सोमवार, 3 मई 2021

Importance of number in life(जीवन में नम्बर का महत्व

Importance of number in life(जीवन में नम्बर का महत्व

 

जीवन में नम्बर का महत्व
जैसे हम जीवन की शुरुआत मे शब्दो को प्रयोग मे लाने के लिये अक्षरों का ज्ञान करते है वैसे ही जीवन मे गिनती करने के लिये नम्बरों को सीखते है। जीरो से लेकर नौ के अंक तक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। हर  व्यक्ति एक नम्बर के आधार पर चला करता है उस नम्बर के बिना उसका जीवन अधूरा सा रहता है,कोई नम्बर भाग्य को देने वाला होता है और कोई नम्बर बहुत ही दुर्भाग्यशाली भी होता है। जन्म के नम्बर से ही पता लग जाता है कि जीवन कितने समय का है और जीवन मे किस किस वक्त कौन सी आफ़त आयेगी या जायेगी साथ ही अगर सूक्ष्म रूप से भी देखा जाये तो हर साल महिना दिन और दिन का एक एक घंटा अपनी गति को प्रदान करता है। नम्बर का जो रूप जीवन मे काम आता है वह इस प्रकार से है :-

जीवन को चलाने वाला नम्बर
जीवन जिस दिन से शुरु हुआ होता उस दिन के नम्बर से ही गति का पता लग जाता है जीवन को चलाने के लिये माता के गर्भ मे आने से ही इस नम्बर की शुरुआत हो जाती है और महिने दिन तथा घंटे से इस नम्बर का पता लगाया जाता है,पैदा होने का समय भी इसी नम्बर से प्राप्त किया जाता है।

ह्रदय की चाहत वाला नम्बर

समय समय पर मनुष्य की चाहत बदलती रहती है और जीवन मे अगर एक ही चाहत बनी रहे तो जीवन का चलना दूभर हो जाता,जब हम जन्म लेते है उसी दिन से गणना शुरु हो जाती है और इस नम्बर के लिये यह भी कहा जाता है बच्चा भी अपने दिल मे चाहत रखता है लेकिन शरीर के परिपक्वता पर आधारित होने के कारण इस नम्बर का एक प्रभाव हमारे दिल मे हमेशा रहता है अगर हमे पता लग जाये कि किस नम्बर के दिन मे हमारी चाहत बदलेगी और इस चाहत के बदलने का समय क्या होगा तो हमे काफ़ी आसानी हो सकती है.

एक नम्बर जो हमेशा मन मे रहे
कहा जाता है कि मन हमेशा चलायमान है लेकिन मन का क्षेत्र भी एक केन्द्र पर जुडा होता है जब तक केन्द्र का संचालक मन के अन्दर भाव नही भरेगा तब तक मन का चलायमान होना हो ही नही सकता है। इस नम्बर के लिये यह भी कहा जा सकता है कि जब भी कोई बात अच्छी या बुरी मन के अन्दर आयेगी उसी नम्बर के अनुसार ही आयेगी.

जन्म दिनांक
जिस दिन जातक का जन्म होता है अपनी अपनी भाषा और संस्कृति के अनुसार उस दिन का एक नम्बर भी होता है जैसे अंग्रेजी मे अगर तारीख को दिन का नम्बर मानते है तो हिन्दी मे तिथि को नम्बर के रूप मे प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार से मुसलमानी कलेण्डर मे चन्द्रमा की तारीख को ही मान दिया जाता है.वैसे दिन की मान्यता भी दी जाती है और जातक के जन्म के दिन के अनुसार ही उसका नम्बर काम मे लिया जाता है जैसे केरल मे जिस दिन व्यक्ति का जन्म होता है उसी दिन के नम्बर के अनुसार उसका फ़लादेश दिया जाता है।
मिलने वाले चेलेंज का नम्बर
जीवन मे जो भी काम करना पडता है उन सभी के लिये एक चेलेन्ज मिलता है जिस दिन काम करने का वह अच्छा हो या बुरा चेलेन्ज मिल जाता है उसी दिन से उस काम के लिये मानसिकता बन जाती है कई नम्बर तो इतने ओड होते है कि उनके लिये आजीवन एक ही प्रकार का चेलेंज स्वीकार करने के लिए व्यतीत करना पडता है।

व्यक्तिगत साल का नम्बर
हिन्दी मे हिन्दी महिनो का नम्बर और अंग्रेजी मे अंग्रेजी महिनो का नम्बर प्रयोग मे लाया जाता है। इसी प्रकार से अलग अलग देशो मे अपने अपने अनुसार महिनो की गणना के अनुसार नम्बर का प्रयोग किया जाता है। नम्बरो के आधार से ही किसी भी अल्प मध्य और उच्च गति का विश्लेषण साल के नम्बर से किया जाता है.
व्यक्तिगत महिने का नम्बर
साल के बाद महिने का नम्बर केवल शरीर की बारह गतियों पर निर्भर करता है जो गति छ: महिने पहले अच्छी थी वही गति छ: महिने बाद खराब हो जाती है जो इन गतियों को पहिचानते है वह अपने लिये पहले से ही इन्तजाम कर लेते है और वे आने वाली मुसीबत से बचकर अपने कार्य को उस मिलने वाली आफ़त से भी अपने को फ़ायदा मे ले जाते है। 

व्यक्तिगत दिन का नम्बर

सूर्य का रोजाना एक अंश का मान देखा गया है चाहे साल का समय या महिने का समय एक बार गडबडा जाये लेकिन दिन का मान उतना ही रहेगा और निश्चित समय मे ही दिन का मान बदल जायेगा,यह मान अच्छे के लिये भी और बुरे के लिये भी माना जाता है। दिन के नम्बर से अक्सर रोजाना के किये जाने वाले कामो की सफ़लता असफ़लता के लिये देखा जाता है और जिस दिन का नम्बर खराब होता है या धोखा देने वाला होता है उसी के अनुसार सम्भाल लेने पर गति के अनुसार नम्बर का प्रयोग कर लिया जाता है।
जीवन की शुरुआत का नम्बर
जीवन की शुरुआत का मतलब पैदा होने से नही है जब व्यक्ति जीवन की प्रोग्रेस मे अपने को ले जाने के लिये आगे जाना शुरु होजाता है वह ही जीवन की शुरुआत मानी जाती है कभी कभी यह भी देखा गया है कि व्यक्ति पैदा होता है खाता पीता सोता जागता है और एक दिन वह चला जाता है लेकिन उसके जीवन मे किसी प्रोग्रेस का अध्याय जुड ही नही पाता है वह दूसरो के भरोसे रहकर ही पूरे जीवन को निकाल जाता है।
जीवन के परिपक्व होने का नम्बर
जीवन के तीन प्रकार माने गये है एक कच्चा जीवन होता है जिसका मान न के बराबर होता है कि कब कहां किस मोड पर जीवन जाकर रुक जाये या किस मोड पर जाकर जीवन का अन्तिम सफ़र ही पूरा हो जाये दूसरा प्रकार अल्प परिपक्व होता है जो जीवन को आगे भी चलाता है और जब चलाने के लिये शुरु हुआ जाये तो वह कार्य या व्यवहार से अपने को नेस्तनाबूद कर ले,तीसरा प्रकार वह होता है कि जीवन पूरी तरह से हर क्षेत्र की जानकारी से पूर्ण हो गया है व्यक्ति के सामने कोई भी बात अच्छी या बुरी आये वह उसे पूरी तरह से निपटाने के लिये अपने व्यवहार को सामने कर देगा इसके लिये भी एक नम्बर होता है जो निश्चित समय का बखान करता है।
अपने को प्रदर्शित करने का नम्बर
व्यक्ति को एक नाम जन्म के बाद दिया जाता है जो नाम पूरे जीवन साथ रहता है और मरने के बाद भी कुछ काल तक भी बना रहता है और मरने के कुछ समय बाद भी समाप्त हो जाता है,नाम का पहला शब्द जीवन को प्रदर्शित करने के लिये माना जाता है इस शब्द के अक्षर और उन अक्षर से बनने वाले नम्बर के बाद ही इस कारण को जाना जाता है।

किये जाने वाले कार्यों का नम्बर
जीवन मे कितने ही कार्य किये जाते है हर कार्य का एक नम्बर होता है जो नम्बर जीवन की शुरुआती हालत मे होता है उसे जीवन के कुछ क्षेत्र के लिये मानते है फ़िर आगे बढने पर दूसरा कोई नम्बर साथ हो जाता है उस नम्बर को भी देखना जरूरी हो जाता है,जितने भी कार्य जीवन मे किये जाने है वह कार्य एक सम्बन्धित नम्बर से जुडे होते है उस नम्बर के आसपास घूमने वाले नम्बरो के आधार पर गिना जाता है कि व्यक्ति कितने प्रकार के कार्य करने के लिये समर्थ है और कितने कार्य वह नही कर सकता है।

किसलिये कार्य करने है का नम्बर
कोई भी कार्य करने का एक कारण होता है और जो कारण बनता है उसका भी एक नम्बर होता है जब तक कार्य के लिये कारण नही बनेगा तब कार्य किया जाना या उसके अच्छे बुरे होने का कोई प्रभाव भी नही जाना जा सकेगा,जीवन मे अलग अलग समय जो कारण बनेगा उसके लिये भी एक नम्बर का प्रकार बनेगा लेकिन उस कारण वाले नम्बर को जानने के लिये बाकी के नम्बरो के अनुसार ही कारण का होना माना जायेगा.

दिमाग को स्थिर रखने का नम्बर
समय काल और दूरी के नियम के अनुसार दिमाग को स्थिर रखने का भी एक नम्बर होता है जैसे समय है लेकिन काम करने का कारण नही बना है काम करने का कारण भी बना है लेकिन काम मे कठिनता आ रही है इन तीनो से तभी फ़ायदा मिलना माना जा सकता है जब दिमाग मे काम करने की स्थिरता है यह स्थिरता भी नम्बर के अनुसार ही आ पाती है।

आत्मीय नम्बर
कभी कभी देखा होगा कि किसी फ़ोन के आने से उसके साथ नया होने के बाद भी मन जुड जाता है और उस नम्बर से बात करने वाले से लगातार बात करने का मन करता है भले ही वह बात करने वाला किसी भी प्रकार से छ्ल कर दे,और कभी यह भी होता है कि कोई फ़ायदा देने वाला बात कर रहा है लेकिन उसके फ़ोन का नम्बर कुछ इस प्रकार का है कि उससे चाहते हुये भी बात नही हो पाती है आदि बाते आत्मीय नम्बर के बारे मे देखी जाती है जैसे फ़ोन का नम्बर घर का नम्बर वाहन का नम्बर और घर मे रहने वाले लोगो का नम्बर आदि.

जीवन के प्रति योजना बनाने का नम्बर
जिस समय कोई कार्य करना होता है वह चाहे घर से सम्बन्धित हो या बाहर से सम्बन्ध रखता हो वह शादी विवाह के लिये हो या किसी प्रकार के इलाज आदि के लिये किसी शिक्षा से जुडा हो या किसी प्रकार से अन्य कारण से उस समय के नम्बर पर आधारित होता है कि जो योजना कार्य के लिये बनायी जा रही है अगर वह योजना ही गलत नम्बर के समय मे बना दी गयी है तो योजना के लिये भले ही सभी साधन मिल जाये लेकिन वह योजना चाह कर भी पूरी नही होती है,यही बात अक्सर प्रेम करने वाले लोगो के लिये भी देखी जाती है प्रेम का अन्त शादी से होता है और प्रेम करने के समय से अगर शादी के समय मे फ़ेर है और बिना विचार के किये गये ही किसी गलत नम्बर के समय मे शादी की बात चलायी जाती है तो प्रेम होने के बावजूद भी शादी नही हो पाती है आदि बाते इस नम्बर से देखी जाती है।

छुपे रूप में की जाने वाली घात का नम्बर
हम अपने जीवन के प्रति सुरक्षा को लेकर चलते है और कभी कभी यह भी होता है कि हम जिस व्यक्ति से अपना सम्पर्क बना रहे होते है या जिसके ऊपर भरोसा करके चल रहे होते है वह व्यक्ति गुप्त रूप से घात करके चला जाता है या किसी प्रकार से हमने गलत नम्बर का मकान खरीद लिया है और अपनी घात का नम्बर नही पता है तो किसी न किसी प्रकार से वह मकान या वाहन हमारे लिये गुप्त रूप से हानि देने के लिये माना जायेगा चाहे वह वाहन के रूप मे एक्सीडेंट करवाये या घर के नम्बर के रूप मे आजीवन कमाने के बाद भी एक दिन डकैती डलवा दे या वह शिक्षा की शुरुआत करने के बाद ही अपनी योजना को हटाकर शिक्षा के बाद भी काम धन्धे के लिये भटकाव पैदा हो जाये.

