आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
रविवार, 21 मई 2017
राज योग राजयोग भी एक ऐसा पक्ष है जहाँ स्वयं ज्योतिष वर्ग भी विभाजित है। कारण एक ही है “मैं नहीं मानता”। तो हम भी कहाँ मना रहे हैं। केवल अपनी बात कहेंगे। वास्तविकता में परख करें।राजयोग के सही मायने क्या हैं! राजयोग है राजा के समान लाभ करने वाला योग – अगर भौतिक जीवन में देखें तो। अब यहां दो बातें और हैं – पहली कि योग फलेगा कितना और दूसरी कि फलीभूत कब होगाजहाँ तक सवाल है फलने का – तो स्पष्ट उत्तर है संबंधित दशाओं में। अगर संबंधित दशा नहीं आई तो योग धरा का धरा रह जाएगाएक उदाहरण से समझना सरल होगा – एक मजदूर का अपना एक कमरा बना लेना राजयोग है, आम आय के व्यक्ति का अपना सुख-सुविधाओं से लैस मकान बना लेना भी रजयोग है। पर एक धनाड्य का बंगला खरीद लेना भी एक साधारण बात हो सकती है। केवल फल ही नहीं संदर्भ समझना भी आवश्यक है। आखिरकार हमारा यह जन्म है तो पूर्वजन्मों के कर्मों की नींव पर ही बना हुआ। राज योग दो शब्दों से मिलकर बना है राज और योग. ज्योतिष की दृष्टि में राजयोग का अर्थ है ऐसा योग है जो राजा के समान सुख प्रदान करे. हम सभी जीवन में सुख की कामना करते हैं परंतु सभी के भाग्य में सुख नहीं लिखा होता है. कुण्डली में ग्रहों एवं योगों की स्थिति पर सुख दुख निर्भर होता है. राज योग भी इन्हीं योगों में से है जो जीवन को सुखी बनाता है. राजयोग कोई विशिष्ट योग नहीं है यह कुण्डली में बनने वाले कई योगों का प्रतिफल है. कुण्डली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है तो उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है. इस ग्रह के आंकलन के लिए लग्न के अनुसार ग्रहों की शुभता, अशुभता, कारक, अकारक, विशेष योगकारक ग्रहो को देखना होता है साथ ही ग्रहों की नैसर्गिक शुभता/अशुभता का ध्यान रखना होता है. राज योग के लिए केन्द्र स्थान में उच्च ग्रहों की उपस्थिति, भाग्य स्थान पर उच्च का शुक्र, नवमेश एवं दशमेश का सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण होता है. कुण्डली में अगर कोई ग्रह अपनी नीच राशि में मौजूद है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह फलदायी नहीं होगा क्योंकि जहां नीच राशि में ग्रह की स्थिति होगी वहीं से सप्तम उस ग्रह की दृष्टि अपने स्थान पर रहेगी. गौर करने के बात यह है कि इसका क्या फल होगा यह अन्य ग्रहों से सम्बन्ध पर निर्भर करेगा. कुण्डली में राजयोग किसी ग्रह विशेष से नहीं बनता है बल्कि इसमें सभी ग्रहों की भूमिका होती है. कई बार जब आप ज्योतिषी को कुंडली दिखाने जाते हैं तब “राजयोग“ शब्द उनके मुँह से सुनाई देता है. कुंडली की भाषा तो ज्योतिषी ही सही से समझ सकता है लेकिन इस शब्द से राजा जैसा योग तो समझ में आता ही है. प्राचीन मुनियों ने अनगिनत योगों की व्याख्या जन्म कुंडली में की है. उनमें से ही एक योग राजयोग है – राज + योग. राज देने वाला योग. इस योग के बनने में ग्रहों की युति शामिल होती है. जन्म कुंडली में केन्द्र स्थान को विष्णु स्थान कहा गया है और त्रिकोण भावों को लक्ष्मी स्थान कहा गया है. जब केन्द्र व त्रिकोण स्वामियों का कुंडली में परस्पर संबंध बनता है तब यह राजयोग बनता है. यदि जन्म कुंडली में कोई ग्रह एक साथ त्रिकोण व केन्द्र का स्वामी है तब उसे योगकारी ग्रह कहा जाता है जो व्यक्ति को अपनी दशा/अन्तर्दशा में अच्छे फल प्रदान करता है यदि वह शुभ स्थिति में हो तो. आगे जारी
गुरुवार, 18 मई 2017
ज्योतिष: अद्वैत का विज्ञान_1 जोतिष शायद सबसे पुराना विषय है और एक अर्थ में सबसे ज्यादा तिरस्कृत विषय भी है। सबसे पुराना इसलिए कि मनुष्य-जाति के इतिहास की जितनी खोजबीन हो सकी है उसमें ज्योतिष, ऐसा कोई भी समय नहीं था, जब मौजूद न रहा हो। जीसस से पच्चीस हजार वर्ष पूर्व सुमेर में मिले हुए हड्डी के अवशेषों पर ज्योतिष के चिह्न अंकित हैं। पश्चिम में पुरानी से पुरानी जो खोजबीन हुई है, वह जीसस से पच्चीस हजार वर्ष पूर्व इन हड्डियों की है, जिन पर ज्योतिष के चिह्न और चंद्र की यात्रा के चिह्न अंकित हैं। लेकिन भारत में तो बात और भी पुरानी है। ऋग्वेद में, पंचानबे हजार वर्ष पूर्व ग्रह-नक्षत्रों की जैसी स्थिति थी, उसका उल्लेख है। इसी आधार पर लोकमान्य तिलक ने यह तय किया था कि ज्योतिष नब्बे हजार वर्ष से ज्यादा पुराने तो निश्चित ही होने चाहिए। क्योंकि वेद में यदि पंचानबे हजार वर्ष पहले जैसी नक्षत्रों की स्थिति थी उसका उल्लेख है, तो वह उल्लेख इतना पुराना तो होगा ही। क्योंकि उस समय जो स्थिति थी नक्षत्रों की उसे बाद में जानने का कोई भी उपाय नहीं था। अब हमारे पास ऐसे वैज्ञानिक साधन उपलब्ध हो सके हैं कि हम जान सकें अतीत में कि नक्षत्रों की स्थिति कब कैसी रही होगी। ज्योतिष की सर्वाधिक गहरी मान्यताएं भारत में पैदा हुईं। सच तो यह है कि ज्योतिष के कारण ही गणित का जन्म हुआ। ज्योतिष की गणना के लिए ही सबसे पहले गणित का जन्म हुआ। और इसीलिए अंकगणित के जो अंक हैं वे भारतीय हैं, सारी दुनिया की भाषाओं में। एक से लेकर नौ तक जो गणना के अंक हैं, वे समस्त भाषाओं में जगत की, भारतीय हैं। और सारी दुनिया में नौ डिजिट, नौ अंक स्वीकृत हो गए, उसका भी कुल कारण इतना है कि वे नौ अंक भारत में पैदा हुए और धीरे-धीरे सारे जगत में फैल गए। जिसे आप अंग्रेजी में नाइन कहते हैं वह संस्कृत के नौ का ही रूपांतरण है। जिसे आप एट कहते हैं वह संस्कृत के अष्ट का ही रूपांतरण है। एक से लेकर नौ तक जगत की समस्त सभ्य भाषाओं में गणित के जो अंकों का प्रचलन है वह भारतीय ज्योतिष के प्रभाव में हुआ। भारत से ज्योतिष की पहली किरणें सुमेर की सभ्यता में पहुंचीं। सुमेरियंस ने सबसे पहले, ईसा से छह हजार वर्ष पूर्व, पश्चिम के जगत के लिए ज्योतिष का द्वार खोला। सुमेरियंस ने सबसे पहले नक्षत्रों के वैज्ञानिक अध्ययन की आधारशिलाएं रखीं। उन्होंने बड़े ऊंचे, सात सौ फीट ऊंचे मीनार बनाए। और उन मीनारों पर सुमेरियन पुरोहित चौबीस घंटे आकाश का अध्ययन करते थे--दो कारणों से। एक तो सुमेरियंस को इस गहरे सूत्र का पता चल गया था कि मनुष्य के जगत में जो भी घटित होता है, उस घटना का प्रारंभिक स्रोत नक्षत्रों से किसी न किसी भांति संबंधित है। जीसस से छह हजार वर्ष पहले सुमेरियंस की यह धारणा कि पृथ्वी पर जो भी बीमारी पैदा होती है, जो भी महामारी पैदा होती है, वह सब नक्षत्रों से संबंधित है। अब तो इसके लिए वैज्ञानिक आधार मिल गए हैं। और जो लोग आज के विज्ञान को समझते हैं वे कहते हैं सुमेरियंस ने मनुष्य-जाति का असली