शनिवार, 27 जनवरी 2018

पेट रोग ओर ज्योतिष मे उपाय

मित्रों आज एक कुंडली पर चर्चा करते हैयदि जातक बचपन से रोगी हो जाये, तो यह उसके पूर्व जन्म का ही
फल होता हैं मनुष्य बुरे कर्म जानकर या अनजाने में करता है "बोया प्रैड़ बबूल का आम कहौं से खाये ।" फिर उसका नया ज़न्म होता है संसार मे जन्म लेकर आते ही रोग उसे दबोच लेते हैं l ऐसो ही यह कहानी है I लग्न में मंगल स्थित है । मंगल अष्टमेश है । खरबूजा चाकू पर गिरे श चाकू खरबूजे पर, कटता खरबूजा ही है । यहां चाकू (अष्टमेश) लग्न ने हैं; वक्री शनि, जो पंचमेश है, वह पंचम भाव, जो पेट का होता है, उसमे रोग होने का संकेत करता है i केतु 4-25 की दूष्टि सूर्य 3-50, बुध  व शुक्र 3-52 धर है राहु क्री दृष्टि पंचमेश शनि तथा चन्द्रमा पर है t नवांश में केतु सूर्य व शुक्र के साथ हैं राहु चन्द्र तथा बुध के साथ है  इस कारण इसका बचपन से पेट ख्याल रहता  राहु की विशेष कृपा कै कारण हमेशा पेट की पीड़ा कै क्या उससे प्तम्बन्धित दवायें खानी पडती हैं I इस प्रकार गत 10 वर्षो से पेट की पीडा जाने का नाम ही नहीं ले रही  सभी  औषधियों के सेवन से
तंग आकर इसका परिवार ंमिला  तब उन्हें ये उपाय  वता दिया गया
200 पूडियां तथा आलू की सब्जी प्रति सप्ताह गरीबो क्रो दान करें । ओर 2 किलो सूजी का हलवा प्रति सप्ताह बांटे। 3.100 मौसमी प्रति सप्ताह दान करे ।  कुछ और  उपाय करवाये
इसके अतिरिक्त भोजन में उन्हें पपीता खाने का परामर्श दिया गया
साथ ही हवन यज विशेष ओषघ युक्त  सामग्री से  करने के लिए कहा गया  जैसे ही पूर्व जन्म के ऋण क्री वापसी हो गई यह वच्चा बिना औषधि के दो मास मेँ स्वस्थ हो गया

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गुरुवार, 25 जनवरी 2018

राहु ओर रोग

: राहु एक छाया ग्रह है,जिसे चन्द्रमा का उत्तरी ध्रुव भी कहा जाता है,इस छाया ग्रह के कारण अन्य ग्रहों से आने वाली रश्मियां पृथ्वी पर नही आ पाती है,और जिस ग्रह की रश्मियां पृथ्वी पर नही आ पाती हैं,उनके अभाव में पृथ्वी पर तरह के उत्पात होने चालू हो जाते है,यह छाया ग्रह चिंता का कारक ग्रह कहा जाता है इस तरह राहु रोग निर्धारण मे वाघ खड़ी करता हैयह अदृश्य ग्रह है  इस के कारण ही इसे ‘मूत-पिशाच, गुप्त भेद, गुप्त मन्त्रणा, धोखेबाजी आदि का कारक माना जात्ता है I यह पेट के कीडों का भी कारक है विद्युत तरंगें तथा वायुमण्डल की अन्य तरंगें दृष्टिगोचर नहीं होती  तथापि उनका प्रभाव सर्वविदित है t अदृश्य तरंगो द्वारा किसी भी व्यथित के शरीर के भीतर विद्यमान रोग का पता चलाना आज आम वात  हो गयी है  यदि हम सूर्य किरणों की ओर ध्यान दे, तो दो किरणे, जो दृष्टिगोचर नहीं ढोती, उनका प्रभाव काफी समय से सिद्ध किया जा चुका है  तूर्य की साक्ष किरणों और आकाशीय ग्रहों का परस्पर क्यद्ध सम्बन्थ है और इस रहस्यमय ज्ञान से कैसे लाभ उठाया जा सकता है
हिंन्दू धर्म के अनुसार सूर्य के रथ में सात घोड़े हैं  इन्हीं सात घोडों पर अन्वेषण न्यूटन ने अपनी पुस्तक में किया और नोवल पुरस्कार प्राप्त किया । न्यूटन के अनुसार यदि हम सूर्य प्रकाश के स्पैवट्रम की और ध्यान दें, तो दो रंग, अवरक्त तथा पराबैगनी, अदृश्य होने के कारण नहीं देखे जा सकते किन्तु अवरक्त फोटोग्राफी तथा अदृश्य किरणों द्वारा व्यक्ति के शरीर के भीतरी मार्गों का फोटो लेना इन्हीं किरणो द्वारा सम्भव हे i सूर्य-किरण पद्धति के अनुसार, जो मी वस्तु जिस रंग की होती है; वह अन्य रंगीं को अपने मे सोख लेती है, लेकिन उस  रंग क्रो वापस करती है, जिस रंग की वह होती है l वह रंग हमारी ओर जाता है और हम उस