हमेशा कष्ट देने वाला नम्बर
कई नम्बर हमारे जीवन मे ऐसे भी होते है जो बिना कारण के ही कष्ट दिया करते है,अक्सर देखा होगा कि जब हम अपने वाहन से आगे जा रहे होते है तो जिस वाहन को कष्ट देना वह किसी भी तरह से आगे जाने की प्रतिस्पर्धा मे सामने आने की कोशिश करेगा,या यह भी देखा होगा कि मकान का नम्बर अगर सही नही है तो गलत नम्बर वाला पडौसी बेकार मे ही परेशान करने लगेगा या कोई फ़ोन का नम्बर ही बेकार मे ही परेशान करने के लिये अपनी काल करने लगेगा आदि इस नम्बर को पहिचान कर पता की जाती है. मित्रों इसी तरह के और लेख आप पढ सकते है.acharyarajesh.in पर जाकर पढ़ सकते हैं मित्रों आचार्य राजेश

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

नवरात्री 2021 और ज्योतिष


चैत्र मास के नवरात्रा की शुरुआत आज से हो रही है,जनमानस की भावना दैवी शक्तियों के प्रति अपने अपने भाव के अनुसार शुरु हो गयी है। आज दिन मंगलवार है,चन्द्रमा,शुक्र मेष राशि में है मंगल वृष राशि में है,राहु वृष राशि में है केतु वृश्चिक राशि में है, शनि मकर राशि में है गुरु कुंभ राशि में है। गुरु ही जगत का जीव है सूर्य जगत की आत्मा है,शनि जगत के कार्य है,राहु जगत की शक्ति है केतु जगत के साधन है,बुध जगत का प्रदर्शन है,मंगल जगत की शक्ति है,चन्द्रमा जगत की मानसिक गति है। इन सब ग्रहों के अनुसार कालचक्र की भावना बहुत ही सुन्दर बनती है।

वृष राशि में कालचक्र की शक्ति विराजमान है,वृप राशि स्थिर कार्यों के लिये मानी जाती है,यह धन की राशि मानी जाती है वैभव की राशि भी मानी जाती हैलाभ या हानि के लिये व्यापारी सोचता है। पास या फ़ेल होने के लिये विद्यार्थी सोचता है। सभी सोचों के पीछे अपने अपने अनुसार शनि से कार्यों के प्रति खर्चा कैसा होना चाहिये रहने के प्रति खर्चा कैसा होना चाहिये,शरीर और घर द्वार के सामन की रक्षा कैसे होनी चाहिये,घर के बुजुर्गों पर खर्चा कैसा हो इस प्रकार की भावनायें वृष राशि में स्थापित कालचक्र की शक्ति सोच रही है। मन जो चन्द्रमा का कारक है मेष राशि में है और कालचक्र की शक्ति के पहले भाव में है,मन शुक्रके साथ होने से तथा दिमाग में एक साथ कई काम होने से अव्यवस्थित सा हो गया है। जनता का ध्यान अपने अपने व्यापार कार्य और घर की शान्ति के लिये दैवी शक्तियों के प्रति जा रहा है। लेकिन शक्ति का निवास वृष राशि में होने से जो भी पूजा और पाठ की तरफ़ मन ले जा रहा है वह केवल परिवार के कुनबे के कार्यों से ही अपने अपने अनुसार पूजा पाठ के लिये अपना ध्यान ले जा रहा है।
शुक्र लक्ष्मी का कारक है,मंगल शक्ति का कारक है,धन की शक्ति का रूप सामान्य रूप से माना जा सकता है। दुर्गा की शक्ति का वृष राशि मे होने से शक्ति भी अपने को घन संबंधित ऐशों आराम के साधनों के रूप से व्यक्त करने के लिये मानी जा सकती है,वृष राशि की दिशा दक्षिणी पूर्वी में है,जितने भी इस दिशा के देश राज्य स्थान है वहाँ और घर के अन्दर जो भी दिशा दक्षिण- पूर्व से सम्बन्ध रखती है सभी जगह दुर्गा का कोई न कोई रूप उपस्थित रहने के लिये जरूरी माना जा सकता है। कितने रूप माता दुर्गा के इस राशि में बनते है उनके लिये अगर सोचा जाये तो पूरे नवरात्रा ही नही कितने साल उनका वर्णन करने के लिये लगेंगे। मेरे ख्याल से बहुत मुश्किल काम है,माता की सेवा तो की जा सकती है माता के बारे में व्याख्या करना मेरे वश की बात नही है,बडे बडे तपस्वी मुनि देव दनुज सभी लगे रहे फ़िर भी उनकी व्याख्या नही कर पाये तो मेरे वश की बात कहाँ हो सकती है। अभी व्यवसाय और दक्षिण पूर्व की बात चल ही रही थी कि फ़ोन की घंटी बज गयी,चमत्कारिक रूप से माता ने अपना प्रभाव बताया कि एक भक्त राजस्थान की प्रसिद्ध करणी माता के स्थान में आया है। शुक्र मंगल का प्रभाव सीधा धर्म स्थान पर जाने से साथ में राहु की उपस्थिति माननी पडती है,कारण अश्टम भाव में केतु है। करणीमाता जिनके मन्दिर में चूहों की भरमार है,मुझे भी पिछले साल गर्मियों में उनके दर्शन करने के लिये जाना पडा था। और अबकी बार दुर्गा का स्थान करणीमाता के रूप में मानना जरूरी हो गया है। जय करणीमाता,सभी भक्तों के दुख हरो,सभी को सुख समृद्धि दो जो भी दुखिया आपको माने उसके सभी कष्ट हरो,जगत के कल्याण की भावना से चलने के लिये सभी के अन्दर बुद्धि का प्रभाव दो। रूप के बारे में दुर्गा की सवारी ही भक्त की पहिचान करवाती है। जिस सवारी पर दुर्गा सवार है उस सवारी का रूप अपने दिमाग में अपने लिये बना लेने से ही माता की भक्ति की भावना मन के अन्दर अपने आप ही पैदा हो जाती है। उनकी सवारी और उनका रूप तथा उनकी सेवा के लिये तो समझ में आ ही गया है। माता के रूप की बात दिमाग में आयी थी रूप का प्रभाव जब तक दिमाग में नही आयेगा उनके बारे में पहिचान करना मुश्किल का काम होगा। शुक्र सजा हुआ है,मन्गल से लाल रंग का शुक्र से कपडा मंगल से धर्म के लिये प्रयुक्त होने वाला। माता का आशीर्वाद किसके लिये है,माता का आशीर्वाद की शक्ति राहु के रूप में मिल रही है,उनके खजाने में राहु का रूप मिल रहा है। राहु घन की शक्ति के रूप में विराजमान है,शक्ति को देने वाला भी केतु है, राहु अनन्त आकाश की ऊंचाइयों के रूप में माना जाता है,राहु से ही आसमानी ग्रहों की शक्ति जनजीवन तक पहुंचती है। केतु उस शक्ति को संभालने और प्रयोग करने के रूप में माना जाता है,केतु के ऊपर ही जिम्मेदारी आजाती है उस शक्ति तक पहुंचा देने की। केतु ही अश्टम भाव में विराजमान है,केतु ही धर्म स्थान तक पहुंचायेगा। केतु ही धर्म का पताका है तो माता तक जाने के लिये केतु को कैसे पहिचाना जाये ? यह प्रश्न दिमाग के अन्दर उत्पन्न होता है।है जो अपने शरीर में पूंछ रखते है। पूंछ जीवों की गति को संभालने के लिये प्रयोग में ली जाती है। मछली की पूंछ जल के अन्दर मछली को गति देती है,चूहे की पूंछ चूहे को भागने दौडने और पीछे के अनुमान लगाने के लिये मानी जाती है। छिपकली की पूंछ छिपकली को आगे भागने के लिये अपनी गति देती है। लेकिन इन जीवों से देवी तक कैसे पहुंचा जा सकता है,मनुष्य को इन जीवों से पहिचान करनी है कि वे अपने को इसी प्रकार के जीवों की गति को पहिचान कर ही देवी तक जा सकते है। मनुष्य रूप में भी केतु की मान्यता है,केतु जो साधन का प्रयोग करना जानता हो,जैसे ड्राइवर को ही ले लीजिये,वह गाडी चलाकर माता के दरबार तक ले जा सकता है। केतु की मान्यता धर्म स्थान के पुजारी के रूप में माना जा सकता है,पुजारी देवी के मन्दिर में पूजा और उनके वास्तविक रूप को बताने में समर्थ है। आसमान में उडने वाले वाहनों में हवाई जहाज की भी पूँछ काम में आती है,वह अपनी पूंछ के सहारे से ही अपनी गति को बदलने के लिये माना जाता है,उसकी सवारी करने के बाद देवी तक जाया जा सकता है। घर के अन्दर देवी तक पहुंचाने के लिये केतु से भान्जे को भी माना जा सकता है,मामा को भी माना जा सकता है,जंवाई को भी माना जा सकता है,नाना को भी माना जा सकता है।
जिसका फ़ोन करणीमाता से आया था वह एक ड्राइवर है,वाहर की एक पार्टी को करणीमाता तक लेकर गया है। जो पार्टी गयी है वह भी मेरी जानकार है,उसके लडके के साथ उसके भान्जे और भतीजे गये है,हवाई जहाज से जयपुर तक आये और जयपुर सेओर फिर करणीमाता तक उस ड्राइवर के साथ गये है। करणीमाता तक जाने के लिये जो साधन है वे हमने आपको बताये है,लेकिन माता तक आज जाने का कारण भी क्या है ? इस बात का उत्तर समझने के लिये उदाहरण देखना पडेगा। जो साथ में गया है वह माता करणी का पूरा भक्त है,उसने अपने निवास स्थान में  करणीमाता का मन्दिर स्थापित कर रखा है। रोजाना भाव भक्ति से वह पूजा अर्चना करता है। लेकिन भावना की पूजा होती है,वह अपने लडकों के लिये सुख साधनों की प्राप्ति के लिये माता की पूजा के लिये पुजारी को रखता है,उसके बडे लडके ने पुजारी को अपशब्द कहे,और यह कह कर अपमानित कर दिया कि वह कुछ नही करता है हराम की खाता है और देवी के नाम से घंटी बजाकर दक्षिणा ले जाता है। पुजारी ने कोई जबाब नही दिया,वह दूसरे दिन से पूजा करने के लिये भी नही आया,जिस मन्दिर को वह अपने पूरे मनोवेग से सजा रहा था,मूर्ति के सामने दीपक जलाकर आरती और भजन गा रहा था वह सब बन्द हो गये। इधर माता का प्रकोप चालू होता है,जीवन की गति जो चलती है उसके अन्दर बदलाव आता है,जब मन्दिर के पुजारी को निकाला तो उस लडके को कुछ भी पता नही चला,वह अपने कामों में लगा रहा,भोजन के समय पर भोजन मिल गया सोनेके समय पर सोना मिल गया,पत्नी की जगह पर पत्नी और पुत्र की जगह पर पुत्र,व्यवसाय चल ही रहा है,कोई बदलाव सामान्य जीवन में नही आया।

कुछ नही होता है भगवान की पूजा आराधना से यह बात तभी तक कही जा सकती है जब तक कि भगवान की शक्ति को समझ नही लिया जाये। उस लडके का काम चलता रहा और पुजारी ने अपने लिये दूसरी जगह पर अपना काम शुरु कर लिया होगा या और कुछ करने लगा होगा उसके बारे में कुछ भी पता नही चला। एक दिन उस लडके की गाडी चलाने वाले ड्राइवर ने अपने घर के किसी काम के लिये कुछ पैसे की मांग की,आदत के अन्दर नास्तिकता हो तो दया का भाव पहले समाप्त हो जाता है,वही हाल उस लडके का था। उसने उस ड्राइवर को पैसे तो दिये नही बल्कि उसे नौकरी से निकाल कर अपमानित भी किया और यह कह कर उसे नौकरी से निकाल दिया कि उस जैसे हजारों ड्राइवर सडक पर मारे मारे घूमते है। वह ड्राइवर घर से परेशान था और नौकरी की टेन्सन  भी आजाने वह एक चिट्ठी लिखकर घर में रख गया और सीधा जाकर कलकत्ता की गंगा में छलांग लगा गया। उसका शव निकाला गया,पुलिस को उसके घर वालों ने उसके लिखे सोसाइट नोट को दिया,उसके अन्दर वह साफ़ साफ़ उस लडके के साथ उसके अन्य घर वालों का नाम भी लिख गया कि उन्होने उसे अपमानित किया नौकरी के पैसे भी नही दिये और नौकरी से भी निकाल दिया,इसलिये वह आत्महत्या कर रहा है। तीनो लोगों के लिये पुलिस गिरफ़्तार करने के लिये घूमने लगी,तीनो लोग ही घर से बेघर हो गये। बूढा बाप आजीवन माता की सेवा में रहा,माता ने उसे मन चाही सम्पत्ति और औलाद का सुख दिया। वह सीधा करणीमाता के लिये रवाना हो गया,मन्दिर में माफ़ी मांगी और पूरे महिने उनकी अर्चना की,तब जाकर उनकी जमानत हो पायी,जमानत होने के बाद उन तीनों को सबसे पहले उस बूढे बाप ने करणी माता भेजा,जहाँ से आज फ़ोन आया था।
शक्ति अपने रूप को अलग अलग स्थान पर प्रकट करती है,शक्ति कभी भी धन बल और दिखावा नही चाहती है,शक्ति को याद रखने से वह अपने अनुसार अपना बल देती रहती है,किस व्यक्ति के रूप में वह अपना बल देती है यह समझने वाली बात है। साधन शक्ति से मिलते है,व्यक्ति शक्ति से मिलते है कार्य और सफ़लता असफ़लता के साधन शक्ति से मिलते है,इन्हे पहिचान कर ही नवरात्रा की सेवा अर्चना करना  सही होगा। जय माता दी

