रविवार, 9 जनवरी 2022

GrahGochar 2022: नए साल में होने वाले राशि परिवर्तन------------ ---


 मित्रोंआगे 2022 में पांच राज्यों

यूपी, पंजाब उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव. पांचों राज्‍यों में अगले साल फरवरी मार्च में होगेंमेरी ज्योतिष गणना के हिसाब से पंजाब को छोड़ कर BJP जीत सकती है पंजाब में Aap का पलड़ा भारी रहेगा लेकिन सरकार किसकी बनेगी यह अभी कहना मुश्किल है उत्तर प्रदेश में 250 से ज्यादा सीट BJP लेकर जीतेगी कुलमिलाकर BJP का पलड़ा भारी रहेगा 


रविवार, 2 जनवरी 2022

राहु और शनि युति conjunctionक


राहु और शनि युति conjunction राहु और शनि दोनों यदि कुंडली में एक साथ आ जाएं, तो सबसे पहले शनि के रूप को समझना जरूरी है,शनि एक ठंडा अन्धेरा और ग्रह है,सिफ़्त कडक है,रूखा है,उसके अन्दर भावनाओं की कोई कद्र नही है,जिस भाव में होता है उस भाव के कामो कारकों और जीवों को जडता में रखता है,इसके अलावा शनि की सप्तम द्रिष्टि भी खतरनाक होती है,जहां जहां इसकी छाया अपना रूप देती है वहां वहां यह अपनी जडता को प्रस्तुत करता है। शनि की जडता की पहिचान वह अपने कामो से करवाता है और अपने पहिनावे और रहन सहन से भी करवाता है,इस पहिचान के लिये शनि की द्रिष्टि को तीसरे भाव से भी देखा जाता है। शनि का अपना परिवार भी होता है उस परिवार को यह अपनी पहिचान के अन्दर ही शामिल रखता है और उस परिवार में अधिकतर लोग कार्य वाली शिक्षाओं को करने वाले और लोहा मशीनरी आदि को काटने जोडने और कई तरह के रूप परिवर्तन वाले कामों को करने वाले होते है। शनि की नजर सप्तम में होने के कारण पत्नी या पति का स्वभाव तेज बोलने का होता है,वह कोई भी बात जोर से चिल्लाकर केवल इसलिये करता है या करती है कि शनि की सिफ़्त वाला व्यक्ति बहुत कम ही किसी की सुनता है और जो सुनता है उसे करने के अन्दर काफ़ी समय लगता है,कम सोचने की आदत होने से और कम बोलने की आदत होने से या गम्भीर बात करने के कारण या फ़ुसफ़ुसाकर बात करने की आदत के कारण चिल्लाकर बात सुनने के लिये जोर दिया जाता है। शनि की जो पैत्रिक पहिचान होती है वह कार्य करने के रूप में कार्य के करने वाले स्थान के रूप में उस स्थान पर जहां पानी की सुलभता कम होती है वहां रहने से भी मानी जाती है,
अधिकतर जब पानी की सुलभता कम होती है तो रहने और जीविकोपार्जन के साधन भी कम होते है,इसलिये शनि की सिफ़्त वाले व्यक्ति के पूर्वजों को या पिता को बाहर जाकर कमाने की जरूरत पडती है,शनि की सिफ़्त के अनुसार ही जातक कार्य करता है और जो भी कार्य करता है वह मेहनत वाले काम होते है।
राहु की आदत को समझने के लिये केवल छाया को समझना काफ़ी है। राहु अन्दरूनी शक्ति का कारक है,राहु सीमेन्ट के रूप में कठोर बनाने की शक्ति रखता है,राहु शिक्षा का बल देकर ज्ञान को बढाने और दिमागी शक्ति को प्रदान करने की शक्ति देता है,राहु बिजली के रूप में तार के अन्दर अद्रश्य रूप से चलकर भारी से भारी मशीनो को चलाने की हिम्मत रखता है,
राहु आसमान में बादलों के घर्षण से उत्पन्न अद्रश्य शक्ति को चकाचौन्ध के रूप में प्रस्तुत करने का कारक होता है,राहु जड या चेतन जो भी संसार में उपस्थित है और जिसकी छाया बनती है उसके अन्दर अपने अपने रूप में अद्रश्य रूप में उपस्थित होता है।शनि राहु को आपस में मिलाने पर अगर शनि पत्थर है और राहु शक्ति को मिलाकर उसे प्रयोग किया जायेगा तो सीमेन्ट का रूप ले लेता है,शनि में मंगल को मिलाया गया तो वह लिगनाइट नामक का पत्थर बनकर और उसके अन्दर लौह तत्व की अधिकता से जल्दी से जुडने वाला सीमेंट बन जाता है,राहु अगर लोहे के साथ मिल जाता है तो वह स्टील का रूप ले लेता है,लेकिन अलग अलग भावों के अनुसार राहु को समझना पडता है,एक भाव में वह हिम्मती बनाता है और कार्य करने की शक्ति को बढाकर बहुत अधिक बल देता है,लेकिन दूसरे भाव में जाकर वह धन और बल वाली शक्ति को प्रदान करना शुरु देता है,व्यक्ति के पास काम बहुत अधिक होता है लेकिन धन के रूप में वही मिल पाता है जो मुश्किल से पेट को भरा जा सके। शनि को कार्य के लिये माना जाता है और वह जब तीसरे भाव से सम्बन्ध बना लेता है तो फ़ोटोग्राफ़ी वाले कामो की तरफ़ अपना ध्यान देने लगता है,छठे भाव में जाने पर वह दवाइयों से सम्बन्धित काम करने लगता है,सप्तम में जाकर वह खतरनाक लोगों की संगति देने लगता है तथा अष्टम में जाकर शमशान के धुयें की तरफ़ से काम करने लगता है,नवे भाव मे जाकर वह धर्म और ज्योतिष के साथ यात्रा वाले काम और रेगिस्तानी काम करने के लिये भी अपनी शक्ति देता है। दसवे भाव मे दोनो की शक्ति राजकार्य के लिये माने जा सकते है और किसी भी अचानक कार्यों की उथल पुथल के लिये भी माना जा सकता है। ग्यारहवे भाव में शनि राहु अपनी सिफ़्त के अनुसार बडे भाई को या दोस्तों के कामों को करने के लिये भी अपनी रुचि देता है,बारहवें भाव में शनि राहु का रूप तंत्र मंत्र और ज्योतिष आदि में रुचि रखने वाला भी माना जाता है।
जीवन के चार आयाम माने जाते है,पहला धर्म का होता है दूसरा अर्थ का माना जाता है,तीसरा काम होता है और चौथा जो मुख्य होता है उसे मोक्ष की संज्ञा दी जाती है। शनि को इन चारों आयामों के अन्दर प्रकट करने के लिये अगर माना जाये तो धर्म में शनि का रूप कई प्रकार से अपनी मान्यता देगा। घर में माता पिता और घर के सदस्यों के प्रति निभाई गयीजिम्मेदारियों के प्रति शनि अपने कर्म को प्रकट करेगा,उनके आश्रय के लिये बनाये गये निवास स्थान और उनकी जीविका को चलाने के लिये दिये गये कार्य या व्यवसाय स्थान माने जा सकते है,परिवार के बाद समाज का रूप सामने आता है उसके अन्दर धर्म से शनि को प्रकट करने के लिये आने जाने के रास्ते बनवाना,अनाश्रित लोगों की सहायता करना,भूखो को भोजन देना और असहायों की दवाइयों आदि से मदद करना माना जायेगा,इसी प्रकार से जब राहु का मिश्रण धर्म के अन्दर मिलेगा,तो परिवार के लोगों के लिये शिक्षा का बन्दोबस्त करना,परिवार के लोगों के लिये कार्य शक्ति का विकास करना,जो भी वे कार्य करते है उन कार्यों के अन्दर अपनी शक्ति का समावेश करना आदि माना जायेगा। शनि राहु को धर्म में ले जाने और पूजा पाठ मे प्रवेश करवाने पर शनि राहु मन्दिर का रूप लेता है,शनि राहु की सिफ़्त को शेषनाग के रूप में भी प्रकट किया जाता है,यह शरीर और इसकी शक्ति को विकास करने में शनि राहु की महती भूमिका मानी जा सकती है,जैसे कि आत्मा को सुरक्षित रखने के लिये इस शरीर का शक्तिवान और कार्यशील होना भी जरूरी है,अगर शरीर असमर्थ होगा उसके अन्दर कार्य करने की शक्ति नही होगी तो जल्दी ही आत्मा शरीर से पलायन कर जायेगी और शरीर शव का रूप धारण कर नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा। समुद्र के अन्दर शेष शय्या पर भगवान विष्णु को दिखाया जाना केवल शरीर के अन्दर आत्मा को सुरक्षित रखने का प्रयास ही माना जा सकता है,इस संसार रूपी समुद्र में शेषनाग रूपी शरीर में विष्णु रूपी आत्मा आराम कर रही है। लालकिताब में शनि के साथ राहु को शेषनाग की युति से विभूषित किया गया है,और बताया भी गया है कि जिस जातक की कुण्डली में यह योग होता है वह शेषनाग के फ़नों के अनुसार एक साथ कई दिशाओं में अपनी द्रिष्टि रखने वाला होता है। मेरे विचार से यह कथन बिलकुल सही है,आज के युग में हो या प्राचीन काल में जिस व्यक्ति की द्रिष्टि चारों तरफ़ गयी वही सभी स्थान से सफ़ल माना जा सकता है,लेकिन जो व्यक्ति एक ही दिशा या एक ही काम के अन्दर अपनी प्रोग्रेस चाहने की कामना में लगा रहा और उस काम या उस वस्तु का युग समाप्त होते ही वह बेकार हो गया और उसके लिये दूसरा रास्ता सामने आने में जितना समय लगा वह वक्त उसके लिये बहुत ही खराब माना जा सकता है। जिस जातक की कुंडली में यह योग होता है वह चारों दिशाओं में अपने दिमाग को ले जाने वाला होता है उसे एक दिशा से कभी संतुष्टि नही होती है। शनि राहु की युति को शेषनाग योग से विभूषित किया गया है।। जिस जातक की कुंडली में यह योग बारहवें भाव में होता है उसके लिये रक्षक भी संसार होता है। वह अक्सर इतना बडा तंत्री होता है कि वह अपनी निगाह से जमीन के नीचे से लेकर आसमान की ऊंचाई वाले कामों को भी कर सकता है और परख भी सकता है। शनि का निशाना अपने से तीसरे स्थान पर होता है राहु का निशाना भी अपने से तीसरे स्थान पर होता है,दोनो का निशाना एक ही प्रकार का होने से जो भी असर तीसरे स्थान पर होगा वह मशीनी गति से होगा,अचानक तो बहुत लाभ दिखाई देने लगेगा और अचानक ही हानि दिखाई देने लगेगी। शनि का रूप कार्य से माना जाये और राहु का रूप शक्ति से माना जाये तो कार्य के अन्दर अचानक शक्ति का विकास दिखाई देने लगेगा और कार्य के रूप में दिखाई देने वाला रूप कभी कभी धुयें की तरह उडता दिखाई देगा। बारहवें भाव में शनि और राहु के होने से आसमानी धुयें की तरह माना जासकता है,व्यक्ति के अन्दर अगर निर्माण के कार्य होंगे तो उसका कार्य उस क्षेत्र में होगा जहां पर फ़ैक्टरियों की चिमनियां होंगी,और आसमान में धुंआ दिखाई देगा। अगर यह युति बारहवें भाव में सिंह राशि में होगा तो जहां व्यक्ति का कार्य स्थान होगा वह किसी तरह से सरकार या राजनीतिक कारणों सेसम्बन्धित भी होगा। शनि राहु की बारहवें भाव से दूसरे भाव में द्रिष्टि होने से कार्य केवल धन और भौतिक वस्तुओं के निर्माण से सम्बन्धित होगा,उन्ही वस्तुओं का निर्माण किया जायेगा जिनसे धन को बनाया जा सके और व्यापारिक कारणों से माना जा सके,जो भी निर्माण किया जायेगा वह व्यापारिक संस्थानों को दिया जायेगा,खुद ही डायरेक्ट रूप से व्यापार नही किया जा सकेगा। धन के लिये व्यापारिक संस्थान ही अपना योगदान देंगे,बारहवें भाव मे स्थापित शनि और राहु की नजर में चौथी द्रिष्टि भी महत्वपूर्ण मानी जायेगी,कार्य का रूप और कार्य की सोच कार्य करने का स्थान कार्य करने वाले लोग कार्य के द्वारा प्राप्त किये गये उत्पादनों को रखने का स्थान,कार्य करने के बाद जो उत्पादन होगा उसका अन्त आखिर में क्या होगा इस बात के लिये शनि और राहु से चौथा भाव देखना बहुत जरूरी होता है। कुंडली के छ: आठ बारह और दूसरे भाव का गति चक्र अपने अनुसार चलता है। बारहवां भाव छठे भाव को देखता है,और दूसरा भाव आठवें को देखता है,वही गति छठे और आठवें की होती है। जैसे बिना कार्य किये मोक्ष यानी शांति नही मिलती है और बिना रिस्क लिये धन की प्राप्ति नही होती है। उसी तरह से बिना धन के रिस्क नही लिया जा सकता है और बिना शांति की आशा के कार्य नही किया जा सकता है,बारहवां भाव जरूरतों का होता है तो वह कार्य करने के लिये प्रेरित करता है,दूसरा भाव धन का होता है तो प्राप्त करने के लिये रिस्क लेने के लिये मजबूर करता है,जो जितनी बडी रिस्क लेता है उतना ही उसे फ़ायदा औरनुकसान होता है लेकिन छठे और बारहवें भाव को देखे बिना जो रिस्क लेते है वे या तो बहुत बडे नुकसान में जाते है या फ़िर बहुत बडे फ़ायदे में रहते है,लेकिन समान रूप से फ़ायदा लेने के लिये छठे और बारहवे भाव वाले कार्यों को करना भी जरूरी होता है। हर भाव की कडी एक दूसरे भाव से जुडी होती है,अक्सर शनि जो कलयुग का कारक है और राहु जो कलयुग के शक्ति को देने वाला है दोनो के अन्दर समाजस्य रखने के लिये अन्य ग्रहों की स्थिति और उन ग्रहों के अनुसार किये जाने वाले कार्य अपने अपने अनुसार फ़ल देने वाले होते है।

