आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
गुरुवार, 13 अप्रैल 2017
ग्रहों से चोखा पोस्ट नंबर ३ मित्रोंजो भी हमारे साथ होता है उसके पीछे भाग्य तो होता ही है परन्तु कुंडली में ग्रहों का अध्ययन करके हम घटनाओं के कारणों का पता लगा सकते हैं और बहुत से घटनाओं के प्रति सचेत हो सकते हैं.हमारे जन्म होते ही हम कई प्रकार के संबंधो से घिर जाते हैं जैसे, माता-पिता के साथ सम्बन्ध, उनसे जुड़े लोगो से सम्बन्ध , जिन्हें हम अलग अलग नामो से पुकारते हैंउम्र बढ़ने के साथ ही और भी बहुत से सम्बन्ध बनते चले जाते हैं जैसे दोस्त, प्रेमी, पति-पत्नी, गुरु, साथी आदि. परन्तु इससे भी हम मना नहीं कर सकते हैं की कुछ लोग जीवन में कुछ रिश्तो से धोखा खा जाते हैं या फिर यूँ कहे की कुछ संबंधो के साथ लोगो के अनुभव नकारात्मक होते हैं.किसी पे भरोसा करने का कोई एक सिधांत नहीं है, कोई भी जीवन में धोखा दे सकता है, कोई भी हमे नुक्सान दे सकता है. हम सोच भी नहीं सकते हैं की कौन हमे क्या दे जाएगा जीवन में और कौन क्या ले जाएगा.कैसे हम जाने की कौन व्यक्ति हमारे लिए फायदेमंद है, शुभ है और कौन नुक्सान दे सकता है. कैसे कोई अपने माता-पिता से अच्छा समर्थन प्राप्त करता है कैसे कोई किसी व्यक्ति से नुक्सान या धोखा खा जाता है. कुंडली के बारह भाव पर प्रत्येक भाव कुछ ना कुछ कहता है हर भाव से अपने रिश्ते नाते जुड़े हुए हैं और भी बहुत से कारण भाव से देखे जातेहैं जन्म हो गया तो शरीर है और शरीर है तो किसी ने तो जन्म दिया ही है,जन्म के कारक ग्रह का धोखे मे होना भी एक प्रकार से जन्म देने का धोखा माना गया है,जैसे माता को ध्यान ही नही था कि उसे गर्भ रह सकता है,और धोखे से गर्भ रह गया और जन्म भी हो गया,जन्म के बाद माता ने त्याग कर दिया और किसी अस्पताल या किसी अन्य प्रकार से शरीर को दूसरो के हवाले कर दिया यह धोखा लगनेश के साथ धोखा होना माना जाता है और लगनेश के द्वारा राहु की छत्रछाया मे रहना तथा जिसे अपना समझा गया है वह अपना है ही नही और जिसे अपना नही माना गया है वह अपना है इस प्रकार की भ्रांति जीवन मे चलती रहती है,जैसे अक्सर दत्तक संतान के मामले मे जाना जाता है,जब बच्चे को छोटी उम्र मे ही गोद दे दिया जाता है और उस बच्चे का पालन पोषण दूसरे स्थान पर होता है,वह बच्चा बडा होकर किसी भी प्रकार से यह मानने के लिये तैयार नही होता है कि वह जिसको माता कह रहा था वह माता है ही नही या गोद देने के बाद जब जातक बडा होने लगा और जिसने गोद दे दिया,कालान्तर मे गोद लेने और गोद देने वाले के बीच मे शत्रुता हो जाती है तो बालक जिसके पास गोद गया है वह अपने खुद के माता पिता से शत्रुता तो कर ही लेगा,लेकिन उसे पता नही है कि वह अपने से ही शत्रुता कर रहा है और जो उसका शत्रु है उससे अपनी मित्रता को किये बैठा है. दूसरे भाव के बारे मे धोखा भी देने वाला दूसरे भाव का ग्रह होता है अक्सर जो पूंजी माता पिता के द्वारा इकट्टी की जातीहै और कहा जाता है कि यह पूंजी जातक के लिये ही है वह चाहे सोना चांदी हो हीरा मोती हो या नगद धन हो,अथवा खुद के परिवार के लोग ही हो,लेकिन जैसे ही जातक बडा होता है खुद के लोग ही उस धन को यह कहकर हडप लेते है कि वह उस परिवार मे केवल पालने पोषने के लिये ही रखा गया था और उस धन पर अधिकार अलावा लोगो का है,जैसे ननिहाल मे पला जातक,किसी अन्य रिस्तेदार के पास पला जातक किसी दोस्त के घर पर पला जातक आदि इसी श्रेणी मे आते है। तीसरे भाव के धोखे के बारे मे कहा जाता है कि जातक जहां है वही के लोगो के साथ अपनी दिनचर्या को बना रहा है,उसी प्रकार की जलवायु मे अपने समय को निकाल रहा है खान पान रहन सहन भोजन कपडा आदि उसी स्थान के प्रति ग्रहण कर रहा है,उसने अपने द्वारा प्रदर्शित करने वाले कारक जैसे ड्रेस आदि जो अपनाये है वह उसी रहने वाले स्थान के अनुरूप अपनाये है जो धर्म अपनाया जा रहा है रहने वाले स्थान के अनुसार ही अपनाया जा रहा है,लेकिन बाद मे पता चलता है कि वह केवल अपने माता पिता की कार्य की रूप रेखा की वजह से वहां निवास कर रहा था और उसे जब सभी कुछ बदलने के लिये बताया जाता है तो वह तीसरे भाव का धोखा माना जाता है. चौथे भाव का धोखा सबसे अधिक खराब माना जाता है,अक्सर इस भाव के स्वामी का राहु के साथ होने पर हमेशा ही मानसिक भ्रम दिया करता है जातक को कभी भी किसी भी स्थान पर चैन से नही रहने देता है जब भी जातक यात्रा करता है तो अक्सर उसकी यात्रा की रास्ता किसी न किसी प्रकार से बदल जाती है वह पानी पी रहा होता है तो उसे यह ध्यान ही नही रहता है कि उसे कितना पानी पीना है,अथवा वह अपने इस दोष के कारण शराब आदि पेय पदार्थो को अपने लिये प्रयोग करना इसीलिये शुरु कर देता है कि वह अपने इस भ्रम वाले स्वभाव से थोडा आराम ले सके लेकिन यह प्रभाव उसे अक्सर बडी बीमारियों से ग्रस्त कर देता है और ऊपरी बीमारियों के साथ जनन तंत्रों वाली बीमारियां भी उसे परेशान करने लगती है. पंचम भाव का धोखा बहुत ही दिक्कत वाला माना जाता है,जातक को या तो अपने प्रति इतना भरोसा हो जाता है कि किसी को कुछ भी नही गिनता है हमेशा अपने को ही आगे गिनने के चक्कर मे किसी समय बहुत बडे संकट मे आजाता है,या फ़िर अपने लिये आगे की सन्तति से दूर रखने वाला इसलिये ही माना जाता है कि उसके जीवन साथी के प्रति हमेशा ही किसी न किसी प्रकार से बनाव बिगाड चलते रहते है जब भी सन्तान पैदा करने का समय आता है जातक के प्रति कई प्रकार की धारनाये या तो जीवन साथी बदल देता है या जातक खुद ही जीवन साथी से भ्रम से दूर हो जाता है। इस प्रकार के धोखा देने वाले कारण अक्सर राजनीति से सम्बन्ध रखने वाले लोगों फ़िल्म मीडिया मे काम करने वालो लोगों शिक्षा के क्षेत्र मे या मनोरंजन के क्षेत्र मे काम करने वाले लोगो के साथ होता देखा जाता है इस बात से सन्तान का आना केवल पुत्र संतान के लिये ही माना जाता है स्त्री संतान मे यह धोखा कभी भी अपना कार्य नही रोकता है। इसी प्रकार से जातक के अन्दर अधिक अहम आने के कारण जातक अपनी परिवार की स्थिति को भी बरबाद करने के लिये माना जाता है जैसे पीछे अठारह साल की कमाई को वह केवल अठारह महिने के अन्दर ही बरबाद करने की अपनी युति को पैदा कर लेता है जैसे वह लाटरी सट्टा जुआ आदि वाले कामो के अन्दर अपनी औकात को छठे भाव का धोखा अक्सर बीमारी के मामले मे कर्जा के मामले मे ब्याज कमाने के मामले मे दुश्मनी करने के मामले मे नौकरी के मामले मे या नौकरो के मामले मे देखा जाता है। इस भाव मे आकर कोई भी ग्रह अपनी युति से धोखा देता है। वह राहु से सम्बन्ध रखे या नही रखे। अक्सर बीमारी के मामले मे भी धोखा देखा जाता है कि मामूली सा बुखार समझते समझते पता चलता है कि वह तो बहुत बडा वायरल या डेंगू जैसा बुखार है,किसी हल्की सी फ़ुन्सी को समझने के बाद पता चलता है कि वह एक केंसर का रूप है या किसी प्रकार के रोजाना के काम को लगातार करने के बाद पता चलता है कि वह काम केवल दिखावा ही था उस काम को करने के बाद कोई फ़ायदा भी नही है और नुकसान भी खूब लग गया है,किसी को कर्जा देने के बाद पहले यानी कर्जा लेने तक तो वह व्यक्ति अपने आसपास घूमने वाला अपनी हर हां मे हां मिलाने वाला था लेकिन जैसे ही कर्जा दिया वह अक्समात ही दूर भी होने लगा और उसने दुश्मनी भी बना ली,या जिस बैंक या किसी फ़ाइनेंस के क्षेत्र मे ब्याज के लोभ से धन को जमा किया जा रहा था वह बैंक या फ़ाइनेंस कम्पनी ही धोखा देकर धन को बरबाद करने के बाद जाने कहां चली गयी। इसके अलावा भी कोई अपनी जुगत लगाकर अन्दरूनी दुश्मनी को निकालने के लिये पहले अपने घर आता था और बहुत अच्छे से सम्बोधन को प्रयोग करता था,जैसे कोई अपने मित्र की पत्नी को बहिन के रूप मे तो मानता था लेकिन उसके अन्दर धोखे को देने वाली बात थी वह बहिन का दर्जा देकर एक दिन पत्नी को लेकर ही फ़रार हो गया,अथवा कोई घर मे आकर अपनी पैठ बनाकर घर के वातावरण को समझता रहा और एक दिन मौका पाकर वह घर का महंगा सामान समेट कर चलता बना आदि बाते देखी जाती है,इसके अलावा भी नौकर को बहुत ही अच्छी तरह से रखा गया था,वह अपनी चाल से एक दिन कोई बडा अहित करने के बाद चलता बना,किसी की नौकरी करते करते बहुत समय हो गया और वह नौकरी करवाने वाला व्यक्ति एक दिन किसी बडे फ़रेब को देकर दूर हो गया और जेल आदि की बाते खुद को झेलनी पडी अथवा नौकरी करने के बाद जब सैलरी को मांगा गया तो कोई दूसरा आरोप देकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया आदि बाते मानी जाती है. सप्तम का धोखा भी नौकरी और जीवन साथी के अलावा साझेदार के लिये माना जाता है,सप्तम का मालिक राहु के साथ है या शनि के साथ है तो धोखा मिलना जरूरी है उसे जीवन साथी से भी धोखा मिलता है उसे साझेदार से भी धोखा मिलता है उसे जो भी काम अपने जीवन यापन के लिये करना होता है वहां से भी धोखा मिलता है,किसी प्रकार के लेन देन के समय के अन्दर किसी की जमानत आदि करने मे भी धोखा मिलता है किसी का बीच बचाव करने या किसी रिस्ते के प्रति बेलेन्स बैठाने के अन्दर भी धोखा मिलता है। इसी प्रकार से जब जातक के साथ किसे एका मुकद्दमा आदि चलता है तो उसके द्वारा भी धोखा दिया जाता है,किसी प्रकार के कागजी धोखे को भी इसी क्षेत्र से माना जाता है। पुरुषा जाति के लिये शुक्र राहु और स्त्री जाति के लिये गुरु राहु का साथ हमेशा ही धोखा देने वाला माना जाता है। अष्टम भाव का धोखा अक्सर किये जाने वाले कामो से देखने को मिलते है,पहले आशा लगी रहती है कि इस काम को करने के बाद बहुत लाभ होगा और एक समय ऐसा आता है कि पूरी मेहनत भी लग चुकी होती है पास का धन भी चला गया होता है पता चलता है कि काम का मूल्य ही समाप्त हो चुका है,इसी प्रकार का धोखा अधिकतर मंत्र तंत्र और यंत्र बनाने वाले अद्भुत चीजो का व्यापार करने वाले शमशान सिद्धि का प्रयोग करने वाले भी करते है जब राहु का स्थान किसी के अष्टम मे होता है या अष्टम का स्वामी किसी प्रकार से राहु केतु शनि के घेरे मे होता है तो वह इन्ही लोगो के द्वारा धोखा खाने वाला माना जाता है यह कारण दशा के अन्दर भी देखा जाता है जैसे धनेश और राहु की दशा मे या अष्टमेश और राहु की दशा मे इसी प्रकार की धोखे वाली बात होती देखी जाती है.अक्सर इसी प्रकार के धोखे शीलहरण के लिये स्त्रियों मे भी देखे जाते है जब भी कोई अपनी रसभरी बातो को कहता है या अपने प्रेम जाल मे ले जाने के लिये चौथे भाव या बारहवे भाव की बातो को प्रदर्शित करता है तो उन्हे समझ लेना चाहिये कि उनके लिये कोई बडा धोखा केवल उनके शील को हरने के लिये किया जा रहा है,इस धोखे के बाद उनका मन मस्तिष्क और ईश्वरीय शक्तिओं से भरोसा उठना भी माना जा सकता है,इस भाव का धोखा उन लोगो के लिये भी दिक्कत देने वाला होता है जो डाक्टरी काम करते है वह अपने धोखे के अन्दर आकर किसी बीमारी को समझ कर कोई दवाई दे देते है और उस दवाई को देने के बाद मरीज बजाय बीमारी से ठीक होने के ऊपर का रास्ता पकड लेता है। यही बात इन्जीनियर का काम करने वाले लोगो के साथ भी होता है वह धोखे मे आकर अपनी रिपेयर करने वाली चीज मे या तो अधिक वोल्टेज की सप्लाई देकर उसे बजाय ठीक करने के फ़ूंक देते या सोफ़्टवेयर को गलत रूप से डालकर पूरे प्रोग्राम ही समाप्त कर लेते है। नवे भाव के ग्रह के लिये धोखा देने वाली बाते अक्सर धर्म स्थान मे धोखा होना यात्रा जो बडे रूप से की जा रही है या विदेश का रूप बनाया जा रहा है के लिये माना जाता है यह बात ऊंची शिक्षा के मामले मे भी देखी जाती है कानून के अन्दर भी देखी जाती है और सही रूप मे माने तो जाति बिरादरी और समाज के लिये भी मानी जाती है। कभी कभी एक धर्म स्थान के लिये लगातार प्रचार किया जाता है और उस प्रचार के अन्दर एक भावना धोखा देने वाली छुपी होती है.उस धोखे मे वही लोग अधिक ठगे जाते है जिनके नवम भाव के मालिक का कारक या तो राहु की चपेट मे होता है या त्रिक स्थानो के स्वामी के साथ अपने गोचर से चल रहा होता है अथवा दशा का प्रभाव चल रहा होता है। दसवे भाव के धोखे वाली बातो के लिये माना जाता है कि कार्य करने के बाद या सरकरी क्षेत्र की सेवा करने के बाद नौकरी आदि के लिये किसी बडी जानकारी के बाद जीवन भर लाभ के लिये की जाने वाली किसी कार्य श्रेणी को शुरु करने वाली बात के लिये माना जाता है. ग्यारहवे भाव के लिये मित्रो से अपघात बडे भाई या बहिन से अपघात लाभ के क्षेत्र मे की जाने वाली अपघात माता के गुप्त धन के प्रति अपघात पिता के पत्नी के परिवार से जुडी या उसकी संगति से मिलने वाली अपघात के लिये जाना जाता है. बारहवे भाव की जाने वाली खरीददारी मे धोखा यात्रा के अन्दर सामान या मंहगे कारक का गुम जाना कही जाना था और कही पहुंचाने वाली बात का धोखा किसी धर्म स्थान मे ठहरने के बाद कोई धोखा होना किसी बडी संस्था को सम्भालने के बाद मिलने वाला धोखा आदि की बाते मानी जाती है अगर आप अपनी कुंडली दिखाना जब बनवाना चाहते हैंतो तो आप मुझसे निम्न नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं हमारी सर्विस पेड़ है 07597718725 09414481324
रविवार, 9 अप्रैल 2017
ग्रह से दोखा पोस्ट नंबर दो समय के दो पहलू है. पहले प्रकार का समय व्यक्ति को ठीक समय पर काम करने के लिये प्रेरित करता है. तो दूसरा समय उस काम को किस समय करना चाहिए पहला समय मार्गदर्शक की तरह काम करता है. जबकि जबकि दूसरा पल-पल का ध्यान रखते हुए आपकी कुंडली दशा अंतर्दशा ग्रहों की चाल और ग्रह से मिलने वाले फल को पहचान कर उसका उपचार करकेे कैसे आगे बढ़ा जाए यह जानकारी देता है कहते हैं समय बड़ा बलवान होता है उस समय को पहचानेका काम ज्योतिष ही कर सकता है अक्सर भ्रम कनफ़्यूजन धोखा फ़रेब चीटिंग अफ़वाह भटकाव नशा बेबजह आदि शब्द राहु के अनुसार ही कहे गये है,जो है उसके प्रति जो नही है उसके भी प्रति राहु अपने अपने स्थान से अपना अपना प्रकार प्रकट करता है साथ ही अगर व्यक्ति की सोच केन्द्रित नही है तो वह अपने सोचने वाले घेरे को लगातार बढाता जाता है और यही सोच उसे जीवन मे धोखा आदि देने के लिये मानी जाती है.लगन मे राहु के होने से जीवन के साथ ही धोखा होता है धन भाव मे होने से धन आदि की चीटिंग और खुद की आंखो के सामने धूल झोंकने वाली बात कही जाती है,तीसरे भाव मे नाटकीय ढंग से अपने विचार प्रकट करने के बाद स्वांग बनाकर ठगने वाली बात मानी जाती है,चौथे भाव मे मानसिक रूप से भावना आदि से ठगी की जाती है पंचम भाव मे मनोरंजन का नशा देकर या लाटरी सट्टॆ खेलकूद मे दिमाग मे लगा कर बुद्धि को भ्रम मे डाला जाता है,छठे भाव से कोई बीमारी नही होने पर बीमारीका भ्रम होनाया वहम होना सातवे भाव मे जीवन साथी और साझेदारी के प्रति तादात से अधिक विश्वास कर लेना और जब भ्रम टूटे तो कही कुछ नही होना जीवन साथी से ही अक्सर धोखा दिलवा देना आठबे भाव मे उन शक्तियों के प्रति भम रहना जो शक्तिया न तो देखी गयी है और न ही उनके प्रति कभी विश्वास किया गया है इस भाव के राहु के द्वारा अक्सर गूढ कारणो की खोज के प्रति भ्रम ही बना रहता है और रेत के पहाड से हीरे की कणी निकालने जैसा होता है और जब रेत का पहाड़ बहुत जाता है तो कुछ पल्ले नहीं आता नवे भाव के राहु से खुद के खानदान और पूर्वजो के प्रति ही भ्रम बना रहना दसवे भाव मे काम के होते हुये भी और काम के करते हुये भी कभी काम पूरा नही होना ग्यारहवे भाव के प्रति चाहे पीछे से हानि ही हो रही हो लेकिन भ्रम से उसी काम को करते जाना जब पता लगना तब तक दिवालिया हो जाना या किसी मित्र पर इतना विश्वास करते जाना कि वह जीवन के हर क्षेत्र से सब कुछ बरबाद कर रहा है लेकिन फ़िर भी उसके प्रति विश्वास को बनाये रखना बाद मे दगा बाजी का रूप दे देना बारहवे भाव से जीवन के प्रति हमेशा डर लगा रहना आक्स्मिक चल देना हवाई किले बनाते रहना और खुद की स्थिति को जमीन पर आने ही नही देना जबकि है कुछ नही फ़िर भी सब कुछ होने का आभास होते रहना और जब हकीकत का पर्दा उठे तो कही कुछ नही आदि की बाते मानी जाती है.paid service 09414481324 07597718725
बुधवार, 5 अप्रैल 2017
