आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
सोमवार, 10 नवंबर 2025
आधुनिक वास्तु: रसोई की दिशा का नया समीकरण
सोमवार, 3 नवंबर 2025
पॉडकास्ट पर ज्योतिष, वास्तु और अंक ज्योतिष: अधूरे ज्ञान और धोखाधड़ी का बढ़ता बाज़ार
बुधवार, 22 अक्टूबर 2025
अंक ज्योतिष कितना सही?
अब ज्योतिष की बात है और मैं यह बात लिख रहा हूं तो आप सोचेंगे कि आखिर आ ही गया अपनी औकात पर। आप कुछ ऐसा समझ सकते हैं। क्योंकि मैंने सीखने में कभी कंजूसी नहीं बरती सो हर ऐसे इंसान से सीखने की कोशिश की जिसके बारे में कहा जाता था कि इसे कुछ आता है। सही कहूं तो आज भी यही स्थिति है। जिस तरह कला के जवान होने तक कलाकार बूढा हो जाता है वैसे ही ज्योतिष की समझ आने तक फलादेश करने का महत्व भी खो सा जाता है। खैर में आता हूं विषय पर आज मित्रों में बात करना चाहता हूं Ank ज्योतिष पर फलित ज्योतिष हमारे ऋषि-मुनियों की देन है तो इस पर उन्होंने बहुत खोज की और रिसर्च की है और भारत से यह विघा विदेशों में भी में फेली लेकिन हम भारतीय अपनी विद्या को संभाल नहीं सके और जब तक उसमें पश्चिम ठप्पा नहीं लगता तब तक उसको हम मानते नहीं और पश्चिम में विकसित आधा अधूरा ज्ञान को हम भारतीय अपना लेते हैं अपने अपने ज्ञान को भूलकर, हमारा भारतीय संवत बिक्रम संवत हिजरी संवत शाखा संवत आदि पहले तो यही तय कर लिया जाय कि परम्परावादी भारतीयों को अपना जन्मदिन कि पद्धति से मानना चाहिए, पारंपरिक हिन्दू कैलेण्डर को (जो भिन्न-भिन्न हैं) या आधुनिक कैलेण्डर को. मेरे जीवन को वर्त्तमान में जो तिथियाँ नियंत्रित करती हैं वे आधुनिक है परन्तु मेरे घर में ही बहुत सी बातों के लिए पारंपरिक कैलेण्डर को आगे कर देते हैं. फिर यह लोचा कि जन्मतिथि मात्र मानी जाय या जन्मतिथि, महीने, और वर्ष के अंकों का जोड़, इसमें भी कई विधियाँ हैं जिनसे योग पृथक आता है. फिर इसमें वर्णमाला के अक्षरों को भी शामिल कर लेना पचड़े को और ज्यादा बढ़ा देता है.वैदिक ज्योतिष, जो महर्षि पराशर, जैमनी, कृष्णमूर्ति आदि की उत्कृष्ट परम्परा पर आधारित है, उसमें जातक के जन्म की तिथि, समय और स्थान को लेकर, एक वैज्ञानिक तरीके से जन्म के समय, आकाश में ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति का निर्धारण कर समय का आकलन किया जाता है। तत्पश्चात ज्योतिष के शास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर फलित कहा जाता है। ज्योतिषीय गणनाएँ पूर्णतः खगोलीय सिद्धांतों पर आधारित होती हैं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जिस तरह घर-घर अपनी पैठ बना ली है, उसका एक दुष्प्रभाव यह हुआ कि मदारी ज्योतिषियों की संख्या बढ़ी है। आप कोई भी चैनल देखें, इन मदारी ज्योतिषियों की एक पूरी जमात अपने लैपटॉप पर त्वरित समाधान बाँचती नज़र आयेगी।