्चों को अष्‍टमी के आसपास जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ रखकर उनके स्वभाव को संतुलित बनाया जा सकता है। इसी प्रकार व्‍यवसाय , विवाह या अन्‍य मामलों में अपने कमजोर ग्रहों के प्रभाव को कम करने या अपने कमजोर भावों की समस्‍याओं को कम करने के लिए सामने वाले के यानि मित्रों या जीवनसाथी की जन्‍मकुंडली में उन ग्रहों या मुद्दों का मजबूत रहना अच्‍छा होता है। इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है।प्राचीनकाल से ही दान का अपना महत्व रहा है , परंतु दान किस प्रकार का किया जाना चाहिए , इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। दान के लिए शुद्ध द्रब्य का होना अनिवार्य है । दान के लिए सुपात्र वह व्यक्ति है , जो अनवरत किसी क्रियाकलाप में संलग्न होते हुए भी अभावग्रस्त है। दुष्‍कर्म या पापकर्म करनेवाले या आलसी व्यक्ति को दान देना बहुत बड़ा पाप होता है । यदि दान के नाम पर आप ठगे जाते हैं , तो इसका पुण्य आपको नहीं मिलेगा। इसलिए दान का उचित फल प्राप्त करने के लिए आप दान करते या देते समय ध्यान रखें कि दान उस सुपात्र तक पहुंच सके , जहॉ इसका उचित उपयोग हो सके।ऐसे में आपको सर्वाधिक फल की प्राप्ति होगी।साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए , खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्‍यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो , तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए। जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त जोकिया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें। राहु के लिए कुष्ठ आश्रम में दान दे। केतु के लिए विकलांग अपाहिज, सफाईकर्मचारी जो जरुरतमंद हो
 यह तथ्‍य सर्वविदित ही है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। जिन रंगों को वे अवशोषित करती हैं , वे हमें दिखाई नहीं देती , परंतु जिन रंगों को वे परावर्तित करती हैं , वे हमें दिखाई देती हैं। यदि ये नियम सही हैं तो चंद्र के द्वारा दूधिया सफेद , बुध के द्वारा हरे , मंगल के द्वारा लाल , शुक्र के द्वारा चमकीले सफेद , सूर्य के द्वारा तप्‍त लाल , बृहस्पति के द्वारा पीले और शनि के द्वारा काले रंग का परावर्तन भी एक सच्‍चाई होनी चाहिएपृथ्‍वी में हर वस्‍तु का अलग अलग रंग है , यानि ये भी अलग अलग रंगों को परावर्तित करती है । इस आधार पर सफेद रंग की वस्‍तुओं का चंद्र , हरे रंग की वस्‍तुओं का बुध , लाल रंग की वस्‍तुओं का मंगल , चमकीले सफेद रंग की वस्‍तुओं का शुक्र , तप्‍त लाल रंग की वस्‍तुओं का सूर्य , पीले रंग की वस्‍तुओं का बृहस्‍पति और काले रंग की वस्‍तुओं का श‍नि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण है कि नवविवाहिता स्त्रियों को मंगल ग्रह के दुष्‍प्रभावों से बचाने के लिए लाल रंग को परावर्तित करने के लिए प्राय: लाल वस्त्र से सुशोभित करने तथा मॉग में लाल सिंदूर लगे की प्रथा है।इसी कारण चंद्रमा का प्रभाव बड़ाने  के लिए मोती , बुध के लिए पन्ना , मंगल के लिए मूंगा , शुक्र के लिए हीरा , सूर्य के लिए माणिक , बृहस्पति के लिए पुखराज और शनि के लिए नीलम पहनने की परंपरा समाज में बनायी गयी है। ये रत्न संबंधित ग्रहों की किरणों को उत्सर्जित कर देते हैं , जिसके कारण ये किरणें इन रत्नों के लिए तो प्रभावहीन होती ही हैं , साथ ही साथ इसको धारण करनेवालों के लिए भी प्रभावहीन बन जाती हैं। इसलिए रत्नों का प्रयोग सिर्फ  ग्रहों को मजबूत के लिए ही किया जाना चाहिए , बुरे ग्रहों के लिए नहीं कभी-कभी पंडितों की समुचित जानकारी के अभाव के कारण ये रत्न जातक को अच्छे फल से भी वंचित कर देती है।रंगों में अद्भूत प्रभाव होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि विभिन्न रंगों की बोतलों में रखा पानी सूर्य के प्रकाश में औषधि बन जाता है , जिसका उपयोग विभिन्न रोगों की चिकित्सा में किया जाता है।यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का प्रयोग सही मात्रा होना चाहिए। इन रंगों की वस्तुओं का  आप दान करें , तो काफी फायदा हो सकता है। क्योंकि हम जिस वस्तु को स्पर्श करते हैं उसको छूने से ऊर्जा ग्रहण भी करता है हमारा शरीर और छोड़ता भी है यानी हमारे शरीर की ऊर्जा बैलेंस होने लगती है आचार्य राजेश

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

ज्योतिष विद्या : विज्ञान या अंधविश्वास

ज्योतिष विद्या : विज्ञान या अंधविश्वास 

ज्योतिष विज्ञान है या अंधश्वास , इस प्रश्न का उत्तर दे पाना समाज के किसी भी वर्ग के लिए आसान नहीं है। परंपरावादी और अंधविश्वासी विचारधारा के लोग ,जो कई स्थानों पर ज्योतिष पर विश्वास करने के कारण धोखा खा चुकें हैं ,भी इस शास्त्र पर संदेह नहीं करते। सारा दोषारोपण ज्योतिषी पर ही होता है। वैज्ञानिकता से संयुक्त विचारधारा से ओत-प्रोत व्यक्ति भी किसी मुसीबत में फंसते ही समाज से छुपकर ज्योतिषियों की शरण में जाते देखे जाते हैं। ज्योतिष की इस विवादास्पद स्थिति के लिए मै सरकार ,शैक्षणिक संस्थानों एवं पत्रकारिता विभाग को दोषी मानता हूं। 

