शनिवार, 15 अगस्त 2020

रक्की,उन्नति रोकी तो नहीं जा रही? कहीं आप बुरे प्रभाव में तो नहीं?

कहीं आपकी तरक्की,उन्नति रोकी तो नहीं जा रही? कहीं आप बुरे प्रभाव में तो नहीं?

www.acharyarajesh.in कर पा रहे आप अच्छे पृष्ठभूमि से हैं। पर आप उसे भी बरकरार नहीं रख पा रहे जो बाप-दादाओं ने बनाया उसे भी नहीं संभल पा रहे ,जबकि आपमें सारी क्षमताएं और योग्यताएं हैं। आप अच्छी शिक्षा ,क्षमता ,योग्यता के बावजूद निम्न स्थिति में जीने को विवश हैं ,जबकि आपके आसपास अथवा परिवार में ही कोई अन्य लगातार उन्नति करता जा रहा ,हर तरफ विकास करता जा रहा अनावश्यक कभी रोग तो कभी हानि ,कभी कलह तो कभी लड़ाई झगड़े ,कभी कर्ज तो कभी दुर्घटनाएं ,कभी बच्चों की समस्याएं तो कभी माता -पिता की ,कभी नौकरी में समस्या तो कभी व्यवसाय में ,कभी पारिवारिक विवाद /मतभेद तो कभी मुकदमे लगातार कुछ न कुछ लगा ही रहता है ,जबकि आप यदि एकाग्र हो कर किसी भी क्षेत्र में जुट जाएँ तो आप सफल हो जायेंगे ,पर आप एकाग्र हो ही नहीं पा रहे ,पूरा समय लक्ष्य पर दे ही नहीं पा रहे इन सबके पीछे कुछ नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हो सकता है। आप माने या न माने पर ऐसा होता है।  विज्ञान भी नकारात्मक और सकारात्मक ऊर्जा को स्वीकार करता है। यह नकारात्मक ऊर्जा ग्रह दोष के कारण हो सकती है। वास्तु दोष के कारण हो सकती है। स्थान अथवा भूमि दोष के कारण हो सकती है। आपके यहाँ पित्र दोष के कारण हो सकती है। आपके कुलदेवता /देवी की असंतुष्टि के कारण हो सकती है। कहीं से आये भूत -प्रेत -ब्रह्म -जिन्न के कारण हो सकती है। किसी के द्वारा भेजे गए भूत-प्रेत के कारण हो सकती है। किसी के द्वारा आपके विरुद्ध किसी तांत्रिक से अभिचार कराने के कारण हो सकती है। आपके किसी नजदीकी द्वारा समय समय पर आपके विरुद्ध टोटके किये जाने के कारण हो सकती है। आपके व्यावसायिक प्रतिद्वंदी अथवा दुश्मन या विरोधी द्वारा आपके विरुद्ध अभिचार कराने के कारण हो सकती है। नौकरी के किसी सहकर्मी अथवा किसी परिचित द्वारा आपकी उन्नति न देख पाने से कोई क्रिया कराने के कारण हो सकती है। इन नकारात्मक या दूषित प्रभावों के कारण ,आपकी उन्नति रुक जाती है ,आपका पतन होने लगता है। स्वभाव में खराबी आ जाती है। व्यवहार व् बर्ताब बिगड़ने लगता है। समय पर कार्य में बाधा आती है। आपके निर्णय गलत होने लगते हैं। आलस्य और प्रमाद घेरने लगता है। निराशा और डिप्रेसन होने लगता है। कभी स्वभाव में उग्रता आती है कभी हीन भावना ,क्षोभ और वितृष्णा रहती है। बुरे स्वप्न आ सकते हैं।अशुभ लक्षण दिख सकते हैं ।रात में निंद का ना आना या भय सा महसूस हो सकता है। कभी ऐसा लग सकता है। की कमरे में आपके अतिरिक्त भी कोई है। किन्तु आपको दीखता नहीं कभी सोते समय कोई आपके ऊपर आ सकता है। लग सकता है। की कोई आपको दबा रहा है। कभी कोई  शक्ति अलग अलग चेहरे भी दिखा सकती है। या चेहराविहीन भी हो सकती है। बार बार घर परिवार अथवा खुद पर बीमारी आ सकती है।घर या कमरे से दुर्गन्ध महसूस हो सकती हैं।सीलन भरा वातावरण बन सकता है। बिना मतलब मुकदमे ,विवाद शुरू हो सकते है। पूरी म्र्हनत के बाद भी व्यवसाय दिन पर दिन कम हो सकता है।सारे प्रयास के बाद भी नौकरी नहीं लग रही या उपयुक्त नहीं मिल रही ।अगर ऐसा कुछ है तो आप नकारात्मक उर्जा से प्रभावि हैं।अगर आपके घर में जाते समय आपका सर भारी हो जाए अथवा आपके कार्य व्यवसाय की जगह पहुचते ही सर भारी हो जाए अथवा दोनों जगह सर भारी हो अनायास अशुभ लक्षण बार बार अथवा कभी लगे की दिमाग विचारशून्य हो गया है या सोचने समझने की क्षमता कम हो जाए कहीं ठीक से मन न लगे तनाव और मानसिक भारीपन महसूस हो |खुद पर से ही विश्वास कम हो जाए बेवजह कमजोरी महसूस हो कुछ करने का मन न करे आलस्य हो तो आप नकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित हो सकते हैं। और इनके द्वारा आपकी उन्नति रोकी जा रही है।इस प्रकार की नकारात्मक उर्जाओं का प्रभाव टोटकों से नहीं समाप्त किया जा सकता इस तरह की समस्याओं को सोसल मीडिया और टोटकों /उपायों की किताबों से पढ़कर अथवा नीम हकीम ज्योतिषी -तांत्रिक से सुनकर करके नहीं हटाया जा सकता ,क्योकि इन्हें तो खुद इनकी तकनिकी ,समय ,मुहूर्त ,पूर्ण क्रिया ,इसके विज्ञानं ,उर्जाओं की समझ नहीं होती न जानकारी होती है। यह खुद यहाँ वहां लिखे अथवा पोस्ट किये हुए उपाय अथवा टोटके उठाकर बता देते हैं। कैसे ,कब ,कहाँ ,किस तरह और क्यों किये जा रहे उपाय अथवा टोटके जानकारी नहीं होती ,इनके पीछे क्या विज्ञान कार्य करता है ,कैसे ऊर्जा समीकरण बनते और बनाये जाते हैं। इन्हें खुद नहीं पता इसीलिए लाखों लोग ऐसे उपाय ,टोटके करके कोई लाभ नहीं पाते और इनका विश्वास ज्योतिष और तंत्र से उठ जाता है ,इन्हें लगता है। सब ठग हैं। और केवल यह सब ठग विद्या है। वास्तव में यहाँ बस वास्तविक पकड़ की बात होती है ।तलवार की जहाँ जरुरत है। वहां सुई चुभोने से काम नहीं होता अपितु नकारात्मक ऊर्जा और उग्र हो अधिक नुक्सान करती है।किसी को छेड़कर अथवा लाठी मार के छोड़ दीजिये तो वह और उग्र हो प्रतिक्रिया करता है ऐसा ही कुछ नकारात्मक उर्जा के साथ होता है |ज्योतिषीय उपाय भी अगर पूर्ण और प्रभावी नहीं किये जाएँ तो कोई प्रभाव नहीं दे पाते टोटके केवल सामान्य परिस्थिति में ही प्रभाव डालते हैं। नकारात्मक ऊर्जा अगर शक्तिशाली हुई तो टोटकों पर उलटी ही प्रतिक्रिया सामने आती है ।यही सब कारण है की यहाँ वहां से लोग उपाय जानकर करते रहते हैं। और परेशान के परेशान ही रहते हैं।इस तरह की नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाब कोकाटने के लिए किसी अच्छे जानकार से ही परामर्श करना चाहिए, और उसके बताये मार्गों का ही अनुसरण करना चाहिए यहाँ वहां से उपाय देखकर और सुनकर नहीं करना चाहिए ,क्योकि इनका अपना विज्ञानं होता है और हर वस्तु ऊर्जा स्वरुप है ,जिसका उपयोग उचित ढंग से न होने पर या तो लाभ होगा नहीं अथवा नुकसान भी संभव है |तांत्रिक उपायों में तो और भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए नकारात्मक ऊर्जा पर सात्विक और सौम्य शक्तियों का बहुत प्रभाव नहीं पड़ता हाँ यह घर और व्यक्ति पर सकारात्मक ऊर्जा बढ़ा जरुर देती हैं जिससे नकारात्मकता की मात्रा का बैलेंस जरुर कम हो जाता है पर वह न समाप्त होती है न कम होती है जो अच्छे या शुभ परिणाम दीखते हैं वह सकारात्मकता बढने के कारण होते हैं।नकारात्मक ऊर्जा तो यथावत बनी ही रहती है और गाहे बगाहे अपना असर दिखाती ही रहती है। नकारात्मक उर्जाओं को हटाने के लिए उग्र शक्तियों का ही सहारा लेना पड़ता है। इसीलिए तांत्रिक और उग्र महाविद्याओं ,भैरवकाली, आदि के साधक इन कार्यों में अधिक सफल होते हैं। नकारात्मकता हटाने के लिए उग्र महाशक्तियों यथा काली ,बगलामुखी ,तारा ,काल भैरव ,नृसिंह ,दुर्गा ,आदि की साधना उपासना और हवन अधिक प्रभावी होते हैं इन नकारात्मक शक्तियों से किसी भी तरह प्रभावित व्यक्तयों को उपरोक्त उग्र शक्तियों के यन्त्र ,कवच में धारण करने चाहिए,स्पष्ट छाया या वायव्य बाधाओं से ग्रस्त व्यक्तियों को खुद  कवच धारण करना चाहिए, और किसी अच्छे तांत्रिक या महाविद्या साधक से संपर्क करना चाहिए,नोट कुछ लोग दो कश्तियों पर सवार होकर  समस्याओं का हल करना चाहते हैऐसे सज्जन कभी भी सफल नहीं हो पाते किसी जानकार योग्य से ही हल करवाएं एक पर भरोसा करके उसके कहे अनुसार ही उपाय करें  जय माता दी