वस्तु का वही रंग मानते हैं  इस प्रणग्लो का ध्यान रखने हुए,किरणो का अध्ययन करे तो जब व्यक्ति की राहु की  कैतु की दशअन्तर दशा -प्रयन्तरदशा चल रही हो तो उस समय उस्नकै शरीर में राहु या कैतु की अट्टश्य किरणे पेहले सै ही ऐविद्यमान होती हैं, तथा  क्षरश्मि (X-I'ays) की अट्टश्य किरणों की वापिस कर देती हैं I अता  क्षरशि्म द्वारा खींचा क्या फोटो शरीर कै अन्दर‘की ठीक वस्तुस्थिति क्रो नहीं बता पाता और हमारी चिकित्सा प्रणाली कहती  है कि क्षरिश्म द्वारा प्राप्त फोटो में सभी कुछ ठीक है I लेकिन यदि सभी कुछ सामान्य है, तो फिर… व्यक्ति रुग्ग क्यों? यही स्थिति अन्य परीक्षणों की भी  होती है I अत यदि राहु  कैतु की अन्तर्दशा  प्रत्यन्तर्दशा चल  रही हो, तो उस समय सभी परीक्षण सही वस्तुस्थिति नहीं दर्शाते, और व्यक्ति कै रोग का निदान नहीं हो पाता ऐसी अवस्था में
ऐसै समय में न तो मन्त्र ही प्रभाक्शाली होते हैं, और न किसी भी दिव्यात्मा कै द्वारा दिया क्या आशीर्वाद ही काम करता है यांदे वह व्यक्ति स्वयं ही दिव्यात्मा हो, तो उसका दिया हुआ शाप भी काम नहीं करता है राहु की दशा में मंत्र जप भी निष्कलं अनुभव होता है । ऐसा क्यो होता है ? ऐसा इसलिए होता हैं, कि जब मन्त्र का जप करते है, तो उस समय मन्त्र ध्वनि से विशेष किरणे बनती हैं, और वे कार्य सिद्धि के लिए
आगे बढती हैं, लेकिन वे किरणे राहु की किरणों से टकराती हैं ओंर
निष्किथ ही जाती हैं I राहु की अन्तर्दशा में यह होता रहता है, और उस
समय उपाय का लाभ इसीलिए प्रतीत नहीं होता है  वास्तव में मन्त्र तो .
राहु एवं रोग निर्धारण में त्रुटि अपना कार्य कर ही रहा होता है  मन्त्र जप न करने क्री स्थिति मे जो और भी हानि होती, उसका सही अनुमान लगाना सम्भव नहीं हो पाता 1968 मेँ गैस्टन और मेनाकर ने एक निबन्ध प्रकाशित किया, जिसमे उन्होंने पीनियल ग्रंथि को फोटोरिसेप्टर (प्रकाश संवेदी केन्द्र) के रूप में सिद्ध किया  यह खोज मानवीय मस्तिष्क में पीनियल नामक महत्त्वपूर्ण ग्रंथि के बिषय में थी  पीनियल ग्रंथि का प्रकाश से सम्बन्ध हैं 1 बिकान्सिन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एचएस. स्सीडर ने अपने अनुसंधान के द्वारा बताया, कि रोशनी का पीनियल पर प्रभाव पड़ता है  पीनियल ग्रंथि से एक हॉर्मोन निकलता है, जो सिरोटोनिन कहलाता हे  मन्द और शीतल प्रकाश में खाव की मात्रा अधिक होती हे  इसी कारण गीता में कहा गया हैं -या निशा सर्वभूतानामू त्तस्याम जाग्रति संयमी' ' -अर्थात् जिस समय संसार सो रखा होगा  उस रात्रि के समय में योगी पुरुष जागते रहते है और साधना में संलग्न रहते हैं I क्योकि अरात्रि मे क्री गई उपासना मे सिंरोटोनिन का स्राव अथिक होता है, और योगी पुरुष रात्रि क्रो ही उपासना करतेहै  तीत्मा प्रकाश में इस रस का स्राव कम हो जाता है . जिस प्रकार माचिस की तीली में अग्नि रहती है, लेकिन रगढ़ने पर ही वह प्राप्त होती हे I इस्री प्रकार पीनियल ग्रंथि में दिव्य शक्तियां हैं, लेकिन अंधकार में अभ्यास से ही वे प्राप्त हो सकती हैं ।
परोक्ष दर्शन क्री यह प्रक्रिया एक्स और गामा किरणों की तरह होती है I 'एक्स-किरण जिस प्रकार शरीर की भीतरी संरचना तथा गामा किरण  इस्पप्ल जेसी कठोर वस्तु की आन्तरिक बनावट का भी भेद खोल देती हैं, इसी प्रकार पीनियल ग्रथि को रश्मियों के माध्यम से सामने बैठे व्यक्ति के बिषय मे कुछ भी बताया जा सकता है I वृक्षों में भी सिरोटोनिन से मिलतान्तुलता एक स्राव 'मिलटोनिन' पाया जाता हैं  यह हार्मोन क्ले, पीपल तथा बरगद जैसे पेडों मे स्वाभाविक मात्रा मे माया जाता है ।इस लिए धार्मिक कार्यो तथा विवाह के समय क्ले के तने और पत्तों का प्राय: प्रयोग किया जाता था I पीपल के वृक्ष को मी इसीलिए पवित्र मानते हैं । गीता में श्रीकृष्ण ने पैडो मे स्वयं क्रो अश्वत्थ्व(पीफ्त) बताया है I स्मरण रहे, कि पीनियल ग्रंथि आज्ञा चक्र के घास होती है I आज इतना ही वाकी अगले लेख में आचार्य राजेश


