मित्रों कल हमनें 6भाव तक लिखा था आज आगे सातवें भाव की वात करते हैं। सातवाँ भाव गृहस्थी का कारक है। वैवाहिक और दाम्पत्य सम्बन्ध इसमें समाहित होते है।
जातक जीविका उपार्जन करने के लिए किस प्रकार के धंधे करेगा? उसे कितनी आय की प्राप्ति होगी? जीवन निर्वाह आसान होगा या कठिन? गृहस्थ जीवन सुखमय होगा या दुःख भरा? पति पत्नी, जातक के माता पिता, भाई बहन, बाल बच्चे की क्या स्थति होगी? इन बातों का विचार सातवें भाव से किया जाता है। लाल किताब में सातवें भाव को 'गृहस्थी की चक्की ' कहा है – आकाश जमीन दो पत्थर सातवें रिज्क अकल की चक्की हो"भाव सात अगर देखें काल पुरुष की कुंडली में शुक्र की तुला राशि है इस राशि का महत्व जीवन साथी साझेदार जीवन मे लडी जाने वाली जंग तथा सेवा आदि से प्राप्त आय सेवा के प्रति समाप्त करने वाले कारण सन्तान की हिम्मत और सन्तान कैसी है किस प्रकार के आचार विचार उसके अन्दर है वह अपने को समाज मे किस प्रकार के क्षेत्र से जुडकर अपने को संसार मे दिखायेगी माता के घर और माता की मानसिक स्थिति को पिता के कार्य को और कार्यों से जुडे धन आदि की समीक्षा करने के लिये अपनी क्रिया को करेगी. राहु को वैसे छाया ग्रह कहा जाता है,इसके साथ ही राहु के बारे मे कहा जाता है कि ऐसा कोई भी कारक नही है जो आसमान से नही जुडा है चाहे वह अच्छा हो या बुरा सभी की शक्ति को समेटने के लिये राहु का प्रभाव बहुत ही बडे रूप मे या आंशिक रूप से समझना जानना जरूरी है। तुला राशि का राहु मानसिक रूप से अपने को हमेशा उपरोक्त कारणो से जोड कर रखता है और इस राहु का प्रभाव घर के सदस्यों में अच्छे और बुरे रूप से भी देखा जाता है। जिस दिन इस राहु के साथ जन्म होता है उसके अठारह महिने पहले से ही घर के बुजुर्ग सदस्यों पर असर को देखा जाने लगता है। राहु का प्रभाव पिता के बडे भाई पर पहले पडता है इसके बाद यह प्रभाव बडे भाई या बहिन पर पडता है फ़िर इसका प्रभाव छोटे भाई बहिन पर भी पडता है । इसके साथ ही जातक की आमदनी के क्षेत्र पर जातक एके भेषभूषा पर भी पर इसका असर पडता है इस राहु के कारण पैदा होने वाले जातक अक्सर सबसे पहले बायें हाथ से लिखने पढने वाले या इस हाथ से काम करने के लिये पहले ही अपने को उद्धत करते है अक्सर यह भी देखा जाता है कि इस राशि मे राहु वाले व्यक्ति अपने को जीवन साथी के भरोसे ही रखते है उनके लिये कोई भी काम करना मुश्किल होता है जबतक कि वे अपनी भावना को आशंका को अपने जीवन साथी से न बता दें,यह भी देखा गया है कि इस राशि का राहु पति पत्नी के बीच मे एक प्रकार का आशंकाओं का जाल भी बुन देता है और दोनो के बीच मे वाकयुद्ध कारण अक्सर घर का माहौल तनाव वाला बन जाता है और कुछ समय के लिये ऐसा लगता है कि पति पत्नी मे एक ही रहेगा। इस भाव के राहु वाला व्यक्ति पैदा होने के बाद एक प्रकार से आवारगी का जीवन बिताने के लिये भी माना जाता है वह कहां जा रहा है किसके लिये जा रहा है,उसे खुद पता नही होता है। इसके अलावा भी कई शास्त्रो ने अपने अपने अनुसार कथन किये है जो आज के युग मे कम ही फ़लीभूत होते देखे गये है।कहा जाता है कि सप्तम का राहु व्यक्ति के अन्दर अधिक कामुकता को देता है और कामुकता के कारण व्यक्ति का सम्बन्ध कई व्यक्तियों से होता है। यह बात मेरे अनुसार तभी मानी जाती है जब राहु शुक्र या गुरु पर अपना असर दे रहा हो तो शुक्र पर असर होने के कारण पति के प्रति कई स्त्रियों से सम्बन्ध बनाने के लिये और पत्नी पर अपने को सजाने संवारने के प्रति अधिक देखा जाता है जब यह जीवन की जद्दोजहद मे आजाता है तो व्यक्ति एक से अधिक कार्य करने साझेदारी और इसी प्रकार के कामो से अपने को आगे बढाने के लिये भी देखा जाता है। राहु शुक्र के घर मे होने से और व्यवसाय के प्रति अपनी सोच रखने के कारण व्यक्ति को हर मामले मे बडी सोच देकर व्यवसाय के लिये अपनी समझ को देता है। अक्सर इस असर के कारण ही कई लोग तो आसमान की ऊंचाइयों मे चले जाते है और कई लोग अपने पूर्वजो के धन को भी अपनी समझ से बरबाद करने के बाद शराब आदि के आदी होकर अपने जीवन को तबाह कर लेते है। जिन लोगो ने विक्रम बेताल की कथा को पढा होगा उन्हे इस राहु का पूरा असर समझ मे आ गया होगा,यह राहु एक भूत की तरह से व्यक्ति के ऊपर सवार होता है और अपनी क्रिया से जीवन की वह बाते सामने ला देता है जिन्हे हर कोई अपनी बुद्धि से सामने नही ला सकता है जैसे ही व्यक्ति अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है यह राहु का नशा अपने आप ही पता नही कहां चला जाता है। इस राहु का नशा एक प्रकार से या तो बहुत ही भयंकर हो जाता है और उतारने के लिये व्यक्ति पुलिस स्टेशन लाया जाता है,या इस राहु के नशे को उतारने के लिये अस्पताल काम मे आते है या इस राहु का नशा उतारने के लिये धर्म स्थान अपना काम करते है इसके अलावा इसका नशा तब और भी खतरनाक उतरता है जब व्यक्ति अपनी धुन मे चलने के कारण सडक या किसी अन्य प्रकार के कारण से दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है।
आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शुक्रवार, 6 सितंबर 2019
गुरुवार, 5 सितंबर 2019
राहु की दशाभाग 2
http://acharyarajesh.in/2019/09/05/%e0%a4%?राहु की दशाभाग 2
मित्रों पहले हमने राहु पर लिखा था आज उससे आगे,
राहु को विराट रूप मे जाना जाता है और जितने भी ग्रह है सबकी शक्ति को अपने अन्दर सोख लेने की ताकत केवल राहु में है.राहु को समझना भी भारी हैराहु अपनी चलाने के चक्कर में ग्रह और भावों को गलत बताकर भय देने के बाद पूंछने वाले से धन या औकात को छीनने का कार्य करता है.
राहु को विराट रूप मे जाना जाता है और जितने भी ग्रह है सबकी शक्ति को अपने अन्दर सोख लेने की ताकत केवल राहु में है.राहु को समझना भी भारी हैराहु अपनी चलाने के चक्कर में ग्रह और भावों को गलत बताकर भय देने के बाद पूंछने वाले से धन या औकात को छीनने का कार्य करता है.
वैसे राहु की देवी सरस्वती है और अपने समय पर व्यक्ति को सत्यता भी देती है लेकिन सरस्वती और लक्ष्मी में बैर है,जहां सरस्वती होती है वहां लक्ष्मी नही और जहां लक्ष्मी होती है वहां सरस्वती नही.जो लोग दोनो को इकट्ठा करने के चक्कर में होते है वे या तो कुछ समय तक अपने झूठ को चलाकर चुप हो जाते है या फ़िर सरस्वती खुद उन्हे शरीर धन और समाज से दूर कर देती है,अथवा किसी लक्ष्मी के कारण से उन्हे खुद राहु के साये में जैसे जेल या बन्दी गृह में अपना जीवन निकालना पडता है.
राहु अलग अलग भावों में अपनी अलग अलग शक्ति देता है,अलग अलग राशि से अपना अलग अलग प्रभाव देता है,तुला राशि के दूसरे भाव में अगर राहु विद्यमान है तो इस राशि वाला जातक विष जैसी वस्तुओं को आराम से सेवन कर सकता है,और मृत्यु भी इसी प्रकार के कारकों से होती है,उसके बोलने पर गालियों का समिश्रण होता है,मतलब जो भी बात करता है वह बिच्छू के जहर जैसी लगती है,अगर गुरु या कोई सौम्य ग्रह सहायता में नही है तो अक्सर इस प्रकार के लोग शमशान के कारकों के लिये मशहूर हो जाते है, राहु चौथे भाव में स्वभाव से क्रूर कम बोलने वाला असंतोषी और माता को कष्ट देने वाला होता है। शक की बीमारी को देता है रहने वाले स्थान को सुनसान रखने के लिये माना जाता है,मन के अन्दर आशंकाये हमेशा अपने प्रभाव को बनाये रखती है,यहां तक कि रोजाना के किये जाने वाले कामों के अन्दर भी शंका होती है,जो भी काम किया जाता है उसके अन्दर अपमान मृत्यु और जान जोखिम का असर रहता है,बडे भाई और मित्र के साथ कब अपघात कर दे कोई पता नही होता है,जो भी लाभ के साधन होते है उनके लिये हमेशा शंका वाली बातें ही होती है,माता के लिये अपमान और जोखिम देने वाला घर में रहते हुये अपने प्रयासों से कोई न कोई आशंका को देते रहना उसका काम हो जाता है,लेकिन बाहर रहकर अपने को अपने अनुसार किये जाने वाले कामों में वह सुरक्षित रखता है पिता के लिये कलंक देने वाला होता है.
पंचम भाव का राहु मित्रों राहु का सम्बन्ध दूसरे और पांचवें स्थान पर होने पर जातक को सट्टा लाटरी और शेयर बाजार से धन कमाने का बहुत शौक होता है,राहु के साथ बुध हो तो वह सट्टा लाटरी कमेटी जुआ शेयर आदि की तरफ़ बहुत ही लगाव रखता है,अधिकतर मामलों में देखा गया है कि इस प्रकार का जातक निफ़्टी और आई.टी. वाले शेयर की तरफ़ अपना झुकाव रखता है। अगर इसी बीच में जातक का गोचर से बुध अस्त हो जाये तो वह उपरोक्त कारणों से लुट कर सडक पर आजाता है,और इसी कारण से जातक को दरिद्रता का जीवन जीना पडता है,उसके जितने भी सम्बन्धी होते है,वे भी उससे परेशान हो जाते है,और वह अगर किसी प्रकार से घर में प्रवेश करने की कोशिश करता है,तो वे आशंकाओं से घिर जाते है। कुन्डली में राहु का चन्द्र शुक्र का योग अगर चौथे भाव में होता है तो जातक की माता को भी पता नही होता है कि वह औलाद किसकी है,पूरा जीवन माता को चैन नही होता है,और अपने तीखे स्वभाव के कारण वह अपनी पुत्र वधू और दामाद को कष्ट देने में ही अपना सब कुछ समझती है। पंचम भाव में राहु संतान और बुद्धि को बरबार रखता है,जल्दी से जल्दी हर काम को करने के चक्कर में वह अपनी विद्या को बीच में तोड लेता है,नकल करने की आदत या चोरी से विद्या वाली बातों को प्रयोग करने के कारण वह बुद्धि का विकास नही कर पाता है,जब भी कभी विद्या वाली बात को प्रकट करने का अवसर आता है कोई न कोई बहाना बनाकर अपने को बचाने का प्रयास करता है पत्नी या जीवन साथी के प्रति वह प्रेम प्रदर्शित नही कर पाता है और आत्मीय भाव नही होने से संतान के उत्पन्न होने में बाधा होती है.
छठा राहु बुद्धि के अन्दर भ्रम देता है,लेकिन उसके मित्रों या बडे भाई बहिनो के प्रयास से उसे मुशीबतों से बचा लिया जाता है,अपमान लेने में उसे कोई परहेज नही होता है,कोई भी रिस्क को ले सकता है,किसी भी कुये खाई पहाड से कूदने में उसे कोई डर नही लगता है,वह किसी भी कार्य को करने के लिये भूत की तरह से काम कर सकता है और किसी भी धन को बडे आराम से अपने कब्जे में कर सकता है,गूढ ज्ञान के लिये वह अपने को आगे रखता है,बाहरी लोगों से और पराशक्तियों के प्रति उसे विश्वास होता है,अपने खुद के परिवार के लिये आफ़तें और शंकाये पैदा करता रहता है.
राहु को दवाइयों के रूप में भी माना जाता है,जो दवाइयां शरीर में एल्कोहल की मात्रा को बनाती है और जो दवाइयां दर्द आदि से छुटकारा देती है वे राहु की श्रेणी में आती है.
राहु की आशंका कभी कभी बहुत बडा कार्य कर जाती है जैसे कि अपना प्रभाव फ़ैलाने के लिये कोई झूठी अफ़वाह फ़ैला कर अपना काम बना ले जाना.