सरकार यदि चाहती तो  सभी पत्रिकाओंओर TV channel पर में राशि-फल के प्रकाशन /प्रसारण पर रोक लगाया जा सकता था। आखिर हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वासों जैसे जुआ , मद्यपान , बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि को समाप्त करनें में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है ,परंतु ज्योतिष पर विश्वास करनेवालों के लिए ऐसी कोई कड़ाई नहीं हुई। आखिर क्यों ?
 पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए तो लगभग सभी पत्रिकाएं यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, इंटरव्यू , भविष्यवाणियॉ आदि निकालती रहती है पर जब आजतक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका, जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया तो फिर ऐसे लेखों या समाचारों का क्या औचित्य ?पत्रिकाओं के विभिन्न लेखों हेतु किया जानेवाला ज्योतिषियों कें चयन का तरीका ही गलत है । उनकी व्यावसायिक सफलता को उनके ज्ञान का मापदंड समझा जाता है , लेकिन वास्तव में किसी की व्यावसायिक सफलता उसकी व्यावसायिक योग्यता का परिणाम होती है ,न कि विषय-विशेष की गहरी जानकारी। इन सफल ज्योतिषियों का ध्यान फलित ज्योतिष के विकास में न होकर अपने व्यावसायिक विकास पर होता है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा ज्योतिष विज्ञान का प्रतिनिधित्व करवाना जनता को कोई संदेश नहीं दें पाता है। जो ज्योतिषी ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध कर सकें , उन्हें ही अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए या एक प्रतियोगिता में किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान देकर सभी ज्योतिषियों से उस जन्मपत्री का विश्लेषण करवाना चाहिए । उसकी पूरी जिंदगी कें बारे में जो ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी कर सके उसे ही अखबारों ,पत्रिकाओं टीवी चैनल में स्थान मिलना चाहिए।

परंतु ज्योतिषियों की परीक्षा लेने के लिए कभी भी ऐसा नहीं किया गया ,फलस्वरुप ज्योतिष की गहरी जानकारी रखनेवाले समाज के सम्मुख कभी नहीं आ सके और समाज नीम-हकीम ज्योतिषियों से परेशान होता रहा। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कुछ लोग और कुछ संस्थाएं ऐसी है , जो ज्योतिष विज्ञान के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। वे ज्योतिष से संबंधित बातों को सुनने में रुचि कम और उपहास में रुचि ज्यादा रखते हैं। उनके दृष्टिकोण में समन्वयवादिता की कमी भी आजतक ज्योतिष को विज्ञान नहीं सिद्ध कर पायी है।
ज्योतिष विज्ञान की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए यह कहा जाता है कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, किन्तु ज्योतिष शास्त्र यह मानता है कि पृथ्वी स्थिर है और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। जब यह परिकल्पना ही गलत है तो उसपर आधारित भविष्यवाणी कैसे सही हो सकती है ? हमारे ऋषि मुनियों पर भी संदेह किया गया पर बात ऐसी नहीं है । जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं , वह चलायमान होते हुए भी हमारे लिए स्थिर है , ठीक उसी प्रकार , जिस प्रकार हम किसी गाड़ी में चल रहे होते हैं , वह हमारे लिए स्थिर होती है और किसी स्टेशन पर पहुंचते ही हम कहते हैं , `अमुक शहर आ गया।´ जिस पृथ्वी में हम रहतें हैं , उसमें हम स्थिर सूर्य के ही उदय और अस्त का प्रभाव देखते हैं। इसी प्रकार अन्य आकाशीय पिंडों का भी प्रभाव हमपर पड़ता है। पृथ्वी से कोई कृत्रिम उपग्रह को किसी दूसरे ग्रह पर भेजना होता है तो पृथ्वी को स्थिर मानकर ही उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की दूरी निकालनी पड़ती है। जब यह सब गलत नहीं होता तो ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानते हुए उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की गति पर आधारित फल कैसे गलत हो सकता है ?

ज्योतिष की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि सौरमंडल में सूर्य तारा है , पृथ्वी, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रह हैं तथा चंद्रमा उपग्रह है, जबकि ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रह माने जाते हैं । इसलिए इस परिकल्पना पर आधारित भविष्यवाणी महत्वहीन है। इसके उत्तर में मेरा यह कहना है कि सभी विज्ञान में एक ही शब्दों के तकनीकी अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । अभी विज्ञान पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन कर रहा है। ब्रह्मांड में स्थित सभी पिंडों को स्वभावानुसार कई भागों में व्यक्त किया गया है। सभी ताराओं की तरह ही सूर्य की प्रकृति होने के कारण इसे तारा कहा गया है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को ग्रह कहा गया है। ग्रहों की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को उपग्रह कहा गया है। किन्तु फलित ज्योतिष पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं कर सिर्फ अपने सौरमंडल का ही अध्ययन करता है। सूर्य को छोड़कर अन्य ताराओं का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं महसूस किया गया है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उपग्रहों का पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया है । सूर्य, चंद्र , बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं मंगल की गति और स्थिति के प्रभाव को पृथ्वी , उसके जड़-चेतन और मानव-जाति पर महसूस किया गया है। इसलिए इन सबों को ग्रह कहा जाता है। ग्रहों की इस शास्त्र में यही परिभाषा दी गयी है। इसके आधार पर इसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।तीसरा तर्क यह है कि ज्योतिष में राहू और केतु को भी ग्रह माना गया है , जबकि ये ग्रह नहीं हैं । ये तर्क बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले यह जानकारी आवश्यक है कि राहू और केतु हैं क्या ? पृथ्वी को स्थिर मानने से पृथ्वी के चारो ओर सूर्य का एक काल्पनिक परिभ्रमण-पथ बन जाता है। पृथ्वी के चारो ओर चंद्रमा का एक परिभ्रमण पथ है ही । ये दोनो परिभ्रमण-पथ एक दूसरे को दो विन्दुओं पर काटते हैं । अतिप्राचीनकाल में ज्योतिषियों को मालूम नहीं था कि एक पिंड की छाया दूसरे पिंडों पर पड़ने से ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं। जब ज्योतिषियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं और सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रह की गणना सैकड़ों साल पहले ही हम बता देते हैं हमारे ऋषि-मुनियों ने अंतघ्यान हो कर ब्रह्मांड को देखा और उसको पूरा समझने के लिए आपको भीतर के ब्रह्मांड को देखना ही पड़ेगा तभी ज्योतिष के बारे में आप की जानकारी पूरी होगी वरना बाहर से कुछ हासिल नहीं होता अधूरा ही मिलेगा

चौथा तर्क यह है कि सभी ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में विविधता क्यों होती है ? हम सभी जानते हैं कि कोई भी शास्त्र या विज्ञान क्यों न हो कार्य और कारण में सही संबंध स्थापित किया गया हो तो निष्कर्ष निकालने में कोई गल्ती नहीं होती। इसके विपरित यदि कार्य और कारण में संबंध भ्रामक हो तो निष्कर्ष भी भ्रमित करनेवाले होंगे। ज्योतिष विज्ञान का विकास बहुत ही प्राचीन काल में हुआ। उस काल में कोई भी शास्त्र काफी विकसित अवस्था में नहीं था।सभी शास्त्रों और विज्ञानों में नए-नए प्रयोग कर युग के साथ-साथ उनका विकास करने पर बल दिया गया , पर अफसोस की बात है कि ज्योतिष विज्ञान अभी भी वहीं है जहॉ से इसने यात्रा शुरु की थी । महर्षि जैमिनी और पराशर के द्वारा ग्रह शक्ति मापने और दशाकाल निर्धारण के जो सूत्र थे ,उसकी प्रायोगिक जॉच कर उन्हें सुधारने की दिशा में कभी कार्य नहीं किया गया। अंधविश्वास समझते हुए ज्योतिष-शास्त्र की गरिमा को जैसे-जैसे धक्का पहुंचता गया, इस विद्या का हर युग में ह्रास होता ही गया।

