रविवार, 10 मई 2020

समुंदर मंथन में छिपा गहरा राज रहस्य-2

https://youtu.be/jNaWy6N2GuEसमुद्र मंथन में छिपा जीवन का उपदेश


मित्रों पहली पोस्ट में हमने कथा पर चर्चा की लेकिनइस पौराणिक कथा का आध्यात्मिक संबध भी है| यह कथा सभी के लिए मार्गदर्शक है| आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो समुद्र का अर्थ है शरीर और मंथन से अमृत और विष दोनों निकलते हैं|मित्रों
इस कहानी के किरदार हमारे जीवन से मेल खाते हैं जैसे देवता सकारात्मक सोच और समझ को दर्शाते हैं वहीं असुर नकारात्मक सोच एवं बुराइयों के प्रतीक हैं|
समुद्र हमारे दिमाग के समान दिखाया गया है जिसमें कई तरह के विचारों एवं इच्छाओं की उतपत्ति होती है और समुद्र की लहरों के समान यह भी समय-समय पर बदल जाती हैं|
मंदार, अर्थात मन और धार, पर्वत आपकी एकाग्रता को दर्शाता है। क्योंकि यह एक धार यानि एक ही दिशा में सोचने की बात कहता है|
कथा में कछुआ यानि विष्णु जी ने अहंकार को हटा कर समुद्र मंथन का सारा भर अपनी पीठ पर लिया , ऐसे ही हमे भी अहंकार को हटा कर सबके हित में अथवा एकाग्रता की राह पर चलना चाहिए|
विष या हलाहल जीवन से जुड़े दुःख और परेशानियों का प्रतीक है| विष को पीने वाले महादेव बाधाओं को दूर करना सिखाते हैं|
मोहिनी यानि ध्यान का भटकना जो हमें हमारे लक्ष्य से दूर करती है|
अमृत दर्शाता है हमारे लक्ष्य को यानि जीवन का सार
मंथन के दौरान पाई जाने वाली वस्तुऐं सिद्धियों का प्रतीक हैं| यह सिद्धियां भौतिक दुःख दूर करने के बाद प्राप्त होती हैं|दरअसल, हजारों सालों से यह प्रसंग केवल धार्मिक नजरिए से ही नहीं बल्कि इसमें समाए जीवन को साधने वाले सूत्रों के लिए भी अहमियत रखता है।
आज भी कई धर्म परंपराएं इसी प्रसंग से जुड़े कई पहलुओं के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। महाकुंभ में उमड़ता जलसैलाब हो या धन कामना के लिए लक्ष्मी पूजा, सभी के सूत्र समुद्र की गहराई से निकले इन अनमोल रत्नों व उनमें समाए प्रतीकात्मक ज्ञान से जुड़े हैं।
आप इस प्रसंग को धार्मिक रीति-रिवाजों या अन्य किसी जरिए से सुनते हैं, लेकिन कई लोग खासतौर पर युवा पीढ़ी समुद्र मंथन की वजह, उससे निकली बेशकीमती रत्नों व उनकी अनूठी खूबियों और इस घटना से जुड़ी कई रोचक बातों से अनजान है।
देव-दानवों ने समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत का मथनी और वासुकि नाग को रस्सा (नेति या सूत्र) बनाया। स्वयं भगवान ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल को डुबने से बचाया। असल में, व्यावहारिक नजरिए से इस घटना से जुड़े प्रतीकात्मक सबक हैं। मसलन, संसार समुद्र हैं, इसमें मंदराचल पर्वत की तरह मन को स्थिर करने के लिए कछुए रूपी भगवान की भक्ति का सहारे वासुकि नाग के प्रेम रूपी सूत्र से जीवन का मंथन करें। इस तरह इससे निकला ज्ञान रूपी अमृत पीने वाला ही अमर हो जाता है।
देव-दानवों ने समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत का मथनी और वासुकि नाग को रस्सा (नेति या सूत्र) बनाया। स्वयं भगवान ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल को डुबने से बचाया। असल में, व्यावहारिक नजरिए से इस घटना से जुड़े प्रतीकात्मक सबक हैं। मसलन, संसार समुद्र हैं, इसमें मंदराचल पर्वत की तरह मन को स्थिर करने के लिए कछुए रूपी भगवान की भक्ति का सहारे वासुकि नाग के प्रेम रूपी सूत्र से जीवन का मंथन करें। इस तरह इससे निकला ज्ञान रूपी अमृत पीने वाला ही अमर हो जाता है।
उच्चै:श्रवा घोड़ा - समुद्र मंथन से अश्वजाति में श्रेष्ठ, चन्द्रमा की तरह सफेद व चमकीला, मजबूत कद-काठी का दिव्य घोड़ा उच्चै:श्रवा प्रकट हुआ, जो दैत्यों के हिस्से गया और इसे दैत्यराज बलि ने ले लिया।
उच्चै:श्रवा में श्रवा का मतलब ख्याति या कीर्ति भी है। यानी जो मन का स्थिर रख काम करे वह मान व पैसा भी कमाता है। किंतु जो केवल कीर्ति के पीछे भागे उसे फल यानी अमृत नहीं मिलता। दैत्यों के साथ भी ऐसा ही हुआ।
ऐरावत हाथी - चार दांतों वाला अद्भुत हाथी, जिसके दिव्य रूप व डील-डौल के आगे कैलाश पर्वत की महिमा भी कुछ भी नहीं। स्कन्दपुराण के मुताबिक ऐरावत के सिर से मद बह रहा था और उसके साथ 64 और सफेद हाथी भी मंथन से निकले। ऐरावत को देवराज ने प्राप्त किया।
असल में हाथी की आंखे छोटी होती है। इसलिए ऐरावत, पैनी नजर या गहरी सोच का प्रतीक है। संकेत है कि शरीर सुख ही नहीं आत्मा की और भी ध्यान दें।
कौस्तुभ मणि - सभी रत्नों के सबसे श्रेष्ठ व अद्भुत रत्न। इसकी चमक सूर्य के समान होकर त्रिलोक को प्रकाशित करने वाली थी। देवताओं को मिला यह रत्न भगवान विष्णु के स्वरूप अजीत ने अपनी हृदयस्थल पर धारण करने के लिए प्राप्त किया।
कल्पवृक्ष - स्वर्गलोक की शोभा माने जाने वाला कल्पवृक्ष। इसकी खासियत यह थी कि मांगने वालें को उसकी इच्छा के मुताबिक चीजें देकर हर इच्छा पूरी करता है।
अप्सराएं - सुन्दर वस्त्रों से सजीं और गले में सोने के हार पहनीं, मादक चाल-ढाल व मुद्राओ वाली अप्सराओं को, जिनमें रम्भा प्रमुख थी को देवताओं ने अपनाया।
महालक्ष्मी - समुद्र मंथन से निकली साक्षात मातृशक्ति व महामाया महालक्ष्मी के तेज व सौंदर्य, रंग-रूप ने सभी को आकर्षित किया। लक्ष्मीजी को मनाने के लिए सभी जतन करने लगे। किसे अपनाएं यह सोच लक्ष्मीजी ऋषियों के पास गई, किंतु ज्ञानी, तपस्वी होने पर क्रोधी होने से उन्हें नहीं चुना।
इसी तरह देवताओं को महान होने पर भी कामी, मार्कण्डेयजी को चिरायु होने पर भी तप में लीन रहने, परशुराम जी को जितेन्द्रिय होने पर भी कठोर होने की वजह से नहीं चुना।
आखिर में लक्ष्मीजी ने शांत, सात्विक, सारी शक्तियों के स्वामी और कोमल हृदय होने से भगवान विष्णु को वरमाला पहनाई। संदेश यही है कि जिनका मन साफ और सरल होता है उन पर लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
चन्द्रमा - स्कन्दपुराण के मुताबिक सागर मंथन से संपूर्ण कलाओं के साथ चन्द्रमा भी प्रकट हुए। ग्रह-नक्षत्रों के ज्ञाता गर्ग मुनि ने बताया कि चन्द्र के प्राकट्य से विजय देने वाला गोमन्त मुहूर्त बना है, जिसमें चन्द्र का गुरु से योग के अलावा बुध, सूर्य, शुक्र, शनि व मंगल से भी चन्द्र की युति शुभ है।
वारुणी (मदिरा) - सुन्दर आंखों वाली कन्या के रूप में वारुणी देवी प्रकट हुई, जो दैत्यों ने प्राप्त की।
पारिजात - इस वृक्ष की खासियत यह बताई गई है कि इसको छूने से ही थकान मिट जाती है। मान्यता है कि स्वर्ग की अप्सराएं व नर्तकियां भी इसे छूकर अपनी थकान मिटाती थीं। समुद्र मंथन वास्तविक है, और कहानी का गहरा अर्थ है।
समुद्र मानव शरीर का चित्रण है।
मंथन सुमेरु पर्वत से होता है जो मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) का चित्रण है जो सभी साधनाओं का आधार है।
इसका आधार कुर्म या कछुआ द्वारा प्रदान किया जाता है क्योंकि एक साधक को साधना में प्रगति करने के लिए अपनी इंद्रियों को काबु में रखना पड़ता है। समुद्र मंथन का अगर सांकेतिक या दार्शनिक अर्थ आप कई निकाल सकते है हर व्यक्ति अपनी मानसिकता के अनुसार इसका अभिप्राय निकलेगा।

जैसे इसका आध्यात्मिक अर्थ अगर आप निकाले तो ये किसी साधक की अवस्था को दर्शाता है जैसे कूर्म अवतार विष्णु जी का जिसने मंदराचल पर्वत को आधार दिया यानी अगर साधना शुरु करनी हो तो एक आधार यानी गुरु चाहिए जो आपकी सहायता कर सके।

