रविवार, 13 अक्टूबर 2019

ग्रहों के उपाय



मित्रों ज्योतिष मे ग्रहों का रूप अलग अलग बताया गया है,ग्रह प्रयक्ष और अप्रतक्ष रूप से अपना असर देते है।ज्योतिषी अपने अपने ज्ञान के अनुसार ग्रह के खराब होने के उपाय बतलाते है। अलग अलग ग्रहो के अलग अलग उपाय बताये जाते है,लोग अपनी अपनी कुंडली लेकर ज्योतिषियों के पास जाते है अपने बारे मे पूंछते है,ज्योतिषी द्वारा कुंडली को देखा जाता है जो भी ग्रह अपना खराब असर दे रहा होता है उसी के अनुसार गणना करने के बाद उपाय बता दिया जाता है। लेकिन उपाय हमेशा के लिये नही होते है,उपाय कुछ समय के लिये करने के लिये कहा जाता है। कारण ग्रह नुकसान का देने वाला होता है वही ग्रह कुछ समय बाद फ़ायदा देने के लिये भी माना जाता है,जो ग्रह फ़ायदा देता है वही ग्रह कुछ समय बाद नुकसान देने के लिये भी अपनी क्रिया को शुरु कर देता है। यह बात और भी मानी जा सकती है कि जैसे ड्राइवर अपनी योग्यता के सहारे ही गाडी को चलाता है,कभी कभी वही योग्यता भी खतरनाक बन जाती है और वही गाडी जो वह आराम से सम्भाल सकता है उसकी जान लेने के लिये भी अपना काम करती है। महावत जिस हाथी को चलाने की सामर्थ्य रखता है वही हाथी जब अपनी पर आता है तो पहले वह अपने महावत को ही मारता है,उसी प्रकार से जो सपेरा सांप को पालता है और सांपो के द्वारा ही अपने जीवन को चलाना जानता है कभी कभी वही सांप उसकी मौत का कारण बन जाता है,जो तांत्रिक अपने तंत्र से सभी को वश मे करने के बाद अपने द्वारा प्राप्त की गयी आसुरी शक्तियों का प्रयोग करता है लेकिन वही तांत्रिक अपने द्वारा पाली गयी आसुरी शक्तियों से ही मारा जाता है। तो यह जरूरी नही है कि जो कारक फ़ायदा दे रहा है वह नुकसान नही दे,इसलिये हमेशा ख्याल यह रखकर चलना चाहिये कि अगर आज सूर्य नुकसान दे रहा है तो वह हमेशा ही नुकसान देता रहेगा वह फ़ायदा भी देगा,लेकिन फ़ायदा के समय मे भी नुकसान वाला उपाय किया जाता रहा तो वह बजाय फ़ायदा के नुकसान भी देने लगेगा। इस बात के लिये लोगो को भ्रम मे डाल दिया जाता है कि यह सूर्य आजीवन परेशान करने वाला है और उसका उपाय आजीवन करना चाहिये।सबसे पहले जिन्दा ग्रहों का उपाय करना जरूरी होता है,पिता से बिगड गयी है तो समझ लीजिये सूर्य खराब है बेटा कहे मे नही चल रहा है और ऊल जलूल काम करने के बाद घर मे क्लेश को फ़ैला रहा है तो समझ लीजिये कि सूर्य खराब है,सभी ग्रह अपना खराब तभी देते है जब कोई न कोई खराब ग्रह उस ग्रह से अपनी युति लेता है जैसे बेटा घर मे क्लेश फ़ैला रहा है तो देखना यह पडेगा कि बेटे को शनि या राहु या केतु जैसे कारक साथ मे लेकर चलने की आदत तो नही पड गयी है,कही पिता के पास भी इसी प्रकार के कारक तो नही शुरु हो गये है। सूर्य के साथ शनि का मिलना हो गया होगा तो वह सूर्य की चमक को धीमा कर देगा जो सूर्य की गर्मी है उसे ठंडा कर देगा,इस शनि को दूर करने के लिये सूर्य के बल मे बढोत्तरी करनी पडेगी उसे शनि के कारको से दूर करना पडेगा,सूर्य जो शरीर मे बल का कारक है अपनी पहिचान को देने वाला है अगर वह शनि के तामसी कारणो मे मिल जायेगा तो शरीर की चमक समाप्त होने लगेगी,अगर शरीर मे कई प्रकार के रोग लग गये है तो भी सूर्य का धीमा हो जाना माना जायेगा.लेकिन सूर्य के खराब होने के पहले चन्द्रमा को भी देखना पडेगा जब तक चन्द्रमा पर कोई ग्रह अपना असर नही देगा सूर्य खराब नही हो सकता है,चन्द्र यानी मन पर कोई कारण नही आने पर सूर्य का खराब होना नही माना जाता है,जैसे मन मे किसी प्रकार की शंका आ गयी है और वह शंका समाप्त नही हो रही है जब तक मन की शंका को दूर नही किया जायेगा शरीर का सूर्य व्यवस्थिति नही हो सकता है। जैसे चन्द्रमा के साथ मंगल का प्रकोप शुरु हो जाये तो माता को गुस्सा आना शुरु हो जायेगा और माता जब गुस्सा करेगी तो पिता का दैनिक क्लेश के कारण तामसी कारणो मे जाना जरूरी हो जायेगा,उसी प्रकार से जब बेटे की मां घर मे क्लेश नही करेगी या बेटे पर अनावश्यक कारण नही थोपेगी बेटा तामसी कारणो मे नही जायेगा। यह उम्र और जलवायु के कारण भी होता है,जब तक इन सभी बातो का ख्याल नही किया जायेगा तब तक कोई भी कारण क्लेश का नही बनेगा। समस्या आने के पहले समस्या की हवा चलनी शुरु हो जाती है। जैसे कोई एक्सीडेंट होना है तो पहले एक्सीडेंट करने वाला कारण शुरु हो जायेगा फ़िर एक निश्चित स्थान पर दोनो कारण जब इकट्ठे होंगे तभी एक्सीडेंट होगा,बिना कारण की उत्पत्ति के एक्सीडेंट नही हो सकता है। राहु अब ही सूर्य के साथ गोचर करेगा उस समय पिता या पुत्र के प्रति अनावश्यक सोच का आना माना जायेगा,उस सोच का रास्ता नही मिलने पर शरीर मे कई प्रकार के रोग लगने शुरु हो जायेंगे वह रोग या तो चिन्ता से बाहर जाने के प्रति होंगे या अचानक आने वाली विपत्ति से बचने के लिये सोचे जाने वाले उपाय होंगे उपाय नही मिलने पर सूर्य अपने को समय के घेरे मे ले जाकर तामसी कारणो मे शुरु हो जायेगा उसे चिन्ता होगी कि अमुक समय पर अमुक कारण बन सकता है उतने समय के लिये वह अगर अपने को अपने से बाहर रखेगा तो वह बच सकता है या उस समय पर उसे कुछ भी कहने या सुनने अथवा कार्य को करने मे असमर्थ होना पडेगा इसलिये वह अपने को उस कारण से दूर रखकर ही चलना ठीक होगा इसलिये वह अपने शराब आदि तामसी कारणो मे लेकर चला जायेगा या अपनी समस्या से छुटकारा लेने के लिये किसी अनावश्यक कारण को पकडने और अपनी समस्या से दूर जाने का उपक्रम रचने लगेगा,उस समय अगर केतु का सहारा मिल जाता है और उसकी कार्य प्रणाली को सहायक बनकर हल कर दिया जाता है तो सूर्य डूबने से बच भी जायेगा और समस्या का अन्त भी हो जायेगा। बेटा अगर बाप से बनाकर चलता है तो दोनो का सूर्य हमेशा के लिये ही उदय रहेगा जैसे ही बाप बेटे मे किसी भी बात से अनबन हो गयी दोनो का सूर्य खतरे मे चला जायेगा,इसी प्रकार से जब तक सूर्य यानी सरकार के कानूनो और मर्यादाओ का पालन किया जाता रहेगा शरीर के सूर्य पर कोई दिक्कत नही आयेगी जैसे ही अहम के अन्दर आकर या शनि सम्बन्धित चतुराई को लाकर अपने को सरकार के समक्ष पेश किया गया सरकार शरीर के सूर्य पर कारावास या किसी प्रकार के दंड देने की प्रक्रिया से सूर्य को ग्रहण दे देगी। एक कहावत और भी सुनी होगी कि लोहा लोहे को ही काटता है इसी प्रकार से बाप बेटे की अनबन बाप और बेटे दोनो को ही काट देती है,इसलिये पहले अपने सूर्य को सही रखने के लिये अपने पिता और अपने पुत्र से कभी अनबन बनाकर नही रखना चाहिये इस प्रकार से जिन्दा ग्रह के साथ मित्रता करने के बाद चालीस प्रतिशत तक लाभ लिया जा सकता है बाकी का अपने कार्यों से रत्न धारण करने से और सूर्य वाली मर्यादा को निभाने से भी सूर्य अपना काम करता रहेगा।शनि को कुंडली मे बडे भाई की उपाधि से विभूषित किया गया है वही शनि बुजुर्ग की हैसियत से भी अपने को सामने रखता है। बडे भाई और पुत्र का साथ शनि सूर्य की युति मे लेकर जायेगा अगर इस कारण मे केवल केतु का सहारा लिया जाता रहेगा तो बडे भाई के द्वारा पुत्र को सहारा मिलता रहेगा और पुत्र अपनी मर्यादा से बाहर नही जायेगा लेकिन बीच मे शुक्र का आना हो गया तो सूर्य और शनि दोनो ही बरबाद हो जायेंगे,जैसे बडे भाई के द्वारा पुत्र को किसी प्रकार की सहायता दी जाती है वह सहायता तभी तक सही मानी जायेगी जब तक बीच मे लेन देन का कारण नही पैदा होता है यही बात इस प्रकार से भी मानी जा सकती है कि जब घर की औरतो मे सूर्य पैदा हो जायेगा तो एक दूसरे के प्रति राजनीति की बाते पैदा हो जायेंगीऔर कहा जाने लगेगा कि अमुक समय मे अमुक प्रकार की सहायता उन्हो ने नही की थी लेकिन हमने सहायता की थी इस प्रकार से मानसिक कष्ट का कारण पैदा होगा और हो सकता है सूर्य खराब हो जाये यानी पुत्र अपनी सहायता बडे भाई से लेना बन्द कर दे या बडा भाई अपनी दी जाने वाली सहायता को बन्द कर दे,इसी प्रकार से जब घर मे शादी सम्बन्ध वाले कारण बनते है और उस समय अगर सूर्य शनि की मान्यता को कायम नही रखा गया तो भी एक दूसरे के प्रति अनबन होने का कारण पैदा हो जायेगा और वह शादी सम्बन्ध होगा जरूर लेकिन जीवन मे आगे के लिये खतरनाक ही बन जायेगा वह किसी भी प्रकार से सूर्य की तरक्की का रास्ता इसलिये नही बन पायेगा क्योंकि जीवित ग्रह की सहायता नही मिलने पर सूर्य खुद को शनि वाले कारणो मे ले जाकर या तो अपनी मर्जी से शनि जो शराब कबाब आदि के कारणो मे या घर से मर्यादा से विपरीत कामो को करने के बाद शनि को ग्रहण करेगा इसलिये सबसे पहले जहां तक हो सके जिन्दा ग्रह को सम्मुख रखकर चलना ठीक होगा।

सभी ग्रहो से फ़ायदा लेने का अचूक उपाय जो ज्योतिष और पुराने जमाने से प्रयोग मे आता हुआ देखा गया है वह बहुत ही सुन्दर और बलकारी तथा खुद का और परिवार का नाम चलाने के लिये माना जाता रहा है,सूर्य को खराब नही होने देने के लिये घर के पिता और पुत्र का सम्मान अपने अपने स्थान पर रखना चाहिये तथा समय समय पर मिलने वाले कनफ़्यूजन को दूर करते रहना चाहिये,चन्द्रमा के उपाय के लिये घर के बुजुर्ग स्त्री सदस्यों का सम्मान करते रहना चाहिये और उनके आशीर्वाद को लेते रहना चाहिये बडी बहिन भी चन्द्रमा के अधिकार मे आजाती है लेकिन उसकी शादी के बाद केवल मर्यादा तक जी सीमित रहना चाहिये अन्यथा या तो बडी बहिन का जीवन चौपट हो जायेगा या खुद को कोई आगे बढने का रास्ता नही मिल पायेगा इसी प्रकार से बुध की सहायता के लिये बहिन बुआ बेटी का सम्मान करना और उनके लिये जो भी सहायता मिलती है देते रहना चाहिये बहिन बुआ बेटी से आजीवन का एक सम्पर्क का रास्ता मिलता है जैसे वह अनजाने लोगो के बीच मे शादी के बाद मे जाती है और उन अन्जाने लोगो से सम्पर्क का बनना एक प्रकार से बडे कमन्यूकेशन के रूप मे माना जाता है अगर अपनी तरफ़ से मान सम्मान तथा सम्पर्क को कायम रखा जाता है किसी भी मिलने वाली बुराई या भलाई मे मिल बैठ कर और आदर सम्मान से उस कारण को समझ लिया जाता है तो जो सम्पर्क बना है उससे भी और सम्पर्क को भी दुख मे सुख मे साथ लिया जा सकता है,साथ ही बहिन बुआ बेटी का सम्मान भी सुरक्षित रहेगा और अहम के कारण या एक दूसरे की प्रतिस्पर्धा के कारण उन्हे कष्ट भी नही होगा पारिवारिक जीवन भी सही चलता रहेगा। गुरु का साधने का सबसे अच्छा तरीका है किसी भी सम्बन्ध के प्रति आत्मीय लगाव होना चाहिये इसी बात को उच्च का गुरु यानी कर्क राशि का गुरु माना जाता है क्योंकि कर्क राशि चन्द्रमा की राशि है और इस राशि मे गुरु का आस्तित्व उच्च का हो जाता है यह इसलिये होता है कि सम्बन्ध को मानसिक रूप से इज्जत के रूप से देखा जाता है लेकिन जो लोग सम्बन्ध को केवल स्वार्थ हित तक ही सीमित रखते है वह व्यवहार के रूप मे आजाता है और वह अपने सम्बन्ध को आजीवन कायम नही रख पाते है। इसका परिणाम यह होता है कि जैसे ही काम निकला वे दूर हो जाते है और अपने या उनके आगे के कामो मे बाधा भी आजाती है साथ ही एक दूसरे के प्रति लोकरीति और आक्षेप विक्षेप भी मिलने लगते है। शुक्र के लिये भी यही माना जाता है कि जितना हो सके पति पत्नी को और पत्नी पति को अगर भौतिकता से दूर रखकर अपने को केवल इसी भावना मे लेकर चलते है कि उन्हे हाथ से हाथ मिलाकर जीवन की तरक्की मे आगे जाना है या जो भी काम करना है वह दोनो की रजामन्दी से ही होना है तो शुक्र अपने असर को देता रहेगा जैसे ही शुक्र के अन्दर कानून का भाव पैदा हो जाता है शुक्र खराब हो जाता है यह बात उन लोगो से सीखनी चाहिये जो अपने सम्बन्ध महिलाओ से केवल कामेक्षा की पूर्ति के लिये रखते है या जो लोग विवादित जमीन जायदाद को खरीदने या बेचने मे सम्बन्धित होते है उनके लिये खुद का जीवन भी बरबाद होना माना जाता है साथ ही जिससे वह सम्बन्ध स्थापित करते है उनका जीवन भी बरबाद होना माना जाता है,इसी प्रकार से शनि के लिये मैने ऊपर लिखा ही है जिसे शनि के बारे मे बेलेन्स करना आता है जो समय के साथ कार्य की योजना और महत्व को समझते है जो लोग बुजुर्गो से समय पर राय लेना जानते है और जो लोग अपने लिये हमेशा के लिये चलने वाले कार्य को पकडने की सोचते है भले ही वह कम फ़ायदा देने वाला हो लेकिन लगातार पकड कर चलने और आने वाली कमाई को निश्चित तरीके से समझने के लिये उनके अन्दर बुद्धि है तो वे आगे बढ जाते है,इसी बात को कहावत के रूप मे भी कहा जाता है कि पांच कमाओ लेकिन रोज कमाओ दाल रोटी खाओ लेकिन रोज खाओ,राहु केतु के लिये भी यही मान्यता होती है अक्सर राहु के आने से किसी भी ग्रह के साथ सामजस्य नही बन पाता है कनफ़्यूजन पैदा हो जाते है और उन कनफ़्यूजन को अगर मंगल की तकनीक से निकाल दिया जाता है या अचानक मिलने वाले मुसीबत के कारणो को तकनीकी रूप से प्रयोग मे लाया जाता है तो कनफ़्यूजन भी फ़ायदा देने वाला बन जायेगा लेकिन उसी कनफ़्यूजन मे रहकर और अधिक कनफ़्यूजन को बढा दिया जायेगा तो वही कनफ़्यूजन आगे के सभी रास्ते भी बन्द कर देगा और कोई भी दुर्घटना देने के लिये माना जायेगा। मित्रों ज्योतिष्  के ऐसे पोस्ट आप हमारै website www.acharyarajesh.in पर पढ़ सकते हैं

