रविवार, 10 मार्च 2019

लाल किताब के अनुसार उम्र का पैंसठवां साल

लाल किताब के अनुसार उम्र का पैंसठवां साल 

ग्यारह जमता गद्दी पर सम्मुख अष्टम आजाता,

घर दूसरा तीजे से अपने आप ही जुड जाता,

धर्म तीसरे जाकर बैठे कर्म धर्म को पनपाता,

चौथा अपने ही घर में रहता सम्मुख खर्चा दिखलाता,

गद्दी पंचम में लग जाती,बीमारी ग्यारह भाव भरे,

पंचम छुपजाता छ: में जाकर सप्तम बारहबाट करे,

लालकिताबी वर्षफ़ली का रूप अनौखा देखा है,

मानव जीवन की गाथा है किये कर्म का लेखा है॥ ‌

https://youtu.be/3qu9NkJ-vRshttps://youtu.be/3qu9NkJ-vRsर्थ:- पैंसठवें साल में ग्यारहवा भाव पहले भाव में आजाता है,मित्रमंडली से खूब छनने लगती है,जीवन के दूसरे पडाव की मित्रमंडली न तो कुछ लेने वाली होती है और न ही कुछ देने वाली होती है। छुपे रहस्यों को खोजने में सहायता भी करती है,और बात बात में अपमान भी करती है,जितनी भी दूर की बातें होती है सामने आकर खडी हो जाती है। ग्यारहवां भाव बडे भाई की गद्दी भी कहलाता है,जब पहले भाव में यह गद्दी लग जाती है तो अपने को बडे भाई होने का अहसास होने लगता है और जो भी कार्य छोटों के लिये मानसिक रूप से किये जाने होते है वे किये जाते है,पहली गद्दी पर ग्यारह के आसीन होते ही कुटुम्ब सामने आने लगता है,वह कुटुम्ब जो पिता परिवार से जुडा होता है,अन्य रिस्तेदारों की कोई मौका परस्ती काम नही आती है,दखल भी नही होता है। ग्यारह के गद्दी पर आसीन होते ही सातवां घर यानी पत्नी या पति सीधे बारह का रास्ता अपना लेते है,वे या तो यात्रा में रहते है या अपने को दुनिया से कूच करने का कारण पैदा कर लेते है। ग्यारह के गद्दी पर आते ही सातवां सीधे से ग्यारह से लेने की फ़िराक में रहने लगता है वह जो भी लेता है वह केवल लाभ के कारणों के लिये ही माना जाता है,और बारह के अन्दर जो सातवां घर विद्यमान है वह खर्चा भी किराये में बीमारी में रहन सहन में अपनी सन्तान के लिये बीमारी में सन्तान के कर्जा को चुकाने में पुत्र वधू वाले कारणों में खर्चा करने लगता है। ग्यारह के गद्दी पर आते ही आठवां सप्तम में आजाता है,जीवन साथी के कुटुम्ब में किसी प्रकार की मृत्यु या अपमान के बारे में राय देने या लेने की बात सामने आती है,जो भी अपमान जोखिम जीवन साथी के कुटुम्ब से पूर्व में मिला होता है सबके लिये चुकाने का समय सामने होता है,जीवन साथी का प्रभाव शमशानी प्रभाव सा हो जाता है।अगर सामने होता है तो बिच्छू जैसा बर्ताव करने का कारण भी मिलता है। ग्यारहवे के गद्दी पर जाने के बाद धर्म भाग्य का भाव तीसरे में जाकर बैठ जाता है। छोटे भाई बहिनो के पास में पूर्वजों से सम्बन्धित कार्य करने का कारण बनने लगता है,छोटी यात्रायें केवल धार्मिक स्थानों या न्याय वाले घरों में ही होती है। चौथा घर चौथे ही घर में विद्यमान होता है इसलिये एक बार पैदा होने वाले स्थान पर जरूर जाना पडता है। गद्दी पंचम में स्थापित हो जाती है इसलिये सन्तान के घर में निवास करना और सन्तान की सन्तान के प्रति बीमारी आदि से जूझने का समय भी मिलता है,सन्तान के जीवन साथी के प्रति दुश्मनी कर्जा बीमारी से छुटकारे का कारण भी सोचना पडता है। छठे घर में पंचम के बैठने से सन्तान को किये जाने वाले कार्यो में दिक्कत का सामना करना पडता है,अस्पताली कारण बनते रहते है। सन्तान की सन्तान को जीवन साथी के द्वारा आश्रय दिया जाना भी मिलता है। अष्टम का स्थान सप्तम में आजाने से जीवन साथी के प्रति नकारात्मक भाव ही मिलता है,जीवन साथी जीवन के गूढ कारण खोजने और अपमान देने जीवन को क्षति देने के कारणों के प्रति लगाव रखता है,जीवन साथी का किसी प्रकार से तंत्र मंत्र या शमशानी शक्तियों के प्रति लगाव का होना भी माना जाता है। अष्टम भाव में तीसरे घर के आजाने से जो भी अपमान और बीमारी तथा जोखिम वाले कारण होते है उनके अन्दर छोटे भाई बहिन ही छुटकारा दिलवाने के लिये गुप्त रूप से कार्य करते रहते है,अपने को प्रदर्शन के मामले में गुप्त रूप से रहकर ही समय को निकालना पडता है। दसवां घर धर्म के घर में आजाने से कार्यों को धर्म से सम्बन्धित भाग्य से सम्बन्धित कानून से विदेश से सम्बन्धित ही करने पडते है। बारहवें घर का दसवें घर में बैठने से जो भी कार्य किये जाते है उनके अन्दर यात्रा का होना जरूरी होता है खर्चा कार्यों की मुख्य श्रेणी में आजाता है,पिछले पांच साल से रहने वाले स्थान के प्रति खर्चा भी करना पडता है चाहे वह निर्माण के कार्यों के लिय हो या वाहन सम्बन्धी हो या सामाजिक रूप से अपनी प्रतिष्ठा को बनाने के लिये ही हो। ग्यारहवें भाव में छठा घर बैठ जाने से लाभ की जगह पर अस्पताली खर्चा करना अथवा किसी ब्याज का आना किराये के प्रति कोई बुराई ले लेना आदि भी माना जाता है।

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

49 वां साल और क्या कहती है लालकिताब

49 वां साल और लालकिताब

पंचम चेता बारह से,साख मिलेगी ग्यारह से,

ग्यारह नवां विराजे जो,गद्दी सूनी होगी तो,

चौथा बिगड़े दोनों ओर,बजे खोपडा सन सन शोर,

छठे में आकर दूजा बैठा,नवा कर्म का मांगे लेखा,

सप्तम दूजा दे पहिचान,दसवा देता अपनी तान,

तीजा लाभ दिखाता है,अष्टम सप्तम जाता है,

पंचम खाता तीजा देता,दसवा कहता ग्यारह भाग,

छठा सोचता घर में रहकर,नवा दसम में गाये राग.

उनंचास की रीति कही है,लालाकिताबी बात सही है.


अर्थ:-

पांचवे भाव में बारहवा भाव आकर बैठ गया है,जो भी बढ़ोत्तरी होनी है वह नवे घर में जाकर बैठे ग्यारहवे घर से मिलेगी,जब ग्यारहवा घर नवे घर में बैठ जाए और वह खाली हो तो केवल सोच कर ही काम चलाना पड़ता है,कारण पांचवे के अन्दर बैठा बारहवा घर और उसके अन्दर बैठे ग्रह अपनी पूर्ती के लिए खर्चा तो मांगेगे,और जब नहीं मिलेगा तो दूसरा घर जो छठे घर में बैठ गया है,उससे और उसके अन्दर बैठे ग्रह से मांगना शुरू कर देंगे,उसी समय में अगर पहला घर अपने ही घर में विराजमान है यानी जहां पैदा हुए थे वही आकर रहना जरूरी है,अगर गद्दी सूनी है यानी पहला घर खाली है,साथ ही चौथा घर इस समय में आठवे भाव में चला जाता है,जिससे जद्दी मकान,पुराने जान पहिचान वाले जो उम्र की पच्चीसवी साल तक बहुत अच्छे जानकार थे केवल माँगने के लिए आने लगेंगे और अपने बारे में जानकारी करने के बाद कुछ न कुछ मानिसक अपमान देकर चले जायेंगे,उधर चौथे घर में छठा घर विराजमान हो गया,यानी जहां पैदा हुए थे वही आकर रहे तो मानसिक रूप से शारीरिक रूप से पहिचान के रूप से पारिवारिक अक्समात खर्चे के रूप से अधिक सोचने के कारण बीमार होना शरीर में चलने फिरने में दिक्कत का आना,रात की नींद और दिन का चैन समाप्त होना आदि शुरू हो जाएगा,कारण चौथा घर दोनों तरफ से बिगड़ जाता है,इस 49 वी साल में अच्छे का खोपडा बारहवे के पंचम में जाने से रहने के लिए यात्रा के लिए परिवार के लिए केवल खर्चा ही सामने आने लगता है,इस कारण से छठा घर जब चौथे में आजाये तो सोचने के कारण मन से बीमारी तो मानी ही जा सकती है,दूसरा घर जो धन को देने वाला है कुटुंब से सहायता करने वाला है वह जाकर जब छठे घर में बैठ जाए तो केवल कर्जा के बारे में सोचना होता है किये जाने वाले कामो के बदले में धन प्राप्त करने के लिए माना जाता है,बीमारी के लिए खर्चा करना और मानसिक शानित के लिए खर्चा करना माना जाता है,इसके साथ ही जो भाग्य का घर था वह इस उम्र में आकर दसवे घर में बैठ जाता है,यहाँ बैठते ही लाभ को प्राप्त करने के लिए धर्म को देखने लगते है जो भी जानकार और पहिचान वाले होते है वे भाग्य को प्राप्त करने के लिए लाभ देने वाले बन जाते है,कर्म का रूप दसवे में नवा बैठने से धर्म के रूप में बन जाता है,यहाँ गुरु भी अपनी चालाकी से अपने कार्य को करने के लिए अपनी शक्ति को देने लगता है और अपने गुरु धर्म को भूल कर व्यापारी के रूप में सामने आता है,सातवां घर जो सलाह देने के लिए मंत्री का रूप माना जाता है वह भी किसी भी सलाह को देने के लिए फीस की फरामायास करने लगता है,इधर आगे के कार्य को करने के लिए दसवा तीसरे में बैठ जाता है और लिखने बोलने प्रकाशित करने के लिए अपनी शक्ति को प्रकाशित तो करना चाहता है लेकिन जिस चौथे से वह कार्य के लिए सहायता को चाहता है वही बजाय सहायता देने के अस्पताली कारणों से और किये जाने वाले कामो की एवज में नौकरों और काम करने के साधनों के रूप में माँगने लगता है,जो कार्य करने का फल मिलता है वह इसी प्रकार के कारणों में खर्च हो जाता है,देखने के लिए तो तीसरा घर लाभ के घर में जाकर बैठ गया है और जो भी जान पहिचान के लोग और कुटुंब के लोग है समझते है कि बहुत धन आ रहा है और खूब लाभ का कारण बन रहा है लेकिन नवा जो दसवे में जाकर बैठा है वह केवल कहता है देने के लिए कभी कभी के अलावा अपने को असमर्थ बता देता है,जो गुप्त रूप से जानकारी होती है और जो भी जीवन साथी या खुद के जोखिम से काम करने के लिए पहले से बचा कर रखा गया होता है वह कार्य के रूप में कार्य स्थान के रूप में कार्य स्थान पर गुप्त वस्तुओं की खरीद बेच से किये जाने वाले कार्यों के रूप में जाना जाता है,जो कुछ भी कहने से प्रकाशित करने से बताने से और दूसरे की आफत को दूर करने से मिलता है वह परिवार के बाहर रहने से यानी पिछले समय में रहने वाले स्थान के लिए चला जाता है,परिवार और संतान के मामले में केवल खर्चे दिखाई देते है और परिवार के लिए एक ही रूप में देखना पड़ता है कि वह अपने अपने प्रदर्शन से केवल माँगने के लिए माना जाता है,जब भी कोई काम करने के लिए सोचा जाता है या राय माँगी जाती है तो नवे भाव में बैठे ग्यारहवे की तरफ इशारा कर दिया जाता है कि वह ही सहायता करेगा,नवे में ग्यारहवे के होने से इशारा दोस्तों और पहले के कमाए गए धन  तथा मूल्यों से माना जाता है.छठा घर जब रहने वाले स्थान में और मन में होता है तो वह कार्य और कार्य के स्थान के मामले में सोचता है और जब कार्य के लिए कोई कारण सोचता है तो दसवा सामने होने से और दसवे में विराजमान नवा होने से वह अपने राग को कहना शुरू कर देता है कि धर्म को प्रयोग करने के बाद कमाना शुरू कर दो,यह लालाकिताबी कथन उनंचासवी साल के लिए कहा गया है.