फलस्वरुप यह 21वीं सदी में भी घिसट-घिसटकर ही चल रहा है। ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में अंतर का कारण कार्य और कारण में पारस्परिक संबंध की कमी होना है। ग्रह-शक्ति निकालने के लिए मानक-सूत्र का अभाव है। कुल 10-12 सूत्र हैं ,सभी ज्योतिषी अलग अलग सूत्र को महत्वपूर्ण मानते हैं। दशाकाल निर्धारण का एक प्रामाणिक सूत्र है , पर उसमें एक साथ जातक के चार-चार दशा चलते रहतें हैं-एक महादशा, दूसरी अंतर्दशा, तीसरी प्रत्यंतर दशा और चौथी सूक्ष्म महादशा। इतने नियमों को यदि कम्प्यूटर में भी डाल दिया जाए , तो वह भी सही परिणाम नहीं दे पाता है , तो पंडितों की भविष्यवाणी में अंतर होना तो स्वाभाविक है। सभी ज्योतिषी अलग अलग दशा को महत्वपूर्ण मान लें तो सबके कथन में अंतर तो आएगा ही।  ओर फिर अगर आप समुंदर के किनारे खड़े हैं और आपके पास जो जो पात्र हैं उतना उतना ही जल ले पाओगे अगर आपके पास पात्र छोटा है तो उसमें कम जल आएगा अगर आपके पास पात्र बड़ा है तो उसमें ज्यादा जल आएगा इसी तरह ज्योतिष ज्ञान है।
ज्योतिष विज्ञान मूलत: संकेतों का विज्ञान है , यह बात न तो ज्योतिषियों को और न ही जनता को भूलनी चाहिए। किन्तु जनता ज्योतिषी को भगवान बनाकर तथा ज्योतिषी अपने भक्तों को बरगलाकर फलित ज्योतिष के विकास में बाधा पहुंचाते आ रहे हैं। हर विज्ञान में सफलता और असफलता साथ-साथ चलती है। मेडिकल साइंस को ही लें। हर समय एक-न-एक रोग डॉक्टर को रिसर्च करने को मजबूर करते हैं। किसी परिकल्पना को लेकर ही कार्य-कारण में संबंध स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, पर सफलता पहले प्रयास में ही मिल जाती है, ऐसी बात नहीं है। अनेकानेक प्रयोग होते हैं , करोड़ों-अरबों खर्च किए जाते हैं, तब ही सफलता मिल पाती है ।
भूगर्भ-विज्ञान को ही लें, प्रारंभ में कुछ परिकल्पनाओं को लेकर ही कि यहॉ अमुक द्रब्य की खान हो सकती है , कार्य करवाया जाता था ,परंतु बहुत स्थानों पर असफलता हाथ आती थी। धीरे-धीरे इस विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि कसी भी जमीन के भूगर्भ का अध्ययन कम खर्च से ही सटीक किया जा सकता है। अंतरिक्ष में भेजने के लिए अरबों रुपए खर्च कर तैयार किए गए उपग्रह के नष्ट होने पर वैज्ञनिकों ने हार नहीं मानी। अभी हाल ही में चंद्रयान इसरो ने भेजा उसके बारे में सभी जानते हैं उनकी कमजोरियों पर ध्यान देकर उन्हें सुधारने का प्रयास किया जा रहा है तो अब सफलता मिल रही है। उपग्रह से प्राप्त चित्र के सापेक्ष की जानवाली मौसम की भविष्यवाणी नित्य-प्रतिदिन सुधार के क्रम में देखी जा रही है।
मानव जब-जब गल्ती करते हैं , नई-नई बातों को सीखते हैं ,तभी उनका पूरा विकास हो पाता है , परंतु ज्योतिष-शास्त्र के साथ तो बात ही उल्टी है , अधिकांश लोग तो इसे विज्ञान मानने को तैयार ही नहीं , सिर्फ खामियॉ ही गिनाते हैं और जो मानते हैं , वे अंधभक्त बने हुए हैं । यदि कोई ज्योतिषी सही भविष्यवाणी करे तो उसे प्रोत्साहन मिले न मिले ,उसके द्वारा की गयी एक भी गलत भविष्यवाणी का उसे व्यंग्यवाण सुनना पड़ता है। इसलिए अभी तक ज्योतिषी इस राह पर चलते आ रहें हैं , जहॉ चित्त भी उनकी और पट भी उनकी ही हो। यदि उसने किसी से कह दिया, `तुम्हे तो अमुक कष्ट होनेवाला है , पूजा करवा लो ,यदि उसने पूजा नहीं करवाई और कष्ट हो गया,तो ज्योतिषी की बात बिल्कुल सही। यदि पूजा करवा ली और कष्ट हो गया तो `पूजा नहीं करवाता तो पता नहीं क्या होता´ । यदि पूजा करवा ली और कष्ट नहीं हुआ तो `ज्योतिषीजी तो किल्कुल कष्ट को हरनेवाले हैं´ जैसे विचार मन में आते हैं। हर स्थिति में लाभ भले ही पंडित को हो , फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी धक्का पहुंचता आ रहा है।चीज का विकास लगभग नियिचत होता है प्रकृति का यह नियम है कि जिस बीज को उसने पैदा किया , उसे उसकी आवश्यकता की वस्तु मिल ही जाएगी । देख-रेख नहीं होने के बावजूद प्रकृति की सारी वस्तुएं प्रकृति में विद्यमान रहती ही है। बालक जन्म लेने के बाद अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी मॉ पर निर्भर होता है। यदि मॉ न हों , तो पिता या परिवार के अन्य सदस्य उसका भरण-पोषण करते हैं। यदि कोई न हो , तो बालक कम उम्र में ही अपनी जवाबदेही उठाना सीख जाता है। एक पौधा भी अपने को बचाने के लिए कभी टेढ़ा हो जाता है , तो कभी झुक जाता है। लताएं मजबूत पेड़ों से लिपट कर अपनी रक्षा करती हैं ।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सबकी रक्षा किसी न किसी तरह हो ही जाती है और ऐसा ही ज्योतिष शास्त्र के साथ हुआ। आज जब सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं ज्योतिष विज्ञान के प्रति उपेक्षात्मक रवैया अपना रही है, 
जीवन में सभी ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिए भी आपको भीतर का ज्ञान होना आवश्यक है 
 किसी व्यक्ति का भविष्य जानना असंभव तो नहीं , मुश्किल भी नहीं रह गया है , क्योंकि व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करने में बड़ा अंश विज्ञान के नियम का होता है , छोटा अंश ही सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक या पारिवारिक होता है या व्यक्ति खुद तय करता है। वास्तव में , हर कर्मयोगी आज यह मानते हैं कि कुछ कारकों पर आदमी का वश होता है , कुछ पर होकर भी नहीं होता और कुछ कुछ पर तो होता ही नहीं । व्यक्ति का एक छोटा निर्णय भी गहरे अंधे कुएं में गिरने या उंची छलांग लगाने के लिए काफी होता है। इतनी अनिश्चितता के मध्य भी अगर ज्योतिष भविष्य में झांकने की हिम्मत करता आया है तो वह उसका दुस्साहस नहीं , वरण् समय-समय पर किए गए रिसर्च के मजबूत आधार पर उसका खड़ा होना है। और फिर मित्रों भविष्य बताने वाला कुक्षी कितना भीतर से उस परमात्मा से जुड़ा हुआ है ?कितनी उसने अपना अध्यात्म में बल प्राप्त है !यह सब बातें भी निर्भर करती है! अब सही ज्योतिषी की तलाश कैसे करें? कोई ज्योतिषी जो होगा मित्रों वो कभी भविष्यफल बताने के लिए राशिफल का सहारा नहीं लेगा क्योंकि ज्योतिष विज्ञान के बोबिल्कुल उलट है तो जो लोग राशिफल बता रहे हैं आप उन्हें नजरअंदाज करें!आपकी कुंडली ओर गोचर दोनो का प्रभाव आपका आने वाला समय तय करता है! आचार्य राजेश