चंद्र ग्रह पोस्ट नंबर 6 मित्रों आज भी हम बात करेंगे चंद्रमा परकुंडली भी एक अजीब पहेली मानी जाती है,कौन सा ग्रह कहाँ पर धोखा दे रहा है या कब धोखा देगा,अथवा खुद ही धोखा बनकर संसार में विचरण करने के लिये जीवन को प्रदान कर रहा है इस बात की जानकारी करना बहुत जरूरी होता है। कौन कैसे कहाँ धोखा देता है इस बात की जानकारी मनुष्य रूप मे समझने के लिये मनुष्य जीवन के कारक ग्रहों का जानना भी जरूरी है। धोखे का भाव कौन सा है किस ग्रह के साथ कौन सा धोखा हो सकता है इस बात को भी जानना जरूरी है,किस स्थान पर कैसे कौन धोखा देगा,वह मित्र के रूप मे धोखा देगा,दोस्त के रूप मे धोखा देगा या खुद ही अपने मन से धोखा खाने के लिये अपने चेहरे पर बोर्ड लगाकर घूमेगा कि आओ मुझे धोखा दो, और जो देखो वही धोखा देकर चलता बने खुद धोखा खा कर अपने आप चुपचाप बैठ जाओ।[05/04 7:05 pm] Acharya Rajesh kumar: चन्द्रमा मन का कारक है केवल सोचने का काम करता है,जब सोच मे ही धोखा पैदा हो जाये तो धोखा देखना भी पडेगा और धोखा देकर काम भी करने का काम चन्द्रमा का होगा। लगन का चन्द्रमा राहु से ग्रसित है,हर सोच भ्रमित हो जायेगी,किसी का विश्वास करना तो दूर अपना खुद का भी विश्वास नही किया जा सकता । गति के पकडते ही आत्मविश्वास डगमगा उठेगा,गति भी बिगड जायेगी और जो कार्य होना था वह भी नही हो पायेगा। दूसरे भाव का चन्द्रमा जब भी अपनी गति मे आयेगा केवल सोच से ही कार्य करने के बाद धन की प्राप्ति को करने मे लगा रहेगा वह कार्य कभी सम्बन्ध के बारे मे भी सोच के लिये माना जा सकता है तो जीवन के सम्बन्धो के लिये भी माना जा सकता है। ख्वाबी जिन्दगी को जीने के लिये दूसरा चन्द्रमा काफ़ी है। एक भावना से भरा हुआ चेहरा और किसी भी बात को सोचने के लिये अचानक चेहरे का सफ़ेद होना इसी चन्द्रमा की निशानी है। पानी पी पी कर जीवन को निकाला जाना यानी गले का सूखना भी इसी चन्द्रमा के द्वारा माना जा सकता है। दोहरे सम्बन्ध को स्थापित कर लेना इसी चन्द्रमा के कारण होता है यानी पहले किसी सम्बन्ध ने धोखा दिया है तभी दूसरे सम्बन्ध के बारे मे सोचा जा सकता है अन्यथा नही। तीसरा चन्द्रमा भी अपनी गति को आसपास के माहौल से मानसिकता को लगाकर रखता है। कोई भी कुछ भी कह दे,अचानक आंसू निकलना इसी चन्द्रमा की निशानी है,कोई भी कहीं जाये उसके बारे मे आशंका का बना रहना कि वह कहां जायेगा कब आयेगा कैसे आयेगा कैसे जायेगा और इसी बात को जानने के लिये कई उपक्रम किये जायेंगे और इसी दौरान किसी भी कारक से धोखा मिल जायेगा। कहने सुनने के लिये आत्मीय सम्बन्ध बनाना और जब आत्मीय सम्बन्ध बन जाते है तो विश्वास का पूरा होना भी माना जाता है विश्वास भी वही करेगा जो आत्मीय हो और इसी आत्मीयता मे जब किसी भी प्रकार से धोखा मिलेगा तो समझ मे आयेगा कि आत्मीयता की कितनी औकात जीवन मे रह जाती है। चौथा चन्द्रमा वैसे भी दिमाग को आसपास के लोगो को जानने पहिचानने के लिये और हमेशा अपने को यात्रा वाले कारणो से जोड कर रखने वाला होता है,कभी कभी देखा जाता है कि ख्वाब इतने गहरे हो जाते है कि यात्रा मे अपने ही अन्दर की सोच लगाकर बैठे रहते है और अचानक जब ख्याल आता है तो कोई सामान या जोखिम को लेकर चलता हो जाता है फ़िर सिवाय और अधिक सोचने के कुछ भी सामने नही रहता है। एक बात और इस चन्द्रमा के बारे मे सोची जाती है कि व्यक्ति का प्रभाव आसपास के लोगो से अधिक होता है और जब भी कोई कैसी भी बात करता है तो उस व्यक्ति के बारे मे चिन्ता चलती रहती है कि आखिर उसने यह कहा क्यों ? यह बात भी होती है कि चौथा चन्द्रमा अपनी पंचम गति से अष्टम की बातो को अधिक सोचता है कि उसके पूर्वज कैसे थे क्या करते थे उसकी मान्यता कैसी थी वह मान्यता के अनुसार कितने शाही दिमाग से रहन सहन से अपने जीवन को बिताने के लिये चला करता था लेकिन जैसे ही पूर्वजो का आस्तिव समाप्त होता है अचानक केवल ख्वाब ही रह जाते है,इन पूर्वजो की मान्यता को समाप्त करने का कारण खुद के ही कार्य माने जाते है जैसे किसी ने कह दिया अमुक स्थान पर अमुक वाहन सस्ते मे मिल रहा है फ़िर क्या था जोर लगाकर उस वाहन को ले लिया गया और पता लगा कि वह वाहन कुछ ही समय मे कबाडा हो गया,यह सोच पूर्वजो के धन को समाप्त करने वाली और जो भी पास मे था उसे भी समाप्त करने के लिये केवल एक लोभ जो सस्ते के रूप मे था धोखा खाने के लिये काफ़ी माना जाता है। अगर चौथे भाव मे बुध शनि का योग हो तो यह चन्द्रमा अधिक कामुकता को भी देता है और बातो मे एक वाचालता का कारण भी पैदा करता है,जिसके अन्दर पुरानी बातो का ख्याल अधिक रखा जाता है किसी के भी प्रश्न का उत्तर बिना तर्क के समझ मे भी नही आता हैपंचम का चन्द्रमा भी धोखा देने मे पीछे नही रहता है,किसी ने जरा सी बात की और अक्समात दिल उस पर आ गया और कुछ समय बाद सामने वाले के लिये कुछ भी करने के लिये तैयार हो जाना मामूली सी बात होती है। यह बात अक्सर पुरुष स्त्रियों के प्रति और स्त्री पुरुषों के प्रति जानबूझ कर करने वाले होते है। किसी ने भावुकता से भरा गाना गा दिया बस उसके साथ साथ आंसू चलने लग गये और सामने वाले ने तो अपने अनुसार केवल नौटंकी की थी और खुद जाकर उस नौटंकी का शिकार बन गये।धन्यवाद कहना तो दूर कही कही पर बुरा ही बना दिया,जिस कन्या का विवाह किया था वह कभी वापस आकर रक्षाबंधन आदि के अवसर पर धागा भी बांधने नही आयी। यह धोखा भी पांचवे चन्द्रमा के कारण ही माना जा सकता है छठे भाव का चन्द्रमा भी प्लान बनाकर काम करने के लिये अपनी गति को देता है लेकिन सौ मे से एक भी प्लान सफ़ल कभी नही होता है केवल रास्ता चलते जो काम होने वाले होते है वह हो जाते है और जो काम प्लान बनाकर किया जाता है वह नही होता है। सोचा था कि अमुक काम को अमुक समय पर कर लिया जायेगा और अमुक समय पर काम करने के बाद अमुक मात्रा मे धन आयेगा और अमुक मात्रा मे खर्च करने के बाद अमुक सामान की प्राप्ति हो जायेगी और उस सामान से अमुक प्रकार का कष्ट समाप्त हो जायेगा,पता लगा कि वह काम नही हुआ और बीच की सभी कडियां पता नही कहां चली गई छठे भाव का चन्द्रमा मौसी और चाची का कारक होता है,अगर इनके प्रति सेवा भाव रखा जाये तथा खुद की माता की बीमारियों और रोजाना के कामो के बारे मे सहायता की जाये तो यह चन्द्रमा अच्छे फ़ल देने लगता है,इस चन्द्रमा को सफ़ेद खरगोश की उपाधि भी दी जाती है जो लोग खरगोश को पालने और उन्हे दाना पानी देने का काम करते है उनके लिये भी चन्द्रमा का सहयोग मिलता रहता है,छठे भाव का चन्द्रमा अपनी सप्तम द्रिष्टि से बारहवे भाव को देखता है बारहवा भाव नवे भाव का चौथा यानी भाग्य का घर होता है अगर धर्म स्थानो मे जाकर श्रद्धा से धार्मिक कार्य किये जाते रहे तो भी चन्द्रमा साथ देता है,नमी वाले स्थानो मे रहने से पानी के क्षेत्रो मे कार्य करने से यात्रा आदि के कार्यों मे कार्य करने से यह चन्द्रमा दिक्कत देने वाला बन जाता है.इस चन्द्रमा मे बुध का प्रभाव आने से माता को उनके मायके मे यानी ननिहाल मे सम्मान मिलता है अगर ननिहाल से बनाकर रखी जाये तो भी चन्द्रमा सहायक हो जाता है.छठे घर का चन्द्रमा के बारे मे कहा जाता है,कि जो भी प्रयत्न किया जाता है जो इच्छा पालकर कार्य किया जाता है सभी प्रयत्नो को असफ़ल कर देता है,"विकलं विफ़लं प्रयत्नं",लेकिन जो भी कार्य रास्ते चलते किया जाता है वह सफ़ल हो जाता है या थक कर जब कार्य को बन्द करने का मन करता है कार्य पूरा होने लगता है आदि बाते आती है,यह भाव श्रम करने के बाद जीविका चलाने के लिये अपनी योजना को देता है,जितना श्रम किया जायेगा उतना ही यह अच्छा फ़ल देगा,जितना आलस किया जायेगा उतना ही खराब फ़ल देगा.लोगों की सेवा करना और रोजाना के कार्यों को सुचारु रूप से समाप्त करना ही इस घर के चन्द्रमा का अच्छा उपाय है.सबसे खतरनाक तो सातवे भाव का चन्द्रमा को माना गया है। शादी करने के बाद मिलने वाला धोखा ! बडी धूमधाम से शादी की गयी और यह सोचा गया कि पति या पत्नी आकर घर को सम्भालेगी,पता लगा कि पत्नी का पीछे किसी से अफ़ेयर था वह अपने साथ घर की जमा पूंजी भी लेकर चली गयी या पति जिसे यह माना था कि बहुत ही सदाचारी है भावनाओ को समझने वाला है सभी भावनाओ को समझेगा और पता लगा कि उसका पहले से ही कोई अफ़ेयर आदि चल रहा था और वह एक दिन लापता हो गया मिला तब जब उसके साथ एक दो बच्चे भी थे। इस चन्द्रमा के द्वारा लोगो को जो नौकरी करने वाले होते है उन्हे भी खूब बना दिया जाता है नौकरी करवाने वाला कहता है कि अमुक काम की ट्रेनिंग करनी है और उस ट्रेनिंग मे अमुख खर्चा होगा उस खर्चे को पहले दो विर नौकरी करो नौकरी भी ऐसी अच्छी होगी कि ट्रेनिंग के समय मे ही नौकरी करवाने वाला अपनी कम्पनी को बन्द कर के भाग जायेगा और आधी ट्रेनिंग और दिया गया रुपया खड्डे मे चला जायेगा इस प्रकार से समय भी बेकार हुआ और धन भी गया मानसिक शांति भी गयी साथ मे जो पढाई के कागज भी लिये गये थे फ़ोटो भी ली गयी थी वह भी गयी और पता नही किसकी आई डी बनाकर किस बैंक से कर्जा और लिया जायेगा अथवा कौन से मोबाइल की कौन सी सिम फ़र्जी आई डी से लेकर किसके के लिये किस प्रकार की बात की जायेगी और जब पकडा जायेगा तो वही कारण जो नौकरी के लोभ मे था सामने आयेगा। एक बात और भी इस चन्द्रमा के कारण बनती है कि माता भी अपनी राय को भावुकता मे देती है और जो भी काम बनने का होता है उसके अन्दर रिस्क लेने से साफ़ मना किया जाता है। बिना रिस्क के फ़ायदा और नुकसान और तजुर्बा भी कहां से मिलेगा सप्तम का चन्द्रमा बुध और शुक्र के साथ होने से सास और उसकी बहिने या तो एक ही खानदान गांव या स्थान पर होती है साथ ही पत्नी और पत्नी की बहिन दूसरी माता से पैदा होती है,अथवा पत्नी का परिवार खेती आदि का काम करता है अथवा खेती सम्बन्धित फ़सलो का कारोबार करता है. अष्टम का चंद्रमा,अपने गति को देने वाला है,कुये के पानी की तरह से अपना काम करता है काफ़ी मेहनत करने के बाद कोई काम किया जाता है और जब परिणाम सामने आता है तो खारे पानी के तरह से आता है। गूढ बातो को अपनाने मे मन लगना अक्सर इसी भाव के चन्द्रमा के द्वारा होता है,कोई भी गुप्त कार्य किया जाना इसी चन्द्रमा के कारण से ही होता है। यह चन्द्रमा अक्सर चोर की मां के रूप मे काम करता है यानी चोर की मां पहले तो अपने पुत्र को बल देती रहती है कि शाबाश वह जिसका भी सामान चुरा कर लाया वह ठीक है जब उसका पुत्र पकड लिया जाता है तो वह कोने मे सिर देकर रोने के लिये मजबूर हो जाती है वह खुले रूप मे किसी के सामने रो भी नही सकती है। व्यक्ति की मानसिकता उन कार्यों को करने के लिये होती है जो गुप्त रूप से किये जाते है वह काम अक्सर बेकार की सोच से पूर्ण ही होते है वे कभी किसी के लिये भलाई करने वाले नही होते है,हां धोखे से भलाई वाले बन जाये वह दूसरी बात है। सोच मे उन्ही लोगो से काम लिया जाता है जो या तो मरे है या मर चुके है यानी मरे लोगों की आत्मा से काम करवाना।अक्सर इस चन्द्रमा वाले लोग अपनी बातो को इस प्रकार से करते है कि वे किसी न किसी की नजर मे चढने के लिये मजबूर हो जाते है वे या तो दुश्मनी मे ऊपर हो जाते है या किसी के मन मे इस प्रकार से बस जाते है कि लोग उनसे सारे भेदो को जान लेने के लिये उनकी हर कीमत पर पहले तो सहायता करते है उन्हे मन से और वाणी से बहुत प्यार देने का दिखावा करते है जैसे ही उनकी सभी गति विधियों को प्राप्त कर लेते है वे अक्सर दूर हो जाते है और बदनाम भी करने लगतेहैजब जब अष्टम चन्द्रमा से राहु अपनी युति मिलायेगा वह मानसिक तनाव अनजाने भय आदि के प्रति देगा,इसके उपाय के लिये अपने सामने लोगो से बात करने और परिवार से वैमनस्यता आदि को नही रखना चाहिये पराशक्तियों के प्रति खर्चा नही करना चाहिये ह्रदय सम्बन्धी बीमारी का ख्याल रखना चाहिये,गुप्त कार्य करना और सोचना तथा हमेशा यौन सम्बन्धो के प्रति ध्यान रखना भी स्वास्थ्य और जीवन के अमूल्य समय को बरबाद करना होता है,अक्सर कुये का पानी सोने वाले स्थान मे कांच की बोतल मे रखने से और विधवा माता जैसी स्त्रियों की सेवा करना फ़लदायी होता है. नवे भाव के चन्द्रमा का प्रभाव भी कम नही होता है लोग विदेश के लोगो से मानसिकता को लगाने के लिये देखे जाते है बाहर जाते है और अपने यहां की रीति रिवाजो को थोपने की कोशिश करते है जैसे ही उनकी चाल को लोग समझ लेते है फ़िर उनकी ही मानसिकता का फ़ायदा उठाकर उन्हे ही आराम से धोखा दिया जाता है अक्सर इस प्रकार के लोग अपने कार्यों से यात्रा वाले काम या कानून वाले काम या विदेशी लोगो से खरीद बेच के काम करते हुये देखे जा सकते है यही चन्द्रमा उन्हे अधिक पूजा पाठ या लोगो की धार्मिक भावनाओ से खेलने के लिये भी देखने मे आया है कभी कभी तो वे लोगों को इतना मानसिक रूप से बरबाद कर देते है कि लोग अपने घर द्वार को छोड कर उनके पास ही आकर बस जाते है लेकिन जब उन्हे सच्चाई का पता चलता है तो वे उनसे उसी प्रकार से नफ़रत करने लगते है जैसे कल का खाया हुआ जब आज लैट्रिन मे जाता है तो उसे छूना तो दूर बदबू की बजह से नाक भी बन्द करके रखनी पडती है। दसवे भाव का चन्द्रमा अक्सर जीवन के कार्यों के लिये दिक्कत देने वाला माना जाता है इस चन्द्रमा वालो को अपने पिता की गति का पता नही होता है और पिता की गति जब तक जातक को नही मिलती है तब तक जातक किसी भी लिंग का हो वह अपने को पराक्रम मे आगे नही ले जा पाता है वह माता के द्वारा या माता के स्वभाव पर चलने वाला होता है उसके अन्दर केवल घर की और रिस्तो वाली बाते ही परेशान करने के लिये होती है जब भी कोई बात होती है तो उसका ध्यान अलावा दुनिया के रिस्क लेने की अपेक्षा घर के लोगों के बीच मे ही उलझा रहना माना जाता है यह भी देखा गया है कि इस प्रकार के लोग अपनी शिक्षा मे या काम करने के अन्दर अपनी लगन इस प्रकार के लोगो से लगा लेते है जो इस बात की घात मे इन्तजार करने वाले होते है कि उन्हे कोई तीतर मिले जिसे अपनी शिकार वाली नीति से पंख उधेड कर काम मे लिया जा सके। अक्सर देखा जाता है कि इस चन्द्रमा वाले जातक कभी भी अपने पहले शुरु किये गये काम मे सफ़ल नही होते है जब उन्हे दूसरी बार उसी काम को करने का अवसर मिलता है तो वे समझ जाते है कि पहले उन्हे मानसिक रूप से समझ नही होने के कारण धोखे मे रखा गया था और उनका चलता हुआ काम पूरा नही हो पाया था वह काम अचानक शुरु कर देने के बाद वे सफ़ल भी हो जाते है लेकिन काम के मिलने वाले लाभ को वे या तो धर्म स्थानो मे खर्च करने के बाद अपने को दुबारा से चिन्ता मे ले जाते है या फ़िर किये जाने वाले खर्चे के प्रति अपनी सोच को कायम रखने के कारण अन्दर ही अन्दर घुलते रहते है।ग्यारहवा चन्द्रमा जब धोखा देने वाला होता है तो उसके लिये अक्सर दोस्त बनकर लोग उसे लूट खाते है जब भी कोई काम खुद का होता है तो दोस्त दूर हो जाते है और जब कोई काम दोस्तो का होता है तो अपनी भावनाओ से इस प्रकार से सम्मोहित करते है कि जातक जिसका ग्यारहवा चन्द्रमा होता है उनकी सहायता करने के लिये मजबूर हो जाता है वह मजबूरी चाहे जाति से सम्बन्धित हो या समाज से सम्बन्धित हो या किसी प्रकार के बडे लाभ की सोच के कारण हो,जब वापसी मे उस की गयी सहायता का मायना देखा जाता है तो उसी प्रकार से समझ मे आता है जैसे आशा दी जाये कि आने वाले समय मे बरसात होगी तो रेत मे पानी आयेगा फ़िर उसके अन्दर फ़सल को पैदा करने के बाद लिया गया चुकता कर दिया जायेगा। बारहवा चंद्रमा अक्सर दिमाग को पराशक्तियों की सोच मे ले जाता है आदमी का दिमाग इसी सोच मे रहता है कि आदमी मरने के बाद भी कही जिन्दा रहता है और रहता भी है तो वह क्या करता है यानी भूत प्रेत पर विश्वास करने वाला और इसी प्रकार की सोच के कारण वह आजीवन किसी न किसी प्रकार से ठगा जाता है,चाहे वह तांत्रिकों के द्वारा ठगा जाये या आश्रम बनाकर अपनी दुकानदारी चलाने वाले लोगों से ठगा जाये यह कारण अक्सर उन लोगो के साथ अवश्य देखा जाता है जिनके पास एक अजीब सोच जो उनके खुद के शरीर से सम्बन्ध रखती है देखी जा सकती है। लोग इस चन्द्र्मा से आहत होने के कारण बोलने मे चतुर होते है अपनी भावना को प्रदर्शित करने मे माहिर होते है उनकी भावना की सोच मे उस प्रकार के तत्व जान लेने की इच्छा होती है जो किसी अन्य की समझ से बाहर की बात हो। इस बात मे वे बहुत ही बुरी तरह से तब और ठगाये जाते है जब उन्हे यह सोच परेशान करती है कि योग और भोग मे क्या अन्तर होता है वे योग की तलास मे भटकते है और जहां भी बडा नाम देखा उनके सोच वही जाकर अटक जाती है लेकिन जब उनके सामने आता है कि रास्ता चलते मनचले और जेब कट की जो औकात होती है वही औकात उनके द्वारा सोचे गये और नाम के सहारे चलने वाले व्यक्ति के प्रति होती है तो वे अक्समात ही विद्रोह पर उतर आते है। और विद्रोह पर उतरने के बाद ऐसा भी अवसर आता है जब उन्हे इन बातो से इतनी नफ़रत पैदा हो जाती है कि वे किसी भी ऐसे स्थान को देखने के बाद खुले रूप मे गालिया दे या न दें लेकिन मन ही मन गालियां जरूर देते देखे गये है।बारहवा चन्द्रमा राशि के अनुसार और अन्य ग्रहों की द्रिष्टि से अपने फ़ल को देता है,मन के भाव से नवा भाव होने से श्रद्धा वाले स्थान पर चन्द्रमा के होने से जिस भी कारक की तरफ़ श्रद्धा होती है यहीं से पता किया जाता है,मन की श्रद्धा से जो खर्चा यात्रा या किसी भी कार्य को किया जाता है वह यहीं से चन्द्रमा के अनुसार ही देखा जाता है वायु का घर होने के कारण अगर चन्द्रमा इस भाव मे है तो हवाई यात्राओं की अधिकता होती है अगर केतु से सम्बन्ध होता है और त्रिक राशि का सम्बन्ध भी होता है तो फ़ांसी जैसे कारण भी बन जाते है चौथा मंगल अगर अष्टम राहु से ग्रसित होकर इस भाव के चन्द्रमा को देखता है तो जेल जाने या बन्धन मे रहने के कारण को भी पैदा करता है और भूत दोष के कारण शरीर को अस्पताल मे भी भर्ती रखने के लिये अपनी युति को देता है बारहवा चन्द्रमा राशि के अनुसार और अन्य ग्रहों की द्रिष्टि से अपने फ़ल को देता है,मन के भाव से नवा भाव होने से श्रद्धा वाले स्थान पर चन्द्रमा के होने से जिस भी कारक की तरफ़ श्रद्धा होती है यहीं से पता किया जाता है,मन की श्रद्धा से जो खर्चा यात्रा या किसी भी कार्य को किया जाता है वह यहीं से चन्द्रमा के अनुसार ही देखा जाता है वायु का घर होने के कारण अगर चन्द्रमा इस भाव मे है तो हवाई यात्राओं की अधिकता होती है अगर केतु से सम्बन्ध होता है और त्रिक राशि का सम्बन्ध भी होता है तो फ़ांसी जैसे कारण भी बन जाते है चौथा मंगल अगर अष्टम राहु से ग्रसित होकर इस भाव के चन्द्रमा को देखता है तो जेल जाने या बन्धन मे रहने के कारण को भी पैदा करता है और भूत दोष के कारण शरीर को अस्पताल मे भी भर्ती रखने के लिये अपनी युति को देता हैं चन्द्रमा नीची सोच रखता है तो अच्छी शिक्षा और अच्छे सम्बन्ध उच्च का गुरु किसी काम का नही है,"मन के हारे हार है मन के जीते जीत,मन से होती शत्रुता मन से होती प्रतीत".