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

सिंह लग्न की कुंडली और उसकी विवेचना


कुंडली मे गुरु जीव का अधिकारी होता है सूर्य आत्मा का अधिकारी माना जाता है मंगल आत्मीय शक्ति को बढाने वाला होता है बुध आत्मीय प्रभाव को प्रसारित करने का कारक होता है शुक्र जीव को सजाने और आत्मा के भावो को प्रकट करने मे अपनी सुन्दरता को प्रकट करता है तो चन्द्रमा आत्मीय मन को सृजित करने का भाव पैदा करता है.शनि भौतिक रूप को प्रकट करता है और जीव के कर्म को करने के लिये अपनी योग्यता को प्रकट करता है। यूरेनस दिमाग के संचार को प्रकट करने और भौतिक संचार को बनाने बिगाडने का काम करता है प्लूटो मिट्टी को मशीन मे परिवर्तित करने का कार्य करता है नेपच्यून आत्मा के विकास का अधिकारी माना जाता है.समय के अनुसार जीव का रूप परिवर्तन होता रहता है जैसे आदिम युग मे जीव का रूप कुछ और होता था पाषाण युग मे कुछ था मध्य युग मे कुछ और था और वर्तमान मे कुछ और है तथा आने वाले भविष्य मे जीव का रूप कुछ हो जायेगा। जीव वही रहता है रूप परिवर्तन मे सहायक प्लूटो को मुख्य माना गया है,जो आधुनिकता से लेकर अति अधुनिकता को विकसित करने के लिये लगातार अपने प्रभाव को बढाता जा रहा है और हम क्या से क्या होते जा रहे है,लेकिन जीव के विकास की कहानी के साथ आत्मा का रूप नही बदल पाता है जीव कितना ही आधुनिक हो जाये आत्मा वही रहती है। जो भी कर्म किये जाते है उनका प्रभाव आत्मा पर उसी प्रकार से पडता रहता है जैसे एक चिट्टी विभिन्न डाकघरो मे जाकर डाकघर की उपस्थिति को दर्शाने के लिये अपने ऊपर उन डाकघरो की मुहर अपने चेहरे पर लगाकर प्रस्तुत करती है।

ऊपर दी गई कुंडली सिंह लगन की है और सूर्य विद्या से प्राप्त बुद्धि के भाव मे विराजमान है,सूर्य का साथ देने के लिये बुध जो लगन का चेहरा और भौतिक प्राप्ति तथा कार्य के प्रभाव का नाम प्रस्तुत करने की भावना को भी देता है। सूर्य का प्रभाव धरती तक लाने के लिये सूर्य किरण ही जिम्मेदार होती है। बिना सूर्य किरण के सूर्य का प्रभाव धरती पर आ ही नही सकता है,बुध को किरण का रूप मानने पर यही पता चलता है कि बुध सूर्य की गरमी रोशनी जीवन की प्रस्तुति को धरती तक लाने के लिये संचार का काम करता है इसलिये बुध को संचार का ग्रह कहा गया है। पंचम भाव विद्या के भाव से दूसरा भाव होने से विद्या से प्राप्त बुद्धि को प्रयोग करने का भाव भी कहा गया है और जब इस भाव मे गुरु की धनु राशि का समागम होता है तो ऊंची शिक्षा वाली बुद्धि को प्राथमिक शिक्षा जैसा माना जाता है। कानून की कारक यह राशि विदेशो से भी सम्बन्ध रखती है धर्म और भाग्य से भी यह राशि जुडी होती है साथ ही यात्रा और धार्मिकता को फ़ैलाने या उस धार्मिकता से लोकहित के कार्य करने के लिये भी अपनी युति को प्रस्तुत करती है। इस राशि के प्रभाव को अगर पंचम मे लाया जाता है तो ऊंची जानकारी को खेल खेल मे प्रस्तुत करने की कला भी मानी जाते है,सूर्य भी हकीकत मे कालपुरुष की कुंडली के अनुसार इसी भाव का मालिक है,राज्य और राजनीति से भी सम्बन्ध रखता है। लेकिन उद्देश्य कुछ भी हो मतलब शिक्षा से ही होता है।पुराने जमाने की जो कहानी कही जाती है कि गुरुओं मे इतनी दम होती थी कि वे मिट्टी को चलाने फ़िराने लगते थे,वे कहानिया अविश्वसनीय लगती है,हम कभी कभी कह देते है कि यह सब कपोल कल्पित है,लेकिन आज जिधर भी नजर घुमाई जाती है उधर ही मरी हुयी मिट्टी दौड रही है जिस इंसान को देखो मरी मिट्टी से ही खेल रहा है काम कर रहा है उसी मिट्टी को प्रयोग मे लाकर कमा रहा खा रहा है उसी मिट्टी पर बैठ कर भागा जा रहा है उसी मिट्टी से एक दूसरे से संचार कर रहा है,लेकिन उस जमाने की बातें कपोल कल्पित लगती है ! पुराने गुरु पीले कपडे पहिन कर विद्या को प्रदान किया करते थे लेकिन आधुनिक गुरु कम कपडे पहिन कर कम काम करके अधिक बुद्धि का प्रयोग करके जो कारक पैदा कर रहे है उन्हे गुरु की उपाधि से दूर करने के बाद वैज्ञानिक की उपाधि दे रहे है,वास्तविकता भी है कि जब गुरु सुपर गुरु हो जाता है और मरी मिट्टी मे इतनी जान डाल देता है कि उसका जीवन बिना मरी मिट्टी के बेकार सा हो जाता है तो वह दिमाग को हर पल हर क्षण हर मौके पर दौडाने का काम भी करता है और अपने को वैज्ञानिक कहलाने लगता है। वैज्ञानिक शब्द की व्याख्या को देखा जाये तो वह व+ऐ+ज्ञान+इक से ही देखा जायेगा और इसे अगर विच्छेद करने के बाद जाना जाये तो वाममार्गी तांत्रिको से कम नही समझा जा सकता है। व को मुर्दा कहा जाता है ऐ की मात्रा लगाते है मुर्दे मे जान डालने की क्रिया बन जाती है और जो इस क्रिया को प्रयोग करना जानता हो उसे ज्ञानी की उपाधि दी जाती है लेकिन वह सिद्धान्त के ऊपर ही निर्भर है इसलिये इक यानी एक ही के प्रति समर्पित हो जाती है,तो कौन कहता है कि वैज्ञानिक तांत्रिक नही होता है। जीव यानी गुरु को अपने तंत्र से मरी हुयी मिट्टी मे जान डाल कर लोक हित मे प्रयोग किया जाने लगे और लोग उस मरी मिट्टी जिसमे जान डाल दी गयी है उसे प्रयोग मे लेकर अपने को धन्य समझ ले तथा अपनी आवश्यकताओ को पूरा करने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर कर दे तो जिसने उस मई मिट्टी मे जान डाल दी है वह किसी संत से कम कहा जा सकता है क्या ?

राहु फ़ैलाव देता है फ़ैलना भी सीमित नही होता है,असीमित होता है और जो व्यक्ति एक साधारण व्यक्ति से कई गुनी योग्यता सीखने की रखता हो तथा अपने को बजाय साधारण आदमी के अलग थलग दिखाने की औकात को रखता हो उसी को वक्री कहा जाता है। राहु हमेशा उल्टा चलता है,राहु को शक्ति के रूप मे देखा जाता है और जब यह राहु गुरु के साथ हो जाये तो खराब भाव मे जाकर यह जहरीली हवा बन जाता है लेकिन अच्छे भाव मे जाकर यह अमृत प्रदान करने वाली हवा भी बन जाता है और जिस व्यक्ति की कुंडली मे राहु लगन मे हो अच्छी राशि मे हो तो बात ही कुछ और होती है। लेकिन सीधा आदमी उल्टे को नही सुधार सकता है केवल उल्टा आदमी ही उल्टे को सुधार सकता है,उसी प्रकार से राहु को सुधार मे लाने के लिये गुरु को भी उल्टा कर दिया जाये तो राहु आसानी से सुधार मे लाया जा सकता है,इस कुंडली को भी देखिये राहु लगन मे है शिक्षा की राशि मे है और गुरु भी वक्री होकर राहु की गति मे बदल गया है साथ ही नवे भाव के मालिक मंगल का तकनीकी सहारा भी ले लिया है तो राहु को सुधार कर अच्छे रूप मे बदलना जाना जा सकता है। जो राहु दूसरो को डराने का काम करता है एक प्रकार से काली आंधी बनकर लोगो को परेशान करता है तो वह राहु वक्री गुरु के सानिध्य मे आकर और मंगल का साथ लेकर असीमित ज्ञान के क्षेत्र को दिखाने प्रकाश मे लाने के लिये और संसार को सामने रखने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर कर रहा है। इसी बात को अगर राहु को सिलीकोन माना जाये गुरु को सिलीकोन को तरीके से जोडना और सर्किट आदि बनाने के काम मे लिया जाये तथा मंगल को शक्ति की कारक बिजली के रूप मे देखा जाये तो यह कम्पयूटर का रूप धारण कर सकता है सर्किट बोर्ड पर लगे हुये आई सी कण्डेन्सर रजिस्टेंस ट्रांजिस्टर डायोड आदि की जानकारी भी देता है और उस के अन्दर अपने ज्ञान का प्रयोग करने के बाद लोगो के लिये उस मशीन का तैयार करना हो जाता है जिससे लोग अपने जीवन की जरूरतो को बाहरी लोगो से लिखने पढने से लेकर आने जाने तथा कितने ही प्रकार के कार्य करने के लिये स्वतंत्र हो सकते है। यह वक्री गुरु का ही काम है कि वह शनि प्लूटो यानी मरी हुयी मशीन को हार्डवेयर आदि डालकर उसे सिस्टम से चलाने की क्रिया मे राहु नामका सोफ़्टवेयर डालकर कई प्रकार की मशीनी श्रेणी मे बदल सकता है। अगर इसी जगह पर मार्गी गुरु होता तो वह दूसरे के द्वारा बनाये गये सामान को प्रयोग करने वाला होता लेकिन वक्री गुरु होने के कारण वह अपने द्वारा बनाये गये सामान को दूसरो के हित के लिये प्रयोग करने वाला बन जाता है।सिंह लगन का चौथा भाव वृश्चिक राशि का होता है यह राशि बहुत गूढ होती है कभी प्रकट रूप से सामने नही होती है जैसा कि मेष राशि का स्वभाव होता है कि उसके मन के अन्दर कुछ भी है वह सामने रख देती है इसलिय ही दूसरो के लिये बलि का बकरा बन जाती है उसी स्थान पर सिंह लगन का जातक अपने विचार बहुत गूढ रखता है और उस बुद्धि का प्रयोग करता है जो बुद्धि साधारण आदमी के पास नही होती है वह अपने भाव को प्रकट करने के लिये गूढ तंत्र का प्रयोग करता है उसे तकनीकी विद्या को प्राप्त करने की आदत होती है साथ ही वह अपने को इतने भेद की नीति के अन्दर रखता है कि मन के अन्दर क्या है जान लेने के लिये अपनी पूरी योग्यता को प्रस्तुत कर सकने के बाद भी यह जाहिर नही होने देता है कि आखिर मे उसकी मंशा क्या थी ? यह राशि तकनीकी राशि भी है और किसी भी प्रकार की तकनीक को दिमाग मे रखने और तकनीकी विद्या के प्रति हमेशा मन को लगाकर चलने के लिये भी मानी जा सकती है यह राशि तकनीक के अलावा दुनिया के भेद मृत्यु के बाद का जीवन पराशक्तियों और शमशानी सिद्धियों के प्रति भी जान लेने की भावना को रखती है। हकीकत मे इस भाव का मालिक चन्द्रमा होता है और जनता का मालिक भी चन्द्रमा होता है दिशाओं से यह दक्षिण पश्चिम दिशा की कारक भी कही गयी है इस प्रकार से जातक की मानसिक रुचि अन्तर की जानकारी के लिये भी मानी जा सकती है।यह राशि नकारात्मक मंगल की राशि भी कही गयी है सकारात्मक मंगल जीव के अन्दर की शक्ति कही जाती है और नकारात्मक मंगल जीव के मरने के बाद उसकी पराशक्ति का कारक होता है। सकारात्मक मंगल जीव के जिन्दा रहने तक साथ देने वाला होता है और नकारात्मक मंगल जीव के मरने के बाद उसकी शक्तियों को दूसरे लोगों के प्रति प्रयोग करने के लिये भी माना जाता है,अक्सर सामाजिक परिवेश मे इस मंगल को लोग भूत प्रेत तंत्र आदि के रूप मे कहते सुने जा सकते है।

यूरेनस इस राशि मे उपस्थित होता है तो जातक के मन के अन्दर एक तो उन शक्तियों को प्रकट करने की इच्छा होती है जो मरने के बाद की जानी जा सकती है दूसरे जातक के अन्दर मरी हुयी मिट्टी के अन्दर से यह जान लेने की कला का विकास भी होता है कि वह कैसे मरी किस अवयव की खराबी से मरी और उस मरी हुई शक्ति के अवयब को जांच लेने की और उसे बदल कर नया जीवन मरी हुयी मिट्टी को देने से भी जानी जा सकती है इस बात को अगर डाक्टरी रूप मे देखा जाता है तो एक प्राणी की मौत के पहले के जीवन को प्राप्त करने के लिये खराब हुये अवयब को बदलने का काम किया जाता है जबकि यूरेनस को संचार का ग्रह माने जाने पर जातक के अन्दर कमन्यूकेशन की चीजों के खराब होने पर उन्हे जांच लेने और उन्हे ठीक करने की क्रिया को जान लेने का कारण भी कहा जाता है इस कारण को अगर देखा जाये तो आज के जमाने मे इन्हे इन्फ़ोर्मेशन तकनीक का जानकार भी कहा जाता है और कम्पयूटर इंजीनियर के रूप मे भी देखा जाता है। नेपच्यून के इस भाव मे होने से यह भी देखा जाता है कि जातक के अन्दर राख से साख निकालने की क्षमता का होना भी होता है वह समझ सकता है कि जो कबाडा हो चुका है उस कबाडे से क्या क्या वस्तु निकाली जा सकती है जो काम की है और उस वस्तु को दूसरी वस्तुओं मे प्रयोग करने के बाद उन्हे काम मे लिया जा सकता है। नेपच्यून का रूप अक्सर आत्मा के रूप मे पाश्चात्य ज्योतिष मे प्रयोग मे लाया गया है लेकिन हमारी संस्कृति के अनुसार से मन के आगे नही मान सकते है मन और आत्मा मे भेद को समझने वाले लोग इस बात को समझ सकते है। जो आत्मा कबाड से जुगाड बनाकर उन्हे काम का सिद्ध कर सके वही एक अच्छे इंजीनियर की श्रेणी मे भी गिना जाता है।

सूर्य और बुध का पंचम भाव मे होना आत्मा का मिलन शिक्षा के क्षेत्र मे जाने का होता है यहा जातक अपनी उपस्थिति को शिक्षा के क्षेत्र मे ले जाने और वहीं से अपनी उन्नति को शुरु करने के लिये भी माना जाता है लेकिन यह बात तभी सिद्ध हो सकती है जब जातक के पुत्र संतान की प्राप्ति हो,उसके पहले सूर्य का उदय होना और सरकारी क्षेत्र मे अपने प्रभाव को दिखाने का कारण नही बनता है,सूर्य से तीसरे भाव मे केतु के होने से भी एक कारण यह भी माना जाता है कि कुम्भ राशि का केतु उन्ही लोगो से मित्रता को बनाता है जब वह मित्रता किसी भी प्रकार से कमन्यूकेशन के मामले मे हो पुरानी ज्योतिष के अनुसार बडे भाई की पत्नी या दोस्त की पत्नी के या बडी बहिन के पति के सहायक कार्यों से जोड कर भी देखा जाता है और  इस केतु को अक्सर सहायक के रूप मे भी माना जाता है चाचा भतीजे का सम्बन्ध भी कायम करता है जीवन के अन्दर एक व्यक्ति की सलाह और शिक्षा जातक को आगे बढाने के लिये भी मानी जाती है।यह केतु पत्नी के रूप मे भी सामने आता है और जातक को अपनी सहायता से आगे बढाने के लिये भी देखा जा सकता है। यह केतु मानसिक रूप से भीअपनी सहायता को देने वाला माना जाता है और जीवन मे जो भी सहायक कार्य है उन्हे करने के लिये भी देखा जा सकता है। संतान मे यह दूसरे नम्बर की संतान का रूप भी समझा जा सकता है और पुत्री संतान के प्रति भी अपनी भावना को रखता है।