इतिहास प्रारंभ किया। इतिहासज्ञ कहते हैं कि सब तरह का इतिहास सुमेर से शुरू होता है। उन्नीस सौ बीस में चीजेवस्की नाम के एक रूसी वैज्ञानिक ने इस बात की खोजबीन की कि जब भी सूरज पर--सूरज पर हर ग्यारह वर्षों में पीरियाडिकली बहुत बड़ा विस्फोट होता है। सूर्य पर हर ग्यारह वर्ष में आणविक विस्फोट होता है। और चीजेवस्की ने यह खोजबीन की कि जब भी सूरज पर ग्यारह वर्षों में आणविक विस्फोट होता है तभी पृथ्वी पर युद्ध और क्रांतियों के सूत्रपात होते हैं। और उसने कोई सात सौ वर्ष के लंबे इतिहास में सूर्य पर जब भी दुर्घटना घटती है, तभी पृथ्वी पर दुर्घटना घटती है, इसका इतना वैज्ञानिक विश्लेषण किया कि स्टैलिन ने उसे उन्नीस सौ बीस में उठा कर जेल में डाल दिया। वह स्टैलिन के मरने के बाद ही चीजेवस्की छूट सका। क्योंकि स्टैलिन के लिए तो अजीब बात हो गई! माक्र्स का और कम्युनिस्टों का खयाल है कि पृथ्वी पर जो क्रांतियां होती हैं उनका कारण मनुष्य के बीच आर्थिक वैभिन्य है। और चीजेवस्की कहता है कि क्रांतियों का कारण सूरज पर हुए विस्फोट हैं। अब सूरज पर हुए विस्फोट और मनुष्य के जीवन की गरीबी और अमीरी का क्या संबंध? अगर चीजेवस्की ठीक कहता है तो माक्र्स की सारी की सारी व्याख्या मिट्टी में चली जाती है। तब क्रांतियों का कारण वर्गीय नहीं रह जाता, तब क्रांतियों का कारण ज्योतिषीय हो जाता है। चीजेवस्की को गलत तो सिद्ध नहीं किया जा सका, क्योंकि सात सौ साल की जो गणना उसने दी थी वह इतनी वैज्ञानिक थी और सूरज में हुए विस्फोटों के साथ इतना गहरा संबंध उसने पृथ्वी पर घटने वाली घटनाओं का स्थापित किया था कि उसे गलत सिद्ध करना तो कठिन था। लेकिन उसे साइबेरिया में डाल देना आसान था। स्टैलिन के मर जाने के बाद ही चीजेवस्की को ख्रुश्चेव साइबेरिया से मुक्त कर पाया। इस आदमी के जीवन के कीमती पचास साल साइबेरिया में नष्ट हुए। छूटने के बाद भी वह चार-छह महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह सका। लेकिन छह महीने में भी वह अपनी स्थापना के लिए और नये प्रमाण इकट्ठे कर गया है। पृथ्वी पर जितनी महामारियां फैलती हैं, उन सबका संबंध भी वह सूरज से जोड़ गया है। सूरज, जैसा हम साधारणतः सोचते हैं, ऐसा कोई निष्क्रिय अग्नि का गोला नहीं है, अत्यंत सक्रिय है। और प्रतिपल सूरज की तरंगों में रूपांतरण होते रहते हैं। और सूरज की तरंगों का जरा सा रूपांतरण भी पृथ्वी के प्राणों को कंपित करता है। इस पृथ्वी पर कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता जो सूरज पर घटित हुए बिना घटित हो जाता हो। जब सूर्य का ग्रहण होता है तो पक्षी जंगलों में गीत गाना चौबीस घंटे पहले से बंद कर देते हैं। पूरे ग्रहण के समय तो सारी पृथ्वी मौन हो जाती है, पक्षी गीत गाना बंद कर देते हैं, सारे जंगलों के जानवर भयभीत हो जाते हैं, किसी बड़ी आशंका से पीड़ित हो जाते हैं। बंदर वृक्षों को छोड़ कर नीचे आ जाते हैं। भीड़ लगा कर किसी सुरक्षा का उपाय करने लगते हैं। और एक आश्चर्य कि बंदर, जो निरंतर बातचीत और शोरगुल में लगे रहते हैं, सूर्यग्रहण के वक्त बंदर इतने मौन हो जाते हैं जितने साधु और संन्यासी भी नहीं होते! चीजेवस्की ने ये सारी की सारी बातें स्थापित की हैं। सुमेर में सबसे पहले यह खयाल पैदा हुआ। उसके बाद स्विस पैरासेलीसस नाम का एक चिकित्सक, उसने एक बहुत अनूठी मान्यता स्थापित की। और वह मान्यता आज नहीं कल सारे मेडिकल साइंस को बदलने वाली सिद्ध होगी। अब तक उस मान्यता पर बहुत जोर नहीं दिया जा सका, क्योंकि ज्योतिष तिरस्कृत विषय है--सर्वाधिक पुराना, लेकिन सर्वाधिक तिरस्कृत, यद्यपि सर्वाधिक मान्य भी। अभी फ्रांस में पिछले वर्ष गणना की गई तो सैंतालीस प्रतिशत लोग ज्योतिष में विश्वास करते हैं कि वह विज्ञान है--फ्रांस में! अमरीका में मौजूद पांच हजार बड़े ज्योतिषी दिन-रात काम में लगे रहते हैं और उनके पास इतने कस्टमर्स हैं कि वे काम निपटा नहीं पाते। करोड़ों डालर अमरीका प्रतिवर्ष ज्योतिषियों को चुकाता है। अंदाज है कि सारी पृथ्वी पर कोई अठहत्तर प्रतिशत लोग ज्योतिष में विश्वास करते हैं। लेकिन वे अठहत्तर प्रतिशत लोग सामान्य हैं। वैज्ञानिक, विचारक, बुद्धिवादी ज्योतिष की बात सुन कर ही चौंक जाते हैं। सी जी जुंग ने कहा है कि तीन सौ वर्षों से विश्वविद्यालयों के द्वार ज्योतिष के लिए बंद हैं, यद्यपि आने वाले तीस वर्षों में ज्योतिष तुम्हारे दरवाजों को तोड़ कर विश्वविद्यालयों में पुनः प्रवेश पाकर रहेगा। पाकर रहेगा प्रवेश इसलिए कि ज्योतिष के संबंध में जो-जो दावे किए गए थे उनको अब तक सिद्ध करने का उपाय नहीं था, लेकिन अब उनको सिद्ध करने का उपाय है।
रविवार, 14 मई 2017
केमद्रुम योग [केमद्रुम योग ज्योतिष में चंद्रमा से निर्मित एक महत्वपूर्ण योग है. वृहज्जातक में वाराहमिहिर के अनुसार यह योग उस समय होता है जब चंद्रमा के आगे या पीछे वाले भावों में ग्रह न हो अर्थात चंद्रमा से दूसरे और चंद्रमा से द्वादश भाव में कोई भी ग्रह नहीं हो. यह योग इतना अनिष्टकारी नहीं होता जितना कि वर्तमान समय के ज्योतिषियों ने इसे बना दिया है. व्यक्ति को इससे भयभीत नहीं होना चाहिए क्योंकि यह योग व्यक्ति को सदैव बुरे प्रभाव नहीं देता अपितु वह व्यक्ति को जीवन में संघर्ष से जूझने की क्षमता एवं ताकत देता है, जिसे अपनाकर जातक अपना भाग्य निर्माण कर पाने में सक्षम हो सकता है और अपनी बाधाओं से उबर कर आने वाले समय का अभिनंदन कर सकता है. [चन्द्र को मन का कारक कहा गया है. सामान्यत: यह देखने में आता है कि मन जब अकेला हो तो वह इधर-उधर की बातें अधिक सोचता है और ऎसे में सोच सकारात्मक होनी चाहिए अच्छे कार्य में ध्यान लगाए ऐसे जातक अपने बलबूते पर कामयाब होते हैं किसी के अघीन रहना उनके लिए अच्छा नहीं रहता ऐसे जातक देखी है कि यह सृजनातमक होते हैं कलाकार होते हैं कलात्मक होतैे हैं कुछ बुराइयां से बच कर रहे जैसे जुआ सटा शराब आदिकेमद्रुम योग के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह योग संघर्ष और अभाव ग्रस्त जीवन देता है. इसीलिए ज्योतिष के अनेक विद्वान इसे दुर्भाग्य का सूचक कहते हें. परंतु लेकिन यह अवधारणा पूर्णतः सत्य नहीं है. केमद्रुम योग से युक्त कुंडली के जातक कार्यक्षेत्र में सफलता के साथ-साथ यश और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं. वस्तुतः अधिकांश विद्वान इसके नकारात्मक पक्ष पर ही अधिक प्रकाश डालते हैं. यदि इसके सकारात्मक पक्ष का विस्तार पूर्वक विवेचन करें तो हम पाएंगे कि कुछ विशेष योगों की उपस्थिति से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में