आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शनिवार, 18 अप्रैल 2020
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020
गुरुवार, 2 अप्रैल 2020
कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?
कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?https://youtu.be/B-yfoSy0s2Iकब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?
कोरोना वायरस के लगातार सामने आते मामलों के बीच देशभर को लॉकडाउन (21 Days Lockdown) कर दिया गया हैयह लॉकडाउन आपके भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से किसी भी कीमत पर घर के बाहर नहीं निकलने की सलाह दी है। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का संकल्प जो हमने लिया था उसकी सिद्धी के लिए भारत के लोगों ने योगदान दिया। बहुत से मित्रों ने जानकारों ने पूछा है। lockdown कब तक चलेगा मित्रों 24तारीख रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने यह घोषणा की उस समय की कर कुंडली देखी जाए तो तुला लग्न बनता है और शनि और मंगल तुला लग्न मकर राशि में चौथे घर में विराजमान है।
मंगलदेब ने (23तारीख को इस राशि में प्रवेश कर शनि देव के साथ युति की मकर राशि शनि की अपनी राशि है। मंगल देव यहां उच्च के है एक मंगल देव ही ऐसा ग्रह है जो दुश्मन की राशि में जाकर उच्च का हो जाता है चोथा घर जनता का है ।और मंगल देब सेनापति (4मई )तक मंगल मकर में ही रहेंगे मंगल पुलिस का कारक है सेना का कारक है यानि इस corona virus को रोकने के लिए पुरी सख्ती रखीं जाएंगी और सरकार पुलिस ओर सेना का प्रयोग पुरी तरह से करेंगी 4मई, के बाद ही lockdown कम होने के आसार नजर आते हैं26मार्च से 30जून ,तक का समय भारी है उसके बाद सुघार आना शुरू हो जाएगा
मित्रों अपने आप को हिफाजत से रखें बचा कर रखें घर में रहे आचार्य राजेश
कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?
कब खत्म होगा (Lockdown)लॉक डाउन कितने दिन तक चलेगा लॉक डाउन lockdown?
कोरोना वायरस के लगातार सामने आते मामलों के बीच देशभर को लॉकडाउन (21 Days Lockdown) कर दिया गया हैयह लॉकडाउन आपके भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से किसी भी कीमत पर घर के बाहर नहीं निकलने की सलाह दी है। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का संकल्प जो हमने लिया था उसकी सिद्धी के लिए भारत के लोगों ने योगदान दिया। बहुत से मित्रों ने जानकारों ने पूछा है। lockdown कब तक चलेगा मित्रों 24तारीख रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने यह घोषणा की उस समय की कर कुंडली देखी जाए तो तुला लग्न बनता है और शनि और मंगल तुला लग्न मकर राशि में चौथे घर में विराजमान है।
मंगलदेब ने (23तारीख को इस राशि में प्रवेश कर शनि देव के साथ युति की मकर राशि शनि की अपनी राशि है। मंगल देव यहां उच्च के है एक मंगल देव ही ऐसा ग्रह है जो दुश्मन की राशि में जाकर उच्च का हो जाता है चोथा घर जनता का है ।और मंगल देब सेनापति (4मई )तक मंगल मकर में ही रहेंगे मंगल पुलिस का कारक है सेना का कारक है यानि इस corona virus को रोकने के लिए पुरी सख्ती रखीं जाएंगी और सरकार पुलिस ओर सेना का प्रयोग पुरी तरह से करेंगी 4मई, के बाद ही lockdown कम होने के आसार नजर आते हैं तब तक मित्रों अपने आप को हिफाजत से रखें बचा कर रखें घर में रहे आचार्य राजेश
शुक्रवार, 27 मार्च 2020
लाल किताब के अनुसार सुर्य/Surya according to Lal Kitab /
www.acharyarajesh.in
जगत का स्वामी सूर्य है सभी ग्रह और नक्षत्र सूर्य के आसपास ही चक्कर लगा रहे है,वेदो मे सूर्य की आराधना सबसे अच्छी मानी गयी है जो भी संसार मे दिखाई देता है वह सब सूर्य की कृपा से ही सम्भव है,विद्वान लोग सूर्य आराधना के लिये मुख्य स्तोत्र विष्णु सहस्त्र नाम को ही मानते है। सूर्य का कुंडली मे पक्का घर एक पांच आठ नौ ग्यारह और बारह को ही कहा गया है सूर्य के मित्र ग्रहो में चन्द्रमा को भी माना गया है गुरु भी सूर्य का मित्र है और मंगल को भी सूर्य का मित्र तथा सहायक और सूर्य की रक्षा करने वाला कालान्तर के लिये सूर्य की गर्मी को सोख कर सूर्य की अनुपस्थिति मे संसार को गर्मी देने वाला माना गया है। साथ ही धरती के अन्दर के जीवो को गर्मी देने के लिये सूर्य का सहायक मंगल ही काम करता और उर्जा को देने के लिये अपनी शक्ति से सूर्य की गर्मी को सोख कर जीवो को प्रदान काता है। सूर्य पहले घर मे उच्च का माना जाता है और सातवे घर मे नीच का माना जाता है।
सूर्य का समय सुबह सूर्योदय से एक घंटे के लिये और दिन रविवार माना गया है।सूर्य के खराब होने बुखार आना आंखो की रोशनी कम होना दिमाग के चढे रहने से सिर की तकलीफ़ रहना आदि माना जाता है साथ ही बिना बात के सरकारी आफ़तो का आना भी सूर्य के कारण ही होता है। सूर्य के बिना जो जीवन मे अपनी गति को प्रदान करने वाले ग्रह बुध और बुध के बाद शुक तथा शुक्र के बाद चन्द्रमा फ़िर धरती और उसके बाद मंगल को माना जाता है शुक्र और बुध को सूर्य के अधिक पास होने के कारण मनसुई ग्रह की उपाधि भी दी गयी है। जब जातक की कुंडली मे सूर्य पहले पांचवे और ग्यारहवे घर मे होता है तो इसकी शक्ति को श्रेष्ठ माना जाता है जब भी मंगल छठे घर मे होता है और केतु अगर पहले घर मे हो तो भी सूर्य सही फ़ल प्रदान करता है सूर्य की शक्ति कभी नीच की नही होती है यह अपनी नीचता को दूसरे ग्रह से जोड कर प्रदान करता है। सूर्य के अच्छे होने की पहिचान होती है कि व्यक्ति का हड्डी का ढांचा सुडौल और ऊंचा होने से लम्बाई और चौडाई अच्छी होती है सूर्य का कारक अंग आंखे होने से आंखे बडी और चमकदार होती है सूर्य से पहिचान का कारण होने से सूर्य उच्च कुल मे जन्म देने के साथ साथ चेहरे पर राजसी चमक का देने वाला भी होता है। सूर्य की शक्ति के कारण ही जातक के अन्दर साहस भी होता है हिम्मत भी होती है और जहां भी नीचता वाले कारण यानी शनि की सीमा शुरु होती है सूर्य के पहुंचने के साथ ही शनि की सीमा समाप्त हो जाती है। सूर्य किसी भी विकट परिस्थिति मे जिन्दा रखने की ताकत देता है यह जंगलो मे निवास के समय जडी बूटियों की पहिचान करवा देता है महलो मे रहने पर राजसी ठाटबाट को भी देने वाला होता है और राजसी कारणो को समझाने वाला और कानून को बनाने वाला भी माना जाता है। सूर्य अगर सशक्त है तो कोई भी दुश्मन ठहर नही पाता है वह पीठ पीछे बुराई कर सकता है लेकिन सामने आकर जी हुजूरी ही करता है। मंगल के साथ अगर सूर्य सही होता है तो वह रक्षा सेवा या सामाजिक कारणो मे अपने नाम और यश को फ़ैलाने मे सहायक हो जाता है। लेकिन शनि की नीचता के आते ही यानी किसी भी कारण मे रिस्वत तामसी भोजन या पर स्त्री पर पुरुष के संसर्ग से अपनी शक्ति को समेट लेता है साथ ही आगे के जीवन को घोर यातना मे ले जाता है शनि के सवार होते ही राहु का प्रकोप शुरु हो जाता है और जेल जाना या अस्पताल मे अपनी जिन्दगी को काटने के लिये मजबूर कर देता है। जब भी बेकार के ख्याल आने लगे लोग अधिक चमचागीरी करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि सूर्य खराब होना शुरु हो गया है। सूर्य कभी भी दूसरो के ऊपर मोहताज नही होता है वह हमेशा अपनी कमाई पर ही निर्भर रहने वाला होता है उसे दान और इसी प्रकार के कारण देने तो आते है लेकिन वह लेना नही जानता है,सूर्य श्रेष्ठ वाला व्यक्ति कभी भी अपनी मर्यादा से बाहर नही जाता है वह अपनी जाति कुल और समाज को पहले देखकर चलने वाला होता है। सूर्य के सही फ़ल देने के कारण सभी ग्रह अपने अपने समय मे अच्छा फ़ल देने लगते है लेकिन बुध उम्र की जवानी की शुरुआत तक कुछ भी फ़ल नही देता है शनि जातक के पिता की आय पर और खुद की कमाई पर प्रभाव देने लगता है। सूर्य जब भी खराब होता है लार आना शुरु हो जाता है,कभी कभी शरीर का कोई एक हिस्सा अचानक काम करना बन्द कर देता है और उसी समय मे शरीर की हड्डी का टूटना या लम्बे समय के लिये चल फ़िर नही पाना आदि बाते भी देखी जाती है। जातक के पहले घर मे सूर्य के साथ अन्य कोई शत्रु ग्रह होता है तो वह सूर्य पर अपना प्रभाव डालने लगता है और जातक को कष्ट देता है लेकिन कोई भी कष्ट दिन के समय मे नही होता है रात को ही कष्ट होना माना जाता है,अगर सूर्य और शनि आमने सामने है तो कष्ट नही मिल पाते है इसका कारण होता है कि दिन मे सूर्य बचाता है और रात मे शनि रक्षा करने वाला होता है इसलिये पहले घर मे सूर्य को उच्च का कहा जाता है और सप्तम स्थान मे शनि को उच्च का कहा गया है।लाल किताब के अनुसार शुक्र और बुद्ध एक ही जगह हैं, तो वे सूर्य हैं। सूर्य गुरु के साथ है, तो चन्द्र है। सूर्य बुध के साथ है, तो मंगल नेक है। सूर्य शनि के साथ है, तो मंगल बद राहु होगा।Surya according to Lal Kitab /
