सोमवार, 12 जून 2017

माँ काली ज्योतिष की आज की पोस्ट पहले विवाह 20 से लेकर 25 साल तक हो जाता था पर आज समय मे वदलाव आ चुका है आज नोजवान पीङी जो शिक्षा गृहन करके जव तक अपने पैरो पर खङे नही होते तव तक विवाह नही करते हजारो कुन्ङलीया मेरे पास आती कई तरह के सवाल जातक जातिका पुछती है पर यह सवाल भी पुछा जाता है हमारा विवाह कौन सी दिशा में होगा जन्म कुंडली में प्रथम भाव लग्न को पूर्व दिशा ,सप्तम भाव को पश्चिम ,चतुर्थ भाव को उत्तर एवं दशम भाव को दक्षिण दिशा समझें , अतः इसी क्रम में शुक्र से सप्तमेश की जो दिशा हो ,उसी दिशा में प्रायः वर का घर होता है | चन्द्रमा एवं सप्तमेश जिस दिशा में हों इनमें जो बलवान हो जातक की ससुराल उसी दिशा में होगी | चन्द्रमा सातवें भाव में हो तथा चन्द्र राशि का स्वामी मंगल या अन्य पापग्रहों से दृष्ट हो अथवा पापग्रह चन्द्रमा से त्रिकोण में हों तो जातक का विवाह जन्म स्थान से दूर होता हैयदि पंचमेश ,सप्तमेश एवं शुक्र का शुभ संयोग हो अथवा पंचमेश और सप्तमेश एक साथ हो तो प्रेम विवाह होता है, यदि पराक्रमेश तृतीय भाव का स्वामी सप्तम भाव में हो तो भी जातक के प्रयत्न से विवाह होता है अर्थात प्रेम विवाह की संभावना होती है , नीच राशिस्थ सूर्य की शुक्र के साथ युति हो तो प्रेम विवाह होता है,मिथुन राशि में चन्द्र और बुध की युति हो या चन्द्रमा मिथुन राशि में शुक्र से युत हो तो प्रेम विवाह का योग बनता है, पंचमेश एवं सप्तमेश का राशि परिवर्तन राज योग एवं प्रेम का सूचक भी है वाकी आप अपने अनुभव से परखे मेरी यही कोशिश है की आप ज्योतिष का ज्यादा से ज्यादा ज्योतिष का ज्ञान हासिल करे मित्रो आप से अगर कोई कुंङली दिखाना या वनवाना या हमसे किसी भी समस्या का उपाय जानना चाहते है तो हमसे सम्पर्क करे हमारी सेवा दक्षिणा के साथ है 09414481324 07597718725 आचार्य राजेश

आओ ज्योतिष सीखें पूरी ज्‍योतिष नौ ग्रहों, बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों और बारह भावों पर टिकी हुई है। सारे भविष्‍यफल का मूल आधार इनका आपस में संयोग है। नौ ग्रह इस प्रकार हैं - ग्रहअन्‍य नामअंग्रेजी नामसूर्यरविसनचंद्रसोममूनमंगलकुजमार्सबुध मरकरीगुरूबृहस्‍पतिज्‍यूपिटरशुक्रभार्गववीनसशनिमंदसैटर्नराहु नॉर्थ नोडकेतु साउथ नोड आधुनिक खगोल विज्ञान (एस्‍ट्रोनॉमी) के हिसाब से सूर्य तारा और चन्‍द्रमा उपग्रह है, लेकिन भारतीय ज्‍योतिष में इन्‍हें ग्रहों में शामिल किया गया है। राहु और केतु गणितीय बिन्‍दु मात्र हैं और इन्‍हें भी भारतीय ज्‍योतिष में ग्रह का दर्जा हासिल है।  भारतीय ज्‍योतिष पृथ्‍वी को केन्द्र में मानकर चलती है। राशिचक्र वह वृत्त है जिसपर नौ ग्रह घूमते हुए मालूम होते हैं। इस राशिचक्र को अगर बारह भागों में बांटा जाये, तो हर एक भाग को एक राशि कहते हैं। इसी तरह जब राशिचक्र को सत्‍ताईस भागों में बांटा जाता है, तब हर एक भाग को नक्षत्र कहते हैं। हम नक्षत्रों की चर्चा आने वाले समय में करेंगे।  एक वृत्त को गणित में 360 कलाओं (डिग्री) में बाँटा जाता है। इसलिए एक राशि, जो राशिचक्र का बारहवाँ भाग है, 30 कलाओं की हुई। फ़िलहाल ज़्यादा गणित में जाने की बजाय बस इतना जानना काफी होगा कि हर राशि 30 कलाओं की होती है। आज आप ग्रह के नाम अच्छी तरह सेयाद कर ले   ग्रह       अन्‍य नाम          अंग्रेजी नाम सूर्य       रवि              सन चंद्र      सोम               मून मंगल    कुज               मार्स बुध                       मरकरी गुरू     बृहस्‍पति            ज्‍यूपिटर शुक्र     भार्गव              वीनस शनि     मंद                सैटर्न राहु     नॉर्थ                नोड केतु     साउथ               नो्: ग्रह       अन्‍य नाम          अंग्रेजी नाम सूर्य       रवि              सन चंद्र      सोम               मून मंगल    कुज               मार्स बुध                       मरकरी गुरू     बृहस्‍पति            ज्‍यूपिटर शुक्र     भार्गव              वीनस शनि     मंद                सैटर्न राहु     नॉर्थ                नोड केतु     साउथ               नोड

