मे तिथियों की जानकारी दी थी यह संख्या मे कुल तीस होती है और मास का आरम्भ सदा पड़ेवा या प्रतिपदा से होता है और उसके बाद दूज तीज चौथ तथा पंचमी होती है इनको ज्योतिष की भाषा मे नन्दा,,जया,,भद्रा,,रिक्ता और पूर्णा कहते है यह पांच पांच के साइकल मे पुनरावृत्ति होती है और पन्द्रहवीं तिथि या तो अमावश्या कहलाती है या पूर्णमाशी। इसमें अमावस्या से पहले की पांच तिथि और बाद की पांच तिथि कम बली होती है इसलिए आमतौर पर इनको महूर्त मे ग्रहण नहीं करते है,,यह साधारण नियम है सदा ऐक जैसा लागू नहीं होता है।यह जानकारी अधूरी है शेष अगले भाग मे।आप थोड़ा सा ध्यान देंगे तो काम चलाऊ पंचांग देखना सीख जाऐगे।सबका धन्यवाद।
आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024
सोमवार, 19 फ़रवरी 2024
आओ ज्योतिष विद्या सीखे1
आज फिर अपनी पंचांग की जानकारी वाली पोस्ट पर आगे ,,मै इसको सरल शब्दो मे समझाने का प्रयास करूंगा और कुछ इसके माध्यम से ज्योतिष सीखना आरम्भ करने वालो को जानकारी देने का प्रयास रहेगा।मैने नक्षत्र के बारे मे और तिथि की जानकारी दी थी जिस खाने मे नक्षत्र लिखा है वह ऊपर से नीचे रहता है पर नक्षत्र के नाम से दाहिने हाथ की तरफ आपको दो खाने मिलेंगे ऐक मे घटी पल लिखा होगा और दूसरे मे घण्टा मिनट ,,यह उस नक्षत्र के समाप्त होने का समय रहता है।ऐक घटी 24 मिनट की होती है और ऐक घटी मे 60 पल होते है।आप घण्टा मिनट ग्रहण करें इससे आपको नक्षत्र के समाप्त होने का समय ज्ञात होगा इसी प्रकार तिथि के दाहिनी तरफ आपको घटी पल और घण्टा मिनट लिखा मिलेगा यह तिथि के समाप्त होने का समय होता है। दाहिनी तरफ ही आपको कुछ और जानकारी मिलेगी यदि उस दिन भद्रा है तो दाहिने तरफ उसके आरम्भ होने का समय लिखा रहता है और भद्रा के समाप्त होने का भी समय लिखा रहता है।
आज इतनी जानकारी इसको किसी पंचांग को लेकर चेक करना सीखे शेष अगली बार,,सबका धन्यवाद।
शनिवार, 17 फ़रवरी 2024
आओ ज्योतिष विद्या सीखें
आज ज्योतिष पर बहुत छोटी सी पोस्ट,, ज्योतिष पढ़ना पढ़ाना और ज्योतिष सीख कर फलित करना दोनो मे ज़मीन आसमान का अन्तर रहता है ज्योतिष मे आपको जैसे जीने मे ऐक ऐक सीढ़ी चढ़ना सिखाया जाता है वैसे ऐकल ग्रह का फल पढ़ाते है और जब आप इस विषय को सीख लेते है तो अपनी उस जानकारी के आधार पर कुण्डली का फलित करते है यह अन्तर बहुत बड़ा हो जाता है।
फलित मे आपको 12 राशियो,,9 ग्रह और 12 भाव तथा 27 नक्षत्र के आधार पर सारे प्रश्नो के उत्तर देने होते है,,केवल ऐक ग्रह के आधार पर सीमित फलित तो कर सकते है फर सम्पूर्ण नहीं और इतनी मेहनत करने फर भी कभी उत्तर शत-प्रतिशत नही मिलता बल्कि ऐक की जगह दो या तीन उत्तर निकलते है उसमें से किसका चयन करें जो घटे इसमें इष्ट कृपा सहायक होती हैऔर आपका सात्विक आचरण यह इस ब्रह्म विद्या और अन्य विषय मे सबसे प्रमुख अन्तरहै।
शनि मंगल को आम तौर पर पापी ग्रह माना गया है और सूर्य को क्रूर ग्रह कभी यह सोचा इसका क्या कारण है इसका कारण शनि और मंगल दोनो को 12 राशियों मे केवल 39 39 रेखा मिलना है सर्वाष्टक सारणी मे।सूर्य को 48 मिलती है और चन्द्रमा को सूर्य से ऐक अधिक 49 मिलती है और शुक्र,, गुरू तथा बुध को 50 से अधिक मिलती है।
आप इस अन्तर को समझे आपको टुकड़े-टुकड़े मे पढ़ाया गया है पर फलित आपको सम्पूर्ण करना है।आशा करता हूं यह छोटा सा अन्तर आपको सही लगा होगा।सबका धन्यवाद।
गुरुवार, 5 अक्टूबर 2023
श्राद्धपक्ष या पितृपक्ष
श्राद्धपक्ष या पितृपक्ष: इस तरह पाएं पूर्वजों का आशीर्वा