उपभोक्तावाद की इस रेलमपेल में कहीं तिलक चुटियाधारी खाँटी पंडित जी दिखते हैं, तो कहीं टाई-सूट में सजे फ़र्राटा अंग्रेज़ी बोलने वाले एस्ट्रोलोजर। इन सबके बीच एक प्रचलित विद्या है अंक ज्योतिष। इस प्रचलित अंक ज्योतिष में व्यक्ति की जन्मतिथि (ईसवी कलेंडर के अनुसार) के अंकों को जोड़कर एक मूलांक बना दिया जाता है और फिर उसे आधार बनाकर अधकचरा भविष्य बाँच दिया जाता है। इसी तरह अंग्रेजी के अक्ष्ररों (ए, बी, सी, डी आदि) को एक एक अंक दिया है. और लोगों के नाम के अंग्रेजी अक्षरों के अंकों के योग से उसका मूलांक निकाला जाता है. फिर उसी आधार पर उसका भी भविष्य बाँच दिया जाता है।अंक ज्योतिष ईसवी कलेंडर की तिथि के अनुसार चलता है जिसका एक सौर वर्ष मापने के अलावा कोई सार्वभौमिक आधार नहीं है। समय के अनंत प्रवाह में ईसवी कलेंडर मात्र 20 शताब्दी पुराना है। जिसमें अचानक एक दिन को 1 जनवरी लेकर वर्ष की शुरुआत कर दी गयी और शुरु हो गया 1 से 9 अंकों की श्रेणी में जातक को बाँटने का सिलसिला। यह सर्वविदित है कि इतिहास की धारा में अनेक सभ्यताओं तथा राजाओं ने अपने अपने कलेंडर विकसित किये जिन सबके वर्ष और तिथियों में कोई तालमेल नहीं है। तब सवाल यह उठता कि अंक ज्योतिष का आधार ईसवी कलेन्डर ही क्यों? अंग्रेज़ों ने चुँकि विश्व के एक बड़े हिस्से पर राज किया, इसलिये ईसवी कलेंडर का प्रचलन बढ़ गया। यहाँ तक कि विभिन्न गिरजाघरों ने इस कैलेंडर के दिनों की मान्यताओं पर प्रश्न चिह्न लगाए हैं. और तो और, जो सबसे अवैज्ञानिक बात इसकी सार्वभौमिकता को चुनौती देती है, वो यह है कि भिन्न भिन्न देशों ने इस कैलेंडर को भिन्न भिन समय पर अपनाया.ईसवी कलेंडर की शुरुआत 1 ए.डी. से होती है जो 1बी.सी. के समाप्त होने के तुरत बाद आ जाता है, यह तथ्य मज़ेदार है, क्योंकि इस बीच किसी ज़ीरो वर्ष का प्रावधान नहीं है। देखा जाये तो ईसवी कलेंडर की तिथियाँ, मूलत: सौर वर्ष को मापने का एक मोटा मोटा तरीका भर है। जब हम ईसवी कलेंडर के विकास पर दृष्टि डालतें हैं तो पाते हैं कि कलेंडर के बारह महीनों के दिन समान नहीं हैं और इनमें अंतर होने का कारण भी स्पष्ट नहीं है. यदि इस कलेंडर का इतिहास देखें तो इतनी उथल पुथल है कि इसकी सारी वैज्ञानिक मान्यताएँ समाप्त हो जाती हैं. इस कलेंडर पर कई राजघरानों का भी प्रभाव रहा, जैसे जुलियस और ऑगस्टस सीज़र. 13 वीं सदी के इतिहासकार जोहान्नेस द सैक्रोबॉस्को का कहना है कि कलेंडर के शुरुआती दिनों में अगस्त में 30 व जुलाई में 31 दिन हुआ करते थे। बाद में ऑगस्टस नाम के राजा ने (जिसके नाम पर अगस्त माह का नाम पड़ा) इस पर आपत्ति जतायी कि जुलाई (जो ज्यूलियस नाम के राजा के नाम पर था) में 31 दिन हैं, तो अगस्त में भी 31 दिन होने चाहिये. इस कारण फरवरी (जिसमें लीप वर्ष में 30 व अन्य वर्षॉं में 29 दिन होते थे) से एक दिन निकालकर अगस्त में डाल दिया गया। अब क्या वे अंक ज्योतिषी कृपा कर यह बताएँगे कि दिनों को आगे पीछे करने से कालांतर में तो सभी अंक बदल गये, तो इनका परिमार्जन क्या और कैसे किया गया?