मंगलवार, 30 जुलाई 2019

मैं अपने जीवन में रिचहोना चाहता हूँ। और पूरी तरह से मेरे सभी उद्देश्य कव पुरे होंगे

मैं अपने जीवन में रिचहोना  चाहता हूँ।  और पूरी तरह से मेरे सभी उद्देश्य कव पुरे होंगे

कल सपने के बारे मे लिखा था,आज भी यही प्रश्न सामने है कि मै धनी बनना चाहता हूँ.सपना धन का,बहुत ही महत्वपूर्ण बात है,जिसे देखो इसी प्रकार का सपना लेकर चल रहा है.चौथा आठवा और बारहवा भाव इच्छाओं का कहलाता है लेकिन इच्छा पूर्ति के लिये इन तीनो भावो के ग्यारहवे भाव भी बली होने जरूरी है,इस जातक की कुंडली मे चौथे के ग्यारहवे यानी दूसरे भाव मे भी कोई ग्रह नही है,आठवे के ग्यारहवे में केवल सूर्य लगनेश और शुक्र जो तृतीयेश और कार्येश है विद्यमान है,बारहवे भाव के ग्यारहवे भाव मे भी कोई ग्रह नही है इस प्रकार से एक बात और भी जानी जा सकती है कि चौथा भाव खाली है,केवल आठवे भाव मे और बारहवे भाव मे ही मंगल और चन्द्रमा है। चन्द्रमा केवल सोच को देने वाला है और मंगल हिम्मत को देने वाला है.चौथा भाव पूर्वजो से प्राप्त सम्पत्ति की सोच से आगे बढने वाला होता है आठवा भाव खुद के द्वारा परिश्रम करने के बाद नौकरी या सेवा वाले काम करने के बाद प्राप्त करने वाले धन के प्रति सोच कर आगे बढने के लिये माना जाता है और दसवा भाव जो कार्य बडी विद्या को लेकर किये गये होते है के लिये माना जाता है। जातक की प्राथमिक विद्या में बुध वक्री होकर विराजमान है यानी प्राथमिक विद्या मे भी बदलाव हुया है ऊंची विद्या मे शनि विराजमान है जो केवल करके सीखने के लिये ही अपनी शक्ति को प्रदान करता है डिग्री लेने या अन्य प्रकार के कारण पैदा करने के बाद विशेषता हासिल करने के लिये नही माना जाता है,इसके बाद जो किसी विषय मे अलावा योग्यता के लिये देखा जाता है वह दूसरे भाव से देखना जरूरी है,लेकिन यह भाव भी खाली है.गुरु राहु की नवम पंचम युति को अक्सर फ़रेबी सम्बन्धो के लिये भी माना जा सकता है,जातक के दिमाग मे वही कारण पैदा होंगे जिससे वह फ़रेब से सम्बन्ध बनाकर धन कमाने के लिये अपनी इच्छाओं को पालेगा। धनु राशि का बुध अगर वक्री होता है तो वह उल्टे कानून बनाकर अपने कार्यों को लेकर चलने वाला होता है,केतु शनि और वक्री बुध की आपसी युति बन जाती है तो जातक कानून को अन्धेरे मे रखकर सत्ता या राजनीति का बल लेकर धन कमाने के लिये अपनी इच्छा को जाहिर करता है। लेकिन शनि जब भी किसी भी ग्रह को दसवी और चौथी नजर से देखता है तो वही ग्रह शनि की वक्र नजर से आहत हो जाते है। बारहवा चन्द्रमा नवी शनि से आहत है,छठे भाव के शुक्र और सूर्य दोनो ही इस शनि की दसवी नजर से आहत है। बारहवा भाव खर्च करने का मालिक भी है चन्द्रमा के बारहवे भाव मे होने से जातक मानसिक सोच को खर्च करने के लिये अपनी युति को देता है,इस चन्द्रमा की योग्यता से यह जिस भाव मे अपना गोचर करता है उसी को खर्च करने का मानस बना रहता है,जिस ग्रह के साथ रहता है उसी ग्रह की कारक वस्तुओ को खर्च करने के लिये माना जा सकता है। मंगल का प्रभाव भी इसी प्रकार से माना जाता है यह जिस भाव मे गोचर करता है उसी के प्रति अपनी मारक सोच रखता है,मीन राशि का मंगल होने के कारण अक्सर दिमागी झल्लाहट क भी प्रयोग करने के लिये माना जाता है,साथ ही यह मन्गल जन्म के जिस ग्रह के साथ अपना गोचर करेगा वह ग्रह भी मंगल की तपिस से नही बच पायेगा। राहु की सिफ़्त के अनुसार वह जिस भाव मे अपना गोचर करेगा उसी ग्रह या भाव से अपनी साझेदारी प्रकट करना शुरु कर देगा,वह साझेदारी किसी भी क्षेत्र से अच्छे या बुरे किसी भी कारण से हो सकती है केतु का स्वभाव अपनी उपस्थिति को देने है यह जिस भाव मे जिस ग्रह के साथ अपना गोचर करेगा वह अपनी उपस्थिति उसी भाव या राशि या ग्रह के अनुसार प्रदर्शित करना शुरु कर देगा। इस प्रकार से सूर्य और शुक्र के छठे भाव मे होने से साल के बारह महिनो मे जातक बारह प्रकार के कार्य सम्बन्धी बदलाओ को भी करेगा और जिस भी कार्य या स्थान मे हाथ डालने की कोशिश करेगा वह उसी से मानसिक और कार्य शत्रुता को अपने अन्दर बैठा लेगा.गुरु जो सम्बन्धो का कारक है जिस भाव राशि या ग्रह के साथ गोचर करेगा उसी भाव ग्रह के साथ व्यापारिक भाव पैदा कर लेगा,इस प्रकार से धन का कारक बुध जो वक्री है वह आयेगा तो लेकिन उल्टी गति से आकर वापस चला जायेगा। मित्रों आप भी अपनी कुंडली दिखाकर अपनी परेशानी का उपाय चाहते हैं तो आप हमारे नम्वरो पर सम्पर्क कर सकते हैं हमारी सेवा सशुल्क है आचार्य राजेश