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

मंत्र की शक्ति

मंत्र की शक्ति
मंत्र की अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र सत्ता है।मंत्र विद्या के रहस्य इस दुनिया के ऐसे अजूबे हैं कि जिनके समझ में आ गए, उनके लिए किसी दिव्य अनुदान से कम नहीं हैं हमारा भारतवर्ष इस क्षेत्र में सर्वोपरि था, क्योंकि यहां के साधक और महर्षि अपने आप में मंत्रमय थे, उनका पूरा जीवन मंत्र और उनके रहस्य को समझने-समझाने में बीत जाता था। वे शिष्यों को अपने साथ रखकर उन्हें पुत्रवत स्नेह देते थे और उन्हें मंत्र की मूल ध्वनि का ज्ञान कराते थे। यह परम्परा मौलिक रूप से बराबर आगे बढ़ती गयी, परन्तु मुगलकाल में इस पद्धति का ह्रास हुआ और उस समय फारसी कलमा तथा इसी प्रकार के मंत्रों का प्रचलन बढ़ा, फलस्वरूप मूल मंत्र और उसके रहस्य को समझने वाले महर्षि कम होते गए।मंत्र का अर्थ होता है जो मन से त्राण दिला दे यानी मन से मुक्त कर दे । मन से मुक्त होने का एक अर्थ ये भी है कि आप ध्यान की अवस्था मे प्रवेश कर गए।कई लोग ध्यान का अर्थ मन का एकाग्र होना मानते है पर ऐसा नही है। ध्यान का अर्थ न मन की एकाग्रता से है न चंचलता से ध्यान निर्विचार अवस्था है ।
अब मंत्र विज्ञान के बारे में बात करते है। मंत्र विज्ञान पे आज के समय मे भरोसा करना बहुत कठिन है क्योकि हमारे पास जब किसी चीज़ के सूत्र खो जाते है तब बड़ी कठिनाई होती है हमारे बस मंत्र बच गए है उसका विज्ञान खो गया है।
मंत्र का विज्ञान नाद के विज्ञान पे काम करता है। नाद का अर्थ हर अक्षर का हर शब्द का एक विशेष ध्वनि है जिसे नाद भी कहते है। वो ध्वनि हमारे मन पे हमारे शरीर पे एक विशेष प्रभाव डालती है। हमारे शरीर का कुछ विशेष हिस्सा कुछ विशेष शब्दो को बोलते हुए उसमे सम्मलित होता है। जैसे आप हुम् बोले तो आपके हृदय से लेकर आपके नाभि तक विशेष कंम्पन होगा। आप शांत होकर अगर ‘माँ ’ की ध्वनि करे तो आप पाएंगे आपके दोनों आंखों के बीच आपको हल्का कंम्पन महसूस होगा। जैसे आप बिना जीभ का प्रयोग किये ‘ह’ तो बोल सकते परंतु ‘ट’ नही बोल सकते है। इसी तरह हर अक्षर हर शब्द किसी न किसी तरह आपके शरीर के किसी विशेष हिस्से पे प्रभाव डालता है। कुछ विशेष शब्द आपके मन पे भी प्रभाव डालते है जैसे कोई आपको ‘ मूर्ख’ कहे आपका मन तुरंत गुस्से से भर जाएगा कोई आपको ’ सज्जन’ कहे आप तुरंत प्रसन्न हो जायेगे। इसी प्रकार मंत्र आपके मन पे भी प्रभाव डालता है।
अब आती है वो बात जिसपे विश्वास करना मुश्किल है यानी मंत्र से बहुत दूसरी परिस्थितिया भी बदली जा सकती है।अब उसको समझना बहुत कठिन है वो अनुभव का विषय है।पूरा अस्तित्व ध्वनियों का एक जटिल संगम है। उसमें से हमने कुछ ध्वनियों को पहचाना जो ब्रह्मांड के हर आयाम को खोलने वाली कुंजियों की तरह हैं। जब तक आप खुद चाभी नहीं बन जाते, वह आपके लिए नहीं खुलेगा। मंत्र बनने का मतलब है कि आप चाभी बन रहे हैं, चाभी बन कर ही आप ताले को खोल सकते हैं, जिस समय आप मंत्र का उच्चारण करते हैं, तब ध्वनि की जो विशिष्ट आन्दोलनयुक्त तरंगें निर्मित होती हैं, उन तरंगों का सीधा प्रभाव आपके मस्तिष्क में आता है।किन्हीं विशिष्ट ध्वनि-तरंगों को निर्मित कर पत्थर भी तोड़े जा सकते हैं। जैसे लेज़र किरणों से पेट की पथरी को तोड़कर ख़त्म कर देते हैं, इसी तरह ध्वनि की विशिष्ट तरंगों द्वारा किसी ठोस चीज़ को भी तोड़ा जा सकता है।
एक बार बादशाह अकबर के दरबार मेंमें तानसेन और बैजू बावरा में एक प्रतियोगिता करायी गयी। इस प्रतियोगिता में एक संगमरमर की शिला रखी गयी। प्रतियोगिता में शर्त यह रखी गयी कि जो अपने गायन से उस संगमरमर की शिला को तोड़ देगा वही जीतेगा।
हथौड़ी या छैनी से नहीं, डण्डे-भाले से भी नहीं, कण्ठ से निकली हुई ध्वनि तरंगों से और बैजू ने यह कर दिखाया। इटली वेफ संगीत की एक पद्घति है उसमें एक महिला होती है, उसको ‘सोपरानो’ कहते हैं। उसकी गायकी का कमाल यह है कि वह इतने तीव्र सप्तक में गा सकती है कि उसवे सामने रखे हुए काँच के गिलास को वह अपनी आवाज़ से तोड़ देती है। जो महिला ग्लास को तोड़ दे, उसे ‘बेस्ट सोपरानो’ माना जाता है। का सीधा संबंध उच्चारण से है। इसे 'ध्वनि विज्ञान' भी कहा जाता है। जो खोज हुई है उनके अनुसार, वह समय करीब ही है, जब ध्वनि विज्ञान ऋषियों जैसे ही काम करने लगेगा। कौत्स मुनि ने मंत्रों को अनर्थक माना है। अनर्थक यानि जिसका कोई अर्थ न हो। ध्वनि प्रवाह को, शब्द गुंथन को महत्व दिया जाना चाहिए। 'ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐं' आदि बीज मंत्रों के अर्थ से नहीं, ध्वनि से ही प्रयोजन सिद्ध होता है। संगीत का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर जो असाधारण प्रभाव पड़ता है, उससे समस्त विज्ञान जगत परिचित है।
निश्चित गति से शीशे के गिलास के पास ध्वनि पैदा करें, तो वह टूट जाएगा। पुल पर चलते हुए सैनिकों को कदम मिलाकर चलने की ध्वनि नहीं करने दी जाती, क्योंकि तालबद्धता से पुल गिर सकता है। इस ही ध्वनि विज्ञान के आधार पर मंत्रों की रचना हुई है। उनके अर्थों का उतना महत्व नहीं है, इसलिए कौत्स मुनि ने उन्हें 'अनर्थक' बताया है। 
ध्वनि की तरंगों में से बड़ी ऊर्जा, बड़ी शक्ति निकलती है। जिस समय आप मंत्र का उच्चारण करते हैं, तब मंत्र के द्वारा उत्पन्न की गयी ध्वनि तरंगों का सीधा प्रभाव आपवे मस्तिष्क की तीनों ग्रन्थियों हाइपोथेलेमस, पिट्यूटरी और पीनियल पर पड़ता है।
विशेषतः जब आप मंत्र की ध्वनि का गुंजन करते हैं, तब आप अंगूठे से कान बंद कर लेते हैं, ताकि बाहर की कोई आवाज़ भीतर जाये ही नहीं। इस तरह अंगूठे से कान बंद करके जब आप मंत्र का उच्चारण करते हैं, तब उसकी तरंगें सीधे आपके मस्तिष्क में पहुँच कर मस्तिष्क की सूक्ष्म संरचना को बदल सकती हैं।
मेडिकल साइन्स के पास हाइपरटेन्शन के कारणों को दूर करने की कोई दवा नहीं है। हाइपरटेन्शन का सबसे बड़ा कारण है ‘तनाव’। ऐसी कोई दवा मेडिकल साइन्स के पास नहीं है, जिसको खाने से आप तनावमुक्त हो सकें। अभी तक तो बनी नहीं है। अभी तक जितनी दवाएँ बनी हैं या बन रही हैं, वे केवल तनाव के कारण शरीर में आने वाले लक्षणों को दूर करने के काम आती हैं।
वास्तव में दवाओं में कुछ केमिकल्स ही होते हैं। उनमें से कुछ दवाएँ कैल्शियम के रूप में होती हैं। कुछ दवाएँ नसों में से रक्त-प्रवाह सुचारु रूप से बहे इसलिये दी जाती हैं या फिर कोई दवा रक्त में बन रहे क्लॉट्स को पिघला कर पतला कर देती है।
मेडिकल साइन्स ने अभी तक ऐसी कोई गोली नहीं बनायी है, जिसके सेवन से मस्तिष्क में तनाव ही न रहे। परंतु ऋषियों के पास ऐसी दवा है और उनकी इस दवा को हम मंत्र कहते हैं। मंत्र की उपयोगिता अनदेखे ईश्वर को ख़ु़श करने के लिये नहीं है। मेरी दृष्टि में मंत्र का उच्चारण यह कोई साधना भी नहीं है। मंत्र का उच्चारण  शरीर,  दिमाग़ और मन को संतुलित करने के लिये सर्वोत्तम उपाय है।शक्ति का स्फोट मंत्र शक्ति की ही प्रक्रिया है, लेकिन रहस्य में लिपटी हुई। अणु विस्फोट से उत्पन्न होने वाली भयावह शक्ति की जानकारी हम सभी को है। शब्द की एक शक्ति सत्ता है। उसके कंपन भी चिरंतन घटकों के सम्मिश्रण से बनते हैं। इन शब्द कंपन घटकों का विस्फोट भी अणु विखंडन की तरह ही हो सकता है। मंत्र, योग साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही विधि व्यवस्था रहती है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उसका उपात्मक, होमात्मक और दूसरे तप साधनों तथा कर्मकांडों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है, लगभग उसी अर्थ में संस्कृत में स्फोट का प्रयोग किया जाता है। मंत्र-साधना वस्तुतः शब्द शक्ति का विस्फोट ही है।

रविवार, 21 जून 2020

क्या तीसरा विश्व युद्धहोगा। क्या भारत ओर चीन के मघ्य युद्ध होगा?(2)