दूसरा वासुकि नाग दर्शाता है उस साधना सूत्र को जिसको लेके आप साधना करेगे यांनी जिस विधि को आप साधेंगे चाहे वो मंत्र हो योग हो ध्यान हो उस विधि का आप बार बार अभ्यास करेगे जो नाग को मथने के समान है।
तीसरा देवता और दानव हमारे चित्त को दर्शाते हैं चित्त यानी मन और बुद्धि का समन्वय मन दानव को दर्शाता है यानी जो दुष्टता दिखाता है जिसको सही गलत से कोई मतलब नही है जिसको सिर्फ अनुभव चाहिए जिसको सिर्फ अपना स्वार्थ देखना है। वही बुद्धि देवता का प्रतीक है बुद्धि में विवेक होता है विवेक बताता है क्या काम हमारे लिए सही है क्या गलत है। तो देव दानव मन बुद्धि की खींचातानी को दर्शाते हैं।मन जीतता है तब हम गलत काम करते है जब बुद्धि जीतती है तो हम सही काम करते है।
चौथा समुद्र मंथन में नाना प्रकार की चीजें निकलती है जो साधना से उत्त्पन्न होने वाले फल को दर्शाता है जिससे साधक के मन मे लोभ आता है विष भी निकलता है जिसे शिव पीते है यानी साधना में जो भी विघ्न पैदा होता है उसका निराकरण आपका इष्ट करता है।
फिर अंत मे अमृत निकलता है यानी आप लक्ष्य के करीब पहुच गए है लेकिन सिर्फ करीब पहुचे है प्राप्त नही हुआ है ।फिर अंत मे भटकाने के लिए मोहनी आती है जो कि देवता को यानी बुद्धि को अमृत पिलाती है यानी जो उस अंतिम समय मे बुद्धि से काम ले लेता है वो अमृत पी लेता है यानी सफलता प्राप्त कर लेता है लेकिन एक दानव भी अमृत पी लेता है यानी कोई कोई मन से यानी छल से कपट से भी सफलता प्राप्त कर लेते है फिर भगवान उनको 2 टुकड़ो में काट देते है यानी ऐसी सफलता जो छल पूर्वक आये उसका अंत अच्छा नही होता या वो ज्यादा देर टिकती नही है।

ये बात किसी साधक और किसी विद्यार्थी पे भी लागू होती है।

ये मेरी मौलिक सोच है इसमें कुछ गलत भी हो सकता है या किसी को अच्छा न लगे उसके लिए क्षमा चाहूगां। आचार्य राजेश

समुद्र कथा में छुपे गहरे रहस्य-1

https://youtu.be/jNaWy6N2GuE
समुद्र मंथन – हमारे धर्म की पौराणिक कथाओं में वैसे तो कई कथाएँ प्रचलित हैं…

लेकिन देवता और दानवों द्वारा कियें गया समुद्र मंथन की कहानी सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं.

कहा जाता हैं कि मंदार पर्वत को शेषनाग से बांधकर समुद्र का मंथन किया गया था और उस मंथन में समुद्र से ऐसी कई चीज़े प्राप्त हुई थी, जो बहुत अमूल्य थी. मंथन से प्राप्त चीजों में से एक चीज़ अमृत भी थी, जिसे लेकर देवताओं और असुरों में देवासुर युद्ध हुआ था और भगवान विष्णु की मदद से देवता इस युद्ध में अमृत को पाकर विजय प्राप्त कर पाए थे.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि समुद्र का मंथन करने की बात देवतों के मन में आई कैसी थी? इस पुरे वाकये के पीछे एक रोचक कहानी हैं जिसे आज हम आपको बतायेंगे.

विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार एक बार देवराज इन्द्र अपनी किसी यात्रा से बैकुंठ लोक वापस लौट रहे थे और उसी समय दुर्वासा ऋषि बैकुंठ लोक से बाहर जा रहे थे. दुर्वासा ऋषि ने ऐरावत हाथी में बैठे इन्द्रदेव को देखा तो उन्हें भ्रम हुआ कि हाथी में बैठा व्यक्ति त्रिलोकपति भगवान् विष्णु हैं. अपने इस भ्रम को सही समझ कर दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र को फूलों की एक माला भेंट की लेकिन अपने मद और वैभव में डूबे देवराज इन्द्र वह माला अपने हाथी ऐरावत के सिर पर फेंक दी और ऐरावत हाथी ने भी अपना सिर झटक कर उस माला को ज़मीन पर गिरा दिया जिससे वह माला ऐरावत के पैरों तले कुचल गयी.

दुर्वासा ऋषि ने जब इन्द्र की इस हरकत को यह देखा तो क्रोधित हो गए. उन्होंने ने इन्द्र द्वारा किये गए इस व्यवहार से खुद का अपमान तो समझा ही साथ ही इसे देवी लक्ष्मी का भी अपमान समझा.

इन्द्र द्वारा किये गए इस अपमान के बाद दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र की श्रीहीन होने का श्राप दे डाला. ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कुछ ही समय बाद इन्द्र का सारा वैभव समुद्र में गिर गया और दैत्यों से युद्ध हारने पर उनका स्वर्ग से अधिकार छीन लिया गया.

अपनी इस दशा से परेशान होकर सभी देवता इंद्रदेव के साथ भगवान् विष्णु के पास पहुचे और इस समस्या का समाधान पूछा. तब भगवान् ने देवताओं को समुद्र मंथन कर स्वर्ग का सम्पूर्ण वैभव वापस पाने और मंथन से निकलने वाले अमृत का उपभोग करने का रास्ता सुझाया.

देवताओं को भगवान् विष्णु द्वारा सुझाया गया यह मार्ग स्वीकार था लेकिन इस समाधान में एक दिक्कत यह थी कि समुद्र मंथन अकेले देवताओं के बस की बात नहीं थी उन्हें इसमें दैत्यों को भी शामिल करना आवश्यक था. देवता नारायण की इस बात के लिए राजी हो गए और उन्होंने दानवो के साथ मिल कर समुद्र मंथन कियमान्यता हैं कि समुद्र मंथन से अमृत के अलावा धन्वन्तरी, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ मणि, दिव्य शंख, वारुणी या मदिरा, पारिजात वृक्ष, चंद्रमा, अप्सराएं, उचौ:श्राव अश्व, हलाहल या विष और कामधेनु गाय भी प्राप्त हुई थी. लेकिन अमृतपान के लिए देवता और असुरों में युद्ध हुआ था. भगवान् विष्णु की मदद से देवताओं ने यह युद्ध जीत लिया और अंततः देवताओं को अमृत की प्राप्ति हो पाई थी.

शुक्रवार, 1 मई 2020

शनि केतु की युति

https://youtu.be/RH_hA1GD-UA
मित्रों आज हम चर्चा करेंगे शनि और केतु ग्रह की युति पर शनि ग्रह और केतु ग्रह की युति को समझने के लिए सर्वप्रथम हमें दोनों ग्रहों को समझना होगा। शनि ग्रह आयु, न्याय, नौकरी, सेवा, अपमान, और निष्ठा के कारक ग्रह है। ये कारावास के भी कारक ग्रह है। एवं केतु को रहस्यमयी विषयों का कारक ग्रह माना गया है। यह मोक्ष कारक ग्रह भी है्।
केतु को मंगल के समान माना गया है, राहु केतु एक दूसरे के पूरक है मित्रों केतु एवं शनि दोनों ही व्यक्ति ग्रहों को आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर करने वाला और मार्गदर्शन करने वाला माना गया है, शनि ग्रहों की प्रवृत्ति है की पापी व्यक्तियों को सजा, कष्ट देकर कठिन सबक देते है। शनि जहाँ व्यक्ति को सबसे अलग थलग कर देता है, वही केतु रिश्तों का त्याग कर वैराग्य देता है। केतु हमें अतीत को फिर से देखने के लिए मजबूर करता है। जैसा की सर्वविदित है की शनि अपनी साढ़ेसाती, शनि ढैय्या अथवा अपने गोचर के समय व्यक्ति को अपने किए गए कर्मों की जिम्मेदारी लेने और सात्विक मार्ग का चयन कर, सही कार्य करने के लिए मजबूर कर देता है।शनि ग्रह और केतु दोनों ग्रहों का एक सिद्धांत जो एकसमान है वह है- “जो बोया है वही काटना पडेगा” अर्थात अपने पाप कर्मों की सजा स्वयं ही भुगतनी होगी। “अपनी गंदगी स्वयं ही साफ करनी होगी”। यह उक्ति उन लोगों के लिए एक सन्देश है जो वर्त्तमान में मानसिक, शारीरिक और आर्थिक कष्ट झेल रहे है। जो जीवन परिस्थितियों से हताश और निराश हो चुके है। जिन्हें अतीत ने चोट पहुंचाई है, पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का फल जो इस जन्म में कष्टों के रूप में प्राप्त कर चुका रहे है। शनि केतु युति का यह मेल कर्मों की सफाई या कर्ज चुकाना अथवा कठिन समय से सीख लेने वाला भी माना जा सकता है.कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमारे जीवन का कोई घाव हमारी मानसिक शान्ति को बार बार भंग करता है। ऐसे अतीत से बाहर आने के लिए आवश्यक है की पुरानी सारी बातों को भूल जाया जाए और अतीत को पकड़ कर ना रखा जाएँ। पुराने ऋणों का भुगतान करने के लिए इस जन्म में आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। शनि हमें सांसारिक जिम्मेदारियों से जोड़े रखता है, हमें कष्ट देकर हमारी सहनशक्ति को बेहतर करता है। शनि और केतु दोनों व्यक्ति को अतीत के दुःख-दर्दों से बचने के लिए आश्रम की और भागने की प्रवृति देते हैं। जो लोग देश की जगह विदेश में रहने के इच्छुक है। यह योग ऐसे लोगों के लिए अनुकूल साबित होता हैकेतु ग्रह का स्वभाव है की वह दुनिया का सामना करने से बचना चाहता है। सफलता प्राप्ति के लिए वह कठिन परिश्रम करने से बचना चाहता है। इसके लिए गृहस्थ जीवन का त्याग कर सन्यास जीवन ग्रहण करता है। पूरे समय ध्यान और साधना में समय व्यतीत करता है और दुनिया की जिम्मेदारियों से नहीं निपटता है। शनि और केतु का एक साथ होना बड़ी संख्या में जातकों को पारिवारिक जीवन से हटाकर सन्यास, आश्रम जीवन की ओर लेकर जा सकता है। अवचेतन मन की चुनौतियों का ज्ञान देता है। मय बलवान होता है। हमें सभी शुभ फल की प्राप्ति होती है तथा किसी समय हमारे लिए निराशा का भी क्षण होता है।शनि के साथ केतु है तो काला कुत्ता कहा जाता है,शनि ठंडा भी है और अन्धकार युक्त भी है, दोस्तोंशनि राहु केतु के साथ के बिना कोई शुक्र सडक पर नही चल सकता है,शुक्र गाडी है,खाली शुक्र शनि है तो भार वाहक गाडी है,शुक्र के साथ राहु है तो सजी हुई गाडी है,गुरु का प्रभाव है तो हवाई जहाज भी है,केतु अगर कर्क के संचरण में है तो चार पहिये की गाडी है,वृश्चिक के संचरण में है तो आठ पहिये की गाडी है,और अगर किसी प्रकार से तुला या वृष का है तो दो पहिये के अलावा कुछ सामने नही आता है,गुरु केतु और शुक्र सही जगह पर है तो जातक हवाई जहाज उडाने की हैसियत रखता है,और अगर वह नकारात्मक पोजीसन में है तो जातक को पतंग उडाना सही रूप से आता होगा, आज इतना ही मित्रों बाकी अगले लेख के माध्यम से चर्चा करें आचार्य राजेश