शनिवार, 21 सितंबर 2019

भारत की कुंडली

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मित्रों मुझे बहुत दुख होता है जब मैं देखता हूं बड़े बड़े अच्छे  नाम वाले ज्योतिषी सदियों से  लोगों को गुमराह कर रहे हैं राशिफल के नाम पर और भी जाने क्या-क्या   और अब मैं देख रहा हूं कि 15 अगस्त  भारतदेश की कुंडली की बात हो रही है जो हर साल होती है तो उसको लेकर मेरे क्या विचार हैं आइए जानते हैंभारतवर्ष की कुंडली का विश्लेषण समय-समय पर ज्योतिषीगण करते ही रहते हैं। आज मैं इस मुद्दे पर अपना मत प्रकट कर रहा हूं- जड़ वस्तु का ज्योतिषीय विश्लेषण नहीं-
 मेरा मानना है कि किसी भी जड़ वस्तु का ज्योतिषीय विश्लेषण नहीं हो सकता फ़िर चाहे वह देश हो, खेत-खलिहान हो या मकान इत्यादि। उनके ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए वह जिस व्यक्ति के आधिपत्य में है उसकी जन्मपत्रिका का विश्लेषण किया जाना चाहिए ना कि उस वस्तु का, जैसे यदि किसी राज्य का विश्लेषण करना हो तो वह उसके राजा की जन्मपत्रिका के आधार पर किया जाएगा
भारत की प्रचलित कुंडली गलत है-
 यदि हम यह मान भी लें कि भारतवर्ष की कुंडली के आधार पर भारत के भविष्य के संबंध में कुछ भविष्यवाणियां की जा सकती हैं तो उसके लिए भारत की प्रामाणिक जन्मपत्रिका का होना आवश्यक है। अभी तक तथाकथित ज्योतिषीगण जिस जन्मपत्रिका को भारत की जन्मपत्रिका बताकर उसका विश्लेषण करते हैं वह जन्मपत्रिका सर्वथा असत्य व गलत है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि जन्मपत्रिका के निर्माण के लिए जातक के जन्म की सही दिनांक, समय व स्थान की आवश्यकता होती है। भारत के संबंध में यह तीनों ही अप्राप्त हैं अब आप शायद मेरी बातों का विश्वास ना करें क्योंकि आप कहेंगे भारत का जन्म तो 15 अगस्त सन 1947 को रात्रि 12:00 बजे हुआ था। भारतवर्ष की बताई जाने वाली जन्मपत्रिका भी इसी समय व दिनांक के आधार पर बनी हुई होती है लेकिन यह पूर्णत: गलत है क्योंकि जन्म तो 'पाकिस्तान' का हुआ था ना कि भारत का, भारत का तो विभाजन हुआ था। विभाजन के आधार पर यदि भारत का जन्म माने तो भारत का विभाजन तो इससे पूर्व भी कई बार हो चुका था। अत: भारत के जन्म अर्थात निर्माण के सम्बन्ध में कोई दिनांक व समय प्राप्त ही नहीं है तो फ़िर जन्मपत्रिका का निर्माण कैसे हो?

 एक समान कुंडली-नोट यहां में जड़ वस्तु की वात कर रहा हु 
 
14 एवं 15 अगस्त को रात्रि 12:00 बजे को आधार मानकर निर्माण की जाने वाली कुंडलियों में चन्द्र को छोड़कर सभी ग्रहों  की समानता है क्योंकि ग्रह परिवर्तन सामान्यत: कम से कम 1 माह में ही होता है। अत: जब कुंडली एक ही समान हैं तो फ़लित विलग-विलग कैसे   संभव है? इसका निर्णय आप स्वयं कीजे विभाजन के आधार पर समय अलग नहीं हो सकता-कुछ विद्वानों ने 13 रात का समय लिया तो कुछ विद्वानों ने 14 सुवह का पाकिस्तान का लिया है
 हम यदि भारत के विभाजन को भी जन्मपत्रिका निर्माण का आधार मानें जो कि सर्वथा गलत है तो भी विभाजन का समय अलग-अलग नहीं हो सकता। जिस दिन पाकिस्तान का निर्माण किया गया ठीक उसी समय वर्तमान भारत भी अस्तित्व में आ गया फ़िर दोनों देशों का निर्माण समय अलग-अलग कैसे हुआ? स्वतन्त्रता या परतन्त्रता ज्योतिष का आधार नहीं हो सकती।
 अत: उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतवर्ष की कुंडली बनाकर उसका फ़लित व भविष्य विश्लेषण सम्बन्धी बातें करना नितांत असत्य व भ्रामक हैं।कल वात करते हैं कि भारत का नाम भारत कैसे पड़ा। मित्रों भारतवर्ष का नामकरण कैसे हुआ इस संबंध में मतभेद हैं। भारतवर्ष में तीन भरत हुए एक भगवान ऋषभदेव के पुत्र, दूसरे राजा दशरथ के और तीसरे दुश्यंत- शकुंतला के पुत्र भरत।
भारत-1 : भारत नाम की उत्पति का संबंध प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट राजा मनु के वंशज भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत से है। श्रीमद् भागवत एवं जैन ग्रंथों में उनके जीवन एवं अन्य जन्मों का वर्णन आता है।

ऋषभदेव स्वयंभू मनु से पांचवीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वयंभू मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। राजा और ऋषि ऋषभनाथ के दो पुत्र थे- भरत और बाहुबली।