शनिवार, 20 जनवरी 2018

वात ज्योतिष की

भारतीय वैदिक ज्योतिष मूलरूप से नक्षत्र आधारित है कारण जब बालक का जन्म होता है तो सर्वप्रथम नक्षत्र के आधार पर उसके शुभ अशुभ का ज्ञान किया जाता ही फिर उसके अन्य संश्कारो के निर्धारण के लिए नक्षत्र के आधार पर ही मुहूर्त देखा जाता है कहा जाता है कि ग्रह से बडा नक्षत्र होता है और नक्षत्र से भी बडा नक्षत्र का चरण जब विवाह कि बात आती है तो वर बधू का मेलापक भी नक्षत्र के आधार पर ही किया जाता है जब भी किसी शुभ कार्य के लिए मुहूर्त का निर्धारण करना होता है तब भी नक्षत्रों को ही प्राथमिकता प्रदान की जाती है कुंडली में भविष्य के फलादेश के लिए भी सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली विंशोत्तरी दशा का निर्धारण भी नक्षत्रों के आधार पर ही होता है  फिर फलादेश के लिए नक्षत्रों का प्रयोग क्यों नहीं !तिष जगत में आज नक्षत्रों का चलन सिर्फ मुहूर्त निर्धारण तक ही सीमित हो गया है, ज्योतिषी राशियों के आधार पर ही फलादेश कर रहे है नतीजा फ़लादेश असफल हो रहे हैंज्‍योतिष की किताबों में आपको ग्रहों, राशियों और भावों के बारे में विस्‍तार से जानकारी मिल जाएगी। इससे अधिक देखने पर हम पाते हैं कि राशियों को नक्षत्रों के अनुसार विशिष्‍टता दी गई है। चंद्रमा भी नक्षत्रों पर से गुजरते हुए हमें रोज के बदलावों की जानकारी देता है। ज्‍योतिष की प्राचीन और नई पुस्‍तकों में यह तो दिया गया है कि अमुक नक्षत्र में चंद्रमा के विचरण का फलां फल है, लेकिन कहीं यह नहीं बताया गया है कि नक्षत्र का नैसर्गिक स्‍वभाव क्‍या है या उस पर किसी ग्रह के स्‍वामित्‍व का वास्‍तविक अर्थ क्‍या है।
पाराशर ऋषि ने नक्षत्र चार के आधार पर ही दशाओं का विभाजन किया लेकिन नक्षत्रों के बारे में विस्‍तार से जानकारी नहीं दी। इसी तरह प्रोफेसर केएस कृष्‍णामूर्ति ने केवल चंद्रमा के नक्षत्र चार से बाहर आकर हर भाव और ग्रह के नक्षत्रों तक उतरकर विशद् विश्‍लेषण पेश किया, लेकिन उन्‍होंने ने भी कहीं नक्षत्रों की निजी विशिष्‍टताओं के बारे में स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है। जबकि वृहत्त संहिता और दूसरी एकाध प्राचीन पुस्‍तक में नक्षत्रों के स्‍वरूप का वर्णन तक मिलता है। इन नक्षत्रों के स्‍वरूप के आधार पर ही उनके गुण भी बताए गए हैं। जब नक्षत्र के बारे में इतनी सटीक जानकारी उपलब्‍ध है तो उनके निजी या एकांगिक गुणों के बारे में कहीं स्‍पष्‍ट नहीं किया जाना कुछ खल जाता है। नक्षत्रों में विचरण को दौरान अगर चंद्रमा के स्‍वभाव में नियमित रूप से परिवर्तन आता है तो क्‍या अन्‍य ग्रहों पर भी ऐसे प्रभाव का अध्‍ययन जरूरी नहीं है।पहले पता करते हैं कि नक्षत्र हैं क्‍या?
हमने देखा कि बारह राशियां भचक्र के 360 डिग्री को बराबर भागों में बांटती हैं। इस तरह आकाश के हमने बारह बराबर टुकड़े कर दिए। तारों का एक समूह मिलकर नक्षत्र बनाता है। ऐसे सत्‍ताईस नक्षत्रों की पहचान की गई है। इससे आ खाकाश को बराबर भागों में बांटा गया है। हर नक्षत्र के हिस्‍से में आकाश का 13 डिग्री 20 मिनट भाग आता है। जब हम चंद्रमा के दैनिक गति की बात करते हैं कि इसमें नक्षत्रों की विशेष भूमिका होती है। राशि वही हो और नक्षत्र बदल जाए तो चंद्रमा का स्‍वभाव भी बदल जाता है। इसी तरह हर ग्रह के स्‍वभाव में भी नक्षत्र चार के दौरान बदलाव आता है। चूंकि नक्षत्रों का स्‍वामित्‍व ग्रहों को ही दिया गया है। ऐसे में स्‍वभाव में परिवर्तन भी ग्रहों के अनुसार ही मान लिया जाता है। जबकि हकीकत में यह नक्षत्र की नैसर्गिक प्रवृत्ति के अनुसार होना चाहिए।अव आप देख सकते हैं राशि फल कहा सही वैठता है


शनिवार, 6 जनवरी 2018

सैकड़ों ज्योतिष के बीच योग्य ज्योतिष को पहचानेंगे कैसे ?

सैकड़ों ज्योतिष के बीच योग्य ज्योतिष को पहचानेंगे कैसे ?सबसे पहले तो आप यह मानना बंद कर दें कि टीवी पर आधे-आधे घंटे का प्रोग्राम देने वाला या ग्लैमरस स्टूडियो में इंटरव्यू देने वाला सभी ज्योतिष ज्योतिषीय ज्ञान से समृद्ध हैं। इनमें से कुछ सही हो सकते हैं तो कुछ गलत भी। इसलिए ग्लैमरस टीवी स्क्रिन पर दिखने वाले या प्राचरित होने वाले सभी ज्योतिषों पर भरोसा न करें। उसी ज्योतिष के पास जायें जिनकों आप पहले से जानते हैं या पहले परख चुके हैं, अथवा आपके किसी परिचित, मित्र या रिश्तेदारों ने जिन्हें आजमा रखा है। जिस ज्योतिष से आपको या आपके परिचितों और रिश्तेदारों को पहले लाभ मिल चुका है।
उस ज्योतिष पर आप आंख मूंदकर कभी भरोसा न करें जो आपके कुंडली वांचते हुए यह कह रहा हो कि पहले आपके साथ ऐसा होना चाहिए था या यह कहे कि आपके साथ पहले ऐसा हुआ होगा। ज्ञान से समृद्ध और जानकर ज्योतिष स्पष्ट शब्दों में आपके भूत काल की विवेचना करते हुए कहेगा कि आपके साथ ऐसा ही हुआ होगा। ध्यान रहे योग्य ज्योतिष के लिए अगर-मगर किन्तु-परंतु की कोई जगह नहीं होती। पहले और भविष्य की घटनाओं को वह पूरे आत्मविश्वास के साथ कनफर्म करता है। द्विअर्थो संवाद में भविष्य वाचने वाले और आपको ही कन्फ्यूज करने वाले ज्योतिष से आप सावधान रहें। जरा सा भी संदेह होने पर पहले अपनी गलत कुंडली की विवेचना करावें। जो कुंडली आपकी नहीं हो उसे अपनी कुंडली बताकर ज्योतिष महोदय के सामने प्रस्तुत करें। अगर वह वाकई सही और ज्ञानी ज्योतिष हैं तो कुंडली वाचने के पहले ही एक या दो सवाल कर आपकी कुंडली जांच कर उसे गलत करार देंगे और आपकी सही कुंडली बना देंगे या आपको सही कुंडली लाने की सलाह देंगे।दरअसल आपकी सही कुंडली देखते ही कोई भी योग्य ज्योतिष आपका ‘नेचर और फीचर’ बड़ी आसानी से तुरंत बता सकता है। यहां तक की आपकी लंबाई, आपका रंग आपके चेहरे की बनावट के बारे में भी आपकी कुंडली देख कमोवेश सही-सही बताया जा सकता है। अगर कोई ज्योतिष आपकी कुंडली चेक किये बिना या कनफर्म किये बिना भी फलित की विवेचना करता है या उपाये बताता है या उपाये के नाम पर पैसा वसूली की कोशिश करता है तो भी आपको सावधान होने की जरूरत है।
अगर आप ज्योतिषीय सलाह ले रहें हैं या कुंडली की विवेचना करवां रहे हैं तो आप ज्योतिषीय उपाये कहीं भी करने या कराने के लिए स्वतंत्र हैं। याद रहे ज्योतिषीय ज्ञान एक अलग चीज है और उपाय के लिए कर्मकांड एक अलग चीज। दोनों में विशेषज्ञता हासिल करना एक टेढ़ी खीर है। इसलिए कोई एक व्यक्ति दोनों में विशेषज्ञ हो यह जरूरी नहीं है हां, कोई-कोई महापुरुष ऐसे हो सकते हैं।
आज ज्योतिषों की भीड़ में ठगे जाने की आशंका ज्यादा बढ़ गई है। इसलिए जरूरी है कि आप परख कर ही किसी से ज्योतिषीय सलाह लें। नहीं तो अच्छा होने की जगह बुरा भी हो सकता है

