आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शुक्रवार, 18 मई 2018
जन्मकुंडली ओर आप का भविष्य
सोमवार, 14 मई 2018
जुड़वां बच्चों का भविष्य
कल कुछ मित्र जुड़वां बच्चों के वारे जानकारी चाहतेथे कि एक ही मां की कोख से कुछ मिनट के अंतराल में जन्मे जुड़वां बच्चों के रंग, स्वभाव और भविष्य में कैसे अंतर आ जाता है?जुड़वां बच्चे जन्म लेते है
तो जन्म समय में सिर्फ ५ या १० मिनट का अंतर होता है यदि कुंडली देखी जाये तो दोनों के जन्म नक्षत्र, राशि, लग्न यहाँ तक कि पूरी कि पूरी कुंडली एक जैसी हुबहू होती है सिर्फ विंशोत्तरी दशा काल में कुछ अंतर रहता है कृष्णमूर्ति जी ने यह विचार किया कि जब दोनों जुड़वाँ जन्म लेने वाले जातको की कुंडलिया एक सी है फलादेश भी एक ही है जब कि वास्तविकता कुछ और ही होती है दोने के रूप रंग , स्वाभाव, व्यव्हार, शिक्षा, विवाह, नौकरी आदि में असमानताए रहती है उन्होंने गहन अध्यन किया दिन रात ज्योतिष अनुसन्धान से उन्होंने आखिरकर ये खोज लिया कि जुड़वाँ जन्म लेने वाले बच्चो में ये असमानताए क्यों होती है !यदि दो जुड़वां बच्चों का जन्म समय एक ही मान लिया जाये तो क्या एक ही कुण्डली को दो बार देखने से अलग – अलग विश्लेषण या परिणाम प्राप्त होगा | यह धारणा बिलकुल गलत है की जुड़वाँ बच्चों का जन्म समय समान होता है |इसके अनुसार किसी भाव का फल भावेश अर्थात उसका स्वामी न करके, वह ग्रह जिस नक्षत्र में स्थित हैं, उसका उपनक्षत्र स्वामी करेगा अर्थात् उस भाव का फल उपनक्षत्रेश के आधार पर होगा। जैसे-किसी की जन्मपत्री में तुला लग्न में दशमेश चंद्र, उच्च या स्वगृही है तो उसे किसी कंपनी/सरकारी नौकरी में उच्च पद पर या प्रतिष्ठित व्यवसाय में होना चाहिए। परंतु वास्तव में वह व्यक्ति फुटपाथ पर मजदूरी कर रहा था, तब ऐसे में उसकी जन्मपत्री का अध्ययन किया तो यह पाया कि उसका उपनक्षत्र स्वामी, जन्मपत्री में नीच राशि में स्थित था, अत: उसे वास्तव में निम्न स्तर का रोजगार मिला। ठीक इस प्रकार जुड़वा बच्चों या समकक्ष में के.पी. ने उपनक्षत्र स्वामी का निर्माण राशियों को 4-4 मिनट में बांटकर सारणी तैयार कर किया तथा जुड़वा बच्चों के फल कथन में इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया तो बिल्कुल सटीक पाया गया। क्योंकि जुडवां बच्चों में 2-3 मिनट का ही अंतर रहता है या एक ही स्थान, समय में भी 2-3 मिनट का ही अंतर पाया जाता है। अत: के.पी. की उपनक्षत्रेश पद्धति इनपर बिल्कुल सही साबित हुई। गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार विश्व में जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय की अवधि में सबसे कम समय का अंतर एक मिनट का दर्ज हुआ है जो कि केसेंड्रा फ्लोरेस नामक अमरीकी महिला ने सेंट जोसफ हॉस्पिटल केलिफोर्निया में 9 जुलाई 2013 को 13:39 व् 13:40 बजे जुड़वाँ बच्चों को जन्म देने पर हुआ है | इसी प्रकार एक पंद्रह वर्ष तक की गयी एक जर्मन शोध के अनुसार जुड़वाँ बच्चों के जन्म समय में औसत अवधि का अंतर 13.5 मिनट का पाया गया है जिस से साबित होता है कि ज्योतिष दृष्टिकोण से भी जुड़वाँ बच्चों का भविष्य व् जीवन एक समान नही हो सकता क्योंकि उनका जन्म समय जो ज्योतिष का आधार है, कभी एक समान नही होता |
इन सभी कारणों से चाहे वह जीवविज्ञान से सम्बन्धित हों, प्रकृति की रचना, कर्म सिद्धांत, पूर्व जन्म का परिणाम, भाग्य, हस्तरेखा या ज्योतिष विषय हो, यह निश्चित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन और भविष्य कभी दूसरे व्यक्ति के समान नही हो सकता चाहे वह जुड़वाँ ही क्यों न हों |इसे ऐसा भी समझ सकतेहै हमारे चारों तरफ ऊर्जाओं के क्षेत्र है, एनर्जी फील्डसस है और वह पूरे समय हमें प्रभावित कर रहे है। जैसे ही बच्चा जन्म लेता है तो वह जगत के प्रति, जगत प्रभावों के प्रति फंस जाता है। जन्मै को वैज्ञानिक भाषा में हम कहें एक्स पोजर, जैसे कि फिल्म को हम ऐक्सपोज करते है। कैमरे में, जरा सा शटर आप दबाते है एक क्षण के लिए कैमरे की खिड़की खुलती है और बंद हो जाती है। उस क्षण में जो भी कैमरे के समक्ष आ जाता है। वह फिल्मी पर अंकित हो जाता है। फिल्म ऐक्सपोज हो गई। अब दुबारा उस पर कुछ अंकित न होगा—और अब यह फिल्मज उस आकार को सदा अपने भीतर लिए रहेगी। वहींकुछ क्षण के अन्तर से यह फिर से हो तो वो होता फ्लर्ट आ जाऐगा
जिस दिन मां के पेट में पहली दफा गर्भाधान होता है तो पहला एक्सापोजर होता है। जिस दिन मां के पेट से बच्चाे बाहर आता है, जन्म लेता है, उस दिन दूसरा एक्सिपोजर होता है। और वह दोनों एक्पोिजर संवेदनशील चित पर फिल्म की भांति अंकित हो जाते है। पूरा जगत उस क्षण में बच्चा अपने भीतर अंकित कर लेता है। और उसकी एम्पेतथीज, समानुभूति निर्मित हो जाती है।हर क्षण अलग है