मंगलवार, 4 अप्रैल 2017
चंद्र ग्रह पोस्ट नंबर 5मित्रों आज की पोस्ट भी चंद्रमा पर ही है काल पुरुष की कुंडली में चंद्रमा चौथे भाव का स्वामी हैकुंडली का चौथा भाव मानसिक गति का होता है और दूसरा भाव उस गति को लाभान्वित करने के लिये देखा जाता है। मानसिक गति को सोचने के बाद की प्राप्त करने की क्रिया को पंचम से देखा जाता है यानी जो सोचा जाये उसे प्राप्त कर लिया जाये। मानसिक गति को प्राप्त करने के लिये जो भी क्रिया करनी पडती है वह कुंडली के लगन भाव से देखा जाता है या चन्द्रमा के स्थापित स्थान से दसवे भाव के अनुसार समझा जाता है चन्द्रमा पर पडने वाले प्रभाव के साथ साथ चौथे भाव के स्वामी की गति को भी देखा जाता है और चौथे भाव का मालिक अगर चन्द्रमा का शत्रु है या चन्द्रमा से किसी प्रकार से गोचर से शत्रुता रख रहा है या त्रिक भाव से अपनी क्रिया को प्रदर्शित कर रहा है तो वह क्रिया भी प्रयास करने या प्रयास के दौरान अपनी प्रयोग की जाने वाली शक्ति को समझने के लिये मानी जा सकती है।बुद्धि और सोच को एकात्मक करने की क्रिया मे अगर बल की कमी है,बल बुद्धि और सोच मे किसी प्रकार का भ्रम है,बुद्धि बल और सोच मे कोई न कोई नकारात्मक प्रभाव है तो क्रिया पूर्ण नही हो पायेगी। जब कोई भी क्रिया पूरी नही हो पाती है तो बुद्धि पर बल पर और सोच पर इन तीनो के प्रभाव मे एक प्रकार से जल्दी से प्राप्त करने की कोशिश शुरु हो जायेगी और जब अक्समात उस शक्ति को प्राप्त करने की क्रिया होगी तो यह जरूरी है कि उसके लिये पूर्ण रूप से बुद्धि बल शरीर बल और सोचने की शक्ति के बल मे से किसी पर भी या तीनो पर ही केन्द्र बन जायेगा और उस केन्द्र से अगर किसी प्रकार की बाहरी अलावा कारण को उपस्थिति किया जायेगा तो मानसिक क्रिया एक प्रकार से उद्वेग मे चली जायेगी परिणाम में वाणी व्यवहार और कार्य के अन्दर एक झल्लाहट का प्रभाव सामने आने लगेगायह मानसिक गति है और इसे तीन से चार तक पहुंचाने के लिये तीन का भाव जो भावुकता के साथ प्रदर्शन करने से होता है वह भाव भावनाओ को समझने से सात की गति को आठ मे पहुंचाने के लिये सम्बन्धो को शुरु करने से पहले सम्बन्धो के परिणाम को समझना ग्यारह से बारह मे पहुंचाने के लिये मानसिक गति को बजाय हर समय लाभ के सोचने के उसे पराशक्ति के सहारे छोडना सही है। उदाहरण के लिये अगर शुक्र के साथ चन्द्रमा का सम्बन्ध एक बारह का है और वह भी तीन चार मे है तो शुक्र के प्रति चन्द्रमा सोच हमेशा यात्रा आदि के कारको सम्बन्धो मे स्त्री जातको की भावनाओ को देखने मानसिकता मे उन्ही बातो को कहने जो भावना से पूर्ण हो से शुक्र को चन्द्रमा से जोडना बेहतर होगा,इसके लिये जो भी भौतिक सम्पत्तियों में घर मकान जमीन वाहन आदि है उनके लिये व्यवहारिकता मे सोचना और उन पर व्यवहारिकता से अमल करना किसी की भावना को देखकर उसकी सहायता करने से पहले उस भावना को अपनी हैसियत आदि से परखना बजाय रूप के प्रति ध्यान भटकाने के उस रूप को समझकर उसके प्रति प्रतिक्रिया को व्यक्त करना सही होगा.आदि बातो से गति को बदला जा सकता है.इसे अगर तंत्र के रूप मे देखा जाये तो शुक्र चौथे भाव का रहने का भवन है और उस भवन की बाहरी साज सज्जा जो ऊपरी और सबसे नीचे की सज्जा को बनाने मे ध्यान जाता है ,लेकिन उसी प्रकार को अगर बीच के कारको मे पैदा कर दिया जाये और मकान आदि के बाहरी आवरण को अन्दर के आवरण मे स्थापित कर दिया जाये तो उस स्थान की मजबूती और लोगो के लिये मानसिक शांति का कारक बन जायेगा एक महीने के अन्दर चन्द्रमा सवा बारह दिन राहू के घेरे में रहता है और इसी बीच में मनुष्य के हाव भाव चिंता आदि अपनी अपनी राशि के अनुसार बनते रहते है,राहू जिस भाव में होता है उसी प्रकार की चिंता बनी रहती है और जिसके जिस भाव में चन्द्रमा राहू से ग्रसित होता है उसी भाव की चिंता बनाना एक आम बात मानी जाती है.जैसे राहू वृश्चिक मे है इस राशि का भाव या तो अस्पताल होगा या मौत वाले कारण होंगे या इन्फेक्सन होगा या राख से साख निकालने वाली बात होगी किसी प्रकार की खोजबीन में अंदरूनी जानकारी करने वाली बात मानी जायेगी,यह भाव मेष राशि वालो के लिए जब चन्द्रमा राहू के साथ अष्टम में होगा तभी मानी जायेगी,जैसे ही वृष राशि की बात आयेगी उस राशि का चन्द्रमा राहू के साथ सप्तम में होगा और सप्तम के अनुसार नौकरी करना नौकरी से मिलाने वाला लाभ जीवन साथी के मामले में चिंता करना जो भी सलाह देने वाला है उसकी बात का विशवास नहीं करना यहाँ तक की आगे जाने वाले रास्ते में भी कनफ्यूजन को देखना माना जाएगा,कहाँ से कैसे गुप्त धन मिले कैसे गुपचुप रूप से कोइ सम्बन्ध बने आदि की चिंता लगी रहेगी,इसी प्रकार से जैसे ही मिथुन राशि का चन्द्रमा छठे भाव में वृश्चिक के राहू के साथ आयेगा जो भी रोग होंगे वे गुप्त रोगोके साथ इन्फेक्सन वाले रोग होंगे पानी का इन्फेक्सन होगा कर्जा जहां से लिया होगा वह लेने वाला नहीं ले पायेगा जो कर्जा दिया होगा वह भी राख का ढेर दिखेगा जहां नौकरी आदि की जायेगी वह भी गंदा स्थान होगा या कोइ फरेब का कारण होगा नहीं तो किसी कबाड़ के स्टोर वाला ही काम होगा इसके बाद कई प्रकार की अन्य तकलीफे भी देखने को मिलेगी जैसे आपरेशन आदि होना कारण वृश्चिक का राहू इन्फेक्सन भी देता है तो डाक्टरी हथियारों को चलाने का कारण भी पैदा करता है.दुश्मनी भी होगी तो एक दूसरे को समाप्त करने वाली होगी कानूनी लड़ाई भी होगी तो वह राहू के छठे भाव में रहने तक कमजोर ही होगी इसी प्रकार से अन्य कारणों को भी समझा जा सकता है,वही चन्द्रमा जब मेष राशि का कार्य भाव में आयेगा तो भी राहू की नजर में आयेगा वह कार्य भी करने के लिए वही कार्य अधिकतर करेगा की या तो वह बीमार हो जाए या किसी प्रकार की जोखिम के डर से कार्य ही नहीं करे और करे भी तो उसे कोइ न कोइ इस बात का डर बना रहे की कार्य तो किया है लेकिन कार्य फल किस प्रकार का मिलेगा,वही चन्द्रमा जब बारहवे भाव में आयेगा तो भी राहू के घेरे में होगा और उस विचार से यात्रा आदि में किसी प्रकार के जोखिम वाले काम में या किसी प्रकार की नौकरी आदि की योजना में लोन लेने में कर्जा चुकाने में किसी बड़े संस्थान को देखने में वह अपनी गति को प्रदान करेगा उसी प्रकार से जब चन्द्रमा मेष राशि का ही दूसरे भाव में आयेगा तो नगद धन के लिए एक ही चिंता दिमाग में रहेगी की किस प्रकार से मुफ्त का माल मिल जाए या किस प्रकार से जादू यंत्र मन्त्र तंत्र से धन की प्राप्ति हो जाए कोइ ऐसा काम किया जाए जो आगे जाकर लाभ भी दे और मेहनत भी नहीं लगे या धन कमा भी लिया गया है तो राहू की गुप्त नजर से या तो वह चोरी हो जाए या किसी फरेब के शिकार में फंस जाए,वही चन्द्रमा जब चौथे भाव में जाएगा तो मन के अन्दर ज़रा भी जल्दी से कोइ काम करने के लिए दिक्कत का कारण ही जाना जाएगा जो भी पहले से वीरान स्थान है या जो भी पिता माता से समबन्धित स्थान है वे जाकर अपनी युति से बनाए भी जायेंगे और रहने के काम में भी नहीं आयेंगे,इसी प्रकार से माता का स्वास्थ जो पेट वाली बीमारियों से भी जुडा हो सकता है माता के अन्दर पाचन क्रिया का होना भी हो सकता है आदि कारणों के लिए देखा जाएगा अक्सर इस युति में यह भी देखा जाता है की या तो यात्रा के लिए फ्री के साधन मिल जाते है या कबाड़ से जुगाड़ बनाकर यात्रा करनी पड़ती .अव यह समस्या आती है कि कोई सरल उपाय जो सभी के लिये उपयोगी वह कैसे ग्रहों के प्रति बताया जाये ? अक्सर जो समर्थ होते है वे तो अपने अनुसार ग्रहों की पीडा का निवारण कर लेते है या करवा लेते है लेकिन जो असमर्थ होते है वे एक तो परेशान होते है ऊपर से अगर उन्हे कोई रत्न या महंगी पूजा पाठ को बता दिया जाये तो कोढ में खाज जैसी हालत हो जाती है। ज्योतिष की मान्यता के अनुसार इसका क्षेत्र अथाह समुद्र की तरह से है,और मान्यताओं के अनुसार जो वैदिक जमाने से चली आ रही है अगर ग्रहों के उपाय किये जायें तो वे सचमुच में फ़लीभूत होते है। लाल किताब के उपाय भी बहुत प्रभावशाली है लेकिन जय उपाय पूरी तरह कुंडली दिखाकर किसी अच्छे ज्योतिष से पर ही उपाय करें ऐसा ना हो कि एक भाव में ग्रह बैठकर देख कर हिसाब से आपको उपाय करें बिना सोचे-समझे किताब पढ़ कर मित्रोंचन्द्रमा को प्रभावित करने वाले ग्रह बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु मंगल है। बुध अगर चन्द्रमा को बुरा फ़ल देता है तो बुरे लोगों से सम्पर्क बढने लगते है और व्यवसाय आदि के लिये मानसिक कष्ट मिलने लगते है। चन्द्रमा स्त्री ग्रह है और भावुकता के लिये भी जाना जाता है। शिवजी ने चन्द्रमा को सिर पर धारण किया है इसलिये चन्द्रमा के लिये आराध्य देव शिवजी को ही माना जाता है। राहु केतु चन्द्रमा को ग्रहण देने वाले है जब भी राहु के साथ जन्म कुंडली में चन्द्रमा गोचर करता है किसी न किसी प्रकार की भ्रम वाली स्थिति पैदा हो जाती है और वही समय चिन्ता करने वाला समय माना जाता है। कुंडली के जिस भाव में राहु होता है उसी भाव की बाते दिमाग में तैरने लगती है,अक्सर इसी समय में बडी बडी अनहोनी होती देखी गयीं है। केतु के साथ गोचर करने पर एक तरह का नकारात्मक भाव दिमाग में आजाता है किसी भी साधन के लिये लम्बी सोच दिमाग में बन जाती है और जैसे ही चन्द्रमा केतु से दूर होता है वह सोच केवल ख्याली पुलाव की तरह से समाप्त हो जाती है। चन्द्रका का गोचर जैसे ही मंगल के साथ होता है दिमाग में तामसी विचार मंगल के स्थापित होने वाली राशि के अनुसार पनपने लगते है,अगर मंगल वृश्चिक राशि में है तो उस कारक को समाप्त करने के लडाई करने के झगडा करने के मारने के कत्ल करने के विचार दिमाग में आने लगते है,अगर मंगल धनु राशि में होता है तो न्याय कानून विदेश धर्म आदि के लिये उत्तेजना पनपने लगती है,अगर चन्द्रमा गुरु के साथ होता है तो सम्बन्धो के मामले में गुरु के स्थान वाले प्रभाव के अनुसार मिलने लगता है,बुध के साथ होने पर बुध जैसा और बुध के स्थान के अनुसार मिलता रहता है,जन्म के चन्द्रमा पर अगर राहु ग्रहण देने लगा है तो चन्द्रमा के बल को बढाना चाहिये और राहु के बल को समाप्त करना चाहिये। राहु अगर वायु राशि में है तो मन्त्रों के द्वारा जाप करने पर और अग्नि राशि में है तो हवन आदि के द्वारा भूमि राशि में है तो राहु के देवता सरस्वती की मूर्ति की पूजा करने के बाद जो मूर्ति पूजन में विश्वास नही रखते है उनके लिये शिक्षा स्थान या मिलकर इबादत करने वाले स्थान में राहु के रूप को नमन करना चाहिये,पानी वाली राशि में होने पर पानी के किनारे राहु का तर्पण करना चाहिये। केतु के द्वारा चन्द्रमा पर असर होने पर चन्द्रमा के बल को रत्न और वस्तुयों के द्वारा बढाकर केतु के बल को क्षीण करना चाहिये। चन्द्रमा की धातु चांदी है और रत्न मोती तथा चन्द्रमणि है। जडी बूटियों में चन्द्रमा के लिये करोंदा का कांटे वाला पेड माना जाता है।मित्रों अगर आपको मेरी पोस्ट अच्छी लगती है तो आप उसे लाइक जरूर करे paid service 09414481324 07597718725
सोमवार, 3 अप्रैल 2017
चंद्र ग्रह पोस्ट नंबर 4 जीवन के शुरु होते ही सुख दुख पाप पुण्य हारी बीमारी लाभ हानि आदि अच्छे और बुरे परिणाम सामने आने लगते है,सुख को महसूस करने के बाद दुखों से डर लगने लगता है हानि को समझ कर लाभ को ही अच्छा माना जाता है,जीवन के शुरु होने के बाद मौत से डर लगने लगता है। यही बात कुंडली में समझी जा सकती है,ग्रह की प्रकृति हानिकारक है या लाभ को प्रदान कराने वाली है। अगर ग्रह हानि देने वाला है तो उसे लाभदायक बनाने के प्रयत्न किये जाते है और लाभदायक तो लाभदायक है ही। खराब ग्रह के बारे में लालकिताब में लिखा है,-"बसे बुराई जासु तन,ताही को सम्मान,भलो भलो कहि छोडिये खोटिन को जप दान",बुराई करने से तात्पर्य है अनुभव करवाना,अगर किसी बुरी वस्तु का अनुभव ही नही होगा तो उसके अच्छे या बुरे होने का मतलब भी समझ में नही आयेगा,कई बार कई कारकों को हम सुनकर या पढकर या दूर से समझ कर ही त्याग देने से मतलब रखते है,जब कहा जाता है कि अमुक वस्तु जहरीली है और उसे अगर खा लिया गया तो मौत हो सकती है,और जब भी उस वस्तु को सामने देखा जाता है तो उससे केवल सुनकर या पढकर या दूर से समझ कर ही दूर रहने में भलाई समझी जाती है और जब कोई अपना या ना समझ व्यक्ति उस वस्तु की तरफ़ आमुख होता है तो उससे वही कहा जाता है जो हमने सुना या पढा या समझा या दूर से देखा। ग्रह कुंडली में जब सही तरह से मान्यता के रूप में देखा जाये तो जीवन के चार पुरुषार्थों में चारों ही अपने अपने स्थान पर सही माने जाते है। धर्म के रूप में शरीर परिवार और पुरानी वंशावली के प्रति मान्यता को समझा जाता है,अर्थ के रूप में मिला हुआ जो परिवार और हमारे कुटुम्ब ने हमे दिया है,हमारे द्वारा रोजाना के कार्यों से जो प्राप्त होता है और जो हमारे वंश से या हमारी उच्च शिक्षा के बाद प्राप्त होता है के प्रति माना जा सकता है। काम के रूप में हमारे से छोटे बडे भाई बहिन हमारे जीवन में कदम से कदम मिलाकर साथ चलने वाले लोग एवं वे लोग जिनके लिये हम आजीवन अपनी जद्दोजहद को जारी रखते है,चाहे वह पति पत्नी के रूप में हो,या संतान के रूप में या फ़िर संतान की संतान के प्रति हो,जब सही मायनों में हमने जीवन को समझ लिया है और तीनो पुरुषार्थों को पूरा कर लिया है तो बाकी का बचा एक मोक्ष यानी शांति नामका पुरुषार्थ अपने आप ही अपनी उपस्थिति को उत्पन्न कर देगा बात चंद्र ग्रह की चल रही है और चन्द्रमा के लिये केवल शनि ही पल्ले पडा है। जैसे कर्क और सिंह के सप्तम के स्वामी शनि होता है एक सकारात्मक होता है एक नकारात्मक होता है वैसे ही शनि की दोनो राशियों के लिये भी सूर्य और चन्द्रमा ही सप्तम के स्वामी भी होते है और सकारात्मक और नकारात्मक का प्रभाव देते है। चन्द्रमा का रूप जब शनि की राशि मकर से सप्तम का होता है तो वह केवल सोच को पैदा करने के लिये ही अपना फ़ल देता है तथा सप्तम का स्वामी जिस भाव मे होता है उसी भाव का फ़ल भी प्रदान करता है। राशि भी अपना फ़ल प्रदान करती है और सप्तम के स्वामी पर जो भी ग्रह अपनी नजर देते है उन ग्रहों का असर भी सप्तम के स्वामी पर पडता है आगे पीछे के ग्रहो का प्रभाव भी बहुत अदर देता है जिस तरह एक मकान में सभी सदस्यों का अपना अपना प्रभाव होता है उसी तरह हमारी कुंडली में प्रत्येक ग्रह का अपना अपना प्रभाव एक सदस्य के कभी घर घर नहीं बनता उसी तरह एक ग्रह के फल से कभी फल कथन कुंडली में नहीं किया जा सकता अब यहां मैं चंद्र की कुछ बुराइयां जब चंद्र अशुभ होता है उसके बारे में आपको बताऊंगा फिर भी पूरी कुंडली देखकर ही यह समझना चाहिए कि चंद्र शुभ है या अशुभ है और उसके फल को ज्ञात करना चाहिएचन्द्रमा खराब होने की निशानी होती है कि मन की सोच बदल जाती है झूथ बोलना आजाता है,चलता हुआ रास्ता भूला जाता है माता बीमार रहने लगती है जुकाम और ह्रदय वाली बीमारिया शुरु हो जाती है वाहन जो भी पास मे है सभी किसी न किसी कारण से बन्द हो जाते है बडी या छोटी बहिन भी दिक्कत मे आजाती है घर मे पानी मे कही न कही से गन्दगी पैदा हो जाती है भोजन करते समय पसीना अधिक निकलने लगता है किसी भी काम को करते समय खांसी आने लगती है गले मे ठसका लगने लगता है चावल को मशाले वाले पदार्थो मे मिलाकर खाने का जी करने लगता है। घर मे कन्या संतति की बढोत्तरी होने लगती है,कोई बहिन बुआ बेटी विधवा जैसा जीवन जीने लगती है,पडौसी नाली के लिये और घर मे आने वाली पानी के लिये लडने लगते है,मूत्र रोग पैदा हो जाते है,घर मे सुबह शाम की सफ़ाई भी नही हो पाती है,पानी का सदुपयोग नही किया जाता है घर मे पानी का साधन खुले मे नही होकर अन्धेरे मे कर दिया जाता है,पानी को बेवजह बहाना शुरु कर दिया जाता है,लान मे लगी घास सूख जाती है अधिक पानी वाले पेड नही पनप पाते है घर के एक्वेरियम मे मछलिया जल्दी जल्दी मरने लगती है,जुकाम वाले रोगो से पीडा होने पर सिर हमेशा तमकता रहता है अच्छे काम को करने के समय भी बुरा काम अपने आप हो जाता है मन की गति कन्ट्रोल नही होने पर एक्सीडेन्ट हो जाता है पुलिस और कानूनी क्षेत्र का दायरा बढने लगता है घर के अन्दर दवाइयों का अम्बार लगने लगता है। आंखो से अपने आप ही आंसू आने लगते है,आसपास के लोग तरह तरह की बाते करने लगते है हितू नातेदार रिस्तेदार सभी कुछ न कुछ कहते हुये सुने जाते है जिन लोगो के साथ अच्छा काम किया है वह भी अपनी जीभ से उसे उल्टा बताने लगते है जो अधिक चाहने वाले होते है उनके अन्दर भी बुराइया आने लगती है आदि बाते देखने को मिलती है।