गुरुवार, 16 अगस्त 2018

जन्मकुंडली में छठा भाव (6)षट्म भाव

ज्योतिष ने छठे घर को बीमारी, क़र्ज़, शत्रु, अधीनता, पराधीनता इत्यादि का माना है | लाल किताब के अनुसार इस घर का मालिक बुध और कारक केतु होता हैओर शनी  राशिफल का  ग्रह तथा यह घर पाताल होता है | क्योकि लाल किताब के अनुसार केतु हमारे पैर का प्रतिनिधित्व करता है और राक्षसों का निवास स्थान पाताल होता है इसलिए इस घर में राहु उच्च का हो जाता है |लाल किताब की धारणा अनुसार षष्टम भाव को घर के ख़ुफ़िया रास्ते एवं तहखाने से सम्बंधित बताया गया है। किसी जातक के शत्रु, सेवक, रोग एवं मामा के सम्बन्ध में विवेचन षष्टम भाव से किया जाता है।

   नाना एवं भांजे का मकान कैसा होगा इसी भाव से देखा जाता है रिश्तेदारों से मिलने वाली सहायता के सम्बन्ध में षष्टम भाव ही बताता है। मित्रोंष्ठ भाव रोग, ऋण और रिपु का कहा गया है। ये तीनो बातें गंभीर रूप में मुखर हो कर जब सामने आती है तब हम सहसा कह उठते है कि - ना जाने किस जन्म का यह फेर है जिसमें हम आज भी बंधे है । 'जन्म-जन्म का वैर', 'पिछले जन्म का कर्ज', 'पिछले जन्म का पाप' आदि कुछ लोकोपयोग के मुहावरे है जो पूर्व जन्म और रोग-ऋण-रिपु के संबंधों को बताते हैं। लोकाचार के मुहावरे time immemorial से चली आ रही मान्यता, परंपरा व तात्कालीन धर्म,आध्यात्म, विज्ञान आदि से उपजी आम समझ को अपने साथ ढोती हुई यहाँ तक लाती है। इसलिए लोक-व्यवहार में प्रयुक्त मुहावरों का अपना विशेष महत्व है। जब हम ज्योतिष की बात करते हैं तो हमें पुनर्जन्म की अवधारणा को मानना ही होगा। पुनर्जन्म की अवधारणा दो जीवन की निरंतरता और आत्मा की अमरता की और कालपुरुष से सम्बद्ध होने की कड़ी है । कुंडलीमे  देखें तो हमारे इस जीवन का पंचम भाव पिछले जन्म का सूचक है। अर्थात, इस जीवन का पूर्वजन्म का भाव (5भाव  ) पूर्व जीवन का द्वादश/मोक्ष भाव है । दुसरे शब्दों में, अब का पंचम भाव तब का द्वादश भाव था। तो पिछले जन्म का लग्न क्या होगा - एक घर आगे तब के द्वादश से (जो अब का पंचम है)। अर्थात, इस जन्म के पंचम भाव से एक घर आगे अर्थात षष्ठ भाव। षष्ठ भाव पिछले जन्म का लग्न  इसे त्रिकोण के रूप में समझें । पिछले जन्म का जो धर्म त्रिकोण था आज हमारा अर्थ त्रिकोण है। जो ‘धर्म’ हमने पूर्व में किया था उसका tangible effect इस जीवन के अर्थ त्रिकोण से प्रकट होगा।कुंडली का छठा भावग्न- पंचम-नवम भाव का त्रिकोण महत्वपूर्ण त्रिकोण होता है। दूसरा भाव ,प्राप्त होने का भाव है।किसी भी भाव को यदि बीज -जड़ या मूल मान लिया जाय तो समझिए अगला भाव, इस बीज का फल है, इसकी उपज है ,इससे प्राप्त हासिल है.नवम का फल कर्म है ,लग्न का फल धन भाव है।धन भाव अर्थात आपके पैदा होते ही आपको सहज प्राप्त वसीयत ,आपको स्वतः प्राप्त सुविधा।इसी प्रकार पंचम भाव जो की शिक्षा, संतान या सीधे कहूँ उत्पादन का भाव है ,इसका ही फल षष्टम भाव है.जातक के जन्म लेते ही उसके लिए शत्रु का रोल निभाने वाला भाव। ये शत्रु भाव है ,किसका शत्रु भला ?कुंडली का ,जातक का। उसकी हैसियत का ,उसकी पर्सनैलिटी का।पने प्राप्त ज्ञान से,अपने उत्पादन से (पंचम से ) आगे के जीवन के लिए जो उत्पादित होना था ,जो लाभ नवम के रूप में लग्न को प्राप्त होना था, उसके लिए लिए विनाश का कारण बन जाता है छठा भाव। लग्न को यह आठवीं दृष्टि से देखता है ,उसे बर्बाद करने वाली स्थितियां उत्पन्न करता है। शायद उलझ रहे हैं आप .... चलिए सामान्य भाषा में कहता हूँ।

अपनी सोच ,अपने प्राप्त ज्ञान को (पंचम ) जातक अपने भाग्य को बदलने ,या कहें काम करने का अवसर ,सोच मुहैया करता है।भाग्य के लिए प्लेटफॉर्म तैयार करता है . पंचम भाव के लिए लग्न ही भाग्य भाव होता है ,अतः प्राप्त शिक्षा ,प्राप्त ज्ञान से वह अपने लिए फिर अवसर पैदा करता है यानी हालात उत्पन्न करता है। पंचम भाव का पंचम भाव कुंडली का नवम भाव होता है। यानी अपने प्राप्त ज्ञान (पंचम )से हम नवम के लिए बीज होते हैं (त्रिकोण के अनुसार )अब इस बीज का फल (नवम का ) लग्न होता है। लेकिन भाग्य से प्राप्त फल (लग्न )के फल की क्वालिटी इस बात पर निर्भर करती है की नवम को बीज के रूप में ,पैदा होने के हालात के रूप में ,या कहें पृष्टभूमि के रूप में पंचम भाव ने कैसा बीज उपलब्ध कराया था।ये सोच का चक्र है।भाई इस गड़बड़झाले में छठे भाव का रोल तो नजर ही नही आ रहा।छठा भाव शत्रु का भाव है ,किसका शत्रु ? जाहिर रूप से लग्न का ,शरीर का ,जीवन का ,जातक का। यह कमियों का भाव है। हमारी कमियां ही हमारी शत्रु हैं ,हमारे शरीर का रोग हैं ,तभी तो मारक हैं लग्न में मौजूद मानसिक शक्ति के लिए ,तभी तो शत्रु का किरदार निभा रहा है ,क्योंकि यहाँ से लग्न आठवां पड़ता है।बर्बाद भले ही अष्टम करता हो किन्तु उस अष्टम के लिए लग्न में जो सोच बनती है उसकी रूप रेखा तैयार करने का काम कुंडली का षष्टम भाव ही करता है.किसी भी भाव को यदि हाथी माना जाय तो अगला भाव उस हाथी को दिशा देने वाला अंकुश है ,उसे एकाग्रता देने वाला बिंदु है।पंचम भाव ने रावण को छठे के रूप में ऐसा विनाशकारी फल दिया जिसने रावण की सोच को (लग्न को )कभी सदबुद्धि से काम ही नहीं करने दिया। परम ज्ञानी (पंचम के बलवान होने के कारण )भी प्राप्त ज्ञान के रूप में जो फल छठे भाव से उत्पन हुआ उसने रावण को अहंकारी ,लोभी ,कामी बना दिया।अपनी शिक्षा अपने ज्ञान को सही गति न दे सकने के कारण अंत में रावण दुर्गति को प्राप्त हुआ।छठे भाव की स्थिति आरम्भ में ही संकेत दे देती हैं कि क्या चीज जातक के जीवन में उसके लिए शत्रु का रोल निभाने वाली है।तुला लग्न में उत्पन रावण के लिए आरम्भ में ही तय हो चुका था की शत्रु के रूप में गुरु (तुला से छठे में गुरु की मीन राशि होती है )यानी उसका ज्ञान ही उसकी सद्बुद्धि (लग्न को )मारक प्रभाव देगा। अपने अहम का परिणाम ही भुगता उसने।इसी प्रकार यदि किसी जातक की कुंडली में चन्द्रमा छठे भाव में मौजूद है तो मान लीजिये कि जातक की भावनाएं ही उसके लिए शत्रु का रोल निभाने वाली हैं।भावनाओं की अधिकता में ऐसा जातक अपना भला बुरा नहीं भांप पाता। अतः माता पिता को चाहिए की अपनी संतान की कुंडली में षष्टम भाव में प्रभावित हो रहे ग्रहों से बचाव का प्रयास शास्त्रोक्त उपायों द्वारा करते रहें।पंचम भाव में पड़ा बीज ही तय कर देता है की आगे फल की रूप रेखा कैसी होने वाली है जीवन में हमें पैदायशी हासिल सुख भाग्यवश ही प्राप्त होते हैं। इस भाग्य को तय करने के लिए ,इस त्रिकोण का बेस, पंचम भाव है। छठा भाव इस पंचम भाव को दिशा देने वाला भाव है। यानी इस जीवन व उस जीवन में भाग्यवश हमें जो भी प्राप्त होने वाला है उसका बीज पंचम में पड़ गया होता है। व षष्टम भाव उस बीज को पालने का कार्य करता है .छठा भाव, दशम कर्म भाव की बुनियाद है।इतिहास गवाह है की जो जातक अपने कार्य व्यवसाय हेतु छठे की मदद लेकर चला ,उसने बुलंदियों का स्पर्श किया। अतः जैसे ही आप छठे भाव पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते है,आप दशम को अपने आप दशम को अपने मन माफिक हालात उपलब्ध करा पाते हैं।(अब दशम का बीज आपके अधिकार में जो होता है ).इसी समीकरण में दशम अपने अगले कोण (द्वितीय )के लिए प्लेटफॉर्म बनाता है।जितना अच्छा दशम भाव उतना मजबूत द्वितीय भाव।किसी जातक के कार्य व्यवसाय के प्रति कोई भी भविष्वाणी करने से पहले छठे भाव का अध्ययन अवश्य करें। कुंडली त्रिकोणों पर आधारित होती हैं ,किसी भी भाव के सम्बंधित अन्य दोनों कोणों का बहुत महत्त्व होता है. दशम काम धंधे या कहें कर्म भाव के बनने वाले त्रिकोण में द्वितीय व षष्टम भाव ही त्रिकोण के अन्य दो कोण हैं। ऐसे में दशम भाव से सम्बंधित किसी भी प्रकार की भविष्य वाणी हेतु षष्टम भाव को नजरंदाज करना बड़ी चूक है।सामान्य भाषा में यही कि जितना आपने अपनी कमजोरियों,अपने माइनस पॉइंट्स को काबू में रखा ,जीवन में अपनी पॉवर अपनी शक्ति अपने कर्म को नियंत्रित करने का अधिकार पाया। भला कैसे ??? दशम भाव का भाग्य स्थान छठा भाव ही तो है। अतः ये सोचना कि शिक्षा भाव से (पंचम से ) दशम भाव नियंत्रित होगा ,भला कितनी बड़ी भूल है। दशम से पंचम तो अष्टम ,मारक होता है मारक  से मारने वाला नहीं होता मित्रों.हाँ इस पंचम को काबू में करने वाला अंकुश (छठा भाव ) अवश्य नवम है। अतः अपने ज्ञान की सही दिशा तय करके सफलता प्राप्त की जा सकती है। डाक्टरी की पढाई कर (पंचम )उसे सही दिशा (छठे द्वारा ) जन कल्याण में लगाया तो दशम की शक्ति को प्राप्त किया। किन्तु यदि यहीं से डाक्टरी सीख कर लोगों की किडनी आदि निकालने का कार्य किया तो दशम के लिए मृत्यु का प्रभाव उत्पन्न किया। काम भी ख़त्म ,सम्मान भी ख़त्म। शिक्षा भी ख़त्म।