जातक एक शिक्षक के रूप मे भी जाना जा सकता है जो लोगो को आधुनिक युग मे विभिन्न प्रकार की मशीनोको उपयोग मे लाने का रूप बताये,जो लोग विद्या से जुडे है उनके लिये कार्य करने का रूप भी प्रस्तुत करता है,साथ ही कालेज शिक्षा मे कार्य को करने का रूप भी दे सकता है जो राजनीति से सम्बन्धित विषयों की जानकारी कानूनी जानकारी और विदेशी परिवेश से जुडी जानकारी को प्रदान करना जानता हो,एक संत जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के बिना अपनी सहायता को सेवा के रूप मे लोगों को प्रदान करे भी माना जा सकता है। शनि अपनी नजर से की जाने वाली सेवा से जीवन यापन के लिये कार्य करना भी माना जाता है साथ ही प्लूटो के साथ होने से वह उतना धन नही इकट्ठा कर पाता है जो जीवन मे धन का मोह रखने वाले करते है और बिना उपयोग मे लाये मर जाते है। चन्द्रमा का ग्यारहवे भाव मे होना जातक को उतना ही लाभ दे पाता है जो अपने शरीर की पूर्ति कर ले और कहने के लिये तो उसके कोई भी काम नही बिगडते है जो भी कार्य होता है वह मित्रो की सहायता से पत्नी की सहायता से साथ मे चलने वाले दो लोगो से जो मित्रता की सीमा मे ही होते है के प्रति माना जा सकता है। आचार्य राजेश कुमार

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-6 मेडिकल एस्ट्रोलॉजी

https://wp.me/p8Sg50-1IH
स्वास्थ्य मनुष्य के लिए ईश्वर का दिया हुआ सबसे अमूल्य और दिव्य उपहार है। अपने शरीर को स्वस्थ रखना मनुष्य का कर्तव्य है अन्यथा मनुष्य अपने मन और अपनी सोच को शुद्ध व पवित्र नहीं रख सकता।
        यह स्वास्थ्य मनुष्य की पूँजी है। शरीर स्वस्थ होता है तो मनुष्य सभी कार्य उत्साह से करता है। यदि यही शरीर रोगी हो जाए या अपंग हो तो मनुष्य अपने स्वयं के कार्य करने में असमर्थ हो जाता है तो घर-परिवार व भाई-बन्धुओं के प्रति अपने कर्त्तव्यों को चाहकर भी पूरा नहीं कर सकता। मित्रों पिछली पोस्ट में हमने कुछ चर्चा हदयरोग पर की यह पोस्ट भी उसी पर आधारित है आप खुद पढ़े और शेयर करे ताकि दुसरे भी लाभ ले सकें आचार्य राजेश
     तरबूज शायद आप सभी ने खाया होगा। देखने में गोल काले और हरे रंग का होता है,धारियां भी होती है हरे पर काली और काले पर सफ़ेद,बैरायटी में छोटे छोटे और सफ़ेद रंग के भी होते है। तरबूजों की खेती को गर्मी के दिनों किया जाता है और अक्सर नदियों के किनारे या खेतों में इसकी फ़सल पैदा की जाती है। शनि मंगल को अगर मिट्टी के रूप में देखे तो वह पकी ईंट के रूप में माना जायेगा। लाल पत्थर जिसे अंग्रेजी में लिगनाइट के रूप में जाना जाता है और सीमेन्ट फ़ैक्टरी जिसे सीमेन्ट बनाने के लिये प्रयोग में लेती है को भी आपने देखा होगा,अगर आपका टूर कभी जोधपुर की तरफ़ लगा हो तो सभी मकान लाल पत्थर से ही बने है,आगरा से आगे तातपुर का लालपत्थर काफ़ी मसहूर है। यह पत्थर तो अष्टम शनि मंगल की निशानी है और गर्मी के मौसम में आने वाली पीली आन्धी बारहवें शनि मंगल की निशानी है था तरबूज चौथे शनि मंगल की निशानी है। शनि मंगल के साथ अगर चन्द्रमा जुड जाता है तो वह शनि मंगल को पानी के आकार में बदल देता है,वह पानी का आकार अगर पृथ्वी के नीचे से निकलता है तो अष्टम में जाना जाता है और मंगल की अधिकता में वह ज्वालामुखी का लावा बन जाता है अन्यथा वह शनि की अधिकता में लाल पत्थर ही बन कर रह जाता है। छठे भाव का चन्द्रमा अस्पताली पानी अष्टम का चन्द्रमा कुये का पानी और बारहवा चन्द्रमा आसमानी पानी यानी बरसात के लिये जाना जाता है। यह सब बातें तो बाह्य वातावरण के लिये बतायी गयी है लेकिन शरीर के अन्दर जब इन्हे देखा जाये तो छठा मन्गल शनि और चन्द्रमा अस्पताल में बीमारी के दौरान चन्द्रमा जो ह्रदय का मालिक है और शनि मंगल जो ह्रदय में जमने वाले खून के थक्के के रूप में है को दूर करने के लिये आपरेशन के दौरान मौत देने के लिये माना जाता है,यह जानबूझ कर उम्र की तीसवीं साल से गलत कार्यो को करने से गलत आचार विचार और व्यवहार रखने से सामने आता है,मंगल खून का कारक है और शनि गन्दगी का कारक है चन्द्रमा जो मन का कारक है वह मारकाट फ़रेब ठगी लूटपाट के कामो में लगा रहता है तो कभी डर से कभी उल्टा सीधा खानपान से शरीर में बीमारी को पैदा करने वाला माना जाता है। मकान में दबने से जमीन के नीचे काम करते वक्त दबने से ट्रेन दुर्घटना में मरने से तथा सिर के बल गिरने के बाद सिर के फ़टने से जो मौत होती है वह अष्टम शनि मंगल के रूप में जाना जाता है,यह कारक अक्सर जननांग के अन्दर केंसर आदि के लिये भी जाना जाता है। शनि मंगल चन्द्रमा के साथ जब बारहवें भाव में होता है तो जातक के लिये सडक दुर्घटना में वायुयान की दुर्घटना में ऊंचे स्थान से गिरने पर और हवाई कारणों से सिर के फ़टने से मौत का होना माना जाता है,यह सिर के केंसर का रूप भी होता है और यह हाईपर टेन्सन रखने वालों के लिये भी माना जाता है।इस प्रकार की ग्रह युति से बचने के लिये पहले गलत कार्यों के प्रति सोच को बन्द कर दिया जाये,आज की जरूरत के लिये किसी के कल को नही खराब किया जाये,जोर जबरदस्ती से चोरी से फ़रेबी से डकैती आदि के कारणो से दूर रहा जाये,तो छठे भाव के मंगल शनि और चन्द्रमा से मुक्ति मिल सकती है,गुप्त रूप से किसी की हत्या करना जानवरों के शरीर को भोजन के रूप में प्रयोग करना मैथुन में अनैतिकता को लाना आदि बाते अष्टम शनि मन्गल और चन्द्रमा की युति से जानी जाती है,जल्दी से गुस्सा हो जाना किसी की जायदाद को जबरदस्ती हथिया लेना धर्म स्थान पर जबरदस्ती कब्जा कर लेना,जेल या बन्धन में किसी बडी सजा को भुगतना,अपने ही खून के साथ गलत सम्बन्ध बनाना आदि बारहवें शनि मन्गल और चन्द्रमा की निशानी है,इन कारणॊ से बचने के लिये इन कारणों से बचना चाहिये। इसके अलावा शनि मंगल चन्द्रमा की युति से बचने के लिये पहाडी स्थानों की यात्रा अगर शनि मंगल चन्द्रमा छठे भाव में है तो और गर्म प्रदेशों की यात्रा अगर शनि मंगल चन्द्रमा अष्टम में है तो और शनि मंगल चन्द्रमा के लिये संयुक्त रूप में मंत्र जाप तथा दक्षिण पूर्व की देवी यात्रा जो माता कामाख्या काली और तारापीठ के नाम से जानी जाती है की जाये तो लाभ मिलता है,इसके अलावा नीलम मूंगा मोती का बना हुआ पेन्डल अगर बारहवें भाव में है तो और छठे भाव के लिये इन रत्नों को उंगलियों में धारण करना तथा दान करना अगर अष्टम भाव में है तो भी लाभदायक रहता है,रत्नो की अनुपस्थिति में इन ग्रहों की कारक वस्तुओं को प्रयोग में लाया जाता है,जैसे शनि के लिये राई मन्गल के लिये मिर्ची और चन्द्रमा के लिये चापड छठे भाव के चन्द्रमा के लिये प्रयोग कर सकते है,शनि के लिये खेजडी की जड मंगल के लिये नीम की जड और चन्द्रमा के लिये बिदारीकंद की जड को आठवें भाव के लिये प्रयोत में ले सकते है,शनि के लिये सिर के बाल मंगल के लिये शक्कर के बने बतासे और चन्द्रमा के लिये बारिस के जल को प्रयोग कर सकते है।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-5 medical astrology

https://wp.me/p8Sg50-1IH   
मित्रोंआज की पोस्ट भी हम हदयरोग पर ही करेंगे हमारीकिसी विषय पर हमारी पिछली पोस्ट है आप पढ़ सकते हैं
 मित्रों हमारे ऋषि-मुनि कह गए हैं, 'पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख जेब में हो माया।' यदि काया अर्थात शरीर रोगी है तो आप धन कैसे कमाएंगे। यदि पहले से ही अपार धन है तो वह किसी काम का नहीं। धन से कोई रोग नहीं मिटता है। शरीर स्वस्थ और सेहतमंद है तभी तो आप जीवन का आनंद ले सकेंगे। घुमना-फिरना, हंसी-मजाक, पूजा-प्रार्थना, मनोरंजन आदि सभी कार्य अच्छी सेहत वाला व्यक्ति ही कर सकता है। अत: इसे समझना जरूरहै। एक कहावत जब से होश सम्भाला है सुनता आया हूँ संसार में सबसे बलवान पानी है,और सबसे कमजोर गाय है। सन्तान के लिये माता का ह्रदय है और पति पत्नी के लिये आपसी सामजस्य है,इनकी मजबूती के लिये वैदिक काल से ही इनकी मजबूती का कारण बताने की बातें चलती आयी है। पानी की रक्षा नही की जायेगी,फ़ालतू में बहते हुये पानी को नही संभाला गया तो एक दिन प्यास से जीवन की हानि हो सकती है,गाय को नही सम्भाला गया और इसी प्रकार से दुर्दशा होती रही तो एक दिन आने वाली पीढी दूध के बिना बहुत कमजोर हो जायेगी,माता का ह्रदय अगर सन्तान ने नही समझा तो उसे बुढापे में माता के आक्रोस रूपी श्राप को अपनी सन्तान के द्वारा झेलना पडेगा,पति और पत्नी के बीच का सामजस्य नही बना तो एक दिन गृहस्थी बरबाद होनी निश्चित है। लगनेश का कमजोर होना इन सभी बातों के लिये जिम्मेदार माना जाता है,लगन को शरीर का मालिक बताया गया है और जो राशि लगन में है उसके मालिक को लगनेश कहा जाता है,लगनेश अगर बीमारी के भाव मे है या अपमान के भाव मे है या अपने को दुनियादारी के भाव से दूर रखकर बैठा है तो उपरोक्त सभी कारणॊं को झेलना तो पडेगा ही। लगनेश के कमजोर होते ही बाकी के ग्रह वह चाहे मित्र हो या शत्रु हों,सभी शरीर पर अपने आप हावी होने लगेंगे और रास्ते के छोटे छोटे पत्थर भी दुश्मन बनने लगेंगे। जिन्हे अपना समझा गया है वे ही अपने आप पराये होने लगेंगे जिनसे कुछ प्राप्त करने की आशा की जायेगी वे ही पास से और ले जायेंगे,यह सब लगनेश की कमजोरी से से ही जाना जाता है। ऊपर दी गई कुंडली में लगनेश बीमारी कर्जा दुश्मनी नौकरी के भाव में विराजमान है,यही भाव माता के दिखावे का है,यही भाव पिता के पूर्वजों का है,यही भाव पुत्र वधू के अपमान का है,यही भाव बडे भाई और मित्रों के लिये अपमान देने का है। इस भाव के कारकों में माता की छोटी बहिन पिता के द्वारा पूजे जाने वाले देवताओं और धर्म तथा पिता के द्वारा प्रयोग में लिये गये भाग्य के कारणों को भी जाना जाता है। प्राप्त की गयी विद्या का प्रयोग प्रयोग किये जाने वाले वाहन का बाहरी प्रदर्शन और मेक अपने मेक अप के सामान और पहने जाने वाले कपडों को रखा जाने वाला स्थान,कार्य करने के बाद जो धन आदि प्राप्त हुया है उसके लिये प्रयोग में लाये जाने वाले जोखिम का स्थान कार्य के बाद प्राप्त की गयी पूंजी को जमा करने वाली बैंक आदि का नाम और स्थान सी भाव से जाना जाता है। इस भाव से जीवन साथी के लिये खर्च करने का कारण जीवन साथी के आराम करने का स्थान,जीवन साथी के द्वारा यात्रा आदि करने का कारण भी इसी भाव से जाना जाता है। उपरोक्त कारणों में जाते ही जातक के लिये जमा ताकत को खर्च करना या जमा ताकत को प्रयोग में नही लिया जाना अथवा रोजाना के कार्यों में जमा ताकत को खर्च करते जाना आदि के लिये भी जाना जाता है। इस भाव का एक रूप पानी वाले साधन के लिये बाहरी बनावट और मकान में जिसमें रहते है उसकी बाहरी बनावट सजावट और नाम आदि के लिये भी जाना जाता है। लगनेश की शक्ति इन सभी बातों के अन्दर कमजोर होने की बात ही मानी जा सकती है। जब लगनेश कमजोर है तो रहने वाले स्थान में राहु रूपी इन्फ़ेक्सन का पैदा होना आमवात है। उपरोक्त कुंडली में राहु का स्थान कर्क राशि में चौथे भाव में है,यहां राहु पीने वाली पानी के अन्दर इन्फ़ेक्सन पैदा करने के लिये जाना जायेगा उसका कारण दसवे भाव में सूर्य के होने से पानी के अन्दर लकडी पत्ते जीवाश्मो के जाने से ही होगा। इस इन्फ़ेक्सन का प्रभाव सीधा ह्रदय पर तब पडना चालू होगा जब जुकाम खांसी फ़ेफ़डों के इन्फ़ेक्सन कफ़ का अधिक बनना आदि पाया जायेगा। इसके अलावा रहने वाले मकान में उत्तर दिशा में शौचालय का निर्माण किया जायेगा और दक्षिण दिशा में रोशनी का प्रयोग किया जायेगा। कार्य करने का स्थान सरकारी होगा तो भी राहु का इन्फ़ेक्सन बैठने वाले स्थान में एसी आदि के लगे होने और सरकारी ठेकों से की जाने वाली सफ़ाई आदि के लिये जिम्मेदार माना जायेगा। यह तब और अधिक प्रभावी होगा जब सरकारी कार्यालयों में शिक्षा चिकित्सा वाहनो अन्य सरकारी विभागों के लिये भवनों की देख रेख का काम सडक और पुल आदि के निर्माण के काम किये जाते होंगे। इसके अलावा जो लोग वाहनों की देख रेख करने वाले होंगे और पेट्रोल डीजल गैस आदि के घेरे में रहते होंगे। जो लोग ट्रेफ़िक पुलिस में काम करते होंगे या दिन भर सडकों पर अपने कार्यों को करने के लिये बाध्य होंगे। स्कूली शिक्षा को देने वाले होंगे या स्कूलों में ही अपने निवास को बनाये रखने वाले होंगे। इस राहु का सीधा असर मंगल पर जा रहा है और जातक को अस्पताली कारणों से पीने वाली दवाइयों को जिनके अन्दर खांसी आदि से दूर रहने के लिये एल्कोहल आदि का प्रयोग करना पडता होगा भी ह्रदय की धमनियों को कम करने या अधिक फ़ुलाने के लिये मानना पडेगा। एक कहावत और भी कही जाती है कि "झगडे की जड हांसी और रोगों की जड खांसी",अर्थात झगडे का कारण हंसना होता है और रोगों के पनपने का कारण खांसी का बढना होता है। राहु और कमजोर लगनेश के कारण इस कुंडली में सूर्य जो कार्य स्थान में है कमजोर हो गया है।इस युति से बचाव का रास्ता अपने को उपरोक्त कार्यों में जाने के बाद जलवायु से सुरक्षित रखना,इसके अलावा अगर इस प्रकार के कार्य करने को मिल रहे है और उन कार्यों के बाद शरीर में जुकाम आदि का प्रभाव कम नही हो रहा है तो उस प्रकार के कार्यों को बन्द करने के बाद दूसरे कार्यों को करने का उपाय सोचना चाहिये। पहला सुख जब निरोगी काया, के अनुसार कार्य तो और भी मिल जायेंगे लेकिन लोभ के कारण इन कार्यों को करने के बाद शरीर का सत्यानाश हो गया तो आगे कार्य भी नही कर पाओगे और दुनिया से जल्दी कूच करने का बहाना भी बन जायेगा। राहु से बचने के लिये केतु का उपाय उसी प्रकार से कारगर है जैसे तेजाब की बाल्टी से किसी वस्तु को निकालने के लिये संडासी का प्रयोग,बिजली के तार को पकडने के लिये इन्सूलेटेड प्लास की जरूरत,राहु के लिये केतु का उपाय किया जाता है और केतु के लिये राहु के उपाय अगर दोनो में से कोई एक जीवन में शैतानी करने के लिये अपनी शक्ति का प्रयोग कर रहा हो तो। जब चौथे भाव में राहु है तो दसवें भाव में केतु का होना जरूरी है,यह उसी प्रकार से है जैसे कोई समस्या बनी है तो समस्या का समाधान भी उसकी उल्टी दिशा में समस्या के ठीक 180 की डिग्री में होगा। केतु के लिये रहने वाले स्थान में कुत्ता पालना,शरीर की सेवा के लिये नौकर का रखना,आफ़िस आदि में प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं को नंगे हाथों से नही पकड कर पकडने वाले साधनों से पकडना। जो भी इन्फ़ेक्टेड स्थान है वहां से भोजन पानी वायु के लिये शुद्ध स्थान का प्रयोग करना आदि उपाय किये जा सकते है,राहु को कन्ट्रोल में रखने के लिये और लगनेश को बली करने के लिये चौथे भाव के राहु के विरुद्ध में स्थापित केतु की राशि के अनुसार के रंग की लहसुनिया,लगनेश की लगन के अनुसार रंग का रत्न और भाग्य के रत्न को आपस में मिलाकर प्रयोग करना जरूरी होता है। मित्रों आप में से बहुत से लोग फोन पर मेरे से रत्नों के बारे में पूछते हैं कि मैं कौन सा रतन पर मित्रों रतन का चुनाव करने के लिए कुंडली को बहुत गहराई से देखना पड़ता है जांच ना पड़ता है अतः आप अपनी कुंडली अगर आप मुझसे दिखाना चाहते हैं या बनवाना चाहते हैं अगर आपको कोई समस्या है तो उसका उपाय चाहते हैं तो आप मुझसे मेरे नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं । आचार्य राजेश

