बुधवार, 22 अगस्त 2018

कुंडली का चौथा भाव में शुक्र

चौथे घर का सम्बन्ध हमारी उम्र के दूसरे हिस्से से यानी पच्चीस साल की आयु से लेकर पचास साल की आयु तक,इसी हिस्से में हमारे गृहस्थ जीवन और जवानी के समय में हम कहां तक लाभ प्राप्त कर सकते है उसके बारे में भी इस घर से पूरी तरह जाना जा सकता है,यह घर हमारी किस्मत भाग्य से भी संबन्ध रखता है,लेकिन किस्मत के उस हिस्से से जो पूर्वजन्म से हम अपने साथ लाये हैं,यानी किस्मत किस हद तक हमारा साथ देगी इसक संबन्ध भी चौथे घर से है।कुन्ङली के चोथे भाव मे जव शुक्र होता है तो लालकिताव मे हिदायत है कि पती अपनी पत्तनी से दोवारा शादी करे आखीर ऐसा क्यो क्या कारन है यह क्यों कहा जाता है. जब भी कोई ऐसी जन्मपत्री देखने को मिलती है जिसमे जातक

 की कुंडली मे शुक्र खाना नो 4 में हो तो लाल किताब वाले बिना किसी तार्किक विश्लेषण के और बिना कुछ सोचे तुरंत कहते है की पत्नी से दुबारा शादी कर लो. लाल किताब 1952 पेज नंबर 444 पर लिखा है ” औरते एक ही वक्त में दो जिंदा होंगी,एक बूढी माँ की तरह बढ़ी उम्र की दूसरी ऐश आराम की मालिक हरफन मौला ज़माना की बेगम होगी,मगर औलाद की फिर भी किल्लत ही होगी,बल्कि लावल्दी तक जायज़ होगी.यहाँ पर शर्त यह की खाना नंबर 2 – 7 खाली हो और शुक्र किसी दुसरे गृह का साथी गृह न बन रहा हो”. अब इसका क्या उपाय किया जाये कि दो औरते न हो या दुबारा शादी न हो तो इसके लिए भी लाल किताब के पेज नंबर 443/1952 पर लिखा है कि पहली ही औरत से पहला मर्द दो दफा शादी की रसम अदा कर ले तो शुकर की दो औरत होने की शर्त न रहेगी और औलाद ज़ल्दी होगी. तर्क का विषय यह है की ऐसा क्यों लिखा है दो औरते हो सकती है या दुबारा शादी हो सकती है,इसके लिए सबसे पहले खाना नंबर 4 को देखते है की यह खाना असल में है किसका. खाना नंबर 4 असल में चंद्र का है,इस घर पर हर तरह से चन्द्र का ही हक है,और चन्द्र असल में माता है,और अब यहाँ पर शुक्र आ गया है,जिस जातक की भी कुंडली में शुक्र खाना नंबर 4 में है वो देखे की उनकी पत्नी उन् पर माँ की तरह ही अधिकार जमाती है.असल में उस ने शादी तो पत्नी के लिए की है लेकिन आ गयी घर में माँ.उसकी पत्नी उसका हर समय धयान रखती है,जो की बुरी बात नहीं,लेकिन ध्यान व रख रखाव का तरीका जो है वो है एक माँ की तरह,जैसे ही यह व्यक्ति घर से निकलता है,खाने का डिब्बा त्यार मिलता है,खाना अभी खाया नहीं की दफ्तर में फ़ोन आ गया की खाना खा लिया क्या ?जैसे एक माँ को अपने बेटे की चिंता रहती है वैसे ही इसकी पत्नी को अपने पति की चिंता है.अब जन्म देने वाली माँ और पत्नी जिसने माँ की जगह ले ली आपस में वर्चस्व कि लड़ाई लड़ रही है कि इस पर मेरा अधिकार अधिक है न कि माँ का और माँ अपने बेटे पर अधिकार चाह रही है क्योकि वह मेरी संतान है |यही कारण घर में क्लेश उत्पन्न करदेता है सास बहु का अपनत्व खत्म और झगडा शुरू जैसे दो सौतन हों | अब ज़रा दूसरी तरह से इस पर दृष्टि डालते है कि अगर ऐसे जातक की माँ न हो तो क्या हो अब पत्नी को घर की चिंता है,रिश्तेदारों की चिंता है.पति के लिए पत्नी के पास वक़्त ही नहीं है ,अब यहाँ पर पति और पत्नी का झगडा शुरू हो गया है,जब पत्नी अपने पति को प्यार के लिए समय ही नहीं देगी तो ऐसे समय में पति का भटक जाना कोई बड़ी बात नहीं,पत्नी को पता चल जाये तो क्लेश ,बात फिर एक दुसरे से अलग हो जाने तक पहुँच जाती है. मतलब साफ़ है की शुकर 4 वाला घर में अपनी पत्नी को ब्याह कर नहीं लता बल्कि अपनी माँ को अपने घर लाता है,विवाह का मुख्य उदेश्य संतान कि प्राप्ति है जब माँ लेकर आया है तो संतान किसे पैदा होगी| और संतान कोई अपनी माँ से तो नही पैदा करेगा करेगा तो पत्नी से ही |पत्नी तो प्यार दे नहीं रही,बल्कि वो तो पति का धयान एक बच्चे की तरह रख रही है.पति प्यार के लिए बाहर भटक रहा है. अब कुछ लालकिताब का बेडागर्क करने वाले ज्योतिषी जो उपाय सूझाते है वो है कि ऐसा व्यक्ति अपनी पत्नी से दुबारा शादी कर ले,लेकिन शादी कैसे करनी है? अक्सर देखा जाता कि ऐसी शादी को मजाक के तौर पर लिया जाता है,लेकिन अगर हम लाल किताब को ध्यान से पढ़े तो यह समझ आता है की शादी को पूरी विधि से किया जाये तभी इसका सही फल मिल सकता है वर्ना नहीं. क्योंकि साफ साफ लिखा है कि शादी की पूरी रसम अदा करनी है न कि अपनी शादी की परम्परा का कोई मजाक बनाना है.इसके साथ एक सावधानी और है कि जैसे ही दुबारा शादी की जाये,तुरंत ही अपनी पत्नी का नाम बदल दें.तभी दूसरी शादी का फल मिलेगा,वर्ना नहीं. अब आपकी पत्नी के दो नाम हो गए,एक तो वो जो आपकी माँ की तरह है,दूसरा नाम आपकी पत्नी का है,जो आपको पत्नी का प्यार दे.जिस से आपके घर में औलाद आ सके. अब फिर चलते है लाल किताब 1952 पेज नंबर 443 जैसा कि पहले लिखा गया है कि दूसरी शादी करने से औलाद की किल्लत दूर होगी.अगर इतना करने से आपका घर परिवार बच है तो में नहीं समझता की इस में कोई नुकसान है,इन्सान किस लिए इतनी मेहनत करता है,क्यों इतनी भागदौड़ लगी हुई है,अगर इस से या इतना करने घर परिवार बच जाये तो फिर और क्या चाहिए,लाल किताब आपको सही रास्ता दिखाती है

पंच महापुरुष योग

मित्रो पञ्च महापुरूष योग की चर्चा करते हैयह किस प्रकार अलग-अलग लग्नों में घटित होते है :- १. हँस योग -यदि गुरू उच्च राशि कर्क अथवा स्वराशि धनु अथवा मीन राशि में केंद्र में होतो यह योग बनता है , यह योग स्थिर लग्नों अर्थात वृषभ , सिंह, वृश्चिक, या कुम्भ लग्नों की कुंडलियों में नहीं बनता है। निम्नानुसार लग्नों में स्थित भावों में गुरू होने से हँस नामक पञ्च महापुरूष नामक योग बनता है। १. मेष लग्न -चतुर्थ भाव में कर्क राशि में। २. मिथुन लग्न -धनु राशि या मीन राशि में स्थित गुरू से। ३. कर्क लगन में -कर्क राशि में लग्न में स्थित होने से। ४. कन्या लग्न- चतुर्थ भाव में धनु राशि अथवा सप्तम भाव में मीन राशि में हो तो. ५. तुला लग्न में - दशम भाव में कर्क राशि में। ६. धनु लग्न- लग्न में अथवा चतीर्थ भाव में गुरू हो तो। ७. मकर लग्न- सप्तम भाव में कर्क राशि का गुरू हो तो। ८. मीन लग्न- दशम में धनु का अथवा लग्न में मीन राशि का गुरू होतो यह योग होता है हँस योग का - फल जिस जातक की कुंडली में यह योग होता है वह जातक स्वस्थ, सुन्दर. प्रशंसित , न्यायप्रिय , आकर्षक, सफलता पाने वाला होता है। मृत्यु के बाद भी यह लोकप्रिय रहता है।आचार्य राजेश