गुरुवार, 7 मार्च 2019

क्या रत्न(Gemstone) धारण करना ठीक ?

https://youtu.be/2GqMEVBeo_Yक्या रत्न(Gemstone) धारण करना ठीक ?
हर मनुष्य की जन्मपत्री में ग्रहों की कमजोर और बलवान दशा के अनुसार ही मनुष्य के भाग्य में परिवर्तन आता रहता है। अशुभ ग्रहों को शुभ बनाना या शुभ ग्रहों को और 


अधिक शुभ बनाने की मनुष्य की सर्वदा चेष्टा रही है जिसके लिए वो अनेक उपाय करता है जैसे मंत्र जाप, दान, औषधि स्नान, रत्न धारण, धातु एवं यंत्र धारण, देव दर्शन आदि। रत्न धारण एक महत्वपूर्ण एवं असरदार उपाय है।अक्सर देखा जाता है कि किसी भी कारण के निवारण के लिये ज्योतिषी द्वारा रत्न को धारण करने लिये सलाह दी जाती है,रत्न को धारण करने के बाद भी जब जातक को फ़ायदा नही मिलता है तो ज्योतिष और ज्योतिषी के लिये जातक के मन में आस्था हटने लगती है। रत्न को भी धारण किया और फ़ायदा भी नही हुया तो यह रत्न का जंजाल क्या है ? अक्सर इसी बात पर लोगों के दिमाग में रत्नो के प्रति आपाधापी का समय मान लिया जाता है। इस बात की पुष्टि के लिये जातक अपने रत्न को लेकर विभिन्न रत्न व्यवसाइयों के पास भागता है,कोई उसे सही बताता है कोई गलत बताता है,गलत बताने का एक कारण और भी माना जाता है कि हर रत्न व्यवसायी अपने को उच्च कोटि का व्यवसायी मानता है और अपने माल के अलावा किसी के भी माल को खरा बताने में संकोच करता है। इस बात के पीछे जिसने रत्न जातक को दिया है वह और रत्न दोनो ही जातक के दिमाग में गलतफ़हमी डाल देते है,जातक या तो वह रत्न वापस करने के लिये व्यवसायी के पास जाता है या उसे अपने पास रख कर केवल यही मान कर बैठ जाता है कि उसे ठगा गया है।
रत्न क्या है ?
रत्न को समझने के लिये अगर कोई कितना ही बडा पारखी है कभी समझ नही सकता है,कारण कोई भी रत्न जमीन से निकला केवल जमीन का ही टुकडा है। लाल हरा पीला नीला काला जैसा भी रंग है वह जमीन का दिया हुआ है। जिस वक्त में वह रत्न जमीन से निकाला गया है वह किसी को तो फ़ायदा देने वाले और किसी को नुकसान देने के लिये ही माना जायेगा। रत्न को काट छांट कर अलग अलग आकार में बनाना और अलग अलग रूप से धारण करने के योग्य बनाना भी रत्न के आकार को सजाना संवारना होता है।
कैसे दी जाती है रत्न को शक्ति ?
रत्न को जमीन से निकालना ही रत्न का गर्भ धारण है। रत्न का आकार प्रदान करना उसे अलग अलग रूप मे बनाना रत्न का प्रकृति के अनुसार गर्भकाल में उसी प्रकार से आकार प्रदान करना है जैसे किसी बच्चे का गर्भकाल में आकार प्रकार बनता है। रत्न जब बनकर तैयार हो जाता है पूरी तरह से परखने के बाद जौहरी के पास आजाता है तो वह एक जन्मे हुये बच्चे की तरह से माना जाता है। जब किसी को रत्न की जरूरत पडती है तो वह उस रत्न को अपने पास ले जाता है,और उसे जिस कारण के लिये जरूरत पडती है तो वह उसी कारण के अनुसार अभिमन्त्रित करता है। अभिमन्त्रित करने का अभिप्राय उसी प्रकार से जैसे किसी बच्चे को शिक्षा दी जाती है,उसे बुद्धिबल से पूर्ण बनाया जाता है। अक्सर लोग यह कहकर रत्न जातक को पकडा देते है कि इसे लेजाकर अमुक मंत्र को पढ कर पहिन लेना,जातक ले जाता है बताये गये मंत्र को पढ कर रत्न को धारण कर लेता है,लेकिन जब काम नही करता है तो दोष रत्न को दिया जाता है,और अगर रत्न धारण करने के समय के आसपास से दिन सुधरने लग गये और फ़ायदा होने लगा तो रत्न देने वाले और रत्न दोनो के प्रति जातक के दिमाग में आस्था जगना स्वभाविक है। अक्सर यह भी देखा जाता है कि रत्न को बेचने वाले अपने अपने प्रकार को बहुत ही बढा चढाकर बोलते है और बेचने के लिये कितने ही तरह के ठगी वाले कारण पैदा करते है,लेकिन बिना शक्ति की पूर्णता को प्राप्त किये रत्न कार्य करने में हमेशा असमर्थ होता है। रत्न को प्रभावी बनाने के लिये ग्रह के अनुसार अभिषेख किया जाता है,रत्न को ग्रह मानकर उसे ग्रह की प्रकृति के अनुसार ही सम्बन्धित स्थान पर स्थापित किया जाता है,ग्रह के अनुसार ही समय पर उस रत्न को स्थापित किया जाता है,ग्रह के अनुरूप ही उसे नियत समय पर शक्ति देने का कार्य मन्त्रित विधि से किया जाता है। यह मन्त्रित विधि कोई एक दिन की या एक अल्प समय की नही होती है,अलग अलग जातक के लिये अलग अलग प्रकार के ग्रह के खराब समय के दिनो अथवा वर्षों के अथवा आजीवन के लिये अभिमन्त्रित करना पडता है,यह भी नही कि एक साथ कई रत्नो को रख लिया और अभिमन्त्रित कर दिया,कारण जिस जातक के लिये रत्न को अभिमन्त्रित करना है उसके अनुसार ही उस रत्न को सन्कल्पित करना होता है,जब तक रत्न को सन्कल्पित नही किया गया है उसे किसी प्रकार से प्रयोग में नही लाया जा सकता है। जातक की कुंडली के अनुसार ग्रह की दशा को देखा जाता है,और जिस ग्रह की दशा चल रही है,या कोई खराब ग्रह जातक के लगनेश पर गोचर कर रहा है,तो दशा के समय के अनुसार वह दशा खराब ग्रह की है,या त्रिक भाव के कारक की दशा है,तो उसके लिये किस समय में किस भाव मे वह दशा वाला ग्रह अधिक कुप्रभाव देगा उस समय के लिये उस रत्न को उतने ही समय के लिये अभिमन्त्रित करना जरूरी होता है। जैसे शनि की दशा मे यह जरूरी नही है कि शनि खराब ही फ़ल देगा वह भाव के अनुसार अपना फ़ल देने के लिये माना जायेगा। अलग अलग समय के लिये अलग अलग श्रेणी में रत्न को मंत्रों से अभिमन्त्रित करना पडता है,जैसे शनि की दशा मे यह जरूरी नही है कि शनि खराब ही फ़ल देगा वह भाव के अनुसार अपना फ़ल देने के लिये माना जायेगा। अलग अलग समय के लिये अलग अलग श्रेणी में रत्न को मंत्रों से अभिमन्त्रित करना पडता है,जैसे शनि रत्न नीलम को तभी तक प्रभावी माना जाता है जब तक शनि कारक ग्रह या कारक भाव पर अपना असर दे रहा होता है। जैसे ही शनि की रश्मियां उस कारक ग्रह या कारक भाव से दूर होती है,वही नीलम बजाय फ़ायदा के नुकसान देने लगता है। इसके अलावा भी जैसे शनि बुद्धि के कारक ग्रह बुद्ध पर अपना असर दे रहा है तो एक उपाय बुध की शक्ति को बढाने से माना जाता है दूसरा उपाय शनि की शक्ति को घटाने से माना जाता है,शनि की शक्ति नीलम के द्वारा तभी घटाई जा सकती है जब उसे सम्बन्धित समय के लिये अभिमन्त्रित किया गया है,बिना अभिमन्त्रित नीलम उसी प्रकार से माना जायेगा जैसे किसी पागल को अच्छे अच्छे कपडे आभूषण पहिना कर खडा कर दिया जाये। रत्नों के मामले में आज भी देखा जाता है कि यह एक झूठ का बाजार बन कर रह गया है,जोहरी रत्न को काट कर उसे विभिन्न आकार देकर,केवल बेचने से अपने को सामने रखते है,फ़ायदा देना या नुक्सान देना उनके द्वारा नही देखा जाता है। रत्न को अभिमंत्रित करवाने के लिये नाम और गोत्र के अनुसार ही अभिमंत्रित करवाना जरूरी होता है,रत्न को कितने समय के लिये पहिना जाना है उसी समय के अनुसार रत्न को अभिमंत्रित करना पडता है,जैसे शनि का समय ढाई साल के लिये एक भाव पर और दस महिने सम्बन्धित ग्रह पर गोचर करने का होता है,उस समय के लिये ही नीलम को अभिमन्त्रित करना पडता है,अभिमत्रित करने का तात्पर्य रत्न के अन्दर प्राण प्रतिष्ठा करने से होता है। जैसे नीलम को ढाई साल के लिये अभिमन्त्रित करना है तो उसे पहले शनि के नक्षत्र में खरीदना पडता है,फ़िर उसे भावानुसार वस्तु के अन्दर स्थापित करना होता है,या ग्रह के अनुरूप वस्तु पर स्थापित करना होता है,फ़िर एक साल के लिये तीन लाख मंत्र के जाप सन्कल्पित व्यक्ति के लिये शनि मंत्र से करने पडते है,इस प्रकार से ढाई साल के लिये साढे सात लाख मंत्रों का जाप करने के बाद जातक को पहिनने के लिये कारक भाव और कारक ग्रह के अनुसार धातु में पहिनने के लिये राय दी जाती है,इस प्रकार से पहिने जाने वाले रत्न का प्रभाव जीवन जरूर पडता है। इस प्रकार से अभिमंत्रित रत्न की कीमत साधारण रत्न की कीमत से कई सौ गुना बढ जाती है,लेकिन उस एक बात और भी ध्यान रखने योग्य है कि किसी अन्य व्यक्ति के लिये सन्कल्पित मन्त्र से अभिमन्त्रित रत्न किसी दूसरे को पहिनाने से बडी बडी दुर्घटनाये भी होती देखी गयी है। रत्न को पहिनने पर अगर अचानक कोई अनहोनी होती है तो यह अक्समात नही मानना चाहिये कि वह अनहोनी खराब थी,जैसे किसी नीलम को पहिनते ही किसी बहुत पहले से जानकार व्यक्ति से लडाई हो जाती है तो यह मान लेना चाहिये कि वह व्यक्ति किसी प्रकार से बडा अहित करने वाला था इस कारण से उससे लडाई हो गयी है,अथवा कोई वस्तु खत्म हो जाती है तो वह वस्तु किसी प्रकार से जानजोखिम में देने वाली भी हो सकती थी,अक्समात रत्न जो अभिमंत्रित है से विश्वास नही उठा लेना चाहिये। मित्रोंकौन सा रत्न कब पहना जाए इसके लिए कुंडली का सूक्ष्म निरीक्षण जरूरी होता है। लग्न कुंडली, नवमांश, ग्रहों का बलाबल, दशा-महादशाएँ आदि सभी का अध्ययन करने के बाद ही रत्न पहनें। आचार्य राजेश

बुधवार, 6 मार्च 2019

बुध-गुरु की युति | Mercury Jupiter Conjunctionhttps://youtu.be/3qu9NkJ-vRs

https://youtu.be/3qu9NkJ-vRsबुध-गुरु की युति | Mercury Jupiter Conjunction  मित्रों आज वात करते हैं वुघ ओर गुरु एवं एक साथ एक ही भाव मैं हो या युति में है मित्रों कोई भी दो ग्रह का मेल शुभ भी हो सकता है और अशुभ भी हो सकता है यह आपकी कुंडली में देख कर ही फल कथन किया जाता है लालकिताब में गुरु को सूर्य से भी अधिक महत्व दिया गया है,

सूर्य सौर मंडल के ग्रहों का राजा है,तो गुरु को देवताऒ का का गुरु कहा गया हैब्रहस्पति को राजगुरु तथा संयम बोला गया है

भारतीय परम्परा के शासक भी गुरु के शासन में रहा करते थे,ज्योतिष के अनुसार ग्रहों को कालपुरुष के नौ अंगों का रूप बताया गया है,इस अंग विभाजन में गुरु को शरीर की गर्दन का प्रतिनिधि माना जाता है,कालपुरुष ने गर्दन को गुरु के रूप में अपने हाथ में पकड रखा हो,फ़िर अन्य ग्रहों की बिसात ही क्या रह जाती है,लालकिताब ने गुरु को आकाश का रूप दिया है,जिसका कोई आदि और अन्त नही है,गुरु ही भौतिक और आध्यात्मिक जगत का विकास करता है,उसके ऊपर अपनी निगरानी रखता है,गुरु से ज्ञान का विचार कहा गया है और बुध को मंत्री, दुनियावी हिसाब-किताब बोला गया है बुध से बुद्धि का. ज्ञान और बुद्धि दोनों अलग हैं और एक दूसरे के पूरक भी परन्तु ज्ञान श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञान बुद्धि को सन्मार्ग दिखाता है. ज्ञान बुद्धि को पोषित करता है. ज्ञान हो तो व्यक्ति बुद्धि से ऊपर उठ जाता है और इसके लिए गुरु का पत्रिका में बलवान होना आवश्यक है. बलवान गुरु बुध के दोषों को ढकने की क्षमता रखता है परन्तु गुरु वास्तव में बलवान होना चाहिए.सोचने वाली बात यह है कि बृहस्पति तो बुध को शत्रु समझता है परन्तु बुध बृहस्पति को सम (न मित्र न शत्रु) समझता है. बुध को ज्ञान से कोई परहेज नहीं. बुध का तो एक ही शत्रु है - चन्द्रमा. उसके अतिरिक्त उसको किसी से शत्रुता नहीं. भावनाओं में बहना बुध को नहीं भाता अपितु बुद्धि से प्रत्येक विषय में ऊहापोह करना अच्छा लगता है.  जो तर्क की कसौटी पर खरा उतरे वह सत्य ऐसा प्रायः इन लोगों का मानना होता है. यूँ ही समर्पण कर देना इन्हें नहीं आता.