परिवर्तित हो जाता है. इसलिए किसी जातक की कुंडली देखते समय केमद्रुम योग की उपस्थिति होने पर उसको भंग करने वाले योगों पर ध्यान देना आवश्यक है तत्पश्चात ही फलकथन करना चाहिएव्यवहार में ऐसा पाया गया है कि कुंडली में गजकेसरी, पंचमहापुरुष जैसे शुभ योगों की अनुपस्थिति होने पर भी केमद्रुम योग से युक्त कुंडली के जातक कार्यक्षेत्र में सफलता के साथ-साथ यश और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं। ऐसे में क्या कहा जाये। क्या शास्त्रों में लिखी बातों को असत्य या निर्मूल कहकर केमद्रुम योग की परिभाषा पर प्रश्न चिह्न लगा दिया जाये। वस्तुतः सत्यता यह है कि केमद्रुम योग के बारे में बताने वाले अधिकांश विद्वान इसके नकारात्मक पक्ष पर ही अधिक प्रकाश डालते हैं। जो पूर्णतः असैद्धांतिक एवं अवैज्ञानिक है। यदि हम इसके सकारात्मक पक्ष का गंभीरतापूर्वक विवेचन करें तो हम पाएंगे कि कुछ विशेष योगों की उपस्थिति से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में परिवर्तित हो जाता है। शास्त्रों में ऐसे योगों का उल्लेख भी मिलता है जिनके प्रभाव से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में बदल जाता है। केमद्रुम योग को भंग करने वाले प्रमुख योग निम्नलिखित हैं।जब कुण्डली में लग्न से केन्द्र में चन्द्रमा या कोई ग्रह हो तो केमद्रुम योग भंग माना जाता है. योग भंग होने पर केमद्रुम योग के अशुभ फल भी समाप्त होते है. कुण्डली में बन रही कुछ अन्य स्थितियां भी इस योग को भंग करती है, जैसे चंद्रमा सभी ग्रहों से दृष्ट हो या चंद्रमा शुभ स्थान में हो या चंद्रमा शुभ ग्रहों से युक्त हो या पूर्ण चंद्रमा लग्न में हो या चंद्रमा दसवें भाव में उच्च का हो या केन्द्र में चंद्रमा पूर्ण बली हो अथवा कुण्डली में सुनफा, अनफा या दुरुधरा योग बन रहा हो, तो केमद्रुम योग भंग हो जाता है. यदि चन्द्रमा से केन्द्र में कोई ग्रह हो तब भी यह अशुभ योग भंग हो जाता है और व्यक्ति इस योग के प्रभावों से मुक्त हो जाता है. कुछ अन्य शास्त्रों के अनुसार- यदि चन्द्रमा के आगे-पीछे केन्द्र और नवांश में भी इसी प्रकार की ग्रह स्थिति बन रही हो तब भी यह योग भंग माना जाता है. केमद्रुम योग होने पर भी जब चन्द्रमा शुभ ग्रह की राशि में हो तो योग भंग हो जाता है. शुभ ग्रहों में बुध्, गुरु और शुक्र माने गये है. ऎसे में व्यक्ति संतान और धन से युक्त बनता है तथा उसे जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है. इसके इलावा गुरु और चंद्र की दृष्टि एक ही भाव पर पढ़ रही हो या त्रिकोण में सभी ग्रहो का होना जहां केंद्र में सभी ग्रह हो तब भी यह योग भंग हो जाता है केमद्रुम योग जिसे एक अशुभ योग माना जाता है, यदि किसी प्रकार भंग हो जाता है तो यह पूर्ण रूप से राजयोग में बदल जाता है। इसलिए किसी जातक की कुंडली देखते समय केमद्रुम योग की उपस्थिति होने पर उसको भंग करने वाले उपर्युक्त योगों पर निश्चय ही ध्यान देना चाहिए। उसके बाद ही फलकथन करना चाहिए। केमद्रुम योग को भंग कर राजयोग में परिवर्तित करने वाले उपर्युक्त योगों की सत्यता की पुष्टि महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, जुल्फिकार अली भुट्टो, भैरों सिंह शेखावत, बिल गेट्स, देवानंद, राजकपूर, ऋषि कपूर, शत्रुध्न सिन्हा, अमीषा पटेल, अजय देवगन, राहुल गांधी, शंकर दयाल शर्मा, ईजमाम उल हक, जवागल श्री नाथ, पीचिदंबरम, मेनका गांधी, वसुंधरा राजे, अर्जुन सिंह तथा अनुपम खेर आदि सुप्रसिद्ध जातकों की कुंडलियों में स्वतः कर सकते हैं। ज्योतिषी एच. एन. काटवे जन्म दिनांक : 6 फरवरी 1892 जन्म समय : 4 : 20 बजे जन्म स्थान : बेलगाव इस योग को लेकर भयभीत नहीं होना चाहिए कुंडली को गहराई से देखना चाहिए तब जाकर किसी वात का निर्णय करना चाहिए यहां कुछ तथाकथित ज्योतिषयो न ेईस योग को लेकर बहुत भ्रांतियां और गलतफहमियां पैदा ्की है। कुछ ज्योतिषी अपनी लालच के कारण लोगों को गुमराह करते हैं। पहले तो कुंडली फ्री में देखने लोकसेवा कहकर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते ह।ैं और बाद में उन को डराकर पूजा पाठ के नाम पर यत्र मंत्र तंत्र के नाम पर लूटने का काम करते हैं पर हम लोगों मे भी यह कमी है कि वो भी सब कुछ मुफ्त में चाहते हैं अतः हमें भी इससे बचना चाहिए मित्रों अगर आप मुझसे अपनी कुंडली बनवाना जा दिखाना चाहते हैं तो निमनलिखित नंबरों पर संपर्क कर सकतेहै 07597718725/09414481324
शनिवार, 13 मई 2017
नीच ग्रहों का डरमित्रों आप सब ने सुना होगा कुंडली दिखवाते समय ज्योतिषी महाराज बोलते है अपनी कुंडली में फला फला ग्रह नीच का है या उच्च का है, नीच ग्रह से मतलब है की उस ग्रह में ताकत कम है।मतलब ग्रह कमजोर है.दरअसल नीच के ग्रह को लेकर अधिक्तर ज्योतिष अक्सर लोगों को बहुत ही भयमित कर देते हैं। यह सच भी है कि नीचस्थ ग्रह जातक को अक्सर परेशानी में डाल देता है। लेकिन कई छुटभैये ज्योतिषों को यह पता नहीं होता कि कई बार कुंडली में स्वयं ग्रहों की स्थिति के कारण नीच भंग योग बनता है। ऐसे योग के कारण ग्रह की नीचता स्वयं ही समाप्त हो जाती है। और कभी-कभी तो यह नीचता भंग होकर राजयोग की तरह प्रभाव देता है। लेकिन पूजा, पाठ, अनुष्ठान या उपाय के नाम पर पैसा ऐंठने वाले लोग नीचस्थ ग्रह का सिर्फ भय दिखाते हैं। एक सच तो यह भी है कि ज्योतिष के नाम पर धंधा करने वाले कइयों को खुद पता नहीं होता कि कुंडली में नीच भंग करने वाले योग भी बनता है। या बन सकता है। ऐसे में नाहक ही सलाह लेने गये लोगों को डरना पड़ता है और कभी-कभी उपाय के नाम पर अनावश्यक खर्च करना पड़ता है।ग्रह कब नीच की स्थिति में होता है और कैसे उसकी नीचता भंग होती है। सूर्य तुला राशि में, चंद्रमा वृश्चिक राशि में, मंगल कर्क राशि गुरु मकर राशि, बुध मीन राश में, शुक्र कन्या राशि में नीचस्थ माना गया है। इसके साथ राहु मीन राशि, धनु राशि और वृश्चिक राशि में तथा ठीक इसके विपरित राशियों कन्या, मिथुन और वृष राशि में केतु की उपस्थिति को नीच माना गया है। कुंडली में आखिर ऐसी क्या स्थिति बनती है कि ग्रहों की नीचता भंग होकर वह शुभ फल देने लगता है। खास बात ये है कि अगर ग्रहों का नीचत्व भंग होता है तो वह ग्रह निर्बल हो जाता है और जिस राशि में वह अवस्थित होता है उस राशि स्वामी को दो गुणा बल भी मिलता है जिससे वह अपने भावों के फल में वृद्धि भी करता है।