धर्म स्थान पर राहु का रूप साफ़ सफ़ाई करने वाले व्यक्ति के रूप में होता है,धन के स्थान में राहु का रूप आई टी फ़ील्ड की सेवाओं के रूप में माना जाता है,जहां असीमित मात्रा की गणना होती है वहां राहु का निवास होता है. आगे लिखा जा रहा है।,,,,,,,,,,,
राहु की दशा
राहु एक छाया ग्रह है,इसकी परिमाप नही है। आसमान की ऊंचाइयां है,केवल नीले रंग में आभासित होता है लेकिन इसका कोई ठिकाना नही है कि यह है कहां तक है शाम और सुबह का इसका समय है,शाम को इसका समय नकारात्मक होता है और सुबह का समय इसका सकरात्मक होता है। ब्रह्म में इसे विराट रूप मिला है,महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने विराट रूप को प्रदर्शित किया था। वैसे राहु के बारे में बहुत सी मिथिहासिक कहानिया मिलती है,एक कहानी समुद्र मंथन के समय की मिलती है कि देवताओं और दैत्यों ने अमृत प्राप्त करने के लिये समुद्र मंथन किया था,देवताओं के बीच में बैठ कर राहु ने चालाकी से अमृत का पान कर लिया कर लिया था लेकिन सूर्य और चन्द्र ने उसकी चालाकी को देखकर भगवान विष्णु से शिकायत कर दी थी,उन्होने अपने सुदर्शन चक्र से इसके सिर को धड से अलग कर दिया था,लेकिन अमृत गले से नीचे उतरने के कारण धड और सिर अमर हो गये थे,धड को केतु और सिर को राहु नाम से जाना जाता है,तब से सूर्य और चन्द्र के साथ राहु केतु की दुश्मनी मानी जाती है,और समय समय पर यह दोनो सूर्य और चन्द्र को ग्रहण दिया करते है। इसके साथ ही राहु का प्रभाव माता पिता और बच्चे पर अधिक पडता है। राहु के लिये कहा जाता है कि वह आकाशीय पिंड नही है,केवल चन्द्रमा का उत्तरी कटाव बिन्दु है,जिसे पश्चिमी लोग North Node के नाम से जानते है। भारतीय ज्योतिष में राहु और केतु को अन्य ग्रहों के समान महत्व दिया है,पाराशर ने राहो तमो अर्थात अंधकार युक्त ग्रह की परिभाषा दी है,उनके अनुसार धूम्रवर्णी जैसा नीलवर्णी राहु वनचर भयंकर वात प्रकृति प्रधान तथा बुद्धिमान होता है,नीलकंठ ने राहु का स्वरूप शनि जैसा बताया है। शनि जडता देता है,राहु नशा देता है,और केतु नकारात्मक प्रभाव देता है,बिना राहु के केतु पूर्ण नही है और बिना केतु के राहु भी पूर्ण नही है। राहु केतु के लिये कोई राशि नही बताई गयी है केवल नक्षत्रों का आधिपत्य दिया गया है। नारायण भट्ट ने कन्या राशि को राहु के लिये बताया है,उनके अनुसार राहु मिथुन रासि में उच्च का और धनु राशि में नीच का होता है। राहु के नक्षत्रों में आर्द्रा स्वाति और शभिषा हैं। राहु का वर्ण नीलमेघ के समान है,यह सूर्य से १९००० योजन नीचे है,तथा सूर्य के चारों ओर नक्षत्र की भांति घूमता रहता है,शरीर में इसे पेट और पिंडलियों में इसे स्थान मिला है,जब जातक विपरीत कर्म करने लगता है,जो राहु उसे सुधारने के लिये अनिद्रा पेट के रोग दिमागी रोग पागलपन आदि भयंकर रोग देता है,जिस प्रकार से अपने निदनीय कर्मों से दूसरे को पीडा जातक पहुचाता है,उसी प्रकार से राहु जातक को दुख देने के लिये अपने रोग प्रदान करता है। अगर जातक के कर्म शुभ होते है तो यह पलक झपकते ही ऊचाइयों तक पहुंचा देता है,अतुलित धन सम्पत्ति और राजकाज देने में इसे देर नही लगती है,इसलिये अगर जीवन के अन्दर कोई गलत काम हो गये हों तो राहु की दशा शुरु होने से पहले ही राहु की शरण में चले जाना चाहिये। राहु की पूजा पाठ जप दान आदि द्वारा यह प्रसन्न होता है,गोमेद इसकी इसकी मणि है,तथा पूर्णिमा इसका दिन है,अभ्रम इसकी धातु है।कुंडली के बारह भावों में राहु का स्थान
पहले भाव मे राहु शत्रुनाशक होता है लेकिन जातक को अकेला बैठा रहने और काम के अन्दर मन नही लगने की बात भी देता है,सिर के अन्दर अनगिनत विचार आते और जाते रहते है,जब भी जातक को कोई कष्ट या चिन्ता होती है तो वह फ़ौरन घबडा जाता है,राहु के सिर पर होने के कारण उसे घर के अन्दर अपने जीवन साथी के द्वारा किये गये कृत्य समझ में नही आते है,वह दिमागी हलचल के बीच घर की स्थिति को समझ नही पाता है और अपने अनुसार कार्य करने के उपरान्त उसके जीवन साथी के द्वारा पिता और माता का अपमान किया जाता है जातक का पूजा पाठ में मन नही लगता है और किसी न किसी प्रकार के नशे का वह आदी हो जाता है। अक्सर वह सिर दर्द का मरीज होता है और आंखों की रोशनी भी उसकी समय से पहले ही कम हो जाती है,उसे प्रेम प्यार के मामले में एक प्रकार का नशा चढता है,वह जल्दी से धन कमाने वाले मामलों में अपने को जब भी ले जाता है तो उसके शरीर में एक विचित्र सी हलचल हुआ करती है। अक्सर उसकी संतान कम ही होती है और अगर अधिक होती है तो कम से कम एक संतान उसकी अवैद्य जरूर होती है चाहे वह किसी प्रकार से किसी की संतान को पालने के रूप में हो या सहायता करने के रूप में हो। जातक दिमाग का रोगी अवश्य होता है कब क्या करेगा किसी को पता नही होता है घर में या बाहर जब भी उसे कोई क्लेश होता है तो सिर को पटकने की आदत बन जाती है,उसका जीवन साथी उसकी इस प्रकार की दशा से लाभ उठाता है और अपनी चालाकी से जातक को अपने कामो से अन्धेरे में रखता है। लगन का राहु व्यक्ति को स्वार्थी बना देता है और अपना काम बनता भाड में जाये जनता के जैसी आदत का बन जाता है जब तक खुद का स्वार्थ पूरा नही होता है तब तक को पैरो में पडे रहने की आदत होती है लेकिन जैसे ही अपना काम पूरा हुआ लगन के राहु वाले का पता नही चलता है कि वह कहां गया। अक्सर इस प्रकार के राहु वाले की सिफ़्त नौकर की होती है वह या तो नौकर बन कर रहता है या नौकरी वाले काम करने के बाद अपने जीवन को पालने के काम करता है लगन का राहु वाला व्यक्ति झूठ बोलने वाला भी होता है और कपट आदि उसके अन्दर भरे होते है किसी भी काम को निकालने के लिये वह अपने को किसी भी रूप में सामने कर सकता है और भेद लेने के बाद खुद तो बाहर होजाता है और दूसरे को फ़ंसाकर चला जाता है।दूसरे भाव में विराजमान राहु अपने ही कुटुम्ब का नाशक होता है धन के मामले में जातक को दिखाई तो बहुत देता है लेकिन सामने कुछ नही होता है उसके अन्दर शराब आदि नशे करने की आदत होती है और अपने को बहुत ही बलवान समझने के कारण अक्सर भले स्थानों में उसकी बे इज्जती होती है। धन भाव में होने के कारण पिता के परिवार को जल्द से जल्द समाप्त करने वाला होता है,और माता के लिये अक्सर जान का दुश्मन ही बना रहता है,घर के पानी वाले साधनों में भी राहु अपना असर देता है और किसी प्रकार के कैमिकल इफ़ेक्ट से घर के पानी को दूषित करता है,वाहन के लिये भी यह राहु खतरनाक ही होता है,अक्सर इस भाव का जातक नशे में गाडी चलाने का आदी होता है,और नशे में गाडी चलाने के कारण या तो अपने शरीर को तोडता है अथवा किसी अन्य को अपने नशे की आदतों के कारण जान से हाथ तक धोना पडता है,इस स्थान के राहु वाले से अपने स्वसुर से कभी नही बनती है,और बनती भी है तो केवल स्वार्थ की पूर्ति के लिये ही बनती है,जीवन साथी का कोई ठिकाना नही होता है कब दुनियां से कूच कर जाये या अपने मायके जाकर बैठ जाये,इसके अलावा अगर वह पुरुष जातक है तो उसका भी ठिकाना नही होता है कि कब और कहां वह अपने शरीर को नष्ट कर लेगा या किसी अन्य बेकार की स्त्री के साथ अपना सम्बन्ध बनाकर बैठ जायेगा। दूसरे भाव के जातक झूठ बोलने में बहुत ही माहिर होते है उनकी बातों में लगभग झूठ ही मिलती है,वे अपने अपमान जानजोखिम के कामो को और खोजबीन करने वाले कामों कभी भी किसी प्रकार की भी झूठ बोल सकते है,अधिक चालाकी और ठगी करने की आदत होती है,तथा अगर वह मोबाइल आदि अधिक प्रयोग करता है तो उसके मोबाइल अधिकतर खोते ही रहते है,वह किसी भी कमन्यूकेशन के काम को पलक झपकते ही बरबाद कर सकता है,अथवा वह अपने साले भान्जे या मामा के घर के लिये आफ़त भी बन सकता है,जो भी इस प्रकार के जातक से चलकर दुश्मनी लेता है इस भाव के राहु वाला जातक उसे किसी न किसी बहाने ठिकाने लगा ही देता है।
तीसरे भाव के राहु वाला जातक विवेक से काम लेने वाला होता है किसी भी कार्य को वह अपने हठ से पूरा करने की क्षमता रखता है उसे गाने बजाने और संगीत के साधन रखने का बडा शौक होता है अक्सर उसे टीवी या फ़िल्म देखने का बडा शौक होता है उसे परफ़्यूम लगाने का और घर के अन्दर खुशबू रखने का भी शौक होता है,जहरीली दवाइयों को हजम करने की भी आदत होती है,अधिक मिर्च मसाले खाना नानवेज की तरफ़ मन का जाना आदि मिलता है,अक्सर उससे मिलने वाले लोग कम्पयूटर या इसी प्रकार की शिक्षा वाले लोग होते है जो लोग फ़िल्म लाइन में अपना कैरियर संगीन सीन के अन्दर बनाते है वे राहु के तीसरे भाव के कारण ही ऐसा कर पाते है,उनके अन्दर जोखिम लेने की बडी आदत होती है,और उनका मिलान भी इसी प्रकार के लोगों से होता है घर की या बाहर की एन्टिक चीजें बेचने और उन्हे कलेक्ट करने की भी आदत होती है,जब भी कोई चान्स मिलता है तो दोस्ती के अन्दर वे अपने को प्रभावित करने मे नही चूकते हैं। उनका काम दवाइयो का या नशे वाले प्रोडक्ट का अथवा मल्टी मार्केटिंग का होता है,अक्सर इस भाव के राहु का प्रभाव शिक्षात्मक रूप में अधिक होता है,जातक लोगों को सिखाने का काम आसानी से कर सकता है।
आगे लिखा जा रहा है................