रविवार, 11 जून 2017

कर्म और भाग्य और ज्योतिष जीवन में पुरूषार्थ और भाग्य दोनों का ही अलग-अलग महत्व है। ये ठीक है कि पुरूषार्थ की भूमिका भाग्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन इससे भाग्य का महत्व किसी भी तरह से कम नहीं हो जाता।कर्म के साथ भाग्य जोड़ दोगे तो उसका मान 10 गुना बढ़ता ही जाएगा। लेकिन केवल भाग्य भरोसे बैठकर कर्म भी क्षीण होने लगते हैं। मित्रों, जीवन में पुरूषार्थ और भाग्य.दोनों अपने-अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं । पांडवों की माता कुन्ती भगवान श्री कृष्ण से कहती है, कि मेरे सभी पुत्र महापराक्रमी एवं विद्वान है । किन्तु हम लोग फिर भी वनों में भटकते हुए जीवन गुजार रहे हैं, क्यों ? क्योंकि भाग्य ही सर्वत्र फल देता है भाग्यहीन व्यक्ति की विद्या और उसका पुरूषार्थ निरर्थक है वैसे देखा जाए तो भाग्य एवं पुरूषार्थ दोनों का ही अपना-अपना महत्व है । लेकिन इतिहास पर दृष्टी डाली जाए तो सामने आएगा कि जीवन में पुरूषार्थ की भूमिका भाग्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है । भाग्य की कुंजी सदैव हमारे कर्म के हाथ में होती है, अर्थात कर्म करेंगे तो ही भाग्योदय होगा जबकि पुरूषार्थ इस विषय में पूर्णत: स्वतंत्र है । माना कि पुरूषार्थ सर्वोपरी है, किन्तु इतना कहने मात्र से भाग्य की महता तो कम नहीं हो जाती । आप देख सकते हैं, कि दुनिया में ऎसे मनुष्यों की कोई कमी नहीं है जो कि दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन फिर भी उनका सारा जीवन अभावों में ही व्यतीत हो जाता है । अब इसे आप क्या कहेंगें ? उन लोगों नें पुरूषार्थ करने में तो कोई कमी नहीं की फिर उन लोगों को वो सब सुख सुविधाएं क्यों नहीं मिल पाई ? जो कि आप और हम भोग रहे हैं । एक इन्सान इन्जीनियरिंग, डाक्टरी या मैनेजमेन्ट की पढाई करके भी नौकरी के लिए मारा मारा फिर रहा है, लेकिन उसे कोई चपरासी की नौकरी पर भी रखने को भी तैयार नहीं है वहीं दूसरी ओर एक कम पढा लिखा इन्सान किसी काम धन्धे में लग कर बडे मजे से अपने परिवार का पेट पाल रहा है । अब इसे आप क्या कहेंगें ? एक मजदूर जो दिन भर भरी दुपहर में पत्थर तोडने का काम करता है, क्या वो कम पुरूषार्थ कर रहा है ? अब कुछ लोग कहेंगें कि उसका वातावरण, उसके हालात, उसकी समझबूझ इसके लिए दोषी है, या फिर उसमें इस तरह की कोई प्रतिभा नहीं है, कि वो अपने जीवन स्तर को सुधार सके अथवा उसे जीवन में ऎसा कोई उचित अवसर नहीं मिल पाया कि वो जीवन में आगे बढ सके या फिर उसमें शिक्षा की कमी है आदि आदि...ऎसे सैकंडों प्रकार के तर्क हो सकते हैं मैं मानता हूँ कि इस के पीछे जरूर उसके हालात, वातावरण, शिक्षा- दीक्षा, उसकी प्रतिभा इत्यादि कोई भी कारण हो सकता है । लेकिन ये सवाल फिर भी अनुत्तरित रह जाता है, कि क्या ये सब उसके अपने हाथ में था ? यदि नहीं तो फिर कौन सा ऎसा कारण है, कि उसने किसी अम्बानी, टाटा-बिरला के घर जन्म न लेकर एक गरीब के घर में जन्म लिया । किसी तर्कवादी के पास इस बात का कोई उत्तर है ? ये निर्भर करता है इन्सान के भाग्य पर जिसे चाहे तो आप luck कह लीजिए या मुक्कदर या किस्मत या फिर कुछ भी यह सत्य है, कि इन्सान द्वारा किए गए कर्मों से ही उसके भाग्य का निर्माण होता है । लेकिन कौन सा कर्म, कैसा कर्म और किस दिशा में कर्म करने से मनुष्य अपने भाग्य का सही निर्माण कर सकता है ये जानने का जो माध्यम है, उसी का नाम ज्योतिष है ज्योतिष शास्त्र का महत्व वेदों से है. ज्योतिष शास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जो आपके जीवन के हर रास्तो पर शुभता लाने में समर्थ है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य की कुंडली के नवम भाव को भाग्य भाव माना जाता है. अपने भाग्य की वृद्धि के लिए आपको कुंडली के नवम भाव, भाग्येश और भाग्य राशि पर अधिक विचार करना चाहियें और अपके भाग्य वृद्धि में अवरोध कर रहे ग्रहों को ज्योतिष के उपायों के अनुसार दूर करना चाहियें. आप ज्योतिष शास्त्र को ऐसे समझ सकते हो कि परमात्मा हमारा हाथ पकड़कर हमे भाग्य तक नही पहुंचता बल्कि हमे रास्ता दिखा देता है. उसी तरह ज्योतिष शास्त्र आपके भाग्य वृद्धि के लिए अनेक रास्ते बनता है और आपको अनेक उपाय देता है जिनकी मदद से आप अपने भाग्य में वृद्धि कर सको. ग्रह, नक्षत्र, राशियाँ एवं अन्य ब्रह्मांड स्थित पिंड को सतत प्रभावित करते रहते हैं और इसी कारण उसके कर्म को प्रभावित करते रहते हैं, कर्म के प्रभाव से ही भाग्य प्रभावित होता है और यही कारण है कि जिससे ज्योतिषीय ग्रह स्थितियाँ मनुष्य के भाग्यदर्शन में सहायक सिद्ध होती है। स्थूल रूप से कुंडली के 12 भावों को तीन भागों में विभक्त किया गया है, ये हैं केन्द्र (1/4/7/10 भाव), पणकर (2/5/8/11) तथा आपोक्लिम (3/6/9/12) जो ग्रह केंद में बैठा है वह पूर्वजन्मकृत कर्मों के फल का प्रदाता है तथा आपोक्लिम स्थान के ग्रहों से स्थान व दृष्टि संबंध बना रहा हो तो अपरिवर्तनशील कर्मफल को दर्शाता है। पणकर स्थान के ग्रह इहजन्मोपार्जित कर्मों का इसी जन्म में भोग करने वाले होते हैं तथा यह सुनिश्चित भी किया जा सकता है कि इस कर्म को किन कर्मों एवं प्रयोगों से बदला जा सकता है। लग्न से द्वादश भावों कि राशियाँ अपने पीछे के कर्म एवं योनि का दिग्दर्शन करती है। द्वादशांश चक्र में लग्नेश एवं लग्न राशि से कर्म के फल फल एवं संचित कर्म तथा प्रारब्ध निर्माण कि बाधाओं का बोध होता है। आज इतना ही आचार्य राजेश 07597718725 09414481324

शनिवार, 10 जून 2017

अस्त ग्रहो का अपना एक विशेष महत्व होता है। इसलिए अस्त ग्रहो की ओर ध्यान देना आवश्यक है अब बात करते है ग्रह अस्त कैसे होता है? कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दुरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपना तेज और शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह सौर मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है ऐसे ग्रह को अस्त ग्रह कहते है।प्रत्येक ग्रह की सूर्य से यह समीपता अंशो में मापी जाती है इस मापदंड के अनुसार हर एक ग्रह सूर्य से निम्नलिखित दुरी के अंदर आ जाने से अस्त हो जाता है: चंद्रमा सूर्य के दोनों और 12 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।बुध सूर्य के दोनों ओर 14 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।लेकिन बुध अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हो तो वह सूर्य के दोनों और 12 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त होता है।गुरु सूर्य के दोनों ओर 11 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।शुक्र सूर्य के दोनों और 10 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।बुध की तरह शुक्र भी यदि अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हो तो वह सूर्य के दोनों ओर 8 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाते है।शनि सूर्य के दोनों ओर 15 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी अस्त नही होते।हमेशा वक्री रहते है। किसी भी ग्रह के अस्त हो जाने से उसके प्रभाव में कमी आ जाती है तथा वह ग्रह कुंडली में ठीक तरह से कार्य करने में सक्षम नही रह जाता।किसी भी अस्त ग्रह की प्रभावहीनता का सही अनुमान लगाने के लिए उस ग्रह का कुंडली में स्थिति के कारण बल, सूर्य का उसी कुंडली में विशेष बल व अस्त ग्रह की सूर्य से दुरी देखना आवश्यक होता है।उसके बाद ही उस ग्रह की कार्य क्षमता के बारे में सही जानकारी प्राप्त होती है।उदाहरण के लिए, किसी कुंडली में गुरु सूर्य से 11 अंश दूर होने पर अस्त ही कहलाएंगे तथा 1 अंश दूर पर भी अस्त कहलाएंगे लेकिन पहली स्थिति में कुंडली में गुरु का बल दूसरी स्थिति के मुकाबले अधिक होगा क्योंकि जितना ही कोई ग्रह सूर्य के पास आ जाता है उतना ही उसका बल कम होता जाता है।