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रविवार, 13 मई 2018
मेरी अपनी वात
मित्रो एक सच यह भी हैं…
(ज्योतिष अपने आप में एक सम्पूर्ण विज्ञानं हैं…ज्योतिषी गलत हो सकता हैं,ज्योतिष नहीं मित्रों जहाँ सभी विज्ञानं का ज्ञान समाप्त हो जाता हैं वह से ज्योतिष विज्ञानं आरम्भ होती हैं
यह काफी पुरानी घटना हैं,मै ट्रेन मे रिजर्वेशन की तलाश मे भटक रहा था। ट्रेन मे तिल रखने तक की जगह नही थीमेरा मित्र मेरे साथ था जगह ना मिलने के कारन हम टायलेट के पास बैठे अपने ही जैसे यात्रियो के साथ बैठ गये एक सहयात्री समय काटने के लिये लोगो का हाथ देख रहा था और विस्तार से सब कुछ बता रहा था। पास बैठे पिता-पुत्र की बारी आयी। पुत्र का हाथ देखते ही उसके माथे पर चिंता की लकीर उभर आयी। वह कुछ नही बोला। पिता को आशंका हुयी। वह पुत्र के बारे मे जानने व्यग्र हो उठा। एक कोने मे ले जाकर उस सहयात्री ने धीरे से बताया कि आपके पुत्र के हाथ को देखकर लगता है कि इसका कुछ समय पहले किसी से झग़डा हुआ है और ऐसा भी लगता है कि यह मर्डर करके भागा है। मै ने सोचा अब तो उस ज्योतिषी की खैर नही। ऐसा पिटेगा कि दम निकल जायेगा। पर हुआ उल्टा। पिता उनके पैरो मे गिर गया और बताया कि चम्वा मे दोस्तो के साथ किसी झग़डे मे इन सब से किसी की हत्या हो गयी। कैसे भी मैने अपने बेटे को निकाला है। अब इसे मुम्बई ले जा रहा हूँ ताकि कुछ काम सीखने के बाद वाहर के देशो मे नौकरी मिल सके। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही रहा। मैने बहुत बार भविष्य़वाणियो के बारे मे सुना और पढा था पर उन्हे सच होते इतने करीब से नही देखा था।
उस ज्योतिषी के दिव्य ज्ञान ने मुझे प्रेरित किया कि मै इस प्राचीन विज्ञान का विस्तार से अध्ययन करुँ। मैने ढेरो पुस्तके खरीदी पर बिना गुरु केसही ज्ञानृ नही मिलता फिर पत्राचार से भी पङाई की तव भी वात नही वनी प्यास ज्यो की त्यो वनी रही जब भी हमे अखबारो मे किसी ज्योतिषी का विज्ञापन दिखता हम उसके ठिकने पर पहुँच जातेओर उनसे सीखने को कहते ओर कईयो से सीखा भी पर सव अघकचरे ज्ञानी थे कुछ समय तक यह सिलसिला चला यह तक कि इसी तरह जो शहर के ज्योतिषी थे या आस पास के उनके पास भी जा जा कर सीखा धीरे-धीरे समझ विकसित हुयी और जब एक ज्योतिष सम्मेलन मे दुनिया भर से आये विद्वानो से मिलवाने मेरे ऐक मित्र मुझे जबरदस्ती ले गये तो मेरी आँखे खुली। मैने ज्योतिष को एक समृद्ध पारम्परिक ज्ञान की तरह पाया। उन्ही विद्वानो से पता चला कि कैसे भारतीय ज्योतिष के आगे सारी दुनिया नतमस्तक है। उसके बाद से मैने शहर के ज्योतिषी ङेरे नाथ संत महात्मा किसी को नही छोङा सभी के पास ज्ञान के लिऐ भटकता रहा !खैर मेरी अघ्यातम यात्रा के किस्से काफी लम्वे हे फिर कभी आप को वताउगा
कुछ वर्षो पहले एक ऐसे हस्तरेखा विशेषज्ञ से मिलने का अबसर मिला जो लोगो को टीवी पर या मंच से सुनकर उनकी हू-बहू हस्तरेखाए बना देता है। हस्तरेखा से लोगो के बारे मे बताना तो ठीक है पर लोगो को सुनकर भला कैसे कोई हस्तरेखा बना सकता है? यह विशेषज्ञ अपनी मर्जी से ही व्यक्ति का चुनाव करता है और इस ज्ञान से अर्थ लाभ नही करता है। वह इसके प्रदर्शन के भी खिलाफ है। मुझे पता है कि यदि वह इस ज्ञान के साथ बाजार मे आये तो उसे लोगो के सिर आँखो मे बैठने मे जरा भी देर नही लगेगी। डिस्कवरी चैनल मे एक बार एक फिल्म आ रही थी जिसमे बताया गया था कि शीत युद्ध के दिनो मे अमेरीकी सेना ने एक ऐसे लोगो की टोली बनायी थी जो कल्पना के सहारे एक बन्द कमरे मे बैठकर दुश्मनो के बारे मे विशिष्ट जानकारी देते थे। आज ऐसी कोई बात भारत मे करे तो हमारा आधुनिक समाज इसे अन्ध-विश्वास घोषित करने मे जरा भी देर नही करेगा। इसी तरह की सोच ने आज भारतीय पारम्परिक ज्ञान को उसके अपने घर मे बेसहारा कर दिया है।
मै ज्योतिष को विज्ञान मानता हूँ। आम तौर पर ज्योतिषीयो द्वारा की जाने वाली भविष्यवाणियो पर तरह-तरह के सवाल किये जाते है। ये भविष्य़वाणियाँ व्यवसायिक ज्योतिष से जुडे लोग अर्थार्जन के लिये करते है। इसी आधार पर ज्योतिष के विज्ञान होने पर सन्देह किया जाता है। लोगो के इस तर्क को सुनकर मुझे बरबस ही एक और विज्ञान की याद आ जाती है। वह है हम सब का प्यारा मौसम विज्ञान जिसकी भविष्य़वाणियाँ शायद की कभी सही होती है। शहर से लेकर गाँवो तक सब जानते है इस विज्ञान को और इसकी उल्टी भविष्य़वाणियो को। पर फिर भी कोई इसे ज्योतिष की तरह कटघरे मे खडा नही करता। देश मे इस विज्ञान के विकास के लिये अरबो खर्च किये जा रहे है। इसका एक प्रतिशत भी भारतीय ज्योतिष के उत्थान मे खर्च किया जाता तो इसे नया जीवन मिल जाता।