रविवार, 28 जुलाई 2019

घनी(अमीर )बनने का स्वप्न

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घनी(अमीर )बनने का स्वप्न

जीवन स्वप्न के रूप मे ही समझा बेहतर होता है लोग अपने अपने अनुसार स्वप्न बुना करते है और उन स्वप्नो को पूरा करने के लिये अपनी अपनी युक्तियां लगाया करते है उद्देश्य केवल चार ही होते है जो पुरुषार्थ के रूप मे माना जाता है,धर्म अर्थ काम और मोक्ष यही चार पुरुषार्थ है। धर्म की तरफ़ जाने से जातक अपने आप को आगे दुनिया मे दिखाना चाहता है,वह दिखावा भले ही शरीर की बनावट से हो या शरीर के द्वारा किये जाने वाले करतबो से हो वह चाहे शरीर की विशेष क्रिया के द्वारा भगवान के प्रति अपने को दिखाना चाहता हो या वह अपने को खुद ही ईश्वर बनाकर दिखाने की चेष्टा मे हो। अर्थ के मामले मे जातक अपने को अधिक से अधिक धनी बनाने के लिये युक्तियां बनाया करता हो या अपने को हर प्रकार का साधन धन से प्राप्त करने की योजना मे लगा रहता हो,चमक दमक से अपने जीवन को सभी के सामने प्रस्तुत करने के लिये भी आर्थिक रूप से बढावा देने के लिये माना जाता हो,इसी प्रकार से काम नाम के पुरुषार्थ की बढोत्तरी के लिये वह लोगो से अपने कार्यों को सिद्ध करने की कला को प्रस्तुत करना जानता हो अपने साथ समाज को भी साथ लेकर चलने के लिये अपनी योजनाओ को बनाया करता हो या अकेले मे अपने जीवन साथी और पुत्र पुत्री आदि सन्तान के रूप मे अपने आप को आगे बढाने के लिये प्रयास रत हो आदि बाते काम नामक पुरुषार्थ की श्रेणी मे आती है इसी प्रकार से जब व्यक्ति इन तीनो प्रकार के पुरुषार्थो को या तो प्राप्त कर चुका हो या उनके प्रति लगाव खत्म हो गया हो अथवा इतना भोग लिया हो कि वह बुरा लगने लगा हो या फ़िर अपने परिवार समाज या रीति रिवाज घर परिवार मे वह किसी बात से हमेशा ही तरसता रहा हो इसी के नाम को मोक्ष का प्रकार का कहा जाता है। मोक्ष का मतलब होता है सन्तुष्ट हो जाना,घनु लग्न की कुंडली हैं इस कुंडली में चौथा आठवा और बारहवा भाव जीवन की संतुष्टि के लिये की जाने वाली इच्छाओं के लिये माना गया है।धनु लगन है,लगनेश गुरु चौथे भाव मे है,गुरु का पंचम नवम योग राहु से अष्टम भाव मे है और जातक का बारहवा भाव खाली है। जातक का यह त्रिकोण पूरा नही है केवल चन्द्रमा से इस त्रिकोण को महिने मे सवा दो दिन के लिये पूरा किया जाता है,यह कारण जातक की इच्छा की तृप्ति के लिये अपनी कमी को बता रहा है।इच्छा की तृप्ति क्यों पैदा हो रही है इस बात को जानने के लिये जातक के दादा पिता माता नाना आदि की इच्छाओं की तृप्ति के लिये भी देखना जरूरी है जातक के किस सम्बन्धी की इच्छा की तृप्ति हो रही है,इस बात का विवेचन इसलिये जरूरी होता है क्योंकि जातक को इच्छाओं की तृप्ति के लिये सोच केवल अपने परिवार से ही प्राप्त हुयी होती है वह अलग से लेकर नही आता है। दादा के लिये जातक के राहु को देखेंगे,राहु के बारहवे भाव मे शुक्र है,राहु के चौथे भाव मे मंगल वक्री है,राहु का अष्टम भाव खाली है,इसका मतलब है कि दादा की उन्नति के कारण उनके पिता थे और शादी के बाद दादा के जीवन को उनकी पत्नी यानी दादी ने सम्भाल लिया था (बारहवा शुक्र).दादा की मानसिक इच्छा एक व्यवसायिक स्थान बनाने की थी लेकिन वह व्यवसायिक स्थान निर्माण मे अधूरा रह गया (वक्री मंगल तुला राशि का),जातक के दादा मे रिस्क लेने जोखिम लेने पूर्वजो के ऊपर ही अपने को निर्भर करने जितना कमाना और उतना ही खर्च लेना की आदत से उनकी इच्छायें पूरी नही हो पायीं (राहु से अष्टम भाव खाली कुम्भ राशि). पिता के लिये देखने के लिये सूर्य की स्थिति को देखते है,सूर्य से बारहवे भाव मे गुरु है सूर्य से चौथे भाव मे राहु है और सूर्य से अष्टम में कोई भी ग्रह नही है,इस प्रकार से जातक के पिताजी तीन भाई और तीन भाइयों मे जातक के पिता का स्थान बडप्पन के स्थान मे होने से तथा जातक के पिता के द्वारा अपने परिवार का पालन पोषण शिक्षा विवाह शादी आदि करने मे अपने धन को लगाया गया,चौथे भाव मे राहु के होने से जो भी कमाया गया वह किसी न किसी कारण से आक्समिक रूप से खर्च कर दिया गया और अपने नाम को कमाने के चक्कर मे या सामाजिक मर्यादा को दिखाने के चक्कर मे सयंत नही रखा गया,पिता का भी अष्टम खाली होने के कारण पिता मे भी जोखिम लेने की आदत नही थी जो भी हो रहा है सीधे से होने और सीधे से चलने मे ही विश्वास था। जातक की माता के लिये देखते है तो चन्द्रमा के चौथे भाव मे गुरु है,जातक की माता पूजा पाठ धर्म कर्म आदि से पूर्ण थी और अपने घर मे ही सामाजिक संगठन आदि के लिये अपने अनुसार कार्य करती थी उनका ध्यान धर्म संस्कृति और लोगो के साथ उच्चता मे जाने का था बडे समुदाय के रूप मे उन्होने भी अपने पति के परिवार के लिये कार्यों मे योगदान दिया,तीन लोगो की परवरिस और उन्हे आगे बढाने की योग्यता प्रदान की,माता के अष्टम मे राहु होने से जातक की माता को अक्समात रिस्क लेने की आदत थी वह किसी भी प्रकार से अपने को सोच विचार कर कार्य करने के लिये नही जाना जाता है,सभी कुछ सामने होने के बाद भी वह केवल आकस्मिक सोच के कारण नही प्राप्त कर पायीं। यही बात जातक के नाना के लिये देखने पर केतु से बारहवे भाव मे चन्द्रमा के होने से जातक के नाना का प्रभाव धर्म और पराशक्तियों की सहायता से अच्छा था वे बडे धार्मिक स्थानो और धार्मिक लोगो के लिये अपने विचार सही रखते थे लेकिन उनके चौथे भाव मे सूर्य बुध शनि के होने से जातक के नाना के पास घर मे वही काम थे जो सुबह शाम किये जाते है और अक्सर उनके पास केवल पिता के दिये गये कार्य और सरकार आदि से मिलने वाली मामूली सहायता को ही माना जा सकता है उन्होने भी अपनी तीन सन्तानो को आगे बढाने पढाने लिखाने मे खर्च किया,केतु से अष्टम भाव खाली होने से भी जातक के नाना को भी रिस्क लेने और जोखिम लेने की आदत नही थी इस कारण से वे भी अतृप्त रह गये।

इस प्रकार से जातक के लिये भी जातक की माता की तरह से ही बारहवे भाव के त्रिकोण को पूरा करने के लिये किये जाने वाले खर्चे जीवन को संयत बनाने के लिये आहार विहार और जो भी आकस्मिक प्राप्त होता है उसे छठे भाव को भरने के लिये जमा करने और रोजाना के कार्यों मे सोचने से अधिक कार्य करने अपने जीवन को खाने पीने और दोस्त आदि के लिये कार्य करने कमन्यूकेशन के साधनो को केवल काम तक ही सीमित करने के लिये अक्समात ही बीमार आदि होने से बचने के लिये अन्जान स्थान के रिस्क लेने वाले कारण अथवा गुपचुप रूप से शिक्षा वाले समय को गंवाने आदि के लिये माना जा सकता है। अगर जातक अष्टम राहु का उपयोग उसी प्रकार से करे जैसे बिजली को प्रयोग करने के लिये उसके उपयोग को जानना,अगर जातक अपने द्वारा किये जाने वाले खर्चो से अपने को संभाल कर रखे तो जातक को धनी बनाने से कोई नही रोक सकता है। मित्रों अगर आप अपनी कुंडली दिखाकर उपाय चाहते हैं तो ही आप संपर्क करें क्योंकि हमारी सारी सेवाएं सशुल्क  है