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

#Planet#TransitIn #May&June2020

https://youtu.be/2A7UF80uvVsAstro Guru आचार्य राजेश कुमार
Planet Transit In May &June 2020:
By acharyaRajeshkumar
Planet Transit in May 2020:
 
मित्रों मई माह में कई ग्रह अपनी चाल बदलेंगे। इन ग्रहों में सूर्य, मंगल, बुध शामिल हैं। इस महीने बुध दो बार अपनी राशि बदलेगा। इसके साथ ही गुरु, शुक्र और शनि ग्रह वक्री होंगे। इन सभी ग्रहों की चाल का प्रभाव आप सभी के ऊपर शुभाशुभ रूप में पड़ेगा।4 मईको मंगल ग्रह कुंभ राशि में प्रवेश करेगा। इस राशि में यह 18 जून 2020 तक रहेगा। बुध ग्रह 9 मई को वृषभ राशि में प्रवेश करेगा।14 मई को सूर्य का मेष राशि से वृषभ राशि में प्रवेश होगा। सूर्य इस राशि में 15 जून 2020 तक रहेगा।25 मई को बुध अपनी स्वराशि में प्रवेश करेगा।11 मई को शनि वक्री होंगे। उनकी यह वक्री चाल 142 दिन तक रहेगी। इसके बाद 29 सितंबर को फिर से मार्गी हो जाएंगे। ज्योतिष में शनि का गोचर, वक्री और मार्गी होना बहुत ही महत्व होता है। इसका प्रभाव सभी पर पड़ता है 13 मई को शुक्र ग्रह वक्री होंगे। इसके बाद 25 जून 2020 को शुक्र मार्गी होगा। 14 तारीख को गुरु वक्री चाल चलेंगे और फिर 13 सितंबर 2020 को वह मार्गी होंगे। राहु केतु सदा ही बक्री चाल चलते हैंकुल 6ग्रह बक्री गति से होंगे प्लुटो सहित 7ग्रह होगेबक्री ग्रह अक्सर अप्रत्याशित रूप से अच्छे और बुरे दोनों परिणाम देते हैं। प्रतिगामी गति में ग्रह पृथ्वी के अधिक निकट होते हैं। इसलिए उनका प्रभाव अधिक महसूस होता है। प्रतिगामी गति में ग्रहों के कारक तत्वों की कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति में कुंडली के जिस घर में वक्री ग्रह होते हैं उनके परिणाम समुचित नहीं दे पाते हैं। इसलिए जब ग्रह वक्र हो तब किसी नई नीति या परियोजना को शुरू नहीं करना चाहिएसौर मंडल के सभी ग्रह पृथ्वी के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। लेकिन सांसारिक दृष्टिकोण से ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी नहीं चल रही है, और सभी ग्रह केंद्र के रूप में पृथ्वी के साथ घूम रहे हैं। यह सिर्फ एक ऑप्टिकल भ्रम है। इसलिए ग्रह रुकते हुए प्रतीत होते हैं, पीछे की ओर जाते हैं, फिर से रुकते हैं और आगे जाते हैं जिसे डायरेक्ट मोशन कहते हैं। सूर्य और चंद्रमा हमेशा प्रत्यक्ष गति में होते हैं (अर्थात, वे कभी पीछे नहीं चलते हैं) जबकि राहु और केतु हमेशा प्रतिगामी यानी वक्री होते हैं (अर्थात, वे हमेशा पीछे की ओर बढ़ते हैं)। पांच ग्रह, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि दोनों प्रत्यक्ष और प्रतिगामी गति में चलते हैं। कुल 9 ग्रह हैं जिनका प्रभाव हमारे जीवन और समाज पर होता है। इस बीच काल सर्प योग भी प्रभावी रहेगा। ज्योतिषीय दृष्टि से ग्रहों की ऐसी स्थिति शुभ नहीं होती है। पूरी दुनिया इन दिनों एक गंभीर संकट का सामना कर रही है ऐसे में 6 ग्रहों का एक साथ उलटी चाल में चलना क्या गुल खिलाएंगा 18 जून को बुध उलटी चाल से चलने लगेंगे। गौरतलब है कि 18 जून से 25 जून के बीच ये चारों ग्रह एक ही समय पर प्रतिगामी यानी वक्र रहेंगे। ग्रहों की यह स्थिति 15 जुलाई तक कालपुरुष कुंडली में बने काल सर्प दोष के साथ परस्पर व्याप्त होती है जिसका परिणाम चिंताजनक हो सकता है।प्रतिगामी शनि उन कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए शक्ति प्रदान करते है जिन्हें अतीत में अधूरा छोड़ दिया गया था। शनि 11 मई से 29 सितंबर तक मकर राशि में वक्री रहेंशनि का प्रतिगमन जिम्मेदारियों और काम के बोझ के साथ एक कठिन अवधि को दर्शाता है। लेकिन यह लोगों को अपने कौशल को अधिक निखारने और यथार्थवादी एवं व्यवहारिक बनने में भी मदद करेगा। कोरोनावायरस के कारण आने वाली चुनौतियों के समाधान के लिए नए कानून और नीतियां बनाई जा सकती हैं। न्यायिक सुधार और न्यायिक ढांचे का पुनर्गठन भी हो सकता है।शुक्र विलासिता, आराम, सौंदर्य और खुशी की भावना का ग्रह है। कालपुरुष की कुंडली में वह 2 और 7 भाव के स्वामी हैं। शुक्र 13 मई से 25 जून तक वृष राशि में वक्री रहेंगे जो इस अवधि के दौरान लोगों के सामान्य दृष्टिकोण में सुधार होगा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की समीक्षा की जाएगी। यात्रा और आतिथ्य उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए समर्थन और प्रोत्साहन मिल सकता है। साथ ही भारत के प्रतिष्ठा को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा मिलेगा।बृहस्पति ज्ञान और बुद्धिमत्ता के ग्रह हैं। प्रतिगामी गति में उनके शुभ परिणाम देने की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। बृहस्पति नवे और ग्यारहवें भाव के स्वामी है और 14 मई से 13 सितंबर तक मकर राशि में वक्री रहेंगे इस समय के दौरान देश में उन कार्यों और परियोजनाओं को फिर से शुरू करने की क्षमता बढ़ेगी जिन्हें पहले अधूरा छोड़ दिया गया था। यह वह समय है जब बीमार कंपनियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है और सरकार द्वारा वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज भी प्रदान किया जा सकता है। भारत के अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों को मजबूती मिल सकती है। इस समय जन आक्रोश और अशांति की आशंका रहेगी। मौजूदा कानूनों और नीतियों के खिलाफ धार्मिक समुदायों में भी असंतोष पैदा हो सकती है।बुध व्यापार, संचार व्यवस्था एवं नयी सोच का प्रतीक है। कालपुरुष कुंडली में, बुधक्षतीसरे ,छठे भाव के मालिक हैं। यह 18 जून से 12 जुलाई के बीच वृषभ राशि में वक्री रहेंगे, जो इस समय के दौरान कोरोनो वायरस के प्रभावों से निपटने के लिए नए विचार और समाधान सामने आ सकते हैं। पड़ोसियों देशों के साथ संवाद में व्यवधान आ सकता है। यह भी गौरतलब है कि 18 जून से 25 जून के बीच चार ग्रह – शनि, बृहस्पति, शुक्र और बुध – एक ही समय में प्रतिगामी गति में होंगे जो भ्रम और अराजकता पैदा कर सकते हैं।जून और जुलाई के महीने में करीब 30 दिन के अंदर तीन ग्रहण लगने जा रहे हैं ऐसे में इसका क्या असर होगा जानिए
जब भी किसी एक महीने में दो से अधिक ग्रहण पड़े और पाप ग्रहों का भी उस पर प्रभाव रहे तो वह समय जनता के लिए कष्टकारी होगा।
मित्रों6 जून से 5 जुलाई के बीच तीन ग्रहण लगने जा रहे हैं। इनमें से दो ग्रहण भारत में दृश्य होंगे। 5/6 जून को लगने वाला चंद्र ग्रहण यूरोप, भारत सहित एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी दिखाई देगा। 21 जून को पड़ने वाला सूर्य ग्रहण भारत सहित एशिया के कई दूसरे राज्यों, यूरोप और अफ्रीका में भी दिखेगा।
इसके बाद 4/5 जुलाई को लगने जा रहा चंद्र ग्रहण अफ्रीका और अमेरिका में नजर आएगा। इन तीनों ग्रहणों में से पहले दो ग्रहण, जो कि आषाढ़ कृष्ण पक्ष में पड़ेंगे, वह भारत में दृश्य होंगे। अंतिम ग्रहण जो कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष में है वह भारत में दिखाई नहीं देगा। इन ग्रहणों का मिथुन और धनु राशि के अक्ष को पीड़ित करना अमेरिका और पश्चिम के देशों के लिए विशेष रूप से अशुभ होगा।
भारत और विश्व के लिए 21 जून का सूर्य ग्रहण बेहद संवेदनशील है। मिथुन राशि में होने जा रहे इस ग्रहण के समय मंगल जलीय राशि मीन में स्थित होकर सूर्य, बुध, चंद्रमा और राहु को देखेंगे जिससे अशुभ स्थिति का निर्माण होगा। इसके अलावा ग्रहण के समय 6 ग्रह शनि, गुरु, शुक्र और बुध वक्र होंगे। राहु केतु हमेश वक्र चलते हैं इसलिए इनको मिलकर कुब 6 ग्रह वक्री रहेंगे, जो शुभ फलदायी नहीं है। इस स्थिति में संपूर्ण विश्व में बड़ी उथल-पुथल मचेगी।
ग्रहण के समय इन बड़े ग्रहों का वक्री होना प्राकृतिक आपदाओं जैसे अत्यधिक वर्षा, समुद्री चक्रवात, तूफान, महामारी आदि से जन-धन की हानि कर सकता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका को जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई में भयंकर वर्षा एवं बाढ़ से जूझना पड़ सकता है। ऐसे में महामारी और भोजन का संकट इन देशों में कई स्थानों पर हो सकता है। मंगल जल तत्व की राशि मीन में पांच माह तक रहेंगे ऐसे में वर्षा काल में आसामान्य रूप से अत्यधिक वर्षा और महामारी का भय रहेगा। ग्रहण के समय शनि और गुरु का मकर राशि में वक्री होना इस बात की आशंका को जन्म दे रहा है कि चीन के साथ पश्चिमी देशों के संबंध बेहद खराब हो सकते है
भारत के पश्चिमी हिस्सों में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान में राजनीतिक उठा-पटक चिंता का कारण बनेगी तथा हिंद महासागर में चीन की गतिविधयों से तनाव बढ़ेगा। शनि, मंगल और गुरु इन तीनों ग्रहों के प्रभाव से विश्व में आर्थिक मंदी का असर एक वर्ष तक बना रहेगा।