जगत का स्वामी सूर्य है सभी ग्रह और नक्षत्र सूर्य के आसपास ही चक्कर लगा रहे है,वेदो मे सूर्य की आराधना सबसे अच्छी मानी गयी है जो भी संसार मे दिखाई देता है वह सब सूर्य की कृपा से ही सम्भव है,विद्वान लोग सूर्य आराधना के लिये मुख्य स्तोत्र विष्णु सहस्त्र नाम को ही मानते है। सूर्य का कुंडली मे पक्का घर एक पांच आठ नौ ग्यारह और बारह को ही कहा गया है सूर्य के मित्र ग्रहो में चन्द्रमा को भी माना गया है गुरु भी सूर्य का मित्र है और मंगल को भी सूर्य का मित्र तथा सहायक और सूर्य की रक्षा करने वाला कालान्तर के लिये सूर्य की गर्मी को सोख कर सूर्य की अनुपस्थिति मे संसार को गर्मी देने वाला माना गया है। साथ ही धरती के अन्दर के जीवो को गर्मी देने के लिये सूर्य का सहायक मंगल ही काम करता और उर्जा को देने के लिये अपनी शक्ति से सूर्य की गर्मी को सोख कर जीवो को प्रदान काता है। सूर्य पहले घर मे उच्च का माना जाता है और सातवे घर मे नीच का माना जाता है।
सूर्य का समय सुबह सूर्योदय से एक घंटे के लिये और दिन रविवार माना गया है।सूर्य के खराब होने बुखार आना आंखो की रोशनी कम होना दिमाग के चढे रहने से सिर की तकलीफ़ रहना आदि माना जाता है साथ ही बिना बात के सरकारी आफ़तो का आना भी सूर्य के कारण ही होता है। सूर्य के बिना जो जीवन मे अपनी गति को प्रदान करने वाले ग्रह बुध और बुध के बाद शुक तथा शुक्र के बाद चन्द्रमा फ़िर धरती और उसके बाद मंगल को माना जाता है शुक्र और बुध को सूर्य के अधिक पास होने के कारण मनसुई ग्रह की उपाधि भी दी गयी है। जब जातक की कुंडली मे सूर्य पहले पांचवे और ग्यारहवे घर मे होता है तो इसकी शक्ति को श्रेष्ठ माना जाता है जब भी मंगल छठे घर मे होता है और केतु अगर पहले घर मे हो तो भी सूर्य सही फ़ल प्रदान करता है सूर्य की शक्ति कभी नीच की नही होती है यह अपनी नीचता को दूसरे ग्रह से जोड कर प्रदान करता है। सूर्य के अच्छे होने की पहिचान होती है कि व्यक्ति का हड्डी का ढांचा सुडौल और ऊंचा होने से लम्बाई और चौडाई अच्छी होती है सूर्य का कारक अंग आंखे होने से आंखे बडी और चमकदार होती है सूर्य से पहिचान का कारण होने से सूर्य उच्च कुल मे जन्म देने के साथ साथ चेहरे पर राजसी चमक का देने वाला भी होता है। सूर्य की शक्ति के कारण ही जातक के अन्दर साहस भी होता है हिम्मत भी होती है और जहां भी नीचता वाले कारण यानी शनि की सीमा शुरु होती है सूर्य के पहुंचने के साथ ही शनि की सीमा समाप्त हो जाती है। सूर्य किसी भी विकट परिस्थिति मे जिन्दा रखने की ताकत देता है यह जंगलो मे निवास के समय जडी बूटियों की पहिचान करवा देता है महलो मे रहने पर राजसी ठाटबाट को भी देने वाला होता है और राजसी कारणो को समझाने वाला और कानून को बनाने वाला भी माना जाता है। सूर्य अगर सशक्त है तो कोई भी दुश्मन ठहर नही पाता है वह पीठ पीछे बुराई कर सकता है लेकिन सामने आकर जी हुजूरी ही करता है। मंगल के साथ अगर सूर्य सही होता है तो वह रक्षा सेवा या सामाजिक कारणो मे अपने नाम और यश को फ़ैलाने मे सहायक हो जाता है। लेकिन शनि की नीचता के आते ही यानी किसी भी कारण मे रिस्वत तामसी भोजन या पर स्त्री पर पुरुष के संसर्ग से अपनी शक्ति को समेट लेता है साथ ही आगे के जीवन को घोर यातना मे ले जाता है शनि के सवार होते ही राहु का प्रकोप शुरु हो जाता है और जेल जाना या अस्पताल मे अपनी जिन्दगी को काटने के लिये मजबूर कर देता है। जब भी बेकार के ख्याल आने लगे लोग अधिक चमचागीरी करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि सूर्य खराब होना शुरु हो गया है। सूर्य कभी भी दूसरो के ऊपर मोहताज नही होता है वह हमेशा अपनी कमाई पर ही निर्भर रहने वाला होता है उसे दान और इसी प्रकार के कारण देने तो आते है लेकिन वह लेना नही जानता है,सूर्य श्रेष्ठ वाला व्यक्ति कभी भी अपनी मर्यादा से बाहर नही जाता है वह अपनी जाति कुल और समाज को पहले देखकर चलने वाला होता है। सूर्य के सही फ़ल देने के कारण सभी ग्रह अपने अपने समय मे अच्छा फ़ल देने लगते है लेकिन बुध उम्र की जवानी की शुरुआत तक कुछ भी फ़ल नही देता है शनि जातक के पिता की आय पर और खुद की कमाई पर प्रभाव देने लगता है। सूर्य जब भी खराब होता है लार आना शुरु हो जाता है,कभी कभी शरीर का कोई एक हिस्सा अचानक काम करना बन्द कर देता है और उसी समय मे शरीर की हड्डी का टूटना या लम्बे समय के लिये चल फ़िर नही पाना आदि बाते भी देखी जाती है। जातक के पहले घर मे सूर्य के साथ अन्य कोई शत्रु ग्रह होता है तो वह सूर्य पर अपना प्रभाव डालने लगता है और जातक को कष्ट देता है लेकिन कोई भी कष्ट दिन के समय मे नही होता है रात को ही कष्ट होना माना जाता है,अगर सूर्य और शनि आमने सामने है तो कष्ट नही मिल पाते है इसका कारण होता है कि दिन मे सूर्य बचाता है और रात मे शनि रक्षा करने वाला होता है इसलिये पहले घर मे सूर्य को उच्च का कहा जाता है और सप्तम स्थान मे शनि को उच्च का कहा गया है।लाल किताब के अनुसार शुक्र और बुद्ध एक ही जगह हैं, तो वे सूर्य हैं। सूर्य गुरु के साथ है, तो चन्द्र है। सूर्य बुध के साथ है, तो मंगल नेक है। सूर्य शनि के साथ है, तो मंगल बद राहु होगा।Surya according to Lal Kitab /
ग्रहों में चन्द्र (ठंडक-सर्दी), मंगल (लाली) और बुध (खाली घेरा) सूर्य के आवश्यक अंग हैं। इन ग्रहों का सूर्य के साथ होना शुभ है। सूर्य के साथ राहु-केतु के आ जाने पर ग्रहण माना जाएगा। पहले घर को जगाने के लिए मंगल का उपाय और 5वें के लिए सूर्य का उपाय करना चाहिएं सूर्य जब भी राहु के साथ होगा आदमी के विचार गंदे हो जायेंगे वह जब भी सोचेगा गलत ही सोचेगा,सूर्य और शनि की टकराव वाली स्थिति मे चन्द्रमा दिक्कत मे आजाता है यानी घर मे अगर पिता पुत्र आपस मे टकराने लगे तो माता को कष्ट पहुंचता है इसी प्रकार से अगर यह स्थिति हो तो सूर्य के विरोधी ग्रहो का उपचार करने से सूर्य और शनि की स्थिति सही होने लगती है।सूर्य अगर जन्म कुंडली के छठे या सातवे भाव मे हो तो किसी भी काम को शुरु करने से पहले कुछ मीठा खाकर काम शुरु करना चाहिये.इसके बाद जनता मे मीठी वस्तुयें बांटने से भी फ़ायदा होता है,रत्न धारण मे सूर्य जब अपने नक्षत्र मे हो उस समय सुबह के समय रविवार को Rd मे या सोने मे माणिक का पहिनना ठीक होता है।
लाल किताब के अनुसार सुर्य/Surya according to Lal Kitab /
www.acharyarajesh.in
जगत का स्वामी सूर्य है सभी ग्रह और नक्षत्र सूर्य के आसपास ही चक्कर लगा रहे है,वेदो मे सूर्य की आराधना सबसे अच्छी मानी गयी है जो भी संसार मे दिखाई देता है वह सब सूर्य की कृपा से ही सम्भव है,विद्वान लोग सूर्य आराधना के लिये मुख्य स्तोत्र विष्णु सहस्त्र नाम को ही मानते है। सूर्य का कुंडली मे पक्का घर एक पांच आठ नौ ग्यारह और बारह को ही कहा गया है सूर्य के मित्र ग्रहो में चन्द्रमा को भी माना गया है गुरु भी सूर्य का मित्र है और मंगल को भी सूर्य का मित्र तथा सहायक और सूर्य की रक्षा करने वाला कालान्तर के लिये सूर्य की गर्मी को सोख कर सूर्य की अनुपस्थिति मे संसार को गर्मी देने वाला माना गया है। साथ ही धरती के अन्दर के जीवो को गर्मी देने के लिये सूर्य का सहायक मंगल ही काम करता और उर्जा को देने के लिये अपनी शक्ति से सूर्य की गर्मी को सोख कर जीवो को प्रदान काता है। सूर्य पहले घर मे उच्च का माना जाता है और सातवे घर मे नीच का माना जाता है।
सूर्य का समय सुबह सूर्योदय से एक घंटे के लिये और दिन रविवार माना गया है।सूर्य के खराब होने बुखार आना आंखो की रोशनी कम होना दिमाग के चढे रहने से सिर की तकलीफ़ रहना आदि माना जाता है साथ ही बिना बात के सरकारी आफ़तो का आना भी सूर्य के कारण ही होता है। सूर्य के बिना जो जीवन मे अपनी गति को प्रदान करने वाले ग्रह बुध और बुध के बाद शुक तथा शुक्र के बाद चन्द्रमा फ़िर धरती और उसके बाद मंगल को माना जाता है शुक्र और बुध को सूर्य के अधिक पास होने के कारण मनसुई ग्रह की उपाधि भी दी गयी है। जब जातक की कुंडली मे सूर्य पहले पांचवे और ग्यारहवे घर मे होता है तो इसकी शक्ति को श्रेष्ठ माना जाता है जब भी मंगल छठे घर मे होता है और केतु अगर पहले घर मे हो तो भी सूर्य सही फ़ल प्रदान करता है सूर्य की शक्ति कभी नीच की नही होती है यह अपनी नीचता को दूसरे ग्रह से जोड कर प्रदान करता है। सूर्य के अच्छे होने की पहिचान होती है कि व्यक्ति का हड्डी का ढांचा सुडौल और ऊंचा होने से लम्बाई और चौडाई अच्छी होती है सूर्य का कारक अंग आंखे होने से आंखे बडी और चमकदार होती है सूर्य से पहिचान का कारण होने से सूर्य उच्च कुल मे जन्म देने के साथ साथ चेहरे पर राजसी चमक का देने वाला भी होता है। सूर्य की शक्ति के कारण ही जातक के अन्दर साहस भी होता है हिम्मत भी होती है और जहां भी नीचता वाले कारण यानी शनि की सीमा शुरु होती है सूर्य के पहुंचने के साथ ही शनि की सीमा समाप्त हो जाती है। सूर्य किसी भी विकट परिस्थिति मे जिन्दा रखने की ताकत देता है यह जंगलो मे निवास के समय जडी बूटियों की पहिचान करवा देता है महलो मे रहने पर राजसी ठाटबाट को भी देने वाला होता है और राजसी कारणो को समझाने वाला और कानून को बनाने वाला भी माना जाता है। सूर्य अगर सशक्त है तो कोई भी दुश्मन ठहर नही पाता है वह पीठ पीछे बुराई कर सकता है लेकिन सामने आकर जी हुजूरी ही करता है। मंगल के साथ अगर सूर्य सही होता है तो वह रक्षा सेवा या सामाजिक कारणो मे अपने नाम और यश को फ़ैलाने मे सहायक हो जाता है। लेकिन शनि की नीचता के आते ही यानी किसी भी कारण मे रिस्वत तामसी भोजन या पर स्त्री पर