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

कभी भी चणा कभी मुट्ठी भर चना

घी का रूप दूध से बनता है पहले दूध को जमाया जाता है फ़िर दही बनाकर उसे बिलोकर दूध का सार रूप घी को निकाला जाता है.चौथे भाव का रूप दूध से है तो दूध का बदला हुआ रूप नवे भाव से है और नवे भाव का सार घी रूप मे बारहवा भाव है,बारहवा भाव हकीकत मे राहु से जोड कर देखा जाता है और राहु जो अद्रश्य रूप से अपनी शक्ति को रखता है कहने को तो घी तरल पदार्थ है लेकिन वह भोजन मे लेने से शरीर को तन्दुरुस्त बनाता है,चौथे भाव के राहु की नजर पहले तो अष्टम पर भी होती है फ़िर नवी नजर बारहवे भाव पर भी होती है इस भाव का राहु अगर राजी हो गया तो घी ही पैदा करता जाता है और राजी नही है तो वह छठे भाव से कडी मेहनत करवाने के बाद केवल मुट्ठी भर चने खिलाकर ही पेट पालने के लिये अपनी शक्ति को दे पाता है वैसे चना भी शनि के लिये कहा जाता है राहु शनि जब आमने सामने हो जाते है तो दसवे भाव का शनि जातक को कडी मेहनत के बाद भी मेहनत का फ़ल सही नही दे पाता है.