किसी ग्रह की नीचता तब बड़ी आसानी से भंग हो जाती है जब कुंडली में उस नीच राशि का स्वामी लग्न या चंद्रमा से केंद्र में अवस्थित हो। दूसरी स्थिति में नीचत्व तब भंग होता है जब नीच राशि का स्वामी और उसी के उच्च राशि स्वामी परस्पर एक-दूसरे से केन्द्र में हों। यह भी माना गया है कि नीच ग्रह अगर लग्न और चंद्र से केन्द्र में अवस्थित हो तो भी ग्रहों का नीचत्व भंग हो जाता है। अष्टमेश ग्रह को नीचत्व का दोष स्वयं भंग हो जाता है। और नीच ग्रह को उसके उच्च राशि स्वामी अगर पूर्ण दृष्टि देख रहा है।इन स्थितियों में ग्रहों की नीचता स्वयं भंग हो जाती है। इसलिए ग्रहों की नीच राशि में बैठे रहने से घबराना या हड़बड़ाना नहीं चाहिए बल्कि बारिकी से कुंडली में यह देखने की जरूरत होती है कि कहीं नीच भंग योग है कि नहीं है। दूसरी बात लोगों के मन में उच्च तथा नीच राशियों में स्थित ग्रहों को लेकर एक प्रबल धारणा बनी हुई है कि अपनी उच्च राशि में स्थित ग्रह सदा शुभ फल देता है तथा अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह सदा नीच फल देता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह को तुला राशि में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा इसीलिए तुला राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि कह कर संबोधित किया जाता है और अधिकतर ज्योतिषियों का यह मानना है कि तुला राशि में स्थित शनि कुंडली धारक के लिए सदा शुभ फलदायी होता है।किंतु यह धारणा एक भ्रांति से अधिक कुछ नहीं है तथा इसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है और इसी भ्रांति में विश्वास करके बहुत से ज्योतिष प्रेमी जीवन भर नुकसान उठाते रहते हैं क्योंकि उनकी कुंडली में तुला राशि में स्थित शनि वास्तव में अशुभ फलदायी होता है तथा वे इसे शुभ फलदायी मानकर अपने जीवन में आ रही समस्याओं का कारण दूसरे ग्रहों में खोजते रहते हैं तथा अपनी कुंडली में स्थित अशुभ फलदायी शनि के अशुभ फलों में कमी लाने का कोई प्रयास तक नहीं करतेप्रत्येक ग्रह को किसी एक राशि विशेष में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जिसे इस ग्रह की उच्च की राशि कहा जाता है। इसी तरह अपनी उच्च की राशि से ठीक सातवीं राशि में स्थित होने पर प्रत्येक ग्रह के बल में कमी आ जाती है तथा इस राशि को इस ग्रह की नीच की राशि कहा जाता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह की उच्च की राशि तुला है तथा इस राशि से ठीक सातवीं राशि अर्थात मेष राशि शनि ग्रह की नीच की राशि है तथा मेष में स्थित होने से शनि ग्रह का बल क्षीण हो जाता है। इसी प्रकार हर एक ग्रह की 12 राशियों में से एक उच्च की राशि तथा एक नीच की राशि होती है।किंतु यहां पर यह समझ लेना अति आवश्यक है कि किसी भी ग्रह के अपनी उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का संबंध केवल उसके बलवान या बलहीन होने से होता है न कि उसके शुभ या अशुभ होने से। तुला में स्थित शनि भी कुंडली धारक को बहुत से अशुभ फल दे सकता है जबकि मेष राशि में स्थित नीच राशि का शनि भी कुंडली धारक को बहुत से लाभ दे सकता है। इसलिए ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों को यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए कि उच्च या नीच राशि में स्थित होने का प्रभाव केवल ग्रह के बल पर पड़ता है न कि उसके स्वभाव पर।शनि नवग्रहों में सबसे धीमी गति से भ्रमण करते हैं तथा एक राशि में लगभग अढ़ाई वर्ष तक रहते हैं अर्थात शनि अपनी उच्च की राशि तुला तथा नीच की राशि मेष में भी अढ़ाई वर्ष तक लगातार स्थित रहते हैं। यदि ग्रहों के अपनी उच्च या नीच राशियों में स्थित होने से शुभ या अशुभ होने की प्रचलित धारणा को सत्य मान लिया जाए तो इसका अर्थ यह निकलता है कि शनि के तुला में स्थित रहने के अढ़ाई वर्ष के समय काल में जन्में प्रत्येक व्यक्ति के लिए शनि शुभ फलदायी होंगे क्योंकि इन वर्षों में जन्में सभी लोगों की जन्म कुंडली में शनि अपनी उच्च की राशि तुला में ही स्थित होंगे। यह विचार व्यवहारिकता की कसौटी पर बिलकुल भी नहीं टिकता क्योंकि देश तथा काल के हिसाब से हर ग्रह अपना स्वभाव थोड़े-थोड़े समय के पश्चात ही बदलता रहता है तथा किसी भी ग्रह का स्वभाव कुछ घंटों के लिए भी एक जैसा नहीं रहता, फिर अढ़ाई वर्ष तो बहुत लंबा समय है।इसलिए ग्रहों के अपनी उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का मतलब केवल उनके बलवान या बलहीन होने से समझना चाहिए न कि उनके शुभ या अशुभ होने से। मैने अपने ज्योतिष अभ्यास के कार्यकाल में ऐसी बहुत सी कुंडलियां देखी हैं जिनमें अपनी उच्च की राशि में स्थित कोई ग्रह बहुत अशुभ फल दे रहा होता है क्योंकि अपनी उच्च की राशि में स्थित होने से ग्रह बहुत बलवान हो जाता है, इसलिए उसके अशुभ होने की स्थिति में वह अपने बलवान होने के कारण सामान्य से बहुत अधिक हानि करता है। इसी तरह मेरे अनुभव में ऐसीं भी बहुत सी कुंडलियां आयीं हैं जिनमें कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में स्थित होने पर भी स्वभाव से शुभ फल दे रहा होता है किन्तु बलहीन होने के कारण इन शुभ फलों में कुछ न कुछ कमी रह जाती है। ऐसे लोगों को अपनी कुंडली में नीच राशि में स्थित किन्तु शुभ फलदायी ग्रहों के रत्न धारण करने से बहुत लाभ होता है क्योंकि ऐसे ग्रहों के रत्न धारण करने से इन ग्रहों को अतिरिक्त बल मिलता है तथा यह ग्रह बलवान होकर अपने शुभ फलों में वृद्धि करने में सक्षम हो जाते हैं। मित्रों अब आप यह देखें आपकी कुंडली में कौन सा ग्रह कारक है शुभ है जो भाव से संबंधित है लेकिन वह अस्त है या नीच है या बलहीन है पर कारक है या योग कारक है तो रतन घारन करें फिर भी किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली दिखाकर यह निश्चित करें आज इतना ही आचार्य राजेश 07597718725
गुरुवार, 11 मई 2017