कुछ वर्षो पहले एक किसान की हवाले से यह जानकारी स्थानीय अखबार मे छपी कि इस बार मछरिया नामक खरपतवार की संख्या को देखकर लगता है कि बारिश कम होगी। जैसी कि उम्मीद थी दूसरे ही दिन इसे अन्ध-विश्वास बताते हुये एक समाचार छप गया। किसान ने ठान लिया कि चुप रहने मे ही भलाई है। उस साल सचमुच बारिश कम हुयी। ऐसे ही वनस्पतियो और पशुओ के व्यवहार से मौसम की परम्परागत भविष्य़वाणी का विज्ञान अपने देश मे समृद्ध है। मौसम विज्ञानी इसे महत्व नही देते है पर जानकारी मिलने पर इस पर शोध-पत्र तैयार कर विदेशो मे प्रस्तुत करने का अवसर भी नही छोडते है। किसानो के पारम्परिक ज्ञान पर वाह-वाही लूटकर अवार्ड भी पा जाते है
कौआ-कैनी नामक खरपतवार जो कि बरसात मे खेतो मे उगता है, के फूलो को बन्द होता देखकर किसान यह पूर्वानुमान लगा लेते है कि मौसम बिगडने वाला है। इसी तरह सर्दियो मे उगने वाले कृष्णनील नामक खरपतवारो के फूलो से भी ऐसी ही जानकारी एकत्र की जाती है।अब भी यह सागर मे एक बूँद के समान है। कभी-कभी लगता है कि पारम्परिक भारतीय ज्ञान की रक्षा के लिये और परम्पराओ और संस्कारो को नयी पीढी तक पहुँचाने के लिये लोगो को जोडकर एक ऐसा संगठन बनाऊँ जो इस विषय मे उपलब्ध तमाम जानकारियो को आम लोग तक तो पहुँचाये ही साथ ही इन्हे अन्ध-विश्वास बताकर अपनी दुकान चलाने वाले तथाकथित समाजसेवियो के खिलाफ भी आवाज उठाये। आखिर भारत मे रहकर उसकी परम्पराओ और संस्कारो को गलत ठहराना किसी अपराध से कम नही है।मित्रो आज जो भी मांकाली की कृप्पा से ही हु मुझ मे मेरा कुछ भी नही है आचार्य राजेश
रविवार, 6 मई 2018
विपरीत राजयोग से असाधारण धनलाभ
मित्रों यह पोस्ट उन मित्रों के लिए जो ज्जयोतिष सिख रहे हैं या ज्योतिषी है शुभ भावों के स्वामी बली होते है,तो धन मिलता है,यह तो सभी जानते है,लेकिन ऐसा भी देखा गया है,कि जो भाव कुन्डली में अनिष्ट का संकेत करते है,और अगर उनके स्वामी अगर किसी प्रकार से कमजोर है
तो भी धन शुभ भावों के स्वामियों से अधिक मिलता है.कुन्डली के ६,८,और १२ भाव अनिष्ट भाव माने जाते है,इन तीनो को त्रिक भी कहा जाता है,इन किसी भी स्थान का स्वामी किसी त्रिक में या अनिष्ट ग्रह से देखा जाता है,तोबहुत ही निर्बल हो जाता है,इस कारण से विपरीत राजयोग की प्राप्ति हो जाती है,माना जाता है कि छथा भाव ऋण का है,और किसी पर लाखों रुपयों का ऋण है,और किसी आदमी द्वारा अक्समात उस ऋण को उतार दिया जाता है,तो उसको एक तो ऋण से छुटकारा मिला और दूसरे धन का लाभ भी हुआ,इसी प्रकार से आठवां स्थान गरीबी का माना जाता है,यदि किसी की गरीबी का अक्समात निवारण हो जाये तो वह भी विपरीत राजयोग की गिनती मे ही गिना जायेगा.इसी प्रकार से बारहवां भाव भी व्यय का है,और किसी का व्यय रुक कर अगर बैंक में जमा होना चालू हो जाये तो भी इसी विपरीत राजयोग की गिनती में गिना जायेगा.गणित का नियम सभी को पता होगा कि दो नकारात्मक एक सकारात्मक का निर्माण करते है,और दो सकारात्मक भी एक सकारात्मक का निर्माण करते है,लेकिन एक नकारात्मक और एक सकारात्मक मिलकर नकारात्मक का ही निर्माण करेंगे,इसी प्रकार का भाव इस विपरीत राजयोग मे प्रतिपादित किया जाता है.
इसकी व्याख्या इस प्रकार से भी की जा सकती है:-आठवें भाव के स्वामी व्यय अथवा ऋण में हों,छठे भाव के स्वामी गरीबी या व्यय के स्थान में हो,और बारहवें भाव के स्वामी ऋण अथवा गरीबी में हों,अथवा अपने ही क्षेत्र में होकर अपने ही प्रभाव से परेशान हो,तो वह जातक धनी लोगो से भी धनी होता है.इसका विवेचन इस कुन्डली के द्वारा भी कर सकते है:- कन्या लगन की कुन्डली में बुध लगन में है,सूर्य केतु दूसरे भाव में तुला में है,गुरु शुक्र तीसरे भाव में वृश्चिक राशि में है,राहु शनि आठवें भाव में मेष राशि के है,मंगल चन्द्र नवें भाव में वृष राशि के है,इस कुन्डली में ऋण भाव के मालिक शनि मेष राशि के नीच भी है और गरीबी के भाव में भी विराजमान है तथा राहु से ग्रसित भी है,साथ ही सूर्य जो व्यय का मालिक है,से भी देखे जा रहे है,और कोई भी अच्छा ग्रह उसे नही देख रहा है,इसी प्रकार से सूर्य भी तुला का होकर नीच है,और केतु का साया भी है,अपने ही स्थान से तीसरे स्थान में है,राहु,शनि और केतु का पूरा पूरा ध्यान सूर्य के ऊपर है,और सूर्य के लिये कोई भी सहारा कही से नही दिखाई दे रहा है,यह उदाहरण विपरीत राजयोग का श्रेष्ठ उदाहरण माना जा सकता है.जातक लगनेश बुध के चलते बातो से कमा रहा है,पराक्रम में गुरु और शुक्र का बल है,गुरु ज्ञान है और शुक्र दिखावा है,मंगल चन्द्र नवें भाव से जो कि धन के मामले में परेशान जनता का उदाहरण है,को अपनी राय देकर मनमानी फ़ीस लेकर जनता को धन के कारणो जैसे कर्जा और धन के कारण चलने वाले कोर्ट केशो से फ़ायदा दिलवा रहा है,इधर शनि जो कि कमजोर होकर राहु का साथ लेकर बैठा है,सरकारी कारिन्दो की सहायता से मुफ़्त की जमीनो से और उनको खरीदने बेचने से भी धन की उपलब्धि करवा रहा है.