हिंदू धर्म को मानने वाले श्राद्धपक्ष में पूर्वजों का आशीर्वाद पाने के लिए तर्पण व उपाय करते हैं।संसारमें हमारे संबंध दो प्रकार के होते हैं १-स्थूल शरीरसे २-भावनात्मक शरीरसे । आजीवन हम, हमारे स्वजनों की इच्छापूर्ति व सेवा प्रत्यक्ष कर सकते हैं किन्तु मरणोपरान्त यह संभव नहीं है यथा भावनात्मक संबंध से उनकी इच्छाओंकी आपूर्ति करते हैं । यहांसे श्राद्धका प्रारम्भ होता हैं ।प्रकीर्तितम् भाव से कुछ समर्पित किया जाता हैं तो भावात्मक शरीर उसे अवश्य प्राप्त करता हैं । टैलीपथी यहीं तो हैं – हमारे विचारों का भावात्मक शरीर द्वारा आदान-प्रदान । वाचाहीन प्राणी भी इससे ही अपना व्यवहार करते हैं । श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम् पितरों की तृप्ति के लिए जो सनातन विधि से जो कर्म किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं । ऎसा नहीं है कि सूक्ष्म शरीर की ये अवधारणा सिर्फ भारतीय है बल्कि "Egyptian Book of the Dead " में भी सूक्ष्म शरीर के बारे में विचार प्रकट किए गए हैं । आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के डा. सेसिल ने भी प्रयोगों के आधार पर एक निष्कर्ष निकाला था कि स्थूल शरीर के समानान्तर किसी एक सूक्ष्म शरीर की सत्ता है,जो कि सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों के बावजूद कभी कभी शरीर को छोडकर दूर चली जाती है,हालांकि एक सुनहले रंग के सूक्ष्म तंतु(तार) के माध्यम से ये हर हाल में हमारे इस स्थूल शरीर की नाभी से जुडी रहती है। जब कभी यह सुनहला तंतु (तार) किसी कारणवश टूट जाता है तो उस सूक्ष्म सत्ता का स्थूल शरीर से फिर कोई संबंध नहीं रह जाता और यही किसी व्यक्ति की आकस्मिक मृ्त्यु का कारण बनता है। कुरानमें भी - फिर पुनर्जन्म के समय तुम उपर उठोगे पाक कुरआन 23-16 । अद्वैत वेदांत अनुसार कि "ब्रह्म सदैव विकासशील रहता है" । आधुनिक युग में इस स्थापना की सर्वप्रथम पुष्टि हुई आईंस्टीन के इस कथन द्वारा कि "यूनिवर्स निरन्तर प्रगति पर है"। वर्तमान समय में जीवन भागदौड़ से भरा है। इसलिए कई लोगों के लिए यह संभव नहीं हो पाता कि वे पितरों के लिए तर्पण आदि कर पाएं। ऐसे में हमारे शास्त्रों में कुछ छोटे.छोटे उपाय बताए गए हैं। ये उपाय ऐसे हैं जो किसी भी व्यक्ति की कुण्डली में शनि, राहु सूर्य और गुरु ग्रहों की युति और उनके साथ अन्य ग्रहों के बुरे प्रभावों से बने पितृदोष को भी दूर करते हैं।
ये उपाय सुखी सफल और वैभवशाली जीवन की राह आसान बनाने वाले माने गए हैं।
जानिए ये खास उपाय : श्राद्ध पक्ष में गरीब बच्चों को सफेद मिठाई का दान करें।
-देवता और पितरों की पूजा स्थान पर जल से भरा कलश रखकर सुबह तुलसी या हरे पेड़ों में चढ़ाएं।
-भोजन से पहले तेल लगी दो रोटी गाय को खिलाएं।
-चिडिय़ा या दूसरे पक्षियों के खाने.पीने के लिए अन्न के दानें और पानी रखें।
-पिता, गुरु व उम्र में बड़े लोगों का अपमान न करें। उनकी खुशी के लिए हरसंभव कोशिश करें।
-सफेद कपड़ों व सफेद रूमाल का दान करने से भी पितृ दोष दूर होता है।
-अनाज और फलों का दान करने से भी पितृ देवता खुश होते हैं।
-हनुमानजी के मंदिर में नियमित रूप से घी का दीपक जलाएं।
-शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर दूध अर्पित करें। उसके बाद 5 लीटर दूध गरीब बच्चों में बांटे। यह उपाय पूरे 16 दिन करें। जिन लोगों को भी पितृ दोष है उन्हें इस उपाय को करने से बेहतर परिणाम मिलेंगे।
-हर शनिवार को पीपल या वट की जड़ों में दूध चढाएं।
-रोज तैयार भोजन में से तीन भाग गाय, कुत्ते और कौए के लिए निकालें और उन्हें खिलाएं।
-किसी तीर्थ पर जाएं तो पितरों के लिए तीन बार अंजलि में जल से तर्पण करना न भूलें।
-रोज माता-पिता और गुरु के चरण छूकर आशीर्वाद लेने से पितरों की प्रसन्नता मिलती है।
-जिस भी व्यक्ति की पुण्यतिथि है उसकी पसंद का पकवान बनाकर गरीबों को दान करें। अपने माता पिता की सेवा करे । पृथ्वी से ब्रह्माण्ड – नक्षत्र – ग्रह जिसे भी हम जानते हैं, हम अपना बनाते हैं, तो जो हमारे हैं उनको हम मरणोपरान्त कैसे भूल सकते हैं – कैसे उनसे नाता तोड सकते हैं । सूर्य-चंद्र-नक्षत्रों से हमे संबंध है, यथा हम सूर्योपासना या ग्रहशांति करते हैं वैसे हि पितरोसे भी हम श्राद्धद्वारा हमारा सम्बंध कायम करतै हैं ।
श्राद्ध के विषयमें यह पर्याप्त नहीं हैं, यद्यपि अवकाश एवं मेरे ज्ञानकी मर्यादाके कारण यहां विराम करते हैं.. आप विद्वज्जन के चरणों में समर्पित जय माता दी