सारी सृष्टि एक चक्र में चलती है सारे अंक एक चक्र में चलते हैं जैसे 1 से 9 के बाद पुन: 1 (10=1+0=1) आता है. ईसवी कलेंडर के आधार पर अंक ज्योतिष में अजब तमाशा होता है जैसे 30 जून (मूलांक 3) के बाद 1 जुलाई (मूलांक 1) आता है। इसी तरह 28 फरवरी (2+8=10=1) के बाद 1 मार्च (1 अंक) आता है। नाम के अक्षरों के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणियाँ अंगरेज़ी (आजकल हिंदी वर्णमाला के अक्षरों को भी) के अक्षरों के अंकों को जोड़कर की जाती हैं. अब यह तो सर्वविदित है कि नाम के हिज्जे उस भाषा का अंग है जो जातक के देश या प्रदेश में बोली जाती है और जो साधारणतः निर्विवाद होता है. जैसे ही इसका अंगरेज़ी लिप्यांतरण किया जाता है, वैसे ही विरोध प्रारम्भ हो जाता है. ऐसे में सारे अंक बिगड़ सकते हैं और साथ ही जातक का भविष्य भी इसी अधूरे ज्ञान का सहारा लेकर आजकल लोग इन ज्योतोषियों की सलाह पर अपने नाम की हिज्जे बदलने लगे हैं.अंक ज्योतिष के यह अंतविरोध, इसके पूरे विज्ञान को तथाकथित की श्रेणी में ले आते हैं। एक सवाल यह भी रह जाता है कि क्या पूरी मानव सभ्यता को मात्र 9 प्रकार के व्यक्तियों में बांट कर इस प्रकार का सरलीकृत भविष्य बाँचा जा सकता है? ऐसे में इस नितांत अवैज्ञानिक सिद्धांत को, ज्योतिष के नाम पर चलाने के इस करतब को क्या कहेंगे आप? भारतीय अंक ज्योतिष अपने आप में एक विज्ञान है और हमारी वर्णमाला मैं बहुत से रहस्य छुपे है हमारी तिथियां अपने आप में संपूर्ण है उपरोक्त विचार मात्र अंक-ज्योतिष के विषय में हैं। ज्योतिष शास्त्र के विषय में नहीं क्योंकि उसके सिद्धांत और पद्धतियाँ, खगोल शास्त्र पर आधारित हैं और कई अर्थो में वैज्ञानिकता लिये हैं। ज्योतिष शास्त्र में अभी और गहन शोध होने बाकी हैं भक्ति सिर को भी इस पर बात जारी रहेगी दोस्तों हो सकते मेरी बातों से तो ताकत के दोषियों को नाराजगी पैदा हो पर मुझे इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता सच तो सच्च ही होता है आचार्य राजेश
बुधवार, 23 जुलाई 2025
मैं कौन हूं
सोमवार, 7 जुलाई 2025
आचार्य जी, आपका राजा (सूर्य) इतना 'गरीब' क्यों है?"
ऑफिस डायरी / सत्य घटना
"
आचार्य जी, आपका राजा (सूर्य) इतना 'गरीब' क्यों है?" — जब एक 'लॉजिकल' दोस्त मेरे ऑफिस में ही फंस गया!
(एक मजेदार किस्सा: कैसे बिग-बैंग, मेडिकल साइंस और रिश्तों के सच ने ज्योतिष को सिद्ध किया)
1. एंट्री: एक डरा हुआ भक्त और एक अकड़ू दोस्त
कल दोपहर की बात है। मेरा पुराना क्लाइंट आर्यन अपने दोस्त विकास के साथ आया। विकास के चेहरे पर "मैं सब जानता हूँ" वाला भाव था। आते ही उसने ऐलान कर दिया, "आचार्य जी, मैं इन ग्रह-नक्षत्रों को नहीं मानता। यह सब अंधविश्वास है। अगर आपके पास लॉजिक है तो बात करें, वरना मैं अपने दोस्त को ले जा रहा हूँ।"
मैंने मुस्कुराकर कहा, "विकास बाबू! विराजिये। चाय पीजिये और अपने 'लॉजिकल' तीर चलाइये।"
2. पहला राउंड (सबसे बुनियादी सवाल): "सूर्य राजा और चंद्रमा रानी ही क्यों?"
विकास ने कुर्सी खींचते ही पहला सवाल दागा:
"आचार्य जी, बेसिक से शुरू करते हैं। आपने सूर्य को 'राजा' और चंद्रमा को 'रानी' बना दिया। बाकी सब नौकर। ऐसा क्यों? चंद्रमा तो पत्थर का टुकड़ा है, उसे रानी क्यों कहते हो?"