शनिवार, 5 मई 2018
जन्म कुंडली और फलादेश
,लेकिन मै जो तरीका प्रयोग में लाता हूँ वह अपने प्रकार का है. राशि चक्र में गुरु जहाँ हो उसे लगन मानना जरूरी है कुंडली का विश्लेषण करते वक्त गुरु जहाँ भी विराजमान हो उसे लगन मानना ठीक रहता है,कारण गुरु ही जीव का कारक है और गुरु का स्थान ही बता देता है कि व्यक्ति की औकात क्या है,इसके साथ ही गुरु की डिग्री भी देखनी जरूरी है,गुरु अगर कम या बहुत ही अधिक डिग्री का है तो उसका फ़ल अलग अलग प्रकार से होगा,उदाहरण के लिये कन्या लगन की कुण्डली है और गुर मीन राशि में सप्तम में विराजमान है तो फ़लादेश करते वक्त गुरु की मीन राशि को लगन मानकर गुरु को लगन में स्थापित कर लेंगे,और फ़लादेश गुरु की चाल के अनुसार करने लगेंगे। ग्रहों की दिशाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है कालचक्र के अनुसार राशियों के अनुसार दिशायें भी बताई जाती है,जैसे मेष सिंह और धनु को पूर्व दिशा की कारक और मिथुन तुला तथा कुम्भ को पश्चिम दिशा की कारक वृष कन्या और मकर को दक्षिण दिशा की कारक तथा कर्क वृश्चिक और मीन को उत्तर दिशा की कारक राशियों में माना जाता है। इन राशियों में स्थापित ग्रहों के बल और उनके द्वारा दिये गये प्रभाव को अधिक ध्यान में रखना पडेगा। ग्रहों की द्रिष्टि का ध्यान रखना जरूरी है ग्रह अपने से सप्तम स्थान को देखता है,यह सभी शास्त्रों में प्रचिलित है,साथ ग्रह अपने से चौथे भाव को अपनी द्रिष्टि से शासित रखता है और ग्रह अपने से दसवें भाव के लिये कार्य करता है,लेकिन सप्तम के भाव और ग्रह से ग्रह का जूझना जीवन भर होता है,इसके साथ ही शनि और राहु केतु के लिये बहुत जरूरी है कि वह अपने अनुसार वक्री में दिमागी बल और मार्गी में शरीर बल का प्रयोग जरूर करवायेंगे,लेकिन जन्म का वक्री गोचर में वक्री होने पर तकलीफ़ देने वाला ग्रह माना जायेगा. ग्रहों का कारकत्व भी समझना जरूरी है ग्रह की परिभाषा के अनुसार तथा उसके भाव के अनुसार उसका रूप समझना बहुत जरूरी होता है,जैसे शनि वक्री होकर अगर अष्टम में अपना स्थान लेगा तो वह बजाय बुद्धू के बहुत ही चालाक हो जायेगा,और गुरु जो भाग्य का कारक है वह अगर भाग्य भाव में जाकर बक्री हो जायेगा तो वह जल्दबाजी के कारण सभी तरह के भाग्य को समाप्त कर देगा और आगे की पुत्र संतान को भी नही देगा जिससे आने वाले वंश की क्षति का कारक भी माना जायेगा. जन्म के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनायें होती है जन्म के समय के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनाओं को बताने के लिये माना जाता है,अगर शनि जन्म से लगन में है और गोचर से शनि कर्म भाव में आता है तो खुद के कर्मों से ही कार्यों को अन्धेरे में और ठंडे बस्ते मे लेकर चला जायेगा। इसके बाद लगन का राहु गोचर से गुरु को अष्टम में देखता है तो जीवन को बर्फ़ में लगाने के लिये मुख्य माना जायेगा,जीव का किसी न किसी प्रकार की धुंआ तो निकलना ही है। गुरु के आगे और पीछे के ग्रह भी अपना अपना असर देते है गुरु के पीछे के ग्रह गुरु को बल देते है और आगे के ग्रहों को गुरु बल देता है,जैसी सहायता गुरु को पीछे से मिलती है वैसी ही सहायता गुरु आगे के ग्रहो को देना शुरु कर देता है,यही हाल गोचर से भी देखा जाता है,गुरु के पीछे अगर मंगल और गुरु के आगे बुध है तो गुरु मंगल से पराक्रम लेकर बुध को देना शुरु कर देगा,अगर मंगल धर्म मय है तो बुध को धर्म की परिभाषा देना शुरु कर देगा और और अगर मंगल बद है तो गाली की भाषा देना शुरु कर देगा,गुरु के पीछे शनि है तो जातक को घर में नही रहने देगा और गुरु के आगे शनि है तो गुरु घर बाहर निकलने में ही डरेगा। शनि चन्द्रमा की युति जन्म की साढेशाती शनि और चन्द्रमा का कुंडली में कही भी योगात्मक प्रभाव है तो जन्म से ही साढेशाती का समय माना जाता है,इस युति का सीधा सा प्रभाव है कि जातक अपने अनुसार काम कभी नही कर पायेगा,उसे स्वतत्र काम करने में दिक्कत होगी उसे खूब बता दिया जाये कि वह इस प्रकार से रास्ता पकड कर चले जाना लेकिन वह कहीं पर अपने रास्ते को जरूर भूल जायेगा,इसलिये कुंडली में गुरु के साथ चन्द्रमा की स्थिति भी देखनी जरूरी होती है,वैसे चन्द्रमा को माता का कारक भी मानते है,लेकिन अलग अलग भावों में चन्द्रमा का अलग अलग रूप बन जाता है,जैसे धन भाव में चन्द्रमा कुटुम्ब की माता,तीसरे भाव में चन्द्रमा पिता के बिना नही रहने वाली माता चौथे भाव में चन्द्रमा से बचपन के सभी कष्टों को दूर करने वाली माता,पंचम स्थान से स्कूल की अध्यापिका माता,छठे भाव में मौसी भी मानी जाती है और चाची भी मानी जाती है,सप्तम में माता के रहते पत्नी या पति के लिये विनासकारी माता,अष्टम में माता का स्थान ताई की नही बनेगी,नवे भाव में दादी का रूप यह चन्द्रमा ले लेता है,दसवें भाव में पिता से परित्याग की गयी माता,और ग्यारहवे भाव में जब तक स्वार्थ पूरा नही होता है तब तक की माता और बारहवें भाव में जन्म के बाद भूल जाने वाली माता के रूप में माना जाता है,इस चन्द्रमा के साथ जहां भी शनि होगा जातक के लिये वही स्थान फ़्रीज करने के लिये काफ़ी माना जायेगा। कुंडली का सूर्य पिता की स्थिति को बयान करता है गुरु को जीव की उपाधि दी गयी है तो सूर्य को पिता की उपाधि दी गयी है,उसी सूर्य को बाद में पुत्र की उपाधि से विभूषित किया गया है,लेकिन पिता के लिये नवा भाव ही देखना बेहतर तरीका होता है और पिता के ऊपर आने वाले कष्टों के लिये कुंडली के चौथे भाव में जब भी कोई क्रूर ग्रह गोचर करेगा या शनिका गोचर होगा पिता के लिये कष्ट का समय माना जायेगा। इसके