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

दिन का स्वामी सूर्य रात का मालिक शनि

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दिन का स्वामी सूर्य रात का स्वामी शनि
दिन को कामकाज करना चाहिये रात को सोना चाहिये
सूर्य दिन का स्वामी है,शनि रात का स्वामी है,सूर्य शरीर मे फ़ुर्ती और ताकत को भरने वाला है और जब शरीर कार्य करते समय थक जाता है तो शनि शरीर को आराम देने के लिये रात को प्रदान करता है,दिन की थकान को रात को सोने बाद समाप्त हो जाती है। दिन के तीन भाग मुख्य माने जाते है,पहला दिन का उदय होना दूसरा दिन का मध्य जिसे दोपहर कहते है और तीसरा दिन की समाप्ति का समय जिसे सन्ध्या काल काल कहा जाता है,दिन के उदय होने और दिन के समाप्त के समय को शनि और सूर्य की मिलन की सीमा में लाते है,सुबह को शनि जीव को सूर्य को सौंपता है,और सन्ध्या को सूर्य जीव शनि को सौंपता है। शनि के द्वारा जातक के अन्दर जो तत्व भरे जाते है उन्हे सूर्य उपभोग में लेता है और दिन को जो तत्व शरीर मे भरे जाते है वे शनि रात को उपयोग करता है। जैसे दिन को किये जाने वाले कार्यों से शरीर मे फ़ुर्ती रहती है और शाम होते होते शरीर की ककक थक जाती है,थकी हुयी ग्रंथियों की रूप रेखा और कार्य करने की क्षमता को अगर थका हुआ ही रखा जाये तो जीव दूसरे दिन कार्य करने के लायक ही नही रहेगा,इसलिये सूर्य शनि को शरीर सौप देता है,शनि उन थकी हुयी ग्रंथियों को अपनी शक्ति से फ़िर से संभालता है जो ग्रंथिया निढाल होकर कार्य करने से बिलग हो गयी होती है उन्हे शरीर से शनि के तत्वों को प्रदान किया जाता है जैसे हाथ का थक जाना और जब रात होती है तो शनि की आराम करने वाली अवस्था में उस हाथ को कार्यविहीन करने के बाद जमे हुये खून के थक्के को एन्जाइम के द्वारा फ़िर हटाना और हाथ के अन्दर दुबारा से स्फ़ूर्ति को भरना जो नशे काम नही कर पाती है खून की चाल से दुबारा से काम करने के काबिल बनाने का काम शनि का ही होता है।इस प्रकार से शनि जब कार्य करने की शक्ति को पूरा करता है तो सूर्य सुबह को तरोताजा शरीर से कार्य करवाने के लिये अपने अनुसार नयी सोच और नयी रास्ता देता है,जिससे जीव अपने पालन पोषण के लिये संसार के कार्य करने के लिये और नये निर्माण के लिये अपने शरीर को संसार के हवाले कर देता है शाम तक वह पूरी शक्ति से कार्य करता है और दुबारा से शनि के पास चला जाता है इस प्रकार से जीव के क्रम को शनि और सूर्य अपने अपने अनुसार पालते है,जैसे ही जीव की शक्ति का खात्मा हो जाता है जीव की गति को दूसरे जीवन में ले जाने के लिये अन्य ग्रह अपना अपना कार्य करने के बाद शांति देते है।जन्म लेना ही सूर्य है और मृत्यु को प्राप्त करना ही शनि है
तमसो मा ज्योतिर्गमय कहावत के अनुसार अन्धकार से निकलकर प्रकाश में जाने का उदाहरण दिया गया है,बन्द आंखों को खोलने के बाद जब जीव को चेतना मिलती है तो उसे प्रकाश की प्राप्ति होती है। जैसे ही प्रकाश की प्राप्ति होती है जीव अपनी चेतना को जगत के हित के लिये उपयोग में लाने की क्रियायें करने लगता है,इन क्रियाओं में जो शक्ति मिलती है वह दूसरों के हित के लिये ही मानी जाती है,देखने में भले ही सूर्य के सामने किसी का अहित किया जाता हो लेकिन उसे किसी न किसी प्रकार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हित ही मिलता है। जीव अपनी शक्ति को प्राप्त करने के लिये तरह तरह की हिंसा को करता है,जैसे एक शेर हिरन को मारता है,हिरन का रूप शेर के लिये भोजन के लिये होता है उसी हिरन के लिये वनस्पति भोजन के रूप में होती है,वनस्पति के लिये भोजन के रूप में धरती के अन्दर के तत्व जो कीणों मकोडों और सडे हुये जीवाश्मों के रूप में होते है,जो कृषि विज्ञान में ह्यूमस के रूप में माने जाते है होते है कीणों मकोडों के लिये दूसरे तरह की प्राणी जगत को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है,का भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार से देखने में तो शेर हिरन के लिये हिंसक होता है लेकिन हिरन भी वनस्पति के लिये हिंसक होता है,यह क्रम लगातार चला करता है,सूर्य अपनी शक्ति से प्रकृति को पैदा करता है और प्रकृति अपनी शक्ति से जीवों को पैदा करती है जीवन चक्र को चलाने के लिये एक दूसरे की हिंसा को करती है,उस हिंसा को समझ से दूर रखने के लिये शनि का प्रयोग होता है,कारण अगर सामने हर जीव की हिंसा होती है और शनि के द्वारा उसे दुबारा से पूर्ण नही किया जाता है तो दूसरे दिन जीव के लिये आहार मिलना नही होगा और संसार चक्र रुक जायेगा। इस नही रुकने देने की क्रिया को पूरा करने के लिये शनि और सूर्य दोनो ही अपनी अपनी गति को निर्बाध रूप से चलाये जा रहे है। प्रकट करना सूर्य का काम होता है और समाप्त करना शनि का कार्य होता है,जो प्रकट होता है वह जन्म है और जो समाप्त होता है वह मृत्यु है।

जीवन की गति गुरु के द्वारा दिये गये मूल्य पर निर्भर है
सूर्य के द्वारा जीवन को दिया जाता है लेकिन गुरु उस जीव का मूल्य प्रदान करता है,जैसे जब जीव ने जन्म लिया उस समय जीव के शरीर को पूर्ण करने वाले कौन कौन से तत्व थे जो शरीर को पूर्णता और कमी की सीमा को दर्शाते है,जीव जन्म लेने के बाद कितनी निर्माण करने की ताकत को रखता है वह अपनी बुद्धि को कैसे प्रयोग कर सकता है उसे जो शक्ति मिली है उसे वह कहां और कैसे प्रयोग कर सकता है,उसके द्वारा प्रयोग करने वाली शक्ति का मूल्य विकास के लिये किया जाता है तो जीव का मूल्य बढ जाता है एक जीव का कार्य दूसरे जीवों केलिये बहुत समय तक और बहुत प्रकार से फ़ायदा देने वाला होता है तो जीव की चाहत बढ जाती है और जीव का मूल्य बढ जाता है उस जीव की रक्षा करने के लिये प्रकृति अपने अपने प्रकार से सहायता करती है,जीव को शक्ति से जीव को बुद्धि से और जीव को प्राकृतिक रूप से अपनी सहायता करने की हिम्मत प्रकृति देती है।

गुरु के साथ सूर्य का होना जीव का चेतन होना और दिन का प्रकार माना जाता है
गुरु के साथ जब सूर्य का प्रकट रूप मिलता है तो जीव चेतन अवस्था के कारकों में आजाता है जीव के अन्दर आत्मा का संयोग मिल जाता है जीव की बुद्धि प्रखरता की सीमा से ऊपर चली जाती है,वह दूसरों के हित और अनहित की बात को सोचने और करने लगता है उसे केवल अपने शरीर की सन्तुष्टि से लगाव नही होकर दूसरे की भलाई के लिये भी अपनी गति अपने आप ही बनानी पडती है,उसे उस भलाई करने के लिये अलग अलग कारक अपनी अलग अलग शक्ति से सहायता भी करने लगते है। जब तक जीव चेतन अवस्था में अपने प्रखर ज्ञान को प्रकट करने के बाद उस ज्ञान को प्रयोग में लाने लगता है उसका दिन माना जाता है,जैसे ही तामसी कारणों से जीव अपने ज्ञान को अज्ञान के रूप में प्रकट करने लगता है जीव की रात मानी जाती है।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

सूर्य की अष्टम द्रिष्टि

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सूर्य की अष्टम द्रिष्टि भी उसी तरह से मानी जाती है जैसे बाकी के ग्रहों की लेकिन साधारण ज्योतिष मे इसका फ़लकथन नही किया गया है,लालकिताब के अनुसार यह कथन मिलता है कि किसी भी भाव की लगन अपने से सप्तम से मंत्रणा करती है अष्टम से देखती है और ग्यारहवे से नतीजा देती है,यानी लगन सिंहासन है सप्तम मंत्री है अष्टम आंखे है ग्यारहवा चलने वाले पैर माने जाते है उसी प्रकार से गुरु के लिये भी एक बात जरूरी मानी जाती है कि वह वह अगर नीच है और नीच भाव को भी अपनी द्रिष्टि से देखता है तथा उस नीच का फ़ल भी तब और खराब हो जाता है जब गुरु एक चोर भाव मे बैठ कर चोरी से ग्यारहवे भाव को देखे,(छठे से छठा) और इस तरह की बाते तब और भी समझ मे आती है कि गुरु जो सम्बन्ध का कारक है और वह चोरी से अपने साथ काम करने वाले लोगो से मित्रता को बढाकर उनसे अपनी अनैतिकता को पूर्ण करता है तो वह बहुत ही खतरनाक हो जाता है.सूर्य और चन्द्रमा के लिये भी माना जाता है कि वे जिस स्थान पर होते है उस स्थान से अपने अष्टम को उखाड कर फ़ेंकने के लिये और अपने से दसवे स्थान के साथ विश्वासघात करने के लिये योजना जरूर बनाते है बशर्ते कोई उनका दुश्मन राहु केतु शुक्र शनि उन्हे रोक नही रहा हो तो.

सोमवार, 13 दिसंबर 2021

Tantra (तंत्र क्या है)