ज्योतिषी जी से पूंछो तो वह कहने लगेंगे कि मोती की माला पहिन लो चन्द्र मणि को पहिन लो चांदी को पहिन लो चांदी को दान मे दे दो,चन्द्रमा के जाप कर लो,यह सब खूब करो लेकिन जो कल किया है उसे आज भुगतने के लिये ज्योतिषी जी अपने सामान के साथ सहायता नही दे पायेंगे,कितने ही मंत्र बोल लो लेकिन मंत्र भी तब तक काम नही करेगा जब तक चित्त वृत्ति सही काम नही करेगी,घर मे रखी चांदी को या खरीद कर दान मे देने से किसी और का भला हो सकता है बिना चित्त वृत्ति बदले खुद का भला तो हो नही सकता है,मोती की माला भी तभी काम करेगी जब चित्त वृत्ति बदलेगी,अगर आज से चित्त वृत्तिको बदलने की हिम्मत है तो कल अपने आप ही सही होने लगेगा नही मानो तो अंजवा कर देख लो। चन्द्रमा का काम तुरत फ़ल देना होता है वह आज धन के भाव मे रहकर धन को देगा लेकिन जैसे ही वह खर्चे के भाव मे जायेगा तो धन को खर्च भी करवा लेगा,जो भी कारक उसके साथ होगा उसी के अनुसार वैसे ही काम करने लगेगा जैसे पानी मे मिठाई मिला दो तो मिठाई जैसा काम करने लगेगा गर्मी मे रख तो गर्म हो जायेगा फ़्रिज मे रख तो ठंडा हो जायेगा,मिर्ची मिला तो कडवा हो जायेगा जहर मिला तो जहरीला हो जायेगा,लेकिन चित्त वृति नही बदलती है तो वह जहरीला पानी मार सकता है और चित्त वृत्ति बदली है तो वह किसी जहरीले जानवर के काटने पर उसे बचा भी सकता है,मिर्ची वाला पानी सब्जी मे दाल मे भोजन के काम आ सकता है गर्म पानी चाय मे काम आ सकता है और ठंडा पानी शर्बत मे काम आ सकता है,लेकिन यह सब होगा तभी जब चित्त वृत्ति को बदल लो,बिना चित्त वृत्ति को बदले कुछ भी नही हो सकता है। चन्द्रमा भावुकता कारक है,अधिक भावना मे आकर यह रोना भी शुरु कर देता है और जब प्रहसन पर आये तो हँसना भी चालू कर देता है,जब गम की श्रेणी मे आजाये तो अकेला बैठ कर सोचने के लिये भी मजबूर कर सकता है,डरने की कारकता मे चला जाये तो थरथर कांपने भी लगता है। यह सब कारण अच्छी और बुरी भावना को साथ लेकर चलने से ही होता है,अन्यथा नही होता है।जब मन के अन्दर बदले की भावना नही पैदा होगी तो किसी से बैर भाव भी नही होगा और जब बैर भाव नही होगा तो लोग अच्छा ही सोचेंगे जो मन की भावनाये है उनका अच्छा और बुरा रूप दोनो सोच कर निकालेंगे तो हो ही नही सकता है कि कोई बुराई मान ले। लेकिन यह भी ध्यान रखना है कि फ़ूल और तलवार का रूप भी दिमाग से समझना पडेगा अन्यथा तलवार का काम काटना होता है और फ़ूल का काम सुन्दर भावना को देना होता है,कसाई तलवार की भाषा को समझता है और सन्त फ़ूल की भावना को समझता है।जैसे ही मन की भावना बदली मोती की माला भी काम करने लगेगी,लोगो को एक गिलास पानी पिलाने से भी चांदी के दान से बडा फ़ल मिलने लगेगा,एक सफ़ेद कपडा पहिनने से भी चन्द्रमणि का फ़ल मिलने लगेगा। यह सब कल की बुराई को आज निकालने पर कल अच्छाई से ही मुकाबला होगा इसमे कोई दोराय नही है,अक्सर जिस राशि मे चन्द्रमा होता है उस राशि मे व्यक्ति की पहुंच पर ही सोच को देने के लिये और लोगो के अन्दर जानकारी देने के लिये माना जा सकता है,जब तक व्यक्ति चन्द्रमा तक नही पहु़ंचता है तब तक वह जनता के बारे मे सोचता है जैसे ही वह चन्द्रमा की सीमा को लांघ जाता है जनता उसके बारे मे सोचने लगती है मित्रोंज्योतिष अपने रूप में कालचक्र को देखने वाली है। ज्योतिष मनुष्य की गुलाम नही है वह जो है उसे ही बखान करना जानती है। ग्रह को अपने भाव से प्रकट करना सभी की आदत है,भाव को ग्रह से जोडना भी अपने अपने भाव के बात है,भाव को बदला जा सकता है,ग्रह को भाव में रूप के अनुसार अनुमान लगाकर बताया जा सकता है,मनुष्य अपनी गति को बदल सकता है लेकिन ग्रह अपनी गति को नही बदल सकता है। जिस पृथ्वी पर हम टिके है उसकी गति को अगर दूर से देख लें तो घिग्घी बंध जायेगी,किस शक्ति से हम धरती पर टिके है उसकी गति कितनी भयानक है यह हम धरती की परिक्रमा करने की चाल से समझ सकते है।आज आज इतना ही आचार्य राजेश
शनिवार, 1 अप्रैल 2017
चंद्र ग्रह पोस्ट नंबर 3 हम सूर्य से अहं और चन्द्रमा से मन ग्रहण करते हैं और अहं व मन का संयोग हमारे व्यवहार में सुधार लाता है। ये दोनों ग्रह सूर्य और चन्द्र ज्योतिष में ऐसे ग्रह हैं जिनसे व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार का निरूपण आसानी से किया जा सकता है। ज्योतिष में चन्द्रमा पर बहुत बल दिया गया है।रूठा हुआ भाग्य पुन: मनाया जा सकता है, खोई हुई प्रतिष्ठा और धन पुन: अर्जित किए जा सकते हैं। एक साधारण एवं गरीब व्यक्ति भी मानसिक रूप से बहुत प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो सकता है अथवा वही व्यक्ति बहुत अधिक दु:खी, पीड़ित और कष्ट से भरा जीवन व्यतीत करता है। ये सभी परिस्थितियां विभिन्न प्रकार के चंद्र राशि ओर स्थान बल पर आधारित हे |सूर्य और चन्द्र अकेले ही सकारात्मक और नकारात्मक होते है बाकी के ग्रह अपनी अपनी अलग अलग प्रकृति अलग अलग राशियों में देने के लिये माने जाते है। सूर्य अयन में सकारात्मक और नकारात्मक का परिणाम देता है और चन्द्रमा पक्ष में अपने सकारात्मक और नकारात्मक रूप में उपस्थित होता है। उत्तरायण और दक्षिणायन का रूप सूर्य का है तो कृष्ण और शुक्ल पक्ष चन्द्रमा का है। यह प्रभाव कुंडली के सभी ग्रहों और राशियों के लिये इन दोनो ग्रहों का माना जाता है।चन्द्रमा मन का राजा है,"मन है तो जहान है मन नही है तो शमशान है",यह कहावत चन्द्रमा के लिये बहुत अच्छी तरह से जानी जाती है। पल पल की सोच चन्द्रमा के अनुसार ही बदलती है चन्द्रमा जब अच्छे भाव मे होता है तो वह अच्छी सोच को कायम करता है और बुरे भाव मे जाकर बुरे प्रभाव को प्रकट करता है। लेकिन जब चन्द्रमा कन्या वृश्चिक और मीन का होता है तो अपने अपने फ़ल के अनुसार किसी भी भाव मे जाकर राशि और भाव के अनुसार ही सोच को पैदा करता है। जैसे मेष लगन का चन्द्रमा अगर कर्क राशि मे है तो वह भावनात्मक सोच को ही कायम करेगा अगर वह लगन मे है तो अपनी काया के प्रति भावनात्मक सोच को पैदा करेगा और वृष राशि मे है तो अपने परिवार के लिये धन के लिये और भौतिक साधनो के लिये भावनात्मक सोच को पैदा करेगा वही चन्द्रमा अगर मिथुन राशि का होकर तीसरे भाव मे चला गया है तो वह केवल अपने पहिनावे लिखने पढने और इसी प्रकार की सोच को पैदा करेगा,अष्टम मे है तो वह अपनी भावनात्कम सोच को अपमान होने और गुप्त रूप से प्राप्त होने वाले धन अथवा सम्मान के प्रति अपनी सोच को रखने के साथ साथ वह मौत के बाद के जीवन के प्रति भी अपनी सोच अपनी भावना मे स्थापित कर लेगा। इसी प्रकार से कन्या राशि का चन्द्रमा अगर अच्छे भाव मे है तो वह अच्छी सोच को पैदा करने के लिये सेवा वाले कारणो को सोचेगा और बुरे भाव मे है तो वह केवल चोरी कर्जा करना और नही चुकाना दुश्मनी को पैदा कर लेना और हमेशा घात लगाकर काम करना आदि के लिये ही सोच को कायम रख पायेगा।चन्द्रमा जगत की उत्पत्ति का कारक है यह माता बनकर जीव को पैदा करता है और पानी बनकर जीव को पालता है तथा भावना बनकर जीव को अच्छे और बुरे काम करवाता है जीवन देने का कारक भी बनता तो मारने का भी कारक बनता है। भौतिक रूप से सभी ग्रहो के साथ मिलकर अपने रूप को बदलता है तथा राशि के अनुसार अपना स्वभाव बना लेता है भाव के अनुसार ही भावना को बनाने का कारक है. जब चन्द्रमा की जाग्रत अवस्था जीव मे होती है तो वह चेतन अवस्था मे होता है चन्द्र्मा की सुषुप्त अवस्था मे जीव जागते हुये भी अचेतन अवस्था मे चला जाता है। हिन्दी के चेतन शब्द का अर्थ देखने पर च जो चन्द्रमा का कारक है मे ऐ की मात्रा शक्ति उसी प्रकार से प्रदान करती है जैसे शब्द शव मे इ की मात्रा लगाने पर शिव का रूप बन जाता है। अक्षर तक के शामिल होने पर चेत यानी सजगता शुरु हो जाती है और अक्षर न जब जाग्रत अवस्था मे गुप्त रहस्यों को भी समझा जा सके। अर्थात जाग्रत अवस्था मे जब गुप्त रहस्य को भी समझा जा सके तभी चेतन अवस्था का होना माना जाता है।एक बात चेतन अवस्था के लिये और भी मानी जाती है कि जब सूर्य के साथ चन्द्रमा होता है तो चन्द्रमा की औकात नही होती है वह सूर्य के अहम के आगे अपने प्रभाव रूपी भावना को प्रदर्शित भी नही कर सकता है और कोई भी रहस्य समझने की उसमे ताकत भी नही होती है। जैसे जैसे चन्द्रमा सूर्य से दूर होता जाता है वैसे वैसे उसके अन्दर ताकत आती जाती है जैसे जैसे चन्द्रमा सूर्य के पास आता जाता है उसकी ताकत कम होती जाती है। शुक्ल या कृष्ण पक्ष की सप्तमी से अष्टमी के बीच मे चन्द्रमा की ताकत निश्चित मात्रा मे होती है और पूर्णिमा के दिन जब चन्द्रमा सूर्य से एक सौ अस्सी अंश की दूरी पर होता है तो चन्दमा पूर्ण बलवान होता है अक्सर बडे काम इसी तिथि को पूर्ण होते है और प्रत्येक जीव की अच्छी या बुरी ताकत बढ जाती है। अक्सर इस तिथि को भावना रूपी बल के कारण ही मंगल राहु आदि ग्रहों की सहायता से बलात्कार जैसे केश अधिक होते है और मंगल शनि के बीच मे चन्द्रमा के आने से एक्सीडेन्ट और हत्या जैसे मामले भी होते देखे गये है,पुलिस रिकार्ड को अगर खंगाला जाये तो सबसे अधिक दुर्घटना या बुरे काम पूर्णिमा के दिन ही होते और अगर तीर्थ स्थानो पर या धार्मिक स्थानो पर भीड को देखा जाये तो पूर्णिमा के दिन ही अधिक भीड देखी जा सकती है।मंगल के साथ चन्द्रमा की स्थिति या तो क्रूरता पूर्ण हो जाती है या वह बिलकुल ही मन्द गति की हो जाती है खून को शक्ति का कारक माना जाता है और शक्ति मे अगर पानी की मात्रा अधिक है तो वह भावनात्मक शक्ति बन जाती है और नीच के मंगल के होने से मन की स्थिति बहुत ही कमजोर मानी जाती है वही चन्दमा जब मंगल के शनि के घर मे होने से मकर राशि का होता है तो वह अपनी मंगल की शक्ति को दस गुनी चन्द्रमा को दे देता है शनि की चालाकी और भावना का विनाश भी मंगल को मिल जाता,और यह भाव चन्दमा को भी उच्चता मे ले जाता है जो कहना है करना है वह कडक भाषा मे कहा जाता है और खरे स्वभाव से काम भी किया जाता है।बुध के साथ चन्द्र्मा के मिलने से ह्रदय मे एक मजाकिया का प्रभाव बन जाता है प्रहसन करना जो भी ह्रदय मे आता है कह देना और जो भी काम मन को प्रफ़ुल्लित करे उसे बखान कर देना लिखने के अन्दर मन को प्रदर्शित करने वाली बातो को कहना आदि भी माना जाता है चन्द्र बुध का व्यक्ति हमेशा खुले मन का होता है वह अपने अद्नर कोई बात छुपा नही पाता है अगर वही बुध खराब राशि जैसे मीन राशि मे या वृश्चिक राशि मे चला जाता है और चन्द्रमा का साथ हो जाता है बात का गूढ पन तथा मन के अन्दर एक प्रकार की इतिहास बखान करने वाली बात या गडे मुर्दे उखाडने की बात भी मानी जा सकती है। यह मन को जो अचेतन अवस्था मे होता है को तीखे शब्दो और तीखे कामो के द्वारा जाग्रत करने का अजीब रूप भी बन जाता है। योगी की बुद्धि भी चन्द्रमा के वृश्चिक राशि मे जाने से हो जाता है और किसी प्रकार से राहु का साथ भी हो जाये तो आने वाले समय की आशंका भी व्यक्त कर दिया जाता है। जो नही है वह भी उसके साथ हो जाता है और जो है उसे नही भी बताया जा सकता है। यही चन्द्रमा जब सूर्य के साथ अगर वृश्चिक राशि का हो जाता है तो व्यक्ति अपने मन की व्यथा को किसी के सामने व्यक्त भी नही कर सकता है।नो आंखो की द्रिष्टि को नाक के ऊपर वाले हिस्से मे टिका कर बन्द आंखो से मिलने वाले अन्धेरे को देखा जाये तो एक अचेतन अवस्था भी चेतन अवस्था मे बदल जाती है। साथ ही यह क्रिया अगर लगातार की जाती रहे तो वे रहस्य जो हमेशा साथ नही होते है या मरते वक्त तक पता नही चल पाते है वह भी सामने आ जाते है मौत के बाद की अवस्था या पिछले जीवन की अवस्था भी सामने आजाती है या जो भी व्यक्ति सामने आता है उसके आगे पीछे के सभी कार्य व्यवहार रीति रिवाज और अच्छे बुरे काम सामने आजाते है।अक्सर अधिक सोचने के कारण या मोह लोभ आदि के भ्रम मे आकर चेतन मन भी अचेतन हो जाता है व्यक्ति जागता हुआ भी सोता रहता है यानी अपने ख्यालो मे इतना खो जाता है,कि उसे होश भी नही रहता है कि कोई व्यक्ति क्या कह गया है या उसने अपने ख्यालो मे रहकर कोई ऐसा काम कर दिया जिससे खुद की या किसी अन्य की जोखिम की बात भी हो गयी है,यह बात उन लोगो से भी समझी जा सकती है जो हत्या आदि करने के बाद जब व्यक्ति जेल मे जाता है और जब उसका चेतन रूप जाग्रत होता है उस समय उसे खुद के ऊपर भी विश्वास नही रहता है कि उसने वह काम कैसे कर दिया है।मित्रोंकुंडली की परिभाषा बनाते समय एक एक ग्रह का ध्यान रखना जरूरी होता है। एक ग्रह एक भाव मे एक सौ चवालीस भाव रखता है,हर भाव का रूप राशि के अनुसार अपनी अपनी भावना से ग्रह शक्ति की विवेचना करता है। वही ग्रह मित्र होता है तो समय पर वही ग्रह शत्रु भी हो जाता है जो ग्रह बचाने वाला होता है वही मारने वाला भी बन जाता है मित्रों अगर आपकी भी कोई समस्या है और आप उसका समाधान चाहते हैं जब कुंडली बनवाना दिखाना चाहते हैं तो आप मुझसे मेरे नंबरों पर संपर्क करें और पूरी-पूरी जानकारी ले सकते हैं09414481324 07597718725 मां काली ज्योतिष आचार्य राजेश बाकी आगे
गुरुवार, 30 मार्च 2017