बाहुबली को वैराग्य प्राप्त हुआ तो ऋषभ ने भरत को चक्रवर्ती सम्राट बनाया।
भारत-2 : राम के छोटे भाई भरत राजा दशरथ के दूसरे पुत्र थे। उनकी माता कैकयी थी। उनके अन्य भाई थे लक्ष्मण और शत्रुघ्न। परंपरा के अनुसार राम को गद्दी पर विराजमान होना था लेकिन उन्हें 14 वर्ष का वनवास मिला। इस दौरान भरत ने राजगद्दी संभाली और उन्होंने राज्य का विस्तार किया। कहते हैं उन्हीं के कारण इस देश का नाम भारत पड़ा।
भरत-3 : पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना 'महाभारत' में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। कालिदास कृत महान संस्कृत ग्रंथ 'अभिज्ञान शाकुंतलम' के एक वृत्तांत अनुसार राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष का नामकरण हुआ।
मरुद्गणों की कृपा से ही भरत को भारद्वाज नामक पुत्र मिला। भारतद्वाज महान ‍ऋषि थे। चक्रवर्ती राजा भरत के चरित का उल्लेख महाभारत के आदिपर्व में भी है।
हालांकि ज्यादातर विद्वान मानते हैं कि ऋषभनाथ के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर ही भारत का नामकरण हुआ।  आचार्य राजेश

राहु की संगत बनाम शक्तीकीरंगत

 
कुंडली मे राहु जिस ग्रह के साथ गोचर करता है या जिस ग्रह के साथ जन्म समय से विराजमान होता है वही शक्ति जीवन के अन्दर काम करने के लिये मानी जाती है। घर की छत की शक्ति होती है कि वह हवा पानी धूप से रक्षा करती है,छतरी की शक्ति होती है कि वह पानी और धूप से शरीर को बचाती है,धूप की शक्ति होती है कि वह शरीर मे गर्मी पहुंचाती है,बरसात की शक्ति होती है कि वह शरीर को भीगने का सुख देती है,सर्दी की शक्ति होती है कि वह शरीर को ठंडा रखने का सुख देती है। यानी जहां जहां शक्ति है वहां वहां राहु की छाया है,घर की छत को भी राहु की उपाधि दी जाती है तो छतरी को भी राहु कहा जाता है,सूर्य की छाया यानी धूप भी राहु की श्रेणी मे आजाती है चन्द्रमा की शीतलता भी राहु की श्रेणी मे गिनी जाती है. इस प्रकार से जब ब्रह्माण्ड का कारक राहु ही है तो राहु से डरने का कारण क्या हो सकता है। जब राहु जिस ग्रह के साथ होता है तो उस ग्रह के बारे मे असीमित भावना को भर देता है,वह भावना अगर जन्म के राहु से टकरा रही है तो वह एक अमिट छाप यानी मोहर को लगा देती है।
राहु के साथ अगर सूर्य है शुक्र है तो राहु राजसी ठाटबाट को प्रस्तुत करने से चूकेगा नही उसी जगह पर अगर राहु के साथ मे शनि है वक्री बुध है तो उस आदमी को झूठ बोलने और चालाकी से काम निकालने के अलावा कुछ आता भी नही होगा। उदाहरण के लिये अपने क्रिकेत खिलादी सचिन तेन्दुलकर को ही देख लो कहने को तो राहु चौथे भाव मे बैठा है चन्द्रमा के साथ है अष्टम के सूर्य शुक्र से युति है तो वह राजकीय रूप से जनता के मन से धन धान्य के द्वारा आगे बढाने के लिये कमी नही दे रहा है। इसी बात को अगर और देखा जाये तो राहु का योग चौथे भाव मे भी है और राहु का योग अगर अष्टम भाव मे हो जाता है तो राहु अन्दरूनी भेद को भी जानने वाला बना देताहै,सचिन की कुंडली मे जन्म कुंडली से राहु चौथे भाव मे है और जिस घडी मे सचिन पैदा हुये है उस घडी मे राहु अष्टम मे बैठा हुआ है,अगर कारकांश कुंडली से देखा जाये तो भी चौथे भाव को मजबूत कर रहा है और उसे अगर होरा लगन से देखा जाये तो सीधा जाकर लाभ मे बैठ जाता है,इस प्रकार से जीवन मे प्रसिद्धि धन धान्य के लिये राहु अपनी गति को पूर्ण रूप से प्रदान करने वाला होता है। चन्द्र कुंडली से जब राहु लगन मे हो तो वह अपनी शक्ति को मजबूती से पैर जमाने के लिये और खुद की सोच से आगे बढने वाला भी बना देता है,नवांश से यह राहु अगर सप्तम मे चला जाये और शनि के साथ शुक्र का प्रभाव देकर आच्छादित कर दे और भी सोने मे सुहागा बना देने के लिये अपनी गति को और भी प्रदान करने वाला बन जाता है।
तीसरा सप्तम का और ग्यारहवा राहु अगर सही स्थिति मे है तो वह प्रसिद्धि देने के लिये बहुत ही उत्तम माना जाता हैजबराहु का गोचर तीसरे भाव मेआया  वह सचिन को प्रसिद्धि दी तो सौवां शतक देकर इस राहु ने नवाजा है। इसके अलावा भी एक बात और भी सही है कि जब कुंडली मे राहु चौथा होता है तो वह धर्मी हो जाता है वह किसी भी प्रकार से जीवन मे खराबी नही पैदा कर सकता है चन्द्रमा के साथ होने से मां का आशीर्वाद हमेशा साथ रहने वाला होता है जो लोग मां को घूरा कूडा समझते है उन्हे इस बात को समझ लेना चाहिये कि जब तक माता का आशीर्वाद साथ है दुनिया साथ है जैसे ही इस आशीर्वाद मे बददुआ मिल जाती है अपना शरीर भी काम नही आता है। । ग्रहों की स्थिति के साथ ही हम बात करते हैं महादशाओं की। किसी भी जातक को उसकी कुंडली के शुभ ग्रहों का फल उस ग्रह महादशा अंतर्दशा में माना जाएगा या गोचर से माना जाएगा मंगल की महादशा के बाद प्रारंभ हुई राहु की महादशा। राहु की महादशा के प्रारंभ होते ही शुरू हुआ सचिन की सफलताओं का वह स्वर्णिम सफर जिसे कोई भूल नहीं सकता। राहु चतुर्थ भाव में लाभेश चंद्रमा से युत होकर स्थित हैं तथा दशम भाव को पूर्ण दृष्टि प्रदान कर रहे हैं। राहु धनेश शुक्र व लाभेश चंद्रमा के नक्षत्र व उपनक्षत्र में बैठकर नीचभंग राजयोग भी बना रहे हैं। राहु मिथुन राशि में उच्च के होते हैं। राहु के उच्चनाथ बुध सप्तम भाव में अर्थात लग्न से केंद्र में बैठे हैं जिस कारण राहु का नीच भंग हो गया है। 18 वर्ष की राहु की महादशा में सचिन को वह सब कुछ मिला जिसकी हर व्यक्ति की चाह होती है। अब तक अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में उनकी पकड़ बन चुकी थी। उनका प्रेम परवान चढ़ा और पारिवारिक सहमति से उनका विवाह भी हो गया। यहां पर हम कुंडली की व्याख्या नहीं करेंगेसचिन तेंदुलकरः कोच या कमेंटेटर के रूप में आ सकते है नजर 
सचिन ने इस समय क्रिकेटे के खेल से भले ही निवृत्ति ले ली हो, पर क्रिकेट का मैदान नहीं छोड़ेंगे। कहने का अभिप्राय यह है कि आगामी समय में सचिन कोच या कमेंटेटर के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं। कुंडली के अनुसार जब राहु का गोचर में  इसी स्थान पर   में आगमन होगा तब इनको किसी रूप में आकस्मिक लाभ होने के आसार हैं। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को  बीच विदेश में किसी प्रकार का सम्मान मिलने की संभावना है। 
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शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