श्राद्ध के विषयमें यह पर्याप्त नहीं हैं, यद्यपि अवकाश एवं मेरे ज्ञानकी मर्यादाके कारण यहां विराम करते हैं.. आप विद्वज्जन के चरणों में समर्पित जय माता दी
सोमवार, 2 अक्टूबर 2023
गुरुवार, 15 दिसंबर 2022
16 दिसंबर से खरमास आंरभ, अगले 30 दिनों तक नहीं होंगे मांगलिक कार्य ---------------------
16 दिसंबर से खरमास आंरभ, अगले 30 दिनों तक नहीं होंगे मांगलिक कार्य ---------------------
्हिंदू धर्म में मांगलिक कार्यों के लिए समय तय है, ताकि जीवन में कोई संकट न आए और शुभ कार्य का रास्ता बनता रहे। इसलिए चाहे शुक्र अस्त हों, या देवशयन का समय हो या खरमास, इस समय कोई नया मांगलिक कार्य नहीं किया जाता। अभी कुछ दिन पहले ही देवउठनी एकादशी बीती है और शुक्र उदय हुए हैं. अब 16 दिसंबर से खरमास लग रहा है। इस महीने के बीतने तक फिर मांगलिक कार्य शादी विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि बंद हो जाएंगे।
क्या है खरमासः खरमास का अर्थ है खराब महीना। मान्यता है कि जब भी सूर्य देव, गुरु बृहस्पति की राशि धनु या मीन में भ्रमण करते हैं ऐसी स्थिति बनती है। इस महीने में सूर्य की किरणें कमजोर हो जाती हैं यानी उनका तेज क्षीण हो जाता है। इसलिए इसे अच्छा नहीं माना जाता।इस जगत की आत्मा का केंद्र सूर्य है। बृहस्पति की किरणें अध्यात्म नीति व अनुशासन की ओरे प्रेरित करती हैं। लेकिन एक दूसरे की राशि में आने से समर्पण व लगाव की अपेक्षा त्याग, छोड़ने जैसी भूमिका अधिक देती है। उद्देश्य व निर्धारित लक्ष्य में असफलताएं देती हैं। जब विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ आदि करना है तो उसका आकर्षण कैसे बन पाएगा? क्योंकि बृहस्पति और सूर्य दोनों ऐसे ग्रह हैं जिनमें व्यापक समानता हैं।
सूर्य की तरह यह भी हाइड्रोजन और हीलियम की उपस्थिति से बना हुआ है। सूर्य की तरह इसका केंद्र भी द्रव्य 4 भेद है, जिसमें अधिकतर हाइड्रोज-' ही * जबकि दूसरे ग्रहों का केंद्र ठोस है। इसका भार सौर मंडल के सभी ग्रहों के सम्मिलित भार से भी अधिक है। यदि यह थोड़ा और बड़ा होता तो दूसरा सूर्य बन गया होता।
पृथ्वी से 15 करोड़ किलोमीटर दूर सूर्य त 64 करोड़ किलोमीटर दूर बृहस्पति वर्ष में एक बार ऐसे जमाव में आते हैंकि सौर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के माध्यम से बृहस्पति के कण काफी मात्रा में पृथ्वी के वायुमंडल में पहुंचते हैं, जो एक दूसरे की राशि में आकर अपनी किरणों को आंदोलित करते हैं।
इस कारण धनु व मीन राशि के सूर्य को खरमास/मलमास की संज्ञा देकर व सिंह राशि के बृहस्पति में सिंहस्थ दोष दर्शाकर भारतीय भूमंडल के विशेष क्षेत्र गंगा और गोदावरी के मध्य (धरती के कंठ प्रदेश से हृदय व नाभि को छूते हुए) गुह्म तक उन्र भारत के उत्तरांचल, उत्तरप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, राज्यों में मंगल कर्म व यज्ञ करने का निषेध किया गया है, जबकि पूर्वी व दक्षिण प्रदेशों में इस तरह का दोष नहीं माना गया है।
८ वनवासी अंचल में क्षीण चन्द्रमा अर्थात वृश्चिक राशि के चन्द्रमा (नीच राशि के चन्द्रमा के चन्द्रमा (नीच राशि के चन्द्रमा) की अवधि भर ही टालने में अधिक विश्वास रखते हैं, क्योंकि चंद्रमा मन का अधिपति होता है तथा पृथ्वी से बहुत निकट भी है, लेकिन धनु संक्रांति खर मास यानी मलमास में वनवासी अंचलों में विवाह आयोजनों की भरमार देखी जा सकती है, किंतु सामाजिक स्तर पर उनका अनुसंधान किया जाए तो इस समय में किए जाने वाले विवाह में एक दूसरे के प्रति संवेदना व समर्पण की अपेक्षा यौन विकृति व अपराध का स्तर अधिक दिखाई देता है।
ज्योतिष के अनुसार सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने के बाद मकर राशि में प्रवेश करने से पहले तक की अवधि खरमास कही जाती है। इस साल खरमास 16 दिसंबर से लग रहा है और 14 जनवरी तक रहेगा। इस अवधि में धनु राशि के स्वामी बृहस्पति भी प्रभावहीन रहते हैं। इस दौरान गुरु के स्वभाव में भी उग्रता रहती है।