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

#लॉकडाउन3मई। 3 मई के बाद जब lockdown खुलेगा क्या कहती है ग्रहों के गोचर की स्थिति?


मित्रों मैंने पहले भी एक पोस्ट डाली थी उसमें मैंने कहां धा कि 14तारीक को सुर्य उच्च के होंगेपर सुर्य10अश पर उच्च के होते हैं जो 24/42020को होोंगेउस  के बाद सुघार आना शुरू हो जाएगा लेकिन देश के कुछ ही हिस्सोमे मेरी गणना के अनुसार मंगल, वह 22 मार्च को शनि की राशि मकर में आए। यहां आकर मंगल उच्च के हो गए। इससे मंगल का प्रभाव बढ़ गया। कमाल की बात देखिए इसी दिन जनता कर्फ्यू लगाया गया। इसके बाद 24 मार्च से पूरे देश में लॉक डाउन घोषित कर दिया गया और अब 4 मई से जब लॉक डाउन समाप्त होगा तो मंगल भी मकर से निकलेंगे। यानी इन दिनों जो पूरी दुनिया में तबाही मची हुई है उसमें मंगल और शनि का बड़ा युघ है। शनि मंगल के योग के समाप्त होते ही दुनिया भर में फैले कोरोना के कहर में कमी आने लगेगी भारत में कोरोना पीडि़तों की संख्या 30 मार्च को अचानक से बढ गयी जब तबलिगी जमात के कारण यहां भी कमाल की बात यह रही कि इसी दिन गुरु मकर राशि में पहुंचे और शनि मंगल के बीच में फंसकर पीड़ित हो गए। गुरु के पीड़ित होने से धर्म-कर्म के कार्यों में बाधा आ रही है। मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद, चर्च सभी सीमित तरीके से अपने दैनिक कार्यों को पूरा कर पा रहे हैं। लेकिन 4 मई को मंगल मकर राशि से निकल कर कुंभ राशि में आ जाएंगे। इससे बृहस्पति को बल मिलेगा। जनता के बीच डर ओर खोफ कम होने लगेगा।सूर्य देव13 अप्रैल से उच्च राशि राशि मेष में विराजमान हैं। 4 मई से मंगल के मकर से कुंभ में जाने के बाद बृहस्पति अपनी पूर्ण शक्ति से फल देने में सक्षम हो जाएंगे और धीरे-धीरे अपने सुधारात्मक प्रभाव से लोगों के जीवन में उन्नति को सुनिश्चित करेंगे। किन्त बृहस्पति, जो स्थिरता एवं विकास के प्रतीक हैं, इस समय तेज गति में चल रहे हैं जिसे ज्योतिषीय भाषा में बक्री गति से उल्टी चाल से कहा गया है। इस स्थिति में विकास दिखेगा लेकिन यह सच से दूर हो सकता है।11 मई को शनि और 14 मई को बृहस्पति (वक्री) हो जाएंगे। जब भी कोई ग्रह अपनी नीच राशि में होकर बक्री हो जाता है तो वह उच्चतम फल देता है। बृहस्पति का निश्चित रूप से मौजूदा स्थिति में तनाव काम करेगा। जहां तक ​​निर्णय लेने का सवाल है, यह सबसे महत्वपूर्ण अवधियों में से एक होगा। विश्व के नेताओं को अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और व्यवसायों को बचाने के लिए कुछ सख्त निर्णय लेने की आवश्यकता होगी। यह मौजूदा नीतियों के आत्मनिरीक्षण और समीक्षा का समय होगा। 30 जून को, प्रतिगामी बृहस्पति अपनी राशि धनु में आ जाएंगे जिससे उन्हें और अधिक बल मिलेगा। इस स्थिति में वह राहु और केतु की नकारात्मक ऊर्जा को कम करेंगे। इस स्थिति के कारण, विश्व अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए एक सामान्य रोडमैप पर वैश्विक नेताओं के बीच आम सहमति होने की संभावना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की भूमिका जांच के दायरे में आएगी और एक नई विश्व स्वास्थ्य एजेंसी के गठन का विचार होगा। 21june को सुर्य ग्रहण होगाभारत और विश्व के लिए 21 जून का सूर्य ग्रहण बेहद संवेदनशील है। मिथुन राशि में होने जा रहे इस ग्रहण के समय मंगल जलीय राशि मीन में स्थित होकर सूर्य, बुध, चंद्रमा और राहु को देखेंगे जिससे अशुभ स्थिति का निर्माण होगा। इसके अलावा ग्रहण के समय 6 ग्रह शनि, गुरु, शुक्र और बुध वक्र होंगे। राहु केतु हमेश वक्र चलते हैं इसलिए इनको मिलकर कुब 6 ग्रह वक्री रहेंगे, जो शुभ फलदायी नहीं है। इस स्थिति में संपूर्ण विश्व में बड़ी उथल-पुथल मचेगी।ग्रहण के समय इन बड़े ग्रहों का वक्री होना प्राकृतिक आपदाओं जैसे अत्यधिक वर्षा, समुद्री चक्रवात, तूफान, महामारी आदि से जन-धन की हानि कर सकता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका को जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई में भयंकर वर्षा एवं बाढ़ से जूझना पड़ सकता है। विस्फोटक स्थिति बनेगी ऐसे में कुछ देशों में तनातनी तनाव का माहोल वन सकता है आग से संबंधित घटनाएं घटित हो थी नजर आ रही है महामारी और भोजन का संकट विश्व के कुछ देशों में कई स्थानों पर हो सकता है।इस वर्ष मंगल जल तत्व की राशि मीन में पांच माह तक रहेंगे ऐसे में वर्षा काल में आसामान्य रूप से अत्यधिक वर्षा और महामारी का भय रहेगा। ग्रहण के समय शनि और गुरु का मकर राशि में वक्री होना इस बात की आशंका को जन्म दे रहा है कि चीन के साथ पश्चिमी देशों के संबंध बेहद खराब हो सकते हैं।भारत के पश्चिमी हिस्सों में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान में राजनीतिक उठा-पटक चिंता का कारण बनेगी तथा हिंद महासागर में चीन की गतिविधयों से तनाव बढ़ेगा। शनि, मंगल और गुरु इन तीनों ग्रहों के प्रभाव से विश्व में आर्थिक मंदी का असर अगस्त 2021 तक बना रहेगा।इस वर्ष आषाढ़ के महीने में 6 जून से 5 जुलाई के बीच तीन ग्रहण लगने जा रहे हैं। इनमें से दो ग्रहण भारत में दृश्य होंगे।सके बाद 4/5 जुलाई को लगने जा रहा चंद्र ग्रहण अफ्रीका और अमेरिका में नजर आएगा। इन तीनों ग्रहणों में से पहले दो ग्रहण, जो कि आषाढ़ कृष्ण पक्ष में पड़ेंगे, वह भारत में दृश्य होंगे। अंतिम ग्रहण जो कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष में है वह भारत में दिखाई नहीं देगा। इन ग्रहणों का मिथुन और धनु राशि के अक्ष को पीड़ित करना अमेरिका और पश्चिम के देशों के लिए विशेष रूप से अशुभ होगा। मित्रों जिनकी भी कुंडली में सूर्य के साथ राहु या केतु चंद्र के साथ राहु केतु की युति हो वो लोग अपनी-अपनी कुंडली अभी से दिखा कर उपाय करें कुछ उपाय ग्रहण के समय ओर कुछ पहले ही शुरू करने चाहिए आज इतना ही मित्रों आगे फिर से आपको जानकारी देंगे आचार्य राजेश

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?

कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?https://youtu.be/B-yfoSy0s2Iकब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?

कोरोना वायरस के लगातार सामने आते मामलों के बीच देशभर को लॉकडाउन (21 Days Lockdown) कर दिया गया हैयह लॉकडाउन आपके भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से किसी भी कीमत पर घर के बाहर नहीं निकलने की सलाह दी है। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का संकल्प जो हमने लिया था उसकी सिद्धी के लिए भारत के लोगों ने योगदान दिया। बहुत से मित्रों ने जानकारों ने पूछा है। lockdown कब तक चलेगा मित्रों 24तारीख रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने यह घोषणा की उस समय की कर कुंडली देखी जाए तो तुला लग्न बनता है और शनि और मंगल तुला लग्न मकर राशि में चौथे घर में विराजमान है।
 मंगलदेब ने (23तारीख को इस राशि में प्रवेश कर शनि देव के साथ युति की मकर राशि शनि की अपनी राशि है। मंगल देव यहां उच्च के है एक मंगल देव ही ऐसा ग्रह है जो दुश्मन की राशि में जाकर उच्च का हो जाता है  चोथा घर जनता का है ।और मंगल देब सेनापति (4मई )तक मंगल मकर में ही रहेंगे मंगल पुलिस का कारक है सेना का कारक है यानि इस corona virus को रोकने के लिए पुरी सख्ती रखीं जाएंगी और सरकार पुलिस ओर सेना का प्रयोग पुरी तरह से करेंगी 4मई, के बाद ही lockdown कम होने के आसार नजर आते हैं26मार्च से 30जून ,तक का समय भारी है उसके बाद सुघार आना शुरू हो जाएगा 
मित्रों अपने आप को हिफाजत से रखें बचा कर रखें  घर में रहे  आचार्य राजेश

कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?

कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?

कोरोना वायरस के लगातार सामने आते मामलों के बीच देशभर को लॉकडाउन (21 Days Lockdown) कर दिया गया हैयह लॉकडाउन आपके भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से किसी भी कीमत पर घर के बाहर नहीं निकलने की सलाह दी है। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का संकल्प जो हमने लिया था उसकी सिद्धी के लिए भारत के लोगों ने योगदान दिया। बहुत से मित्रों ने जानकारों ने पूछा है। lockdown कब तक चलेगा मित्रों 24तारीख रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने यह घोषणा की उस समय की कर कुंडली देखी जाए तो तुला लग्न बनता है और शनि और मंगल तुला लग्न मकर राशि में चौथे घर में विराजमान है।
 मंगलदेब ने (23तारीख को इस राशि में प्रवेश कर शनि देव के साथ युति की मकर राशि शनि की अपनी राशि है। मंगल देव यहां उच्च के है एक मंगल देव ही ऐसा ग्रह है जो दुश्मन की राशि में जाकर उच्च का हो जाता है  चोथा घर जनता का है ।और मंगल देब सेनापति (4मई )तक मंगल मकर में ही रहेंगे मंगल पुलिस का कारक है सेना का कारक है यानि इस corona virus को रोकने के लिए पुरी सख्ती रखीं जाएंगी और सरकार पुलिस ओर सेना का प्रयोग पुरी तरह से करेंगी 4मई, के बाद ही lockdown कम होने के आसार नजर आते हैं तब तक मित्रों अपने आप को हिफाजत से रखें बचा कर रखें  घर में रहे  आचार्य राजेश

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

लाल किताब के अनुसार सुर्य/Surya according to Lal Kitab /

www.acharyarajesh.in
जगत का स्वामी सूर्य है सभी ग्रह और नक्षत्र सूर्य के आसपास ही चक्कर लगा रहे है,वेदो मे सूर्य की आराधना सबसे अच्छी मानी गयी है जो भी संसार मे दिखाई देता है वह सब सूर्य की कृपा से ही सम्भव है,विद्वान लोग सूर्य आराधना के लिये मुख्य स्तोत्र विष्णु सहस्त्र नाम को ही मानते है। सूर्य का कुंडली मे पक्का घर एक पांच आठ नौ ग्यारह और बारह को ही कहा गया है सूर्य के मित्र ग्रहो में चन्द्रमा को भी माना गया है गुरु भी सूर्य का मित्र है और मंगल को भी सूर्य का मित्र तथा सहायक और सूर्य की रक्षा करने वाला कालान्तर के लिये सूर्य की गर्मी को सोख कर सूर्य की अनुपस्थिति मे संसार को गर्मी देने वाला माना गया है। साथ ही धरती के अन्दर के जीवो को गर्मी देने के लिये सूर्य का सहायक मंगल ही काम करता और उर्जा को देने के लिये अपनी शक्ति से सूर्य की गर्मी को सोख कर जीवो को प्रदान काता है। सूर्य पहले घर मे उच्च का माना जाता है और सातवे घर मे नीच का माना जाता है।
सूर्य का समय सुबह सूर्योदय से एक घंटे के लिये और दिन रविवार माना गया है।सूर्य के खराब होने बुखार आना आंखो की रोशनी कम होना दिमाग के चढे रहने से सिर की तकलीफ़ रहना आदि माना जाता है साथ ही बिना बात के सरकारी आफ़तो का आना भी सूर्य के कारण ही होता है। सूर्य के बिना जो जीवन मे अपनी गति को प्रदान करने वाले ग्रह बुध और बुध के बाद शुक तथा शुक्र के बाद चन्द्रमा फ़िर धरती और उसके बाद मंगल को माना जाता है शुक्र और बुध को सूर्य के अधिक पास होने के कारण मनसुई ग्रह की उपाधि भी दी गयी है। जब जातक की कुंडली मे सूर्य पहले पांचवे और ग्यारहवे घर मे होता है तो इसकी शक्ति को श्रेष्ठ माना जाता है जब भी मंगल छठे घर मे होता है और केतु अगर पहले घर मे हो तो भी सूर्य सही फ़ल प्रदान करता है सूर्य की शक्ति कभी नीच की नही होती है यह अपनी नीचता को दूसरे ग्रह से जोड कर प्रदान करता है। सूर्य के अच्छे होने की पहिचान होती है कि व्यक्ति का हड्डी का ढांचा सुडौल और ऊंचा होने से लम्बाई और चौडाई अच्छी होती है सूर्य का कारक अंग आंखे होने से आंखे बडी और चमकदार होती है सूर्य से पहिचान का कारण होने से सूर्य उच्च कुल मे जन्म देने के साथ साथ चेहरे पर राजसी चमक का देने वाला भी होता है। सूर्य की शक्ति के कारण ही जातक के अन्दर साहस भी होता है हिम्मत भी होती है और जहां भी नीचता वाले कारण यानी शनि की सीमा शुरु होती है सूर्य के पहुंचने के साथ ही शनि की सीमा समाप्त हो जाती है। सूर्य किसी भी विकट परिस्थिति मे जिन्दा रखने की ताकत देता है यह जंगलो मे निवास के समय जडी बूटियों की पहिचान करवा देता है महलो मे रहने पर राजसी ठाटबाट को भी देने वाला होता है और राजसी कारणो को समझाने वाला और कानून को बनाने वाला भी माना जाता है। सूर्य अगर सशक्त है तो कोई भी दुश्मन ठहर नही पाता है वह पीठ पीछे बुराई कर सकता है लेकिन सामने आकर जी हुजूरी ही करता है। मंगल के साथ अगर सूर्य सही होता है तो वह रक्षा सेवा या सामाजिक कारणो मे अपने नाम और यश को फ़ैलाने मे सहायक हो जाता है। लेकिन शनि की नीचता के आते ही यानी किसी भी कारण मे रिस्वत तामसी भोजन या पर स्त्री पर पुरुष के संसर्ग से अपनी शक्ति को समेट लेता है साथ ही आगे के जीवन को घोर यातना मे ले जाता है शनि के सवार होते ही राहु का प्रकोप शुरु हो जाता है और जेल जाना या अस्पताल मे अपनी जिन्दगी को काटने के लिये मजबूर कर देता है। जब भी बेकार के ख्याल आने लगे लोग अधिक चमचागीरी करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि सूर्य खराब होना शुरु हो गया है। सूर्य कभी भी दूसरो के ऊपर मोहताज नही होता है वह हमेशा अपनी कमाई पर ही निर्भर रहने वाला होता है उसे दान और इसी प्रकार के कारण देने तो आते है लेकिन वह लेना नही जानता है,सूर्य श्रेष्ठ वाला व्यक्ति कभी भी अपनी मर्यादा से बाहर नही जाता है वह अपनी जाति कुल और समाज को पहले देखकर चलने वाला होता है। सूर्य के सही फ़ल देने के कारण सभी ग्रह अपने अपने समय मे अच्छा फ़ल देने लगते है लेकिन बुध उम्र की जवानी की शुरुआत तक कुछ भी फ़ल नही देता है शनि जातक के पिता की आय पर और खुद की कमाई पर प्रभाव देने लगता है। सूर्य जब भी खराब होता है लार आना शुरु हो जाता है,कभी कभी शरीर का कोई एक हिस्सा अचानक काम करना बन्द कर देता है और उसी समय मे शरीर की हड्डी का टूटना या लम्बे समय के लिये चल फ़िर नही पाना आदि बाते भी देखी जाती है। जातक के पहले घर मे सूर्य के साथ अन्य कोई शत्रु ग्रह होता है तो वह सूर्य पर अपना प्रभाव डालने लगता है और जातक को कष्ट देता है लेकिन कोई भी कष्ट दिन के समय मे नही होता है रात को ही कष्ट होना माना जाता है,अगर सूर्य और शनि आमने सामने है तो कष्ट नही मिल पाते है इसका कारण होता है कि दिन मे सूर्य बचाता है और रात मे शनि रक्षा करने वाला होता है इसलिये पहले घर मे सूर्य को उच्च का कहा जाता है और सप्तम स्थान मे शनि को उच्च का कहा गया है।लाल किताब के अनुसार शुक्र और बुद्ध एक ही जगह हैं, तो वे सूर्य हैं। सूर्य गुरु के साथ है, तो चन्द्र है। सूर्य बुध के साथ है, तो मंगल नेक है। सूर्य शनि के साथ है, तो मंगल बद राहु होगा।Surya according to Lal Kitab /