जो लोग बात बात में कारण खोजते हैं प्रायः ऐसे लोग बुध प्रभावित होते हैं. ईश्वर को तो समर्पण चाहिए, संदेह नहीं. जहाँ संशय हो वहाँ ईश्वर का क्या काम. इसलिए बुध को बृहस्पति शत्रु समझता है. बुध यदि अशुभ प्रभाव में हो तो बुद्धि संशय युक्त हो जाती है और ऐसे व्यक्ति की खोज (संशय अथवा भ्रम) कभी समाप्त ही नहीं होती - यदि पत्रिका में गुरु बली न हो तो.ज्योतिष के अनुसार गुरु को धनु और मीन राशि का स्वामी बताया है,लालकिताब के अनुसार गुरु को नवें और बारहवें भाव का स्वामी बताया गया है,लालकिताब के अनुसार ही गुरु को भचक्र की बारह राशियों के अनुसार बारहवें भाव को राहु और गुरु की साझी गद्दी बताया गया है,बारहवे भाव में गुरु और राहु अगर टकराते है,तो राहु गुरु पर भारी पडता है,और गुरु के साथ राहु के भारी पडने के कारण जो गुर संसार को ज्ञान बांटने वाला है,वह एक साधारण सा मनुष्य बन कर अपना जीवन चलाता है,गुरु के भी मित्र और शत्रु होते है,गुरु जो आध्यात्मिक है ,उसे भौतिक कारणों को ही गौढ मानने वाले लोग जो शुक्र के अनुयायी होते है,उनसे नही पटती है,और अक्सर आध्यात्मिक व्यक्ति की भौतिक कारणों को ही गौढ मानने वाले लोगों के साथ नही बनती है,इसी को शत्रुता कहते है,बुध जो वाणी का राजा है,और अपने भाव को वाणी के द्वारा ही प्रकट करने की योग्यता रखता है,की आध्यात्मिक सिफ़्त रखने वाले गुरु से नही पटती है,लेकिन वही बुध अगर किसी प्रकार से गुरु के मुंह पर विराजमान होता है,जो गुरु के मुखारबिन्दु से आध्यात्मिक बातों का निकलना चालू हो जाता है,यह बात बुध के कुन्डली के दूसरे भाव में विराजमान होने पर ही मिलती है,बुध जब पंचम में होता है,तो भी गुरु के घर पर जाकर शिक्षात्मक बातों को प्रसारित करने में अपना मानस रखता है,और गुरु का मित्र बन जाता है,नवें भाव में गुरु का मित्र केवल आध्यात्मिक बातों को प्रसारित करने के लिये भौतिक साधनो के द्वारा या गाने बजाने के साधनो के द्वारा कीर्तन भजन और अन्य साधनो मे अपनी गति गुरु को देकर गुरु का सहायक बन जाता है,ग्यारहवें भाव में जाकर वह गुरु के प्रति वफ़ादार दोस्त की भूमिका अदा करता है,इस लिये वह हर तरह से गुरु का शत्रु नही रहता है,जबकि वैदिक ज्योतिष में गुरु का शत्रु ही बुध को माना गया है.


गीता में भगवान कृष्ण ने कहा भी है, "नायं लोकोSस्ति न परो सुखं संशयात्मनः". अर्थात् संशयग्रस्त व्यक्ति के लिए न तो इस जन्म (लोक) में और न ही परलोक में कोई सुख है. ध्यान देने वाली बात यह है कि बृहस्पति को सुख का कारक भी माना जाता है. उस सुख का जो भौतिक के अतिरिक्त है. भौतिक सुखों का कारक तो शुक्र है.


बुद्धि यदि भ्रमित हो जाये तो अच्छा नहीं इसलिए राहु के साथ बुध की स्थिति को बहुत से ज्योतिषी अच्छा नहीं समझते. साथ ही ज्ञान शुद्ध होना चाहिए. ज्ञान का भ्रष्ट होना अच्छा नहीं इसलिए राहु के साथ गुरु की स्थिति का विचार भी सोच समझकर करने को कहा जाता है.


अचला ह तो वह तो यही है कि बुध और गुरु दोनों ही पत्रिका में बलवान तथा शुभ स्थिति में हों. ऐसा व्यक्ति कैसी भी परिस्थिति में अपने ज्ञान और विवेक से सफलता का मार्ग ढूँढ ही निकलता है. पत्रिका में बुध तो बलवान हो परन्तु गुरु अशुभ प्रभाव में हो अथवा बलहीन हो तो ऐसा व्यक्ति, ज्ञान हो न हो, चतुर बहुत होता है. उन्हें दूसरों को चुप कराना खूब आता है. बहस में उनसे जीतना कठिन होता है परन्तु भीतर तो खोखलापन रहता ही है.

नवग्रहों में बुध से गुरु बली है. गुरु से बली केवल सूर्य और चन्द्र हैं. यदि सूर्य, चन्द्र अथवा दोनों पत्रिका में महाबली हों तो व्यक्ति अपना उचित अनुचित खूब समझता है. उसके आत्मबल अथवा मनोबल से बुद्धि उसके वश में रहती है. अपने लिए सही मार्ग क्या है यह जानने के लिए उसे किसी पुस्तक की अथवा बाहरी गुरु की आवश्यकता नहीं होती. उसे भीतर ही गुरु मिल जाता है अथवा प्रकृति ही उसे ज्ञान का मार्ग/साधन, सही गुरु उपलब्ध कराती चलती है.

रविवार, 3 मार्च 2019

ग्रहों के चलते फिरते रुप

https://youtu.be/rLabGPgeiFUज्योतिष अर्थात ज्योति + इश अर्थात इश की ज्योति अर्थात इश के नेत्र जिनसे इश इस श्रृष्टि का संचार व नियंत्रण करते है | ये आज का अध्युनिक विज्ञानं भी मानता है के हर ग्रह की हर जीव की हर प्राणी की हर अणु की (atom) अपनी एक निश्चित नकारात्मक व सकारात्मक उर्जा होती है | अगर हम उस उर्जा का सही संतुलन अपने जीवन में बना ले तो वही ईश्वर की प्राप्ति का सच्चा साधन है  यहाँ हम चर्चा करेंगे ग्रहों  के चलते फिरते रुप की कई बार दिमाग मे धारणा आती हैकि ज्योतिषी अपने द्वारा जब देखो तब ग्रहों के बारे बताते रहते है जब देखो तब सूर्य खराब है चन्द्रमा खराब है मंगल खराब है आदि बातो से दिमाग को बहलाने की कोशिश करते है सूर्य तो सभी के लिये उदय होता है चन्द्रमा भी सभी के जैसा ही दिखाई देता है फ़िर यह ग्रह केवल एक आदमी को ही क्यों परेशान करते है.वास्तव मे एक साधारण आदमी की इससे अधिक सोच हो भी क्या सकती है। कई बार तो लोग झल्लाकर कह ही उठते है कि आखिर मे आचार्य जी यह शनि हमे ही क्यों परेशान कर रहा है ऐसा कोई रास्ता नही है कि इस शनि को हमसे दूर कर दिया जाये जिससे हम बिना शनि के कम से कम आराम से तो रह सकते है। लोगों की बात सुनकर काफ़ी गुस्सा भी आता है और हंसी भी आती है कि पहले तो शनि को दूर किया ही नही जा सकता है और शनि अगर साथ मे नही है तो आदमी अपने हाथ पैर हिलाना भी भूल जायेगा,उसे शेर मारे या नही मारे उसे चीटियां ही चुन जायेंगी। सही बात है बिना समझे ग्रह को हर कोई नही समझ सकता है।आकाश मे ग्रह दिखाई देते है,वह पिण्ड ग्रह माने जाते है सूर्य दिखाई देता है भले ही वह कम या अधिक दिखाई देता हो लेकिन दिखाई जरूर देता है इसलिये सूर्य को सूर्य कहा जाता है,काली अन्धेरी रात मे चन्द्रमा का दर्शन जरूर होता है भले ही वह पन्द्रह दिन बढता हुआ दिखाई दे और पन्द्रह दिन घटता हुआ दिखाई दे,इसी प्रकार से मंगल बुध शुक्र शनि गुरु अदि ग्रह है जो बहुत ही दूर होने के कारण कभी छोटे और कभी कुछ बडे दिखाई देते है। इन ग्रहो की शक्तियां हमे उसी प्रकार से मिलती है जैसे सूर्य से प्रकाश भी मिलता है और ऊर्जा भी मिलती है चन्द्रमा से पानी पर असर मिलता है यानी चन्द्रमा के कारण ही धरती पर पानी का होना पाया जाता है,मंगल है दूर जरूर लेकिन उसकी लाल रश्मिया हमे धरती पर लाल रंग के रूप मे मिलती है बुध सूर्य के पास है इसलिये यह हमे धरती पर हरीतिमा का आभास देता है सूर्य के रहने तक हरा और सूर्य के छुपने के बाद बुध का रूप काले रंग मे दिखाई देने लगता है जैसे दिन मे कोई भी हरा भरा पेड हरा दिखाई देता है लेकिन रात होते ही वह हरा रंग काला दिखाई देने लगता है। गुरु की पीली आभा हमे मिलती है और गुरु के द्वारा ही हमे पीला रंग मिलता है,गुरु की पीली रश्मिया ही वायु को इधर उधर घुमाने के लिये और गुरु के उनन्चास उपग्रह हवा के उनचास रूप देने के लिये माने जाते है,शुक्र का रूप मे हमे प्रकृति की कलाकारी के रूप  मे मिलता है बुध के आसपास रहने से सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को वह सुन्दरता के रूप मे प्रकट करता है इसलिये शुक्र हमे बल देने वाले कारको मे अपनी शक्ति को बिखेरता हुआ मिलता है शनि हमारे से बहुत दूर है लेकिन सूर्य और शनि की सीमा बन्धी हुयी है जिधर शनि होता है उसके विपरीत शनि की स्थिति होती है यानी जब सूर्य छुप जाता है तो शनि की सीमा अन्धेरे और ठंडी प्रकृति देने के लिये सामने होता है। इन सबकी शक्ति को लाने के लिये राहु और इनकी शक्ति को प्रयोग करने के लिये केतु का कार्य होता है। यह बात तो हुयी आसमानी शक्तियों के बारे में लेकिन वही शक्तिया हर व्यक्ति के अन्दर भी उपस्थित है।

बच्चे के लिये पिता सूर्य है माता चन्द्रमा है मंगल भाई है बुध बहिन बुआ बेटी है गुरु खुद जीव है शुक्र जीवन साथी है पुरुष के लिये स्त्री और स्त्री के लिये पुरुष मे है शनि बुजुर्ग लोग भी है राहु ससुराल है केतु साले भानजे भतीजे लडके आदि है। यह ग्रह चलते फ़िरते है। यही ग्रह शरीर के अन्दर है सूर्य से पहिचान हड्डियों का ढांचा नाम पहिचान आंखो की द्रिष्टि है तो चन्द्रमा से शरीर मे पानी की मात्रा और मन है जो हमेशा पानी और चन्द्र्मा की तरह से चलायमान है,मंगल शरीर मे खून मे शामिल है जितना अच्छा मंगल होता है उतनी ही अच्छी शक्ति मिलती है अच्छी जाति और अच्छी कुल की बात भी मंगल से देखी जाती है इसी प्रकार से बुध जो शरीर मे बोलने के लिये वाणी के रूप मे सुनने के लिये कानो के रूप मे समझने के लिये बुद्धि के रूप मे और सूंघने के लिये नाक के रूप मे भी शामिल है गुरु वायु के रूप मे जिन्दा रखने के लिये समझने के लिये रिस्तो के रूप मे और जीवित रहने के लिये प्राण वायु के द्वारा कार्य करने के लिये है शुक्र का रूप शरीर मे जननेन्द्रिय के रूप मे है शरीर की पहिचान को सुन्दर या बदशूरत बनाने के लिये है,शनि शरीर मे खाल और बालो के रूप मे है जिससे शरीर की सर्दी गर्मी बरसात मे रक्षा होती है बाहरी वातावरण के अनुसार शनि ही रक्षा करने वाला होता है। राहु आकस्मिक बचाव करने वाला है जिसे विचार की श्रंखला मे बदलाव करने वाला किसी एक या अधिक क्षेत्रो मे जाने की धुन सवार करने के लिये और केतु शरीर मे जोडों के रूप मे हाथ पैर शरीर के अंगो को प्रयोग करने के लिये अपनी शक्ति को देने वाला है।

शरीर परिवार के अलावा कुछ ग्रह ऐसे भी है जो केवल आभास देते है कुछ हर स्थान पर मजबूत होते है,जैसे तरबूज के अन्दर जो डंठल होता है वह बुध है तरबूज की बनावट सूर्य है,तरबूज के अन्दर पानी चन्द्रमा है तरबूज का गूदा शुक्र है तरबूज के बीज केतु है तरबूज का शरीर के लिये फ़ायदा या नुकसान देने का कारक राहु है तरबूज का छिलका शनि है। इसी प्रकार से किसी भी कारक मे ग्रहो का होना जरूरी है।

जिस घर मे हम रहते है उस घर की सामने की बनावट ऊंचाई नाम नम्बर आदि सूर्य है,घर के अन्दर पानी का स्थान चन्द्रमा है,घर के अन्दर मंगल रसोई है रोशनी का कारक भी सूर्य है,गुरु हवा आने के रास्तो से है,बुध घर के अन्दर संचार के साधनो से है शुक्र घर की सजावट है शनि घर की दिवालो मे लगे ईंट पत्थर सीमेट प्लास्टर और बाहरी दिवालो के रूप मे है राहु घर मे संडास और सीढिया है केतु घर के अन्दर खिडकी और झरोखों के रूप मे है।जिस आफ़िस मे हम काम करत है उस आफ़िस का नाम सूर्य है उस आफ़िस के अन्दर काम करने वाले लोग चन्द्रमा है उस आफ़िस की कम्पटीशन मे शक्ति मंगल है आफ़िस के अन्दर टेलीफ़ोन इंटरनेट कम्पयूटर आदि बुध है आफ़िस का मालिक गुरु है आफ़िस की साज सज्जा शुक्र है आफ़िस की रक्षा करने वाले चौकीदार चपरासी आदि शनि है,साफ़ सफ़ाई करने वाले राहु आफ़िस मे कार्य करने के साधन केतु के रूप मे है,वह चाहे टूर  से काम कर रहे हो या बाहर की डाक लाने ले जाने का काम कर रहे हो।

पूजा पाठ मे भी ग्रह अपने अपने अनुसार विराजमान है,देवी देवता की बनावट सूर्य है देवी देवता के लिये सोची जाने वाली क्रिया शैली चन्द्रमा है हवन यज्ञ आदि दीपक अगरबत्ती की आग मंगल है बोली जाने वाली मंत्रो की भाषा प्रार्थना मानसिक प्रार्थना आदि बुध है,धारणा बनाना गुरु है मूर्ति आदि की बनावट पूजा की सजावट शुक्र है पूजा के अन्दर रक्षा करने वाले गेट कमरा अलमारी आदि शनि है फ़ोटो बिजली की सजावट फ़ूलो की सजावट आदि राहु हैऔर इसी राहु को देवता का आक्स्मिक दर्शन या दिया जाने वाला प्रभाव राहु है जितने भी कारक पूजा पाठ आदि के लिये प्रयोग मे लाये जाते है वह केतु के रूप में है।