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

गगन लहरी योगगगन लहरी योग

गगन लहरी योग
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 जब कुंडली मे सभी ग्रह एक तीन नौ और दसवे भाव मे इकट्ठे हो जायें तो गगन लहरी योग का निर्माण हो जाता है। ऐसा जातक गेंद की तरह से सारी उम्र एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता रहता है और एक गेंद की भांति उसका आस्तित्व एक स्थान पर नही बन पाता है। प्रस्तुत कुंडली मे सूर्य बुध पहले भाव मे है बुध आदित्य योग का निर्माण तो हो रहा है लेकिन बुध के वक्री होने पर वह खुद के द्वारा आदेश से काम नही करवा कर दूसरे के आदेश से काम करने वाला होता है,वह खुद कानूनो का पालन नही करने के बाद दूसरो को कानून का पालन करने का आदेश देता है,वह दूसरो को केवल कुछ शब्दो में सुनता है और उसका जबाब विस्तृत रूप मे लोगो को देता है,अक्सर कन्या संतान या बहिन बुआ से बनती नही है या होती ही नही है। पिता का कानूनी मामले मे या समाज संगठन मे वर्चस्व रहा होता है,पिता के खुद के लोग ही जड काटने के लिये माने जाते है पिता का कानून से काम करवाना या कानून का पालन करवाना या धन आदि के मामले मे दूसरो की सहायता करना और एक समय मे उसी धन आदि के लिये दूसरो पर कानून का इस्तेमाल करना आदि भी पाया जाता है। इस प्रकार के जातक अक्सर बोलने के लिये कार्य करने के लिये स्थान स्थान पर यात्रा करते रहते है,अक्सर राहु जिस ग्रह के साथ या जिस भाव मे होता है जातक को उसी क्षेत्र मे अपने नाम और यश कमाने के लिये योग्यता का निर्माण करना पडता है,या तो जातक मानसिक रूप से अपने को आकासीय कारणो मे विचरण करने के लिये माना जाता है या किसी प्रकार मीडिया या सम्पादन मे छुपे भेद खोलने के लिये काम करना पडता है या फ़िर यात्रा आदि के कामो मे उसे लगातार लगा रहना होता है नवे भाव के ग्रहो के अनुसार उसे अपने जीवन को चलाना पडता है,अगर नवे भाव मे कानून या धर्म से सम्बन्धित ग्रह होते है तो कानून और धर्म आदि के बारे मे बाते करता है और उन्ही के द्वारा कन्ट्रोल होकर चलने के लिये मजबूर होता है,इस कुंडली मे गुरु के वक्री होने पर जातक को अपने देश या माहौल से दूर रहकर दूसरे देश या माहौल के लिये ही काम करना होगा,एक समस्या या एक कारण को कई रूप मे विवेचन करने के लिये उसे काम करना होगा,उसे काम करने का एक संयत क्षेत्र नही मानना होगा वह केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति तक ही काम करेगा,इसके अलावा वह राहु के मीन राशि मे और शनि तथा शुक्र के साथ होने से विश्व की तीन बडी कम्पनियों के सानिध्य मे उन्ही के आदेश से अपने जीवन को निकालने वाला होगा। उसके खरी बोलने की आदत को यही काम करने वाली कम्पनिया या विचार राहु शनि शुक्र के रूप मे मंगल और चन्द्रमा को कन्ट्रोल करेंगे जैसे इस जातक के दसवे भाव मे मंगल और चन्द्रमा है जो जातक के लिये बेलेन्स बनाकर तकनीकी काम करने के लिये अपनी युति को देते है लेकिन जातक राहु शनि और शुक्र की युति से अपने खरे बोलने के प्रभाव को खुद के लिये व्यापारिक नीति से काम करने के लिये अपनी युति को प्रदान करने के बाद कन्ट्रोल करने के लिये माना जायेगा। अगर जातक किसी प्रकार के छोटी यात्रा वाले काम करता है या किसी प्रकार से किसी ऐसे संस्थान के लिये काम करता है जो दूसरो को कुछ समय के लिये या हमेशा के लिये बन्धन वाले या कानूनी कारण पैदा करते है उनके ऊपर भी ऊपर का अंकुश उसे अपने मर्जी से काम नही करने देगा। जातक को पैदा होने से लेकर मृत्यु पर्यंत तक इधर से उधर ही रहना होगा या आना जाना पडेगा। किसी भी प्रकार से उसे विदेश आदि जाने मे दिक्कत नही होगी,जहां लोग विदेश आदि मे जाने के लिये तमाक कानूनी कार्यवाही मे उलझे रहेंगे जातक एक ही प्रयास मे विदेश आदि जाने के लिये अपनी शक्ति का प्रयोग करने के माना जायेगा। मित्रों अगर आप भी अपनी कुंडली दिखाना चाहते हैं तो आप हमारे नम्वरो पर सम्पर्क कर सकते हैं हमारी सेवा सशुल्क है

सोमवार, 15 जुलाई 2019

चंद्र ग्रहण

चंद्र ग्रहण पर विशेषचंद्र ग्रहण पर विशेष
16-17 जुलाई को आषाढ़ पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण लगेगा। ग्रहण वाले दिन गुरु पूर्णिमा भी है।
यह ग्रहण खण्डग्रास चंद्र ग्रहण होगा। इससे अलावा इस ग्रहण में ही सावन महीने की शुरुआत भी होगी। 16 जुलाई की रात 1.31 बजे ग्रहण का स्पर्श होगा, मध्य तीन बजे व मोक्ष रात 4.30 बजे होगा। यह चंद्र ग्रहण भारत में कुल मिलाकर 2 घंटे 59 मिनट होगा। चंद्र ग्रहण धनु राशि और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में होगा।ज्योतिषीय दृष्टिकोण से लंबी अवधि तक दिखाई देने वाला यह चंद्रग्रहण भारत सहित पाकिस्तान, मध्य-एशिया और दक्षिण-अमेरिका के लिए विशेष रूप से अशुभ साबित हो सकता है। ग्रहण के समय चंद्रमा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में होकर धनु और मकर दोनों राशियों को प्रभावित करेंगे। अग्नि तत्व की राशि धनु के अंतिम अंशों से शुरू होकर यह चंद्रग्रहण मकर राशि के शुरुआती अंशों को पीड़ित करता हुआ बेहद तीव्र रूप से फल देने वाला होगाइस क्रम में चंद्रग्रहण के नौ घंटे पूर्व 16 जुलाई को सूतक लगने के कारण शाम 4:30 से मंदिरों के कपाट बंद हो जाएंगे। ग्रहण के दौरान नकारात्मक शक्तियां ज्यादा हावी रहती हैं, हमारे ज्योतिष शास्त्रों ने चंद्रमा को चौथे घर का कारक माना है. यह कर्क राशी का स्वामी है. चन्द्र ग्रह से वाहन का सुख सम्पति का सुख विशेष रूप से माता और दादी का सुख और घर का रूपया पैसा और मकान आदि सुख देखा जाता है.
  जन्म कुंडली में यदि चन्द्र राहू या केतु के साथ आ जाये तो वे शुभ फल नहीं देता है.ज्योतिष ने इसे चन्द्र ग्रहण माना है, यदि जन्म कुंडली में ऐसा योग हो तो चंद्रमा से सम्बंधित सभी फल नष्ट हो जाते है माता को कष्ट मिलता है घर में शांति का वातावरण नहीं रहता जमीन और मकान सम्बन्धी समस्या आती है.चन्द्र ग्रहण योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है,चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है,माँ के सुख में कमी आती है, कार्य को शुरू करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना लक्षण हैं, फोबिया,मानसिक बीमारी, डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया,इसी योग के कारण माने गए हैं, मिर्गी ,चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है.
—-चन्द्र+केतु ,सूर्य+राहू ग्रहण योग बनाते है..इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं ।।
कुंडली चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं । चूँकि चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी विशेष नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है  मित्रों आप की कुंडली में भी चंद्र ग्रहण दोष है तो आप मुझसे या किसी अच्छै astrologer से मिलकर कल उपाय करें यह आपके लिए इस बेस्ट रहेगा