अलावा राहु का गोचर पिता के लिये असावधानी से कोई दुर्घटना और केतु के गोचर से अचानक सांस वाली बीमारी या सांस की रुकावट वाली बीमारी को माना जायेगा,चन्द्रमा से जल से भय और मंगल से वाहन या अस्पताल या पुलिस से भय माना जायेगा। सूर्य और गुरु की युति से पिता पुत्र का एक जैसा हाल होगा,और जातक को जीवात्मा की उपाधि दी जायेगी,साथ ही अगर धर्म के भाव में स्थापित है तो ईश्वर अंश से अवतार माना जायेगा। राहु सूर्य और गुरु का साथ पुराने पूर्वज के रूप में जातक का जन्म माना जायेगा,और गुरु से तीन भाव पहले की राशि के काम करने के लिये जातक को वापस अपने परिवार में आने को माना जायेगा। सूर्य शुक्र का साथ बलकारी पिता और जातक के लिये भी बलकारी योग का रूप देगा,इसके अन्दर कितनी ही बलवान स्त्री क्यों न हो लेकिन जातक के वीर्य को अपनी कोख बडी मुश्किल से धारण कर पायेगी,जैसे ही पुत्र संतान का योग आयेगा,जातक की पत्नी किसी न किसी कारण से मिस कैरिज जैसे कारण पैदा कर देगी,लेकिन जैसे ही सूर्य का समय समाप्त होगा जातक के एक पुत्र की उत्पत्ति होगी। इसी प्रकार से सूर्य और चन्द्र का साथ जातक के जीवन में अमावस्या का योग पैदा करता है। जातक के बचपन में माता को पिता के कारणों से फ़ुर्सत ही नही मिल पायेगी,जो वह जातक का ध्यान रख सके। इसी तरह से चन्द्रमा और सूर्य का आमना सामना जातक के जीवन में पूर्णिमा का योग पैदा करेगा,जातक को छोड कर माता का दूर जाना कैसे भी सम्भव नही है और माता के लगातार साथ रहने के कारण जातक को किसी भी कष्ट का अनुभव नही होगा लेकिन वह अपने जीवन में माता जैसा सभी को समझने पर छला जरूर जायेगा,यहां तक कि उसकी शादी के बाद भी लोग उसे छलना नही छोडेंगे,उसकी पत्नी भी उसके साथ भावनाओं में छल करके उससे लाभ लेकर अपने मित्रों को देती रहेगी या अपने परिवार की भलाई का काम सोचती रहेगी अगर आप को नहीं दिखाना चाहते हैं या बनवाना चाहते हैं यहां ज्योति सीखना चाहते हैं तो हमारे नंबरों पर संपर्क करें 0759771872509414481324 आचार्य राजेश
गुरुवार, 12 अप्रैल 2018
मंगल मंगल है नहीं है अमंगल
मंगल,शनि,राहु,और क्षीण चन्द्रमा पापी ग्रह है,इनमे कोई भी १,४,७,८,१२ भावों में स्थित हो या इन भावों को देखता हो,तो वह मंगलीक दोष होता है.जन्म कुन्डली के १,४,७,८,१२ भावों को समझना बहुत जरूरी है,फला भाव शारीरिक गठन,कद,काठी,रंग रूप,शारीरिक शक्ति और स्वास्थ्य का कारक है,इस भाव के पीडित होने पर जातक के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पडता है,स्वास्थ्य खराब होने पर जातक चिढचिढा हो जाता है,और उग्र स्वभाव तथा हठी हो जाता है,चौथा भाव माता का भाव होता है,और जीवन के प्रति बहुत ही उपयोगी माना जाता है,उसके पीडित होने पर जातक जीवन उपयोगी वस्तुओं केव लिये तरस जाता है,अभाव सौ अनर्थों का एक अनर्थ होता है,जहां भी देखो टोटे की लडाइयां ही मिलती है,जीवन दुख और दैन्य से भर जाता है.सप्तम भाव विवाह,दाम्पत्य सुख,सन्तान और परिवार की बढोत्तरी का कारक है,साझेदार से भी जुडा हुआ है,विवाह की द्रिष्टि से यह भाव बहुत ही महत्व पूर्ण माना जाता है,इस भाव में अगर पापी ग्रह बैठे हों,या इस भाव को पाई ग्रह देखते हो,तो विवाहित जीवन सुख मय नही होता है,पति पत्नी को एक दूसरे से सन्तुष्टि नही मिलती है,परिवार में तरह तरह के अमंगल होते रहते है,इन सबसे पारिवारिक जीवन नर्क मय हो जाता है.अष्टम भाव उम्र और शान्ति का कारक है,यह मोक्ष का भाव भी कहा जाता है,अन्तिम प्रणित का कारण भी माना जाता है,इसके पीडित होने पर जातक की उम्र चिन्ताओं में ही कट जाती है,उसे किसी प्रकार की शान्ति नही मिल पाती है,बारहवें भाव को व्यय और यात्रा का भाव भी बोला जाता है,इसे अगर कोई पापी ग्रह देखते हों तो व्यय अधिक होता है,यात्रा और घर से बाहर ही मन लगता है,हर समय दिमाग में आगे के जीवन की कल्पनायें ही दिमाग खराब करती रहती है,इन सबसे मानसिक परेशानिया तब और बढ जाती है,ज्योतिष में मांगलिक दोष की शुरुआत कब हुई किसी को पता नही है,समय समय पर लेखकों और विद्वानो ने अपने अपने विचारों से इसे अपने अपने अनुसार लिखा है,महर्षी पाराशर,मणित्थ बैद्यनाथ,और वराहमिहिर जैसे और आचार्यों ने इस विषय को कोई मायने नही दिया,लेकिन बाद के ज्योतिषियों ने इस मंगलीक दोष का हौआ खडा कर दिया,किसी ने लिखदिया,"लग्ने च व्यये पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे,कन्या भर्तुर्विनाशाय भर्तुर कन्या विनाशक:",इसका मतलब होता है कि १,४,७,८,१२ भावों में मम्गल हो तो कन्या अपने होने वाले पति का विनाश करती है,और वर अपनी होने वाली पत्नी का विनाश करता है,सामान्य बोलचाल की भाषा में "नाश कर देना",का मतलब है मार देना या नष्ट कर देना होता है,जैसे किसी ने दरवाजे के कपाट बनाये और एक पल्ला बडा और एक छोटा कर दिया तो हम कहेगे कि किवाड का नाश कर दिया,लेकिन जो नाश करदेना का मतलब मम्गल के लिये व्याख्याकारों ने दिया वह संसय से भरा ही कहा जायेगा,एक महिला की कुन्डली में मंगल,शुक्र और चन्द्र तीनो लगन में विराजमान थे,कन्या के पिता ने जितने लोगों को कुन्डली दिखाई सभी ने मंगली का दोष उस बेचारी कन्या के सिर पर थोप दिया,लेकिन किसी ने भी जरा सी मेहनत करने के बाद कुन्डली को देखा होता तो देख लेते कि कन्या के सप्तम में मंगल और ग्यारहवें भाव में गुरु केतु भी विराजमान है,कन्या का भाग्य प्रबल था,और वह पुलिस की एक ट्रेफ़िक एस.पी.