चंद्रग्रह पोस्ट नंबर दो चन्द्रमा शुभ ग्रह है.यह शीतल और सौम्य प्रकृति धारण करता है.ज्योतिषशास्त्र में इसे स्त्री ग्रह के रूप में स्थान दिया गया है.यह वनस्पति, यज्ञ एवं व्रत का स्वामी ग्रह है. लाल किताब में सूर्य के समान चन्द्रमा को भी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण माना गया हैटेवे में अपनी स्थिति एवं युति एवं ग्रहों की दृष्टि के अनुसार यह शुभ और मंदा फल देता है. लाल किताब में खाना नम्बर चार को चन्द्रमा का घर कहा गया है चन्द्रमा सूर्य और बुध के साथ मित्रपूर्ण सम्बन्ध रखता है.शुक्र, शनि एवं राहु के साथ चन्द्रमा शत्रुता रखता है.केतु के साथ यह समभाव रखता है.मिथुन और कर्क राशि में यह उच्च होता है एवं वृश्चिक में नीच.सोमवार चन्द्रमा का दिन होता है.लाल किताब के टेवे में 1, 2, 3, 4, 5, 7 एवं 9 नम्बर खाने में चन्द्रमा श्रेष्ठ होता है जबकि 6,7, 10, 11 एवं 12 नम्बर खाने में मंदा होता है. राशि के साथ सप्तम खाने में चन्द्रमा होने से धन एवं जीवन के सम्बन्ध में उत्तम फल मिलता है.कुण्डली में चतुर्थ भाव यानी चन्द्र का पक्का घर अगर खाली हो और इस पर उच्च ग्रहों की दृष्टि भी न हो और अन्य ग्रह अशुभ स्थिति में हों तब भी चन्द्रमा व्यक्ति को अशुभ स्थितियों से बचाता और शुभता प्रदान करता है. जब चन्द्रमा पर शुक्र, बुध, शनि, राहु केतु की दृष्टि होती है तो मंदा फल होता हैं जबकि इसके विपरीत चन्द्र की दृष्टि इन ग्रहों पर होने से ग्रहों के मंदे फल में कमी आती है और शुभ फल मिलता है.चन्द्र के घर का स्थायी ग्रह शत्रु होने पर भी मंदा फल नहीं देता है. इस विधा में कहा गया है कि चन्द्रमा अगर टेवे में किसी शत्रु ग्रह के साथ हो तब दोनों नीच के हो जाते हैं जिससे चन्द्रमा का शुभ फल नहीं मिलता है.लाल किताब में खाना नम्बर 1, 4, 7 और 10 को बंद मुट्ठी का घर कहा गया है.इन घरो में स्थित ग्रह अपनी दशा में व्यक्ति को अपनी वस्तुओं से सम्बन्धित लाभ प्रदान करते हैं.चन्द्रमा देव ग्रह है,तथा सूर्य का मित्र है,मंगल भी गुरु भीसूर्य और चन्द्रमा अगर किसी भाव में एक साथ होते है,तो कारकत्व के अनुसार फ़ल देते है,सूर्य पिता है और चन्द्र यात्रा है,पुत्र को भी यात्रा हो सकती है,एक संतान की उन्नति बाहर होती है।अगर जन्मकुंडली में अकेला चंद्र हो और उस पर किसी दूसरे ग्रह की नजर (दृष्टि) न हो तो जातक हर हालत में अपने कुल की हिफजत करता है। उसका बर्ताव दया और नम्रतापूर्ण रहता है। जातक में अपने ऊपर आने वाले किसी भी आघात, दोष, यहां तक कि फांसी की सजा भी खारिज करवाने की बेमिसाल ताकत होती है। चंद्र कर्क राशि का स्वामी है। यह अपने मित्र ग्रह बृहस्पति, मंगल एवं सूर्य पर अपना कुछ प्रभाव डालकर स्वयं बुरी स्थिति से बच जाता है। चंद्र चौथे घर का हर तरह से मालिक है। यह शनि के शत्रु सूर्य से मित्रता निभाने के लिए शनि के समय रात को भी सूर्य की तरह प्रकाश फैलाता है और शनि के अंधेरे को नष्ट करने का प्रयास करता है।मन की शांति और दिल में चैन पैदा करने वाला, गंगा की तरह सबकी गंदगी को अपने अंदर समेटकर साफ-सुथरा रूप देने वाला तथा गर्मी को ठंडक में बदल देने वाला ग्रह चंद्र है। इसे माता का प्रतीक माना गया है, इसलिए सभी ग्रह इसके कदमों में सिर झुकाकर बुराई न करने की कसम खाते है। चंद्र के शत्रु राहु, केतु और शनि है। यदि पापी ग्रह शनि, राहु और केतु कुंडली के चौथे घर (जो च्रंद का घर है) में हो तो जातक का बुरा नहीं कर पाते। चंद्र के संपर्क में आने के बाद इनकी बुराई खुद-ब-खुद खत्म हो जाती है।ज्योतिष में चन्द्र और शनि का योग विष योग के नाम से प्रसिद्ध है। इसका कारण ज्योतिष में शनि को जहर का कारक माना जाना है। चन्द्र पानी का कारक होता है और जब उसमे शनि का जहर मिल जाता है तो वो जहरीला हो जाता है। चंद्र दूध का भी कारक होता है और जब दूध में जहर मिलता है तो सफेद से नीला हो जाता है और नीला रंग राहु का माना गया है और शनि का भी अर्थात इन दोनों ग्रहों का पूर्ण प्रभाव जातक पर पड़ता है।चंद्र हमारे मन और मानसिक सुख का कारक है तो शनि उदासी और वैराग्य के कारक होते है। जब चंद्र को शनि का साथ मिलता है तो उस जातक में चंद्र की चंचलता समाप्त हो जाती है। इस पर शनि की उदासी हावी हो जाती है। जातक मानसीक रूप से अशांत रहने लग जाता है और उसमे एक वै राग्य की भावना का जन्म होने लग जाता है। सभी जानते हैं की चंद्रमा हमारी माता का भी कारक होता है और शनि का प्रभाव जातक की माता को भी स्वास्थ्य से सम्बंधित समस्या प्रदान करता है। यदि आपने ध्यान दिया होगा तो अमावस्या की काली रात जो की शनि की होती है उसमे चन्द्र नही निकलता है । शनि के अंधेरे में चंद्र गुम हो जाता है। यानी जब शनि का पूर्ण अशुभ प्रभाव चन्द्र पर हो तो जातक को चन्द्र से संबंधित समस्या का सामना करना पड़ जाता है। लाल किताब में भी चंद्र को धन और शनि को खजांची कहा गया है और जब इन दोनों का साथ हो तो जातक के धन की रखवाली जहरीला सांप करता है। यानी जातक के पास धन हो तो भी वो उसका प्रयोग नही कर सकता यानी धन की थैली पर सांप कुण्डली मार कर बैठ जाता है।यदि चन्द्रमा की दृष्टि शनि पर हो तो चन्द्रमा पर दुष्प्रभाव नही होता। यदि शनि की दृष्टि चन्द्रमा पर हो तो चन्द्रमा के फल का विपरीत प्रभाव पड़ता है। चन्द्रमा में शनि का विष आये बिना नही रहेगा।शनि द्वारा शासित जातक शुक्र से सम्ब्नधित वस्तुए के व्यापार में लाभ प्राप्त नही कर सकेगा। यदि राहु - केतु या शनि की दृष्टि चन्द्रमा पर हो तो द्रष्टा ग्रह से सम्बंधित जातक के सबंधी पर अशुभ फलो का प्रभाव होगा। जब सूर्य और मंगल साथ साथ एक ही भाव में हो तो चन्द्रमा प्राय: लाभ का ग्रह नही होता। जब चन्द्रमा की दृष्टि गुरु पर हो तो 2 में बुध, 5 में शुक्र, 9 में राहु तथा 12 में शनि हो तो चन्द्रमा शुभ फल नही देता। यदि 2, 4 या 8 खली होने के कारण सुप्त हो तो चन्द्रमा का उपाए करना चाहिए। ग्रहों के 35 साला दौरे में चन्द्रमा को एक साल मिला है। चंद्र बुरे घरों में हों और उनको शनि, राहू, केतू पीड़ित कर रहे हों तो ऐसे जातक के रूपये पैसे या प्रॉपर्टी पर दुसरे लोग मौज करते हैं। चंद्र भी मन्दे हों और उसी समय बुध भी मन्दे हाल हों और दोनों नीच या अपने दुश्मन ग्रहों से संबंध (कन्सर्न) करें तो सोच ख़राब हो जाती है और इज्जत मान भी नष्ट हो जाता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में चन्द्र नीच के या मन्दे हाल हों तो ऐसे व्यक्ति को समझाना या नसीहत देने का कोई लाभ नहीं मिलता क्योंकि ऐसा व्यक्ति जिद्दी हो जाता है और अपने आगे किसी की नही सुनता। जिस कुंडली में चन्द्र और गुरु दोनों मन्दे नीच या दुश्मन ग्रहों से पीड़ित हो रहे हों तो ऐसा जातक दो नम्बर के कामों की तरफ जल्दी आकर्षित हो जाता है। वाकी आगे मित्रों अगर आप की ज़िंदगी में कोई भी समस्या चल रही है और आप उससे निजाद पाना चाहते है तो मुझ से समर्पक कर सकते हैऔर मैं पूरी कोशिश करूंगा कि उसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी आप लोगों को मुहैया करवा सकूँ। हमारी service paid है आचार्य राजेश 09414481324 07597718725
बुधवार, 29 मार्च 2017
: चंद्र ग्रह मित्रोंअसल में चंद्र कोई ग्रह नहीं बल्कि धरती का उपग्रह माना गया है। पृथ्वी के मुकाबले यह एक चौथाई अंश के बराबर है। पृथ्वी से इसकी दूरी 406860 किलोमीटर मानी गई है। चंद्र पृथ्वी की परिक्रमा 27 दिन में पूर्ण कर लेता है। इतने ही समय में यह अपनी धुरी पर एक चक्कर लगा लेता है। 15 दिन तक इसकी कलाएं क्षीण होती है तो 15 दिन यह बढ़ता रहता है। चंद्रमा सूर्य से प्रकाश लेकर धरती को प्रकाशित करता है। देव और दानवों द्वारा किए गए सागर मंथन से जो 14 रत्न निकले थे उनमें से एक चंद्रमा भी थे जिन्हें भगवान शंकर ने अपने सिर पर धारण कर लिया था।चंद्र को देव ग्रह माना गया है और जा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है कर्क राशि का यह स्वामी है। चंद्रमा के अधिदेवता अप् और प्रत्यधिदेवता उमा देवी हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार चंद्रदेव महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र हैं। इनको सर्वमय कहा गया है। ये सोलह कलाओं से युक्त हैं। चंद्रमा का विवाह राजा दक्ष की सत्ताईस कन्याओं से हुआ। ये कन्याएं सत्ताईस नक्षत्रों के रूप में भी जानी जाती हैं, पत्नी रोहिणी से उनको एक पुत्र मिला जिनका नाम बुध है। पृथ्वी से जुड़े प्राणियों की प्रभा (ऊर्जा पिंडों) और मन को ग्रह प्रभावित करते हैं। प्रत्येक ग्रह में एक विशिष्ट ऊर्जा गुणवत्ता होती है, जिसे उसके ग्रहों की ऊर्जा किसी व्यक्ति के भाग्य के साथ एक विशिष्ट तरीके से उस वक्त जुड़ जाती है जब वे अपने जन्मस्थान पर अपनी पहली सांस लेते हैं। यह ऊर्जा जुड़ाव धरती के निवासियों के साथ तब तक रहता है जब तक उनका वर्तमान शरीर जीवित रहता है।ग्रह आद्यप्ररुपीय ऊर्जा के संचारक हैं। प्रत्येक ग्रह के गुण स्थूल जगत और सूक्ष्म जगत वाले ब्रह्मांड ्रुवाभिसारिता के समग्र संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं, जैसे नीचे वैसे ही ऊपरमाँ का सुख क्योंकि चन्द्र प्राण का कारक और मनुष्य रूप में माँ ही प्राण तुल्य है।जब किसी भी मनुष्य को किसी भी प्रकार से कष्ट होता है।तो उसे माँ ही याद आती है।और माँ को भी अपनी संतान के दुख का अभास हो जाता है।और अपनी संतान के दुख को दूर करने का प्रयत्न मन से वचन से और कर्म से करती है।यदि माँ मनसा, वाचा,कर्मणा अपनी संतान की रक्षा नहीं कर पाती तो तब इस स्थिति में माँ अपने हृदय से अपने प्राणों से प्यारी संतान की रक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करती है। और भगवान उस माँ की प्रार्थना को सुन लेते हैं।और उसकी संतान के प्राणों की पुनः रक्षा करते हैं।और प्रभु प्रार्थना उसका जीवन आनंदमय कर देती है। चन्द्र ग्रह का भी यही काम प्राणों की रक्षा करना है।मनुष्यों में माँ प्राण और नव ग्रहो में चन्द्र प्राण है। चन्द्र ग्रह शान्ति का प्रतीक है।सफेद रंग है।जल तत्व है।यदि किसी भी मनुष्य की जन्म कुण्डली में जीवन में चन्द्र ग्रह शुभ हो तो जातक बहुत शांत स्वभाव का,मातृ -सुख की प्राप्ति, प्रत्येक कार्य को बहुत स्थिर बुद्धि से करने वाला, जल संबंधित पानी, चाय-कोफी,जूस,फिनाइल - तेजाब कोल्ड ड्रिंक की एजेंसी कम्पनी, आईस क्रीम, आईस क्यूब की फैक्ट्री, दूध बेचने का काम शराब के ठेके का काम लेना, बेचना, खरीदना, इत्यादि ( लिक्विड ) का व्यापार करने वाला होता है।अगर आप की कुण्डली मे चन्द्र ग्रह की स्थिति उतम और यहाँ बताये हुआ कोई भी व्यपार, व्यवसाय आप करते है। तो आप अपने इस व्यपार मे बहुत लाभ कमा रहे है।या इनमे से कोई भी व्यपार करके आप धन, ऐश्वर्य, नाम कमाने वाले हो बस आप को अपने काम मे सत्य निष्ठा,ध्यान, स्थिरता, योग्यता, अपना व्यवहार और वाणी को उतम,और थोड़ा परिश्रम की अवश्यकता है। बाकी चन्द्र ग्रह अपना शुभ फल दे के आप की मेहनत को सफल करके ख्याति नाम प्राप्त करवायेगा।लेकिन ये व्यपार, व्यवसाय, प्रारम्भ करने से पहले आप को पता होना चाहिए। कि आप की जन्म कुण्डली मे चन्द्र ग्रह की स्थिति शुभ होनी चाहिए। और यदि चन्द्र ग्रह की स्थिति आप की जन्म पत्रिका में अशुभ हैं।तो आप को चन्द्र ग्रह से संबंधित कोई भी व्यपार, व्यवसाय नहीं करना चाहिए। यदि आप करेगे तो आप को लाभ नहीं हानि होगी। Modern Science भी इस बात को पूरी तरह से स्वीकार करता है कि पूर्णिमा व अमावस्या के समय जब चन्द्रमा, पृथ्वी के सर्वाधिक नजदीक होता है, तब पृथ्वी के समुद्रों में सबसे बड़े ज्वार-भाटा होते हैं और इतने बड़े ज्यार-भाटा का मूल कारण चन्द्रमा की गुरूत्वाकर्षण शक्ति ही है, जो कि मूल रूप से पृथ्वी के समुद्री जल काे ही सर्वाधिक आकर्षित करता है।सम्पूर्ण पृथ्वी पर लगभग 75% भू-भाग पर समुद्र का खारा जल है और इन्हे Scientists ने से भी सिद्ध किया है कि मनुष्य का शरीर भी लगभग 75% पानी से बना है तथा ये पानी भी लगभग उसी अनुपात में और उतना ही खारा है, जितना कि समुद्री जल। यानी सरलतम शब्दों में कहें तो हमारा शरीर लगभए एक छोटे समुद्र के समान है। तो जब चन्द्रमा के गुरूत्वाकर्षण का प्रभाव समुद्र के पानी पर पड़ता है, तो उसी मात्रा में वैसा ही प्रभाव मानव शरीर पर क्यों नहीं पड़ेेगा मानव का दिमाग मूल रूप से 80% पानी से बना होता है और हमारे भोजन द्वारा जीवन जीने के लिए जितनी भी उर्जा ये शरीर Generate करता है, उसकी 80% उर्जा का उपयोग केवल दिमाग द्वारा किया जाता है क्योंकि शरीर के काम करना बन्द कर देनेसो जाने, बेहोश हो जाने अथवा शिथिल हो जाने पर भी दिमाग यानी मन अपना काम करता रहता है। यानी मन, मनुष्य के शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसकी वजह से ये तय होता है कि व्यक्ति जीवित है या नहीं। यदि व्यक्ति का मन मर जाए, तो शरीर जीवित होने पर भी उसे मृत समान ही माना जाता है, जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में कोमा की स्थिति कहते हैं और भारतीय फलित ज्योतिष के अनुसार मन का कारक ग्रह चन्द्रमा है।जिस प्रकार से जीवन मे लगन प्रभावी होती है उसी प्रकार से चन्द्र राशि भी जीवन मे प्रभावी होती है। चन्द्रमा एक तो मन का कारक है दूसरे जब तक मन नही है तब कुछ भी नही है,दूसरे चन्द्रमा माता का भी कारक है और माता के रक्त के अनुसार जातक का जीवन जब शुरु होता है तो माता का प्रभाव जातक के अन्दर जरूर मिलता है,हमारे भारत वर्ष मे जातक का नाम चन्द्र राशि से रखा जाता है यानी जिस भाव का चन्द्रमा होता है जिस राशि मे चन्द्रमा होता है उसी भाव और राशि के प्रभाव से जातक का नाम रखा जाता है मैने पहले भी कहा है कि चन्द्रमा मन का कारक है और जब मन सही है तो जीवन अपने आप सही होने लगता है जो सोच सोचने के बाद कार्य मे लायी जायेगी वह सोच अगर उच्च कोटि की है तो जरूर ही कार्य जो भी होगा वह उच्च कोटि का ही होगा,सूर्य देखता है चन्द्र सोचता है और शनि करता है बाकी के ग्रह हमेशा सहायता देने के लिये माने जाते है। कोई ग्रह समय पर मित्र बनकर सहायता देता है तो कोई ग्रह शत्रु बनकर एक प्रकार की शिक्षा के लिये अपना प्रयोग दे कर चला जाता है जो ग्रह आज शत्रु है तो कल वही ग्रह मित्र बनकर अपना प्रभाव प्रदर्शित करता है आदि बाते जरूर देखने मे आती है।मेरा यह सतत प्रयास रहा है कि आप ज्योतिष के अन्दर अन्धेरे मे नही रहे और आपको जितनी अच्छी ज्योतिष सीखने का कारण मिलेगा मुझे उतना ही आनन्द आयेगा कि भारत के ऋषियों मनीषियों की शोध की बाते आप तक पहुंची और आपने उन बातो को सीख कर अपने ग्यान को भी बढाया साथ मे उन लोगो की भी सहायता की जो आज के भौतिक युग मे केवल धन को ही महत्ता देते है और उस महत्ता के कारण जो वास्तव मे जरूरत वाले है उन्हे ज्योतिष का प्रभाव समझ मे नही आता है उसके बाद भी तामसी प्रवृत्ति के लोग उन्हे बरगलाते है और उन्हे हमारे ज्योतिष को जो वेद का छठा अंग है और सूर्य बनकर देख रहा है चन्द्रमा बनकर सोच रहा है मंगल बनकर पराक्रम दे रहा है बुध बनकर एक दूसरे को जोड रहा है गुरु बनकर रिस्ते स्थापित कर रहा है शुक्र बनकर जीवन को सजा रहा है शनि बनकर कार्य की तरफ़ बढा रहा है राहु बनकर आकस्मिक अच्छा कर रहा है और केतु बनकर साथ के सहायक कारको को प्रदान कर रहा है मित्रों चन्द्रमा राशि के अनुसार क्या क्या सोचने के लिये मन के अन्दर लहरो को उठाता है यह लहरे भावना के अनुसार किस प्रकार से ऊपर नीचे जाती है और जीवन मे सोच आना और सोच का जाना कैसे होता है। इतना ध्यान रखना है कि लगन शरीर है तो चन्द्र राशि सोच है,सूर्य लगन पिता की तरफ़ से मिले संस्कार है। वाकी आगे मित्रों अगर आप भी मुझसे अपनी कुंडली बनवाना क्या दिखाना चाहते हैं तो आप मुझसे संपर्क करें हमारे फोन नंबर पर पूरी जानकारी ले paid service 09414481324 07597718725
सोमवार, 27 मार्च 2017