शुक्रवार, 30 अगस्त 2019
छठे भाव में चंद्रमा
मित्रों छटा भाव हमारे अंदरुनी मन के साथ साथ बाहरी शरीर के साथ भी सम्बन्ध रखता है। ये हमारे मानशिक संताप, दुश्मनी, बीमारी, ननिहाल परिवार, मुकदमे, नोकरी, रैखेल, बहुत बाधा, पेट ,पाचन शक्ति, कर्जे आदि का कारक माना जाता है ।इस भाव मे कोई ग्रह न होना शारीरिक और मानशिक रुप से जातक के लिय अच्छा माना जाता है इस भाव के फल बहुत तेज़ प्रभाव के साथ घटित होते है ।
अब बात करते है चंद्र देव की
मित्रों चन्द्र जो की ज्योतिष में मानशिक शांति ,माता आदि का कारक माना जाता है वो इस भाव में आकर काफी हद तक कमजोर हो जाता है और उसके शुभ फल जातक को नही मिल पाते हैलाल किताब में इस भाव के चन्द्र को धोखे की माता या खारा कडवा पानी कहकर सम्बोधित किया गया है |
बीमारियों के पहलू से चन्द्र देव खून की रफ़्तार को तेज़ कर देने के कारक है यानी हाई ब्लड प्रेसर । यदि अशुभ चन्द्र इस घर मे हो और उस से मंगल की दृष्टी और अशुभ कर रही हो। चन्द्र अशुभ तब ही जाता है या तो वो विरश्चिक राशि मे हो या शनि राहु केतु का उस से सम्बन्ध हो जाये या चन्द्र पक्ष मे छिण् हो।
चन्द्र इस भाव मे नानि का कारक होता है और जातक मे सेवा भाव भी उतपन करता है इसिलिय इस भाव का चन्द्र डॉक्टर नर्स आदि की कुंडली में शुभ फल देने वाला होता है ऐसे डॉक्टर का एक ही मकसद होता है की किसी भी तरह से उसका मरीज ठीक हो । ऐसा जातक एक बुजुर्ग औरत की तरह दूसरों की सेवा करता है लेकिन तब तक जब तक की जातक छोटे दर्जे का हो जैसे जैसे उसका रुतबा बढ़ता है सेवा भाव समाप्त होता जाता है।यह भाव बुध और केतु से प्रभावित होता है। इस घर में स्थित चंद्रमा दूसरे, आठवे, बारहवें और चौथे घरों में बैठे ग्रहों से प्रभावित होता है। ऐसा जातक बाधाओं के साथ शिक्षा प्राप्त करता है और अपनी शैक्षिक उपलब्धियों का लाभ उठाने के लिए उसे बहुत संघर्ष करना पडता है। यदि चंद्रमा छठवें, दूसरे, चौथे, आठवें और बारहवें घर में होता है तो यह शुभ भी होता है ऐसा जातक किसी मरते हुए के मुंह में पानी की कुछ बूंदें डालकर उसे जीवित करने का काम करता है। यदि छठवें भाव में स्थित चंद्रमा अशुभ है और बुध दूसरे या बारहवें भाव में स्थित है तो जातक में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति पाई जाएगी। ठीक इसी तरह यदि चन्द्रमा अशुभ है और सूर्य बारहवें घर में है तो जातक या उसकी पत्नी या दोनो ही आंख के रोग या परेशानियों से ग्रस्त हों जाना छठे भाव में अशुभचंद्रमा होने से आपको जीवन में सदा प्यार की कमी महसूस हो सकती है अथवा आपको जीवन में एक बार प्यार में धोखा मिल सकता है. ऎसा भी हो सकता है कि आप किसी को चाहते हो और कभी उसे कहने की हिम्मत ना करने से आप उसे पा ना सके हो और यही आपके मन का मलाल हो सकता है.
आप सदा किसी ना किसी बात को लेकर तनाव और मानसिक परेशानियो से घिरे रह सकते है क्योकि छठे भाव में चंद्र की स्थिति से आपका मन कमजोर हो जाता है और जब मन ही कमजोर हो गया तब आप छोटी से छोटी बात पर अधिक परेशान हो जाते हैं. मन व्याकुल रहता है.षष्ठ भाव में स्थित चन्द्रमा वाले व्यक्ति सेवक के रूप में कार्य करते हैं। यहाँ स्थित चन्द्रमा बहुत अच्छा फल नहीं दे पाता है इसका मुख्य कारण है की षष्ठ भाव रोग, ऋण,रिपु, लड़ाई-झगड़ा इत्यादि का भाव है। माता के साथ इनका संबंध सामान्य रहता है यदि माता रोग दुख या किसी अन्य कारण से परेशान हैं तो छठे भाव में स्थित चन्द्रमा वाला व्यक्ति इससे बहुत ही दुखी होता है और यथा शीघ्र अपनी माता की परेशानियों को दूर करने का प्रयास भी करता है।
छठा भाव नौकरी का भी होता है और प्रतिस्पर्धा का भी होता है. इस भाव में पाप ग्रह का होना अच्छा माना गया है ताकि व्यक्ति अपने हर तरह के विरोधियो पर काबू पा सके. चंद्रमा के इस भाव में होने से आपके कार्य क्षेत्र पर आपके सहयोगी आपका इस्तेमाल कर करते हैं और आप उनका विरोध भी नहीं कर पाते छठे भाव का चन्द्रमा भी प्लान बनाकर काम करने के लिये अपनी गति को देता है लेकिन सौ मे से एक भी प्लान सफ़ल कभी नही होता है केवल रास्ता चलते जो काम होने वाले होते है वह हो जाते है और जो काम प्लान बनाकर किया जाता है वह नही होता है। सोचा था कि अमुक काम को अमुक समय पर कर लिया जायेगा और अमुक समय पर काम करने के बाद अमुक मात्रा मे धन आयेगा और अमुक मात्रा मे खर्च करने के बाद अमुक सामान की प्राप्ति हो जायेगी और उस सामान से अमुक प्रकार का कष्ट समाप्त हो जायेगा,पता लगा कि वह काम नही हुआ और बीच की सभी कडियां पता नही कहां चली गयी।छठे भाव का चन्द्रमा मौसी और चाची का कारक होता है,अगर इनके प्रति सेवा भाव रखा जाये तथा खुद की माता की बीमारियों और रोजाना के कामो के बारे मे सहायता की जाये तो यह चन्द्रमा अच्छे फ़ल देने लगता है,इस चन्द्रमा को सफ़ेद खरगोश की उपाधि भी दी जाती है जो लोग खरगोश को पालने और उन्हे दाना पानी देने का काम करते है उनके लिये भी चन्द्रमा का सहयोग मिलता रहता है,छठे भाव का चन्द्रमा अपनी सप्तम द्रिष्टि से बारहवे भाव को देखता है बारहवा भाव नवे भाव का चौथा यानी भाग्य का घर होता है अगर धर्म स्थानो मे जाकर श्रद्धा से धार्मिक कार्य किये जाते रहे तो भी चन्द्रमा साथ देता है,नमी वाले स्थानो मे रहने से पानी के क्षेत्रो मे कार्य करने से यात्रा आदि के कार्यों मे कार्य करने से यह चन्द्रमा दिक्कत देने वाला बन जाता है.इस चन्द्रमा मे बुध का प्रभाव आने से माता को उनके मायके मे यानी ननिहाल मे सम्मान मिलता है अगर ननिहाल से बनाकर रखी जाये तो भी चन्द्रमा सहायक हो जाता है. छठे भाव से कोई बीमारी नही होने पर बीमारीका भ्रम होना ओर उसके लिए परेशान रहनावर्षफल के हिसाब से चन्द्र इसी भाव में आया हुआ हो | जातक चाहे तो किसी अस्पताल या समसान में पानी का प्रबंध कर सकता है | इस भाव के चन्द्र वाले जातक को रात्री में दूध भी नही पीना चाहिए ये उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता है | इस भाव के चन्द्र का सबसे उत्तम उपाय है की जातक किसी धर्मस्थान में जाकर अपना शीश नवाता रहे और समय समय पर सूर्य या मंगल या गुरु से सम्बन्धित चीजें धर्म स्थान में दान करता रहे ऐसे में उसे चन्द्र के इस भाव के अशुभ फलों से मुक्ति मिलती है |
लेकिन इस भाव के चन्द्र के फलित को जान्ने के लिय हमे ये देखना भी जरूरी होगा की दुसरे भाव में शुभ ग्रह है या पापी ग्रह है | यदि यहाँ शुभ ग्रह हुवे तो ऐसे में चन्द्र के अशुभ फल जातक को नही मिलेंगे और ये जातक के व्यवसाय अदि में जातक की सहायता करेगा | इसी प्रकार यदि चोथा भाव खाली हुआ तो जातक की मानशिक शांति पर इस भाव के चन्द्र के अशुभ फल नही पड़ेंगे इसके साथ ही जातक के ग्रहस्थी सुख , सुख की नींद के लिय बारवें भाव में सिथत ग्रह को देखना होगा यदि वहां शुभ ग्रह और चन्द्र के मित्र ग्रह हुवे तो फिर चन्द्र इन सुखों में विरधी करेगा | इस भाव में चन्द्र हो और अस्ठ्म भाव में सूर्य या मंगल या गुरु चन्द्र के मित्र ग्रह हो तो ये योग जातक की आयु को लंबा करने वाला सिद्ध होता है |
इसी प्रकार दो चार आठ और बारवें भाव में यदि चन्द्र के मित्र ग्रह ही आये तो ऐसा जातक मुर्दे में भी जान डाल सकने के योग्य बन जाता है यानी की हम कह सकते है की वो एक अच्छा डॉक्टर बन सकता है जो मरते हुवे को भी बचा ले साथ ही यदि बुद्ध दुसरे या बारवें भाव में हो तो फिर चन्द्र का अशुभ फल जातक को मिलता है | सूर्य के बारवें भाव में होने पर जातक की एक आँख की रौशनी कम हो सकती है या फिर उसकी माता को आँखों में रौशनी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है |
मित्रों ये केवल आंशिक विवेचना है पूर्ण फल पूरी कुंडली पर निर्भर करते है ये पहले भी क्रह चुका हूं आज इतना ही आचार्य राजेश
सोमवार, 26 अगस्त 2019
चंद्र बारहवें
मित्रों आज वात करते हैं चंद्र बारहवें की बारहवें घर में स्थित चंद्रमा जातक के मन में अप्रत्याशित मुसीबतों और खतरों को लेकर एक साधारण सा डर पैदा करता है। जिससे जातक की नींद और मानसिक शांति भंग होती है। यदि चौथे भाव में स्थित केतू कमजोर और पीडित हो तो जातक के पुत्र और मां पर प्रतिकूल असर पडता है।12वाँ भाव मोक्ष का भी है इसलिए चंद्रमा के इस भाव में होने से आपका झुकाव आध्यात्म की ओर हो सकता है.
आप अपने जन्म स्थान से दूर जाकर तरक्की कर सकते हैं अथवा विदेश भी जा सकते हैं.
इस भाव का चंद्रमा व्यक्ति को एक अच्छा लेखक बना सकता है क्योकि आप रचनात्मक व्यक्ति हैं.
इस भाव में चंद्रमा के होने से आपकी माता भी आध्यात्मिक विचारो वाली महिला हो सकती है.
इस भाव का चंद्रमा कमजोर तो होता है लेकिन छठे और आठवें भाव जितना नहीं.
इस भाव के चंद्रमा पर से जब भी राहु शनि अथवा अन्य पाप ग्रहों का गोचर होप्ता है तब मानसिक परेशानी अधिक होती है.
बारहवें भाव के चंद्रमा के बारे में बात करते हैं. यह भाव व्यय भाव भी कहलाता है. इस भाव में चंद्रमा होने से मन का व्यय होता है और चित्त अशांत रहता है.
12वाँ भाव मोक्ष का भी है इसलिए चंद्रमा के इस भाव में होने से आपका झुकाव आध्यात्म की ओर हो सकता है. आप किसी आश्रम के सदस्य बन सकते हैं.
यह भाव विदेश का भी है इसलिएा आप अपने जन्म स्थान से दूर जाकर तरक्की कर सकते हैं अथवा विदेश भी जा सकते हैं.