तंत्र- भी इसी तरह एक टेक्नोलॉजी है, लेकिन एक अलग स्तर की, पर है भौतिक ही। यह सब करने के लिए इंसान अपने शरीर, मन और ऊर्जा का इस्तेमाल करता है टेक्नोलॉजी चाहे जो हो, हम अपने शरीर, मन और ऊर्जा का ही इस्तेमाल करते हैं। आम तौर पर हम अपनी जरूरतों के लिए दूसरे पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन एक mobile फोन या किसी टेक्नोलॉजी के उत्पादन के लिए जिन बुनियादी पदार्थों का उपयोग होता है, वे शरीर, मन और ऊर्जा ही होते हैं
आज जबकि तंत्र या तांत्रिक को पढे लिखे लोग धोखा,पाखण्ड तथा अन्धविश्वास कहते है तो तन्त्र प्रयोग लिखने का औचित्य क्या है? आप किसी भी चीज को दिखाना चाहते है या उसे समझाना चाहते है, यदि वह व्यक्ति उस विषय की गहराई या उस चीज की विशेषता को नहीं जानता इसलिये वह आपका आपकी चीज का तथा आपकी बात का मजाक उडाता है,व्यंग बाण छोडता है तथा अन्धविश्वास कहता है,यही स्थिति पढे लिखे लोगों की हो गयी है,वे अपने अपने विषय के अलावा और कुछ समझने की कोशिश ही नही करते है,उन्हे यह भी पता नही होता है कि वे जब अपनी माँ के पेट में आये होते है उस समय भी दाई ने या डाक्टर ने कोई तंत्र ही किया होता है,अगर दाई या डाक्टर नही होगा तो घर की किसी बढी बूढी महिला के द्वारा तंत्र बताया गया होगा कि इस प्रकार से इतने दिन के पीरियड के समय में बच्चा गर्भ मे आ सकता है,और इतने दिन के पीरियेड के बाद कन्या गर्भ में आ सकती है,इतने दिन के पहले या इतने दिन के बाद गर्भ धारण किया तो बच्चा या तो गर्भपात से गिर जायेगा या पैदा होते ही मर जायेगा,जो लोग तंत्र को नही जानते है वे या तो बच्चों के लिये जीवन भर पछताते रहते है या फ़िर किसी का बच्चा गोद लेकर अपना काम चलाते है,इसके लिये भी अस्पतालों एक फ़र्टिलिटी सेंटर खुल गये है वे आसानी से किसी के वीर्य को किसी के गर्भ में स्थापित कर देते है और एक की जगह दो दो बच्चे जुडवां तक दे देते है। यह सब तंत्र नही है तो क्या है,डाक्टर को दवाई और शरीर विज्ञान का तंत्र आता है उसे आता है कि किस स्थान की कमी है और उस कमी को पूरा करने के लिये कौन सी नश को काट कर या नकली नश को लगाकर काम चलाया जा सकता है,आजकल तो तंत्र के बलबूते पर डाक्टर नकली वाल्व लगाकर दस बारह साल के लिये ह्रदय को चालू कर देते है।
जिस पश्चिमी सभ्यता के पीछे आज के भारतीय लोग दौडे चले जा रहे है,उन लोगों को पता नही था कि भारत में हनुमान जी की पूजा आदि काल से की जाती रही है,वे जब भारत में घूमने के लिये आते तो वे भारत में मंगलवार के दिन हनुमान जी के मंदिर में जाकर लोगों को चिढाया करते थे,Oh ! here is monkey Go? क्या बात है यहां तो बन्दर भी भगवान हैं। जब उन्होने ही मंगल पर वाइकिंग भेजा और जब पहली मंगल की तस्वीर वाइकिंग ने भेजी तो उन्हे यह देखकर महान आश्चर्य हुआ कि जो तस्वीर बंदर के रूप में भारत में पूजी जाती है वह कोई बन्दर की तस्वीर नही होकर "Face of Mars" मंगल का चेहरा है।हमारे यहाँ हनुमान जी की पूजा का महत्व मंगलवार के दिन ही माना जाता है,और मंगल ग्रह की शांति के लिये ही हनुमानजी की पूजा की जाती हैऔर जब भी कोई बाधा आती है तो एक ही दोहा उनकी आराधना के लिये मसहूर माना जाता है,-"लाल देह लाली लसे,और धरि लाललंगूर,बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि शूर",आज जब वैज्ञानिक इस तस्वीर को पा गये है तो उनको आश्चर्य होने लगा है कि यह चेहरा भारत में कैसे पूजा जाने लगा,भारत के लोगों को कैसे पता लगा कि मंगल का चेहरा बन्दर जैसा है,वे बिना किसी यान या विमान के वहाँ कैसे पहुंच गये,जब लोगों को पता लगा कि भारतीयों के पास तांत्रिक विद्या है और उस विद्या से वे किसी भी ग्रह की परिक्रमा आराम से कर लेते है और किसी भी विषय को तंत्र द्वारा आराम समझ सकते है तो उन्हे भारी ग्लानि हुयी,सन दो हजार में मिली फ़ेस आफ़ मार्स की फ़ोटो उन्होने दो हजार दो में इसलिये ही प्रकाशित की थी कि कहीं पूरे विश्व में ही हनुमान जी की आराधना शुरु न हो जाये और जिन लोगों की वे खिल्ली उडाया करते थे वे ही अब उनकी खिल्ली नही उडाने लगें। भारत के अन्दर जो भी संस्कृत और हिन्दी के अक्षर है उनकी कलात्मक रचना ही देवी और देवता का रूप माना गया है,छोटा "अ" अगर सजा दिया जाये तो वह धनुष बाण लेकर खडे हुये व्यक्ति का रूप बन जाता है,शनि जी का रंग काला है और शनि के मंत्र के जाप के समय "शं" बीज का उच्चारण करते है,अगर शं के रूप को सजा दिया जाये तो वह सीधा श्रीकृष्ण भगवान का रूप बन जाता है। इसी प्रकार से "शिव" शब्द को सजाने से भगवान शंकर का रूप बनता है,विष्णु शब्द को सजाने पर वह भगवान विष्णु का रूप बनता है,""क्रीं" शब्द को सजाने पर शेर पर सवार माता दुर्गा का रूप बनता है,आदि रूप आप खुद परख सकते है। जब उन्हे भारत की तंत्र क्रिया पर विश्वास हो गया तो उन्होने भारत से हिन्दी भाषा को ही भारत से गायब करवाने की सोची न रहेगा बांस और न ही बजेगी बांसुरी।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

मन का राजा चन्द्रमा


चन्द्रमा मन का राजा है,"मन है तो जहान है मन नही है तो शमशान है",यह कहावत चन्द्रमा के लिये बहुत अच्छी तरह से जानी जाती है। पल पल की सोच चन्द्रमा के अनुसार ही बदलती है चन्द्रमा जब अच्छे भाव मे होता है तो वह अच्छी सोच को कायम करता है और बुरे भाव मे जाकर बुरे प्रभाव को प्रकट करता है। लेकिन जब चन्द्रमा कन्या वृश्चिक और मीन का होता है तो अपने अपने फ़ल के अनुसार किसी भी भाव मे जाकर राशि और भाव के अनुसार ही सोच को पैदा करता है। जैसे मेष लगन का चन्द्रमा अगर कर्क राशि मे है तो वह भावनात्मक सोच को ही कायम करेगा अगर वह लगन मे है तो अपनी काया के प्रति भावनात्मक सोच को पैदा करेगा और वृष राशि मे है तो अपने परिवार के लिये धन के लिये और भौतिक साधनो के लिये भावनात्मक सोच को पैदा करेगा वही चन्द्रमा अगर मिथुन राशि का होकर तीसरे भाव मे चला गया है तो वह केवल अपने पहिनावे लिखने पढने और इसी प्रकार की सोच को पैदा करेगा,अष्टम मे है तो वह अपनी भावनात्कम सोच को अपमान होने और गुप्त रूप से प्राप्त होने वाले धन अथवा सम्मान के प्रति अपनी सोच को रखने के साथ साथ वह मौत के बाद के जीवन के प्रति भी अपनी सोच अपनी भावना मे स्थापित कर लेगा। इसी प्रकार से कन्या राशि का चन्द्रमा अगर अच्छे भाव मे है तो वह अच्छी सोच को पैदा करने के लिये सेवा वाले कारणो को सोचेगा और बुरे भाव मे है तो वह केवल चोरी कर्जा करना और नही चुकाना दुश्मनी को पैदा कर लेना और हमेशा घात लगाकर काम करना आदि के लिये ही सोच को कायम रख पायेगा।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

Solar eclipse (सूर्य) ग्रहण)ओर काल सर्प

Solar eclipse (सूर्य) ग्रहण)ओर काल सर्पSolar eclipse (सूर्य) ग्रहण)ओर काल सर्प Acharya Rajesh:
मित्रो साल 2021का आखिरी ग्रहण सुर्य ग्रहण4 दिसंबर को होने वाला ग्रहण पूर्ण सूर्यग्रहण होगा। यह साल का दूसरा और अंतिम सूर्यग्रहण होगा।
- हिंदू पंचांग की ज्योतिषीय गणना के आधार पर यह सूर्यग्रहण विक्रम संवत 2078 के कार्तिक माह की अमावस्या तिथि पर वृश्चिक राशि और अनुराधा नक्षत्र में लगेगा।
- भारत में इस सूर्य ग्रहण को नहीं देखा जा सकेगा इस कारण से इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा।क्योकिभारत में इस सूर्य ग्रहण को देखा नहीं जा सकेगा। इसी दिन शनि अमावस्या भी है   जब भी अमावस्या की तिथि शनिवार के आती है इसे शनि अमावस्या कहा जाता है सूर्य ग्रहण सुबह लगभग 11 बजे शुरू हो जाएगा। दोपहर 03 बजकर 07 मिनट पर ग्रहण खत्म हो जाएगा। करीब 01 बजकर 57 मिनट पर यह ग्रहण पूर्ण रूप से चंद्रमा की छाया में रहेगाबीते दो वर्षों में दिसंबर के महीने में सूर्यग्रहण लगता आ रहा है। इस साल दिसंबर में सूर्य ग्रहण की हैट्रिक लगने जा रही है। यानी लगातार 3 वर्षो से दिसंबर में सूर्यग्रहण का संयोग बना रहा है। लेकिन इस बार के सूर्यग्रहण की खास बात यह है कि इस बार सूर्यग्रहण धनु राशि में नहीं बल्कि वृश्चिक शाशि में लगने जा रहा है। इससे पहले के दोनों सूर्यग्रहण धनु राशि में घटित हुए थे। मित्रों 4 दिसंबर को सूर्य ग्रहण होगा औरसूर्य ग्रहण के अगले दिन ही मंगल अपनी राशि वृश्चिक में आकर सूर्य से मिलेंगेओर उसके साथ ही 5 दिसंबर को सभी ग्रह राहु और केतु के बीच में आ जाएंगे जिसको ज्योतिष भाषा में कालसर्प योग कहा जाता है