सोमवार, 1 जनवरी 2018

नमस्कार करना हमारी संस्कृति का प्रतीक है, हिंदुस्तानियों की पहचान बना 'नमस्कार' केवल एक परंपरा ही नहीं बल्कि इसके कई भौतिक और वैज्ञानिक फायदे हैं।जिनके बारे में आप में से बहुत कम लोग जानते होंगे।हमारे देश ने नमस्कार का अद्भुत ढंग निकाला।‍ दुनिया मैं वैसा कहीं भी नहीं है। भारत देश ने कुछ दान दिया है मनुष्‍य की चेतना को, अपूर्व। यह देश अकेला है जब दो व्‍यक्ति नमस्‍कार करते है, तो दो काम करते है। एक तो दोनों हाथ जोड़ते है। दो हाथ जोड़ने का मतलब होता है: दो नहीं एक। दो हाथ दुई के प्रतीक है, द्वैत के प्रतीक है। उन दोनों को हाथ जोड़ने का मतलब होता है, दो नहीं एक है। उस एक का ही स्‍मरण दिलाने के लिए।हाथों को अनाहत चक पर रखा जाता है, आँखें बंद की जाती हैं और सिर को झुकाया जाता दोनों हाथों को जोड़ कर नमस्‍कार करते है। और, दोनों को जोड़ कर जो शब्‍द उपयोग करते है। वह परमात्‍मा का स्‍मरण होता है। कहते है: राम-राम, जयराम, या कुछ भी, लेकिन वह परमात्‍मा का नाम होता है। दो को जोड़ा कि परमात्‍मा का नाम उठा। दुई गई कि परमात्‍मा आया। दो हाथ जुड़े और एक हुए कि फिर बचा क्‍या: हे राम।

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

संकल्प की शक्ति

                            बहुत समय पहले की बात है. जापान में एक युवा समुराई रहता था जो अपनी मंगेतर से बहुत प्रेम करता था. एक दिन जब उसकी मंगेतर जंगल से गुज़र रही थी, तब एक आदमखोर बाघ ने उसपर प्राणघातक हमला कर दिया. समुराई ने अपनी प्रेयसी को बचाने के भरसक प्रयास किए उसकी मृत्यु हो गई.
दुःख में आकंठ डूबे समुराई ने यह संकल्प लिया कि वह अपनी प्रिया की असमय मृत्यु का प्रतिशोध लेगा और उस बाघ को खोजकर खत्म कर देगा.
इस प्रकार समुराई अपने धनुष-बाण लेकर गहरे जंगल में चला गया और बहुत लंबे समय तक उस बाघ की खोज करता रहा. एक दिन उसे वह एक बाघ कुछ दूरी पर सोता दिखाई दिया. समुराई उसे देखकर समझ गया कि उसी बाघ ने उसकी प्रेयसी के प्राण लिए थे.
उसने अपना धनुष उठाया और निशाना लगाकर बाण छोड़ दिया. बाण बिजली की गति से छूटकर बाघ के शरीर को भेद गया. प्रत्यंचा पर दूसरा बाण चढ़ाकर वह बाघ की मृत्यु सुनिश्चित करने के लिए सतर्कतापूर्वक उसकी ओर बढ़ा… लेकिन वह यह देखकर अचंभित था कि उसके तीर ने किसी बाघ को नहीं बल्कि उसके जैसे दिखनेवाले धारीदार पत्थर को भेद दिया था!
इस घटना का बाद गांव में हर ओर उसकी धनुर्विद्या की चर्चा थी… कि उसने किस तरह एक पत्थर को तीर से भेद दिया, और लोग उसकी परीक्षा लेना चाहते थे.
लेकिन अनेक बार प्रयास करने के बाद भी समुराई के तीर चट्टानों और पत्थरों से टकराकर टूटते रहे. वह उन्हें भेदने का करिश्मा दुहरा नहीं सका.
क्योंकि इस बार समुराई जानता था कि वह पत्थर पर तीर चला रहा है. विगत में उसका संकल्प इतना गहन था कि वह वास्तव में पत्थर को तीर से भेद सका. परिस्तिथियों के बदलते ही उसका अद्भुत कौशल लुप्त हो गया.