ये 16 दिसंबर से 14 जनवरी की अवधि में जप, तप ही करना चाहिए। खरमास में उगते सूर्य को अर्घ्य देना शुभ होता है। इस अवधि में पीपल और तुलसी को जल चढ़ाना चाहिए। साथ ही गोसेवा करनी चाहिए, जिससे भगवान विष्णु प्रसन्न होंगें और मंगल करेंगे।
इस समय सूर्य धनु राशि में करेंगे प्रवेशः 16 दिसंबर को सुबह 10 बजकर 11 मिनट पर सूर्य वृश्चिक राशि से निकलकर धनु राशि में प्रवेश करेंगे और 14 जनवरी 2023 को रात 8 बजकर 57 मिनट तक धनु राशि में रहेंगे।
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022
2022 का आखिरी सूर्य ग्रहण आज 25 अक्टूबर को
आज है सूर्य ग्रहणसूर्य ग्रहण 2022:। ------------
साल 2022 का आखिरी सूर्य ग्रहण आज 25 अक्टूबर को करीब 2 बजकर 29 बसमिनट पर लगेगा. हालांकि यह भारत में करीब शाम 4 बजे दिखाई देगा. ऐसे में सूर्य ग्रहण का सूतक शुरू हो चुका है. लोगों को सूतक काल के नियमों का पालन करना चाहिए. यह सूर्य ग्रहण आज यानी 25 अक्टूबर को लगने जा रहा है. यह आंशिक सूर्य ग्रहण है. पंचांग के अनुसार यह सूर्य ग्रहण तुला राशि में लगेगा.साल 2022 का दूसरा सूर्य ग्रहण भारतीय समानुसार आज 25 अक्टूबर को दोपहर बाद 02 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर शाम 06 बजकर 32 मिनट तक रहेगा. यह सूर्य ग्रहण 04 घंटे 3 मिनट की अवधि का है. भारत में यह सूर्य ग्रहण करीब शाम 4 बजे दिखाई देगा.यह सूर्य ग्रहण भारत के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में बेहतर ढंग से देखा जा सकेगा यानी इसे नई दिल्ली, बेंगलुरू, कोलकाता, चेन्नई, उज्जैन, वराणसी और मथुरा से देखा जा सकता है. पूर्वोत्तर भारत यानी मेघालय के दाईं और असम राज्य के गुवाहाटी के आसपास के बाएं हिस्सों में यह सूर्यग्रहण नहीं दिखाई देगा क्योंकि इस क्षेत्र में यह सूर्य ग्रहण सूर्यास्त के बाद लगेगा. भारत के अलावा, आखिरी सूर्य ग्रहण 2022 यूरोप, पूर्वोत्तर अफ्रीका, दक्षिण पश्चिम एशिया और अटलांटिक में दिखाई देगा.
ये लोग न देखें सूर्य ग्रहण
पंचांग के अनुसार, 25 अक्टूबर को लगने वाला सूर्य ग्रहण तुला राशि और स्वाति नक्षत्र में लगेगा. इस वजह से जिन लोगों का जन्म स्वाति नक्षत्र में हुआ है उन्हें यह सूर्य ग्रहण नहीं देखना चाहिए. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ऐसे लोगों पर सूर्य का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है.आज साल 2022 का आखिरी सूर्य ग्रहण लग रहा है। अक्टूबर माह की 25 तारीख, दिन मंगलवार को लग रहा यह सूर्य ग्रहण कई मायनों में खास है। दिवाली के अगले दिन लग रहे इस सूर्य ग्रहण के बारे में ज्योतिषविदों का मानना है कि इसका दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेगा। शाम चार बजकर 29 मिनट से करीब डेढ़ घंटे तक ग्रहण का प्रभाव रहेगा। सूतक काल का ग्रहण के दौरान खास महत्व है। भारत में सूर्य ग्रहण शाम 6 बजकर 9 मिनट के बाद समाप्त हो जाएगा। सूर्य ग्रहण 2022 से 12 घंटे पहले ही सूतक काल प्रभाव में आ गया है। सूर्य ग्रहण के चलते इस बार गोवर्धन पूजा 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी।मित्रों इस बार दिवाली भी ग्रहण के साये में मनाई गई है। क्योंकि नक्षत्र का दोष ग्रहण के एक दिन आगे और एक दिन पीछे तक माना जाता है। 24 अक्टूबर को रात में अमावस्या होने के कारण और अगली तिथि 25 अक्टूबर को भोर से ही सूतक काल लगने के चलते इस बार सूर्य ग्रहण 2022 के बारे में ज्योतिषी कह रहे हैं कि 27 साल के बाद ऐसा दुर्लभ योग बन रहा है।धार्मिक नजरिए से ग्रहण को अशुभ माना गया है और ग्रहण में किसी भी तरह का शुभ काम और पूजा-पाठ वर्जित हो जाता है। इस कारण से गोवर्धन पूजा एक दिन के लिए टल गई है। 27वर्षों बाद ग्रहण के कारण दिवाली के तीसरे दिन गोवर्धन पूजा होगी।LIVE Surya Grahan 2022 LIVE : साल का आखिरी सूर्य ग्रहण आज, कब से लगेगा ग्रहण और कहां-कहां दिखाई देगा?