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

उच्च के ग्रह


्उच्च के ग्रह ््
सूर्य
सूर्य यानी पिता जिसने जीवन दिया। लग्न में उच्च का कर दिया।
           चन्द्रमा

फिर चन्द्रमा माता। द्वितीय भाव भोजन, परिवार। हो गया यहां उच्च का।

             राहु
फिर तीसरा भाव राहु भाई शारीरिक ग्रोथ, भावनाएं। सब कुछ बढ़ने लगी। हो गया राहु उच्च का।

              गुरु
फिर आये गुरु महाराज ज्ञान देने को चतुर्थ में। समझदारी, विवेक, विद्या। हो गए चतुर्थ में उच्च के।
            बुध      

अब बुध बाबू प्रतियोगिता में। हर चीज में प्रथम आने की चाह। हो गए बुध बाबू यहां उच्च के।
              शनि

अब आये शनि महाराज जिंदगी को बैलेंस करने के लिए। सप्तम में उच्च के। सोचने के लिए की क्या करना है जिंदगी में आगे।
             केतु

फिर केतु महाराज ने नवम में धर्म, उच्च कोटि की बुद्धि दे दी कि अब जीवन जी लिया आगे का क्या सोचा है।


मंगल
दसम में तो मंगल महावीर ने दिखा दिया अपने पराक्रम का दम उच्च का होक की कर्म किये जा फल की चिंता मत कर।

            शुक्र
ओर सबसे अंत मे नंबर आया शुक्र का की बहुत भोग, भोग लिया अब निर्वाण की तैयारी करो।




शनिवार, 20 मार्च 2021

देव गुरु बृहस्पति ग्रह का गोचर 2021की पुरी जानकारी

www.acharyarajesh.in
देवगुरु बृहस्पति अपनी नीच राशि मकर की यात्रा समाप्त करके 05 अप्रैल 2021 की मध्यरात्रि कुंभ राशि में प्रवेश कर रहे हैं। इस राशि पर 13 सितंबर तक रहने के बाद वक्री अवस्था में पुनः मकर राशि में प्रवेश कर जाएंगे, जहां 20 नवंबर 2021 तक रहेंगे। उसके बाद पुनः मार्गी अवस्था में कुंभ राशि में प्रवेश कर जाएंगे। इनके राशि परिवर्तन का प्रभाव सभी प्राणियों के कार्य-व्यापार में हानि-लाभ के अतिरिक्त शासन सत्ता और न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।तुलसीदास जी ने एक चौपाई रामचरितमानस में लिखी है -"धर्म से विरति योग से ग्याना,ग्यान मोक्ष प्रद वेद बखाना",अर्थात जब व्यक्ति अपने को न्याय समाज जलवायु और मर्यादा में लेकर चलने लगता है तो उसके सामने हजारों कारण व्यस्त रहने के बन जाते है,जब वह अपने को कारण रूप से बने कार्यों के अन्दर व्यस्त कर लेता है तो वह एक योगी की भांति अपने जीवन को चलाने लगता है। उसे केवल भोजन अगर समय से मिल जाये तो ठीक है नही मिलता है तो ठीक है वह अपने को कार्यों में हमेशा ही लगाकर रखता है। कार्य की अधिकता के कारण और अपने शरीर को शरीर नही समझने पर इस प्रकार के जातक को एक योगी की भांति ही माना जा सकता है। जब व्यक्ति विरति यानी कर्म में अपने को लगा लेता है और संसार में केवल अपना कर्म ही धर्म के रूप में देखता है तो उसे योग अर्थात समय की पहिचान और कार्यों के दक्षता के साथ दुनियादारी के प्रति जानकार समझ लिया जाता है। उसे ज्ञानी की श्रेणी में रखा जाने लगता है और जब ज्ञान को खर्च करने के बाद उसका उपयोग किया जाता है,तो वह मोक्ष का अधिकारी माना जाता है। कुम्भ राशि वालों को कार्य के बाद प्राप्त फ़लों के रूप में माना जाता है,कालपुरुष के अनुसार यह राशि मित्रता और बडे भाई के रूप में माना जाता है। यह कार्य करने के बाद मिलने वाले फ़लों से भी माना जाता है,यह राशि घर बनाने और जनता से सम्बन्ध स्थापित करने के लिये प्राप्त की जाने वाली रिस्क से भी माना जाता है। यह भाव सन्तान के जीवन से चलने वाली जद्दोजहद से भी माना जा सकता है। पिता के द्वारा प्राप्त नगद आय से भी माना जाता है,पिता के द्वारा जोडे गये कुटुम्बी जनों के प्रति और उनसे मिलने वाली सहायता से भी माना जा सकता है। इस राशि का स्वभाव अपने कार्यों और पीछे की जिन्दगी से जुडे कार्यों से माना जाता है यानी जो कल किया है उससे मिलने वाले फ़लों से भी माना जा सकता है। यह राशि बडे रूप में हर कार्य को करना चाहती है छोटे रूप में कार्य करने पर यह केवल जनता के अन्दर रहकर जनता की सेवा करने के बाद और जनता से जुडी समस्याओं के प्रति अपनी वफ़ादारी को रखती है लेकिन इस प्रकार के जातकों का मोह कर्क राशि के छठे भाव में होने के कारण अन्दरूनी रूप से जनता के अन्दर की जानकारियां भी सही समय पर लेने की उत्कंठा रहती है,जब उन्हे जनता के अन्दर के भेद मिल जाते है तो उन्हे दुनियादारी में प्रसारित करने में भी अच्छा लगता है। इस राशि वाले अगर किसी प्रकार से मीडिया या इसी प्रकार के वायु वाले कमन्यूकेशन से जुड जाते है तो अपना अच्छा नाम कर लेते है और कभी कभी यह भी देखा गया है कि इनकी रुचि आलसी होने के कारण और पूर्व में अपने द्वारा फ़रेब आदि करने से गुरु के समय में दिक्कत भी आती है। इस राशि में गोचर किया है गुरु ने कुंभ राशि जो शनि की राशि है और काल पुरुष की कुंडली के अनुसार यह खाना नंबर 11 है।पिछले समय से चली आ रही अपमान मौत और जोखिम के लिये जो शनि बार बार अपनी शक्ति को दे रहा था उसके अन्दर कमी आएगी शनि मकर में है पहले गुरु के साथ था अब गुरु उसके आगे एक घर आ जाएगा गुरु के कुंभ राशि में आ जाने से धन वाली और परिवार कुटुम्ब वाली परेशानियों में अन्त होने का समय माना जाता है,जो लोग पहले अपनी रिस्क के अनुसार जनता के धन को प्रयोग में लाने के बाद जनता के कर्जी बन गये थे और उन्हे कोई रास्ता चुकाने का नही मिल रहा था वह इस गुरु की कृपा से कोई न कोई रास्ता मिल जाता है चाहे वह रास्ता किसी प्रापर्टी को बेचने के बाद मिलता हो या कोई प्रापर्टी वाला कार्य करने के बाद मिलने वाले कमीशन आदि से जाना जाता हो। कुंभ को अगर लगन मानकर चलें तो गुरु की पांचवीं द्रिष्टि पंचम भाव यहां पर मिथुन राशि आती है जो कि काल पुरुष की कुंडली के अनुसार तीसरी राशि भी है मिथुन राशि वालों के लिए गुरु की दृष्टि अमृत के समान है।मिथुन राशि कमन्यूकेशन और प्रदर्शन की राशि है,इस राशि से कालपुरुष अपनी प्रकृति को दर्शित करता है,संसार में जितने भी कमन्यूकेशन के साधन है और जैसा भी स्थान देश और जलवायु के अनुसार बोलचाल रहन सहन अपने को लोगों को दिखाने की कला है,वह सब मिथुन राशि के ऊपर ही निर्भर करती है। गुरु इस राशि से सप्तम भाव और दसवें भाव का मालिक है। सप्तम जीवन साथी और साझेदारी के नाम से जाना जाता है और व्यक्ति अपने जीवन में जो भी करने के लिये आता है वह सब सप्तम के साथ आमना सामना करने के बाद ही करता है। मिथुन राशि का स्वभाव होता है कि वह गर्म के सामने ठंडी हो जाती है और ठंडे के सामने अपनी गर्मी को प्रस्तुत करती है। यह स्वभाव व्यक्ति स्थान वस्तु के लिये भी देखा जाता है,जैसे घर बनवाते समय बरसात के मौसम में उसकी सुरक्षा के लिये छत बनाना और बिना बरसात वाले स्थान में जहां धूप गर्मी और जाडे की आवश्यकता नही समझी जाती है वहां खुला छोड दिया जाता है। उसी प्रकार से मनुष्य के पहिनावे के लिये भी देखा जाता है,मनुष्य के बोलचाल की भाषा में भी देखा जाता है,भाषा और भाषा के विश्लेषण के लिये भी देखा जाता है। इस राशि का प्रभाव हर मनुष्य के अन्दर किसी न किसी रूप में मिलता है.