शनिवार, 2 दिसंबर 2017

मल मास का वैज्ञानिक रहस्य

आचार्य राजेश

ईस बार मलमास 15 दिसंबर से आरंभ हो रहा है जो 14 जनवरी 2018तक रहेगा। मलमास के चलते दिसंबर के महीने में अब केवल 5 दिन और विवाह मुहूर्त रहेंगे जो कि 8, 9,12,13 व 14 दिसंबर है। इसके बाद अगले महीने 23 जनवरी के बाद ही शादियां होंगी। 15 दिसंबर को ग्रहों का राजा सूर्य रात 8:53 पर धनु राशि में प्रवेश करेगा। इसी के साथ मलमास प्रारंभ हो जाएगा। मलमास प्रारंभ होते ही सभी प्रकार के शुभकार्य मसलन शादी-विवाह, मुंडन, जनेऊ, गृह प्रवेश जैसे कार्यों पर रोक लग जाएगी। 15 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही मलमास समाप्त हो जाएगा और शुभ कार्य पुनः आरंभ हो जाएंगे। हालांकि 15 से 22 जनवरी के बीच शादियों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं होने के कारण शहनाईयों की गूंज 23 जनवरी से ही सुनाई देगी।भारतीय ज्योतिष गणनाओं के आधार पर मलमास अधिक मास या तेरहवें मास के रूप में वर्णित है। सूर्य 12 राशियों में साल भर भ्रमण करते हैं, इसी क्रम में 32 महीना 16 दिन 4 घड़ी के बाद सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती है। जिस माह में सूर्य की संक्रांति नहीं होती है वह मलमास, अधिक मास कहलाता है। यानि लगभग हर तीन वर्ष बाद मलमास पड़ता है.
मान्यता है कि मलमास का वर्ष 396 दिन का होता है, जबकि अन्य वर्ष 365 दिन 5 घंटे 45 मिनट और 12 सैकंड का होता है। धर्माचार्यों के अनुसार भारत में मलमास में केवल राजगीर ही पवित्र रहता है इसीलिए इस अवधि में राजगीर में तैंतीस कोटिदेवी-देवता निवास करते हैं।
इस अवधि में शादी-विवाह, मुंडन, उपनयन आदि को छोड़कर सभी तरह के शुभ कार्य केवल राजगीर में ही होते हैं। आखिर खर मास में क्यों नहीं होते वैवाहिक शुभ कार्य 
इस जगत की आत्मा का केंद्र सूर्य है। बृहस्पति की किरणें अध्यात्म नीति व अनुशासन की ओर प्रेरित करती हैं। लेकिन एक-दूसरे की राशि में आने से समर्पण व लगाव की अपेक्षा त्याग, छोड़ने जैसी भूमिका अधिक देती है। उद्देश्य व निर्धारित लक्ष्य में असफलताएं देती हैं। जब विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ आदि करना है तो उसका आकर्षण कैसे बन पाएगा? क्योंकि बृहस्पति और सूर्य दोनों ऐसे ग्रह हैं जिनमें व्यापक समानता हैं।
सूर्य की तरह यह भी हाइड्रोजन और हीलियम की उपस्थिति से बना हुआ है। सूर्य की तरह इसका केंद्र भी द्रव्य से भरा है, जिसमें अधिकतर हाइड्रोजन ही है जबकि दूसरे ग्रहों का केंद्र ठोस है। इसका भार सौर मंडल के सभी ग्रहों के सम्मिलित भार से भी अधिक है। यदि यह थोड़ा और बड़ा होता तो दूसरा सूर्य बन गया होता। पृथ्वी से 15 करोड़ किलोमीटर दूर सूर्य तथा 64 करोड़ किलोमीटर दूर बृहस्पति वर्ष में एक बार ऐसे जमाव में आते हैं कि सौर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के माध्यम से बृहस्पति के कण काफी मात्रा में पृथ्वी के वायुमंडल में पहुँचते हैं, जो एक-दूसरे की राशि में आकर अपनी किरणों को आंदोलित करते हैं।सूर्य जब बृहस्पति की राशि धनु या फिर मीन में होता है तो ये दोनों राशियां सूर्य की मलीन राशि मानी जाती है. वर्ष में दो बार सूर्य बृहस्पति की राशियों के संपर्क में आता है. प्रथम दृष्टा 15-16 दिसंबर से 14-15 जनवरी और द्वितीय दृष्टा 14 मार्च से 13 अप्रैल. द्वितीय दृष्टि में सूर्य मीन राशि में रहते हैं.
इस कारण धनु व मीन राशि के सूर्य को खरमास/मलमास की संज्ञा देकर व सिंह राशि के बृहस्पति में सिंहस्थ दोष दर्शाकर भारतीय भूमंडल के विशेष क्षेत्र गंगा और गोदावरी के मध्य (धरती के कंठ प्रदेश से हृदय व नाभि को छूते हुए) गुह्य तक उत्तर भारत के उत्तरांचल, उत्तरप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, राज्यों में मंगल कर्म व यज्ञ करने का निषेध किया गया है, जबकि पूर्वी व दक्षिण प्रदेशों में इस तरह का दोष नहीं माना गया है।
वनवासी अंचल में क्षीण चन्द्रमा अर्थात वृश्चिक राशि के चन्द्रमा (नीच राशि के चन्द्रमा) की अवधि भर ही टालने में अधिक विश्वास रखते हैं, क्योंकि चंद्रमा मन का अधिपति होता है तथा पृथ्वी से बहुत निकट भी है, लेकिन धनु संक्रांति खर मास यानी मलमास में वनवासी अंचलों में विवाह आयोजनों की भरमार देखी जा सकती है, किंतु सामाजिक स्तर पर उनका अनुसंधान किया जाए तो इस समय में किए जाने वाले विवाह में एक-दूसरे के प्रति संवेदना व समर्पण की अपेक्षा यौन विकृति व अपराध का स्तर अधिक दिखाई देता है।उत्तरभारत में यज्ञ-अनुष्ठान का बड़ा महत्व रहा है। इस महत्व पर संस्कार के निमित्त एक कथा इस प्रकार है कि पौष मास में ब्रह्मा ने पुष्य नक्षत्र के दिन अपनी पुत्री का विवाह किया, लेकिन विवाह समय में ही धातु क्षीण हो जाने के कारण ब्रह्मा द्वारा पौष मास व पुष्य नक्षत्र श्रापित किए गए।
इस तरह के विज्ञान की कई रहस्यमय बातों को कथानक द्वारा बताई जाने के पौराणिक आख्यानों में अनेक प्रसंग मिलते हैं, इसलिए धनु संक्रांति सूर्य पौष मास में रहने व मीन सूर्य चैत्र मास में रहने से यह मास व पुष्य नक्षत्र भी विवाह में वर्जित किया गया है।ह अधिक मास क्या है और क्यों आता है? यह जिज्ञासा स्वाभाविक है। अधिक मास से तात्पर्य है वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद आदि महीनों में किसी का दो बार उसी एक वर्ष में आ जाना यानी किसी वर्ष में दो आषाढ़ हो जाना या दो श्रावण हो जाना।
इस प्रकार उस वर्ष में बारह महीनों के बजाय तेरह महीने हो जाना यानी एक माह बढ़ जाना। यह घटना
(तेरह महीने आ जाने की) प्रति तीसरे वर्ष क्यों हो जाती है, यह जानना रोचक रहेगा। इसके पीछे के कुछ वैज्ञानिक कारण भी नजर आते हैं।
सूर्य-चंद्रमा हैं कारण
विज्ञानवेत्ता मानते हैं कि विश्वभर में वर्षगणना के कैलेंडर का महीनों वाला हिसाब विभिन्न धर्मों और विभिन्न क्षेत्रों में या तो सूर्य के या चंद्रमा के आधार पर होता है। इस प्रकार भारतीय कैलेंडर सूर्य, चंद्र तथा नक्षत्र तीनों को संतुलित करके चलता है, इसलिए इसे सौर-चांद्र वर्षमान या ल्यूनी सोलर कैलेंडर कहते हैं। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार सूर्य पूरे वर्ष मे 12 राशियों से गुजरता है. सूर्य का इन राशियों में भ्रमण 365 दिन में पूर्ण होता है. सूर्य के एक राशि में समय बिताकर दूसरी राशि में प्रवेश करने तक का काल सौर मास कहलाता है. अत: सूर्य की इस गति के आधार पर की जाने वाली वर्ष गणना सौर वर्ष कहलाती है. इसी प्रकार चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह होने से सूर्य के सापेक्ष गति बनाने के लिए 29 दिन 12 घंटे और 44 मिनट समय लेता है. चंद्रमा की गति का यह काल चंद्रमास कहलाता है.
इस अवधि के आधार पर पूरे वर्ष के दिनों की गणना करें तो एक चंद्रवर्ष 354 दिनों का होता है. जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का होता है. इस प्रकार चंद्रवर्ष में 11 दिन कम होते हैं. सनातन धर्म में प्राचीन ऋषि-मुनियों, ग्रह-नक्षत्रों और ज्योतिष विद्या के मनीषियों ने काल गणना त्रुटिरहित बनाने की दृष्टि से ही चंद्रवर्ष और सौरवर्ष की अवधि में इस अंतर को दूर करने के लिए 32 माह 16 दिन और चार घड़ी के अंतर से यानि हर तीसरे चंदवर्ष में एक ओर चंद्रमास जोड़कर 11 दिनों के अंतर को पूरा किया जाता है. सूर्य और चंद्र दोनों के समन्वय के कारण वर्ष में दिनों की गणना का जो अंतर आता है, वह प्रतिवर्ष लगभग ग्यारह दिन का होता है
इस प्रकार सूर्य और चंद्र दोनों की पूरी पड़ताल निरंतर रखने की वैज्ञानिक ललक का परिणाम है हर तीस महीनों के बाद एक अधिक मास की गणना द्वारा सौर-चांद्र गणना का समन्वय बिठाने क
े मार्ग की परिकल्पना।कि है2018 में 16 मई से अधिकमास शुरू होगा, जो 13 जून तक चलेगा। अधिकमास में ही 24 मई को गंगा दशहरा पर्व भी मनाया जाएगा। अधिकमास के कारण देवशयनी एकादशी 9 जुलाई को आएगी।