शुक्र ग्रह पोस्ट नंबर 3 मित्रों आज भी हम शुक्र पर ही बात करेंगे फिल्मी दुनिया की चकाचौंध, फेशनेबल वस्त्रों में घूमते युवा, विपरीत लिंगियों की तरफ बढ़ता आकर्षण अदभुत सा लगता है न ये संसार, ये सारी चीजें शुक्र के प्रतिनिधित्व में आती है. अगर शुक्र का अच्छा प्रभाव कुंडली में हो तो व्यक्ति को दुनिया की बुलंदियों पर पंहुचा देता है लेकिन शुक्र का फ़ायदा भी आपको तभी मिल सकता है, जब कुंडली में अन्य ग्रह आपकी आर्थिक मदद कर सकें और ऐसा करने से आपकी जिन्दगी पूरी तरह से ही बदल जायेगीशुक्रदेव का हमारी कुंडली में बड़ा ही अलग सा किरदार होता है। शुक्र गुरु है उन दैत्यों का जो निद्रा और वासना के पुतले है। उन्हें धर्म या दर्शन से कोई दरोकर नही में शुक्र को उन्ही वासना और विश्राम कारक मन गया है। अकेला शुक्र किसी भी भाव में बुरा नही।वुघ शुक्र के साथ मित्रता रखता है लेकिन मुसीबत के वक्त मित्रता की बलि दे देता है यदि बुध शुक्र से 1, 2, 3 भावों में स्थित हो तो दोनों के फल संयुक्त रूप से शुभ होते है अलग अलग भी अच्छे ही होते है। इन स्थानों में केतु भी शुभ फल देता है। यदि भाव स्तिथि इससे भिन्न हो तो राहु फल को विषाक्त कर देता है। यदि शुक्र और बुध 2-8, 3-9, 6-12, 8-2 हों तो खराब फल देता है, किन्तु ऐसा बहुत कम होता है। शुक्र और बुध एक दूसरे से 150 की दुरी पर प्राय नही जाते। यदि बुध षष्ठ भाव में और शुक्र द्वादश भाव में हो तो दोनों उच्च के होते है। अतः शुभ फल देते है। यदि राहु की दृष्टि शुक्र पर हो तो या शुक्र की दृष्टि राहु पर हो तो शुक्र के फल शून्य जाते है। यदि जन्म कुंडली में शुक्र पर किसी प्रकार का विपरीत प्रभाव होतो गोचर से जब भी वह अशुभ घर में आयेगातो उसके फल शून्य हो जायेंगे। शुक्र की अधिस्ठात्री देवी लक्ष्मी है। उसकी धातु चांदी और रत्न हीरा माने गए है। वह पत्नी और प्रेमिका की कारक है। कपूर, घी, दही, रुई और सुगंध देने वाले पौधे शुक्र के छेत्र अधिकार में आते है। देहंगो में वह चेहरे का कारक है। भाव को सक्रिय करता है और चतुर्थ में राशिफल का ग्रह बन जाता है। ग्रहों को 35 साला दौरे में उसे 3 साल मिले है। शुक्र सफेद रंग (दही) दुनिया की मिट्टी, ज़माने की लक्ष्मी, गऊ माता, मर्द की औरत ने किसी को नीच न किया। इसलिये हर एक ने पसन्द किया और खुद नीच किया। ''बदी खुफिया तू जिससे दिन रात करता, वक्त मन्दा तेरे वही सर पर चढ़ता। शुक्र के ग्रह को दुनियावी किस्मत से कोई ताल्लुक नहीं। सिर्फ इश्क व मुहब्बत की फालतू दो से एक ही आंख हो जाने की ताकत शुक्र कहलाती है। स्त्री ताल्लुक, गृहस्थ आश्रम, बाल बच्चों की बरकत और बड़े परिवार का 25 साला ज़माना शुक्र का अहद है। इस ग्रह में पाप करने कराने की नस्ल का खून और गृहस्थी हालत में मिट्टी और माया का वजूद है। मर्द के टेवे में शुक्र से मुराद स्त्री और औरत के टेवे में उसका खाविन्द मुराद होगी। अकेला बैठा हुआ शुक्र टेवे वाले पर कभी भी बुरा असर न देगा और न ही ऐसे टेवे वाला गृहस्थी ताल्लुक में किसी का बुरा कर सकेगा। जब दृष्टि के हिसाब से आमने सामने के घरों में बैठे हों तो चमकती हुई चांदनी रात में चकवे चकवी की तरह अकेले अकेले होने का असर मन्दरज़ा जैल होगा। अगर बुध कुण्डली में शुक्र से पहले घरों में बैठा हो तो इस तरह दोनों के मिले हुए असर में केतु की नेक नीयत का उम्दा असर शामिल होगा। लेकिन अगर शुक्र कुण्डली में बुध से पहले घरों में हो तो इस तरह मिले हुए दोनों के असर में राहु की बुरी नीयत का असर शामिल होगा। दृष्टि वाले घरों में बैठे होने के वक्त शुक्र का असर प्रबल होगा। लेकिन जब बुध पहले घरों में हो और मन्दा होवे तो शुक्र में बुध का मन्दा असर शामिल हो जायेगा। जिसे शुक्र नही रोक सकता व गृहस्थ मन्दे नतीजे हाेंगे। जब अकेले अकेले बन्द मुट्ठी के खानों से बाहर एक दूसरे से 7वें बैठे हो तो दोनो ही ग्रहों और घरों का फल निकम्मा होगा। मगर शुक्र 12 और बुध 6 में दोनों का उच्च होगा जिसमें केतु का उत्तम फल शामिल होगा। ऐसी हालत में बैठे होने के वक्त दोनों का असर बाहम न मिल सकेगा। जब दोनो ग्रह जुदा जुदा मगर आपस में दृष्टि के खानों की शर्त से बाहर हों तो जिस घर शुक्र हो वहां बुध अपना असर अपनी खाली नाली के ज़रिए लाकर मिला देगा और शुक्र के फल को कई दफ़ा बुरे से भला कर देगा। लेकिन बुध के साथ अगर दुश्मन ग्रह हों तो ऐसी हालत में शुक्र कभी भी बुध को ऐसी नाली लगाकर अपना असर उसमें मिलाने नही देगा। ऐसी हालत में बुध किसी तरह भी शुक्र को निकम्मा या बरबाद नही कर सकता। जन्म कुण्डली में शुक्र अगर अपने दुश्मन ग्रहों को देख रहा हो तो जब कभी बमुजिब वर्ष फल शुक्र मन्दा हो या मन्दे घरों में जा बैठे, वह दुश्मन ग्रह जिनको कि शुक्र जन्म कुण्डली में देख रहा था, शुक्र के असर को ज़हरीला और मन्दा करेंगे ख्वाह वह शुक्र को अब देख भी न सकते हों । ऐसे टेवे वाला जिससे खुफिया बदी किया करता था अब वही दुश्मनी और बरबादी का सबब होगा। .यहा सुर्य के साथ शुक्र ,सूर्य गर्मी है और शुक्र रज है सूर्य की गर्मी से रज जल जाता है,और संतान होने की गुंजायस नही रहती है,इसी लिये सूर्य का शत्रु है,जब कभी भी कुंडली में सूर्यूर्और शनि का झगड़ा होगा, ऐसी हालत में न सूर्य बर्बाद होगा न शनि, क्योकि वे दोनों बाप-बेटे है लेकिन इसका असर शुक्र पर जरूर पड़ेगा। बेशक शुक्र उस समय अच्छी स्थिति में हो। कहने का भाव यह है कि सूर्य शनि के झगडे में व्यक्ति की स्त्री पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इसी तरह बुध ने भी अपने बचाव के लिए शुक्र से दोस्ती कर रखी है, लेकिन चालाक बुध अपने वफ़ादारी के फर्ज को नही निभाता। जब कभी बुध पर कष्ट आता है तो वो अपने ही दोस्त शुक्र को मुशीबत में डाल देगा। ऐसा नहीं की हर जगह शुक्र ही मरते है। बल्कि जब कभी चन्द्र और शुक्र मुकाबले पर होखासकर शुक्र चन्द्र मुश्तरका खाना न 7 या शुक्र अकेला खाना न 7 और चन्द्र खाना न 1 तो माता पर या माता की नजर पर इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है । शुक्र देव नीच मंदे या दुश्मन ग्रहो के साथ बैठ जाये या दृष्टि आदि से पीड़ित हो तो शुक्र के बुरे फल मिलते है और ऎसे जातक के स्वाभाव में यह भी देखा जाता है की वह जल्दी बिस्तर नही छोड़ता और वह शुक्र के फल को और भी बुरा कर लेता है। शुक्र का सम्बन्ध राहु के साथ हो जाये तो पति पत्नी के सम्बन्ध में शक वहम मारपीट तक होती है। ऎसे जातक को गुप्त रोग तक हो जाते है यहाँ तक की जातक नपुंसक तक हो जाते है। ऐसा व्यक्ति अपने साथी को तंग ही करता रहता है। शुक्र का सम्बन्ध सूर्य के साथ होने से सम्भोग की इच्छा बहुत काम हो जाती है। वो भी जीवनसाथी को खुश नही रख पता। खुद के व साथी के शरीर में अंदरुनी कमजोरी हो जाती है जो की आसानी से पकड़ में नही आती। जब शुक्र का सम्बन्ध चन्द्र के साथ हो जाये तो ऎसे जातक का सम्बन्ध अपनी सास के साथ अच्छा नही होता। अगर ऐसा योग अगर लड़की की कुंडली में हो तो उसे सास की तरफ से कभी सुख नही मिलता। ऎसे जातक की माँ की आँखों में तकलीफ रहती है और साथ ही चमड़ी के रोग भी हो जाते है। यहाँ तक की जातक को भी इन्ही परेशानियो का सामना करना पड़ता है। शुक्र देव 2, 3, 7, 10, 12 में अच्छे फल देते है लेकिन यह भी जरूरी होता है की वे अपने सत्रु गृह सूर्य ,चन्द्र ,राहु के साथ युक्ति द्वारा या दृष्टि द्वारा ख़राब तो नही हो रहे। शुक्र देव के बारे में एक आश्चर्यजनक बात यह है की खाना 6 ,8 ,12 में तो इसका भेद ही बहुत रहस्यमय हो जाता है।यही अगर ,शुक्र के साथ राहु के मिलने से कामुकता में इतनी अधिकता आजाती है कि हर बात में ही कामुकता का रूप दिखाई देने लगता है। यह बात हर जगह नही मानी जाती है,कुंडली की राशि और भाव पर भी निर्भर करता है। शुक्र का प्रभाव अगर दसवे भाव में राहु के साथ हो जाता है तो कार्य करने के लिये शाही चमक दमक वाला दफ़्तर ही रास आता है चाहे सैलरी कितनी ही कम क्यों न हो। घर में भोजन की दिक्कत बनी रहे लेकिन पत्नी की सजावट और कास्मेटिक का बोलबाला जरूर होगा,पेट्रोल के लिये धन कमाने में दिक्कत होगी लेकिन गाडी चमक दमक वाली होगी। घर के अन्दर टूटा पलंग होगा लेकिन दरवाजे की सजावट निराली होगी,यह होता है शुक्र और राहु का इकट्ठा रूप।अक्सर लोगों की धारणा होती है कि अमुक ग्रह कुंडली में दिक्कत देने वाला है इसलिये इसकी उपयोगिता नही है। अमुक ग्रह का उपाय किया जाये उसका रत्न पहिना जाये या पूजा पाठ से उसे उपयोगी बनाया जाये। यह भी सभी को पता होता है कि ग्रह भी समय समय से अपना फ़ल प्रदान करता है,यह भी पता है कि ग्रह अगर जन्म से ही खराब है तो वह कितना अच्छा फ़ल दे पायेगा।मित्रों मैंने कभी नहीं कहा कि मैं फ्री देखता हूं क्या मैंने आप लोगों से कहा की आपमुझसे ही अपनी कुंडली दिखाएं यह बात मुझे कहने पड़ रही है कि कुछ लोग उल्टे सीधे सवाल करते हैं या आप मेरी Facebook से जुड़े अगर आप मुझसे अपनी कुंडली दिखाना या बनवाना चाहते हैं तो हमारी सर्विस,paid हे्है आचार्य राजेश
रविवार, 26 मार्च 2017
शुक्रग्रह भाग नंबर २ मित्रों आज भी हम शुक्र के बारे में ही बात करेंगे ज्योतिष की इस विधा में वैवाहिक जीवन के सुख विवाह और वैवाहिक सुख के लिए शुक्र सबसे अधिक जिम्मेवार होता है. इस विषय में लाल किताब और भी बहुत कुछ कहता है. यदि शुक्र जन्म कुण्डली में सोया हुआ है तो स्त्री सुख में कमी आती है. राहु अगर सूर्य के साथ योग बनाता है तो शुक्र मंदा हो जाता है जिसके कारण आर्थिक परेशानियों के साथ साथ स्त्री सुख भी बाधित होता है. लाल किताब में लग्न, चतुर्थ, सप्तम एवं दशम भाव बंद मुट्ठी का घर है. इन भाव के अतिरिक्त किसी भी अन्य भाव में शुक्र और बुध एक दूसरे के आमने सामने बैठे हों तो शुक्र पीड़ित होकर मन्दा प्रभाव देने लगता है. इस स्थिति में शुक्र यदि खाना १२ में होता है तो मन्दा फल नहीं देता है.कुण्डली में खाना संख्या 1 में शुक्र हो और सप्तम में राहु तो शुक्र को मंदा करता है जिसके कारण दाम्पत्य जीवन का सुख नष्ट होता हे अगर एक दूसरे से छठे और आठवें घर में होते हैं तो टकराव के ग्रह बनते हैं. सूर्य और शनि कुण्डली में टकराव के ग्रह बनते हैं तब भी शुक्र मंदा फल देता है जिससे गृहस्थी का सुख प्रभावित होता है. पति पत्नी के बीच वैमनस्य और मनमुटाव रहता है.पीड़ित शुक्र से प्रभावित जातक की जिंदगी में सुख की बेहद न्यूनता हो जाती है, उसे पग-पग पर संघर्ष करना पड़ता है, भोग-वैभव उससे कोसों दूर रहते हैं, मानसिक रूप से ऐसे व्यक्ति एक नीरस इंसान की तरह लोगों के बीच जाना जाता है ज्योतिष मे स्त्री ग्रह का दर्जा दिया है। शुक्र को वास्तव में स्त्री ग्रह का दर्जा तो दिया गया है,लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव प्रत्येक जीवधारी में बराबर का मिलता है,पुरुष के अन्दर स्त्री अंगों की उपस्थिति भी इस ग्रह का भान करवाती है। जिस प्रकार से मंगल की गर्मी गुस्सा और उत्तेजना को पुरुष और स्त्री दोनो के अन्दर समान भाव में पाया जाना है,उसी प्रकार से शुक्र का प्रभाव स्त्री और पुरुष दोनो के अन्दर समान भाव में पाया जाता है।शुक्र को आनन्द का ग्रह कहा जाता है,वैसे सभी ग्रह अपने अपने प्रकार का आनन्द प्रदान करते है,सूर्य राज्य का आनन्द प्रदान करवाता है,मंगल वीरता और पराक्रम का आनन्द प्रदान करवाता है,चन्द्र भावुकता का आनन्द देता है,बुध गाने बजाने का आनन्द देता है,गुरु ज्ञानी होने का आनन्द देता है,शनि समय पर कार्य को पूरा करने का आनन्द देता है। शुक्र आनन्द की अनुभूति जब देता है,जब किसी सुन्दरता के अन्दर प्रवेश हो,भौतिक रूप से या महसूस करने के रूप से,जैसे भौतिक रूप से किसी वस्तु या व्यक्ति को सुन्दरता के साथ देखा जाये,महसूस करने के रूप से जैसे किसी की कला का प्रभाव दिल और दिमाग पर हावी हो जावे।शुक्र आनन्द के साथ दर्द का कारक भी है,जब हम किसी प्रकार से सुन्दरता के अन्दर प्रवेश करते हैं तो आनन्द की अनुभूति होती है,और जब किसी भद्दी जगह या बुरे व्यक्ति से सम्पर्क करते है तो कष्ट भी होता है। स्त्री कारक ग्रह है। इसलिए इस घर (खाना नं 6) में शुक्र होने पर जो वैर - विरोध पैदा होता है वो अधिकतर स्त्रिओं की ओर से और स्त्रिओं के कारण होता है। उसके शत्रु भी स्त्री स्वभाव के होंगे। ये शत्रु उस व्यक्ति के साथ बहुत ईर्ष्या रखते है और उसके बारे में दूसरे लोगों के पास झूठी - सच्ची बातों से उसे बदनाम करने की कोशिश करते है और किसी हद तक अपनी कोशिशों में सफल भी होते है। इस घर का शुक्र मीठा मीठा बोलने वाले दुश्मन पैदा करता है। जो की ठीक ही प्रतीत होता है। इसका कारण यह है की छठा घर बुध का पक्का घर है और बुध एक स्त्री गृह होने के साथ चुस्ती और होशियारी का ग्रह भी हैं जिसकी जुबान में मिठास है। अतः शुक्र जैसे ग्रह का छठे घर में होना स्वाभाविक ही है कि वो ऐसे शत्रु पैदा करेगा, जिनकी बोली में शहद और बगल में छुपा हुआ खंजर जैसे ही किसी का छठे घर का शुक्र अपना बुरा फल देना शुरू करता हैं वैसे ही उसके दायें या बाएं हाथ का अंगूठा बिना किसी चोट के ही दर्द करने लगता है। ऐसी हालत में साधारण सा ये उपाय हैं कि फटे पुराने गंदे कपडे न पहने, साफ़ सुथरे कपडे पहने अगर हो सके तो दिन में दो बार कपडे बदले और इत्र परफ्यूम आदि का प्रयोग करे। यदि यहाँ का शुक्र पत्नी की सेहत के बारे में , औलाद के बारे में या व्यक्ति के अपने सम्मान के बारे में अशुभ फल दे रहा हो तो यह सबसे उपयुक्त उपाय होगा की उस व्यक्ति की पत्नी कभी भी नंगे पाँव जमीन पर न चले। कारण यह है की इस घर का शुक्र पाताल का शुक्र है। छठे घर को पाताल कहा गया है, इसलिए जमीन की तह के नीचे पड़ा हुआ है। लेकिन जब उसकी कारक स्त्री के नंगे पाँव जमीन को छु लेंगे तो पाताल में पड़ा हुआ प्रभाव ऊपर जमीन पर आ जाएगा। हो सके तो कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी को नंगे पाँव कभी न चलने दे।जातक का शुक्र कुंडली में अस्त होता है,तो तमाम प्रकार के वीर्य विकार पाये जाते है,पुरुष की कुन्डली में सूर्य के साथ शुक्र होने पर संतान बडी मुश्किल से पैदा होती है,और अधिकतर गर्भपात के कारण देखे जाते है,स्त्री की कुन्डली में शुक्र और मंगल की युति होने पर पति पत्नी हमेशा एक दूसरे से झगडते रहते है,और जीवन भर दूरियां ही बनी रहती है। अक्सर शुक्र अस्त वाला जातक पागलों जैसी हरकतें किया करता है,उसके दिमाग में बेकार के विकार पैदा हुआ करते है,वह बेफ़जूल के संकल्प मन में ग्रहण किया करता है,और उन संकल्पं के माध्यम से अपने आसपास के लोगों को परेशान किया करता है। शुक्र की धातु के लिये कोई भी धातु जिस पर कलाकारी और खूबशूरती का जामा पहिनाया गया हो मानी जाती है,अनाजों और सब्जियों तथा फ़लों में इसके स्वाद के साथ पकाने और प्रयोग करने की क्रिया को माना गया है। खैर वात करते हैं लाल किताब में अष्टम शुक्र की कालपुरुष की दूसरी राशि के स्वामी के मौत के घर में चला जाना अतः ऐसे इंसान के यहां क़र्ज़ की संभावना बनी रहती है। ऐसा इंसान का अपने पार्टनर से कभी भी अच्छा सम्बन्ध नहीं होता। इसको ऐसे कहा जा सकता हैं कि ऐसे शुक्र वाले का जायज सम्बन्ध तो सूली पे चढ़ जाता हैं उसे संतुष्टि नहीं मिलती लेकिन नाजायज सम्बन्ध ही उसको संतुष्टि देते हैं। ऐसे लोगों को काले रंग की गाय को 8 रविवार आटे का पेड़ा देना चाहिए। अगर हो सके तो आगे भी करते रहे। क्योंकि शुक्र गाय हैं , पर आठवें घर में अर्थात अँधेरे के घर में , यह गाय काले रंग की हो जाती हैं। आटे का पेड़ा सूर्य की वस्तु हैं और रविवार सूर्य का वार है। सो इस शुक्र के अँधेरे को, उसके दुश्मन ग्रह सूर्य से रोशन करना हैं।आठवें शुक्र को जली मिटटी की चांडाल औरत कहा गया है। आठवें शुक्र वाले की पत्नी सख्त स्वभाव की होती हैं। औरत की जुबान से निकला हर शब्द पत्थर की लकीर होगा।अगर किसी के लिए बुरा कहेगी तो तुरंत सच हो जाता हैं। लेकिन अछा कहने पे जरूरी नहीं। अगर ऐसा इंसान अपनी पत्नी को तंग करेगा तो शुक्र का फल दोनों के के लिऐ मंदा होगा। ऐसे इंसान की शादी यदि 25 वर्ष तक हो जाये तो तो बहुत अशुभ होगा। शुक्र 8 के समय यदि खाना नंबर २ खाली हो तो देखा जाता हैं की बुजर्गों का सर पे साया नहीं होता। चन्द्र - मंगल या बुध अच्छी हालत होने पे ही शुक्र का असर कम हो सकता हैं।जब सूर्य के साथ या सूर्य की दृष्टि में शनि आ जाएँ तब शुक्र से मिलने वाले सुखों में कमी होती है। जब सूर्य के साथ शुक्र एक ही घर में या किसी वर्ष फल में सूर्य की दृष्टि शुक्र के ऊपर पड़ रही हो तब भी शुक्र के सुखो में कमी हो जाती है। जब सूर्य शुक्र के पक्के घर 7 में बैठ जाएँ तब भी शुक्र के फलों में परेशानी होतीहै जब सूर्य घर 12 जोकि बिस्तर के सुखों का घर है बंहा पर सूर्य बैठ कर शुक्र के सुखो का नाश करते हैं। क्योंकि बिस्तर के सुख का कारण शुक्र हैं। साथ ही शुक्र को फूल भी बोला जाता है और सूर्य तो आग का विशाल गोला है तो आग के पास फूल जल जाता है और हाँ एक बात और कि सूर्य 12 बाले जातक का जीवन साथी बिस्तर पर प्यार कम और झगड़ा ज्यादा करता है। इस प्रकार से सूरय शुक्र को हानि पहुंचाते हैं।मित्रों अगर आपकी भी कोई समस्या है जहां आप अपनी कुंडली के बारे में कोई उपाय पूछना चाहते हैं जहां आप अपनी कुंडली बनवाना जा दिखाना चाहते हैं तो आप संपर्क करें हमारी सर्विस paid है अधिक जानकारी के लिए हमारे इन नंबरों पर संपर्क करें 09414481324 07597718725