पुरुष के संसर्ग से अपनी शक्ति को समेट लेता है साथ ही आगे के जीवन को घोर यातना मे ले जाता है शनि के सवार होते ही राहु का प्रकोप शुरु हो जाता है और जेल जाना या अस्पताल मे अपनी जिन्दगी को काटने के लिये मजबूर कर देता है। जब भी बेकार के ख्याल आने लगे लोग अधिक चमचागीरी करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि सूर्य खराब होना शुरु हो गया है। सूर्य कभी भी दूसरो के ऊपर मोहताज नही होता है वह हमेशा अपनी कमाई पर ही निर्भर रहने वाला होता है उसे दान और इसी प्रकार के कारण देने तो आते है लेकिन वह लेना नही जानता है,सूर्य श्रेष्ठ वाला व्यक्ति कभी भी अपनी मर्यादा से बाहर नही जाता है वह अपनी जाति कुल और समाज को पहले देखकर चलने वाला होता है। सूर्य के सही फ़ल देने के कारण सभी ग्रह अपने अपने समय मे अच्छा फ़ल देने लगते है लेकिन बुध उम्र की जवानी की शुरुआत तक कुछ भी फ़ल नही देता है शनि जातक के पिता की आय पर और खुद की कमाई पर प्रभाव देने लगता है। सूर्य जब भी खराब होता है लार आना शुरु हो जाता है,कभी कभी शरीर का कोई एक हिस्सा अचानक काम करना बन्द कर देता है और उसी समय मे शरीर की हड्डी का टूटना या लम्बे समय के लिये चल फ़िर नही पाना आदि बाते भी देखी जाती है। जातक के पहले घर मे सूर्य के साथ अन्य कोई शत्रु ग्रह होता है तो वह सूर्य पर अपना प्रभाव डालने लगता है और जातक को कष्ट देता है लेकिन कोई भी कष्ट दिन के समय मे नही होता है रात को ही कष्ट होना माना जाता है,अगर सूर्य और शनि आमने सामने है तो कष्ट नही मिल पाते है इसका कारण होता है कि दिन मे सूर्य बचाता है और रात मे शनि रक्षा करने वाला होता है इसलिये पहले घर मे सूर्य को उच्च का कहा जाता है और सप्तम स्थान मे शनि को उच्च का कहा गया है।लाल किताब के अनुसार शुक्र और बुद्ध एक ही जगह हैं, तो वे सूर्य हैं। सूर्य गुरु के साथ है, तो चन्द्र है। सूर्य बुध के साथ है, तो मंगल नेक है। सूर्य शनि के साथ है, तो मंगल बद राहु होगा।Surya according to Lal Kitab /
जगत का स्वामी सूर्य है सभी ग्रह और नक्षत्र सूर्य के आसपास ही चक्कर लगा रहे है,वेदो मे सूर्य की आराधना सबसे अच्छी मानी गयी है जो भी संसार मे दिखाई देता है वह सब सूर्य की कृपा से ही सम्भव है,विद्वान लोग सूर्य आराधना के लिये मुख्य स्तोत्र विष्णु सहस्त्र नाम को ही मानते है। सूर्य का कुंडली मे पक्का घर एक पांच आठ नौ ग्यारह और बारह को ही कहा गया है सूर्य के मित्र ग्रहो में चन्द्रमा को भी माना गया है गुरु भी सूर्य का मित्र है और मंगल को भी सूर्य का मित्र तथा सहायक और सूर्य की रक्षा करने वाला कालान्तर के लिये सूर्य की गर्मी को सोख कर सूर्य की अनुपस्थिति मे संसार को गर्मी देने वाला माना गया है। साथ ही धरती के अन्दर के जीवो को गर्मी देने के लिये सूर्य का सहायक मंगल ही काम करता और उर्जा को देने के लिये अपनी शक्ति से सूर्य की गर्मी को सोख कर जीवो को प्रदान काता है। सूर्य पहले घर मे उच्च का माना जाता है और सातवे घर मे नीच का माना जाता है।
सूर्य का समय सुबह सूर्योदय से एक घंटे के लिये और दिन रविवार माना गया है।सूर्य के खराब होने बुखार आना आंखो की रोशनी कम होना दिमाग के चढे रहने से सिर की तकलीफ़ रहना आदि माना जाता है साथ ही बिना बात के सरकारी आफ़तो का आना भी सूर्य के कारण ही होता है। सूर्य के बिना जो जीवन मे अपनी गति को प्रदान करने वाले ग्रह बुध और बुध के बाद शुक तथा शुक्र के बाद चन्द्रमा फ़िर धरती और उसके बाद मंगल को माना जाता है शुक्र और बुध को सूर्य के अधिक पास होने के कारण मनसुई ग्रह की उपाधि भी दी गयी है। जब जातक की कुंडली मे सूर्य पहले पांचवे और ग्यारहवे घर मे होता है तो इसकी शक्ति को श्रेष्ठ माना जाता है जब भी मंगल छठे घर मे होता है और केतु अगर पहले घर मे हो तो भी सूर्य सही फ़ल प्रदान करता है सूर्य की शक्ति कभी नीच की नही होती है यह अपनी नीचता को दूसरे ग्रह से जोड कर प्रदान करता है। सूर्य के अच्छे होने की पहिचान होती है कि व्यक्ति का हड्डी का ढांचा सुडौल और ऊंचा होने से लम्बाई और चौडाई अच्छी होती है सूर्य का कारक अंग आंखे होने से आंखे बडी और चमकदार होती है सूर्य से पहिचान का कारण होने से सूर्य उच्च कुल मे जन्म देने के साथ साथ चेहरे पर राजसी चमक का देने वाला भी होता है। सूर्य की शक्ति के कारण ही जातक के अन्दर साहस भी होता है हिम्मत भी होती है और जहां भी नीचता वाले कारण यानी शनि की सीमा शुरु होती है सूर्य के पहुंचने के साथ ही शनि की सीमा समाप्त हो जाती है। सूर्य किसी भी विकट परिस्थिति मे जिन्दा रखने की ताकत देता है यह जंगलो मे निवास के समय जडी बूटियों की पहिचान करवा देता है महलो मे रहने पर राजसी ठाटबाट को भी देने वाला होता है और राजसी कारणो को समझाने वाला और कानून को बनाने वाला भी माना जाता है। सूर्य अगर सशक्त है तो कोई भी दुश्मन ठहर नही पाता है वह पीठ पीछे बुराई कर सकता है लेकिन सामने आकर जी हुजूरी ही करता है। मंगल के साथ अगर सूर्य सही होता है तो वह रक्षा सेवा या सामाजिक कारणो मे अपने नाम और यश को फ़ैलाने मे सहायक हो जाता है। लेकिन शनि की नीचता के आते ही यानी किसी भी कारण मे रिस्वत तामसी भोजन या पर स्त्री पर पुरुष के संसर्ग से अपनी शक्ति को समेट लेता है साथ ही आगे के जीवन को घोर यातना मे ले जाता है शनि के सवार होते ही राहु का प्रकोप शुरु हो जाता है और जेल जाना या अस्पताल मे अपनी जिन्दगी को काटने के लिये मजबूर कर देता है। जब भी बेकार के ख्याल आने लगे लोग अधिक चमचागीरी करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि सूर्य खराब होना शुरु हो गया है। सूर्य कभी भी दूसरो के ऊपर मोहताज नही होता है वह हमेशा अपनी कमाई पर ही निर्भर रहने वाला होता है उसे दान और इसी प्रकार के कारण देने तो आते है लेकिन वह लेना नही जानता है,सूर्य श्रेष्ठ वाला व्यक्ति कभी भी अपनी मर्यादा से बाहर नही जाता है वह अपनी जाति कुल और समाज को पहले देखकर चलने वाला होता है। सूर्य के सही फ़ल देने के कारण सभी ग्रह अपने अपने समय मे अच्छा फ़ल देने लगते है लेकिन बुध उम्र की जवानी की शुरुआत तक कुछ भी फ़ल नही देता है शनि जातक के पिता की आय पर और खुद की कमाई पर प्रभाव देने लगता है। सूर्य जब भी खराब होता है लार आना शुरु हो जाता है,कभी कभी शरीर का कोई एक हिस्सा अचानक काम करना बन्द कर देता है और उसी समय मे शरीर की हड्डी का टूटना या लम्बे समय के लिये चल फ़िर नही पाना आदि बाते भी देखी जाती है। जातक के पहले घर मे सूर्य के साथ अन्य कोई शत्रु ग्रह होता है तो वह सूर्य पर अपना प्रभाव डालने लगता है और जातक को कष्ट देता है लेकिन कोई भी कष्ट दिन के समय मे नही होता है रात को ही कष्ट होना माना जाता है,अगर सूर्य और शनि आमने सामने है तो कष्ट नही मिल पाते है इसका कारण होता है कि दिन मे सूर्य बचाता है और रात मे शनि रक्षा करने वाला होता है इसलिये पहले घर मे सूर्य को उच्च का कहा जाता है और सप्तम स्थान मे शनि को उच्च का कहा गया है।लाल किताब के अनुसार शुक्र और बुद्ध एक ही जगह हैं, तो वे सूर्य हैं। सूर्य गुरु के साथ है, तो चन्द्र है। सूर्य बुध के साथ है, तो मंगल नेक है। सूर्य शनि के साथ है, तो मंगल बद राहु होगा।Surya according to Lal Kitab /
ग्रहों में चन्द्र (ठंडक-सर्दी), मंगल (लाली) और बुध (खाली घेरा) सूर्य के आवश्यक अंग हैं। इन ग्रहों का सूर्य के साथ होना शुभ है। सूर्य के साथ राहु-केतु के आ जाने पर ग्रहण माना जाएगा। पहले घर को जगाने के लिए मंगल का उपाय और 5वें के लिए सूर्य का उपाय करना चाहिएं सूर्य जब भी राहु के साथ होगा आदमी के विचार गंदे हो जायेंगे वह जब भी सोचेगा गलत ही सोचेगा,सूर्य और शनि की टकराव वाली स्थिति मे चन्द्रमा दिक्कत मे आजाता है यानी घर मे अगर पिता पुत्र आपस मे टकराने लगे तो माता को कष्ट पहुंचता है इसी प्रकार से अगर यह स्थिति हो तो सूर्य के विरोधी ग्रहो का उपचार करने से सूर्य और शनि की स्थिति सही होने लगती है।सूर्य अगर जन्म कुंडली के छठे या सातवे भाव मे हो तो किसी भी काम को शुरु करने से पहले कुछ मीठा खाकर काम शुरु करना चाहिये.इसके बाद जनता मे मीठी वस्तुयें बांटने से भी फ़ायदा होता है,रत्न धारण मे सूर्य जब अपने नक्षत्र मे हो उस समय सुबह के समय रविवार को Rd मे या सोने मे माणिक का पहिनना ठीक होता है।
मंगलवार, 24 मार्च 2020
शक्ति की उपासना
जगत में शक्ति के बिना कोई काम सफल नहीं होता है। चाहे आपका सिद्धांत कितना भी अच्छा हो, आपके विचार कितने ही सुंदर हों लेकिन अगर आप शक्तिहीन हैं तो आपके विचारों का कोई मूल्य नहीं होगा। विचार अच्छा है, सिद्धांत अच्छा है, इसीलिए सर्वमान्य हो जाता है ऐसा नहीं है। शक्ति ही जीवन है और जीवन ही शक्ति है