वक्री ग्रह के फल

मित्रो वक्री ग्रह हो को लेकर पहले भी काफी पोस्ट fb पर post कर चुका हु वक्री ग्रह सदा हानी या वुरा नहीं करते वह कभी-कभी बहुत शुभ फल भी जातक को देते है खास स्थान में वक्री ग्रह जातक को उच्च शिखर पर पहुंचाने में अत्यंत सहायक होते हैं ऐसी स्थिति में जातक को धन, यश व अच्छी सेहत की प्राप्ति होती है किसी के जन्म में यदि कोई ग्रह वक्री होता है और जीवन में वह वक्री ग्रह जब गोचर में आता है, तो बहुत शुभ फल देता है। खास बात यह है कि सूर्य और चंद्रमा कभी वक्री नहीं होते मंगल : यह ग्रह यदि वक्री है तो व्यक्ति शीघ्र क्रोधी तथा उत्तेजित होने वाला हो सकता है जब मंगल का वक्रत्व समाप्त होता है, तभी उसके सभी कार्य पूर्ण होना माना जा सकता है वक्री मंगल वाले व्यक्ति प्राय: डॉक्टर, वैज्ञानिक या रहस्यमयी विधाओं के ज्ञाता देखे गऐ है वाकी योग भी कुंङली मे हो तो वैसे वक्री मंगल वाले मजदूर कार्यस्थल पर काम के बजाय हड़ताल पर रहना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसे जातक अधिकतर कामचोर होते हैंपुरा फल कथन पुरी कुंङली पर ही देखा जाता है यह सिर्फ जनरल जानकारी है हर ग्रह के लिऐ ऐसा ही माने क्योकि कोई भी ऐक ऐकल ग्रह से फल संभव नही बुध : जिनकी जन्मकुंडली में बुध वक्री होता है, वह कमजोर स्वाभाव वाले अथवा मुसीबत में घबरा जाने वाले व्यक्ति होते हैं। जब गोचर में बुध वक्री हो जाता है तो व्यक्ति तीक्ष्ण बुद्धि वाले होते हैं। समाज की विभिन्न समस्याओं को आश्चर्यजनक ढंग से सुलझाने में वे सक्षम होते हैं वुघ जव भी गोचर मे वक्री हो तव वो अपना लेपटोप या कम्प्यूटर मे ङाटा को संभाल कर रखे या backup वना कर रखे बृहस्पति : वक्री बृहस्पति भी शुभ फल देता है। इसके जातकों के पास अद्भुत क्षमता होती है और वे विलक्षण कार्यशैली वाले होते हैं। भले ही उनका कोई काम अधूरा रह जाए, पर आखिरकार वह अपने अधूरे कार्यों को पूरा जरूर करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि भवन निर्माण का कार्य रुका हुआ हो अथवा फैक्टरी बंद पड़ी हो, तो दोबारा गोचर में वक्री आने पर रुका हुआ काम पुन: शुरू हो जाता है और पूरा भी होता है शुक्र : जन्म के समय शुक्र के वक्री होने पर जातक धार्मिक स्वभाव का होता है। धर्म पर विश्वास रखने के कारण ऐसे जातकों को लोकप्रियता मिलती है। गोचर में शुक्र जब वक्री होता है, तो उस दौरान वह व्यक्ति सत्यवादी, पर क्रूर हो जाता है। यदि वक्री शुक्र वाले जातक को प्यार, स्नेह या सम्मान नहीं मिलता, तो वह विद्रोही हो जाता है। वक्री शुक्र वाले जातक यदि कलाकार, संगीतज्ञ, कवि या ज्योतिषी हैं, तो उनकी शक्ति बढ़ जाती है और अपने व्यवसायों में वे शिखर पर पहुंच जाते हैं। साथ ही वे काफी नाम भी कमाते हैं। शनि : जन्म में शनि जब वक्री होता है और युवा होने पर जब वह वक्री गोचर में आता है, तो व्यक्ति शक्की स्वभाव का हो जाता है और साथ ही स्वार्थी भी हो जाता है। ऐसे व्यक्ति दिखते कुछ और हैं, पर वास्तव में कुछ और होते हैं। ऐसे व्यक्ति ऊपर से साहसी, कठोर, सिद्धांतवादी और अनुशासनप्रिय होने का ढोंग करते हैं। हकीकत यह होती है कि वे अंदर से डरपोक, खोखले और लचीले स्वभाव के होते हैं। वैसे तो वक्री ग्रहों को अच्छा नहीं माना जाता, पर कुछ खास परिस्थितियों में इनका प्रभाव जातकों के लिए शुभ होता है। ज्योतिष शास्त्र में वक्री ग्रहों को भी शुभ की संज्ञा दी गई है, जिनसे जातकों का जीवन सुखमय हो सकता है।मै फिर यही कहुगा कोई फल पुरी कुंङली देख कर ही संभव हो सकता है वक्री ग्रह अगर कुंङली मे शुभ है या अशुभ है तो उसके फलो मे अघिकता होगी आचार्य राजेश

राहु की दे सकता है अच्छा फल

मित्रो यह जरूरी नहीं की राहू बुरा फल ही दे वेशक राहु पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है। इसकी अपनी कोई राशि नहीं होती है, इसलिए कुंडली में यह जिस राशि और ग्रह के साथ में होता है उसके अनुसार फल देता है। राहु पाप ग्रह होने के कारण हमेशा बुरा फल दे यह जरूरी नही है। कुंडली में धन प्राप्त हाने के योग भी राहु के द्वारा बन सकते हैं ऐक कहावत है जिसको मारे राहु उसको कौन तारे जिसको तारे राहु उसको कौन मारे अष्टलक्ष्मी योग- जब किसी कुंडली में राहु छठे भाव में होता है और 1, 4, 7, 10वें भाव में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग बनता है। पापी ग्रह राहु, गुरु के समान अच्छा फल देता है। यह योग जिसकी कुण्डली में होता है वह व्यक्ति धार्मिक, आस्तिक एवं शान्त स्वभाव वाला होता है और यश व सम्मान के साथ-साथ धनवान हो जाता है। लग्न कारक योग- अगर किसी का लग्र मेष, वृष या कर्क लग्न है तभी यह योग बनता है। कुण्डली में राहु दुसरे, 9वें या दसवें भाव में नहीं है तो उनकी कुंडली में ये योग होता है। कुंडली की इस स्थिति से राहु का अशुभ प्रभाव नही होता क्योंकि उपर बताए गए लग्र वालों के लिए राहु शुभ फल देने वाला होता है। ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है। राहुकोप मुक्त योग- राहु पहले भाव में हो या तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में होता है और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो यह योग बनता है। ऐसे में व्यक्ति पर राहु के अशुभ प्रभाव नही पड़ते। ऐसे व्यक्तियों के सभी काम आसानी से होते हैं और उनके जीवन में कभी पैसों की कमी नही होती। राहु की महादशा लगने पर मानते हैं कि जैसे सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन ऐसा नहीं है। राहु और उसकी महादशा हर समय नुकसानदायक नहीं होती। राहु रंक को भी राजा बनाने की क्षमता रखता है। राहु की महादशा में विदेश जाने से बहुत लाभ होता है। विदेश का मतलब है वर्तमान निवास से दूर जाकर कार्य करने से सफलता मिलती है। अगर कुंडली में राहु , चौथे, दसवें, ग्यारहवें या नवें स्थान में अपने मित्र ग्रहों की राशि यानी शनि और शुक्र की राशि (मकर, कुंभ, वृषभ या तुला) में स्थित होता है तो बहुत सफलता दिलाता है।वहीं राहु यदि मिथुन राशि में हो तो कई ज्योतिष विद्वानों द्वारा उच्च का माना जाता है। राहु एक छाया ग्रह है। यह किसी भी राशि का स्वामी नही है। लेकिन यह जिसके अनुकुल हो जाता है उसे जीवन मे बहुत मान सम्मान प्रतिष्ठा और पद प्राप्त होता है। राजनितिज्ञों के लिए तो राहु का अनूकुल होना अत्यधिक फायदेमंद होता है। आज कल राहु केतु या शनी को लेकर कुछ तथा कथित ज्योतिषी जातको ङरा रहे है तथा जाप या पुजा के नाम से पैसा ठगते है मैरा आप से अ निवेदन है कि आप अपने शहर के अच्छे ज्योतिषी को ही अपनी कुंङली दिखाऐ ओ अक्सर जातक मुफ्त कुंङली दिखाने के चक्कर मे रहते है ऐसा ना करे आप ज्योतिषी को उसकी उचित दक्षिणा दे अगर आप मुझ से अपनी कुंङली दिखाना याकिसी समस्या का उपाय जानना चाहते है तो सम्पर्क करे 09414481324 07597718725 मांकाली ज्योतिष आचार्य राजेश

काली मुर्ती रहस्य।

मां काली मुर्ती रहस्य। कभी आपने देखा है काली की मूर्ति को, वह मां है और विकराल, मां है 

और हाथ में खप्‍पर लिए है। आदमी की खोपड़ी का। मां है, उसकी आंखों में सारे मातृत्‍व का सागर। और नीचे, वह किसी की छाती पर खड़ी है। पैरों के नीचे कोई दबा हे। क्‍योंकि जो सृजनात्मक है, वहीं विध्‍वंसात्‍मक होगा। क्रिएटिविटि का दूसरा हिस्‍सा डिस्ट्रैक्शन है। इसलिऐ मां को खड़ा किया है, नीचे लाश की छाती पर खड़ी है। हाथ में खोपड़ी है आदमी की मुर्दा। खप्‍पर है, लहू टपकता है। गले में माला है खोपडियो की। और मां की आंखे है और मां का ह्रदय है, जिनसे दूध बहे। और वहां खोपड़ियो की माला टंगी है। असल में जहां से सृष्‍टि पैदा होती है। वहीं प्रलय होता है। सर्किल पूरा वहीं होता है। इसलिए मां जन्‍म दे सकती है। लेकिन मां अगर विकराल हो जाती है। शक्‍ति उसमें बहुत है। क्‍योंकि शक्‍ति तो वहीं है, चाहे वह क्रिएशन बने और चाहे डिस्ट्रैक्शन बने। शक्‍ति तो वहीं है, चाहे सृजन हो या विनाश हो। जिन लोगों ने मां की धारणा के साथ सृष्‍टि और विनाश, दोनों को एक साथ सोचा था, उनकी दूरगामी कल्‍पना है। लेकिन बड़ी गहन और सत्‍य के बड़े निकट। असल मे स्‍वर्ग और पृथ्‍वी का मूल स्‍त्रोत वहीं है। वहीं से सब पैदा होती है। लेकिन ध्‍यान रहे, जो मूल स्‍त्रोत होता है,वही चीजें लीन हो जाती हे। वह अंतिम स्‍त्रोत भी होता है।