बुधवार, 29 नवंबर 2017

गंड मूल का सच ओर वैज्ञानिक आधार

वैसे तो बच्चे का जन्म किसी के भी घर में खुशियों को लाने वाला होता है, लेकिन अगर बच्चे का जन्म ‘गण्ड-मूल नक्षत्र’ में हुआ हो; तो लोगों की खुशियाँ ये सुनते ही काफ़ूर हो जाती हैं। क्या होते हैं गण्ड-मूल नक्षत्र? इनकी संख्या कितनी होती है? क्या ये वाकई इतने खतरनाक होते हैं? आज तक आप इन्हीं सब सवालों से जूझते आये होंगे। आइये, आज हम इन्हीं के बारे में बात करते हैं संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं। जैसे मार् इसी प्रकार गंड-मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से नाजुक और दुष्परिणाम देने वाले होते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य के लिए इन नक्षत्रों की शांति जरूरी है। मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं।
क्या हैं गंड मूल नक्षत्र
ये आप भी जानते हैं कि नक्षत्रों की संख्या 27 होती है; इनमें से ही 6 नक्षत्र गण्ड-मूल नक्षत्र माने जाते हैं, जो कि अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती हैं। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इन 6 गण्ड-मूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में जन्म लेने पर जातक को ‘गण्ड-मूल दोष’ से युक्त मान लिया जाता है; जबकि सच्चाई कुछ और है, जिससे हर कोई नावाकिफ़ है। इसी बात का फ़ायदा धूर्त ज्योतिषी और ढोंगी पण्डित उठाते हैं।सच तो ये है कि ये नक्षत्र पूरी तरह से खराब नहीं होते, बल्कि इनका एक छोटा सा अंश ही दोषयुक्त होता है। संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं। जैसे मार्ग संधि (चौराहे-तिराहे), दिन-रात का संधि काल, ऋतु, लग्र और ग्रह के संधि स्थल आदि को शुभ नहीं मानते हैं। इसी प्रकार गंड-मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से नाजुक और दुष्परिणाम देने वाले होते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य  लिए इन नक्षत्रों की शांति जरूरी है। मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं।राशि और नक्षत्र दोनों जब एक स्थान पर समाप्त होते हैं तब यह स्थित गण्ड नक्षत्र कहलाती है और इस समापन स्थिति से ही नवीन राशि और नक्षत्र के प्रारम्भ होने के कारण ही यह नक्षत्र मूल संज्ञक नक्षत्र कहलाते हैं।राशि चक्र में ऐसी तीन स्थितियां होती हैं जब राशि और नक्षत्र दोनों एक साथ समाप्त होते हैं। यह स्थिति ‘गंड नक्षत्र’ कहलाती है। इन्हीं समाप्ति स्थल से नई राशि और नक्षत्र की शुरूआत होती है। लिहाजा इन्हें ‘मूल नक्षत्र’ कहते हैं। इस तरह तीन नक्षत्र गंड और तीन नक्षत्र मूल कहलाते हैं। गंड और मूल नक्षत्रों को इस प्रकार देखा जा सकता है।
कर्क राशि जल राशि व अश्लेषा नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं। यहीं से मघा नक्षत्र और सिंह राशिअग्न का उद्गम होता है। लिहाजा अश्लेषा गंड और मघा मूल नक्षत्र है।
वृश्चिक राशि में ज्येष्ठा नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं, यहीं से मूल नक्षत्र और धनु राशि की शुरूआत होने के कारण ज्येष्ठा ‘गंड’ और ‘मूल’ का नक्षत्र होगा।
मीन राशि और रेवती नक्षत्र का एक साथ समाप्त होकर यहीं से मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरूआत होने से रेवती, गंड तथा अश्विनी मूल नक्षत्र कहलाते हैं।
उक्त तीन गंड नक्षत्र अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती का स्वामी ग्रह बुध है तथा तीन मूल नक्षत्र मघा, मूल व अश्विनी का स्वामी ग्रह केतु हैसच तो ये है कि ये नक्षत्र पूरी तरह से खराब नहीं होते, बल्कि इनका एक छोटा सा अंश ही दोषयुक्त होता है। अश्विनी, मघा और मूल की प्रारम्भिक 2 घटी तथा रेवती, आश्लेषा और ज्येष्ठा की अन्तिम 2 घटी ही दोषयुक्त होती हैं। चूँकि 1 घटी 24 मिनट की होती है, इसलिए प्रत्येक नक्षत्र में 48 मिनट और इनकी सन्धि के दौरान कुल 96 मिनट अर्थात्‌ 1 घण्टा 36 मिनट ही दोषपूर्ण होते हैं। जबकि  कुछ पण्डित लोग दोनों नक्षत्रों के दौरान अर्थात्‌ पूरे ्2 दिनों (48 घण्टे) के दौरान हुये जन्म को खराब बता कर लोगों को डराते हैं और पूजा-पाठ का जाल फ़ैलाकर उन्हें लूटते हैं।ज्योतिष में कुछ विशेष आधारों पर राशि और नक्षत्र को तीन-२ चक्रों में विभाजित किया गया है। ये चक्र एक विशेष सन्धि-स्थल पर आपस में जुड़े होते हैं। इस तरह इन तीन सन्धि-स्थलों पर जो 6 नक्षत्र आपस में जुड़ते हैं, उन्हें ही ‘गण्ड-मूल नक्षत्र’ कहा जाता है। चूँकि सन्धि या संक्रमण काल को सामान्य रूप से अशुभ या कष्टकारक माना जाता है, अत: ऐसा माना जाता है कि गण्ड-मूल दोष में उत्पन्न बच्चे पर कुछ ना कुछ नकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ता है।चूँकि नक्षत्र का प्रभाव नकारात्मक है, इसलिए 27 दिन पश्चात्‌ पुन: उसी नक्षत्र के आने पर किसी विद्वान ब्राह्मण को बुलवा कर आप् शान्ति के लिए पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा आदि करने में कोई बुराई नहीं है; परन्तु 27 दिन तक पिता को अपने बच्चे का मुँह ना देखने देना एक बेकार की बात ही है। लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि ये शान्ति वगैरह तभी करवायें, जब बच्चे का जन्म उस विशेष 2 घटी में ही हुआ हो मतलव जल और आग का एक साथ मिलने का समय । वरना मेरे इस लेख को लिखने का कोई फ़ायदा नहीं होगा।शतपथ ब्राह्मण और तैत्तरीय ब्राह्मण नामक ग्रंथ में बताया गया है कि कुछ स्‍थितियों में यह दोष अपने आप समाप्त हो जाता है और इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति खुद के लिए भाग्यशाली होते हैं।व्यक्ति का जन्म अगर वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुंभ लग्न में हो, तब मूल नक्षत्र में जन्म होने पर भी इसका अशुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
गंडमूल नक्षत्र में जन्म लेने पर भी अगर लड़के का जन्म रात में और लड़की का जन्म दिन में हो, तब मूल नक्षत्र का प्रभाव समाप्त हो जाता है। गंडमूल नक्षत्र मघा के चौथे चरण में जन्म लेने वाला बच्चा धनवान और भाग्यशाली होतागंडमूल दोष 28 साल बाद अपने आप समाप्त हो जाता है। ऐसा हमारे जातक शास्त्रों में लिखा है E3। है।Gandmool गंडमूल दोष के बारे में यह article यदि आपको पसंद आया हो, तो इसे like और दूसरों को share करें। आप Comment box में Comment जरुर करें, ताकि यह जानकारी और लोगों तक भी पहुंच सके।
चलते-२ एक बात अवश्य कहूँगा कि बेवजह घबरायें नहीं। आपका बच्चा भी अन्य बच्चों की तरह भाग्यशाली है। उसका भविष्य उसकी कुण्डली के अन्य योगों पर निर्भर करेगा, ना कि केवल ‘गण्ड-मूल दोष’ में बँधकर रह जायेगा। हमेशा की तरह खुश रहिये।