शुक्रवार, 9 जून 2017

आओ ज्योतिष सीखे ,ज्योतिष वेद का ही अन्ग है,समय की परिभाषा को देने बाला ग्रन्थ है्पृथ्वी की दैनिक गति और उसके पर्याय घड़ी के 24 घंटे को समझने के बाद उस ब्रह्मांड को समझने की चेष्‍टा करें , जो ,महीने ऋतु , वर्ष, युग, मन्वंतर , सृष्टि , प्रलय का लेखा-जोखा और संपूर्ण जगत की गतिविधि को विराट कम्प्यूटर की तरह अपने-आपमें संजोए हुए है। निस्संदेह इन वर्णित संदर्भों का लेखा-जोखा विभिन्न ग्रहों की गतिविधियों पर निर्भर है। उसकी सही जानकारी आत्मविश्वास में वृद्धि करेगी , उसकी एक झलक मात्र से किसी का कल्याण हो सकता है , दिव्य चक्षु खुल जाएगा , आत्मज्ञान बढ़ेगा और संसार में बेहतर ढंग से आप अपने को नियोजित कर पाएंगे। भविष्‍य को सही ढंग से समझ पाना , उसमें अपने आपको खपाते हुए सही रंग भरना सकारात्मक दृष्टिकोण है। समय की सही जानकारी साधन और साध्य दोनो ही है। पहली दृष्टि में देखा जाए , तो घड़ी मात्र एक साधन है , किन्तु गंभीरता से देखें , तो वह मौन रहकर भी कई समस्याओं का इलाज कर देती है। इसी तरह ग्रहों के माध्यम से भविष्‍य की जानकारी रखनेवाला मौन रहकर भी अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त कर लेता है , पर इसके लिए एक सच्‍चे ज्‍योतिषी से आपका परिचय आवश्‍यक है। अति सामान्य व्यक्ति के लिए घड़ी या फलित ज्योतिष शौक का विषय हो सकता है , किन्तु जीवन के किसी क्षेत्र में उंचाई पर रहनेवाले व्यक्ति के लिए घड़ी और भविष्‍य की सही जानकारी की जरुरत अधिक से अधिक है। यह बात अलग है कि सही मायने में भविष्‍यद्रष्‍टा की कमी अभी भी बनी हुई है। ' दशा पद्धति' संपूर्ण जीवन के तस्वीर को घड़ी की तरह स्पष्‍ट बताता है। ग्रह ऊर्जा लेखाचित्र से यह स्पष्‍ट हो जाता है कि कब कौन सा काम किया जाना चाहिए। एक घड़ी की तरह ही ज्योतिष की जानकारी भी समय की सही जानकारी प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं , वरन् अप्रत्यक्षत: बहुत सारी सूचनाएं प्रदान करके , समुचित कार्य करने की दिशा में बड़ी प्रेरणा-स्रोत है। जो कहते हैं कि घड़ी मैंने यों ही पहन रखी है या ज्योतिषी के पास मैं यों ही चला गया था , निश्चित रुप से बहुत ही धूर्त्‍त या अपने को या दूसरों को ठगनेवाले होते हैं। यह सही है कि आज के व्यस्त और अनिश्चित संसार में हर व्यक्ति को एक अच्छी घड़ी या फलित ज्योतिष की जानकारी की आवश्यकता है। इससे उसकी कार्यक्षमता काफी हद तक बढ़ सकती है । जीवन के किसी क्षेत्र में बहुत ऊंचाई पर रहनेवाला हर व्यक्ति यह महसूस करता है कि महज संयोग के कारण ही वह इतनी ऊंचाई हासिल कर सका है , अन्यथा उससे भी अधिक परिश्रमी और बुद्धिमान व्यक्ति संसार में भरे पड़े हैं , जिनकी पहचान भी नहीं बन सकी है। उस बड़ी चमत्कारी शक्ति की जानकारी के लिए फुरसत के क्षणों में उनका प्रयास जारी रहता है। यही कारण है कि बडे बडे विद्वान भी जीवन के अंतिम क्षणों में सर्वशक्तिमान को समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को फलित ज्योतिष की जानकारी से कई समस्याओं को सुलझा पाने में मदद मिल सकती है , किन्तु इसके लिए अपने विराट उत्तरदायितव को समझते हुए समय निकालने की जरुरत है। अपनी कीमती जीवन-शैली में से कुछ समय निकालकर इस विद्या का ज्ञान प्राप्त करेंगे , तो इसके लिए भी एक घड़ी की आवश्यकता अनिवार्य होगी। आचार्य राजेश

आओ ज्योतिष सीखे ,ज्योतिष वेद का ही अन्ग है,समय की परिभाषा को देने बाला ग्रन्थ है्पृथ्वी की दैनिक गति और उसके पर्याय घड़ी के 24 घंटे को समझने के बाद उस ब्रह्मांड को समझने की चेष्‍टा करें , जो ,महीने ऋतु , वर्ष, युग, मन्वंतर , सृष्टि , प्रलय का लेखा-जोखा और संपूर्ण जगत की गतिविधि को विराट कम्प्यूटर की तरह अपने-आपमें संजोए हुए है। निस्संदेह इन वर्णित संदर्भों का लेखा-जोखा विभिन्न ग्रहों की गतिविधियों पर निर्भर है। उसकी सही जानकारी आत्मविश्वास में वृद्धि करेगी , उसकी एक झलक मात्र से किसी का कल्याण हो सकता है , दिव्य चक्षु खुल जाएगा , आत्मज्ञान बढ़ेगा और संसार में बेहतर ढंग से आप अपने को नियोजित कर पाएंगे। भविष्‍य को सही ढंग से समझ पाना , उसमें अपने आपको खपाते हुए सही रंग भरना सकारात्मक दृष्टिकोण है। समय की सही जानकारी साधन और साध्य दोनो ही है। पहली दृष्टि में देखा जाए , तो घड़ी मात्र एक साधन है , किन्तु गंभीरता से देखें , तो वह मौन रहकर भी कई समस्याओं का इलाज कर देती है। इसी तरह ग्रहों के माध्यम से भविष्‍य की जानकारी रखनेवाला मौन रहकर भी अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त कर लेता है , पर इसके लिए एक सच्‍चे ज्‍योतिषी से आपका परिचय आवश्‍यक है। अति सामान्य व्यक्ति के लिए घड़ी या फलित ज्योतिष शौक का विषय हो सकता है , किन्तु जीवन के किसी क्षेत्र में उंचाई पर रहनेवाले व्यक्ति के लिए घड़ी और भविष्‍य की सही जानकारी की जरुरत अधिक से अधिक है। यह बात अलग है कि सही मायने में भविष्‍यद्रष्‍टा की कमी अभी भी बनी हुई है। ' दशा पद्धति' संपूर्ण जीवन के तस्वीर को घड़ी की तरह स्पष्‍ट बताता है। ग्रह ऊर्जा लेखाचित्र से यह स्पष्‍ट हो जाता है कि कब कौन सा काम किया जाना चाहिए। एक घड़ी की तरह ही ज्योतिष की जानकारी भी समय की सही जानकारी प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं , वरन् अप्रत्यक्षत: बहुत सारी सूचनाएं प्रदान करके , समुचित कार्य करने की दिशा में बड़ी प्रेरणा-स्रोत है। जो कहते हैं कि घड़ी मैंने यों ही पहन रखी है या ज्योतिषी के पास मैं यों ही चला गया था , निश्चित रुप से बहुत ही धूर्त्‍त या अपने को या दूसरों को ठगनेवाले होते हैं। यह सही है कि आज के व्यस्त और अनिश्चित संसार में हर व्यक्ति को एक अच्छी घड़ी या फलित ज्योतिष की जानकारी की आवश्यकता है। इससे उसकी कार्यक्षमता काफी हद तक बढ़ सकती है । जीवन के किसी क्षेत्र में बहुत ऊंचाई पर रहनेवाला हर व्यक्ति यह महसूस करता है कि महज संयोग के कारण ही वह इतनी ऊंचाई हासिल कर सका है , अन्यथा उससे भी अधिक परिश्रमी और बुद्धिमान व्यक्ति संसार में भरे पड़े हैं , जिनकी पहचान भी नहीं बन सकी है। उस बड़ी चमत्कारी शक्ति की जानकारी के लिए फुरसत के क्षणों में उनका प्रयास जारी रहता है। यही कारण है कि बडे बडे विद्वान भी जीवन के अंतिम क्षणों में सर्वशक्तिमान को समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को फलित ज्योतिष की जानकारी से कई समस्याओं को सुलझा पाने में मदद मिल सकती है , किन्तु इसके लिए अपने विराट उत्तरदायितव को समझते हुए समय निकालने की जरुरत है। अपनी कीमती जीवन-शैली में से कुछ समय निकालकर इस विद्या का ज्ञान प्राप्त करेंगे , तो इसके लिए भी एक घड़ी की आवश्यकता अनिवार्य होगी। आचार्य राजेश

