आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
मांकाली ज्योतिष की आज की पोस्ट उन मित्रो के लिऐ है जो ज्योतिष सिख रहे है या जो ज्योतिष की जानकारी रखते है ओर ज्यादा से ज्यादा ज्ञान पाना चाहते है मित्रो पोस्ट थोङी लम्वी है माफी चाहुगा मेरा तो यही उदेश्य है की ज्ञान वाटा जाऐ ज्ञान वाटने से ओर वङता है आचार्य राजेश मिथुन लगन की कुंडली और केतु लगन में है,राहु का सप्तम में होना बाजिव है,चौथा शनि वक्री है,लगनेश वक्री बुध दसवे भाव में मंगल गुरु शुक्र के साथ विराजमान है,सूर्य ग्यारहवा और चन्द्र पंचम में विराजमान है। केतु का कार्य प्राप्त करना होता है और राहु का कार्य इकट्ठा करके देना होता है। राहु जिस भाव में है उस भाव के आसपास से और जहां जहां उसकी द्रिष्टि यानी स्थापित होने वाले स्थान से स्थापित होने वाले स्थान से तीसरे स्थान से पंचम स्थान से सातवें स्थान से और नवें स्थान से यह लेता है, (सातवें स्थान के केतु से यह भाव का नकारात्मक प्रभाव लेता है) और सकारात्मक रूप से यह केवल केतु को ही प्रदान करता है। केतु राहु से प्राप्त किये गये प्रभाव और कारण को अपने स्थान पर खर्च करता है तीसरे स्थान पर खर्च करता है पंचम स्थान पर खर्च करता है और नवें स्थान पर खर्च करता है। इस बात के लिये यह भी जानना आवश्यक है कि जब राहु अपने से तीसरे स्थान से पराक्रम को इकट्ठा करके केतु को देता है तो केतु बदले में उस पराक्रम के स्थान पर भाग्य की बातों को देता है। जैसे राहु ने अपने से तीसरे स्थान से व्यक्ति की कपडे पहिनने की जानकारी को इकट्ठा किया और केतु को प्रदान कर दिया,बदले में केतु ने उस तीसरे स्थान पर अपने समाज और मर्यादा के अनुरूप गुण प्रदान कर दिया यानी जातक को बजाय कपडे को ओढने के उसे सिलवा कर तरीके से पहिना दिया,उसी प्रकार से राहु ने जातक के द्वारा शिक्षा की शक्ति को लिया और केतु को प्रसारित कर दिया,केतु ने धीरे से उस शक्ति को लाभ के मामले में लेकर उसे अपने लिये साधन बना लिया और जीविकोपार्जन के लिये प्रदान करने लगा। राहु ने सप्तम के प्रभाव को जातक से लिया और वासना के रूप में केतु को प्रदान कर दिया,जातक ने अफ़ेयर और शादी विवाह के सम्बन्ध के द्वारा उस शक्ति को प्रयोग में लिया और अपने लिये आजीवन व्यस्त रहने का साधन बना लिया। राहु ने अपने से नवें भाव के प्रभाव को भाग्य के रूप में प्राप्त किया,केतु ने उस भाग्य के प्रभाव को अपनी शक्ति बनाकर समाज मे चलने के लिये योग्य बना लिया।राहु केतु की सीमा रेखा एक दूसरे के प्रति एक सौ अस्सी डिग्री की मानी जाती है,दोनो ही छाया ग्रह है इसलिये अपनी अपनी योग्यता को स्वभाव और ज्ञान के रूप में तो प्रदर्शित करते है,लेकिन सामने नही आते है,जैसे बिजली का तार लम्बा है तो केतु का रूप देता है,चौकोर है तो मंगल केतु का रूप देता है,गोल है तो बुध केतु का रूप देता है,लचीला है तो बुध के साथ गुरु का प्रभाव भी शामिल है कठोर है तो शनि का प्रभाव भी शामिल है,उस तार का प्रयोग अगर कपडे लटकाने वाली अलगनी के रूप में लिया जाता है तो वह शक्ति की भावना को तभी तक अपने अन्दर संजोकर रखेगा जब तक कपडे के अन्दर पानी यानी चन्द्रमा की मात्रा अधिक है,अगर शनि का प्रभाव चन्द्रमा के साथ है तो केतु को अधिक समय तक बोझ को लादकर रखना पडेगा,और सूर्य का चन्द्रमा के साथ अधिक प्रभाव है तो जरा सी देर के लिये बोझ को लादना पडेगा,साथ ही मंगल का प्रभाव अधिक है तो कपडे को जला भी सकता है और खुद भी मंगल के साथ जल कर खत्म हो सकता है। लेकिन राहु का प्रभाव उस केतु के अन्दर समय के अनुसार ही बनेगा। जैसे बिजली का तार देखने में तो वह आस्तित्वहीन मालुम होगा लेकिन उसे छूते ही वह करेंट को अपने बल के द्वारा प्रदर्शित करेगा मिथुन राशि का बुध दसवें भाव में वक्री है,राहु से चौथा है और केतु से दसवां,साथ ही शनि वक्री होकर चौथे भाव में लगनेश से विरोधाभास का कारण भी पैदा कर रहा है। अगर यह युति प्रश्न कुंडली के अनुसार देखी जाती तो वक्री बुध के लिये यह माना जाता कि प्रश्न कर्ता कुछ भूल कर आया है और उसे वापस फ़िर से प्रश्न पूंछने के लिये आना पडेगा,यहां बुध वक्री किसी गणित की जानकारी जैसे तारीख या हिसाब किताब को खोज कर वापस आयेगा। सप्तम में शनि वक्री के लिये माना जाता है कि उसकी पत्नी या जीवन साथी नही है,कारण राहु ने दसवीं नजर से शनि वक्री को देखा है,केतु ने चौथे भाव से देखा है इसलिये पत्नी या जीवन साथी का इन्तकाल तभी हो गया होगा जब शनि वक्री हुआ होगा। केतु से दसवें भाव में लगनेश के होने से लगनेश को मानसिक