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 2019 में भी ऐसा सूर्य ग्रहण लगा था और उस समय भी कालसर्प योग का निर्माण हुआ था उसके बाद कोरोना वायरस पुरी दुनिया में भयंकर रूप से फैल गया इस वायरस से कई लोगों की जान ले गई इसीलिए दोस्तों अभी भी यह समय काफी दिक्कत वाला कहा जा सकता है इसीलिए हमें जो भी सरकार की तरफ से निर्देश है उसका पालन करते रहना चाहिए मित्रों सूर्य और चंद्र ग्रहण के समय बनने वाली कुंडली का विशेष महत्व दिया गया है। इसमें बताया गया है कि ग्रहण का प्रभाव उन स्थानों पर अधिक होता है जहां वह दृष्टिगोचर यानी दिखाई देते हैं किन्तु गोचर में बन रही विशेष ग्रह स्थिति के कारण ग्रहण का कुछ प्रभाव लगभग सर्वत्र ही दिखाई देता है। अभी हाल ही में 19 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन पड़ा आंशिक चंद्र ग्रहण भारत में केवल पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्र में आंशिक रूप से दृश्य था, किन्तु इसी दिन ‘कृषि-कानूनों’ को रद्द करने की प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया।अब आगे 4 दिसंबर के सूर्य ग्रहण के बादओर 5 दिसम्बर के गोचर को देखते हुए सर्दी के मौसम के तेज़ी से करवट लेने के साथ-साथ भारत की राजनीति में कुछ ‘गरमा-गर्मी’ और अप्रिय-संवाद के चलते कुछ बड़ी हलचल होगी। किसान आंदोलन के कारण उत्तर-प्रदेश की राजनीति में बड़ी उथल-पुथल होगी।सरकार के द्वारा जनता के हित में कुछ कल्याणकारी कदम उठाने का संकेत है। पेट्रोल और डीज़ल के दामों में कुछ कमी से जनता को महंगाई से राहत मिलेगी। 5 दिसंबर को मंगल के वृश्चिक राशि में आने के कुछ दिनों के भीतर खाने-पीने  के सामान के दामों में कमी का लाभ भी जनता को मिलेगा।  कुछ बड़े निर्णयों से जनता को लाभ होगा। सुप्रीम कोर्ट के दबाव में केंद्र सरकार को प्रदूषण नियंत्रण को लेकर कोई नई नीति बनानी पड़ सकती है। सूर्य ग्रह यहां भी दिखाई देगा जहां एक बड़े समुद्री तूफान और बेमौसमी वर्षा से देश के पश्चिमी हिस्से में भारी क्षति पहुंच सकती है। जल तत्व की राशि वृश्चिक में पड़ रहे इस सूर्य ग्रहण की राशि को 7 दिसंबर से मंगल प्रभावित करेंगे जिसके 45 दिन के भीतर जहां कुछ बड़े तूफान आएंगे तो भारत में रिकॉर्डतोड़ सर्दी जनता को कष्ट देगी। इस वर्ष सर्दी के मौसम में सामान्य से अधिक वर्षा गेहूं और मक्के के किसानों को लाभ देगी।

रविवार, 31 अक्टूबर 2021

Sambandhon ka karak Guru (सम्बन्धों का कारक गुरु)-

सम्बन्धों का कारक गुरु)- Astro Guru Acharyarajesh(सम्बन्धों का कारक गुरु)------------___------------____मित्रों हमारी
जिंदगी पर ग्रहों का बहुत प्रभाव पड़ता है जीवन मैं सुख-दुख उतार-चढ़ाव सब ग्रहण किया प्रभाव के कारण ही है। मित्रों सभी ग्रह आपको आपकी कुंडली के अनुसार अच्छा या बुरा प्रभाव दे सकते हैं ऐसे बरस पति को एक नैसर्गिक शुभ ग्रह माना जाता है। लेकिन अगर बृहस्पति ही कुंडली में खराब हो तो बहुत ही बुरा प्रभाव दे देता है । गुरु जो जीव का कारक है।
गुरु को सम्बन्धों का कारक माना जाता है। माता पिता भाई बहिन पुत्र पुत्री और जितने भी रिस्ते नाते है सभी गुरु की श्रेणी में ही आते है,किसी भी रिस्ते को पहिचानने के लिये गुरु को ही देखना जरूरी है,यहाँ तक कि खुद के शरीर के साथ खुद का सम्बन्ध भी गुरु से ही जाना जाता है। शिक्षा में गुरु को आध्यात्मिक शिक्षा के रूप में धर्म और मृत्यु के बाद के जीवन के लिये भी गुरु को पहिचाना जाता है। गुरु जब कुंडली में अपनी विरोधी नीति को किसी भी सम्बन्धी के भाव से व्यक्त करता है तो सम्बन्धों में बिगाड आता है लेकिन सम्बन्धों को बनाने के लिये किये जाने वाले प्रयासों में अगर सूर्य आडे आता है तो सम्बन्ध बनने के बजाय और बिगडते जाते है। कारण गुरु और सूर्य के मिलने से जीवात्मा योग तो मिलता है लेकिन अहम की वृत्ति भी दिमाग में भरती है,यह तब और भारी होता है जब मंगल सूर्य और गुरु का आपसी संयोग मिलता है। गुरु विभिन्न भावों के अनुसार विभिन्न बैर भाव बनाता है,और जब गुरु का प्रभाव केन्द्र और त्रिकोण के लिये आघात देता है तो सम्बन्ध जन्म से ही खराब हो जाते है,और जब गोचर से आघात देता है तो सम्बन्ध कुछ समय के लिये खराब होते है लेकिन फ़िर बन जाते है। पाराशर के नियम के अनुसार कि हर भाव का बारहवां भाव उसका विनाशक होता है। और हर भाव का आठवां भाव उस भाव का रिस्क लेने का स्थान होता है,विनाशक बनने पर अगर विनाशक ग्रह के विरोध में ग्रह को कृत्रिम रूप से उत्पन्न कर लिया जाता है तो विनाशक ग्रह या भाव से छुटकारा मिल जाता है,उसी प्रकार से रिस्क वाले स्थान को सही रूप से समझ कर अगर विनाशक स्थिति को अन्य स्थान और निर्माण वाले कारक में प्रयोग कर लिया जाये तो रिस्क का सही मतलब और फ़ल मिल जाता है। गुरु का बैर भाव और कोर्ट केश का व्यविधान केवल पारिवारिक मामलों के लिये ही देखा जाता है,लेकिन सम्बन्ध चाहे वह व्यवसायिक हों या पारिवारिक सम्बन्ध तो सम्बन्ध ही कहे जायेंगे। गुरु का भावानुसार सम्बन्धों के साथ विरोध बहुत ही तीखा देखने को मिलता है,जैसे गुरु लगन में है तो वह सप्तम तीसरे और ग्यारहवें भाव से विरोध करेगा,गुरु अगर धन भाव मे है तो वह चौथे आठवें और बारहवे भाव से विरोध करेगा,गुरु अगर पराक्रम में है तो वह सन्तान धर्म और लगन से विरोध करेगा,गुरु अगर चौथे भाव मे है तो वह छठे दसवें और दूसरे भाव से विरोध करेगा,गुरु अगर पंचम मे है तो वह जीवन साथी लाभ और पराक्रम से विरोध करेगा,गुरु अगर छठे भाव मे है तो वह रिस्क वाले भाव खर्चे वाले भाव और सुख भाव से विरोध करेगा,इसी प्रकार से सप्तम का गुरु धर्म लगन और सन्तान भाव से विरोधात्मक प्रभाव देगा। विरोध करवाने वाले कारकों में राहु केतु रोजाना की चिक चिक करवाते है,मंगल मारकाट और फ़ौजदारी वाली बातें करवाता है,शनि कोल्ड वार करवाने के लिये माना जाता है,शुक्र धन सम्पत्ति और बंट्वारे वाले कारणों में बैर करवाने वाला होता है बुध बहिन बुआ बेटी के रूप में बैर को बढवाने वाला होता है आदि कारक भी सामने आते है।

रविवार, 13 जून 2021

राहु चोथा

राहु चोथा

तखत पावे जब चौथा टेवे राहु मंदा खुद होता हो.

मुट्ठी चंद्र 8 या 11 बैठे अकेला चौथे न मंदा हो.

चार समुद्र ग्रह 9 नाभि मुद्रा कोई न रखता हो.