हिन्दू देवी देवताओं मे सूर्य विष्णु है चन्द्रमा अर्धनारीश्वर शिव है बुध दुर्गा है गुरु ब्रह्मा है और बारह भावो के अनुसार इन्द्र के रूप मे पूजे जाते है शुक्र लक्ष्मी है और एक सौ आठ रूप मे यानी हर भाव मे बारह बारह प्रकार की सोच से अपनी कृपा को देने वाली है शनि भैरों के रूप मे भी है भौमिया के रूप मे भी है और शनि ही काले रंग के देवताओं के रूप मे है राहु सरस्वती भी है बोले जाने वाले जाप किये जाने वाले मंत्र है केतु गणेश भी है तो देवी देवताओं के वाहन के रूप मे भी देखे जाते है।जातियों में सूर्य राजपूत है चन्द्रमा किसान है मंगल सैनिक है बुध व्यापारी है गुरु धर्म पुजारी है हिन्दू है शुक्र कलाकार है जो सजावट प्रिय है,शनि नौकरी करने वाली जातिया है राहु मुस्लिम भी है और खुशी मे खुशी की भावना देने वाले दुख मे दुख की भावना देने वालेहै यह डर के रूप मे भी है तो उत्साह के रूप मे भी है केतु जाति से सिक्ख भी है तो जाति हर ग्रह के साथ मिलकर अनेक प्रकार की सहायक जातियों के रूप मे भी देखी जाती है।

शनिवार, 2 मार्च 2019

Lottery , शेयर-सट्टा व लॉटरी से धनार्जन कैसे करें?https://youtu.be/5QlK8Oa_lmk

https://youtu.be/5QlK8Oa_lmkप्रायः हर व्यक्ति यह चाहता है कि उसे अचानक भारी धन-लाभ हो, चाहे वह किसी भी प्रकार से हो। 

इस अचानक लाभ के लिए व्यक्ति अपनी जमापूँजी को भी लॉटरी, रेस, सट्टा आदि में लगा देते हैं। सृजनात्मक होना श्रम मांगता है, लंबा चिंतन और प्रतिभा मांगता है, जीवन भर की साधना मांगता है। तब अंत में धन पैदा होगा। धन के विरोधी सरल तरकीब निकालते हैं। जुआ खेल, सट्टा खेल, लाटरी निकाल कर ज्यादा पाने की कोशिश करते हैं।इस तरह अपनी परिश्रम से कमाई हुई दौलत को बर्बाद करना सर्वथा अनुचित है। यह भी जान लेना जरूरी है कि वास्तव में आपके भाग्य में आकस्मिक धन-लाभ प्राप्त होना है या नहीं। मित्रों लाभ को प्राप्त करने के लिये दो कारण संसार में चलते है एक मेहनत करने के बाद किये गये कार्यों की एवज में लाभ का प्राप्त करना और दूसरा बिना मेहनत करने के दिमाग को प्रयोग करने के बाद धन को प्राप्त करने की क्रिया को करना। हानि के कारण दोनो ही पक्षों को देखने को मिलते है जैसे मेहनत करने के बाद जब फ़ल लेने का समय हुआ तो कार्य का मूल्य ही समाप्त हो गया,अथवा बना हुआ कार्य खराब हो गया,साथ ही बुद्धि को अपनाने के बाद जब धन को प्राप्त करने का समय आया तो अचानक धन बजाय आने के चला भी गया। शेयर बाजार कमोडिटी वाले काम पूंजी बाजार वाले काम बुद्धि वाले काम है,यह काम धन के उतार चढाव से सम्बन्ध रखते है,जैसे हमेशा के लिये जिन्स बाजार से उपार्जन करने के लिये वस्तु के बढने के समय उसे खरीद लिया जाता है और वस्तु के घटने के समय उसे अच्छे दामों मे बेच दिया जाता है,अर्थशास्त्र का नियम ह्रासमान तुष्टिगुण नियम,वस्तु का बढ्ना यानी कीमत का घटना और वस्तु का घटना यानी कीमत क बढना जिन्स के बाजार में देखा जाता है। यह कार्य शनि के मार्गी वाले स्थानों और जातकों के लिये देखा जाता है। लेकिन शेयर बाजार में भी प्रतिस्पर्धा के कारण बनने का समय खोजा जाता है,यह कार्य बुध पर निर्भर करता है,कुंडली में बुध जितना बलवान होगा उसके अन्दर समय और प्रतिस्पर्धा को जोडने घटाने की बुद्धि अच्छी होगी वह अपने समय कारण और स्थान के साथ जलवायु वाले कारणों से पता रखेगा कि उसका शेयर को खरीदने और बेचने का समय कब आयेगा। अक्सर यह कार्य वही लोग कर पाते है जो धनु कन्या और मकर के मंगल से पूर्ति होते है और उनकी कुंडली में बुध स्वतंत्र होता है,यानी सूर्य के साथ होने पर अस्त नही होता,कुंडली में वक्री है तो मार्गी में फ़ायदा देने वाला और मार्गी है तो वक्री होने में फ़ायदा देने वाला होगा है। शनि मेहनत करने का ग्रह है यह दो प्रकार से मेहनत को करवाता है,एक शरीर से मेहनत करवाने वाले को मार्गी शनि के नाम से जाना जाता है और बुद्धि से काम करने वाले को वक्री शनि के रूप मे जाना जाता है। इस शनि के बारे में आप पीछे की पोस्ट को पढ सकते है। ज्योतिष से लाटरी सट्टा और जुआ का भाव पंचम है,इस भाव को बुद्धि का भाव माना जाता है साथ ही इससे नगद में धन देने वाला भाव छठा है और और हमेशा के लिये लाभ देने वाला भाव तीसरा है। अगर इन भावों पर राहु अपना असर दे रहा है,तो लाभ की मात्राअनिश्चित मानी जाती है,लाभ भारी मात्रा में भी हो सकता है,और हानि भी भारी मात्रा में हो सकती है। लेकिन कुंडली में राहु अगर शुक्र या गुरु से अपनी युति जीवन के कारक भावों में बनाकर बैठा है तो लाभ की निश्चितता को माना जा सकता है। इस प्रकार की युति के कारणों मे भी अगर गुरु राहु के साथ मिलकर शुक्र से भी युति बनाकर बैठा है,तो जातक का दिमाग चमक दमक में अधिक चला जाता है और जो भी वह कमाता है उसे छिपाने के लिये उन रास्तों को अपना लेता है जहां पर सरकारी या नीच हरकत रखने वाले लोग उसके धन को किसी न किसी कारण हडप कर लेते है। केतु का प्रभाव भी लाटरी सट्टा और जुआ पर अधिक देखा जाता है,केतु अगर कमन्यूकेशन के कारक भावों में है या किसी प्रकार से तीसरे सातवें या ग्यारहवें भाव से युति बनाता है तो व्यक्ति किसी व्यक्ति की सहायता से टेलीफ़ोन से इन्टरनेट से या सूचना के माध्यम से यह कार्य कर सकता है,अगर केतु सूर्य के साथ युति लेता है तो सरकारी लाटरी या स्कीमो से धन को कमाने वाला होता है,केतु बुध से युति लेता है तो व्यक्ति का रुझान खेल कूद वाले सट्टों से माना जाता है राहु का सम्बन्ध दूसरे और पांचवें स्थान पर होने पर जातक को सट्टा लाटरी और शेयर बाजार से धन कमाने का बहुत शौक होता है,राहु के साथ बुध हो तो वह सट्टा लाटरी कमेटी जुआ शेयर आदि की तरफ़ बहुत ही लगाव रखता है,अधिकतर मामलों में देखा गया है कि इस प्रकार का जातक निफ़्टी और आई.टी. वाले शेयर की तरफ़ अपना झुकाव रखता है। अगर इसी बीच में जातक का गोचर से बुध अस्त हो जाये तो वह उपरोक्त कारणों से लुट कर सडक पर आजाता है,और इसी कारण से जातक को दरिद्रता का जीवन जीना पडता है,उसके जितने भी सम्बन्धी होते है,वे भी उससे परेशान हो जाते है,और वह अगर किसी प्रकार से घर में प्रवेश करने की कोशिश करता है,तो वे आशंकाओं से घिर जाते है।,केतु का असर अगर शुक्र पर होता है तो जातक कानूनी कार्यों से बचकर अनैतिक रूप से चलने वाले जुआ या विदेशी जुआ खानों से धन प्राप्त करने की बात देखी जाती है,लेकिन यह धन अक्सर सरकार या सम्बन्धित लोगों के प्रति अक्समात खर्च होने का कारण भी बनता है। केतु का शुक्र पर असर होने के कारण जातक का दिमाग अगर औरतों के प्रति या सजने संवरने के प्रति चला जाता है अपनी शान शौकत को दिखाने के अहम में चला जाता है अथवा अपने को कबूतरबाजी के कार्यों में ले जाता है तो धन के कारण दूर चले जाते है। जिसकी लगन में गुरु राहु नवे भाव में शुक्र होता है उनके लिये लक्ष्मी अपना स्थान केवल घर की स्त्री की इज्जत करने से और बढ जाती है,अगर जातक किसी प्रकार से विदेशी लोगो और बाहर की स्त्रियों में अपने मन को लगा लेता है तो उसके लिये पहले लक्ष्मी अपना स्थान तो देती है लेकिन अक्समात ही जातक को कंगाल कर जाती है। मंगल का स्थान अगर दसवें भाव में कन्या राशि में हो और शनि का स्थान छठे स्थान में हो और शनि अगर वक्री हो तो जातक अपनी बुद्धि से धन की तकनीक को प्रयोग करने के बाद अथाह धन को प्राप्त करने वाला होता है लेकिन इस ग्रह युति के जातक को वक्री शनि के समय तथा बुध के अस्त होने और वक्री होने के समय अपने धन को इन कारणों में प्रयोग नही करना चाहिये।

बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

Conjunction of mars and Saturn - मंगल शनि युति

https://youtu.be/UhhGa4T6iLsमित्रों आज बात करते है शनि और मगंल जब हो कुंडली मे इकठ्ठे हो कुंडली में इन दोनों ग्रहों के भाव, स्थान व उनके संबन्धित कारकों को भी देखा जाना चाहिए। 

 ज्योतिष का हर जानकार शनि ग्रह को धरती पर होने वाली सभी बुरी घटनाओं का प्रतीक व कारक मानता है। संसार में होने वाले कष्ट, दुःख, संताप, मृत्यु, अपंगता, विकलता, दुष्टता, पतन, युद्ध, क्रूरता भरे कार्य, अव्यवस्था, विद्रोह इत्यादि का कारक ग्रह शनि ही माना जाता है। किसी की भी कुंडली में इसकी स्थिति बहुत महत्व रखती है मंगल  हमारे शरीर में शक्ति के कारक माने जाते है | हमारे में जो फुर्ती होती है जोश और हिम्मत होती है किसी भी कार्य को तत्काल करने की क्षमता मंगल पर निर्भर करती है जबकि दूसरी तरफ शनि  आलस्य के कारक माने जाते है| हम किसी कार्य को कितना टालते है हमारे शरीर में उर्जा की कमी होना या किसी भी कार्य को करने में देरी करना शनि के प्रभाव के फलस्वरूप हमारे शरीर में होती है| शनि  सांप  तो  मंगल  शेर  यानी  की  ऐसे  जातक में इन  दोनों  की  मिलावट  मिली  हुई   होगी  तो ऐसा जातक  विनम्र  इंसान  को माफ़  करने  वाला  लेकिन  क्रूर  इंसान को  तबाह  करने  वाला  होता है  दुसरे  शब्दों में  ऐसा  जातक  बुरे  इंसानों  को  कभी माफ़  नही  करता  और  उनका  नुक्सान करता है  

अब एक तो फुर्ती तेज़ी का प्रतीक जोश का प्रतीक मंगल  तो दूसरी तरफ आलस्य के मारे शनि  दोनों एक साथ हो गये है|} अत: स्पस्ट है की इन दोनों के अपने अपने प्रभाव में कुछ बदलाव तो जरुर आएगा| शनि जो हर कार्य को काफी सोच समझ कर करने के कारक माने जाते है ऐसे में मंगल की अथाह शक्ति को शनि की समझ का सहारा मिल जाता है और इंसान में बहादुरी के साथ अच्छी समझ का भी समावेश हो जाता है| 