चिंता केतु के लिये ही होगी। लगनेश जो भी कार्य करेगा वह केतु को ध्यान में रखकर ही करेगा लगनेश से सम्बन्ध रखने वाले ग्रहों में जैसे शुक्र है तो लगनेश को चिन्ता स्त्री की अपने लिये नही होगी,कारण लगनेश वक्री है कभी भी वक्री लगनेश अपने लिये चिन्ता करने वाला नही होता है उसे अपने से चौथे भाव की चिन्ता का सामना ही करना पडता है। लगनेश को चिन्ता अपने केतु के लिये शुक्र को पैदा करने की है,वह चाहता है कि उसके पुत्र की शादी हो जाये जो उसके लिये घर संभालने वाली बात को कर सके। लगनेश् से दसवें भाव में राहु के होने से पिता का भी अन्तकाल हो चुका है,और लगनेश से चौथे केतु पर शनि की दसवी नजर पडने के कारण माता का भी अन्तकाल हो गया है। केतु से पंचम में चन्द्रमा के होने से और राहु से ग्यारहवे भाव में चन्द्रमा होने से लगनेश को दो माताओं ने एक साथ पाला है,एक माता अष्टम चन्द्र होने के कारण ताई की हैसियत वाली होगी,और लगनेश से दूसरे भाव में सूर्य के होने से जातक का पिता दो भाई था लेकिन राहु का असर दूसरे भाव के सूर्य पर पडने से जातक की ताई विधवा का जीवन निकालने के समय में ही जातक के पालन पोषण के प्रति अपनी आस्था रखने वाली होगी। वक्री बुध के साथ मंगल के होने से जातक रक्षा सेवा में कार्य करने वाला होगा,लगनेश के साथ गुरु के होने से जातक का एक भाई बडा भी होगा जो चौथे केतु की करामात से अपंग रहा होगा और गुरु के साथ वक्री बुध के कारण अविवाहित ही रहा होगा,तथा लगनेश के वक्री होने से और सूर्य के बीच में गुरु के होने से वह अनदेखी के कारण चन्द्रमा के पीछे शनि होने से ठंड के कारण अन्तिम गति को प्राप्त हुआ होगा। सूर्य से तीसरे भाव में केतु के होने से जातक के पिता को लाठी या सहारा लेकर चलने की आदत भी होगी सूर्य से सप्तम में चन्द्रमा के होने से जातक की दो बुआ हमेशा पिता को सहारा देने वाली होंगी लेकिन प्रश्न के समय वे दोनो ही बुआ विधवा जीवन को निकाल रहीं होंगी। चन्द्रमा से छठे भाव में बुध के वक्री होने से दोनो बुआ अपनी अपनी कमर को झुकाकर चलने वाली होंगी और जातक की ताई भी कमर झुकाकर ही मरी होंगी। मंगल के चौथे भाव में केतु के होने से और बुध के वक्री होने से गुरु के साथ होने से जातक की पत्नी को केंसर जैसी बीमारी रही होगी,तथा एक बुआ को भी केंसर की बीमारी रही होगी। जो केंसर की बीमारी जातक के गुरु यानी गले में रही होगी तो जातक की एक बुआ को गर्भाशय जो चन्द्रमा से पंचम स्थान को वक्री शनि के द्वारा देखा जा रहा है,की बीमारी रही होगी।लगन से सप्तम का राहु अगर धनु राशि का है तो जातक बदचलन होगा,वह अपनी मर्यादा को नही जानता होगा और उसका विश्वास नही किया जा सकता है। साथ ही जातक के जो भी सन्तान होगी वह या तो शराब आदि के कारणों मे व्यस्त होगी जो कार्य जातक के द्वारा किया जायेगा वही कार्य जातक के बडे पुत्र के द्वारा किया जायेगा,अन्य सन्तान भी राहु के असर से ग्रसित होगी या तो विक्षिप्त अवस्था में होगी या पिता का कहना नही मानती होगी। राहु ग्यारहवा चन्द्रमा जातक को भौतिक धन के रूप में खेती वाली जमीने ही इकट्ठी करने के लिये अपनी युति देगा,साथ ही केतु से दसवा मंगल रक्षा सेवा देगा मंगल बुध मिलकर एक सन्तान को मारकेटिंग में अग्रणी बनायेगा,शुक्र से सम्बन्धित होने के कारण एक सन्तान को पत्नी भक्त बनायेगा। जैसे ही गुरु चन्द्रमा के साथ गोचर करेगा जातक अपने जीवन साथी की जगह पर एक स्त्री को लाकर घर में रखेगा,जो विधवा होगी और वह जातक की ताई की भांति ही अपने जीवन को निकालेगी वहुँत से मित्र फोन करते है कुंङली के लिऐ मित्रो हमारी paid service है अगर आपका मन हो तो ही वात करे हा कोई लाचार है या गरीव है उसके लिऐ free हैकृप्पा msgना करे हमारे नम्वरो पर वात करे 07597718725 09414481324
सोमवार, 7 नवंबर 2016
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
काफी पुरानी ऐक पोस्ट कर रहा हु कुन्ङली की फोटो के साथ ताकि जो ज्योतिष सिख रहै है उनको लाभ मिले मेरी यही कोशिश रही है ज्यादा से ज्यादा ज्ञान हम सव को प्राप्त हो क्योंकि ज्ञान वाटने से ओर वङता है आचार्य राजेश यहकुंडली कर्क लगन की है और लगनेश चन्द्रमा दूसरे भाव में है। गुरु लगनेश चन्द्रमा से सप्तम भाव में वक्री होकर विराजमान उच्च का मंगल सप्तम मे विराजमान हैपंचम शनि ने मंगल को आहत किया है। पंचम शनि के पास नवे भाव मे विराजमान राहु का असर भी है। सूर्य केतु का पूरा बल सप्तम के मंगल को मिल रहा हैजो कारण ग्रह अपने अनुसार वैवाहिक जीवन को छिन्न भिन्न करने के लिये उत्तरदायी है वे इस