तीनों मित्र नर ग्रह शरण माता की पेट के अंदर कुल पलता हो.
जब टेवे में चतुर्थ घर मुख्य हो सिंहासन अधिपति हो तो राहु का प्रभाव मंदा हो जाता है. इस घर को केन्द्र स्थानों में से एक माना जाता है. लाल किताब में इस केन्द्र स्थानों को बंद मुट्ठी का भाव कहा जाता है. इसे बंद मुट्ठी का भाव कहने से तात्पर्य य्ह भी है कि इस भाव से गर्भस्थ शिशु का विचार भी किया जाता है.इस भावसेमाता मन मकान की बाते सभी करते है और माता मन मकान से सभी का लगाव होता है। बचपन से जवानी तक माता से और जवानी से लेकर बुढापे तक मकान से तथा बुढापे से लेकर मौत आने तक मन के साथ जुडा रहना जरूरी होता है। यह बात सही है कि आदमी कहीं पर स्वतंत्र नही है लेकिन मन के साथ तो वह हमेशा ही बन्धा हुआ है,मन का स्थान कुंडली मे चौथे भाव मे होता है और चौथे भाव से मन शंकाओं से तब भर जाता है जब उसके साथ राहु का भी सम्बन्ध स्थापित हो जाये। संसार में कई लोग आपको तर्क और कुतर्क करते हुये मिल जायेंगे। जैसे चौथे भाव के राहु वाले व्यक्ति से कोई बात की जाये तो उसके अन्दर हजारों शंकाये एक बात के लिये पैदा हो जायेंगी वह उन बातों के लिये तरह तरह की जानकारिया और उन जानकारियों के पीछे और कई जानकारियां लेने की कोशिश करेगा,समझाना भारी केवल चौथे राहु वाले के लिये ही पडता है यह बहुत ही समझने वाली बात है। ज्योतिष के अनुसार राहु को रूह का दर्जा दिया गया है,राहु केवल रूह के रूप में शरीर पर हावी होता है लोग इसकी गणना कई तरह की छाया रूपी शक्ति के लिये किया करते है। गुरु के साथ राहु का साथ होना भी खतरनाक माना जाता है गुरु जीव होता है तो राहु रूह जीव के ऊपर रूह हावी हो जाये तो जीव की स्वतंत्र सत्ता रह ही नही पाती है जैसा रूह चाहती है जीव उसी प्रकार से कार्य करता है। अगर राहु के साथ मंगल स्थापित हो जाता है जीव के अन्दर नीची सोच के साथ खून की चाल धीमी हो जाती है वह जरा सी बात को सोचने लगता है और अपने ही अन्दर घूमने लगता है। अक्सर चौथा राहु स्त्री की कुंडली में बहुत बुरा प्रभाव डाला करता है। किसी महिला के दिमाग में उसके परिवार के प्रति अगर राहु नाम की रूह कोई भ्रम डाल दे और वह उस भ्रम को निकालने के लिये अपने सारे प्रयास शुरु कर देगी,और जब तक उसका जीवन है वह उसी भ्रम के अन्दर फ़ंसी रहेगी,हर रहने वाले स्थान को वह शक की नजर से देखेगी,और जो भी उसके परिवारी जन है उनके लिये उसके मन में शक की बीमारी ही रहेगी,उसके लिये कितना ही जतन किया जाये कि उसे सत्यता का पता मिल जाये लेकिन वह सत्य के अन्दर से भी असत्यता का आभास करवाने लगेगी। एक पति के लिये इससे खतरनाक बात क्या हो सकती है कि उसके सही रहने के बाद भी उसकी पत्नी उसे शाम को प्रताणित केवल इसलिये करे कि वह देर से घर आया तो जरूर उसके अन्दर कोई न कोई राज है,या गाडी रास्ते में खराब हुयी तो उसके अन्दर भी उसकी कोई चाल है,या वह खाना कम खा रहा है या वह किसी के साथ जा रहा है या कोई महिला उससे बात करने लगी है आदि बातें यह रूह बहुत बुरी तरह से प्रकट करती है। कई लोगों को देखा है कि वे अपने इसी ख्याल के कारण घंटो बाथरूम में पानी बहाया करती है कि उनका वस्त्र गंदा है उनके ब्रस को किसी ने छू लिया होगा,उनके नहाने वाले साबुन को किसी ने प्रयोग में लिया होगा या किसी ने उसकी चप्पलों को ही प्रयोग में लिया होगा। चौथा राहु सदैव कर्जा दुश्मनी और बीमारी के भाव को देखता है और जो भी बाते इन कारकों से जुडती है,वे सभी चौथे राहु के लिये मसला बन जाती है,किसी से दुश्मनी बन जाने पर चौथा राहु वाला व्यक्ति दुश्मनी से कम अपने शक वाले ख्यालों से जल्दी मरने की कोशिश करेगा,जैसे वह रात को सो रहा है और चूहा आकर किसी प्रकार से कोई सामान को बजा दे तो वह यह नही सोचेगा कि चूहे ने उसके सामान को गिराया है वह पूरे घर के अन्दर कोहराम इसलिये मचा देगा कि कोई उसके घर में था और वह उसे मारने आया था। कारण चौथा भाव अपनी युति से अष्टम मौत के भाव को भी देखता है। इसके अलावा बाहरी आफ़तों के लिये इस भाव को भी अधिक माना जाता है किसी धर्म स्थान या किसी अस्पताली कारण को अगर वह व्यक्ति समझ गया है तो वह अपने मरीजों केवल शक के आधार पर ही दवाइयां देगा और मरीज जीने वाला भी होगा तो भी शक के आधार पर दी जाने वाली दवाइयों से वह समय से पहले ही परलोक सिधार जायेगा। अक्सर चौथे राहु वाले व्यक्ति की पहिचान यात्रा में सही रूप से की जा सकती है,इस प्रकार का व्यक्ति जब भी यात्रा करेगा अपने स्थान के अलावा भी अपने सामान को फ़ैलाने का काम करेगा,उसकी कोई वस्तु जरा सी इधर उधर हुयी और वह अपने शक वाले स्वभाव को आसपास वाले यात्रियों पर करना शुरु कर देगा,इसके अलावा वह रास्ते भर किसी से बात नही करेगा,अपने ही ख्यालों में खोया हुआ यात्रा करेगा,जहां उसे उतरना है उसके साथ वाले सहयात्री उसे उतारने की कोशिश करेंगे तो ही वह उतरेगा अन्यथा उसे ध्यान नही होगा कि उसे उतरना भी है या नही। चौथे राहु वाला व्यक्ति प्रेम करने के मामले भी शक करने वाला माना जाता है,किसी ज्योतिष जानने वाले के पास वह शादी के पहले ही जाना शुरु कर देगा और शादी से पहले ही वह पूरी जानकारी अपने पति या पत्नी के लिये करना शुरु कर देगा,यह भी देखा गया है कि इन्ही कारणों से अधिकतर इस प्रकार के लोगों की शादी या तो हो नही पाती है और हो भी जाती है तो वह वैवाहिक जीवन को सही नही चला पाते है,उनको अधिक सोचने के कारण टीबी या सांस वाले रोग पैदा हो जाते है और अस्पताल की तरह से घर का माहौल भी बन जाता है। दमा स्वांस आदि की बीमारी होने के बाद वे अधिकतर मामले में सांस की गति को सामान्य रखने के इन्हेलर आदि का प्रयोग करते हुये देखे जाते है। महिलाओं में चौथे राहु का असर एक प्रकार से और देखा जा सकता है कि वे अपने घर के फ़र्स को साफ़ से साफ़ रखना चाहती है उन्हे गंदगी बहुत जल्दी दिखाई देने लगती है,कोई जरा सा घर के अन्दर घुसा और उसके पैरों के निशान बने तो वह जल्दी से ही पौंछा लेकर उस स्थान को पोंछने का कार्य करने लगेगी,उन्हे घर के माहौल में एक अजीब सी बदबू का होना मिलेगा और वे अधिक समय घर की साफ़ सफ़ाई में ही बिताना पसंद करती है।

रविवार, 16 मई 2021

Gemstone रत्न किस तरह चारण करें

Gemstone रत्न किस तरह चारण करें 
 
मित्रों ग्रहों को मजबूत करने के लिए रत्‍नों का प्रयोग किया जाता है। कुंडली में कमजोर ग्रहों के शुभ प्रभाव को पाने के लिए भी रत्‍न धारण किए जाते हैं.liकुंडली में कमजोर ग्रहों के शुभ प्रभाव को पाने के लिए भी रत्‍न धारण किए जाते हैं. आइए जानते हैं कि वैदिक ज्‍योतिष में रत्‍नों को किस तरह से धारण करना उत्तम माना गया है।