गुरुवार, 8 जून 2017

क्या है ज्योतिष मित्रोंज्योतिष का अर्थ है.ज्योति यानी प्रकाश ,इस प्रकार ज्योतिषी का अर्थ हुआ जो प्रकाशमान हो .और दूसरों को भी अपने ज्ञान के प्रकाश से रास्ता दिखा सके.वर्तमान समय में ज्योतिषी वह व्यक्ति है जो ,धोती कुरता या कुरता पायजामा पहनता हो तिलक लगाता हो शिखा रखता हो और तमाम श्लोक, मंत्र गिना सकता हैउसका पहनावा और दिखावा निश्चित हो .चाहे उसके अन्दर मर्यादा ,आध्यात्म,आचरण और शुचिता हो, या न हो आचार्य वराहमिहिर ने ,जो की ज्योतिष के प्रणेता थे ,ने एक ज्योतिषी होने की तमाम शर्तें बताई है.जिनमे मूल रूप से आचरण और संस्कारों की बात ही कही गयी है वराहमिहिर ने कोई " ड्रेस कोड" नहीं बताया हैअहंकार तो सर्वथा त्याज्य है उनकी परिभाषा में जबकि वर्त्तमान समय के माननीय ज्योतिषी किसी व्यक्ति के भविष्य के बारे में ऐसे चुनौतियां देते हैं मानो उन्होंने ही उस व्यक्ति का जीवन नियत किया है और जनता यह समझती है ज्योतिषी तो स्वयं भगवान का सोलह कला युक्त अवतार है और वह उसके जीवन की तमाम समस्याओं को नष्ट कर देगा जनता और ज्योतिषी दोनों ही ज्योतिष जैसे महान पराविज्ञान के महत्व को समझे बिना इसका प्रयोग कर रहे हैं और असफलता की दशा में एक दूसरे पर दोषारोपण भी कर रहे हैं कहाँ हैं आध्यात्मिक और वैज्ञानिक ज्योतिषी और कहाँ है वह जनता जो इस बात को समझ सके ?हमें हमारी प्राचीन सभ्यता का गौरव है और इसी लिए हमें इसे सभ्यता की अर्वाचीन चुनौतियों से तराशना जरुरी हो जाता है| ज्योतिष शास्त्र भी हमारी वेदिक संस्कृति का एक अनमोल उपहार है| जब हम ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों का अवलोकन करते हैं तो हमें समयांतर पर शास्त्र में किये गए संशोधन नजर आते है| इससे यह प्रतिपादित होता है की संशोधित विचारों को शास्त्र में मान्यता देने में उस काल में कोई छोछ नहीं था| दुर्भाग्य वश जिस समयकाल में शास्त्रों की रचना हुई, हमारे महषींओं ने अपने शिष्यों की मेघा के अनुरूप अपने ज्ञान को सूत्रबद्ध किया| विचारों को मुद्रित करने के साधनों की मर्यादा, अपने ज्ञान को अनुचित हाथों में जाने से रोकने की चेष्ठा एवं कुछ हद तक वर्ण सम्बन्धी धारणाओं की वजह से सूत्रबध्ध ग्रंथों को जन-साधारण स्तर पर लोक-भोग्य स्वरूप में प्रकाशित नहीं किया जा सका| जब बाहरी जगत ने विज्ञान युग में प्रवेश किया, हमारी पुरातन ज्ञान की धरोहर को विदेशी शासन के दुर्व्यवहार से काफी क्षति हुई| इस संधिकाल में ज्योतिष शास्त्र भी अवरुद्ध हुआ| ज्योतिष भी मेघावी मनुष्यों के हाथों से निकल कर धीरे धीरे लालची, कूप-मुन्डको के हाथों का खिलौना बनाता जा रहा है| जो लोग अन्य व ऐसे लोग आज ज्योतिषी के मुखौटे पहन कर साधारण लोगों के ज्योतिष विषयक अज्ञान का भरपूर फायदा उठा रहें हैं| यह धन पीपसुओ ने ऐसे कई दुर्योगों को शास्त्रोमे घुसा दिया जिस का कोई शास्त्रोक्त प्रमाण न हो न ही कोई तार्किक समाधान|ऐसा इसलिए क्योंकि भारतवर्ष में ज्‍योतिष के क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कम लोग हैं, अधिकांश का आस्था‍वान चिंतन है , वे हमारे ऋषि महर्षियों को भगवान और ज्योतिष को धर्मशास्त्र समझते है, जबकि ऋषिमुनियों को वैज्ञानिक तथा ज्योतिष शास्त्र् को विज्ञान मानना चाहिएे हैं, जिसमे समयानुकूल बदलाव की आवश्यंकता है। इस प्रकार ज्योतिष विशेषज्ञों के साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोणवालों के लिए यह विज्ञान ही है ऐसी ही परिस्थितियों में हम यह मानने को मजबूर हो जाते हैं कि वास्तव में प्रकृति के नियम ही सर्वोपरि हैं। हमलोग पाषाण-युग, चक्र-युग, लौह-युग, कांस्य-युग ......... से बढ़ते हुए आज आई टी युग में प्रवेश कर चुकें हैं, पर अभी भी हम कई दृष्टि से लाचार हैं। नई-नई असाध्य बीमारियॉ ,जनसंख्या-वृद्धि का संकट, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा ,कहीं भूकम्प तो कहीं ज्वालामुखी-विस्फोट--प्रकृति की कई गंभीर चुनौतियों से जूझ पाने में विश्व के अव्वल दर्जे के वैज्ञानिक भी असमर्थ होकर हार मान बैठे हैं। यह सच है कि प्रकृति के इन रहस्यों को खुलासा कर हमारे सम्मुख लाने में इन वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिससे हमें अपना बचाव कर पाने में सुविधा होती है। प्रकृति के ही नियमो का सहारा लेकर कई उपयोगी औजारों को बनाकर भी हमने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों का झंडा गाडा है , किन्तु वैज्ञानिकों ने किसी भी प्रकार प्रकृति के नियमों को बदलने में सफलता नहीं पायी है। इसलिए मेरा मानना है ज्योतिष भी एक विज्ञान है पर अभी बहुत शोध बाकी है आचार्य राजेश