शत्रु भाव का शत्रु एकादश भाव होता है ,जाहिर तौर पर यदि आपका एकादश भाव मजबूत है तो आप अपने कई रोगों,कई शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। कहते हैं की रावण ने अपने पुत्र मेघनाथ के लिए एकादश भाव को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया था। मेघनाथ की कुंडली में एकादश भाव में ही सर्वाधिक ग्रहों का बल प्राप्त हो रहा था। अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिए उसने मेघनाथ के एकादश भाव से सहायता प्राप्त की। आखिर इंद्रजीत तो मेघनाथ ही था न।

शत्रु भाव को (छठे भाव ) को बुद्धि दशम से प्राप्त होती है ,अर्थात कर्म ही आपके शत्रु भाव को सदबुद्धि प्राप्त करा सकते हैं ,अतः अपनी बुद्धि का गलत उपयोग किया तो नवम को खराब किया ,अपनी बुद्धि के अंकुश पर नियंत्रण नहीं रखा तो दशम को खराब कियाअतः अपने कर्मों के द्वारा हम शत्रु भाव को विनाशकारी होने से रोक सकते है। आचार्य राजेश

सोमवार, 13 अगस्त 2018

पंचम भाव की पूरी जानकारी

 मित्रो पंचवा भाव पणकर (शर्त कर) होता है। यह मिलाजुला शुभाशुभ भाव माना जाता है। 

इस भाव से जातक के जीवन की सफलता असफलता का विचार किया जाता है। इसी  से जातक का भविष्य जाना जाता है। पंचम भाव का स्वामी सूर्य और कारक वही गुरु को बनाया गया क्यों की सूर्य रुपी प्रकाश द्वारा ही हम पंचम रुपी विद्या ग्रहण करते हैं और इसके संतान कारक होने का कारण भी यही है के संतान ही अपने माता पिता का नाम रौशन करती है ,इसे प्रॉडक्‍शन हाउस भी कह सकते हैं। इंसान क्‍या पैदा करता है, वह इसी भाव से आएगा। इसमें शिष्‍य, पुत्र और पेटेंट वाली खोजें तक शामिल हो सकती हैं। ईमानदारी से की गई रिसर्च भी इसी से देखी जाएगी। ईमानदारी से मेरा अर्थ है ऐसी रिसर्च जिससे विद्यार्थी अथवा विषय के लिए कुछ नया निकलकर आ रहा हो। इसके अलावा आनन्‍दपूर्ण सृजन, सुखी बच्‍चे, सफलता, निवेश, जीवन का आनन्‍द, सत्‍कर्म जैसे बिंदुओं को जानने के लिए इस भाव को देखना इसी पंचम से हर व्यक्ति की मानसिकता भी देखी जाती है तो उन कारकों की पोजीशन के अनुसार ही हम कोई निर्णय ले सकते हैं ! ्कुंडली का पांचवा भाव बहुत मत्वपूर्ण भाव होता है क्योकि यह लग्नेश के मित्र का भाव होता है टलग्नेश ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी पंश्मेश को दी है इसको त्रिकोनाधिपति भी कहते हैइस भाव की सबसे बड़ी खसियत यह है यह भाव सभी शुभ भावो और अच्छे भावो से सही प्लेसमेंट रखता है


यह भाव लगन से 5 है

2 भाव से 4 है

7 भाव से 11 है

9 भाव से 9 है

और

11 भाव से 7 है

अच्छे भावो से यह और भी अच्छा हो जाता है

अगर आपका यह भाव खराब हो जाय आपका तीन पिलर में से एक पिलर टूट जायगा

जिस पर आपका पूरा लगन खड़ा हैलग्नेश यानी आप को संतान इस भाव से ही प्राप्त होती है

आपकी संतान कैसी होगी वो आपके नाम को यश देगी या आपके नाम पर कलंक लगा देगी यह चीज़ इस भाव से जानी जा सकती है

इस भाव से आपका ज्ञान आपकी हाई एजुकेशन कैसी होगी आपको पढ़ाई लिखाई का सुख मिलेगा या नही आप पर मा सरस्वती कितनी मेहरबान है इस भाव से पता चल जाता है

कुंडली मे यह भाव मझबूत हो इंसान खूब पड़ा लिखा होता है उसकी बुद्धि बहुत तेज होती है वो हर चीज़ को बहुत जल्दी समझ लेता है

इस भाव से आपका पेट के बारे में भी जाना जाता है आपकी पाचन शक्ति कितनी मझबूत है इंसान के पेट से होने वाली बीमारिया भी इस भाव से देखी जाती है

कयह भाव अच्छा हो इंसान को धन की भी अच्छी प्राप्ति होती है ऐसा इंसान अपने काम मे बहुत बड़ी कामियाबी हासिल करता है्कुंडली का चौथा भाव जनता का प्यार है5 भाव जनता का धन होता है पब्लिक रिलेशनशिप से।उसको धन मिलता हैसट्टा शेयर मार्कीट से इंसान को बहुत फायदा होता है अगर यह भाव बहुत अच्छा होगाइस भाव से आपके प्रेम सम्वन्ध भी देखे जाते है इंसान का प्रेम विवाह होगा और वो कितने लोगों के साथ अपने प्रेम संबंध रखता हैकुंडली मे यह भाव अगर अच्छा हुआ आप जीवन मे जल्दी सफलता पा सकते है क्योकि पिछले जन्मो के अच्छे कर्म होने की वजह से आप जल्दी ही किसी चीज़ को हासिल कर लेते हैसंतान आपकी आज्ञाकारी होगी आपके सुख और दुख में आपके साथ चलेगीअगर कुंडली का भाव भावेश और कारक खराब हुआ आपकी पढ़ाई पूरी नही हो पाएगी आप विद्या के क्षेत्र में पीछे रह जाओगेआपकी संतान नही होगी अगर हुई तो आपको उसका सुख नही मिल पाएगा वो आपको बीच मे ही छोड़कर चली जायेगी आपके दुखो में वो आपका साथ नही देगीआपके पिछले जन्मों के पुन्य नष्ट हो जायँगे और इस जीवन मे आपको बहुत संघर्ष करना होगापाचवें घर से शरीर के अंगों में दिल, रीढ की हड्डी का विचार किया जाता है.इस भाव से ईश्वरीय ज्ञान देखा जाता है. किसी व्यक्ति की ईश्वर पर कितनी श्रद्धा है. इसकी जानकारी पंचम घर से ही प्राप्त होती है. पंचम घर से नाटक, फिल्म, कलाकार, तथा फिल्म उद्योग (film industry) से जुड़े विषयों को  भीदेखा जाता है. तीसरे घर से तीसरा भाव होता है इस कारण इस घर से भाई-बन्धुओं की छोटी यात्राओं का आंकलन किया जाता है. जीवनसाथी से लाभ, पिता की धार्मिक आस्था, पिता की विदेश यात्रा, कोर्ट-कचहरी के फैसले के विषय में भी यही घर जानकारी देता है. यह स्थान छठे घर से बारहवां स्थान है जिसके कारण प्रतियोगिता कि भावना कमी करता है. नौकरी में बदलाव, उधार लिये गये ऋण की हानि भी दर्शाता है.घर में रसोईघर को पंचम भाव का स्थान माना जाता है.