गोचर मैं सिंह राशि में मंगल के प्रति फलादेश

गोचर मैं सिंह राशि में मंगल के प्रति फलादेश

वर्तमान मे मंगल का गोचर सूर्य की राशि मे चल रहा है,यह कारण सरकारी क्षेत्र मे और राजनीति में जिद्दी होने की बात को प्रकट करता है,सबसे पहले जिद्दी शब्द की व्याख्या करना जरूरी है। जब किसी कार्य मे परेशानी का कारण पैदा होने लगता है तो उस कार्य को जबरदस्ती करने की दिमाग मे आती है,बाकी के सभी कार्य छोड कर एक ही कार्य करने की जिद दिमाग मे पैदा हो जाती है। इससे व्यक्ति रूप मे भी दिमाग मे जिद्दीपन आजाता है,और व्यक्ति के आसपास के जो कार्य होते है उनके अन्दर परेशानी का कारण पैदा होना शुरु हो जाता है। काल पुरुष के अनुसार मंगल का स्थान संतान परिवार विद्या बुद्धि मनोरंजन जल्दी से धन कमाने के क्षेत्र खेलकूद के प्रति की जाने वाली भावना माता के परिवार माता के धन पिता के द्वारा रिस्क लेकर किये जाने वाले कार्य जीवन साथी के मित्र आदि के भाव मे इस मंगल का गोचर करना माना जाता है। इन सभी कारणो मे किसी न किसी प्रकार की उत्तेजना के कारण दिक्कत का होना माना जा सकता है। इन कारणो मे सरकार का परिवार का सन्तान का और इसी प्रकार के कारको का मानसिक तनाव भी माना जा सकता है। इन्ही क्षेत्रो मे कार्य करने वाले लोग किसी न किसी प्रकार से आहत भी होते है और चोट आदि के द्वारा दिक्कत भी उठाते है। मंगल खून की गर्मी का कारक है इस कारण से गुस्सा का बढना भी माना जाता है,जब कोई बढचढ कर बात करने के लिये अपनी मानसिकता को आगे रखता है या ताव खाता है तो अभिमान की मात्रा बढने से लडाई झगडे की नौबत भी आजाती है। अगर जातक की कुंडली में सूर्य भी इसी स्थान मे है तो जातक के पिता के प्रति यही धारणा मानी जा सकती है पुत्र के प्रति भी यही कारण माना जा सकता है इन दोनो को किसी प्रकार चोट आदि से पेट सम्बन्धी दिक्कत का होना भी माना जा सकता है.अगर इस भाव मे चन्द्रमा है तो जातक की माता को परेशानी का कारण पैदा होता है जनता के अन्दर किसी न किसी बात पर गुस्सा आता है और तोड फ़ोड जैसे कारण पैदा हो जाते है। शासन मे कोई स्त्री शासक यात्रा आदि मे अपने बिजी रखता है,परिवार मे भाई की यात्रा का कारण भी माना जा सकता है,इस युति से उतावलापन भी देखने को मिलता है। अगर इसी स्थान मे बुध है तो मानसिक अशान्ति और और दुश्मनी मे बढोत्तरी होने लगती है जो मित्र होते है वह भी अधिक अभिमान या अहम के कारण शत्रु बनने लगते है,पेट सम्बन्धी बीमारी का होना भी माना जा सकता है। अगर इस भाव मे गुरु के साथ मंगल का गोचर होता है तो जातक के अन्दर जितनी विद्या है उससे अधिक बात करने का कारण बनता है और कार्य के अन्दर जाकर वह झूठा अहम खत्म हो जाता है इसलिए अपमान भी होता है और अगर स्त्री की कुंडली मे यह युति बनती है तो उसके पति का यात्रा वाला या स्थान परिवर्तन का योग बनता है। वैसे उन्नति का समय भी माना जा सकता है। गोचर से जब मंगल इस भाव मे शुक्र पर आता है तो जान पहिचान मे बढोत्तरी होने की बात भी मिलती है सम्बन्धी घर आने लगते है,उत्सव आदि होने की बात भी होती है स्त्री जातक की कुंडली मे पति को लाभ होता है और भाई को किसी स्त्री से जान पहिचान का कारण भी माना जा सकता है। यही मंगल जब शनि पर गोचर करता है तो नौकरी आदि मे परेशानी देने का कारण बनता है किसी उच्च अधिकारी से मनमुटाव हो जाता है और धन की भी हानि होने का कारण बनता है यह बात अक्सर कार्य के अन्दर अधिक तकनीक लगाने और अपनी बात को उत्तेजना मे आगे रखने का कारण बनता है,यही पर राहु का असर होता है तो जातक के भाई पर परेशानी का कारण पैदा होता है जिद मे बढोत्तरी होती है पेट के अन्दर गैस का बनना और पाचन क्रिया का खराब होना भी माना जा सकता है,केतु के साथ मंगल का गोचर होने से भाई के अक्समात धार्मिक बनने की बात भी मानी जा सकती है या पति का किसी प्रकार से धर्म के प्रति लगाव शुरु हो जाता है आचार्य राजेश

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

वक्रीशनि मार्गी शनि

शनि बुधवार, 18 सितंबर को ग्रहों का न्यायाधीश शनि अपनी चाल बदलेगा। ये ग्रह अभी धनु राशि में वक्री है। 18 तारीख के बाद मार्गी हो जाएगाजब शनि मार्गी हो जाएगा, तब सिर्फ राहु-केतु ही वक्री रहेंगे, क्योंकि ये दोनों ग्रह हमेशा वक्री ही रहते हैं।