शनिवार, 25 मार्च 2017
शुक्र ग्रह ग्रहों का असर जिस तरह प्रकृति पर दिखाई देता है ठीक उसी तरह मनुष्यों पर यह असर देखा जा सकता है। आपकी कुंडली में ग्रह स्थिति बेहतर होने से बेहतर फल प्राप्त होते हैं। वहीं ग्रह स्थिति अशुभ होने की दशा में अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं। बलवान ग्रह स्थिति स्वस्थ सुंदर आकर्षण की स्थितियों की जन्मदाता बनती हैं तो निर्बल ग्रह स्थिति शोक संताप विपत्ति की प्रतीक बनती हैं। लोगों के मध्य में आकर्षित होने की कला के मुख्य कारक शुक्र ग्रह हैं। कहा जाता है कि शुक्र जिसके जन्मांश लग्नेश केंद्र में त्रिकोणगत हों वह आकर्षक प्रेम सौंदर्य का प्रतीक बन जाता है। यह शुक्र जी क्या है और बनाने व बिगाड़ने में माहिर शुक्र देव का पृथ्वी लोक में कहां तक प्रभाव हैशुक्र मुख्यतः स्त्रीग्रह, कामेच्छा, वीर्य, प्रेम वासना, रूप सौंदर्य, आकर्षण, धन संपत्ति, व्यवसाय आदि सांसारिक सुखों के कारक है। गीत संगीत, ग्रहस्थ जीवन का सुख, आभूषण, नृत्य, श्वेत और रेशमी वस्त्र, सुगंधित और सौंदर्य सामग्री, चांदी, हीरा, शेयर, रति एवं संभोग सुख, इंद्रिय सुख, सिनेमा, मनोरंजन आदि से संबंधी विलासी कार्य, शैया सुख, काम कला, कामसुख, कामशक्ति, विवाह एवं प्रेमिका सुख, होटल मदिरा सेवन और भोग विलास के कारक ग्रह शुक्र जी माने जाते हैं।वैभव का कारक होने की वजह से शुक्र राजा की तरह बर्ताव करता है। जनरली इसका फेवरेट कलर पिंक, ब्लू आदि होते हैं जो अमूमन स्त्रियों के मनपसंद कलर माने जाते हैं। अगर हम वाहनादि की बात करें तो कुण्डली में शुक्र की मजबूती चौपाए वाहन का सुख उपलब्ध कराता है जबकि कमजोर शुक्र होने से जीवन में इनका अभाव बना रहता है।सांसारिक व भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए मनुष्य की कुण्डली का शुक्र मजबूत व शुभ प्रभाव युक्त होना ही चाहिए। इसके अलावा शुक्र की विविध भावों में मौजूदगी भी उसकी किस्मत को खास ढंग से प्रभावित करती है। सांसारिक सुखों से है। यह रास, रंग, भोग, ऐश्वर्य, आकर्षण तथा लगाव का कारक है। शुक्र दैत्यों के गुरु हैं और कार्य सिद्घि के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद के प्रयोग से भी नहीं चूकते। सौन्दर्य में शुक्र की सहायता के बिना सफलता असंभव है। य, रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करने का शौकीन होता है। आजकल फैशन से वशीभूत ऐसे वस्त्रों का प्रचलन स्त्री वर्ग में बढ़ रहा है जो शरीर को ढंकने में अपर्याप्त होते हैं। यह संभवत: शीत प्रधान शुक्र-चन्द्र के प्रभाव क्षेत्रों की देन है। महिला वर्ग का चर्म परिधान शुक्र-चन्द्र एवं मंगल की परतों से बना होता है अर्थात् कोमलता तेज, रक्तिमा एवं सौन्दर्य का सम्मिश्रण ही उसकी विशेष आकर्षण शक्ति होती है।शुक्र ग्रह से प्रभावित युवतियां ही प्रतियोगिता के अंतिम राउंड तक पहुंच पाती है। कुछ ग्रह ऐसे भी होते हैं जो कुछ दूर तक तो युवतियों का सहयोग करते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे प्रतिभागियों के ग्रह भारी पड़ते हैं, कमजोर ग्रह वाली युवतियां पिछड़ने लगती है। यह भी ज्ञात हुआ है कि प्रतियोगिताओं के निर्णायक भी शनि, मंगल, गुरु जैसे ग्रहों से प्रभावित होते हैं। सौन्दर्य शास्त्र का विधान पूरी तरह से ज्योतिषकर्म और चिकित्सकों के पेशे जैसा ही है। अगर किसी निर्णायक को सौन्दर्य ज्ञान नहीं हो तो वह निर्णय भी नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक शुक्र से प्रभावित तो होते हैं लेकिन उन पर गुरु-चंद्रमा का भी प्रभाव होता है जो उन्हें विवेकवान बनाता है। जन्म कुण्डली में तृतीय एवं एकादश भाव स्त्री का वक्षस्थल माना जाता है। गुरु-शुक्र इन भावों में बैठे हों या ये दोनों ग्रह इन्हें देख रहे हों, साथ में बली भी हों तो यह भाव सुन्दर, पुष्ट एवं आकर्षक होता है और आंतरिक सौन्दर्य परिधान सुशोभित करते हैं। पंचम एवं नवम भाव कटि प्रदेश से नीचे का होता है जो स्त्री को शनि गुरु प्रधान कृषता तथा स्थूलता सुशोभित करती है। अभिनय एवं संगीत में दक्षता प्रदान करने वाला ग्रह शुक्र ही है। शुक्र सौन्दर्य, प्रेम, कलात्मक अभिरुचि, नृत्य, संगीतकला एवं बुद्घि प्रदान करता है। शुक्र यदि बली होकर नवम, दशम, एकादश भाव अथवा लग्न से संबंध करें तो जातक सौन्दर्य के क्षेत्र में धन-मान और यश प्राप्त करता है। लग्न जातक का रूप, रंग, स्वभाव एवं व्यक्तित्व को दर्शाता है। चोथाभाव चन्द्रमा का जनता का प्रतिनिधित्व करता है। पंचम भाव बुद्घि, रुचि एवं मित्र बनाने की क्षमता को दर्शाता है। तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग देता है। मीन राशि के शुक्र कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है तृतीय भाव सृजनात्मक योग्यता का सूचक है। इसका बली होना एवं लग्न से संबंध सौन्दर्यता में निपुणता लाता है। कुशल अभिनय के लिए चंद्रमा एवं संवाद अदायगी के लिए बुध बली हो तथा शुभ स्थानों में चन्द्र-बुध का होना अभिनय, संगीत एवं नृत्य इत्यादि में सफलता दिलाता है। जन्म लग्न, चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न से दशम भाव पर शुक्र का प्रभाव सफलता का योग बनाता है।बुध एवं शुक्र का बली होकर शुभ स्थानों विशेषकर लग्न, पंचम दशम या एकादश भाव से संबंध सौन्दर्य क्षेत्र में सफलता देता है। चन्द्र कुण्डली में लग्नेश-धनेश की युति लाभ-स्थान में धन वृद्घि का संकेत देती है। साथ ही शुक्र व बुध का दशम व दशमेश से संबंध जातक को भाग्य बल प्रदान कर सफलता एवं प्रसिद्घि देता है।चन्द्र, शुक्र एवं बुध का संबंध चतुर्थभाव, चतुर्थेश धन भाव व धनेश, पंचम भाव व पंचमेश, नवमभाव व नवमेश से होने पर सफलता के योग देगा पंच महापुरुष योगों के अन्तर्गत शश योग (उच्च का शनि केन्द्र में) एवं मालव्य योग (उच्च व स्वराशि का केन्द्र में) एवं लग्नेश का स्वराशि व उच्च राशि का होना। कुण्डली में सभी शुभ ग्रह लग्न में एवं सभी पाप ग्रह अष्टम भाव में होने पर यह योग यश का भागीदार बनाता है कुण्डली में द्वितीय, नवम और एकादश के स्वामी ग्रह अपने-अपने स्थान पर होने से यह योग बनता है जो जातक को प्रसिद्धि के द्वार कुण्डली में सप्तमेश दशम स्थान में और दशमेश के साथ भाग्येश हो तो श्रीनाथ योग बनता है। कुछ विद्वानों के अनुसार दशमेश उच्च का होने पर ही यह योग बन जाता है, जो जातक को आकर्षक, सुखी और सम्माननीय बनाता है। आंतरिक परिधान के कारक शुक्र, चंद्र और केतु हैं तथा बाह्य परिधान के कारक सूर्य, राहु, बुध, गुरु व शनि हैं। अलग-अलग चन्द्र राशियों एवं सूर्य राशियों के अनुसार अपने प्रभाव दिखाते हैं। इस क्षेत्र में सफलता के लिए बुद्घि, चातुर्य, कला-कौशल के साथ कठोर परिश्रम जरूरी है। इसके लिए लग्न, चतुर्थ व पंचम भाव बली होना महžवपूर्ण है। सिंह राशि का शुक्र अभिनय कौशल देता है।तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग प्रदान करता है। मीन राशि का शुक्र व्यक्ति की कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है। किसी व्यक्ति की भौतिक समृद्धि एवं सुखों का भविष्य ज्ञान प्राप्त करन हो तो उसके लिए उस व्यक्ति की जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह की स्थिति एवं शक्ति (बल) का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। अगर जन्म कुंडली में शुक्र की स्थिति सशक्त एवं प्रभावशाली हो तो जातक को सब प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत यदि शुक्र निर्बल अथवा दुष्प्रभावित (अपकारी ग्रहों द्वारा पीड़ित) हो तो भौतिक अभावों का सामना करना पड़ता है। इस ग्रह को जीवन में प्राप्त होने वाले आनंद का प्रतीक माना गया है। प्रेम और सौंदर्य से आनंद की अनुभूति होती है और श्रेष्ठ आनंद की प्राप्ति स्त्री से होती है। अत: इसे स्त्रियों का प्रतिनिधि भी माना गया है और दाम्पत्य जीवन के लिए ज्योतिषी इस महत्वपूर्ण स्थिति का विशेष अध्ययन करते हैं। अगर शक्तिशाली शुक्र स्वराशि, उच्च राशि का मूल त्रिकोन) केंद्र में स्थित हो और किसी भी अशुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट न हो तो जन्म कुंडली के समस्त दुष्प्रभावों अनिष्ट) को दूर करने की सामर्थ्य रखता है। किसी कुंडली में जब शुक्र लग्न्र द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम, दशम और एकादश भाव में स्थित हो तो धन, सम्पत्ति और सुखों के लिए अत्यंत शुभ फलदायक है। सशक्त शुक्र अष्टम भाव में भी अच्छा फल प्रदान करता है। शुक्र अकेला अथवा शुभ ग्रहों के साथ शुभ योग बनाता है। चतुर्थ स्थान में शुक्र बलवान होता है। इसमें अन्य ग्रह अशुभ भी हों तो भी जीवन साधारणत: सुख कर होता है। स्त्री राशियों में शुक्र को बलवान माना गया है। यह पुरुषों के लिए ठीक है किंतु स्त्री की कुंडली में स्त्री राशि में यह अशुभ फल देता है ग्रह नक्षत्रों के प्रभाव से व्यक्ति समाज पशु पक्षी और प्रकृति तक प्रभावित होते हैं। ग्रहों का असर जिस तरह प्रकृति पर दिखाई देता है ठीक उसी तरह मनुष्यों पर सामान्यतः यह असर देखा जा सकता है। आपकी कुंडली में ग्रह स्थिति बेहतर होने से बेहतरफल प्राप्त होते हैं। वहीं ग्रह स्थिति अशुभ होने की दशा में अशुभफल भी प्राप्त होते हैं। बलवान ग्रह स्थिति स्वस्थ सुंदर आकर्षण की स्थितियों का जन्मदाता बनती है तो निर्बल ग्रह स्थिति शोक संताप विपत्ति की प्रतीक बनती है। लोगों के मध्य में आकर्षित होने की कला के मुख्य कारक शुक्र जी है। कहा जाता है कि शुक्र जिसके जन्मांश लग्नेश केंद्र में त्रिकोणगत हों वह आकर्षक प्रेम सौंदर्य का प्रतीक बन जाता है। यह शुक्र जी क्या है और बनाने व बिगाडने में माहिर शुक्र जी का पृथ्वी लोक में कहां तक प्रभाव है बृहद पराशर होरा शास्त्र में कहा गया कि शुक्र बलवान होने पर सुंदर शरीर, सुंदर मुख, अतिसुंदर नेत्रों वाला, पढने लिखने का शौकीन कफ वायु शुक्र का वैभवशाली स्वरूपः- यह ग्रह सुंदरता का प्रतीक, मध्यम शरीर, सुंदर विशाल नेत्रों वाला, जल तत्व प्रधान, दक्षिण पूर्व दिशा का स्वामी, श्वेत वर्ण, युवा किशोर अवस्था का प्रतीक है। चर प्रकृति, रजोगुणी, स्वाथी, विलासी भोगी, मधुरता वाले स्वभाव के साथ चालबाज, तेजस्वी स्वरूप, श्याम वर्ण केश और स्त्रीकारक ग्रह है। शुक्र ग्रह सप्तम भाव अर्थात दाम्पत्य सुख का कारक ग्रह माना गया है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शुक्र दैत्यों के गुरु हैं। ये सभी विद्याओं व कलाओं तथा संजीवनी विद्या के भी ज्ञाता हैं। यह ग्रह आकाश में सूर्योदय से ठीक पहले पूर्व दिशा में तथा सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में देखा जाता है। यह कामेच्छा का प्रतीक है तथा धातु रोगों में वीर्य का पोषक होकर स्त्री व पुरुष दोनों के जनानांगों पर प्रभावी रहता है।।शुक्र ग्रह से स्त्री, आभूषण, वाहन, व्यापार तथा सुख का विचार किया जाता है। शुक्र ग्रह अशुभ स्थिति में हो तो कफ, बात, पित्त विकार, उदर रोग, वीर्य रोग, धातु क्षय, मूत्र रोग, नेत्र रोग, आदि हो सकते हैं वेदिक ज्योतिष शास्त्र में शुक्र ग्रह बुध, शनि व राहु से मैत्री संबंध रखता है। सूर्य व चंद्रमा से इसका शत्रुवत संबंध है। मंगल, केतु व गुरु से सम संबंध है। यह मीन राशि में 27 अंश पर परमोच्च तथा कन्या राशि में 27 अंश पर परम नीच का होता है। तुला राशि में 1 अंश से 15 अंश तक अपनी मूल त्रिकोण राशि तथा तुला में 16 अंश से 30 अंश तक स्वराशि में स्थित होता है। इसका तुला राशि से सर्वोत्तम संबंध, वृष तथा मीन राशि से उत्तम संबंध, मिथुन, कर्क व धनु राशि से मध्यम संबंध, मेष, मकर, कुंभ से सामान्य व कन्या तथा वृश्चिक राशि से प्रतिकूल संबंध है। भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ नक्षत्र पर इसका आधिपत्य है। यह अपने स्थान से सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। शुक्र जातक को ललित कलाओं, पर्यटन और चिकित्सा विज्ञान से जोड़ता है। जब किसी जातक की कुंडली में शुक्र सर्वाधिक प्रभावकारी ग्रह के रूप में होता है तो शिक्षा के क्षेत्र में पदाधिकारी, कवि, लेखक, अभिनेता, गीतकार, संगीतकार, वाद्ययंत्रों का निर्माता, शृंगार का व्यवसायी बनाता है। जब यही शुक्र जन्म पत्रिका में सप्तम या 12 वें भाव में वृष राशि में स्थित रहता है तो यह प्रेम में आक्रामक बनाता है। ये दोनों भाव विलासिता के हैं।जब यही शुक्र लग्न में है और शुभ प्रभाव से युक्त है तो व्यक्ति को बहुत सुंदर व आकर्षक बनाता है। शुक्र ग्रह पत्नी का कारक ग्रह है। और जब यही शुक्र ग्रह सप्तम भाव में रहकर पाप प्रभाव में हो और सप्तमेश की स्थिति भी उत्तम न हो तो पत्नी को रुग्ण या आयु की हानि करता है। तीसरे भाव पर यदि शुक्र है और स्वगृही या मित्रगृही हो तो व्यक्ति को दीर्घायु बनाता है। यह भाव भाई का स्थान होने से और शुक्र स्त्रीकारक ग्रह होने से बहनों की संख्या में वृद्धि करता है। जब किसी कुंडली में शुक्र द्वितीय यानी धन व परिवार भाव में उत्तम स्थिति में बैठा है तो व्यापार से तथा स्त्री पक्ष अर्थात ससुराल से आर्थिक सहयोग मिलता है। यदि उत्तम स्थिति में नहीं होता है तो व्यापार में लाभ नहीं मिल पाताइस भौतिक संसार में हर चीज शुक्र से जनित है। हर प्रकार के भौतिक सुख देने वाला शुक्र ग्रह ही है अतः शुक्र ग्रह का कुंडली में बलिष्ट होना बहुत आवश्यक है। ग्रहों में शुक्र को विवाह व वाहन का कारक ग्रह कहा गया है (इसलिये वाहन दुर्घटना से बचने के लिये भी इसको शुभ करना चाहिए ऐसे उपाय किये जा सकते है। शुक्र ग्रह के उपाय करने से वैवाहिक सुख की प्राप्ति की संभावनाएं बनती है। वाहन से जुडे मामलों में भी यह उपाय लाभकारी रहते है।आगे शुक्र के वारे ओर वात करेगै पोस्ट काफी लम्वी हो गई है ।
गुरुवार, 23 मार्च 2017