शुक्रवार, 28 जून 2019

कुछ करनी कुछ कर्म का फेर


मीन राशि की कुंडली है और गुरु वक्री होकर ग्यारहवे भाव मे मकर राशि का होकर बैठा है। मकर राशि के अन्दर अगर गुरु वक्री हो जाता है तो वह अपनी नीचता को दूर करने के बाद उच्चता मे आ जाता है। लेकिन जो अन्य ग्रह गुरु पर असर देने वाले होते है उनसे गुरु के स्वभाव मे परिवर्तन होना माना जाता है। चौथे भाव मे शनि विराजमान है और वह गुरु को अष्टम नजर से देख रहा है। माता के भाव से अष्टम मे गुरु होने से जातक को परदेशी या परदेश वास के लिये अपनी युति को देता है,साथ ही जातक के अन्दर अपने स्वभाव को वक्री करने के कारण जो भी कार्य समाज धर्म आदि होता है उससे अपने को केवल कर्म की मान्यता को मानने वाला भी होता है,चन्द्र लगनेश के द्वारा शनि केतु को छठे प्रभाव से देखने के कारण जातक की माता को अस्वस्थ माना जाता है। चौथा शनि अक्सर केतु के साथ होने से कंटक ढैया के नाम से भी जाना जाता है यह कंटक ढैया उन्ही कारको को प्रभावित करती है जो कारक ग्रह या भाव के रूप मे शनि की नजर में होते है। इस कुंडली मे शनि पहले तो अपने बैठने वाले स्थान को जडता दे रहा है,शनि एक पत्थर की भांति केतु की शक्ल मे लम्बा बनाकर शनि यानी ठंडी और निवास के स्थान मे केवल कमन्यूकेशन के कारणो से पूर्ण होने के बाद व्यक्ति को लम्बा लिटाने के लिये माना जाता है। शनि के साथ केतु होने से जिस कारक मे वह अपना असर देता है उसी कारक को नकारात्मक कर देता है,जैसे इस कुंडली मे शनि चौथे भाव मे है और वह चौथे भाव की कारक वस्तुओ जीवो को अपने अनुसार फ़्रीज कर रहा है,उन्हे सहारा देने के लिये शनि अपने पराक्रम को चौथे भाव से अपने तीसरे स्थान यानी छठे भाव को देख रहा है उस भाव मे शुक्र के स्थापित होने के कारण और शुक्र का राज्य की राशि मे स्थापित होने के कारण तथा सिंह राशि को सन्तान की कारक होने के कारण पुत्री सन्तान को या पुत्र की पत्नी को अपनी सेवा के लिये अपने को आगे पीछे खिसकाने को या अपने लिये कोई सहायता लेने के लिये जरूरत मे मानता है। यह स्थान शुक्र के छठे भाव मे होने के कारण नौकरानी के लिये भी माना जाता है,और जातक की माता के लिये नौकरानी की भी जरूरत पडती है इसके साथ ही यह स्थान बीमारी का होने के कारण और बीमारी के वक्त तीमारदारी करने के लिये भी अपनी गति को प्रदान करता के प्रति माना जाता है। शनि की निगाह छठे भाव के बाद अष्टम भाव मे भी है कारण एक पांच नौ किसी भी भाव के त्रिकोण की राशियों मे गिने जाते है और जो भी ग्रह इन भावो मे होते है सम्बन्धित भाव को उसी प्रकार से देखते है जैसे कि लगन पंचम और नवम को देखा जाता है। माता के भाव से पंचम में अष्टम भाव पंचम मे है जातक की माता को जीवन मे इस शनि और केतु के कारण अपमान जोखिम और परिवार को सम्भालने के काम तथा परिवार को किसी भी प्रकार की जोखिम से दूर रखने के कामो के लिये जाना जाता है,जातक के पिता की राशि मे राहु के होने से जातक के पिता के लिये केवल इतना ही माना जा सकता है कि वह या तो शिक्षा के क्षेत्र मे अपने को जोड कर रखता है या किसी प्रकार के मनोरंजन वाले क्षेत्र मे अपने को आगे बढाने और उसी के अन्दर अपने कार्यों को करने के लिये माना जाता है,अथवा वह सरकारी संस्थाओ मे अपने कार्यों को करना जानता है। इसके अलावा सूर्य के आगे शुक्र के होने से माता के अलावा भी किसी स्त्री जातक के साथ सम्बन्ध रहने और माता के प्रति बेरुखी अपनाने के लिये भी माना जाता है,माता के द्वारा किसी शिक्षा संस्थान मे कार्य करना भी माना जा सकता है।

शनि केतु का चौथे भाव मे होना जातक की माता के लिये अच्छा नही माना जा सकता है,कारण शनि का स्वभाव नीरस होता है और अगर मंगल लगन मे चन्द्रमा के साथ होता है तो जातक की सोच मे अधिक तामसी कारण होने अर्थात जरा सी बात मे गुस्सा होने की बात को भी माना जा सकता है,इस कारण से भी जातक की माता को मानसिक रूप से कष्ट मिलने की बात मिलती है,शनि केतु के एक साथ होने से और गुरु के वक्री होने के कारण अक्सर जातक को स्त्री सन्तान के रूप मे भी माना जाता है और जातक के अगर कोई भाई होता भी है तो वह अपने परिवार से दूर जाकर अपने घर के बारे मे केवल सोचने के अलावा और कोई सहायता नही कर पाता है। राहु के गोचर के कारण जब भी जातक का राहु का राहु बारहवे भाव से गोचर करने के बाद जैसे जैसे जातक के नवे भाव की तरफ़ बढता जाता है वैसे वैसे जातक के चौथे भाव को समाप्त करने की अपनी गति को प्रदान करने की तरफ़ चलता जाता है। जैसे चौथे भाव का कारक माता को माना जाता है तो राहु जब जातक के बारहवे भाव मे आयेगा तो वह अपनी नवी द्रिष्टि से जातक की माता को पारिवारिक सोच के अन्दर ले जायेगा इस प्रकार से जातक की माता को अपने परिवार और सन्तान के भाग्य के लिये सोच पैदा हो जाती है साथ ही जातक की माता को यह चिन्ता सताने लगती है कि उसके परिवार और समाज के साथ क्या कारण बनेंगे जिसके कारण से वह अपनी औकात को कैसे दूसरे के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश करेगा,इसके बाद राहु का गोचर जब जातक के ग्यारहवे भाव मे होता है तो जातक की माता के अष्टम भाव मे यह अपनी युति को प्रदान करता है,जातक की माता के सामने कार्यों मे या आने जाने के अन्दर अथवा किसी प्रकार से घर के अन्दर की कोई दुर्घटना या कोई इन्फ़ेक्सन वाली बीमारी के द्वारा अथवा घर के सजाये संवारे जाने के दौरान जातक की माता को शारीरिक कष्टो का सामना करना पडता है,जब राहु का गोचर जातक के दसवे भाव मे होता है तो पिता की कारक वस्तुओ या पिता के स्वभाव को अक्समात ही छठे शुक्र की युति से दिक्कत देने वाला बन जाता है अथवा जातक का कार्यों की तरफ़ या किसी प्रकार से अन्य जाति की स्त्री के साथ या किसी कार्य करने वाली महिला के साथ सम्बन्ध बन जाता है इस सम्बन्ध के कारण जातक अपनी माता की देखभाल केवल बहुत बडी दिक्कत मे ही कर पाता है और जातक की माता के शरीर मे जो जडता से अपने स्थान पर पडा होता है के अन्दर कोई न कोई इन्फ़ेक्सन जो पीठ वाले होते है अथवा कोई कारण जो बिछाने वाले कपडो से सम्बन्धित होते है खराब होने लगते है और जातक के कार्य के प्रति कोई भी समय वाले काम नही माने जाते है,इसके बाद जैसे ही राहु जातक के नवे भाव मे प्रवेश करता है वह कारण अगर दूसरी या तीसरी बार राहु के नवे भाव मे आने के कारण जातक की माता के लिये यह राहु अपनी अष्टम गति चौथे भाव मे देने के लिये शोक या मृत्यु सम्बन्धी कारणो को पैदा करने वाला माना जाता है। जैसे वर्तमान मे राहु इस कुंडली मे नवे भाव मे है और माता के घर को अष्टम द्रिष्टि से देख रहा है तथा केतु का तीसरे भाव मे होना और शनि का केतु के साथ वर्तमान मे सहायक होना जातक की माता के लिये मोक्ष को देने वाला भी माना जा सकता है शनि की नजर इस राहु पर आने वाले नवम्बर के महिने तीसरे सप्ताह तक है इसलिये जातक की माता के लिये सांस की बीमारिया होने या जातक की माता को अधिक सर्दी आदि के कारण यह राहु अपनी पूरी गति को प्रदान करने के बाद जातक की माता के लिये मृत्यु जैसे कारण पैदा करने के लिये माना जा सकता है। आने वाले नौ नवम्बर की रात 12:30 से 03:30 का समय जातक की माता के लिये बहुत ही खतरनाक माना जा सकता है।
जातक की माता की सुरक्षा के लिये एक उपाय बहुत ही कारगर है कि बेसन की रोटी पर सरसों का तेल चुपड कर थोडा सा गुड उस रोटी पर रखकर जातक की माता के ऊपर सात वार उसारा करने के बाद उसे किसी काले जानवर को खिलाने से इस प्रकार का खराब असर दूर किया जा सकता है। गुरु जो बेसन का कारक है और सरसों का तेल राहु की श्रेणी मे भी आता है तथा गुड मंगल के रूप मे जो अष्टम का रूप माना जाता है,को लेकर काले जानवर यानी राहु की श्रेणी के जीव को खिलाने से बुरा असर लालकिताब के अनुसार समाप्त किया माना जाता है। इसके अलावा राहु का नवे भाव मे होने से अगर तर्पण करवा दिया जाये तो भी जातक की माता को फ़ायदा मिलने की बात मानी जा सकती है।

गुरुवार, 30 मई 2019

वात करते हैं मोदी जी प्रधानमंत्री पद की शपथ के बारे में

30 मई को नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं, 30 मई को अपरा एकादशी भी है इसका अपना धार्मिक महत्व है. अखिर क्यों मोदी अपरा एकादशी के दिन शपथ ले रहे हैं? क्या ये एक संयोग है? एकदशी तिथि के दिन शपथ होना ही शुभ है। लेकिन इस समय रात 11 बजकर 3 मिनट तक रेवती नक्षत्र का होना आगामी समय में किसी बडे़ नेता को गंभीर बीमारी होने का संकेत दे रहा है।