जन्म कुंडली में चोथे (चतुर्थ) भाव की पुरी जानकारी

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मित्रों आप सब को आचार्य राजेश का नमस्कार। मित्रों मैं आप सब का धन्यवाद करता हूँ कि आप सब समय निकाल कर मेरे आर्टिकल्स पड़ते हैं और उनसे अधिक अधिक लाभ उठाते हैं।मित्रों आज मैं खाना न 4 की व्याख्या करने जा रहा हूं जिसे लाल किताब में माता की गोद कहा है |

चोथे भाव का स्वामी चन्द्रमा है। इस भाव का कारक भी चन्द्रमा है। लाल किताब ने चन्द्रमा को माता माना है। ज्योतिष शास्त्र में भी चन्द्रमा माता का कारक है। इसी कारण चतुर्थ को मातृ भाव की संज्ञा दी गयी है।चतुर्थ भाव केंद्र भावों में से एक है। लाल किताब में केंद्र भावों को बंद मुठी के भाव कहा गया  लाल किताब में हथेली के विभिन्न भावों के स्थान माने गए है। अंगुलियों से ठीक नीचे ह्रदय - रेखा से घिरे हुए स्थान पर अनामिका की जड़ में प्रथम भाव, कनिष्टिका की जड़ में सप्तम और मध्यमा की जड़ में दसवें भाव का स्थान है। चतुर्थ भाव का स्थान कलाई के बिलकुल पास में हथेली के गुद्दे पर है। मुट्ठी बंद करने पर 1 ,7 ,10 ही मुट्ठी के भीतर आते है। चन्द्रमा का सिंहासन तो मुट्ठी से बाहर रह जाता है। फिर भी चतुर्थ को बंद मुठी का भाव कहने का कारण यह है कि इस भाव के द्वारा गर्भस्र्त शिशु का विचार किया जाता है। माता की गोद, पेट का जमाना। शिशु को अपने भीतर बंद किये हुए गर्भाशय बंद मुठी ही तो है।गर्भावस्था के समय तीनों नर ग्रह (सूर्य, मंगल, गुरु) चन्द्र माता की शरण में होते है। उसका मित्र बुध भी मदद करता है। फलतः गर्भस्थ शिशु पूर्णतः सुरक्षित रहता है।“तीनों मित्र ग्रह नर शरण माता की, पेट अंदर कुल पलता हो।”इस किलेबंदी के रहते हुए राहु केतु जैसे परम पापी भी गर्भ का कोई अनिष्ट नही कर पाते। यहां पर बैठा ग्रह चंद्र के प्रभाव में होता है“ग्रह चौथे हो जो कोई बैठा, तासीर चन्द्र वो पाता है।असर मगर हो उस घर जाता, शनि जहां टेवे बैठा हो।”यदि चतुर्थ स्तिथ ग्रहों में से किसी का अशुभ प्रभाव हो तो वह उस घर में चल जाता है, जिसमे शनि देव विराजमान हों। चन्द्रमा रात्रि बलि होता हे । इसलिए जन्म कुंडली में चतुर्थ में जो भी ग्रह विधमान होते है ,वे रात्रि बलि हो जाते है -“ग्रह चौथे का रात को जागे, या जागे मुसीबत में।”चतुर्थ में कोई ग्रह अकेला हो और उसका सहायक कोई न हो तो वह बुढ़ापे में शुभ फल देता है -“मदद कोई हो न जब करता है, आ तारे वो बुढ़ापे में”चतुर्थ भाव खाली हो और चन्द्रमा केंद्र के घरों से बाहर हो तो भी सब ग्रहों का फल उत्तम होता है, चाहे चन्द्रमा रद्दी ही क्यों न हों -“खाली होते चौथे मंदिर आखिरी उम्र तक उन्नति हो,चन्द्र का फल दे चन्द्र, बैठा चन्द्र चाहे नष्टि हो “चौथे भाव का मालिक चन्द्रमा है,जो इस घर में उच्च फ़ल का भी है,यानी चन्द्रमा या गुरु किसी का भी चौथे भाव में होना शुभ फ़ल ही देता है,चौथे घर में हम अपने पिता की ओर से क्या प्राप्त करेंगे,या पिता की स्थिति कैसी होगी हमे इस बात का संकेत मिलता है। इसके अलावा पिता के साथ हमारा संबन्ध कैसा होगा यह भी चौथे भाव से देखा जाता है।  चौथा भाव घर में पानी रखने का स्थान है,यह नल कुंआ आदि का भी कारक है,शारीरिक तौर पर हमारे शरीर में आयुर्वेदिक सिद्धान्तों के अनुसार सर्दी गर्मी या हमारे मन की शांति का चौथे घर से विशेष सम्बन्ध है,यहां पर अशुभ ग्रह होने से मन की शांति पर बुरा असर पडता है,कई बार सब कुछ होते हुये भी व्यक्ति के मन की खुशी में विघ्न ही रहते हैं,यानी वह समस्या न होते हुये भी मुरझाये फ़ूल की तरह रहता है,तथा उसके जीवन में जद्दोजहद के हौसले में भी काफ़ी कमी आ जाती है।थे घर का सम्बन्ध हमारी उम्र के दूसरे हिस्से से यानी पच्चीस साल की आयु से लेकर पचास साल की आयु तक,इसी हिस्से में हमारे गृहस्थ जीवन और जवानी के समय में हम कहां तक लाभ प्राप्त कर सकते है उसके बारे में भी इस घर से पूरी तरह जाना जा सकता है,यह घर हमारी किस्मत भाग्य से भी संबन्ध रखता है,लेकिन किस्मत के उस हिस्से से जो पूर्वजन्म से हम अपने साथ लाये हैं,यानी किस्मत किस हद तक हमारा साथ देगी इसक संबन्ध भी चौथे घर से है।दिशा की द्रिष्टि से चौथा भाव पूर्व और उत्तर दिशा का कारक है,इस तरह से हमारे कामों के सम्बन्ध में चौथा घर कपडे के काम से विशेष सम्बन्ध रखता है,इसके अलावा पानी और दूध भी इसके अन्तर्गत आते है,शायद इसीलिये यदि चौथे भाव में चन्द्रमा हो तो इसे खर्च करने पर बढने वाला आमदन का दरिया कहा जाता है,यदि चौथे घर मे शुभ ग्रह अथवा चन्द्रमा या गुरु या दोनों हो तो तब व्यक्ति को कपडे से सम्बन्धित काम करने से भी लाभ होता है,शर्त यह है कि दसवें घर में कोई अशुभ ग्रह न हो,क्योंकि चौथे घर की सातवीं द्रिष्टि दसवें घर अर्थात हमारे कर्म स्थान पर पडती है।थोथा घर हमारे आमदन के साधनों से भी सम्बन्ध रखता है,यानी जीवन में जो हम कमायेंगे उस कमाई का चश्मा किस ओर से और किस तरह से हमें प्राप्त होगा। यह घर गर्भ अवस्था अथवा माता के पेट से भी सम्बन्ध रखता है,वास्तव में माता के पेट मे होने से नही बल्कि जन्म के बाद का जो जो पहला हिस्सा है,यानी शैशव काल है,उसका भी इस घर से सम्बन्ध है,शायद कई बार चन्द्रमा कमजोर होने की स्थिति में बच्चे का शैशव काल का जमाना स्वास्थ्य के सम्बन्ध में इतना अच्छा नहीं रह जाता है।थोथा घर हमारी माता से विशेष संबन्ध रखता है,यदि यहां पर खराब ग्रह हों तो माता के लिये खराब असर होता है,यानी माता के मन की शांति व स्वास्थ्य ठीक नही रह पाता है,यदि यहां पर शुक्र राहु जैसे ग्रह हों तो माता की सेहत के लिये इसका असर अच्छा नहीं रह पाता। मंगल और केतु का भी असर होना माता के स्वास्थ्य को खराब करता है,माता के अलावा इसका सम्बन्ध हमारे नाना के घर से भी है,यानी माता के बहन भाइयों तथा माता के माता-पिता से यानी नाना नानी से। यहां पर बहुत अशुभ ग्रह होने से मामा पर बुरा असर पडता है,वेश टिप्पणी : जब चौथे घर में अकेला ग्रह हो और चंद्रमा बंद मुट्ठी के खानों से बाहर कहीं भी बरबाद या खराब हो रहा हो तो चौथे घर का ग्रह शुभ फल होगा, चाहे वह चंद्रमा का मित्र हो या शत्रु | यह सिद्धांत मंगल बद या मांगलिक पर भी लागू होगा। यदि चंद्रमा 8 वृश्चिक में नीच का हो या 11 वें घर मे शुन्य (निरपेक्ष या मंदा) हो, चौथे घर वाला ग्रह शुभ फल हो किताब तरमीम शुदा (1942) में लिखा है : "ग्रह चैथे के रात को जागे,या जागे वह मुसीबत में।मदद कोई न हो जब करता, आ तारे वह बुढ़ापे में ।।" 