शक्ति उपासना व साधना के विविध प्रयोग अनादिकाल से साधको ने किये है,जिसके अनेक विधि-विधायें मिलती है शक्ति उपासना से लोकजीवन में सहज अभिष्ट सिद्धि प्राप्त होती रही है ।इस लिए इसके प्रति गहरा आकर्षण भी रहा है,इस मार्ग के अनुयायी बडे बडे साधु महात्मा हो गये है। परन्तु वर्तमान काल मे इस उपासना के रूप और स्वरूप मे प्राय: ऐसा परिवर्तन देखने मे आता है जिससे विदित होता है किस इस मार्ग के साधारण उपासक अधिकांश मे इस उपासना के वास्तविक रूप और स्वरूप से अपरिचित है। शक्ति का अर्थ सभी को पता है और उपासना का अर्थ पास मे होना अपने समीप समझना माना जाता है। शक्ति साधना का मतलब होता है कि उस साधन के समीप बैठा जाये या उस साधन को प्रयोग किया जाये जिससे शक्ति की प्राप्ति हो। शक्ति कोई भौतिक रूप मे देखने को भी मिलती है और आध्यात्मिक तरीके से भी महसूस की जाती है। मनुष्य के अन्दर जब ज्ञान के नेत्र खुल जाते है वह जड पदार्थो की सहायता से भौतिक शक्ति का निर्माण कर देता है जैसे सिलीकोन जो एक मिट्टी की तरह की राख ही है,इस राख के अन्दर वह तरह तरह के प्रयोग करने के बाद कम्पयूटर जैसी याद दास्त को संजोकर रखने वाली चीजों का निर्माण कर सकने मे समर्थ हो सकता है। शक्ति का बीज सबसे पहले मनुष्य के शरीर मे ही उपस्थिति होता है। इसी शक्ति की सहायता से माया को अपने आधीन किया जाता है। माया के आधीन होने पर जीव निर्बन्ध होकर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। इस नजर से शक्ति उपासना को मुक्ति का साधन भी माना गया है। शक्ति के रूप और स्वरूप को बिना बताये या समझे उपासना का मतलब भी समझ मे नही आ सकता है। इसलिये शक्ति के रूप और स्वरूप को समझना बेहद जरूरी है।
मनुष्य शरीर एक लघु ब्रह्माण्ड है। ब्रह्माण्ड मे रहने वाले सभी पदार्थ लघु रूप मे मनुष्य शरीर मे विद्यमान है। इस प्रकार से जो भी उपासक कुछ प्राप्त करने का प्रयत्न करता है वह अपने साधनों से अपने अन्दर की शक्ति को इकट्ठा करने के बाद ही प्राप्त करता है। जो भी पदार्थों के रूप मे शरीर मे विद्यमान तत्व है उन्हे इकट्ठा करने के बाद ही वह उन्हे वश मे करता है। और उन पदार्थो को अपने वश मे लाकर प्रयोग मे लाता है। इस प्रकार से इस माया को जीतने की शक्ति प्राप्त करने का इच्छुक है वह शक्ति उपासना से अपने भीतर रहने वाले उस शक्ति तत्व को बल देकर उसे काम मे लाता है। जिससे माया उसके आधीन हो जाती है। इसके बाद जो महत्वपूर्ण बात है कि वे साधन कौन कौन से हैं जिनके द्वारा माया को अपने आधीन रखने की शक्ति को प्राप्त किया जाये ? उन्ही साधनो को जानना उन साधनो के रूप और स्वरूप को समझना ही शक्ति उपासना के रूप और स्वरूप को समझना माना गया है।
प्राचीन ऋषियों महात्माओं ने अपनी खोज के द्वारा दो प्रकार के शक्ति उपासना के रूप और स्वरूप पहिचाने है। जिसमे पहला होता है योग साधन और दूसरा होता है मंत्र जाप। योग के अन्दर अष्टांग योग लय योग सुरत शब्द योग राजयोग हंस योग आदि की अनगिनत शाखायें है। दूसरा साधन मंत्र जाप को माना है। आजकल की भागम-भाग जिन्दगी मे योग साधन को अपनाना बहुत ही कठिन है साथ ही आहार विहार का समय स्थान आदि भी नही मिलता है,कंकरीट के जंगल मे पेडों की हरियाली खोजने मे ही इतना समय लग जायेगा कि योग तो धरा रह जायेगा और रोजाना की जिन्दगी की जरूरते भी पूरी नही हो पायेंगी इसलिये मंत्र जाप का करना हर व्यक्ति की पहुँच मे है।मंत्रो के भी दो भाग बताये गये है एक तो वेदोक्त होता है और दूसरा साबर मंत्रो के रूप मे जाना जाता है। वैदिक मंत्रो का प्रयोग साबर मंत्रो से बहुत ऊँचा माना जाता है क्योंकि उनकी शुद्धता वेदों से परख कर ही प्रकट की जाती है जबकि साबर मंत्र स्थानीय लोगों द्वारा पता नही किस देवता आदि के लिये प्रयोग किये जाते है उनके बोलने की कला और भाव प्रकट करना वश की बात नही होती है। लेकिन वैदिक मंत्र को कहीं से भी खोजा भी जा सकता है और उसके भाव को भी तरह तरह के स्थान और कारणो से समझा भी जा सकता है। वैदिक मंत्र के जप से फ़ल भी शीघ्रता से मिलता है,परन्तु मन्त्र जाप की सफ़लता के लिये भी दो नियम जरूरी है। पहला तो मंत्र का उच्चारण शुद्ध होना चाहिये,उच्चारण मे जरा सी गल्ती से मिलने वाले लाभ की जगह पर हानि होने की अधिक सम्भावना भी रहती है। दूसरा नियम मंत्र जाप विधिपूर्वक होना चाहिये,बिना विधि के जाप करने से भी फ़ायदा की जगह पर नुकसान होने का कारण बन जाता है।
आजकल वैदिक मंत्रो का जाप प्राय: लुप्त सा हो गया है,साबर मंत्रो का प्रचलन है और उनकी विधि को सही रूप से नही समझने या समझाने वाले नही मिलने के कारण भी अगर कोई साधक मंत्रो का प्रयोग जाप मे लेता है तो वह अपनी मेहनत के द्वारा जाप भी करता है भाव भी बनाता है,लेकिन विधि आदि नही मिलने से वह जाप निष्फ़ल हो जाता है। लोग इसी कारण से मंत्र जाप को बेकार समझने लगते है और ढोंग आदि करने के नाम से पुकारने लगते है। इसके अलावा भी लोगो के द्वारा सुना जा सकता है कि जाप करना केवल अपने समय को खराब करना होता है। केवल मूर्ख लोग ही इनपर विश्वास करते है आदि बातें कहने के अलावा एक बात और कह दी जाती है कि भगवान शंकर ने इन मंत्रों को कील दिया है जिससे यह अपने प्रभाव को नही दे पाते। परन्तु यह सब कपोल कल्पित ही माना जाता है। यह सब बाते मूल सिद्धांतो को नही जानने के कारण ही कहीं जाती है। मंत्रो के जाप के प्रति सूक्ष्म विचार करना बहुत जरूरी है।यह बात सभी को पता है कि जो शब्द कहा जाता है उसका उच्चारण करते ही उसका प्रकम्पन वायु मंडल मे फ़ैल जाता है। जब मुँह से कोई उच्चारण किया जाता है तो बाहर के वायु मंडल मे और ह्रदय मे उच्चारण करने से शरीर के अन्दर के वायु मंडल मे प्रकम्पन पैदा होता है। इसलिये जो शब्द मुँह से उच्चारित किये जाते है वे कम असरकारक होते है,ह्रदय से उच्चारण किये गये शब्द काफ़ी समय तक शरीर के वायु मंडल मे फ़ैले रहते है। इस प्रकम्पन से जो चिन्ह वायुमंडल मे बनते है वे तब तक वायु मंडल मे घूमते रहते है जब तक कोई पदार्थ उनको अपने भीतर सोख नही लेता या वे फ़ैलते फ़ैलते इतने कमजोर नही हो जाते कि उनका भाव भी नकारात्मक के समान हो जाता है। किसी मंत्र की विधि पूर्वक की गयी शुरुआत का कारण अक्सर श्रद्धालुओं को समझने मे जब आने लगता है जब अक्समात मंत्र को शुरु करते ही बडी बडी जमुहाइयां आने लगती है आंखो से आंसू बहने लगते है। शब्दों से उत्पन्न होने वाला प्रकम्पन उच्चारण भेद के अनुसार भिन्न भिन्न प्रकार के चिन्ह इसी प्रकार से बनाने लगता है जैसे जमुहाई आना आंसू निकलना किसी अंग विशेष का फ़डकने लग जाना,तन्द्रा का आने लगना आदि। इस बात को और अधिक गहराई से समझने के लिये आजकल प्रयोग मे लाये जाने वाले इलेक्ट्रोनिक साधनों को ही देख लीजिये। जैसे वायुमंडल मे चिन्ह बनते है उसी प्रकार से इलेक्ट्रोनिक डिवाइस मे चिन्ह बनाकर इसी प्रयोग को काम मे लाया जाता है। सीडी पेन ड्राइव कम्पयूटर की डिवाइस आदि मे जब भौतिक रूप से चिन्ह बन सकते है तो मानना ही पडेगा कि वायु मंडल मे उपस्थित ईथर मे भी चिन्ह बनते है।
किसी मंत्र के जाप से क्या फ़ल मिलता है यह बात उसका उपयोग किये बिना नही पता लग सकती है। यह बात जरूरी है कि जो वेदो मे लिखा गया है वह अगर विधि पूर्वक से जाप मे लाया जायेगा तो फ़ल सदा ही एकसा ही निकलेगा। कारण ऋषि मुनि साधक योगी महायोगी जो भी कहते आये है वह कभी गलत नही हो सकता है। अगर मंत्र जाप के बाद कोई फ़ल नही मिल रहा है तो अवश्य समझ लेना चाहिये कि उस मंत्र के साधन या विधि मे कोई गलती हो गयी है।
संसार की किसी भी भाषा मे जो शब्द बनते है उनके उच्चारण के पांच स्थान ही हैं। होंठ जीभ दांत तालू और कण्ठ। इन स्थानो मे पंच तत्व विद्यमान होते है। जैसे होंठ पृथ्वी तत्व है,जीभ जल तत्व है,दांत अग्नि तत्व है,तालू वायु तत्व है और कंठ आकाश तत्व का स्थान है। जब मंत्रो के ऐसे अक्षर या शब्द जिनका उच्चारण होंठों से होता है तो वे पृथ्वी तत्व को सबल बनाने मे सहायक होते है,लेकिन पृथ्वी तत्व को प्राप्त करने का भी समय होता है। अगर पृथ्वी तत्व के समय में पृथ्वी तत्व की प्राप्ति के मंत्रो का जाप किया जाता है तो पृथ्वी तत्व की प्राप्ति हो जायेगी और अगर पृथ्वी तत्व को जल तत्व के समय मे जाप किया जाता है तो पृथ्वी तत्व के अन्दर जल तत्व का समावेश हो जाने से बजाय पृथ्वी तत्व के दलदल की प्राप्ति हो जायेगी,जो हानिकारक भी हो सकती है,अथवा पृथ्वी तत्व के समय अग्नि तत्व के समय मे या मिश्रण कर दिया गया तो वह गर्म आग की तरह से गर्म रेत का प्रभाव देने लगेगा। जैसे मानसिक परेशानियों के समय में ज्योतिष से चन्द्रमा मे बढोत्तरी हो जाती है,उस समय मे अगर चन्द्रमा जो जल तत्व का कारक है,उसे कम करने के लिये केवल पृथ्वी तत्व का प्रयोग करना पडेगा,और बुध ग्रह के मंत्र जैसे ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सह बुद्धाय नम: का जाप करने से जल तत्व की कमी होने लगेगी।