इस भाव का चंद्रमा व्यक्ति को एक अच्छा लेखक बना सकता है क्योकि आप रचनात्मक व्यक्ति हैं और आपका मन बहुत सी कल्पनाओ में खोया रहता है. एक लेखक के लिए अच्छी कल्पनाएँ करना बहुत जरुरी है तभी वह अच्छे और सुंदर लेख लिख सकता है.बारहवा चंद्रमा अक्सर दिमाग को पराशक्तियों की सोच मे ले जाता है आदमी का दिमाग इसी सोच मे रहता है कि आदमी मरने के बाद भी कही जिन्दा रहता है और रहता भी है तो वह क्या करता है यानी भूत प्रेत पर विश्वास करने वाला और इसी प्रकार की सोच के कारण वह आजीवन किसी न किसी प्रकार से ठगा जाता है,चाहे वह तांत्रिकों के द्वारा ठगा जाये या आश्रम बनाकर अपनी दुकानदारी चलाने वाले लोगों से ठगा जाये यह कारण अक्सर उन लोगो के साथ अवश्य देखा जाता है जिनके पास एक अजीब सोच जो उनके खुद के शरीर से सम्बन्ध रखती है देखी जा सकती है। लोग इस चन्द्र्मा से आहत होने के कारण बोलने मे चतुर होते है अपनी भावना को प्रदर्शित करने मे माहिर होते है उनकी भावना की सोच मे उस प्रकार के तत्व जान लेने की इच्छा होती है जो किसी अन्य की समझ से बाहर की बात हो। इस बात मे वे बहुत ही बुरी तरह से तब और ठगाये जाते है जब उन्हे यह सोच परेशान करती है कि योग और भोग मे क्या अन्तर होता है वे योग की तलास मे भटकते है और जहां भी बडा नाम देखा उनके सोच वही जाकर अटक जाती है लेकिन जब उनके सामने आता है कि रास्ता चलते मनचले और जेब कट की जो औकात होती है वही औकात उनके द्वारा सोचे गये और नाम के सहारे चलने वाले व्यक्ति के प्रति होती है तो वे अक्समात ही विद्रोह पर उतर आते है। और विद्रोह पर उतरने के बाद ऐसा भी अवसर आता है जब उन्हे इन बातो से इतनी नफ़रत पैदा हो जाती है कि वे किसी भी ऐसे स्थान को देखने के बाद खुले रूप मे गालिया दे या न दें लेकिन मन ही मन गालियां जरूर देते देखे गये पर अगर चन्द्रमा यहां अपने घर का हो या गुरु अथवा बुध की राशि में हो तो मनुष्य इन्द्रियजय, दान देने वाला स्मार्ट शरीर वाला और सभी प्रकार के सुख भोगने वाला होता है। यदि चन्द्रमा अशुभ अवस्था में हो तो नीच प्रवृत्ति वाले मनुष्यों के साथ रहने वाला होता है। अन्यत्र कहा गया है — द्र्व्यक्षयम् क्षुधाल्पत्वं नेत्ररूक्कलहोगृहे।।
अर्थात इस स्थान पर चन्द्रमा होने से धन का नाश होता है। इसे मंदाग्नि रहती है और भूख कम लगती है। घर में लड़ाई-झगड़ा होते रहता है। ऐसे जातक के आँखों में विकार होता है। आपका जुडाव किसी अस्पताल या धार्मिक संस्थान के साथ हो सकता है।ऐसे चंद्रमा वाला व्यक्ति अपने पिता के विषय में, उसकी धन- दौलत के बारे में या सामाजिक हैसियत के बारे में हमेशा कुछ न कुछ बातें करता रहता है।यह भी कहा गया है कि पिता से मिलने वाली धन-दौलत मिट्टी हो जाती है अर्थात् उसमें बरकत नहीं होती परन्तु अपनी कमाई से प्राप्त धन में बरकत होती है। यह भी कहा गया है कि यदि चन्द्रमा बारहवें घर में हो और आठवें घर में केतु हो तो जातक का पुत्र गृह छोड़कर चला जाता है।रहवें स्थान में चन्द्रमा(होने से आपकों आखों से सम्बंधित परेशानी हो सकती है। यदि मंगल का किसी तरह सम्बन्ध बनता है तो आखो में चोट लग सकता है और उसके कारण नेत्र दोष होगा। वही शनि के साथ योग बन रहा हो तो काला मोतियाबिंद या रतौधी जैसी बीमारी हो सकती है। यदि राहु से सम्बन्ध बनता है तो इन्फेक्शन के कारण नेत्र दोष होगा। इसके अलावा कफ से सम्बंधित परेशानियां भी हो सकती हैं।ऐसे व्यक्ति को कभी भी अपने घर के छत के नीचे कुआं या हैण्डपम्प नही लगवाना चाहिए। इसे लगाने से धन की हानि होती। दाम्पत्य सुख में भी समस्याएं आती है। अकारण क्लेश होते रहता है। इस समस्या से मुक्ति हेतु अपने घर के छत पर मिट्टी के मटके में बारिश का पानी भरकर रखें सभी समस्याएं अपने आप धीरे धीरे समाप्त हो जायेगी।
रविवार, 25 अगस्त 2019
आठवें भाव का चंद्र
आठवें भाव का चंद्र
लाल किताब में आठवां घर मृत्यु व बिमारी का घर कहा गया है. इस घर का स्वामी मंगल है और कारक ग्रह शनि है इसलिए इस घर को शनि-मंगल की सांझी गद्दी कहा जाता है. मंगल ही यहां वृश्चिक का भावेश भी होता है. यह भाव न्याय, बुद्धि तथा दया से हटकर बदले का सिद्धांत अपनाता है. इस भाव में क्षमा के लिए दया या विवेक से काम नहीं लिया जाता है. आठवें घर के कर्मों के फलों का निर्णय चंद्रमा द्वारा होता है. आठवां घर अपनी दृष्टि से दूसरे घर को देखता है. वहीं दूसरा घर छठे घर को और छठा घर बारहवें घर को देखने का काम करता है. इस प्रकार से आठवें घर का प्रभाव दूसरे घर से होते हुए छठे और बारहवें घर तक पहुंचता है.छठे या आठवें घर में कोई ग्रह पिड़ित हो तो अशुभ फल प्राप्त होते हैं. यह अशुभता 12वें घर को भी प्रभावित करती है. इसलिए 6, 9, 12 घर का विचार एक साथ करना चाहिए तभी बातों का सही अनुमान लगाया जा सकता है. आठवें घर से संबंधित बातों में चंद्रमा सबसे अधिक शक्तिशाली माना गया है. यह स्वग्रही व उच्च का होकर बारहवें घर के अशुभ प्रभावों को मिटा देता है. आठवें स्थान में बैठा ग्रह दूसरे और ग्यारहवें घर में बैठे ग्रहों का शत्रु हो तो वह जबरदस्त प्रभाव देता हैआठवे भाव का चन्द्रमा भी अपने गति को देने वाला है,कुये के पानी की तरह से अपना काम करता है काफ़ी मेहनत करने के बाद कोई काम किया जाता है और जब परिणाम सामने आता है तो खारे पानी के तरह से आता है। गूढ बातो को अपनाने मे मन लगना अक्सर इसी भाव के चन्द्रमा के द्वारा होता है,कोई भी गुप्त कार्य किया जाना इसी चन्द्रमा के कारण से ही होता है। यह चन्द्रमा अक्सर चोर की मां के रूप मे काम करता है यानी चोर की मां पहले तो अपने पुत्र को बल देती रहती है कि शाबाश वह जिसका भी सामान चुरा कर लाया वह ठीक है जब उसका पुत्र पकड लिया जाता है तो वह कोने मे सिर देकर रोने के लिये मजबूर हो जाती है वह खुले रूप मे किसी के सामने रो भी नही सकती है। व्यक्ति की मानसिकता उन कार्यों को करने के लिये होती है जो गुप्त रूप से किये जाते है वह काम अक्सर बेकार की सोच से पूर्ण ही होते है वे कभी किसी के लिये भलाई करने वाले नही होते है,हां धोखे से भलाई वाले बन जाये वह दूसरी बात है। सोच मे उन्ही लोगो से काम लिया जाता है जो या तो मरे है या मर चुके है यानी मरे लोगों की आत्मा से काम करवाना।अक्सर इस चन्द्रमा वाले लोग अपनी बातो को इस प्रकार से करते है कि वे किसी न किसी की नजर मे चढने के लिये मजबूर हो जाते है वे या तो दुश्मनी मे ऊपर हो जाते है या किसी के मन मे इस प्रकार से बस जाते है कि लोग उनसे सारे भेदो को जान लेने के लिये उनकी हर कीमत पर पहले तो सहायता करते है उन्हे मन से और वाणी से बहुत प्यार देने का दिखावा करते है जैसे ही उनकी सभी गति विधियों को प्राप्त कर लेते है वे अक्सर दूर हो जाते है और बदनाम भी करने लगते है।जब जब भीअष्टम चन्द्रमा से राहु अपनी युति मिलायेगा वह मानसिक तनाव अनजाने भय आदि के प्रति देगा,इसके उपाय के लिये अपने सामने लोगो से बात करने और परिवार से वैमनस्यता आदि को नही रखना चाहिये पराशक्तियों के प्रति खर्चा नही करना चाहिये ह्रदय सम्बन्धी बीमारी का ख्याल रखना चाहिये,गुप्त कार्य करना और सोचना तथा हमेशा यौन सम्बन्धो के प्रति ध्यान रखना भी स्वास्थ्य और जीवन के अमूल्य समय को बरबाद करना होता है,अक्सर कुये का पानी सोने वाले स्थान मे कांच की बोतल मे रखने से और विधवा माता जैसी स्त्रियों की सेवा करना फ़लदायी होता है.बड़े बुजुर्गों के चरण स्पर्श करना शुभता देने वाला होता है.
किसी ऎसे स्थान में न रहें जहां कुआं इत्यादि को बंद करवाकर घर बनाया गया हो मित्रोंप्रत्येक जन्मपत्री में दो लग्न बनाये जाते हैं। एक जन्म लग्न और दूसरा चन्द्र लग्न। जन्म लग्न को देह समझा जाए तो चन्द्र लग्न मन है। बिना मन के देह का कोई अस्तित्व नहीं होता और बिना देह के मन का कोई स्थान नहीं है। देह और मन हर प्राणी के लिए आवश्यक है इसीलिये लग्न और चन्द्र दोनों की स्थिति देखना ज्योतिष शास्त्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। सूर्य लग्न का अपना महत्व है। वह आत्मा की स्थिति को दर्शाता है। मन और देह दोनों का विनाश हो जाता है परन्तु आत्मा अमर है। आचार्य राजेश 7597718725/9414481324
शुक्रवार, 23 अगस्त 2019
गुरु शुक्र का परिवर्तन यानी परिवार से अदालत तक
गुरु शुक्र का परिवर्तन यानी परिवार से अदालत तक
गुरु तुला राशि का हो और शुक्र धनु राशि का हो तो गुरु और शुक्र का आपसी परिवर्तन योग माना जाता है। व्यक्ति के अन्दर एक प्रकार से सम्बन्धो को बेलेन्स करने के लिये अनौखी क्षमता का विकास होना शुरु हो जाता है और उन सम्बन्धो को आपसी सहमति से नही सुलझाया जा सकता है वह या तो बडे सामाजिक कारणो से सुलझाया जा सकता है या फ़िर सीधे अदलाती मामले से ही सुलझाया जा सकता है। इन दोनो ग्रहो पर जैसे ही राहु की छाया आती है वैसे ही सम्बन्धो मे किसी न किसी बात से उत्तेजना आनी शुरु हो जाती है और जीवन साथी आपस मे एक दूसरे को शक की नजर से देखना शुरु कर देते है,अक्समात ही एक दिन किसी कमन्यूकेशन या इसी प्रकार की बात पर दोनो मे कहा सुनी हो जाती है बात अगर समाज तक रहती है तो समाज सुलझा सकता है अगर बात अदालत मे चली जाती है तो फ़िर दोनो के अन्दर इस राहु की करामात से अदालती कामो मे अहम के कारण उलझना और वकीलो आदि के कानूनी दाव पेच मे वही कमाइया बरबाद करना जो जीवन को अच्छे क्षेत्र के लिये प्रयोग मे लायी जा सकती थी। यह जातक की कमी से नही माना जाता है और न ही किसी प्रकार की गलत शिक्षा या सामाजिक बदलाव के बारे मे जाना जाता है यह केवल जन्म समय के ग्रह और गोचर से उन पर गलत ग्रहो की मार के कारण ऐसा हो जाता है। तुला राशि भौतिकता की राशि है और व्यापार से सम्बन्ध रखती है। गुरु धर्म और पारिवारिक सम्बन्धो के साथ साथ एक दूसरे के प्रति आस्था रखने वाला ग्रह है। इस ग्रह का तुला राशि मे जाने का मतलब है कि जातक अपने सम्बन्ध को भी व्यापारिक नजर से देखना शुरु कर देता है कि कौन सा सम्बन्ध फ़ायदा देने वाला है और कौन सा सम्बन्ध नुकसान देने वाला है। अक्सर जीवन साथी को कमाई की नजर से देखने वाले लोग जीवन साथी के अन्दर अन्य लोगो से कम्पेयर करने वाले लोग जीवन साथी को दूसरे लोगो का आकार प्रकार बताकर प्रताणित करने वाले लोग इसी गुरु की श्रेणी मे आते है। यह गुरु अगर चौथे भाव मे होता है तो माता का स्वभाव व्यवसायिक हो जाता है और वह माता अपने ही घर मे अपने ही लोगो के साथ यह सोचना शुरु कर देती है कि अमुक सन्तान फ़ायदा देने वाली है और अमुक सन्तान नुकसान देने वाली है इस प्रकार से घर के अन्दर जो भावना चलती है वह भावना एक दूसरे के प्रति गलत हो जाती है घरो के अन्दर बंटवारा होना और घरो के अन्दर एक सदस्य को उत्तम देखना तथा एक सदस्य को नीचा देखना इसी प्रकार के घरो मे देखा जाता है। इसके साथ ही यह गुरु अगर तुला राशि का होकर लगन मे विराजमान हो जाता है तो जातक अपने शरीर और अपने नाम के अनुसार ही अपने को ही व्यापारिक भावना से देखना शुरु कर देता है साथ ही उससे यह भी कहते सुना जा सकता है कि उसके अमुक साथी अमुक कार्य मे आगे बढ गये है और वह अपने स्थान पर अपने को सही रास्ते पर नही ले जा पाआ है इसका एक कारण अक्सर भाग्य को भी कोशने के लिये माना जा सकता है। इस गुरु का प्रभाव तब और भी खराब हो जाता है अगर तुला राशि मे सूर्य भी गुरु के साथ हो और अपनी युति से उन लोगो का साथ मिल जाये जो हमेशा ही नीची राजनीति को बताकर घरो के अन्दर भेद भाव और राजनीति फ़ैलाकर सम्बन्धो को खराब भी कर देते है तथा विवाह आदि के प्रभाव को एक प्रकार की व्यवसायिक भावना से देखने लगते है।शुक्र जब धनु राशि का होकर अगर चन्द्र मंगल की नवम पंचम युति को ले लेता है तो भी जातक के लिये एक प्रकार से सम्बन्धो मे पारिवारिक और सामाजिक मर्यादा का खात्मा हो जाना माना जा सकता है। कारण चन्द्रमा अपनी युति से मंगल को उत्तेजना मे ले जाताहै और विचार हमेशा उत्तेजना से पूर्ण होते है जातक के अन्दर यही भावना रहती है कि इस प्रकार का रिस्ता करने के बाद उसे जीवन मे क्या मिला है अगर उसका रिस्ता अमुक के साथ हो जाता तो वह बहुत बडी हैसियत से या सुखो के अन्दर अपने को ले जा रही होती या ले जा रहा होता। उसके मित्र की पत्नी अधिक कमाने वाली है या उसकी सहेली का पति पैसा कमाने वाला है वह अपने अपने जीवन साथी को हमेशा ही कोशने के लिये अपने फ़ालतू समय मे लगा कर माना जा सकता है। शुक्र का धनु राशि मे होना मर्यादा मे भी और धर्म भी भौतिकता को देखना होता है और इस प्रकार से अगर स्त्री की कुंडली मे शुक्र धनु राशि का है तो जैसे ही राहु की छाया शुक्र पर आती है स्त्री को एक प्रकार से चमक दमक की तरफ़ जाना माना जा सकता है यह चमक दमक उसके परिवारिक जीवन मे एक प्रकार से आग लगा देती है यह बात अक्सर उन लोगो मे भी देखी जाती है जिनके पति या तो मारकेटिंग के कामो से जुडे होते है या दो भाई होकर अपने भाइयों के साथ रहने के लिये मजबूर होते है वे लोग जैसे ही इस प्रकार के कारण स्त्री के अन्दर देखते है पहले तो वे चुप रहते है लेकिन जैसे ही राहु का पूरा प्रकोप शुक्र के साथ होता है वह अपनी अपनी धारणा से उस स्त्री को प्रताणित करने लगते है या अपने उद्देश्य को बताकर किनारा करने की कोशिश करने लगते है। जव भी राहु का प्रकोप धनु राशि पर रहा है जिनकी कुंडली मे धनु राशि का शुक्र है और तुला राशि का गुरु है तथा वे विवाहित जीवन को बिता रहे होते है उनके लिये यह समय बहुत ही कठिन माना जा सकता है इस कारण से अक्सर विवाहित जीवन टूटते माने जा सकते है और स्त्री की कुंडली मे होने से स्त्री को अगर समझौता की नीति का पता है तो ठीक है अन्यथा उसे जीवन भर अन्य पुरुषों के साथ राहु की गति के अनुसार सम्बन्ध बनाना और अपने को जीवन भर एक के बाद दूसरे पुरुषों की शैया को सजाने का काम ही माना जा सकता है। कर्क राशि का राहु जब भी धनु राशि पर आता है तो जातक या जातिका को वैवाहिक जीवन को बरबाद करने के लिये देखा जा सकता है,एक हंसते खेलते परिवार मे अचानक सम्बन्धो के मामले मे विवाद पैदा हो जाते है और शादी सम्बन्ध गेंद की भांति उछाल दिये जाते है।
इन मामलो मे स्त्री को ही पुरुष के प्रति की गयी गल्तियों के लिये अपने को समर्पित करना ठीक माना जाता है,अन्यथा गुरु जो पुरुष का कारक है और स्त्री जो जीवन संगिनी की कारक है का अपने जीवन मे दूषित होना कोई नही रोक सकता है,कानून केवल कुछ समय के लिये राहत दे सकता है लेकिन परिवार समाज सन्तान तथा जीवन का ध्येय कुछ भी नही माना जा सकता है। मित्रों आप की कोई समस्या है और उपाय चाहते हैं तो आप अपनी कुंडली दिखाकर उपाय कर सकते हैं प्रत्येक कुंडली फीस 1100 केवल
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शनिवार, 17 अगस्त 2019
अंत जो गति सो मति
अंत जो गति सो मति
एक कहावत बहुत ही प्रसिद्द है जो आखिर में जो होना होता है वही बुद्धि बन जाती है.जातक का जन्म होता है उसकी बुद्धि के अनुसार उसका शरीर संसार बनने लगता है,लेकिन यह सब जीवन की आख़िरी सीढी पर जो कुछ जीवन में किया होता है उसके अनुसार प्रकट होने लगता है.जो शरीर की गति होनी होती वही बुद्धि शुरू से बन जाती है और अपने अपने समय पर अपने अपने कार्य करती रहती है.