ज्योतिष से वैदिक काल से ज्योतिष का प्रचलन रहा है समय की पहिचान बिना ज्योतिष के ज्ञान के नही हो सकती है।आज का विज्ञान प्राचीन ज्योतिष का लघु शिष्य है और आयुर्वेद ज्योतिष का चचेरा भाई। ज्योतिष एक रितंभरा प्रज्ञा है। ज्योतिष का इतिहास मानव सभ्यता का इतिहास है जिसका आधार पूर्णतः गणितीय एवं वैज्ञानिक है। हमारे मनिषियों ने इस “पराविज्ञान” के प्रत्येक पक्ष का गहनतम अध्ययन किया है। ज्योतिष शास्त्र एक गुढ़ वैज्ञानिक चिंतन है। यह ग्रह-नक्षत्रों का चिंतन मात्र नहीं, बल्कि भविष्य को टटोलकर अपने अनुकूल बनाने की चेस्टा है। वस्तुतः ज्योतिष भविष्य की तलाश है।इसी प्रकार से आसमानी गह भी ज्योतिष से ही कालान्तर के लगातार ज्ञान को प्राप्त करने के कारण ही पहिचाने जाते है। जब तक ज्योतिष का ज्ञान नही था तब तक पृथ्वी स्थिर थी और सूर्य चन्द्रमा और तारे चला करते थे। जैसे ही ज्योतिष का ज्ञान होने लगा तो पता लगा कि सूर्य तो अपनी ही कक्षा मे स्थापित है बाकी के ग्रह चल रहे है। लेकिन ऋषियों और मनीषियों को बहुत पहले से ज्योतिष का ज्ञान था उन्हे प्रत्येक ग्रह के बारे मे जानकारी थी,यहां तक कि मंगल ग्रह के बारे मे भी उनका ज्ञान प्रचुर मात्रा मे था और उन्होने मंगल ग्रह की पूरी गाथा पहले ही लिख दी थी। पुराने जमाने से सुनता आया हूँ- "लाल देह लाली लसे और धरि लाल लंगूर,बज्र देह दानव दलन जय जय कपि शूर",इस दोहे को लिखा तो तुलसीदास जी है लेकिन उन्हे इस बारे मे कैसे पता लगा कि मंगल का रंग लाल है और जब मंगल को खुली आंख से देखा जाये तो लाल रंग का ही दिखाई देता है सूखा ग्रह है इसलिये बज्र की तरह से कठोर है,साथ ही ध्वजा पर लाल रंग का होना मंगल का उपस्थिति का कारण भी बनाता है,मंगल के देवता हनुमान जी के विषय मे उन्होने लिखा था। इस बात का सटीक पता तब और चला जब अमेरिका के नासा स्पेस से वाइकिंग नामका उपग्रह यान मंगल पर भेजा गया और उसने जब सन दो हजार में मंगल के ऊपर की कुछ तस्वीरे भेजी तो उसके अन्दर एक फ़ेस आफ़ मार्स के नाम से भी तस्वीर आयी। यह तस्वीर बिलकुल हनुमान जी की तस्वीर की तरह थी,इस तस्वीर को उन्होने सन दो हजार दो तक नही प्रसारित की,इसका भी कारण था,वे अपने को बहुत ही उन्नत और वैज्ञानिक भाषा मे दक्ष मानते थे और जब भी उनका कोई टूरिस्ट भारत आता था और भारत मे जब हनुमानजी के मंदिर को देखता तो वह मजाक करता था और "मंकी टेम्पिल" कह के चला जाता था। इस फ़ेस आफ़ मार्स ने अमेरिका के वैज्ञानिक धारणा को चौपट कर दिया और उन्हे यह पता लग गया कि भारत मे तो आदि काल से ही मंगल को हनुमान जी के रूप मे माना जा रहा है। विज्ञान जहाँ समाप्त हो जाता है वहाँ से ज्योतिष विज्ञान शुरु होता है ! जिस प्रकार से विज्ञान के अन्दर जो भी धारणा पैदा की जाती है उसके अनुसार रसायन शास्त्र भौतिक शास्त्र चिकित्सा शास्त्र आदि बनाये गये है। लेकिन जितनेी तत्व विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरते है उनके अन्दर केवल चार तत्व की मीमांसा ही की जा सकती है। बाकी का एक तत्व जो गुरु के रूप मे है वह विज्ञान न तो कभी प्रकट कर पाया है और न ही कभी अपनी धारणा से प्रकट कर सकता है। शरीर विज्ञान को ही ले लीजिये,सिर से लेकर पैर तक सभी अंगो का विश्लेषण कर सकता है,हड्डी से लेकर मांस मज्जा खून वसा धडकन की नाप आदि सभी को प्रकट कर सकता है कृत्रिम अंग बनाकर एक बार शरीर के अंग को संचालित कर सकता है। फ़ाइवर ब्लड को बनाकर कुछ समय के लिये खून की मात्रा को बढा सकता है लेकिन जो सबसे मुख्य बात है वह है प्राण वायु यानी गुरु की वह पैदा नही कर सकता है जब प्राण वायु को शरीर से जाना होता है तो वह चली जाती है और शरीर मृत होकर पडा रह जाता है उसके बाद शरीर वैज्ञानिक केवल पोस्ट्मार्टम रिपोर्ट को ही पेश कर सकता है कि ह्रदय रुक गया मस्तिष्क ने काम करना बन्द कर दिया अमुक चीज की कमी रह गयी और अमुक कारण नही बन पाया। नही समझ पाये आज तक कि गुरु क्या है लेकिन ज्योतिष शास्त्र मे सर्वप्रथम गुरु का विवेचन समझना पडता है गुरु जिस स्थान से शुरु होता है अपने अन्तिम समय तक केवल काल की अवधि तक ही सीमित रहता है उसे कोई पकड नही पाया अपने अनुसार पैदा नही कर पाया और न ही विज्ञान के अन्दर इतनी दम है कि वह भौतिक रूप से गुरु को प्रदर्शित कर सके। जिस दिन यह गुरु भौतिकता मे समझ मे आने लगेगा उस दिन विज्ञान की परिभाषा पराविज्ञान के रूप मे जानी जायेगी।
सोमवार, 8 मई 2017
किसी भी काम में सफलता पाने के लिए सही ज्ञान होना आवश्यक है। अज्ञान या अधूरा ज्ञान हमेशा परेशानियों का कारण बनता है। अत: व्यक्ति को सदैव ज्ञान अर्जित करने के प्रयास करते रहना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा जानकारी होगी तो हमारा दिमाग अच्छे-बुरे समय में सही निर्णय ले सकेगा। सही और गलत में से सही को चुनना तो सरल है, लेकिन दो सही बातों में से ज्यादा सही कौन सी बात है, ये जानने के लिए ज्ञान होना बहुत जरूरी है।
शुक्रवार, 5 मई 2017
मां काली ज्योतिष की आज की पोस्ट ज्योतिष तो अपने आप में पूर्णतः सही गणना है, परन्तु भविष्य वक्ता की गणना सही है या गलत यह इस बात पर निर्भर करता है कि जो व्यक्ति गणना कर रहा है, उसके पास ज्योतिष का कितना ज्ञान है, जिस प्रकार एक प्रशिक्षित डॉक्टर या वैद्य किसी बीमारी को डाइग्नोस करने में पहले उसके लक्षण व स्वभाव को समझता है फिर उसका इलाज करता है । हालांकि यह और बात है कि आज के मशीनी युग में हम मशीनी परीक्षण पर निर्भर हैं, लेकिन दोनों ही स्थितियों में डॉक्टर व वैद्य का ज्ञान और परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही मरीज़ को सही इलाज मिलना सम्भव है । थोड़ी सी लापरवाही या अल्पज्ञान मरीज़ के लिये घातक सिद्ध हो सकता है ठीक उसी प्रकार ज्योतिष में ग्रहों के स्वभाव, भाव और राशि तथा आपसी ग्रहों के संबंधों के आधार पर भविष्य कथन होता है जो पूर्णतः सही होता है । परन्तु यदि ज्योतिष शास्त्री अगर ग्रहों की स्थिति व भावगत स्वभाव को समझने में थोड़ी सी भी भूल कर देते हैं तो उनका कथन गलत हो जाता है । ज्योतिष शास्त्र जीवन का आईना दिखाने के साथ - साथ जीवन का मार्गदर्शन भी करता है । व्यक्ति का जीवन किस दिशा में निर्धारित है और उसे को किस दिशा में प्रयास करना चाहिए । जैसे कि ज्योतिष में पहले से निर्धारित है कि अमुक समस्या का समय अमुक तारीख से अमुक तारीख तक रहेगा, उसके लिए व्यक्ति मानसिक तौर पर तैयार हो जाता है और उस समय धैर्य नहीं खोता है । अगर समस्या का समय पता न हो तो व्यक्ति धैर्य खो देता है । अतः समस्या का कारण पता होने से सकारात्मक दिशा में सुधार हेतु प्रयास भी काफी हद तक व्यक्ति को समस्याओं से निजात दिलाने में सार्थक होते हैं । जहाँ तक नौकरी की बात है तो बच्चे के जन्म के समय से ही पता लग जाता है कि वह नौकरी करेगा या व्यवसाय तो उस दिशा में उसके स्वभाव के अनुरूप दिशा देना उसके कैरियर में काफी महत्वपूर्ण साबित होता है । ठीक उसी प्रकार से बीमारी की जहां तक बात है तो ज्योतिष द्वारा यह आंकलन होता है कि कौन सी बीमारी कब और शरीर के किस हिस्से में होगी उसके अनुरूप ज्योतिष द्वारा कौन से उपाय करने चाहिए यह तय करना आसान हो जाता है । जैसे की अगर किसी को पाचन की समस्या हो रही है तो कुण्डली में यह पता चल जाता है कि उसे यह समस्या मंदाग्नि या जठराग्नि के कारण है । मंदाग्नि, जठराग्नि पित्तज प्रवृति के ग्रहों की प्रबलता या निर्बलता पर निर्भर करते हैं । ऐसी स्थिति में उन ग्रहों को सन्तुलित करने का उपाय स्वास्थ्य के लिए कारगर साबित हो सकता है ।