स्त्री-पुरुष जीवन रथ के दो पहिए

््स्त्री-पुरुष जीवन रथ केदो पहिए हैं।सृष्टि सृजन में दोनों का समान योगदान होता है। नारी जननी, माँ, बेटी, पत्नी, बहन, नानी, दादी बन समाज, परिवार को पोषित करती है। नारी को कई दैवीय रूपों में पूजा जाता है। ऐश्वर्य के लिए लक्ष्मी, शक्ति के लिए दुर्गा, ज्ञान के लिए सरस्वती। संस्कृत का श्लोक है – "यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। वैदिक काल में गार्गी जैसी विदूषी स्त्री ने यज्ञवलक्य को शास्त्रार्थ में हरा दिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि उस ज़माने में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे। स्वतंत्रता-स्वच्छंदता थीमध्यकालीन युग में नारियों की दशा बरबस, बेचारी-सी हो गई। उसे पाँव की जूती मानने लगे और नारी परिवार-समाज की संकुचित सीमाओं में बँध कर रह गई। पुरुष प्रधान समाज में नारी के नारीत्व का हरण होने लगा।। अनादि काल से महिलायें तिरस्कार झेलती आयीं है। पति के रूप में प्राप्त पुरुष स्त्री को कामना के रूप में स्वीकार करने के बजाय अवमानना के रूप में प्रयोग करता है,जब कि प्रकृति ने स्त्री को निराकार और पुरुष को साकार रूप में इस संसार में उपस्थित किया है। निराकार और साकार का रूप समझे बिना स्त्री पुरुष कभी भी अपने को सामजस्यता में नही रख पायेंगे,पहले आपको बता देना चाहता हूँ कि साकार और निरकार का अर्थ क्या है ? इस संसार में धनात्मक कारक साकार है,और ऋणात्मक कारक निराकार है,पुरुष का अर्थ एक तरह से है – मर्दाना। प्रकृति का अर्थ है स्त्री। तो सृष्टि जिस तरह से है, उसे समझाने के लिए सृष्टि के सृजन के बीज को पुरुष कहा गया है। यह नर है, लेकिन उसकी जीवन-निर्माण में कोई सक्रिय भूमिका नहीं है। यह बिलकुल मनुष्य के जन्म जैसी है। पुरुष सिर्फ बीज डालता है, लेकिन बाकी सारा सृजन नारी द्वारा होता है। इसलिए, देवी मां या पार्वती या काली को प्रकृति कहा गया है। वह संपूर्ण सृजन करती हैं, लेकिन इस सृजन का बीज है शिव या पुरुष। इसे शिव-शक्ति या पुरुष-प्रकृति, या यिन-यैंग या और भी कई तरह से समझा जा सकता हैस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है।।दोनो का अनुपात समान रूप से प्रयोग में लाने पर जीवन बिना किसी अवरोध के चला करता है,और इनके अन्दर जरा सा भी अनुपात बिगाड लिया जाये तो जीवन कष्टकारक हो जाता है। एक स्त्री एक पुरुष का अनुपाती रूप धनात्मक शक्ति को ऋणात्मक शक्ति में विलीन करने के लिये काफ़ी है,एक पुरुष अगर कई ऋणात्मक शक्तियों की पूर्ति करने के लिये उद्धत होता है तो वह जानबूझ कर अपनी जीवन की गति को असमान्य करता है,या तो वह जीवन को कम करता है अथवा वह जीवन भर अभावों में जीता है। उसी प्रकार से अगर एक स्त्री अगर कई सकारात्मक कारकों को अपने जीवन में प्रयोग करती है तो वह अपने जीवन को जल्दी समाप्त करने की चाहत करती है साथ ही जीवन को बरबाद करने के अलावा और कुछ नही करना चाहती है। इस बात को समझने के लिये आपको कहीं नही जाना है केवल अपने आसपास के माहौल को देखना है,आप किसी विधवा स्त्री या विधुर को देखिये,उसके जीवन को देखिये,उसकी आयु को देखिये,एक महिला का पति अगर चालीस साल की उम्र में गुजर गया है तो वह महिला अपनी वास्तविक उम्र से बीस साल और अधिक जिन्दा रहती है,अगर एक पुरुष चालीस साल में विधुर हो गया है तो वह अपनी वास्तविक उम्र से बीस साल और अधिक जिन्दा रहता है,इस अधिक उम्र को प्राप्त करने का कारण क्या है। इसे कोई भी बालिग आराम से समझ सकता है। अगर पुरुष अधिक स्त्रियों की कामना करता है और अधिक से अधिक कई स्त्रियों के साथ समागम करता है तो उसकी उम्र हर पहलू में कम होती चली जाती है,वह चाहे कितना ही धनी हो,कितना ही खाने पीने वाला हो,उसके पास चाहे कितने ही शरीर को बलवान बनाने वाले तत्वों की अधिकता हो,वह अपनी उम्र को कम ही करेगा। उसी प्रकार से कोई स्त्री अगर एक से अधिक पुरुषों के साथ समागम करती है तो वह भी अपनी उम्र की एक एक सीढी कम करती चली जाती है। इस बात को समझने के बाद भी अगर कोई स्त्री या पुरुष अधिक स्त्री या पुरुष की कामना करता है तो वह, वास्तव में सोसाइट करने वाली बात ही करता है।स्त्री पुरुष को ईश्वर ने संसार में निर्माण के लिये भेजा है यह तो एक साधारण व्यक्ति भी जानता है,लेकिन भावनाओं की गति को पकड कर चलने के साथ ही अगर दोनो अपने अपने कार्यों को करते चले जाते है,और वे जीवन की गति को निर्बाध चलाने के लिये एक के बाद एक निर्बाध (Resistance) पैदा करते जाते है तो जीवन आराम से निकल जाता है। इस स्त्री और पुरुष की गति को अगर रोजाना के प्रयोग में ली जाने वाली बिजली से तुलना करें तो आराम से समझ में आ सकता है,फ़ेस और न्यूटल दो भाग में घरेलू बिजली प्रयोग में ली जाती है,फ़ेस को न्यूटल से सीधा जोडने पर फ़्यूज उड जाता है,और फ़ेस को किसी रजिस्टेंस के माध्यम से न्यूटल तक पहुंचाने से उस रजिस्टेंस से जीवन की भौतिकता में सुख भी प्राप्त किया जा सकता है,और फ़्यूज भी नही उडता है,बिजली की गति सामान्य भी रहती है। स्त्री को न्यूटल और पुरुष को फ़ेस समझे जाने पर दोनो की आपसी शक्ति को प्रकृति ने बच्चे रूपी रजिस्टेंस पैदा किये है,दोनो अपनी अपनी शक्ति को बच्चों के माध्यम से खर्च करें तो बच्चे तरक्की करते जायेंगे,और दोनो का जीवन भी सार्थक होता चला जायेगा। लेकिन दोनो के बीच बीच में होने वाले शार्ट सर्किट से भी बचना पडेगा। भगवान रूपी पावर हाउस,तार और खम्भों रूपी माता पिता,आन आफ़ करने वाले स्विच रूपी रोजाना के कार्य और व्यवसाय,इन्डीकेटर रूपी नाम और समाज में वेल्यू,एम सी बी रूपी भाग्य और भगवान के प्रति श्रद्धा भी ध्यान में रखनी जरूरी है।

मंत्र जाप ओर उसका प्रभाव

है मंत्रजाप का प्रभाव मनुष्य शरीर एक बायोकैमिकल मशीन की तरह से है,यह केवल जैविक तत्वों से ही चलता है,जो तत्व जमीन से उगे होते है,जिन तत्वों के अन्दर भी एक स्वयं की उत्पादित होने की क्षमता होती है,उन्ही तत्वों से शरीर चलता है। शरीर में ग्रहण करने की क्षमताओं में भोजन से शरीर के विकास,पानी से शरीर के लवणों क्षारों और सभी तत्वों की पूर्ति और निकास का काम,वायु से शरीर के तत्वों को आगे पीछे करने का काम,अग्नि से शरीर के अन्दर तत्वों को पकाने और बेकार के तत्वों को जलाने का काम,सभी तत्वों के आपसी संघर्षण करने से उत्पन्न विद्युत के द्वारा भाग्य और दुर्भाग्य को बुद्धिबल से प्रकट करने वाली बात को माना जाता है।सही तरह के भोजन, विचार, श्वास प्रक्रिया, मनोभाव और भावनाओं से आपके शरीर को ठीक करते हुए उसका कायाकल्प किया जा सकता है। इसी तरह उचित शब्दों को बोलना और सही तरह की ध्वनियां सुनना भी महत्वपूर्ण है। इससे आपका तंत्रिका तंत्र अपने आस-पास के जीवन के प्रति संवेदनशील हो पाएगा। क्या आपने ध्यान दिया है कि जब आप कुछ घंटों तक गाड़ियों या मशीनों की कर्कश आवाजें सुनते हैं, तो आपको अपने आसपास की साधारण चीजों को भी ठीक से समझने में मुश्किल होती है। जबकि किसी दिन अगर आप सिर्फ घर पर बैठे कुछ शास्त्रीय संगीत सुन रहे होते हैं, उस दिन आपका दिमाग तेज और सजग होता है और बहुत आसानी से चीजों को समझ लेता है। अगर आप सचेतन होकर, इन चीजों पर अधिक से अधिक ध्यान दें, या कम से कम इस बारे में सचेत रहें कि किस तरह की ध्वनि आपके सिस्टम को नुकसान पहुंचा रही है और किस तरह की ध्वनि से लाभ होता है, तो आप उन ध्‍वनियों को शुद्ध कर लेंगे, जिनका आप उच्चारण करते हैं। हो सकता है कि आप उस आदमी को न रोक पाएं, जो आपके बगल में चिल्ला रहा हो, लेकिन कम से कम आप जो बोलते हैं, उस ध्वनि को तो शुद्ध कर सकते हैं। क्योंकि आप जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं, उनका असर आपके ऊपर सबसे अधिक होता है।ध्वनि एक चीज है, लेकिन एक और चीज है, ध्वनि के उच्चारण के पीछे की नीयत या लक्ष्य। बोलने की क्षमता मनुष्य को मिला एक विशेष उपहार है। बोले जाने वाले शब्दों की जटिलता के हिसाब से कोई और जीव इंसान की बराबरी नहीं कर सकता शरीर में आंखे प्रकाश के विभिन्न रूपों से शक्ति को ग्रहण करती है,नाक हवा में उपस्थित शक्तियों को ग्रहण करती है,कान धरातलीय कर्षण विकर्षण से उत्पन्न आवाजों से शक्ति को ग्रहण करते है,जीभ विभिन्न स्वरों को पैदा करने के बाद शरीर के अन्दर ग्राह्य तन्त्रिका तंत्र को मजबूत करती है और उन अणुओं को खोलने का काम करती है जो पहले खोले नही गये है अथवा खोले तो गये है लेकिन समयावधि के बाद बे स्वत: बन्द हो गये है,इसके साथ ही जीभ और ह्रदय के आपसी तालमेल से स्वाद,रस,वाणी,कर्मेन्द्रियों का साथ देना भी जीभ का काम है। मंत्र जाप का रूप उसी प्रकार से माना जा सकता है जिस प्रकार से कम्पयूटर के कीबोर्ड पर विभिन्न बटनो को दबाने से विभिन्न काम होते है। हीन भावना से दूर होने का मंत्र हीन भावना से ग्रसित व्यक्ति को अपने को एक घंटे के लिये एकान्त कमरे मे ले जाना चाहिये,वह समय कोई भी हो,दिन या रात सुबह या शाम जो भी उसके लिये उपयुक्त हो। दिमाग के अक्ष को साधने के लिये अक्षर "क्ष" का प्रयोग करने के लिये उसके सभी रूपों का उच्चारण जीभ और ह्रदय से एक साथ चलाना चाहिये। मतलब जाप करते वक्त जीभ की गति स्थिर होकर चले,लेकिन जोर से बोलना,आवाज निकालना आदि नही हो,इस प्रकार से मंत्र को जाप करते वक्त केवल यही ध्यान रखना चाहिये कि "मैं समर्थ हूँ,यह प्रकृति मेरे साथ है,मैं अपने को अमुक काम में अमुक व्यक्ति के साथ अमुक व्यक्ति के ठीक होने अमुक समय तक समर्थ होना चाहता हूँ".इस सोच के साथ जो मंत्र है वह इस प्रकार से है,-"क्षं क्षां क्षिं क्षीं क्षुं क्षूं क्षृं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्ष:" इस मंत्र का फ़ल तीन महिने में साक्षात सामने आने लगता है,लेकिन मंत्र जाप के समय अन्य चिन्तायें नही होनी चाहिये,पेशाब पानी अन्य शरीर की गतियों को पहले से ही पूर्ण करने के बाद ही इसका जाप करना चाहिये। जब सभी इच्छायें पूरी होने लगें तो भी इस मंत्र को नही त्यागना चाहिये,यह ही अक्ष या यक्ष का मंत्र बोला जाता है,जिससे शरीर का मुख्य बिन्दु जागृत हो जाता है और शरीर के वे अणु धीरे धीरे खुलने लगते है जो उन्नति के लिये प्राय: बन्द हो गये होते है या पहले से खोले ही नही गये होते है। वह विज्ञान है। विज्ञान को विज्ञान की तरह ही लेना चाहिए और बिलकुल उसी रूप में उसका इस्तेमाल करना चाहिए। कुछ मंत्र ऐसे भी हैं, जिनमें आपकी भावनाओं की जरूरत होती है। जबकि कुछ मंत्र ऐसे भी हैं, जो भावनाओं के साथ मिलकर सब गड़बड़ कर देंगे। इसलिए इनका इस्तेमाल आपको बिल्कुल विज्ञान की तरह करना चाहिए। यह रयासन विज्ञान की तरह हैं। आपको इसे बिल्कुल उसी रूप में करना होगा, तभी ये काम करेंगे। लेकिन आज ज्यादातर लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती और वह हर चीज को मिला देते हैं, इसलिए जो लोग इन्हें कर रहे हैं, आप उन पर इसका कोई महत्वपूर्ण असर या लाभ होता नहीं देखते। इसकी वजह सिर्फ इतनी है कि न तो उनमें इसके लिए जरूरी स्पंदन होता है और न ही इसके लिए जरूरी जानकारी, समझ और जागरूकता। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि बिना जरुरी जागरूकता के अगर किसी चीज को बार-बार दोहराया जाए तो वह दोहराव आपमें सुस्ती व ढीलापन ही लाता है। आप बहुत सारे ऐसे लोगों को पाएंगे, जिन्हें लगता है कि वे प्रार्थना कर रहे हैं, लेकिन इस दोहराव की प्रक्रिया के चलते वे सुस्त हो चुके हैं। बिना जरूरी जागरूकता के बार-बार किया जाने वाला उच्चारण मन को सुस्त बना देता है।