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-4 medical astrology

 ज्योतिष द्वारा रोग निदान की विद्या को चिकित्सा ज्योतिष भी कहा जाता है। इसे मेडिकल ऍस्ट्रॉलॉजी (Medical Astrology), नैदानिक ज्योतिषशास्त्र (Clinical Astrology) भी कहा जा सकता है। यदि समय रहते इनका चिकित्सकीय एवं ज्योतिषीय उपचार दोनों कर लिए जाएं तो इन्हें घातक होने से रोका जा सकता है। Cकाल पुरुष की कुंडली में हृदय का प्रतिनिधित्व कर्क और सिंह राशियां करती हैं और हृदय का मुख्य स्थान चतुर्थ भाव, नव ग्रहों में सूर्य सृष्टि का जीवनाधार है और यही हृदय की धड़कन का कारक है। यदि जन्मकुंडली में कर्क और सिंह राशियां, चतुर्थ भाव, सूर्य और चंद्र बलवान एवं शुभ ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों, तो व्यक्ति को हृदय रोग नहीं होता। इसके विपरीत यदि ये सभी कमजोर हों, तो व्यक्ति को निश्चय ही जीवन में हृदय संबंधी कोई न कोई रोग होगा।हदय के रोग का कारक ग्रह सूर्य है तो मंगल रक्त संचार को नियंत्रित करता है। शनि रोगों का द्योतक है।कुंडली में बहुत से ऐसे योग है जो कि लग्न के लिए अलग-अलग हैं परंतु मुख्यत: दिल की बीमारी सूर्य-शनि और दिल का दौरा शनि-मंगल देते हैं[05/10, 21:11] Acharya Rajesh: ज्योतिष द्वारा रोग निदान की विद्या को चिकित्सा ज्योतिष भी कहा जाता है। इसे मेडिकल ऍस्ट्रॉलॉजी (Medical Astrology), नैदानिक ज्योतिषशास्त्र (Clinical Astrology) भी कहा जा सकता है। यदि समय रहते इनका चिकित्सकीय एवं ज्योतिषीय उपचार दोनों कर लिए जाएं तो इन्हें घातक होने से रोका जा सकता है। Cकाल पुरुष की कुंडली में हृदय का प्रतिनिधित्व कर्क और सिंह राशियां करती हैं और हृदय का मुख्य स्थान चतुर्थ भाव, नव ग्रहों में सूर्य सृष्टि का जीवनाधार है और यही हृदय की धड़कन का कारक है। यदि जन्मकुंडली में कर्क और सिंह राशियां, चतुर्थ भाव, सूर्य और चंद्र बलवान एवं शुभ ग्रहों से युक्त व दृष्ट हों, तो व्यक्ति को हृदय रोग नहीं होता। इसके विपरीत यदि ये सभी कमजोर हों, तो व्यक्ति को निश्चय ही जीवन में हृदय संबंधी कोई न कोई रोग होगा।हदय के रोग का कारक ग्रह सूर्य है तो मंगल रक्त संचार को नियंत्रित करता है। शनि रोगों का द्योतक है।कुंडली में बहुत से ऐसे योग है जो कि लग्न के लिए अलग-अलग हैं परंतु मुख्यत: दिल की बीमारी सूर्य-शनि और दिल का दौरा शनि-मंगल देता है कर्क राशि का शनि होता है तो जातक के लिये दूसरों की भावना को समझना बहुत मुश्किल की बात होती है। अक्सर आपका वास्ता उन लोगों से भी पडा होगा जिन लोगों के मन में अपने ही दोस्तों अपने ही बडे भाई या बडी बहिनों अथवा काम करने के बाद दी जाने वाली कमाई के प्रति नुक्ताचीनी करने के बाद राजनीतिक बल से तुरत ही विभूषित कर दिया जाता है,वास्तव में यह कोई जातक की कमी से नही होता है,यह बात तभी मानी जाती है जब जातक का जन्म चौदह फ़रवरी से चौदह मार्च के बीच में हुआ होता है। उस समय जलवायु के अन्दर बसन्ती बयार का चलना माना जाता है और मौसम की जवानी जातक के लिये सहायक होती है। राजनीति का एक खेल और समझा जा सकता है कि राजनीति तभी होती है जब पेट भरा हो,जब तक जातक को भूख लगी है वह रूखा सूखा ठंडा गर्म सभी प्रकार का भोजन बडे आराम से कल लेगा,जैसे ही पेट भरा और कोई भोजन वाली वस्तु सामने आयी तो उसके अन्दर कई तरह की राजनीति सामने आने लगेगी जैसे नमक कम या अधिक है,मिर्च कम या अधिक है कम पकाया गया है या जला दिया गया है आदि। इसी प्रकार की राजनीति का प्रभाव जातक के इस समय में जन्म लेने के बाद पडता हुआ देखा जाता है,जितने भी छिद्रान्वेषी पैदा हुये है अगर इतिहास को उठाकर देखा जाये तो इसी काल में पैदा होने वाले व्यक्ति मिलेंगे। लेकिन इस समय में जो जातक किसी कारण से कर्क के शनि से आच्छादित युति में पैदा हुये है,मलिन या गन्दी बस्तियों मे पैदा हुये है,पानी को पाटकर बनाये हुये घरों में पैदा हुये है,अथवा खेती किसानी या जनता से जुडे समाज में पैदा हुये है उनके दोस्त तो राजनीति में विराजमान मिलेंगे और वे उनकी दोस्ती से अपने लिये कार्य भी जुटा लेंगे लेकिन उनके लिये ही काट करने से नही चूकेंगे। यह द्रश्य तो जातक के बाहरी जीवन के लिये देखा जा सकता है लेकिन उनके शरीर में जो प्रभाव यह ग्रह युति देती है वह जातक के कठोर स्वभाव से जातक की जडता वाली बुद्धि से शिक्षा को कम लेने के कारण या सीखने के लिये पढने के बजाय करने वाली बुद्धि का प्रयोग करने से माना जाना बेहतर समझने का कारण बनता है। शनि को कंट्रोल करने के लिये प्राय: दो ग्रहों का उपयोग अदिक किया जाता है एक सूर्य और दूसरा मंगल। जब शनि की अष्टम द्रिष्टि में सूर्य या मंगल आजाते है तो वे शनि पर अपना अधिकार नही रख पाते है,और शनि अपने द्वारा सूर्य और मंगल को प्रताणित करता रहता है। शनि से अष्टम में जाकर सूर्य बेबस हो जाता है,साथ ही मंगल को जो गर्म लोहे के पिंड की भांति है अगर शनि की ठंडी पर्त में दबा दिया जायेगा तो वह अपनी गर्मी को कैसे प्रदान कर सकता है,उसी प्रकार से जब सूर्य की रोशनी को शनि के अन्धेरे में दबा दिया जायेगा तो सूर्य भी बेवस हो जायेगा। इस बेबसता को ही जातक के लिये ह्रदय वाली बीमारी के रूप में भी जाना जा सकता है,सबसे अधिक प्रभाव जातक की आंखों की रोशनी पर पडता है उसके बाद जातक की पाचन क्रिया बेकार हो जाती है और गले में हमेशा कफ़ की खडखडाहट सुनने को मिलती रहती है। सूर्य शनि के लिये कुछ करने से इसलिये असमर्थ होता है कि वह जातक के ग्यारहवें भाव में है और उसे इसी शनि से अपने रोजाना के कामों के लिये काम चलाना है,यह भाव साधारण व्यक्ति के लिये माना जाता है लेकिन जो राजनीति में है उनके लिये माना जाता है कि उन्हे उसी जनता की बदौलत ही सीट मिलती है और उसी जनता के प्रति कोई गलत काम करते है या गर्मी दिखाते है तो वह जनता बिदक गयी तो अगले चुनाव में उसकी हार भी मानी जा सकती है। व्यापारी या सरकारी नौकरी में विराजमान लोग भी इसलिये असमर्थ है कि उन्ही कर्मचारियों से उन्हे काम भी लेना है और उन्ही की बदौलत वे अपने कार्यों में सफ़ल है तो वे किसलिये इस शनि से पंगा लेने चले। ह्रदय की बीमारी में राहु शनि और केतु अगर सूर्य चन्द्र पर अपनी अष्टम द्रिष्टि डालता है तो वह जातक के लिये ग्रहों की युति के अनुसार खतरनाक माना जाता है।इस युति से जातक को अगर ह्रदय वाली बीमारी से बचना है तो जातक को अपने रोजाना के कार्यों को खुद ही करना चाहिये। हर काम में काम करने वाले को अपने आसपास नही रखना चाहिये,अक्सर गर्मी के दिनो में लोग बर्फ़ का पानी पीते है और ठंड के दिनों में ठंडे पानी से नहाते है अपने हाथों को ठंडे पानी में रखते है या गले को कानो को खोल कर चलते है उनके लिये इस ग्रह युति का प्रभाव ह्रदय रोग को पैदा करने के लिये माना जाता है। इस युति में जातक को मूली छाछ और स्विन्ग पूल में नहाने का शौक होता है,यह तीनो ही एक समय में प्रयोग करने का मतलब है कि ह्रदय रोग को बुलावा देना। और सूर्य शनि की युति यानी सुबह शाम में अगर इन कारकों का प्रयोग किया जाता है तो भी जातक को ह्रदय रोग की बीमारी से बचाया नही जा सकता है। इस युति वाले जातकों को कभी ठंडे कमरे में और अन्धेरे में नही सोना चाहिये,सोने वाले पलंग पर हमेशा गुलाबी रंग की चद्दर और कमरे के पर्दे गुलाबी रंग के होने चाहिये,पूजा में दीपक का जलाना भी जरूरी है,राहु की चीजे जैसे अगरबत्ती चलाना धूल वाली जगह पर नही जाना सुबह के समय झाडू लगाते समय नाक को बन्द रखना इस रोग में सहायता देने के लिये माना जाता है,इस युति वाले जातक को सूर्य का रत्न माणिक को भी पहिनना जरूरी है
लेकिन सामान्य माणिक इस शनि की युति को रोकने में असमर्थ मानी जाता है इसके लिये जातक को दोपहर के सूर्य का कारक स्टार या तुरका रूबी को ही पहिनना चाहिये,इस रूबी की खास पहिचान है कि किसी भी प्रकार की रोशनी में जाने पर इसमे से किरणे निकलती है जो प्रत्यक्ष रूप से साफ़ दिखाई देती है। अपने द्वारा किसी भी प्रकार की जानकारी के लिये फोन कर सकते है। अपनी संघ जन्म तारीख और समय के अनुसार अपनी बीमारी के लिये भी बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से पता कर सकते है।

कर्क राशि का शनि होता है तो जातक के लिये दूसरों की भावना को समझना बहुत मुश्किल की बात होती है। अक्सर आपका वास्ता उन लोगों से भी पडा होगा जिन लोगों के मन में अपने ही दोस्तों अपने ही बडे भाई या बडी बहिनों अथवा काम करने के बाद दी जाने वाली कमाई के प्रति नुक्ताचीनी करने के बाद राजनीतिक बल से तुरत ही विभूषित कर दिया जाता है,वास्तव में यह कोई जातक की कमी से नही होता है,यह बात तभी मानी जाती है जब जातक का जन्म चौदह फ़रवरी से चौदह मार्च के बीच में हुआ होता है। उस समय जलवायु के अन्दर बसन्ती बयार का चलना माना जाता है और मौसम की जवानी जातक के लिये सहायक होती है। राजनीति का एक खेल और समझा जा सकता है कि राजनीति तभी होती है जब पेट भरा हो,जब तक जातक को भूख लगी है वह रूखा सूखा ठंडा गर्म सभी प्रकार का भोजन बडे आराम से कल लेगा,जैसे ही पेट भरा और कोई भोजन वाली वस्तु सामने आयी तो उसके अन्दर कई तरह की राजनीति सामने आने लगेगी जैसे नमक कम या अधिक है,मिर्च कम या अधिक है कम पकाया गया है या जला दिया गया है आदि। इसी प्रकार की राजनीति का प्रभाव जातक के इस समय में जन्म लेने के बाद पडता हुआ देखा जाता है,जितने भी छिद्रान्वेषी पैदा हुये है अगर इतिहास को उठाकर देखा जाये तो इसी काल में पैदा होने वाले व्यक्ति मिलेंगे। लेकिन इस समय में जो जातक किसी कारण से कर्क के शनि से आच्छादित युति में पैदा हुये है,मलिन या गन्दी बस्तियों मे पैदा हुये है,पानी को पाटकर बनाये हुये घरों में पैदा हुये है,अथवा खेती किसानी या जनता से जुडे समाज में पैदा हुये है उनके दोस्त तो राजनीति में विराजमान मिलेंगे और वे उनकी दोस्ती से अपने लिये कार्य भी जुटा लेंगे लेकिन उनके लिये ही काट करने से नही चूकेंगे। यह द्रश्य तो जातक के बाहरी जीवन के लिये देखा जा सकता है लेकिन उनके शरीर में जो प्रभाव यह ग्रह युति देती है वह जातक के कठोर स्वभाव से जातक की जडता वाली बुद्धि से शिक्षा को कम लेने के कारण या सीखने के लिये पढने के बजाय करने वाली बुद्धि का प्रयोग करने से माना जाना बेहतर समझने का कारण बनता है। शनि को कंट्रोल करने के लिये प्राय: दो ग्रहों का उपयोग अदिक किया जाता है एक सूर्य और दूसरा मंगल। जब शनि की अष्टम द्रिष्टि में सूर्य या मंगल आजाते है तो वे शनि पर अपना अधिकार नही रख पाते है,और शनि अपने द्वारा सूर्य और मंगल को प्रताणित करता रहता है। शनि से अष्टम में जाकर सूर्य बेबस हो जाता है,साथ ही मंगल को जो गर्म लोहे के पिंड की भांति है अगर शनि की ठंडी पर्त में दबा दिया जायेगा तो वह अपनी गर्मी को कैसे प्रदान कर सकता है,उसी प्रकार से जब सूर्य की रोशनी को शनि के अन्धेरे में दबा दिया जायेगा तो सूर्य भी बेवस हो जायेगा। इस बेबसता को ही जातक के लिये ह्रदय वाली बीमारी के रूप में भी जाना जा सकता है,सबसे अधिक प्रभाव जातक की आंखों की रोशनी पर पडता है उसके बाद जातक की पाचन क्रिया बेकार हो जाती है और गले में हमेशा कफ़ की खडखडाहट सुनने को मिलती रहती है। सूर्य शनि के लिये कुछ करने से इसलिये असमर्थ होता है कि वह जातक के ग्यारहवें भाव में है और उसे इसी शनि से अपने रोजाना के कामों के लिये काम चलाना है,यह भाव साधारण व्यक्ति के लिये माना जाता है लेकिन जो राजनीति में है उनके लिये माना जाता है कि उन्हे उसी जनता की बदौलत ही सीट मिलती है और उसी जनता के प्रति कोई गलत काम करते है या गर्मी दिखाते है तो वह जनता बिदक गयी तो अगले चुनाव में उसकी हार भी मानी जा सकती है। व्यापारी या सरकारी नौकरी में विराजमान लोग भी इसलिये असमर्थ है कि उन्ही कर्मचारियों से उन्हे काम भी लेना है और उन्ही की बदौलत वे अपने कार्यों में सफ़ल है तो वे किसलिये इस शनि से पंगा लेने चले। ह्रदय की बीमारी में राहु शनि और केतु अगर सूर्य चन्द्र पर अपनी अष्टम द्रिष्टि डालता है तो वह जातक के लिये ग्रहों की युति के अनुसार खतरनाक माना जाता है।इस युति से जातक को अगर ह्रदय वाली बीमारी से बचना है तो जातक को अपने रोजाना के कार्यों को खुद ही करना चाहिये। हर काम में काम करने वाले को अपने आसपास नही रखना चाहिये,अक्सर गर्मी के दिनो में लोग बर्फ़ का पानी पीते है और ठंड के दिनों में ठंडे पानी से नहाते है अपने हाथों को ठंडे पानी में रखते है या गले को कानो को खोल कर चलते है उनके लिये इस ग्रह युति का प्रभाव ह्रदय रोग को पैदा करने के लिये माना जाता है। इस युति में जातक को मूली छाछ और स्विन्ग पूल में नहाने का शौक होता है,यह तीनो ही एक समय में प्रयोग करने का मतलब है कि ह्रदय रोग को बुलावा देना। और सूर्य शनि की युति यानी सुबह शाम में अगर इन कारकों का प्रयोग किया जाता है तो भी जातक को ह्रदय रोग की बीमारी से बचाया नही जा सकता है। इस युति वाले जातकों को कभी ठंडे कमरे में और अन्धेरे में नही सोना चाहिये,सोने वाले पलंग पर हमेशा गुलाबी रंग की चद्दर और कमरे के पर्दे गुलाबी रंग के होने चाहिये,पूजा में दीपक का जलाना भी जरूरी है,राहु की चीजे जैसे अगरबत्ती चलाना धूल वाली जगह पर नही जाना सुबह के समय झाडू लगाते समय नाक को बन्द रखना इस रोग में सहायता देने के लिये माना जाता है,इस युति वाले जातक को सूर्य का रत्न माणिक को भी पहिनना जरूरी है लेकिन सामान्य माणिक इस शनि की युति को रोकने में असमर्थ मानी जाता है इसके लिये जातक को दोपहर के सूर्य का कारक स्टार या तुरका रूबी को ही पहिनना चाहिये,इस रूबी की खास पहिचान है कि किसी भी प्रकार की रोशनी में जाने पर इसमे से किरणे निकलती है जो प्रत्यक्ष रूप से साफ़ दिखाई देती है।
अपने द्वारा किसी भी प्रकार की जानकारी के लिये फोन कर सकते है।
अपनीजन्म तारीख और समय के अनुसार अपनी बीमारी के लिये भी बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से पता कर सकते है। आचार्य राजेश कुमार