कुण्डली के खाना नम्बर 4 को लाल किताब में माता की गोद व पेट का ज़माना कहा गया है। माता का ताल्लुक दिल, दूध, धन-दौलत, कुदरती तौर पर तबीयत का झुकाव क्या होगा। शान्ति सुभाओ, सर्द तर पानी जैसा (मानिन्द पानी) होगा। व्यक्तिगत लिखी हुई बात (तहरीर जाती), माता का पेट, जिस्मानी हालत का असर, घोड़ा, दूध वाले चारपाये, आबी या पानी के जानवर, माता का खानदान, मासी फूफी का मकान, खाली तह ज़मीन, धरती माता, समन्दर पार या समन्दर का सफ़र, खुशी, बृहस्पत का धन, हौंसला, रस या फलों के रस , बजाजी कपड़े का काम, रूहानी ताकत मुताल्लिका सूरज, वक्त जवानी, साथ लाई हुई चन्द्र की चीज़ें, धन, मर्दों का ताल्लुक, रूहानी कारोबार, (उत्तर-पूर्व स्थान) शुमाल मशरिक, बृहस्पत, सूरज, चन्द्र जैसे हों वैसा ही फल होगा। शुक्र मंगल बद या मंगलीक, केतु राशि फल के होंगे। ग्रह का असर मानिन्द रफ्तार केकड़ा होगा यानी ग्रह का असर केकड़े की गति जैसा होगा। यह मैदान (सहन) है खाना नम्बर 10 का और इस घर का न्यायकर्ता (मुन्सिफ) सनीचर होगा।चन्द्र खाना नम्बर 4 का मालिक है। दूध का सफेद चन्द्र, राहु केतु इस घर में पाप छोड़ने का हलफ लिये होते हैं यानी पाप न करने की कसम खाते हैं। यह भी संभव है कि उनके चुप रहने से लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है। जैसे दंड देने का अधिकारी यदि शरारती को न डांटे तो अत्याचार और भी बड जाता है।जिस तरह रात को जागने वाले आंख के होशियार होते हैं, उसी तरह ही इस घर के ग्रह रात को जागने या अपना असर रात को दिया करते हैं या वह ग्रह आखिरी वक्त जब कोई मददगार न हो, मदद दिया करते हैं। बुढ़ापे में तो खासकर मदद करते हैं।इस घर में चाहे सनीचर ज़हरीला सांप और मंगल जला हुआ मगर राहु केतु धर्मात्मा ही रहेंगे या यूं कहो कि चुप होंगे और पाप न करेंगे। चन्द्र बन्द मुट्ठी (खाना नम्बर 1,4,7, 10) से बाहर चाहे रद्दी हो और उस वक्त खाना नम्बर 4 खाली हो तो चन्द्र का नेक असर होगा। नम्बर 4 में कोई भी अकेला ग्रह हो और चन्द्र बन्द मुट्ठी से बाहर मन्दा हो रहा हो तो नम्बर 4 वाला ग्रह नेक असर ही देगा। अपने घर खाना नम्बर 4 में चन्द्र खर्चने पर और बढ़ने वाला आमदन का दरिया होगा। माता के आर्शीवाद से माया की लहर बहर होगी।इस घर का पानी में रहने वाले जीव जन्तुओं से भी सम्बन्ध है,और इसके अलावा दूध देने वाले जानवर गाय भैंस आदि से भी इसका संबन्ध है,सवारी के संबन्ध में यह घर चार पहिया के वाहन का कारक है,क्योंकि पिछले जमाने में इस घर को घोडे का घर कहा जाता था,और दरियायी घोडा भी इसी घर से सम्बन्ध रखता है,चौथे घर को लक्ष्मी स्थान भी माना जाता है,इसका अर्थ है कि उस व्यक्ति के धन रखने का स्थान,यदि यहां पर शुभ ग्रह हों तो मकान के उसी भाग में यदि वह व्यक्ति अपने धन को रखे तो उसका फ़ल काफ़ी मात्रा में शुभ हो जाता है,इस घर को चश्मारिजक भी कहा जाता है,यानी हमारे जीवन में उन्नति के लिये हमारी किस्मत का चश्मा फ़ूटेगा,या नहीं अथवा किस प्रकार या किस साधन से हम अपना धन कमायेंगे,और किस मात्रा में कमा सकते हैं।पौधों दरख्तों में रसभरे फ़लों के वृक्षों का कारक चौथा घर है,ऐसे वृक्ष जिनके फ़ल रस से भरे हों,फ़ल तो खजूर भी कहा जाता है,लेकिन खजूर कोई रसभरा फ़ल नहीं है,उदाहरण के लिये तरबूज आम अंगूर अनानास आदि फ़ल चौथे भाव के फ़ल से सम्बन्धित होते हैं।हमारे शरीर के अंगों में चौथे घर का संबन्ध हमारी छाती या हमारे दिल से है,इसी तरह से कई बार चौथे घर में अशुभ ग्रह होने से दिल की बीमारी होने का अंदेशा रहता है,औरत के टेवे में चौथा घर नाभि या पेट के अंदरूनी भाग से भी सम्बन्ध रखता है,यानी स्त्री की कुंडली में यदि चौथे भाव में अशुभ ग्रह होंतो वह बच्चा होने के समय या गर्भावस्था में स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है।धन के मामले में चौथे घर का सम्बन्ध हमारे पिछले जन्म से लाये हुये बंद मुट्ठी का कारक है,यानी पिछले जन्मों के अनुसार जो हमारा भाग्य है,उसके फ़ल की प्राप्ति की मात्रा का संबन्ध भी इसी घर से है,इसीलिये इसे साथ लाया माल या बन्द मुट्ठी के अन्दर का हिस्सा कहा जाता है।चौथा घर चन्द्रमा का घर है,इसलिये इस घर का रात्रि के समय में बहुत सम्बन्ध है,यदि यहां पर शुभ ग्रह हों तो रात को किये हुये काम अच्छा फ़ल देंगे,यानी वह ग्रह रात के समय ज्यादा शक्तिशाली होंगे,यदि यहां अशुभ ग्रह हों तो हम पर विपदा भी रात के समय ही आयेगी,यदि यहां शुभ ग्रह हों तो वह रात्रि के समय पूरी अवस्था में जाग पडते हैं,यहां पर यह बात भी ध्यान रखने योग्य है,कि चौथे घर में यानी चन्द्रमा के घर में माता के घर में बैठा हुया कोई भी ग्रह अशुभ फ़ल नहीं देता है,यदि चन्द्रमा केंद्रीय घरों अर्थात एक चार सात दस से बाहर बैठा हो। इस घर में चन्द्रमा ग्रहफ़ल का और मंगल शुक्र केतु राशिफ़ल के होते हैं।

रविवार, 12 अगस्त 2018

जन्म कुंडली का तीसरा भाव

मित्रों तीन की संख्या अशुभ मानीजाती है। तीन आदमी एक साथ किसी काम के लिए नही जाते। कोई वस्तु लेनी देनी हो तो तीन की संख्या में नही देते यों तो शास्त्रीय ज्योतिष में भी तीसरे भाव को बहुत शुभ भावों की श्रेणी में नही रखा गया है; किन्तु लाल किताबकार ने तो इसे बहुत ही अशुभ कहा है।

इस घर का रंग है खूनी, असर होता भी है खूनी। मित्रों तीसरे भाव का कारक ग्रह मंगलहै,औरहमारेज्योतिष की सभी पद्धतियों के अनुसार भी मंगल ही तीसरे घर का कारक है,यहां पर राशि का मालिक बुध है,लेकिन इस घर पर मंगल का ज्यादा अधिकार होने के कारण बुध यहां अच्छे फ़ल का नहीं माना गया है। शायद इस्का कारण यह है कि मंगल का प्रभाव बुध में बहुत कमी या कमजोरी कर देता है।

तीसरे घर से हम व्यक्ति का जिम्मेदार होना या अपने फ़र्ज को निभाना इसकी मात्रा का अंदाजा लगा सकते है,व्यक्ति में कितना शौर्य या कितनी बहादुरी है उसका पता भी इसी भाव से लगता है,यह भात ध्यान रखने योग्य है,कि यहां व्यक्ति की बहादुरी से मतलब है कि वह दूसरे लोगों की कहां तक सहायता कर पाता है और दूसरे लोगों के बर्ताव में वो कहां तक अपनी बहादुरी को प्रकट कर सकता है।

तीसरे घर का संबन्ध हमारे मकान के अन्दर रखे आराम के सामान से भी है,यानी यहां पर शुभ ग्रह होने से व्यक्ति के घर में आराम के साधन काफ़ी मात्रा में होंगे,यदि अशुभ ग्रह यहां बैठा हुआ है तो उसके आराम के साधनों में कमी आ जायेगी,तीसरा घर महारी शारीरिक तौर पर जाग्रत अवस्था का घर है,यानी हममें किसी काम को लेकर कितना उत्साह स्फ़ूर्ति है या उत्साह कितना मंदा है,इसका सम्बन्ध भी इसी घर से है,यही घर नजर का असर यानी हमारी द्रिष्टि में किस प्रकार की शक्ति है,इस बात का कारक है,इससे नजर लग जाने का मतलब नहीं है,इसका अर्थ केवल इतना है कि किसी व्यक्ति की नजरों की शक्ति किस हद तक प्रभावशाली रहती है,यही घर चोरी बीमारी का स्थान भी है,कुछ हद तक हमारी दूसरों के साथ शत्रुता का संबंध भी इसी घर से है।