शुक्र ग्रह

" src="https://www.youtube.com/embed/yyIQX_9eCZI"शुक्र ग्रह ग्रहों का असर जिस तरह प्रकृति पर दिखाई देता है ठीक उसी तरह मनुष्यों पर यह असर देखा जा सकता है।

शुक्र ग्रहशु कुंडली में ग्रह स्थिति बेहतर होने से बेहतर फल प्राप्त होते हैं। वहीं ग्रह स्थिति अशुभ होने की दशा में अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं। बलवान ग्रह स्थिति स्वस्थ सुंदर आकर्षण की स्थितियों की जन्मदाता बनती हैं तो निर्बल ग्रह स्थिति शोक संताप विपत्ति की प्रतीक बनती हैं। लोगों के मध्य में आकर्षित होने की कला के मुख्य कारक शुक्र ग्रह हैं। कहा जाता है कि शुक्र जिसके जन्मांश लग्नेश केंद्र में त्रिकोणगत हों वह आकर्षक प्रेम सौंदर्य का प्रतीक बन जाता है। यह शुक्र जी क्या है और बनाने व बिगाड़ने में माहिर शुक्र देव का पृथ्वी लोक में कहां तक प्रभाव हैशुक्र मुख्यतः स्त्रीग्रह, कामेच्छा, वीर्य, प्रेम वासना, रूप सौंदर्य, आकर्षण, धन संपत्ति, व्यवसाय आदि सांसारिक सुखों के कारक है। गीत संगीत, ग्रहस्थ जीवन का सुख, आभूषण, नृत्य, श्वेत और रेशमी वस्त्र, सुगंधित और सौंदर्य सामग्री, चांदी, हीरा, शेयर, रति एवं संभोग सुख, इंद्रिय सुख, सिनेमा, मनोरंजन आदि से संबंधी विलासी कार्य, शैया सुख, काम कला, कामसुख, कामशक्ति, विवाह एवं प्रेमिका सुख, होटल मदिरा सेवन और भोग विलास के कारक ग्रह शुक्र जी माने जाते हैं।" src="https://www.youtube.com/embed/yyIQX_9eCZI"वैभव का कारक होने की वजह से शुक्र राजा की तरह बर्ताव करता है। जनरली इसका फेवरेट कलर पिंक, ब्लू आदि होते हैं जो अमूमन स्त्रियों के मनपसंद कलर माने जाते हैं। अगर हम वाहनादि की बात करें तो कुण्डली में शुक्र की मजबूती चौपाए वाहन का सुख उपलब्ध कराता है जबकि कमजोर शुक्र होने से जीवन में इनका अभाव बना रहता है।सांसारिक व भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए मनुष्य की कुण्डली का शुक्र मजबूत व शुभ प्रभाव युक्त होना ही चाहिए। इसके अलावा शुक्र की विविध भावों में मौजूदगी भी उसकी किस्मत को खास ढंग से प्रभावित करती है। सांसारिक सुखों से है। यह रास, रंग, भोग, ऐश्वर्य, आकर्षण तथा लगाव का कारक है। शुक्र दैत्यों के गुरु हैं और कार्य सिद्घि के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद के प्रयोग से भी नहीं चूकते। सौन्दर्य में शुक्र की सहायता के बिना सफलता असंभव है। य, रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करने का शौकीन होता है। आजकल फैशन से वशीभूत ऐसे वस्त्रों का प्रचलन स्त्री वर्ग में बढ़ रहा है जो शरीर को ढंकने में अपर्याप्त होते हैं। यह संभवत: शीत प्रधान शुक्र-चन्द्र के प्रभाव क्षेत्रों की देन है। महिला वर्ग का चर्म परिधान शुक्र-चन्द्र एवं मंगल की परतों से बना होता है अर्थात् कोमलता तेज, रक्तिमा एवं सौन्दर्य का सम्मिश्रण ही उसकी विशेष आकर्षण शक्ति होती है।शुक्र ग्रह से प्रभावित युवतियां ही प्रतियोगिता के अंतिम राउंड तक पहुंच पाती है। कुछ ग्रह ऐसे भी होते हैं जो कुछ दूर तक तो युवतियों का सहयोग करते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे प्रतिभागियों के ग्रह भारी पड़ते हैं, कमजोर ग्रह वाली युवतियां पिछड़ने लगती है। यह भी ज्ञात हुआ है कि प्रतियोगिताओं के निर्णायक भी शनि, मंगल, गुरु जैसे ग्रहों से प्रभावित होते हैं। सौन्दर्य शास्त्र का विधान पूरी तरह से ज्योतिषकर्म और चिकित्सकों के पेशे जैसा ही है। अगर किसी निर्णायक को सौन्दर्य ज्ञान नहीं हो तो वह निर्णय भी नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक शुक्र से प्रभावित तो होते हैं लेकिन उन पर गुरु-चंद्रमा का भी प्रभाव होता है जो उन्हें विवेकवान बनाता है। जन्म कुण्डली में तृतीय एवं एकादश भाव स्त्री का वक्षस्थल माना जाता है। गुरु-शुक्र इन भावों में बैठे हों या ये दोनों ग्रह इन्हें देख रहे हों, साथ में बली भी हों तो यह भाव सुन्दर, पुष्ट एवं आकर्षक होता है और आंतरिक सौन्दर्य परिधान सुशोभित करते हैं। पंचम एवं नवम भाव कटि प्रदेश से नीचे का होता है जो स्त्री को शनि गुरु प्रधान कृषता तथा स्थूलता सुशोभित करती है। अभिनय एवं संगीत में दक्षता प्रदान करने वाला ग्रह शुक्र ही है। शुक्र सौन्दर्य, प्रेम, कलात्मक अभिरुचि, नृत्य, संगीतकला एवं बुद्घि प्रदान करता है। शुक्र यदि बली होकर नवम, दशम, एकादश भाव अथवा लग्न से संबंध करें तो जातक सौन्दर्य के क्षेत्र में धन-मान और यश प्राप्त करता है। लग्न जातक का रूप, रंग, स्वभाव एवं व्यक्तित्व को दर्शाता है। चोथाभाव चन्द्रमा का जनता का प्रतिनिधित्व करता है। पंचम भाव बुद्घि, रुचि एवं मित्र बनाने की क्षमता को दर्शाता है। तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग देता है। मीन राशि के शुक्र कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है तृतीय भाव सृजनात्मक योग्यता का सूचक है। इसका बली होना एवं लग्न से संबंध सौन्दर्यता में निपुणता लाता है। कुशल अभिनय के लिए चंद्रमा एवं संवाद अदायगी के लिए बुध बली हो तथा शुभ स्थानों में चन्द्र-बुध का होना अभिनय, संगीत एवं नृत्य इत्यादि में सफलता दिलाता है। जन्म लग्न, चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न से दशम भाव पर शुक्र का प्रभाव सफलता का योग बनाता है।बुध एवं शुक्र का बली होकर शुभ स्थानों विशेषकर लग्न, पंचम दशम या एकादश भाव से संबंध सौन्दर्य क्षेत्र में सफलता देता है। चन्द्र कुण्डली में लग्नेश-धनेश की युति लाभ-स्थान में धन वृद्घि का संकेत देती है। साथ ही शुक्र व बुध का दशम व दशमेश से संबंध जातक को भाग्य बल प्रदान कर सफलता एवं प्रसिद्घि देता है।चन्द्र, शुक्र एवं बुध का संबंध चतुर्थभाव, चतुर्थेश धन भाव व धनेश, पंचम भाव व पंचमेश, नवमभाव व नवमेश से होने पर सफलता के योग देगा पंच महापुरुष योगों के अन्तर्गत शश योग (उच्च का शनि केन्द्र में) एवं मालव्य योग (उच्च व स्वराशि का केन्द्र में) एवं लग्नेश का स्वराशि व उच्च राशि का होना। कुण्डली में सभी शुभ ग्रह लग्न में एवं सभी पाप ग्रह अष्टम भाव में होने पर यह योग यश का भागीदार बनाता है कुण्डली में द्वितीय, नवम और एकादश के स्वामी ग्रह अपने-अपने स्थान पर होने से यह योग बनता है जो जातक को प्रसिद्धि के द्वार कुण्डली में सप्तमेश दशम स्थान में और दशमेश के साथ भाग्येश हो तो श्रीनाथ योग बनता है। कुछ विद्वानों के अनुसार दशमेश उच्च का होने पर ही यह योग बन जाता है, जो जातक को आकर्षक, सुखी और सम्माननीय बनाता है। आंतरिक परिधान के कारक शुक्र, चंद्र और केतु हैं तथा बाह्य परिधान के कारक सूर्य, राहु, बुध, गुरु व शनि हैं। अलग-अलग चन्द्र राशियों एवं सूर्य राशियों के अनुसार अपने प्रभाव दिखाते हैं। इस क्षेत्र में सफलता के लिए बुद्घि, चातुर्य, कला-कौशल के साथ कठोर परिश्रम जरूरी है। इसके लिए लग्न, चतुर्थ व पंचम भाव बली होना महžवपूर्ण है। सिंह राशि का शुक्र अभिनय कौशल देता है।तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग प्रदान करता है। मीन राशि का शुक्र व्यक्ति की कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है। किसी व्यक्ति की भौतिक समृद्धि एवं सुखों का भविष्य ज्ञान प्राप्त करन हो तो उसके लिए उस व्यक्ति की जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह की स्थिति एवं शक्ति (बल) का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। अगर जन्म कुंडली में शुक्र की स्थिति सशक्त एवं प्रभावशाली हो तो जातक को सब प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत यदि शुक्र निर्बल अथवा दुष्प्रभावित (अपकारी ग्रहों द्वारा पीड़ित) हो तो भौतिक अभावों का सामना करना पड़ता है। इस ग्रह को जीवन में प्राप्त होने वाले आनंद का प्रतीक माना गया है। प्रेम और सौंदर्य से आनंद की अनुभूति होती है और श्रेष्ठ आनंद की प्राप्ति स्त्री से होती है। अत: इसे स्त्रियों का प्रतिनिधि भी माना गया है और दाम्पत्य जीवन के लिए ज्योतिषी इस महत्वपूर्ण स्थिति का विशेष अध्ययन करते हैं। अगर शक्तिशाली शुक्र स्वराशि, उच्च राशि का मूल त्रिकोन) केंद्र में स्थित हो और किसी भी अशुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट न हो तो जन्म कुंडली के समस्त दुष्प्रभावों अनिष्ट) को दूर करने की सामर्थ्य रखता है। किसी कुंडली में जब शुक्र लग्न्र द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम, दशम और एकादश भाव में स्थित हो तो धन, सम्पत्ति और सुखों के लिए अत्यंत शुभ फलदायक है। सशक्त शुक्र अष्टम भाव में भी अच्छा फल प्रदान करता है। शुक्र अकेला अथवा शुभ ग्रहों के साथ शुभ योग बनाता है। चतुर्थ स्थान में शुक्र बलवान होता है। इसमें अन्य ग्रह अशुभ भी हों तो भी जीवन साधारणत: सुख कर होता है। स्त्री राशियों में शुक्र को बलवान माना गया है। यह पुरुषों के लिए ठीक है किंतु स्त्री की कुंडली में स्त्री राशि में यह अशुभ फल देता है ग्रह नक्षत्रों के प्रभाव से व्यक्ति समाज पशु पक्षी और प्रकृति तक प्रभावित होते हैं। ग्रहों का असर जिस तरह प्रकृति पर दिखाई देता है ठीक उसी तरह मनुष्यों पर सामान्यतः यह असर देखा जा सकता है। आपकी कुंडली में ग्रह स्थिति बेहतर होने से बेहतरफल प्राप्त होते हैं। वहीं ग्रह स्थिति अशुभ होने की दशा में अशुभफल भी प्राप्त होते हैं। बलवान ग्रह स्थिति स्वस्थ सुंदर आकर्षण की स्थितियों का जन्मदाता बनती है तो निर्बल ग्रह स्थिति शोक संताप विपत्ति की प्रतीक बनती है। लोगों के मध्य में आकर्षित होने की कला के मुख्य कारक शुक्र जी है। कहा जाता है कि शुक्र जिसके जन्मांश लग्नेश केंद्र में त्रिकोणगत हों वह आकर्षक प्रेम सौंदर्य का प्रतीक बन जाता है। यह शुक्र जी क्या है और बनाने व बिगाडने में माहिर शुक्र जी का पृथ्वी लोक में कहां तक प्रभाव है बृहद पराशर होरा शास्त्र में कहा गया कि शुक्र बलवान होने पर सुंदर शरीर, सुंदर मुख, अतिसुंदर नेत्रों वाला, पढने लिखने का शौकीन कफ वायु शुक्र का वैभवशाली स्वरूपः- यह ग्रह सुंदरता का प्रतीक, मध्यम शरीर, सुंदर विशाल नेत्रों वाला, जल तत्व प्रधान, दक्षिण पूर्व दिशा का स्वामी, श्वेत वर्ण, युवा किशोर अवस्था का प्रतीक है। चर प्रकृति, रजोगुणी, स्वाथी, विलासी भोगी, मधुरता वाले स्वभाव के साथ चालबाज, तेजस्वी स्वरूप, श्याम वर्ण केश और स्त्रीकारक ग्रह है। शुक्र ग्रह सप्तम भाव अर्थात दाम्पत्य सुख का कारक ग्रह माना गया है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शुक्र दैत्यों के गुरु हैं। ये सभी विद्याओं व कलाओं तथा संजीवनी विद्या के भी ज्ञाता हैं। यह ग्रह आकाश में सूर्योदय से ठीक पहले पूर्व दिशा में तथा सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में देखा जाता है। यह कामेच्छा का प्रतीक है तथा धातु रोगों में वीर्य का पोषक होकर स्त्री व पुरुष दोनों के जनानांगों पर प्रभावी रहता है।।शुक्र ग्रह से स्त्री, आभूषण, वाहन, व्यापार तथा सुख का विचार किया जाता है। शुक्र ग्रह अशुभ स्थिति में हो तो कफ, बात, पित्त विकार, उदर रोग, वीर्य रोग, धातु क्षय, मूत्र रोग, नेत्र रोग, आदि हो सकते हैं वेदिक ज्योतिष शास्त्र में शुक्र ग्रह बुध, शनि व राहु से मैत्री संबंध रखता है। सूर्य व चंद्रमा से इसका शत्रुवत संबंध है। मंगल, केतु व गुरु से सम संबंध है। यह मीन राशि में 27 अंश पर परमोच्च तथा कन्या राशि में 27 अंश पर परम नीच का होता है। तुला राशि में 1 अंश से 15 अंश तक अपनी मूल त्रिकोण राशि तथा तुला में 16 अंश से 30 अंश तक स्वराशि में स्थित होता है। इसका तुला राशि से सर्वोत्तम संबंध, वृष तथा मीन राशि से उत्तम संबंध, मिथुन, कर्क व धनु राशि से मध्यम संबंध, मेष, मकर, कुंभ से सामान्य व कन्या तथा वृश्चिक राशि से प्रतिकूल संबंध है। भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ नक्षत्र पर इसका आधिपत्य है। यह अपने स्थान से सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि डालता है। शुक्र जातक को ललित कलाओं, पर्यटन और चिकित्सा विज्ञान से जोड़ता है। जब किसी जातक की कुंडली में शुक्र सर्वाधिक प्रभावकारी ग्रह के रूप में होता है तो शिक्षा के क्षेत्र में पदाधिकारी, कवि, लेखक, अभिनेता, गीतकार, संगीतकार, वाद्ययंत्रों का निर्माता, शृंगार का व्यवसायी बनाता है। जब यही शुक्र जन्म पत्रिका में सप्तम या 12 वें भाव में वृष राशि में स्थित रहता है तो यह प्रेम में आक्रामक बनाता है। ये दोनों भाव विलासिता के हैं।जब यही शुक्र लग्न में है और शुभ प्रभाव से युक्त है तो व्यक्ति को बहुत सुंदर व आकर्षक बनाता है। शुक्र ग्रह पत्नी का कारक ग्रह है। और जब यही शुक्र ग्रह सप्तम भाव में रहकर पाप प्रभाव में हो और सप्तमेश की स्थिति भी उत्तम न हो तो पत्नी को रुग्ण या आयु की हानि करता है। तीसरे भाव पर यदि शुक्र है और स्वगृही या मित्रगृही हो तो व्यक्ति को दीर्घायु बनाता है। यह भाव भाई का स्थान होने से और शुक्र स्त्रीकारक ग्रह होने से बहनों की संख्या में वृद्धि करता है। जब किसी कुंडली में शुक्र द्वितीय यानी धन व परिवार भाव में उत्तम स्थिति में बैठा है तो व्यापार से तथा स्त्री पक्ष अर्थात ससुराल से आर्थिक सहयोग मिलता है। यदि उत्तम स्थिति में नहीं होता है तो व्यापार में लाभ नहीं मिल पाताइस भौतिक संसार में हर चीज शुक्र से जनित है। हर प्रकार के भौतिक सुख देने वाला शुक्र ग्रह ही है अतः शुक्र ग्रह का कुंडली में बलिष्ट होना बहुत आवश्यक है। ग्रहों में शुक्र को विवाह व वाहन का कारक ग्रह कहा गया है (इसलिये वाहन दुर्घटना से बचने के लिये भी इसको शुभ करना चाहिए ऐसे उपाय किये जा सकते है। शुक्र ग्रह के उपाय करने से वैवाहिक सुख की प्राप्ति की संभावनाएं बनती है। वाहन से जुडे मामलों में भी यह उपाय लाभकारी रहते है।आगे शुक्र के वारे ओर वात करेगै पोस्ट काफी लम्वी हो गई है ।