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 25 Oct 2022 09:11 AM IST
Surya Grahan Live: Solar Eclipse India Date Sutak Kaal Timing, Aaj Surya Grahan Kab Lagega, Effects On Rashi
सूर्य ग्रहण 25 अक्टूबर 2022 लाइव अपडेट - फोटो : अमर उजाला
खास बातें
Solar Eclipse 2022 Date and Time, Surya Grahan Kab Se Kab Tak Hai:आज आंशिक सूर्य ग्रहण लगने वाला है। यह सूर्य ग्रहण भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में देखा जा सकेगा। भारत में ग्रहण होने से इसका सूतक काल मान्य रहेगा। ग्रहण का सूतक सुबह 4 बजे लग चुका है। भारत में यह ग्रहण दोपहर बाद देखा जा सकेगा।
लाइव अपडेट
09:10 AM, 25-OCT-2022
कब लगता है आंशिक सूर्यग्रहण
आंशिक सूर्यग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के आंशिक रूप में आता है, जिससे पृथ्वी के स्थान विशेष से देखने पर सूर्य का आधा भाग ही नजर आता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ग्रहण का लगना एक खगोलीय घटनाक्रम है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के मध्य होकर गुजरता है।
08:57 AM, 25-OCT-2022
सूर्य ग्रहण के दौरान वर्जित कार्य
ग्रहण के सूतक काल से ही पूजा पाठ बंद कर देना चाहिए।
सूर्य ग्रहण के अवधि के दौरान घर के पूजा वाले स्थान को पर्दे से ढक दें।
आज आप भूलकर भी देवी-देवताओं की पूजा न करें।
सूर्य ग्रहण के दौरान खाना-पीना बिल्कुल न खाएं।
खाद्य पदार्थों में तुलसी के पत्ते डालकर रख दें।
रविवार, 23 अक्टूबर 2022
Diwali 2022 दिवाली पुजा के शुभ मुहूर्त
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मित्रों इस बार दीपावली (Diwali 2022) का पर्व 24 अक्टूबर,कल सोमवार को मनाया जाएगा। अमावस्या तिथि शाम 5 बजे बाद शुरू होने से लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त भी शाम का ही रहेगा। दिन भर लक्ष्मी पूजा नहीं की जा सकेगी। ऐसा संयोग बहुत कम बार बनता है जब दीपावली पर दिन में पूजा का कोई भी शुभ मुहूर्त न हो। सोमवार को देर रात तक दुकान व कारखानों में पूजा की जा सकेगी। आगे जानिए घर के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त साथ ही दुकान, कारखाने व ऑफिस के लिए पूजा मुहूर्त भी।
मित्रों इस बार दीपावली (Diwali 2022) का पर्व 24 अक्टूबर,कल सोमवार को मनाया जाएगा। अमावस्या तिथि शाम 5 बजे बाद शुरू होने से लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त भी शाम का ही रहेगा। दिन भर लक्ष्मी पूजा नहीं की जा सकेगी। ऐसा संयोग बहुत कम बार बनता है जब दीपावली पर दिन में पूजा का कोई भी शुभ मुहूर्त न हो। सोमवार को देर रात तक दुकान व कारखानों में पूजा की जा सकेगी। आगे जानिए घर के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त साथ ही दुकान, कारखाने व ऑफिस के लिए पूजा मुहूर्त भी।
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (घर के लिए) (Diwali 2022 Shubh Muhurat Ghar Ke Liye)
शाम 05.40 से 06.25 तक
शाम 07.15 से रात 0932 तक
रात 11.43 से 12.40 तक
दुकान के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त (Diwali 2022 Shubh Muhurat Dukan Ke Liye)
शाम 05.50 से 07.15 तक
रात 08.05 से 09.05 तक
रात 10.34 से 12.11 तक
ऑफिस के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त (Diwali 2022 Shubh Muhurat Office Ke Liye)
शाम 06.05 से 07.32 तक
रात 07.50 से 08.40 तक
रात 10.34 से 12.11 तक
फैक्ट्री के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त (Diwali 2022 Shubh Muhurat Factory Ke Liye)
शाम 07.15 से रात 09.05 तक
रात 11.43 से 12.40 तक
रात 01.45 से 03.46 तक
इसबार दिवाली पर्व पर लक्ष्मी पूजन करने का शुभ मुहूर्त चार लग्नों में रहेगा। लेकिन श्रेष्ठ शुभमुहूर्त वृष या सिंह लग्न का समय रहेगा।
उन लग्नों में सुबह 8.30 बजे से 10.30 बजे तक वृश्चिक लग्न, दोपहर 3 बजे से शाम 5 बजे तक कुंभी लग्न, शाम 7.30 बजे से रात 9.30 बजे तक प्रदोष वेला में वृष लग्न और अर्ध रात्रि के बाद 1 बजे से 3 बजे तक सिंह लग्न रहेगा। इनमें से प्रदोष वेला में वृष लग्न के दौरान लक्ष्मी पूजन करना सबसे ज्यादा शुभ है जबकि सिंह लग्न में भी लक्ष्मी पूजन श्रेष्ठ माना गया है। प्रदोष वेला का अर्थ है दिन रात्रि का संयोग। दिन विष्णु रूप और रात्रि लक्ष्मी रूप।