मित्रों जैसा कि आप जानते हैं की हर ज्योतिषी जो टीवी पर आ रहा है या राजनेताओं के साथ जुड़े हुए हैं जरुरी नहीं है कि वह अच्छे  बहुत बढ़िया  हो जिसने  भी य शाम 7:00 बजे का मुहूर्त निकाला है वह ज्यादा बढ़िया नहीं है मेरी नजर में क्योंकिउस समय 30 मई के दिन गुरुवार शाम 7 बजे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की शपथ लेने जा रहे है l प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के समय वृश्चिक लग्न का उदय हो रहा है जो की संयोग से उनका जन्म लग्न और जन्म राशि भी है

 यह तो ठीक है वृश्चिक लग्न की कुंडली में गुरु पंचमेश है और उस पर सातवें भाव से दशमेश सूर्य और अष्टमेश बुध की दृष्टि से अच्छे फल मिलने की पूर्ण संभावना बनी हुई हैपर संप्तम का सुर्य के कारण अच्छे पलों में कमी आएगी आप देखें इस समय  सातवें भाव का स्वामी शुक्र 6भाव में है यह भाव के वारे सभी ज्योतिष मित्र अच्छी तरह से जानते हैं 8वे भाव का ग्रह संप्तम में है यह भी  ठीक नहीं ऐसा कौन सा समय है जिस पर  मोदी जी प्रधानमंत्री की क्योंकि स्शपथ लेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा वह समय है

 12:01 जो कि समय सिंह लग्न बन रहा है जो कि स्थिर लग्न भी है और सूर्य बुध दशम में है बृहस्पति सुखवा में है जोगी बहुत बढ़िया योग है और चंद्रमा से भी बृहस्पति नवम भाव में है 2 ग्रह को छोड़कर बाकी सारे ग्रह केंद्र से त्रिकोण से संवन्घ रख रहे है उस समय तो निर्धारित हो चुका है तो इस पर मोदी जी क्या उपाय कर सकते हैं मोदी जी को चाहिए कि वह अपने ईस्ट के सामने 12:01 से लेकर 12:15 तक मनसे शपथ ग्रहण करें तो उनके लिए बहुत अच्छा होगा

गुरुवार, 16 मई 2019

सोते समय सिर किस दिशा में होना चाहिए और इसका विज्ञानिक रहस्य क्या है? What Is The Best Direction To Sleep ?

https://youtu.be/5QlK8Oa_lmkसोते https://youtu.be/5QlK8Oa_lmk सिर किस दिशा में होना चाहिए और  इसका  विज्ञानिक रहस्य क्या है? What Is The Best Direction To Sleep ?          

अच्छी सेहत के लिए पौष्ट‍िक आहार, योग-ध्यान के साथ-साथ नियमित दिनचर्या भी जरूरी है. दिनचर्या में सही वक्त पर नींद लेना भी शामिल है. शास्त्रों में इस बारे में बताया गया है कि सोने का सही तरीका क्या होना चाहिए.
दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना बेहतर माना गया है. ऐसी स्थ‍िति में स्वाभाविक तौर पर पैर उत्तर दिशा में रहेगा. शास्त्रों के साथ-साथ प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, सेहत के लिहाज से इस तरह सोने का निर्देश दिया गया है. यह मान्यता भी वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है.सोते समय सिर किस दिशा में होना चाहिए और इसका विज्ञानिक रहस्य क्या है? What Is The Best Direction To Sleep ?उत्तर की ओर क्यों न रखें सिर?

दरअसल, पृथ्वी में चुम्बकीय शक्ति होती है. इसमें दक्षिण से उत्तर की ओर लगातार चुंबकीय धारा प्रवाहित होती रहती हैमित्रो इसको ऐसे समझे दरअसल.हमारा दिल शरीर के निचले आधे हिस्से में नहीं है, वह तीन-चौथाई ऊपर की ओर मौजूद है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ रक्त को ऊपर की ओर पहुंचाना नीचे की ओर पहुंचाने से ज्यादा मुश्किल है।जो रक्त शिराएं ऊपर की ओर जाती हैं, वे नीचे की ओर जाने वाली धमनियों के मुकाबले बहुत परिष्कृत हैं। वे ऊपर मस्तिष्क में जाते समय लगभग बालों की तरह होती हैं। इतनी पतली कि वे एक फालतू बूंद भी नहीं ले जा सकतीं। अगर एक भी अतिरिक्त बूंद चली गई, तो कुछ फट जाएगा और आपको हैमरेज (रक्तस्राव) हो सकता है।
ज्यादातर लोगों के मस्तिष्क में रक्तस्राव होता है। यह बड़े पैमाने पर आपको प्रभावित नहीं करता मगर इसके छोटे-मोटे नुकसान होते हैं। आप सुस्त हो सकते हैं, जो वाकई में लोग हो रहे हैं। 35 की उम्र के बाद आपकी बुद्धिमत्ता का स्तर कई रूपों में गिर सकता है जब तक कि आप उसे बनाए रखने के लिए बहुत मेहनत नहीं करते। आप अपनी स्मृति के कारण काम चला रहे हैं, अपनी बुद्धि के कारण नहीं।जब आपको रक्त से जुड़ी कोई समस्या होती है, मसलन एनीमिया या रक्त की कमी तो डॉक्टर हमें क्या सलाह देता है? आयरन या लौह तत्व। यह आपके रक्त का एक अहम तत्व है। आपने पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रों (मैगनेटिक फील्ड) के बारे में सुना होगा। कई रूपों में अपनी चुंबकीयता के कारण पृथ्वी बनी है। इसलिए इस ग्रह पर चुंबकीय शक्तियां शक्तिशाली हैं।अगर आप उत्तर की ओर सिर करते हैं और 5 से 6 घंटों तक उस तरह रहते हैं, तो चुंबकीय खिंचाव आपके दिमाग पर दबाव डालेगा।
जब शरीर क्षैतिज अवस्था में होता है, तो आप तत्काल देख सकते हैं कि आपकी नाड़ी की गति धीमी हो जाती है। शरीर यह बदलाव इसलिए लाता है क्योंकि अगर रक्त उसी स्तर पर पंप किया जाएगा, तो आपके सिर में जरूरत से ज्यादा रक्त जा सकता है और आपको नुकसान हो सकता है। अब अगर आप अपना सिर उत्तर की ओर करते हैं और 5 से 6 घंटों तक उसी अवस्था में रहते हैं, तो चुंबकीय खिंचाव आपके दिमाग पर दबाव डालेगा। अगर आप एक उम्र से आगे निकल चुके हैं और आपकी रक्त शिराएं कमजोर हैं तो आपको रक्तस्राव और लकवे के साथ स्ट्रोक हो सकता है।या अगर आपका शरीर मजबूत है और ये चीजें आपके साथ नहीं होतीं, तो आप उत्तेजित या परेशान होकर जाग सकते हैं क्योंकि सोते समय दिमाग में जितना रक्त संचार होना चाहिए, उससे ज्यादा होता है। ऐसा नहीं है कि एक दिन ऐसा करने पर आप मर जाएंगे। मगर रोजाना ऐसा करने पर आप परेशानियों को दावत दे रहे हैं। आपके साथ किस तरह की परेशानियां हो सकती हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि आपका शरीर कितना मजबूत है।