प्रकार से है:- गुरु सम्बन्ध का कारक है चन्द्रमा से सप्तम में विराजमान है मार्गी गुरु समानन्तर में रिस्ता चलाने के लिये माना जाता है लेकिन वक्री गुरु जल्दबाजी के कारण रिस्ता बदलने के लिये माना जाता है। मार्गी गुरु समानन्तर में रिस्ता चलाने के लिये माना जाता है लेकिन वक्री गुरु जल्दबाजी के कारण रिस्ता बदलने के लिये माना जाता है। मार्गी गुरु स्वार्थ भावना को लेकर नही चलता है लेकिन वक्री गुरु स्वार्थ की भावना से रिस्ता बनाता भी है और जल्दी से तोड भी देता है। बार बार मानसिक प्रभाव रिस्ते से बदलने के कारण और एक से अधिक जीवन साथी प्राप्त करने के लिये अपनी मानसिक शक्ति को समाप्त करने के कारण अक्सर वक्री गुरु पुरुष सन्तान को भी पैदा करने से असमर्थ रहता है। उस समय में गुरु नवे भाव में जन्म के राहु के साथ गोचर कर रहा था और राहु का असर गुरु पर आने से जीवन साथी पर कनफ़्यूजन की छाया पूरी तरह से है गोचर के गुरु के सामने जन्म समय के सूर्य केतु भी है,जो पिता और पिता परिवार से लगातार गुप्त रूप से कमन्यूकेशन और राजनीति करने तथा गुप्त रूप से जातिका को रिमोट करने से आहत भी है. पंचम का शनि वृश्चिक राशि का है,साथ ही चन्द्रमा और लगन से सप्तमेश शनि के होने के कारण तथा शनि का शमशानी राशि में स्थापित होने के कारण जातिका के परिवार के द्वारा शादी के बाद से ही पति को नकारा समझा जाने लगा,इसके साथ ही जातक की अन्तर्बुद्धि भी परिवार के कारणों से खोजी बनी हुयी है,जातिका का समय पर भोजन नही करना शनि की सिफ़्त के कारण लगातार चिन्ता में रहना,पति पत्नी के सम्बन्ध के समय में अपने को ठंडा रखना,जननांग में इन्फ़ेक्सन की बीमारी गंदगी के कारण रहना और सन्तान के लिये या तो असमर्थ होना या भोजन के अनियमित रहने के कारण शरीर में कमजोरी होना भी माना जाता है,इसी के साथ पंचम शनि के प्रभाव से सप्तम स्थान का आहत होना जब भी कोई घरेलू बात होना या परिवार को सम्भालने की बात होना तो गुपचुप रहना घरेलू कार्यों में वही काम करना जो परिवार से दूरिया बनाते हो,वैवाहिक जीवन को ठंडा बनाने के लिये काफ़ी होते है,शनि का लाभ भाव में भी अपने असर को देना,अर्थात रोजाना के कार्यों में सुबह से ही घरेलू चिन्ताओं का पैदा किया जाना और इन कारणों से होने वाली लाभ वाली स्थिति में दिक्कत आना भी वैवाहिक कारणों के नही चलने के लिये माना जाता है,शनि की दसवीं द्रिष्टि दूसरे भाव में चन्द्रमा पर होने से नगद धन और पति परिवार की महिलाओं से पारिवारिक बातों का बुराई के रूप में बताया जाना भी वैवाहिक कारणों को समाप्त करने के लिये काफ़ी है। वक्री गुरु का सीधा नवम पंचम का सम्बन्ध शुक्र और बुध से होने से पति के द्वारा पहले किसी अन्य स्त्री से अफ़ेयर का चलाना और बाद मे शादी करना भी एक कारण माना जा सकता है,इस प्रभाव से जो मर्यादा पत्नी की होती है वह अन्य स्त्रियों से काम सुख की प्राप्ति के बाद पति के अन्दर केवल पत्नी मौज मस्ती के लिये मानी जाती है,लेकिन जैसे जैसे पत्नी का ओज घटता जाता है पति का दिमाग पत्नी से हट्कर दूसरी स्त्रियों की तरफ़ जाना शुरु हो जाता है,इस कारण में अक्सर सन्तान के रूप में केवल पुत्री सन्तान का होना ही माना जाता है,और पुरुष को वैवाहिक जीवन से दूर जाने के लिये यह आकांक्षा भी शामिल होती है कि वह पुत्र हीन है और उसकी पत्नी पुत्र सन्तान पैदा करने में असमर्थ है,शुक्र बुध के एक साथ तुला राशि में चौथे भाव में होने से शादी के बाद भी पति का रुझान अन्य स्त्रियों से होता है। केतु का शनि को बल देना और केतु को सूर्य का बल प्राप्त होना तथा शनि का परिवार में स्थापित होना वैवाहिक जीवन को पारिवारिक न्यायालय से समाप्त करने का कारण तैयार होता है। अष्टम गुरु से दूसरे भाव में राहु के होने से पति के द्वारा बनायी गयी बातों से और झूठे कारण बनाकर अदालती कारण जातिका के लिये बनाये जाते है,राहु के द्वारा शुक्र बुध को अष्टम भाव से देखने के कारण जातिका पर चरित्र के मामले में भी झूठे कारण बनाकर लगाये जाते है.इन कारणों से चन्द्रमा जो राहु से षडाष्टक योग बनाकर विराजमान है,परिवार पर झूठे चरित्र सम्बन्धी आक्षेप सहन नही कर पाता है और विवाह विच्छेद का कारण बनना जरूरी हो जाता है. इन कारणों को जातिका के द्वारा रोका जा सकता है। उच्च के मंगल की स्थिति के कारण जातिका को कटु वचन बोलने से बचना चाहिये। राहु के मीन राशि में होने से जातिका को जितना डर लगेगा उतना ही ससुराल खानदान उसके ऊपर सवार होगा मित्रो अगर आप मुझ से अपनी कुंङली दिखाना या कुंङली वनवाना चाहते है तो मेरे नम्वर पर सम्पर्क करे माकाली ज्योतिष आचार्य राजेश 07597718725 09414481324
शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016
मित्रो दिपावाली दीयो के विना अघुरी है दियो वेचने वाले से तोलमोल मत करे ऐक गरीव थोङा पैसा ज्यादा भी ले तो कोई फर्क नही पङेगा दोस्तो दियो को पँच तत्व व गृहो से क्यामेल है आऐ देखते है दीया मिटृटी से वनता है यानी तत्व पृथ्वी ओर मिटृटी को शुक्र गृह से भी जोडा गया मिटृटी को मथा जाता है पानी के साथ तत्व पानी ओर गृह चन्द्र ओर मिटृटी को मथने वाला कुम्हार यानी शनी यहा मेहनत होगी वहा शनी का ही माना जा सकता है दीयो का अकार वुघ का माना जा सकता है दीयो को पकने के लिऐ आग की जरुरत होगी यानी मंगल ओर अग्नी तत्व आग को जलाने के लिऐ लकङी यानी शनीआग को जलने के लिऐ हवा यानी आक्सीजन की जरुरता होगी यानी वृहस्पती दीयो के अन्दर खाली स्थान यानी अकाश तत्व पकने के वाद दीयो का लाल होना यानी मंगल ओर कही से काला होना राहु ओर तेल सरसो का ङाले शनी देसी घी ङाले तो शुक्र ओर राहु जव दीयो को जलाते है तो प्रकाश यानी सुरज गृह वात्ती केतु गृह दीयो से उठने वाला घुँआ राहु दीये तले अन्घेरा राहु ओर शनी घर लक्ष्मी दीये जगाऐ तो यह वेटी जगाऐ तो वुघ घरवाली जगाऐ तो शुक्र मंगल कार्य मे मंगल ओर घर्म कार्य मे गुरु गृह अव आप देखे दीयो को पाँच तत्व ओर नो गृह का साथ है आचार्य राजेश
बुधवार, 26 अक्टूबर 2016
मित्रो आज वात करते है दीपावाली की अमावस की रात गहरा गहन अंघेरा हम दीये जलाते है ओर पुरी रोशनी करते है ओर सोचते है दीये जलाकर अंघेरा दुर हो गया है कोन सा अंघेरा अव अंघेरा भी दो तरह का है वाहर भी ओर भीतर भी वाहर तो रोशनी हो गई पर भीतर तो ओर गहरा अंघेरा है यह तो कभी सोचा ही नही भीतर का दीया कैसे जगेगा कोन सा तेल डालना होगा ओर तेल कहा मिलेगा वाहर के दीये तो तेल से जलते है ओर वाती भी चाहिये भीतर के दीवे के लिऐ ना तेल चाहिऐ ना वाती ईस लिऐ पलटु साहिव ने कहा उलटा कुँआ गगन मे दीया जले वीन वाती वीन तेल दीया सतत जल रहा है वस पर्दा हटाना होगा जव हमे हमारा दीया मिलेगा तव असल मे दिवाली होगी ओर हर क्षण ओर हर पल दीवाली आओ दीया जलाऐ जय माँता दी जय माँकाली आचार्य राजेश
सोमवार, 24 अक्टूबर 2016
मित्रो आपने दीपावाली की पुजा को लेकर शुभसमय पुछा है जो ईस तरह है2016, रविवार के दिनयह पर्व मनाया जायेगा। जिसका समय सायं 06:27 से लेकर रात्रि 08:09 का है इस मुहूर्त की अवधि 1 घंटे 42 मिनट की है। श्री लक्ष्मी-गणेश पूजन का ये मुहूर्त अत्यंत शुभ मुहूर्त है। जिसमे श्री लक्ष्मी-गणेश की पूजा करना बहुत लाभकारी सिद्ध होगा ऊपर बताया गया मुहूर्त प्रदोष काल मुहूर्त है। जिसमे प्रदोष काल सायं 05:33 से प्रारंभ होकर रात्रि 08:09 तक रहेगा। जबकि वृषभ काल सायं 6:27 से प्रारंभ होकर रात्रि 08:22 तक रहेगा।अमावस्या दिनांक 29 अक्टूबर, 2016 शनिवार रात्रि 10:40 से प्रारंभ होकर दिनांक 30 अक्टूबर, 2016 रविवार रात्रि 11:08 पर समाप्त होगीजबकि सिंह काल रात्रि 12 :57 से प्रारंभ होकर प्रातः 03:14 तक रहेगा दिवाली लक्ष्मी पूजन के लिए चौघड़िया के मुताबिक शुभ मुहूर्त प्रातः मुहूर्त (चार, लाभ, अमृत) – सुबह 07:58 से दोपहर 12:05 तक। दोपहर मुहूर्त (शुभ) – दोपहर 1:27 से दोपहर 02:49 तक। सायं मुहूर्त (शुभ, अमृत, चार) – सायं 05:33 से 10:27 तक।
दीपावालीकी सव को राम राम अरे आज तो दीपावाली नही है जी आने वाली 30 तारीख को दीपावाली की सवको राम राम मित्रो मन हुआ दियो के पर्व पर पर कुछ कहु हे माँ सवके जीवन रोशनी से भरदे हमे अंघेरे से उजयारे की ओर लेकर आओ माँ तुम ही शक्ती रुपा हो शक्ति ही जीवन है,और जब शक्ति नही है तो जीवन भी निरर्थक है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त विभिन्न प्रकार की शक्तियां मानव जीवन के साथ चलती है,शक्तियों के तालमेल से ही व्यक्ति आगे बढता है,नाम कमाता है,प्रसिद्धि प्राप्त करता है,जब शक्ति पर विश्वास नही होता है तो जीवन भी हवा के सहारे की तरह से चलता जाता है,और जरा भी विषम परिस्थिति पैदा होती है तो जीवन के लिये संकट पैदा हो जाते हैं। किस प्रकार की शक्तियों का होना जरूरी है हर व्यक्ति के लिये तीन प्रकार की शक्तियों को प्राप्त करना जरूरी होता है,पहली मानव शक्ति,दूसरी है भौतिक शक्ति,और तीसरी है देव शक्ति। मानव शक्ति भी दिखाई देती है,भौतिक शक्ति भी दिखाई देती है लेकिन देव शक्ति दिखाई नही देती है बल्कि अद्रश्य होकर अपना बल देती है। कौन देवता किस शक्ति का मालिक है? भगवान गणेशजी मानव शक्ति के प्रदाता है,माता लक्ष्मी भौतिक शक्ति की प्रदाता है और माता सरस्वती पराशक्ति यानी देव शक्ति की प्रदाता हैं,इन्ही तीन शक्तियों की पूजा का समय दीपावली के दिन प्राचीन काल से माना जाता रहा है। दीपावली का त्यौहार कार्तिक कृष्ण-पक्ष की अमावस्या को ही मनाया जाता है भारत मे तीन ऋतुओं का समय मुख्य माना जाता है,सर्दी गर्मी और बरसात,सर्दी की ऋतु कार्तिक अमावस्या से चैत्र की अमावस्या तक,गर्मी की ऋतु चैत्र अमावस्या से श्रावण अमावस्या तक,और बरसात की ऋतु श्रावण अमावस्या से कार्तिक अमावस्या तक मानी जाती है।