सोमवार, 27 नवंबर 2017

अनुभव की वात

अनुभव की बात समझ-समझ की बात होती है। कुछ लोग हैं जो अपनी बुद्धि से भगवान को पकड़ना चाहते हैं। यह मन और बुद्धि से परे की चीज़ है। अगर हाथी को बाँधने वाली ज़ंजीर से हम चींटी को बाँधना चाहें तो कैसे बंधेगी?
तो समझने की बात है- ज्ञान की बात, भगवान की बात, हम अपनी बुद्धि से नहीं पकड़ सकते हैं। हम सिर्फ अनुभव से इस चीज़ को पकड़ सकते हैं। लोग समझते हैं कि आज स्कूल में यह पढ़ा, परंतु जिस चीज़ का अनुभव नहीं किया, वह कैसे समझ में आ जाएगी? अंगूर मीठे होते हैं, यह सीखने के लिए किसी को स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं है। जिस दिन अंगूर मुँह में डालेंगे, अपने आप पता लग जायेगा कि अंगूर मीठे होते हैं।
हम भगवान की बात करते हैं, ज्ञान की बात करते हैं, मुक्ति की बात करते हैं। पर इसको अनुभव में बदलना ज़रूरी है। कोई दस घंटे तक भाषण दे सकता है, कि चीनी क्या होती है, मीठा क्या होता है, पर, अगर वह मिठास ज़बान पर रख दी जाये तो मनुष्य एक ही पल में समझ जायेगा। फिर उसके प्रश्न बाकी नहीं रहेंगे, फिर वह दुविधा में नहीं रहेगा, फिर उसको जगह-जगह भटकने की ज़रूरत नहीं रहेगी। वह उस चीज़ का अनुभव अपने जीवन में, अपने अंदर कर सकेगा।
ये है बात अनुभव की। इस संसार में ‘शांति-शांति’ कहने वालों की कोई कमी नहीं है, पर कोई बिरला ही मिलेगा जो शांति का अनुभव करा दे। और जबतक ये अनुभव नहीं होगा, तबतक हम पहचान नहीं पायेंगे कि हमको क्या मिला है।
अनुभव एक ऐसी चीज़ है कि उसके बाद फिर कुछ कहने के लिए बाकी नहीं रह जाता। अनुभव करो, अनुभव से वह चीज़ समझ में आएगी। अनुभव से इस चीज़ को पकड़ पाओगे, और तभी अपने जीवन को सफल कर पाओगे।
दुनिया में गुरु की महिमा भूल-भाल गये। भूल-भाल गये गुरु का महत्व! अंधविश्वास में फंसे रहते हैं। गुरु तो तुम्हारा कोई न कोई ज़रूर होगा। कोई न कोई तुमको पाठ ज़रूर पढ़ायेगा। पर इतनी बात है कि अगर सच्चा पाठ पढ़ गये तो यह जीवन की नैया उस पार लग जायेगी। अगर सच्चा पाठ नहीं पढ़ पाये तो यह डूबेगी। तो ऐसा गुरु चाहिए, जो अनुभव की बात करे।जिसने खुद अनुभव किया हो