क्या सितम्बर 2020 के बाद भारत मे होंगे युद्ध जैसे हालात

मित्रों मेरी पिछली पोस्ट जरुर पढ़े

मित्रों प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों जैसे वाराह मिहिर तथा अंय संहिता ज्योतिषियों ने भारत की प्राचीन राशि मकर बताई थी 20 वीं सदी के महान ब्रिटिश पाॅमिस्ट काउंट लुई हेमन कीरो में भी 1925 मे प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘वल्र्ड प्रैडिक्शन’ मे भारत की राशि मकर बताई है लगभग हजार वर्ष पहले भारत विदेशी
मुस्लिम आक्रांताओं का गुलाम हो गया और 15 अगस्त 1947 को वृष लग्न मे भारत विदेशी गुलामी से मुक्त हुआ। भारतीय ज्योतिष मे किसी भी देश या व्यक्ति के पूर्वजंम का ज्ञान नवम भाव से और अगले जंन्म का ज्ञान पंचम भाव से होता है। वृष राशि मकर राशि से पंचम राशि है।  भारतीय ज्योतिष मे बृहस्पति को धर्म और अध्यात्म का कारक ग्र्रह माना गया है तथा राहू को दैत्यों, राक्षसों, मुस्लिमों, मलेच्छों नास्तििििक धर्म विरोधी तथा दुर्भाग्य, नर संहार का कारक ग्रह माना गया है। भारत के इतिहास मे वृष मिथुन और धनु राशियो ंकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दुर्भाग्यवश भारत के जमांक मे धर्म गुरू की राशि धनु  भारत की प्राचीन राशि मकर से धनु 12 भाव की राशि है। जो विनाश का भाव है मिथुन राशि भारत की राशि मकर से छठे भाव की राशि है। जो रोग व शत्रु का भाव है। भारत के इतिहास मे वृष मिथुन वृश्चिक और धनु राशियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। राहू विनाश का कारक ग्रह है। केतु मोक्ष अलौकिकता तथा नई उत्पति का कारक ग्रह है। साथ ही केतु मे कई विनाशकारी शक्तियां भी है। भारत के लंबे इतिहास का ज्योतिषीय अध्ययन करने पर यह तथ्य प्रकृट हुआ है। जब-जब वृष वृश्चिक या मिथुन व धनु राशि मे राहू या केतु का गोचर हेाता है। तब तब भारत मे विनाशकारी घटनायें घटित होती है। राहू-केतु के विनाशकारी प्रभाव का  भारत के इतिहास मे आश्चर्यजनक विनाशकारी घटनायें:-
1. तराईन का द्वितीय युद्ध-24 मार्च सन् 1192 ग्राम तराईन जिला हनुमानगढ राजस्थान। वृष लग्न मिथुन मे केतु, सिंह मे मंगल, वक्री, धनु मे राहू, व शनि वक्री, कुंभ मे बुध, मीन मे सूर्य व गुरू शुक्र व चन्द्र।
2. पानीपत का प्रथम युद्ध-3 अप्रैल सन 1526। मिथुन मे केतु धनु मे राहू, मीन मे बुध सूर्य, मेष मे चन्द्र, सूर्य व मंगल, वृष मे शुक्र व बृहस्पति।
3. पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी 1761। पानीपत, हरियाणा। मकर लग्न 29 अंश। मकर मे सूर्य मंगल, कुंभ मे शुक्र व बुध, मीन मे शनि, मेष मे चन्द्र 4 अंश, वृष मे राहू व तथा वृश्चिक मे केतु।
4. खानवा का युद्ध-16 मार्च 1527। मेष मे चन्द्र, 23 अंश, वृष मे गुरू, मिथुन मे केतु, वृश्चिक मे मंगल, धनु मे राहू, कुंभ मे बुध, मीन मे सूर्य शुक्र व शनि।
5. बक्सर का युद्ध-22 अक्टूबर 1764। वृश्चिक लग्न मकर मे मंगल, मीन मे राहू, मेष मे शनि, वक्री, मिथुन मे गुरू, सिंह मे शुक्र, कन्या मे बुध व केतु तुला मे सूर्य।  
6. तैमूर का हमला- 17 फरवरी 1398। दिल्ली। मकर लग्न, वृष मे केतु, सिंह मे गुरू, कन्या मे मंगल, वृश्चिक मे शुक्र व राहू, धनु मे सूर्य शुक्र व शनि।  
7. भारत की स्वतंत्रता। 15 अगस्त 1947 रात्रि 12 बजे दिल्ली। वृष लग्न मे राहू मिथुन मे मंगल। कर्क मे सूर्य चन्द्र शुक्र, शनि व बुध, तुला मे गुरू, व वृश्चिक मे केतु।
7. राम मंदिर विध्वंस-5 मई 1528। दोपहर बाद, अयोध्या। कर्क लग्न मे गुरू व चन्द्र, वृश्चिक मे राहू, मीन मे शुक्र, मेष मे सूर्य व शनि, वृष मे मंगल बुध व केतु। 
8. बाबरी मस्जिद विघ्वंस-6 दिसम्बर 1992। दोपहर-12.30। अयोध्या। कुंभ लग्न, मेष लग्न मे चन्द्र 5 अंश, वृष मे केतु, कर्क मे मंगल कन्या मे गुरू, वृश्चिक मे सूर्य बुध व राहू, मकर मे शुक्र व शनि। 
9. भारत-पाक युद्ध 1947। 22 अक्टूबर 1947 प्रातः-4.00। कशमीर, कन्या लग्न तुला मे शुक्र, बुध, सूर्य, वृश्चिक मे गुरू व केतु, वृष मे राहू, कर्क मे मंगल व शनि। उ. षाढा-3।
10. भारत-पाक युद्ध 1965। 1 सितम्बर 1965। प्रातः-4.00। छम्ब व अखनूर (जम्मू) कर्क लग्न लग्न मे बुध, सिंह मे सूर्य, कन्या मे नीच का शुक्र  तुला मे मंगल, व चन्द्र, वृश्चिक मे केतु कुंभ मे वक्री शनि वृष मे राहू।। 
11. सोमनाथ मंदिर विध्वंस- 8 जनवरी 1026। दोपहर-3.30 जिला सोमनाथ, काठियावाड़ गुजरात। वृष मे चन्द्र व केतु। वृश्चिक में राहू, धनु मे बुध, मकर मे सूर्य व शुक्र, कुंभ मे मंगल, मीन मे शनि। मेष मे मंगल।
12. 1857 की गदर 10 मई 1857 मीन मे  राहू 14 अंश कन्या मे केतु 14 अंश नवांश मे वृष मे केतु व वृश्चिक मे राहू था।
श्रीमती इन्दिरा गाधी की हत्या-31 अक्टूबर 1984। 7.30 प्रातः। दिल्ली। तुला लग्न मे नीच का सूर्य बुध व शनि, वृश्चिक मे शुक्र व केतु धनु मे मंगल व गुरू मकर मे चन्द्र व वृष मे राहू। 
13. भारतमंत्री नरेन्द्र मोदी-जं 17 सितम्बर 1950। प्रातः-11.05 मिनट, मेहसाना गुजरात। वृश्चिक लग्न मे नीच का चन्द्र व मंगल, कुंभ मे वक्री गुरू मीन मे राहू, सिंह मे सूर्य व शनि, कन्या मे सूर्य बुध व केतु, कन्या गत केतु का राशि स्वामी बुध केतु से युत है।
घटना     तिथि   राहू केतु की स्थिति
1. सोमनाथ मंदिर विध्वंस   8 जनवरी 1025  वृष मे केतु वृश्चिक मे राहू 
2. राम मंदिर विध्वंस   5 मई 1528  वृष मे केतु वृश्चिक मे राहू 
3. पानीपत का तृतीय युद्ध   14 जनवरी 1761  वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
4. तैमूर का हमला    17 फरवरी 1398  वृष मे केतु वृश्चिक मे राहू 
5. 1857 की गदर    10 मई 1857  नवांश मे वृष मे केतु व वृश्चिक मे राहू 
6. भारत की आजादी   15 अगस्त 1947  वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
7. भारत पाक युद्ध 1947   22 अक्टूबर 1947 वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
8. भारत पाक युद्ध 1965   1 सितम्बर 1965  वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
9. बाबरी मस्जिद विघ्वंस   6 दिसम्बर 1992  वृष मे केतु वृश्चिक मे राहू
10. श्रीमती इन्दिरा गंाधी की हत्या  31 अक्टूबर 1984 वृष मे राहू वृश्चिक मे केतु
मिथुन गत राहू या केतु और धनु
मे राहू या केतु की घटनायें घटना  तिथि   राहू केतु की स्थिति
1. पृथ्वीराज चैहान की पराजय  24 मार्च 1192  मिथुन मे केतु, धनु मे राहू
2. पानीपत का प्रथम युद्ध   3 अप्रैल सन 1526 मिथुन मे केतु धनु मे राहू।
3. खानवा का युद्ध     16 मार्च 1527  मिथुन मे केतु धनु मे राहू।
भारत का भविष्य:-
गत 7 मार्च 2019 से जब से राहू मिथुन मे और धनु मे केतु आया है। तब से भारत मे भयानक बेरोजगारी, आर्थिक मंदी कानून व्यवस्था की असफलता एन.आर.सी. मुददे पर देश व्यापी व्यापक विरोध आंदोलन और जनवरी 2020 से देश मे आया कोरोना महामारी अभूतपूर्व संकट लंबा लाॅकडाउन अर्थ व्यवस्था का फेल हो जाना प्रवासी भारतीयों का लाखों की संख्या मे वापस पलायन तथा करीब 10 करोड़ भारतीय श्रमिकों का बेरोजगार पैदल या अंय साधनों द्वारा मूल निवास का पलायन करोड़ों भारतीयों का बेरोजगार हो जाना आदि दुर्भाग्य पूर्ण धटनायें घट रही। इतिहास अपने आप का दोहरा रहा है। ठीक सब कुछ वैसा ही हो रहा है। जैसा आज से 74 साल पहले देश मे घटा था आजादी की प्राप्ति देश का बटवारा, करीब डेढ से दो करोड़ आबादी का पलायन भयानक बेरोजगारी व आर्थिक मंदी व दंगों मे करीब 20 लाख लोगांे की हत्या। 25 सितम्बर 2020 को राहू वृष और केतु वृश्चिक राशि मे प्रवेश करेगा जो आगामी डेढ साल तक रहेगा भारत के राहू वृष राशि मे तथा केतु वृश्चिक राशि है।  राहू ने ही भारत का विभाजन किया राहू स्वयं ही खंडित देह या विकृत शरीर का प्रतीक है। धु्रव नाड़ी के अनुसार जब राहू से राहू या केतु का गोचर होता है। राहू या केतु से केतु या राहू का गोचर होता तों जीवन मे भारी दुर्भाग्य संकट आती हैं। और अनेक अशुभ घटनायें घटती है। 1947 मे इसी गोचर मे भारी रक्तपात करवाया था संभव हो कि इस बार यह नरसंहार कोरोना वायरस के कारण होगा आने वाले दुर्भाग्य के स्वरूप का वर्णन करना अभी संभव नही है। पर विनाश निश्चित है। 25 जनवरी 2020 से शनि ने आगामी ढाई साल के लिये मकर राशि मे प्रवेश किया है। जो भारत की राशि है।   मई 2020 से शनि वक्री है । शनि श्रमिकों का भी कारक है। अतः श्रमिकों को भारी दुर्भाग्य और दुःख सामना करना पडे़गा। शनि आयु कारक भी है। अतः शनि भारी संख्या मे अकाल मौतें देगा। 
प्रधानमंत्री मोदी की कुण्डली:-
वृष का राहू प्रधनमंत्री की लग्न व चन्द्र लग्न से निकलेगा राहू ना केवल उनके लग्नेश से निकलेगा बल्कि अपने शत्रु ग्रह मंगल से भी निकलेगा। दुर्भाग्यवश उनका चन्द्रमा ना केवल भाग्येश है। बल्कि नीच का भी जो उन्हे भारी निराशा देगा उन्हे कई क्षेत्रों मे भारी असफलता व दुर्भाग्य भी देगा संभव हो कि यह संकट कोरोना के विस्तार के कारण आये। मंगल राहू-योग व चन्द्र राहू योग मोदी जी के जीवन मे अनेक विपत्तियां दुर्भाग्य व पराजय देगा
! मित्रों अगर हम आगे देखेंगे कि 2022जनफरी फ़रवरी के आसपास कुछ बड़ी ताकतवर देशों में तनाव रहेगा जिससे युद्ध जैसी स्थितियां बनेंगी। यह तो मैं पक्का नहीं कह सकता कि युद्ध होगा या नहीं पर तनाव जरूर रहेगा पूरे विश्व में डर का माहोल बना सकता है दोस्तो  यह अनुमान है हकीकत में क्या होता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा  मां जगदम्बा विश्व की रक्षा करे

क्या तीसरा विश्व युद्धहोगा। क्या भारत ओर चीन के मघ्य युद्ध होगा ?



मित्रों आपको पता ही है कि भारत और चीन में सीमा पर तनाव चल रहा है।इस वक्त देश और दुनिया में कई लोग भारत और चीन के बीच युद्ध की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। इसी आशंका के चलते कई ज्योतिष और भविष्‍यवक्ता अपने अपने यूट्यूब चैनल या सोशल मीडिया को चमकाने के लिए युद्ध की तरीख तक करने में लगे हैं। पिछले कुछ सालों से भारत और पाकिस्तान को लेकर हर साल युद्ध होने की भविष्‍यवाणी की जाती है लेकिन युद्ध तो होता हुआ नहीं दिखाई देता। हां, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे जरूर कुछ होता रहा है। आखिर इन भविष्यवाणियों का सच क्या है। भविष्य के गर्त में क्या छुपा है। आओ आज हम भी थोड़ा कुछ जान लेते हैं। भविष्यवाणियों के बारे में।
कोई दोनों देशों की कुंडली खंगाल रहा है तो कोई ग्रहण एवं ग्रहों के परिवर्तन के आधार पर भविष्यवाणी कर रहा है
मित्रों जब भी सूर्य ग्रहण होने वाला रहता है तो उसके कुछ दिन पूर्व भूकंप, तूफान आता है और समाज में जनविद्रोह की भावना भड़कती है। यदि ऐसा पहले नहीं होता है तो सूर्य ग्रहण के कुछ दिन बाद ऐसा होता है। दूसरा यह कि जब भी चंद्र ग्रहण होता है तो लोगों का मन बैचेन हो जाता है और वे उनमें हत्या या आत्महत्या के खलाल बढ़ जाते हैं। समुद्र के भीतर तूफान और भूकंप का जन्म होता है। इसी तरह जब भी कोई ग्रह अपनी राशि परिवर्तन करता है या दूसरे ग्रह के उपर से गुजरता है तो भी धरती पर भारी परिवर्तन देखने को मिलते हैं। अपनें देखा होगा ऐसा सवकुछू घटित होते हुए मित्रों मैंने पहले ही यह सब कुछ अपने ब्लॉग पर पिछले कुछ लेख लिखकर आप को बता दिया था आप मेरे ब्लॉग पर ऐ पिछले Articles पढ़ सकते हैं। हऐसे में यह एक ओर सोशल मीडिया पर तीसरा विश्व युद्ध होने के चर्चे हैं, लेकिन मेरा ज्योतिषीय गणना के अनुसार कोई युद्ध नहीं होगा। उनके अनुसार, ‘ दुनिया में थोड़ी हलचल तो जरूर रहेगी, लेकिन यह किसी बड़े युद्ध का कारण नहीं बनेगी।
अभी उथल-पुथल इसलिए है क्योंकि 6 ग्रह एक ही घर में एकसाथ आ गए हैं। इसके कारण यह उथल-पुथल मची हुई है। लेकिन कुछ दिनों बाद शनि ग्रह के मकरमे सिंघी चाल से राशि में आने के बाद से स्थिति में सुधार होना शुरू हो जाएगा।’
इस कारण विश्व में विस्फोटक गतिविधियां हो रही हैं।विश्वयुद्ध को लेकर किसी तरह का विचार मन में लाने की कोई जरूरत नहीं है। इसका कारण यह कि शनि फिलहाल राशि मकर में वक्री है। शनि जब अपनी स्वराशि में होते हैं तो शांति बहाल होती है। शनि न्यायधीश हैं और शांति कायम करना उनका काम है। ऐसे में विश्व युद्ध की आशंका में कोई दम नहीं है। जानकारी के अनुसार 2020 से पहले शनि के मकर राशि में वक्री रहते हुए ऐसे तीन ग्रहण 1962 में हुए थे। 58 साल पहले 17 जुलाई को चंद्र ग्रहण, 31 जुलाई को सूर्य ग्रहण और 15-16 अगस्त की मध्य रात्रि में चंद्र ग्रहण हुआ था। इस साल में भी चंद्र ग्रहण की धार्मिक मान्यता नहीं थी। 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था। कुछ दिनों बाद 1 सितंबर 1962 को ईरान में भारी भूकंप आया था। 2020 में भी ऐसे ही ग्रहण हो रहे हैं। पिछले कई दिनों से देश के अलग-अलग हिस्सों में लगातार भूकंप के झटके आ रहे हैं और आगे भी इसका खतरा बना रहेगा। भारत और चीन के बीच सिक्किम सेक्टर में पिछले कई दिनों से तनाव है. जहां भूटान सीमा के पास चीन सड़क बनाने की तैयारी कर रहा है. चीन की तरफ से लगातार उकसावे वाले बयान आ रहे हैं. वहां के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अगर भारत की तरफ से विवाद का निपटारा सही तरीके से नहीं हुआ, तो जंग छिड़ सकती है.
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने तो यहां तक कह दिया कि अगर जंग हुई तो भारत का 1962 से बुरा हाल होगा. लगातार भड़काऊ बयान से दोनों देशों के संबंध काफ़ी तनावपूर्ण दौर में हैं. एक और रिपोर्ट में कहा गया कि अगर भारत ने सेना नहीं हटाई तो उसे बलपूर्वक खदेड़ दिया जाएगा.
तो क्या ये माना जाए कि भारत और चीन के बीच जंग के आसार हैं.अगली पोस्ट में जानते हैं आचार्य राजेश

मंगलवार, 2 जून 2020

ग्रहण को लेकर मन में हैं शंकाएं, पढ़ें वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय विश्लेषण Surya Grahan 2020


