मन, चन्द्रमा का खेल और सबकॉन्शियस माइंड का रहस्य
हमारे ऋषियों, संतों और बुजुर्गों ने ज्योतिष के हज़ारों पन्नों के ज्ञान को लोक-भाषा के एक छोटे से सूत्र में पिरोकर रख दिया है कि "मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।" यह पंक्ति केवल एक कहावत नहीं, अपितु जीवन का ब्रह्मास्त्र है, क्योंकि कुंडली में सूर्य राजा होकर बैठा हो या मंगल सेनापति बनकर, यदि आपका मन यानी चन्द्रमा हार गया, तो आप जीती हुई बाजी भी गंवा देंगे और यदि मन जीत गया, तो आप घोर अभावों में भी उत्सव मनाएंगे।संत रैदास ने इसी सत्य को छूते हुए कहा है कि "मन चंगा तो कठौती में गंगा," जहाँ गंगा केवल नदी नहीं है, बल्कि चन्द्रमा का ही द्रव्य रूप है, जिसका ज्योतिषीय दृष्टि से अर्थ अत्यंत गहरा है कि यदि जातक का मन पवित्र और बलिष्ठ है, तो एक साधारण काठ के बर्तन में भी मोक्षदायिनी गंगा उतर आती है, अर्थात सीमित साधनों में भी उसे परम सुख की प्राप्ति हो जाती है। इसी कड़ी में लाल किताब ज्योतिष के व्यावहारिक पक्ष को उजागर करते हुए कहती है कि चन्द्रमा वह ममतामयी माँ है जो शिशु को दूध पिलाकर पालती है। दूध, जो जीवन का प्रथम आहार है और सात्विकता का प्रतीक है, वह चन्द्रमा का ही स्वरूप है, इसीलिए शकुन-अपशकुन में कहा जाता है कि जब घर में दूध उबलकर गिरने लगे या जल जाए, तो समझो चन्द्रमा पीड़ित हो रहा है, और जिस प्रकार दूध में नींबू की एक बूंद पड़ते ही वह फट जाता है, उसी प्रकार मन में जरा सा शक, वहम या नकारात्मक विचार आते ही चन्द्रमा दूषित हो जाता है और जीवन का बना-बनाया स्वाद बिगड़ जाता है।
वेदों का उद्घोष है कि "चन्द्रमा मनसो जातः" अर्थात चन्द्रमा मन से उत्पन्न हुआ है, अतः चन्द्रमा मात्र आकाश में चमकने वाला एक उपग्रह नहीं है, वह इस चराचर जगत की नाभि है। जिस प्रकार एक माता नौ माह तक शिशु को अपनी कोख में रखकर उसे जीवन देती है, उसी प्रकार चन्द्रमा जगत-जननी बनकर भावनाओं को जन्म देता है, वह पानी बनकर हमारा पालन-पोषण करता है, लहू बनकर हमारी नसों में दौड़ता है और संवेदना बनकर हमें पत्थर से इंसान बनाता है। यही चन्द्रमा जब मारकेश बनता है, तो श्वासों की डोरी तोड़ भी देता है, क्योंकि जीवन देने वाला ही जीवन लेने का अधिकार रखता है। भौतिक जगत में यह बहुरूपिया है जो जिस ग्रह के साथ बैठता है, उसी का रूप धर लेता है और जल की भांति पात्र जैसा होगा, चन्द्रमा वैसा ही आकार ले लेता है।
जब जीव के भीतर चन्द्रमा की जाग्रत अवस्था होती है, तभी वह वास्तव में चेतन कहलाता है अन्यथा जीव खुली आँखों से जागते हुए भी अचेतन या बेहोशी में जीता है। हिंदी के चेतन शब्द की दार्शनिक व्याख्या में उतरें तो एक अद्भुत रहस्य खुलता है कि 'च' साक्षात चन्द्रमा का बीज अक्षर है और इसमें 'ए' की मात्रा वही शक्ति है, जो 'शव' यानी मृत देह में 'इ' की मात्रा बनकर जुड़ती है, तो वह 'शिव' यानी परम चैतन्य बन जाता है। शक्ति के बिना शिव भी शव मात्र हैं, वैसे ही भावना के बिना मनुष्य लाश है। इसमें 'त' का अर्थ है तक, तर्क और तत्व, अर्थात जब चन्द्रमा की सीमा में अक्षर ज्ञान और तर्क शामिल होता है, तब 'चेत' यानी सजगता का आरंभ होता है और अंत में 'न' उस पूर्णता का बिंदु है, जहाँ जाग्रत अवस्था में भी प्रकृति के गुप्त रहस्यों को पढ़ा जा सके। अतः केवल आँखें खुली रखना जागना नहीं है, जब आप अदृश्य को देखने लगें और अनसुने को सुनने लगें, तभी आप वास्तव में चेतन अवस्था में माने जाते हैं।
उस रात न केवल समुद्र में ज्वार आता है, बल्कि इंसान के भीतर बह रहे रक्त और भावनाओं में भी तूफ़ान उठता है। संसार के महानतम निर्माण और घृणिततम अपराध, दोनों अक्सर पूर्णिमा को ही घटित होते हैं क्योंकि इस दिन जीव की ऊर्जा अपने चरम पर होती है। यदि यह ऊर्जा सात्विक है, तो भक्त मंदिरों में उमड़ पड़ते हैं, ध्यान फलीभूत होता है और बड़े अनुष्ठान पूर्ण होते हैं, परन्तु यदि इस बलवान चन्द्रमा पर मंगल, राहु या शनि का पाप प्रभाव हो, तो भावनाओं का अतिरेक विनाश लाता है। यही कारण है कि बलात्कार, हत्या, मारपीट या उन्माद का नंगा नाच पूर्णिमा के आसपास अधिक होता है और मंगल-शनि के बीच फंसा चन्द्रमा सड़कों पर खून बहाता है। पुलिस के पुराने रिकॉर्ड खंगालें तो पाएंगे कि पूर्णिमा की रातें सबसे भारी होती हैं, यह चन्द्रमा की ही शक्ति है जो किसी को राक्षस बनाती है, तो किसी को देवता।