लाल किताब के मुताबिक की जब मंगल के साथ शनि हो तो मंगल अपनी सारी शक्ति शनी देव को दे देते है और खुद बुद्ध की तरह खाली हो जाते है और शनिचर ज्यादा बलि हो जाते है| इसका उदाहरण देकर समझाया गया है की ऐसे इन्सान के भाई की हालत जातक से जातक से अच्छी नही होती यानी वो किसी न किसी चीज में जातक से कम होता है जैसे धन दौलत | ऐसे इन्सान के घर चोरी होने का भय भी बना रहता है|शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है। मित्रों शनि को कार्य के लिये और मंगल को तकनीक के लिये माना जाता है। शनि का रंग काला है तो मंगल का रंग लाल है,दोनो को मिलाने पर कत्थई रंग का निर्माण होजाता है। कत्थई रंग से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुयें व्यक्ति स्थान पदार्थ सभी शनि मंगल की युति में जोडे जाते है। शनि जमा हुआ ठंडा पदार्थ है तो मंगल गर्म तीखा पदार्थ है,दोनो को मिलाने पर शनि अपने रूप में नही रह पाता है जितना तेज मंगल के अन्दर होता है उतना ही शनि ढीला हो जाता है। इस बात को रोजाना की जिन्दगी में समझने के लिये घर मे बनने वाली आलू की सब्जी के लिये सोचिये,आलू की सिफ़्त शनि में जोडी जाती है कारण जमीन के अन्दर से यह सब्जी उगती है जड के रूप में इसका आस्तित्व है,जब निकाला जाता है तो जमा हुआ पानी और अन्य पदार्थों का मिश्रण होता है। यह सूर्य की गर्मी से सड जाता है इसके लिये इसे कोड स्टोरेज में रखा जाता है और समय पर निकाल कर इसे प्रयोग में लाया जाता है,सब्जी बनाते वक्त इसे छिलके को निकाल कर मिर्च मशाले आदि के साथ सब्जी के रूप में पकाया जाता है जितनी गर्मी इसे दी जायेगी उतना ही पतला यह पक जायेगा,लेकिन अपने अन्दर के पानी के अनुसार ही यह ढीला या कडक बनेगा,भोजन के समय इसे प्रयोग करने पर अपने रूप परिवर्तन से आराम से खाया जा सकता है। अगर इसे गर्म नही किया जाये तो यह पकेगा नही और कसैला स्वाद देगा और खाया भी नही जायेगा। सीधे आग में डालने पर यह जल जायेगा,फ़्लेम वाली आग में यह पकेगा नही,जितनी मन्दी आग से इसे पकाया जायेगा उतना ही स्वादिष्ट बनेगा। दूसरा उदाहरण मंगल की भोजन में प्रयोग की जाने वाली मिर्च से भी लिया जाता है,जब मिर्च अधिक हो जाती है तो शरीर के अन्दर जमा हुआ कफ़ जो शनि के द्वारा पैदा किया जाता है पिघलना शुरु हो जाता है,जितनी अधिक मिर्च खायी जाती है उतना अधिक कफ़ शरीर से पिघलना शुरु हो जाता है,यहां तक कि अगर अधिक मिर्ची खायी जाये तो शरीर में जलन पैदा हो जाती है,शरीर में वसा के रूप में जमा शनि का पदार्थ पिघल कर आन्सू की रूप में कफ़ के रूप में नाक के रूप में पेशाब के समय चर्बी के रूप में मल को पतला करने के बाद दस्त के रूप में निकल जायेगा,अधिक मिर्च के प्रयोग करने पर यह शरीर की रक्षा के रूप में उपस्थित और सर्दी गर्मी से शरीर को बचाने वाले पदार्थ को शरीर से निकाल कर बाहर कर देगी। उसी प्रकार से धीमी आंच पर रखा हुआ पानी भी भाप की शक्ल में बर्तन से विलीन हो जायेगा। यह मंगल की सिफ़्त है। एक बात और भी मानी जाती है कि शनि का स्थान गन्दी जगह पर होता है और मंगल का स्थान गर्म जगह पर होता है,जिन जातकों की कुंडली में शनि मंगल की युति होती है उनका खून किसी न किसी प्रकार के इन्फ़ेक्सन से युक्त होता है। शनि के अन्दर एक बात और देखी जाती है कि वह जड है उसे कोई भान नही है,जैसे सूर्य देखने की क्षमता रखता है चन्द्र सोचने की क्षमता को रखता है मंगल हिम्मत को दिखाने की क्षमता को रखता है बुध गन्द को सूंघने की क्षमता को रखता है,गुरु सुनने और काम शक्ति के विकास की क्षमता को रखता है शुक्र स्पर्श से समझने की क्षमता का रूप होता है,राहु आकस्मिक घटना को देने की ताकत को रखता है तो केतु स्वभाव से ही सहायता के लिये सामने होता है,लेकिन शनि जड है उसे जैसा साधनों से बनाया जाता है वैसा ही वह बन जाता है। मंगल के साथ तकनीकी कारण से शनि जमे हुये कार्य को पिघलाने का काम करता है। शनि पत्थर है और उसे लाल रंग से रंग दिया जाये तो वह धर्म के रूप में बन जायेगा,शनि चोर है तो मंगल सिपाही है। शनि पत्थर है तो मंगल लोहा है,इसलिये ही शनि के लिये लोहे का छल्ला पहिना जाता है। रिस्तो मे देखा जाये तो शनि कर्म है मंगल भाई है,शनि दुख है तो मंगल भाई का दुख है,शनि खेती का काम है तो मंगल मशीनरी है,शनि जेल है तो मंगल उसका प्रहरी है,शनि विदेशी है तो मंगल उसे कन्ट्रोल करने वाला है,शनि कोयला है तो मंगल तपती हुई आग है,शनि कमजोर है तो मंगल उसके अन्दर शक्ति को देने वाला है,शनि डाकू है तो मंगल उसकी उसकी साहस की सीमा है,शनि बुजुर्ग दार्शनिक है तो मंगल उसके तामसिक विचार है,शनि कब्रिस्तान है तो मंगल जलती हुई आग है,शनि खंडहर है तो मंगल उसके अन्दर तपती हुयी रेत है,शनि बाल है तो मंगल उसे काटने वाला नाई है,शनि लकवा है तो मंगल गर्म सेंक है,शनि फ़ोडा है तो मंगल आपरेशन है,शनि कर्म है तो मंगल रसोई है,शनि मधुमक्खी है तो मंगल उसके अन्दर का जहर है,शनि आलू का पकौडा है तो मंगल उसके अन्दर मीठी चटनी है। शनि काम करने वाले कर्मचारी है तो मंगल कार्य स्थल की रखवाली करने वाला गार्ड है। शनि घर है तो मंगल उसका दरवाजा है। मंगल खून चोट चेचक अपेन्डिक्स हार्निया देता है तो शनि वात लकवा ह्रदय की बीमारी ट्यूमर ब्रांकाइटिस की बीमारी देता है। मंगल शनि की युति में कार्य तकनीकी होते है मशीन के कार्य भी होते है,व्यापारिक राशि तुला में अगर युति है तो मारकेटिंग की क्षमता भी होती है,एम बी ए आदि करने के बाद बाजार का तकनीकी ज्ञान भी होता है। शनि कार्य होता है तो मंगल कार्य में संघर्ष भी देता है,एक भाई को कष्ट जरूर होता है,मंगल युवा होता है और शनि उसे बुजुर्ग जैसे कष्ट भी देता है,शनि कार्य है तो मंगल उत्तेजना में उसे बदलने का रूप भी बन जाता है। शत्रु अधिक होते है और किसी प्रकार से चन्द्रमा सामने हो तो नाक पर गुस्सा करने वाला व्यक्ति भी होता है। मंगल शनि के साथ वक्री हो तो उत्साह में कमी होती है,काम शक्ति निर्बल होती है,शनि मंगल के साथ वक्री हो तो अधिकार को प्राप्त करने की जल्दबाजी होती है और वह अधिकार भले ही खास आदमी की मौत करनी पडे लेकिन अधिकार जल्दी से लेने में दिक्कत नही होती है। मंगल शनि की दशा में तीन महिना पहले से और तीन महिना बाद तक तथा बीच के एक महिना में घोर कष्ट भुगतने पडते है। शनि में मंगल की दशा में उन्नीस महिने का घोर कष्ट होता है। शनि मंगल के साथ होने पर जातक को बहुत मेहनत के बाद ही सफ़लता मिलती है,हर काम में असन्तोष होता है,वह अपने तकनीकी कारणॊ से ऊंची पदवी वाले लोगो से अनबन ही रखता है,साथ ही गलतफ़हमी का शिकार भी होता रहता है,कार्य भी अक्सर चलते हुये अपने आप बन्द हो जाते है अगर जातक नौकरी करता है तो इन्ही कारणो से उसे बार बार कार्य बदलने पडते है,किसी के कार्य से उसे सन्तोष होता ही नही है। यह युति अगर तीन सात या ग्यारह में चन्द्रमा के साथ होती है तो जातक को नौकरी में परेशानी होती है जीवन साथी की नाक पर गुस्सा होता है और इसी कारण से वैवाहिक जीवन और नौकरी दोनो ही परेशानी में होती है,जीवन साथी को बीमारियों की बजह से और नौकरी को तकनीकी कमियों से परेशान होने के लिये भी जाना जाता है। धन हानि भी होती है,नौकरी करने में परेशानी भी होती है,व्यापार आदि में कठिनायी भी होती है। अगर यह युति ग्यारहवे भाव में है और राहु छठे भाव में है तो जातक को कार्य के अन्दर बहाने बनाने की आदत होती है साथ ही वह आंख बचाकर काम करने वाला होता है,छठे से छठा कर घर कार्य में चोरी की आदत भी देता है और जातक को किसी न किसी बात पर अचानक धन का मुआवजा देने या पुलिस आदि में रिपोर्ट होने तथा परेशान होने की बात भी मिलती है। एक भाई को सजा वाली बातें भी मिलती है।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

बुध +शनि एक साथ (बुध शनि की युति)Conjunction of Mercury and Saturn - budh शनि युति

https://youtu.be/hb9Ouf_rST4मित्रों आज बात करेंगे बुध और शनि की युति जब एक ही भाव में एक साथ हो या किसी भी तरह की युति बन रही है, तो कल क्या होगा दो ग्रहों के मेल से एक नए ग्रह का प्रभाव जागृत होता है l बुध बुद्धि और शनि परख है l बुद्धि और परख का तालमेल अगर खराब हो जाए तो नुकसान झेलना पड़ता है l

बुध को खराब करने पर शनि भी negative फल देना शुरू कर देता है l शनि बुध के अधीन है lकुंडली में तो उसका क्या फल होता है, बुध व्यापार प्रधान ग्रह है,सूर्य का साथी है,जाति से बनिया है,स्वभाव से राजकुमार है,कार्य से बातूनी है,अधिक मजाक करना इसकी सिफ़्त है,ह्रदय से जिसके साथ चलदे उसी की गाने लगता है,घर में घरानी और बाहर राजरानी वाला भी स्वभाव अपनाता है। बातूनी होना और अपनी बात को सामने रखकर अपनी ही कहते रहना इसका प्राकृतिक स्वभाव है। शनि कर्म का दाता है,प्रकृति से ठंडा और मन से चालाक है,रात का कारक,अन्धेरे का राजा है,नीची बस्तियों मे रहने वाला,नीच की संगति करने वाला,माना जाता है

,बुध और शनि के मिल जाने से कार्य के लिये कहा जा सकता है कि वह बातों की खेती करने वाला,बातों की खेती बडे आराम से नहीं की जा सकती है,उसके लिये बुद्धि की जरूरत पडती है,और बुद्धि को देने वाला बुध नहीं होता है,बुद्धि को देने वाला गुरु होता है,अगर किसी प्रकार से गुरु बुध शनि से पीछे बैठा है,तो वह अपने द्वारा बुध शनि को बातों की खेती करने के लिये ज्ञान देने लग जाता है। वह किस प्रकार की बातों की खेती करता है इसका प्रभाव गुरु के बैठने वाले स्थान से जाना जा सकता है,जैसे कर्क का गुरु ऊंची बातों की खेती करेगा,और मकर का गुरु नीची बातें करेगा। इसके साथ ही जो टोपिक बातों के होंगे वे बुध शनि के आगे के भावों के द्वारा देखने को मिलते है,जैसे बुध शनि के आगे अगर सूर्य बैठा है तो बातों की खेती में पिता या पुत्र के प्रति बातें की जायेंगी,लेकिन पिता के प्रति बातें करने के लिये भी सूर्य को देखना पडेगा कि वह किस भाव में है,अक्सर सूर्य बुध के आसपास ही होता है,या तो साथ चलता है अथवा आगे पीछे चलता है,अगर अधिक पास है तो बातों के अन्दर घमंड होता है,और अगर आसपास के भाव में अलग बैठा है तो अहम की मात्रा में उतनी ही कमी होती जाती है। सूर्य से पीछे बैठा है तो बातों में अहम होता है,और सूर्य से आगे बैठा है तो बातों के अन्दर दब्बूपन है। शनि और बुध दोनों ही दोस्त है,कारण बुध का स्वभाव लालकिताब के अनुसार हिजडे के जैसा बताया गया है,हिजडे का अर्थ नपुंसक होने से ही नहीं,मनसा वाचा कर्मणा सभी तरह से व्यक्ति के अन्दर हिजडापन दिखाई देने लगता है,जुबान के अन्दर भी चालाकी।कुंडली मे बुध शनि की युति अगर शिक्षा के क्षेत्र मे होती है तो जातक पढाई लिखाई के प्रति आलसी होता है वह व्यापारिक कला मे प्रवीण होता है। शिक्षा मे देर होने का कारण करके सीखने वाली बुद्धि से भी माना जाता है,बुध को बुद्धि से देखा जाता है और शनि को कार्य से देखा जाता है। जातक करके सीखने वाले कामो मे सफ़ल हो जाता है। शनि को मिट्टी और बुध को आकार बनाने के लिये भी माना जाये तो जातक का कार्य मिट्टी से बने बर्तन आदि बनाने के लिये और उनकी कलाकारी के लिये भी माना जाता है  शनि से लकडी और बुध से खिलौने बनाने का रूप भी देखा जाये तो जातक इसी प्रकार के कार्य करने मे सफ़ल हो सकता है। बुध भाषा से और शनि लिखने के लिये माना जाये तो जातक उन्ही बातो को लिखता है जो इतिहास की द्रिष्टि से मजबूत और हमेशा के लिये याद रखने के लिये मानी जा सकती है। जातक की कुंडली मे बुध शनि जिस भाव मे होते है उसी भाव मे कोई न कोई दोष का होना भी माना जाता है। अगर ग्यारहवे भाव मे यह युति होती है तो जातक की पीठ मे कोई कूबड नुमा उठान होता है। जातक के चौथे भाव मे होने पर पुरुष है तो स्त्री जैसे स्तन बन जाते है और अगर यह स्त्री की कुंडली मे होता है तो वक्ष स्थल के मजबूत होने की बात देखी जाती है लेकिन संतान के मामले मे यह युति स्त्री जातको को दिक्कत देने के लिये भी मानी जाती है। दसवे भाव मे यह युति होने से अक्सर जातक का का काम भूमि सम्बन्धी कामो से होता है जमीनी नाप जोख तथा जमीनी लेखा बन्धी के लिये भी माना जा सकता है।