मां काली ज्योतिष की आज की पोस्ट उन मित्रों के लिए है जो ज्योतिष सिख रहे हैं. ज्योतिष के अनुसार इंसानों को जन्म के समय और ग्रहों की स्थिति के अनुसार 12 राशियों में विभाजित किया गया है। हर राशि के व्यक्ति का स्वभाव और आदतें दूसरी राशि के लोगों से एकदम अलग होती हैं। किसी भी इंसान को समझने के लिए ज्योतिष सटीक विद्या है। राशि चक्र की यह पहली राशि है, इस राशि का चिन्ह ”मेढा’ या भेडा है, इस राशि का विस्तार चक्र राशि चक्र के प्रथम 30 अंश तक (कुल 30 अंश) है। राशि चक्र का यह प्रथम बिन्दु प्रतिवर्ष लगभग 50 सेकेण्ड की गति से पीछे खिसकता जाता है। इस बिन्दु की इस बक्र गति ने ज्योतिषीय गणना में दो प्रकार की पद्धतियों को जन्म दिया है। भारतीय ज्योतिषी इस बिन्दु को स्थिर मानकर अपनी गणना करते हैं। इसे निरयण पद्धति कहा जाता है। और पश्चिम के ज्योतिषी इसमे अयनांश जोडकर ’सायन’ पद्धति अपनाते हैं। किन्तु हमे भारतीय ज्योतिष के आधार पर गणना करनी चाहिये। क्योंकि गणना में यह पद्धति भास्कर के अनुसार सही मानी गई है। मेष राशि पूर्व दिशा की द्योतक है, तथा इसका स्वामी ’मंगल’ है। इसके तीन द्रेष्काणों (दस दस अंशों के तीन सम भागों) के स्वामी क्रमश: मंगल-मंगल, मंगल-सूर्य, और मंगल-गुरु हैं। मेष राशि के अन्तर्गत अश्विनी नक्षत्र के चारों चरण और कॄत्तिका का प्रथम चरण आते हैं। प्रत्येक चरण 3.20' अंश का है, जो नवांश के एक पद के बराबर का है। इन चरणों के स्वामी क्रमश: अश्विनी प्रथम चरण में केतु-मंगल, द्वितीय चरण में केतु-शुक्र, तॄतीय चरण में केतु-बुध, चतुर्थ चरण में केतु-चन्द्रमा, भरणी प्रथम चरण में शुक्र-सूर्य, द्वितीय चरण में शुक्र-बुध, तॄतीय चरण में शुक्र-शुक्र, और भरणी चतुर्थ चरण में शुक्र-मंगल, कॄत्तिका के प्रथम चरण में सूर्य-गुरु हैं।मेष राशि भचक्र की पहली राशि है और इस राशि मे एक से लेकर तीस अंश तक चन्द्रमा अपने अपने प्रकार सोच को प्रदान करता है। नाडी ज्योतिष मे यह तीस अंश एक सौ पचास सोच को देता है,और एक अंश की पांच सोच अपने आप ही पांच प्रकार के तत्वो के ऊपर निर्भर होकर चलती है। सवा दो दिन के अन्दर एक सौ पचास तरफ़ की सोच जब व्यक्ति के अन्दर एक राशि की पैदा हो जायेंगी तो एक महिने के अन्दर अपने आप चाढे चार हजार सोच बन जायेंगी,एक एक सोच का अगर निरूपण किया जाये तो एक व्यक्ति की सोच बताने मे ही साढे चार हजार लोगो को लगना पडेगा,तब जाकर जीवन की एक महिने की सोच को पैदा किया जा सकता है,वह भी सोच केवल समय काल परिस्थिति के अनुसार बनेगी जैसी जलवायु होगी उसी प्रकार की सोच बनेगी यह जरूरी नही है कि थार के रेगिस्तान की सोच आसाम के अधिक पानी वाले क्षेत्र मे जाकर एक ही हो जाये। या अमेरिका के व्यक्ति की सोच भारत के व्यक्ति की सोच से मेल खा जाये अथवा ब्रिटेन के व्यक्ति की मानसिकता भारत के व्यक्ति के मानसिकता से जुड कर ही चल पाये। चन्द्रमा जब मेष राशि मे प्रवेश करता है तो पहले अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करता है,नक्षत्र का पहला पाया होता है इस नक्षत्र का मालिक भी केतु होता है और पहले पाये का मालिक भी केतु होता है। राहु केतु वैसे चन्द्रमा की गति के अनुसार सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव देने वाले होते है चन्द्रमा की उत्तरी ध्रुव वाली सीमा को राहु के घेरे मे मानते है और दक्षिणी ध्रुव वाली सीमा को केतु के घेरे वाली सीमा को मानते है। इस प्रकार से जातक के अन्दर जो स्वभाव पैदा होगा वह मूल संज्ञक नक्षत्र के रूप मे होगा उसके अन्दर मंगल का प्रभाव राशि से होगा केतु का प्रभाव नक्षत्र से होगा और केतु का ही प्रभाव पद के अनुसार होगा। नकारात्मक भाव देने और केवल अपनी ही हांकने के कारण इस पद मे पैदा होने वाला जातक अधिक तरक्की नही कर पाता है मंगल के क्षेत्र मे आने से जातक के अन्दर एक प्रकार का पराक्रम जो लडाई झगडे से सम्बन्धित हो सकता है एक इंजीनियर के रूप मे हो सकता है एक भोजन पकाने वाले रसोइये के रूप मे हो सकता है एक भवन बनाने वाले कारीगर के रूप मे भी हो सकता है लेकिन वह अपने दिमाग का प्रयोग नही कर पायेगा,वह जो भी काम करेगा वह दूसरो की आज्ञा के अनुसार ही करेगा जैसे वह फ़ौज मे भर्ती होगा तो उसे अपने अफ़सर की आदेश की पालना करनी होगी वह अगर इंजीनियर होगा तो वह केवल बिजली आदि मे पहले से बनी रूप रेखा मे ही काम कर पायेगा यानी वह अपने दिमाग का प्रयोग केवल पहले से बने नियम के अन्दर ही करने का अधिकार होगा वह अपने मन से काम नही कर सकता है। केतु का रूप धागे के रूप मे है लेकिन गर्म मंगल के साथ सूत आदि का धागा जल जायेगा यहां पर केवल धातु जो मंगल की कारक होगी वह तांबा ही होगी और जातक तांबे के तार से मंगल बिजली की रूप मे प्रयोग करने का कारण जानता होगा वह धातु मे केतु जो पत्ती के रूप मे भी होगा और तार जो क्वाइल के रूप मे भी होगा से क्वाइल बनाकर मोटर भरने का काम भी कर सकता है और बिजली आदि की सहायता से मोटर को चलाने का काम भी कर सकता है इसी प्रकार से मंगल के साथ केतु के मिल जाने से तथा केतु के ही सहायक होने के कारण केतु यहां पर बिजली को बनाने वाला या ठीक करने वाला पेचकस भी माना जा सकता है किसी प्रकार से बुध की नजर अगर पड रही है तो बिजली आदि को चैक करने वाला मीटर भी काम मे लिया जा सकता है आदि बाते देख सकते है उसी प्रकार से जब जातक के पास रक्षा सेवा जैसे काम होगे तो वह एक जवान की हैसियत से काम करने वाला होगा उसे केतु यानी अपने पर एक सहायक होने और आदेश को पालन करने की क्रिया भी पता होगी वह मंगल केतु के रूप मे राइफ़ल को भी प्रयोग मे लायेगा और राहु रूपी बारूद से अपने द्वारा युद्ध के मैदान मे अपने पराक्रम को भी दिखा सकता है। इसी प्रकार से अगर जातक वावरची का काम करता है तो वह भोजन बनाने के हथियारो से सब्जी काटने आग पर पकाने आदि के काम भी केतु यानी तवा कलछुली आदि से काम करने का कारक बन सकता है अगर वह डाक्टर है तो वह इंजेकसन आदि से दवाइया देने तथा केवल हाथ देखकर पर्ची आदि काटने का काम कर सकता है या मशीनी जांच के द्वारा अपने अनुभव को मरीज के साथ भी बांट सकता है,लेकिन वह जो भी इलाज करेगा वह केवल केतु यानी शरीर के अवयवो के लिये ही करेगा यानी हाथ पैर उंगलिया दांत आंत आदि के लिये वह अपने प्रकार को ठीक करने के लिये तथा सिर के अन्दर के अवयव यानी कान आंख नाक मुंह के रोग ही ठीक करने के लिये अपने अनुभव को प्रदर्शित करेगा। इस राशि के चन्द्रमा की निगाह अपने से सप्तम भाव मे जाती है अगर चन्द्रमा को कोई खराब ग्रह नही देख रहा है या कोई क्रूर ग्रह चन्द्रमा को आहत नही कर रहा है तो जातक के अन्दर जो भी काम होगा वह व्यापारिक नीति से इसलिये होगा वह व्यापारिक नीति से इसलिये होगा क्योंकि चन्द्रमा के सप्तम मे तुला राशि है और चन्द्रमा की निगाह तुला राशि के आखिरी नक्षत्र विशाखा और और उसके पद जो शनि का है पर जाने के कारण अपनी स्थिति को एक प्रकार से ठंडे माहौल के अनुसार ही रख पायेगा उसे जो भी मिलता है उसी पर अपना समय निकालना और अपने अनुसार ही जो भी कार्य सम्बन्ध को निभाने और घर आदि बनाने तथा जीवन साथी के प्रति किये जाने वाले कामो के लिये भी अपना असर देगा। केतु के नक्षत्र अश्विनी के अन्दर चन्द्रमा मेष्र राशि मे जब एक अंश से कुछ अधिक समय तक केवल अपना असर मंगल और केतु का देता है लेकिन सवा अंश से आगे जाते ही केतु के अन्दर शुक्र का असर मिलना शुरु हो जाता है। चन्द्रमा जो सोच का कारक है जातक के अन्दर मंगल की हिम्मत मेष से मिलती है केतु से सहायता वाले काम करने का अवसर केतु के साथ होने मिलना होता है केतु मे शुक्र का असर आने से जातक को कलाकारी की तरफ़ ले जाने के लिये शुक्र अपना असर देने लगता है। इस असर के कारण जातक के अन्दर एक प्रकार से भौतिकता भी भर जाती है वह सहायता के रूप मे स्त्री रूप को भी धारण कर सकता है और कलाकारी को प्रदर्शित करने के लिये एक ब्रुस का रूप भी ले सकता है वह केनवास पर चित्रकारी भी कर सकता है हथोडे की सहायता से पत्थर पर मूर्ति को भी बना सकता है जमीन जहां फ़सले पैदा होती हो मंगल के रूप मे मशीनरी का प्रयोग केतु सहारे के रूप मे ले सकता है और खेती की जमीन से फ़सले भी पैदा कर सकता है कारण चन्दमा यहा शुक्र के साथ मिलकर मंगल और केतु का सहारा लेकर किसान के रूप मे भी अपनी छवि दिखा सकता है। यही केतु अगर एक्टिंग मे चला जाता है तो कलाकार के रूप मे पराक्रम दिखाने वाला कलाकार भी बन जाता है जब भी कोई कारण अपनी कला का दिखाने का मिलता है तो जातक हिम्मत वाले रोल अदा करने के लिये खूबशूरती से प्रस्तुत करने की योग्यता को भी प्रदर्शित कर सकता है,यही केतु के साथ मिला चन्द्रमा शुक्र की सहायता और मंगल के प्रयोग से भवन आदि की सजावट भी करने के लिये अपनी वास्तुकारी का कारण भी पैदा कर सकता है अगर कोई अच्छा ग्रह सहारा नही दे रहा हो तो स्ट्रीट लाइट ठीक करने का आदमी भी यही केतु बना सकता है और स्त्री है तो धागे के काम को करने वाला भी बना सकता है जो लाल कपडे पर काले धागे से शुक्र की सजावट वाली चित्रकारी करने के बाद अपनी कलाकारी को प्रदर्शित करने की योग्यता को बना ले। सवा तीन अंश के अन्दर मेष राशि मे चन्द्रमा के जाने के बाद राशि मेष में मंगल का असर अश्विनी नक्षत्र मे केतु का असर और इसी नक्षत्र के अन्दर सूर्य का असर मिल जाता है। कायदे से अगर ग्रहो का मिश्रण किया जाता है तो चन्द्रमा माता से मेष राशि सिर से मंगल गर्मी से या उत्तेजना से गुस्सा से केतु कान से सूर्य बनावट से भी देखा जा सकता है इसी जगह चन्द्रमा सोच से मेष शरीर से किये जाने वाले काम जैसे मेहनत करना अपने ही प्रयास से उद्देश्य की पूर्ति करना आदि मंगल से रक्षा सेवा के लिये तकनीकी सेवा के लिये अस्प्ताली सेवा के लिये भोजन पकाने और इसी प्रकार की सेवा के लिये निर्माण कार्य करने के लिये जमीन के अन्दर के काम करने के लिये केतु सहायक के रूप मे और सूर्य सरकारी रूप से भी माना जा सकता है। मेष राशि का चन्द्रमा माता को प्रभावशाली बनाता है मंगल का प्रभाव होने से भाई की यात्रा का कार्यक्रम भी बनता रहता है यानी भाई के पास यात्रा वाले काम होते है चन्द्रमा सोच से देखा जाये तो मंगल गुस्सा का भी कारक है इसलिये गुस्सा अधिक आता हो और विचार भी ठीक नही होते हो,यही बात शादी के बाद की स्त्री के लिये देखा जाये तो सास साहसी हो और वह अपनी सास से परेशान हो.इसी बात को भौतिक मे लेकर देखे तो चन्द्र पानी वाला स्थान हो मेष राशि जहां लोग अपना निवास करते हो मंगल वहां पर चलने वाले उद्योग धन्धे और बिजली आदि से चलने वाली मशीने हो केतु सूर्य से सरकारी अधिकारी के रूप में कार्य करने वाला हो यही बात यात्रा मे भी देखी जाती है और चन्द्रमा वाले जितने भी कारक होते है उनके लिये मानी जाती है।चन्द्रमा का मेष राशि मे साढे पांच अंश तक पहुंचने के बाद मंगल के साथ केतु और राहु दोनो का असर पैदा हो जाता है जातक के अन्दर के प्रकार का जुनून सवार रहता है वह जिस काम के लिये अपना मानस बना लेता है वह उसी काम की धुन मे लगा रहता है अक्सर जो लोग कालान्तर की दुश्मनी को मानने वाले होते है और अपने विरोधी को खूनी संघर्ष से समाप्त करने वाले होते है वे इसी काल मे पैदा होते है मंगल से रक्षा सेवा और केतु से बन्दूक तथा राहु से बारूदी काम लेने वाले होते है इस युति मे पैदा होने वाले जातक वाहन आदि के अच्छे सम्भालने वाले होते है वह किसी भी प्रकार के इंजन वाले काम को करने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर करते है। इस युति मे पैदा होने वाले जातक अगर होटल लाइन को अपना व्यवसाय बना लेते है तो उनके लिये यह कार्य बहुत ही उत्तम माना जाता है और उनकी धुन के आगे वह लगातार आजीवन आगे बढते रहते है लेकिन पुरुष है तो ससुराल परिवार और स्त्री है तो उसकी अधिक कामुकता उसे बरबाद करने के लिये मानी जाती है इसी प्रकार से जो लोग पूजा पाठ या धर्म आदि के कामो मे व्यस्त रहते है वह भी अपने को अधिक चालाकी और झूठे प्रयोग के कारण लोगो को ठगना पसंद करते है भावनाओ के साथ खिलवाड करना खाना पीना ऐश करना आदि काम होते है समुदाय के साथ मिलकर किसी भी काम को बलपूर्वक करना भी माना जाता है अक्सर मंगल राहु और केतु के साथ चन्द्रमा के मिलने से पुराने जमाने के रजवाडों के प्रति भी देखा जा सकता है जौहर आदि करना भी इसी युति का कारण माना जाता है अक्सर इस युति मे पैदा होने वाले जातक जब अधिक परेशान हो जाते है तो जहर खाकर आग लगाकर आत्म हत्या भी करते देखे गये है वैसे अधिकतर लोग वाहन आदि से दुर्घटना मे मारे जाते हुये देखे गये है,अस्पताली काम करने वाले लोग अक्सर जनता के हित की बात करते हुये भी देखे गये है किसी भी प्रकार की नयी औषिधि का आविष्कार करना और उस औषिधि को जन हित के लिये प्रसारित करना भी देखा गया है नये इंजन या बिजली के उपकरण का आविष्कार करना भी माना जाता है।चन्दमा के पोने आठ डिग्री पर पहुंचते ही मंगल केतु के साथ गुरु का असर जातक को मिल जाता है वह मंगल केतु के जिस भी कार्य मे जाता है तो भाग्य उसके साथ हो जाता है और वह आराम की जिन्दगी जीने के लिये भी माना जा सकता है किसी भी विषय मे महारत हासिल करना भी देखा जाता है अधिक से अधिक शिक्षा का प्राप्त करना अलावा डिग्री लेकर भी अपनी योग्यता को प्रदर्शित करना भी माना जाता है,जातक अपने परिवार समुदाय का मुखिया बनकर भी रहता है और जो भी कारण उसके पूर्वजो के जमाने के होते है उन्हे प्रयोग करना और उन्ही कारणोपर अपने समुदाय को इकट्ठा करना भी माना जाता है। इन अंशो पर गुरु का साथ जातक को मन इच्छित फ़ल प्रदान करने के लिये भी अपनी योग्यता को देता है अगर कोई खराब ग्रह आकर अपनी शक्ति से इन्हे बरबाद नही करता है तो पोने दस डिग्री पर पहुंचते ही चन्द्रमा मंगल केतु और शनि के घेरे मे पहुंच जाता है,चन्द्रमा मंगल की गर्मी और शनि की ठंडक के बीच मे फ़ंस कर उमस देने वाले माहौल जैसा बन जाता है जातक हर पल किसी न किसी बात के लिये कल्पता रहता है और वह अपने को शनि के साथ फ़्रीज करता रहता है तथा मंगल के साथ गर्म करता रहता है जातक को अगर नानवेज आदि प्रयोग करने का कारण बनता है तो जातक के अन्दर खून के थक्के जमने की बीमारी का होना भी माना जाता है नानवेज अगर प्रयोग नही करता है तो जातक अधिक मिर्च मशाले और जमीनी कंद वाली सब्जियां भी प्रयोग मे अधिक करता है। जातक के कामो के अन्दर अक्सर वही काम देखे जा सकते है जो लोगो की सेवा करने वाले काम नाई आदि के काम चमडा को काटने छीलने के काम अक्सर इस युति के जातक को सिर की बीमारियां भी बहुत होती है। पोने ग्यारह डिग्री पर चन्द्रमा के पहुंचने के बाद जातक के अन्दर कमन्यूकेशन वाले कामो का करना व्यक्तिगत सम्पर्क बनाने के बाद किये जाने वाले कामो को करना समुदाय का बनाना लोगो के अन्दर प्रचार प्रसार को करना दिमागी इलाज को करना पुलिस और रक्षा सेवा के कार्यो मे वकालत जैसे काम करना फ़ौजी कानूनो को बनाना और पालन करवाना आदि बाते देखी जाती है जातक के बोल चाल की भाषा मे कर्कश भाव मिलने लगते है वह बात करने के समय आदेशात्मक बात करना जानता है और लोगो को अपने अनुसार चलने के लिये बाध्य करना भी जानता है,नक्सा देखना जमीन की बातो को कागज पर उकेरना आदि भी बाते देखी जा सकती है. इसी प्रकार से अन्य अंश के लिये चन्द्रमा की गणना की जाती है्जिस प्रकार से जीवन मे लगन प्रभावी होती है उसी प्रकार से चन्द्र राशि भी जीवन मे प्रभावी होती है। चन्द्रमा एक तो मन का कारक है दूसरे जब तक मन नही है तब कुछ भी नही है,दूसरे चन्द्रमा माता का भी कारक है और माता के रक्त के अनुसार जातक का जीवन जब शुरु होता है तो माता का प्रभाव जातक के अन्दर जरूर मिलता है,हमारे भारत वर्ष मे जातक का नाम चन्द्र राशि से रखा जाता है यानी जिस भाव का चन्द्रमा होता है जिस राशि मे चन्द्रमा होता है उसी भाव और राशि के प्रभाव से जातक का नाम रखा जाता है इस प्रकार से जातक के जीवन मे माता का सर्वोच्च स्थान दिया जाता है,विदेशों आदि मे माता के नाम को जातक के नाम के पीछे जोडा जाता है लेकिन भारत मे माता के ऊपर ही पूर्ण जीवन टिकाकर रखा जाता है। मैने पहले भी कहा है कि चन्द्रमा मन का कारक है और जब मन सही है तो जीवन अपने आप सही होने लगता है जो सोच सोचने के बाद कार्य मे लायी जायेगी वह सोच अगर उच्च कोटि की है तो जरूर ही कार्य जो भी होगा वह उच्च कोटि का ही होगा,सूर्य देखता है चन्द्र सोचता है और शनि करता है बाकी के ग्रह हमेशा सहायता देने के लिये माने जाते है
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