तो किस दिशा में सिर करके सोना सबसे अच्छा होता है? पूर्व सबसे अच्छी दिशा है। पूर्वोत्तर ठीक है। पश्चिम चलेगा। अगर कोई विकल्प नहीं है तो दक्षिण। उत्तर बिल्कुल नहीं। जब तक आप उत्तरी गोलार्ध में हैं, यही सही है – उत्तर के अलावा किसी भी दिशा में सिर करके सोया जा सकता है। दक्षिणी गोलार्ध में, दक्षिण की ओर सिर करके न रखें। सुबह उठते समय आप  अपनी दायीं तरफ घूमें और फिर बिस्तर से बाहर आएं, क्योंकि नींद से उठते समय मेटाबोलिक प्रक्रिया बहुत धीमी होती है। ऐसे में अचानक से बिस्तर छोड़ने पर दिल पर दबाव पड़ेगा।औरसुबह बिस्तर से उठने से पहले अपने हाथों को मसलें और अपनी हथेलियों को अपनी आँखों पर लगाएं। हथेलियों को मसलने से हाथों में स्थित सभी नाड़ियां सक्रीय हो जाती हैं और आपका सिस्टम जल्दी से सजग हो जाता है।पारंपरिक रूप से आपसे यह भी कहा जाता है कि सुबह उठने से पहले आपको अपनी हथेलियां रगड़नी चाहिए और अपनी हथेलियों को अपनी आंखों पर रखना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा करने पर आपको भगवान दिख सकते हैं। इसका संबंध भगवान के दिखने से नहीं है।हमारे हाथों में नाड़ियों का एक भारी जाल है। अगर  हम  अपनी हथेलियां रगड़ते हैं, तो सभी नाड़ियां सक्रिय हो जाती हैं और शरीर तत्काल सजग हो जाता है। सुबह जगने पर भी अगर आप  सुस्त महसूस करते हैं, तो ऐसा करके देखिए, आपका पूरा शरीर तत्काल सजग हो जाएगा। तत्काल आपकी आंखों और आपकी इंद्रियों के दूसरे पहलुओं से जुड़ी सारी नाड़ियां सजग हो जाती हैं। शरीर को हिलाने से पहले आपका शरीर और दिमाग दोनों सक्रिय होने चाहिए। आपको सुस्त नहीं उठना चाहिए, इसका मकसद यही है।

रविवार, 28 अप्रैल 2019

गुण मिलान या कुंडली मिलान

गुण मिलान या कुंडली मिलान आज के कंप्यूटर के युग में बहुत सामान्य की बात हो गयी है हर दूसरा जातक अपने कंप्यूटर पर सॉफ्टवेर के माध्यम से कुंडली मिलान कर बोल देता है

की इनके तो 28 गुण मिल गए या 33 गुण मिल गए अब विवाह में कोई व्यवधान नहीं आएगा आगे बात की जा सकती है मंगल दोष को भी अधिकतर ज्योतिष के सॉफ्टवेर बता ही देते है भकुट और नाडी दोष के बारे में भी सभी सॉफ्टवेर में दिया ही होता है एसे में जातक अपने आप में ही संतुष्ट हो जाता है ये अवस्था तब है जब गुण 26 से ऊपर मिले होते है इसके विपरीत यदि कभी 12या 14गुण मिलते है तो जातक आपनी ही बात से पलट जाते है हम कुंडली मिलान को विशेष महत्त्व ही नहीं देते कुंडली कुछ नहीं होती सिर्फ अपनी सोच है एसे में क्या तत्व दर्शन जातक को अपने पार्टनर का सही चुनाव देने में संभव है तो तो आंशिक रूप से खुद को ही छलावा देना हुआ गणितीय आकडे तो हर सॉफ्टवेर से आसानी से निकल आते है कुंडली मिलान इतना आसान नहीं होता जितना की एक जातक समझता है हर विषय को गंभीरता से जब तक न लिया जाये सही उत्तर मिलना आसान नहीं होते एसे में विवाह तो हो जाते है पर कितने समय तक चलेगे ये अपने आप में प्रश्न चिन्ह बन जाता है वाहिक बंधन जीवन का सबसे महत्वपूर्ण बंधन है। विवाह प्यार और स्नेह पर अधारित एक संस्था है। यह वह पवित्र बंधन है, जिसपर पूरे परिवार का भविष्य निर्भर करता है। समान्यत: कुंडली में अष्ट कुट एवं मांगलिक दोष ही देखा जाता है, लेकिन यह जान लेना अनिवार्य है कि कुंडली मिलान की अपेक्षा कुंडली की मूल संरचना अति महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति में बाहरी आकर्षण तो हो सकता है, लेकिन भीरत से वह पत्थर हृदय वाला और स्वार्थी भी हो सकता है, जाहिर है कि कुंडली की विस्तृत व्याख्या अनिवार्य मानी जाती है। कुंडली के बारह भावों में सप्तम भाव दांपत्य का है, इस भाव के अलावे आयु, भाग्य, संतान, सुख, कर्म, स्थान का पूर्णत: विश्लेषण एक सीमा में अनिवार्य है। नवमांश कुंडली सप्तांश, चतुर्विशांश, सप्तविशांश के अलावा रोग के लिए त्रिशांश कुंडली भी देखी जाती है। लड़कों के लिए शुक्र एवं लड़कियों के लिए गुरु कारक ग्रह है, इसकी स्थिति देखना अनिवार्य है। पुन: गुरु से सप्तम, चंद्र से सप्तम एवं सप्तम भाव के अधिपति की शुभ स्थिति देखी जाती है। शुक्र जो की व्यक्तिगत जीवन का करक है उसकी स्थिति देखे. मांगलिक होने पर मंगल की शक्ति भी देखे, कई बार मांगलिक होने पर भी मंगल का बुरा असर नहीं पड़ता क्यूंकि मंगल बलहीन होता है. . संतान भाव की स्थिति और सम्बंधित ग्रहों का अध्ययन भी अलग से करें . विवाह स्थान और सम्बंधित ग्रहों का अध्ययन करे. कुंडली में मौजूद अच्छे योगो का अध्ययन भी करे. दोनों की कुंडली में मौजूद बुरे योगों का अध्ययन भी करें और उसका समाधान निकाले. लग्न की स्थिति का भी पूरा अध्ययन जरुरी है. इसी के साथ चन्द्र कुंडली, नवमांश कुंडली आदि का अध्ययन भी जरुरी है. अतः किसी भी निष्कर्ष पर ऐसे ही मत पहुचे, अच्छे रिश्तो को ऐसे ही मत छोड़ दीजिये. याद रखे –स्वगृही, मित्रगृही या उच्च हो उसे शुभ ग्रह कहते हैं और कारक और अकारक को भी देखना चाहिए आजकल शादी में सिर्फ लड़की का रूप-रंग ही देखा जाता है, जबकि सामान्य कद-काठी और रूप-रंग के बच्चे भी यदि अत्यंत भाग्यशाली हुए, तो घर की स्थिति उत्तरोत्तर अच्छी होती जाती है और घर में चार चांद लग जाते हैं। कई मामलों में मांगलिक दोष भी भंग हो जाता है, लेकिन उसे मांगलिक मान लिया जाता है और शादियां कट जाती हैं।किसी भी कुंडली में हर ग्रह भाव राशि की एक विशेष अवस्था होती है जो जातक की जीवन की प्रकृति का निर्माण करती है एसे में दो जातको की कुंडली को देख कर उसके सामान्य और असामान्य क्रम को देखना और जीवन की अवस्था में बदलव पर दोनों के स्थायित्व को देखने का क्रम ही कुंडली मिलान होता है चंद्र की अवस्था का आकलन ही 36 गुणों में अभिव्यक्त किया गया है जो सही मायेने में सही भी है चंद्र जातक के मन का कारक है चंद्र की विशिष्ट अवस्थाओ के आधार पर दो कुंडलियो में गुण दोषों को देखा जाता है ये सामान्य रूप से बहुत हद तक सही भी है ज्योतिष में मंगल को भी विवाह के समय विशेष रूप से देखा जाता है मंगल के अच्छा होने पर विघ्न कम आते है एसा माना गया है जबकि वास्तविकता कितनी है ये अनुभवी जन ही जानते है इस क्रम में कुछ एसे विषयों को जोड़ना चाहुगा जिसको सामान्य जन नहीं जानते और न ही विवाह के समय उतना विचार करते है जातक की कुंडली में सप्तम भाव जीवन साथी बसका होता है इसके स्वामी का अस्त होना क्रूर ग्रह सूर्य के साथ होना, राहू या केतु के साथ होना सप्तम भाव पर गुरु या शुक्र की द्रष्टि न होना, मंगल या शनि की द्रष्टि होना जातक के वैवाहिक जीवन में नीरसता लाता है हमारे ज्योतिषीय जीवन में अनेकानेक विचित्र अनुभव होते रहे हैं। कुछ महानुभाव ऐसे भी आते हैं, जो कहते हैं कि मेरी कन्या के लिए एक अच्छा रिश्ता आया है। कृपा करके कुण्डली मिला दें। वर-कन्या की कुण्डली मिलाने से उनका आशय केवल इतना होता है कि आप गुण मिलान कर दें,बाकी वेस्वयंनिपटालेगे ये पूरी तरह हास्यपद बात होने के साथ ही उनके अल्पज्ञान का प्रदर्शन भी है।किंतु गांव-गिरांव और कस्बाई इलाकों में महानुभाव पंडितों ने अपने पेशेवर अन्दाज के कारण लोगों को भ्रम में डाला और मेट्रो शहरों के सिलेब्रिट्री ज्योतिर्विदों ने अंधाधुंध कमाई के चक्कर में सच को सामने आने ही नहीं दिया। केवल गुण मिलान के कारण लाखों दाम्पत्य जीवन पूरी तरह बर्बाद हो जाते हैं। छत्तीस गुणों में से कम से कम सोलह गुण मिल गए और वर-कन्या का आंख मूंदकर विवाह सम्पन्न करा दिया जाता है। भोगते तो बेचारे वे हैं जो अब शादी के वचन में व`घ गयै। जन्मकुंडली मिलान करने के पुरा समय लगना चाहिए यदि ज्योतिषाचार्य आपको पांच मिनट में कुंडली मिलान करके दे देते हैं तो यह चिंता का विषय है | सबसे पहले जन्म लग्न से जातक जातिका के चरित्र का पता चलता है | चरित्र सबसे पहले हैं बाकी चीजें बाद की हैं | लग्न के बाद राशी और फिर होरा चक्र देखा जाता है | मांगलिक दोष है या नहीं यह सुनने में आसान लगता है परन्तु कई बार गलती से मांगलिक की अमांगलिक से शादी करवा दी जाती है | मांगलिक योग की तीव्रता में यदि 70 से अधिक अंकों का फर्क हो तो कुंडली मिलान उत्तम नहीं है | जन्मकुंडली का पांचवां घर यह बता सकता है कि भावी पति / पत्नी के भविष्य में संतान सुख है या नहीं | इस पर विचार वे लोग कर सकते हैं जो शादी केवल संतान की इच्छा से करना चाहते हैं | कई बार वंश को आगे बढाने के लिए दुबारा शादी की जाती है | आज भी कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जो संतान सुख से वंचित हैं और रजामंदी से दुसरे विवाह के लिए प्रयासरत रहते हैं | अजीब लगेगा परन्तु यह सुनिश्चित कर लें कि एक से अधिक विवाह का योग तो नहीं है ? आयु का विचार ज्योतिष में निषिद्ध है परन्तु मैं मानता हूँ कि यदि कुछ ऐसा दिखाई दे तो संकेत अवश्य दिया जा सकता है | अब मिलान की बारी आती है | कुंडली मिलान करते समय ऊपर लिखे सभी सिद्धांत यदि ध्यान में रखे जाएँ तो उत्त्तम जीवन साथी आपको अवश्य मिलेगा | मैं दावे से कह सकता हूँ कि उपरोक्त बातें सुनिश्चित करने के बाद तलाक जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है | यदि हर व्यक्ति ज्योतिष के नियमों का पालन करता है तो आने वाले समय में वैवाहिक समस्याओं पर किसी अदालत में कोई केस नहीं बचेगा 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सोमवार, 15 अप्रैल 2019