बरसात के बाद सभी वनस्पतियां आकाश से पानी को प्राप्त करने के बाद अपने अपने फ़लों को दीवाली तक प्रदान करती है,इन वनस्पतियों के भण्डारण के समय की शुरुआत ही दीपावली के दिन से की जाती है,आयुर्वेद में दवाइयां और जीवन वर्धक वनस्पतियों को पूरी साल प्रयोग करने के लिये इसी दिन से भण्डारण करने का औचित्य ऋग्वेद के काल से किया जाता है। इसके अलावा उपरोक्त तीनो शक्तियों का समीकरण इसी दिन एकान्त वास मे बैठ कर किया जाता है,मनन और ध्यान करने की क्रिया को ही पूजा कहते है,एक समानबाहु त्रिभुज की कल्पना करने के बाद,साधन और मनुष्य शक्ति के देवता गणेशजी,धन तथा भौतिक सम्पत्ति की प्रदाता लक्ष्मीजी,और विद्या तथा पराशक्तियों की प्रदाता सरस्वतीजी की पूजा इसी दिन की जाती है तीनो कारणों का समीकरण बनाकर आगे के व्यवसाय और कार्य के लिये योजनाओं का रूप दिया जाता है,मानव शक्ति और धन तथा मानवशक्ति के अन्दर व्यवसायिक या कार्य करने की विद्या तथा कार्य करने के प्रति होने वाले धन के व्यय का रूप ही तीनों शक्तियों का समीकरण बिठाना कहा जाता है। जैसे साधन के रूप में फ़ैक्टरी का होना,धन के रूप में फ़ैक्टरी को चलाने की क्षमता का होना,और विद्या के रूप में उस फ़ैक्टरी की जानकारी और पैदा होने वाले सामान का ज्ञान होना जरूरी है साधन विद्या और लक्ष्मी तीनो का सामजस्य बिठाना ही दीपावली की पूजा कहा जाता है विभिन्न राशियों के विभिन्न गणेश,लक्ष्मी,और सरस्वती रूप संसार का कोई एक काम सभी के लिये उपयुक्त नही होता है,प्रकृति के अनुसार अलग अलग काम अलग अलग व्यक्ति के लिये लाभदायक होते है,कोई किसी काम को फ़टाफ़ट कर लेता है और कोई जीवन भर उसी काम को करने के बाद भी नही कर पाता है,इस बाधा के निवारण के लिये ज्योतिष के अनुसार अगर व्यक्ति अपने काम और विद्या के साथ अपने को साधन के रूप में समझना शुरु कर दे तो वह अपने मार्ग पर निर्बाध रूप से आगे बढता चला जायेगा,व्यक्ति को मंदिर के भोग,अस्पताल में रोग और ज्योतिष के योग को समझे बिना किसी प्रकार के कार्य को नही करना चाहिये।आम आदमी को लुभावने काम बहुत जल्दी आकर्षित करते है,और वह उन लुभावने कामों के प्रति अपने को लेकर चलता है,लेकिन उसकी प्रकृति के अनुसार अगर वह काम नही चल पाता है तो वह मनसा वाचा कर्मणा अपने को दुखी कर लेता है। आगे हम आपको साधन रूपी गणेशजी,धन रूपी लक्ष्मी जी और विद्या रूपी सरस्वतीजी का ज्ञान करवायेंगे,कि वह किस प्रकार से केवल आपकी ही प्रकृति के अनुसार आपके लिये काम करेगी,और किस प्रकार से विरोधी प्रकृति के द्वारा आप को नेस्तनाबूद करने का काम कर सकती है जय माता दी जय माँ काली माकाली ज्योतिष आचार्य राजेश 09414481324 07597718725
रविवार, 23 अक्टूबर 2016
शरीर एक नाव है एँव आत्मा एक यात्री यही सत्य है सभी कहते हैँ यदि यह सत्य भी है महान तो शरीर ही हुआ ना जीवन भर ढोता रहा जो इस यात्री का बोझ जो केवल मूक साथी था इस घाट से उस घाट की बीच की दूरी का इस आशा मेँ इस पर सवार किंचित यह नाव समय के धारे के विपरीत बह कर उसे मिला देगी उस परम से जिसका वो एक अँश है उसे क्या बोध कि इस नाव के साथ बँधी हैँ और बहुत सी नाँवेँ जो विवश करती है उसे सिर्फ बहाव के साथ बहने को और उन नावोँ पर सवार उस जैसे यात्री अनसुना कर देते है इस नाव के अंत्रनाद को जय माता दी
सोमवार, 17 अक्टूबर 2016