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

हदयरोग ओर ज्योतिषीय उपचार-3 medical astrology


मित्रों इससे पहले भी मैं तीन पोस्ट बीमारी पर कर चुका हूं उसको आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं ।और यह पोस्ट भी उसी पर आधारित है। अगर अच्छी लगे तो शेयर करें ,   
ज्योतिष में रोग बीमारी जानने का विधान है। जन्मपत्री में ग्रहों की स्थिति तथा गोचर का प्रभाव बीमारी और उसके समाधान के स्पष्ट संकेत देता है। जीवन यापन में सजगता तथा ग्रहों की शांति से इन बीमारियों से बचा जा सकता है।हृदय सीने में बायीं तरफ, कालपुरुष कुंडली के चौथे भाव को दर्शाता है। मस्तिष्क भी चौथे भाव का आधिपत्य रखता है। हृदय रोग के निर्धारण में मस्तिष्क की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

चन्द्रमा चौथे भाव का कारक ग्रह है। इसकी कमजोर और दूषित अवस्था होने पर हृदय रोग की आशंका बढ़ जाती है। चन्द्रमा की स्वामी राशि कर्क है। कर्क राशि का शुद्ध एवं बलवान अवस्था में होना मस्तिष्क की स्वस्थता का प्रतीक है। साथ ही हृदय रोग की आशंका में कमी लाता है। कर्क राशि की बलवान स्थिति  व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में आशातीत बढ़ोत्तरी करती है।
कालपुरुष कुंडली में हृदय होने का गौरव अनुराधा नक्षत्र को प्राप्त है। और अनुराधा नक्षत्र शनि से संबंधित है कर्क राशि का शनि अक्सर जनता से जोड कर रखता है जातक के अन्दर भावना भावुकता से पूर्ण नही होती है इसका कारण है कि मन का पत्थर हो जाना और मन का ठंडा हो जाना। कोई भी व्यक्ति अपने उद्गारों को प्रस्तुत करने में असमर्थ होता उसे केवल कार्य करने वाले लोगों से सम्पर्क करना ही अच्छा लगता है वह अधिक से अधिक भौतिक जायदाद को इकट्ठा करने के लिये अपने मन को लगाये रहता है,पारिवारिक माहौल में उसे दर्द नही होता है कि उसके अमुक सदस्य को अमुक पीडा है,पीडा निवारण के लिये वह केवल डाक्टरी सहायता को देने की बात करता है,उसे भावनात्मक रूप से समझ नही होती है कि वह जिससे बात कर रहा है उसके प्रति अगर वह दो शब्द प्रेम से बोल देता है तो उसकी पीडा कम हो जायेगी। इस प्रकार के लोगों के लिये सीधी सी पहिचान होती है कि जातक कर्क के शनि से आच्छादित है,उसे भावना से अधिक कार्य की चिन्ता है उसका मन उसी प्रकार से जमा हुआ है जैसे पानी को जमाकर बर्फ़ बना दिया जाये। इस प्रकार के व्यक्ति के ह्रदय में जडता पैदा हो जाती है,और जब कर्क राशि के शनि के साथ कमजोर सूर्य का प्रभाव होता है यानी जातक का जन्म आधीरात के समय होता है,और जातक का जन्म जहां होता है वह स्थान ठडे स्थान के रूप में है,जन्म का समय भी जुलाई और अगस्त के बीच में होता है,इस प्रकार की युति जब कुंडली के अन्दर मिलती है तो जातक के लिये कठोर ह्रदय की बीमारी के रूप में जाना जाता है,जातक अपनी पीडा को भी प्रकट नही कर सकता है वह किसी दुख को दूर करने के लिये अपने बाहुबल को ही प्रयोग में लाता है और जब उसका बाहुबल टूट जाता है तो वह सीधा अस्पताल में चला जाता है जहां डाक्टर उसके ह्रदय की ओपन हर्ट सर्जरी के द्वारा या तो उसके ह्रदय में जमा गंदगी को साफ़ करते है या बन्द धमनियों को खोल कर प्लास्टिक के वाल्व डालते है। उपरोक्त कुंडली में शनि के साथ सूर्य और बुध का होना इसी बात का संकेत देता है,सूर्य से ह्रदय बुध से धमनिया और प्लास्टिक तथा शनि से कार्य।इस प्रकार की ग्रह युति से बचने के लिये और अपनी रक्षा के लिये जातक को कभी भी वातानुकूलित स्थानों में काम नही करना चाहिये,कारण जातक को सूर्य की धूप की उपयोगिता जरूरी है सूर्य जातक के शरीर से पसीने को बहायेगा तो जातक के ह्रदय में जमा गन्दगी खून के साथ निकलकर साफ़ होती रहेगी,दूसरे जातक को अपने कामुक स्वभाव में कन्ट्रोल करके रखना चाहिये जिससे उसके शरीर का सूर्य यानी वीर्य या रज सुरक्षित रहे और शरीर की कमजोरी में वह काम आये,अति कामुकता से बचने के लिये जातक को आहार विहार और रोजाना के कार्यों पर बल देना चाहिये,राजनीति से सम्बन्धित कार्यों पर या जनता से जुडे कार्यों को कम से कम करना चाहिये जिससे जनता के दुख और दर्द को बार बार महसूस करने के लिये उसे अपने ह्रदय पर अधिक जोर नही डालना पडे। सूर्य और शनि की युति मे जातक के पास सुबह और शाम के ही काम अधिक होते है बाकी समय वह अपने दिमाग को प्लान बनाने के लिये प्रयोग में लाता है अधिक सोचने के कारण जातक का ह्रदय कभी अधिक उत्तेजित होता है और कभी धीमा होता है इस प्रकार से सांसो की गति कम या अधिक बार बार होने लगती है,इस गति के साथ ह्रदय का कार्य कभी अच्छा और कभी बुरा होने लगता है,जब ह्रदय की गति में अधिक परिवर्तन होता है तो वह ह्रदय को बन्द करने केलिये काफ़ी होता है,इसे ही हार्ट अटैक की बीमारी कहा जाता है,जातक को सूर्य शनि की युति में बुध की उपस्थिति के लिये नवग्रह का बना पेन्डल अपने सीने से लगाकर रखना चाहियेण यह पेन्डलके मघ्य मानिक्य ओर दूसरे रतन आसपास और रतन सही क्रम में लगे हो
,कारण सूर्य और शनि पिता पुत्र की तरह से है और जहां सूर्य की सीमा समाप्त होती है वही से शनि की सीमा शुरु हो जाती है,साथ ही बुध भी अपनी गति को सूर्य और शनि के साथ बराबरी की सीमा में बान्ध कर रखता है,इस प्रकार से कोई एक ग्रह का प्रभाव इन ग्रहो की युति में फ़र्क नही दे पाता है,नवग्रह का पेन्डल  जब ह्रदय पर लटकता है तो जातक के अन्दर चलने वाले विचारों में स्थिरता आती है वह सोचता भी है और करता भी इस प्रकार से व्यक्ति की जीवन की अवधि बढ जाती है,जो व्यक्ति राजनीति में है या जो व्यक्ति जनता के साथ जुडकर जनता वाले कार्य कर रहे है अथवा जो लोग जनता के साथ मिलकर खरीद बेच का कार्य चांदी चावल तथा खेती से पैदा होने वाली जिन्स के प्रति अपने काम कर रहे है,अथवा जो लोग हाउसिंग सोसाइटी को बनाकर चला रहे है अथवा मकान को बनाकर बेचने का काम कर रहे है पानी वाले कार्यों को कर रहे है पानी वाले जहाज या नाव अथवा बोटिंग वाले काम कर रहे है उनके लिये यह स्वास्तिक बहुत फ़लदायी होता देखा गया है। मित्रों अगर आप भी अपनी कोई समस्या का उपाय चाहते हैं अपनी कुंडली दिखाना का बनवाना चाहते हैं तो आप हमारी वेबसाइट पर या हमारे नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं आचार्य राजेश कुमार

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

हदय रोग ओर ज्योतिषीय उपचार-2 medical Astrology

हदय रोग ओर ज्योतिषीय उपचार-www.acharyarajesh.in2 medical Astrology
मित्रों ज्योतिष और चिकित्सा का आपस में गहरा संबंध होता है। चिकित्सा से शरीर को रोग से मुक्त किया जाता है तो ज्योतिष से यह पता चल जाता है कि किस उम्र में किसे बीमारी घेर सकती है। ज्योतिष शरीर को निरोगी रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। 
शरीर पर चन्द्रमा का सीधा प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा 72 बीमारियों को नियंत्रित होती हैं। अगर चंद्रमा असंतुलित है तो आपको बीमारियां घेरेंगी। कुंडली में चंद्रमा के प्रभाव से बच नहीं सकते हैं। यदि चंद्रमा संतुलित रहे।           तो बीमारियों से बचा जा सकता है। 
शरीर के नौ साल्ट का नौ ग्रहों से संबंधित है शरीर में नौ प्रकार के साल्ट पाए जाते हैं, जो समान अनुपात में मिलते हैं। इनका सम्बंध नौ ग्रहों की उत्पत्ति से है। इसलिए ग्रहों का प्रभाव शरीर पर साफ पड़ता है।  साल्ट का असंतुलन नहीं होना चाहिए। स्वस्थ रहने के लिए ज्योतिष बेहद कारगर है। ज्योतिष यह बता सकने में सक्षम है कि एक बच्चे को किस आयु खंड में बीमारी घेर सकती है।  पृथ्वी पर जो कुछ है वह शरीर में है। अगर शरीर में 72 प्रतिशत जल है तो चन्द्रमा का भी इतना असर है। मित्रों हम बात हदयरोग पर कर रहे हैंअक्सर ह्रदय रोग इन स्थानो में अधिक पनपते है जहां पानी का इकट्ठा रहना माना जाता है जैसे हमेशा बहने वाली नदी के किनारे के स्थान समुद्री किनारों वाले स्थान तथा पहाडी घाटियों के बीच में या नीचे तलहटी में बसे हुये स्थान। इसके अलावा भी आज के जीवन की चलने वाली गतियों में मानव जाति के द्वारा की जाने वाली चिन्ता भी ह्रदय रोग का मुख्य कारण माना जा सकता है। चिन्ता के भी कारण तभी बनते है जब मानसिक गतियों का स्थिर नही रहना,जो भी काम किया जाता है उसके अन्दर किसी न किसी कमी के कारण अथवा किये जाने वाले काम के पूरे होने के समय में अचानक किसी भी प्रकार की कमी के कारण कार्य का बन्द हो जाना या काम की कीमत के मिलने के समय में अचानक काम की समाप्ति हो जाना भी ह्रदय रोग की मुख्य भूमिका मानी जाती है। ह्रदय का कारक चन्द्रमा है और चन्द्रमा को मन का कारक भी कहा जाता है,चन्द्रमा के साथ राहु के मिलने से मन के अन्दर आशंकायें बनी रहती है,और उन आशंकाओं या भ्रम से मन हमेशा उसी भ्रम के लिये चिन्ता मे बना रहता है,दूसरे चन्द्रमा के साथ मंगल होने से और चन्द्रमा तथा मंगल का साथ दु:स्थानों में होने से भी ह्रदय रोग की बीमारी का कारण जाना जाता है। ऊपर दी गई कुंडली में चन्द्रमा मंगल के साथ वृश्चिक राशि का है,इस राशि में विराजमान चन्द्रमा और मंगल अक्सर मृत्यु का कारण ह्रदय रोग से पीडित होने पर ही देते है।इसके लिये भी केतु की सहायता लेनी पडती है लेकिन इसके लिये लहसुनिया का रूप बदल जाता है,इस स्थान के चन्द्र मंगल वाली युति के जातकों को लहसुनिया स्लेटी रंग की जिसके अन्दर हल्की लालिमा हो को स्वर्ण में पहिना जाना ठीक रहता है।
ध्यान यह भी रखा जाता है कि इस स्थान पर चन्द्रमा का रूप या तो विधवा माता के रूप में हो जाता है अथवा माता का जन्म अपने भाई बहिनो में छोटे रूप मे होता है अथवा जातक के परिवार में ही ताई के रूप में माता का रूप होता है या ताई का जातक के साथ मानसिक रूप से अनबन का कारण भी बनता है,जातक का स्वभाव अपने ही भाई बहिनो के प्रति गलत बनता रहता है और जातक के अन्दर अपनी मानसिक द्वन्दता के कारण वह अपने ही लोगों के साथ तर्क करने के लिये अपने को हर समय तैयार रखता है जातक के अन्दर अपने ही भाई के साथ अपघात करने में कोई दिक्कत नही होती है वह किसी न किसी प्रकार से धन के रूप में समाज के रूप में परिवार के रूप में भाई के साथ घात करने के लिये अपनी मानसिकता को लगाये रखता हैजातक का मन रूपी चन्द्रमा जब शरीर से अधिक काम करने लगता है तो भी ह्रदय रोग के लक्षण मिलने लगते है,जैसे चन्द्रमा मिथुन राशि का होकर तीसरे भाव में आजाये,तो जातक अपने को भावुकता से काम करने वाला होता है वह अक्सर मन के अनुसार रोने लगता है मन के अनुसार हंसने लगता है मन के अनुसार रुष्ट हो जाता है मन के अनुसार गालिया देने लगता है और मन के अनुसार ही वह अपने को लेकर चलने वाला होता है अक्सर वे कलाकार जो नाटक आदि में काम करते है अपनी भावुकता से लोगों को हंसाने और रुलाने आदि का कार्य करते है उनके अन्दर इस प्रकार की बीमारी पायी जाती है,एक्टर अधिकतर इसी बीमारी का शिकार होते है,इसके साथ ही चन्द्रमा अगर कन्या राशि का होता तो जातक के अन्दर ह्र्दय की बीमारी का होना पाया जाता है,इसके लिये भी एक कारण बहुत ही चौंकाने वाला माना जाता है कि जातक अपनी छोटी उम्र में ही कामुकता की गिरफ़्त में आजाता है उसके द्वारा सोचे काम बन नही पाते है वह अपने किसी भी प्रयास में सफ़ल नही हो पाता है तो सीधा असर ह्रदय पर ही जाता है,वैसे भी छठा भाव चौथे का तीसरा है यानी अपने ह्रदय को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का कारण बनना,अपने रोजाना के कामों के अन्दर इस राशि वाले चन्द्रमा के लिये माना जाता है कि वह पानी वाले काम अधिक करता है जैसे साफ़ सफ़ाई करना लोगों के लिये सेवा वाले काम करना लोगों के प्रति अपनी भावनात्मक प्रस्तुति को देना आदि इसके अलावा चन्द्रमा जब अष्टम यानी वृश्चिक राशि का होता है तो जातक के अन्दर तकनीकी कला का विकास होना भी माना जाता है वह अक्सर रूहानी कार्यों के लिये अपने को लेकर चलने लगता है किसी भी क्षेत्र के कामो के अन्दर वह अपनी अन्तर्द्र्ष्टि को अधिक प्रयोग में लेने लगता है इस प्रकार से दिमाग में अधिक वजन पडता है और सांसों के अन्दर बदलाव आने लगता है तो भी जातक के ह्रदय पर असर पडना शुरु हो जाता है।
ईस प्रकार के चन्द्रमा वाले जातको को काले रंग की लहसुनिया को पहिनना चाहिये लेकिन यह लहसुनिया तांबे में पहिना जाना उचित है। तांबा मंगल की धातु है और इस धातु में अगर केतु को धारण किया जायेगा तो मानसिक गति जो बिगडती है उसके अन्दर कोई न कोई सहायक कारण बनने लगेगा और जातक के ह्रदय पर पडने वाले बोझ में कमी आजायेगी,इसके अलावा भी जातक को स्वभाव में परिवर्तन लाना जरूरी है जैसे तीसरे चन्द्रमा के लिये छोटी बहिन पर बुरा प्रभाव होगा जरूर लेकिन उसके लिये अगर पहले से ही सोच कर कार्य किये जायेंगे तोवह परेशानियों से बची रहेगी और दिमागी रूप में जातक के लिये ठीक रहेगा,इसके अलावा जातक को अपने कार्यों के अन्दर वे कार्य जो अक्समात हंसी या गमी की सीमा में आते हो नही करना चाहिये,उस स्वभाव मे कमी लानी चाहिये जिनके अन्दर आंखों में अधिक आंसू आते हो,इस बात को भी जान लेना आवश्यक है कि जिनके जल्दी आंसू आते है उनके लिये लो-ब्लड प्रेसर की बीमारी को जाना जाता है और जिनके आंसू आते ही नही है वे हाई-ब्लड प्रेसर के मरीज होते है।
अधिक जानकारी के लिए फोन कर सकते है।
अपने बारे में जानने के लिये बेव-साइटwww.acharyarajesh.in से अपने प्रश्न को जन्म विवरण के साथ भेज सकते है.मित्रोआपशुल्क हमारे बैंक अकाउंट में ,pnb0684000100192346 IFC punb0068400 में या ह हमारा पेटीएम नंबर 7597718725पर या हमारे phone pay Google pay no 9414481324पर भेज सकते हैं परचार्य राजेश कुमार