सोमवार, 20 अगस्त 2018

राहु का खेल

मित्रो कल मैने राहू पर पोस्ट की थी थोडा ओर वात करते है ज्योतष में राहु को मायावी ग्रह के नाम से भी जाना जाता है 

तथा मुख्य रूप से राहु मायावी विद्याओं तथा मायावी शक्तियों के ही कारक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त राहु को बिना सोचे समझे मन में आ जाने वाले विचार, बिना सोचे समझे अचानक मुंह से निकल जाने वाली बात, क्षणों में ही भारी लाभ अथवा हानि देने वाले क्षेत्रों जैसे जुआ, लाटरी, घुड़दौड़ पर पैसा लगाना, इंटरनैट तथा इसके माध्यम से होने वाले व्यवसायों तथा ऐसे ही कई अन्य व्यवसायों तथा क्षेत्रों का कारक माना जाता है।यह अकेला ही ऐसा ग्रह है जो सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल भी बना सकता है तथा इसी लिए इस ग्रह को मायावी ग्रह के नाम से जाना जाता है। अगर आज के युग की बात करें तो इंटरनैट पर कुछ वर्ष पहले साधारण सी दिखने वाली कुछ वैबसाइटें चलाने वाले लोगों को पता भी नहीं था की कुछ ही समय में उन वैबसाइटों के चलते वे करोड़पति अथवा अरबपति बन जाएंगे। किसी लाटरी के माध्यम से अथवा टैलीविज़न पर होने वाले किसी गेम शो के माध्यम से रातों रात कुछ लोगों को धनवान बना देने का काम भी इसी ग्रह का है।इंटरनैट से जुड़े हुए व्यवसाय तथा इन्हें करने वाले लोग, साफ्टवेयर क्षेत्र तथा इससे जुड़े लोग, तम्बाकू का व्यापार तथा सेवन, राजनयिक, राजनेता, राजदूत, विमान चालक, विदेशों में जाकर बसने वाले लोग, अजनबी, चोर, कैदी, नशे का व्यापार करने वाले लोग, सफाई कर्मचारी, कंप्यूटर प्रोग्रामर, ठग, धोखेबाज व्यक्ति, पंछी तथा विशेष रूप से कौवा, ससुराल पक्ष के लोग तथा विशेष रूप से ससुर तथा साला, बिजली का काम करने वाले लोग, कूड़ा-कचरा उठाने वाले किसी जातक की कुण्‍डली में राहू की दशा या अंतरदशा चल रही हो तो उसे क्‍या समस्‍या आएगी। अपनी कुण्‍डली विश्‍लेषण के दौरान जातक का यह सबसे कॉमन सवाल होता है और किसी भी ज्‍योतिषी के लिए इस सवाल का जवाब देना सबसे मुश्किल काम होता है