शरीर रूपी ब्रह्माण्ड के अन्दर तीन ब्रह्माण्ड बताये गये है। शरीर मे ऊपर का भाग पराब्रह्माण्ड कहा गया है,बीच का भाग स्वब्रह्माण्ड कहा गया है और नीचे का भाग अपराब्रह्माण्ड बताया गया है। स्वब्रह्माण्ड का सम्बन्ध विराट तत्व से पराब्रह्माण्ड का सम्बन्ध विद्युत तत्व से और अपराब्रह्माण्ड का सम्बन्ध शून्य तत्व से बना हुआ है। स्व के अन्दर कारण शक्तियां उपस्थित होती है और परा मे सूक्ष्म शक्तियां उपस्थित है,अपरा मे स्थूल शक्तियां उपस्थित होती है। मंत्र के जिन अक्षरो या शब्दो का प्रकम्पन होता है उनसे विराट तत्व सम्बन्धित कारण शक्तियों का विकास होता है,जिनसे परा मे प्रकम्पन होता है उनसे विद्युत सम्बन्धित सूक्ष्म शक्तियों का प्रकम्पन होता है। और जिनसे अपरा मे प्रकम्पन होता है उनसे शून्य तत्व सम्बन्धित स्थूल शक्तियों का विकास होता है। उदाहरण के लिये "राम" शब्द के उच्चारण से पराब्रह्माण्ड में प्रकम्पन होता है। इस शब्द मे र अक्षर के कारण को सबसे पहले तालू को जीभ स्पर्श करती है,तालू को वायु तत्व से जोड कर माना गया है,साथ ही जीभ जो जल तत्व की कारक है उससे वायु तत्व का मिश्रण होना जल तत्व को वायु तत्व के द्वारा सूक्ष्म तरीके से उठाने की क्षमता है,जैसे समुद्र के जल मे लहरे आने पर वायु के द्वारा समुद्र के पानी को अवशोषित कर लिया जाता है और हवा मे बादलो के रूप मे वही पानी सिमटा हुआ दिखाई देने लगता है। अक्षर र मे बडे आ की मात्रा लगाते ही कंठ से मिलने वाले आकाश तत्व का प्रवेश हो जाता है और जब म को कहा जाता है तो पृथ्वी तत्व के मालिक होंठ काम करने लगते है। होंठ को बन्द करने के बाद जो ध्वनि निकलती है वह नासिका से निकलती है जो पराब्रह्माण्ड के रूप मे एक सूक्ष्म विद्युत तरंग के रूप मे प्रसारित होती है। इस प्रकार से ह्रदय से लगातार राम शब्द को निकालते रहने से दैहिक दैविक और भौतिक तीनो शक्तियों का कारण शरीर मे पैदा हो जाता है और शरीर राममय हो जाता है। इसी प्रकार से अल्लाह शब्द मे कंठ तालू और जीभ का प्रयोग किया जाता है,जो आकाश तत्व जल तत्व को लेकर वायु तत्व के द्वारा आकाश तत्व मे ही समा जाता है। ईशा शब्द में भी आकाश तत्व को कंट्रोल करने के बाद जल तत्व को वायु तत्व से कन्ट्रोल करने के बाद आकाश तत्व मे सम्मिलित किया गया है। इन शब्दो के उच्चारण से सूक्ष्म शक्तियां जागृत होती है। ह्रीं शब्द के उच्चारण से स्वब्रह्माण्ड में प्रकम्पन होता है,अत: इस शब्द के उच्चारण से कारण शक्तियां जागृत हो जाती है,ध्री शब्द के उच्चारण से अपराब्रह्माण्ड मे प्रकम्पन होता है जिससे स्थूल शक्तियां जागृत हो जाती है। इस प्रकार की शक्तिया जब पूर्ण रूप से जागृत हो जाती है तब यह साधक के भाव के अनुसार एक विशेष रूप धारण करने के बाद उसके सामने प्रकट होने लगती है। साधक शक्ति के उस रूप से जो भी चाहत रखता है वह चाहत उस शक्ति के द्वारा उसे प्रदान की जाती है और साधक का जाप सफ़ल होने लगता है,परन्तु एकाग्र होकर और इन्द्रियों को जीतने के बाद ही यह शक्तियां जागृत होती है।
साबर मंत्रो के भी दो भेद होते है एक पैशाचिक और एक दैविक। पैशाचिक शक्ति के लिये इतना ही कहा जाता है कि वह कोई भी रूप लेकर प्रकट नही होती है। साधक के अन्दर उन शक्तियों का समावेश हो जाता है और वह मनचाहे तरीके से अपने कार्यों को करवाने लगता है। पैशाचिक शक्तियों मे जो भी कार्य करना होता है वह कार्य के बदले मे कुछ प्राप्त करने की चाहत रखती है अगर किये गये कार्यों की एवज मे कुछ दिया नही गया तो साधक के शरीर से भी वह शक्तियां चाहे गये तत्व को प्राप्त कर लेती है,इसलिये ही पैशाचिक शक्ति को प्रयोग करने वाले साधक अक्सर बुरी मौत से मरते हुये देखे जाते है। लेकिन दैविक शक्तिया कुछ बदले मे नहीं मांगती है वे केवल भला करने के लिये ही अपने रूप को प्रकट करती है और भला करने के बाद अपना रूप छुपा लेती है। इसके साथ यह भी माना जाता है कि अगर एक साधक दूसरे साधक की सिद्धि को नष्ट करने की कोशिश करता है तो उसकी स्वयं की सिद्धि नष्ट हो जाती है। लेकिन योग और ज्ञान मार्ग के उपासकों की सिद्धि कभी नष्ट नही होती है यह गीता मे भी बताया गया है। हमेशा मंत्र जाप को विधिविधान से ही करना चाहिये और इच्छित परा स्व और अपरा ब्रह्माण्ड के अनुसार ही मंत्रों का चुनाव करना चाहिये,तभी साधना सफ़ल हो सकती है।www.acharyarajesh.in
गुरुवार, 19 मार्च 2020
#(Coronavirus)#क्या कारण है ज्योतिष ग्रह योग क्यों फैला कोरोना और कब मिलेगी राहत?
www.acharyarajesh.in
कोरोना वायरस को लेकर पूरी दुनिया खौफजदा है। कोरोना चीन के वुहान शहर से सामने आया कोरोना वायरस आज पूरे विश्वभर में चर्चा के चरम पर है और एक महामारी का रूप ले चुका है। लाखों लोग इस वायरस से प्रभावित हो चुके हैं। कोरोना वायरस के रूप में शुरू हुई महामारी लगातार बढ़ती जा रही है। भारत में भी इसके बहुत से मामले सामने आने लगे हैं, लेकिन लोगों के मन में एक ही सवाल है कि इस वायरस से कब राहत मुक्ति मिलेगी।ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से देखें तो इस समय में कोरोना वायरस का सामने आना एवं महामारी का रूप लेना ये मात्र कोई संयोग नहीं है बल्कि इसके पीछे बहुत विशेष ज्योतिषीय कारण और वर्तमान ग्रह स्थितियां हैं। इसी वजह से कोरोना वायरस विश्वस्तर पर एक महामारी के रूप में फैलता जा रहा है।
कोरोना वायरस को लेकर पूरी दुनिया खौफजदा है। कोरोना चीन के वुहान शहर से सामने आया कोरोना वायरस आज पूरे विश्वभर में चर्चा के चरम पर है और एक महामारी का रूप ले चुका है। लाखों लोग इस वायरस से प्रभावित हो चुके हैं। कोरोना वायरस के रूप में शुरू हुई महामारी लगातार बढ़ती जा रही है। भारत में भी इसके बहुत से मामले सामने आने लगे हैं, लेकिन लोगों के मन में एक ही सवाल है कि इस वायरस से कब राहत मुक्ति मिलेगी।ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से देखें तो इस समय में कोरोना वायरस का सामने आना एवं महामारी का रूप लेना ये मात्र कोई संयोग नहीं है बल्कि इसके पीछे बहुत विशेष ज्योतिषीय कारण और वर्तमान ग्रह स्थितियां हैं। इसी वजह से कोरोना वायरस विश्वस्तर पर एक महामारी के रूप में फैलता जा रहा है।
ये ग्रह हैं संक्रामक बीमारियों के जिम्मेदारज्योतिष में राहु और केतु दोनों को संक्रमण (बैक्टीरिया, वायरस) इंफेक्शन से होने वाली सभी बीमारियों और छिपी हुई बीमारियों का ग्रह माना गया है। बृहस्पति जीव और जीवन का कारक ग्रह है जो हम सभी व्यक्तियों का प्रतिनिनधित्व करता है इसलिए जब भी बृहस्पति और राहु या बृहस्पति और केतु का योग होता है तब ऐसे समय में संक्रामक रोग और ऐसी बीमारिया फैलती हैं जिन्हें चिहि्नत करना अथवा समाधान कर पाना बहुत मुश्किल होता है पर इसमें भी खास बात ये है कि राहु के द्वारा होने वाली बीमारियों का समाधान तो फिर भी मिल जाता है, लेकिन केतु को एक गूढ़ और रहस्यवादी ग्रह माना गया है इसलिए जब भी बृहस्पति और केतु का विस्फोटक योग होता है तो ऐसे में इस तरह के रहस्मयी संक्रामक रोग सामने आते हैं जिनका समाधान आसानी से नहीं मिल पाता और ऐसा ही हो रहा है इस समय कोरोना वायरस के केससामने आ रहे है समझिए कोरोना वायरस के कारण
दरअसश मित्रों कोरोना वायरस ज्योतिष के अनुसार जो भी वायरस महामारी फैलता हैं वो राहु केतु और शनि से प्रभावित होता है, जो ऑक्सीजन को दूषित करके हवा को विषैला बनाते है
राहु का संबंध धुएं और आसमान दोनों से भी है। ऐसे ही कोई वायरस हवा में कहीं भी पहुंच जाता है। राहु आसमां ओर विस्तार का कारक है वहीं ऑक्सीजन हवा का कारक ग्रह बृहस्पति है। नाक के जरिए सांस लिया जाता है और ऑक्सीजन शरीर तक पहुंच कर जीवन प्रदान करती है।
शनि हवा में पैदा हुए कण हैं, जो इसको फैलाने में मदद करते हैं। अभी राहु अपनी उच्च राशि मिथुन में गोचर कर रहे हैं है। शनि अपनी मकर राशि में हैं और ये हमारी ऑक्सीजन को प्रभावित करते हैं। जिसका कारक ग्रह बृहस्पति है। नाक के जरिए सांस लिया जाता है और ऑक्सीजन शरीर तक पहुंच कर जीवन प्रदान करती है।
कोरोना वायरस का हमला श्वास के जरिए मानव शरीर में पहुंच कर नुकसान पहुंचा रहा है। पूरे ब्रह्मांड की ऑक्सीजन पर बृहस्पति का स्वामित्व स्थापित है। ऑक्सीजन बारिश के कारण पैदा होती है, जिससे पेड़-पौधे फलते-फूलते हैं और स्वच्छ वायु देते हैं। जिसका कारक ग्रह चंद्र है। वर्तमान समय में भारत पर कोरोना वायरस का असर शुरू हो चुका है।चंद्र और बृहस्पति दोनों ग्रह उत्तर दिशा को केंद्रित करते हैं। भारत में इसका असर उत्तरी भारत में ज्यादा होगा जैसे कि दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, पंजाब, राजस्थान, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर। होली के बाद इसका असर बढ़ा। अमावस्या से यानि कि 24 मार्च से इस कोरोना वायरस को और अधिक बढ़ावा मिलेगा।प्रवेश करेंगे, जहां शनि देव पहले से ही बैठे हैं।और मकर राशि में ही22 मार्च को मंगलदेव का आगमन हो रहा हैमिथुन राशि से गले के रोग देखे जाते हैं तथा कर्क राशि फेफड़े और जल संबंधित बीमारियों को दर्शाती है।
वर्तमान समय में राहु का गोचर मिथुन राशि में ही चल रहा है तथा मंगल भी बृहस्पति और केतु के साथ धनु राशि में बैठकर पूर्ण रूप से मिथुन और कर्क राशि को देख रहा है, मित्रों जैसा कि आपको पता ही है