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

हदय रोग ओर ज्योतिषीय उपचार medical Astrology





मित्रों मेरी पिछली पोस्ट भी बीमारी और रोग पर मैंने लिखी थी आज भी हम एक बीमारी एक रोग की बात करेंगे जिसमें हम लेंगे दिल की बीमारी हदयरोग  की हृदयरोग इन दिनों एक विकराल सेहत समस्या बनकर उभरा है। मित्रों हदय मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है । ह्रदय की बनावट कार्य प्राणी या वाल्वों में रक्त संचार की रुकावट या शिराओं संचार व्यवस्था में गड़बड़ी  होने से ह्रदय के कार्य करने में रुकावट पैदा होती है फलस्वरूप ह्रदय रोग उत्पन्न हो जाते हैं । शरीर की बीमारियों के मामले में अगर देखा जाये ग्रह अपनी सूचना को पहले से देते है अगर जातक सचेत होकर अपने ग्रहों को समझता रहे तो उन बीमारियों से बचा रहेगा। अक्सर ह्रदय रोग सबसे खतरनाक माना गया है  इस रोग से पीड़ित मरीजों की कुंडलियों का विश्लेषण और उनसे बातचीत करने पर पाया कि यदि हार्ट अटैक का कांबीनेशन आपकी कुंडली में है तो आपको अच्छे से अच्छा सर्जन या हृदय रोग विशेषज्ञ भी इस रोग से नहीं बचा सकता।  अस्पतालो में एक हार्ट स्पैशलिस्ट डाक्टर, एक किसान, एक फौजी, एक महिला, एक 12 साल का बच्चा जब बाईपास सर्जरी करवाते दिखे तो उन्होंने उन सभी तथ्यों की पुष्टि की जिनसे हार्ट प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए और फिर भी अच्छी सेहत, उचित रखरखाव और नियमित व्यायाम, योगासनों आदि के बावजूद हो गई।
यूं तो ज्योतिष शास्त्र की मैडीकल शाखा, बहुत विशाल तथा चिकित्सा विज्ञान की तरह ही कॉम्पलीकेटिड है लेकिन फिर भी हम एक कुंडली की उदाहरण देकर आप की सुविधा के लिए कुछ योग बता रहे हैं जो वे स्वयं अपनी कुंडली में देख सकते हैं या सुयोग्य ज्योतिषी को दिखा सकते हैं जिसे इस शाखा में पूर्ण अनुभव हो। वैसे तो बुखार आना भी खतरनाक है लेकिन ह्रदय रोग के कारण बनने के लिये ग्रह युतियों का ध्यान रखा जाये और वास्तविक जीवन के ग्रहों से बचा जाये तो इस रोग से बचा जा सकता है। जैसे बुध का स्थान मेष लगन में है और राहु बुध को ग्यारहवे भाव से देख रहा है साथ ही शनि भी कर्क राशि से बैठ कर अपनी युति को बुध के लिये प्रदान कर रहा है तो जातक के अन्दर पानी वाली बीमारी होगी शनि किसी भी प्रभाव को अपने दसवे स्थान को सप्लाई करता है,जैसे शनि इस कुंडली में पानी वाले भाव और राशि में है,यह अपने असर को सीधा दसवीं द्रिष्टि से बुध को देगा इस असर का रूप शनि के अनुसार होगा जैसे शनि की सिफ़्त ठंडी और गन्दी है तो यह लगन के बुध यानी सिर के स्नायु तन्त्र को ठंडा और गंदा प्रभाव देगा,लेकिन कब देगा इसके लिये जातक के कर्मफ़ल स्थान के बैठे राहु का असर जब बुध को मिलेगा। यानी जातक के रहने वाले स्थान में जहां शनि स्थापित है,वह पानी वाले नम और गन्दे स्थान के रूप में जाना जायेगा,तालाब या नदी वाले स्थान को पाट कर बनाया गया माना जायेगा,अथवा वह निम्न स्तरीय जीवन को जीने वाले लोगों के बीच में जाना जायेगा,उस स्थान पर रहने के कारण तथा किये जाने वाले कार्यों में किसी ऐसी जलवायु का होना जहां कैमिकल इफ़ेक्ट अधिक होगा वह जातक को अपने असर में लेगा और जातक की नाक हमेशा बहती रहेगी,धीरे धीरे यह असर सीधा फ़ेफ़डों पर जायेगा

और सांस वाली बीमारी स्नोफ़ीलिया जुकाम का बना रहना कानों के अन्दर सुरसुराहट का रहना आदि असर देखइसके लिये जातक को तत्वो के रूप में मंगल जो शनि की सिफ़्त को गर्म करेगा,सूर्य जो राहु के कैमिकल इफ़ेक्ट को कम करेगा तथा शुक्र जो जातक के लगन के बुध को अपने कन्ट्रोल में लायेगा के लिये मूंगा माणिक और कुंडली के हिसाब से यंत्र लगाकर  पेन्डल पहिना जाना चाहिये साथ ही जातक को ऐसे स्थानों के निवास से दूर रहना चाहिये उन कामो से बचना चाहिये जो अपने द्वारा वायु में कैमिकल इफ़ेक्ट को पैदा करते हों।
वैसे तो इस पेंडेंट की कीमत बाजार में स्टोन को खरीदने फ़िर उसे बनवाने में हजारों रुपयें में मानी जाती है लेकिन इसे मेटल में बनवा कर और थोक की कीमत में ले् इसे लेने के लिये नीचे लिखें हमारे फोन नंबरों पर आप बात कर सकते हैं,इसे बनाने में माणिक लगभग सवा पांच रत्ती मूंगा पांच से छ: रत्ती और यंत्र का प्रयोग  लाया जाता है।अपने बारे में शरीर के रोगों के बारे में भी आप मेरी बेव साइट से सम्पर्क कर सकते है।ह्रदय रोग के लिये बहुत से कारण और भी बनते है जिनके लिये अगर विस्तृत रूप में कुंडली का विवेचन किया जाये तो कारण मिलने लगते है। इस कुंडली में जो मेष लगन की है और शनि पानी वाले भाव कर्क राशि में विराजमान है,साथ ही राहु छठे भाव में जो बीमारी का भाव माना जाता है में विराजमान है,राहु अपनी उल्टी द्रिष्टि से पानी वाले भाव में बैठे शनि को देख रहा है,तथा शनि और राहु के बीच में चौथे भाव का मालिक चन्द्रमा है,शनि और राहु को पाप ग्रह की उपाधि दी गयी है,दो पाप ग्रह के बीच में बैठा चन्द्रमा ह्रदय रोग की बीमारी का संकेत दे रहा है। इस संकेत से जाना जा सकता है कि जातक का निवास ठंडे और गन्दे स्थान में है तथा वह जो रोजाना के कार्य करता है उसके अन्दर किसी न किसी प्रकार की गन्दगी वाली बात है जो रहने वाले स्थान में वायु को गन्दा कर रही है। छठे भाव को उत्तर पश्चिम दिशा का कारक कहा जाता है जो पश्चिमी दिशा से लगे कोने में रहने वाले स्थान के रूप में भी जाना जाता है राहु का दु:स्थान में जाने का मतलब है कि कोई गन्दा प्रभाव देने वाली वस्तु या कारक उस स्थान पर स्थापित है अधिकतर मामले में इस स्थान पर अगर घर का टायलेट है तो वह भी गन्दी श्रेणी में आयेगा अथवा उस स्थान पर कचडा आदि डालने की जगह अथवा रहने वाले मकान के इस दिशा में कोई गन्दा कारक स्थापित है,इन कारणों से ह्रदय रोग की सम्भावना बढ जाती है और चन्द्रमा बाधित हो जाता है।क्सर एक उपाय बहुत ही कारगर सिद्ध माना जाता है कि जब चन्द्रमा राहु से या शनि से पीडित हो तो केतु का उपाय फ़लदायी हो जाता है,इस उपाय के लिये केतु को सूर्य की या मंगल की धातु में स्थापित करने के बाद उस धातु में मंत्रों से पूरित ताबीजी रूप देकर लहसुनिया को स्थापित कर दिया जाता है इस ताबीजी रूप में बने लहसुनिया को गले में धारण करने से इस प्रकार के ग्रह योग से बने ह्रदय रोग में सहायता मिलती है। पंचम भाव का चन्द्रमा शिक्षा वाले कार्यों के लिये मनोरन्जन वाले कार्यों के लिये और जल्दी से धन कमाने वाले कार्यों के लिये जाना जाता है,शनि जो पानी वाले स्थान में बैठ कर अपना रूप कागज के रूप में भी लेता है और वाहन के रूप में भी जो पानी के अन्दर चलाये जाते है का रूप धारण कर लेता है,चान्दी चावल और उन ठोस कारकों का रूप लेता है जो पानी से अधिक पैदा होते है,अथवा जनता के बीच में रहकर अपने कार्यों को करना भी माना जाता है,साथ ही कार्य करने वाले स्थान के रूप में भी जाना जाता है,जैसे राहु के छठे भाव में होना यानी कार्य स्थान के पास में या तो सार्वजनिक टायलेट का होना या कार्यस्थान के पास में किसी प्रकार की अस्पताली गंदगी का इकट्ठा होना अथवा सफ़ाई कर्मचारियों के द्वारा कचडे को इकट्ठा करने वाला स्थान होना आदि भी माना जाता है इन स्थानों से भी बचने के उपाय करने चाहिये।
मुझसे सम्पर्क करने के लिये आप मेरे फ़ोन नम्बर पर अथवा मेरी बेव साइट www.acharyarajesh.in पर अपनी जन्म तारीख आदि से अपने शरीर में रोग आदि की जानकारी के लिये पता कर सकते है.रत्नो के लिये और रत्न से सम्बन्धित जानकारी के लिये भी अपनी शंका को पता कर् सकते है। आगे,,,,,,,आचार्य राजेश कुमार 