ग्रहों में चन्द्र (ठंडक-सर्दी), मंगल (लाली) और बुध (खाली घेरा) सूर्य के आवश्यक अंग हैं। इन ग्रहों का सूर्य के साथ होना शुभ है। सूर्य के साथ राहु-केतु के आ जाने पर ग्रहण माना जाएगा। पहले घर को जगाने के लिए मंगल का उपाय और 5वें के लिए सूर्य का उपाय करना चाहिएं सूर्य जब भी राहु के साथ होगा आदमी के विचार गंदे हो जायेंगे वह जब भी सोचेगा गलत ही सोचेगा,सूर्य और शनि की टकराव वाली स्थिति मे चन्द्रमा दिक्कत मे आजाता है यानी घर मे अगर पिता पुत्र आपस मे टकराने लगे तो माता को कष्ट पहुंचता है इसी प्रकार से अगर यह स्थिति हो तो सूर्य के विरोधी ग्रहो का उपचार करने से सूर्य और शनि की स्थिति सही होने लगती है।सूर्य अगर जन्म कुंडली के छठे या सातवे भाव मे हो तो किसी भी काम को शुरु करने से पहले कुछ मीठा खाकर काम शुरु करना चाहिये.इसके बाद जनता मे मीठी वस्तुयें बांटने से भी फ़ायदा होता है,रत्न धारण मे सूर्य जब अपने नक्षत्र मे हो उस समय सुबह के समय रविवार को Rd मे या सोने मे माणिक का पहिनना ठीक होता है।

लाल किताब के अनुसार सुर्य/Surya according to Lal Kitab /

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जगत का स्वामी सूर्य है सभी ग्रह और नक्षत्र सूर्य के आसपास ही चक्कर लगा रहे है,वेदो मे सूर्य की आराधना सबसे अच्छी मानी गयी है जो भी संसार मे दिखाई देता है वह सब सूर्य की कृपा से ही सम्भव है,विद्वान लोग सूर्य आराधना के लिये मुख्य स्तोत्र विष्णु सहस्त्र नाम को ही मानते है। सूर्य का कुंडली मे पक्का घर एक पांच आठ नौ ग्यारह और बारह को ही कहा गया है सूर्य के मित्र ग्रहो में चन्द्रमा को भी माना गया है गुरु भी सूर्य का मित्र है और मंगल को भी सूर्य का मित्र तथा सहायक और सूर्य की रक्षा करने वाला कालान्तर के लिये सूर्य की गर्मी को सोख कर सूर्य की अनुपस्थिति मे संसार को गर्मी देने वाला माना गया है। साथ ही धरती के अन्दर के जीवो को गर्मी देने के लिये सूर्य का सहायक मंगल ही काम करता और उर्जा को देने के लिये अपनी शक्ति से सूर्य की गर्मी को सोख कर जीवो को प्रदान काता है। सूर्य पहले घर मे उच्च का माना जाता है और सातवे घर मे नीच का माना जाता है।
सूर्य का समय सुबह सूर्योदय से एक घंटे के लिये और दिन रविवार माना गया है।सूर्य के खराब होने बुखार आना आंखो की रोशनी कम होना दिमाग के चढे रहने से सिर की तकलीफ़ रहना आदि माना जाता है साथ ही बिना बात के सरकारी आफ़तो का आना भी सूर्य के कारण ही होता है। सूर्य के बिना जो जीवन मे अपनी गति को प्रदान करने वाले ग्रह बुध और बुध के बाद शुक तथा शुक्र के बाद चन्द्रमा फ़िर धरती और उसके बाद मंगल को माना जाता है शुक्र और बुध को सूर्य के अधिक पास होने के कारण मनसुई ग्रह की उपाधि भी दी गयी है। जब जातक की कुंडली मे सूर्य पहले पांचवे और ग्यारहवे घर मे होता है तो इसकी शक्ति को श्रेष्ठ माना जाता है जब भी मंगल छठे घर मे होता है और केतु अगर पहले घर मे हो तो भी सूर्य सही फ़ल प्रदान करता है सूर्य की शक्ति कभी नीच की नही होती है यह अपनी नीचता को दूसरे ग्रह से जोड कर प्रदान करता है। सूर्य के अच्छे होने की पहिचान होती है कि व्यक्ति का हड्डी का ढांचा सुडौल और ऊंचा होने से लम्बाई और चौडाई अच्छी होती है सूर्य का कारक अंग आंखे होने से आंखे बडी और चमकदार होती है सूर्य से पहिचान का कारण होने से सूर्य उच्च कुल मे जन्म देने के साथ साथ चेहरे पर राजसी चमक का देने वाला भी होता है। सूर्य की शक्ति के कारण ही जातक के अन्दर साहस भी होता है हिम्मत भी होती है और जहां भी नीचता वाले कारण यानी शनि की सीमा शुरु होती है सूर्य के पहुंचने के साथ ही शनि की सीमा समाप्त हो जाती है। सूर्य किसी भी विकट परिस्थिति मे जिन्दा रखने की ताकत देता है यह जंगलो मे निवास के समय जडी बूटियों की पहिचान करवा देता है महलो मे रहने पर राजसी ठाटबाट को भी देने वाला होता है और राजसी कारणो को समझाने वाला और कानून को बनाने वाला भी माना जाता है। सूर्य अगर सशक्त है तो कोई भी दुश्मन ठहर नही पाता है वह पीठ पीछे बुराई कर सकता है लेकिन सामने आकर जी हुजूरी ही करता है। मंगल के साथ अगर सूर्य सही होता है तो वह रक्षा सेवा या सामाजिक कारणो मे अपने नाम और यश को फ़ैलाने मे सहायक हो जाता है। लेकिन शनि की नीचता के आते ही यानी किसी भी कारण मे रिस्वत तामसी भोजन या पर स्त्री पर पुरुष के संसर्ग से अपनी शक्ति को समेट लेता है साथ ही आगे के जीवन को घोर यातना मे ले जाता है शनि के सवार होते ही राहु का प्रकोप शुरु हो जाता है और जेल जाना या अस्पताल मे अपनी जिन्दगी को काटने के लिये मजबूर कर देता है। जब भी बेकार के ख्याल आने लगे लोग अधिक चमचागीरी करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि सूर्य खराब होना शुरु हो गया है। सूर्य कभी भी दूसरो के ऊपर मोहताज नही होता है वह हमेशा अपनी कमाई पर ही निर्भर रहने वाला होता है उसे दान और इसी प्रकार के कारण देने तो आते है लेकिन वह लेना नही जानता है,सूर्य श्रेष्ठ वाला व्यक्ति कभी भी अपनी मर्यादा से बाहर नही जाता है वह अपनी जाति कुल और समाज को पहले देखकर चलने वाला होता है। सूर्य के सही फ़ल देने के कारण सभी ग्रह अपने अपने समय मे अच्छा फ़ल देने लगते है लेकिन बुध उम्र की जवानी की शुरुआत तक कुछ भी फ़ल नही देता है शनि जातक के पिता की आय पर और खुद की कमाई पर प्रभाव देने लगता है। सूर्य जब भी खराब होता है लार आना शुरु हो जाता है,कभी कभी शरीर का कोई एक हिस्सा अचानक काम करना बन्द कर देता है और उसी समय मे शरीर की हड्डी का टूटना या लम्बे समय के लिये चल फ़िर नही पाना आदि बाते भी देखी जाती है। जातक के पहले घर मे सूर्य के साथ अन्य कोई शत्रु ग्रह होता है तो वह सूर्य पर अपना प्रभाव डालने लगता है और जातक को कष्ट देता है लेकिन कोई भी कष्ट दिन के समय मे नही होता है रात को ही कष्ट होना माना जाता है,अगर सूर्य और शनि आमने सामने है तो कष्ट नही मिल पाते है इसका कारण होता है कि दिन मे सूर्य बचाता है और रात मे शनि रक्षा करने वाला होता है इसलिये पहले घर मे सूर्य को उच्च का कहा जाता है और सप्तम स्थान मे शनि को उच्च का कहा गया है।लाल किताब के अनुसार शुक्र और बुद्ध एक ही जगह हैं, तो वे सूर्य हैं। सूर्य गुरु के साथ है, तो चन्द्र है। सूर्य बुध के साथ है, तो मंगल नेक है। सूर्य शनि के साथ है, तो मंगल बद राहु होगा।Surya according to Lal Kitab /