मित्रों ग्रहण पर मैं पहले भी पोस्ट कर चुका हूं लेकिन एक astrologer होने के नाते मित्र दोस्त आस पड़ोस के लोग और रिश्तेदार यह सभी बार-बार सूर्यग्रहण को लेकर पूछ रहे हैं तो आज फिर से एक पोस्ट कर रहा हूं जिसमें सब कुछ बहुत ही डिटेल में बताया जाएगा। मित्रों इस साल का पहला सूर्यग्रहण 21 जून रविवार काे हाेगा।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, 21 जून को सदी का सबसे बड़ा कंकणाकृति सूर्य ग्रहणओर सदी का सबसे बड़ा ग्रहण होने के कारण इस पर शोध भी होगा। जबकि इसके प्रभाव के चलते दिन में अंधेरा छा जाएगा। साथ ही दिन में तारे भी दिखाई देंगे।इसका असर बहुत अच्‍छा नहीं मिलने जा रहा है। पहले से ही नाजुक दौर से गुजर रही अर्थव्यवस्था में और गिरावट आने के संकेत हैं। मृत्युदर और बढ़ोतरी हो सकती है। तूफान और भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी आ सकती हैं।
यह सूर्य ग्रहण मृगशिरा नक्षत्र और मिथुन राशि में होगा। जिनका जन्म नक्षत्र मृगशिरा और जन्म राशि या जन्म लग्न मिथुन है। उनके लिए यह विशेष अरिष्ट फल प्रदान करने वाला होगा। मिथुन लग्न मृगशिरा नक्षत्र और मिथुन राशि वालों को अपनी कुंडली जरूर किसी अच्छे ज्योतिषाचार्य को दिखानी चाहिए ‌।ग्रहण सुबह 9:16 बजे शुरू हाेगा। वलयाकार स्थिति सुबह 10.16 बजे शुरू हाेगी। यह दाेपहर 2.02 बजे तक रहेगी। इसके बाद आंशिक स्थितिदाेपहर 3.04 बजे खत्म होगी।
आषाढ़ महीने में 5 शनिवार होने से महंगाई बढ़ सकती है जबकि 5 रविवार का होना शोक संताप को बढ़ाने वाला और कष्टकारी योग है। इसके चलते रोग संक्रमण बढ़ सकता है। लोगों में डर बढ़ेगा। देश में कई जगहों पर जीवन अस्त-व्यस्त हो सकता है। इसके अलावा आषाढ़ शुक्लपक्ष की पंचमी को मघा नक्षत्र और शुक्रवार होने से समुद्री तूफान की अशंका भी बन रही है।
आषाढ़ महीने में तिथि वार और पनक्षत्रों की विशेष स्थिति बन रही है। इस महीने में कई महत्वपूर्ण घटनाएं होने के योग बन रहे हैं। सूर्यग्रहण के अलावा 6 ग्रहों के वक्री होने से प्राकृतिक आपदाएं आने की आशंका है। इस दौरान ज्यादा बारिश, समुद्री चक्रवात, भूकंप, तूफान और महामारी से जन-धन की हानि का खतरा बन रहा है। इसके अलावा भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश में चक्रवात के साथ भयंकर बारिश हो सकती है21 जून आषाढ़ मास की अमावस्या ये ग्रहण भारत के अलावा नेपाल, पाकिस्तान, सऊदी अरब, यूऐई, एथोपिया तथा कोंगों में दिखाई देगा।
एक के बाद एक ग्रह अपनी चाल बदलकर बक्री हो रहे हैं वर्तमान में राहु मिथुन राशि में वक्री है, वहीं शनि व गुरु मकर राशि में वक्री हैं। इसके अलावा शुक्र वृषभ राशि में वक्री हो चल रहा है। इन चारों वक्री ग्रहों के साथ 18 जून से बुध अपनी ही राशि मिथुन राशि में वक्री होकर अशुभ फल बढ़ाएगा। ग्रहों की ये स्थिति देश-विदेश में आपदाएं और जन-धन हानि का संकेत दे रही हैं।
21june को सुर्य कर्क रेखा के ठीक ऊपर आ जाएगा। जिससे ये साल का सबसे बड़ा दिन भी होगा। ये सदी का दूसरा ऐसासूर्यग्रहण है, जो 21 जून को हो रहा है। इससे पहले 2001 में 21 जून को सूर्य ग्रहण हुआ था।हर सुर्य ग्रहण 18साल 11महीने 7दिन 47मिनट के वाद अपने को दोहराता है
21 जून, यानी रविवार को होने वाले सूर्य ग्रहण पर ग्रहों की ऐसी स्थिति बन रही है, बनेगा. ये ग्रहण बहुत महत्वपूर्ण होगा. इस ग्रहण से तीन ग्रह प्रभावित हो रहे हैं. राहु ग्रहण लगा रहा है, बुध सूर्य के साथ बैठा हुआ है और मंगल सूर्य को देख रहा है. इस दौरान अग्नि मजबूत होगीऐसी स्थिती 500 सालों में नहीं बनी। मित्रों कोई भी घटना अगर घटती है गोचर के अंदर तो अगर उसकी हम जन्म कुंडली बनाई जाए तो. उससे काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है। जैसे कि 10:16 पर स्पर्श होगा तो उस समय कि अगर कुंडली निकाली जाए तो सिंह लग्न की कुंडली बनती है। और लगन के ग्यारहवें भाव में मिथुन राशि के अंदर मृगशिरा नक्षत्र के अंदर यह ग्रहण योग हो रहा है।यह ग्रहण राहुग्रस्त है। मिथुन राशि में राहु सूर्य-चंद्रमा को पीड़ित कर रहा है। मंगल जल तत्व की राशि मीन में है और मिथुन राशि के ग्रहों पर दृष्टि डाल रहा है। इस दिन बुध, गुरु, शुक्र और शनि वक्री रहेंगे। राहु और केतु हमेशा वक्री ही रहते है। इन 6 ग्रहों की स्थिति के कारण ये सूर्य ग्रहण और भी खास हो गया सिह लग्न में मिथुन राशि में यह योग बनता है और यह South-eastदिशा जोन में है।ज्योतिष ग्रंथ बृहत्संहिताके अनुसार इस ग्रहण पर मंगल की दृष्टि पड़ने से देश में आगजनी, विवाद और तनाव की स्थितियां बन सकती हैं। आषाढ़ महीने में ये ग्रहण होने से मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, कश्मीर और दिल्ली ओर यमुना नदी के किनारे बसे शहरों पर भी वहीं अफगानिस्तान और चीन के लिए भी ग्रहण अशुभ रहेगा।12 में से 8 राशियों के लिए अशुभहै यहां पर मैं आपको बता दूं कि यह आप अपनी कुंडली में भी देखें तब ही ऐसा शुभ अशुभ फल का निर्णय लेवें[क्या करें और क्या नहीं
ग्रहण के समय घर से बाहर नहीं निकलें। ग्रहण से पहले स्नान करें। तीर्थों पर न जा सकें तो घर में ही पानी में गंगाजल मिलाकर नहाएं। ग्रहण के दौरान भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें। श्रद्धा के अनुसार दान करना चाहिए। कि मुहूर्त चिंतामणिग्रंथ के अनुसार सूर्य ग्रहण के दौरान सोना, यात्रा करना, पत्ते का छेदना, तिनका तोड़ना, लकड़ी काटना, फूल तोड़ना, बाल और नाखून काटना, कपड़े धोना और सिलना, दांत साफ करना, भोजन करना, शारीरिक संबंध बनाना, घुड़सवारी, हाथी की सवारी करना और गाय-भैंस का दूध निकालना। इन सब बातों की मनाही है।: इसे नग्न आंखों से देखने का प्रयास न करें. कई बार लोग इस सलाह को मजाक में उड़ा देते हैं, लेकिन यह आपकी आंखों के लिए बेहद ज़रूरी है. नग्न आंखों से ग्रहण देखने पर आंखों को नुकसान पहुंच सकता है गर्भवती महिला को आंखों से ग्रहण को नहीं देखना चाहिए. – ग्रहण के समय गर्भवती महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई, काटना या छीलने जैसे कार्य नहीं करना चाहिए. क्योंकि ऐसा करने से बच्चों के अंगों को क्षति पहुंच सकती है देखा जाए तो यह ग्रहणमृगशिरा नक्षत्र और मिथुन राशि में घटित होगा. मिथुन राशि के साथ-साथ कर्क, वृश्चिक और मीन राशि वालों के लिए भी परेशानी वाला रह सकता है. इन राशि वालों को सावधानी बरतने की जरूरत है.यह ग्रहण दोष नछतरो पर होगा मृगशिराके बाद आर्द्रा नक्षत्र में होगादो अपशकुन के साथ घटित होंगे. पहला यह है कि ग्रहण अयन परिवर्तन के दिन घटित हो रहा है, जब सूर्य का दक्षिणायन प्रारंभ होने जा रहा है अर्थात सूर्य देव सायं कर्क राशि में प्रवेश करते ही ग्रहण योग बनाएंगे. यह घटना एक चेतावनी देने वाली है. दूसरा अपशकुन धर्म और आस्था से जुड़ा हुआ है. जब सूर्य देव आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं तो पृथ्वी रजस्वला होती है और कामाख्या शक्तिपीठ, गुवाहाटी में तीन दिवसीय अम्बुवासी उत्सव प्रारम्भ होता है. मृगशिरा तथा आर्द्रा नक्षत्र एवं मिथुन राशि में पढ़ने वाले सूर्य ग्रहण को चूड़ामणि सूर्य ग्रहण कहते हैं। इस ग्रहण का सभी राशियों के लिए प्रभाव कैसा रहेगा अगली पोस्ट में

सोमवार, 1 जून 2020

Lunar And Solar Grahan/eclipse 2020: ग्रहण, जनिए सूतक काल का समय

https://youtu.be/2A7UF80uvVs
मित्रों 6 जून से 5 जुलाई के बीच दो चंद्र ग्रहणओर एक सुर्य ग्रहण लगेगा। 5 व 6 जून मांद्य चंद्र ग्रहण और 5 जुलाई को उप छाया ग्रहण लगेंगे। जो भारत ने दृश्य मान नहीं होने के कारण कम प्रभावशाली होगा। 21 जून को लग रहे सूर्य ग्रहण भारत में 99.4 % दृश्यमान परम ग्रास रहेगा। जिसमें चूड़ामणि सूर्य ग्रहण का अद्भुत नजारा होगा।
पंचांगीय दशा से यह सूर्य ग्रहण बेहद संवेदनशील और अशुभ स्थिति का निर्माण करने वाला होगा। जिसमें छह ग्रह एक साथ वक्री होकर संपूर्ण विश्व में बड़ी उथल-पुथल की स्थिति बनाएंगे। अभी एक पोस्ट लिख चुका हूं आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं महासागर में चीन की गतिविधियों से स्थिति तनावपूर्ण बनेगी। लगभग 5 घंटे 48 मिनट और 3 सेकंड के उक्त सूर्य ग्रहण के होने की बात बताई जा रही है।
जिसमें एक पॉजिटिव बात भी सामने आ रही है कि वर्तमान में कोरोनावायरस के संक्रमण व्याधि सूर्य ग्रहण से शुरू होकर इस सूर्य ग्रहण के गुजर जाने के बाद धीरे-धीरे कम होती जाएगी।58 वर्ष पूर्व वर्ष 1962 में ऐसी ही एक माह में तीन ग्रहणों की स्थिति बनी थी। जिसमें 17 जुलाई 1962 को मांद्य चंद्र ग्रहण, 31 जुलाई 1962 को सूर्य ग्रहण और 15 अगस्त 1962 को मांद्य चंद्रग्रहण हुआ था। मित्रोंपहला ग्रहण 5 जून को होगा। यह चंद्र ग्रहण रहेगा। इस वर्ष का यह दूसरा चंद्र ग्रहण है। इसके पहले 10 जनवरी को चंद्र ग्रहण लग चुका है। इसके बाद 21 जून को सूर्य ग्रहण लगेगा जो कि कंकणाकृति का होगा। यह भारत में नजऱ नहीं आएगा। तीसरा ग्रहण भी चंद्र ग्रहण है जो 5 जुलाई को लगेगा। एक माह में तीन ग्रहण केवल एक ग्रहण भारत में दिखाई देगा। एक माह में तीन ग्रहण का होना देश के लिए हितकारी नहीं है। 5 जून से 5 जुलाई 2020 के बीच मे तीन ग्रहण हैं।   चंद्रग्रहण - 5 जून , 2020

आरम्भ - रात्रि 11:15

अंत - रात्रि 2:34 ( 6 जून )

कुल अवधि - 3 घण्टे 19 मिनट

2. सूर्यग्रहण - 21 जून 2020

आरम्भ - सुबह 9:15

अंत - शाम 15:03

कुल अवधि - 5 घण्टा 48 मिनट

3. चंद्रग्रहण - 5 जुलाई 2020

आरम्भ - सुबह 8:37 मिनट

अंत - दिन 11:22 मिनट

कुल अवधि - 2 घण्टे 45 मिनट

( भारत में दृश्य नहीं है, इसलिए सूतक मान्य नहीं होगा, लेकिन साधना के लिए मान्य होगा )

तीन से ज्यादा ग्रहण आ जाएं तो एक चिंता का विषय बनता है

5 जून 2020 चंद्रग्रहण

प्रारंभ रात 11:15 मिनिट समाप्ति 6 जून सुबह 2:34 चंद्र ग्रहण जिसमे शुक्र वक्री और अस्त रहेगा गुरु शनि वक्री रहेंगे तो तीन ग्रह वक्री रहेंगे, जिसके कारण जिसके प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा। शेयर बाजार से जुड़े हुए लोग सावधान रहें। यह ग्रहण वृश्चिक राशि पर बुरा प्रभाव डालेगा। अगर कुंडली में भी अशुभ प्रभाव हो किसी भी तरह से

21 जून 2020 सूर्य ग्रहण

एक साथ 6 वक्री रहेंगे बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु यह छह ग्रह 21 जून 2020 को वक्री रहेंगे। इन छह ग्रह का वक्री होना यानी एक बहोत बड़ा तहलका मचाने वाला है।
5 जुलाई 2020 चंद्रग्रहण एक बहुत बड़ा परिवर्तन
मंगल का राशि परिवर्तन
सूर्य का राशि परिवर्तन
गुरु धन राशि मे वापस, लेकिन वक्री रहेंगे।
शुक्र मार्गी होगा24 जनवरी से शनि मकर राशि में गोचर है और मई से शनि की उल्टी चाल भी शुरू हो चुकी है. हालांकि सितंबर माह में केतु के राशि परिवर्तन और गुरु के साथ शनि के मार्गी हो जाने से इन हालातों में सुधार आने की भी संभावना है. सितंबर के आखिरी सप्ताह में देश में हालात पूरी तरह से अनुकूल हो सकते हैं और इस संक्रमण से मुक्ति मिलने के आसार हैं.