रविवार, 4 जून 2017

आओ ज्योतिष सीखे ग्रुप से वैदिक ज्योतिष वैदिक ज्योतिष भारतीय ज्योतिष ग्रहों के प्रभाव पर, प्राचीन भारतीय ऋषियों और संतों द्वारा प्राप्त ज्ञान पर आधारित एक प्राचीन विज्ञान है | यह विज्ञान पश्चिमी खगोलविदों और ज्योतिषो के पैदा होने के भी काफी लम्बे समय से पहले भारत में विकसित कर लिया गया था | १५०० ई.पू. ही इसकी जड़ों ने वेदों में कदम रख लिया था | .ज्योतिष की कार्यप्रणली हम सभी जानते है की वैदिक ज्योतिष का सम्बन्ध १२ घर १२ राशियाँ और नौ ग्रहों से है, लेकिन में यहाँ पर ज्योतिष की कार्यप्रणली के बारे में चर्चा करना चाहता हूँ ! चलो जानने की कोशिश करते है की ज्योतिष किन सिद्धांतो पर कार्य करता है और इसके पीछे छिपे क्या तथ्य है तथा लाखों लोग इस विज्ञानं से किस प्रकार जुड़े हुए है ! जहाँ तक में समझता हूँ ज्योतिष एक ऐसी कार्य प्रणली है जिसके द्वारा मनुष्यों को अपने पिछले जन्मो के कर्मो का फल प्राप्त होता है ! अच्छे कर्मो का अच्छा फल तथा बुरे कर्मो का बुरा फल ! मान लो यदि आपने अपने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये है तो इस जन्म में आप एक सुखी जीवन व्यतीत करेंगे ! कम परिश्रम से भी अधिक फल की प्राप्ति करेंगे, परन्तु यदि आपने यदि अपने पिछले जन्म में सिर्फ बुरे ही बुरे कर्म किये है तो अगला जन्म आपके बुरे कर्मो का फल देगा ! पूरा जीवन दुःख और परेशानियों से भरा और अधिक से अधिक महनत करने पर भी फल की प्रति नहीं होगी ! और यही कारण है की लाखों लोग जीवन भर संघर्ष करने पर भी कुछ प्राप्त नहीं कर पाते और दूसरी तरफ कम परिश्रमी लोग अपने जीवन में बैठे बीठाय बहुत कुछ हांसिल कर लेते है!

