:देव केरलम (नाड़ी अंश) - चर राशियाँ (मेष, कर्क, तुला, मकर): भाग-5 (4° से 5° तक का सूक्ष्म भविष्य)
हर हर महादेव!
मैं आचार्य राजेश कुमार (हनुमानगढ़), नाड़ी अंश शृंखला के पाँचवे भाग में आपका स्वागत करता हूँ।
आज हम 4 डिग्री से 5 डिग्री के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं।
यह क्षेत्र थोड़ा संवेदनशील है। यहाँ ग्रह होने पर व्यक्ति को भावनात्मक रूप से बहुत संभलकर रहना पड़ता है, लेकिन अंत में 'सुखदा' (सुख) की प्राप्ति भी यहीं होती है।
अपनी कुंडली (D1) के लग्नेश, सूर्य या चंद्रमा की डिग्री जांचें।
(स्मरण रहे: यह गणना केवल चर राशियों—मेष, कर्क, तुला, मकर—के लिए है)
21. विबला (Vibala) अंश
(विस्तार: 04° 00' से 04° 12')
* अर्थ: बल से रहित / संवेदनशील / कोमल।
* सामान्य फल: यह थोड़ा नाजुक अंश है। जातक शारीरिक या मानसिक रूप से कोमल होता है। उसे जीवन में सहारे की जरूरत पड़ती है।
* सटीक भेद (Precision):
* पूर्व भाग (04° 00' - 04° 06'): यहाँ 'शारीरिक कोमलता' होती है। जातक को मौसम बदलने पर जल्दी सर्दी-जुकाम या एलर्जी हो सकती है। उसे अपनी इम्यूनिटी (Immunity) का ध्यान रखना चाहिए।
* उत्तर भाग (04° 06' - 04° 12'): यहाँ 'मानसिक संवेदनशीलता' होती है। जातक छोटी-छोटी बातों को दिल पर लगा लेता है। वह भावुक होता है, लेकिन कला के लिए यह अच्छा है।
22. विह्वला (Vihvala) अंश
(विस्तार: 04° 12' से 04° 24')
* अर्थ: व्याकुल / उत्साहित / बेचैन।
* सामान्य फल: जातक के मन में हमेशा एक 'हलचल' रहती है। वह शांत नहीं बैठ सकता। यह घबराहट भी दे सकता है और अत्यधिक खुशी भी।
* सटीक भेद (Precision):
* पूर्व भाग (04° 12' - 04° 18'): जातक 'चिंता' (Anxiety) का शिकार हो सकता है। भविष्य को लेकर डर बना रहता है। (उपाय: ध्यान/Meditation करें)।
* उत्तर भाग (04° 18' - 04° 24'): जातक 'उत्साही' (Excited) होता है। वह किसी भी काम को बहुत तेजी और जोश में शुरू करता है। यह ऊर्जा अगर सही दिशा में लगे तो चमत्कार करती है।
23. सोल्ला (Solla) अंश
(विस्तार: 04° 24' से 04° 36')
* अर्थ: शूल / कांटा / तीखा।
* सामान्य फल: यह संघर्ष और तीखेपन का अंश है। जातक को जीवन में चुभने वाली बातों का सामना करना पड़ता है, लेकिन इससे वह मजबूत बनता है।
* सटीक भेद (Precision):
* पूर्व भाग (04° 24' - 04° 30'): जातक की 'वाणी तीखी' हो सकती है। वह सच मुँह पर बोल देता है, जिससे लोग नाराज हो जाते हैं। आलोचक (Critic) बनने के लिए उत्तम।
* उत्तर भाग (04° 30' - 04° 36'): जातक के जीवन में 'अचानक बाधाएं' (कांटे) आती हैं, लेकिन वह उन्हें हटाकर आगे बढ़ता है। यह संघर्ष से सफलता का योग है।
24. सुखदा (Sukhada) अंश
(विस्तार: 04° 36' से 04° 48')
* अर्थ: सुख देने वाली / आनंददायक।
* सामान्य फल: यह बहुत ही शुभ अंश है। पिछले अंशों (विबला, विह्वला) के कष्टों के बाद यहाँ 'विश्राम' और 'सुख' मिलता है।
* सटीक भेद (Precision):
* पूर्व भाग (04° 36' - 04° 42'): यहाँ 'पारिवारिक सुख' मिलता है। जातक का वैवाहिक जीवन और संतान सुख उत्तम रहता है। घर में शांति रहती है।
* उत्तर भाग (04° 42' - 04° 48'): यहाँ 'भौतिक सुख' मिलता है। जातक को वाहन, अच्छे कपड़े और लक्जरी (Luxury) का सुख प्राप्त होता है।
25. स्निग्धा (Snigdha) अंश
(विस्तार: 04° 48' से 05° 00')
* अर्थ: चिकना / स्नेही / मित्रवत / प्रेमपूर्ण।
* सामान्य फल: जातक का स्वभाव तेल जैसा चिकना (Smooth) होता है। वह कहीं भी फिट हो जाता है और सबके साथ मित्रता बना लेता है।
* सटीक भेद (Precision):
* पूर्व भाग (04° 48' - 04° 54'): जातक के 'मित्र बहुत होते हैं'। वह दोस्तों की मदद से ही तरक्की करता है। उसका नेटवर्क बहुत बड़ा होता है।
* उत्तर भाग (04° 54' - 05° 00'): जातक 'धनी और स्नेही' होता है। 'स्निग्ध' का अर्थ धन (Liquid Cash) भी है। उसके पास धन का प्रवाह (Flow) बना रहता है।
निष्कर्ष:
मित्रों, हमने चर राशियों के पहले 5 डिग्री (अंश 1 से 25) की यात्रा पूरी कर ली है।
यहाँ हमने देखा कि जीवन कैसे 'विबला' (कमजोरी) से शुरू होकर 'सुखदा' (सुख) और 'स्निग्धा' (प्रेम) तक पहुँचता है।
अगले लेख में हम 5 डिग्री से आगे (भाग 6) की चर्चा करेंगे, जहाँ 'माया' और 'विद्युत्' (बिजली) जैसे तेज अंश आएंगे।
शुभम भवतु!
— आचार्य राजेश कुमार
(सत्य सनातन ज्योतिष एवं महाकाली सेवक)
स्थान: हनुमानगढ़, राजस्थान
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