पीपल का वृक्ष और वैज्ञानिक रहस्य

🌹पीपल का वृक्ष देवता कहा जाता है 🌹पीपल का वृक्ष हिन्दू धर्म में सबसे पवित्र माना जाता है. मुख्य रूप से इसको भगवान विष्णु का स्वरूप मानते हैं. इसके पत्तों, टहनियों यहां तक कि कोपलों में भी देवी-देवताओं का वास माना जाता है. कहा जाता है कि पीपल के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और शीर्ष में शिव जी निवास करते हैं.

शाखाओं, पत्तों और फलों में सभी देवताओं का निवास होता है. यह प्राकृतिक और आध्यात्मिक रूप से इतना महत्वपूर्ण है कि भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि, "वृक्षों में मैं पीपल हूं". वैज्ञानिक रूप से पीपल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बहुत ऑक्सीजन पैदा करता है.

हिन्दू धर्म में पीपल के पेड़ का बहुत महत्व होता है. इसे न केवल धर्म संसार से जोड़ा गया है, बल्कि वनस्पति विज्ञान और आयुर्वेद के अनुसार भी पीपल का पेड़ कई तरह से फायदेमंद माना गया है. लुकमान के जीवन मे उल्‍लेख है कि एक आदमी को उसने भारत भेजा आयुर्वेद की शिक्षा के लिए और उससे कहा कि तू बबूल के वृक्ष के नीचे सोता हुआ भारत पहुच। और किसी दूसरे वृक्ष के नीचे न तो आराम करना और न ही सोना। वह आदमी जब तक भारत आया, क्षय रोग से पीड़ित हो गया था। कश्‍मीर पहुंचकर उसने पहले चिकित्‍सक को कहा कि मैं तो मरा जा रहा हूं। मैं तो सीखने आया था आयुर्वेद, अब सीखना नहीं है। सिर्फ मेरी चिकित्‍सा कर दें। मैं ठीक हो जाऊं तो अपने घर वापस लोटू। उस वैद्य न उससे कहा, तू किसी विशेष वृक्ष के नीचे सोता हुआ तो नहीं आया?

उस आदमी ने तपाक से कहा: हां मुझे मेरे गुरु ने आज्ञा दी थी कि तू बबूल के वृक्ष के नीचे सोता हुआ जाना।

वह वैद्य हंसा। उसने कहा, तू कुछ मत कर। तू अब नीम के वृक्ष के नीचे सोता हुआ वापस लौट जा।‘’ वह नीम के वृक्ष के नीचे सोता हुआ वापस लौट गया। वह जैसा स्‍वास्‍थ चला था, वैसा स्‍वास्‍थ लुकमान के पास पहुंच गया।

लुकमान ने उससे पूछा: ‘’तू जिन्‍दा लौट आया, अब आयुर्वेद में जरूर कोई राज है।"

उसने कहा: ‘लेकिन मैंने कोई चिकित्‍सा नहीं की।'

लुकमान ने कहा: इसका कोई सवाल नहीं है। क्‍योंकि मैंने तुझे जिस वृक्ष के नीचे सोते हुए भेजा था। तू जिन्‍दा लौट नहीं सकता था। तू लौटा कैसे। क्‍या किसी और वृक्ष ने नीचे सोत हुआ लौटा है।

उसने कहा: ‘ मुझ आज्ञा दी कि अब बबूल से बचूं। और नीम के नीचे सोता हुआ लौट जाऊं। तो लुकमान ने कहा कि वह भी जानते है।असल में बबूल सक-अप करता है एनर्जी को। आपकी जो एनर्जी है, आपकी जो प्राण ऊर्जा है, उसे बबूल पीता है। बबूल के नीचे भूलकर मत सोना। और अगर बबूल की दातुन की जाती रही है तो उसका कुल कारण इतना है कि बबूल की दातुन में सर्वाधिक जीवन एनर्जी होती है। वह आपके दांतों को फायदा पहुंचा देती है। क्‍योंकि वह पाता रहता है। जो भी निकलेगा पास से वह उसकी एनर्जी पी लेता है। नीम आपकी एनर्जी नहीं पीता है। बल्‍कि अपनी एनर्जी आपको दे देता है। अपनी ऊर्जा आप पर उड़ेल देता है।लेकिन पीपल के वृक्ष के नीचे भी मत सोना। क्‍योंकि पीपल का वृक्ष ज्‍यादा एनर्जी उड़ेल देता है कि उसकी वजह से आप बीमार पड़ जाएंगे। पीपल का वृक्ष सर्वाधिक शक्‍ति देने वाला वृक्ष है। इसलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि पीपल का वृक्ष बोधि-वृक्ष बन गया, उसके नीचे लोगों को बुद्धत्‍व मिला। उसका कारण है कि वह सर्वाधिक शक्‍ति दे पाता है। वह अपने चारों और से शक्‍ति आप पर लुटा देता है। लेकिन साधारण आदमी उतनी शक्‍ति नहीं झेल पाएगा। सिर्फ पीपल अकेला वृक्ष है पृथ्‍वी पर जो रात में भी और दिन में भी पूरे समय शक्‍ति दे रहा है। इसलिए उसको देवता कहा जाने लगा। उसकी और कोई कारण नहीं है। सिर्फ देवता ही हो सकता है जो ले न और देता ही चला जाए। लेता नहीं, लेता ही नहीं देता ही चला जाता है।