राहू क्‍या समस्‍या पैदा करता है, यह जानने से पूर्व यह जानने का प्रयास करते हैं कि राहू खुद क्‍या है। समुद्र मंथन की मिथकीय कथा के साथ राहू और केतू का संबंध जुड़ा हुआ है। देवताओं और राक्षसों की लड़ाई का दौर चल ही रहा था कि यह तय किया गया कि शक्ति को बढ़ाने के लिए समुद्र का मंथन किया जाए। अब समुद्र का मंथन करने के लिए कुछ आवश्‍यक साधनों की जरूरत थी, मसलन एक पर्वत जो कि मंथन करे, सुमेरू पर्वत को यह जिम्‍मेदारी दी गई, शेषनाग रस्‍सी के रूप में मंथन कार्य से जुड़े, सुमेरू पर्वत जिस आधार पर खड़ा था, वह आधार कूर्म देव यानी कछुए का था और मंथन शुरू हो गया यह कथा तो आप सभ जानते ही है दरअसल यह कथा हमारे भीतर की है यह साघको समझ मे नही आ सकती है क्योंकि कुंडली जागरण के लिए भी यह कथा मायने रखती है क्या ध्यान में जो डूबते हैं भीतर अलख लगाते हैं उनको भी जह समझ   में आती है कुंडली साप  के कृति की तरह हमारे शरीर में है मेरु पर्वत से यात्रा शुभ होती है नीचे से ऊपर की ओर राहु को जैसे सर्प कह दिया जाता है और कुंडली भी सर्प की तरह कुडंल मारे हमारे भीतर वेठी  हुई है और राहु अघेरे का भी  प्रतीक है यानि भीतर के अंधेरे में डूबना होगा। और मंथन भीतर जाकर मंथन करना होगा खैर यह बातें थोड़ी लंबी हो जाएंगी।पोस्ट तो फिर कभी यह मैं आपसे यह बातें शेयर करूंगा मिथकीय घटना के इतर देखा जाए तो राहू और केतू वास्‍तव में सूर्य और चंद्रमा के संपात कोणों पर बनने वाले दो बिंदू हैं। पृथ्‍वी पर खड़ा जातक अगर आकाश की ओर देखता है तो सूर्य और चंद्रमा दोनों ही पृथ्‍वी का चक्‍कर लगाते हुए नजर आत हैं। वास्‍तव में ऐसा नहीं है, लेकिन एक ऑब्‍जर्वर के तौर पर यह घटना ऐसी ही होती है। ऐसे में दोनों ग्रहों (यहां सूर्य तारा है और चंद्रमा उपग्रह इसके बावजूद हम ज्‍योतिषीय कोण से इन्‍हें ग्रह से ही संबोधित करेंगे) की पृथ्‍वी के प्रेक्षक के लिए एक निर्धारित गति है। चूंकि पृथ्‍वी उत्‍तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर केन्द्रित हो पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है, सो उत्‍तर की ओर बनने वाले संपात कोण को राहू (नॉर्थ नोड) और दक्षिण की ओर बनने वाले संपात कोण को केतू (साउथ नोड) कहा गया।कहानी के अनुसार राहू केवल सिर वाला भाग है। राहू गुप्‍त रहता है, राहू गूढ़ है, छिपा हुआ है, अपना भेष बदल सकता है, जो ढ़का हुआ वह सबकुछ राहू के अधीन है। भले ही पॉलीथिन से ढकी मिठाई हो या उल्‍टे घड़े के भीतर का स्‍पेस, कचौरी के भीतर का खाली स्‍थान हो या अंडरग्राउण्‍ड ये सभी राहू के कारकत्‍व में आते हैं। राहू की दशा अथवा अंतरदशा में जातक की मति ही भ्रष्‍ट होती है। चूं‍कि राहू का स्‍वभाव गूढ़ है, सो यह समस्‍याएं भी गूढ़ देता है।

जातक परेशानी में होता है, लेकिन यह परेशानी अधिकांशत: मानसिक फितूर के रूप में होती है। उसका कोई जमीनी आधार नहीं होता है। राहू के दौर में बीमारियां होती हैं, अधिकांशत: पेट और सिर से संबंधित, इन बीमारियों का कारण भी स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता है।कहानी के अनुसार राहू केवल सिर वाला भाग है। राहू गुप्‍त रहता है,  राहू के दौर में बीमारियां होती हैं, अधिकांशत: पेट और सिर से संबंधित, इन बीमारियों का कारण भी स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता राहू से पीडि़त व्‍यक्ति जब चिकित्‍सक के पास जाता है तो चिकित्‍सक प्रथम दृष्‍टया य निर्णय नहीं कर पाते हैं कि वास्‍तव में रोग क्‍या है, ऐसे में जांचें कराई जाती है, और आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि ऐसी मरीज जांच रिपोर्ट में बिल्‍कुल दुरुस्‍त पाए जाते हैं। बार बार चिकित्‍सक के चक्‍कर लगा रहे राहू के मरीज को आखिर चिकित्‍सक मानसिक शांति की दवाएं दे देते है राहू बिगड़ने पर जातक को मुख्‍य रूप से वात रोग विकार घेरते हैं, इसका परिणाम यह होता है कि गैस, एसिडिटी, जोड़ों में दर्द और वात रोग से संबंधित अन्‍य समस्‍याएं खड़ी हो जाती हैं।किसी भी जातक की कुण्‍डली में राहू की महादशा 18 साल की आती है। विश्‍लेषण के स्‍तर पर देखा जाए तो राहू की दशा के मुख्‍य रूप से तीन भाग होते हैं। ये लगभग छह छह साल के तीन भाग हैं। राहू की महादशा में अंतरदशाएं इस क्रम में आती हैं राहू-गुरू-शनि-बुध-केतू-शुक्र-सूर्य- चंद्र और आखिर में मंगल। किसी भी महादशा की पहली अंतरदशा में उस महादशा का प्रभाव ठीक प्रकार नहीं आता है। इसे छिद्र दशा कहते हैं। राहू की महादशा के साथ भी ऐसा ही होता है। राहू की महादशा में राहू का अंतर जातक पर कोई खास दुष्‍प्रभाव नहीं डालता है। अगर कुण्‍डली में राहू कुछ अनुकूल स्थिति में बैठा हो तो प्रभाव और भी कम दिखाई देता है। राहू की महादशा में राहू का अंतर अधिकांशत: मंगल के प्रभाव में ही बीत जाता है।राहू में राहू के अंतर के बाद गुरु, शनि, बुध आदि अंतरदशाएं आती हैं। किसी जातक की कुण्‍डली में गुरु बहुत अधिक खराब स्थिति में न हो तो राहू में गुरू का अंतर भी ठीक ठाक बीत जाता है, शनि की अंतरदशा भी कुण्‍डली में शनि की स्थिति पर निर्भर करती है, लेकिन अधिकांशत: शनि और बुध की अंतरदशाएं जातक को कुछ धन दे जाती हैं। इसके बाद राहू की महादशा में केतू का अंतर आता है, यह खराब ही होता है, मैंने आज तक किसी जातक की कुण्‍डली में राहू की महादशा में केतू का अंतर फलदायी नहीं देखा है। राहू में शुक्र कार्य का विस्‍तार करता है और कुछ क्षणिक सफलताएं देता है। इसके बाद का दौर सबसे खराब होता है। राहू में सूर्य, राहू में चंद्रमा और राहू में मंगल की अंतरदशाएं 90 प्रतिशत जातकों की कुण्‍डली में खराब ही होती हैंराहू के आखिरी छह साल सबसे खराब होते हैं, इस दौर में जब जातक ज्‍योतिषी के पास आता है तब तक उसकी नींद प्रभावित हो चुकी होती है, यहां नींद प्रभावित का अर्थ केवल नींद उड़ना नहीं है, नींद लेने का चक्र प्रभावित होता है और नींद की क्‍वालिटी में गिरावट आती है। मंगल की दशा में जहां जातक बेसुध होकर सोता है, वहीं राहू में जातक की नींद हल्‍की हो जाती है, सोने के बावजूद उसे लगता है कि आस पास के वातावरण के प्रति वह सजग है, रात को देरी से सोता है और सुबह उठने पर हैंगओवर जैसी स्थिति रहती है। तुरंत सक्रिय नहीं हो पाता है।राहू की तीनों प्रमुख समस्‍याएं यानी वात रोग, दिमागी फितूर और प्रभावित हुई नींद जातक के निर्णयों को प्रभावित करने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि जातक के प्रमुख निर्णय गलत होने लगते हैं। एक गलती को सुधारने की कोशिश में जातक दूसरी और तीसरी गलतियां करता चला जाता है और काफी गहरे तक फंस जाता हैएकमात्र राहू की ही समस्‍याए ऐसी है जो दीर्धकाल तक चलती है। राहू के समाधान के लिए कोई एकल ठोस उपाय कारगर नहीं होता है। ऐसे में जातक को न केवल ज्‍योतिषी की मदद लेनी चाहिए, बल्कि लगातार संपर्क में रहकर उपचारों को क्रम को पूरे अनुशासन के साथ फॉलो करना चाहिए। मेरा निजी अनुभव यह है कि राहू के उपचार शुरू करने के बाद कई जातक जैसे ही थोड़ा आराम की मुद्रा में आते हैं, वे उपचारों में ढील करनी शुरू कर देते हैं, इसका नतीजा यह होता है कि जातक फिर से फिसलकर पहले पायदान पर पहुंच जाता है।अपने सालों के अनुभव में मुझे राहू की समस्‍या वाले जातक ही अधिक मिले हैं। सालों तक हजारो जातकों के राहू के उपचार करते करते मैंने एक पैटर्न बनाया है, जो राहू के बदलते स्‍वभाव और प्रभावों को नियंत्रित कर सकने मे कामयाब साबित हुआ है। ऐसे में प्रभावी उपचार जातक को राहू की पीड़ा से बहुत हद तक बाहर ले के जा सकते है इसके बावजूद भी मैंने हमेशा यही कहा है कि राहू की समस्‍या का 80 प्रतिशत समाधान गारंटी से होता है, राहू की समस्‍या का पूरी तरह समाधान नहीं किया जा सकता, चाहें आप एक हजार ज्‍योतिषियों की सलाह ही क्‍यों न ले लें वाकी कुन्डली मे देख कर  कौन सा लग्न है राहु कोन से भाव मे है कितने अ.श का है किसके नछत्तंर मे किसकी राशी मेहै या उप नछत्तर या किसके साथ युती है ओर दृश्टया यह सव वाते गोर करके ही फल देखे Acharya rajesh kumar 07597718725

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जन्म कुंडली में दसवें घर (दशम भाव)