Lunar And Solar Grahan/eclipse 2020: ग्रहण,


मित्रों 6 जून से 5 जुलाई के बीच दो चंद्र ग्रहणओर एक सुर्य ग्रहण लगेगा। 5 व 6 जून मांद्य चंद्र ग्रहण और 5 जुलाई को उप छाया ग्रहण लगेंगे। जो भारत ने दृश्यhttps://youtu.be/2A7UF80uvVs मान नहीं होने के कारण कम प्रभावशाली होगा। 21 जून को लग रहे सूर्य ग्रहण भारत में 99.4 % दृश्यमान परम ग्रास रहेगा। जिसमें चूड़ामणि सूर्य ग्रहण का अद्भुत नजारा होगा।

पंचांगीय दशा से यह सूर्य ग्रहण बेहद संवेदनशील और अशुभ स्थिति का निर्माण करने वाला होगा। जिसमें छह ग्रह एक साथ वक्री होकर संपूर्ण विश्व में बड़ी उथल-पुथल की स्थिति बनाएंगे। अभी एक पोस्ट लिख चुका हूं आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं महासागर में चीन की गतिविधियों से स्थिति तनावपूर्ण बनेगी। लगभग 5 घंटे 48 मिनट और 3 सेकंड के उक्त सूर्य ग्रहण के होने की बात बताई जा रही है।
जिसमें एक पॉजिटिव बात भी सामने आ रही है कि वर्तमान में कोरोनावायरस के संक्रमण व्याधि सूर्य ग्रहण से शुरू होकर इस सूर्य ग्रहण के गुजर जाने के बाद धीरे-धीरे कम होती जाएगी।58 वर्ष पूर्व वर्ष 1962 में ऐसी ही एक माह में तीन ग्रहणों की स्थिति बनी थी। जिसमें 17 जुलाई 1962 को मांद्य चंद्र ग्रहण, 31 जुलाई 1962 को सूर्य ग्रहण और 15 अगस्त 1962 को मांद्य चंद्रग्रहण हुआ था। मित्रोंपहला ग्रहण 5 जून को होगा। यह चंद्र ग्रहण रहेगा। इस वर्ष का यह दूसरा चंद्र ग्रहण है। इसके पहले 10 जनवरी को चंद्र ग्रहण लग चुका है। इसके बाद 21 जून को सूर्य ग्रहण लगेगा जो कि कंकणाकृति का होगा। यह भारत में नजऱ नहीं आएगा। तीसरा ग्रहण भी चंद्र ग्रहण है जो 5 जुलाई को लगेगा। एक माह में तीन ग्रहण केवल एक ग्रहण भारत में दिखाई देगा। एक माह में तीन ग्रहण का होना देश के लिए हितकारी नहीं है। 5 जून से 5 जुलाई 2020 के बीच मे तीन ग्रहण हैं। चंद्रग्रहण - 5 जून , 2020

आरम्भ - रात्रि 11:15

अंत - रात्रि 2:34 ( 6 जून )

कुल अवधि - 3 घण्टे 19 मिनट

2. सूर्यग्रहण - 21 जून 2020

आरम्भ - सुबह 9:15

अंत - शाम 15:03

कुल अवधि - 5 घण्टा 48 मिनट

3. चंद्रग्रहण - 5 जुलाई 2020

आरम्भ - सुबह 8:37 मिनट

अंत - दिन 11:22 मिनट

कुल अवधि - 2 घण्टे 45 मिनट

( भारत में दृश्य नहीं है, इसलिए सूतक मान्य नहीं होगा, लेकिन साधना के लिए मान्य होगा )

तीन से ज्यादा ग्रहण आ जाएं तो एक चिंता का विषय बनता है

5 जून 2020 चंद्रग्रहण

प्रारंभ रात 11:15 मिनिट समाप्ति 6 जून सुबह 2:34 चंद्र ग्रहण जिसमे शुक्र वक्री और अस्त रहेगा गुरु शनि वक्री रहेंगे तो तीन ग्रह वक्री रहेंगे, जिसके कारण जिसके प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा। शेयर बाजार से जुड़े हुए लोग सावधान रहें। यह ग्रहण वृश्चिक राशि पर बुरा प्रभाव डालेगा। अगर कुंडली में भी अशुभ प्रभाव हो किसी भी तरह से

21 जून 2020 सूर्य ग्रहण

एक साथ 6 वक्री रहेंगे बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु यह छह ग्रह 21 जून 2020 को वक्री रहेंगे। इन छह ग्रह का वक्री होना यानी एक बहोत बड़ा तहलका मचाने वाला है।
5 जुलाई 2020 चंद्रग्रहण एक बहुत बड़ा परिवर्तन
मंगल का राशि परिवर्तन
सूर्य का राशि परिवर्तन
गुरु धन राशि मे वापस, लेकिन वक्री रहेंगे।
शुक्र मार्गी होगा24 जनवरी से शनि मकर राशि में गोचर है और मई से शनि की उल्टी चाल भी शुरू हो चुकी है. हालांकि सितंबर माह में केतु के राशि परिवर्तन और गुरु के साथ शनि के मार्गी हो जाने से इन हालातों में सुधार आने की भी संभावना है. सितंबर के आखिरी सप्ताह में देश में हालात पूरी तरह से अनुकूल हो सकते हैं और इस संक्रमण से मुक्ति मिलने के आसार हैं.


Lunar And Solar Grahan/eclipse 2020: ग्रहण, जनिए सूतक काल का समय

https://youtu.be/2A7UF80uvVs

Lunar And Solar Grahan/eclipse 2020: ग्रहण,


मित्रों 6 जून से 5 जुलाई के बीच दो चंद्र ग्रहणओर एक सुर्य ग्रहण लगेगा। 5 व 6 जून मांद्य चंद्र ग्रहण और 5 जुलाई को उप छाया ग्रहण लगेंगे। जो भारत ने दृश्यhttps://youtu.be/2A7UF80uvVs मान नहीं होने के कारण कम प्रभावशाली होगा। 21 जून को लग रहे सूर्य ग्रहण भारत में 99.4 % दृश्यमान परम ग्रास रहेगा। जिसमें चूड़ामणि सूर्य ग्रहण का अद्भुत नजारा होगा।

पंचांगीय दशा से यह सूर्य ग्रहण बेहद संवेदनशील और अशुभ स्थिति का निर्माण करने वाला होगा। जिसमें छह ग्रह एक साथ वक्री होकर संपूर्ण विश्व में बड़ी उथल-पुथल की स्थिति बनाएंगे। अभी एक पोस्ट लिख चुका हूं आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं महासागर में चीन की गतिविधियों से स्थिति तनावपूर्ण बनेगी। लगभग 5 घंटे 48 मिनट और 3 सेकंड के उक्त सूर्य ग्रहण के होने की बात बताई जा रही है।
जिसमें एक पॉजिटिव बात भी सामने आ रही है कि वर्तमान में कोरोनावायरस के संक्रमण व्याधि सूर्य ग्रहण से शुरू होकर इस सूर्य ग्रहण के गुजर जाने के बाद धीरे-धीरे कम होती जाएगी।58 वर्ष पूर्व वर्ष 1962 में ऐसी ही एक माह में तीन ग्रहणों की स्थिति बनी थी। जिसमें 17 जुलाई 1962 को मांद्य चंद्र ग्रहण, 31 जुलाई 1962 को सूर्य ग्रहण और 15 अगस्त 1962 को मांद्य चंद्रग्रहण हुआ था। मित्रोंपहला ग्रहण 5 जून को होगा। यह चंद्र ग्रहण रहेगा। इस वर्ष का यह दूसरा चंद्र ग्रहण है। इसके पहले 10 जनवरी को चंद्र ग्रहण लग चुका है। इसके बाद 21 जून को सूर्य ग्रहण लगेगा जो कि कंकणाकृति का होगा। यह भारत में नजऱ नहीं आएगा। तीसरा ग्रहण भी चंद्र ग्रहण है जो 5 जुलाई को लगेगा। एक माह में तीन ग्रहण केवल एक ग्रहण भारत में दिखाई देगा। एक माह में तीन ग्रहण का होना देश के लिए हितकारी नहीं है। 5 जून से 5 जुलाई 2020 के बीच मे तीन ग्रहण हैं। चंद्रग्रहण - 5 जून , 2020

आरम्भ - रात्रि 11:15

अंत - रात्रि 2:34 ( 6 जून )

कुल अवधि - 3 घण्टे 19 मिनट

2. सूर्यग्रहण - 21 जून 2020

आरम्भ - सुबह 9:15

अंत - शाम 15:03

कुल अवधि - 5 घण्टा 48 मिनट

3. चंद्रग्रहण - 5 जुलाई 2020

आरम्भ - सुबह 8:37 मिनट

अंत - दिन 11:22 मिनट

कुल अवधि - 2 घण्टे 45 मिनट

( भारत में दृश्य नहीं है, इसलिए सूतक मान्य नहीं होगा, लेकिन साधना के लिए मान्य होगा )

तीन से ज्यादा ग्रहण आ जाएं तो एक चिंता का विषय बनता है

5 जून 2020 चंद्रग्रहण

प्रारंभ रात 11:15 मिनिट समाप्ति 6 जून सुबह 2:34 चंद्र ग्रहण जिसमे शुक्र वक्री और अस्त रहेगा गुरु शनि वक्री रहेंगे तो तीन ग्रह वक्री रहेंगे, जिसके कारण जिसके प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा। शेयर बाजार से जुड़े हुए लोग सावधान रहें। यह ग्रहण वृश्चिक राशि पर बुरा प्रभाव डालेगा। अगर कुंडली में भी अशुभ प्रभाव हो किसी भी तरह से

21 जून 2020 सूर्य ग्रहण

एक साथ 6 वक्री रहेंगे बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु यह छह ग्रह 21 जून 2020 को वक्री रहेंगे। इन छह ग्रह का वक्री होना यानी एक बहोत बड़ा तहलका मचाने वाला है।
5 जुलाई 2020 चंद्रग्रहण एक बहुत बड़ा परिवर्तन
मंगल का राशि परिवर्तन
सूर्य का राशि परिवर्तन
गुरु धन राशि मे वापस, लेकिन वक्री रहेंगे।
शुक्र मार्गी होगा24 जनवरी से शनि मकर राशि में गोचर है और मई से शनि की उल्टी चाल भी शुरू हो चुकी है. हालांकि सितंबर माह में केतु के राशि परिवर्तन और गुरु के साथ शनि के मार्गी हो जाने से इन हालातों में सुधार आने की भी संभावना है. सितंबर के आखिरी सप्ताह में देश में हालात पूरी तरह से अनुकूल हो सकते हैं और इस संक्रमण से मुक्ति मिलने के आसार हैं.