"मार्गी शनि देह कुटवावे,वक्री खुद की बुद्धि चलावे,
काम करे ना करवावन देई,केवल आवन जावन लेई.
खुद के घर में वक्री रहता,देश से जाय विदेश में रहता,
जब कभी घर आवन होई,दस पांच साल में वापिस कोई"
शनि की आदतों से नही शनि की नजर से डरा जाता है,शनि की नजर जहाँ भी पड जाती है उसका कल्याण होना निश्चित है,मार्गी शनि पानी वाला सांप माना जाता है तो वक्री शनि जहरीला सांप और अस्त शनि को शेषनाग की उपाधि दी जाती है। कुंडली के त्रिक भाव में अगर शनि है तो बिना अपना असर दिये नही जाता है लेकिन शनि की आदत है कि वह अगर अपने इष्ट देव चाहे जो भी हों या अपने माता पिता की सेवा में रहता है,तो उसके ऊपर यह अपना असर कम ही करते हैं। जब शनि कुंडली में मार्गी होता है तो शरीर से मेहनत करवाता है और जो भी काम करवाता है उसके अन्दर पसीने को निकाले बिना भोजन भी नहीं देता है और जब किया सौ का जाय तो मिलता दस ही है,इसके साथ ही शरीर के जोड़ जोड़ को तोड़ने के लिए अपनी पूरी की पूरी कोशिश भी करता है,रहने के लिए अगर निवास का बंदोबस्त किया जाए तो मजदूरों से काम करवाने की बजाय खुद से भी मेहनत करवाता है तब जाकर कोई छोटा सा रहने वाला मकान बनवा पाता है,जब कोई कार्य करने के लिए अपने को साधनों की तरफ ले जाता है तो साधन या तो वक्त पर खराब हो जाते है या साधन मिल ही नहीं पाते है,मान लीजिये किसी को घर बनवाने के लिए सामान लाना है,सामान लाते हुए घर के पास ही या तो साधन खराब हो जाएगा जिससे आने वाले सामान को घर तक लाना भी है और साधन भी ख़राब है या रास्ता ही खराब है उस समय मजदूरी से अगर उस सामान को लाया जाता है तो वह मजदूरी इतनी देनी पड़ती है जिससे मकान को बनवाने के लिए जो बजट है वह फेल हो रहा है इस लोभ के कारण सामान को खुद ही घर बनाने के स्थान तक ढोने के लिए मजबूर होना पड़ता है,इसके बाद अगर किसी बुद्धि का प्रयोग भी किया जाए तो कोई न कोई रोड़ा आकर अपनी कलाकारी कर जाता है,जैसे कोई आकर कह जाता है कि अमुक समय पर उसका वह काम करवा देगा लेकिन खुद भी नहीं आता है और भरोसे में रखकर काम को करने भी नहीं देता है,यह मार्गी शनि का कार्य होता है,इसी प्रकार से मार्गी शनि एक विषहीन सांप की भांति भी काम करता है,विषहीन सांप से कोई डरता नहीं है उसे लकड़ी से उछल कर हाथ से पकड़ कर शरीर को तोड़ने का काम करता हैउसी जगह वक्री शनि बुद्धि से काम करने वाला होता है जैसे जातक को घर बनवाना है तो वह अपनी बुद्धि से साधनों का प्रयोग करेगा,पहले किसी व्यक्ति को नियुक्त कर देगा फिर उसे अपनी बुद्धि के अनुसार किये जाने वाले काम का मेहनताना देगा,जो मेहनताना दिया जा रहा है उसकी जगह पर वह दूसरा कोई काम बुद्धि से करेगा जिससे दिया जाने वाला मेहनताना आने भी लगेगा और दिया भी जाएगा जिससे खुद के लिए भी मेहनत नहीं करनी पडी और नियुक्त किये गए व्यक्ति के द्वारा काम भी हो गया,इस प्रकार से बुद्धि का प्रयोग करने के बाद जातक खुद मेहनत नहीं करता है दूसरो से बुद्धि से करवाकर धन को भी बचाता है,वक्री शनि का रूप जहरीले सांप की तरह से होता है वह पहले तो सामने आता ही नहीं है और अगर छेड़ दिया जाए तो वह अपने जहर का भी प्रयोग करता है और छेड़ने वाले व्यक्ति को हमेशा के लिए याद भी करता है,इस शनि के द्वारा मेहनत कास लोगों के लिए भी समय समय पर आराम करने और मेहनत करने के लिए अपने बल को देता है जैसे मार्गी शनि जब वक्री होता है तो मेहनत करने वाले लोग भी दिमागी काम को करने लगते है और जब वक्री शनि वाले जातको की कुंडली में वक्री होता है तो दिमागी काम की जगह पर मेहनत वाले काम करने की योजना को बनाकर परेशानी में डाल देता है.जब शनि अपने ही घर में वक्री होकर बैठा हो तो वह पैदा होने वाले स्थान से उम्र की दूसरे शनि वाले दौर में शनि का एक दौर पैंतीस साल का माना जाता है विदेश में फेंक देता है,जब कभी जातक को पैदा होने वाले स्थान में भेजता है और जल्दी ही वापस बुलाकर फिर से विदेश में अपनी जिन्दगी को जीने के लिए मजबूर कर देता है,इसके साथ ही शनि की आदत है कि वह कभी भी स्त्री जातक के साथ बुरा नहीं करता है वह हमेशा पुरुष जातक और अपने ऊपर धन बल शरीर बल बुद्धि बल रखने वाले लोगों पर बुरा असर उनके बल को घटाने और वक्त पर उनके बल को नीचा करने का काम भी करता है,घर में जितना असर पुत्र जातक को खराब देता है उतना ही अच्छा बल पुत्री जातक को देता है,लेकिन वक्री शनि से पुत्री जातक अपने देश काल और परिस्थिति से दूर रहकर विदेशी परिवेश को ही सम्मान और चलन में रखने के लिए भी माना जाता है.

शनिवार, 14 सितंबर 2019

राहु दशाफल भाग (4)

राहु दशा भाव (4)