इसमें कहीं कोई दो राय नहीं कि मनुष्य का भाग्य और पुरूषार्थ दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। परन्तु यह भी सच है कि भाग्य से मनुष्य जो पाता है उसे कायम रखने के लिए उसे प्रयास करने होते हैं लेकिन जो भाग्य में नहीं है उसे कर्मयोगी व्यक्ति पुरूषार्थ से हासिल कर लेते हैं। जीवन के अनेक पहलुओं को प्रभावित करने वाला ज्योतिष शास्त्र हमारी समस्याओं के हल तो अवश्य देता है परन्तु ज्योतिष विद्या भी कर्म पर बल देती है । इसलिए यदि हम स्वयं पर भरोसा रखेंगे तो भ्रम और भ्रान्तियों के मकड़जाल में भी कम फसेंगे ।किसी भी व्यक्ति की कुण्डली का अध्ययन भी ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर ही किया जाता है । आज बदलते दौर के साथ हम जितना आधुनिक होते जा रहे हैं उतना ही ज़्यादा हम भविष्य को जानने के लिऐ भी आतुर रहने लगे हैं । शायद यही वजह है कि आज ज्योतिष विद्या को अनेक भ्रान्तियों ने आ घेरा है जिस कारण समाज में अन्धविश्वास भी बढ़ने लग है अब सवाल यह है कि सही ज्योतिषी और गलत ज्योतिषी मैं फर्क कैसे जाने क्या जो ज्योतिषी अपनी फीस लेकर आपको कुंडली देखकर पसंद करते हैं वह गलत है या फ्री अभी देखकर बताते हैं पूजा पाठ के नाम से आपक डरा् कर आपसे पैसे लेते्हैं। मुफ्त में कोई कुछ नहीं देता मित्रों अतः ऐसे लोगो से दूर रहे उसके बाद दूसरे ज्योतिषियों में से आप चुनाव करें,आचार्य राजेश
मां काली ज्योतिष की आज की पोस्ट ज्योतिष तो अपने आप में पूर्णतः सही गणना है, परन्तु भविष्य वक्ता की गणना सही है या गलत यह इस बात पर निर्भर करता है कि जो व्यक्ति गणना कर रहा है, उसके पास ज्योतिष का कितना ज्ञान है, जिस प्रकार एक प्रशिक्षित डॉक्टर या वैद्य किसी बीमारी को डाइग्नोस करने में पहले उसके लक्षण व स्वभाव को समझता है फिर उसका इलाज करता है । हालांकि यह और बात है कि आज के मशीनी युग में हम मशीनी परीक्षण पर निर्भर हैं, लेकिन दोनों ही स्थितियों में डॉक्टर व वैद्य का ज्ञान और परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही मरीज़ को सही इलाज मिलना सम्भव है । थोड़ी सी लापरवाही या अल्पज्ञान मरीज़ के लिये घातक सिद्ध हो सकता है ठीक उसी प्रकार ज्योतिष में ग्रहों के स्वभाव, भाव और राशि तथा आपसी ग्रहों के संबंधों के आधार पर भविष्य कथन होता है जो पूर्णतः सही होता है । परन्तु यदि ज्योतिष शास्त्री अगर ग्रहों की स्थिति व भावगत स्वभाव को समझने में थोड़ी सी भी भूल कर देते हैं तो उनका कथन गलत हो जाता है । ज्योतिष शास्त्र जीवन का आईना दिखाने के साथ - साथ जीवन का मार्गदर्शन भी करता है । व्यक्ति का जीवन किस दिशा में निर्धारित है और उसे को किस दिशा में प्रयास करना चाहिए । जैसे कि ज्योतिष में पहले से निर्धारित है कि अमुक समस्या का समय अमुक तारीख से अमुक तारीख तक रहेगा, उसके लिए व्यक्ति मानसिक तौर पर तैयार हो जाता है और उस समय धैर्य नहीं खोता है । अगर समस्या का समय पता न हो तो व्यक्ति धैर्य खो देता है । अतः समस्या का कारण पता होने से सकारात्मक दिशा में सुधार हेतु प्रयास भी काफी हद तक व्यक्ति को समस्याओं से निजात दिलाने में सार्थक होते हैं । जहाँ तक नौकरी की बात है तो बच्चे के जन्म के समय से ही पता लग जाता है कि वह नौकरी करेगा या व्यवसाय तो उस दिशा में उसके स्वभाव के अनुरूप दिशा देना उसके कैरियर में काफी महत्वपूर्ण साबित होता है । ठीक उसी प्रकार से बीमारी की जहां तक बात है तो ज्योतिष द्वारा यह आंकलन होता है कि कौन सी बीमारी कब और शरीर के किस हिस्से में होगी उसके अनुरूप ज्योतिष द्वारा कौन से उपाय करने चाहिए यह तय करना आसान हो जाता है । जैसे की अगर किसी को पाचन की समस्या हो रही है तो कुण्डली में यह पता चल जाता है कि उसे यह समस्या मंदाग्नि या जठराग्नि के कारण है । मंदाग्नि, जठराग्नि पित्तज प्रवृति के ग्रहों की प्रबलता या निर्बलता पर निर्भर करते हैं । ऐसी स्थिति में उन ग्रहों को सन्तुलित करने का उपाय स्वास्थ्य के लिए कारगर साबित हो सकता है ।इसमें कहीं कोई दो राय नहीं कि मनुष्य का भाग्य और पुरूषार्थ दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। परन्तु यह भी सच है कि भाग्य से मनुष्य जो पाता है उसे कायम रखने के लिए उसे प्रयास करने होते हैं लेकिन जो भाग्य में नहीं है उसे कर्मयोगी व्यक्ति पुरूषार्थ से हासिल कर लेते हैं। जीवन के अनेक पहलुओं को प्रभावित करने वाला ज्योतिष शास्त्र हमारी समस्याओं के हल तो अवश्य देता है परन्तु ज्योतिष विद्या भी कर्म पर बल देती है । इसलिए यदि हम स्वयं पर भरोसा रखेंगे तो भ्रम और भ्रान्तियों के मकड़जाल में भी कम फसेंगे ।किसी भी व्यक्ति की कुण्डली का अध्ययन भी ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर ही किया जाता है । आज बदलते दौर के साथ हम जितना आधुनिक होते जा रहे हैं उतना ही ज़्यादा हम भविष्य को जानने के लिऐ भी आतुर रहने लगे हैं । शायद यही वजह है कि आज ज्योतिष विद्या को अनेक भ्रान्तियों ने आ घेरा है जिस कारण समाज में अन्धविश्वास भी बढ़ने लग है अब सवाल यह है कि सही ज्योतिषी और गलत ज्योतिषी मैं फर्क कैसे जाने क्या जो ज्योतिषी अपनी फीस लेकर आपको कुंडली देखकर पसंद करते हैं वह गलत है या फ्री अभी देखकर बताते हैं पूजा पाठ के नाम से आपको ब्रोकर आपसे पैसे लेते्हैं। मुफ्त में कोई कुछ नहीं देता मित्रों अतः ऐसे लोगो से दूर रहे उसके बाद दूसरे ज्योतिषियों में से आप चुनाव करें,आचार्य राजेश
गुरुवार, 4 मई 2017
बुधवार, 3 मई 2017