यह जो आपके भीतर प्राण ऊर्जा है, इस प्राण-ऊर्जा को…यही आप है

गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

महामृत्युंजय मंत्र


महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का एक श्लोक है.शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित ये महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है.स्वयं या परिवार में किसी अन्य व्यक्ति के अस्वस्थ होने पर मेरे पास अक्सर बहुत से लोग इस मन्त्र की और इसके जप विधि की जानकारी प्राप्त करने के लिए आते हैं. इस महामंत्र के बारे में जहांतक मेरी जानकारी है,वो मैं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ महामृत्युंजय गायत्री संजीवनी मंत्र ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ त्रयंबकंयजामहे ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान ऊँ धियो योन: प्रचोदयात ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ अक्सर हम लोग घर मे ईसका पाठ करवाते है यातो विमारी से छुटकारा पाने के लिऐ या गृह पिङा शांत करने के लिऐ मित्रो पर वात फिर भी नही वनती कभी सोचा है आपने इस मंत्र का फल क्यो नही मिलता हजारो रुपऐ खर्च करने के वाद भी कई कारण है मित्रो यह विघा मुझे वहुत कठीन प्रयास के वाद ऐक पहुचे हुऐ सिद्ध तपस्वी योगी जी से मिली यह मेरी खुशाकिस्मती है पहला कारण इसमें ऐक वीज मंत्र- कम है यानी पासवर्ङ छुपा दिया गया जो जानकारी कर्मकांड करने वाले पंङित ओर पुजारी लोगो को पता नही दुसरा इसमें आचरन की शुद्धि तथा तपोवल की वहुँत जरुरत है तीसरा खुद की सिद्दि जी यह मंत्र जव तक किसा का सिद्द नही तव तक काम नही करेगा वस आपको तसल्ली हो जाती है कि आपने सवा लाख का जाप करवा लिया अव हमारे योगीयो ने वो वीज इस लिऐ छुपा दिया क्योकि इस मंत्र मे वहुँत शक्ति है ओर इसका गलत प्रयोग भी हो सकता है दुसरा कारण शांत वातावरन ओर ऐकान्त या घ्यान लग जाऐ ओर यह सव रात के समय ही संभव है पुजारी लोग सिर्फ कर्मकांङ पर ही घ्यान देते है वस ओर कुछ नही यह मंत्र जाप मानसिक ओर घ्यान से सम्वघित है पर कलयुग का वोलवाला है दोस्तो सच ना तो कोई सुनना चाहता है ना मानना पुरी पोस्ट पङ कर कुछ लोगो को वुरा लग सकता है पर सच तो सच ही है वाते तो ओर भी इसके सम्वन्घ मे पर आज नही आचार्य राजेश

सिद्धकुंजिकास्तोत्रम

: सिद्धकुंजिकास्तोत्रम ****** स्वयं बाबा भोलेनाथ ने इस भूलोक में ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए एक महाकुंजिका स्तोत्र की रचना अपने मुख से की । जो भक्त इस मंत्र को नित्य उनका ध्यान करके पढ़ेगा, उसे इस संसार में धन-धान्य, समृद्धि, सुख-शांति और निर्भय जीवन व्यतीत करने के समस्त साधन प्राप्त होंगे। यह एक गुप्त मंत्र है।

 इसके पाठ से भक्त के ऊपर किया हुआ समस्त व्यभिचार कर्म स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं | इसके पाठ से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि उद्देश्यों की भी पूर्ति होती है। इसके पाठ से सम्पूर्ण दुर्गाशप्तशती के पाठ का फल प्राप्त होता है | यह मंत्र कुछ इस तरह हैः--- शिव उवाच शृणु देवी प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम | येन मन्त्रप्रभावेण चंडीजापः शुभो भवेत || १ || न कवचं नार्गालास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम | न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम || २ || कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत | अति गुह्यतरं देवी देवानापि दुर्लभम || ३|| गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वती | मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम | पाठमात्रेण संसिद्ध्येत कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम || ४ || अथ मन्त्रः -- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चमुण्डायै विच्चे।। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।। नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी । नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ।। नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे । ऐंकारी सृष्टिरूपायै, ह्रींकारी प्रतिपालिका।। ३ || क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तु ते । चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ।। धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी । क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरू ।। हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नम: ।। अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरू कुरू स्वाहा ।। पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।। म्लां म्लीं, म्लूं मूल विस्तीर्ण कुन्जिकाए नमो नमः सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरूष्व मे ।। इदं तु कुंजिका स्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे | अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वती || यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् । न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ।।... कम से कम 20 बार पहले बोल चुका फिर कहता हूं इस मां के कुंजिका स्तोत्र के 21 पाठ रोज करना शुरू कर दें फिर इसका प्रभाव 3 महीने के बाद दिखना शुरु हो जाएगा जय माता दी

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

तंत्र-विद्या (Tantra)

https://youtu.be/rLabGPgeiFUतंत्र हमारे प्राचीन हिन्दु-शास्त्रों में कुंडलिनी साधना' का उल्लेख आता है। ऐसे प्राचीन ग्रंथों में साधना के कई मार्ग दिखाए गए हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने हमारे शरीर के भीतर छह चक्रों की खोज की थी। वे छह चक्र क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि तथा आज्ञा चक्र हैं। मूलाधार चक्र में एक सर्पिणी ढाई कुंडल मारकर बैठी रहती है, जिसे कुंडलिनी कहते हैं। हमारे मेरुदण्ड में तीन मुख्य नाडियाँ होती हैं, इडा, पिंगला और सुषुम्ना। जैसे-जैसे योगाभ्यास द्वारा जब कुंडलिनी जागृत होकर इन छह चक्रों का भेदन करती हुई आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे साधक को तरह-तरह की सिद्धियाँ प्राप्त होती जाती है। अंत में कुंडलिनी आज्ञा चक्र को भेदते हुए सहस्रार बिंदुजिसे कुछ साघक सातव चक्र पर पहुँच जाती है तो वहाँ साधक को आलौकिक ज्ञान की प्राप्ति होने लगती है. यही एक बार इंसान की ऊर्जा सहस्रार तक पहुँच जाती है,
www.acharyarajesh.in तो वह पागलों की तरह परम आनंद में झूमता है। अगर आप बिना किसी कारण ही आनंद में झूमते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी ऊर्जा ने उस चरम शिखर को छू लिया है।दरअसल, किसी भी आध्यात्मिक यात्रा को हम मूलाधार से सहस्रार की यात्रा कह सकते हैं। यह एक आयाम से दूसरे आयाम में विकास की यात्रा है, इसमें तीव्रता के सात अलग-अलग स्तर होते हैं। आपकी ऊर्जा को मूलाधार से आज्ञा चक्र तक ले जाने के लिए कई तरह की आध्यात्मिक प्रक्रियाएं और साधनाएं हैं, लेकिन आज्ञा से सहस्रार तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। कोई भी एक खास तरीका नहीं है। आपको या तो छलांग लगानी पड़ती है या फिर आपको उस गड्ढे में गिरना पड़ता है, जो अथाह है, जिसका कोई तल नहीं होता। इसे ही ‘ऊपर की ओर गिरना‘ कहते हैं। योग में कहा जाता है कि जब तक आपमें ऊपर की ओर गिरने’ की ललक नहीं है, तब तक आप वहां पहुँच नहीं सकते।यही वजह है कि कई तथाकथित आध्यात्मिक लोग इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि शांति ही परम संभावना है, क्योंकि वे सभी आज्ञा में ही अटके पडे़ हैं। वास्तव में शांति परम संभावना नहीं है। आप आनंद में मग्न हो सकते हैं, इतने मग्न कि पूरा विश्व आपके अनुभव और समझ में एक मजाक जैसा लगने लगता है। जो चीजें दूसरों के लिए बड़ी गंभीर है, वह आप के लिए एक मजाक होती है।लोग अपने मन को छलांग के लिए तैयार करने में लंबे समय तक आज्ञा चक्र पर रुके रहते हैं। यही वजह है कि आध्यात्मिक परंपरा में गुरु-शिष्य के संबधों को महत्व दिया गया है। उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि जब आपको छलांग मारनी हो, तो आपको अपने गुरु पर अथाह विश्वास होना चाहिए। 99.9 फीसदी लोगों को इस विश्वास की जरूरत पड़ती है, नहीं तो वे छलांग मार ही नहीं सकते। यही वजह है कि गुरु-शिष्य के संबंधों पर इतना महत्व दिया गया है, क्योंकि बिना विश्वास कोई भी कूदने को तैयार नहीं होगा।

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...