रविवार, 31 जुलाई 2022
क्या राशिफल सही होता है।
प्यारे मित्रों मैंने पहले भी राशिफल पर आपको एक पोस्ट लिखकर बताया था लेकिन कुछ लोग अब भी मुझसे कुछ सवाल कर रहे हैं राशिफल को लेकर तो आज फिर से पोस्ट लिख रहा हूं की राशिफल सही है या गलत आप खुद ही फैसला करें राशियाँ 130 करोड़ लोग भारत वर्ष में। यानी एक राशि के दस करोड़ से ज़्यादा लोग । दस करोड़ लोगों का आज का दिन एक जैसा रहने वाला है । सभी की यात्रा सुखद रहेगी, सभी का पत्नी से झगड़ा हो सकता है, सभी को आर्थिक हानि की सम्भावना है ।जो राशिफल आप अख़बार में पढ़ते हैं या टी॰वी॰, इंटेरनेट या यू ट्यूब पर देखते हैं उसका कोई औचित्य नहीं है। आप मनोरंजन के लिए देखना या पढ़ना चाहते है तो ठीक है ।नाम का पहला अक्षर से देखें तो राम-रावण
कृष्ण- कंश
भूत-भगवान
देवता-दैत्य ------ सभी के नाम का पहला अक्षर समान है तो फिर इनकी सोच में इतना अंतर क्यों है। कहते हैं कि इनकी राशि एक है लेकिन व्यक्तित्व अलग-अलग हैं क्योंकि इनका जन्म, स्थान, समय, और वातावरण भिन्न है। वजह जो भी हो इससे यह साबित होता है कि हमारा नाम हमारी किस्मत नहीं लिखता हमारे द्वारा जो इस जीवन में कर्म किए जाते हैं उसी से हमारी जन्मकुंडली बनती है ।अब इसे अच्छी तरह से समझ
एक राशि में सव्वा दो नक्षत्र होते एक नक्षत्र में चार चरण ऐसे दो नक्षत्र के आठ चरण और तीसरे नक्षत्र का एक चरण ऐसे कुल आठ चरण हुए अब एक ही राशि में पैदा हुए व्यक्ति के नक्षत्र और चरण भिन्न - भिन्न हुए तो राशि फल भी भिन्न भिन्न हुए ,एक ही माँ के गर्भ से जन्मे दो जुड़वा बच्चे की राशि तो क्या जन्म कुंडली एक जैसी होती है एक डॉक्टर है तो दूसरा संगीतकार ऐसा क्यों ! क्योकि कृष्णमूर्ति पद्धति अनुसार दोनों की राशि एक है ,नक्षत्र भी एक है लेकिन उप नक्षत्रेश भिन्न है उपस्वामी भिन्न है इसलिए इसमें समय का बड़ा महत्त्व है ,राम और रावण तथा कृष्ण और कंस की राशि एक है लेकिन व्यक्तित्व अलग है यह फर्क के कारन भले राशिया एक हो लेकिन समय के नुसार नक्षत्र के उप - उप स्वामी भिन्न होने से फल अलग हुए हमारा भविष्य कथन सिर्फ चंद्रराशि से तय नहीं होता लेकिन आपके जन्म समय जन्म स्थान से पूर्व दिशामेकौनसी राशि उदित हुई (लग्नराशि ) और पुरे 12 घरोंमे कौन कौन से ग्रह बैठे है और कितने अंश के है और एक दुसरे से कितने अंश पर है ऐसी बहुत सारी बाते फलकथन पर निर्भर करती है और साथ - साथ भविष्य फल कथन करने वाला कितना जानकार है यह भी फलकथन पर आधार रखता है इसलिए एक ही राशि का फलकथन सब के लिए 100 % लागु नहीं होता है
लेकिन हाँ, राशिफल बिलकुल सटीक हो सकता है अगर आपको ज्योतिष का ज्ञान हो तब। मैं बताता हूँ राशिफल कैसे निकालते हैं। राशिफल के लिए ये देखना होता है की गोचर में कौनसे ग्रह किस राशि में भ्रमण कर रहे हैं और आपकी कुंडली के कौनसे घर में स्थित है । दैनिक राशिफल के लिए बाक़ी ग्रह के साथ चंद्रमा किस राशि में है ये देखना होता है ।
सटीक भविष्यवाणी के लिए अगर दशा कौनसे ग्रह की चल रही है ये भी देखा जा्ऐ। किसी की भी कुंडली देख कर राशिफल बताया जा सकता है, दैनिक भी, वार्षिक भी।आपका दिमाग़ चक्कर खा रहा होगा, खाएगा ही क्योंकि इसको समझने के लिए ज्योतिष आना चाहिए।
निष्कर्ष यह है की बिना कुंडली देखे ये कह देना की मेष राशि वालों का दिन ऐसा रहेगा , वृष राशि वालों का दिन वैसा रहेगा ये सही नही है।
जिस राशिफल की मैं बात कर रहा हुँ यानी अख़बार वाला you tube, internet वाला राशिफल नही,अब आपको समझ में आया होगा कि TV channel पर बैठे ज्योतिषी सिर्फ आप लोगों को मुर्ख बना रहे हैं और अपनी दुकान चला रहे हैं फिर भी अगर आप राशिफल सुनते हैं या पढ़ते हैं तों आपकी मर्जी जो सच्चाई है वो मैंने कहा दिया है मुझे मालूम है कि कुछ ज्योतिषी जो राशिफल कहते हैं या लिखते हैं उन्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगने वाली पर मित्रों मेरा काम आपको जानकारी देना बाकि फिर आचार्य राजेश
शुक्रवार, 29 जुलाई 2022
गुरुवार, 14 जुलाई 2022
सिंह लग्न का बारहवां सूर्य