इस राशि वालों के जीवन साथी के मामले में माना जाता है कि जीवन साथी तो ज्ञान और मर्यादा के साथ बंध कर रहता है लेकिन इस राशि वाले का स्वभाव जो है उसे बोल देने और केवल बातें करने से माना जाता है। इस राशि वाले गाने बजाने और संगीत आदि के प्रेमी होते है जब कि उनके जीवन साथी अपने अनुसार हमेशा चुप रहने और बडी बातें सोचने के कारण अपने को गुप्त ही रखा करते है। इस राशि के दसवें भाव का मालिक गुरु है जो ज्योतिष के अनुसार नीच का कहलता है,और इस गुरु की शिफ़्त के अनुसार जो भी कार्य इस राशि वालों से प्रकृति करवाती है वह सभी किसी न किसी प्रकार से घर और बाहर की बातें ध्यान में रखकर तथा सबसे पहले धन के मामले में सोच कर ही की जाती है,अक्सर इस राशि वालों की मुख्य कमाइया किराया ब्याज से लेना या देना और जनता से अपनी इच्छाओं की पूर्ति में रहता है,इस राशि वाले अपना भावनात्मक रूप इस प्रकार से प्रस्तुत करते है कि सामने वाला इनकी बातों में जरूर आजाता है,और जो भी इन्हे अपने अनुसार करना होता है कर जाते है और अपने लिये जो भी चाहत होती है पूरी कर लेते है,इनके अष्टम में शनि की मकर राशि होने से यह अपने प्रभाव को अन्दरूनी गुप्त रिस्तों में बहुत ही छिपाकर रखते है और अक्सर बडी उम्र वाले हमेशा अपनी उम्र से कम लगने के कारण अपने से कम उम्र वालों के साथ मिलकर चलते देखे जा सकते है। इस राशि वालों की सिफ़्त एक प्रकार से बडी खतरनाक भी होती है यह अपने घर की बात किसी को नही बताते लेकिन इनके पास सबकी खबर रहती है कि कब किसके यहां क्या हो रहा है। गुरु को दोहरे धन और धन के द्वारा बनायी जाने वाली सम्पत्ति से तथा घर आदि केरहने के स्थान के परिवर्तन से भी माना जाता है। जनता के अन्दर से ही धन को लेने के बाद जनता के लिये ही कमाने का उपक्रम भी सामने आने लगता है जो लोग शेयर बाजार कमोडिटी आदि का कार्य करते है उन्हे जनता से धन प्राप्त करने और जनता के लिये कमाकर देने के लिये अच्छा समय माना जा सकता है लेकिन अगर वही लोग अपने कमाये धन को अचल सम्पत्ति के रूप में इकट्ठा करते रहे तो आगे के समय उनके लिये अपनी औकात दिखाने का और अपने नाम को बनाने का सही अवसर भी माना जाता है। जो भी रिस्क लेने वाले साधन है उनके अन्दर यह राशि वाले अगर अपनी बुद्धि को जरा भी प्रयोग में लाते है तो उन्हे धन के कमाने से कोई रोक नही सकता है,इसके लिये उन्हे यह भी ध्यान रखना पडेगा कि वारहवे विराजमान राहु उन्हे अचानक ऐसे खर्चे करवाएगा जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगीऔरअपनोद्वारा कपट पूर्ण व्यवहार से भी बाधित करेगा,मित्रो से झूठ और फ़रेब से बचकर भी जातक को चलना पडेगा.समय समय पर अपने द्वारा कमाये गये लाभ को अगर वह किसी दूसरे की मंत्रणा से खर्च करता है तो उसे अचानक हानि का भी सामना करना पडेगा। इस गुरु की सप्तम द्रिष्टि सिंह राशि पर जाने से भी अगर वह अपना मोह नौकरी आदि के लिये करता है तो उसके द्वारा किये जाने वाले कोई भी प्रयास जोखिम तो ले सकते है लेकिन सभी जोखिम लेने के पीछे सरकारी अफसरोसे सहयोग मिलने के ही आसार मिलते है,अगर हो सके तो इस गुरु के प्रभाव की गर्म हवाओं से बचने के लिये दूसरे की नौकरी में कोई रिस्क लेना बेकार ही माना जायेगा। इस गुरु की नवीं द्रिष्टि कर्म भाव में जाने से और कर्म भाव में तुला राशि में होने से जोतुला राशि तुलनात्मक कार्यों के लिये उत्तम राशि है,यह धर्म अर्थ काम और मोक्ष के बारे में तुलनात्मक अध्ययन करना जानती है.बिना शुक्र की भौतिकता के इस राशि वाले अपने कार्यों को प्रदर्शित नही कर सकते है। तुला राशि वाले अपने अन्दर ही हमेशा सिमटे रहने वाले होते है और वक्त पडने पर उसी राय को प्रदान करते है जो उनके अनुसार सर्वश्रेष्ठ होती है। इस राशि वालों को हमेशा नकारात्मक परिस्थितियों से जूझना पडता है,जो भी खुद के लोग होते है वे केवल शमशानी क्रियाओं तक ही साथ रहते है,जिन्हे सहायता दी जावे वे अपने को दूर करने के बाद पीछे से बुराइयां ही प्रदान करते है,गुरु इस राशि के तीसरे और छठे भाव का मालिक होता है,तीसरा भाव धनु राशि होने से इस राशि वालों को अपने को प्रदर्शित करने के लिये केवल न्याय वाले क्षेत्र,धर्म और भाग्य से सम्बन्धित क्षेत्र, समाज मर्यादा और देश के प्रति किये जाने वाले प्रयासों के लिये लिखने पढने और बोलने के अन्दर सामाजिकता प्रभाव रखने वाले आदि स्थान माने जाते है,मीन राशि जो गुरु की नकारात्मक राशि है इस राशि के छठे भाव मे अपना स्थान रखती है,यह भाव भी नकारात्मक है और यह राशि भी नकारात्मक है,नियम के अनुसार जब दो नकारात्मक शक्तियां आपस में मिलती है तो कोई न कोई सकारात्मक परिणाम ही निकलता है। किसी भी नकारात्मक स्थान की सेवा करने के बाद उस स्थान को सकारात्मक बनाना इस राशि वालों के लिये इसी मीन राशि से सहायता मिलती है। इस राशि वालों के पास या तो कर्जा होगा नही और होगा तो इतना बडा होगा कि आजीवन उसे चुकाने में लगे रहना पडेगा,या तो कोई बीमारी होगी नहे और होगी भी तो इतनी बडी कि आजीवन उस बीमारी के लिये सोचना ही पडेगा,या तो इस राशि वाले सेवा करेंगे नही और करेंगे तो आजीवन सेवा के कार्य ही करते रहेंगे। भी कबाड से जुगाड बनाने की कला होती है वह जातक के अन्दर आराम से काम करने लगती है और व्यक्ति अपने दिमाग से राख से भी सोना पैदा करने की जानकारी रख सकता है। उसके द्वारा ब्रोकर वाले कार्य किसी भी तरह की कमीशन खोरी के कार्य करने वालों को धन लाभ होगा और इस काम से उससे अधिक धन पैदा करने के कार्य पिछले समय में अपनी योग्यता से जो हानि प्राप्त की है उस योग्यता को प्रदर्शित करने और उसके प्रयोग करने के बाद गयी हुयी प्रतिष्ठा को हासिल किया जा सकता है।

रविवार, 14 मार्च 2021

तंत्र-मंत्र-यंत्र और नारी


लोग ज्योतिष को जब अपनी कुंडली दिखाते हैं तो अक्सर एक सवाल पूछते हैं कि कुंडली में किसी तंत्र-मंत्र का असर तो नहीं है. दरअसल, तंत्र एक प्रक्रिया है जिससे हम अपनी आत्मा और मन को बंधन मुक्त करते हैं. तंत्र की प्रक्रिया से मन और शरीर शुद्ध होता है.
इससे ईश्वर का अनुभव करने में सहायता मिलती है. तंत्र की प्रक्रिया से भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की समस्या का हल निकाल सकते हैं. तंत्र में पुरुष को को हवा और स्त्री को धरती का रूप दिया गया है। पुरुष की प्रवृत्ति होती है कि वह किसी भी दिशा में गर्मी की तरफ़ बढ लेता है और स्त्री का कार्य किसी भी वस्तु को सहेज कर रख लेने का होता है। स्त्री के अन्दर सहेज कर रखने की प्रवृत्ति अक्सर पुरुषों को समय पर काम भी देती है और जो समझदार नही होते है वे स्त्री के द्वारा सहेज कर रखने वाली वस्तु को नकारते है या बिना समझे उसका दुरुपयोग करते है। सभी स्त्रियों की प्रकृति एक समान होती है,लेकिन जिस प्रकार से एक ही तरह की मिट्टी से कई तरह के मीठे खट्टे चरपरे नमकीन स्वाद अन्य वस्तुओं के सहयोग से निकाल लिये जाते है उसी प्रकार से स्त्री भी अपने स्वभाव से सभी तरह के विषय अपने पास जमा करने के बाद समय पर उन सभी का प्रभाव अपने परिवार को देने का काम करती है। धन की कामना भी स्त्री को इसीलिये अधिक होती है कि वह सभी तरह के विषयों को अपने पास इकट्ठा कर सके। वैसे स्त्री को प्रकृति के अनुसार सोलह जगह से बांधा गया है,और जो स्त्रियां अपने बंधनो से मुक्त है तो वे किसी भी दिशा में अपने विषयों की प्राप्ति के लिये गलत या सही जैसा भी मार्ग अपना सकती हैं। स्त्री का दिमाग कभी भी एक जैसा नही होता है,वह अपने दिमाग को लाखों तरीके से प्रयोग करने की कोशिश करती है। महिलायें किस प्रकार से अपने तंत्र को प्रयोग करती है जो उन्होने प्राचीन या किसी के द्वारा प्रयोग करने के लिये दिये गये तंत्रों से समाधान मिलता है।
स्वप्न तंत्र की प्रक्रिया
सबसे पहले इस तंत्र का बखान करना इसलिये मुख्य समझा है कि यह हर किसी महिला के साथ अक्सर देखा जाता है,सुबह की चाय का स्वाद अगर अधिक मीठा या चाय में शक्कर नही है तो पहिचान लेना चाहिये कि रात को श्रीमती के द्वारा स्वप्न देखा गया है और उसी स्वप्न की उधेड बुन में चाय का स्वाद अधिक मीठा या फ़ीका रह गया है। स्वप्न की बातों का सीधा असर महिलाओं में इसलिये और अधिक जाता है कि वे केवल अपने आसपास के माहौल से काफ़ी सशंकित रहती हैं। पडौसी के घर पर क्या हो रहा है,पडौसिन ने किस से क्या बात की है,पडौसी के घर पर कौन सा नया काम हुआ है,आदि बातें केवल महिलाओं के द्वारा जल्दी से जानी जा सकती है,यह केवल प्रकृति के द्वारा दिया गया एक तोहफ़ा ही माना जायेगा जिनके प्रति हम कभी जागरूक नही होते है वह बातें महिलाओं को जल्दी पता चल जाती है। पति के प्रति अगर उन्हे संदेह होता है तो वे फ़ौरन अपने स्वप्न का अर्थ पता नही किन किन बातों से लगाना शुरु कर देती है और जब स्वप्न में उन्हे कोई अप्रिय बात देखने को मिलती है तो वे किसी ना किसी बहाने से पूंछना शुरु कर देतीं है और अगर पति उन बातों का सही उत्तर देता है तो वे अक्सर समय पर आश्वस्त नही होती है,और इन्तजार भी करती है कि आखिर में यह बात उन्होने देखी क्यों? एक महिला ने स्वप्न में देखा कि उसकी मरी हुई सास उसके आभूषणों को अन्य किसी महिला को पहिना रही है,महिला ने सुबह से ही उन आभूषणों के बारे में सोचना चालू कर दिया,पति से कई सवाल किये गये कि लाकर में जो आभूषण रखे है वे सही सलामत तो है,उन्हे निकाल कर कहीं गिरवी आदि तो नही रखा गया है,अथवा आज चल कर अपने लाकर के आभूषण चैक करने है। पति को कोई जरूरी काम है और उसने ना नुकर की तो बस घर के अन्दर क्लेश चालू हो गया,आखिर में पति महोदय उन्हे लेकर लाकर में रखे आभूषणों को दिखाने के लिये गये,सभी आभूषणों को चैक किया गया तो हार गायब था। पत्नी को शक सबसे पहले अपने पति पर गया और उनसे पूंछा कि उसकी अनुपस्थिति में लाकर को खोला था,बैंक के मैनेजर से जानकारी मांगी कि कब कब लाकर खुला है,लेकिन पता लगा कि लाकर उसकी अनुपस्थिति में खोला ही नही गया है। बहुत सोचने के बाद कि आखिर हार लाकर से कहाँ गया। पति तो अपने कामों में व्यस्त हो गये लेकिन श्रीमती जी का खाना पीना सब हराम हो गया। वे तरह से तरह से सोचने लगीं कि आखिर में हार गया कहाँ ? आखिरी बार उसे पहिना था और पहिन कर फ़लां की शादी में गये थे,उसके बाद उसे पहिना था तो दूसरे दिन ही लाकर में रख कर आ गये थे। उस हार की चिन्ता में शहर के जाने माने ज्योतिषी जी के पास वे गयीं और उनसे पूंछा,ज्योतिषी जी ने अपनी ज्योतिष से बताया कि हार उन्ही की घर की महिला के पास है। लेकिन यह पता कैसे लगे कि महिला घर की कौन है? वे चिन्ता में घर आयीं,और पलंग पर पडकर सोचने लगीं। रात को पति काम से वापस आये,अनमने ढंग से भोजन आदि दिया गया,और फ़िर पति की खोपडी खाने का समय मिला था,अचानक पति को ध्यान आया कि एक बार उनकी भाभी ने कहीं जाने के लिये गहने मांगे थे,और वे वापस भी कर गयीं थी,लेकिन यह नही देखा था कि हार उन गहनों में है या नही। उन्होने अपनी भाभी से पूंछने के लिये फ़ोन उठाया और पूंछा,-"भाभी आपने जो गहने लिये थे,उस समय हार तो आपके पास नही रह गया था,आज जब लाकर चैक किया तो हार उसके अन्दर नही मिला है",भाभी ने सीधे से उत्तर दिया कि हार वे इसलिये वापस नही कर पायीं थी कि उनकी बडी वाली लडकी पहिन कर अपने ससुराल चली गयी थी और तब से अभी तक आयी नही है,उन्होने सोचा था कि आयेगी तभी जाकर दे आयेंगी। पूरा भेद खुल गया,कि हार जो उस महिला की सास दूसरी औरत को पहिना रही थी,वह बात सही थी,इससे उन श्रीमती का विश्वास स्वप्न के प्रति पक्का हो गया था। इस प्रकार से महिलायें अपने स्वप्नो का अर्थ विभिन्न तरीकों से लगाया करती है,अक्सर उनके स्वप्नों का फ़ल भी सही ही निकलता है।
अंग फ़डकने का फ़ल
महिलाओं में रोजाना यही बात और की जाती है कि आज उनकी दाहिनी आंख फ़डक रही है,दाहिनी आंख महिलाओं की फ़डकने के से अक्सर खराब असर ही मिलते हैं। बेकार की आशंका से पीडित होने पर या घर में किसी के बीमार होने पर अथवा किसी नये किये जाने वाले काम के प्रति आशंकायें की जाती है,घर का कोई सदस्य बाहर होता है तो उसके बारे में अच्छे बुरे विचार किये जाते है,और जब कोई आसपास के लोगों में या परिवार में कोई दुर्घटना घट जाती है तो वह आंख भी फ़डकना बंद हो जाता है,और इस प्रकार से अंग फ़डकने की क्रिया को भी अक्सर महिलाओं में सत्य माना जाने लगता है