मार्च 2019 से ही केतु धनु राशि में चल रहा है लेकिन चार नवम्बर 2019 को बृहस्पति का प्रवेश भी धनु राशि में हो गया था जिससे बृहस्पति और केतु का योग बन गया था जो के रहस्मयी संक्रामक रोगों को उत्पन्न करता है। चार नवम्बर को बृहस्पति और केतु का योग शुरू होने के बाद कोरोना वायरस का पहला केस चीन में नवम्बर के महीने में ही सामने आया था। यानि के नवम्बर में बृहस्पति-केतु का योग बनने के बाद ही कोरोना वायरस एक्टिव हुआ। इसके बाद एक और नकारात्मक ग्रहस्थिति बनी जो था 26 दिसंबर को होने वाला सूर्य-ग्रहण जिसने कोरोना वायरस को एक महामारी के रूप में बदल दिया। 26 दिसंबर को हुआ सूर्य ग्रहण समान्य नहीं था क्योंकि इस सूर्य ग्रहण के दिन छःग्रहों के (सूर्य, चन्द्रमा, शनि बुध बृहस्पति, केतु) एकसाथ होने से ष्ठग्रही योग बन रहा था जिससे ग्रहण का नकारात्मक प्रभाव बहुत तीव्र हो गया था। भारत में इसका प्रभाव सीएए और एनआरसी के विरोध-प्रदर्शनों में की गयी हिंसा के रूप में दिखा। साथ ही कोरोना वायरस के मामले भी बढ़ते गए। कुल मिलाकर नवम्बर में केतु-बृहस्पति का विस्फोटक योग बनने पर कोरोना वायरस सामने आया और 26 दिसंबर को सूर्य ग्रहण के बाद इसने एक बड़ी में।महामारी का रूप धारण कर लिया।
इससे पहले भी ऐसे ग्रह योग ने मचाई थी तबाही
यह सन 1918 में स्पैनिश फ्लू नाम से एक महामारी फैली थी जिसकी शुरुआत स्पेन से हुई थी। इस महामारी से दुनिया में करोड़ों लोग संक्रमित हुए थे। उस समय भी बृहस्पति-केतु का योग बना हुआ था। सन 1991 में ऑस्ट्रेलिया में माइकल एंगल नाम का बड़ा कम्प्यूटर वायरस सामने आया था जिसने इंटरनेट और कम्यूटर फील्ड में वैश्विक स्तर पर बड़े नुकसान किये थे और उस समय भी गोचर में बृहस्पति-केतु का योग बना हुआ। सन 2005 में एच-5 एन-1 नाम से एक बर्डफ्लू फैला था और उस समय में भी गोचर में बृहस्पति-केतु का योग बना हुआ था। ऐसे में जब भी बृहस्पति-केतु का योग बनता है उस समय में बड़े संक्रामक रोग और महामारियां सामने आती हैं। 2005 में जब बृहस्पति-केतु योग के दौरान बर्डफ्लू सामने आया था तब बृहस्पति-केतु का योग पृथ्वी तत्व राशि में होने से यह एक सीमित एरिया में ही फैला था जबकि चार नवम्बर को बृहस्पति-केतु का योग अग्नि तत्व राशि (धनु) में बना है जिस कारण कोरोना वायरस आग की गति से पूरे विश्वभर में फैलता जा रहा है।नवम्बर में शुरू हुए बृहस्पति-केतु के योग और दिसंबर में हुए सूर्य ग्रहण के कारण पिछले चार महीनो से कोरोना वायरस तेजी फ़ैल रहा है और वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को भी इसका कोई ठोस समाधान नजर नहीं आ रहा है। ज्योतिष के जनारिये से देखें तो आने वाले 29 मार्च को बृहस्पति मकर राशि में प्रवेश होगा जिससे पिछले चार महीनो से चल रहा बृहस्पति-केतु का योग खत्म हो जाएगा। ऐसे में 29 मार्च के बाद से कोरोना वायरस के अटैक से राहत मिलना शुरू हो जाएगी और इसके संक्रमण का प्रभाव कम होना शुरू हो जाएगा। 14 अप्रैल को सूर्य का मेष राशि में प्रवेश होगा जिसके बाद वैज्ञानिकों को कोरोना वायरस का कोई ना कोई एंटीडोट मिलेगा। इस स्थिति में कुल मिलाकर 29 मार्च के बाद एक से डेढ़ महीने के अंदर इस महामारी का प्रभाव भी कम होने की उम्मीद है।14 मई 2020 को जब वक्री देवगुरु बृहस्पति का आगमन मकर राशि में होगा, तक यह बीमारी पूर्ण रूप से समाप्त होगी। उस दिन मकर राशि में नीच भंग के कारण यह बीमारी प्रभावहीन हो जाएगी। इससे पूर्व 11 मई 2020 को शनिदेव का वक्री होना इसमें सहायक होगा। मित्रों यार जहां भी आपको बता दूं जिन लोगों के लग्न में केतु है और लग्न मिथुन है या राहु है उन लोगों को खास एहतियात बरतने की जरूरत है ऐसे लोगों को अपने बचाव के लिए पूरे उपाय करने चाहिए आचार्य राजेश
गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020
#क्या राशिफल सही होता है ?क्या है सच#
https://youtu.be/sXMcp0IapGE
मित्रोंआमतौर पर हम अपनी सुविधा के लिए रोज सुबह टीवी पर ही अपना राशिफल देखते हैं कई अखबार का भी इस्तेमाल करते हैं बहुत सारे लोग अपने मोबाइल मेंyoutube या किसी अन्य सोशल साइट्स पर भी राशिफल देखते हैं ।
मित्रोंआमतौर पर हम अपनी सुविधा के लिए रोज सुबह टीवी पर ही अपना राशिफल देखते हैं कई अखबार का भी इस्तेमाल करते हैं बहुत सारे लोग अपने मोबाइल मेंyoutube या किसी अन्य सोशल साइट्स पर भी राशिफल देखते हैं ।
क्या वो टीवी या कही और देखा हुवा राशीफल सभी के लिए एकसमान होता हैं ?
इसमें प्रश्न उठना स्वाभाविक है ऐसा क्यों? मान लीजिए किसी व्यक्ति का मेष राशि है मेष राशि वाले सिर्फ आप ही होंगे! मेष राशि लाखों-करोड़ों लोगों का हो सकता हैं
कोई गरीब हो सकता है कोई अमीर हो सकता है कोई सामान्य वर्ग का हो सकता है अब इसमें जो भविष्यवाणियां बताई जाती है क्या वह सभी के लिए सही होती है?
नहीं हो सकती क्योंकि जन्म कुंडली में ग्रहों की भिन्न-भिन्न स्थितियां होती हैं सब का विचार बहुत जरूरी है आपके ऊपर किस ग्रह की महादशा चल रही है हो सकता हैहो सकता है किसी की शनि की चल रही हो किसी की गुरु की किसी की राहु की
वैसे भी 12 राशियां हैं और 600 करोड़ लोग हैं। ऐसे में एक राशि में आए 50 करोड़ लोग। तो भला इतने लोगों का भविष्य एक जैसा कैसे हो सकता है। हमारे भारत देश की जनसंख्या है 130 करोड़ से ज्यादा है तो एक राशि के अंदर कितने लोग हो गए सब के अलग-अलग कर्म है उन कर्मों के आधार पर ही आपकी जन्मकुंडली का निर्माण होता है और जन्म कुंडली से ही आपका सही भूत भविष्य और वर्तमान का फल कथन किया जा सकता हैसबसे पहले आइए आप समझे कि दैनिक राशिफल और सप्ताह का राशिफल कैसे निकाला जाता है? राशिफल का फलादेश मुख्यत: चंद्रमा के भ्रमण पर निर्भर रहता है। चंद्रमा सप्ताह भर में लग्न या राशि से जिस भाव में भ्रमण करता है, उस तरह से दैनिक/साप्ताहिक राशिफल निर्धारित किया जाता है। ठीक अब यह तो आप समझ गए जैसे कि आपको यह भी बता दूं कि 27 नछतर होते हैं 12 राशियां और जिस तरह सूर्य मेष से लेकर मीन तक भ्रमण करता है, उसी तरह चन्द्रमा अश्विनी से लेकर रेवती तक के नक्षत्र में विचरण करता है तथा वह काल नक्षत्र मास कहलाता है। यह लगभग 27 दिनों का होता है इसीलिए 27 दिनों का एक नक्षत्र मास कहलाता हैप्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में बांटा गया है | एक नक्षत्र13डीग्री20| का होता है अतः नक्षत्र के एक चरण की दूरी 13/20|/4 = 30/20| होती है | सवा दो नक्षत्र अर्थात ९ चरण (30/0 ) की एक राशि होती है | चंद्रमा सवा दो दिन में एक राशि पार कर लेता है अर्थात 30/0 आगे बढ़ जाता है यानी सवा दो दिन तक चंद्रमा एक ही राशि में रहता है | 27 दिन में सभी १२ राशियाँ और नक्षत्र पार कर लेता है | इन चरणों के लिए कुछ अक्षर निश्चित किये गए हैं, जिसके हिसाब से किसी जातक का नामकरण किया जाता है |
क्रमांक नक्षत्र नक्षत्र चरण चरणाक्षर राशि
1 अश्विनी 1,2,3,4 चू, चे, चो, ला मेष मेष राशि में तीन नछतर होते हैं और 9चरणआप ज्योतिष की थोड़ी समझ रखते हैं तो सोचिए विचार करिए इस तरह अन्य राशियां आजकल अधिकांश व्यक्ति प्रात:काल समाचार पत्र में सर्वप्रथम दैनिक राशिफल वाले स्तंभ में अपनी राशि का फलित देखकर अपने दिन का पूर्वानुमान लगाने में उत्सुक रहते हैं और सांझ ढलते ही महसूस करते हैं कि उनकी राशि का जो फलित दैनिक राशिफल में बताया गया था, वह तो असत्य निकला। इसके बाद वे ज्योतिष शास्त्र को कोसने लगते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। तो मैं उन ज्योतिषीयों को दोषी मानता हूं जो अपने नाम के आगे आचार्य या Dr लगाते हैं और जनता को ऐसा लगता कि यह बहुत ही विद्वान और पढ़े लिखे ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता होंगे लेकिन जो लोग दैनिक राशिफल का काम करते हैं ऐसे लोगों को ज्योतिष आता ही नहीं है मित्रों यह आपको समझना होगा आजकल जिस प्रकार दैनिक राशिफल बताया जाता है, वह पूर्णत: भ्रामक व अप्रामाणिक होता है। उसका कोई शास्त्रोक्त व ज्योतिषीय आधार नहीं होता।
ज्योतिष शास्त्र में फलित के लिए ग्रह स्थिति मुख्यरूपेण उत्तरदायी होती है, चाहे वह जन्म पत्रिका की ग्रह स्थिति हो या गोचर की। ज्योतिष शास्त्र में किसी जातक के फलित के लिए उसकी जन्म पत्रिका की लग्न कुंडली को सर्वाधिक महत्ता प्रदान की गई है तत्पश्चात नवमांश कुंडली, उसके बाद वर्ग कुंडली, फिर विंशोत्तरी दशाएं, उसके बाद योगिनी दशाएं और सबसे अंत में गोचर को मान्यता दी गई है। जब गोचर को ही फलित करते समय सबसे अंतिम पायदान पर रखा जाता है तो केवल चंद्र के गोचर व नक्षत्र से दैनिक राशिफल निकालना कहां तक उचित व प्रामाणिक है?
अब उपर्युक्त आधार पर क्या यह मान लिया जाए कि ज्योतिष शास्त्र में दैनिक राशिफल होता ही नहीं है?
नहीं, ऐसा कदापि नहीं है। दैनिक राशिफल भी ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत ही आता है किंतु वह प्रत्येक जातक का निजी होता है और उसका आधार प्रश्न कुंडली व नष्टजातकम् पद्धति होता है।
उस दैनिक राशिफल के लिए व्यक्ति को ज्योतिषी से प्रश्न करना होता है कि 'मेरा आज का दिन कैसा रहेगा?
' तब ज्योतिषी प्रश्न कुंडली के आधार पर अथवा उस व्यक्ति से कोई अंक पूछकर उसके दिन के बारे गणना कर उस दिन का भविष्य संकेत उसे देता है।
इस प्रकार का दैनिक राशिफल व्यक्तिगत होता है, न कि सार्वजनिक। अत: हमारे मतानुसार समाचार पत्रों व न्यूज चैनलों में प्रसारित-प्रकाशित होने वाले दैनिक राशिफल के फलित को गंभीरता से न लेते हुए अपनी जन्म पत्रिका की ग्रह स्थितियों, दशाओं व अपनी राशि गोचर पर ही विश्वास करना चाहिए। आचार्य राजेश
रविवार, 23 फ़रवरी 2020
gemlogy# रत्न कैसे काम करते हैं?