मित्रो मेरी पिछली पोस्ट वास्तु पर थी आप लोगो ने वहुँत पसन्द की मेरी कोशिश है ज्यादा से ज्यादा आप को श्ज्ञान मिले ताकि कुछ अंघविश्वास जो हमारे समाज मे फैले है उससे दुर हो सके मित्रो मेरी आने वाली कुछ पोस्ट वास्तु पर ही होगी दक्षिण मुखी मकान को लेकर ना जाने कितनी गलत फहमी है की यह शुभ है या कितना वुरा है वास्तु जीवन को प्रभावित करता है यह कई प्रकार से देखने मे भी आता है और समझने मे भी आता है.लेकिन हर दिशा हर व्यक्ति के लिये अशुभ हो यह समझ मे नही आता है.अक्सर लोगो को कहते सुना है कि दक्षिण मुखी मकान अशुभ होता है और उसी जगह पर पूर्व फ़ेसिंग और उत्तर फ़ेसिंग मकान की कीमत अच्छी मिल जाती है लेकिन दक्षिण मुखी मकान का पूरा मूल्य नही मिल पाता है.आखिर ऐसा क्या है जो दक्षिण मुखी मकान से लोग घबरा जाते है यहा तक कुछ सुत्र को समझने के वाद दक्षिण मुखी मकान में दोपहर का सूर्य अपनी रश्मियों को प्रसारित करता है इन रश्मियों को वही सहन कर सकता है जो दिमाग शरीर और भौतिकता मे बलवान होता है.कारण जो गर्मी और ऊष्मा सूर्य से प्रसारित होती है वह साधारण लोग हजम नही कर पाते है.जिनका मंगल शुभ हो वो दक्षिण मुखी मकान मे रह सकते है पुलिस सेना तकनीके क्षेत्र के लोग डाक्टर दवाई बनाने वाले होटल और आग वाला काम करने वाले मिठाई बनाने वाले दक्षिण मुखी मकान मे सफ़ल हो जाते है और उनकी बराबरी का कार्य अलावा दिशाओ वाले नही कर पाते है. तकनीकी दिमाग का होना और गर्म दिमाग का होना इसी दिशा मे रहने वाले लोगों के पास होता है,अधिकतर देह बल का प्रयोग करने वाले और शरीर को धन औकात और नाम के लिये प्रयोग करने वाले लोग इसी दिशा को पसन्द करते है. जो लोग विपरीत कार्यों से जुडे होते है वे उपरोक्त कारणो के कारण परेशान होते है,पूजा घर भी दक्षिण फ़ेस वाले सही माने गये है अगर उन घरो में हवन अखण्ड ज्योति को जलाकर रखा गया है. अगर दक्षिण मुखी मकान का दरवाजा लाल रंग का है तो व्यक्ति आराम से रह सकता है. लाल रंग के स्वास्तिक भी इस दिशा के दरवाजे वाले मकानो के लिये शुभ होते है. मिर्च मसाले के व्यवसाय वाले इस दिशा के दरवाजों के मकान मे रहने के बाद अक्सर पनपते देखे गये है. कर्जा देने वाले बैंकिंग का काम करने वाले और ब्याज तथा किराये से रहने वाले लोग इस दिशा के मकानो से हमेशा दुखी देखे गये है उनके धन को या सम्मान को शरीर को किसी न किसी प्रकार से आघात ही लगते देखे गये है. अगर दक्षिण मुखी मकान के आगे टी क्रास भी है तो अक्सर मकान मालिक और किरायेदार के बीच मे लम्बी लडाई भी होती देखी गयी है,अक्सर मकान मालिक बाहर भटकता है और किरायेदार ऐश करता है. हर किसी के लिऐ दक्षिण दिशा वुरी नही हो सकती मित्रो अगर आप अपनी कुंङली दिखाना या कोई समस्या का उपाय चाहते है तो सम्पर्क करे आचार्य राजेश 09414481324 07597718725 paid service
जीवन मन्त्र ...............अपनी आवश्यकता को कंट्रोल में रखिये, फिजूल खर्ची और दिखावे से बचिए अपने जीवन को सिर्फ पैसों की दौड़ में ही व्यर्थ ना कीजिये, पैसे के अलावा भी बहुत कुछ.......बहुत कुछ है जीवन में जीने का पूरा-पूरा लुत्फ़ भी उठाईये. तभी हमारा जीवन सार्थक होगा जब हम हवन द्वारा पूजा करते हैं तो हवन सामग्री थोड़ी-थोड़ी देर में हवन कुंड में डालते है. यदि उस हवन कुंड में सामाग्री बहुत देर से डालें तो अग्नि ही ख़त्म हो जायेगी लेकिन यदि सारी सामाग्री हमनें इसलिए बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी तो उसे अंत में डालने पर इतना धुवां फैलेगा कि आँखें जलने लगेगी और गर्मी से वहाँ बैठना ही मुश्किल हो जायेगा. पर ऐसा ही हम करते हैं. यही हमारी फितरत है. या तो हम इतनी कंजूसी से जीते हैं कि जीने का रस ही नहीं ले पाते. और या हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं. हम समझ ही नहीं पाते कि हर पूजा खत्म होनी होती है. हम ज़िंदगी जीने की तैयारी में ढेरों चीजें जुटाते रहते हैं, पर उनका इस्तेमाल नहीं कर पाते. हम कपड़े खरीद कर रखते हैं कि फलां दिन पहनेंगे, फलां दिन कभी नहीं आता. हम पैसों का संग्रह करते रहते हैं ताकि एक दिन हमारे काम आएगा, वो एक दिन नहीं आता और फिर एक दिन अचानक ही ऊपर से बुलावा आ जाता है. ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची ही रह जाती है. हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि हम समझ ही नहीं पाते कि जब सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले है, उसे बचा कर क्या करना? बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही देगा अगर ज़िंदगी की हवन सामग्री का इस्तेमाल हम पूजा के समय सही अनुपातम में करते चले जाएं, तो न धुंआ होगी, न गर्मी न आंखें जलेंगी ध्यान रहे, संसार हवन कुंड है और जीवन पूजा. एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है. अच्छी पूजा वही होती है, जिसमें हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो जाता है. अच्छी ज़िंदगी वही होती है, जिसमें हमें संग्रह करने के लिए मेहनत न करनी पड़े. हमारी मेहनत तो बस ज़िंदगी को जीने भर जुटाने की होनी चाहिए और थोड़ा इमरजेंसी जितना बचाकर रखना चाहिए और कुछ अपनी अगली पीढी के लिए.
शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016
मित्रो आप मे से वहुँत से मित्र मुझसे वास्तु के वारे मे सवाल पुछ रहे थे ईसके वारे मुझे जानकारी तो थी पर समझ मे नही आ रहा था की कहा से शुरु करु सो छोटी सी कोशिश की है लेख थोङा लम्वा जरुर है पर आपको जानकारी जरुर मिलेगी वास्तु क्या है वास्तु विज्ञान को समझने के लिये निम्न सिद्धान्तों को ध्यान में रखना पृथ्वी की गति पृथ्वी के घूर्णन और अन्य ग्रहों के चुम्बकीय प्रभाव सूर्य से प्रदत्त ऊर्जा सूर्य से मिलने वाली विभिन्न रंगों की ऊर्जा ऊर्जा को प्रभावी-अप्रभावी बनाने वाले नियम अलग अलग स्थानों की ऊर्जा और मानवीय स्वभाव ऋतुओं के अनुसार अलग अलग ऊर्जा के प्रकार स्थल पठार पहाड जलीय वन भूमि से प्राप्त अलग अलग ऊर्जा के प्रकार अलग अलग ऊर्जा से शरीर का अलग अलग विकास और सभ्यता की नई और पुरानी विकास की गति मस्तिष्क को मिलने वाली नई और पुरानी ऊर्जा के अनुसार किये जाने वाले निर्माण और विध्वंशकारी कार्य तथा सृजन क्षमता का विकास या विदीर्ण दिमाग की गति. भूगोल में आप लोगों ने पढा होगा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर साढे तेइस अंश झुकी हुयी है,अगर यह झुकाव नही होता तो सभी दिन रात आचार विचार व्यवहार मानव जीव जन्तु सभी एक जैसे होते। दिन रात का माप बराबर का होगा,उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर छ: छ: महिने के दिन और रात नही होते। भूमध्य रेखा पर बारह महीने लगातार पानी नही बरसता और भयंकर गर्मी नहीं पडती आदि कारण मिलते। लेकिन हवाओं का प्रवाह नही होता,ऋतुओं का परिवर्तन नही होता,पानी की गति नही होती नदियां बहती नही पहाड बनते नहीं यह सब भी पृथ्वी की गति और उसके झुके होने का फ़ल है। उत्तरी ध्रुव का फ़ैल कर घूमना और दक्षिणी ध्रुव का एक ही स्थान पर सिमट कर घूमना,यह दोनो बातें धरती के लिये एक भराव और जमाव वाली बातों के लिये मानी जा सकती है,जिस तरह से एक पंखा अपनी हवा को उल्टी तरफ़ से खींच कर सीधी तरफ़ यानी सामने फ़ेंकता है उसी तरह से धरती उत्तरी ध्रुव से अन्य ग्रहों की चुम्बकीय शक्ति को इकट्ठा करने के बाद धरती के अन्य भागों को प्रेषित करता है। अक्सर आपने देखा होगा कि उत्तरी ध्रुव के पास रहने वाले लोग अपने आप में विलक्षण बुद्धि के मालिक होते है उनके शरीर सुडौल और दिमागी ताकत अधिक होती है। पूर्वी भागों में रहने वाले लोग शरीर से कमजोर ठिगने और बुद्धि से चालाक होते है,पानी के अन्दर रहने या उष्ण जलवायु के कारण उनका शरीर काले रंग का होता है। इसके विपरीत दक्षिणी ध्रुव की तरफ़ रहने वाले लोग अत्याचारी और अपनी बुद्धि को मारकाट की तरफ़ ले जाने वाले हिंसक प्रवृत्ति वाले होते है।यह सकारात्मक और नकारात्मक गति का प्रभाव माना जाता है। नदियों का पानी अधिकतर पश्चिम से पूर्व की तरफ़ उत्तरी ध्रुव की तरफ़ तथा कर्क रेखा के आसपास के क्षेत्रों में बहता हुआ पाया जाता है,लेकिन जैसे जैसे मकर रेखा के पास पहुंचते जाते है पानी की गति पश्चिम की तरफ़ जाती हुयी मिलती है। समुद्र के पानी की गति भी अक्सर देखने को मिलती है कि जैसे जैसे सूर्य कर्क रेखा की तरफ़ चलता जाता है,समुद्र का पानी दक्षिणी ध्रुव की तरफ़ सिमटता जाता है और जैसे ही सूर्य मकर रेखा की तरफ़ बढता जाता है समुद्र का पानी उत्तरी ध्रुव की तरफ़ बढना शुरु हो जाता है। सपाट मैदानी भागों में हवा का रुख काफ़ी तेज होता है और पहाडी भागों में तथा हिमालय के तराई वाले भागों में हवा का बहाव कम ही मिलता है। तूफ़ान पहाडी चोटियों और समुद्री किनारों की तरफ़ अधिक चलते है,पृथ्वी का पानी उत्तरी ध्रुव की तरफ़ अधिक जमता हुआ चला जाता है,और सूर्य के कर्क रेखा की तरफ़ आने पर वह पिघल कर नदियों के रास्ते दक्षिण की तरफ़ के समुद्रों को भरने लगता है। जैसे ही सूर्य मकर रेखा की तरफ़ आता है समुद्रों का पानी वाष्पीकरण द्वारा हवा में नमी के रूप में आता है बादलों की शक्ल में बदलता है और उत्तरी भागों की तरफ़ बढता चला जाता है,हिमालय पहाड की चोटियों से टकराकर कुछ बादल तो भारत में बरस जाते है और जो बाहर उत्तर की तरफ़ निकल जाते है वे बर्फ़ के रूप में जम कर उत्तरी ध्रुव में पानी को जमाकर बर्फ़ में बढोत्तरी करते हैं। यह गति धरती की असमान्य गति है,जब भी कोई