गुरुवार, 11 मार्च 2021

तंत्र विद्या- तांत्रिक और आम आदमी

www.acharyarajesh.in
धर्म ग्रंथों में तंत्र विद्या का महत्व दर्शाया गया है। जो लोग रामायण, महाभारत, शिव पुराण या अन्य ग्रंथों के अस्तित्व को स्वीकारते हैं वे तंत्र विद्या को नकार नहीं सकते। जिस तरह किसी बीमारी को दूर करने दवाई का सेवन जरूरी है उसी तरह जीवन की कुछ समस्याएं ऐसी होती है, जिनका समाधान तंत्र विद्या में है, जिसे विधिवत किया जाए तो फल अवश्य मिलता है। लेकिनअज्ञानी लोगों का यह दुर्भाग्य है कि वे अपनी समस्याओं के निवारण के चक्कर में ढोंगी तांत्रिकों का सहारा लेते हैं। वास्तव में जिस तांत्रिक को तंत्र विद्या का सच्चा ज्ञान होगा वह भोलेभाले लोगों की भावनाओं के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करेगा। तंत्र विद्या की यह पहली शर्त होती है कि इसके जरिए समाज के दुखी लोगों को राहत पहुंचाई जाए।
तंत्र का उपयोग मानव कल्याण के लिये किया जाता है,लेकिन मानव ही मानव को तंत्र के तरीके से लूटे तो वह तंत्र कदापि भला नही हो सकता है,जैसे एक डाक्टर का काम मरीज को बचाकर उसकी जिन्दगी देना होता है,कारण उसे शरीर के तंत्र के बारे में सभी बातें ज्ञात होती है,लेकिन वही डाक्टर अगर अपनी विद्या का उल्टा प्रयोग करना चालू कर दे,और बजाय मरीज को बचाने के मरीज के अन्दर अपने धन का भंडार देखना चालू कर दे,अच्छे भले मरीज को जिसे केवल कुछ समय के लिये पेट का दर्द है और उसे अपनी जान पहिचान की लेब्रोटरी से कुछ टेस्ट करवा कर किडनी का मरीज घोषित कर दे,और किडनी को निकाल कर बेच दे तथा मरीज के रिस्तेदार की किडनी को निकाल कर मरीज के लगा दे,तो इसके अन्दर तंत्र दोषी नही माना जा सकता है,तंत्र को प्रयोग करने वाले दोषी माने जा सकते है।भौतिक तथा आजकी उठापटक के अन्दर अपने अन्दर हर व्यक्ति एक भावना पाल कर चल रहा है कि किस प्रकार से वह अधिक से अधिक धन को कमा सकने में समर्थ हो सकता है और उस कमाये हुये धन को मन चाहे तरीके से दूसरों को नीचा दिखाने केलिये प्रयोग करना चालू कर सकता है,उसे जो करना है वह उन बातों को पूरा करने के लिये मानसिक रूप से सोचा करता है कि कब उसकी चाहत वाली बातें पूरी हो सकती है। उन मानसिक बातों को पूरा करने केलिये वह तरह तरह की बातें करना तरह तरह के प्रयोग करना और तरह तरह के साधन बनाकर इन्सान के दिमाग को इन्सान की बुराइयों और इन्सान को ही खत्म करने वाली वस्तुओं को पैदा करना आदि यह सब एक जानवर से अधिक कुछ नही हो सकता है जैसे एक कुत्ते के सामने कोई मांस का टुकडा डाल दिया तो वह अन्य कुत्तों को पास नही फ़टकने देना चाहता है वह चाहता है कि कोई उसके मांस के टुकडे को कोई ले नही जाये।
शिक्षा का अर्थ
शिक्षा का वास्तविक अर्थ विकास होता है,वह शिक्षा चाहे शरीर की हो,धन की हो,व्यक्ति या समाज की हो या फ़िर राजनीति की हो,या फ़िर तकनीक से सम्बन्ध रखती हो,शिक्षा का मूल उद्देश्य विकास ही होता है,अगर शिक्षा से विकास का रास्ता खुलता है तो बेकार का दिमाग जिसके अन्दर कचडा बचपन से भरा होता है उसके समाज और परिवार में जो शुरु से होता रहा है उसके प्रति वह जो शिक्षा को प्राप्त करने वाला है तो उसका दुरुपयोग करने की सोचता है। बहुत ही मुश्किल और कई दसक लगातार काम करने के बाद पहले गणना के यन्त्र बनाये गये फ़िर कम्पयूटर का निर्माण हुआ,यह केवल इसलिये हुआ कि आदमी जल्दी से काम करना सीखे,उसे जो एक साल मे काम करना है उसे वह एक दिन में कर ले,बडी बडी फ़ाइलों को सम्भालने के लिये बडे बडे स्टोर और उनकी देखभाल रख रखाव और प्राकृतिक आपदा के कारण खराब होने से बचाया जा सके,लेकिन उसी जगह कचडा रखने वाले दिमागी लोगों ने पूरा सिस्टम खराब करने के लिये वाइरस का निर्माण ही कर डाला जो दस साल मेहनत की गयी उसे एक सेकेण्ड में बरबाद करने लग गया। शिक्षा का मतलब यह नही होता कि व्यक्ति अपने नैतिक मूल्यों से ही गिर जाये,और प्राचीन महाऋषियों और ज्ञानियों को ही गालियां देने लगे,वह भूल जाये कि जिस विद्या को समझदार समाज खोज रहा है उसे लेने के लिये मारा मारा घूम रहा है,वह सर्वप्रथम हमारे भारत में ही प्राप्त हुयी थी। और उसी शिक्षा की बदौलत हमारा नाम विश्व के कौने में प्रसिद्ध है। जिन्हे हम गंवार जाहिल और बेवकूफ़ की संज्ञा देते है उनके परिवार आज भी सही सलामत और बंधे हुये चल रहे है लेकिन जो आज अलग थलग है और अपनी ही सभ्यता को भूल कर घूम रहे है उन्हे जवानी में तो भोग मिल सकते है लेकिन बुढापे के लिये उन्हे वृद्धाश्रम की ही खोज करनी पडती है।
कौन है तंत्र को बदनाम करने वाला
कहा जाता है कि जब लोमडी को अंगूर नही मिले तो वह कहने लगी कि खट्टे अंगूर है,वही हाल मध्यम परिवारों का है,पुराने जमाने की शिक्षा की बदौलत उनके परिवार कुछ अमीर बन गये,उनकी शिक्षा को जब पूरा किया गया तो वे अपने को शहंशाह समझने लगे और खुद के ही बाप को जब गाली दी जा सकती है,पूर्वजों की बात ही कौन कहे,जब घर के अन्दर आते ही अपने घर वालों की बात का उल्टा जबाब दिया जाये,घर के बडे बूढों के अन्दर जनरेशन गेप बता कर उन्हे बातचीत से दूर किया जाये,एक कोने में कुछ साधन देकर लिटा दिया जाये,पत्नी को काम और बच्चों से फ़ुर्सत नही हो,घर का बुजुर्ग अपने हाल में पडा पडा कराहता रहता हो,और वे ही अगर तंत्र को बेकार बतायें तो वह किस मायने में सही कहा जा सकता है।

तंत्र विद्या- तांत्रिक और आम आदमी

www.acharyarajesh.in
धर्म ग्रंथों में तंत्र विद्या का महत्व दर्शाया गया है। जो लोग रामायण, महाभारत, शिव पुराण या अन्य ग्रंथों के अस्तित्व को स्वीकारते हैं वे तंत्र विद्या को नकार नहीं सकते। जिस तरह किसी बीमारी को दूर करने दवाई का सेवन जरूरी है उसी तरह जीवन की कुछ समस्याएं ऐसी होती है, जिनका समाधान तंत्र विद्या में है, जिसे विधिवत किया जाए तो फल अवश्य मिलता है। लेकिनअज्ञानी लोगों का यह दुर्भाग्य है कि वे अपनी समस्याओं के निवारण के चक्कर में ढोंगी तांत्रिकों का सहारा लेते हैं। वास्तव में जिस तांत्रिक को तंत्र विद्या का सच्चा ज्ञान होगा वह भोलेभाले लोगों की भावनाओं के साथ कभी खिलवाड़ नहीं करेगा। तंत्र विद्या की यह पहली शर्त होती है कि इसके जरिए समाज के दुखी लोगों को राहत पहुंचाई जाए।
तंत्र का उपयोग मानव कल्याण के लिये किया जाता है,लेकिन मानव ही मानव को तंत्र के तरीके से लूटे तो वह तंत्र कदापि भला नही हो सकता है,जैसे एक डाक्टर का काम मरीज को बचाकर उसकी जिन्दगी देना होता है,कारण उसे शरीर के तंत्र के बारे में सभी बातें ज्ञात होती है,लेकिन वही डाक्टर अगर अपनी विद्या का उल्टा प्रयोग करना चालू कर दे,और बजाय मरीज को बचाने के मरीज के अन्दर अपने धन का भंडार देखना चालू कर दे,अच्छे भले मरीज को जिसे केवल कुछ समय के लिये पेट का दर्द है और उसे अपनी जान पहिचान की लेब्रोटरी से कुछ टेस्ट करवा कर किडनी का मरीज घोषित कर दे,और किडनी को निकाल कर बेच दे तथा मरीज के रिस्तेदार की किडनी को निकाल कर मरीज के लगा दे,तो इसके अन्दर तंत्र दोषी नही माना जा सकता है,तंत्र को प्रयोग करने वाले दोषी माने जा सकते है।भौतिक तथा आजकी उठापटक के अन्दर अपने अन्दर हर व्यक्ति एक भावना पाल कर चल रहा है कि किस प्रकार से वह अधिक से अधिक धन को कमा सकने में समर्थ हो सकता है और उस कमाये हुये धन को मन चाहे तरीके से दूसरों को नीचा दिखाने केलिये प्रयोग करना चालू कर सकता है,उसे जो करना है वह उन बातों को पूरा करने के लिये मानसिक रूप से सोचा करता है कि कब उसकी चाहत वाली बातें पूरी हो सकती है। उन मानसिक बातों को पूरा करने केलिये वह तरह तरह की बातें करना तरह तरह के प्रयोग करना और तरह तरह के साधन बनाकर इन्सान के दिमाग को इन्सान की बुराइयों और इन्सान को ही खत्म करने वाली वस्तुओं को पैदा करना आदि यह सब एक जानवर से अधिक कुछ नही हो सकता है जैसे एक कुत्ते के सामने कोई मांस का टुकडा डाल दिया तो वह अन्य कुत्तों को पास नही फ़टकने देना चाहता है वह चाहता है कि कोई उसके मांस के टुकडे को कोई ले नही जाये।
शिक्षा का अर्थ
शिक्षा का वास्तविक अर्थ विकास होता है,वह शिक्षा चाहे शरीर की हो,धन की हो,व्यक्ति या समाज की हो या फ़िर राजनीति की हो,या फ़िर तकनीक से सम्बन्ध रखती हो,शिक्षा का मूल उद्देश्य विकास ही होता है,अगर शिक्षा से विकास का रास्ता खुलता है तो बेकार का दिमाग जिसके अन्दर कचडा बचपन से भरा होता है उसके समाज और परिवार में जो शुरु से होता रहा है उसके प्रति वह जो शिक्षा को प्राप्त करने वाला है तो उसका दुरुपयोग करने की सोचता है। बहुत ही मुश्किल और कई दसक लगातार काम करने के बाद पहले गणना के यन्त्र बनाये गये फ़िर कम्पयूटर का निर्माण हुआ,यह केवल इसलिये हुआ कि आदमी जल्दी से काम करना सीखे,उसे जो एक साल मे काम करना है उसे वह एक दिन में कर ले,बडी बडी फ़ाइलों को सम्भालने के लिये बडे बडे स्टोर और उनकी देखभाल रख रखाव और प्राकृतिक आपदा के कारण खराब होने से बचाया जा सके,लेकिन उसी जगह कचडा रखने वाले दिमागी लोगों ने पूरा सिस्टम खराब करने के लिये वाइरस का निर्माण ही कर डाला जो दस साल मेहनत की गयी उसे एक सेकेण्ड में बरबाद करने लग गया। शिक्षा का मतलब यह नही होता कि व्यक्ति अपने नैतिक मूल्यों से ही गिर जाये,और प्राचीन महाऋषियों और ज्ञानियों को ही गालियां देने लगे,वह भूल जाये कि जिस विद्या को समझदार समाज खोज रहा है उसे लेने के लिये मारा मारा घूम रहा है,वह सर्वप्रथम हमारे भारत में ही प्राप्त हुयी थी। और उसी शिक्षा की बदौलत हमारा नाम विश्व के कौने में प्रसिद्ध है। जिन्हे हम गंवार जाहिल और बेवकूफ़ की संज्ञा देते है उनके परिवार आज भी सही सलामत और बंधे हुये चल रहे है लेकिन जो आज अलग थलग है और अपनी ही सभ्यता को भूल कर घूम रहे है उन्हे जवानी में तो भोग मिल सकते है लेकिन बुढापे के लिये उन्हे वृद्धाश्रम की ही खोज करनी पडती है।
कौन है तंत्र को बदनाम करने वाला
कहा जाता है कि जब लोमडी को अंगूर नही मिले तो वह कहने लगी कि खट्टे अंगूर है,वही हाल मध्यम परिवारों का है,पुराने जमाने की शिक्षा की बदौलत उनके परिवार कुछ अमीर बन गये,उनकी शिक्षा को जब पूरा किया गया तो वे अपने को शहंशाह समझने लगे और खुद के ही बाप को जब गाली दी जा सकती है,पूर्वजों की बात ही कौन कहे,जब घर के अन्दर आते ही अपने घर वालों की बात का उल्टा जबाब दिया जाये,घर के बडे बूढों के अन्दर जनरेशन गेप बता कर उन्हे बातचीत से दूर किया जाये,एक कोने में कुछ साधन देकर लिटा दिया जाये,पत्नी को काम और बच्चों से फ़ुर्सत नही हो,घर का बुजुर्ग अपने हाल में पडा पडा कराहता रहता हो,और वे ही अगर तंत्र को बेकार बतायें तो वह किस मायने में सही कहा जा सकता है।