भचक्र की पांचवी राशि सिंह राशि है,लगन में इस राशि का प्रभाव बहुत ही प्रभाव वाला माना जाता है,यह अपनी औकात के अनुसार जातक के अन्दर गुण देती है,जैसे जातक का स्वभाव बिलकुल शेर की आदत से जुडा होता है,जातक जो खायेगा वही खायेगा,जातक जहां जायेगा वहां जायेगा,जातक के लिये कोई बन्धन देने वाली बात को अगर सामने लाया जायेगा तो वह बन्धन की बात को करने वाले या बन्धन का कारण पैदा करने वाले के लिये आफ़त को देने वाला बन जायेगा। इस राशि के स्वभाव के अनुसार वह एक सीमा में अपने को बान्धने के लिये मजबूर हो जाता है,वह अपने परिवार यानी माता पिता से तभी तक सम्बन्ध रखता है जब तक माता पिता के द्वारा वह समर्थ नही हो जाता है,अक्सर जातक को माता के प्रति सहानुभूति अधिक होती है लेकिन पत्नी के आने के बाद माता से दूरिया बढ जाती है पिता को केवल पिता की शक्ति के अनुसार ही जातक मानता है जैसे ही पिता से दूरिया होती है वह अपने बच्चों और जीवन साथी के प्रति समर्पित हो जाता है और जीवन साथी के द्वारा ही उसके लिये अधिक से अधिक कार्य पूरे किये जाते है,जब तक जीवन साथी के द्वारा उसके लिये प्रयास करने के रास्ते नही दिये जाते है वह किसी भी रास्ते पर जाने के लिये उद्धत नही होता है लेकिन जीवन साथी के उकसाने के बाद वह अपने को पूरी तरह से करना या मरना के रास्ते को अपना लेता है,जितना वह जीवन साथी के लिये समर्पित होता है उतनी ही आशा अपने जीवन साथी से छल नही करने के लिये रखता है,अगर कोई शक्ति को अपना कर जीवन साथी के प्रति आघात करता है तो वह अपने अनुसार या तो अपने को पूरी तरह से समाप्त कर लेता है या अपने को इतना बेकार का बना लेता है कि वह दूसरे किसी जीवन साथी को अपना कर उसी प्रकार से त्यागना शुरु कर देता है जैसे एक कुत्ता अपने लिये कामुकता की बजह से भटकाना शुरु कर देता है। यह तभी होता है जब उसे जीवन साथी के द्वारा कोई आहत करने वाला कारण बनता है।इस राशि वाले जातक की आदत होती है कि वह अपनी शक्ति से ही कमा कर खाने में विश्वास रखता है और जब वह शक्ति से हीन हो जाता है तो अपने को एकान्त में रखकर अपनी जीवन लीला को समाप्त करने की बाट जोहने लगता है। वह दया पर निर्भर रहना नही जानता हैअक्सर इस राशि वाले की पहिचान इस प्रकार से भी की जाती है कि वह अगर किसी स्थान पर जाता है तो वह उस स्थान पर अपने को बैठाने के लिये किसी के हुकुम की परवाह नही करता है उसे जहां भी जगह मिलती है आराम से अपनी जगह को सुरक्षित रूप से तलाश कर बैठने की कोशिश करता है। एक बात और भी देखी जाती है कि इस राशि वाले अक्सर किसी के प्रति लोभ वाली नजर से देखते है तो उनकी पहली नजर गले पर जाती है वे आंखों से आंखो को नही मिलाते है।
बारहवा स्थान कालपुरुष की कुंडली के अनुसार गुरु की वायु राशि मीन है,लेकिन सिंह लगन के लिये इस इस राशि मे पानी की राशि कर्क का स्थापन हो जाता है। कर्क राशि के स्थापन के कारण और सूर्य का बारहवे भाव में बैठना आसमान के राजा का आसमान में ही प्रतिस्थापन भी माना जाता है। यह सूर्य बडे सन्स्थानों में राजनीति वाली बाते करने और राजनीति के मामले में भी जाना जाता है,कर्क राशि घर की राशि है,और सूर्य इस राशि में लकडी अथवा वन की उपज से अपना सम्बन्ध रखता है। जातक की पहिचान और जाति के समबन्ध में कर्क राशि का सूर्य अगर किसी प्रकार से मंगल से सम्बन्ध रखता है तो जातक के परिवार को उसी परिवार से जोड कर माना जाता है जहां से जातक की उत्पत्ति होती है,जातक या तो वन पहाडों में लकडी के बने घर में पैदा होता है और पिता के द्वारा मेहनत करने के बाद वन की उपज से घर को बनाया गया होता है,जातक का पैदा होना और जातक के पिता का बारहवें भाव में होना यानी पिता का बाहर रहना भी माना जाता है। चन्द्र केतु अगर चौथे भाव में है और मंगल का भी साथ है तो जातक के पैदा होने के समय में जितनी मंगल में शक्ति है उतनी ही तकनीक को रखने वाली दाई के साये में जातक का जन्म हुआ होता है और जातक के पिता के साथ किसी प्रकार की दुर्घटना होनी मानी जाती है।मंगल के साथ केतु के होने से जातक के लिये एक तकनीकी काम का करने वाला साथ ही धन वाले कारणो को पैदा करने के लिये।
शुक्रवार, 28 जनवरी 2022
ग्रह दशा फल