रिश्ते और ग्रह नक्षत्तर मित्तरो ग्रह नक्षत्रों व रिश्तों का एक अनोखा व अटूट सम्बन्ध होता है. आपके पारिवारिक रिश्ते ग्रह व नक्षत्रों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं. नक्षत्र यानि आकाश के तारों का समूह व ग्रह यानि आकाश में स्थापित अन्य पिंड. ग्रह व नक्षत्र हमारे आपसी रिश्ते / नातों पर प्रभाव डालते हैं. ये बिल्कुल सत्य है. लाल किताब के अनुसार हमारी जिंदगी से जुड़ने वाला हर रिश्ता किसी ना किसी ग्रह का सूचक है. हमारी कुंडली में जो ग्रह जहाँ स्थित है, वो रिश्ता वहीँ से हमारी ज़िन्दगी में भी आता हैयदि किसी ग्रह की दशा खराब चल रही है तो उस से जुड़े रिश्ते पर ध्यान देने से लाभ प्राप्त होगा. कुंडली का प्रत्येक भाव किसी ना किसी रिश्ते अथवा रिश्तेदार से प्रभावित होता है और इसीलिए कुंडली में यदि कोई ग्रह कमजोर है तो उस से जुड़े रिश्ते को मजबूत बनाने की कोशिश करें व अपने आपसी संबंधों में सुधार व बदलाव लायें.. जिंदगी की आपाधापी में रिश्ते कहीं खो गए हैं शायद इसीलिए अब लोग दुखी है सो तरा के उपाय हम कर रहे हैं लेकिन अपने रिश्तो को नहीं सुधारतेमाता-पिता, भाई-बहिन,पति पत्नी, मित्र पड़ोसी सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के अजितने भी रिश्ते नाते है। सब मिलते है। क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है।जन्म पत्रिका के बाहर भावों में ग्रह और सामाजिक रिश्ते अलग-अलग भाव से होते है।व्यक्ति की कुंडली में ग्रहों ग्रह स्वामी ,ग्रहों के आपसी संबंध, ग्रहों की दृष्टि, आदि का प्रभाव व्यक्ति के संबंधों पर पड़ता है। जो की परिवारजनों के संबंधों को अनुकूल बनाता है। रिश्ते की बुनियाद प्यार और विश्वास हर टिकी होती है। इसलिए अाजकल के समय में जितना रिश्तों को बनाना अासान है उतना ही बनाएं रखना मुश्किल हो गया है। इसके लिए आपको हर रिश्ते की अच्छे से देखभाल करने के लिए अपने रिश्ते को ज्यादा समय देकर और समझदारी से बना कर रखना चाहिए ताकि अापका रिश्ता कमजोर न हों। ऐसे में अगर आपके रिश्ते में कोई गलतफहमी हो या फिर दूरिया हो तो अापके अापकी प्यार से इन्हें दूर करेबदलते जमाने के साथ हर किसी की सोच बदल गई है, तो एेसे ही हर परिवार में बदलती सोच के साथ परिवार भी बिखर गए हैं। पुराने समय में सभी एक साथ एक परिवार बन कर रहते थें पर अब अलग-अलग रहने लगे हैं। एेसे में हर किसी के लिए उन रिश्तों की अहमियत बढ़ जाती है जो खून के न हों, जैसे दोस्ती, व्यापारिक या आसपड़ोस के रिश्ते। एेसे रिश्ते हमारी जरूरतों की वजह से बनते हैं। एेसे में हमें खून के रिश्तों को भी समय देकर और समझदारी से निभाना चाहिएइसलिए दोस्तों अगर आपके ग्रह छप्पर ठीक नहीं चलोगे तो सबसे पहले आपसे बंधुओं को सुधारें उसके बाद ही ज्योतिष उपाय काम करेंगे जब तक आपके अपने आप से दूर है यानी माता-पिता भाई-बहन पड़ोसीं।इनसे आप अपने रिश्ते की करें और इन से मधुर संबंध बनाएंग्रह और संबंध :ग्रह अनुकूल होने पर ग्रहों के अनुसार संबंध ठीक रहते हैं। अपने रिस्तो पर नजर डाले । देखें आपका कौन सा सम्बन्धी आपसे संतुस्ट नही है ,उससे सम्बंधित ग्रह आपका ख़राब होगा। जैसे आपकी माँ आपसे रूठी है तो चन्द्रमाँ आपका अच्छा फल नही कर रहा है। इसी प्रकार पिता से आपके सम्बन्धं अगर ठीक नही है तो सूर्य अच्छा फल नही दे रहा है । पत्नी से अनबन चल रही होतो समझले आप का शुक्र ग्रह ख़राब फल कर रहा है । बहने अगर आपसे खफा हैं तो बुध आप से खफा है। भाई आपके साथ नहीं है तो मंगल आपके साथ नही है । आपके गुरुजन आपसे रुष्ट है तो गुरु ग्रह आपसे रुष्ट है । और जब शनि की टेड़ी नजर आप पर है तो आपके नौकर चाकर आप का नुकसान करते रहेंगे । रहू अपनी सैतानी आपके दुष्ट मित्रो के रूप में दिखा सकता है । केतु आपके पालतू जानवर पर प्रभाव दिखता है । इसके आलावा भी आलग आलग रिस्तो के लिए आलग आलग ग्रह प्रभाव रख ते है । इस तथ्य को जानकर आप आसानी से जान सकते है की ,कौन सा ग्रह आप का ख़राब है और कौन सा अच्छा है आज इतना ही आचार्य राजेश
सोमवार, 1 मई 2017
ज्योतिष क्या है आज के दौर में ज्योतिष एक फैशन बन गया है. ज्योतिष व्यवसायीकरण के युग में एक प्रोडक्ट बन गया है जिसका उपाय किसी इंस्टंट नूडल की तरह बताया जा रहा है .मन की मनुष्य के जीवन में लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता, शुभता-अशुभता या अच्छा-बुरा कब-कब होगा इसको ज्योतिष के माध्यम से ही जाना जा सकता है. लेकिन वास्तव में ज्योतिष का अर्थ होता है व्यक्ति को जागरुक/ सचेत करना, परन्तु समाज में इसके गलत प्रयोग करने ,लोगो को सही जानकारी देने की बजाए उनको भयभीत कर धन कमाने के कारण कई बार इस बिद्या की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है. ज्योतिष समय का विज्ञानं है . तिथि , वार, नक्षत्र , योग और कर्म इन पांच चीजों का अध्ययन कर भविष्य में होने वाली घटनायों का आकलन किया जाता है . संभावनायों और भविष्यवाणी के बजाय ज्योतिष शास्त्र का सही उपयोग परामर्श , मानव जीवन को अनुशासित और जिंदगी के हर पल का एक समुचित मार्गदर्शन के साधन के तौर पर समाज में प्रस्तुत करने की अंत्यत आवश्यकता है . केवल भविष्यवाणियों में सिमित न रह कर , ज्योतिष का आधार लेकर मनुष्य की जीवन की कई समस्यायों का हल निकाला जा सकता है. ज्योतिष भविष्य को बदलता नहीं बल्कि मनुष्य को सही और उचित सलाह देता है . प्रथम तो हमें यह समझ लेना चाहिए की ज्योतिष है क्या ? ज्योतिष प्रकाश का नाम है | प्रकाश अँधेरे को दूर करता है अँधेरा लाता नहीं | ज्योतिष कर्म को निश्चित करता है कर्म से भटकाता नहीं | ज्योतिष व्यर्थ के प्रयासों से बचते हुए सफलता के लिए मदद करता है व्यर्थ के कार्य नहीं करवाता है | वस्तुतः ज्योतिष हमें हमारे अन्तर्निहित शक्ति का ज्ञान करवाते हुए सही दिशा प्रदान करता है | 12 राशि, 9 ग्रह और 27 नक्षत्रों को लेकर कुंडली बनाई जाती है। सही गणना के लिए तारीख, वक्त, स्थान तीनों सही होने चाहिए। ग्रहों के अलावा पिछले पूर्वजन्म भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जन्मकुंडली के अलावा हस्तरेखा, प्रश्नकुंडली आदि तरीकों से भी भाग्य बांचा जाता है। बाहरी दुनिया के साथ हमारे संपर्कों को जानने-समझने का तरीका है ज्योतिष। यह ऐसा विज्ञान है, जो वातावरण द्वारा मनुष्य पर पड़नेवाले प्रभावों की स्टडी करता है। इसमें समुद्र तल से ऊंचाई, देशांतर-अक्षांश, पर्यावरण, स्तंभन, चुंबकत्व, गुरुत्वाकर्षण, रेडिएशन ईश्वर, पुनर्जन्म, पूर्वजन्म और मनुष्य का विवेक मायने रखता है।ज्योतिष महज संकेत करता है, उससे जानना और समझना हमारे ऊपर है। इसके लिए देश-पात्र-काल जरूरी है लेकिन कर्म और संगत का भी असर होता है। प्रश्नकर्ता को घरवालों के ग्रह भी प्रभावित करते हैं। साथ ही, आप कैसा सोचते हैं, क्या करते हैं, ये सब बातें भी प्रभावित करती हैं। हर दो घंटे में लग्न बदलता है। कई बार एक मिनट के अंतर से भी लग्न बदल जाता है, मसलन अगर 2 बजे लग्न बदल रहा है और जन्म 1:59 मिनट पर हुआ तो दूसरा लग्न होगा। तब जन्म समय में 1 मिनट के फर्क से ही गणना में बहुत ज्यादा अंतर आ जाएगा। अगर लग्न नहीं बदला है तो थोड़ा अंतर हो सकता है।दो तरह से असर होता है। एक राशि या लग्न बदल जाना और दूसरे ग्रह की ताकत बदल जाना। लेकिन वक्त काफी मायने रखता है। 