बन कर जब सामने आयी तो कन्या के पिता को भी संतोष हुआ,और उसके लिये हजारों रिस्ते खुद ब खुद चलकर सामने आने लगे,आखिर में उसकी शादी एक अच्छे होनहार जज के साथ हुई और वह बडे आराम से अपने दो बच्चों के साथ नौकरी भी कर रही है,और घर भी सम्भाल रही है,मंगल का कारक पराक्र्म से होता है,मंगल के बारे में इतने बुरे व्याख्यान देना एक बेकार सी बात ही कही जायेगी,मंगल स्त्री की कुन्डली में पति का कारक होता है,और पति की कुन्डली में भाई का कारक होता है,कार्य के अन्दर बिजली और होस्पिटल से अथवा इन्जीनियर से जुडा होता है,शरीर में खून का कारक होता है,अगर सही तरीके से लग,सूर्य लग,चन्द्र लगन,और नवांश को देखा जाये तो संसार के निन्न्यानबे प्रतिशत लोग मंगली मिलेंगे,बाद में कुछ लोगों ने पापी ग्रहों में सूर्य और चन्द्र को भी शामिल कर लिया,सूर्य अगर पिता है,सूर्य अगर व्यक्ति का नाम है,सूर्य अगर व्यक्ति का ढांचा है तो सूर्य के पापी होने से सब कुछ बेकार ही हो जाऐ मंगल को खराब मान सकते है,सूर्य पिता और शनि किसी प्रकार से तामसी वस्तुओं का भोजन और तामसी लोगों से उठक बैठक जातक के खून को खराब कर सकती है,केवल अकेला मंगल तो इस प्रकार के भाव नही पैदा कर सकता है,नवांश नौ मिनट का प्रभाव देता है,लगन सवा दो घन्टे का प्रभाव देती है,सूर्य लगन महिने भर का प्रभाव देता है,और चन्द्र लगन सवा दो दिन का प्रभाव देता है,गुरु का प्रभाव साल भर का होता है,बुध का कभी महिने भर का और बक्री हो जाये तो सवा महिने का प्रभाव देता है,मंगल की चाल भी औसत एक महिने की ही होती है,तो फ़िर किस प्रकार से गलत प्रभाव मिलते है?गलत प्रभाव देने के लिये राहु,शनि और केतु ही जिम्मेदार होते है,मंगल नही.मंगल का सीधा सम्बन्ध रक्त से होता है.कुछ विशेष स्थानों में मंगल रक्त में उग्रता और कुछ मामलों में रक्त की अशुद्धि देता है.अपने ध्यान दिया होगा की मांगलिक अथवा मंगल से संभंधित लग्न के जातक खुजली ,फोड़े -फुंसियों आदि से अधिकतर प्रभावित होते हैं.साथ ही कुछ जातक असाधारण रूप से उग्र होते हैं.ऐसे में मैं व्यक्तिगत रूप से जब भी कुंडली मिलान करता हूँ ,तो इस पहलु को विशेष ध्यान रखता हूँ.मेरा मानना है की यदि एक कुंडली में मंगल दोषकारक हो रहा हो तो कम से कम दूसरी कुंडली में मंगल अपनी शुद्धता के साथ होना चाहिए.या किसी अन्य शुभ गृह की दृष्टि सम्बंधित भाव पर अवश्य होनी चाहिए.
मांगलिक वर के लिए मांगलिक कन्या का क्या अर्थ है मेरी समझ से बाहर है. क्या ऐसी अवस्था में हम मंगल से होने वाले सम्बंधित भाव को अधिक खराब नहीं कर देते?यदि किसी कुंडली में मंगल अपनी नकारात्मक उग्रता किसी जातक को दे रहा है तो ये आवश्यक हो जाता है की जातक का जीवन साथी सौम्य स्वाभाव ,व उग्रता में कम हो.ताकि जीवन में कभी यदि एक गुस्से में अपना नियंत्रण खो देता है तो कम से कम दूसरा स्तिथि को सम्हालने का प्रयास करे.साधारण सा नियम है की किसी भी प्रभाव को कम करना हो तो उसके विपरीत कारक को मजबूत करने का प्रयास करें.यदि गर्मी कम करनी है तो ठण्ड को प्रभावी होने दें,यदि अँधेरा कम करना है तो प्रकाश की मात्रा को अधिक करें.इसी प्रकार यदि मंगल कहीं किसी भाव को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है तो ,मंगल के व्यवहार के विपरीत ग्रह द्वारा उस भाव को सम्हालने वाली कुंडली को तलाश कीजिये.यही सुखी वैवाहिक जीवन का मन्त्र है.मंगल से मंगल को काटने वाली बात बेतुकी है.
शनिवार, 24 मार्च 2018
मां काली मुर्ती रहस्य
मां काली मुर्ती रहस्य। कभी आपने देखा है काली की मूर्ति को, वह मां है और विकराल, मां है और हाथ में खप्पर लिए है। आदमी की खोपड़ी का। मां है,।
उसकी आंखों में सारे मातृत्व का सागर। और नीचे, वह किसी की छाती पर खड़ी है। पैरों के नीचे कोई दबा हे। क्योंकि जो सृजनात्मक है, वहीं विध्वंसात्मक होगा। क्रिएटिविटि का दूसरा हिस्सा डिस्ट्रैक्शन है। इसलिऐ मां को खड़ा किया है, नीचे लाश की छाती पर खड़ी है। हाथ में खोपड़ी है आदमी की मुर्दा। खप्पर है, लहू टपकता है। गले में माला है खोपडियो की। और मां की आंखे है और मां का ह्रदय है, जिनसे दूध बहे। और वहां खोपड़ियो की माला टंगी है।
असल में जहां से सृष्टि पैदा होती है। वहीं प्रलय होता है। सर्किल पूरा वहीं होता है। इसलिए मां जन्म दे सकती है। लेकिन मां अगर विकराल हो जाती है। शक्ति उसमें बहुत है। क्योंकि शक्ति तो वहीं है, चाहे वह क्रिएशन बने और चाहे डिस्ट्रैक्शन बने। शक्ति तो वहीं है, चाहे सृजन हो या विनाश हो। जिन लोगों ने मां की धारणा के साथ सृष्टि और विनाश, दोनों को एक साथ सोचा था, उनकी दूरगामी कल्पना है। लेकिन बड़ी गहन और सत्य के बड़े निकटअसल मे स्वर्ग और पृथ्वी का मूल स्त्रोत वहीं है। वहीं से सब पैदा होती है। लेकिन ध्यान रहे, जो मूल स्त्रोत होता है,वही चीजें लीन हो जाती हे। वह अंतिम स्त्रोत भी होता है।
मंगलवार, 20 मार्च 2018
रत्न फिरोजा Gemstone
सोमवार, 12 मार्च 2018
लाल किताब ओर रत्न चयन
मित्रों रत्नों पर वात चल रही है मैंने अपनी पिछली पोस्ट रतनो पर ही लिखी थी जो आप लोगों द्वारा काफी पसन्द की गई यह पोस्ट भी रत्नों पर ही है लालं किताव में रतन पहनने के बारे में कई तरह के नियम बताए गए हैं।लाल किताब कहती है रत्न शुभ फल देने की शक्ति रखता है तो अशुभ फल देने की भी इसमें ताकत है। रत्नों के नाकारात्मक फल का सामना नहीं करना पड़े इसके लिए रत्नों को धारण करने से पहले कुछ सावधानियों का भी ध्यान रखना जरूरी होता है।