रविवार, 29 सितंबर 2019

Diseases ज्योतिष द्वारा रोग की पहिचान

Diseases  ज्योतिष द्वारा रोग की पहिचान

ज्योतिष शास्त्र भविष्य दर्शन की आध्यात्मिक विद्या है। भारतवर्ष में चिकित्साशास्त्र (आयुर्वेद) का ज्योतिष से बहुत गहरा संबंध है। होमियोपैथ की उत्पत्ति भी ज्योतिष शास्त्र  के आधार पर ही हुआ है I जन्मकुण्डली व्यक्ति के जन्म के समय ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रह नक्षत्रों का मानचित्र होती है, जिसका अध्ययन कर जन्म के समय ही यह बताया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति को उसके जीवन में कौन-कौन से रोग होंगे। चिकित्सा शास्त्र व्यक्ति को रोग होने के पश्चात रोग के प्रकार का आभास देता है।चन्द्रमा के प्रकाश और वायु से धरती पर रोगो को पैदा करने वाले कारक और निवारण के कारक पैदा होते है। जब चन्द्रमा और वायु के कारक गुरु का किसी खराब ग्रह से योगात्मक प्रभाव मिलता है तो चराचर जगत के साथ साथ वनस्पतियों मे भी उनके खराब गुण ही विद्यमान हो जाते है। इसके लिये कहा भी गया है कि ऋतु के अनुसार भोजन लेने से और जो भोजन ऋतु के हिसाब से नही लिया जा सकता है के परित्याग से रोगो का पैदा होना नही मिलता है लेकिन जब जब राहु गुरु चन्द्रमा के साथ साथ अपना प्रभाव देगा वह भाव के अनुसार रोग को पैदा करने के लिये माना जायेगा। मन का कारक चन्द्रमा है और मन के रोगी होने पर शरीर रोगी हो जाता है और मन के प्रसन्न रहने पर शरीर रोग से दूर रहता है। उसी प्रकार से गुरु वायु का और प्राण वायु को संचालित करने का काम करता है जैसे ही गुरु का मिलना राहु या इसी प्रकार के ग्रह शनि केतु मंगल आदि ग्रहों के रोगी भाव के ग्रह के साथ युति लेने से रोग की शुरुआत हो जाती है। चन्द्रमा के लिये शीतकाल का समय बहुत ही अच्छा माना जाता है और इसी लिये देखा होगा कि शरद ऋतु की पूर्णिमा का चन्द्रमा रोगो से लडने की शक्ति को रखता है और लोग इस शरदीय पूर्णिमा को नदियों मे सरोवरो मे स्नान भी करते है और खीर आदि बनाकर रात को चन्द्रमा के सामने रखते है सुबह को उसका सेवन करते है जिससे चन्द्रमा के द्वारा दिये गये रोग निदान की शक्ति को ग्रहण किया जाता है। एक बात और भी देखी होगी कि पूर्णिमा के दिन मन भी बहुत प्रसन्न रहता है और अमावस्या के दिन मन की गति भी बहुत कमजोर मानी जाती है,जो काम अमावस्या को शुरु करने पर नही हो पाता है वह पूर्णिमा के दिन शुरु करने से पूरा हो जाता है। राजस्थान मे देखा भी गया है कि अमावस्या को मेहनत का काम करने वाले कारीगर इमारतो का काम करने वाले ठेकेदार काम को बन्द ही रखते है और काम को इसलिये नही करते है कि वे मानते है कि यह दिन उनके पूर्वजो का है और पूर्वजो के लिये वे काम नही करते है इसके पीछे जो वैज्ञानिक कारण सामने आता है वह केवल यही है कि मेहनत के काम को करने के बाद अगर अमावस्या को किया जाता है तो वह काम अगर खराब हो जाता है तो दुबारा से करना पडेगा और किये गये काम की मेहनत के साथ साथ उसका फ़ल भी खराब हो जायेगा। इसी प्रकार से समुद्र के अन्दर होने वाले बदलाव को भी इन्ही तिथियों मे देखा जा सकता है। रोगो की वृद्धि और कमी भी इन्ही तिथियों मे देखी जा सकती है। चन्द्रमा का रोगो से बहुत सम्बन्ध होता है इस बात को एक प्रकार से और भी देखा जा सकता है कि अगर रात को बच्चा जन्म लेता है तो बच्चे की आंखे नीली या कालिमा लिये होती है जबकि दिन को जन्म लेने वाले बच्चे की आंखो की पुतली का रंग बिलकुल सफ़ेद होता है यही बात अगर आप कर्क के चन्द्रमा और वृश्चिक के चन्द्रमा से देखेंगे तो कर्क के चन्द्रमा मे जन्म लेने वाले जातक की दांतो की पहिचान बहुत ही सुन्दर व चमकीली होती है जबकि चन्द्रमा के वृश्चिक राशि मे होने से दांतो की पहिचान गन्दी और पायरिया आदि से ग्रस्त तथा टेढी मेढी होती है,उसी प्रकार से मीन के चन्द्रमा मे जातक के दांत लम्बे होते है वृष के चन्द्रमा के दांत चौडे और सामने के चौकोर होते है।
"ज्योतिष के अनुसार यह भी कहा जाता है कि दवाई रत्न ग्रह नक्षत्र तारा आदि जब भाग्य सही होता है तो वह सभी सफ़ल हो जाते है और जब दुर्भाग्य का समय होता है तो वे सभी बेकार हो जाते है" इसलिये रोगो के लिये और इलाज के लिये सबसे पहले भाग्य का देखना जरूरी होता है और भाग्य सही नही है तो किसी भी प्रकार से रोग भी ठीक नही होता है और रोगी को कष्ट भी मिलता है।"जब  यदि देवयोग से शनि रोग का कारक बनता हो, जो जातक को लम्बे समय तक पीड़ित रखता है। यह और एक दर्द भी है कि राहु जब किसी रोग का जनक होता है, तो बहुत समय तक तो उस रोग की जांच (डायग्नोसिस) ही नहीं हो पाती है। डाक्टर यह समझ ही नहीं पाता है कि जातक को क्या बीमारी है? और ऐसी स्थिति में रोग अपेक्षाकृत अधिक अवधि तक चलता है।
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी रोगों से अवश्य पीड़ित होता है। कुछ व्यक्ति कुछ विशेष समय में अथवा माह में ही प्रतिवर्ष बीमार हो जाते है। ये सभी तथ्य प्रायः जन्म पत्रिका में ग्रहों की भावगत एवं राशिगत स्थितियों और दशा, अन्तर्दशा पर निर्भर करते हैं। इसके अतिरिक्त कई बीमारियां ऐसी हैं, जो होने पर बहुत कम दुष्प्रभाव डाल पाती हैं, जबकि कुछ बीमारियां ऐसी हैं, जो जब भी जातक विशेष को होती हैं, तो बहुत नुकसान पहुंचाती है। कई बार ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है कि बीमारी होती तो हैं लेकिन उसकी पहचान भली प्रकार से नहीं हो पाती है। उन सभी प्रकार के तथ्यों का पता जातक की कुंडली को देखकर लगाया जा सकता है।आयुर्वेद शास्त्र में अनिष्ट ग्रहों का विचार कर रोग का उपचार विभिन्न रत्नों का उपयोग और रत्नों की भस्म का प्रयोग कर किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोगों की उत्पत्ति अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से एवं पूर्वजन्म के अवांछित संचित कर्मो के प्रभाव से बताई गई है। अनिष्ट ग्रहों के निवारण के लिए पूजा, पाठ, मंत्र जप, यंत्र धारण, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न धारण आदि साधन ज्योतिष शास्त्र में उल्लेखित है।
ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव दूर करने के लिये रत्न धारण करने की बिल्कुल सार्थक है। इसके पीछे विज्ञान का रहस्य छिपा है और पूजा विधान भी विज्ञान सम्मत है। ध्वनि तरंगों का प्रभाव और उनका वैज्ञानिक उपयोग अब हमारे लिये रहस्यमय नहीं है। इस पर पर्याप्त शोध किया जा चुका है और किया जा रहा है। आज के भौतिक और औद्योगिक युग में तरह-तरह के रोगों का विकास हुआ है। रक्तचाप, डायबिटीज, कैंसर, ह्वदय रोग, एलर्जी, अस्थमा, माईग्रेन आदि औद्योगिक युग की देन है। इसके अतिरिक्त भी कई बीमारियां हैं, जिनकी न तो चिकित्सा शास्त्रियों को जानकारी है और न उनका उपचार ही सम्भव हो सका है। आचार्य राजेश

शनिवार, 28 सितंबर 2019

संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात


 हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----` संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात ´। मित्रों ज्योतिष भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। इस बात को एक उदाहरण की सहायता से अच्छी तरह समझाया जा सकता है। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो , तो उन कमजोरियों के कारण , जिनका चंद्रमा स्वामी है ,बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है , उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा। उसे उन बच्चों के साथ अधिकांश समय व्यतीत करना चाहिए , जिन बच्चों का जन्म पूर्णिमा के आसपास हुआ हो। उन बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा होजाएगा। इसके विपरीत यदि उन्हें अमावस्या के निकट जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ ही रखा जाए तो बालक अधिक दब्बू किस्म का हो जाएगा। इसी प्रकार अधिक उच्छृंखल बच्चों को अष्‍टमी के आसपास जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ रखकर उनके स्वभाव को संतुलित बनाया जा सकता है। इसी प्रकार व्‍यवसाय , विवाह या अन्‍य मामलों में अपने कमजोर ग्रहों के प्रभाव को कम करने या अपने कमजोर भावों की समस्‍याओं को कम करने के लिए सामने वाले के यानि मित्रों या जीवनसाथी की जन्‍मकुंडली में उन ग्रहों या मुद्दों का मजबूत रहना अच्‍छा होता है। इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है।प्राचीनकाल से ही दान का अपना महत्व रहा है , परंतु दान किस प्रकार का किया जाना चाहिए , इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। दान के लिए शुद्ध द्रब्य का होना अनिवार्य है । दान के लिए सुपात्र वह व्यक्ति है , जो अनवरत किसी क्रियाकलाप में संलग्न होते हुए भी अभावग्रस्त है। दुष्‍कर्म या पापकर्म करनेवाले या आलसी व्यक्ति को दान देना बहुत बड़ा पाप होता है । यदि दान के नाम पर आप ठगे जाते हैं , तो इसका पुण्य आपको नहीं मिलेगा। इसलिए दान का उचित फल प्राप्त करने के लिए आप दान करते या देते समय ध्यान रखें कि दान उस सुपात्र तक पहुंच सके , जहॉ इसका उचित उपयोग हो सके।ऐसे में आपको सर्वाधिक फल की प्राप्ति होगी।साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए , खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्‍यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो , तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए। जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त जोकिया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें। राहु के लिए कुष्ठ आश्रम में दान दे। केतु के लिए विकलांग अपाहिज, सफाईकर्मचारी जो जरुरतमंद हो
 यह तथ्‍य सर्वविदित ही है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। जिन रंगों को वे अवशोषित करती हैं , वे हमें दिखाई नहीं देती , परंतु जिन रंगों को वे परावर्तित करती हैं , वे हमें दिखाई देती हैं। यदि ये नियम सही हैं तो चंद्र के द्वारा दूधिया सफेद , बुध के द्वारा हरे , मंगल के द्वारा लाल , शुक्र के द्वारा चमकीले सफेद , सूर्य के द्वारा तप्‍त लाल , बृहस्पति के द्वारा पीले और शनि के द्वारा काले रंग का परावर्तन भी एक सच्‍चाई होनी चाहिएपृथ्‍वी में हर वस्‍तु का अलग अलग रंग है , यानि ये भी अलग अलग रंगों को परावर्तित करती है । इस आधार पर सफेद रंग की वस्‍तुओं का चंद्र , हरे रंग की वस्‍तुओं का बुध , लाल रंग की वस्‍तुओं का मंगल , चमकीले सफेद रंग की वस्‍तुओं का शुक्र , तप्‍त लाल रंग की वस्‍तुओं का सूर्य , पीले रंग की वस्‍तुओं का बृहस्‍पति और काले रंग की वस्‍तुओं का श‍नि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण है कि नवविवाहिता स्त्रियों को मंगल ग्रह के दुष्‍प्रभावों से बचाने के लिए लाल रंग को परावर्तित करने के लिए प्राय: लाल वस्त्र से सुशोभित करने तथा मॉग में लाल सिंदूर लगे की प्रथा है।इसी कारण चंद्रमा का प्रभाव बड़ाने  के लिए मोती , बुध के लिए पन्ना , मंगल के लिए मूंगा , शुक्र के लिए हीरा , सूर्य के लिए माणिक , बृहस्पति के लिए पुखराज और शनि के लिए नीलम पहनने की परंपरा समाज में बनायी गयी है। ये रत्न संबंधित ग्रहों की किरणों को उत्सर्जित कर देते हैं , जिसके कारण ये किरणें इन रत्नों के लिए तो प्रभावहीन होती ही हैं , साथ ही साथ इसको धारण करनेवालों के लिए भी प्रभावहीन बन जाती हैं। इसलिए रत्नों का प्रयोग सिर्फ  ग्रहों को मजबूत के लिए ही किया जाना चाहिए , बुरे ग्रहों के लिए नहीं कभी-कभी पंडितों की समुचित जानकारी के अभाव के कारण ये रत्न जातक को अच्छे फल से भी वंचित कर देती है।रंगों में अद्भूत प्रभाव होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि विभिन्न रंगों की बोतलों में रखा पानी सूर्य के प्रकाश में औषधि बन जाता है , जिसका उपयोग विभिन्न रोगों की चिकित्सा में किया जाता है।यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का प्रयोग सही मात्रा होना चाहिए। इन रंगों की वस्तुओं का  आप दान करें , तो काफी फायदा हो सकता है। क्योंकि हम जिस वस्तु को स्पर्श करते हैं उसको छूने से ऊर्जा ग्रहण भी करता है हमारा शरीर और छोड़ता भी है यानी हमारे शरीर की ऊर्जा बैलेंस होने लगती है आचार्य राजेश

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

ज्योतिष विद्या : विज्ञान या अंधविश्वास

ज्योतिष विद्या : विज्ञान या अंधविश्वास 

ज्योतिष विज्ञान है या अंधश्वास , इस प्रश्न का उत्तर दे पाना समाज के किसी भी वर्ग के लिए आसान नहीं है। परंपरावादी और अंधविश्वासी विचारधारा के लोग ,जो कई स्थानों पर ज्योतिष पर विश्वास करने के कारण धोखा खा चुकें हैं ,भी इस शास्त्र पर संदेह नहीं करते। सारा दोषारोपण ज्योतिषी पर ही होता है। वैज्ञानिकता से संयुक्त विचारधारा से ओत-प्रोत व्यक्ति भी किसी मुसीबत में फंसते ही समाज से छुपकर ज्योतिषियों की शरण में जाते देखे जाते हैं। ज्योतिष की इस विवादास्पद स्थिति के लिए मै सरकार ,शैक्षणिक संस्थानों एवं पत्रकारिता विभाग को दोषी मानता हूं। 

सरकार यदि चाहती तो  सभी पत्रिकाओंओर TV channel पर में राशि-फल के प्रकाशन /प्रसारण पर रोक लगाया जा सकता था। आखिर हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वासों जैसे जुआ , मद्यपान , बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि को समाप्त करनें में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है ,परंतु ज्योतिष पर विश्वास करनेवालों के लिए ऐसी कोई कड़ाई नहीं हुई। आखिर क्यों ?
 पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए तो लगभग सभी पत्रिकाएं यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, इंटरव्यू , भविष्यवाणियॉ आदि निकालती रहती है पर जब आजतक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका, जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया तो फिर ऐसे लेखों या समाचारों का क्या औचित्य ?पत्रिकाओं के विभिन्न लेखों हेतु किया जानेवाला ज्योतिषियों कें चयन का तरीका ही गलत है । उनकी व्यावसायिक सफलता को उनके ज्ञान का मापदंड समझा जाता है , लेकिन वास्तव में किसी की व्यावसायिक सफलता उसकी व्यावसायिक योग्यता का परिणाम होती है ,न कि विषय-विशेष की गहरी जानकारी। इन सफल ज्योतिषियों का ध्यान फलित ज्योतिष के विकास में न होकर अपने व्यावसायिक विकास पर होता है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा ज्योतिष विज्ञान का प्रतिनिधित्व करवाना जनता को कोई संदेश नहीं दें पाता है। जो ज्योतिषी ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध कर सकें , उन्हें ही अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए या एक प्रतियोगिता में किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान देकर सभी ज्योतिषियों से उस जन्मपत्री का विश्लेषण करवाना चाहिए । उसकी पूरी जिंदगी कें बारे में जो ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी कर सके उसे ही अखबारों ,पत्रिकाओं टीवी चैनल में स्थान मिलना चाहिए।

परंतु ज्योतिषियों की परीक्षा लेने के लिए कभी भी ऐसा नहीं किया गया ,फलस्वरुप ज्योतिष की गहरी जानकारी रखनेवाले समाज के सम्मुख कभी नहीं आ सके और समाज नीम-हकीम ज्योतिषियों से परेशान होता रहा। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कुछ लोग और कुछ संस्थाएं ऐसी है , जो ज्योतिष विज्ञान के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। वे ज्योतिष से संबंधित बातों को सुनने में रुचि कम और उपहास में रुचि ज्यादा रखते हैं। उनके दृष्टिकोण में समन्वयवादिता की कमी भी आजतक ज्योतिष को विज्ञान नहीं सिद्ध कर पायी है।
ज्योतिष विज्ञान की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए यह कहा जाता है कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, किन्तु ज्योतिष शास्त्र यह मानता है कि पृथ्वी स्थिर है और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। जब यह परिकल्पना ही गलत है तो उसपर आधारित भविष्यवाणी कैसे सही हो सकती है ? हमारे ऋषि मुनियों पर भी संदेह किया गया पर बात ऐसी नहीं है । जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं , वह चलायमान होते हुए भी हमारे लिए स्थिर है , ठीक उसी प्रकार , जिस प्रकार हम किसी गाड़ी में चल रहे होते हैं , वह हमारे लिए स्थिर होती है और किसी स्टेशन पर पहुंचते ही हम कहते हैं , `अमुक शहर आ गया।´ जिस पृथ्वी में हम रहतें हैं , उसमें हम स्थिर सूर्य के ही उदय और अस्त का प्रभाव देखते हैं। इसी प्रकार अन्य आकाशीय पिंडों का भी प्रभाव हमपर पड़ता है। पृथ्वी से कोई कृत्रिम उपग्रह को किसी दूसरे ग्रह पर भेजना होता है तो पृथ्वी को स्थिर मानकर ही उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की दूरी निकालनी पड़ती है। जब यह सब गलत नहीं होता तो ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानते हुए उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की गति पर आधारित फल कैसे गलत हो सकता है ?