सोमवार, 8 मार्च 2021

तंत्र विज्ञान-तंत्र क्या है?

www.acharyarajesh.inतंत्र क्या है

तंत्र- भी इसी तरह एक टेक्नोलॉजी है, लेकिन एक अलग स्तर की, पर है भौतिक ही। यह सब करने के लिए इंसान अपने शरीर, मन और ऊर्जा का इस्तेमाल करता है टेक्नोलॉजी चाहे जो हो, हम अपने शरीर, मन और ऊर्जा का ही इस्तेमाल करते हैं। आम तौर पर हम अपनी जरूरतों के लिए दूसरे पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन एक mobile फोन या किसी टेक्नोलॉजी के उत्पादन के लिए जिन बुनियादी पदार्थों का उपयोग होता है, वे शरीर, मन और ऊर्जा ही होते हैं
आज जबकि तंत्र या तांत्रिक को पढे लिखे लोग धोखा,पाखण्ड तथा अन्धविश्वास कहते है तो तन्त्र प्रयोग लिखने का औचित्य क्या है? आप किसी भी चीज को दिखाना चाहते है या उसे समझाना चाहते है, यदि वह व्यक्ति उस विषय की गहराई या उस चीज की विशेषता को नहीं जानता इसलिये वह आपका आपकी चीज का तथा आपकी बात का मजाक उडाता है,व्यंग बाण छोडता है तथा अन्धविश्वास कहता है,यही स्थिति पढे लिखे लोगों की हो गयी है,वे अपने अपने विषय के अलावा और कुछ समझने की कोशिश ही नही करते है,उन्हे यह भी पता नही होता है कि वे जब अपनी माँ के पेट में आये होते है उस समय भी दाई ने या डाक्टर ने कोई तंत्र ही किया होता है,अगर दाई या डाक्टर नही होगा तो घर की किसी बढी बूढी महिला के द्वारा तंत्र बताया गया होगा कि इस प्रकार से इतने दिन के पीरियड के समय में बच्चा गर्भ मे आ सकता है,और इतने दिन के पीरियेड के बाद कन्या गर्भ में आ सकती है,इतने दिन के पहले या इतने दिन के बाद गर्भ धारण किया तो बच्चा या तो गर्भपात से गिर जायेगा या पैदा होते ही मर जायेगा,जो लोग तंत्र को नही जानते है वे या तो बच्चों के लिये जीवन भर पछताते रहते है या फ़िर किसी का बच्चा गोद लेकर अपना काम चलाते है,इसके लिये भी अस्पतालों एक फ़र्टिलिटी सेंटर खुल गये है वे आसानी से किसी के वीर्य को किसी के गर्भ में स्थापित कर देते है और एक की जगह दो दो बच्चे जुडवां तक दे देते है। यह सब तंत्र नही है तो क्या है,डाक्टर को दवाई और शरीर विज्ञान का तंत्र आता है उसे आता है कि किस स्थान की कमी है और उस कमी को पूरा करने के लिये कौन सी नश को काट कर या नकली नश को लगाकर काम चलाया जा सकता है,आजकल तो तंत्र के बलबूते पर डाक्टर नकली वाल्व लगाकर दस बारह साल के लिये ह्रदय को चालू कर देते है।
जिस पश्चिमी सभ्यता के पीछे आज के भारतीय लोग दौडे चले जा रहे है,उन लोगों को पता नही था कि भारत में हनुमान जी की पूजा आदि काल से की जाती रही है,वे जब भारत में घूमने के लिये आते तो वे भारत में मंगलवार के दिन हनुमान जी के मंदिर में जाकर लोगों को चिढाया करते थे,Oh ! here is monkey Go? क्या बात है यहां तो बन्दर भी भगवान हैं। जब उन्होने ही मंगल पर वाइकिंग भेजा और जब पहली मंगल की तस्वीर वाइकिंग ने भेजी तो उन्हे यह देखकर महान आश्चर्य हुआ कि जो तस्वीर बंदर के रूप में भारत में पूजी जाती है वह कोई बन्दर की तस्वीर नही होकर "Face of Mars" मंगल का चेहरा है।हमारे यहाँ हनुमान जी की पूजा का महत्व मंगलवार के दिन ही माना जाता है,और मंगल ग्रह की शांति के लिये ही हनुमानजी की पूजा की जाती हैऔर जब भी कोई बाधा आती है तो एक ही दोहा उनकी आराधना के लिये मसहूर माना जाता है,-"लाल देह लाली लसे,और धरि लाललंगूर,बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि शूर",आज जब वैज्ञानिक इस तस्वीर को पा गये है तो उनको आश्चर्य होने लगा है कि यह चेहरा भारत में कैसे पूजा जाने लगा,भारत के लोगों को कैसे पता लगा कि मंगल का चेहरा बन्दर जैसा है,वे बिना किसी यान या विमान के वहाँ कैसे पहुंच गये,जब लोगों को पता लगा कि भारतीयों के पास तांत्रिक विद्या है और उस विद्या से वे किसी भी ग्रह की परिक्रमा आराम से कर लेते है और किसी भी विषय को तंत्र द्वारा आराम समझ सकते है तो उन्हे भारी ग्लानि हुयी,सन दो हजार में मिली फ़ेस आफ़ मार्स की फ़ोटो उन्होने दो हजार दो में इसलिये ही प्रकाशित की थी कि कहीं पूरे विश्व में ही हनुमान जी की आराधना शुरु न हो जाये और जिन लोगों की वे खिल्ली उडाया करते थे वे ही अब उनकी खिल्ली नही उडाने लगें। भारत के अन्दर जो भी संस्कृत और हिन्दी के अक्षर है उनकी कलात्मक रचना ही देवी और देवता का रूप माना गया है,छोटा "अ" अगर सजा दिया जाये तो वह धनुष बाण लेकर खडे हुये व्यक्ति का रूप बन जाता है,शनि जी का रंग काला है और शनि के मंत्र के जाप के समय "शं" बीज का उच्चारण करते है,अगर शं के रूप को सजा दिया जाये तो वह सीधा श्रीकृष्ण भगवान का रूप बन जाता है। इसी प्रकार से "शिव" शब्द को सजाने से भगवान शंकर का रूप बनता है,विष्णु शब्द को सजाने पर वह भगवान विष्णु का रूप बनता है,""क्रीं" शब्द को सजाने पर शेर पर सवार माता दुर्गा का रूप बनता है,आदि रूप आप खुद परख सकते है। जब उन्हे भारत की तंत्र क्रिया पर विश्वास हो गया तो उन्होने भारत से हिन्दी भाषा को ही भारत से गायब करवाने की सोची न रहेगा बांस और न ही बजेगी बांसुरी।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

ज्योतिषी जीवन नष्ट कर सकते हैं आपका सावधान

www.acharyarajesh.inज्योतिष कितना सही कितना गलत क्या है शुभ क्या है शुभ क्या है नसीब तकदीर किस्मत जानने के लिए यह पोस्ट अंत तक पढ़े

मित्रों। मैं स्पष्ट कर दूं कि अपने नौसिखिए काल में मैं भी ऐसा ही रहा हूं। इसलिए लेख के दौरान जो व्‍यंग्‍य बाण आएंगे उन्‍हें मेरे ऊपर ही चला हुआ समझा जाए। वर्तमान में ज्योतिष विद्या विवादों के घेरे में है और इसका कारण मेरे जैसे ज्योतिषशास्त्री हैं, जो लोगों का मनगढ़ंत भविष्य बता रहे हैं या लोगों को ग्रह-नक्षत्र से डरा रहे हैं। डरपोक लोगों के बारे में क्या कहें, वे तो किसी भी चीज से डर जाएंगे।
 ज्योतिष के त्रिस्कंध हैं यानी इसके 3 प्रमुख स्तंभ हैं- गणित (होरा), संहिता और फलित। कुछ लोग सिद्धांत, संहिता और होरा बताते हैं। एक जमाना था जबकि सारा रेखागणित, बीजगणित, खगोल विज्ञान सब ज्योतिष की ही शाखाएं था, लेकिन अब यह विज्ञान फलित ज्योतिषियों के कारण अज्ञान में बदल गया है।
बहुत से लोगों के मन में आजकल ज्योतिष विद्या को लेकर संदेह और अविश्वास की भावना है जिसका कारण वर्तमान में प्रचलित ज्योतिष और इसको लेकर किया जा रहा व्यापार से है। टीवी चैनलों में ज्योतिष शास्त्री ज्योतिष के संबंध में न मालूम क्या-क्या बातें करके समाज में भय और भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं।ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा गया है, लेकिन सवाल यह उठता है कि कौन-सा ज्योतिष?       वेदों में जिस ज्योतिष विज्ञान की चर्चा की गई वह ज्योतिष या आजकल जो प्रचलित है वह ज्योतिष? ऋग्वेद में ज्योतिष से संबंधित 30 श्लोक हैं, यजुर्वेद में 44 तथा अथर्ववेद में 162 श्लोक हैं। वेदों के उक्त श्लोकों पर आधारित आज का ज्योतिष पूर्णत: बदलकर भटक गया है। भविष्य बताने वाली विद्या को फलित ज्योतिष कहा जाता है जिसका वेदों से कोई संबंध नहीं है। ज्योतिष को 6 वेदांगों में शामिल किया गया है। ये 6 वेदांग हैं- 1. शिक्षा, 2. कल्प, 3. व्याकरण, 4. निरुक्त, 5. छंद और 6. ज्योतिष।वेदों में ज्योतिष तो है, परंतु वह फलित ज्योतिष कदापि नहीं है। फलित ज्योतिष में यह माना जाता है कि या तो जीवों को कर्म करने की स्वतंत्रता है ही नहीं, अगर है भी तो वह ग्रह-नक्षत्रों के प्रभावों से कम है अर्थात आपका भाग्य-निर्माता शनि ग्रह या मंगल ग्रह है। यह धारणा धर्म विरुद्ध है। रावण ने जिस शनि को जेल में डाल रखा था, वह कोई ग्रह नहीं था। जिस राहु ने हनुमानजी का रास्ता रोका था, वह भी कोई ग्रह नहीं था। वे सभी इस धरती पर निवास करने वाले देव और दानव थे।
 