वैसे रतन पहने तो लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर ही पहने।लाल किताब के अनुसार रत्नों में मंदे, कमजोर एवं सोये हुए ग्रहों को नेक, बलशाली, एवं जगाने की क्षमता होती है। लेकिन जब तक सही ज्योतिषी सलाह ना मिले, तब रत्न धारण करने ने नुकसान हो सकता है।वैदिक ज्योतिष के समान लाल किताब भी भविष्य जानने की एक विधा है.लाल किताब में ग्रहों के योग और उनके फल के सम्बन्ध में अपनी मान्यताएं हैं यह ग्रंथ जन्म कुण्डली, हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का मिश्रण है और जिन व्यक्तियों को अपनी जन्म कुण्डली की सत्यता पर भरोसा ना हो तो वह लालकितावके ज्ञान के आधार पर अपने जीवन की बाधाओं का समाधान कर सकते हैं।ज्योतिष की इस विधा में भी लग्न कुंडली वनाई जाती हैप्रयुक्त कुण्डली बस्तुतः पारम्परिक जन्म कुण्डली ही है। जन्म कुण्डली में ग्रहों को यथा स्थान रहने दें, जिन राशियों वह हैं, उन्हें हटा दें। अब लग्न को 1(मेष) राशि मानते हुए दूसरे, तीसरे, आदि 12 भावों में क्रमशः 2(वृष), 3(मिथुन) आदि 12 राशि 12(मीन) तक लिख दें। यह कुण्डली लाल किताब का आधार है।
मित्रों ध्यान दें, लग्न कुण्डली में चाहे जो राशि हो लाल किताब की कुण्डली में सदैव मेष राशि ही रहती है। इसी प्रकार क्रमशः दूसरे में वृष, तीसरे में मिथुन आदि मीन तक बारहों राशियॉ रहती है। यह इन घरों की पक्की राशियॉ कहलाती हैं।
जो ग्रह शत-प्रतिशत शक्तिशाली होते हैं, वह उच्च के ग्रह कहे जाते हैं तथा जो ग्रह निर्बल होते हैं, वह नीचे के कहे जाते हैं। कुण्डली में इनके स्थान भी सुनिश्चित हैं, यथा
स्पष्ट ग्रह शुभता प्रदान करने में पूर्ण रुप से सहयोगी सिद्ध होता है। ज्योतिष शास्त्र के नियमों की तरह प्रत्येक ग्रह की अपनी दृष्टि विशेष होती है। सूर्य, चंद्र, गुरु तथा बुद्ध अपने से सातवें भाव को देखता है। गुरु, राहु, केतु अपने से पॉचवे, सातवें तथा नवे भाव को देखते हैं। मंगल चौथ, सातवे, आठवे भावों को तथा शनि अपने से तीसरे, सातवे तथा दसवे भाव को देखता है। प्रत्येक ग्रह सातवे भाव को अवश्य देखता है।लाल किताब से रत्न चयन करने के लिए यह परिचय पूर्ण नहीं कहा जा सकता तदापि यह भूमिका विषय को समझाने और व्यवहार में लाने की कुंजी अवश्य सिद्ध हो सकती है। किसी कुण्डली में यदि बलवान है, लाल किताब की भाषा में कहें कि यदि वह अपने पक्के ग्रहों में स्थित है तो उनसे संबंधित रत्न धारण किया जा सकता है। किताब सदैव उच्च अर्थात शत-प्रतिशत शक्तिशाली ग्रहों के रत्न धारण करने पर बल देती है। ऐसे योग कुण्डली में खेाजना बहुत ही सरल है। परन्तु यदि कुण्डली में शक्तिशाली ग्रह अथवा ग्रहों का अभाव हो तो सुप्त ग्रह तथा सुप्त भाव को बलवान करने का प्रयास करना चाहधि जितनी सरल है उतनी ही अधिक प्रभावशाली भी सिद्ध होगी। आवश्यता है कि इस ज्ञान को समझने की, उसमें अधिक खोज करने की, तदनुसार व्यवहार में लाने की ताकि अधिकारिक रुप से मानव कल्याण हो सके। अपने बुद्धि-विवेक से और आगे बढ़ाने का एक और प्रयास करके तो देखिये, कितने संतोष जनक परिणाम आपको मिलते हैं।तमाम वैदिक ज्योतिषी मित्रों को कहना चाहता हूं आप लाल किताब की निन्दा मत करें आप इस विघा को सिखे यदि किसी घर में कोई ग्रह सोया हुआ हो तो उस घर को और उस ग्रह के प्रभाव को जाग्रत करने के लिए उस घर का रत्न धारण करें। जैसे पहले घर को जगाने के लिए मंगल का रत्न, दूसरे घर को जगाने के लिए चंद्र का, तीसरे के लिए बुध का, चैथे के लिए चंद्र का, पांचवें के लिए सूर्य का, छठे के लिए राहु का, सातवें के लिए शुक्र का, आठवें के लिए चंद्र, नौवें के लिए गुरु का, दसवें के लिए शनि का, ग्यारहवें के लिए गुरु का एवं बारहवें घर को जगाने के लिए केतु का रत्न धारण किया जा सकता है। यदि दो ग्रह आपस में टक्कर के हों और उनमें शत्रु भाव उत्पन्न हो रहा हो तो दोनों ही ग्रहों के रत्न एक साथ ही पहनना चाहिए। किसी कुंडली में ग्रह यदि बलवान हों, लाल किताब की भाषा में कहें तो यदि वे अपने पक्के घरों में स्थित हों, तो उनसे संबंधित रत्न चयन किया जा सकता है। लाल किताब सदैव उच्च अर्थात शतप्रतिशत शक्तिशाली ग्रहों के रत्न धारण करने पर बल देती है। ऐसे योग किसी कुंडली में खोजना बहुत ही सरल है। परंतु यदि कुंडली में शक्तिशाली ग्रह अथवा ग्रहों का अभाव हो तो सुप्त ग्रह तथा सुप्त भाव को बलवान बनाने की प्रक्रिया अपनाएं। यह विधि जितनी सरल है उतनी ही प्रभावशाली भी। यदि कुंडली में चंद्र ग्रह सर्वाधिक बलशाली हो तो चंद्र का रत्न मोती धारण करवाया जा सकता है। इसके साथ-साथ सुप्त भाव तथा सुप्त ग्रह को भी बलवान कर लिया जाए तो परिणाम अधिक अच्छे होंगे। कुंडली में सर्वाधिक भाग्यशाली ग्रह उच्च भाग्य का द्योतक है। भाग्य के लिए सर्वोत्तम ग्रह के अनुरूप रत्न का चयन निम्न चार बातों को ध्यान में रखकर कर सकते हैं- जिस राशि में ग्रह उच्च का होता है और लाल किताब की कुंडली के अनुसार भी उसी भाव अर्थात राशि में स्थित होता है उससे संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है। यदि ग्रह अपने स्थायी भाव में स्थित हो तथा उसका कोई मित्र ग्रह उसके साथ हो अथवा उसको देखता हो तो उस ग्रह से संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है। नौ ग्रहों में से जो ग्रह श्रेष्ठतम भाव में स्थित हो, उस ग्रह से संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है। कुंडली के केंद्र अर्थात पहले, चैथे, सातवें तथा 10वें भाव में बैठा ग्रह भी भाग्यशाली रत्न इंगित करता है। यदि उक्त भाव रिक्त हों तो नौवां, नौवां रिक्त हो तो तीसरा, तीसरा रिक्त हो तो ग्यारहवां, ग्यारहवां रिक्त हो तो छठा और यदि छठा भाव भी खाली हो तो खाना 12 में बैठा ग्रह भाग्य ग्रह कहलाता है। इस ग्रह से संबंधित रत्न भी भाग्य रत्न कहलाता है। जब किसी भाव पर किसी भी ग्रह की दृष्टि