रत्‍न नौ प्रकार के होते हैं

ग्रहों के आधार पर रत्‍नों को नौ भागों में बांटा गया है। हर एक ग्रह को मजबूती प्रदान करने के लिए एक रत्‍न निर्धारित किया गया है। सूर्य के लिए माणिक, चंद्रमा के लिए मोती, बुध के लिए पन्‍ना, मंगल के लिए मूंगा, गुरु के लिए पुखराज, शुक्र के लिए हीरा, शनि के लिए नीलम, राहु के लिए गोमेद और केतु के लिए लहसुनिया पहना जाताहै मित्रों एक रतन कई किसानों का कई प्रजातियों का और उसमें अलग-अलग बंद होते हैं तब तब होते हैं यह सब एक एस्ट्रोलॉजर जातक की कुंडली को देख कर ही निर्धारित करता है कि उसको कौन सा नीलम या कौन सा पुखराज बनाया जाए गलत नीलम या गलत पुखराज पहनाने से भी परेशान आ सकते परेशानी आ सकती है। इसलिए एक अच्छा रत्न expert ही बता सकता है
 रत्‍न राशि अनुसार नहीं बल्कि कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुसार पहनने चाहिए। कौन-सा रत्‍न कब पहना जाएं इसके लिए कुंडली का सूक्ष्‍म विश्‍लेषण करना जरूरी होता है। लग्‍न कुंडली के अनुसार कारक ग्रहों के रत्न ही पहनने चाहिए। अगर कुंडली में कोई भी कारक ग्रह शुभ ग्रह किसी भी तरह पीड़ित हो रहा हो  अस्त हो रहा तो उसको उस ग्रह को मजबूत करने के लिए रत्न धारण करना चाहिए। जो ग्रह कुडली में उपयोगी है उसकी ताकत को बढ़ाया जाए 
 सामान्यत: लग्न कुंडली के अनुसार कारकर ग्रहों के  रत्न पहने जा सकते हैं जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी होकर पाप प्रभाव में हो, अस्त हो या श‍त्रु क्षेत्री हो उन्हें प्रबल बनाने के लिए भी उनके रत्न पहनना प्रभाव देता है।
किसी भी व्यक्ति के जीवन में रंग और तरंग का सर्वाधिक महत्व होता है. रत्न भी इन्ही रंगों और तरंगों के माध्यम से प्रभाव डालते हैं. व्यक्ति के शरीर के सात चक्र इन्ही रंगों और तरंगों को ग्रहण करते हैं. रत्नों के प्रयोग से व्यक्ति की मानसिक स्थिति में तुरंत बदलाव हो जाता है. रत्नों का असर शरीर के साथ ही मन और कार्यों पर भी पड़ता है. रत्नों का लाभ तो थोड़ी देर में होता है लेकिन गलत रत्न पहनने का नुकसान जल्दी होने लगता है.मित्रो इन लेखों में मैंने वर्तमान में रत्‍न को लेकर चल रहे कई सिद्धांतों और उनके कारण पैदा हो रहे व्‍याघात को समझाने का प्रयास किया है। निर्बल और उच्‍च ग्रह का उपचार भी ऐसा ही एक और व्‍याघात है। इसे एक उदाहरण कुण्‍डली से समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए एक तुला लग्‍न की कुंडली है। उसमें शुक्र लग्‍न का अधिपति हुआ। एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति होने के कारण शनि इस कुंडली में कारक ग्रह है। नवम भाव का अधिपति होने के कारण बुध का उपचार भी किया जा सकता है।
अब कृष्‍णामूर्ति की माने तो इस कुंडली के शुक्र, शनि और बुध ग्रह का ही इलाज किया जा सकता है। अब इस कुंडली में अगर गुरू, सूर्य या मंगल खराब स्थिति में है तो उनके इलाज की जरूरत ही नहीं है। एक व्‍यक्ति राजमहल में रह रहा हो तो उसे ज्ञान, आधिपत्‍य, और ताकत स्‍वत: मिलती है, और अगर न भी मिले तो उसके लिए प्रयास करने की जरूरत भी नहीं है।
ऐसा जातक अगर ज्‍योतिषी से यह मांग करे कि उसे अपने आधिपत्‍य, ताकत और ज्ञान में बढ़ोतरी की जरूरत है तो मान लीजिए कि वह केवल किसी लालसा की वजह से कुछ समय के लिए भटककर यह सवाल कर रहा है। वास्‍तव में उसे जो चाहिए वह ऐश्‍वर्य, विरासत, कंफर्ट, कम्‍युनिकेशन स्किल और अपनी चाही गई चीजों के लिए ईज ऑफ एक्‍सस की जरूरत है। यानि वह अपनी जरूरतों के लिए लम्‍बी लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार नहीं है।
अगर वह जातक किसी साधन या व्‍यवस्‍था को पाने का प्रयास कर रहा है या रही है तो यह कुछ समय की बात हो सकती है दीर्घकालीन जरूरत नहीं। ऐसे में तुला लग्‍न में बैठे नीच के सूर्य को ताकतवर बनाने के लिए माणिक्‍य भी पहना दिया तो फायदा करने के बजाय नुकसान अधिक करेगा।
यही बात अन्‍य लग्‍नों के लिए भी लागू होती है। तो जातक का इलाज करते समय यह ध्‍यान रखने वाली बात है कि वास्‍तव में जातक का मूल स्‍वभाव क्‍या है। उसे अपनी मूल स्थिति में लौटाने से अधिक सुविधाजनक कुछ भी नहीं है। भाग्‍य को धोखा नहीं दिया जा सकता, लेकिन मानसिक स्थिति में सुधार कर खराब समय की पीड़ा को दूर किया जा सकता है। ऐसे में किसी एक जातक की लालसा का पोषण करने के बजाय उसे सही रास्‍ते की ओर भेजना मेरी समझ में सबसे सही उपाय है। ऐसे में मेष से लेकर मीन राशि और लग्‍न वाले जातकों के लिए अलग-अलग उपचार होंगे। आप गौर करेंगे कि कुछ ग्रहों को कारक तो कुछ को अकारक भी बताया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी कुंडली में कारक ग्रहों का प्रभाव होता है और अकारक का नहीं होता। प्रभाव तो सभी ग्रहों का होगा, लेकिन मूल स्‍वभाव कारक ग्रह के अनुसार ही होगा। ऐसे में उपचार के समय भी कारक ग्रहों का ही ध्‍यान रखा जाए।
रही बात उच्‍च और नीच की… यह तो रश्मियों का प्रभाव है। नीच ग्रह की कम रश्मियां जातक तक पहुंचती है और उच्‍च ग्रह की अधिक रश्मियां। ऐसे में अगर कारक ग्रह अच्‍छी स्थिति यानि अच्‍छे भाव में बैठकर कम रश्मियां दे रहा है तो उसके लिए उपचार करना चाहिए। और अकारक ग्रह खराब स्थिति में या नीच का भी है तो उसे छेड़ने की जरूरत नहीं है। मित्रों एक राजा होकर अगर वह किसी खड्डे में गिर जाए तो उसको से आसन पर बैठा देने में ही समझदारी होती है अगर आप भी अपनी कुंडली दिखा कर रतन धारण करना चाहते हैं या अपने ग्रहों का चार करवाना चाहते हैं तो आप संपर्क कर सकते हैं

सोमवार, 3 मई 2021

Importance of number in life(जीवन में नम्बर का महत्व

Importance of number in life(जीवन में नम्बर का महत्व

 

जीवन में नम्बर का महत्व
जैसे हम जीवन की शुरुआत मे शब्दो को प्रयोग मे लाने के लिये अक्षरों का ज्ञान करते है वैसे ही जीवन मे गिनती करने के लिये नम्बरों को सीखते है। जीरो से लेकर नौ के अंक तक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। हर  व्यक्ति एक नम्बर के आधार पर चला करता है उस नम्बर के बिना उसका जीवन अधूरा सा रहता है,कोई नम्बर भाग्य को देने वाला होता है और कोई नम्बर बहुत ही दुर्भाग्यशाली भी होता है। जन्म के नम्बर से ही पता लग जाता है कि जीवन कितने समय का है और जीवन मे किस किस वक्त कौन सी आफ़त आयेगी या जायेगी साथ ही अगर सूक्ष्म रूप से भी देखा जाये तो हर साल महिना दिन और दिन का एक एक घंटा अपनी गति को प्रदान करता है। नम्बर का जो रूप जीवन मे काम आता है वह इस प्रकार से है :-

जीवन को चलाने वाला नम्बर
जीवन जिस दिन से शुरु हुआ होता उस दिन के नम्बर से ही गति का पता लग जाता है जीवन को चलाने के लिये माता के गर्भ मे आने से ही इस नम्बर की शुरुआत हो जाती है और महिने दिन तथा घंटे से इस नम्बर का पता लगाया जाता है,पैदा होने का समय भी इसी नम्बर से प्राप्त किया जाता है।

ह्रदय की चाहत वाला नम्बर

समय समय पर मनुष्य की चाहत बदलती रहती है और जीवन मे अगर एक ही चाहत बनी रहे तो जीवन का चलना दूभर हो जाता,जब हम जन्म लेते है उसी दिन से गणना शुरु हो जाती है और इस नम्बर के लिये यह भी कहा जाता है बच्चा भी अपने दिल मे चाहत रखता है लेकिन शरीर के परिपक्वता पर आधारित होने के कारण इस नम्बर का एक प्रभाव हमारे दिल मे हमेशा रहता है अगर हमे पता लग जाये कि किस नम्बर के दिन मे हमारी चाहत बदलेगी और इस चाहत के बदलने का समय क्या होगा तो हमे काफ़ी आसानी हो सकती है.

एक नम्बर जो हमेशा मन मे रहे
कहा जाता है कि मन हमेशा चलायमान है लेकिन मन का क्षेत्र भी एक केन्द्र पर जुडा होता है जब तक केन्द्र का संचालक मन के अन्दर भाव नही भरेगा तब तक मन का चलायमान होना हो ही नही सकता है। इस नम्बर के लिये यह भी कहा जा सकता है कि जब भी कोई बात अच्छी या बुरी मन के अन्दर आयेगी उसी नम्बर के अनुसार ही आयेगी.

जन्म दिनांक
जिस दिन जातक का जन्म होता है अपनी अपनी भाषा और संस्कृति के अनुसार उस दिन का एक नम्बर भी होता है जैसे अंग्रेजी मे अगर तारीख को दिन का नम्बर मानते है तो हिन्दी मे तिथि को नम्बर के रूप मे प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार से मुसलमानी कलेण्डर मे चन्द्रमा की तारीख को ही मान दिया जाता है.वैसे दिन की मान्यता भी दी जाती है और जातक के जन्म के दिन के अनुसार ही उसका नम्बर काम मे लिया जाता है जैसे केरल मे जिस दिन व्यक्ति का जन्म होता है उसी दिन के नम्बर के अनुसार उसका फ़लादेश दिया जाता है।
मिलने वाले चेलेंज का नम्बर
जीवन मे जो भी काम करना पडता है उन सभी के लिये एक चेलेन्ज मिलता है जिस दिन काम करने का वह अच्छा हो या बुरा चेलेन्ज मिल जाता है उसी दिन से उस काम के लिये मानसिकता बन जाती है कई नम्बर तो इतने ओड होते है कि उनके लिये आजीवन एक ही प्रकार का चेलेंज स्वीकार करने के लिए व्यतीत करना पडता है।