हिन्दू धर्म कर्मप्रधान धर्म है, भाग्य प्रधान नहीं। वेद, उपनिषद और गीता कर्म की शिक्षा देते हैं। सूर्य को इस जगत की आत्मा कहा गया है। एक समय था जबकि ध्यान और मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज्योतिष का भी सहारा लिया जाता था लेकिन अब नहीं। प्राचीनकाल में ज्योतिष विद्या का उपयोग उचित जगह पर करने के लिए घर, आश्रम, मंदिर, मठ या गुरुकुल बनाने के लिए ज्योतिष विद्या की सहायता ली जाती थी।र्तमान में प्रचलित ज्योतिष विद्या एक ऐसी विद्या है, जो आपको धर्म और ईश्वर से दूर करके ग्रहों को पूजने की शिक्षा देती है, जो कि गलत है। यह विद्या आपको शनि, राहु, केतु और मंगल से डराने वाली विद्या है और यही कारण है कि वर्तमान में शनि के मंदिर बहुत बन गए हैं। लोग कालसर्प दोष, ग्रह दोष और पितृ दोष से परेशान होकर घाट-घाट के चक्कर काट रहे हैंनिश्‍चित ही देवता और ग्रह दोनों अलग-अलग हैं। जो देवता जिस ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है या जिस देवता का चरित्र जिस ग्रह के समान है या यह कहें कि ग्रहों की प्रकृति को दर्शाने के लिए उसकी प्रकृति अनुसार ग्रहों के नाम उक्त देवताओं पर रखें गए, जो उस प्रकृति के हैं।हमारा सूर्य भी एक नक्षत्र है। ये नक्षत्र कोई चेतन प्राणी नहीं हैं, जो किसी व्यक्ति विशेष पर प्रसन्न या क्रोधित होते हैं। हमारी धरती पर सूर्य का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है, उसके बाद चन्द्रमा का प्रभाव माना गया है। उसी तरह क्रमश: मंगल, गुरु, बुद्ध और शनि का भी प्रभाव पड़ता है। ग्रहों का प्रभाव संपूर्ण धरती पर पड़ता है, किसी एक मानव पर नहीं। धरती के जिस भी क्षेत्र विशेष में जिस भी ग्रह विशेष का प्रभाव पड़ता है, उस क्षेत्र विशेष में-सा भी ग्रह न तो खराब होता है और न अच्छा। ग्रहों का धरती पर प्रभाव पड़ता है लेकिन उस प्रभाव को कुछ लोग हजम कर जाते हैं और कुछ नहीं। प्रकृति की प्रत्येक वस्तु का प्रभाव अन्य सभी जड़ वस्तुओं पर पड़ता है। मित्रों एक सामान्‍य इंसान और ज्‍योतिषी में कई मूलभूत अंतर होते हैं। हालांकि मैं खुद अभी विद्यार्थी हूं सो पक्‍का नहीं कह सकता कि जितने अंतर मुझे पता है उतने ही अंतर होते हैं या उससे अधिक, लेकिन जो जानता हूं वह बता देता हूं।
इसमें पहला तो है विषय का पुख्‍ता ज्ञान – एक नैसर्गिक ज्‍योतिषी जब ग्रहों, राशियों, भावों, इनके संबंधों और इनके जातक की जिंदगी के प्रभाव के बारे में पढ़ता है तो वह स्‍पष्‍ट रूप से इन्‍हें अलग-अलग समझ पाता है कि इनके जातक की जीवन और आपस में क्‍या संबंध हैं और परिणाम कैसे आ रहे हैं।
शुरूआती दौर में कुंडलियों का विश्‍लेषण उपलब्‍ध किताबी या श्रव्‍य ज्ञान को और धार देता है। बाद में हर ज्‍योतिषी अपने स्‍तर पर पुख्‍ता नियम बना लेता है। बाद में यही नियम फलादेश करने में उसकी सहायता करते हैं।
जो लोग पैदाइशी या ईश्‍वरीय कृपा के साथ ज्‍योतिषी नहीं होते हैं उन्‍हें ग्रहों, राशियों और भावों का चक्‍कर उलझन में डाल देता है। मैंने ऐसे सैकड़ों उदाहरण देखे हैं।
दूसरा है ईश्‍वर प्रदत्त अंतर्ज्ञान – यह किसी भी ज्‍योतिषी के लिए सबसे महत्‍वपूर्ण बिन्‍दू है। एक ज्‍योतिषी केवल अपने चेतन मस्तिष्‍क की गणनाओं से फलादेश नहीं कर सकता। इसके दो कारण है।
पहला गणनाओं का विशाल होना और दूसरा देश-काल और परिस्थितियों के लगातार बदलते रहने से इंटरप्रटेशन में बदलाव आना। इसके चलते ज्‍योतिषी केवल फौरी गणनाओं के भरोसे ही फलादेश नहीं कर पाता है। यहां अंतर्ज्ञान ज्‍योतिषी की मदद करता है। कई लोग अनुमान, कल्‍पना और अंतर्ज्ञान में भेद नहीं कर पाते हैं।
ऐसे में वे ऊट-पटांग फलादेश करते जाते हैं। बाद में पता चलता है कि कोई भी फलादेश सटीक नहीं पड़ रहा है। ऐसे कुछ नौसिखिए ज्‍योतिषी ज्‍योतिष की पुस्‍तकों तो कुछ अपने गुरुओं को गालियां निकालकर बरी हो जाते हैं।
तीसरा है अनुभव – जैसा कि मैं ऊपर स्‍पष्‍ट कर चुका हूं कि ज्‍योतिष में इंटरप्रटेशन का बहुत महत्‍व है। ऐसे में काउंसलिंग के दौरान ज्‍योतिषी का अनुभव बहुत मायने रखता है। मेरा मानना है कि आधुनिक ज्‍योतिषियों को वर्तमान में उपलब्‍ध अधिकांश प्रचलित ज्ञान के बारे में जानकारी होनी चाहिए।
अब संचार माध्‍यमों से यह सहज सुलभ भी है और भारत जैसे स्‍वतंत्र राष्‍ट्र में हर तरह की पुस्‍तक हर जगह उपलब्‍ध है। ऐसे में अपने ज्ञान के दायरे को बढ़ाते जाने से ज्‍योतिषी की धार भी मजबूत होती जाएगी। इसके बावजूद भी जीवन जीने से आ रहा अनुभव भी मायने रखता है।
जिस ज्‍योतिषी की शादी नहीं हुई है वह किसी जातक के विवाह संबंध में आधारित प्रश्‍नों के किताबों में लिखे जवाब तो दे देगा, लेकिन उसका इंटरप्रटेशन इतना कमजोर होगा कि जातक तक सही संदेश पहुंचना संदेह के दायरे में ही रहेगा।
चौथा है खुद ज्‍योतिषी के योग – इस बारे में केएस कृष्‍णामूर्ति ने लिखा है कि ज्‍योतिषी दो तरह के होते हैं। एक गणित में होशियार तो दूसरे फलादेश में होशियार। भले ही गणित में होशियार ज्‍योतिषी को अधिक ज्ञान हो, लेकिन प्रसिद्धि फलादेश करने वाले ज्‍योतिषी को ही मिलेगी।
ऐसे में किसी ज्‍योतिषी की कुंडली में यह भी देखने की जरूरत है कि उसके भाग्‍य में प्रसिद्ध होना लिखा है कि नहीं। अगर प्रसिद्धि नहीं लिखी है तो लाख बेहतर फलादेश करने के बाद भी दुनिया उसे जानेगी नहीं।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

Angarak Yog: राहु के साथ मंगल वृषभ राशि में बना रहे हैं खतरनाक

www.acharyarajesh.in
मित्रों ज्योतिष में जहां हर ग्रह का अपना खास स्थान और  स्थिति हैं। वहीं इनमें देवसेनापति मंगल की एक विशेष स्थिति मानी गई है। मंगल पराक्रमकारी ग्रह होने के चलते कई मायनों में विशेष और सबसे शक्तिशाली भी माना गया है। ऐसे में शुक्र के अपने मित्र शनि के स्वामित्व वाली कुंभ राशि में प्रवेश के ठीक अगले दिन यानिआज  22 फरवरी 2021 को देवसेनापति मंगल शुक्र के स्वामित्व वाली राशि वृषभ में गोचर किया हैं।इस ककराशि में पहले से ही राहु (Rahu) मौजूद है और जब मंगल और राहु मिलेंगे तो अंगारक योग (Angarak Yog) बनाएंगे. इस योग को अच्छा नहीं माना जाता है.

कई जानकारों के अनुसार मंगल और राहु की युति कई मामलों में शुभ नहीं मानी भी जाती, ऐसे में मंगल का ये गोचर कुछ भयानक परिणाम भी ला सकता है। ऐसे में जहां कुछ लोगों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। वहीं कुछ को इसका लाभ भी होता हुआ दिख रहा है।

बन रहा है अंगारक योग

अंगारक योग का निर्माण तब होता है जब राहु और मंगल ग्रह एक साथ आ जाते हैं। 22 फरवरी से यही यानि अंगारक योग की स्थिति बनने जा रही है, वृषभ राशि में इस योग के निर्माण से देश दुनिया पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। ज्योतिष शास्त्र में अंगारक योग को लड़ाई झगड़े, विवाद, आक्रमक, हिंसक स्थितियों का कारक माना गया है।महामारी फैलने का डर रहेगा

दरअसल ज्योतिष शास्त्र में गोचर बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसा इसलिए माना जाता है क्योंकि सभी नवग्रह या नौ ग्रह हमारे आपके जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। चंद्रमा, सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, और केतु कुछ ऐसे प्रमुख ग्रह हैं जिन्हें ज्योतिष की दुनिया में काफी गंभीरता से लिया जाता है। ऐसे में यह बात तो साफ है कि इन ग्रहों के गोचर या राशि परिवर्तन से हमारे जीवन पर असर अवश्य ही पड़ता है।

ज्ञात हो कि हमारे जीवन में ग्रहों की यह चाल कुछ बड़े तो कभी कुछ छोटे बदलाव लेकर आने वाली साबित होती है। इसके अलावा यह सभी ग्रह हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करने की भी क्षमता रखते हैं। लेकिन यह भी गोर करने वाली वात है आपकी जन्म कुंडली में ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार ही गोचर फल करता है । मित्रों सब से पहले इस युति को घ्यान से समझ ले मंगल शक्ति का दाता है,और राहु असीमितिता का कारक है,मंगल की गिनती की जा सकती है लेकिन राहु की गिनती नही की जा सकती है।राहु अनन्त आकाश की ऊंचाई में ले जाने वाला है और मंगल केवल तकनीक के लिये माना जाता है,हिम्मत को देता है,कन्ट्रोल पावर के लिये जाना जाता है।


्गर मंगल को राहु के साथ इन्सानी शरीर में माना जाये तो खून के अन्दर इन्फ़ेक्सन की बीमारी से जोडा जा सकता है,ब्लड प्रेसर से जोडा जा सकता है,परिवार में लेकर चला जाये तो पिता के परिवार से माना जा सकता है,और पैतृक परिवार में पूर्वजों के जमाने की किसी चली आ रही दुश्मनी से माना जा सकता है। समाज में लेकर चला जाये तो गुस्से में गाली गलौज के माना जा सकता है,लोगों के अन्दर भरे हुये फ़ितूर के लिये माना जा सकता है। अगर बुध साथ है तो अनन्त आकाश के अन्दर चढती हुयी तकनीक के लिये माना जा सकता है। गणना के लिये उत्तम माना जा सकता है। गुरु के द्वारा कार्य रूप में देखा जाने वाला मंगल राहु के साथ होने पर सैटेलाइट के क्षेत्र में कोई नया विकास भी सामने करता है,मंगल के द्वारा राहु के साथ होने पर और बुध के साथ देने पर कानून के क्षेत्र में भ्रष्टाचार फ़ैलाने वाले साफ़ हो जाते है,उनके ऊपर भी कानून का शिकंजा कसा जाने लगता है,बडी कार्यवाहियों के द्वारा उनकी सम्पत्ति और मान सम्मान का सफ़ाया किया जाना सामने आने लगता है,जो लोग डाक्टरी दवाइयों के क्षेत्र में है उनके लिये कोई नई दवाई ईजाद की जानी मानी जाती है,जो ब्लडप्रेसर के मामले में अपनी ही जान पहिचान रखती हो। धर्म स्थानों पर बुध के साथ आजाने से मंगल के द्वारा कोई रचनात्मक कार्यवाही की जाती है,इसके अन्दर आग लगना विस्फ़ोट होना और तमाशाइयों की जान की आफ़त आना भी माना जाता है। वैसे राहु के साथ मंगल का होना अनुसूचित जातियों के साथ होने वाले व्यवहार से मारकाट और बडी हडताल के रूप में भी माना जाता है। सिख सम्प्रदाय के साथ कोई कानूनी विकार पैदा होने के बाद अक्समात ही कोई बडी घटना जन्म ले लेती है। दक्षिण दिशा में कोई बडी विमान दुर्घटना मिलती है,जो आग लगने और बाहरी निवासियों को भी आहत करती है,आदि बाते मंगल के साथ राहु के जाने से मिलती है। मित्रों जहां मैं फिर से आपसे कहना चाहूंगा कि उन ज्योतिषियों से बचें जो एक ग्रह गोचर में जब चेंज हो जाता है तो वह आपको राशिफल बताना शुरू कर देते हैं यह बिल्कुल की ज्योतिष नियम के खिलाफ है आपकी कुंडली के हिसाब से और गोचर के मिलान से ही भविष्य बताया जा सकता है हां देश दुनिया के हालात के बारे में जरूर बताया जा सकता है आज मेरे मित्रों इसी तरह अपना प्यार बनाए रखे आचार्य राजेश www.acharyarajesh.in 7597728725