गर्भाधान कब और कैसे चार पुरुषार्थ सामने आते है,पहले धर्म उसके बाद अर्थ फ़िर काम और अन्त में मोक्ष, धर्म का मतलब पूजा पाठ और अन्य धार्मिक क्रियाओं से पूरी तरह से नही पोतना चाहिये,धर्म का मतलब मर्यादा में चलने से होता है,माता को माता समझना पिता को पिता का आदर देना अन्य परिवार और समाज को यथा स्थिति आदर सत्कार और सबके प्रति आस्था रखना ही धर्म कहा गया है,अर्थ से अपने और परिवार के जीवन यापन और समाज में अपनी प्रतिष्ठा को कायम रखने का कारण माना जाता है,काम का मतलब अपने द्वारा आगे की संतति को पैदा करने के लिये स्त्री को पति और पुरुष को पत्नी की कामना करनी पडती है,पत्नी का कार्य धरती की तरह से है और पुरुष का कार्य हवा की तरह या आसमान की तरह से है,गर्भाधान भी स्त्री को ही करना पडता है,वह बात अलग है कि पादपों में अमर बेल या दूसरे हवा में पलने वाले पादपों की तरह से कोई पुरुष भी गर्भाधान करले। धरती पर समय पर बीज का रोपड किया जाता है,तो बीज की उत्पत्ति और उगने वाले पेड का विकास सुचारु रूप से होता रहता है,और समय आने पर उच्चतम फ़लों की प्राप्ति होती है,अगर वर्षा ऋतु वाले बीज को ग्रीष्म ऋतु में रोपड कर दिया जावे तो वह अपनी प्रकृति के अनुसार उसी प्रकार के मौसम और रख रखाव की आवश्यकता को चाहेगा,और नही मिल पाया तो वह सूख कर खत्म हो जायेगा,इसी प्रकार से प्रकृति के अनुसार पुरुष और स्त्री को गर्भाधान का कारण समझ लेना चाहिये।गर्भाधान का समय शोध से पता चला है कि ज्योतिष से गर्भाधान के लिये एक निश्चित समय होता है। इस समय में स्त्री पुरुष के सहसवास से गर्भाधान होने के अस्सी प्रतिशत मौके होते है। इन समयों में एक बात और भी महत्वपूर्ण है कि स्त्री को रजस्वला होने के चौदह दिन तक ही यह समय प्रभावी होता है,उसके बाद का समय संज्ञा हीन हो जाता है,जो व्यक्ति अलावा संतान नही चाहते हों,उनके लिये भी यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण इसलिये होता है क्योंकि अगर इस समय को छोड दिया जाये तो गर्भाधान होने की कोई गुंजायश नही रहती है। लेकिन अपनी जन्म तिथि के अनुसार बिलकुल सही समय को जानने के लिये आप हम से सम्पर्क कर सकते है।समयानुसार प्रत्येक जन्म पत्री के द्वारा जिसके अन्दर सही समय और स्थान का नाम होना जरूरी है,से जन्म समय को निकालने के लिये आप सम्पर्क कर सकते है।समय निकालने की फ़ीस मात्र Rs.1100/- है.सम्पर्क करने के लिये maakaali46 jyotish Hanumagarh town 07597718725 09414481324पर सम्पर्क करें. गर्भाधान के समय ध्यान में सावधानियां ईश्वर ने जन्म चार पुरुषार्थों को पूरा करने के लिये दिया है। पहला पुरुषार्थ धर्म नामका पुरुषार्थ है,इस पुरुषार्थ का मतलब पूजा पाठ और ध्यान समाधि से कदापि नही मानना चाहिये। शरीर से सम्बन्धित जितने भी कार्य है वे सभी इस पुरुषार्थ में शामिल है। शरीर को बनाना ताकत देना रोग आदि से दूर रहना अपने नाम को दूर दूर तक प्रसिद्ध करना,अपने कुल समाज की मर्यादा के लिये प्रयत्न करना,अपने से बडे लोगों का मान सम्मान और व्यवहार सही रखना आदि बातें मानी जाती है। इसके बाद माता पिता का सम्मान उनके द्वारा दिये गये जन्म का सही रूप समझना अपने को स्वतंत्र रखकर किसी अनैतिक काम को नही करना जिससे कि उनकी मर्यादा को दाग लगे आदि बातें इस धर्म नाम के पुरुषार्थ में आती है शरीर के बाद बुद्धि को विकसित करने के लिये शिक्षा को प्राप्त करना,धन कमाने के साधनों को तैयार करना और धन कमाकर जीवन को सही गति से चलाना,उसके बाद जो भी भाग्य बढाने वाली पूजा पाठ रत्न आदि धारण करना आदि माना जाता है। इस पुरुषार्थ के बाद अर्थ नामका पुरुषार्थ आता है इसके अन्दर अपने पिता और परिवार से मिली जायदाद को बढाना उसमे नये नये तरीकों से विकसित करना,उस जायदाद को संभालना किसी प्रकार से उस जायदाद को घटने नही देना,जायदाद अगर चल है तो उसे बढाने के प्रयत्न करना,रोजाना के कार्यों को करने के बाद अर्थ को सम्भालना अगर कोई कार्य पीछे से नही मिला है तो अपने बाहुबल से कार्यों को करना नौकरी पेशा और साधनो को खोजना जमा पूंजी का सही निस्तारण करना जो खर्च किया गया है उसे दुबारा से प्राप्त करने के लिये प्रयोग करना,खर्च करने से पहले सोचना कि जो खर्च किया जा रहा है उसकी एवज में कुछ वापस भी आयेगा या जो खर्च किया है वह मिट्टी हो जायेगा,फ़िर रोजाना के कामों के अन्दर लगातार इनकम आने के साधनो को बनाना और उन साधनों के अन्दर विद्या और धन के साथ अपनी बुद्धि का प्रयोग करना और लगातार इनकम को लेकर अपने परिवार की उन जरूरतों को पूरा करना जो हमेशा के लिये भलाई दें,अर्थ नामके पुरुषार्थ के बाद काम नामका पुरुषार्थ आता है,पुरुष के लिये स्त्री और स्त्री के लिये पुरुष का होना एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करने के लिये माना जाता है,जिस प्रकार से आपके माता पिता ने संतान की इच्छा करने के बाद आपके शरीर को उत्पन किया है उसी प्रकार से अपनी इच्छा करने के बाद नये शरीरों को उत्पन्न करना पितृ ऋण को उतारना भी कहा जाता है। संतान की इच्छा करने के बाद ही सहसवास करना,कारण जो अन्न या भोजन किया जाता है वह चालीस दिन की खुराक सही रूप से खाने के बाद एक बूंद वीर्य या रज का निर्माण करता है,अगर व्यक्ति अपनी कामेच्छा से या किसी आलतू फ़ालतू कारणों में जाकर प्यार मोहब्बत के नाम पर या स्त्री भोग या पुरुष भोग की इच्छा से अपने वीर्य या रज को समाप्त कर लेता है तो शरीर में कोई नया कारण वीर्य और रज जो उत्पन्न करने के लिये नही बनता है.शरीर के सूर्य को समाप्त कर लेने के बाद शरीर चेतना शून्य हो जाता है,शराब कबाब आदिके प्रयोग के बाद जो उत्तेजना आती है और उस उत्तेजना के बाद संभोग में रुचि ली जाती है वह शरीर में विभिन्न बीमारियों को पैदा करने के लिये काफ़ी माना जाता है।भारतीय पद्धति में शरीर में वीर्य और रज को पैदा करने वाले कारक भारत में भोजन के रूप में चावल और गेंहूं को अधिक मात्रा में खाया जाता है,चावल को खाने के बाद शरीर में कामोत्तेजना पुरुषों के अन्दर अधिक बढती है और गेंहूं को खाने के बाद स्त्रियों में कामोत्तेजना अधिक बढती है,लेकिन वीर्य को बधाने के लिये ज्वार पुरुषों के लिये और मैथी रज बढाने के लिये स्त्रियों में अधिक प्रभाव युक्त होती है.प्रकृति ने जो अनाजों का निर्माण किया है उनके अन्दर जो तस्वीर बनाई है वह भी समझने के लिये काफ़ी है,जैसे चने के अन्दर पुरुष जननेन्द्रिय का रूप स्पष्ट दिखाई देता है,इसे खाने से पुरुष की जननेन्द्रिय की वृद्धि और नितम्बों का विकास स्त्री जातकों में होता है। गेंहूं को अगर देखा जाये तो स्त्री जननेन्द्रिय का निशान प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है,सरसों के अन्दर खून के रवों का निशान पाया जाता है,मूंग के अन्दर खून की चलित कणिकाओं का रूप देखने को मिलता है आदि विचार सोच कर भोजन को करना चाहिये. सन्तान की इच्छा के समय चिन्ता मुक्त रहना भी जरूरी है मानसिक चिन्ता से शरीर की गति बेकार हो जाती है,नींद और भोजन का कोई समय नही रह पाता है,नींद नही आने से और भोजन को सही समय पर नही लेने से शरीर की रक्त वाहिनी शिरायें अपना कार्य सुचारु रूप से नही कर पाती है,दिमागी प्रेसर अधिक होने से मानसिक भावना सेक्स की तरफ़ नही जा पाती है,स्त्री और पुरुष दोनो के मामले में यह बात समान रूप से लागू होती है। खुशी का वारावरण भी सन्तान की प्राप्ति के लिये जरूरी है,माहौल के अनुसार ही संभोग करने के बाद जो संतान पैदा होता है,वह उसी प्रकार की संतान के लिये मानी जाती है,जैसा माहौल संभोग के समय में था। मित्रों अगर आप मुझसे ज्योतिष सीखना चाहते हैं या अपनी कुंडली दिखाना जब बनवाना चाहते हैं या अच्छी क्वालिटी के रतन लेना चाहते हैं तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं07597718725 09414481324 आचार्य राजेश