यह युति जमीनी व्यापार करने के लिये भी उत्तम मानी जाती है जैसे यह युति अगर अष्टम मे होती है तो जातक जमीनी व्यापार करने के लिये अपनी बुद्धि का अच्छा प्रयोग करता है लेकिन शर्त यह है कि जातक के लिये केतु भी अपना बल दे रहा हो। जातक व्यापार कार्य के लिये अपनी बुद्धि को अच्छी तरह से प्रयोग कर सकता है तथा खरीद बेच मे अपने को माहिर बना सकता है। जो भी जमीनी कार्य होते है उनके अन्दर जातक सफ़लता प्राप्त करता जाता है। अक्सर यह भी देखा जाता है कि इस युति मे जो भी भाई बहिन होते है उनके अन्दर एक भाई किसी प्रकार से आगे नही बढ पाता है और उसके लिये जीवन मे किये जाने वाले कार्य साधारण ही होते है वह कितनी ही मेहनत करे लेकिन वह सफ़ल नही हो पाता है,अगर बडा भाई या बहिन होती है,तो वह भी व्यापारिक कला मे जाना अच्छा समझता है। कुंडली मे शनि को पहले जन्मा हुआ माना जाता है इसलिये शनि को बडे भाई बहिन की उपाधि दी जाती है। अगर यह युति पंचम नवम और लगन मे होती है तो जातक का विवाह भी इसी काम से जुडे लोगो के साथ होता है। प्लास्टिक से जुडे काम प्लास्टिक को री साइकिल करने वाले काम टायर ट्यूब के काम गाडियों की सजावट के काम भी फ़ायदा देने वाले होते है। इस युति की किसी भी खराबी के लिये जातक को बच्चो को खिलौने दान मे देना चाहिये,अथवा जब भी कोई घर मे शनि वाला काम करे तो या कोई शनि से सम्बन्धित वस्तु घर मे लाये तो खिलौना आदि भी साथ मे लाने से वह वस्तु नुकसान नही देती है। मित्रों बुध शनि की युति जातक की कुंडली में हर भाव में अपना  अलग प्रभाव देगी और उस पर कितना शुभ प्रभाव है और कितना पाप प्रभाव है इस पर भी युति का फल निर्भर होगा  अगर आपकी कुंडली में बुध शनि एक साथ किसी भाव में बैठे हैं तो आप भी इसका फल जानने के लिए अपनी कुंडली दिखा कर हम से फलादेश प्राप्त कर सकते हैं

शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

देशकाल परिस्थिति और ज्योतिष देश काल परिस्थिति और ज्योतिष देश काल परिस्थिति और ज्योतिष देश काल उपस्थिति और ज्योतिष

मित्रो फल कथन करते समय देश काल परिस्थतीक का भी महत्व एक लग्न और एक लग्न की डिग्री में महत्वपूर्ण व्यक्ति का जन्म एक स्थान में कभी नहीं होता। यदि किसी दूरस्थ देश में किसी दूसरे व्यक्ति का जन्म इस समय हो भी , तो आक्षांस और देशांतर में परिवर्तन होने से उसके लग्न और लग्न की डिग्री में परिवर्तन आ जाएगा। फिर भी जब जन्म दर बहुत अधिक हो , तो या बहुत सारे बच्चे भिन्न-भिन्न जगहों पर एक ही दिन एक ही लग्न में या एक ही लग्न डिग्री में जन्म लें , तो क्या सभी के कार्यकलाप , चारित्रिक विशेशताएं , व्यवसाय , शिक्षा-दीक्षा , सुख-दुख एक जैसे ही होंगे ?

मेरी समझ से उनके कार्यकलाप , उनकी बौद्धिक तीक्ष्णता , सुख-दुख की अनुभूति , लगभग एक जैसी ही होगी। किन्तु इन जातकों की शिक्षा-दीक्षा , व्यवसाय आदि संदर्भ भौगोलिक और सामाजिक परिवेश के अनुसार भिन्न भी हो सकते हैं। यहॉ लोगों को इस बात का संशय हो सकता है कि ग्रहों की चर्चा के साथ अकस्मात् भौगोलिक सामाजिक परिवेश की चर्चा क्यो की जा रही है ? स्मरण रहे , पृथ्वी भी एक ग्रह है और इसके प्रभाव को भी इंकार नहीं किया जा सकता। आकाश के सभी ग्रहों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है , परंतु भिन्न-भिन्न युगों सत्युग , त्रेतायुग , द्वापर और कलियुग में मनुष्‍यों के भिनन-भिन्न स्वभाव की चर्चा है। मनुष्‍य ग्रह से संचालित है , तो मनुष्‍य के सामूहिक स्वभाव परिवर्तन को भी ग्रहों से ही संचालित समझा जा सकता है , जो किसी युग विशेष को ही जन्म देता है।

लेकिन सोंचने वाली बात तो यह है कि जब ग्रहों की गति , स्थिति , परिभ्रमण पथ , स्वरुप और स्वभाव आकाश में ज्यो का त्यो बना हुआ है , फिर इन युगों की विशेषताओं को किन ग्रहों से जोड़ा जाए । युग-परिवर्तन निश्चित तौर पर पृथ्वी के परिवेश के परिवर्तन का परिणाम है। पृथ्वी पर जनसंख्या का बोझ बढ़ता जाना , मनुष्‍य की सुख-सुविधाओं के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों का तॉता लगना , मनुष्‍य का सुविधावादी और आलसी होते चले जाना , भोगवादी संस्कृति का विकास होना , जंगल-झाड़ का साफ होते जाना , उद्योगों और मशीनों का विकास होते जाना , पर्यावरण का संकट उपस्थित होना , ये सब अन्य ग्रहों की देन नहीं। यह पृथ्वी के तल पर ही घट रही घटनाएं हैं। पृथ्वी का वायुमंडल प्रतिदिन गर्म होता जा रहा है। आकाश में ओजोन की परत कमजोर पड़ रही है , दोनो ध्रुवों के बर्फ अधिक से अधिक पिघलते जा रहे हैं , हो सकता है , पृथ्वी में किसी दिन प्रलय भी आ जाए ,इन सबमें अन्य ग्रहों का कोई प्रभाव नहीं है।

ग्रहों के प्रभाव से मनुष्‍य की चिंतनधाराएं बदलती रहती हैं , किन्तु पृथ्वी के विभिन्न भागों में रहनेवाले एक ही दिन एक ही लग्न में पैदा होनेवाले दो व्यक्तियों के बीच काफी समानता के बावजूद अपने-अपने देश की सभ्यता , संस्कृति , सामाजिक , राजनीतिक और भौगोलिक परिवेश से प्रभावित होने की भिन्नता भी रहती है। संसाधनों की भिन्नता व्यवसाय की भिन्नता का कारण बनेगी  समुद्र के किनारे रहनेवाले लोग , बड़े शहरों में रहनेवाले लोग , गॉवो में रहनेवाले संपन्न लोग और गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले लोग अपने देशकाल के अनुसार ही व्यवसाय का चुनाव अलग-अलग ढंग से करेंगे। एक ही प्रकार के आई क्यू रखनेवाले दो व्यक्तियों की शिक्षा-दीक्षा भिन्न-भिन्न हो सकती है , किन्तु उनकी चिंतन-शैली एक जैसी ही हो  इस तरह पृथ्वी के प्रभाव के अंतर्गत आनेवाले भौगोलिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस कारण एक ही लग्न में एक ही डिग्री में भी जन्म लेनेवाले व्यक्ति का शरीर भौगोलिक परिवेश के अनुसार गोरा या काला हो सकता है। लम्बाई में कमी-अधिकता कुछ भी हो सकती है , किन्तु स्वास्थ्य , शरीर को कमजोर या मजबूत बनानेवाली ग्रंथियॉ , शारीरिक आवश्यकताएं और शरीर से संबंधित मामलों का आत्मविश्वास एक जैसा हो सकता है। सभी के धन और परिवार विशयक चिंतन एक जैसे माने जा सकते है सभी में पुरुषार्थ-क्षमता या शक्ति को संगठित करने की क्षमता एक जैसी होगी सभी के लिए संपत्ति , स्थायित्व और संस्था से संबंधित एक ही प्रकार के दृष्टिकोण होंगे। सभी अपने बाल-बच्चों से एक जैसी लगाव और सुख प्राप्त कर सकेंगे। सभी की सूझ-बूझ एक जैसी होगी। सभी अपनी समस्याओं को हल करने में समान धैर्य और संघर्ष क्षमता का परिचय देंगे। सभी अपनी जीवनसाथी से एक जैसा ही सुख प्राप्त करेंगे। अपनी-अपनी गृहस्थी के प्रति उनका दृष्टिकोण एक जैसा ही होगा। सभी का जीवन दर्शन एक जैसा ही होगा , जीवन-शैली एक जैसी ही होगी। भाग्य , धर्म , मानवीय पक्ष के मामलों में उदारवादिता या कट्टरवादिता का एक जैसा रुख होगा। सभी के सामाजिक राजनीतिक मामलों की सफलता एक जैसी होगी। सभी का अभीष्‍ट लाभ एक जैसा होगा। सभी में खर्च करने की प्रवृत्ति एक जैसी ही होगी।

किन्तु शरीर का वजन , रंग या रुप एक जैसा नहीं होगा। संयुक्त परिवार की लंबाई , चौड़ाई एक जैसी न  वास्तव में कुंडली में बनते योग को बांच कर उसे ही 100% मानने की भूल ही इस विवाद का कारण बनती है.जातक के जीवन में इस योग को 20% उसके सामाजिक व् पारिवारिक दशा पर निर्भर होना पड़ता है.20% जातक से जुड़े रक्त सम्बन्धियों का रोल इस योग में होता है ,20% उसका स्वयं का प्रयास अर्थात कर्म यहाँ प्रभावित करने वाला कारक बनता है,बाकि का 20% हम हासिल शाश्त्रों के सुझाये उपायों(जिनमे ज्योतिष आदि सामिल हैं) द्वारा इसे प्रभावित करते हैं.तब जाकर योग का वास्तविक प्रतिशत प्राप्त होने की गणना करना बेहतर निर्णय देने में सहायक बनता है. सामान योग में जन्मा जातक अफ्रीका के जंगलों में आदिवासी कबीले का मुखिया बनता है.यही योग अमेरिका में उसे बराक ओबामा भी बना सकता है.सरकारी विभाग से धन प्राप्ति का योग एक चपरासी की कुंडली में भी विराजमान होता है व् अधिकारी की भी.अत यह सव वाते फलकथन करते समय जरुर maakaali jyotish hanumangarh अर्चाय राजेश 07597718725

09414481324

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

शिव ओर शिवलिग.

  1. शिव ओर शिवलिग.  शिव ओर शिवलिग.           ,                      ,                मिञो् शिवलिंग, का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरुप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। 

स्कन्द पुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है | वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्ष/धुरी ही लिंग है

पुराणो में शिवलिंग को कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंगशिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है | हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते है जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा, गणितीय सूत्र, कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि | अर्थ :- सम्पति, मतलब  उसी प्रकार यहाँ लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी या प्रतीक है, लिङ्ग का यही अर्थ वैशेषिक शास्त्र में कणाद मुनि ने भी प्रयोग किया। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और पदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है | अब जरा आईंसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी 

इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है अर्थात दो नही एक ही है पर वो दो हो कर स्रष्टि का निर्माण करता है। हमारे ऋषियो ने ये रहस्य हजारो साल पहले ही ख़ोज लिया था | हम अपने देनिक जीवन में भी देख सकते है कि जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोदिशाओं की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री)+ऊपर व निचे) होता है, फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा का प्रतिरूप, शांत जल में कंकर फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) का प्रतिरूप आदि।

स्रष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट  के पश्चात् उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्त  जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता  भगवान शिव की जगह-जगह पूजा हो रही है, लेकिन पूजा की वात नहीं है। शिवत्व उपलब्धि की बात है। वह जो शिवलिंग हमने देखा है बाहर मंदिरों में, वृक्षों के नीचे, हमने कभी ख्याल नहीं किया, उसका आकार ज्योति का आकार है। जैसे दीये की ज्योति का आकार होता है। शिवलिंग अंतर्ज्योति का प्रतीक है। जव हम्हारे भीतर का दीया जलेगा तो ऐसी ही ज्योति प्रगट होती है, ऐसी ही शुभ्र! यही रूप होता है उसका। और ज्योति बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है। और धीरे  धीरे ज्योतिर्मय व्यक्ति के चारों तरफ एक आभामंडल होता है; उस आभामंडल की आकृति भी अंडाकार होती है।

स.तो इस सत्य को सदियों पहले जान लिया था। लेकिन इसके लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं थे। लेकिन  रूस में एक बड़ा वैज्ञानिक प्रयाग ची नहा है-किरलियान फोटोग्राफी। मनुष्य के आसपास जो ऊर्जा का मंडल होता है, अब उसके चित्र लिये जा सकते हैं। इतनी सूक्ष्म फिल्में बनाई जा चुकी हैं, जिनसे न केवल तुम्हारी देह का चित्र बन जाता है, बल्कि देह के आसपास जो विद्युत प्रगट होती है, उसका भी चित्र बन जाता है। और किरलियान चकित हुआ है, क्योंकि जैसे -जैसे व्यक्ति शांत होकर बैठता है, वैसे – वैसे उसके आसपास का जो विद्युत मंडल है, उसकी आकृति अंडाकार हो जाती है। उसको तो शिवलिंग का कोई पता नहीं है, लेकिन उसकी आकृति अंडाकार हो जाती है। शांत व्यक्ति जब बैठता है ध्यान तो उसके आसपास की ऊर्जा अंडाकार हो जाता है। अशांत व्यक्ति के आसपास की ऊर्जा अंडाकार नहीं होती, खंडित होती है, टुकड़े -टुकड़े होती है। उसमें कोई संतुलन नहीं होता। एक हिस्सा छोटा- कुरूप होती है।में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल तथा की देवता आदि मिल कर भी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शास्वत अंत न पा सके हमारे शरीर मे भी सात चक्रो की    Akriti आकृति muladhar chakkar से यात्रा शुरू होती है  शिवलिंग के अकार की तरह है बात करते हैं शिवलिंग पर जल सहित, भांग, धतूरा, बेलपत्र आदि चढ़ाने की। आपको जानकर हैरानी होगी कि शिवलिंग खुद में न्यूक्लियर रिएक्टर का सबसे बड़ा सिम्बल है। इसकी पौराणिक कथा तो ब्रह्मा और विष्णु के बीच एक शर्त से जुड़ी है। शिवलिंग ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधि है। जितने भी ज्योतिर्लिंग हैं, उनके आसपास सर्वाधिक न्यूक्लियर सक्रियता पाई जाती हैयही कारण है कि शिवलिंग की तप्तता को शांत रखने के लिए उन पर जल सहित बेलपत्र, धतूरा जैसे रेडियो धर्मिता को अवशोषित करने वाले पदार्थों को चढ़ाया जाता है।