ज्योतष में परिणाम की प्राप्ति होने का समय जानने के लिए जिन विधियों का प्रयोग किया जाता है उनमें से एक विधि है विंशोत्तरी दशा। विंशोत्तरी दशा का जनक महर्षि पाराशर को माना जाता है। पराशर मुनि द्वारा बनाई गयी विंशोत्तरी विधि चन्द्र नक्षत्र पर आधारित है।विंशोत्तरी दशा के द्वारा हमें यह भी पता चल पाता है कि किसी ग्रह का एक व्यक्ति पर किस समय प्रभाव होगा।प्रत्येक ग्रह अपने गुण-धर्म के अनुसार एक निश्चित अवधि तक जातक पर अपना विशेष प्रभाव बनाए रखता है जिसके अनुसार जातक को शुभाशुभ फल प्राप्त होता है। ग्रह की इस अवधि को हमारे महर्षियों ने ग्रह की दशा का नाम दे कर फलित ज्योतिष में विशेष स्थान दिया है। फलित ज्योतिष में इसे दशा पद्धति भी कहते हैं। भारतीय फलित ज्योतिष में 42 प्रकार की दशाएं एवं उनके फल वर्णित हैं, किंतु सर्वाधिक प्रचलित विंशोत्तरी दशा ही है। उसके बाद योगिनी दशा है
लगनेश की दशा मे शरीर को सुख मिलता है और धन का लाभ भी होता है,धनेश की दशा मे धन लाभ तो होता है लेकिन शरीर को कष्ट होता है,यदि धनेश पर पाप ग्रह की नजर हो तो मौत तक होती देखी गयी है,तीसरे भाव के स्वामी की दशा मे रोग भी होते है चिन्ता भी होती है आमदनी का प्रभाव भी साधारण ही रहता है,चौथे भाव के स्वामी की दशा मे स्वामी के अनुसार ही मकान का निर्माण भी होता है सवारी का सुख भी प्राप्त होता है,लाभ के मालिक और दसवे भाव के मालिक दोनो ही अगर द्सवे या चौथे भाव मे हो तो चौथे भाव के स्वामी की दशा मे फ़ैक्टरी या बडे कारोबार की तरफ़ इशारा करते है,विद्या लाभ के लिये भी इसी दशा को देखा जाता है.पंचम भाव के स्वामी की दशा में विद्या की प्राप्ति भी होती है धन का जल्दी से धन कमाने के साधनो से धन भी प्राप्त होता है दिमाग अधिकतर लाटी सट्टे और शेयर बाजार जैसे कार्यों से धन की प्राप्ति होती है अधिकतर जुआरी इसी दशा मे अपने को पनपा लेते है.प्रेम इश्क मुहब्बत का कारण भी इसी दशा मे देखा जाता है,अगर साठ साल की उम्र मे भी इस भाव के स्वामी की दशा शुरु हो जाये तो व्यक्ति सठियाने वाली कहावत को चरितार्थ करने लगता है.सम्मान भी मिलता है समाज मे यश भी मिलता हैलेकिन बचपन मे दशा शुरु हो जाये तो माता और मकान तथा वाहन के प्रति दिक्कत भी शुरु हो जाती है.छठे भाव के स्वामी की दशा मे दुश्मनी पैदा होने लगती है बीमारी घेरने लगती है कर्जा भी बढने लगता है.सबसे अधिक सन्तान के लिये दिक्कत का समय माना जाता है और वह उन सन्तान के लिये माना जाता है जब वह शिक्षा के क्षेत्र मे होती है उनके लिये यह भी माना जाता है कि धन का कारण उन्हे पता लगने लगता है और उस कारण से वह चोरी करना ठगी करना और परिवार को बदनाम करने वाले काम भी करने से नही चूकती है,सप्तमेश की दशा मे अगर शादी हो चुकी है तो जीवन साथी को कष्ट बेकार के कारणो से होना शुरु हो जाता है शादी नही हुयी है तो कई प्रकार के रिस्ते बनते और बिगडने की बात भी मानी जाती है.अष्टमेश की दशा मे अगर वह पाप ग्रह है तो मौत या मौत जैसे कष्ट मिलने की बात मानी जाती है अगर अष्टमेश पाप ग्रह के रूप मे है और दूसरे भाव मे विराजमान है तो निश्चय ही मौत का होना माना जा सकता है गुरु के द्वारा देखे जाने पर कोई न कोई सहायता मिल जाती है,लेकिन गुरु के वक्री होने पर मिलने वाले उपाय भी बेकार हो जाते है.नवमेश की दशा मे सुख मिलना जरूरी होता है,भाग्योदय का समय भी माना जाता है,धार्मिक कार्यों मे मन का लगना और अचानक धार्मिक होना भी इसी दशा के प्रभाव से माना जाता है.दसवे भाव के मालिक की दशा मे राज्य से,सहायता मिलने लगती है पिता से सहायता के लिये भी और पुत्र से सहायता के लिये भी माना जाता है सुख का समय शुरु होना भी माना जाता है सम्मान प्राप्ति देश विदेश मे नाम होने की बात भी देखी जाती है लाभेश की दशा मे धन का आना तो होता है लेकिन पिता और पिता सम्बन्धी कारको का नष्ट होना भी माना जाता है बारहवे भाव के मालिक की दशा मे शरीर को कष्ट भी होता है धन की हानि भी होती है और भटकाव भी देखा जाता है सबसे अधिक कारण मानसिक चिन्ताओं के लिये भी माना जाता है,राहु की दशा मे अजीब गरीब कार्य का होना,अचानक धनी और अचानक निर्धन बन जाना पूर्वजो के नाम को या तो चमका देना या उनके नाम का सत्यानाश कर देना भी माना जाता है केतु की दशा मे दलाली जैसे काम करना कुत्ते जैसा भटकाव या ननिहाल खान्दान से अपने जीवन यापन को करना अथवा भटकाव चुगली खबर बनाने का काम आदेश से काम करने के बाद रोजी की प्राप्ति दूसरे के इशारे पर काम करना आदि माना जाता है.
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