शनिवार, 3 जून 2017

आओ ज्योतिष सीखे ग्रुप से अध्याय 1 आज से शुरू करते हैं ज्योतिष सीखने की इच्छा अधिकतर लोगों में होती है। लेकिन उनके सामने समस्या यह होती है कि ज्योतिष की शुरूआत कहाँ से की जाये? कुछ जिज्ञासु मेहनत करके किसी ज्यातिषी को पढ़ाने के लिये राज़ी तो कर लेते हैं, लेकिन गुरूजी कुछ इस तरह ज्योतिष पढ़ाते हैं कि जिज्ञासु ज्योतिष सीखने की बजाय भाग खड़े होते हैं। बहुत से पढ़ाने वाले ज्योतिष की शुरुआत कुण्डली-निर्माण से करते हैं। ज़्यादातर जिज्ञासु कुण्डली-निर्माण की गणित से ही घबरा जाते हैं। वहीं बचे-खुचे “भयात/भभोत” जैसे मुश्किल शब्द सुनकर भाग खड़े होते हैं। अगर कुछ छोटी-छोटी बातों पर ग़ौर किया जाए, तो आसानी से ज्योतिष की गहराइयों में उतरा जा सकता है। ज्योतिष सीखने के इच्छुक नये विद्यार्थियों को कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए- शुरूआत में थोड़ा-थोड़ा पढ़ें। जब तक पहला पाठ समझ में न आये, दूसरे पाठ या पर न जायें। जो कुछ भी पढ़ें, उसे आत्मसात कर लें। बिना गुरू-आज्ञा या मार्गदर्शक की सलाह के अन्य ज्योतिष पुस्तकें न पढ़ें। शुरूआती दौर में कुण्डली-निर्माण की ओर ध्यान न लगायें, बल्कि कुण्डली के विश्लेषण पर ध्यान दें। शुरूआती दौर में अपने मित्रों और रिश्तेदारों से कुण्डलियाँ मांगे, उनका विश्लेषण करें। जहाँ तक हो सके हिन्दी के साथ-साथ ज्योतिष की अंग्रेज़ी की शब्दावली को भी समझें। अगर ज्योतिष सीखने के इच्छुक लोग उपर्युक्त बिन्दुओं को ध्यान में रखेंगे, तो वे जल्दी ही इस विषय पर अच्छी पकड़ बना सकते हैं। ज्‍योतिष के मुख्‍य दो विभाग हैं - गणित और फलित। गणित के अन्दर मुख्‍य रूप से जन्‍म कुण्‍डली बनाना आता है। इसमें समय और स्‍थान के हिसाब से ग्रहों की स्थिति की गणना की जाती है। दूसरी ओर, फलित विभाग में उन गणनाओं के आधार पर भविष्‍यफल बताया जाता है। इस शृंखला में हम ज्‍यो‍तिष के गणित वाले हिस्से की चर्चा बाद में करेंगे और पहले फलित ज्‍योतिष पर ध्यान लगाएंगे। किसी बच्चे के जन्म के समय अन्तरिक्ष में ग्रहों की स्थिति का एक नक्शा बनाकर रख लिया जाता है इस नक्शे केा जन्म कुण्डली कहते हैं। आजकल बाज़ार में बहुत-से कम्‍प्‍यूटर सॉफ़्टवेयर उपलब्‍ध हैं और उन्‍हे जन्‍म कुण्‍डली निर्माण और अन्‍य गणनाओं के लिए प्रयोग किया जा सकता है। पूरी ज्‍योतिष नौ ग्रहों, बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों और बारह भावों पर टिकी हुई है। सारे भविष्‍यफल का मूल आधार इनका आपस में संयोग है।अगर आप भ।मैं से कोई भी ज्योतिष सीखना चाहता है तो वह मुझसे संपर्क कर सकता हैफीस पुरे कोर्स की 2100है WhatsApp पर यह गरूप है 075977187250 9414481324

शुक्रवार, 2 जून 2017

राशिफल की वास्‍तविकता क्‍या है ?? जहां एक ओर ज्‍योतिष को बहुत ही सूक्ष्‍म तौर पर गणना करने वाला शास्‍त्र माना जाता है , वहीं दूसरी ओर पूरी जनसंख्‍या को 12 भागों में बांटकर उनकी राशि के आधार पर राशिफल के रूप में भविष्‍यवाणी करने का प्रचलन भी है। राशिफल के द्वारा दुनियाभर के लोगों को 12 भागों में बांटकर उनके बारे में भविष्‍यवाणी करने का प्रयास आमजनों को गुमराह करने के इलावा कुछ नहीं मेरे ख्याल सेराशिफल की शुरूआत उस वक्‍त की मानी जा सकती है , जब आम लोगों के पास उनके जन्‍म विवरण न हुआ करते हों पर अपने भविष्‍य के बारे में जानने की कुछ इच्‍छा रहती हो। पंडितो द्वारा रखे गए नाम में से उनकी राशि को समझ पाना आसान था, इसलिए ज्‍योतिषियों ने उनकी राशि के आधार पर गोचर के ग्रहों को देखते हुए भविष्‍यवाणी करने की परंपरा शुरू की हो। चूकि प्राचीन काल में अधिकांश लोगों की जन्‍मकुंडलियां नहीं हुआ करती थी , इसलिए राशिफल की लोकप्रियता निरंतर बढती गयी। गोचर तभी प्रभावशाली​ होगा जव आप अपनी जन्मतिथि के हिसाब से अपनी कुंडली वनाकरओर कुंडली के साथ गोचर को मिला कर भविष्य देखे ज्‍योतिष' मानता है कि भले ही किसी व्‍यक्ति के जन्‍मकालीन ग्रह उसके जीवन की एक रूप रेखा निश्चित कर देते हें , पर समय समय पर आनेवाले गोचर के ग्रह भी उसके दिलोदिमाग पर कम प्रभाव नहीं डालते - संभवतः परम्परागत ज्योतिष भी यही मानता है जन्‍मकुंडली को देखने से यह सटीक ढंग से कहा जा सकता है कि जातक के लिए कौन सी पंक्ति अधिक या कम प्रभावी होगी। इसके लिए इस बात को ध्‍यान में रखा जाता है कि गोचर के ग्रहों की खास स्थिति जातक की जन्‍मकुंडली के अनुकूल है या प्रतिकूल ?? - अर्थात केवल सूर्य राशि, चन्द्र राशि या लग्न राशि के आधार पर की गयी भविष्यवाणियों (जो पत्र पत्रिकाओं में छपती रहती हैं या टीवी पर वोली जाती है ) का बहुत अधिक महत्त्व नहीं है |आचार्य राजेश