आप देखेंगे कि कई ऐसी मान्यताएं केवल परंपरा व धर्म के नाम पर निभाई जाती हैं किंतु यदि उनकी गहराई से छानबीन की जाए  Rajesh Kumar 07597718725 09414481324

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

राहु शनि या शनि+राहु (प्रेत श्राप योग)

मित्रों आज एक जॉब की बात करते हैं जिसको बहुत ही बुरा दोष माना जाता है शनि और राहु का कुंडली में किसी भी तरह मेल जिसे प्रेत श्राप – भी कहा जाता है जन्म-पत्रिका के किसी भी भाव में शनि-राहू या शनि-केतू की युति हो तो प्रेत श्राप का निर्माण करती है | शनि-राहू या शनि-केतू की युति भाव के फल को पूरी तरह बिगाड़ देती है तथा लाख यत्न करने पर भी उस भाव का उत्तम फल प्राप्त नहीं होता है

सबसे पहले शनि के रूप को समझना जरूरी है,शनि एक ठंडा अन्धेरा और ग्रह है,सिफ़्त कडक है,रूखा है,उसके अन्दर भावनाओं की कोई कद्र नही है,जिस भाव में होता है उस भाव के कामो कारकों और जीवों को जडता में रखता है,इसके अलावा शनि की सप्तम द्रिष्टि भी खतरनाक होती है,जहां जहां इसकी छाया अपना रूप देती है वहां वहां यह अपनी जडता को प्रस्तुत करता है। शनि की जडता की पहिचान वह अपने कामो से करवाता है और अपने पहिनावे और रहन सहन से भी करवाता है,इस पहिचान के लिये शनि की द्रिष्टि को तीसरे भाव से भी देखा जाता है। शनि का अपना परिवार भी होता है उस परिवार को यह अपनी पहिचान के अन्दर ही शामिल रखता है और उस परिवार में अधिकतर लोग कार्य वाली शिक्षाओं को करने वाले और लोहा मशीनरी आदि को काटने जोडने और कई तरह के रूप परिवर्तन वाले कामों को करने वाले होते है। शनि की नजर सप्तम में होने के कारण पत्नी या पति का स्वभाव तेज बोलने का होता है,वह कोई भी बात जोर से चिल्लाकर केवल इसलिये करता है या करती है कि शनि की सिफ़्त वाला व्यक्ति बहुत कम ही किसी की सुनता है और जो सुनता है उसे करने के अन्दर काफ़ी समय लगता है,कम सोचने की आदत होने से और कम बोलने की आदत होने से या गम्भीर बात करने के कारण या फ़ुसफ़ुसाकर बात करने की आदत के कारण चिल्लाकर बात सुनने के लिये जोर दिया जाता है। शनि की जो पैत्रिक पहिचान होती है वह कार्य करने के रूप में कार्य के करने वाले स्थान के रूप में उस स्थान पर जहां पानी की सुलभता कम होती है वहां रहने से भी मानी जाती है,अधिकतर जब पानी की सुलभता कम होती है तो रहने और जीविकोपार्जन के साधन भी कम होते है,इसलिये शनि की सिफ़्त वाले व्यक्ति के पूर्वजों को या पिता को बाहर जाकर कमाने की जरूरत पडती है,शनि की सिफ़्त के अनुसार ही जातक कार्य करता है और जो भी कार्य करता है वह मेहनत वाले काम होते है।

राहु की आदत को समझने के लिये केवल छाया को समझना काफ़ी है। राहु अन्दरूनी शक्ति का कारक है,राहु सीमेन्ट के रूप में कठोर बनाने की शक्ति रखता है,राहु शिक्षा का बल देकर ज्ञान को बढाने और दिमागी शक्ति को प्रदान करने की शक्ति देता है,राहु बिजली के रूप में तार के अन्दर अद्रश्य रूप से चलकर भारी से भारी मशीनो को चलाने की हिम्मत रखता है,राहु आसमान में बादलों के घर्षण से उत्पन्न अद्रश्य शक्ति को चकाचौन्ध के रूप में प्रस्तुत करने का कारक होता है,राहु जड या चेतन जो भी संसार में उपस्थित है और जिसकी छाया बनती है उसके अन्दर अपने अपने रूप में अद्रश्य रूप में उपस्थित होता है।

शनि राहु को आपस में मिलाने पर अगर शनि पत्थर है और राहु शक्ति को मिलाकर उसे प्रयोग किया जायेगा तो सीमेन्ट का रूप ले लेता है,शनि में मंगल को मिलाया गया तो वह लिगनाइट नामक का पत्थर बनकर और उसके अन्दर लौह तत्व की अधिकता से जल्दी से जुडने वाला सीमेंट बन जाता है,राहु अगर लोहे के साथ मिल जाता है तो वह स्टील का रूप ले लेता है,लेकिन अलग अलग भावों के अनुसार राहु को समझना पडता है,एक भाव में वह हिम्मती बनाता है और कार्य करने की शक्ति को बढाकर बहुत अधिक बल देता है,लेकिन दूसरे भाव में जाकर वह धन और बल वाली शक्ति को प्रदान करना शुरु देता है,व्यक्ति के पास काम बहुत अधिक होता है लेकिन धन के रूप में वही मिल पाता है जो मुश्किल से पेट को भरा जा सके। शनि को कार्य के लिये माना जाता है और वह जब तीसरे भाव से सम्बन्ध बना लेता है तो फ़ोटोग्राफ़ी वाले कामो की तरफ़ अपना ध्यान देने लगता है,छठे भाव में जाने पर वह दवाइयों से सम्बन्धित काम करने लगता है,सप्तम में जाकर वह खतरनाक लोगों की संगति देने लगता है तथा अष्टम में जाकर शमशान के धुयें की तरफ़ से काम करने लगता है,नवे भाव मे जाकर वह धर्म और ज्योतिष के साथ यात्रा वाले काम और रेगिस्तानी काम करने के लिये भी अपनी शक्ति देता है। दसवे भाव मे दोनो की शक्ति राजकार्य के लिये माने जा सकते है और किसी भी अचानक कार्यों की उथल पुथल के लिये भी माना जा सकता है। ग्यारहवे भाव में शनि राहु अपनी सिफ़्त के अनुसार बडे भाई को या दोस्तों के कामों को करने के लिये भी अपनी रुचि देता है,बारहवें भाव में शनि राहु का रूप तंत्र मंत्र और ज्योतिष आदि में रुचि रखने वाला भी माना जाता है।जीवन के चार आयाम माने जाते है,पहला धर्म का होता है दूसरा अर्थ का माना जाता है,तीसरा काम होता है और चौथा जो मुख्य होता है उसे मोक्ष की संज्ञा दी जाती है। शनि को इन चारों आयामों के अन्दर प्रकट करने के लिये अगर माना जाये तो धर्म में शनि का रूप कई प्रकार से अपनी मान्यता देगा। घर में माता पिता और घर के सदस्यों के प्रति निभाई गयी जिम्मेदारियों के प्रति शनि अपने कर्म को प्रकट करेगा,उनके आश्रय के लिये बनाये गये निवास स्थान और उनकी जीविका को चलाने के लिये दिये गये कार्य या व्यवसाय स्थान माने जा सकते है,परिवार के बाद समाज का रूप सामने आता है उसके अन्दर धर्म से शनि को प्रकट करने के लिये आने जाने के रास्ते बनवाना,अनाश्रित लोगों की सहायता करना,भूखो को भोजन देना और असहायों की दवाइयों आदि से मदद करना माना जायेगा,इसी प्रकार से जब राहु का मिश्रण धर्म के अन्दर मिलेगा,तो परिवार के लोगों के लिये शिक्षा का बन्दोबस्त करना,परिवार के लोगों के लिये कार्य शक्ति का विकास करना,जो भी वे कार्य करते है उन कार्यों के अन्दर अपनी शक्ति का समावेश करना आदि माना जायेगा। शनि राहु को धर्म में ले जाने और पूजा पाठ मे प्रवेश करवाने पर शनि राहु मन्दिर का रूप लेता है,शनि राहु की सिफ़्त को शेषनाग के रूप में भी प्रकट किया जाता है,यह शरीर और इसकी शक्ति को विकास करने में शनि राहु की महती भूमिका मानी जा सकती है,जैसे कि आत्मा को सुरक्षित रखने के लिये इस शरीर का शक्तिवान और कार्यशील होना भी जरूरी है,अगर शरीर असमर्थ होगा उसके अन्दर कार्य करने की शक्ति नही होगी तो जल्दी ही आत्मा शरीर से पलायन कर जायेगी और शरीर शव का रूप धारण कर नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा। समुद्र के अन्दर शेष शय्या पर भगवान विष्णु को दिखाया जाना केवल शरीर के अन्दर आत्मा को सुरक्षित रखने का प्रयास ही माना जा सकता है,इस संसार रूपी समुद्र में शेषनाग रूपी शरीर में विष्णु रूपी आत्मा आराम कर रही है। लालकिताब में शनि के साथ राहु को शेषनाग की युति से विभूषित किया गया है,और बताया भी गया है कि जिस जातक की कुण्डली में यह योग होता है वह शेषनाग के फ़नों के अनुसार एक साथ कई दिशाओं में अपनी द्रिष्टि रखने वाला होता है। मेरे विचार से यह कथन बिलकुल सही है,आज के युग में हो या प्राचीन काल में जिस व्यक्ति की द्रिष्टि चारों तरफ़ गयी वही सभी स्थान से सफ़ल माना जा सकता है,लेकिन जो व्यक्ति एक ही दिशा या एक ही काम के अन्दर अपनी प्रोग्रेस चाहने की कामना में लगा रहा और उस काम या उस वस्तु का युग समाप्त होते ही वह बेकार हो गया और उसके लिये दूसरा रास्ता सामने आने में जितना समय लगा वह वक्त उसके लिये बहुत ही खराब माना जा सकता है। जिस जातक की कुंडली में यह योग होता है वह चारों दिशाओं में अपने दिमाग को ले जाने वाला होता है उसे एक दिशा से कभी संतुष्टि नही होती है। शनि राहु की युति को शेषनाग योग से विभूषित किया गया है। जिस जातक की कुंडली में यह योग बारहवें भाव में होता है उसके लिये रक्षक भी संसार होता है। वह अक्सर इतना बडा तंत्री होता है कि वह अपनी निगाह से जमीन के नीचे से लेकर आसमान की ऊंचाई वाले कामों को भी कर सकता है और परख भी सकता है। शनि का निशाना अपने से तीसरे स्थान पर होता है राहु का निशाना भी अपने से तीसरे स्थान पर होता है,दोनो का निशाना एक ही प्रकार का होने से जो भी असर तीसरे स्थान पर होगा वह मशीनी गति से होगा,अचानक तो बहुत लाभ दिखाई देने लगेगा और अचानक ही हानि दिखाई देने लगेगी। शनि का रूप कार्य से माना जाये और राहु का रूप शक्ति से माना जाये तो कार्य के अन्दर अचानक शक्ति का विकास दिखाई देने लगेगा और कार्य के रूप में दिखाई देने वाला रूप कभी कभी धुयें की तरह उडता दिखाई देगा। बारहवें भाव में शनि और राहु के होने से आसमानी धुयें की तरह माना जासकता है,व्यक्ति के अन्दर अगर निर्माण के कार्य होंगे तो उसका कार्य उस क्षेत्र में होगा जहां पर फ़ैक्टरियों की चिमनियां होंगी,और आसमान में धुंआ दिखाई देगा। अगर यह युति बारहवें भाव में सिंह राशि में होगा तो जहां व्यक्ति का कार्य स्थान होगा वह किसी तरह से सरकार या राजनीतिक कारणों से सम्बन्धित भी होगा। शनि राहु की बारहवें भाव से दूसरे भाव में द्रिष्टि होने से कार्य केवल धन और भौतिक वस्तुओं के निर्माण से सम्बन्धित होगा,उन्ही वस्तुओं का निर्माण किया जायेगा जिनसे धन को बनाया जा सके और व्यापारिक कारणों से माना जा सके,जो भी निर्माण किया जायेगा वह व्यापारिक संस्थानों को दिया जायेगा,खुद ही डायरेक्ट रूप से व्यापार नही किया जा सकेगा। धन के लिये व्यापारिक संस्थान ही अपना योगदान देंगे,बारहवें भाव मे स्थापित शनि और राहु की नजर में चौथी द्रिष्टि भी महत्वपूर्ण मानी जायेगी,कार्य का रूप और कार्य की सोच कार्य करने का स्थान कार्य करने वालेकार्य करने का स्थान कार्य करने वाले लोग कार्य के द्वारा प्राप्त किये गये उत्पादनों को रखने का स्थान,कार्य करने के बाद जो उत्पादन होगा उसका अन्त आखिर में क्या होगा इस बात के लिये शनि और राहु से चौथा भाव देखना बहुत जरूरी होता है। कुंडली के छ: आठ बारह और दूसरे भाव का गति चक्र अपने अनुसार चलता है। बारहवां भाव छठे भाव को देखता है,और दूसरा भाव आठवें को देखता है,वही गति छठे और आठवें की होती है। जैसे बिना कार्य किये मोक्ष यानी शांति नही मिलती है और बिना रिस्क लिये धन की प्राप्ति नही होती है। उसी तरह से बिना धन के रिस्क नही लिया जा सकता है और बिना शांति की आशा के कार्य नही किया जा सकता है,बारहवां भाव जरूरतों का होता है तो वह कार्य करने के लिये प्रेरित करता है,दूसरा भाव धन का होता है तो प्राप्त करने के लिये रिस्क लेने के लिये मजबूर करता है,जो जितनी बडी रिस्क लेता है उतना ही उसे फ़ायदा और नुकसान होता है लेकिन छठे और बारहवें भाव को देखे बिना जो रिस्क लेते है वे या तो बहुत बडे नुकसान में जाते है या फ़िर बहुत बडे फ़ायदे में रहते है,लेकिन समान रूप से फ़ायदा लेने के लिये छठे और बारहवे भाव वाले कार्यों को करना भी जरूरी होता है। हर भाव की कडी एक दूसरे भाव से जुडी होती है,अक्सर शनि जो कलयुग का कारक है और राहु जो कलयुग के शक्ति को देने वाला है दोनो के अन्दर समाजस्य रखने के लिये अन्य ग्रहों की स्थिति और उन ग्रहों के अनुसार किये जाने वाले कार्य अपने अपने अनुसार फ़ल देने वाले होते है।शनि राहु की युति