ज्योतिष की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि सौरमंडल में सूर्य तारा है , पृथ्वी, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रह हैं तथा चंद्रमा उपग्रह है, जबकि ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रह माने जाते हैं । इसलिए इस परिकल्पना पर आधारित भविष्यवाणी महत्वहीन है। इसके उत्तर में मेरा यह कहना है कि सभी विज्ञान में एक ही शब्दों के तकनीकी अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । अभी विज्ञान पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन कर रहा है। ब्रह्मांड में स्थित सभी पिंडों को स्वभावानुसार कई भागों में व्यक्त किया गया है। सभी ताराओं की तरह ही सूर्य की प्रकृति होने के कारण इसे तारा कहा गया है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को ग्रह कहा गया है। ग्रहों की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को उपग्रह कहा गया है। किन्तु फलित ज्योतिष पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं कर सिर्फ अपने सौरमंडल का ही अध्ययन करता है। सूर्य को छोड़कर अन्य ताराओं का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं महसूस किया गया है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उपग्रहों का पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया है । सूर्य, चंद्र , बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं मंगल की गति और स्थिति के प्रभाव को पृथ्वी , उसके जड़-चेतन और मानव-जाति पर महसूस किया गया है। इसलिए इन सबों को ग्रह कहा जाता है। ग्रहों की इस शास्त्र में यही परिभाषा दी गयी है। इसके आधार पर इसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।तीसरा तर्क यह है कि ज्योतिष में राहू और केतु को भी ग्रह माना गया है , जबकि ये ग्रह नहीं हैं । ये तर्क बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले यह जानकारी आवश्यक है कि राहू और केतु हैं क्या ? पृथ्वी को स्थिर मानने से पृथ्वी के चारो ओर सूर्य का एक काल्पनिक परिभ्रमण-पथ बन जाता है। पृथ्वी के चारो ओर चंद्रमा का एक परिभ्रमण पथ है ही । ये दोनो परिभ्रमण-पथ एक दूसरे को दो विन्दुओं पर काटते हैं । अतिप्राचीनकाल में ज्योतिषियों को मालूम नहीं था कि एक पिंड की छाया दूसरे पिंडों पर पड़ने से ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं। जब ज्योतिषियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं और सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रह की गणना सैकड़ों साल पहले ही हम बता देते हैं हमारे ऋषि-मुनियों ने अंतघ्यान हो कर ब्रह्मांड को देखा और उसको पूरा समझने के लिए आपको भीतर के ब्रह्मांड को देखना ही पड़ेगा तभी ज्योतिष के बारे में आप की जानकारी पूरी होगी वरना बाहर से कुछ हासिल नहीं होता अधूरा ही मिलेगा

चौथा तर्क यह है कि सभी ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में विविधता क्यों होती है ? हम सभी जानते हैं कि कोई भी शास्त्र या विज्ञान क्यों न हो कार्य और कारण में सही संबंध स्थापित किया गया हो तो निष्कर्ष निकालने में कोई गल्ती नहीं होती। इसके विपरित यदि कार्य और कारण में संबंध भ्रामक हो तो निष्कर्ष भी भ्रमित करनेवाले होंगे। ज्योतिष विज्ञान का विकास बहुत ही प्राचीन काल में हुआ। उस काल में कोई भी शास्त्र काफी विकसित अवस्था में नहीं था।सभी शास्त्रों और विज्ञानों में नए-नए प्रयोग कर युग के साथ-साथ उनका विकास करने पर बल दिया गया , पर अफसोस की बात है कि ज्योतिष विज्ञान अभी भी वहीं है जहॉ से इसने यात्रा शुरु की थी । महर्षि जैमिनी और पराशर के द्वारा ग्रह शक्ति मापने और दशाकाल निर्धारण के जो सूत्र थे ,उसकी प्रायोगिक जॉच कर उन्हें सुधारने की दिशा में कभी कार्य नहीं किया गया। अंधविश्वास समझते हुए ज्योतिष-शास्त्र की गरिमा को जैसे-जैसे धक्का पहुंचता गया, इस विद्या का हर युग में ह्रास होता ही गया।

फलस्वरुप यह 21वीं सदी में भी घिसट-घिसटकर ही चल रहा है। ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में अंतर का कारण कार्य और कारण में पारस्परिक संबंध की कमी होना है। ग्रह-शक्ति निकालने के लिए मानक-सूत्र का अभाव है। कुल 10-12 सूत्र हैं ,सभी ज्योतिषी अलग अलग सूत्र को महत्वपूर्ण मानते हैं। दशाकाल निर्धारण का एक प्रामाणिक सूत्र है , पर उसमें एक साथ जातक के चार-चार दशा चलते रहतें हैं-एक महादशा, दूसरी अंतर्दशा, तीसरी प्रत्यंतर दशा और चौथी सूक्ष्म महादशा। इतने नियमों को यदि कम्प्यूटर में भी डाल दिया जाए , तो वह भी सही परिणाम नहीं दे पाता है , तो पंडितों की भविष्यवाणी में अंतर होना तो स्वाभाविक है। सभी ज्योतिषी अलग अलग दशा को महत्वपूर्ण मान लें तो सबके कथन में अंतर तो आएगा ही।  ओर फिर अगर आप समुंदर के किनारे खड़े हैं और आपके पास जो जो पात्र हैं उतना उतना ही जल ले पाओगे अगर आपके पास पात्र छोटा है तो उसमें कम जल आएगा अगर आपके पास पात्र बड़ा है तो उसमें ज्यादा जल आएगा इसी तरह ज्योतिष ज्ञान है।
ज्योतिष विज्ञान मूलत: संकेतों का विज्ञान है , यह बात न तो ज्योतिषियों को और न ही जनता को भूलनी चाहिए। किन्तु जनता ज्योतिषी को भगवान बनाकर तथा ज्योतिषी अपने भक्तों को बरगलाकर फलित ज्योतिष के विकास में बाधा पहुंचाते आ रहे हैं। हर विज्ञान में सफलता और असफलता साथ-साथ चलती है। मेडिकल साइंस को ही लें। हर समय एक-न-एक रोग डॉक्टर को रिसर्च करने को मजबूर करते हैं। किसी परिकल्पना को लेकर ही कार्य-कारण में संबंध स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, पर सफलता पहले प्रयास में ही मिल जाती है, ऐसी बात नहीं है। अनेकानेक प्रयोग होते हैं , करोड़ों-अरबों खर्च किए जाते हैं, तब ही सफलता मिल पाती है ।
भूगर्भ-विज्ञान को ही लें, प्रारंभ में कुछ परिकल्पनाओं को लेकर ही कि यहॉ अमुक द्रब्य की खान हो सकती है , कार्य करवाया जाता था ,परंतु बहुत स्थानों पर असफलता हाथ आती थी। धीरे-धीरे इस विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि कसी भी जमीन के भूगर्भ का अध्ययन कम खर्च से ही सटीक किया जा सकता है। अंतरिक्ष में भेजने के लिए अरबों रुपए खर्च कर तैयार किए गए उपग्रह के नष्ट होने पर वैज्ञनिकों ने हार नहीं मानी। अभी हाल ही में चंद्रयान इसरो ने भेजा उसके बारे में सभी जानते हैं उनकी कमजोरियों पर ध्यान देकर उन्हें सुधारने का प्रयास किया जा रहा है तो अब सफलता मिल रही है। उपग्रह से प्राप्त चित्र के सापेक्ष की जानवाली मौसम की भविष्यवाणी नित्य-प्रतिदिन सुधार के क्रम में देखी जा रही है।
मानव जब-जब गल्ती करते हैं , नई-नई बातों को सीखते हैं ,तभी उनका पूरा विकास हो पाता है , परंतु ज्योतिष-शास्त्र के साथ तो बात ही उल्टी है , अधिकांश लोग तो इसे विज्ञान मानने को तैयार ही नहीं , सिर्फ खामियॉ ही गिनाते हैं और जो मानते हैं , वे अंधभक्त बने हुए हैं । यदि कोई ज्योतिषी सही भविष्यवाणी करे तो उसे प्रोत्साहन मिले न मिले ,उसके द्वारा की गयी एक भी गलत भविष्यवाणी का उसे व्यंग्यवाण सुनना पड़ता है। इसलिए अभी तक ज्योतिषी इस राह पर चलते आ रहें हैं , जहॉ चित्त भी उनकी और पट भी उनकी ही हो। यदि उसने किसी से कह दिया, `तुम्हे तो अमुक कष्ट होनेवाला है , पूजा करवा लो ,यदि उसने पूजा नहीं करवाई और कष्ट हो गया,तो ज्योतिषी की बात बिल्कुल सही। यदि पूजा करवा ली और कष्ट हो गया तो `पूजा नहीं करवाता तो पता नहीं क्या होता´ । यदि पूजा करवा ली और कष्ट नहीं हुआ तो `ज्योतिषीजी तो किल्कुल कष्ट को हरनेवाले हैं´ जैसे विचार मन में आते हैं। हर स्थिति में लाभ भले ही पंडित को हो , फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी धक्का पहुंचता आ रहा है।चीज का विकास लगभग नियिचत होता है प्रकृति का यह नियम है कि जिस बीज को उसने पैदा किया , उसे उसकी आवश्यकता की वस्तु मिल ही जाएगी । देख-रेख नहीं होने के बावजूद प्रकृति की सारी वस्तुएं प्रकृति में विद्यमान रहती ही है। बालक जन्म लेने के बाद अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी मॉ पर निर्भर होता है। यदि मॉ न हों , तो पिता या परिवार के अन्य सदस्य उसका भरण-पोषण करते हैं। यदि कोई न हो , तो बालक कम उम्र में ही अपनी जवाबदेही उठाना सीख जाता है। एक पौधा भी अपने को बचाने के लिए कभी टेढ़ा हो जाता है , तो कभी झुक जाता है। लताएं मजबूत पेड़ों से लिपट कर अपनी रक्षा करती हैं ।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सबकी रक्षा किसी न किसी तरह हो ही जाती है और ऐसा ही ज्योतिष शास्त्र के साथ हुआ। आज जब सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं ज्योतिष विज्ञान के प्रति उपेक्षात्मक रवैया अपना रही है, 
जीवन में सभी ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिए भी आपको भीतर का ज्ञान होना आवश्यक है 
 किसी व्यक्ति का भविष्य जानना असंभव तो नहीं , मुश्किल भी नहीं रह गया है , क्योंकि व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करने में बड़ा अंश विज्ञान के नियम का होता है , छोटा अंश ही सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक या पारिवारिक होता है या व्यक्ति खुद तय करता है। वास्तव में , हर कर्मयोगी आज यह मानते हैं कि कुछ कारकों पर आदमी का वश होता है , कुछ पर होकर भी नहीं होता और कुछ कुछ पर तो होता ही नहीं । व्यक्ति का एक छोटा निर्णय भी गहरे अंधे कुएं में गिरने या उंची छलांग लगाने के लिए काफी होता है। इतनी अनिश्चितता के मध्य भी अगर ज्योतिष भविष्य में झांकने की हिम्मत करता आया है तो वह उसका दुस्साहस नहीं , वरण् समय-समय पर किए गए रिसर्च के मजबूत आधार पर उसका खड़ा होना है। और फिर मित्रों भविष्य बताने वाला कुक्षी कितना भीतर से उस परमात्मा से जुड़ा हुआ है ?कितनी उसने अपना अध्यात्म में बल प्राप्त है !यह सब बातें भी निर्भर करती है! अब सही ज्योतिषी की तलाश कैसे करें? कोई ज्योतिषी जो होगा मित्रों वो कभी भविष्यफल बताने के लिए राशिफल का सहारा नहीं लेगा क्योंकि ज्योतिष विज्ञान के बोबिल्कुल उलट है तो जो लोग राशिफल बता रहे हैं आप उन्हें नजरअंदाज करें!आपकी कुंडली ओर गोचर दोनो का प्रभाव आपका आने वाला समय तय करता है! आचार्य राजेश

शनिवार, 21 सितंबर 2019

भारत की कुंडली

https://wp.me/p8Sg50-1Ib
मित्रों मुझे बहुत दुख होता है जब मैं देखता हूं बड़े बड़े अच्छे  नाम वाले ज्योतिषी सदियों से  लोगों को गुमराह कर रहे हैं राशिफल के नाम पर और भी जाने क्या-क्या   और अब मैं देख रहा हूं कि 15 अगस्त  भारतदेश की कुंडली की बात हो रही है जो हर साल होती है तो उसको लेकर मेरे क्या विचार हैं आइए जानते हैंभारतवर्ष की कुंडली का विश्लेषण समय-समय पर ज्योतिषीगण करते ही रहते हैं। आज मैं इस मुद्दे पर अपना मत प्रकट कर रहा हूं- जड़ वस्तु का ज्योतिषीय विश्लेषण नहीं-
 मेरा मानना है कि किसी भी जड़ वस्तु का ज्योतिषीय विश्लेषण नहीं हो सकता फ़िर चाहे वह देश हो, खेत-खलिहान हो या मकान इत्यादि। उनके ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए वह जिस व्यक्ति के आधिपत्य में है उसकी जन्मपत्रिका का विश्लेषण किया जाना चाहिए ना कि उस वस्तु का, जैसे यदि किसी राज्य का विश्लेषण करना हो तो वह उसके राजा की जन्मपत्रिका के आधार पर किया जाएगा
भारत की प्रचलित कुंडली गलत है-
 यदि हम यह मान भी लें कि भारतवर्ष की कुंडली के आधार पर भारत के भविष्य के संबंध में कुछ भविष्यवाणियां की जा सकती हैं तो उसके लिए भारत की प्रामाणिक जन्मपत्रिका का होना आवश्यक है। अभी तक तथाकथित ज्योतिषीगण जिस जन्मपत्रिका को भारत की जन्मपत्रिका बताकर उसका विश्लेषण करते हैं वह जन्मपत्रिका सर्वथा असत्य व गलत है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि जन्मपत्रिका के निर्माण के लिए जातक के जन्म की सही दिनांक, समय व स्थान की आवश्यकता होती है। भारत के संबंध में यह तीनों ही अप्राप्त हैं अब आप शायद मेरी बातों का विश्वास ना करें क्योंकि आप कहेंगे भारत का जन्म तो 15 अगस्त सन 1947 को रात्रि 12:00 बजे हुआ था। भारतवर्ष की बताई जाने वाली जन्मपत्रिका भी इसी समय व दिनांक के आधार पर बनी हुई होती है लेकिन यह पूर्णत: गलत है क्योंकि जन्म तो 'पाकिस्तान' का हुआ था ना कि भारत का, भारत का तो विभाजन हुआ था। विभाजन के आधार पर यदि भारत का जन्म माने तो भारत का विभाजन तो इससे पूर्व भी कई बार हो चुका था। अत: भारत के जन्म अर्थात निर्माण के सम्बन्ध में कोई दिनांक व समय प्राप्त ही नहीं है तो फ़िर जन्मपत्रिका का निर्माण कैसे हो?

 एक समान कुंडली-नोट यहां में जड़ वस्तु की वात कर रहा हु 
 
14 एवं 15 अगस्त को रात्रि 12:00 बजे को आधार मानकर निर्माण की जाने वाली कुंडलियों में चन्द्र को छोड़कर सभी ग्रहों  की समानता है क्योंकि ग्रह परिवर्तन सामान्यत: कम से कम 1 माह में ही होता है। अत: जब कुंडली एक ही समान हैं तो फ़लित विलग-विलग कैसे   संभव है? इसका निर्णय आप स्वयं कीजे विभाजन के आधार पर समय अलग नहीं हो सकता-कुछ विद्वानों ने 13 रात का समय लिया तो कुछ विद्वानों ने 14 सुवह का पाकिस्तान का लिया है
 हम यदि भारत के विभाजन को भी जन्मपत्रिका निर्माण का आधार मानें जो कि सर्वथा गलत है तो भी विभाजन का समय अलग-अलग नहीं हो सकता। जिस दिन पाकिस्तान का निर्माण किया गया ठीक उसी समय वर्तमान भारत भी अस्तित्व में आ गया फ़िर दोनों देशों का निर्माण समय अलग-अलग कैसे हुआ? स्वतन्त्रता या परतन्त्रता ज्योतिष का आधार नहीं हो सकती।
 अत: उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतवर्ष की कुंडली बनाकर उसका फ़लित व भविष्य विश्लेषण सम्बन्धी बातें करना नितांत असत्य व भ्रामक हैं।कल वात करते हैं कि भारत का नाम भारत कैसे पड़ा। मित्रों भारतवर्ष का नामकरण कैसे हुआ इस संबंध में मतभेद हैं। भारतवर्ष में तीन भरत हुए एक भगवान ऋषभदेव के पुत्र, दूसरे राजा दशरथ के और तीसरे दुश्यंत- शकुंतला के पुत्र भरत।
भारत-1 : भारत नाम की उत्पति का संबंध प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट राजा मनु के वंशज भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत से है। श्रीमद् भागवत एवं जैन ग्रंथों में उनके जीवन एवं अन्य जन्मों का वर्णन आता है।

ऋषभदेव स्वयंभू मनु से पांचवीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वयंभू मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। राजा और ऋषि ऋषभनाथ के दो पुत्र थे- भरत और बाहुबली।

बाहुबली को वैराग्य प्राप्त हुआ तो ऋषभ ने भरत को चक्रवर्ती सम्राट बनाया।
भारत-2 : राम के छोटे भाई भरत राजा दशरथ के दूसरे पुत्र थे। उनकी माता कैकयी थी। उनके अन्य भाई थे लक्ष्मण और शत्रुघ्न। परंपरा के अनुसार राम को गद्दी पर विराजमान होना था लेकिन उन्हें 14 वर्ष का वनवास मिला। इस दौरान भरत ने राजगद्दी संभाली और उन्होंने राज्य का विस्तार किया। कहते हैं उन्हीं के कारण इस देश का नाम भारत पड़ा।
भरत-3 : पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना 'महाभारत' में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। कालिदास कृत महान संस्कृत ग्रंथ 'अभिज्ञान शाकुंतलम' के एक वृत्तांत अनुसार राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष का नामकरण हुआ।
मरुद्गणों की कृपा से ही भरत को भारद्वाज नामक पुत्र मिला। भारतद्वाज महान ‍ऋषि थे। चक्रवर्ती राजा भरत के चरित का उल्लेख महाभारत के आदिपर्व में भी है।
हालांकि ज्यादातर विद्वान मानते हैं कि ऋषभनाथ के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर ही भारत का नामकरण हुआ।  आचार्य राजेश

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...