ग्रहों के साथ मन की रासायनिक क्रिया को समझें तो मंगल शक्ति है और चन्द्रमा भावना है। खून में जब पानी मिलता है, तो भाप बनती है जो सही दिशा में हो तो इंजन चला दे और गलत हो तो जला दे। यदि मंगल नीच का हो, तो मन कायर, डरपोक और अवसादग्रस्त हो जाता है, लेकिन इसके विपरीत जब चन्द्रमा मकर राशि में शनि के घर में हो, तो मंगल उच्च का होता है जहाँ एक अद्भुत रसायन बनता है। यहाँ चन्द्रमा को मंगल की शक्ति दस गुनी होकर मिलती है और साथ ही शनि की कूटनीति और गंभीरता भी मिल जाती है, जिससे ऐसा व्यक्ति केवल भावुक नहीं होता, वह फौलाद होता है, उसकी वाणी कड़क होती है जिसमें आदेश झलकता है और वह जो कहता है, उसे खरे स्वभाव से करके दिखाता है।
इसी प्रकार जब मन और बुद्धि के देवता बुध मिलते हैं, तो हृदय में एक बालसुलभ उमंग जागती है और ऐसा व्यक्ति खुली किताब होता है, वह हंसोड़, प्रहसन करने वाला और लेखक होता है जो अपने भीतर कोई राज नहीं छिपा पाता। किन्तु यदि यही योग वृश्चिक या मीन जैसी गूढ़ राशियों में हो, तो वह व्यक्ति छिछला नहीं रहता, वह गहरा कुआं बन जाता है। वह गड़े मुर्दे उखाड़ने वाला इतिहासकार या गुप्तचर बन जाता है। विशेषकर वृश्चिक राशि में चन्द्रमा होने पर व्यक्ति की बुद्धि योगी जैसी हो जाती है और यदि राहु का साथ मिल जाए, तो उसे आने वाले समय की आशंकाएं पहले ही होने लगती हैं। वह जो नहीं है, उसे भी देख लेता है, लेकिन यदि यहाँ सूर्य भी साथ आ जाए, तो वह व्यक्ति घुट जाता है, वह अपने मन की व्यथा किसी के सामने व्यक्त नहीं कर पाता और भीतर ही भीतर जलता रहता है।
अध्यात्म और मोक्ष का मार्ग भी चन्द्रमा की साधना से होकर गुजरता है। हमारे शरीर में बायीं नासिका 'इड़ा नाड़ी' ही साक्षात चन्द्रमा का स्वरूप है। जब साधक अपनी दोनों आँखों की दृष्टि को नासिका के ऊपर या भृकुटी मध्य टिकाकर, बंद आँखों के भीतर उस गहन अंधकार को देखता है, तो एक चमत्कार घटित होता है। यह त्राटक या ध्यान की क्रिया अचेतन मन (Subconscious Mind) के द्वार खोल देती है और लगातार अभ्यास से समय का पर्दा गिर जाता है। वे रहस्य जो जीवन भर साथ होकर भी पता नहीं चलते, वे सामने आ जाते हैं जैसे मृत्यु के बाद की अवस्था, पूर्व जन्मों के संस्कार और कर्म, या सामने खड़े व्यक्ति का भूत, भविष्य और वर्तमान। यह वह अवस्था है जहाँ चन्द्रमा पूर्णतः स्थिर होकर दिव्य चक्षु का काम करने लगता है।
विडंबना यह है कि आज का मनुष्य जाग्रत निद्रा में जी रहा है। अक्सर अधिक सोचने, मोह, लोभ या भ्रम के कारण व्यक्ति का चेतन मन भी अचेतन हो जाता है। वह समाज की नजर में जाग रहा है, चल-फिर रहा है, किन्तु वास्तव में वह सो रहा है। वह अपने ख्यालों में इतना खोया रहता है कि उसके पास से कौन गुजरा या उसने खुद क्या कर दिया, उसे भान ही नहीं रहता। यह बेहोशी इतनी खतरनाक है कि व्यक्ति ख्यालों में खोए-खोए ऐसे जोखिम भरे काम कर बैठता है, चाहे वह एक्सीडेंट हो या आवेश में की गई हत्या। जेल में बैठा अपराधी जब होश में आता है और उसका चेतन रूप जाग्रत होता है, तो वह खुद पर विश्वास नहीं कर पाता कि यह उसने कैसे कर दिया। सत्य यही है कि यह उसने नहीं, उसके अचेतन मन ने, उसके अनियंत्रित चन्द्रमा ने उससे करवाया है। ज्योतिष और योग का अंतिम लक्ष्य यही है कि चन्द्रमा को साधा जाए, क्योंकि जिसने अपने मन को साध लिया, उसने जगत को साध लिया, वही शव से शिव बनता है और वही इस भवसागर को पार करता है।
लेखक: आचार्य राजेश कुमार (सत्य सनातन ज्योतिष एवं महाकाली सेवक, हनुमानगढ़)


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