यह युति दिमागी भ्रम देती है,हायपर टेंसन करना आदि इसके मुख्य लक्षण है,राहु जब शनि को त्रिक भावों में देख रहा हो,राहु शनि त्रिक भाव में किसी स्थान पर एक साथ हो,त्रिक स्थान के अलावा कन्या वृश्चिक मीन राशि में स्थापित जन्म का राहु भी इसी श्रेणी में आता है.इसके लिये जो उपाय जल्दी कारगर हों उनको करना ठीक होता है,किसी रत्न को धारण करने पर वह प्रभाव दस प्रतिशत मिलता है,पूजा पाठ करने से वह तीस प्रतिशत तक मिलता है,लेकिन आज के समय में सभी के पास पूजा पाठ करने का समय नही है और किसी अन्य से पूजा पाठ करवाने में विश्वास भी करना मुश्किल है,इसलिये इस युति से शरीर के अन्दर से जो तत्व कम होते जाते है,उन्हे पूरा करने से फ़ल नब्बे प्रतिशत तक पूरे हो जाते है,और इस युति के अन्दर भी दिमाग सकारात्मक कार्य करने लगता है

शनि राहु की युति का इलाज

शनि में राहू का योगात्मक प्रभाव हाइपर टेन्सन की बीमारिया देता है,जब मानसिक चिंताए अधिक लग जाती है तो किया जाने वाला भोजन नहीं पचता है,सोने वाली गोलिया लेने से नींद कभी प्राकृति रूप से नहीं आती है,किसी कठिन समस्या तथा खतरनाक परिस्थिति में शरीर के रियेक्सन में तनाव पैदा होता है,यह शरीर एक चलती फिरती संसार की सबसे बड़ी केमेस्ट्री लेब है,किसी भी प्रकार का तनाव विचार चिंता से शरीर में विभिन्न प्रकार के एन्जाइम्स पैदा होते है,इन सब कामिकल रियेक्सन के फलस्वरूप शरीर को सेल्यूलर लेबल पर अधिक आक्सीडेशन करना पड़ता है,वास्तव में इस दशा के अन्दर जो तनाव पैदा होता है वह शरीर की अस्सी प्रतिशत बीमारियों का कारण बनता है,वर्त्तमान में जो आपके शरीर की पहिचान होगी वह शनि और राहू इस प्रकार से शो करता है:-


* पुतलियों का डायालेषण.

* मुहं और गले का सूखना

* चहरे की वेंस तथा आर्टरीज का सिकुड़ना,हाथ और पांव का पीला पद जाना,

* दिल की धड़कन तेज होना

* अन्तरंग भागो में इन्फेक्सन का पैदा हो जाना कारण शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति का कम हो जाना.

* शरीर के हर अंग में पसीना अधिक आता है विशेष कर हथेली में

* मानसिक स्थिति ऐसी बन जाती है कि रहने वाले स्थान को छोड़ देना ही ठीक रहेगा.

* बार बार सिरदर्द

* हाइपर टेन्सन और इस प्रकार से ब्लड प्रेसर की बीमारी जो लो होती है का पैदा हो जाना

* गर्दन गर्दन के पीछे और पीठ में दर्द

* हमेशा रोने की इच्छा करना

* जल्दी से थकान और कमजोरी

* नींद नहीं आना और डरावने सपने

* धीरे धीरे पेट में अल्सर जैसी बीमारियों का पैदा हो जाना

* एलर्जी और अस्थमा जैसे प्रभाव दिखाई देना

* काम शक्ति का कम हो जाना संतान की पैदाइस में दिक्कत आदि लक्षण मिलते है.


इस शनि और राहू के उपाय जो आज की स्थिति के अनुसार है वे इस प्रकार से है:-

* मल्टी विटामिन दिन में दो बार

* विटामिन ई दिन में एक बार

* कैल गैंग दिन में दो बार

* आयरन फोलिक दिन में एक बार

* विटामिन बी काम्प्लेक्स दिन में तीन बार

यह सभी विद्वान् डाक्टर की सलाह से ही लें,वह शरीर के वजन,खून की मात्रा और शरीर के लक्षण से आपको लेने वाली खुराक और मात्रा की जानकारी दे देगा.इसके अलावा विचारों और सुझाव को सही रखे,नकारात्मक सोच को सकारात्मक सोच में बदले तनाव हमेशा हमारे अन्दर नकाराम्तक विचारों से उत्पन्न होता है,अतः जैसी परिस्थितियाँ हों उन्ही के अनुरूप बदलने की कोशिश करे,इस समय में गुस्सा करना दुःख करना डरना आदि दिक्कत देने वाले कारण होते है.सबसे अधिक भोजन की रूचि और अरुचि का ध्यान रखना भी जरूरी है. मित्रों कर आपकी कुंडली में शनि राहु का मेल है तो आप आप अपनी कुंडली किसी अच्छे एस्ट्रोलॉजर को दिखाएं जो आप हम से भी संपर्क कर सकते हैं तो उनसे पूछ कर ही उपाय करें क्योंकिजैसे सिक्के के दो पहलू होते हैं कि कोई भी योग अच्छा या बुरा हो सकता है तो देखा देखी अपने आप कोई उपाय मत करें जिससे आपको लाभ की बजाय हानि  हो सकती है

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

गुरु और राहु गुरु और राहु की युति (चांडाल योग)

मित्रों आज एक और बुरे जो की बात करते हैं जिसे हम गुरु चांडाल योग के नाम से पुकारते हैंराहु-गुरु की युति या दृष्टि संबंध से एक खास प्रकार का योग जन्म लेता है, जिसे गुरु-चांडाल योग के नाम से जाना जाता है।

 इस संबंध की सबसे बड़ी खराबी ये है कि गुरु तो देव गुरु हैं तथा उनका संबंध एक महान असुर राहु से बनने के कारण वे स्वयं अपनी आत्मरक्षा करने में रत हो जाते हैं। गुरु की इस परिस्थिति का लाभ असुर राहु खूब उठाता है तथा कदम-कदम पर गुरु को पथभ्रष्ट करने की कोशिश करता है।

वह गुरु के विरुद्ध षड़यंत्र रचता है, उन्हें अनैतिक व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित करता है। पराई स्त्रियों में मन लगवाता, चारित्रिक पतन के बीज बो देता है। इसके अलावा ऐसा राहु चोरी, जुआ, सट्टा, अनैतिक तरीके से धन अर्जन की प्रवृत्ति, मद्यपान सहित हिंसक व्यवहार आदि प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है।

कुल मिलाकर यह संयोग गुरु की सभी सद्वृत्तियों के समापन के साथ दुष्प्रवृत्तियों का जन्मदाता सिद्ध होता है। इसके साथ ऐसा चाडाल योग जातक को कदम-कदम पर चालबाजी की प्रवृत्ति अपनाने को विवश करता है। जिस कारण जातक खुद को पतन की पराकाष्ठा पर ले जाता है। मित्रों गुरु oxygen है और राहु Co2 जिससे गुरु कमजोर हो जाता है और गुरु के फल कम हो जाते है !

गुरु चांडाल का यह योग प्रत्येक जातक को अशुभ प्रभाव नहीं देता बल्कि इस योग के प्रभाव में आने वाला जातक बहुत अच्छे चरित्र का तथा उत्तम मानवीय गुणों के स्वामी भी होते है !

गुरु चाण्डाल योग का फलादेश करने से पहले कुंडली में गुरु व् राहु के स्वभावhttps://youtu.be/5QlK8Oa_lmk को और वह किस भाव में है जान लेना आवश्यक है !

बुध अस्त में जन्मा जातक कभी भी राहु वाले खेल न खेले तो बहुत सुखी रहता है,राहु का सम्बन्ध मनोरंजन और सिनेमा से भी है,राहु वाहन का कारक भी है राहु को हवाई जहाज के काम,और अंतरिक्ष में जाने के कार्य भी पसंद है,अगर किसी प्रकार से राहु और गुरु का आपसी सम्बन्ध १२ भाव में सही तरीके से होता है,और केतु सही है,तो जातक को पायलेट की नौकरी करनी पडती है,लेकिन मंगल साथ नही है तो जातक बजाय पायलेट बनने के और जिन्दा आदमियों को दूर पहुंचाने के पंडिताई करने लगता है,और मरी हुयी आत्माओं को क्रिया कर्म का काम करने के बाद स्वर्ग में पहुंचाने का काम भी हो जाता है। इसलिये बुध अस्त वाले को लाटरी सट्टा जुआ शेयर आदि से दूर रहकर ही अपना जीवन मेहनत वाले कामों को करके बिताना ठीक रहता है।जिस प्रकार हींग की तीव्र गंध केसर की सुगंध को भी ढक लेती है और स्वयं ही हावी हो जाती है, उसी प्रकार राहु अपनी प्रबल नकारात्मकता के तीव्र प्रभाव में गुरु की सौम्य, सकारात्मकता को भी निष्क्रीय कर देता है। लेकिन ऐसा सदा नहीं होता जब गुरु स्वयं कमजोर, निर्बल, अशुभ भावेश अथवा अकारक हो जाए तभी राहु के साथ उसकी युति चांडाल योग का निर्माण करती है। क्योंकि राहु चांडाल जाति, स्वभाव यानि कि नकारात्मक गुणों का ग्रह है, इसलिए इस योग को गुरु चांडाल योग कहा जाता हैयदि राहु बलशाली हुए तो शिष्य, गुरू के कार्य को अपना बना कर प्रस्तुत करते हैं या गुरू के ही सिद्धांतों का ही खण्डन करते हैं। बहुत से मामलों में शिष्यों की उपस्थिति में ही गुरू का अपमान होता है और शिष्य चुप रहते हैं।गुरू चाण्डाल योग का एकदम उल्टा तब देखने को मिलता है जब गुरू और राहु एक दूसरे से सप्तम भाव में हो और गुरू के साथ केतु स्थित हों। बृहस्पति के प्रभावों को पराकाष्ठा तक पहुँचाने में केतु सर्वश्रेष्ठ हैं। केतु त्याग चाहते हैं, कदाचित बाद में वृत्तियों का त्याग भी देखने को मिलता है। केतु भोग-विलासिता से दूर बुद्धि विलास या मानसिक विलासिता के पक्षधर हैं और गुरू को, गुरू से युति के कारण अपने जीवन में श्रेष्ठ गुरू या श्रेष्ठ शिष्य पाने के अधिकार दिलाते हैं। इनको जीवन में श्रेय भी मिलता है और गुरू या शिष्य उनको आगे बढ़ाने के लिए अपना योगदान देते हैं। यहां शिष्य ही सब कुछ हो जाना चाहते हैं और कालान्तर में गुरू का नाम भी नहीं लेना चाहते। यदि राहु बहुत शक्तिशाली नहीं हुए परन्तु गुरू से युति है तो इससे कुछ हीन स्थिति नजर में आती है। इसमें अधीनस्थ अपने अधिकारी का मान नहीं करते। गुरू-शिष्य में विवाद मिलते हैं। शोध सामग्री की चोरी या उसके प्रयोग के उदाहरण मिलते हैं, धोखा-फरेब यहां खूब देखने को मिलेगा परन्तु राहु और गुरू युति में यदि गुरू बलवान हुए तो गुरू अत्यधिक समर्थ सिद्ध होते हैं और शिष्यों को मार्गदर्शन देकर उनसे बहुत बडे़ कार्य या शोध करवाने में समर्थ हो जाते हैं।शिष्य भी यदि कोई ऎसा अनुसंधान करते हैं जिनके अन्तर्गत गुरू के द्वारा दिये गये सिद्धान्तों में ही शोधन सम्भव हो जाए तो वे गुरू की आज्ञा लेते हैं या गुरू के आशीर्वाद से ऎसा करते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है और मेरा मानना है कि ऎसी स्थिति में उसे गुरू चाण्डाल योग नहीं कहा जाना चाहिए बल्कि किसी अन्य योग का नाम दिया जा सकता है परन्तु उस सीमा रेखा को पहचानना बहुत कठिन कार्य है जब गुरू चाण्डाल योग में राहु का प्रभाव कम हो जाता है और गुरू का प्रभाव बढ़ने लगता है। राहु अत्यन्त शक्तिशाली हैं और इनका नैसर्गिक बल सर्वाधिक है तथा बहुत कम प्रतिशत में गुरू का प्रभाव राहु के प्रभाव को कम कर पाता है। इस योग का सर्वाधिक असर उन मामलों मेें देखा जा सकता है जब दो अन्य भावों में बैठे हुए राहु और गुरू एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। मित्रों अगर आपकी कुंडली में भी ऐसा योग है या दोष है तब आप अपनी कुंडली किसी अच्छे एस्ट्रोलॉजर को दिखाकर उपाय करें या आप हम से भी संपर्क कर सकते हैं देखा देखी अपने आप पढ़कर उपाय मत करें इससे आपको लाभ की बजाय हानी भी हो सकती है मित्रोंजिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं और तस्वीर के दो रुक उसी तरह कोई भी हो अच्छा या बुरा हो सकता है इसीलिए आप अपनी कुंडली अवश्य दिखाएं और क्या देखें कि यह योग आपको किस तरह का फल दे रहा है उसी तरह से उपाय करें

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...