यह घर हमारे जीवन में भाग्य के चढाव व गिरावट को भी दर्शाता है,यानी किस्मत के क्षेत्र में हम किस हद तक ऊंचे जा सकते है,नीचे गिर सकते है या किस्मत के क्षेत्र में हम वहीं खडे रह जायेंगे,दिशा के अनुसार यह घर दक्षिण दिशा का कारक है,दक्षिण दिशा का कारक इसलिये माना गया है,कि इस घर का कारक ग्रह मंगल जहां बहुत शक्तिशाली है वहीं वह दक्षिण दिशा का भी कारक है। इसलिये तीसरे घर में मेष वृश्चिक या मकर राशि में बैठा मंगल बहुत ही शुभ होता है,और यदि व्यक्ति के मकान का दरवाजा दक्षिण की ओर हो तो इसका कोई बुरा प्रभाव नहीं पडता है।

इस घर का संबन्ध हमारे घर के अन्दर रखे हथियारों से भी है,जैसे तलवार पिस्तौल आदि,यदि यहां पर कोई बहुत शुभ ग्रह हो तो घर में जिसकी तेज धार न हो या टूटे हुये हथियार का रखना अशुभ फ़ल देता है,कुंडली का तीसरा घर इस बात को भी दर्शाता है कि उस व्यक्ति के दूसरे रिस्तेदार या मित्र धन या आर्थिक दशा के अनुसार किस हैसियत के होंगे,यदि यहां पर कोई शुभ ग्रह हो जैसे मंगल यहां पर अच्छी हालत मे हो तो उसके भाइयों की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी।

तीसरा घर व्यक्ति की माया के बाहर जाने का रास्ता है,यह ठीक है कि बारहवां घर हमारे खर्चे का घर है,लेकिन तीसरा घर भी अशुभ होने की हालत में पैसे का नुकसान होने से गहरा सम्बन्ध है,इसलिये इसे चोरी होने का घर भी कहा जाता है,तीसरे घर से ही हम बहन भाई आदि की स्थिति के बारे में जान सकते है,,किंतु इसके अलावा साले बहनोई के बारे में जानने के लिये भी सहायक होता है,उदाहरण के तौर पर राहु साले का कारक है,यदि राहु तीसरे घर में हो तो हमारे अपने साले के साथ संबन्ध अच्छे रह सकते है,या उससे किसी न किसी प्रकार से लाभ हो सकता है।

तीसरे घर को मैदाने जंग और लेन देन का घर भी कहा जाता है,इसका वास्तविक मतलब है कि हमारे जीवन में लडाई झगडे की मात्रा कैसी होगी,या उसमें हमारी स्थिति कैसी होगी,इसका पता चलता है,इसी तरह से पैसे के संबन्ध में जो हमारा दूसरों से लेन देन होगा उसके शुभ या अशुभ असर को भी तीसरे घर से ही देखा जा सकता है।

तीसरे घर को वक्त आखिरी या दुनिया से हमारा नाता खत्म होना यानी मौत से भी कुछ सम्बन्ध है,हालांकि मौत का घर आठवां माना गया है,लेकिन तीसरा घर चूंकि मौत की स्थिति को दर्शाता है,और मौत से पहले के समय पर रोशनी डालता है,इसीलिये इसका सम्बन्ध मौत से भी है,इसी तरह यह घर फ़लदार पौधों वृक्षों का भी कारक है,यदि यहां पर शुभ ग्रह हों तो घर में फ़लदार पौधों का होना अच्छा फ़ल देता है,लेकिन यदि यह घर खराब हो तो घर में फ़्लदार पौधे लगाना अशुभ फ़ल देगा।

हमारे शरीर के अंगों में यह भाव हमारे बाजुओं का कारक है,और बाजू ही हमारी शक्ति या दूसरों के साथ लडाई झगडे आदि में काम आने वाले अंग हैं,इसके अलावा आंख की पलकें हमारा जिगर तथा हमारे शरीर में खून की मात्रा तथा खून के दोषों का पता भी तीसरे भाव से लगता है,हमारी उम्र के लिहाज से इस घर का संबन्ध हमारी जवानी की उम्र से भी है,यदि यहां शुभ ग्रह हों तो हम जवानी के समय में अपने जीवन में ज्यादा उन्नति कर सकते हैं,लेकिन यदि अशुभ ग्रह हो तोजवानी के समय में हमारी मेहनत का फ़ल हमें नहीं मिल पाता है,इसी तरह हम अपने भाइयों दोस्तों या रिस्तेदारों से जो कुछ भी प्राप्त करते है इस घर का इस बात से भी बहुत गहरा संबन्ध है। तीसरे घर में शनि ग्रह ग्रहफ़ल का होगा,लेकिन दौलत के सम्बन्ध में राशिफ़ल का होगा।तीसरे भाव से कुण्डली के बारे में जानने हेतु जातक के इस भाव में किस ग्रह की युति है और किस भाव से इसका संबंध आ रहा है इन सभी बातों को समझना आवश्यक होता है,यदि तीसरा भाव मजबूत हो और किसी अच्छे ग्रह के प्रभाव में हो तो ऎसी स्थिति में जातक परिश्रम करने से अपने जीवन काल में अपने भाईयों, दोस्तों की सहायता भी खूब पाता है. अपनी मेहन और साहस से जातक खूब सफलताएं पाता है. लोगों का पूर्ण सहयोग भी जातक को ऊंचाईयां छूने में मददगार होता है.मर्थकों के सहयोग से सफलतायें प्राप्त करते हैं, जबकि दूसरी ओर यदि जातक की कुंडली में तीसरे भाव पर अशुभ बुरे ग्रहों का प्रभाव हो तो ऐसे व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने भाईयों तथा दोस्तों के कारण बार-बार हानि उठाते हैं तथा इनके दोस्त या भाई इनके साथ बहुत जरुरत के समय पर विश्वासघात भी कर सकते हैं.रीर के कुछ हिस्सों तथा श्वास लेने की प्रणाली को भी दर्शाता है तथा इस भाव पर किसी बुरे ग्रह का प्रभाव कुंडली धारक को मस्तिष्क संबंधित रोगों अथवा श्व्सन संबंधित रोगों से पीड़ित कर सकता है।का तृतीय भाव यदि राहु केतु से प्रभावित हो तो जातक संतान रूप में अपने घर में ज्येष्ठ या अनुज होता है. साथ ही उसमें भाव में राहु और केतु का प्रभाव पड़ने से परेशानी भी आती है. यह संबंधों में तनाव को भी ला सकता है. तीसरा भाव उच्चता लिए हो तो स्वाभिमान में बल आता है जातक को लोगों का सामना करने की हिम्मत मिलती है.

ज्योतिष की जानकारी

मैने पहले राशी फल पर आपको जागरुक करने की कोशिश की पता नही फिर भी लोग राशी फल की मांग करते है 

तब से अब तक परिस्थितियां बदल चुकी हैं. हमारी पूर्णतया वैज्ञानिक यह कला, कम्प्यूटर का सहारा लेकर और भी निखर गई है. पहले की भी बहुत-सी भविष्यवाणियां सत्यापित हुई हैं और अब भी हो रही हैं, लेकिन कुछ लोग ज्योतिष व भविष्यवाणी में पूर्ण आस्था रखते हैं और कुछ लोग किसी राशिफल, अंक-ज्योतिष, बोलें सितारे, टैरो कॉर्ड, आर्थिक भविष्यफल,अंग फड़कने आदि में ही अटके है मेरा अपना विचार है, कि जन्मपत्री में एक पल की भी हेरफेर होने से भविष्यवाणी में भी हेरफेर हो सकती है. एक ही राशि के करोड़ों लोगों के लिए एक ही भविष्यवाणी कैसे सत्य हो सकती है? आजकल हर कला का व्यावसायीकरण हो गया है, ऐसे मे ज्योतिषी लोगो को वोगस राशी फल पङना छोङना होगा वहुँत से मित्रो को मेरी वात समझ मे आ  रही है ओर वो खुलेआम ईसका विरोध भी कर रहे है आपका क्या विचार है कृप्पा जरुर वताऐ कही मै गलत तो नही आचार्य राजेश

शनिवार, 11 अगस्त 2018

जन्म कुंडली में दूसरा भाव

बात करते हैं दुसरे भाव की   यानि कुटुम्भ व धन भाव कीकुन्डली का दूसरा घर हमारी इज्जत और धन को बताता है। 