3.40 सेकंड में नवांश (नवां हिस्सा) बदल जाता है और एक मिनट के फर्क से गणना में 20-25 फीसदी बदलाव आ जाता है। मिनटों का अंतर भी गणना में फर्क ला देता है। सही गणना के लिए सही वक्त और जगह का होना जरूरी है। लेकिन यह भी सच है कि एक ही वक्त पर एक ही जगह जन्मे सभी बच्चों का भविष्य एक नहीं होगा। कर्मयोग और वातावरण से बदलाव आ सकता है। ज्योतिष में ECMCDIP का फॉर्म्युला चलता है, यानी एजुकेशन, करियर, मैरिज, चिल्ड्रन, डेथ, इलनेस और प्रॉपर्टी के बारे में जानने में लोगों की सबसे ज्यादातर दिलचस्पी होती है। लेकिन ज्योतिष महासागर है। बीते या आनेवाले वक्त की सभी बातें सटीक बताना नामुमकिन नहीं हैं।करियर, रिश्ते, कामयाबी, एजुकेशन, बच्चों आदि के बारे में बता सकते हैं लेकिन अगर कोई यह पूछे कि आज मैंने क्या खाया था तो यह नहीं बताया जा सकता।प्रफेशन, बीमारी, देश-विदेश का योग, विवाह, बच्चे, रिश्ते सभी के बारे में बता सकते हैं लेकिन ये सिर्फ संभावनाएं झहोंगी। कर्म तो करना ही पड़ेगा। अगर कोई ये कहे कि इस बंजर जमीन पर फसल कब उगेगी तो बताना मुश्किल है।बस मार्गदर्शक या संकेतक का काम कर सकता है ज्योतिष। अगर ईश्वर न चाहे या किसी ने अपना आत्मबल काफी मजबूत किया हुआ है तो ग्रह चाल का असर काफी कम होगा। : हठयोग के आगे ज्योतिष हार जाता है। अगर किसी को बताया जाए कि बुरा वक्त है और वह सावधान हो जाता है तो वक्त टल सकता है लेकिन तब वही व्यक्ति कहेगा कि ज्योतिषी का बताया गलत साबित हुआ। लोग अक्सर इंटरप्रेट भी गलत कर लते हैं।ज्योतिष बस दिशा दिखाता है। कर्म किए बिना फल की उम्मीद बेकार है।सब कुछ लिखा है। हर बारीक से बारीक बात लिखी है। उपायों से थोड़ा-बहुत बदल सकते हैं। अगर हल्का मारक है यानी ग्रह की पावर कम है तो टाला जा सकता है, प्रबल मारक को रोका नहीं जा सकता। रेखाएं बनती-बिगड़ती हैं। भाग्य भी बदलता है। कर्म और दूसरे उपायों से 50 फीसदी तक बदलाव मुमकिन है। काफी बदलाव किया जा सकता है। हालांकि भाग्य का लिखा मिटता नहीं है सिर्फ कुछ हद तक फेरबदल किया जा सकता है। मसलन, एक बच्चे के ग्रह अच्छे हैं लेकिन बुरी संगति में पड़कर बिगड़ सकता है।बाजारू ज्योतिषी उपाय बताएगा और उपाय खुद करने के नाम पर पैसे एंठेगा। आपकी कुंडली देखकर जो आपके बारे में मोटी-मोटी बातें सही बता दे, उसे विषय का जानकार मान सकते हैं। अच्छे ज्योतिषी के पास तकनीकी, बौद्धिक और नैतिक उत्कृष्टता होती है।जो अपने विषय का जानकार हो, पढ़ा-लिखा हो और तार्किक तरीके से सोचे। तामझाम और आडंबर के चक्कर में नहीं आना चाहिए। उपाय भी ऐसे होने चाहिए, जो आप खुद कर सकें। अच्छा ज्योतिषी सामने बिठाकर या चित्र देखकर फैमिली बैकग्राउंड जानकर बताएगा। किसी की गणनाएं कितनी सही निकलती हैं, इस आधार पर भी पता लगाया जा सकता है। वैसे, दूसरे क्षेत्रों की तरह ज्योतिषियों के लिए डिग्री जरूरी होनी चाहिए। 12 राशियां हैं और 600 करोड़ लोग हैं। ऐसे में एक राशि में आए 50 करोड़ लोग। तो भला इतने लोगों का भविष्य एक जैसा कैसे हो सकता है। दैनिक राशिफल बेकार होते हैं। राशिफल करने वाले लोग को मैं ज्योतिष नहीं मानता ज्योतिष से उन लोगों का नाता हो ही नहीं सकता आचार्य राजेश
मारक बुद्ध बुध का रूप बहुत ही कोमल नाजुक माना जाता है फ़ूल में पंखुडियां बुध की होती है पंखुडियों की सजावट शुक्र करता है और राहु खुशबू देता है,फ़ूल को साधने का काम भी बुध करता है वह हरे पत्तों के रूप में भी और हरे रंग के रूप में भी,केतु उसकी टहनी होती है,जड शनि और गुरु खुशबू को फ़ैलाने वाली वायु.फ़ूल के रंग अलग अलग ग्रहों के आधार पर देखे जाते है चन्द्रमा सफ़ेद सूर्य गुलाबी मंगल लाल गुरु से पीला शनि से काला राहु से धूमिल और केतु से चितकबरा.कई रंगो का मिलावटी रूप भी देखा जाता है जैसे गुलाब में गुलाबी भी होता है तो सफ़ेद भी होता है काला भी होता है लाल गुलाब भी होता है। समय कुंडली के नवांस से मन का कारक चन्द्रमा जिस भाव में होता है उस भाव और उस राशि का रंग ही दिमाग मे रहता है अक्सर चालाक ज्योतिषी पहले से ही फ़ूल का नाम लिख लेते है और जातक से जब फ़ूल का नाम पूंछा जाता है तो जातक उसी फ़ूल का नाम बताता है जो ज्योतिषी ने लिख लिया होता है,यह आश्चर्य की सीमा मे आजाता है और जातक का विश्वास ज्योतिषी पर पूरी तरह से हो जाता है। बुध जब मारक ग्रह का काम करता है तो मेष राषि वाले के लिये छठे भाव की बीमारियां देता है वृष राशि वाले को पेट की बीमारी देता है मिथुन राशि वाले को सांस की बीमारी देता है,कर्क राशि वाले को लकवा की बीमारी देता है सिंह राशि वाले को जुबान के रोग देता है कन्या राशि वाले को सिर के रोग देता है तुला राशि वाले को यात्राओं से इन्फ़ेक्सन देता है वृश्चिक राशि वालो को दाहिने हिस्से में सुन्नता देता है धनु राशि वाले को रीढ की हड्डी की बीमारी देता है मकर राशि वालो को पुट्ठों और नितम्बो की बीमारी देता है कुम्भ राशि वालो को जननांग सम्बन्धी बीमारी देता है,मीन राशि वालो को शरीर के नीचे के हिस्से यानी नाभि के नीचे की बीमारी देता है। आक्स्मिक हादसे में बुध जब राहु का साथ लेता है तो मेष राशि का जातक या तो बहुत सा धन इकट्ठा कर लेता है और डकैती आदि के कारण मारा जाता है अथवा बहुत बडी दुश्मनी अलावा जातियों से कर लेता है और सामाजिक दुश्मनी के कारण मारा जाता है अथवा वह अपने प्रयासो से इतना कर्जा कर लेता है कि कर्जा वसूलने वाले उसे मार डालते है,अथवा वह नौकरी आदि में अपनी बहादुरी दिखाने के चक्कर में मारा जाता है।कन्या लगन मे मीन राशि का बुध चन्द्र शुक्र एक छलावा की तरह से काम करते है,यहाँ बुध एक ऐसी लडकी के रूप मे काम करता है कि वह कहलाने को तो बहिन कहलाये और समय आने पर पत्नी का हक भी पूरा कर दे,इसके साथ ही चन्द्रमा भी यहा बुध के साथ मिलकर जीवन साथी के रूप मे छलावा करता है,शादी के बाद मतलब परस्ती और रिस्ता एक व्यापारी की भांति निभाना भी माना जा सकता है,शुक्र उच्च राशि का होकर केवल जीवन साथी की आराम परस्ती के लिये अपना हक अदा करता है,जातक के लिये यात्राओ वाले काम देता है माता बहिन और पत्नी के बीच मे सामजस्य बैठाने मे दिक्कत आती है,रोजाना के कामो मे कभी कभी एन वक्त पर खोपडी घूमने पर काम का खराब कर दिया भी माना जा सकता है.इस दोष को दूर करने के लिये केवल पहाडी क्षेत्रो की देवी यात्रायें ही लाभदायक होती है ज्योतिष आदि के काम भी फ़लीभूत होते है. अगर आप में से कोई भी मुझसे अपनी कुंडली बनवाना दिखाना या कोई समस्या का हल चाहता है तो आप मुझसे निबंध नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं 07597718725 094144813240 paid service
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