एक जातिका जिसका जन्म तीस(30 )मार्च(3) उन्नीस सौ पचास(1950) में हुआ था की कुंडली के अनुसार मेष लगन है,चौथे भाव में चन्द्रमा है पंचम में वक्री शनि है,छठे भाव में वक्री मंगल है केतु भी विराजमान है,दसवे भाव में शुक्र विराजमान है ग्यारहवे भाव में गुरु विराजमान है,बारहवे भाव में सूर्य बुध और राहू विराजमान है.
इस कुंडली के अनुसार राहू ने अपना अधिकार जिन ग्रहों पर किया है वे है सूर्य राहू के साथ बारहवा है,बुध भी राहू के साथ बारहवा है राहू ने सूर्य और बुध की शक्ति को अपने अन्दर सोख लिया है,राहू की पंचम दृष्टि चौथे चन्द्रमा पर होने के कारण चन्द्रमा का बल भी राहू के पास है,छठे भाव में मंगल वक्री की शक्ति भी राहू ने अपने अन्दर सोख ली है और केतु ने भी मंगल को अपना असर देकर पूर्ण किया है,केतु ने अपना बल शुक्र को भी दिया है और शुक्र के बल को प्राप्त करने के बाद राहू की सहायता की है,राहू के दूसरे भाव का ग्रह राहू से लेता है और राहू से बारहवा ग्रह राहू को देता है वही प्रकार केतु के लिए देखा जाता है केतु से दूसरे भाव का ग्रह केतु से लेता है और केतु से बारहव ग्रह केतु को देता है.इस कुंडली में राहू से बारहवा ग्रह गुरु लाभ भाव में विराजमान है इसलिए राहू गुरु को अपनी शक्ति से प्राप्त किया गया प्रभाव गुरु को दे रहा है और केतु से बारहवा वक्री शनि केतु के प्रभाव में आने वाले सभी ग्रहों की शक्ति को ग्रहण कर रहा है,इस प्रकार से कुल फ़ायदा में रहने वाले ग्रह गुरु और केतु है.ग्यारहवा गुरु जातक के बड़े भाई के रूप में भी होता है और जातक के मित्रो की श्रेणी में भी आता है.पंचम शनि अगर मार्गी होता है तो मस्त मलंग संतान के रूप में माना जाता है और अगर वह वक्री होता है तो निश्चित रूप से पुत्र संतान के रूप में होता है और बुद्धिमान भी होता है.जातिका के लिए कार्यों से यह शनि बुद्धि वाले काम करने की औकात देता है जीवन के प्रति संतानके प्रति पति के प्रति लाभ वाले मामले के प्रति धन के प्रति कोइ भी दिक्कत नहीं हो पाती है,कुंडली में शुक्र का फल जो पति के रूप में है वह दोहरा मिलता है,इस दोहरे कारण के द्वारा अक्सर यह भी देखा जाता है की जातिका के कार्य या घर अथवा संपत्ति एक बार राहू केतु के कारणों से समाप्त हो गयी होती है,लेकिन राहू का असर बारहवे भाव में होने से और चन्द्रमा का राहू से ग्रसित होने के कारण मानसिक रूप से पुत्र के प्रति पुत्री के प्रति जो भी कार्य किये जाते है वे हमेशा दोहरे रूप में किये जाते है,और चिंता का कारण भी हमेशा जीवन के शुरुआत में पिता के प्रति शादी के बाद पुत्र के प्रति और पुत्री के प्रति माने जाते है.लेकिन केतु की सीमा जीवन के आधे भाग तक ही मानी जाती है अगर राहू बारहवा है या लगन में है या दूसरे भाव में है.जीवन का दूसरा भाग जो उम्र की पचासवी साल से ऊपर जाता है वह धीरे धीरे राहू की सीमा में प्रवेश करता जाता है,उस समय में जातक अपने को राहू की सीमा मेजाने के कारण एकांत में ले जाना शुरू कर देता है वह अपने हाथ पैरो के काम को करने के बजाय मानसिक रूप से चिंतित होकर एकांत में रहना शुरू कर देता है,वह अपने सभी क्रियाओं को बंद सा करने लगता है,घर में परिवार में समाज में कोइ अगर मानसिक रूप से लगाव को लगाना भी चाहता है तो जातक अपने स्वभाव के अनुसार उससे दूर रहने की कोशिश करता है अगर किसी प्रकार से जबरदस्ती की जाये तो वह झल्लाहट से जबाब देता है एक दूसरे के प्रति शंका करने के बाद या किसी प्रकार का आक्षेप विक्षेप करने के बाद अगर जीवन साथी है तो उससे अगर घर के अन्य लोग भी है तो उनसे अपनी वार्ता को झल्लाहट भरे कारणों से ही पूर्ण रखने की कोशिश करता है,इस प्रकार से जातक से लोग धीरे धीरे अलग होना शुरू कर देते है जो घर के नए सदस्य होते है वे अपने मानसिक रूप से दूरिया बना लेते है या किसी प्रकार की शब्दों की या कार्यों की अथवा व्यवहार के शत्रुता को दिमाग में पाल लेते है,अपने घर के सदस्य होने के कारण वे दिखावा तो यही करते है की जातक उनके लिए एक घर का सदस्य है लेकिन मानसिक रूप से जातक का कोइ भी किया गया कार्य उन्हें अखरने लगता है सभी कामो के अन्दर कोइ न कोइ दिक्कत देखी जा सकती है इस प्रकार से टोका टोकी का काम शुरू हो जाता है और इस प्रकार से जातक का अपने में ही सिमट कर रहना या किसी प्रकार से घर परिवार से दूरिया बनाना या एक दूसरे के प्रति आने जाने वालो से बुराइया करना ही माना जाता है.
इस राहू का एक प्रभाव और भी देखा जाता है की जातक की उम्र के साठवी साल के बाद में जातक की पुराणी यादे तो जीवित रहने लगती है लेकिन जो भी कार्य वर्त्तमान में किये जाते है उन्हें वह भूलने लगता है,वह पिछली बाते बड़े आराम से बताता है लेकिन कल उसके साथ क्या हुआ है उसे नहीं पता होता है वह यहाँ तक राहू के घेरे में आजाता है कि उससे अगर पूंछा जाए कि कल क्या खाया था वह एक दम से मना कर देगा कि उसे कल खाना मिला ही नहीं था,कई बार तो राहू का भ्रम इतना भी देखा गया है कि जातक अगर चारपाई पर लेता है और वह अपने शरीर की कल्पना को मन के अंदर राहू चन्द्र की ग्रहण वाली नीति से लाकर अनुमान लगाना शुरू कर देता है कि वह लैट्रिन के लिए गया है और वह लैट्रिन वाले स्थान में ही लैट्रिन कर रहा है लेकिन शरीर लैट्रिन तक गया ही नहीं होता है केवल वह मानसिक रूप से लैट्रिन में गया होता है पता चलता है कि जातक ने लैट्रिन बिस्तर पर ही कर ली है.अक्सर जन्म से जिसका चन्द्रमा राहू से जुडा होता है उनके साथ ही इस प्रकार की बाते देखने में आती है.कारण उनकी जिन्दगी में जद्दोजहद की पराकाष्ठा रही होती है घर के बारे में घर के सदस्यों के बारे में घर के बाहर के बारे में पति के बारे में या पत्नी के बारे में अह जीवन भर चिंता को लेकर चला होता है वह चिंता के रूप इस राहू के कारण अक्सर भ्रम में डालने के लिए माने जाते है और यह बात धीरे धीरे याददास्त को समाप्त करने के लिए भी मानी जाती है.
बारहवे राहू वाले व्यक्ति के लिए जीवन के दूसरे आयाम के लिए एक उपाय बहुत ही कारगर हुआ है कि जातक को लहसुन की मात्रा को बढ़ा दिया जाए,सर में कपूर को मिलाकर नारियल का तेल मालिस में प्रयोग किया जाए और पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने का उपाय किया जाता रहे,सर्दी गर्मी से बचाकर रखा जाए.
सोमवार, 12 अगस्त 2019
अष्टम राहु यानी इन्फ़ेक्सन
आपने माया कैलेंडर का नाम तो सुना ही होगा2012इस वारे News Chanels पर काफी वार इस पर चर्चा की गई और माया कलेन्डर को सन दो हजार बारह के आगे नही लिखा गया है ओर कहा कि सन दो हजार बारह के आखिर मे
संसार का विनाश हो जायेगा.उस वक्त मुझे विनाश मनुष्य का नही समझ में नहीं आया आज 2019 हैं और आज मनुष्यता का जरूर समझ मे आ रहा है.अगर देखा जाये तो
संसार का विनाश हो जायेगा.उस वक्त मुझे विनाश मनुष्य का नही समझ में नहीं आया आज 2019 हैं और आज मनुष्यता का जरूर समझ मे आ रहा है.अगर देखा जाये तो
संसार में जो मनुष्यता है वह रिस्तो पर निर्भर है,पिछले समय से राहु की गति के कारण लोग अपने अपने रिस्तो पर ही कनफ़्यूजन करने लगे है.राहु का वर्तमान का प्रभाव बहुत ही गहरा सदमा देने वाला माना जा सकता है.पहले जो भी लोग सामाजिक बन्धन मे बन्ध जाते थे उस बन्धन को आजीवन निभाने के लिये कृत्संकल्प हो जाते थे,सामाजिक वाणी उनके लिये एक प्रकार से अग्नि रेखा का के रूप मे मानी जाती थी लेकिन आज सामाजिक वाणी के साथ साथ सामाजिक मर्यादा का भी हनन हो चुका है.माता पिता बच्चे को पैदा करते है और उन्हे सीधा सा वही शिक्षा का क्षेत्र बताते है जहां से उसे बहुत ही अच्छी नौकरी या चालाकी के रास्ते बताये जाते हो.बच्चा जब शिक्षित हो जाता है तो वह अपनी माता पिता और परिवार की मर्यादा को भूल जाता है उसे लगता है कि यह सब बेकार है,वह जो कर रहा है वही सही है माता पिता जो कर रहे है वह बेकार की बात है. जब किसी प्रकार की चर्चा भी की जाये तो लोग कह देते है आधुनिक युग की बात है.जनरेशन गैप है इसे रोका नही जा सकता है.जब अधिक मर्यादा वाली बात को कर दिया जाये तो उसके लिये कई कारण भी सामने आजाते है,कभी कभी तो लोग अपने घरवार परिवार और समाज को यूं छोड कर चले जाते है जैसे वे इस समाज मे पैदा ही नही हुये हों वे कहीं बाहर से आये हों.