रविवार, 10 मई 2020

समुंदर मंथन में छिपा गहरा राज रहस्य-2

https://youtu.be/jNaWy6N2GuEसमुद्र मंथन में छिपा जीवन का उपदेश


मित्रों पहली पोस्ट में हमने कथा पर चर्चा की लेकिनइस पौराणिक कथा का आध्यात्मिक संबध भी है| यह कथा सभी के लिए मार्गदर्शक है| आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो समुद्र का अर्थ है शरीर और मंथन से अमृत और विष दोनों निकलते हैं|मित्रों
इस कहानी के किरदार हमारे जीवन से मेल खाते हैं जैसे देवता सकारात्मक सोच और समझ को दर्शाते हैं वहीं असुर नकारात्मक सोच एवं बुराइयों के प्रतीक हैं|
समुद्र हमारे दिमाग के समान दिखाया गया है जिसमें कई तरह के विचारों एवं इच्छाओं की उतपत्ति होती है और समुद्र की लहरों के समान यह भी समय-समय पर बदल जाती हैं|
मंदार, अर्थात मन और धार, पर्वत आपकी एकाग्रता को दर्शाता है। क्योंकि यह एक धार यानि एक ही दिशा में सोचने की बात कहता है|
कथा में कछुआ यानि विष्णु जी ने अहंकार को हटा कर समुद्र मंथन का सारा भर अपनी पीठ पर लिया , ऐसे ही हमे भी अहंकार को हटा कर सबके हित में अथवा एकाग्रता की राह पर चलना चाहिए|
विष या हलाहल जीवन से जुड़े दुःख और परेशानियों का प्रतीक है| विष को पीने वाले महादेव बाधाओं को दूर करना सिखाते हैं|
मोहिनी यानि ध्यान का भटकना जो हमें हमारे लक्ष्य से दूर करती है|
अमृत दर्शाता है हमारे लक्ष्य को यानि जीवन का सार
मंथन के दौरान पाई जाने वाली वस्तुऐं सिद्धियों का प्रतीक हैं| यह सिद्धियां भौतिक दुःख दूर करने के बाद प्राप्त होती हैं|दरअसल, हजारों सालों से यह प्रसंग केवल धार्मिक नजरिए से ही नहीं बल्कि इसमें समाए जीवन को साधने वाले सूत्रों के लिए भी अहमियत रखता है।
आज भी कई धर्म परंपराएं इसी प्रसंग से जुड़े कई पहलुओं के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। महाकुंभ में उमड़ता जलसैलाब हो या धन कामना के लिए लक्ष्मी पूजा, सभी के सूत्र समुद्र की गहराई से निकले इन अनमोल रत्नों व उनमें समाए प्रतीकात्मक ज्ञान से जुड़े हैं।
आप इस प्रसंग को धार्मिक रीति-रिवाजों या अन्य किसी जरिए से सुनते हैं, लेकिन कई लोग खासतौर पर युवा पीढ़ी समुद्र मंथन की वजह, उससे निकली बेशकीमती रत्नों व उनकी अनूठी खूबियों और इस घटना से जुड़ी कई रोचक बातों से अनजान है।
देव-दानवों ने समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत का मथनी और वासुकि नाग को रस्सा (नेति या सूत्र) बनाया। स्वयं भगवान ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल को डुबने से बचाया। असल में, व्यावहारिक नजरिए से इस घटना से जुड़े प्रतीकात्मक सबक हैं। मसलन, संसार समुद्र हैं, इसमें मंदराचल पर्वत की तरह मन को स्थिर करने के लिए कछुए रूपी भगवान की भक्ति का सहारे वासुकि नाग के प्रेम रूपी सूत्र से जीवन का मंथन करें। इस तरह इससे निकला ज्ञान रूपी अमृत पीने वाला ही अमर हो जाता है।
देव-दानवों ने समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत का मथनी और वासुकि नाग को रस्सा (नेति या सूत्र) बनाया। स्वयं भगवान ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल को डुबने से बचाया। असल में, व्यावहारिक नजरिए से इस घटना से जुड़े प्रतीकात्मक सबक हैं। मसलन, संसार समुद्र हैं, इसमें मंदराचल पर्वत की तरह मन को स्थिर करने के लिए कछुए रूपी भगवान की भक्ति का सहारे वासुकि नाग के प्रेम रूपी सूत्र से जीवन का मंथन करें। इस तरह इससे निकला ज्ञान रूपी अमृत पीने वाला ही अमर हो जाता है।
उच्चै:श्रवा घोड़ा - समुद्र मंथन से अश्वजाति में श्रेष्ठ, चन्द्रमा की तरह सफेद व चमकीला, मजबूत कद-काठी का दिव्य घोड़ा उच्चै:श्रवा प्रकट हुआ, जो दैत्यों के हिस्से गया और इसे दैत्यराज बलि ने ले लिया।
उच्चै:श्रवा में श्रवा का मतलब ख्याति या कीर्ति भी है। यानी जो मन का स्थिर रख काम करे वह मान व पैसा भी कमाता है। किंतु जो केवल कीर्ति के पीछे भागे उसे फल यानी अमृत नहीं मिलता। दैत्यों के साथ भी ऐसा ही हुआ।
ऐरावत हाथी - चार दांतों वाला अद्भुत हाथी, जिसके दिव्य रूप व डील-डौल के आगे कैलाश पर्वत की महिमा भी कुछ भी नहीं। स्कन्दपुराण के मुताबिक ऐरावत के सिर से मद बह रहा था और उसके साथ 64 और सफेद हाथी भी मंथन से निकले। ऐरावत को देवराज ने प्राप्त किया।
असल में हाथी की आंखे छोटी होती है। इसलिए ऐरावत, पैनी नजर या गहरी सोच का प्रतीक है। संकेत है कि शरीर सुख ही नहीं आत्मा की और भी ध्यान दें।
कौस्तुभ मणि - सभी रत्नों के सबसे श्रेष्ठ व अद्भुत रत्न। इसकी चमक सूर्य के समान होकर त्रिलोक को प्रकाशित करने वाली थी। देवताओं को मिला यह रत्न भगवान विष्णु के स्वरूप अजीत ने अपनी हृदयस्थल पर धारण करने के लिए प्राप्त किया।
कल्पवृक्ष - स्वर्गलोक की शोभा माने जाने वाला कल्पवृक्ष। इसकी खासियत यह थी कि मांगने वालें को उसकी इच्छा के मुताबिक चीजें देकर हर इच्छा पूरी करता है।
अप्सराएं - सुन्दर वस्त्रों से सजीं और गले में सोने के हार पहनीं, मादक चाल-ढाल व मुद्राओ वाली अप्सराओं को, जिनमें रम्भा प्रमुख थी को देवताओं ने अपनाया।
महालक्ष्मी - समुद्र मंथन से निकली साक्षात मातृशक्ति व महामाया महालक्ष्मी के तेज व सौंदर्य, रंग-रूप ने सभी को आकर्षित किया। लक्ष्मीजी को मनाने के लिए सभी जतन करने लगे। किसे अपनाएं यह सोच लक्ष्मीजी ऋषियों के पास गई, किंतु ज्ञानी, तपस्वी होने पर क्रोधी होने से उन्हें नहीं चुना।
इसी तरह देवताओं को महान होने पर भी कामी, मार्कण्डेयजी को चिरायु होने पर भी तप में लीन रहने, परशुराम जी को जितेन्द्रिय होने पर भी कठोर होने की वजह से नहीं चुना।
आखिर में लक्ष्मीजी ने शांत, सात्विक, सारी शक्तियों के स्वामी और कोमल हृदय होने से भगवान विष्णु को वरमाला पहनाई। संदेश यही है कि जिनका मन साफ और सरल होता है उन पर लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
चन्द्रमा - स्कन्दपुराण के मुताबिक सागर मंथन से संपूर्ण कलाओं के साथ चन्द्रमा भी प्रकट हुए। ग्रह-नक्षत्रों के ज्ञाता गर्ग मुनि ने बताया कि चन्द्र के प्राकट्य से विजय देने वाला गोमन्त मुहूर्त बना है, जिसमें चन्द्र का गुरु से योग के अलावा बुध, सूर्य, शुक्र, शनि व मंगल से भी चन्द्र की युति शुभ है।
वारुणी (मदिरा) - सुन्दर आंखों वाली कन्या के रूप में वारुणी देवी प्रकट हुई, जो दैत्यों ने प्राप्त की।
पारिजात - इस वृक्ष की खासियत यह बताई गई है कि इसको छूने से ही थकान मिट जाती है। मान्यता है कि स्वर्ग की अप्सराएं व नर्तकियां भी इसे छूकर अपनी थकान मिटाती थीं। समुद्र मंथन वास्तविक है, और कहानी का गहरा अर्थ है।
समुद्र मानव शरीर का चित्रण है।
मंथन सुमेरु पर्वत से होता है जो मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) का चित्रण है जो सभी साधनाओं का आधार है।
इसका आधार कुर्म या कछुआ द्वारा प्रदान किया जाता है क्योंकि एक साधक को साधना में प्रगति करने के लिए अपनी इंद्रियों को काबु में रखना पड़ता है। समुद्र मंथन का अगर सांकेतिक या दार्शनिक अर्थ आप कई निकाल सकते है हर व्यक्ति अपनी मानसिकता के अनुसार इसका अभिप्राय निकलेगा।

जैसे इसका आध्यात्मिक अर्थ अगर आप निकाले तो ये किसी साधक की अवस्था को दर्शाता है जैसे कूर्म अवतार विष्णु जी का जिसने मंदराचल पर्वत को आधार दिया यानी अगर साधना शुरु करनी हो तो एक आधार यानी गुरु चाहिए जो आपकी सहायता कर सके।

दूसरा वासुकि नाग दर्शाता है उस साधना सूत्र को जिसको लेके आप साधना करेगे यांनी जिस विधि को आप साधेंगे चाहे वो मंत्र हो योग हो ध्यान हो उस विधि का आप बार बार अभ्यास करेगे जो नाग को मथने के समान है।
तीसरा देवता और दानव हमारे चित्त को दर्शाते हैं चित्त यानी मन और बुद्धि का समन्वय मन दानव को दर्शाता है यानी जो दुष्टता दिखाता है जिसको सही गलत से कोई मतलब नही है जिसको सिर्फ अनुभव चाहिए जिसको सिर्फ अपना स्वार्थ देखना है। वही बुद्धि देवता का प्रतीक है बुद्धि में विवेक होता है विवेक बताता है क्या काम हमारे लिए सही है क्या गलत है। तो देव दानव मन बुद्धि की खींचातानी को दर्शाते हैं।मन जीतता है तब हम गलत काम करते है जब बुद्धि जीतती है तो हम सही काम करते है।
चौथा समुद्र मंथन में नाना प्रकार की चीजें निकलती है जो साधना से उत्त्पन्न होने वाले फल को दर्शाता है जिससे साधक के मन मे लोभ आता है विष भी निकलता है जिसे शिव पीते है यानी साधना में जो भी विघ्न पैदा होता है उसका निराकरण आपका इष्ट करता है।
फिर अंत मे अमृत निकलता है यानी आप लक्ष्य के करीब पहुच गए है लेकिन सिर्फ करीब पहुचे है प्राप्त नही हुआ है ।फिर अंत मे भटकाने के लिए मोहनी आती है जो कि देवता को यानी बुद्धि को अमृत पिलाती है यानी जो उस अंतिम समय मे बुद्धि से काम ले लेता है वो अमृत पी लेता है यानी सफलता प्राप्त कर लेता है लेकिन एक दानव भी अमृत पी लेता है यानी कोई कोई मन से यानी छल से कपट से भी सफलता प्राप्त कर लेते है फिर भगवान उनको 2 टुकड़ो में काट देते है यानी ऐसी सफलता जो छल पूर्वक आये उसका अंत अच्छा नही होता या वो ज्यादा देर टिकती नही है।

ये बात किसी साधक और किसी विद्यार्थी पे भी लागू होती है।

ये मेरी मौलिक सोच है इसमें कुछ गलत भी हो सकता है या किसी को अच्छा न लगे उसके लिए क्षमा चाहूगां। आचार्य राजेश

समुद्र कथा में छुपे गहरे रहस्य-1

https://youtu.be/jNaWy6N2GuE
समुद्र मंथन – हमारे धर्म की पौराणिक कथाओं में वैसे तो कई कथाएँ प्रचलित हैं…

लेकिन देवता और दानवों द्वारा कियें गया समुद्र मंथन की कहानी सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं.

कहा जाता हैं कि मंदार पर्वत को शेषनाग से बांधकर समुद्र का मंथन किया गया था और उस मंथन में समुद्र से ऐसी कई चीज़े प्राप्त हुई थी, जो बहुत अमूल्य थी. मंथन से प्राप्त चीजों में से एक चीज़ अमृत भी थी, जिसे लेकर देवताओं और असुरों में देवासुर युद्ध हुआ था और भगवान विष्णु की मदद से देवता इस युद्ध में अमृत को पाकर विजय प्राप्त कर पाए थे.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि समुद्र का मंथन करने की बात देवतों के मन में आई कैसी थी? इस पुरे वाकये के पीछे एक रोचक कहानी हैं जिसे आज हम आपको बतायेंगे.

विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार एक बार देवराज इन्द्र अपनी किसी यात्रा से बैकुंठ लोक वापस लौट रहे थे और उसी समय दुर्वासा ऋषि बैकुंठ लोक से बाहर जा रहे थे. दुर्वासा ऋषि ने ऐरावत हाथी में बैठे इन्द्रदेव को देखा तो उन्हें भ्रम हुआ कि हाथी में बैठा व्यक्ति त्रिलोकपति भगवान् विष्णु हैं. अपने इस भ्रम को सही समझ कर दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र को फूलों की एक माला भेंट की लेकिन अपने मद और वैभव में डूबे देवराज इन्द्र वह माला अपने हाथी ऐरावत के सिर पर फेंक दी और ऐरावत हाथी ने भी अपना सिर झटक कर उस माला को ज़मीन पर गिरा दिया जिससे वह माला ऐरावत के पैरों तले कुचल गयी.

दुर्वासा ऋषि ने जब इन्द्र की इस हरकत को यह देखा तो क्रोधित हो गए. उन्होंने ने इन्द्र द्वारा किये गए इस व्यवहार से खुद का अपमान तो समझा ही साथ ही इसे देवी लक्ष्मी का भी अपमान समझा.

इन्द्र द्वारा किये गए इस अपमान के बाद दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र की श्रीहीन होने का श्राप दे डाला. ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कुछ ही समय बाद इन्द्र का सारा वैभव समुद्र में गिर गया और दैत्यों से युद्ध हारने पर उनका स्वर्ग से अधिकार छीन लिया गया.

अपनी इस दशा से परेशान होकर सभी देवता इंद्रदेव के साथ भगवान् विष्णु के पास पहुचे और इस समस्या का समाधान पूछा. तब भगवान् ने देवताओं को समुद्र मंथन कर स्वर्ग का सम्पूर्ण वैभव वापस पाने और मंथन से निकलने वाले अमृत का उपभोग करने का रास्ता सुझाया.

देवताओं को भगवान् विष्णु द्वारा सुझाया गया यह मार्ग स्वीकार था लेकिन इस समाधान में एक दिक्कत यह थी कि समुद्र मंथन अकेले देवताओं के बस की बात नहीं थी उन्हें इसमें दैत्यों को भी शामिल करना आवश्यक था. देवता नारायण की इस बात के लिए राजी हो गए और उन्होंने दानवो के साथ मिल कर समुद्र मंथन कियमान्यता हैं कि समुद्र मंथन से अमृत के अलावा धन्वन्तरी, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ मणि, दिव्य शंख, वारुणी या मदिरा, पारिजात वृक्ष, चंद्रमा, अप्सराएं, उचौ:श्राव अश्व, हलाहल या विष और कामधेनु गाय भी प्राप्त हुई थी. लेकिन अमृतपान के लिए देवता और असुरों में युद्ध हुआ था. भगवान् विष्णु की मदद से देवताओं ने यह युद्ध जीत लिया और अंततः देवताओं को अमृत की प्राप्ति हो पाई थी.

शुक्रवार, 1 मई 2020

शनि केतु की युति

https://youtu.be/RH_hA1GD-UA
मित्रों आज हम चर्चा करेंगे शनि और केतु ग्रह की युति पर शनि ग्रह और केतु ग्रह की युति को समझने के लिए सर्वप्रथम हमें दोनों ग्रहों को समझना होगा। शनि ग्रह आयु, न्याय, नौकरी, सेवा, अपमान, और निष्ठा के कारक ग्रह है। ये कारावास के भी कारक ग्रह है। एवं केतु को रहस्यमयी विषयों का कारक ग्रह माना गया है। यह मोक्ष कारक ग्रह भी है्।
केतु को मंगल के समान माना गया है, राहु केतु एक दूसरे के पूरक है मित्रों केतु एवं शनि दोनों ही व्यक्ति ग्रहों को आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर करने वाला और मार्गदर्शन करने वाला माना गया है, शनि ग्रहों की प्रवृत्ति है की पापी व्यक्तियों को सजा, कष्ट देकर कठिन सबक देते है। शनि जहाँ व्यक्ति को सबसे अलग थलग कर देता है, वही केतु रिश्तों का त्याग कर वैराग्य देता है। केतु हमें अतीत को फिर से देखने के लिए मजबूर करता है। जैसा की सर्वविदित है की शनि अपनी साढ़ेसाती, शनि ढैय्या अथवा अपने गोचर के समय व्यक्ति को अपने किए गए कर्मों की जिम्मेदारी लेने और सात्विक मार्ग का चयन कर, सही कार्य करने के लिए मजबूर कर देता है।शनि ग्रह और केतु दोनों ग्रहों का एक सिद्धांत जो एकसमान है वह है- “जो बोया है वही काटना पडेगा” अर्थात अपने पाप कर्मों की सजा स्वयं ही भुगतनी होगी। “अपनी गंदगी स्वयं ही साफ करनी होगी”। यह उक्ति उन लोगों के लिए एक सन्देश है जो वर्त्तमान में मानसिक, शारीरिक और आर्थिक कष्ट झेल रहे है। जो जीवन परिस्थितियों से हताश और निराश हो चुके है। जिन्हें अतीत ने चोट पहुंचाई है, पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का फल जो इस जन्म में कष्टों के रूप में प्राप्त कर चुका रहे है। शनि केतु युति का यह मेल कर्मों की सफाई या कर्ज चुकाना अथवा कठिन समय से सीख लेने वाला भी माना जा सकता है.कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमारे जीवन का कोई घाव हमारी मानसिक शान्ति को बार बार भंग करता है। ऐसे अतीत से बाहर आने के लिए आवश्यक है की पुरानी सारी बातों को भूल जाया जाए और अतीत को पकड़ कर ना रखा जाएँ। पुराने ऋणों का भुगतान करने के लिए इस जन्म में आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। शनि हमें सांसारिक जिम्मेदारियों से जोड़े रखता है, हमें कष्ट देकर हमारी सहनशक्ति को बेहतर करता है। शनि और केतु दोनों व्यक्ति को अतीत के दुःख-दर्दों से बचने के लिए आश्रम की और भागने की प्रवृति देते हैं। जो लोग देश की जगह विदेश में रहने के इच्छुक है। यह योग ऐसे लोगों के लिए अनुकूल साबित होता हैकेतु ग्रह का स्वभाव है की वह दुनिया का सामना करने से बचना चाहता है। सफलता प्राप्ति के लिए वह कठिन परिश्रम करने से बचना चाहता है। इसके लिए गृहस्थ जीवन का त्याग कर सन्यास जीवन ग्रहण करता है। पूरे समय ध्यान और साधना में समय व्यतीत करता है और दुनिया की जिम्मेदारियों से नहीं निपटता है। शनि और केतु का एक साथ होना बड़ी संख्या में जातकों को पारिवारिक जीवन से हटाकर सन्यास, आश्रम जीवन की ओर लेकर जा सकता है। अवचेतन मन की चुनौतियों का ज्ञान देता है। मय बलवान होता है। हमें सभी शुभ फल की प्राप्ति होती है तथा किसी समय हमारे लिए निराशा का भी क्षण होता है।शनि के साथ केतु है तो काला कुत्ता कहा जाता है,शनि ठंडा भी है और अन्धकार युक्त भी है, दोस्तोंशनि राहु केतु के साथ के बिना कोई शुक्र सडक पर नही चल सकता है,शुक्र गाडी है,खाली शुक्र शनि है तो भार वाहक गाडी है,शुक्र के साथ राहु है तो सजी हुई गाडी है,गुरु का प्रभाव है तो हवाई जहाज भी है,केतु अगर कर्क के संचरण में है तो चार पहिये की गाडी है,वृश्चिक के संचरण में है तो आठ पहिये की गाडी है,और अगर किसी प्रकार से तुला या वृष का है तो दो पहिये के अलावा कुछ सामने नही आता है,गुरु केतु और शुक्र सही जगह पर है तो जातक हवाई जहाज उडाने की हैसियत रखता है,और अगर वह नकारात्मक पोजीसन में है तो जातक को पतंग उडाना सही रूप से आता होगा, आज इतना ही मित्रों बाकी अगले लेख के माध्यम से चर्चा करें आचार्य राजेश

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

#Planet#TransitIn #May&June2020

https://youtu.be/2A7UF80uvVsAstro Guru आचार्य राजेश कुमार
Planet Transit In May &June 2020:
By acharyaRajeshkumar
Planet Transit in May 2020:
 