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

जन्म कुंडली में धन आने का योग

www.acharyarajesh.in
आज के समय में पैसा ही सबकुछ माना जाने लगा है। अच्छी लाइफ स्टाइल के लिए पैसा होना बहुत जरूरी है। लेकिन कई लोग जीवनभर मेहनत करने के बाद भी पर्याप्त धन एकत्रित नहीं कर पाते हैं। आज के विश्व में धनवान की ही पूजा होती है। जिस मनुष्य के पास धन नहीं होता, वह कितना ही विद्वान हो, कितना ही चतुर हो, उसे महत्ता नहीं मिलती। इस प्रकार ऐसे बहुत से व्यक्ति मिलते हैं, जो सर्वगुण सम्पन्न हैं, परन्तु धन के बिना समाज में उनका कोई सम्मान नहीं है। मित्रों हरेक आदमी को धन की आवश्यकता गौढ रूप से जरूरी है। जैसे शरीर की पालना,परिवार का पोषण अपनी अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने की आवश्यक्ता,शिक्षा व्यवसाय और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धन की आवश्यकता होती है। अक्सर लोग अपने जीवन में धन की प्राप्ति के लिये कई उपाय करते है अपने अपने ज्ञान के अनुसार कार्य करते है,कोई धन से धन कमाता है कोई अपने को प्रदर्शित करके धन कमाता है,कोई अपनी अपनी भावना को प्रदर्शित करने के बाद धन को कमाता है,कोई अपनी शिक्षा को प्रदर्शित करने के बाद धन कमाता है कोई कर्जा दुश्मनी और बीमारी वाले कारणों से धन को कमाता है,कोई साझेदारी और विवाह आदि से धन कमाता है,कोई रिस्क लेकर अपमानित होकर जालसाजी करने के बाद धन कमाता है,कोई धर्म और भाग्य से अपने पैतृक कारणों से धन कमाने की चेष्टा करता है,कोई सरकारी या प्राइवेट नौकरी करने के बाद धन कमाता है,कोई मित्रों के सहयोग से कमन्यूकेशन वाले साधनों से और लाभ करवाने के द्वारा धन को कमाता है कोई अपने अनुसार यात्रा वाले साधन बनाकर बडी बडी संस्थायें बनाकर चैरिटीबल ट्रस्ट बनाकर धन कमाने की कोशिश करता है। जीवन में धन कमाने के लिये करोडों प्रकार के साधन धन कमाने के लिये प्रयोग में लाये जाते है। धन कमाने और धन के गंवाने के दो अलग अलग रूप जातक की कुंडली से देखे जाते है। कब धन आयेगा और कब धन जायेगा,धन आयेगा किस मद से और जायेगा किस कारण से दोनो की समानता को देखना भी जरूरी होता है। जो धन इकट्ठा हो जाता है वह धन भी भौतिक रूप में देखा जाता है,जो धन लगातार चलता रहता है वह भी धन चलायमान धन के रूप में देखा जाता है,जो अधिक धन कमाकर और धन को धन कमाने के साधनों में लगाकर और अधिक धन कमाने के लिये अपनी बुद्धि को प्रयोग में लाता है वही बडा धनी और समझदार कहलाता है। इसके बाद वे धन कमाने वाले लोग भी धन कमाने वाले माने जाते है जो कमाते तो है लाखों करोडों लेकिन उनके पास भोजन भी खाने को नही मिलता है,कई लोग धन को जीवन भर नही कमाते लेकिन बडे मौज से सारा जीवन ऐशो आराम से निकालते है। कई लोग कमाते भी खूब है और उनके पास अंत में धन बिलकुल नही होता है,कोई जीवन की शुरुआत में धन को कमा लेता है कोई जीवन की बीच की आयु में धन को कमाता है और कोई जीवन के अन्तिम समय में कमाना शुरु करता है। धन को ही लक्ष्मी के रूप में जाना जाता है और लोग इसे लक्ष्मी की कृपा के रूप से मानते है।
धन कमाने के लिये जातक की कुंडली में तीन कारण देखने जरूरी होते है,पहला कारण गुरु के रूप में देखा जाता है जो जातक की बुद्धि और ज्ञान के बारे में बताता है कि जातक का स्वभाव जीवन में किस प्रकार से अपने को संसार में प्रदर्शित करने लिये सामने आयेगा,वह लोगों के साथ कैसा व्यवहार करेगा,और व्यवहार के अन्दर वह कैसे लोगों से अपना सम्बन्ध स्थापित करेगा,उसे कैसे वातावरण में रहना होगा,उसके साथ कैसे साधन होंगे और किन साधनों को अपने जीवन में मुख्य रूप से मानेगा। गुरु के बाद कुंडली में धन के लिये साधनों के रूप में शुक्र को देखना जरूरी होता है,जातक को धन कमाने के लिये प्रयोग किये साधनों में कौन सा साधन अधिक उत्तम रहेगा,वह जिस धन को साधनों को चलाने के लिये प्रयोग में लायेगा वे उस धन से चल पायेंगे या नही,धन जो साधनों के रूप में प्रयोग में लाया जायेगा उसकी कीमत जातक के जीवन में कैसा व्यवहार करेगी,जातक जो धन कमाने के लिये धन का प्रयोग करेगा वह आगे के साधनों में उसी धन से धन कमाने के लिये कितना बचत करेगा,या धन को कमाने के चक्कर में इतने साधन बना लेगा कि उसके पास का धन बिलकुल नही बचेगा और वह कर्जा लेकर धन को साधनों में लायेगा,वह कैसे लोगों से धन कमाने के लिये अपनी सहायता को देगा या सहायता को लेने की कोशिश करेगा। तीसरा कारण धन कमाने के लिये साधनों के रूप में देखा जाता है,साधन हमेशा केतु के रूप में देखे जाते है और साधन के कारक केतु के सामने राहु के बिना साधनों की पूर्णता भी नही मिलती है,केतु जितना बली होगा उतना ही बली राहु होगा,केतु जितना खाने की कोशिश करेगा राहु उतना ही शक्ति के रूप में केतु को खिलायेगा,केतु की भूख मिटाने के लिये राहु धन को भी खाकर साधन रूपी केतु को चलाने के लिये अपने प्रयास को सामने करेगा,वह अपने प्रयास से प्रदर्शन करने की कला के रूप में शरीर को भी खाने की कोशिश करेगा,वह माता मन मकान और जानकार लोगों को भी अपनी भूख का आहार बनाकर केतु रूपी साधन को अपना बल देगा,वह शिक्षा की शक्ति को खाकर भी अपने बल को दे सकता है,वह कर्जा करवाकर बीमारी पालकर दुश्मनी पालकर भी केतु को बलवान करेगा,जीवन साथी और साझेदार को भी खाकर अपने बल को केतु को देने की कोशिश करेगा,वह जातक को अपमान में डालकर जातक को मौत देकर या मौत जैसे कारण पैदा करने के बाद अथवा भयंकर रिस्क देकर भी केतु को बलवान करने की कोशिश करेगा,धर्म भाग्य का बल लेकर या धर्म भाग्य से कमाकर भी केतु को बलवान करने की कोशिश करेगा,इस तरीके से इन तीन कारणों को कुंडली में देखकर जातक के धन कमाने के साधनों को देखा जाता है।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

जन्म कुंडली में संतान सुख

www.acharyarajesh.in
Q
जन्म कुंडली में संतान सुख
किस मनुष्य की कैसी सन्तान होती इस्का पता भी लगाया जा सकता है। जन्म कुण्डली में चलित नवमांश कारकांश के द्वारा जन्म योग है या नही इसका पता लगाना तो असंभव नही है तो कठिन अवश्य है।

सन्तान सुख का विचार करने के लिये त्रिकोण यानी पहले पांचवे और नवे भाव तथा दूसरे ग्यारहवे भाव से सन्तान सम्बन्धी विचार करना चाहिये।
पहले भाव यानी शरीर के भाव से जो शरीर के बारे में नये जन्म का विचार देता है से सन्तान के प्रति जानने के महत्वपूर्ण भाव के रूप में जाना जाता है। इसके अन्दर सबसे पहले पति और पत्नी जातक के शरीर के बारे में परीक्षा करनी चाहिये। स्त्री के शरीर से में प्रजनन क्षमता है कि नही और पुरुष के अन्दर प्रजनन के लिये कारक वीर्य की बलवता है कि नही इस बारे में पहले विचार किया जाना उत्तम रहता है। इसके बाद दूसरे भाव से यह भी जानना आवश्यक है कि शरीर से उत्पन्न कुटुंब की बढोत्तरी है कि नही,कहीं ऐसा तो नही कि मारक ग्रह दूसरे स्थान में हो और संतान के पैदा होते ही वह ग्रह संतान को समाप्त कर दे। अगर मारक ग्रह है तो उसका इलाज भी करना जरूरी है। इसके बाद पंचम भास सन्तान सुख का विचार किया जाता है,पंचम स्थान से पांचवे स्थान यानी नवें स्थान और आखिर में ग्यारहवां स्थान यानी लाभ स्थान पांचवे स्थान से सामने बैठे हुये ग्रह भी देखने जरूरी होते है और अपना असर पूरा संतान के मामले में देते है।
 इन पांचों स्थान पर गुरु की द्रिष्टि युति और अन्य प्रकार की गुरु वाली बाते याद रखनी चाहिये,इसके बाद सप्तमांश नवमांश कारकांश यह कुंडली में जन्म के इन पांचों स्थानों के स्वामी की क्या पोजीसन है उसका भी ध्यान होने के बाद सन्तान सम्बन्धी जातक को योग्य मार्गदर्शन करना चाहिये।
सूर्य मंगल गुरु पुत्र संतान के कारक होते है,चन्द्रमा स्त्री ग्रह है और बुध शुक्र शनि कुंडली में बलवान होने पर पुत्र या पुत्री का सुख प्रदान करते है,सूर्य की सिंह राशि बहुत कम सन्तान देने वाली है,और अगर सूर्य ग्यारहवें भाव में बैठ कर पंचम को देखता है तो एक पुत्र से अधिक का योग नही बन पाता है,कभी कभी इस सूर्य के कारण वंश वृद्धि में बाधा भी मिलती है। लेकिन सूर्य कम से कम एक पुत्र तो देगा ही। यदि चन्द्रमा की राशि कर्क किसी प्रकार से योगकारक बन रही है और माता के कारक चन्द्रमा का प्रभाव जीवन में अधिक है या राहु के द्वारा चन्द्रमा और शुक्र को देखा जा रहा है तो भावना के अनुसार चन्द्रमा का भय यानी राहु और चन्द्रमा मिलकर सास का रूप देते है और पत्नी भय से केवल सास के अलावा और किसी के बारे में सोच भी नही पाती है तो कन्या सन्तान का होना आवश्यक हो जाता है और तीन कन्या तक की मान्यता मानी जाती है। एक कहावत "चन्द्र कन्या प्रजावान" के अनुसार भी माना जाता है कि कन्या राशि का चन्द्रमा अधिक प्रजा को उत्पन्न करने वाला होता है। इसके बाद भी पंचम में अगर कर्क या मीन राशि है तो भी कन्या सन्तान की अधिकता होती है। अगर पंचम में कर्क राशि को ग्यारहवे भाव से शनि देखता हो तो वास्तव में सात पुत्री का भी योग बनता है। और पुत्र भी एक ही होता है। शनि पुत्र सुखकम ही नही देता देखा गया  है यह बात अपने अनुभव से कह रहा हूं
 अगर पंचम स्थान पर शनि और मंगल की द्रिष्टि होती है या पंचम स्थान का मालिक व्यय स्थान से सम्बन्ध रखता है अथवा पंचम और धन स्थान पर पाप ग्रहों की युति होती है तो पुत्र का सुख नही मिल पाता है पुत्र होता भी है तो वह या तो बाहर चला जाता है या घर पर भी रहते हुये अजनबी जैसा व्यवहार करता है।मनपसन्द सन्तान के लिये स्त्री के ऋतुकाल से सोलह रात तक ऋतुकाल रहता है,उसमें ही गर्भ धारण हो सकता है,उसमें पहली चार रातें ऋतुदान के वास्ते मना की गयी है,क्योंकि दम्पति के आरोग्य को पहली चार राते रोग पैदा करने वाली होती है,यह समय अनेक रोगों और बाधाओं को बढाने वाला होता है,और विद्वान स्त्री पुरुष इन रातों का परित्याग करते है। इसके बाद की बारह रातें ऋतुदान के लिये मानी गयी है,चौथी रात के ऋतुदान से पुत्र की प्राप्ति होती है लेकिन उसकी उम्र कम होती है,पंचम रात से पुत्री उत्पन्न होती है लेकिन उसकी भी या तो उम्र कम होती है या रोगी होकर पूरी जिन्दगी निकालती है,छठी रात को पुत्र की पैदाइस मानी जाती है और लम्भी उम्र तथा वंश के आगे वृद्धि के लिये माना जाता है,सातवीं रात से पुत्री पैदा होती है आठवीं रात से पुत्र पैदा होता है नवी रात से पुत्री दसवीं रात से श्रेष्ठ पुत्र पैदा होता है,ग्यारहवी रात से सुन्दर पुत्री की पैदाइस होती है,बारहवीं रात से श्रेष्ठ पुत्र की पैदाइस होती है,तेरहवीं रात से  पुत्री पैदा होती है,चौदहवीं रात से पुत्र और पन्द्रहवी रात से लक्ष्मीवान पुत्री प्राप्त होती है,सोलहवीं रात से सर्वगुण सम्पन्न पुत्र की उत्पत्ति होती है,इसके बाद के संयोग से पुत्र संतान की प्राप्ति नही होती है,अगर होती भी है तो या तो गर्भ स्त्राव हो जाता है अथवा मृत अवस्था में पैदा होती है।

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...