निम्न परिवारो की हालत यह है कि शाम को उनके घरो मे चूल्हा जले न जले लेकिन शराब का नशा जरूर करते हुये लोग मिलेंगे,उनके लिये अगर शराब का मिलना मुस्किल हो तो वे अन्य प्रकार के नशे करते मिलेंगे,जैसे खांसी की दवा का पीना कैमिकल भांग वाले स्मेक को लेना और इसी प्रकार के अन्य नशे करने के बाद उन्हे जैसे रात गुजारने के लिये कोई स्थान चाहिये उन्हे घर से कोई मतलब नही होता है सडक पर कोई खाना बेचने वाला मिल गया तो वे उससे खाना उसी प्रकार से मांगते नजर आयेंगे जैसे वह मनुष्य नही होकर किसी भटकते हुये जानवर की श्रेणी मे आ गये हो,उनके घरो की औरतो का बहुत ही बुरा हाल है,वे कहने को तो अमुक की माता अमुक की बहिन और अमुक की पत्नी है लेकिन उन्हे यह संकोच नही है कि वे अन्य पुरुषो से सम्पर्क तो बना रही है लेकिन बदले मे मिलने वाली बीमारिया और इन्फ़ेक्सन आदि उन्हे आगे के जीवन केलिये कितना दुखदायी होगा वे किसी भी प्रकार से अपनी सेहत परिवार और समाज मे जिन्दा कैसे रह पायेंगी,उनकी सन्तान सब कुछ समझदारी से देखती है लेकिन वह कुछ तब तक नही कहती है जब तक वह बडी नही हो जाती है और जैसे ही वह बडी होती है अपने लिये एक स्त्री या पुरुष का चुनाव अपनी मर्जी से करने के बाद बिना शादी विवाह के जाकर अपने किराये या इसी प्रकार के किसी स्थान पर टिक जाते है बच्चे पैदा होने लगते है और जब परिवार का भार बढने लगता है तो वे अपने अपने रास्तो पर चले जाते है माता अपने बच्चे को या तो अकेला छोड कर चली जाती है या पैदा होने के बाद उसे किसी अन्जान स्थान पर छोड देती है पिता किसी अन्य स्त्री को अपने लिये खोज लेता है और स्त्री अपने लिये किसी अन्य पुरुष को खोज लेती है.
मध्यम परिवारो मे अगर देखा जाये तो पुरुष और स्त्रियां दोनो ही नौकरी मे लगी होती है जब वे घर से बाहर होते है और उनके बच्चे अकेले घर मे होते है तो वे अपनी मर्जी से ही रहने खाना खाने आदि के लिये अपनी मानसिक धारणा को एकान्त का रखते ही है लेकिन जब वे कुछ बडे हो जाते है तो वे अपने माता पिता की हरकतो को देखने के बाद वही सब कुछ करने लगते है जो उनके माता पिता बच्चो को सोता हुआ समझ कर करते है.यही नही जब पिता को कोई अपनी पसन्द का कारण मिल जाता है तो पिता का हो सकता है कि वह रात को घर ही नही आता है और माता को भी देखा जाता है कि वह अपने लिये कोई भी कार्य अपने परिवार की जरूरतो को पूरा करने के लिये या अपनी शौक को पूरा करने के लिये कर सकती है जो उसके लिये सामाजिक बन्धन मे कभी भी मान्य नही है,इस प्रकार का दगा पति पत्नी ही आपस मे करते है तो आगे बच्चे भी अपने माता पिता की बातो को दिमाग मे रखकर करने से नही चूकते है।उच्च वर्ग मे देखा जाता है कि माता पिता दोनो ही किसी न किसी नाम के लिये अपनी योग्यता को बनाने के लिये उस प्रकार के कारणो को पैदा करने लगते है कि उनके बच्चे कांच के महलो मे कैद हो रहे होते है उन्हे स्कूल जाने और घर आने से ही मतलब होता है किसको कितना दर्द है उन्हे पता ही नही होता है अगर किसी भडे बच्चे से पूंछ भी लो कि तुम्हारे दादा का क्या नाम है तो वह नही बता पायेगा,साथ ही अन्य रिस्तो की बाते भी उसे पतानही होंगी केवल वह जानता होगा उन्ही लोगो को जो माता या पिता के लिये विजनिश मे साझेदार होते है या किसी पार्टी आदि मे शामिल होने के लिये आये होते है.
यह राहु का इन्फ़ेक्सन कालपुरुष के अनुसार लोगो के अन्दर एक प्रकार से हवस जैसी हालत को बना रहा है किसी भी सोसियल साइट पर देखो लोग अपनी अपनी धारणा को किस प्रकार से प्रकट कर रहे है कोई भी किसी प्रकार से सामाजिक धारणा को नही समझना चाहता है,घरो के अन्दर अहम का भाव पैदा हो गया है भाई भाई को नही समझ रहा है पिता माता को नही समझ रहा है माता अन्य रास्ते पर जा रही है पुत्र अन्य रास्ते पर जा रहा है पुत्री अपने रास्ते पर जा रही है किसी को किसी से कोई मतलब नही रह गया है ऐसा लगता है जैसे एक जानवर ने अपने बच्चे को पालकर बडा कर दिया है और वह अपने कर्तव्य से दूर हो गया है,जो लोग अभी भी कुछ मर्यादा को लेकर चल रहे है उन्हे मर्यादा मे रहने नही दिया जा रहा है किसी न किसी कारण से उनके लिये अजीब से कारण पैदा किये जा रहे है,कि किसी भी प्रकार से मर्यादा मे चलने वाला व्यक्ति भी उन्ही के साथ साथ अपनी कार्य शैली को प्रयोग मे लाना शुरु कर दे.
शनिवार, 10 अगस्त 2019
अपने अच्छे जीवन के लिए क्या करु
अपनी ही एक पुरानी पोस्ट फिर से पोस्ट कर रहा हु जो मित्र ज्योतिष सीख रहे हैं या ज्योतिषी है उनके लिए उपयोगी पोस्ट पढ़े और शेयर करे ताकि दुसरे भी लाभ उठा सकें
एक जातिका का प्रश्न है कि अपने अच्छे जीवन के लिये वह क्या कर सकती है,उसक साथ जो भी हो रहा है वह सही नही है. यह कुंडली वृश्चिक लग्न की है और लगनेश मंगल चौथे भाव मे है इस मंगल को शास्त्रीय रूप से नीच का माना जाता है साथ मे शुक्र भी है जो बारहवे और सातवे भाव मा मालिक भी है.बारहवा खर्च का मालिक है और सातवा जो भी जीवन मे जद्दोजहद करने का कारण बनाने के लिये अपने प्रभाव प्रस्तुत करता है वैसे तो सीधी भाषा में इस भाव को जीवन साथी का भाव भी कहा जाता है लेकिन जैसे ही जातक खुद के प्रयास से कुछ करने की अपनी मर्जी को जाहिर करने लगता है वही पर सातवे भाव का फ़ल मिलना शुरु हो जाता है। उदाहरण के लिये अगर सातवे भाव को जीवन साथी का भाव कहा जाता है तो सातवा भाव साझेदार का भी होता है और सातवा भाव ही कोर्ट कचहरी मे मुकद्दमा आदि लडने वाले प्रतिद्वंदी का भी होता है। कुंडली मे अगर सप्तमेश और लगनेश का साथ होता है तो दोनो भावो का फ़ल मिश्रित हो जाता है देखना यह पडता है कि दोनो मे प्रभाव किस प्रकार का है.लगनेश मंगल मे पहला प्रभाव चन्द्रमा का है क्योंकि वह चन्द्रमा की राशि कर्क यानी चौथे भाव मे है,दूसरा प्रभाव शनि का है क्योंकि वह शनि की राशि मे है तीसरा प्रभाव उसके अन्दर नक्षत्र का जो धनिष्ठा मे विराजमान है और चौथा प्रभाव उस नक्षत्र के पद का है जो बुध का है,पांचवा प्रभाव शुक्र के साथ होने से शुक्र का भी मिश्रित प्रभाव मिला हुआ है,छठा प्रभाव बारहवे चंद्रमा का भी जो नवम पंचम गति से मंगल को अपना असर दे रहा है,सातवा प्रभाव अष्टम गुरु का है जो अपनी नवी द्रिष्टि से अपना असर दे रहा है आठवा प्रभाव गुरु चन्द्र की मिश्रित प्रणाली से मिल रहा है नवां प्रभाव गुरु चन्द्र और शुक्र की मिश्रित प्रणाली से मिल रहा है,तथा दसवा प्रभाव मिथुन तुला राशियों का भी इस प्रकार से मंगल के बल को देखने के लिये इन दस कारणो को देखना जरूरी है,यह सभी कारक जब मिश्रित किये जायेंगे तभी जातिका के जीवन के प्रति कुछ सही फ़लादेश करना उचित रहेगा।जातिका की योग्यता आदि के लिये इन दशो प्रभावों को समझने के लिये इस प्रकार से समझा जायेगा:-
चौथा भाव माता मन मकान का कारक है,मंगल जब इस भाव मे होता है तो साधारण रूप से मानसिक क्लेश का कारक कहा जाता है.घर मे होने वाले क्लेश को समझने के लिये मंगल जो भाई का कारक भी है और शुक्र के साथ होने से भाई की पत्नी के लिये भी माना जाता है इसलिये भाई की पत्नी के द्वारा घर मे क्लेश पैदा किया जाना जरूरी है.घर मे किसी न किसी प्रकार से धन की जद्दोजहद का रहना भी माना जाता है यानी प्रोग्रेस के समय मे भोजन की भी कमी का होना देखा जा सकता है.फ़ेफ़डे का कारक होने के कारण तथा ह्रदय पर असर देने के कारण जुकाम वाली बीमारिया और अधिक सर्दी जुकाम रहने से सिर मे चक्कर आना तथा जुकाम के कारण ही आंखो पर असर देने के लिये भी माना जा सकता है,अक्सर यह प्रभाव बायीं आंख पर अधिक होता है जैसे आंख से पानी का बहते रहना आदि.माता के साथ जब सप्तमेश साथ मे है तो शुक्र नानी का कारक भी हो जाता है यानी चौथे से चौथा भाव नानी का भी माना जाता है,नानी के घर मे भी इसी प्रकार का क्लेश माना जा सकता है नानी की बीमारियां भी इसी प्रकार की मानी जाती है,सप्तम दूसरे नम्बर के भाई बहिन के लिये भी माना जाता है सप्तम का मालिक शुक्र लगनेश के साथ होने से दूसरे नम्बर की बहिन के साथ भी इसी प्रकार का क्लेश देखा जा सकता है,मंगल को स्त्री की कुंडली मे पति के रूप मे भी देखा जा सकता है,इसी प्रकार के कारण पति के लिये भी माने जा सकते है और यही कारण पति की माँ यानी जातिका की सास के लिये भी माना जा सकता है.लेकिन इस भाव के मंगल के लिये यह भी माना जाता है कि जातिका भले ही छोटी हो लेकिन अपनी उम्र के अट्ठाइस साल के बाद उसे अपने घर के लिये बडप्पन की बाते ही करने को मिलेंगी,कारण इस उम्र तक उसने सभी प्रकार के कष्ट सहन कर लिये होते है और अनुभव के आधार पर वह किसी प्रकार के घर के झगडे निपटाने की कला का ज्ञाता हो जाता है.यही बात पति के लिये भी होगी नानी के लिये भी होगी और भाई के लिये भी होगी.अगर जातक किसी प्रकार से अपने घर से दूर चला जाता है यानी किसी प्रकार से शादी के बाद पति के साथ दूर चला जाता है तो बडा भाई घर मे औलाद या सेहत के मामले मे दुखी ही रहना माना जाता है। माता के भाव से ग्यारहवे भाव का मालिक गुरु होने के कारण बडे मामा को भी दुखी माना जा सकता है.जातिक की कुंडली से अष्टम भाव मे गुरु होने के कारण जातिका का ताऊ भी इसी प्रकार से दुखी माना जा सकता है और इस भाव से नवे भाव मे चन्द्रमा होने से जातिका की दादी के लिये भी यही बात जानी जा सकती है.शरीर मे गले के बाद वाले भाव मे मंगल के होने से जातिका को गर्दन की बीमारियां भी होती है जो शुक्र के साथ रहने से थाइराइड जैसी बीमारियों के बारे मे भी सूचित करता है। मंगल केन्द्र मे स्थापित है और लगन का मालिक होने से चौथे मे बैठने से तथा सप्तमेश के साथ होने से दसवे भाव में सप्तमेश और लगनेश मंगल की द्रिष्टि होने से मंगल का केन्द्र मे कब्जा है यह मंगल शुक्र के साथ होने से शरीर के केन्द्र को भी आहत करता है यानी नाभि वाली बीमारियां भी होती है.इस भाव का मंगल खून के अन्दर पतलापन पैदा करता है यानी पानी के भाव मे होने से और शनि की राशि मे होने से दिमाग मे शक की बीमारी को भी पैदा करता है,जो लोग जान पहिचान वाले होते उनके अन्दर भी जातिका के प्रति शक की बीमारी को पैदा करने के लिये माना जाता है.भाग्य के भाव को अपनी छठी नजर से देखने के कारण भाग्य भी काम नही करता है केतु की अष्टम द्रिष्टि होने के कारण वह उम्र की पच्चीसवी साल तक किसी न किसी प्रकार से कालेज के किसी व्यक्ति के साथ गलत सम्बन्धो के लिये भी जोडा जा सकता है,जैसे केतु की अष्टम नजर लगनेश पर पडने के कारण भी जाना जा सकता है.इस कारण से इस भाव के मंगल मे एक प्रकार से एक दूसरे से बदला लेने की भावना भी पैदा हो जाती है और इस भावना से मंगल जो भाई का कारक है और मंगल जो पति का कारक है बदला लेने के कारण जेल जाने के कारणो को भी बना सकता है.जेल जैसे स्थान मे रहना भी एक प्रकार से इस मंगल के कारण ही देखे जाते जब सूर्य से गयरहवा शनि राहु हो यानी एक ऐसी सरकारी संस्था जहां पिता काम करता हो और वह जेल जैसी संस्था को संभालने का काम करता हो तो भी जेल जैसी स्थिति को ही माना जा सकता है.