ग्रहों में चन्द्र (ठंडक-सर्दी), मंगल (लाली) और बुध (खाली घेरा) सूर्य के आवश्यक अंग हैं। इन ग्रहों का सूर्य के साथ होना शुभ है। सूर्य के साथ राहु-केतु के आ जाने पर ग्रहण माना जाएगा। पहले घर को जगाने के लिए मंगल का उपाय और 5वें के लिए सूर्य का उपाय करना चाहिएं सूर्य जब भी राहु के साथ होगा आदमी के विचार गंदे हो जायेंगे वह जब भी सोचेगा गलत ही सोचेगा,सूर्य और शनि की टकराव वाली स्थिति मे चन्द्रमा दिक्कत मे आजाता है यानी घर मे अगर पिता पुत्र आपस मे टकराने लगे तो माता को कष्ट पहुंचता है इसी प्रकार से अगर यह स्थिति हो तो सूर्य के विरोधी ग्रहो का उपचार करने से सूर्य और शनि की स्थिति सही होने लगती है।सूर्य अगर जन्म कुंडली के छठे या सातवे भाव मे हो तो किसी भी काम को शुरु करने से पहले कुछ मीठा खाकर काम शुरु करना चाहिये.इसके बाद जनता मे मीठी वस्तुयें बांटने से भी फ़ायदा होता है,रत्न धारण मे सूर्य जब अपने नक्षत्र मे हो उस समय सुबह के समय रविवार को Rd मे या सोने मे माणिक का पहिनना ठीक होता है।