गुरुवार, 1 जून 2017

आओ ज्योतिष सीखें ग्रुप से कुंडली में फ़लादेश करने के तरीके भारतीय ज्योतिष में जो फ़लादेश किया जाता है उसके लिये कई तरह के तरीके अपने अपने अनुसार अपनाये जाते है,लेकिन मै जो तरीका प्रयोग में लाता हूँ वह अपने प्रकार का है. राशि चक्र में गुरु जहाँ हो उसे लगन मानना जरूरी है कुंडली का विश्लेषण करते वक्त गुरु जहाँ भी विराजमान हो उसे लगन मानना ठीक रहता है,कारण गुरु ही जीव का कारक है और गुरु का स्थान ही बता देता है कि व्यक्ति की औकात क्या है,इसके साथ ही गुरु की डिग्री भी देखनी जरूरी है,गुरु अगर कम या बहुत ही अधिक डिग्री का है तो उसका फ़ल अलग अलग प्रकार से होगा,उदाहरण के लिये कन्या लगन की कुण्डली है और गुर मीन राशि में सप्तम में विराजमान है तो फ़लादेश करते वक्त गुरु की मीन राशि को लगन मानकर गुरु को लगन में स्थापित कर लेंगे,और फ़लादेश गुरु की चाल के अनुसार करने लगेंगे। ग्रहों की दिशाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है कालचक्र के अनुसार राशियों के अनुसार दिशायें भी बताई जाती है,जैसे मेष सिंह और धनु को पूर्व दिशा की कारक और मिथुन तुला तथा कुम्भ को पश्चिम दिशा की कारक वृष कन्या और मकर को दक्षिण दिशा की कारक तथा कर्क वृश्चिक और मीन को उत्तर दिशा की कारक राशियों में माना जाता है। इन राशियों में स्थापित ग्रहों के बल और उनके द्वारा दिये गये प्रभाव को अधिक ध्यान में रखना पडेगा। ग्रहों की द्रिष्टि का ध्यान रखना जरूरी है ग्रह अपने से सप्तम स्थान को देखता है,यह सभी शास्त्रों में प्रचिलित है,साथ ग्रह अपने से चौथे भाव को अपनी द्रिष्टि से शासित रखता है और ग्रह अपने से दसवें भाव के लिये कार्य करता है,लेकिन सप्तम के भाव और ग्रह से ग्रह का जूझना जीवन भर होता है,इसके साथ ही शनि और राहु केतु के लिये बहुत जरूरी है कि वह अपने अनुसार वक्री में दिमागी बल और मार्गी में शरीर बल का प्रयोग जरूर करवायेंगे,लेकिन जन्म का वक्री गोचर में वक्री होने पर तकलीफ़ देने वाला ग्रह माना जायेगा. ग्रहों का कारकत्व भी समझना जरूरी है ग्रह की परिभाषा के अनुसार तथा उसके भाव के अनुसार उसका रूप समझना बहुत जरूरी होता है,जैसे शनि वक्री होकर अगर अष्टम में अपना स्थान लेगा तो वह बजाय बुद्धू के बहुत ही चालाक हो जायेगा,और गुरु जो भाग्य का कारक है वह अगर भाग्य भाव में जाकर बक्री हो जायेगा तो वह जल्दबाजी के कारण सभी तरह के भाग्य को समाप्त कर देगा और आगे की पुत्र संतान को भी नही देगा जिससे आने वाले वंश की क्षति का कारक भी माना जायेगा. जन्म के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनायें होती है जन्म के समय के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनाओं को बताने के लिये माना जाता है,अगर शनि जन्म से लगन में है और गोचर से शनि कर्म भाव में आता है तो खुद के कर्मों से ही कार्यों को अन्धेरे में और ठंडे बस्ते मे लेकर चला जायेगा। इसके बाद लगन का राहु गोचर से गुरु को अष्टम में देखता है तो जीवन को बर्फ़ में लगाने के लिये मुख्य माना जायेगा,जीव का किसी न किसी प्रकार की धुंआ तो निकलना ही है। गुरु के आगे और पीछे के ग्रह भी अपना अपना असर देते है गुरु के पीछे के ग्रह गुरु को बल देते है और आगे के ग्रहों को गुरु बल देता है,जैसी सहायता गुरु को पीछे से मिलती है वैसी ही सहायता गुरु आगे के ग्रहो को देना शुरु कर देता है,यही हाल गोचर से भी देखा जाता है,गुरु के पीछे अगर मंगल और गुरु के आगे बुध है तो गुरु मंगल से पराक्रम लेकर बुध को देना शुरु कर देगा,अगर मंगल धर्म मय है तो बुध को धर्म की परिभाषा देना शुरु कर देगा और और अगर मंगल बद है तो गाली की भाषा देना शुरु कर देगा,गुरु के पीछे शनि है तो जातक को घर में नही रहने देगा और गुरु के आगे शनि है तो गुरु घर बाहर निकलने में ही डरेगा। शनि चन्द्रमा की युति जन्म की साढेशाती शनि और चन्द्रमा का कुंडली में कही भी योगात्मक प्रभाव है तो जन्म से ही साढेशाती का समय माना जाता है,इस युति का सीधा सा प्रभाव है कि जातक अपने अनुसार काम कभी नही कर पायेगा,उसे स्वतत्र काम करने में दिक्कत होगी उसे खूब बता दिया जाये कि वह इस प्रकार से रास्ता पकड कर चले जाना लेकिन वह कहीं पर अपने रास्ते को जरूर भूल जायेगा,इसलिये कुंडली में गुरु के साथ चन्द्रमा की स्थिति भी देखनी जरूरी होती है,वैसे चन्द्रमा को माता का कारक भी मानते है,लेकिन अलग अलग भावों में चन्द्रमा का अलग अलग रूप बन जाता है,जैसे धन भाव में चन्द्रमा कुटुम्ब की माता,तीसरे भाव में चन्द्रमा पिता के बिना नही रहने वाली माता चौथे भाव में चन्द्रमा से बचपन के सभी कष्टों को दूर करने वाली माता,पंचम स्थान से स्कूल की अध्यापिका माता,छठे भाव में मौसी भी मानी जाती है और चाची भी मानी जाती है,सप्तम में माता के रहते पत्नी या पति के लिये विनासकारी माता,अष्टम में माता का स्थान ताई की नही बनेगी,नवे भाव में दादी का रूप यह चन्द्रमा ले लेता है,दसवें भाव में पिता से परित्याग की गयी माता,और ग्यारहवे भाव में जब तक स्वार्थ पूरा नही होता है तब तक की माता और बारहवें भाव में जन्म के बाद भूल जाने वाली माता के रूप में माना जाता है,इस चन्द्रमा के साथ जहां भी शनि होगा जातक के लिये वही स्थान फ़्रीज करने के लिये काफ़ी माना जायेगा। कुंडली का सूर्य पिता की स्थिति को बयान करता है गुरु को जीव की उपाधि दी गयी है तो सूर्य को पिता की उपाधि दी गयी है,उसी सूर्य को बाद में पुत्र की उपाधि से विभूषित किया गया है,लेकिन पिता के लिये नवा भाव ही देखना बेहतर तरीका होता है और पिता के ऊपर आने वाले कष्टों के लिये कुंडली के चौथे भाव में जब भी कोई क्रूर ग्रह गोचर करेगा या शनिका गोचर होगा पिता के लिये कष्ट का समय माना जायेगा। इसके अलावा राहु का गोचर पिता के लिये असावधानी से कोई दुर्घटना और केतु के गोचर से अचानक सांस वाली बीमारी या सांस की रुकावट वाली बीमारी को माना जायेगा,चन्द्रमा से जल से भय और मंगल से वाहन या अस्पताल या पुलिस से भय माना जायेगा। सूर्य और गुरु की युति से पिता पुत्र का एक जैसा हाल होगा,और जातक को जीवात्मा की उपाधि दी जायेगी,साथ ही अगर धर्म के भाव में स्थापित है तो ईश्वर अंश से अवतार माना जायेगा। राहु सूर्य और गुरु का साथ पुराने पूर्वज के रूप में जातक का जन्म माना जायेगा,और गुरु से तीन भाव पहले की राशि के काम करने के लिये जातक को वापस अपने परिवार में आने को माना जायेगा। सूर्य शुक्र का साथ बलकारी पिता और जातक के लिये भी बलकारी योग का रूप देगा,इसके अन्दर कितनी ही बलवान स्त्री क्यों न हो लेकिन जातक के वीर्य को अपनी कोख बडी मुश्किल से धारण कर पायेगी,जैसे ही पुत्र संतान का योग आयेगा,जातक की पत्नी किसी न किसी कारण से मिस कैरिज जैसे कारण पैदा कर देगी,लेकिन जैसे ही सूर्य का समय समाप्त होगा जातक के एक पुत्र की उत्पत्ति होगी। इसी प्रकार से सूर्य और चन्द्र का साथ जातक के जीवन में अमावस्या का योग पैदा करता है। जातक के बचपन में माता को पिता के कारणों से फ़ुर्सत ही नही मिल पायेगी,जो वह जातक का ध्यान रख सके। इसी तरह से चन्द्रमा और सूर्य का आमना सामना जातक के जीवन में पूर्णिमा का योग पैदा करेगा,जातक को छोड कर माता का दूर जाना कैसे भी सम्भव नही है और माता के लगातार साथ रहने के कारण जातक को किसी भी कष्ट का अनुभव नही होगा लेकिन वह अपने जीवन में माता जैसा सभी को समझने पर छला जरूर जायेगा,यहां तक कि उसकी शादी के बाद भी लोग उसे छलना नही छोडेंगे,उसकी पत्नी भी उसके साथ भावनाओं में छल करके उससे लाभ लेकर अपने मित्रों को देती रहेगी या अपने परिवार की भलाई का काम सोचती रहेगी अगर आप को नहीं दिखाना चाहते हैं या बनवाना चाहते हैं यहां ज्योति सीखना चाहते हैं तो हमारे नंबरों पर संपर्क करें 0759771872509414481324 आचार्य राजेश

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...