यानी हमारा सम्मान किस मात्रा तक होना है या नहीं होना है,हमारे पास दौलत किस मात्रा तक होगी,यहां दौलत से अर्थ ऐसी दौलत से है जो शुभ ढंग से कमाई गयी हो,क्योंकि रिस्वत आदि से कमाई दौलत का सम्बन्ध छठे घर से है,व्यक्ति के मकान के बारे में यह भाव संकेत देता है,जैसे उसका मकान किस किस्म का होगा यानी छोटा बडा होगा या दुकान होगी,कहने का मतलब है मकान सम्बन्धी कई चीजों का इस घर से सम्बन्ध हैदूसरा भाव हम कितने ऐसे आराम से रहते है इसका भी बखान करता है,यह भाव हमारे ज्ञान,हमारे अंदर नेकी या बदी यानी जो हमारा दुनिया से सम्बन्ध है,उसके बारे में हमारी मोहमाया या हमारा दूसरों से काम निकलवाने का तरीका आदि भी दर्शाता है। इसके अलावा मानसिक तौर पर प्रेम का संबन्ध भी इसी घर से संबन्ध रखता है। वहां का स्वामित्व शुक्र व् चन्द्र को दिया है और कारक गुरु को माना गया है , ऐसा क्यों इसलिए की शुक्र भौतिक ग्रह है और भौतिक सुखों को प्राप्त करने के लिए धन की ज़रुरत पड़ती ही है , विचारनिए बात यहाँ ये भी है के गुरु को दुसरे, पांचवे , नवं और एकादस का कारक भी माना गया है क्यों की सब असली निधियों का स्वामी गुरु ही होता है जो के किसी के साथ कभी पक्षपात नहीं करता और अगर ये ही अधिकार दुसरे ग्रह को दिया गया होता तो व ज़रूरी पक्षपात करता , तो यही वृहस्पति का बढ़प्पन माना जाता है जो की किसी के साथ कभी अन्याय नहीं करते हैं और सबको सद्बुधि देने वाले ग्रह माने जाते हैं ! हम यह भी देखते हैं के दूसरा भाव मारकेश का भी मन जाता है वजह चाहे जो भी रही हो मसलन के अष्टम जो के आयु का भाव माना गया है उससे अष्टम यानी तीसरे भाव से दवाद्ष भाव यानी दूसरा भाव इसलिए इसे मारकेश माना जाएगा परन्तु दर्शन के रूप में देखें तो यही पता चलता है के शुक्र और चन्द्र के रूप में जो हम भौतिकता जब वृहस्पति रुपी प्यूरिटी को हम एक्सक्लूड यानि बाहर करना शुरू करते हैं तो वह मारक का काम करना शुरू कर देती है , जैसा के मैंने बोला के हम यहाँ इसको लॉजिकल एंगल से देखें तो यही निष्कर्ष निकलता है के बिना मतलब का, बिना मेहनत और गलत तरीकों से कमाया भौतिक सुख आखिरकार हमारे लिए मारकेश का ही काम करेगा, गुरु इस घर का कारक होने के कारण यह घर भी किसी हद तक हमारी आध्यात्मिकता के बारें ज्ञान का कारक है,इस ज्ञान का विशेष सम्बन्ध हमारे जीवन के पहले हिस्से में उम्र की पहली साल से पच्चीसवी साल तक जो ज्ञान हम प्राप्त करते है,उसका भी सम्बन्ध भी है। यह घर हमारी आध्यात्मिकता के बारे में बताता है। यह घर मिट्टी यानी खेती आदि से भी सम्बन्ध रखता है,इसके अलावा गैसे भी इसी घर से देखी जातीं है,उन हवाओं का सम्बन्ध भी इसी घर से जो हवा में ऊपर की ओर उठतीं है,हमारी की गयी बचत तथा स्त्री से मिला धन भी इसी घर से देखा जाता है,आध्यात्मिक रूप से प्राप्त धन भी इसी घर से देखा जाता है। सन्यासी का धन भी इसी घर से देखा जाता है,सन्यासी के धन से मतलब उस धन से जो शुभ कामों के द्वारा कमाया गया हो।

दूसरा भाव हमारे जन्म मरण का दरवाजा भी है। यानी इसका सम्बन्ध हमारे पिछले और आगे के जन्म से भी है,लेकिन यह सम्बन्ध कोई इतना विशेष नहीं जिसे हम फ़लकथन के साथ प्रयोग कर सकें,यह घर हमारे ससुराल का घर भी है,यानी ससुराल के साथ हमारे कैसे सम्बन्ध रहेंगे तथा ससुराल की स्थिति कैसी होगी आदि बातें इसी भाव से देखी जातीं हैं।

जब हम घर के अन्दर कई तरह के पालतू जानवर रखते है तो उनके बारे में भी यह घर अपनी स्थति बताता है। दूसरे घर को धर्म स्थान या मन्दिर भी कहा जा सकता है,यह धर्म स्थान का घर तो है लेकिन पुराने जमाने में इसे गाय के बांधने का स्थान भी जाना जाता था,इस भाव का सम्बन्ध उन पौधों से भी जिनको उनके अंगों को काटकर उगाया जाता है,जैसे मनीप्लांट गुलाब गन्ना केला आदि।

हमारे शरीर में यह भाव गर्दन तथा तिलक लगाने की जगह माथे के बीच में जो स्थान है उसका सम्बन्ध भी इस घर से है,यह घर हमारी गृहस्थी कुटुंब से भी सम्बन्ध रखता है,लेकिन यह जवानी के समय का प्रतीक है,इसके अलावा जो कुछ हम रिस्तेदारों से प्राप्त करेंगे या जो कुछ उन्हे देना पडेगा उसका सम्बन्ध भी इसी भाव से है। किसी सीमा तक रुहानी अर्थात आध्यात्मिक प्राप्ति का सम्बन्ध भी दूसरे घर से है,शायद इस घर पर गुरु का अधिकार होने से यह अध्यात्म का कारक बन गया है।

दिशाओं के अनुसार यह घर उत्तर-पश्चिम दिशा का कारक है,इस घर मे गुरु सबसे अच्छा फ़ल देता है,आमतौर पर इस घर में बैठे सभी ग्रह शुभफ़ल देते है,अगर आठवें भाव के अन्दर कोई ग्रह नहीं हो,इस घर का कारक गुरु है और चन्द्रमा को इस घर में उच्चता प्राप्त है,गुरु को इस घर का कारक इसलिये माना गया है,कि यह घर धन स्थान है,तथा आदर सम्मान का घर भी माना गया है,कोई आदमी आराम के साधन कितने प्रकार के पायेगा इसका फ़लादेश इसी घर से मिलता है,राशि के अनुसार यह घर शुक्र का है,शुक्र हमारे जीवन में आराम के साधनों का प्रतीक है,कालपुरुष के अनुसार यहां शुक्र की वृष राशि आती है,और वृष राशि किसी भी ग्रह को नीच नहीं करती,इस घर में आये हुये सभी ग्रह ग्रहफ़ल के होंगे,यानी उनका कोई उपाय नहीं होगा,इनका उपाय करने के लिये किसी अन्य ग्रह की सहायता लेनी पडेग आदमी की पहचान उसकी वाणी के द्वारा होती हैं। व्यक्ति के अंदर छुपे ज्ञान या अज्ञान की झलक उसकी वाणी के द्वारा हो जाती हैं। वाणी मानव के धन के समान हैं। इसीलिये ज्योतिष शास्त्र में धन और वाणी को दूसरे भाव से देखा जाता हैं। जहां एक तरफ मीठी वाणी आपके लिये सौहार्द पूर्ण माहौल बनाती हैं, वहीं दूसरी तरफ कटु वाणी अपनों को भी शत्रु बनाने में देर नही लगाती।हिंदु जीवन में वाणी का अत्यधिक महत्व हैं, वाणी शुद्ध और पवित्र हो तो वह साक्षात देव वाणी होती हैं, जो बोला जाता हैं, वह सत्य हो जाता हैं। धर्म वाणी पर संयम व नियंत्रण हेतु हमारे शास्त्र में मौन व्रत करने का विधान हैं, मौन व्रत का

दूसरे भाव पर ग्रहों का जैसा प्रभाव होगा, वैसी ही वाणी होगी। बुध, गुरु, शुक्र में से किसी की दूसरे स्थान पर प्रभाव स्थिति व्यक्ति की वाणी को सौम्य, ज्ञान युक्त व प्रभाव शाली बनाती हैं, और यदि यें ग्रह नीचगत हो या अशुभ ग्रहों के प्रभाव में फल देने वाले हो तो विपरीत फल प्राप्त होते हैं।

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

जन्म कुंडली का पहला भाव

भारतीय ज्योतिष में जन्मकुंडली के पहेले घर को प्रथम भाव अथवा लग्न कहा जाता हे | तथा भारतीय वैदिक ज्योतिष अनुसार इसे जन्मकुंडली के बारह भावो में सभी से ज्यादा महत्त्व पूर्ण माना जाता हे |। 

