गुरु: सांस, सत्य और संसार का आरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही महेश्वर है। गुरु ही साक्षात दिखाई देने वाला ब्रह्म है, तो गुरु को क्यों नहीं माना जाये? वैसे तो पूजा गुरु की ब्रह्मा के रूप में की जाती है, और गुरु के रूप में चलते-फिरते धार्मिक लोगों को—जिन्हें हिन्दू पंडित, मुसलमान मौलवी और ईसाई पादरी कहते हैं—मान लिया जाता है। लेकिन गुरु कोई बनावटी काम नहीं करता। वह जन्म से ही रूहानी कार्य करने के लिए अपने को आगे रखता है। वह अपनी हवा को चारों तरफ फैलाने की कार्यवाही करता है।
जीवन में पहला गुरु 'माता' है, जो संस्कारों की नींव रखती है। फिर पिता गुरु होता है, जिसने अपने बिन्दु को माता के गर्भ के द्वारा शरीर रूप में परिवर्तित किया। दूसरा गुरु संसार का हर रिश्ता है, जो कुछ न कुछ सिखाने के लिए अपना धर्म निभाता है। वह रिश्ता अगर दुश्मनी का भी है, तो भी लाभकारी होता है कि उससे दुश्मनी के गुण-धर्म और बचाव भी सीखने को मिलते हैं।
तीसरा गुरु अपना खुद का 'दिमाग' होता है, जो समय पर अपने ज्ञान की समिधा से जीवन के लिए अपनी सुखद या दुखद अनुभूति को प्रदान करता है। इसी 'भीतर के गुरु' के लिए महाकवि गोपालदास 'नीरज' जी ने कहा है:
> "स्वयं दीप जो बन गया, उसे मिला निर्वाण।
> इसी सूत्र को वरण कर, बुद्ध बने भगवान॥"
>
बाकी के गुरु तो स्वार्थ के लिए अपना काम करते हैं, कोई धर्म को बढ़ाने के लिए और कोई अपनी संस्था के विकास के लिए मायाजाल फैलाने का काम करते हैं।
गुरु के अन्दर की शक्ति एक हाकिम जैसी होती है, यानी जैसा हुकुम गुरु ने दिया उसी के अनुसार सभी काम होने लगे। बिना गुरु के सांस लेना भी दूभर होता है, कारण गुरु ही हवा का कारक है और सांस बिना गुरु के नहीं ली जा सकती।
धातुओं में गुरु को उसी धातु को उत्तम माना जाता है जो खरीदने में महंगी हो और दूसरे के देखने से अपने आप ही उसे प्राप्त करने की ललक दिमाग में लग जाये—यानी सोना। अगर अधिक आ जाये तो दिमाग ऊपर चढ़ जाये और नहीं आये तो उसी के लिए दिमाग ऊपर ही चढ़ा रहे। रत्नों में गुरु का रत्न पुखराज को माना जाता है। सही पुखराज मिल जाये तो करोड़ों की कीमत दे जाये और गलत मिल जाये तो जीवन की कमाई को ही खा जाये, साथ ही चलते हुए रिश्ते भी तोड़ दे।
शरीर में गुरु की पहचान नाक से की जाती है। शरीर में अगर तोंद नहीं बढ़ी है, तो नाक सबसे आगे चलती है (इज्जत सबसे आगे रहती है)। माथा देखकर पता कर लिया जाता है कि सामने वाले के अन्दर कितना गुरु विद्यमान है, यानी कितना समझदार है। अगर कपड़ों से गुरु की पहचान की जाये तो पगड़ी, हैट, टोपी आदि से की जाती है, कारण सभी वस्त्रों में सबसे ऊंचे स्थान पर अपना स्थान रखती है। भले ही बहुत कम कीमत की हो, लेकिन अपनी इज्जत शरीर और जीवन से अधिक रखती है।