दशम भाव ज्योतिष भाव कुडंली का सबसे सक्रिय भाव है| इसे कर्म भाव से जाना जाता है क्यूंकि ये भाव हमारे समस्त कर्मों का भाव है| जीवन में हम सब कर्म करते रहते हैं और अपनी आजीविका कमाना भी एक कर्म है| इसीलिये किसी भी तरह का व्यवसाय कर्म से सम्बंधित है| 

दशम भाव directly कर्म को control करता है|कर्म को दशम भाव में क्यों रखा गया है? पहली बात दशम भाव को कुंडली का Zenith – सर्वोच्च शिखर भाव माना जाता है और चूंकि कर्म करते रहना जीवन है, अकर्मण्य होना मृत्यु, तो ऐसे महत्वपूर्ण subject को सर्वोच्च शिखर भाव में ही रखा जाना चाहिये| दूसरी बात दशम भाव पंचम भाव से छठा भाव है – हमारे पूर्व कर्मों के सबसे अनजाने तथ्य दशम भाव में है क्यूंकि पंचम भाव पूर्व पुण्य भाव है और हमारे इस जन्म के कर्म हमारे पूर्व पुण्य कर्मों से directly related हैं| शास्त्र कहते हैं की लग्न कमजोर हो, पंचम भाव पीड़ित हो, और नवम भाव भी बलहीन हो यानी तीनों महत्वपूर्ण शुभ त्रिकोण भाव पीड़ित हों और सिर्फ दशम भाव ही strong हो, तो भी वो जातक लम्बी, सफल और उन्नत जीवन जीने में सक्षम हो जाता है|स भाव केद्वाराअधिकार,ऐश्वर्य-भोग, यश-प्राप्ति, नेतृत्व, प्रभुता, मान-प्रतिष्ठा, राज्य, नौकरी, व्यवसाय कीर्ति, व्यापार,शरीर के अंगों मेंघुटना,विदेशयात्रा,आत्मविश्वासव्यक्ति के कार्यक्षेत्रकाविश्लेषण,अधिकारी,अधिकार व अधिकारों प्रयोग।सम भाव का स्वामी और एकादस भाव का स्वामी सिर्फ शनि को माना गया है और कारक दसम भाव का कर्म को माना गया है दसम भाव ही कर्म करने की प्रेरणा देता है इसके और कारक जैसे सूर्य, बुध भी माने जाते हैं पर मुख्यता शनि को को इसका अधिकार मिलता है, वहीँ ग्यारह भाव का स्वामी भी शनि ही बनता है जिसका कारक गुरु को बनाया गया इससे यही निष्कर्ष निकलता है की शनि रुपी करम जो के धीमी गति से चलता रहता है वही एकादस के रूप में धीमी गति से गुरु के रूप में कैश फ्लो भी निरंतर देता रहता है यानी करम करोगे तभी फल के हकदार बन पायोगे यही शनि का सन्देश है और शनि का एक और भी सन्देश है की निष्काम भाव से किये हुए करम का असली फल गुरु के रूप में मिलता है , शनि सिर्फ और सिर्फ करम वो भी असली करम यानी वह करम जिससे किसी को हानि न पहुंचे उसका फल ज़रूर अच्छा देता है और गलत करम हालांकि हम कहीं ना कहीं करम करने को मजबूर भी होते हैं परन्तु विवेक और बुधि का इस्तेमाल तो खुद ही करना पड़ता है उस रूप में भी शनि का न्याय चक्र हमें नहीं छोड़ता उसकी चाहे जितनी पूजा कर लो, व्रत रख लो मंत्र पढ़ लो इससे शनि कभी प्रभावित नहीं होते , शनि की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें सही कर्म करने पढेंगे तभी शनिदेव हमारी पुकार सुनेगें नहीं तो ये कुछ ऐसा हुआ के कबूतर ने बिल्ली को देखा और आँखें बंद कर ली उससे तो बिल्ली उसे ज़रूर खाएगी सो कर्म की असली परिभाषा को समझते हुए ही कर्म करेंगे तो ज़रूर अच्छा फल मिलेगा !दशम भाव को 'किस्मत की बुनियाद का मैदान' कहा है। किस्मत की बुनियाद कर्म है। कर्म की नीव पर ही भाग का भवन खड़ा होता है। अतः किस्मत की बुनियाद का मैदान हुआ कर्म का छेत्र।"ग्रहमंडल 9 से ही टेवे ,घर दसवें जब बैठा हो,6 पाँचवे चाहे दोस्त उसके ,दुगुनी जहर का होता है"उस समय निश्चित रूप से नही कहा जा सकता है कि ग्रह अच्छे फल देगा या अनिष्ट करेगा। इतना निश्चित है की वह जो भी फल देगा, दुगने वेग का देगा। शकी ग्रह कैसा फल देगा? इस बात का अनुमान ही लगाया जा सकता है। चन्द्रमा शुभ स्तिथि में हो तो अच्छा फल दुगना हो सकता है।दूसरा भाव भी चंगा हुआ तो शक का ग्रह दुगना शुभ फल दे सकता है। आठवां भाव पीड़ित हुआ तो शक का ग्रह दोगुना बुरा फल दे सकता है। दशम में दो शत्रु ग्रह हुआ तो दोनों लड़ते रहेंगे। उस स्तिथि में भी फल का अनुमान चन्द्रमा की स्तिथि से लगाया जा सकता है।चतुर्थस्थ ग्रह दसवें भाव को देखता है। दसवाँ भाव खाली हुआ तो वे अशुभ फल देते है। दूसरा घर खाली हुआ तो दसवाँ ग्रह सो जाता है ।"घर दूजे के खाली होते, दसवाँ फ़ौरन सोता है"राहु, केतु, बुध इस भाव में हमेशा शक के ग्रह होते है। उनका फल शनि की स्तिथि पर निर्भर करता है। शनि चंगा हुआ तो इनका फल दुगुना चंगा और शनि मंदा हुआ तो इनका फल दुगुना मंदा होताहै अंधे और शक के ग्रहों के अनिष्ट फल के निवारण के लिए माता -पिता से मिलकर चलना चाहिए। दस अंधे व्यक्तियों को मुफ्त में भोजन -सामग्री बाँटनी चाहिए।लाल किताब केअनुसार :मैदाने किस्मत’’ग्रह 10वे का घर 10 शक्की, दुगनी ताकत का हेाता हो;आंख बना है घर दो जिसकी, ख्वाब 12 से लेता हो’’कुण्डली के खाना नम्बर 10 को लाल किताब में किस्मत की बुनियाद का मैदान कहा गया है। अगर खाना नम्बर 10 रद्दी ग्रहोें से रद्दी हो रहा हो तो टेवा अन्धे ग्रहों का होगा। चाहे (ख्वाह) तमाम ग्रह उच्च घरों के हों पर अन्धे की तरह अपना फल देंगे। यह सहन (मकान के बीच या सामने का मैदान या आँगन) है नम्बर 4 का और इसका मुन्सिफ (न्यायकर्ता/इंसाफ करने वाला/दिवानी न्यायलय का एक उच्च पदाधिकारी) होगा चन्द्र।इस घर बमुजिब वर्षफल आया हुआ ग्रह धोखे का ग्रह होगा जो अच्छा बुरा दोनों ही तरफ हो सकता है।  नम्बर 8 मन्दा हो तो दुगना मन्दा और नम्बर 2 नेक हो तो दुगना उम्दा होगा। अगर दोनों तरफ बराबर तो अच्छा असर पहले और बुरा असर बाद में होगा। अगर नम्बर 8 व 2 दोनों ही खाली हों तो नम्बर 3, 5, 11 के ग्रह मददगार होंगे।  अगर वह भी खाली हों तो फैसला सनीचर की हालत पर होगा। जब नम्बर 10 में आपस में (बाहम) लड़ने वाले कोई भी ग्रह बैठे हों तो वह टेवा अन्धे ग्रहों का होगा। यानि वह ग्रह हूबहू ऐसे ही ढंग पर असर देंगे, जिस तरह दुनिया में अन्धा प्राणी चलता फिरता है। ऐसी हालत में फैसला चन्द्र की हालत पर होगा। यानि अगर चन्द्र उम्दा तो असर उम्दा वर्ना मन्दा फल लेंगे। अपने माता पिता से मिलते रहना मदद देगा। 10 अन्धे मर्दों को इकट्ठा ही मुफ्त खुराक तकसीम करना खाना नम्बर 10 के ग्रहों की ज़हर धो सकेगा।  अगर खाना नम्बर 10 खाली ही हो तो खाना नम्बर 4 के ग्रहों का कोई नेक फल न हो सकेगा। चाहे (ख्वाह) उस घर में रिज़क के चश्मे को उभारने केे लिए ग्रह लाख दर्जा ही उम्दा क्यों न हो । राहु केतु बुध तीनों ही इस घर में हमेशा शक्की होंगे। जो शनीचर की हालत पर चला करते हैं। यानि अगर सनीचर उम्दा तो दो गुणा उम्दा और अगर शनीचर मन्दा तो दो गुणा मन्दा असर देंगे।

नवम भावं ninth houseनवम भाव

मित्रों आज नवम भाव के बारे में चर्चा करेंगे के यह भाव धरम का और भाग्य का माना जाता हैनवम भाव किस्मत का है | यहाँ बैठे ग्रह आपके भाग्य को बहुत हद तक प्रभावित करते हैं | 

यदि यहाँ कोई भी ग्रह न हो तो भी यहाँ स्थित राशी के स्वामी को देखा जाता है | नवम भाव भाग्य का और दशम भाव कर्म का है | जब इन दोनों स्थानों के ग्रह आपस में किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखते हैं तब राजयोग की उत्पत्ति होती है | राजयोग में साधारण स्थिति में व्यक्ति सरकारी नौकरी प्राप्त करता है | नवम और दशम भाव का आपस में जितना गहरा सम्बन्ध होगा उतना ही अधिक बड़ा राज व्यक्ति भोगेगा | मंत्री, राजनेता, अध्यक्ष आदि राजनीतिक व्यक्तियों की कुंडली में यह योग होना स्वाभाविक ही है |जन्मकुंडली का नौवां घर सर्वाधिक शुभ घरों में गिना जाता है | इस घर का अपना विशेष महत्व है | मैंने जीवन में इस घर का प्रभाव स्वयं अनुभव करके देखा है | अक्सर हम राजयोग के बारे में बात करते हैं | हर व्यक्ति की कुंडली में राजयोग और दरिद्र योग मिल जायेंगे | हर योग की कुछ समय अवधि रहती है | दो तीन साल से लेकर पांच छह साल तक ही ये योग प्रभावशाली रहते हैं | जिस राजयोग के विषय में मैं सोच रहा हूँ अलग है नवम भाव से बनने वाला योग पूरे जीवन में प्रभाव कारी रहता है |