मैं गंभीर हो गया और कहा:
"विकास जी, यह पद 'साइज' देख कर नहीं, 'स्वभाव' (Nature) देख कर दिए गए हैं।
* सूर्य (राजा) क्यों?
पूरे सौरमंडल में केवल सूर्य के पास अपनी 'रोशनी' और 'ऊर्जा' है। वह 'देने वाला' (Giver) है। उसके बिना अंधेरा है। जैसे घर में पिता कमा कर लाता है, वैसे ही सूर्य सबको जीवन देता है। वह आत्मा है।
* चंद्रमा (रानी) क्यों?
विकास बाबू, सूर्य 'आग' (Fire) है, 11,000 वोल्ट का करंट है। अगर यह सीधी आग जनता (पृथ्वी) पर गिरे, तो सब जलकर राख हो जाएगा।
रानी (चंद्रमा) का काम है राजा के उस भयानक 'तेज' (Heat) को सहन करना। चंद्रमा सूर्य की चिलचिलाती धूप को खुद पीता है, उसे अपने भीतर सोखता है और फिर उसे फिल्टर करके 'शीतलता' (चांदनी) के रूप में हमें देता है।
यह बिल्कुल घर की माँ (रानी) जैसा है— पिता (सूर्य) का गुस्सा और दुनिया की तपन माँ खुद झेलती है, और बच्चों (हम) तक सिर्फ प्यार और ममता पहुँचाती है। जो आग को पीकर अमृत दे दे, वही तो रानी हो सकती है! इसलिए चंद्रमा रानी है।"*
विकास ने पहली बार सिर हिलाया, "हम्म... यह बात तो गहरी है।"
3. दूसरा राउंड: "तो फिर राजा-रानी के पास 1 BHK फ्लैट क्यों?"
विकास ने तुरंत अगला सवाल जोड़ा:
"अगर ये इतने ही खास हैं, तो कुंडली में इनके पास सिर्फ एक-एक घर (राशि) क्यों है? जबकि मंगल, गुरु, शनि सबके पास दो-दो घर हैं?"
मैंने हंसकर कहा, "विकास जी, शरीर में हाथ कितने हैं? दो। पैर? दो। लेकिन 'आत्मा' कितनी है?"
विकास: "एक।"
"और 'मन'?"
"वो भी एक।"
"बस! कुदरत का नियम है— काम करने वाले नौकर (हाथ-पैर/मंगल-शनि) दो हो सकते हैं, लेकिन मालिक (आत्मा/सूर्य) और मालकिन (मन/चंद्रमा) एक ही होते हैं। इसलिए राजा-रानी को एक-एक ही राशि मिली। यह गरीबी नहीं, उनकी 'पावर' (Singularity) है!"
4. तीसरा राउंड: "बिग बैंग, कलमा और वर्ड (मेष राशि का राज)"
विकास अब थोड़ा संभल गया था। उसने पूछा: "चलिए ठीक है। लेकिन मेष (Aries) ही पहली राशि क्यों? सूर्य को नंबर 1 क्यों नहीं मिला? या गुरु को?"
मैंने कहा: "क्योंकि ज्योतिष वही बात कहता है जो आपके धर्मग्रंथ और साइंस कहते हैं।"
* बाइबिल: 'In the beginning was the Word' (शुरुआत में शब्द था)।
* कुरान: कहती है सबसे पहले 'कलमा' (कुन) आया, गूंज हुई।
* वेद: कहते हैं 'नाद' (ओम) से सृष्टि बनी।
* साइंस: कहता है 'Big Bang' (महाविस्फोट) हुआ।
"जब धमाका (Big Bang) होता है, तो सबसे पहले क्या पैदा होती है? ऊर्जा और आग (Energy & Fire)। और ज्योतिष में आग का मालिक कौन है? मंगल (Mars)।
इसीलिए ऋषियों ने 'मेष राशि' (मंगल) को नंबर 1 पर रखा। सृष्टि 'शांति' से नहीं, 'धमाके' से शुरू हुई थी।"विकास अब थोड़ा नरम पड़ गया था, लेकिन जिज्ञासा बाकी थी।
"तो बाकी ग्रहों का क्रम कैसे बना?"