कुछ मित्रों ने रत्नों को लेकर कुछ सवाल पूछे हैं कि क्या रत्न काम करते हैं ज्ञान के धारण करने से लाभ मिलता है मित्रोंयह शरीर पंच भूतों से बना है और इन्ही के अधिकार मे सम्पूर्ण जीवन का विस्तार होता है। इन पंचभूतो मे किसी भी भूत की कमी या अधिकता जीवन के विस्तार मे अपने अपने प्रकार से दिक्कत देने के लिये अपना प्रभाव देने लगते है
और हमारा शरीर जिन पांच तत्वों से बना है, क्रमानुसार वे हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। पृथ्वी तत्व से हमारा भौतिक शरीर बनता है। जिन तत्वों, धातुओं और अधातुओं से पृथ्वी (धरती) बनी उन्हीं से हमारे भौतिक शरीर की भी रचना हुई है।तत्व से मतलब तरलता से है।ग्नि तत्व ऊर्जा, ऊष्मा, शक्ति और ताप का प्रतीक है। हमारे शरीर में जितनी गर्माहट है, सब अग्नि तत्व से है।नमें प्राण है, उन सबमें वायु तत्व है। हम सांस के रूप में हवा (ऑक्सीजन) लेते हैं, जिससे हमारा जीवन है।काश तत्व अभौतिक रूप में मन है। जैसे आकाश अनंत है वैसे ही मन की भी कोई सीमा नहीं है। जैसे आकाश अनंत ऊर्जाओं से भरा है, वैसे ही मन की शक्ति की कोई सीमा नहीं हैमिट्टी: पृथ्वी या मिट्टी, हमारे शरीर के उन अंगों के निर्माण से जुड़ी है, जो कठोर और भारी हैं। जैसे हड्डियां, दांत, मांस, त्वचा, बाल, मूंछें, नाक आदि।
अग्नि: अग्नि उन अंगों के निर्माण के लिए आवश्यक है, जो गर्म और तीव्र प्रकृति के हैं। दृष्टि, नजर, शरीर की ऊष्मा, तापमान, रंग, चमक, क्रोध, साहस आदिज्योतिष विज्ञान भी इस बात को स्वीकारता है कि व्यक्ति के जीवन तथा चरित्र को मूलतत्व किस प्रकार प्रभावित करते हैं। जहाँ ज्योतिष के अनुसार तत्व एक ब्रह्मांडीय कंपन के लक्षण बताते हैं
।इन सभी तत्वों को समझ कर हम तत्वों को कुछ प्रयोग के द्वारा संतुलन में कर सकते हैं जिससे हमारे आगे की यात्रा बढ़ सके। जैसे-जैसे हम क्रिया करेंगे उसका अनुभव हमें प्रत्यक्ष मिलेगा। हमारी हाथ की उंगलियों में तत्व संदेश देंगे कि कौन सा तत्व आपके भीतर कम है और कौन सा अधिक है। हम जानते हैं कि हाथ की पांच उंगलियां इन्हीं पांच तत्वों का प्रतिनिधत्व करती हैं। अंगूठा अग्नि का, तर्जनी वायु का, मध्यमा आकाश का, अनामिका पृथ्वी का और कनिष्का जल का प्रधिनिधित्व करती हैं। इन उंगलियों में विद्युत धारा प्रवाहित होती रहती है।
मानव शरीर प्रकृति द्वारा तैयार की गई एक मशीन है जिसके सूक्ष्म संसाधनों व तंत्रों और तत्वों के प्रयोग की सटीक सहज क्रिया के जरिए हम अपनी ऊर्जा को निरंतर गति दे सकते हैं।
.इन पाँच तत्वों के साथ शरीर चलता है .किसी में ज्यादा ,किसी में कम यह देखने को मिलता है और इनपाँच तत्वों के से ही ब्रह्मांड बना है और उसी पर ज्योतिष शास्त्र आधारित हैसभी बारह राशियों को तत्वों के आधार पर चार भागों में बाँटा गया है.और उसी प्रकार ग्रहो की यौगिक विज्ञान के अनुसार हमारा शरीर और यह सारा अस्तित्व पांच तत्वों से मिलकर बना है। ऐसे में खुद को रूपांतरित करने का मतलब होगा - बस इन पांच तत्वों को अपने लिए फायदेमंद बना लेना। हमारे ऋषि-मुनियों में इस पर काफी शोध की रिसर्च की उन्होंने ने अपनी दूरदर्शिता और अनुभूति के आधार पर तथा जन्मकुंडली में ग्रह-राशियों के विन्यास से यह आकलन करने का प्रयास किया कि किस रत्न के प्रयोग से मनुष्य की दैहिक और मानसिक विसंगतियां दूर होती हैं। ज्योतिष शास्त्र के अतिरिक्त आयुर्वेद शास्त्र में भी रत्न प्रयोग से दैहिक रोग मुक्ति का विधान है। रत्न सिद्धांत: आकाश, अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी नामक पंचमहाभूतों से प्राणी देह का ही नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रकृति का निर्माण हुआ है। समन्वित पंचमहाभूतों के स्थापन से हमारी देह स्वस्थ रहती है, मगर इनमें समन्वय के अभाव से देह अनेक व्याधियों से प्रकुपित होने लगती है। ग्रहों की किसी विशेष अवस्था और उनसे उत्सर्जित ऊर्जा की किसी विशेष मात्रा से दैहिक और मानसिक पुष्टता होती है, जो उत्साह, उमंग, वीरता, विवेकशीलता और पराक्रम की द्योतक है तथा ग्रहों की किसी विपरीत अवस्था में दैहिक और मानसिक दुर्बलता होती है, जो, निराशा, हताशा और असफलता की द्योतक है। ऐसी दुर्बलता की अवस्था जिन ग्रह और नक्षत्रों के कारण होती है, उससे संबंधित रत्न धारण करने से मुक्ति मिलती है। इस प्रकार रत्न संबंधित ग्रह की रश्मियों को एकत्र करके हमारी देह में समावेश करा कर उस ग्रह को अनुकूल करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। इसके लिए रत्न जड़ित मुद्रिका इस प्रकार बनाई जाती है कि रत्न दैहिक त्वचा को स्पर्श करता रहे। विभिन्न रत्नों को विभिन्न उंगलियों में धारण किया जाता है, क्योंकि प्रत्येक उंगली से निकलने वाली संदेश संवाहिक तंत्रिका मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों में जाती है। इसलिए रत्न विशेष का प्रभाव उंगली विशेष के माध्यम से मस्तिष्क की विशेष कोशिकाओं को संवेदित करती है। ज्योतिष के अनुसार जब जन्म कुंडली, गोचर कुंडली योगकारक कोई ग्रह निर्बल होता है और उसकी निर्बलता से शरीर में रोग उत्पन्न होता है, तब उस ग्रह से संबंधित रत्न धारण करके या उस रत्न की भस्म का सेवन करके उस ग्रह को बलवान किया जाता है। यह रत्न चिकित्सा का मूलभूत आधार है। यह विज्ञान सम्मत है कि रत्न एक लेंस और प्रिज्म की भांति कार्य करते हैं, जो आकाशीय प्रकाश किरणों को संग्रह करके अपवर्तित करते हैं, जिनसे हमारे कोशिकीय तंतुओं का पोषण होता है। हमारे शरीर में जिस तत्व की कमी हो जाती है या कहें कि जिस ग्रह के बल की कमी हो जाती है तो आपकी कुंडली के आधार पर उस ग्रह को बल देने के लिए रतन धारण करवाए जाते हैं यहां मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि रत्न कभी भी राशि के आधार पर नहीं पहने जाते और ना ही दशा महादशा के आधार पर रत्न हमेशा आप अपनी जन्म कुंडली हस्तरेखा के आधार पर ही पहनें आचार्य राजेश
रविवार, 16 फ़रवरी 2020
#महाशिवरात्रि#2020 पर विशेष
भगवान शिव के विवाह का दिन फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को माना जाता है। शिवपुराण में इस चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है। इस शिवरात्रि में महा इसलिए लगा है क्योंकि शिवरात्रि तो हर महीने में एक बार आती है लेकिन फाल्गुन मास की शिवरात्रि साल में केवल एक बार आती है। महाशिवरात्रि का महत्व इसलिए हैमहाशिवरात्रि भारत के सबसे बड़े और पवित्र रात्रि उत्सवों से एक है। महाशिवरात्रि साल की सबसे अँधेरी रात होती है, और इस रात शिव की कृपा का उत्सव मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि शिव आदिगुरू या पहले गुरु हैं, क्योंति यह शिव और शक्ति की मिलन की रात है। आध्यात्मिक रूप से इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात के रूप में बताया जाता है। इस रात में आध्यात्मिक शक्तियां अधिक जागृत होती हैं इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि इस रात का उपयोग ध्यान, योग, तप और साधना में करना चाहिए।इस रात ग्रहों की विशेष स्थिति होने के कारण, मानव शरीर में ऊर्जा खुद ब खुद ऊपर की ओर चढ़ती है, और पूरी रात रीढ़ को सीढ़ी खड़ी रखकर जागना और जागरूक रहना शारीरिक और आध्यात्मिक खुशहाली के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इस वर्ष महाशिवरात्रि 21फरवरी को है। इस अवसर पर कई दुर्लभ संयोग बने हैं ऐसे में इसदिन का महत्व और बढ़ गया है।शिवरात्रि पर्व इस बार 21 फरवरी को मनाया जायेगा। हिंदू धर्म में इस दिन को बेहद ही खास माना जाता है।यहमहाशिवरात्रि कई मायनों में खास रहने वाली है। क्योंकि इस दिन 59 साल बाद विशेष संयोग बन रहा है इस दिन विशेष संयोग बन रहा है जो पर्व को और भी खास बनाएगा। इसमें विष योग, बुधादित्य और सर्प योग, अंगारक योग भी रहेगा। साथ ही पंचमहापुरुष योग में से एक मालव्य योग व गुरु कुलदीपक योग बनाएंगे। माल्वय व कुलदीपक योग 21फरवरी की रात्रि 2.15 बजे से भोर में 4.19 बजे तक रहेगा।
ये सभी योग महाशिवरात्रि पर्व को और भी खास बना रहे हैं। इस विशेष योग में जन्म लेने वाले जातक पर भगवान शिव की विशेष कृपा बरसेगी। महाशिवरात्रि 21 तारीख फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ेगी।
इस दिन शाम 5.20 बजे से शुरू होकर अगले दिन 22 फरवरी दिन शनिवार को शाम सात बजकर दो मिनट तक रहेगी। रात्रि प्रहर की पूजा शाम को 6.41 बजे से रात 12.52 बजे तक होगी। अगले दिन सुबह मंदिरों में भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा की जाएगी।
ऐसे में भगवान चंद्रमौलीश्वर का पूजन अवश्य करना चाहिए। शश योग। इस दिन चंद्र शनि की मकर राशि में युति हो रही है।चंद्रमा मन का कारक है। वहीं शनि दुख कर कारक है। ऐसे में चंद्र-शनि की युक्ति को विष योग कहते हैं। इसका एक पक्ष यह भी है कि मन जब भी अवसाद में आता है तो विरक्त होने लगता है।इस साल शनि ने 23 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश किया है। शिवरात्रि यानि इस साल से पहले करीब 28 साल पहले शिवरात्रि पर विष योग 2 मार्च 1992 को बना था। इस योग में शनि और चंद्र के लिए विशेष पूजा करनी चाहिए। शिवरात्रि पर ये योग बनने से इस दिन शिव पूजा का महत्व और अधिक बढ़ गया है। कुंडली में शनि और चंद्र के दोष दूर करने के लिए शिव पूजा करने की सलाह दी जाती है।
साथ ही ये योग ज्ञान की खोज भी कराता है। भगवान शिव का दुग्ध, दही, मधुरस, घृत, गन्ना रस, शक्कर समेत विभिन्न प्रकार से अभिषेक करना चाहिए। इससे भगवान शिव की कृपा मिलेगी। इसलिए इस योग के बनने से साधना सिद्धि के लिए ये दिन खास रहेगामहाशिवरात्रि पर बनने वाले विष योग में दूध और तिल मिलाकर अभिषेक करने से शनि देव का आशीष मिलेगा। इस संवत्सर के राजा शनि अपनी स्वराशि है। साथ चंद्रदेव व सूर्यदेव भी शनि की राशि में है। शनिदेव और चंद्रदेव के आराध्य भगवान शिव हैं।