      किसी भी जातक – व्यक्ति के जन्म समय पर उसके जन्म स्थान पर आकाश में उदित राशी को उस व्यक्ति का लग्न माना जाता हे | तथा इस राशी अर्थात लग्न अथवा लग्न राशी को उस जातक की जन्मकुंडली बनाते समय पहेले घर या भाव में स्थान दिया जाता हे | तथा इसके बाद आनेवाली राशियो को जन्मकुंडली में क्रमशः दूसरा …तीसर …बारहवा घर में स्थान दिया जाता हेद्रष्टांत से समजे तो यदि किसी जातक – व्यक्ति के जन्म के समय नभमंडल में मेष राशि का उदय हो रहा हे तो मेष राशि उस जातक का जन्म लग्न कहा जाता हे तथा इस जातक की जन्म कुंडली में पहेले घर या भाव में स्थान दिया जाता हे |तथा मेष राशि के बाद में आनेवाली राशियो को वृषभ से लेकर मीन तक क्रमशः २ से १२ भाव में स्थापित किया जाता हे |किसी भी जन्मकुंडली में लग्न स्थान अथवा प्रथम भाव का महत्त्व सब से अधिक होता हे साथ ही लग्न राशि अनुसार ही जातक के जीवन के लगभग सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रो में इस प्रथम घर – भाव -राशी का भारी प्रभाव पाया जाता हेकुंडली धारक के स्वाभाव -व्यक्तित्व -चरीत्र जानने हेतु ये प्रथम भाव सविशेष महत्त्व रखता हे साथ ही इस घर के अध्ययन से ही कुंडली धारक की आयु …स्वास्थ …व्यवसाय …सामाजिक पद -प्रतिष्ठा …मनोवृत्ति …कार्यप्रणाली जेसे अन्य कई महत्वपूर्ण क्षेत्र और विषय की सटीक जानकारी मिलती हे |जन्मकुंडली का प्रथम भाव शारीर के अंगो में सिर…मस्तिष्क और आसपास के क्षेत्रो का प्रतिनिधित्व करता हे | तथा इस भाव पर किसी भी अशुभ ग्रह का प्रभाव या द्रष्टि होने से शारीर के इन उपरी अंगो से संबंधित रोग …चोट या अन्य परेशानियों का करण बन सकती हे |जन्मकुंडली का प्रथम भाव हमारे गत जन्म के शुभ- अशुभ कर्मो तथा वर्तमान जीवन में इन कर्मो के प्रभाव से उत्पन्न फल और आनेवाले भविष्य में शुभ -अशुभ फल का निर्देश भी करता हे | इस प्रथम भाव के माध्यम से जातक की समाजकी उपलब्धियों -उसके व्यवसाय तथा सहस संघर के बाद मिलनेवाली सफलता के बारेमे भी जानकारी मिलती हे | साथ ही जातक का वैवाहिक जीवन – बौद्धिक स्तर -सुखो का भोग -मानसिक विकास और क्षमता -स्वाभाव की मृदुता अथवा कठोर -निष्ठुर होना तथा अन्य भी अनेको विषय की जानकारी प्राप्त होती हे | प्रथम भाव व्यक्ति की स्वाभिमान और अहंकार की सीमओं को भी दर्शाता हे | जातक की जन्मकुंडली के प्रथम भाव में एक या अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव उसके बाहरी या निजी जीवन को प्रभावित करता हे …किसी भी क्षेत्र में अनेको समस्या -अपयश का करण बन सकता हे | साथ ही जातक के प्रथम भाव में एक या अधिक शुभ ग्रह या उनका प्रभाव होने से उसके निजी या बाहरी जीवन में बडी सफलता -उपलब्धि और खुशियो का कारण बन सकता हेइसीलिए ज्योतिष में जातक की जन्मकुंडली के प्रथम भाव का विशेष अध्ययन बहोत ही ध्यान पूर्वक करना अनिवार्य बन जाता है उसमें काल पुरुख की मेष राशि यानी एरीज जोडिएक पड़ता है और जिसका के स्वामित्व हम मंगल गृह को मानते हैं , वह मंगल फिर अष्टम भाव का भी स्वामी मन जाता है क्यों की उसकी दूसरी राशि वृश्चिक वहां पड़ती है और दोनों राशियों का अपना अलग प्रभाव मन जाएगा , तो हम बात कर रहे थे पहले भाव की की वहां मेष राशी जिसका स्वामी मंगल को माना जाता है व रुधिर जिसे हम खून भी कहते है का शरीर में प्रतिनिधितव करता करता है और मंगल को हम उत्साह व उर्जा का कारक भी मानते हैं दुसरे वहां पर सूर्य उच्च का मन जाता है वह भी उर्जा का प्रकार मन जाता है तो दोनों मंगल और सूर्य उर्जा के कारक होने के साथ साथ अग्नि के कारक भी है इसलिए ये जीवन के संचालक गृह प्रथम भाव के कारक बनाये गए जो की पूरण तया तर्कसंगत मन जाएगा , अब मेडिकल साइंस के मुताविक भी इनका यही मतलव निकलता है क्यों को विज्ञान भी यही मानता आया है की ये सारा ब्रह्माण्ड एक उर्जा के आधीन है और प्रमाणित व प्रतक्ष रूप से सूर्य तो इसका प्रमाण है ही , अब विचारनिए बात यह है की जीवन जीने के लिए वो भी सही जीवन जीने के लिए हमें इस उर्जा का सही समन्वय करना पड़ता है नहीं तो हम कहीं न कहीं पिछड़ना शुरू हो जाते हैं सो हमें उर्जा का नेगेटिव या पॉजिटिव प्रयोग करना आना चाहिए , अपनी अपनी पर्सनल होरोस्कोप में देखने पर इन A2दोनों उर्जा युक्त ग्रहों का किस प्रकार से बैठे हैं , किन किन नक्षत्रों में , उप नक्षत्रों में और आगे उप उप नक्षत्रों में, नव्मंषा कुंडली में, षोडस वर्गों में, अष्टक वर्गों में , पराशर शास्त्र अनुसार की प्लेनेट और न जाने और कितनी विधियों अनुसार देखने के वाद ही ये पता चलता है के वे गृह कितने बलवान हैं , मात्र एक आधी विधि अपूरण मानी जाती गयी है , और विचारनिए बात ये भी है के आज के वक्त में इस पवित्र शास्त्र का मज़ाक बना कर रख दिया गया है मात्र सिर्फ भौतिकता के चलते ऐसा हो रहा है , क्यों के हर आदमी दो चार किताबें पढ़ कर अपने आप को ज्ञानी मानने लगता है और आज जब सब कुछ कोमर्शिअल यानी व्यावसायिक सोच सब पर हावी हो चुकी है तो हर चीज की सैंक्टिटी यानी पवित्रता ख़तम हो रही है , जब स्वार्थ हावी हो जाए तो अक्ल पर पर्दा पड़ना शुरू हो जाता है, तो हम यहाँ देखते हैं के इन दोनों ऊर्जायों का हम कैसे सही इस्तेमाल करते हैं और जैसे के अगर कहीं न कहीं कोई ग्रहों में कमी पूर्व जनित कर्मो के कारण आ गयी हो तो हम उसमे काफी हद तक सुधार भी ला सकते हैं , हालांकि वह सुधार अपनी अपनी बिल्पावेर यानि इच्छा शक्ति , करम और प्रभु पर पूरण भरोसा इसी के चलते पूरण हो पाती है

बुधवार, 1 अगस्त 2018

Medical Astrology

मित्रो पहला सुख निरोगी काया वाद मे माया आज हमारा खानपान ऐसा है जिससे हर आदमी गोलीया खा रहा है मित्रो ज्योतिष  मे भी रोग का पता लएस्ट्रोगाया जा सकता है  

रोग निर्णय के लिऐ 

 किन ग्रहों का विचार करना है-  रोग निर्णय के लिए जिन ग्रहों का विचार करना चाहिए वे हैं- (1) छठे भाव में स्थित ग्रह, (2) अष्टम भाव में स्थित ग्रह, (3) बारहवें भाव में स्थित ग्रह, (4) छठे भाव का स्वामी, (5) षष्ठेश से युति कर रहे ग्रह। 

षष्ठेश रोग का स्वामी है इसलिए षष्ठेश की स्थिति का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानसागरी में षष्ठेश के विभिन्न भावों में फल का बहुत अच्छा वर्णन किया गया है। यदि सिर्फ रोग के संदर्भ में देखा जाए तो षष्ठेश लगन में आरोग्य देते हैं, द्वितीय भाव में व्याधि युक्त शरीर देते हैं, तृतीय भाव में षष्ठेश व्यक्ति को ल़डाई-झगडे़ करने की प्रवृति देते हैं, चतुर्थ भाव में जाने पर पिता को रोगी बनाते है, पंचम भाव में पुत्र के कारण कष्ट प्राप्त होता है, षष्ठेश छठे भाव में होकर आरोग्य देते हैं, शत्रु रहित और कष्टरहित जीवन देते हैं, सप्तम भाव में षष्ठेश पत्नी से कष्ट दिलाते हैं। अष्टम के संदर्भ में ग्रहों का वर्णन भी है। यदि षष्ठेश शनि हो तो संग्रहणी रोग होता है। मंगल हो तो अग्नी ओर जहरीले कीट से से खतरा, बुध हो तो विष दोष, चन्द्रमा हो तो कफ  दोष, सूर्य हो तो जानवर से भय, बृहस्पति हो तो पागलपन और शुक्र हो तो नेत्र रोग होता है। नवें भाव में जाने पर  लंगडापन देता है। दशम में माता से कष्ट और विरोध देता है, एकादश में शत्रु चोरादि से भय देता है और द्वादशभाव में व्यक्ति को अकर्मठ बना देता है।