भूमण्डलीय बदलाव की स्थिति होती है अथवा मानवीय कारणों से कोई विकृति धरती के अन्दर पैदा की जाती है तो अचानक भूकम्प टीसुनामी आदि से धरती के ही वासियों को प्रकोप को भुगतना पडता है। सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक ऊर्जा के लिये पहले क्षितिज पर उदय होते सूर्य को देखना चाहिये,घर का दरवाजा अगर उदय होने वाले सूर्य के सामने आता है तो सूर्य से निकलने वाली रश्मियां सीधे रूप से घर के अन्दर प्रवेश करती है। लेकिन अस्त होने के समय सूर्य की विघटित ऊर्जा घर के अन्दर प्रवेश करती है अगर घर का द्वार नैऋत्य में होता है। सुबह का मौसम नमी युक्त होता है और जो भी ऊर्जा आती है वह द्रव अवस्था मे होती है लेकिन शाम के समय की ऊर्जा सूखी और निरीह होती है,इसी कारन से पूर्व मुखी द्वार वालो को अक्सर पूजा पाठ और ध्यान समाधि के साथ उत्तरोत्तर आगे बढता हुआ देखा जाता है तथा पश्चिम मुखी दरवाजे वालों के यहां भौतिक साधन तो खूब होंगे लेकिन मन की शांति नही होगी,वे तामसी खाने पीने की आदत में जरूर चले गये होंगे,अगर वे किसी प्रकार से तामसी खाने पीने के साधनो में नही गये होंगे तो उनके घरों में सबसे अधिक खर्चा दवाइयों में ही होता होगा। रिस्तेदारी और प्रेम वाले मामलो में ईशान मुखी दरवाजे वाले व्यक्ति अधिक भरोसे वाले होते है,और नैऋत्य मुखी दरवाजे वाले लोग कभी भी किसी प्रकार की भी रिस्तेदारी तोड सकते है। भूमि का चयन जब मकान बनाना होता है तो सबसे पहले भूमि की जरूरत पडती है,भूमि को लेने के पहले उसके चारों ओर की बसावट पर्यावरण दोष आदि की परीक्षा,शमशान के पास वाली जमीन,गंदा नाला या नदी अथवा गंदा भरा हुआ पानी,वर्कशाप के पास वाली जमीन,जमीन पर किसी प्रकार का चलने वाला कोर्ट केश आदि, बिजली की लाइनों के नीचे वाली जमीन,झोपड-पट्टी वाली जमीन,जो जमीन डूब क्षेत्र में हो,बीहड या जंगल वाली जमीन,जिस जमीन पर कोई अपराध वाली घटनायें गोली कांड या दुर्घटना आदि हुयी हो,भूखण्ड का आकार चित्र विचित्र हो, दलदली भूमि,पानी वाले स्थान को मिट्टी भर कर पाट कर बनायी गयी जमीन,आदि दोष वाली जमीन लेने से बचना चाहिये। जमीन लेने के पहले देखलें कि जमीन पर निर्माण करने के बाद तथा बाद में निर्माण होने के बाद प्राकृतिक रूप से मिलने वाले प्रकाश में कमी तो नही हो जायेगी। रहने वाली जमीन के आसपास कोई आगे चल कर व्यवसायिक रूप तो नही रख लेगा,आने जाने के मार्ग को कोई अतिक्रमित तो नही कर लेगा,जिस बस्ती या मुहल्ले में जमीन क्रय की जा रही है वह नाम राशि के अनुकूल है कि नही,इस प्रकार से खरीदी गयी जमीन हमेशा सुखदायी होती है।
बुधवार, 12 अक्टूबर 2016
मित्रो अस्त गृहो लेकर वहुँत सी गलतफहमीया है ज्योतिष में सौरमण्डल के अन्य ग्रहों के साथ सूर्य को भी एक ग्रह मान लिया गया है, लेकिन वास्तव में सूर्य ग्रह न होकर एक तारा है। ग्रह जहां सूर्य की रोशनी से चमकते हैं वहीं सूर्य खुद की रोशनी से दमकता है। पृथ्वी से परीक्षण के दौरान हम देखते हैं कि कई बार ग्रह सूर्य के बहुत करीब आ जाते हैं। किसी भी ग्रह के सूर्य के करीब आने पर ज्योतिष में उसे अस्त मान लिया जाता है। आमतौर पर दस डिग्री से घेरे में सभी ग्रह अस्त रहते हैं। सिद्धांत ज्योतिष के अस्त के कथन को भी फलित ज्योतिष में गलत तरीके से लिया जाने लगा है। अस्त ग्रह के लिए यह मान लिया जाता है कि अमुक ग्रह ने अपना प्रभाव खो दिया, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता। ग्रह खुद की किरणें भेजने के बजाय नक्षत्रों से मिली किरणें जातकों तक भेजते हैं। बुध और शुक्र सूर्य के सबसे करीबी ग्रह हैं। छोटे कक्ष में लगातार चक्कर लगा रहे ये ग्रह सर्वाधिक अस्त होते हैं। अन्य ग्रह भी समय समय पर अस्त और उदय होते रहते हैं। फलित ज्योतिष के अनुसार इन ग्रहों के अस्त होने का वास्तविक अर्थ यह है कि नक्षत्रों (तारों के समूह) से मिल रहे किरणों के प्रभाव को अब ग्रह सीधा भेजने के बजाय सूर्य के प्रभाव के साथ मिलाकर भेज रहे हैं। ऐसे में ग्रह का प्रभाव यथावत तो रहेगा ही उसमें सूर्य का प्रभाव भी आ मिलेगा। इसी वजह से तो बुधादित्य के योग को हमेशा बेहतरीन माना गया है। लेकिन यह योग 4 5 9 भाव मे अपना प्रभाव ही माना जा सकता है
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