मित्रों मई माह में कई ग्रह अपनी चाल बदलेंगे। इन ग्रहों में सूर्य, मंगल, बुध शामिल हैं। इस महीने बुध दो बार अपनी राशि बदलेगा। इसके साथ ही गुरु, शुक्र और शनि ग्रह वक्री होंगे। इन सभी ग्रहों की चाल का प्रभाव आप सभी के ऊपर शुभाशुभ रूप में पड़ेगा।4 मईको मंगल ग्रह कुंभ राशि में प्रवेश करेगा। इस राशि में यह 18 जून 2020 तक रहेगा। बुध ग्रह 9 मई को वृषभ राशि में प्रवेश करेगा।14 मई को सूर्य का मेष राशि से वृषभ राशि में प्रवेश होगा। सूर्य इस राशि में 15 जून 2020 तक रहेगा।25 मई को बुध अपनी स्वराशि में प्रवेश करेगा।11 मई को शनि वक्री होंगे। उनकी यह वक्री चाल 142 दिन तक रहेगी। इसके बाद 29 सितंबर को फिर से मार्गी हो जाएंगे। ज्योतिष में शनि का गोचर, वक्री और मार्गी होना बहुत ही महत्व होता है। इसका प्रभाव सभी पर पड़ता है 13 मई को शुक्र ग्रह वक्री होंगे। इसके बाद 25 जून 2020 को शुक्र मार्गी होगा। 14 तारीख को गुरु वक्री चाल चलेंगे और फिर 13 सितंबर 2020 को वह मार्गी होंगे। राहु केतु सदा ही बक्री चाल चलते हैंकुल 6ग्रह बक्री गति से होंगे प्लुटो सहित 7ग्रह होगेबक्री ग्रह अक्सर अप्रत्याशित रूप से अच्छे और बुरे दोनों परिणाम देते हैं। प्रतिगामी गति में ग्रह पृथ्वी के अधिक निकट होते हैं। इसलिए उनका प्रभाव अधिक महसूस होता है। प्रतिगामी गति में ग्रहों के कारक तत्वों की कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति में कुंडली के जिस घर में वक्री ग्रह होते हैं उनके परिणाम समुचित नहीं दे पाते हैं। इसलिए जब ग्रह वक्र हो तब किसी नई नीति या परियोजना को शुरू नहीं करना चाहिएसौर मंडल के सभी ग्रह पृथ्वी के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। लेकिन सांसारिक दृष्टिकोण से ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी नहीं चल रही है, और सभी ग्रह केंद्र के रूप में पृथ्वी के साथ घूम रहे हैं। यह सिर्फ एक ऑप्टिकल भ्रम है। इसलिए ग्रह रुकते हुए प्रतीत होते हैं, पीछे की ओर जाते हैं, फिर से रुकते हैं और आगे जाते हैं जिसे डायरेक्ट मोशन कहते हैं। सूर्य और चंद्रमा हमेशा प्रत्यक्ष गति में होते हैं (अर्थात, वे कभी पीछे नहीं चलते हैं) जबकि राहु और केतु हमेशा प्रतिगामी यानी वक्री होते हैं (अर्थात, वे हमेशा पीछे की ओर बढ़ते हैं)। पांच ग्रह, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि दोनों प्रत्यक्ष और प्रतिगामी गति में चलते हैं। कुल 9 ग्रह हैं जिनका प्रभाव हमारे जीवन और समाज पर होता है। इस बीच काल सर्प योग भी प्रभावी रहेगा। ज्योतिषीय दृष्टि से ग्रहों की ऐसी स्थिति शुभ नहीं होती है। पूरी दुनिया इन दिनों एक गंभीर संकट का सामना कर रही है ऐसे में 6 ग्रहों का एक साथ उलटी चाल में चलना क्या गुल खिलाएंगा 18 जून को बुध उलटी चाल से चलने लगेंगे। गौरतलब है कि 18 जून से 25 जून के बीच ये चारों ग्रह एक ही समय पर प्रतिगामी यानी वक्र रहेंगे। ग्रहों की यह स्थिति 15 जुलाई तक कालपुरुष कुंडली में बने काल सर्प दोष के साथ परस्पर व्याप्त होती है जिसका परिणाम चिंताजनक हो सकता है।प्रतिगामी शनि उन कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए शक्ति प्रदान करते है जिन्हें अतीत में अधूरा छोड़ दिया गया था। शनि 11 मई से 29 सितंबर तक मकर राशि में वक्री रहेंशनि का प्रतिगमन जिम्मेदारियों और काम के बोझ के साथ एक कठिन अवधि को दर्शाता है। लेकिन यह लोगों को अपने कौशल को अधिक निखारने और यथार्थवादी एवं व्यवहारिक बनने में भी मदद करेगा। कोरोनावायरस के कारण आने वाली चुनौतियों के समाधान के लिए नए कानून और नीतियां बनाई जा सकती हैं। न्यायिक सुधार और न्यायिक ढांचे का पुनर्गठन भी हो सकता है।शुक्र विलासिता, आराम, सौंदर्य और खुशी की भावना का ग्रह है। कालपुरुष की कुंडली में वह 2 और 7 भाव के स्वामी हैं। शुक्र 13 मई से 25 जून तक वृष राशि में वक्री रहेंगे जो इस अवधि के दौरान लोगों के सामान्य दृष्टिकोण में सुधार होगा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की समीक्षा की जाएगी। यात्रा और आतिथ्य उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए समर्थन और प्रोत्साहन मिल सकता है। साथ ही भारत के प्रतिष्ठा को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा मिलेगा।बृहस्पति ज्ञान और बुद्धिमत्ता के ग्रह हैं। प्रतिगामी गति में उनके शुभ परिणाम देने की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। बृहस्पति नवे और ग्यारहवें भाव के स्वामी है और 14 मई से 13 सितंबर तक मकर राशि में वक्री रहेंगे इस समय के दौरान देश में उन कार्यों और परियोजनाओं को फिर से शुरू करने की क्षमता बढ़ेगी जिन्हें पहले अधूरा छोड़ दिया गया था। यह वह समय है जब बीमार कंपनियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है और सरकार द्वारा वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज भी प्रदान किया जा सकता है। भारत के अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों को मजबूती मिल सकती है। इस समय जन आक्रोश और अशांति की आशंका रहेगी। मौजूदा कानूनों और नीतियों के खिलाफ धार्मिक समुदायों में भी असंतोष पैदा हो सकती है।बुध व्यापार, संचार व्यवस्था एवं नयी सोच का प्रतीक है। कालपुरुष कुंडली में, बुधक्षतीसरे ,छठे भाव के मालिक हैं। यह 18 जून से 12 जुलाई के बीच वृषभ राशि में वक्री रहेंगे, जो इस समय के दौरान कोरोनो वायरस के प्रभावों से निपटने के लिए नए विचार और समाधान सामने आ सकते हैं। पड़ोसियों देशों के साथ संवाद में व्यवधान आ सकता है। यह भी गौरतलब है कि 18 जून से 25 जून के बीच चार ग्रह – शनि, बृहस्पति, शुक्र और बुध – एक ही समय में प्रतिगामी गति में होंगे जो भ्रम और अराजकता पैदा कर सकते हैं।जून और जुलाई के महीने में करीब 30 दिन के अंदर तीन ग्रहण लगने जा रहे हैं ऐसे में इसका क्या असर होगा जानिए
जब भी किसी एक महीने में दो से अधिक ग्रहण पड़े और पाप ग्रहों का भी उस पर प्रभाव रहे तो वह समय जनता के लिए कष्टकारी होगा।
मित्रों6 जून से 5 जुलाई के बीच तीन ग्रहण लगने जा रहे हैं। इनमें से दो ग्रहण भारत में दृश्य होंगे। 5/6 जून को लगने वाला चंद्र ग्रहण यूरोप, भारत सहित एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी दिखाई देगा। 21 जून को पड़ने वाला सूर्य ग्रहण भारत सहित एशिया के कई दूसरे राज्यों, यूरोप और अफ्रीका में भी दिखेगा।
इसके बाद 4/5 जुलाई को लगने जा रहा चंद्र ग्रहण अफ्रीका और अमेरिका में नजर आएगा। इन तीनों ग्रहणों में से पहले दो ग्रहण, जो कि आषाढ़ कृष्ण पक्ष में पड़ेंगे, वह भारत में दृश्य होंगे। अंतिम ग्रहण जो कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष में है वह भारत में दिखाई नहीं देगा। इन ग्रहणों का मिथुन और धनु राशि के अक्ष को पीड़ित करना अमेरिका और पश्चिम के देशों के लिए विशेष रूप से अशुभ होगा।
भारत और विश्व के लिए 21 जून का सूर्य ग्रहण बेहद संवेदनशील है। मिथुन राशि में होने जा रहे इस ग्रहण के समय मंगल जलीय राशि मीन में स्थित होकर सूर्य, बुध, चंद्रमा और राहु को देखेंगे जिससे अशुभ स्थिति का निर्माण होगा। इसके अलावा ग्रहण के समय 6 ग्रह शनि, गुरु, शुक्र और बुध वक्र होंगे। राहु केतु हमेश वक्र चलते हैं इसलिए इनको मिलकर कुब 6 ग्रह वक्री रहेंगे, जो शुभ फलदायी नहीं है। इस स्थिति में संपूर्ण विश्व में बड़ी उथल-पुथल मचेगी।
ग्रहण के समय इन बड़े ग्रहों का वक्री होना प्राकृतिक आपदाओं जैसे अत्यधिक वर्षा, समुद्री चक्रवात, तूफान, महामारी आदि से जन-धन की हानि कर सकता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका को जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई में भयंकर वर्षा एवं बाढ़ से जूझना पड़ सकता है। ऐसे में महामारी और भोजन का संकट इन देशों में कई स्थानों पर हो सकता है। मंगल जल तत्व की राशि मीन में पांच माह तक रहेंगे ऐसे में वर्षा काल में आसामान्य रूप से अत्यधिक वर्षा और महामारी का भय रहेगा। ग्रहण के समय शनि और गुरु का मकर राशि में वक्री होना इस बात की आशंका को जन्म दे रहा है कि चीन के साथ पश्चिमी देशों के संबंध बेहद खराब हो सकते है
भारत के पश्चिमी हिस्सों में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान में राजनीतिक उठा-पटक चिंता का कारण बनेगी तथा हिंद महासागर में चीन की गतिविधयों से तनाव बढ़ेगा। शनि, मंगल और गुरु इन तीनों ग्रहों के प्रभाव से विश्व में आर्थिक मंदी का असर एक वर्ष तक बना रहेगा।

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

#लॉकडाउन3मई। 3 मई के बाद जब lockdown खुलेगा क्या कहती है ग्रहों के गोचर की स्थिति?


मित्रों मैंने पहले भी एक पोस्ट डाली थी उसमें मैंने कहां धा कि 14तारीक को सुर्य उच्च के होंगेपर सुर्य10अश पर उच्च के होते हैं जो 24/42020को होोंगेउस  के बाद सुघार आना शुरू हो जाएगा लेकिन देश के कुछ ही हिस्सोमे मेरी गणना के अनुसार मंगल, वह 22 मार्च को शनि की राशि मकर में आए। यहां आकर मंगल उच्च के हो गए। इससे मंगल का प्रभाव बढ़ गया। कमाल की बात देखिए इसी दिन जनता कर्फ्यू लगाया गया। इसके बाद 24 मार्च से पूरे देश में लॉक डाउन घोषित कर दिया गया और अब 4 मई से जब लॉक डाउन समाप्त होगा तो मंगल भी मकर से निकलेंगे। यानी इन दिनों जो पूरी दुनिया में तबाही मची हुई है उसमें मंगल और शनि का बड़ा युघ है। शनि मंगल के योग के समाप्त होते ही दुनिया भर में फैले कोरोना के कहर में कमी आने लगेगी भारत में कोरोना पीडि़तों की संख्या 30 मार्च को अचानक से बढ गयी जब तबलिगी जमात के कारण यहां भी कमाल की बात यह रही कि इसी दिन गुरु मकर राशि में पहुंचे और शनि मंगल के बीच में फंसकर पीड़ित हो गए। गुरु के पीड़ित होने से धर्म-कर्म के कार्यों में बाधा आ रही है। मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद, चर्च सभी सीमित तरीके से अपने दैनिक कार्यों को पूरा कर पा रहे हैं। लेकिन 4 मई को मंगल मकर राशि से निकल कर कुंभ राशि में आ जाएंगे। इससे बृहस्पति को बल मिलेगा। जनता के बीच डर ओर खोफ कम होने लगेगा।सूर्य देव13 अप्रैल से उच्च राशि राशि मेष में विराजमान हैं। 4 मई से मंगल के मकर से कुंभ में जाने के बाद बृहस्पति अपनी पूर्ण शक्ति से फल देने में सक्षम हो जाएंगे और धीरे-धीरे अपने सुधारात्मक प्रभाव से लोगों के जीवन में उन्नति को सुनिश्चित करेंगे। किन्त बृहस्पति, जो स्थिरता एवं विकास के प्रतीक हैं, इस समय तेज गति में चल रहे हैं जिसे ज्योतिषीय भाषा में बक्री गति से उल्टी चाल से कहा गया है। इस स्थिति में विकास दिखेगा लेकिन यह सच से दूर हो सकता है।11 मई को शनि और 14 मई को बृहस्पति (वक्री) हो जाएंगे। जब भी कोई ग्रह अपनी नीच राशि में होकर बक्री हो जाता है तो वह उच्चतम फल देता है। बृहस्पति का निश्चित रूप से मौजूदा स्थिति में तनाव काम करेगा। जहां तक ​​निर्णय लेने का सवाल है, यह सबसे महत्वपूर्ण अवधियों में से एक होगा। विश्व के नेताओं को अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और व्यवसायों को बचाने के लिए कुछ सख्त निर्णय लेने की आवश्यकता होगी। यह मौजूदा नीतियों के आत्मनिरीक्षण और समीक्षा का समय होगा। 30 जून को, प्रतिगामी बृहस्पति अपनी राशि धनु में आ जाएंगे जिससे उन्हें और अधिक बल मिलेगा। इस स्थिति में वह राहु और केतु की नकारात्मक ऊर्जा को कम करेंगे। इस स्थिति के कारण, विश्व अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए एक सामान्य रोडमैप पर वैश्विक नेताओं के बीच आम सहमति होने की संभावना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की भूमिका जांच के दायरे में आएगी और एक नई विश्व स्वास्थ्य एजेंसी के गठन का विचार होगा। 21june को सुर्य ग्रहण होगाभारत और विश्व के लिए 21 जून का सूर्य ग्रहण बेहद संवेदनशील है। मिथुन राशि में होने जा रहे इस ग्रहण के समय मंगल जलीय राशि मीन में स्थित होकर सूर्य, बुध, चंद्रमा और राहु को देखेंगे जिससे अशुभ स्थिति का निर्माण होगा। इसके अलावा ग्रहण के समय 6 ग्रह शनि, गुरु, शुक्र और बुध वक्र होंगे। राहु केतु हमेश वक्र चलते हैं इसलिए इनको मिलकर कुब 6 ग्रह वक्री रहेंगे, जो शुभ फलदायी नहीं है। इस स्थिति में संपूर्ण विश्व में बड़ी उथल-पुथल मचेगी।ग्रहण के समय इन बड़े ग्रहों का वक्री होना प्राकृतिक आपदाओं जैसे अत्यधिक वर्षा, समुद्री चक्रवात, तूफान, महामारी आदि से जन-धन की हानि कर सकता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका को जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई में भयंकर वर्षा एवं बाढ़ से जूझना पड़ सकता है। विस्फोटक स्थिति बनेगी ऐसे में कुछ देशों में तनातनी तनाव का माहोल वन सकता है आग से संबंधित घटनाएं घटित हो थी नजर आ रही है महामारी और भोजन का संकट विश्व के कुछ देशों में कई स्थानों पर हो सकता है।इस वर्ष मंगल जल तत्व की राशि मीन में पांच माह तक रहेंगे ऐसे में वर्षा काल में आसामान्य रूप से अत्यधिक वर्षा और महामारी का भय रहेगा। ग्रहण के समय शनि और गुरु का मकर राशि में वक्री होना इस बात की आशंका को जन्म दे रहा है कि चीन के साथ पश्चिमी देशों के संबंध बेहद खराब हो सकते हैं।भारत के पश्चिमी हिस्सों में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान में राजनीतिक उठा-पटक चिंता का कारण बनेगी तथा हिंद महासागर में चीन की गतिविधयों से तनाव बढ़ेगा। शनि, मंगल और गुरु इन तीनों ग्रहों के प्रभाव से विश्व में आर्थिक मंदी का असर अगस्त 2021 तक बना रहेगा।इस वर्ष आषाढ़ के महीने में 6 जून से 5 जुलाई के बीच तीन ग्रहण लगने जा रहे हैं। इनमें से दो ग्रहण भारत में दृश्य होंगे।सके बाद 4/5 जुलाई को लगने जा रहा चंद्र ग्रहण अफ्रीका और अमेरिका में नजर आएगा। इन तीनों ग्रहणों में से पहले दो ग्रहण, जो कि आषाढ़ कृष्ण पक्ष में पड़ेंगे, वह भारत में दृश्य होंगे। अंतिम ग्रहण जो कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष में है वह भारत में दिखाई नहीं देगा। इन ग्रहणों का मिथुन और धनु राशि के अक्ष को पीड़ित करना अमेरिका और पश्चिम के देशों के लिए विशेष रूप से अशुभ होगा। मित्रों जिनकी भी कुंडली में सूर्य के साथ राहु या केतु चंद्र के साथ राहु केतु की युति हो वो लोग अपनी-अपनी कुंडली अभी से दिखा कर उपाय करें कुछ उपाय ग्रहण के समय ओर कुछ पहले ही शुरू करने चाहिए आज इतना ही मित्रों आगे फिर से आपको जानकारी देंगे आचार्य राजेश

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...