काल पुरुष की कुंडली में आठवें भाव में वृश्चिक राशि मंगल की सकारात्मक राशि है। भावनात्मक राशि के लिये मेष को जाना जाता है। राहु को ग्रहों में छाया ग्रह के रूप मे जाना जाता है,लेकिन विस्तार की नजर से इस छाया ग्रह का वही प्रभाव वही सामने आता है जैसे कडक धूप के अन्दर छाया का आनन्द आता है,या सादा से दिखने वाले तार में बिजली का करण्ट झटका मारता है या एक बुद्धू से दिखाई देने वाले व्यक्ति के अन्दर से असीम ज्ञान का भण्डार उमड पडता है। इस राहु के बारे में कहा जाता है कि बारह साल में रुडी के दिन भी घूम जाते है,या बेकार से लोग राख से साख पैदा कर देते है अथवा बडी बडी दवाइयों के फ़ेल होने के बाद भी सादा सी भभूत काम कर जाती है। वैसे सादा व्यक्ति के लिये इस राशि का राहु बहुत ही खतरनाक माना जाता है,इस राहु के जन्म समय मे वृश्चिक राशि में होने के समय मे राहु की दशा या राहु के गोचर के समय जिस जिस भाव में जिस जिस ग्रह पर अपना प्रभाव डालता है वह भाव ग्रह अपने अपने अनुसार समाप्त होता जाता है।आठवें घर का संबध शनि और मंगल ग्रह से होता है। इसलिए इस भाव का राहू अशुभ फल देता है। जातक अदालती मामलों में बेकार में पैसे खर्च करता है।परिवारिक जीवन भी प्रतिकूलता से प्रभावित होता है। यदि मंगल ग्रह शुभ हो  तो जातक को घनी भी वनाता हैं अष्टम भाव काअशुभ राहु का  धोखा अक्सर किये जाने वाले कामो से देखने को मिलते है,पहले आशा लगी रहती बस है कि इस काम को करने के बाद बहुत लाभ होगा और एक समय ऐसा आता है कि पूरी मेहनत भी लग चुकी होती है पास का धन भी चला गया होता है पता चलता है कि काम का मूल्य ही समाप्त हो चुका है,इसी प्रकार का धोखा अधिकतर मंत्र तंत्र और यंत्र बनाने वाले अद्भुत चीजो का व्यापार करने वाले शमशान सिद्धि का प्रयोग करने वाले भी करते है जब राहु का स्थान किसी के अष्टम मे होता है या अष्टम का स्वामी किसी प्रकार से राहु केतु शनि के घेरे मे होता है तो वह इन्ही लोगो के द्वारा धोखा खाने वाला माना जाता है यह कारण दशा के अन्दर भी देखा जाता है जैसे धनेश और राहु की दशा मे या अष्टमेश और राहु की दशा मे इसी प्रकार की धोखे वाली बात होती देखी जाती है.अक्सर इसी प्रकार के धोखे शीलहरण के लिये स्त्रियों मे भी देखे जाते है जब भी कोई अपनी रसभरी बातो को कहता है या अपने प्रेम जाल मे ले जाने के लिये चौथे भाव या बारहवे भाव की बातो को प्रदर्शित करता है तो उन्हे समझ लेना चाहिये कि उनके लिये कोई बडा धोखा केवल उनके शील को हरने के लिये किया जा रहा है,इस धोखे के बाद उनका मन मस्तिष्क और ईश्वरीय शक्तिओं से भरोसा उठना भी माना जा सकता है,इस भाव का धोखा उन लोगो के लिये भी दिक्कत देने वाला होता है जो डाक्टरी काम करते है वह अपने धोखे के अन्दर आकर किसी बीमारी को समझ कर कोई दवाई दे देते है और उस दवाई को देने के बाद मरीज बजाय बीमारी से ठीक होने के ऊपर का रास्ता पकड लेता है। यही बात इन्जीनियर का काम करने वाले लोगो के साथ भी होता है वह धोखे मे आकर अपनी रिपेयर करने वाली चीज मे या तो अधिक वोल्टेज की सप्लाई देकर उसे बजाय ठीक करने के फ़ूंक देते है या सोफ़्टवेयर को गलत रूप से डालकर पूरे प्रोग्राम ही समाप्त कर लेते है मित्रों कालपुरुष की कुंडली में वृश्चिक राशि बनती हैइस राशि वाला जातक विष जैसी वस्तुओं को आराम से सेवन कर सकता है,और मृत्यु भी इसी प्रकार के कारकों से होती है,उसके बोलने पर गालियों का समिश्रण होता है,मतलब जो भी बात करता है वह बिच्छू के जहर जैसी लगती है,अगर गुरु या कोई सौम्य ग्रह सहायता में नही है तो अक्सर इस प्रकार के लोग शमशान के कारकों के लिये मशहूर हो जाते है,राहु खून की बीमारियां और इन्फ़ेक्सन भी देता है,जैसे मंगल नीच के साथ अगर राहु अष्टम है तो जातक को लो ब्लड प्रेसर की बीमारी होगी,वही बात अगर उच्च के मंगल के साथ युति है तो हाई ब्लड प्रेसर की बीमारी होगी,और मंगल राहु के साथ गुरु भी कन्या राशि के साथ या छठे भाव के मालिक के साथ मिल गया है तो शुगर की बीमारी भी साथ में होगी. अष्टम भाव में राहु गुप्त विद्या गूढ ज्ञान के लिये वह अपने को आगे रखता है,बाहरी लोगों से और पराशक्तियों के प्रति उसे विश्वास होता है,अपने खुद के परिवार के लिये आफ़तें और शंकाये पैदा करता रहता है.
राहु को दवाइयों के रूप में भी माना जाता है,जो दवाइयां शरीर में एल्कोहल की मात्रा को बनाती है और जो दवाइयां दर्द आदि से छुटकारा देती है वे राहु की श्रेणी में आती है.
राहु की आशंका कभी कभी बहुत बडा कार्य कर जाती है जैसे कि अपना प्रभाव फ़ैलाने के लिये कोई झूठी अफ़वाह फ़ैला कर अपना काम बना ले जाना राहु को कचडा अगर माना जाये तो यह राहु कबाडी का काम करने वाले लोगों को और मौत को पेशा के रूप में अपनाने वाले लोगों के लिये भी माना जाना जाता है। इस राहु का कारण अगर व्यक्ति स्थान या नाम के लिये लिया जाता है तो आम आदमी के अन्दर भय का वातावरण पैदा करने के लिये और डरने के लिये भी माना जाता है। जाति से इस राहु का प्रभाव मुस्लिम जाति के लिये भी माना जाता है जो लोग खतरनाक स्थानों में निवास करते है,समुदाय बनाकर हत्या और डराकर राज करने वाले लोगों के लिये भी यह राहु अपने अनुसार कार्य करने वाला माना जाता है। जो लोग दक्षिण पश्चिम दिशा में घर के संडास को बना लेते है उनकी कुंडली में राहु इस राशि में किसी न किसी प्रकार से आकस्मिक हादसे देने का कारक बन जाता है। इस राशि में राहु के होने से केतु का स्थान धन की राशि में होना वास्तविक है,केतु का स्थान धन की राशि में होने से नकारात्मक प्रभाव भी माना जाता है,साथ ही इस राशि में राहु के होने से भोजन आदि के लिये भी सहायक साधनों का इन्तजाम करना पडता है। या तो भोजन को किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से खाना पडता है या भोजन के लिये अलग से चम्मच या इसी प्रकार के औजारों से भोजन करना पडता है,दाहिने अंग में लकवा जैसी बीमारी को पैदा करने के लिये इसी राहु का असर माना जाता है। जननांगो में इन्फ़ेक्सन जैसी बीमारियों के लिये भी इसी राहु को दोषी ठहराया जाता है। बायो गैस प्लांट भी इसी स्थान की उत्पत्ति मानी गयी है,साथ ही शमशानी कार्य करना और शमशान आदि की देखभाल करना नगर पालिका जैसे कार्य करना आदि भी इसी राशि के राहु की देन मानी जाती है।आचार्य राजेश

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...