चौथे भाव को आठवा भाव नवे भाव से और छठा भाव ग्यारहवे भाव से अपनी नजर को रखता है,यानी ताऊ अपनी नजर से अपनी मालिकियत को मानता है और छठा भाव अपने लाभ का साधन मानता है इसलिये जातक को जब भी परेशानी होती है तो अपने ताऊ चाचा आदि से होती है और घर मे बंटवारे आदि जैसे कारण अधिकतर इन्ही लोगो के कारण चलते रहते है.अष्टम मे गुरु के होने से और छठे भाव मे बुध के होने से यह लोग जो भी अपनी कानूनी प्रक्रिया को करते है वह गुप्त रूप से करते है,एक तरफ़ तो वे अपने को इस प्रकार से जाहिर करते रहते है कि वे ही सच्चे हितैषी है लेकिन पीठ पीछे अपनी ही चलाने की बात करते है और गुरु के आगे केतु होने से जातिका के ताऊ आदि अपने चार प्रकार साधनो से अदालती कार्य आदि करते रहते है इस कारण से जातिका के घर मे भी तनाव रहता है.
सूर्य का शिक्षा स्थान मे होना और शनि राहु की सम्मिलित नजर सूर्य पर होने के कारण जातिका के पिता किसी बडे संस्थान को संभालने के लिये माने जा सकते है जो शिक्षा या राज्य के प्रति जाना जाता हो और सचिव जैसी हैसियत को रखता हो.
वर्तमान मे जातिका की दशा शनि की चल रही है और यह दशा जातिका को किये जाने वाले कार्यों से दिक्कत को देने के लिये मानी जाती है लेकिन इस मंगल की युति के कारण जातिका जितना कष्ट भोगेगी उतना ही उसे अपने पतले खून को मजबूत बनाने के लिये जाना जायेगा.
चन्द्रमा का मंगल के साथ योगात्मक प्रभाव होने के कारण जातिका की बुरे वक्त मे कोई न कोई अद्रश्य शक्ति सहायता के लिये आजायेगी.लेकिन जातिका जब मेहनत वाले काम करेगी तो ही यह सम्भव है हरामखोरी मे यह शक्ति खुद ही जातिका को परेशान करने से नही चूकेगी.
अप्रैल दो हजार पन्द्रह तक जातिका को बहुत मेहनत करने की जरूरत है इसके बाद जातिका को अक्समात ही प्रोग्रेस के रास्ते गुरु की सहायता से खुलने लगेंगे.मित्रो आप भी अपनी कुंडली दिखाना चाहते हैं तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं या आपकी कोई समस्या है ओर उपाय चाहते हैं तो हमारे नम्वरो पर सम्पर्क करें हमारी सेवा सशुल्क है आचार्य राजेश 7597718725/9414481324
शुक्रवार, 2 अगस्त 2019
मेरी शादी कव होगी?
मनुष्य का जन्म हो जाता है शिक्षा होजाती धन कमाने के रास्ते मिल जाते है लेकिन विवाह के बारे मे जीवन अनिश्चितता की तरफ़ ही रहता है। अगर कहा जाये कि धनी बनकर शादी जल्दी हो जाती है या सम्बन्ध अच्छा मिल जाता है तो गलत ही माना जा सकता है,खूब पढ लिख कर अगर सम्बन्ध अच्छा बन जाये पत्नी मन या पति मनचाहा मिल जाये तो भी गलत बात ही मानी जाती है,शादी सम्बन्ध हमेशा संस्कारों से पूर्व के कृत पाप पुन्य से और समाज आदि के द्वारा समर्थन से ही सही मिलते है। प्रस्तुत कुंडली वृश्चिक लगन की है.मंगल इस कुण्डली मे लगनेश है और सप्तमेश शुक्र बुध के साथ तीसरे भाव मे विद्यमान है,शुक्र को कुंडली के अष्टम मे बैठा राहु मारक द्रिष्टि से देख रहा है। राहु ने चन्द्रमा को भी ग्रहण दिया हुया है और अपनी नवी द्रिष्टि से सूर्य को भी ग्रहण दिया है। सूर्य चन्द्र को ग्रहण देने के बाद राहु से वक्री गुरु का सम्बन्ध भी बन गया है। वक्री गुरु ने भी सूर्य को असर दिया है। गुरु मार्गी होना ही सम्बन्ध का उत्तम रूप से फ़लदायी माना जाता है,गुरु के मार्गी होते ही जातक के अन्दर स्वार्थी भावना आजाती है वह सम्बन्ध को नफ़ा नुकसान के रूप मे सोचने लगता है,कारण वक्री गुरु का प्रभाव जीवन मे नर संतान नही देने अथवा देने के बाद भी नर संतान का सुख नही देने के लिये माना जाता है। शनि और मंगल के बारे मे भी अगर देखा जाये तो शनि भी कन्या राशि का होकर वक्री है और मंगल भी कन्या राशि मे वक्री हो गया है मंगल पौरुष का कारक है और शनि मेहनत करने वाले कामो का कारक है जातक के अन्दर जब पौरुष ही नही होगा तो वह मेहनत वाले कामो को नही कर पायेगा। इस प्रकार से जातक के अन्दर मेहनत वाले कामो को नही करने से दिमागी बुद्धि का विकास अधिक हो जायेगा और वह अपने को हर सीमा मे बुद्धिमान समझने की कोशिश करेगा जिस समाज या परिवार से वह शादी विवाह की बात को चलाने की कोशिश करेगा उसी समाज या परिवार से अति आधुनिकता मे होने के कारण या विदेशी परिवेश मे रहने या नियमो को अपनानेके कारण भी समाज या परिवार शादी विवाह के लिये हिचकिचायेगा।शुक्र के बारे मे भी कहा जाता है कि जब यह बुध के साथ मकर राशि का तीसरे भाव मे होता है तो जातक के पास शादी विवाह के प्रपोजल खूब आते है लगता भी है कि शादी हो जायेगी लेकिन बात किसी न किसी बात से टूट जाती है अक्सर सोच यह भी होती है कि पत्नी काम करने वाली हो और वह घर संभालने के साथ साथ कमाई भी करे। केतु जिन साधनो से परिवार को आगे बढाने की कोशिश करता है राहु उन्ही साधनो की पूर्ति से परिवार को छोटा करता चला जाता है। जातक के रिस्ते की दो बाते चलेंगी लेकिन एक बात इस साल मे अगर बैठ भी जाती है तो वह किसी न किसी बात से टूट भी सकती है इस कारण को दूर करने के लिये अपने को अपनी मर्यादा समाज और परिवार के बारे मे खुल कर बात करनी चाहिये,विदेशी नीति रीति या अधिक आधुनिकता है तो उसे त्यागने मे ही भलाई है.राहु के द्वारा सूर्य और चन्द्र को ग्रहण देने की नीति से दूर रहने के लिये जातक को अपने पूर्वजो के प्रति श्रद्धा रखकर महिने या साल मे उनके नाम से किसी न किसी धर्म स्थान पर उनकी मान्यता का ध्यान भी रखकर अपने जीवन के क्षेत्र को आगे बढाने का प्रयास करते रहना चाहिये.मित्रो आप को भी कोई परेशानी है तो आप अपनी कुंडली दिखाकर उपाय चाहते हैं तो आप हम से संपर्क कर सकते हैं हमारी सेवा सशुल्क है 7597718725/941448132paytm no 7597718725
गुरुवार, 1 अगस्त 2019
देवी देवताओं के आसनों ओर वाहनों आ्का रहस्य और विज्ञान
हिन्दू धर्म में सभी देवी-देवताओं का अलग-अलग वाहन होता है। इसके अलावा हिन्दू पुराणों में यह भी बताया गया है कि कौन से देवी-देवताओं को कौन सा भोजन या फूल सबसे प्रिय है। जिसके आधार पर हम उनकी आराधना करते है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि सभी भगवान का अलग-अलग वाहन क्यों होता है। तो आइए जानते है कि किस भगवान का वाहन क्या है और क्यों
हिन्दू देवी देवताओं में प्रत्येक देवी देवता के लिये एक निश्चित सवारी का दिखाया जाना एक प्रकार से साधना के प्रथम रूप का वर्णन किया जाना माना जाता है। जिस देवता या देवी की साधना की जाती है वह उसकी सवारी के अनुरूप ही माना जाता है।
दुर्गा की सवारी शेर को दिखा गया है,दुर्गा भक्ति के लिये अपनी प्रकृति को शेर की प्रकृति से जोड कर रखा जाता है। दुर्गा को शक्ति का स्वरुप माना जाता है। और मां की सवारी सिंह होता है, सिंह स्वयं शक्ति, बल, पराक्रम, और क्रोध का कारक होता है। शेर की यह सभी विशेषताएं मां दुर्गा के स्वभाव में मौजूद हैं। मां दुर्गा की हुंकार भी शेर की दहाड़ की ही तरह इतनी तेज है, जिसके आगे कोई भी आवाज सुनाई नहीं देती।दुर्गा की भक्ति को मन्दिर मे या घर के अन्दर नही किया जा सकता है उनकी भक्ति के लिये जंगल पहाड और निर्जन स्थान कन्दरा आदि को अपनाया जाता है।
भोलेनाथ बहुत शक्तिशाली होने के बावजूद बहुत शांत और संयमित रहते है। नंदी बैल भगवान शिव का वाहन है, उनके गणों में वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। बैल बहुत ताकतवर और शक्तिशाली होने के बावजूद शांत रहते हैं जो की भोलेनाथ के स्वभाव में दिखता है। इसके अलावा नंदी के चार पैर हिन्दू धर्म के चार स्तंभ, क्षमा, दया, दान और तप के प्रतीक हैं। नंदी सफेद रंग का बैल है जो स्वच्छता और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। इसी प्रकार से जब शिव की भक्ति को करना होता है तो अपने को इस टप्रकार के स्थान पर ले जाना होता है जहां केवल सन्नाटा हो कोई वनस्पति और जीवित कारक आसपास नही हो साथ ही बाघम्बर बिछाने और भभूत लपेटने का अर्थ भी एक प्रकार से यही माना जाता है कि शिव की साधना के लिये शव यानी मृत मानना जरूरी हो जाता है बिना अपने को मृत माने शिव की साधना नही हो पाती है,निराकार मे साकार का प्रवेश होना उन्ही लोगो के लिये देखा जा सकता है जो अपने को कुछ नही मानते जो अपने को अहम के अन्दर ले कर चलते है वे शिव भक्ति कभी नही कर सकते है।
मूषक का अर्थ चूहा होता है, भगवान गणेश को बुद्धि के देवता माना जाता है। और उनकी सवारी चूहा है, दरअसल चूहा हर चीज को कुतर देता है, बह बिना सोचे समझे हर कीमती चीज़ या अनमोल चीज को कुतर देता है, वह उसे नष्ट कर देता है। इसी तरह बुद्धिहीन और कुतर्की व्यक्ति भी बिना सोचे-समझे, अच्छे-बुरे हर काम में बाधा उत्पन्न करते हैं। श्री गणेश ने मूषक पर सवारी कर कुतर्कों और अहित चाहने वाले लोगों को वश में किया है। गणेश भक्ति के लिये अपने को चूहा की प्रकृति मे ले जाना पडता है जैसे चूहा अपने को सुरक्षित रखते हुये सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नही करता है वह किसी भी बडे अबलम्ब के किनारे चलने और अपनी सुरक्षा को रखते हुये चलता है,तथा एकान्त और ऐसे स्थान पर अपने निवास को बनाता है जो किसी आम जीव की पहुंच से दूर हो एक प्रकार और भी देखा जाता है कि गणेश भक्ति मे अक्सर बाधा आती है उन बाधाओ से बचने के लिये चूहा अपने निवास के आसपास या माहौल मे अपने को एक से अधिक रास्ते जिस प्रकार से प्रयोग करने की युक्ति को बनाकर चलता है उसी प्रकार से गणेश भक्ति को करने वाले लोग अपने को एक ही सिद्धान्त पर लेकर नही चल पाते है उनके लिये कई प्रकार के रास्ते बनाने पडते है और एक रास्ता बन्द हो जाने पर दूसरा रास्ता उन्हे अपने आप चुनना पडता है।
विष्णु को गरुण की पीठ पर सवार होता हुआ दिखाया गया है,भगवत् गीता में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु के भीतर ही समस्त सृष्टि का निवास है, वे सबसे ताकतवर हैं। गरुड़ देव को भी अधिकार और दिव्य शक्तियों से लैस दर्शाया गया है इस वाहन से शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति अपने को दूर गामी और ऊंचाई पर लेजाकर नजर सभी कारको पर रखे और सयंत होकर अपने को आसपास के माहौल मे रखकर एकात्मक रूप से वायु प्रधान होकर यानी निराकार होकर साकार को दिष्टि मे रखकर चलता रहे। विष्णु को शेष शैया पर होना और शेषनाग का समुद्र मे होना भी एक प्रकार से शिक्षा देने वाला होता है कि गहरे पानी यानी मन के अन्दर गहरे विचार पैदा करने के बाद भी अपने आसपास के माहौल को मुलायम और जीविन्त रखकर उन विचारो का एक से अधिक कारण पैदा करने के बाद ही रहा जा सकता है।