व्यक्तिगत साल का नम्बर
हिन्दी मे हिन्दी महिनो का नम्बर और अंग्रेजी मे अंग्रेजी महिनो का नम्बर प्रयोग मे लाया जाता है। इसी प्रकार से अलग अलग देशो मे अपने अपने अनुसार महिनो की गणना के अनुसार नम्बर का प्रयोग किया जाता है। नम्बरो के आधार से ही किसी भी अल्प मध्य और उच्च गति का विश्लेषण साल के नम्बर से किया जाता है.
व्यक्तिगत महिने का नम्बर
साल के बाद महिने का नम्बर केवल शरीर की बारह गतियों पर निर्भर करता है जो गति छ: महिने पहले अच्छी थी वही गति छ: महिने बाद खराब हो जाती है जो इन गतियों को पहिचानते है वह अपने लिये पहले से ही इन्तजाम कर लेते है और वे आने वाली मुसीबत से बचकर अपने कार्य को उस मिलने वाली आफ़त से भी अपने को फ़ायदा मे ले जाते है। 

व्यक्तिगत दिन का नम्बर

सूर्य का रोजाना एक अंश का मान देखा गया है चाहे साल का समय या महिने का समय एक बार गडबडा जाये लेकिन दिन का मान उतना ही रहेगा और निश्चित समय मे ही दिन का मान बदल जायेगा,यह मान अच्छे के लिये भी और बुरे के लिये भी माना जाता है। दिन के नम्बर से अक्सर रोजाना के किये जाने वाले कामो की सफ़लता असफ़लता के लिये देखा जाता है और जिस दिन का नम्बर खराब होता है या धोखा देने वाला होता है उसी के अनुसार सम्भाल लेने पर गति के अनुसार नम्बर का प्रयोग कर लिया जाता है।
जीवन की शुरुआत का नम्बर
जीवन की शुरुआत का मतलब पैदा होने से नही है जब व्यक्ति जीवन की प्रोग्रेस मे अपने को ले जाने के लिये आगे जाना शुरु होजाता है वह ही जीवन की शुरुआत मानी जाती है कभी कभी यह भी देखा गया है कि व्यक्ति पैदा होता है खाता पीता सोता जागता है और एक दिन वह चला जाता है लेकिन उसके जीवन मे किसी प्रोग्रेस का अध्याय जुड ही नही पाता है वह दूसरो के भरोसे रहकर ही पूरे जीवन को निकाल जाता है।
जीवन के परिपक्व होने का नम्बर
जीवन के तीन प्रकार माने गये है एक कच्चा जीवन होता है जिसका मान न के बराबर होता है कि कब कहां किस मोड पर जीवन जाकर रुक जाये या किस मोड पर जाकर जीवन का अन्तिम सफ़र ही पूरा हो जाये दूसरा प्रकार अल्प परिपक्व होता है जो जीवन को आगे भी चलाता है और जब चलाने के लिये शुरु हुआ जाये तो वह कार्य या व्यवहार से अपने को नेस्तनाबूद कर ले,तीसरा प्रकार वह होता है कि जीवन पूरी तरह से हर क्षेत्र की जानकारी से पूर्ण हो गया है व्यक्ति के सामने कोई भी बात अच्छी या बुरी आये वह उसे पूरी तरह से निपटाने के लिये अपने व्यवहार को सामने कर देगा इसके लिये भी एक नम्बर होता है जो निश्चित समय का बखान करता है।
अपने को प्रदर्शित करने का नम्बर
व्यक्ति को एक नाम जन्म के बाद दिया जाता है जो नाम पूरे जीवन साथ रहता है और मरने के बाद भी कुछ काल तक भी बना रहता है और मरने के कुछ समय बाद भी समाप्त हो जाता है,नाम का पहला शब्द जीवन को प्रदर्शित करने के लिये माना जाता है इस शब्द के अक्षर और उन अक्षर से बनने वाले नम्बर के बाद ही इस कारण को जाना जाता है।

किये जाने वाले कार्यों का नम्बर
जीवन मे कितने ही कार्य किये जाते है हर कार्य का एक नम्बर होता है जो नम्बर जीवन की शुरुआती हालत मे होता है उसे जीवन के कुछ क्षेत्र के लिये मानते है फ़िर आगे बढने पर दूसरा कोई नम्बर साथ हो जाता है उस नम्बर को भी देखना जरूरी हो जाता है,जितने भी कार्य जीवन मे किये जाने है वह कार्य एक सम्बन्धित नम्बर से जुडे होते है उस नम्बर के आसपास घूमने वाले नम्बरो के आधार पर गिना जाता है कि व्यक्ति कितने प्रकार के कार्य करने के लिये समर्थ है और कितने कार्य वह नही कर सकता है।

किसलिये कार्य करने है का नम्बर
कोई भी कार्य करने का एक कारण होता है और जो कारण बनता है उसका भी एक नम्बर होता है जब तक कार्य के लिये कारण नही बनेगा तब कार्य किया जाना या उसके अच्छे बुरे होने का कोई प्रभाव भी नही जाना जा सकेगा,जीवन मे अलग अलग समय जो कारण बनेगा उसके लिये भी एक नम्बर का प्रकार बनेगा लेकिन उस कारण वाले नम्बर को जानने के लिये बाकी के नम्बरो के अनुसार ही कारण का होना माना जायेगा.

दिमाग को स्थिर रखने का नम्बर
समय काल और दूरी के नियम के अनुसार दिमाग को स्थिर रखने का भी एक नम्बर होता है जैसे समय है लेकिन काम करने का कारण नही बना है काम करने का कारण भी बना है लेकिन काम मे कठिनता आ रही है इन तीनो से तभी फ़ायदा मिलना माना जा सकता है जब दिमाग मे काम करने की स्थिरता है यह स्थिरता भी नम्बर के अनुसार ही आ पाती है।

आत्मीय नम्बर
कभी कभी देखा होगा कि किसी फ़ोन के आने से उसके साथ नया होने के बाद भी मन जुड जाता है और उस नम्बर से बात करने वाले से लगातार बात करने का मन करता है भले ही वह बात करने वाला किसी भी प्रकार से छ्ल कर दे,और कभी यह भी होता है कि कोई फ़ायदा देने वाला बात कर रहा है लेकिन उसके फ़ोन का नम्बर कुछ इस प्रकार का है कि उससे चाहते हुये भी बात नही हो पाती है आदि बाते आत्मीय नम्बर के बारे मे देखी जाती है जैसे फ़ोन का नम्बर घर का नम्बर वाहन का नम्बर और घर मे रहने वाले लोगो का नम्बर आदि.

जीवन के प्रति योजना बनाने का नम्बर
जिस समय कोई कार्य करना होता है वह चाहे घर से सम्बन्धित हो या बाहर से सम्बन्ध रखता हो वह शादी विवाह के लिये हो या किसी प्रकार के इलाज आदि के लिये किसी शिक्षा से जुडा हो या किसी प्रकार से अन्य कारण से उस समय के नम्बर पर आधारित होता है कि जो योजना कार्य के लिये बनायी जा रही है अगर वह योजना ही गलत नम्बर के समय मे बना दी गयी है तो योजना के लिये भले ही सभी साधन मिल जाये लेकिन वह योजना चाह कर भी पूरी नही होती है,यही बात अक्सर प्रेम करने वाले लोगो के लिये भी देखी जाती है प्रेम का अन्त शादी से होता है और प्रेम करने के समय से अगर शादी के समय मे फ़ेर है और बिना विचार के किये गये ही किसी गलत नम्बर के समय मे शादी की बात चलायी जाती है तो प्रेम होने के बावजूद भी शादी नही हो पाती है आदि बाते इस नम्बर से देखी जाती है।

छुपे रूप में की जाने वाली घात का नम्बर
हम अपने जीवन के प्रति सुरक्षा को लेकर चलते है और कभी कभी यह भी होता है कि हम जिस व्यक्ति से अपना सम्पर्क बना रहे होते है या जिसके ऊपर भरोसा करके चल रहे होते है वह व्यक्ति गुप्त रूप से घात करके चला जाता है या किसी प्रकार से हमने गलत नम्बर का मकान खरीद लिया है और अपनी घात का नम्बर नही पता है तो किसी न किसी प्रकार से वह मकान या वाहन हमारे लिये गुप्त रूप से हानि देने के लिये माना जायेगा चाहे वह वाहन के रूप मे एक्सीडेंट करवाये या घर के नम्बर के रूप मे आजीवन कमाने के बाद भी एक दिन डकैती डलवा दे या वह शिक्षा की शुरुआत करने के बाद ही अपनी योजना को हटाकर शिक्षा के बाद भी काम धन्धे के लिये भटकाव पैदा हो जाये.

हमेशा कष्ट देने वाला नम्बर
कई नम्बर हमारे जीवन मे ऐसे भी होते है जो बिना कारण के ही कष्ट दिया करते है,अक्सर देखा होगा कि जब हम अपने वाहन से आगे जा रहे होते है तो जिस वाहन को कष्ट देना वह किसी भी तरह से आगे जाने की प्रतिस्पर्धा मे सामने आने की कोशिश करेगा,या यह भी देखा होगा कि मकान का नम्बर अगर सही नही है तो गलत नम्बर वाला पडौसी बेकार मे ही परेशान करने लगेगा या कोई फ़ोन का नम्बर ही बेकार मे ही परेशान करने के लिये अपनी काल करने लगेगा आदि इस नम्बर को पहिचान कर पता की जाती है. मित्रों इसी तरह के और लेख आप पढ सकते है.acharyarajesh.in पर जाकर पढ़ सकते हैं मित्रों आचार्य राजेश

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