मैंने कागज पर गोला बनाया:
"विकास जी, जब 'बिग बैंग' (मंगल) हुआ और सूर्य (तारा) बना, तो धमाके से जो टुकड़े गिरे, वो अपनी 'वजन' (Density) के हिसाब से सेट हो गए:
- बुध: सबसे भारी, इसलिए सूर्य के सबसे पास गिरा (मिथुन-कन्या)।
- शुक्र: उससे हल्का, थोड़ा दूर (वृषभ-तुला)।
- मंगल: और दूर (मेष-वृश्चिक)।
- गुरु: भारी गैस, और दूर (धनु-मीन)।
- शनि: सबसे हल्का (गैस का गोला), अंधेरे में सबसे दूर जा गिरा (मकर-कुंभ)।
यह ऋषियों ने हजारों साल पहले अपनी 'दिव्य दृष्टि' से देख लिया था
5. चौथा राउंड: "खून की गर्मी और जीवन-मृत्यु"
मैंने आगे जोड़ा:
*"विकास जी, जिंदा आदमी और मुर्दे में क्या फर्क है? सिर्फ 'गर्मी' का। जब तक खून गर्म है (मंगल), जीवन है। खून ठंडा पड़ा, खेल खत्म!
* मेष (मंगल): जीवन की शुरुआत (बच्चे का रोना/ऊर्जा)।
* वृश्चिक (मंगल): जीवन का अंत (श्मशान/बदलाव)।
आदि भी मंगल, अंत भी मंगल। इसलिए सूर्य (राजा) भी अपने महल में नहीं, बल्कि मंगल के घर (मेष) में जाकर ही 'उच्च' (Exalted) का होता है, क्योंकि राजा की असली शोभा युद्ध के मैदान में है।"*
6. पांचवां राउंड: "पत्थर का चाँद और मन का खेल"
विकास: "लेकिन चंद्रमा तो उपग्रह है, वो मेरे मन को कैसे कंट्रोल करेगा?"
मैंने पानी का गिलास उठाया:
"विकास बाबू, अगर चंद्रमा इतनी दूर से समंदर में ज्वार-भाटा (High Tide) ला सकता है, अरबों टन पानी हिला सकता है, तो क्या आपके शरीर का 70% पानी और खून नहीं हिलाएगा?
पूर्णिमा को पागलपन और बेचैनी बढ़ना जादू नहीं, Liquid Mechanics है!"
7. आखिरी वार: "राहु-केतु और परछाई"
जाते-जाते विकास ने पूछा: "और राहु-केतु? वो तो दिखते भी नहीं?"
मैंने कहा: "सड़क पर अपनी 'परछाई' देखी है? उसका वजन नहीं होता, पर वो साथ चलती है।
राहु वही 'छाया' है। जब सूर्य ग्रहण लगता है, तो कोई पत्थर बीच में नहीं आता, बस एक 'छाया' (राहु) आती है और भगवान सूर्य को ढक देती है। जो छाया सूरज को ढक दे, वो आपकी जिंदगी में अंधेरा तो कर ही सकती है।"
निष्कर्ष
विकास ने अपना लैपटॉप बैग उठाया और हाथ जोड़कर बोला, "गुरुदेव, मान गया! यहाँ तोता नहीं उड़ाया जाता, यहाँ तो ब्रह्मांड की फिजिक्स और रिश्तों की केमिस्ट्री पढ़ाई जाती है।"
तो दोस्तों,
ज्योतिष अंधविश्वास नहीं है। यह सूर्य की चमक, चंद्रमा के त्याग, मंगल की ऊर्जा और बिग-बैंग की गूंज का विज्ञान है।
आचार्य राजेश कुमार
(ज्योतिष, वास्तु और आध्यात्मिक अनुसंधान)
हनुमानगढ़, राजस्थान
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शनिवार, 2 नवंबर 2024
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रविवार, 29 सितंबर 2024
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शुक्रवार, 27 सितंबर 2024
jyotish Sutra
रविवार, 31 मार्च 2024
लाल का किताब के अनुसार मंगल शनि
मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024
आओ ज्योतिष विद्या सीखे
सोमवार, 19 फ़रवरी 2024
आओ ज्योतिष विद्या सीखे1
शनिवार, 17 फ़रवरी 2024
आओ ज्योतिष विद्या सीखें
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