 ग्रहों का नैसर्गिक कारकत्व - तत्व आदि - 

मेडिकल एस्ट्रोलॉजी में सटीक परिणाम पर पहुँचने के लिए ग्रहों के नैसर्गिक कारकत्व तत्व आदि पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। फलदीपिका के अनुसार सूर्य और मंगल तेज के अधिष्ठाता हैं और दृष्टि पर इनका अधिकार है। चन्द्रमा और शुक्र जल तत्व के होने के कारण रसेन्द्रिय के अधिष्ठाता हैं इसलिए शरीर मे  हार्मोन ग्रंथियों पर इनका अधिकार है। बुध पृथ्वी तत्व के होने के कारण घ्राणेन्द्रिय हैं। बृहस्पति में आकाश तत्व प्रधान होने से वे श्रवणेन्द्रिय के अधिष्ठाता हैं। शनि, राहु और केतु वायु के अधिष्ठाता हैं इसलिए स्पर्श का विचार इनसे करना चाहिए। ग्रहों से होने वाले संभावित रोग की विवेचना में नैसर्गिक कारकत्व के साथ-साथ काल पुरूष की कुण्डली में उस ग्रह की राशि का विचार भी करें। उदाहरण के लिए सूर्य हड्डी के नैसर्गिक प्रतिनिधि हैं इसलिए हड्डी से जुडी बीमारियां सूर्य से देखी जाती हैं। कालपुरूष की कुण्डली में सूर्य की राशि पंचम भाव में आती है जो नाभि के आसपास का क्षेत्र है। इसलिए सूर्य से नाभि प्रदेश और कोख की बीमारियां दोनों देखी जानी चाहिए। इसी तरह सूर्य पित्त का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। इसलिए यदि सूर्य से रोग निर्धारण कर रहे हैं तो इन सभी बिन्दुओं पर ध्यान रखना की दशा - 

राहु भ्रम देते हैं। इसलिए जब राहु की दशा चल रही होती है तब बहुत प्रयास के बाद भी सही निदान संभव नहीं हो पाता। यदि प्रत्यन्तरदशा हो तो सही निदान के लिए थोडा इंतजार करने की सलाह दी जाती चाहिए। राहु के बाद बृहस्पति की दशा में भ्रम दूर होते हैं और स्थिति साफ होती है। यह निश्चित किया जाना चाहिए कि राहु दशा का कितना समय बाकी है। यदि थो़डा समय बाकी है और इंतजार करना चाहिए। यदि राहु दशा की अवधि अधिक हो तो राहु की पूजा पाठ और उपाय करने के वाद ही  निदान प्रक्रिया से कुछ हद तक सही परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। किसी ब़डी शल्य क्रिया या किसी प्रकार की खास थैरेपी अपनाने से पहले  किसी आच्छे ज्योतिषी  से सलाह अवश्य ली जानी चाहिए। राहु दशा में बडे़ निर्णय से पूर्व निश्चित रूप से दो बार जांच करानी चाहिए और उसके बाद कदम उठाना चाहिए। 

कुछ खास युतियां - 

रोग निर्णय में कुछ खास युतियां बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। शुक्र के साथ जब भी मंगल या राहु युति करते हैं तो शुक्र के नैसर्गिक कारक तत्वो में वृद्धि होती है। हिस्टीरिया जैसे रोगों में यह योग पाया गया है। यह महत्वपूर्ण है कि यही युति महान कलाकार भी बनाती है और लक्ष्य प्राप्त की ऊर्जा भी देती है। इसलिए किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले कुछ सावधानियां आवश्यक हैं। शुक्र किस भाव के स्वामी हैं और यह युति किस भाव में हो रही है, इस युति पर किन ग्रहों की दृष्टि है, इस सब बिन्दुओं पर ध्यान देकर सही निर्णय पर पहुँचा जा सकता है। बुध और शनि की युति भी महत्वपूर्ण है। प्राय: यह युति निराशाजनक प्रवृत्ति देती है। यदि इनका संबंध सप्तम या द्वादश भाव से हो तो व्यक्ति के वैवाहिक संबंधों में अजीब व्यवहार देखने को मिलता है। भारतीय  समाज  में लोग इस विषय में विशेषज्ञ सलाह लेने से हिचकिचाते हैं और समस्या वैसी ही बनी रहती है। अन्य भावों में युति या संबंध स्त्रायु तंत्र से संबंधित परेशानियों का संकेत है। बुध और राहु की युति त्वचा से जुडे़ बैक्टीरियल इंफेक्शन देती है। बुध इस युति से जितने अधिक पीङित होंगे रोग की तीव्रता उतनी ही अधिक होगी। जहां राहु बैक्टीरियल इंफेक्शन देते हैं वहीं केतु वायरल इंफेक्शन देते हैं। बुध और केतु की युति उनकी दशान्तर्दशा में हरपीज जैसी वाइरस जनित बीमारी देती है। चन्द्रमा मन हैं। अगर  चन्द्र कमजोर और पीडत है तो चन्द्रमा व्याधियुक्त शरीर का कारण हो सकते हैं। चन्द्रमा यदि विष घटी या मृत्युभाग में हो तो कभी ना ठीक होने वाली बीमारियां हो सकती हैं। चन्द्रमा की पाप ग्रहों से युति मनोरोग देती है। कमजोर चन्द्रमा की युति शनि से होने पर डिप्रेशन की शिकायत देखी जाती है। व्यक्ति हालात का सामना नहीं कर पाता है और निराशा के गर्त में चला जाता है। चन्द्रमा और राहु प्राय: मानसिक  या वहम जैसी बीमारी देते हैं। यह बहुत खतरनाक स्थिति होती है जब व्यक्ति भ्रमित रहता हैै तो ना तो वो अपनी स्थिति किसी को समझा पाता है ना ही उसकी असली स्थिति कोई समझ पाता है। - यदि लग्न और लग्नेश बलवान हैं तो व्यक्ति में परिस्थिति से ल़डने और जीतने की क्षमता आ जाती है। लग्नेश बलवान हों और छठा भाव भी रोग का संकेत दे रहा हो तो व्यक्ति को सही इलाज मिलता है उसके ठीक होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। यदि कोई बीमार है और गोचर में बृहस्पति लग्न या लग्नेश को देखते हैं तो व्यक्ति के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है। इस लिए रोग से संबंधित किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले लग्नऔर लग्नेश की स्थिति का अध्ययन अवश्य कर लेना चाहिए। 

1 अष्टमेश जब छठे भाव या छठे भाव के स्वामी से संबंध करता है तो रोग का कारण पिछले  जन्म के कर्म होते हैं। 

2 इसी तरह अष्टम भाव में बैठे ग्रह का संबंध यदि छठें भाव से हो तो भी रोग का कारण गत जन्म के कर्म होते हैं। 3 पंचम और अष्टम बहुत बली हों तो पिछले जन्म के बहुत से अभुक्त कर्म शेष रहते हैं और रोग का कारण बनते हैं।

 4 पंचम में अधिक अष्टक वर्ग बिन्दु का होना यह संकेत है कि गत जन्म के अभुक्त कर्म इस जन्म में पीछा कर रहे हैं। इसलिए पंचम भाव में कम अष्टक वर्ग बिन्दु का होना शुभ माना जाता है। बृहद् पाराशर होरा शास्त्र में वर्णन है कि यदि पंचम या पंचमेश का संबंध मंगल और राहु से होगा तो पिछले जन्म में सर्प के श्राप के कारण इस जन्म में संतान हानि होगी। गर्भ में संतान अपनी माता से नाल के माध्यम से जु़डा रहता है। इस नाल पर राहु का अधिकार है। सर्पदोष के कुछ मामलों में पाया गया है कि यह नाल बच्चो के गले में लिपट कर मृत्यु का कारण ब नी। सर्पाकृति होने के कारण फैलोपियन ट्यूब पर भी राहु का ही अधिकार है। कुछ मामलों फैलोपियन ट्यूब में इंफेक्शन या Blockage  के कारण संतान ना होना पाया गया। 


 मित्रो  शरीर में जो DNA है उसमें एक हिस्सा माता से प्राप्त होता है और दूसरा पिता से। इसी DNA में हमारा Genetic Code होता है जिससे माता-पिता की आदतें बीमारियां आदिहम तक पहुँचती हैं। DNA की सर्पाकृति है और सर्पाकृति पर राहु का अधिकार है। जेनेटिक बीमारियों में राहु की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। कई मामलों में देखा गया है कि बीमारी दो-तीन पीढ़ी तक दबी रहती है परन्तु फिर अचानक प्रकटहो जाती हैमैने ऐसी कई कुन्ङलीया देखी  तो पाया  कि जिस पीढ़ी में बीमारी प्रकट हुई है उन कुण्डलियों में छठें-आठवें भाव पर राहु का प्रभाव अधिक है। छठे, आठवें के स्वामी या तो राहु के नक्षत्र में होंगे या छठें-आठवें में बैठे ग्रह राहु के नक्षत्र या राहु के प्रभाव में होंगे मित्रो हमारे पास ऐसे जातक भी आते है जिनको काफी देर से रोग हे यानी सालो से रोग है ओर दवाई खा रहे है ओर आगे चलकर गृह दशा से ऐसे योग वनते है की रोग भयानक रुप ले सकता है मेरे कुन्ङली  देख कर आगर उनको पाठ पुजा करानेकी सलाह दी जाती है पर वो कहते है कि आप हामे सरल उपाय वताऐ तव वहुँत  हैरानी होती है ऐसी सोच रखने वालो पर सवकुछ होते हुऐ भी अमीर आदमी भी ऐसा करवा नही पाता  यह भी तो पिछले जन्म के शायद कर्म ही है जिस ओलाद के लिऐ आदमी पैसे ईक्कठे करता है वाद मे रोगग्रस्त होने पर कोई सेवा नही करता तव पैसा भी काम नही आता खैर सभ कर्मो का खेल ही है मित्रो आप भी अगर अपनी कुन्ङली  दिखा कर अपनी समस्या का हल चाहते है तो ईन नम्वरो पर सम्पर्क  कर सकते है 09414481324 07597718725  मित्रो हमारी सेवा सशुल्क हैआचार्य राजेश

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