उसी प्रकार से कार्तिकेय जी की मोर के ऊपर सवार होने का कारण भी बताया गया है । मोर चंचलता का प्रतीक है और उसे अपना वाहन बनाना इस बात को दर्शाता है कि कार्तिकेय ने अपने मोरे रूपी चंचल मन को अपने वश में कर लिया है।ओर मोर स्वयं द्रष्टा होता है वह अपने को सयंत रखकर भी जब मुदित होता है तो अपने पंखो को फ़ैला कर नाचना शुरु करता है और जगत कल्याण की भावना से यह समझा जाता है कि जीव की पूर्ति का साधन पानी बरसना तय होता है उसी प्रकार से जब किसी प्रकार की गलत शक्ति की आहट होती है तो मोर चिल्लाना शुरु कर देता है,इस कारण को सूक्ष्म रूप से समझे जाने पर पता चलता है कि सुन्दर और समृद्ध होने पर स्थिति को समझने की शक्ति भी होनी जरूरी होती है इसके साथ ही विष को भोजन करने के बाद भी मोर का कुछ नही बिगडता है कारण उसके अन्दर पराशक्तियों की इतनी गर्मी होती है कि वह मोर कंकडी जैसे पत्थर को खाकर भी अपने जीवन को चलाते रहने के लिये माना जाता है। सांकेतिक भाषा में हंस जिज्ञासा और पवित्रता का प्रतीक कहा जा सकता है।
ज्ञान की देवी सरस्वती को हंस से बेहतर और कोई वाहन मिल भी नहीं सकता था। मां सरस्वती का हंस पर विराजित होना इस बात को दर्शाता है कि ज्ञान के जरिए ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है।इसी प्रकार से सरस्वती का वाहन हंस भी पानी का राजा कहा जाता है वह अपने ही माहौल मे रहना पसंद करता है तथा वह भूखा रह सकता है लेकिन भोजन मे मोती ही उसकी क्रियाशैली मे माने जाते है,अपने को स्माधिस्थ भी रखता है और अपने कार्य को भी करता रहता है।
लक्ष्मी का वाहन उल्लू बताया जाता हैउल्लू शुभता और संपत्ति का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि अत्याधिक धन-संपदा को प्राप्त कर व्यक्ति उल्लू (बुद्धिहीन) हो जाता है। इसलिए देवी लक्ष्मी और उल्लू साथ-साथ चलते हैं। उल्लू दिन में नहीं देख पाता, वह रात का जीव है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि लक्ष्मी जी की कृपा व्यक्ति को अंधकार से मुक्त कर सकती है।
दुर्गा की सवारी शेर को दिखा गया है,दुर्गा भक्ति के लिये अपनी प्रकृति को शेर की प्रकृति से जोड कर रखा जाता है। दुर्गा को शक्ति का स्वरुप माना जाता है। और मां की सवारी सिंह होता है, सिंह स्वयं शक्ति, बल, पराक्रम, और क्रोध का कारक होता है। शेर की यह सभी विशेषताएं मां दुर्गा के स्वभाव में मौजूद हैं। मां दुर्गा की हुंकार भी शेर की दहाड़ की ही तरह इतनी तेज है, जिसके आगे कोई भी आवाज सुनाई नहीं देती।दुर्गा की भक्ति को मन्दिर मे या घर के अन्दर नही किया जा सकता है उनकी भक्ति के लिये जंगल पहाड और निर्जन स्थान कन्दरा आदि को अपनाया जाता है।
भोलेनाथ बहुत शक्तिशाली होने के बावजूद बहुत शांत और संयमित रहते है। नंदी बैल भगवान शिव का वाहन है, उनके गणों में वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। बैल बहुत ताकतवर और शक्तिशाली होने के बावजूद शांत रहते हैं जो की भोलेनाथ के स्वभाव में दिखता है। इसके अलावा नंदी के चार पैर हिन्दू धर्म के चार स्तंभ, क्षमा, दया, दान और तप के प्रतीक हैं। नंदी सफेद रंग का बैल है जो स्वच्छता और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। इसी प्रकार से जब शिव की भक्ति को करना होता है तो अपने को इस टप्रकार के स्थान पर ले जाना होता है जहां केवल सन्नाटा हो कोई वनस्पति और जीवित कारक आसपास नही हो साथ ही बाघम्बर बिछाने और भभूत लपेटने का अर्थ भी एक प्रकार से यही माना जाता है कि शिव की साधना के लिये शव यानी मृत मानना जरूरी हो जाता है बिना अपने को मृत माने शिव की साधना नही हो पाती है,निराकार मे साकार का प्रवेश होना उन्ही लोगो के लिये देखा जा सकता है जो अपने को कुछ नही मानते जो अपने को अहम के अन्दर ले कर चलते है वे शिव भक्ति कभी नही कर सकते है।
मूषक का अर्थ चूहा होता है, भगवान गणेश को बुद्धि के देवता माना जाता है। और उनकी सवारी चूहा है, दरअसल चूहा हर चीज को कुतर देता है, बह बिना सोचे समझे हर कीमती चीज़ या अनमोल चीज को कुतर देता है, वह उसे नष्ट कर देता है। इसी तरह बुद्धिहीन और कुतर्की व्यक्ति भी बिना सोचे-समझे, अच्छे-बुरे हर काम में बाधा उत्पन्न करते हैं। श्री गणेश ने मूषक पर सवारी कर कुतर्कों और अहित चाहने वाले लोगों को वश में किया है। गणेश भक्ति के लिये अपने को चूहा की प्रकृति मे ले जाना पडता है जैसे चूहा अपने को सुरक्षित रखते हुये सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नही करता है वह किसी भी बडे अबलम्ब के किनारे चलने और अपनी सुरक्षा को रखते हुये चलता है,तथा एकान्त और ऐसे स्थान पर अपने निवास को बनाता है जो किसी आम जीव की पहुंच से दूर हो एक प्रकार और भी देखा जाता है कि गणेश भक्ति मे अक्सर बाधा आती है उन बाधाओ से बचने के लिये चूहा अपने निवास के आसपास या माहौल मे अपने को एक से अधिक रास्ते जिस प्रकार से प्रयोग करने की युक्ति को बनाकर चलता है उसी प्रकार से गणेश भक्ति को करने वाले लोग अपने को एक ही सिद्धान्त पर लेकर नही चल पाते है उनके लिये कई प्रकार के रास्ते बनाने पडते है और एक रास्ता बन्द हो जाने पर दूसरा रास्ता उन्हे अपने आप चुनना पडता है।
विष्णु को गरुण की पीठ पर सवार होता हुआ दिखाया गया है,भगवत् गीता में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु के भीतर ही समस्त सृष्टि का निवास है, वे सबसे ताकतवर हैं। गरुड़ देव को भी अधिकार और दिव्य शक्तियों से लैस दर्शाया गया है इस वाहन से शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति अपने को दूर गामी और ऊंचाई पर लेजाकर नजर सभी कारको पर रखे और सयंत होकर अपने को आसपास के माहौल मे रखकर एकात्मक रूप से वायु प्रधान होकर यानी निराकार होकर साकार को दिष्टि मे रखकर चलता रहे। विष्णु को शेष शैया पर होना और शेषनाग का समुद्र मे होना भी एक प्रकार से शिक्षा देने वाला होता है कि गहरे पानी यानी मन के अन्दर गहरे विचार पैदा करने के बाद भी अपने आसपास के माहौल को मुलायम और जीविन्त रखकर उन विचारो का एक से अधिक कारण पैदा करने के बाद ही रहा जा सकता है।
उसी प्रकार से कार्तिकेय जी की मोर के ऊपर सवार होने का कारण भी बताया गया है । मोर चंचलता का प्रतीक है और उसे अपना वाहन बनाना इस बात को दर्शाता है कि कार्तिकेय ने अपने मोरे रूपी चंचल मन को अपने वश में कर लिया है।ओर मोर स्वयं द्रष्टा होता है वह अपने को सयंत रखकर भी जब मुदित होता है तो अपने पंखो को फ़ैला कर नाचना शुरु करता है और जगत कल्याण की भावना से यह समझा जाता है कि जीव की पूर्ति का साधन पानी बरसना तय होता है उसी प्रकार से जब किसी प्रकार की गलत शक्ति की आहट होती है तो मोर चिल्लाना शुरु कर देता है,इस कारण को सूक्ष्म रूप से समझे जाने पर पता चलता है कि सुन्दर और समृद्ध होने पर स्थिति को समझने की शक्ति भी होनी जरूरी होती है इसके साथ ही विष को भोजन करने के बाद भी मोर का कुछ नही बिगडता है कारण उसके अन्दर पराशक्तियों की इतनी गर्मी होती है कि वह मोर कंकडी जैसे पत्थर को खाकर भी अपने जीवन को चलाते रहने के लिये माना जाता है। सांकेतिक भाषा में हंस जिज्ञासा और पवित्रता का प्रतीक कहा जा सकता है।
ज्ञान की देवी सरस्वती को हंस से बेहतर और कोई वाहन मिल भी नहीं सकता था। मां सरस्वती का हंस पर विराजित होना इस बात को दर्शाता है कि ज्ञान के जरिए ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है।इसी प्रकार से सरस्वती का वाहन हंस भी पानी का राजा कहा जाता है वह अपने ही माहौल मे रहना पसंद करता है तथा वह भूखा रह सकता है लेकिन भोजन मे मोती ही उसकी क्रियाशैली मे माने जाते है,अपने को स्माधिस्थ भी रखता है और अपने कार्य को भी करता रहता है।
लक्ष्मी का वाहन उल्लू बताया जाता हैउल्लू शुभता और संपत्ति का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि अत्याधिक धन-संपदा को प्राप्त कर व्यक्ति उल्लू (बुद्धिहीन) हो जाता है। इसलिए देवी लक्ष्मी और उल्लू साथ-साथ चलते हैं। उल्लू दिन में नहीं देख पाता, वह रात का जीव है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि लक्ष्मी जी की कृपा व्यक्ति को अंधकार से मुक्त कर सकती है।
इसका एक ही कारण होता है कि लक्ष्मी उसी के पास आती है जब संसार सोता है और उल्लू जागता है की नीति से अगर काम किया जाता है तो वह लक्ष्मी प्राप्त करने के लिये अपनी गति को बना लेता है। यानी जब सब सोते है तब उल्लू जागता है और जब सब जागते है तब उल्लू सोता है। उसी प्रकार से कमल के फ़ूल पर लक्ष्मी के विराजमान होने का भान यही माना जाता है कि जैसे ही सूर्य उगता है कमल का फ़ूल खिल जाता है यानी जैसे ही सूर्य उदय हो और व्यक्ति अपने को संसार मे फ़ैलाना शुरु कर दे यानी देर तक सोना और रात को देर से सोना भी व्यक्ति को अकर्मण्य बना देता है लक्ष्मी उसके पास नही रहती है।
इसी प्रकार से तकनीकी रूप बुद्धि को प्रदान करने वाले मंगल की सवारी मेढा को बताया गया है इस जीव की यह बात मानी जाती है कि तकनीकी रूप से बुद्धि को विकसित करने के लिये खोपडी मजबूत होनी चाहिये तथा दिमाग को सबल रखना चाहिये आदि बाते देवी देवताओं की सवारी से जोड कर देखी जा सकती है। आदि आचार्य राजेश
इसी प्रकार से तकनीकी रूप बुद्धि को प्रदान करने वाले मंगल की सवारी मेढा को बताया गया है इस जीव की यह बात मानी जाती है कि तकनीकी रूप से बुद्धि को विकसित करने के लिये खोपडी मजबूत होनी चाहिये तथा दिमाग को सबल रखना चाहिये आदि बाते देवी देवताओं की सवारी से जोड कर देखी जा सकती है। आदि आचार्य राजेश
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