मंगलवार, 24 मार्च 2020

शक्ति की उपासना


जगत में शक्ति के बिना कोई काम सफल नहीं होता है। चाहे आपका सिद्धांत कितना भी अच्छा हो, आपके विचार कितने ही सुंदर हों लेकिन अगर आप शक्तिहीन हैं तो आपके विचारों का कोई मूल्य नहीं होगा। विचार अच्छा है, सिद्धांत अच्छा है, इसीलिए सर्वमान्य हो जाता है ऐसा नहीं है। शक्ति ही जीवन है और जीवन ही शक्ति है
शक्ति उपासना व साधना के विविध प्रयोग अनादिकाल से साधको ने किये है,जिसके अनेक विधि-विधायें मिलती है शक्ति उपासना से लोकजीवन में सहज अभिष्ट सिद्धि प्राप्त होती रही है ।इस लिए इसके प्रति गहरा आकर्षण भी रहा है,इस मार्ग के अनुयायी बडे बडे साधु महात्मा हो गये है। परन्तु वर्तमान काल मे इस उपासना के रूप और स्वरूप मे प्राय: ऐसा परिवर्तन देखने मे आता है जिससे विदित होता है किस इस मार्ग के साधारण उपासक अधिकांश मे इस उपासना के वास्तविक रूप और स्वरूप से अपरिचित है। शक्ति का अर्थ सभी को पता है और उपासना का अर्थ पास मे होना अपने समीप समझना माना जाता है। शक्ति साधना का मतलब होता है कि उस साधन के समीप बैठा जाये या उस साधन को प्रयोग किया जाये जिससे शक्ति की प्राप्ति हो। शक्ति कोई भौतिक रूप मे देखने को भी मिलती है और आध्यात्मिक तरीके से भी महसूस की जाती है। मनुष्य के अन्दर जब ज्ञान के नेत्र खुल जाते है वह जड पदार्थो की सहायता से भौतिक शक्ति का निर्माण कर देता है जैसे सिलीकोन जो एक मिट्टी की तरह की राख ही है,इस राख के अन्दर वह तरह तरह के प्रयोग करने के बाद कम्पयूटर जैसी याद दास्त को संजोकर रखने वाली चीजों का निर्माण कर सकने मे समर्थ हो सकता है। शक्ति का बीज सबसे पहले मनुष्य के शरीर मे ही उपस्थिति होता है। इसी शक्ति की सहायता से माया को अपने आधीन किया जाता है। माया के आधीन होने पर जीव निर्बन्ध होकर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। इस नजर से शक्ति उपासना को मुक्ति का साधन भी माना गया है। शक्ति के रूप और स्वरूप को बिना बताये या समझे उपासना का मतलब भी समझ मे नही आ सकता है। इसलिये शक्ति के रूप और स्वरूप को समझना बेहद जरूरी है।
मनुष्य शरीर एक लघु ब्रह्माण्ड है। ब्रह्माण्ड मे रहने वाले सभी पदार्थ लघु रूप मे मनुष्य शरीर मे विद्यमान है। इस प्रकार से जो भी उपासक कुछ प्राप्त करने का प्रयत्न करता है वह अपने साधनों से अपने अन्दर की शक्ति को इकट्ठा करने के बाद ही प्राप्त करता है। जो भी पदार्थों के रूप मे शरीर मे विद्यमान तत्व है उन्हे इकट्ठा करने के बाद ही वह उन्हे वश मे करता है। और उन पदार्थो को अपने वश मे लाकर प्रयोग मे लाता है। इस प्रकार से इस माया को जीतने की शक्ति प्राप्त करने का इच्छुक है वह शक्ति उपासना से अपने भीतर रहने वाले उस शक्ति तत्व को बल देकर उसे काम मे लाता है। जिससे माया उसके आधीन हो जाती है। इसके बाद जो महत्वपूर्ण बात है कि वे साधन कौन कौन से हैं जिनके द्वारा माया को अपने आधीन रखने की शक्ति को प्राप्त किया जाये ? उन्ही साधनो को जानना उन साधनो के रूप और स्वरूप को समझना ही शक्ति उपासना के रूप और स्वरूप को समझना माना गया है।
प्राचीन ऋषियों महात्माओं ने अपनी खोज के द्वारा दो प्रकार के शक्ति उपासना के रूप और स्वरूप पहिचाने है। जिसमे पहला होता है योग साधन और दूसरा होता है मंत्र जाप। योग के अन्दर अष्टांग योग लय योग सुरत शब्द योग राजयोग हंस योग आदि की अनगिनत शाखायें है। दूसरा साधन मंत्र जाप को माना है। आजकल की भागम-भाग जिन्दगी मे योग साधन को अपनाना बहुत ही कठिन है साथ ही आहार विहार का समय स्थान आदि भी नही मिलता है,कंकरीट के जंगल मे पेडों की हरियाली खोजने मे ही इतना समय लग जायेगा कि योग तो धरा रह जायेगा और रोजाना की जिन्दगी की जरूरते भी पूरी नही हो पायेंगी इसलिये मंत्र जाप का करना हर व्यक्ति की पहुँच मे है।मंत्रो के भी दो भाग बताये गये है एक तो वेदोक्त होता है और दूसरा साबर मंत्रो के रूप मे जाना जाता है। वैदिक मंत्रो का प्रयोग साबर मंत्रो से बहुत ऊँचा माना जाता है क्योंकि उनकी शुद्धता वेदों से परख कर ही प्रकट की जाती है जबकि साबर मंत्र स्थानीय लोगों द्वारा पता नही किस देवता आदि के लिये प्रयोग किये जाते है उनके बोलने की कला और भाव प्रकट करना वश की बात नही होती है। लेकिन वैदिक मंत्र को कहीं से भी खोजा भी जा सकता है और उसके भाव को भी तरह तरह के स्थान और कारणो से समझा भी जा सकता है। वैदिक मंत्र के जप से फ़ल भी शीघ्रता से मिलता है,परन्तु मन्त्र जाप की सफ़लता के लिये भी दो नियम जरूरी है। पहला तो मंत्र का उच्चारण शुद्ध होना चाहिये,उच्चारण मे जरा सी गल्ती से मिलने वाले लाभ की जगह पर हानि होने की अधिक सम्भावना भी रहती है। दूसरा नियम मंत्र जाप विधिपूर्वक होना चाहिये,बिना विधि के जाप करने से भी फ़ायदा की जगह पर नुकसान होने का कारण बन जाता है।
आजकल वैदिक मंत्रो का जाप प्राय: लुप्त सा हो गया है,साबर मंत्रो का प्रचलन है और उनकी विधि को सही रूप से नही समझने या समझाने वाले नही मिलने के कारण भी अगर कोई साधक मंत्रो का प्रयोग जाप मे लेता है तो वह अपनी मेहनत के द्वारा जाप भी करता है भाव भी बनाता है,लेकिन विधि आदि नही मिलने से वह जाप निष्फ़ल हो जाता है। लोग इसी कारण से मंत्र जाप को बेकार समझने लगते है और ढोंग आदि करने के नाम से पुकारने लगते है। इसके अलावा भी लोगो के द्वारा सुना जा सकता है कि जाप करना केवल अपने समय को खराब करना होता है। केवल मूर्ख लोग ही इनपर विश्वास करते है आदि बातें कहने के अलावा एक बात और कह दी जाती है कि भगवान शंकर ने इन मंत्रों को कील दिया है जिससे यह अपने प्रभाव को नही दे पाते। परन्तु यह सब कपोल कल्पित ही माना जाता है। यह सब बाते मूल सिद्धांतो को नही जानने के कारण ही कहीं जाती है। मंत्रो के जाप के प्रति सूक्ष्म विचार करना बहुत जरूरी है।यह बात सभी को पता है कि जो शब्द कहा जाता है उसका उच्चारण करते ही उसका प्रकम्पन वायु मंडल मे फ़ैल जाता है। जब मुँह से कोई उच्चारण किया जाता है तो बाहर के वायु मंडल मे और ह्रदय मे उच्चारण करने से शरीर के अन्दर के वायु मंडल मे प्रकम्पन पैदा होता है। इसलिये जो शब्द मुँह से उच्चारित किये जाते है वे कम असरकारक होते है,ह्रदय से उच्चारण किये गये शब्द काफ़ी समय तक शरीर के वायु मंडल मे फ़ैले रहते है। इस प्रकम्पन से जो चिन्ह वायुमंडल मे बनते है वे तब तक वायु मंडल मे घूमते रहते है जब तक कोई पदार्थ उनको अपने भीतर सोख नही लेता या वे फ़ैलते फ़ैलते इतने कमजोर नही हो जाते कि उनका भाव भी नकारात्मक के समान हो जाता है। किसी मंत्र की विधि पूर्वक की गयी शुरुआत का कारण अक्सर श्रद्धालुओं को समझने मे जब आने लगता है जब अक्समात मंत्र को शुरु करते ही बडी बडी जमुहाइयां आने लगती है आंखो से आंसू बहने लगते है। शब्दों से उत्पन्न होने वाला प्रकम्पन उच्चारण भेद के अनुसार भिन्न भिन्न प्रकार के चिन्ह इसी प्रकार से बनाने लगता है जैसे जमुहाई आना आंसू निकलना किसी अंग विशेष का फ़डकने लग जाना,तन्द्रा का आने लगना आदि। इस बात को और अधिक गहराई से समझने के लिये आजकल प्रयोग मे लाये जाने वाले इलेक्ट्रोनिक साधनों को ही देख लीजिये। जैसे वायुमंडल मे चिन्ह बनते है उसी प्रकार से इलेक्ट्रोनिक डिवाइस मे चिन्ह बनाकर इसी प्रयोग को काम मे लाया जाता है। सीडी पेन ड्राइव कम्पयूटर की डिवाइस आदि मे जब भौतिक रूप से चिन्ह बन सकते है तो मानना ही पडेगा कि वायु मंडल मे उपस्थित ईथर मे भी चिन्ह बनते है।
किसी मंत्र के जाप से क्या फ़ल मिलता है यह बात उसका उपयोग किये बिना नही पता लग सकती है। यह बात जरूरी है कि जो वेदो मे लिखा गया है वह अगर विधि पूर्वक से जाप मे लाया जायेगा तो फ़ल सदा ही एकसा ही निकलेगा। कारण ऋषि मुनि साधक योगी महायोगी जो भी कहते आये है वह कभी गलत नही हो सकता है। अगर मंत्र जाप के बाद कोई फ़ल नही मिल रहा है तो अवश्य समझ लेना चाहिये कि उस मंत्र के साधन या विधि मे कोई गलती हो गयी है।
संसार की किसी भी भाषा मे जो शब्द बनते है उनके उच्चारण के पांच स्थान ही हैं। होंठ जीभ दांत तालू और कण्ठ। इन स्थानो मे पंच तत्व विद्यमान होते है। जैसे होंठ पृथ्वी तत्व है,जीभ जल तत्व है,दांत अग्नि तत्व है,तालू वायु तत्व है और कंठ आकाश तत्व का स्थान है। जब मंत्रो के ऐसे अक्षर या शब्द जिनका उच्चारण होंठों से होता है तो वे पृथ्वी तत्व को सबल बनाने मे सहायक होते है,लेकिन पृथ्वी तत्व को प्राप्त करने का भी समय होता है। अगर पृथ्वी तत्व के समय में पृथ्वी तत्व की प्राप्ति के मंत्रो का जाप किया जाता है तो पृथ्वी तत्व की प्राप्ति हो जायेगी और अगर पृथ्वी तत्व को जल तत्व के समय मे जाप किया जाता है तो पृथ्वी तत्व के अन्दर जल तत्व का समावेश हो जाने से बजाय पृथ्वी तत्व के दलदल की प्राप्ति हो जायेगी,जो हानिकारक भी हो सकती है,अथवा पृथ्वी तत्व के समय अग्नि तत्व के समय मे या मिश्रण कर दिया गया तो वह गर्म आग की तरह से गर्म रेत का प्रभाव देने लगेगा। जैसे मानसिक परेशानियों के समय में ज्योतिष से चन्द्रमा मे बढोत्तरी हो जाती है,उस समय मे अगर चन्द्रमा जो जल तत्व का कारक है,उसे कम करने के लिये केवल पृथ्वी तत्व का प्रयोग करना पडेगा,और बुध ग्रह के मंत्र जैसे ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सह बुद्धाय नम: का जाप करने से जल तत्व की कमी होने लगेगी।शरीर रूपी ब्रह्माण्ड के अन्दर तीन ब्रह्माण्ड बताये गये है। शरीर मे ऊपर का भाग पराब्रह्माण्ड कहा गया है,बीच का भाग स्वब्रह्माण्ड कहा गया है और नीचे का भाग अपराब्रह्माण्ड बताया गया है। स्वब्रह्माण्ड का सम्बन्ध विराट तत्व से पराब्रह्माण्ड का सम्बन्ध विद्युत तत्व से और अपराब्रह्माण्ड का सम्बन्ध शून्य तत्व से बना हुआ है। स्व के अन्दर कारण शक्तियां उपस्थित होती है और परा मे सूक्ष्म शक्तियां उपस्थित है,अपरा मे स्थूल शक्तियां उपस्थित होती है। मंत्र के जिन अक्षरो या शब्दो का प्रकम्पन होता है उनसे विराट तत्व सम्बन्धित कारण शक्तियों का विकास होता है,जिनसे परा मे प्रकम्पन होता है उनसे विद्युत सम्बन्धित सूक्ष्म शक्तियों का प्रकम्पन होता है। और जिनसे अपरा मे प्रकम्पन होता है उनसे शून्य तत्व सम्बन्धित स्थूल शक्तियों का विकास होता है। उदाहरण के लिये "राम" शब्द के उच्चारण से पराब्रह्माण्ड में प्रकम्पन होता है। इस शब्द मे र अक्षर के कारण को सबसे पहले तालू को जीभ स्पर्श करती है,तालू को वायु तत्व से जोड कर माना गया है,साथ ही जीभ जो जल तत्व की कारक है उससे वायु तत्व का मिश्रण होना जल तत्व को वायु तत्व के द्वारा सूक्ष्म तरीके से उठाने की क्षमता है,जैसे समुद्र के जल मे लहरे आने पर वायु के द्वारा समुद्र के पानी को अवशोषित कर लिया जाता है और हवा मे बादलो के रूप मे वही पानी सिमटा हुआ दिखाई देने लगता है। अक्षर र मे बडे आ की मात्रा लगाते ही कंठ से मिलने वाले आकाश तत्व का प्रवेश हो जाता है और जब म को कहा जाता है तो पृथ्वी तत्व के मालिक होंठ काम करने लगते है। होंठ को बन्द करने के बाद जो ध्वनि निकलती है वह नासिका से निकलती है जो पराब्रह्माण्ड के रूप मे एक सूक्ष्म विद्युत तरंग के रूप मे प्रसारित होती है। इस प्रकार से ह्रदय से लगातार राम शब्द को निकालते रहने से दैहिक दैविक और भौतिक तीनो शक्तियों का कारण शरीर मे पैदा हो जाता है और शरीर राममय हो जाता है। इसी प्रकार से अल्लाह शब्द मे कंठ तालू और जीभ का प्रयोग किया जाता है,जो आकाश तत्व जल तत्व को लेकर वायु तत्व के द्वारा आकाश तत्व मे ही समा जाता है। ईशा शब्द में भी आकाश तत्व को कंट्रोल करने के बाद जल तत्व को वायु तत्व से कन्ट्रोल करने के बाद आकाश तत्व मे सम्मिलित किया गया है। इन शब्दो के उच्चारण से सूक्ष्म शक्तियां जागृत होती है। ह्रीं शब्द के उच्चारण से स्वब्रह्माण्ड में प्रकम्पन होता है,अत: इस शब्द के उच्चारण से कारण शक्तियां जागृत हो जाती है,ध्री शब्द के उच्चारण से अपराब्रह्माण्ड मे प्रकम्पन होता है जिससे स्थूल शक्तियां जागृत हो जाती है। इस प्रकार की शक्तिया जब पूर्ण रूप से जागृत हो जाती है तब यह साधक के भाव के अनुसार एक विशेष रूप धारण करने के बाद उसके सामने प्रकट होने लगती है। साधक शक्ति के उस रूप से जो भी चाहत रखता है वह चाहत उस शक्ति के द्वारा उसे प्रदान की जाती है और साधक का जाप सफ़ल होने लगता है,परन्तु एकाग्र होकर और इन्द्रियों को जीतने के बाद ही यह शक्तियां जागृत होती है।
साबर मंत्रो के भी दो भेद होते है एक पैशाचिक और एक दैविक। पैशाचिक शक्ति के लिये इतना ही कहा जाता है कि वह कोई भी रूप लेकर प्रकट नही होती है। साधक के अन्दर उन शक्तियों का समावेश हो जाता है और वह मनचाहे तरीके से अपने कार्यों को करवाने लगता है। पैशाचिक शक्तियों मे जो भी कार्य करना होता है वह कार्य के बदले मे कुछ प्राप्त करने की चाहत रखती है अगर किये गये कार्यों की एवज मे कुछ दिया नही गया तो साधक के शरीर से भी वह शक्तियां चाहे गये तत्व को प्राप्त कर लेती है,इसलिये ही पैशाचिक शक्ति को प्रयोग करने वाले साधक अक्सर बुरी मौत से मरते हुये देखे जाते है। लेकिन दैविक शक्तिया कुछ बदले मे नहीं मांगती है वे केवल भला करने के लिये ही अपने रूप को प्रकट करती है और भला करने के बाद अपना रूप छुपा लेती है। इसके साथ यह भी माना जाता है कि अगर एक साधक दूसरे साधक की सिद्धि को नष्ट करने की कोशिश करता है तो उसकी स्वयं की सिद्धि नष्ट हो जाती है। लेकिन योग और ज्ञान मार्ग के उपासकों की सिद्धि कभी नष्ट नही होती है यह गीता मे भी बताया गया है। हमेशा मंत्र जाप को विधिविधान से ही करना चाहिये और इच्छित परा स्व और अपरा ब्रह्माण्ड के अनुसार ही मंत्रों का चुनाव करना चाहिये,तभी साधना सफ़ल हो सकती है।www.acharyarajesh.in

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