नहीं हो अर्थात वह भाव किसी भी ग्रह द्वारा देखा नहीं जाता हो तो वह सुप्त भाव कहलाता है। उदाहरण में ऐसे सुप्त भाव पहला तथा सातवां हैं। इन दोनों भावों को कोई भी ग्रह नहीं देख रहा है। इसके लिए यदि इन भावों को चैतन्य कर देने वाले ग्रहों का उपाय किया जाए तो ये भाव चैतन्य हो जाएंगे तथा इन से संबंधित विषय में व्यक्ति को आशातीत लाभ मिलने लगेगा। जब कोई ग्रह किसी अन्य ग्रह को नहीं देखता तो वह ग्रह सुप्त कहलाता है। सुप्त ग्रह कब जाग्रत होते हैं अर्थात आयु के किस वर्ष में फल देते हैं इसका विवरण भी लाल किताब में मिलता है। यदि उस वर्ष में खोज किए हुए ग्रह के उस रत्न का प्रयोग किया जाए तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यथा उपाय सहायता मिलती है। लाल किताब के अनुसार ग्रहों के कुप्रभावों को समाप्त करने के लिए, उन्हें अनुकूल बनाने के लिए नीचे दिए गए विवरण के अनुसार विभिन्न रत्नों को विभिन्न धातुओं में धारण करना चाहिए। जिस ग्रह को बलवान करना हो उस ग्रह का रत्न उसकी धातु के साथ जड़वा कर पहनना चाहिए। जन्म का ग्रह और जन्म समय का ग्रह यदि एक हो तो वह व्यक्ति के लिए हमेशा शुभ फल प्रदान करने वाला होता है। अतः उसका रत्न निःसंकोच धारण कर लेना चाहिए। जन्म दिन के ग्रह एवं जन्म समय के ग्रह का विवरण इस प्रकार है। इस प्रकार समस्याओं से पीड़ित जातकगण लाल किताब के अनुसार अपने भाग्यशाली रत्न का चयन कर प्रतिकूल ग्रहों के कुप्रभावों से अपनी रक्षा कर सकते हैं। लाल किताब के उपायों से कष्ट निवारण में सहायता मिलती है, यह एक निर्विवाद सत्य है। दिन समय ग्रह रविवार दिन का दूसरा प्रहर सूर्य सोमवार चांदनी रात चंद्र मंगलवार पूर्ण दोपहर मंगल बुधवार दिन का तीसरा प्रहार बुध गुरुवार दिन का प्रथम प्रहर गुरु शुक्रवार कालीरात शुक्र शनिवार रात्रि एवं अंधकारमय शनि गुरुवार शाम पूर्णशाम राहु रविवार प्रातः सूर्योदय से पूर्व केतु ग्रह रत्न धातु सूर्य माणिक्य सोना चंद्र मोती चांदी मंगल मूंगा तांबा बुध पन्ना सोना गुरु पुखराज सोना शुक्र हीरा चांदी शनि नीलम लोहा राहु गोमेद ऊपर धातु केतु लहसुनिया सोना या तांबात्रों ,आप सब जब भी रत्न धारण करे तो ऊपर लिखी बातों का अवश्य ध्यान करे .प्रत्येक जातक को अपनी ग्रह की महादशा के अनुसार और ग्रहो की मित्रता ,उच्च राशिगत ,नीच राशिगत ,अन्तर्दशा ,अन्य ग्रहो की दृष्टि इत्यादि बातो का गहन अध्ययन करके की सही रत्न का चुनाव करना चाहिए नहीं तो लाभ की जगह हानि का सामना करना पड़ सकता हैत्रों ,आप सब जब भी रत्न धारण करे तो ऊपर लिखी बातों का अवश्य ध्यान करे .प्रत्येक जातक को अपनी ग्रह की महादशा के अनुसार और ग्रहो की मित्रता ,उच्च राशिगत ,नीच राशिगत ,अन्तर्द सबशा ,अन्य ग्रहो की दृष्टि इत्यादि बातो का गहन अध्ययन करके की सही रत्न का चुनाव करना चाहिए नहीं तो लाभ की जगह हानि हो सकती है हमसे कुंडली दिखाने पर जातक को रत्न का सुझाव बड़ी ही सटिकता से दिया जाता है .अनेक जातको ने हमारे द्वारा लताऐं सही रत्न का चुनाव कर कई समस्यायों से निजात पाई है .यदि आप भी किसी भी समस्या से पीड़ित है तो मुझसे अवश्य संपर्क करे और पुरे विश्वास के बाद ही रत्न धारण करे क्योंकि आपका विश्वास ही आपकी सफलता की निशानी है .किसी के प्रति अविश्वास ही असफलता की प्रथम सीढ़ी है .
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्jyotish acharya Rajesh: लहसुनिया केतु रतन �� Catseye
गुरुवार, 8 मार्च 2018
लहसुनिया केतु रतन 🐈 Catseye
महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां
‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...
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https://youtu.be/hb9Ouf_rST4 मित्रों आज बात करेंगे बुध और शनि की युति जब एक ही भाव में एक साथ हो या किसी भी तरह की युति बन रही है, तो कल क्य...
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लक्ष्मी योग शुभ ग्रह बुध और शुक्र की युति से बनने वाला योग है।बुध बुद्धि-विवेक, हास्य का कारक है तो शुक्र सौंदर्य, भोग विलास कारक है।अब ये द...
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जब किसी के जीवन में अचानक परेशानियां आने लगे, कोई काम होते-होते रूक जाए। लगातार कोई न कोई संकट, बीमारी बनी रहे तो समझना चाहिए कि उसकी कुंडली...
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दशम भाव ज्योतिष भाव कुडंली का सबसे सक्रिय भाव है| इसे कर्म भाव से जाना जाता है क्यूंकि ये भाव हमारे समस्त कर्मों का भाव है| जीवन में हम सब क...
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https://youtu.be/I6Yabw27fJ0 मंगल और राहूजब राहु और मंगल एक ही भाव में युति बनाते हैं, तो वह मंगल राहु अंगारक योग कहलाता है। मंगल ऊर्जा का स...
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मालव्य योग को यदि लक्ष्मी योगों का शिरोमणी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं। मालव्य योग की प्रशंसा सभी ज्योतिष ग्रन्थों में की गई है। यह योग शुक्...
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आचार्य राजेश ईस बार मलमास 15 दिसंबर से आरंभ हो रहा है जो 14 जनवरी 2018तक रहेगा। मलमास के चलते दिसंबर के महीने में अब केवल 5 दिन और विवाह मुह...
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मित्रों आज वात करते हैं फिरोजा रतन की ग्रहों के प्रभाव को वल देने के लिए या फिर उन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए ज्योतिष विज्ञान द्वारा विभि...