रविवार, 26 नवंबर 2017

सवाल आपके




मित्रों आप वोहोत से मित्र राशीफल के वारे मे सवाल करते है अति ध्यातव्य बात यह है कि सार्वजनिक तौर पर राशिफल,ग्रहों का निवारण और उपचार आदि जो बतलाने और करने का प्रचलन आज कल चल पड़ा है,यह गम्भीर विचारणीय है। चिंता और चिन्तन का विषय भी। इतनी बड़ी आबादी है विश्व की।उसमें तरह-तरह के लोग हैं।भविष्य वक्ता के पास सिर्फ राशियों के आधार पर बारह पैमाने हैं- यानि पूरी मानवता को सिर्फ बारह भागों में बाँट दिया गया।विचारणीय है कि करोड़ों का भाग्य एक समान कैसे हो सकता है?
अब उपचार सम्बन्धी एक उदाहरण- राशि या लग्न के आधार पर किसी ने सुझाव दे दिया- अमुक वस्तु दान करें,अमुक रत्न धारण करें।अब यहाँ भी वही प्रश्न है।क्यों कि सबकी कुण्डली में ग्रहों की स्थिति एक समान नहीं हो सकती।ग्रहों की अवस्था,दृष्टि आदि अनेक बातों का सूक्ष्म विचार करके ही कुछ निर्णय लिया जाना चाहिए।सभी उपचार समय-स्थान-व्यक्ति सापेक्ष हैं।अतः सार्वजनिक सुझाव से व्यक्तिगत सुझाव की कोई तुलना नहीं हो सकती।इसमें वही अन्तर है जो दुकानदार से बुखार की दवा पूछ कर खाने और डॉक्टर से जाँच करा कर दवा लेने में अन्तर है।नब्बे प्रतिशत मामले में हो सकता है- दुकानदार की बतलायी दवा से रोग निवारण हो जाए; किन्तु इसका क्या अर्थ है? डॉक्टर व्यर्थ हैं? आपकी जन्मकुंडली ओर गोचर दोनो का मिलान हो
एक और बात – श्रद्धा, विश्वास और भक्ति बड़ी अच्छी बात है।किन्तु इन तीनों के आगे ‘अन्ध’ शब्द जुड़ जाए तो बड़ा ही घातक सिद्ध होता है।अतः अन्धश्रद्धा,अन्धविश्वास,और अन्धभक्ति से सदा परहेज करना चाहिए।अन्यथा लूटने वाले बैठे हैं,आप यदि लुटाने के लिए तैयार हैं।
ईश्वर सबको सदबुद्धि दें।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

जन्मकुंडली से जाने अपना घर कव वनेगा

acharyarajesh.iacharyarajesh.in/जन्मकुंडली-से-जाने-कव-वने/


आराम और महलों की मस्तियां हैं,

फिर भी भटकते हैं, जहाँ में।

कुटिया हो या घास-फूस का आशियाना,

अपने घर से बढ़कर कुछ नहीं॥`

अपने घर मे रहने की सभी की चाहत होती है लेकिन घर किस्मत से ही बनता है जब योग बनता है योग के साथ अन्य कारको का संयोग बनता है तो घर बनना शुरु हो जाता है।घर बनने का समय अलग अलग जातक की जन्मकुंडली देख कर पता लगाया जाता है घर भी रोटी और कपडा की तरह से जरूरी है,मनुष्य अपने लिये रहने और व्यापार आदि के लिये घर बनाता है,पक्षी अपने लिये प्रकृति से अपनी बुद्धि के अनुसार घोंसला बनाते है,जानवर अपने निवास के लिये गुफ़ा और मांद का निर्माण करते है। जलचर अपने लिये जल में हवा मे रहने वाले वृक्ष आदि पर और जमीनी जीव अपने अपने अनुसार जमीन पर अपना निवास करते है। अपने अपने घर बनाने के लिये योग बनते है। गुरु का योग घर बनाने वाले कारकों से होता है तो रहने के लिये घर बनता है शनि का योग जब घर बनाने वाले कारकों से होता है तो कार्य करने के लिये घर बनने का योग होता है जिसे व्यवसायिक स्थान भी कहा जाता है। बुध किराये के लिये बनाये जाने वाले घरों के लिये अपनी सूची बनाता है तो मंगल कारखाने और डाक्टरी स्थान आदि बनाने के लिये अपनी अपनी तरह से बल देता है। लेकिन घर बनाने के लिये मुख्य कारक शुक्र का अपना बल देना भी मुख्य है,स्वयं की भूमि अथवा मकान बनाने के लिए चतुर्थ भाव का बली होना आवश्यक होता है,. भूमि का कारक ग्रह मंगल है। जन्मपत्री के चौथे भाव से भूमि व भवन सुख का विचार किया जाता है। वैसे तो चौथे भाव के स्वामी (चतुर्थेश) का केंद्र ( कुंडली का लग्न, चौथा, सातवां व दसवां घर) या त्रिकोण ( कुंडली का लग्न, पांचवां व नौवां घर) में होना उत्तम भवन प्राप्ति का योग बनाता है। मंगल के साथ चौथे भाव का स्वामी, पहले भाव का स्वामी व नौवे भाव का स्वामी अच्छी स्थिति में हो व शुभ ग्रहों के साथ हो तो भवन प्राप्ति का अच्छा संकेत है। इसलिए अपना मकान बनाने के लिए मंगल की स्थिति कुंडली में शुभ तथा बली होनी चाहिए.मकान सुख के लिये मंगल और चतुर्थ भाव का ही अध्ययन पर्याप्त नहीं है। भवन सुख के लिये लग्न व लग्नेश का बल होना भी अनिवार्य है। इसके साथ ही दशमेंश, नवमेंश और लाभेश का सहयोग होना भी जरूरी है।* मंगल को भूमि तो शनि को निर्माण का कारक माना गया है। इसलिए जब भी दशा/अन्तर्दशा में मंगल व शनि का संबंध चतुर्थ/चतुर्थेश से बनता है, तब व्यक्ति अपना घर बनाता है उसे भूमि , प्रापर्टी डीलिंग के कार्यों में श्रेष्ठ सफलता मिलती है ।आप अपनी जन्मकुण्डली में देखें और यहाँ दिए गए प्रमुख योगों की संरचना को पहचानें। आप स्वयं जान जायेंगे की घर बनाने का सामर्थ्य आप में कितना है-यदि भाव का स्वामी अकेले या किसी शुभ ग्रह के साथ 1,4,7,10 वें भाव में हो तो जातक माता-पिता द्वारा अर्जित जायदाद में भवन -निर्माण करता है।यदि चौथे भाव का स्वामी 1,5,9 वें भाव में हो तो जातक सरकार से प्राप्त या अपने पूण्य-प्रताप और भाग्य से प्राप्त भुमि पर भवन निर्माण करवाता है।अगर चौथे भाव का स्वामी 3,6,8,12 वें भाव में हो तो जातक अपनी संपदा को छोड़कर लंबी आयु के बाद अपने ही बलबूते पर मकान बनाता है।अ सबगर चौथे भाव का स्वामी लग्न में हो और लग्नेष चौथे भाव में हो तो जातक अपने ही धन संचय से मकान बनवाता है।उपरोक्त संकेतों के आधार पर कुंडली का विवेचन कर घर खरीदने या निर्माण करने की शुरुआत की जाए तो लाभ हो सकता है। इसी तरह पति, पत्नी या घर के जिस सदस्य की कुंडली में गृह-सौख्य के शुभ योग हों, उसके नाम से घर खरीदकर भी कई परेशानियों से बचा जा सकता है।आचार्य राजेश 

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...