कुछ लोगों को आगे बढ़ने के अवसर ही नहीं मिल पाते और कुछ लोग अवसर मिलते ही बहुत दूर निकल जाते हैं | बदकिस्मती जो जीवन बदल दे इसी घर की देन होती है | खुशकिस्मती जो अगली पीढ़ियों के लिए भी रास्ता साफ़ कर दे नवम भाव का प्रबल होना दर्शाती है |

मनपसंद जीवनसाथी पाने की आस में पूरा जीवन गुजर जाता है उसके साथ जिसे कभी पसंद किया ही नहीं |  जिन्दगी के साथ समझौता कर लेना या यह मान लेना कि यही नसीब था इन घटनाओं के लिए नवम भाव ही उत्तरदायी है 

आस लगाकर बैठे हजारों हजार लोग भाग्य के पीछे भागते रहते हैं और यह भी सच है कि इस दौड़ में हम सब हैं | प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हर कोई भाग्य की और देख रहा है | किस्मत का यह ताना बाना अपने आप में विचित्र है | भाग्य को समझ पाना आसान नहीं परन्तु जन्मकुंडली के द्वारा एक कोशिश की जा सकती है इसे लाल किताब में किस्मत की कहानी कहते हैं. इस घर का स्वामी और कारक दोनों ही बृहस्पति हैं. लाल किताब में इस स्थान को गुरू की गद्दी कहा गया है. नौंवा घर कर्मों का विशाल सागर कहा गया हैदेव गुरु वृहस्पति जो के समस्त सुखों का कारक है और हमें यही सन्देश देता है के हमें मानवता का धर्म अपनाते हुए ही करमरत रहना चाहिए क्यों की चाहे इस संसार में आदमी ने कितने धरम बनाये हैं वो अपनी व्यक्तिगत सोच और परम्परा के अनुसार बनाये जाते हैं पर कल्पुरुख लग्न के रूप में ईश्वर ने सिर्फ एक ही धरम बनाया जो की सिर्फ मानवता ही है वैसे भी धरम का मतलब होता है धारण करना यानी आप किसी विचार को धारण करते हैं और उसके बनाये नियम में चलते हैं ये सब कुछ तभी बनाये गए क्यों की यह संसार विविद्ध संस्कृतियों के मेल जोल से बनता है और हम एक दुसरे का आदर करते हुए सबसे कुछ न कुछ सीखते रहते हैं पर इस चीज़ को न भूलते हुए के इश्वर को सिर्फ और सिर्फ मानवता का ही धरम अच्छा लगता है तभी जब काल्पुरुख कुंडली की ब्रह्मा ने कल्पना की होगी तो शुक्र रुपी भौतिकता का ख्याल ना आते हुए आध्यात्मिक देव गुरु वृहस्पति को ही इस पदवी का हक़दार बनाया गया क्यों की तमाम धरम ग्रंथों व गीता का भी अंत का सन्देश सिर्फ मोक्ष को ही माना गया जिसका सन्देश योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था और इस पर निरर्थक वादविवाद से कोई फायदा नहीं क्यों की मोक्ष का कांसेप्ट बहुत गहरा है जो हर किसी के बस की बात नहीं !. नवम घर और दूसरे घर के मध्य एक गहरा संबंध होता है. जब नौंवा घर सोया हुआ हो तो दूसरे घर के माध्यम से उसे जगाया जा सकता है. पर इस स्थित के लिए तिसरे घर और पांचवें घर को खाली होना चाहिए.

सोया हुआ ग्रह जब नौवें घर में आता है तो वह जाग उठता है और अपने भाग्य से संबंधित फलों को देने की कोशिश करता है. ऎसी स्थिति में सूर्य और चंद्रमा सदैव शुभ फल देने वाले बनते हैं. राहु केतु भी बुरा प्रभाव नहीं देते इस घर के बुरे प्रभावों से बचने के लिए नौवें घर के ग्रहों की वस्तुओं को माथे से लगाना चाहिए.

जड़ बुनियाद ग्रह 9 होता किस्मत का आगाज भी है

घर दूजे पर बरिश करता समुद्र भरा ब्रह्माण भी है

नवम में स्थित ग्रह को भाग्योदय करने वाला ग्रह माना जाता है. इसे ही ब्रह्माण का समुद्र भी कहते हैं इसलिए जब यहां से घटाएं उठती हैं तो दूसरे घर अर्थात धन स्थान में वर्षा करती है उसे ही सुख समृद्धि देने की कोशिश करती हैं.

घर तीजे का असर हो पहले बाद मिला घर पांच का हो

कुंडली मकान मरकज गिनते हाकिम गिना सभी ग्रह का हो

अगर लाल किताब कुण्डली में तीसरा घर और पांचवां घर खाली हो तो

रविवार, 19 अगस्त 2018

आठवां भाव 8) अष्टम भाव

आठवां भाव बीमारी और मृत्यु का भाव माना गया है। लाल किताब में इसे मुकाम फानी ,मौत अदल और न्याय का घर कहा गया है।

आठवें भाव का स्वामी मंगल है। कारक शनि और मंगल दोनों है। इसीलिए इसे शनि और मंगल की साजी गद्दी कहा गया है। अष्टम भाव में कर्म और फल का न्याय चन्द्रमा करता है। उसके न्याय में माफ़ी या दया के लिए नही है।जन्मकुंडली में फलादेश करते हुए कुंडली का आठवा भाव और शनि दोनों ही बड़े महत्वपूर्ण माने जाते हैं। कुंडली में अष्टम भाव को आयु का स्थान माना जाता है (कुछ विद्वान इसे मत्यु का स्थान समझते हैं, जो कि गलत हैआठवां भाव मौत का घर माना जाता है,मौत भी आठ प्रकार की मानी जाती है,पहली मौत अपमान के रूप से मानी जाती है,दूसरी मौत शरीर के नाश से मानी जाती है,तीसरी मौत निसन्तान रहने या केवल पुत्री के रहने पर मानी जाती है,चौथी मौत घर बार छोड कर गुमनाम जिन्दगी जीने की मानी जाती है,पांचवीं मौत आत्मा के विरुद्ध काम करने की मानी जाती है,छठी मौत सामयिक रूप से घर बार टत्यागने के कारण मानी जाती है,सातवीं मौत अपने कार्यों से अपने को बरबाद करने से मानी जाती है,और आठवीं मौत जीवन पर्यन्त शमशानी सेवा से मानी जाती ,मौत को ऐसे ही देखें  मरना तो हमें एक दिन होगा ही वा‌स्तव में मृत्यु का स्थान 7वां है।) आठवें भाव जैसा प्रभाव शनि ग्रह का भी है, इसी लिए शनि को इस स्थान का कारक कहा गया है। आठवां स्थान और शनि दोनों ही अचानक आने वाली मुसीबत, प्राकृतिक आपदा, अग्नि, जल, वायु या किसी भी प्रकार की आकस्मिक दुर्घटना, कारागार, यानी जेल, बड़े संकट, शरीर कष्ट की सूचना देते हैं। आठवें स्थान को दुःख भाव या पाप भाव के रूप में देखा जाता हैकुंडली का 8 भाव हमको यह बता देता है इस इंसान की आयु ईश्वर ने कितनी निर्धारित कर रखी है और यह इंसान इस पृथ्वी पर कितने साल जीवित रहेगा इसके लिए 8 भाव और उसके कारक शनि को देखा जाता है कुंडली का 8 भाव आपके नाभि से नीचे के स्थान को भी बताता है वो कितने हष्ट पुष्ट है कुंडली का 8 भाव इंसान को एक अदभुत सोच और परिलोकिक ज्ञान भी देता है इंट्यूशन पावर भी यही से मिलती है इंसान किसी भी चीज़ को बहुत गहराई से सोचकर उस चीज़ पर मंथन करता है कुंडली का 2 भाव का स्वामी या पंचम भाव का स्वामी अगर 8 भाव में हो इंसान किसी न किसी चीज़ पर रिसर्च कर लेता है 8 भाव का स्वामी अगर 8 में हो या पंचमेश का सम्बन्ध 8 भाव से 8 भाव के स्वामी और कारक शनि से हो जाय ऐसा इंसान एक दिन बहुत बड़ा तपस्वी या ऐसी बीमारियों को भी ठीक करने वाला बन जाता है जिसका इलाज बड़े से बड़े डॉक्टर के पास नहीं होता किसी भी चीज़ को बहुत गहराई से समझने के लिए 8 भाव का मझबूत होना भी बहुत जरुरी होता है जब यह भाव कुंडली में बहुत मझबूत होता है इंसान पारिवारिक बंधन और सब रिश्तों से हटकर कुछ अलग करता है वो इस दुनिया के लिए एक मिसाल बनकर भी दिखा सकता है यह भाव समुंद्री यात्राओं का भी भाव होता है और कई बड़ी बड़ी समुंद्री यात्रा का विचार भी इस भाव से किया जाता है 8 भाव से इंसान को गड़ा धन भी प्राप्त होता है वो ज्ञान के रूप में भी हो सकता है अलौकिक शक्तियों के रूप में भी हो सकता है और कुछ इंसान जीवन में ऐसा कर जाय जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की है उस तरह का भी हो सकता है जिसका 8 भाव बहुत ज्यादा मजबूत हो और उस पर उस भाव के स्वामी की दशा हो ऐसा इंसान जो बोलेगा वो सच हो जायेगा 8 भाव से रहस्मयी ताक़त निकलकर वाणी स्थान को देखती है जो की उसके मुह से निकली बात को सच कर देती है कुंडली में इस भाव से बड़ी बड़ी तपस्या की जा सकती है कोई बड़ा रिसर्च किया जा सकता है और जीवन में मॉनव समाज की कोई बड़ा अविष्कार करके भी दिया जा सकता है यह भाव अगर बहुत ही ज्यादा मजबूत हो तो इंसान एक अच्छा ज्योतिषी एक अच्छा साइंटिस्टएक अच्छा तांत्रिक या फिर इस दुनिया से भी जो बाहर एक दुनिया है उसको समझ सकता है ऐसा इंसानमें ईश्वर की दी हुई शक्तियां होती है पर उसको योग और साध्ना से जगाना पड़ता है अगर यह भाव खराब होगा आपकी आयु कम हो जाएगी आपको गुप्त रोग बवासीर के रोग और काफी गुप्त रोगों से झुंझना पड़ जाएगा आपके घर चोरी डकैती पड़ जायगी परिवार और समाज से आपका बहिष्कार हो जायेगा आप किसी एक चीज़ के पीछे पागल हो जाओगे और कुछ समझ नहीं आयेगा आपको मानसिक परेशानी हो जायेगी काम कुछ बचेगा नहीं और ठोकरे खाओगेआपके बड़े बड़े नशे की लत लग जाएगी और जीवन एकांत में ही खत्म हो जायेगा अब भाव भवेश और कारक कैसे है तभी इस भाव के बारे में आप अच्छे से जान सकते है कुंडली का कोई भी भाव कभी खराब नहीं होते है बस उसकी कुछ सिडिफ्फक्ट होते है इसलिए कुंडली में सभी भावो में कुछ न कुछ छुपा है हमें समझने की जरुरत है


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