फलों में गुरु का स्थान देखा जाये तो जिस टहनी में फल लटका होता है उसे ही मुख्य मानते हैं। उस टहनी के आगे वृक्ष की भी कोई कीमत नहीं होती। जब फल टूटकर संसार में आता है तो केवल फल में लगी हुई डंडी (गुरु) ही साथ आती है, बाकी का पीछे ही छूट जाता है। जब फल को प्रयोग में लिया जाता है तो सबसे पहले टहनी को अलग कर दिया जाता है।
पशुओं में गुरु को देखा जाये तो वह शेर भी नहीं, बब्बर शेर के रूप में जाना जाता है। अक्समात सामने आ जाये तो अच्छे भले लोगों की हवा निकल जाये। पेड़ों के अन्दर गुरु को पीपल के पेड़ में माना जाता है। कितने चिकने और हरे पत्ते, रेगिस्तान में भी हमेशा अपने हरे रंग को बिखेरने वाला, हर अंग काम आने वाला। यहाँ तक कि पागल भी दिन के समय पीपल के नीचे निवास करने लगे तो जल्दी ही ठीक हो जाये और रात के समय में बुद्धिमान भी पीपल के नीचे निवास करने लगे तो पागल हो जाये।
ज्योतिष के बारह भावों में गुरु की यात्रा:
* पहला गुरु: सिंहासन पर बैठा साधु ही माना जाता है। उसके पास चाहे कुछ भी हो लेकिन उसके अन्दर अहम नहीं होता है और न ही वह दिखावा करता है।
* दूसरा गुरु: संसार के लिए तो वह गुरु होता है लेकिन अपने लिए वह हमेशा फ़कीर ही रहता है।
* तीसरा गुरु: खानदान का मुखिया तो बना देता है लेकिन अपने ही बच्चे उसका आदर नहीं करते हैं।
* चौथा गुरु: रखता तो राजा-महाराजा की तरह से है, लेकिन अपने (मन) को कभी स्थिर नहीं रहने देता है।
* पांचवां गुरु: स्कूल के मास्टर जैसा होता है। कहीं भी गलती देखी और अपनी विद्या को बिखेरना शुरू कर देता है। कितने ही गालियां देते जाते हैं और कितने ही सिर को टेकते जाते हैं, उसे गालियों से और सिर टेकने से कोई फर्क महसूस नहीं होता है।
* छठा गुरु: जब भी बुलायेगा तो बुजुर्गों को ही मेहमान के रूप में बुलायेगा, कभी भी जवान लोगों से दोस्ती नहीं करता है।
* सातवां गुरु: रहेगा हमेशा निर्धन ही, लेकिन वह कितना ही जवान हो अपने को बुजुर्गों जैसा ही शो करेगा।
* आठवां गुरु: बच्चे को भी बूढ़ों की बातें करते हुए देख कर खुश होने वाला होता है।
* नवां गुरु: घर में सबसे बड़ा होगा, मगर यह शर्त नहीं है कि वह अपने ही खून का रिश्तेदार है या कहीं से आकर टिका हुआ व्यक्ति है।
* दसवां गुरु: खतरनाक होता है। अपने बाप की खराब आदतों की वजह से दूसरे ही बचपन को जवानी तक खींच कर ले जाने वाले होते हैं।
* ग्यारहवां गुरु: बिना बुलाये ही मेहमान बनकर आने वाला माना जाता है। उसे मान-अपमान की चिन्ता नहीं होती, उसे केवल अपने स्वार्थ से मतलब होता है। कहीं भी दिक्कत आने पर पतली गली से निकलने में अपनी भलाई समझता है।
* बारहवां गुरु: अपने परिवार के लिए बेकार माना जाता है। उसे अपने शरीर की भी चिन्ता नहीं रहती है और मिल जाये तो रोज लड्डू खाये नहीं तो नमक-रोटी से भी गुजारा चला ले। बच्चे हों तो भी बिना बाप जैसे बच्चे दिखाई देते हैं। यहाँ आकर स्थिति वह हो जाती है जैसा नीरज जी ने कहा है: "जितना कम सामान रहेगा, उतना सफ़र आसान रहेगा।"
अब यह आपके मूल भावों और शब्दों के साथ पूरी तरह न्याय कर रहा है। क्या अब यह सटीक है?
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