इससे शिवरात्रि पर बनने वाले इस विशेष योग में भगवान शिव के साथ ही शनिदेव और चंद्रदेव का भी आशीष मिलेगा। पूजन से शनि और चंद्रदेव की कृपा भी मिलेगी। दूसरी खास बात ये है कि महाशिवरात्रि के पावन दिन पर सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। जिसमें शुभ कार्य संपन्न करने से लाभ मिलता है। इसी के साथ 117 साल बाद शनि और शुक्र का दुर्लभ योग भी महाशिवरात्रि के दिन बन रहा है। इस शिवरात्रि शनि अपनी राशि मकर में मौजूद रहेंगे और शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में रहेगे रबुधादित्य और सर्प योग भी रहेंगे शिवरात्रि पर
21 फरवरी को बुध और सूर्य कुंभ राशि में एक साथ रहेंगे, इस वजह से बुध-आदित्य योग बनेगा।शिवरात्रि पर बुध अपने मित्र और सूर्य अपने पुत्र के घर में एक साथ रहेंगे, इस वजह से बुध-आदित्य योग बनेगा। इसके अलावा इस दिन सभी ग्रह राहु- केतु के मध्य रहेंगे, इस वजह से सर्प योग भी बन रहा है।
केतु व मंगल एक ही भाव में युति बना रहे हैं, इसे मंगल केतु अंगारक योग कहते हैं। मंगल अग्नि तत्व से संबद्ध है, जबकि केतु काम वासना व लालसा का वाचक है। यह स्पर्शनीय शक्ति उत्पन्न् करते हैं, जो नकारात्मक नतीजे प्रदान करती हैं। शिव पूजन से ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव से भी मुक्ति मिलेगी। इसके अलावा इस दिन शिवरात्रि पर राहु मिथुन राशि में और केतु धनु राशि में रहेगा। शेष सभी ग्रह राहु-केतु के बीच रहेंगे। सूर्य और बुध कुंभ राशि में, शनि और चंद्र मकर राशि में, मंगल और गुरु धनु राशि में, शुक्र मीन राशि में रहेगा। सभी ग्रह राहु-केतु के बीच होने से सर्प योग बनेगा।इस साल शिवरात्रि पर शनि अपनी स्वयं की राशि मकर में और शुक्र ग्रह अपनी उच्च राशि मीन में रहेगा। ये एक दुर्लभ योग है, जब ये दोनों बड़े ग्रह शिवरात्रि पर इस स्थिति में रहेंगे। 2020 से पहले 25 फरवरी 1903 को ठीक ऐसा ही योग बना था और शिवरात्रि मनाई गई थी। इस साल गुरु भी अपनी स्वराशि धनु राशि में स्थित है। इस योग में शिव पूजा करने पर शनि, गुरु, शुक्र के दोषों से भी मुक्ति मिल सकती है। 21 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा। पूजन के लिए और नए कार्यों की शुरुआत करने के लिए ये योग बहुत ही शुभ माना गया है।जिन लोगो को केरियर से संबंधित परेशानी आ रही है करियर में सफलता और असफलता के लिए कुडंली में बुध ग्रह को जिम्मेदार माना गया है। नौकरी, बिजनेस और पढ़ाई में आने वाली बाधा को दूर करने के लिए इस महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर पारद भस्म का लेपन करें व दूर्वा घास चढ़ाएं।। ऐसे में भगवान शिव का सरल विधि से किया गया पूजन आपके दुख दूर कर सकता है। भोलेनाथ को दही एवं मिश्री अर्पित करें। बुध का दोष दूर हो इस उपाय से करियर संबंधी बाधा दूर हो जाती है।
मानसिक परेशानी को दुर करने के लिए
कुंडली में ग्रह दोष होने से व्यक्ति की मानसिक परेशानी बढ़ जाती है। ज्योतिष में मानसिक परेशानी का संबंध चंद्रमा से संबंधित ग्रह दोष के कारण होता है। इस परेशानी को दूर करने के लिए महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर दूध ओर चावल मिलाकर अभिषेक करें व चांदी भस्म का लेपन करें भोले नाथ को खीर का भोगअर्पित करना चाहिए। मान-सम्मान में आई गिरावट को दूर करने के उपाय
अगर किसी की कुंडली में सूर्य ग्रह से संबंधित कोई दोष हो तो व्यक्ति के मान-सम्मान में गिरावट होने लगती है और अपयश का सामना करना पड़ता है। मान-सम्मान को बढ़ाने के लिए महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर चंदन का लेप लगाएं और शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।हत संबंधी परेशानियों से छुटकारा पाने के उपाय
कुंडली में राहु-केतु के अशुभ घर में बैठने पर स्वस्थ्य संबंधी परेशानियां आने लगती है। सेहत को ठीक करने के लिए महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को धतूरा चढ़ाएं।विल्व पत्र चढाऐ
विवाह संबंधी दोष को दूर करने के उपाय
कुंडली में बृहस्पति ग्रह के कमजोर और दोष होने से विवाह होने में तमाम तरह की परेशानियां आने लगती है। साथ ही पति-पत्नी में मनमुटाव भी बढ़ने लगता है। कुंडली में इस दोष को दूर करने के लिए इस पवित्र महाशिवरात्रि पर शिवलिंग दुघ में ग़ज़ल मिलाकर अभिषेक करें तथा पीले फूल और केले अर्पित करें
संतान प्राप्ति में विलंब हो रहा है अथवा संतान पर संकट आ रहे हैं, वैवाहिक रिश्तों में कड़वाहट घुल रही है तो यह शुक्र का दोष हो सकता है। इसके लिए पंचामृत से भोलेनाथ का अभिषेक कीजिए। शिवकृपा से सब मंगल होगा
शनिदेव का दोष जातक को अनेक कष्ट देता है। हालांकि हनुमानजी के पूजन एवं शनि को तेल चढ़ाने से भी कोप शांत होता है लेकिन शिवरात्रि पर भगवान शिव का गन्ने के रस से किया गया अभिषेक भी श संगनि को शांत कर सकता है। इससे आपके बिगड़े काम बनने लगेंगे। और शिवलिंग पर बदाम चढ़ाएं ्महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव पर एक लोटा जल चढ़ाने से ही भगवान शिव अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। भगवान शिव अपने भक्तों पर जितनी जल्दी प्रसन्न होते हैं उतनी ही जल्दी उनसे रुष्ट भी हो सकते हैं। ऐसे में आइए जानते वो वाते जिसे भूलकर भी भगवान शिव की पूजा के दौरान नहीं करना चाहिए।
शंख जल- भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था। शंख को उसी असुर का प्रतीक माना जाता है जो भगवान विष्णु का भक्त था। इसलिए विष्णु भगवान की पूजा शंख से होती है शिव की नहीं।
पुष्प- भगवान शिव जी की पूजा में केसर, दुपहरिका, मालती, चम्पा, चमेली, कुन्द, जूही आदि के पुष्प नहीं चढ़ाने चाहिए।
करताल- भगवान शिव के पूजन के समय करताल नहीं बजाना चाहिए।
तुलसी पत्ता- जलंधर नामक असुर की पत्नी वृंदा के अंश से तुलसी का जन्म हुआ था जिसे भगवान विष्णु ने पत्नी रूप में स्वीकार किया है। इसलिए तुलसी से शिव जी की पूजा नहीं होती।
तिल- यह भगवान विष्णु के मैल से उत्पन्न हुआ मान जाता है इसलिए इसे भगवान शिव को नहीं अर्पित किया जाना चाहिए।
टूटे हुए चावल- भगवान शिव को अक्षत यानी साबूत चावल अर्पित किए जाने के बारे में शास्त्रों में लिखा है। टूटा हुआ चावल अपूर्ण और अशुद्ध होता है इसलिए यह शिव जी को नही चढ़ता।
कुमकुम- यह सौभाग्य का प्रतीक है जबकि भगवान शिव वैरागी हैं इसलिए शिव जी को कुमकुम नहीं चढ़ता।
शनिवार, 8 फ़रवरी 2020
शनि देते हैं आपके किए गए कार्मो का फल?
शनिदेव को सूर्य पुत्र एवं कर्मफल दाता माना जाता है। लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी.शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है।सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ उचित न्याय करता है। जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही कोउनके कर्मो के अनुसार दण्डिंत (प्रताडित) करते हैं। अनुराधा नक्षत्र के स्वामी शनि हैं।नि के दो घर माने जाते है एक करने वाला और एक सोचने वाला। जो लोग काम को करने के बाद सोचते है वे मकर की श्रेणी मे आते है और जो सोच कर करते है वे कुम्भ की श्रेणी में आते है। कार्य को करने के बाद सोचने की क्रिया को करके सीखने का होता है और सीख कर करने की क्रिया को शिक्षा को पूर्ण करने के बाद कर्म की क्रिया को कहा जाता है। कार्य को करने के बाद जो सीखता है वह कार्य के बारे में गूढ रूप से जानता है कारण उसके द्वारा प्रेक्टिकल में कार्य किया जाता है। लेकिन सीख कर कार्य को जो करता है वह कार्य में अनुभव के बिना कहीं न कहीं अटक जाता है। , मित्रों शनि कर्म का कारक है,कर्म करने के लिये शनि अपनी पूरी ताकत देता है,कितना ही आलसी व्यक्ति हो शनि अपने अनुसार वक्त पर कर्म करने के लिये अपनी ताकत को दे ही देता है। व्यक्ति को शनि जमीनी ताकत का बोध करवाता है,कैसे जमीन से उगा जाता है और उगने के बाद समय के थपेडे किस प्रकार से खाये जाते है,तब जाकर किस प्रकार से कर्म की कसौटी पर उसे खरा उतरना पडता है। शनि के तीन रूप माने जाते है और तीनो रूपों को जन्म कुंडली के अनुसार परखा जाता है। शनि मार्गी होता है तो सम्बन्धित भाव के कार्य वह पूरे जीवन करवाता रहता है,चाहे वह अच्छा हो या बुरा कर्म तो मनुष्य को करने ही पडेंगे,वह गोचर से भी जिस भाव में प्रवेश करेगा,जन्म कुंडली के भाव के अनुसार ही अपनी शिफ़्त को प्रदान करेगा। मार्गी शनि शारीरिक मेहनत करवाता है और वक्री शनि दिमागी काम करवाता है,दिमागी कार्य करने के लिये वह अपने फ़ल भावानुसार ही देता है। व्यक्ति को अगर कहीं शारीरिक मेहनत करने के अवसर आते है और वह अपने द्वारा शारीरिक मेहनत करने के लिये उद्दत होता है तो वह शारीरिक मेहनत के अन्दर असफ़लता देता है,लेकिन दिमागी मेहनत के अन्दर अपने बल को प्रदान करता रहता है। उसी प्रकार से अगर शनि कुंडली में मार्गी है,और व्यक्ति अगर दिमागी मेहनत करने के कारण कही भी प्रस्तुत करता है तो उसे सफ़लता नही मिलती है। लेकिन वह अपने अनुसार शारीरिक मेहनत को करने के बाद सफ़ल होता जाता है। शनि अस्त का प्रभाव अपने में बहुत महत्व रखता है,जन्म स्थान का शनि अगर अस्त है तो वह गोचर से जिस भी भाव में प्रवेश करेगा,उस भाव के जन्म के भाव से सम्बन्धित कार्यों को बन्द कर देगा,चलते हुये कार्य बन्द होने के कारण मनुष्य को बैचेनी हो जाती है,वह सोचने लगता है कि उसके द्वारा कोई भूल हुयी है और उसी भूल से उसका कार्य बन्द हुआ है,लेकिन जैसे ही शनि अपने समय के अनुसार आगे बढेगा वह बन्द किये गये कार्य को शुरु कर देगा और आगे के कार्य बन्द कर देगा,इस तरह से व्यक्ति के जीवन में शनि का जो योगदान मिलता है वह समझकर ही अगर किया जाता है तो व्यक्ति की सफ़लता मिलनी निश्चित होती है। उदाहरण के तौर पर अगर शनि बारहवे भाव में जाकर वक्री हो गया है,बारहवां भाव जेल जाने का कारण भी बनाता है,अगर शनि मार्गी होता है तो जेल में जाकर जेल के कार्य करना और जेल सम्बन्धी दुख भोगना जरूरी होता है,लेकिन शनि अगर बारहवें भाव में वक्री है तो वह दूसरों को जेल जाने के कारणॊं से बचाता है,उसके अन्दर दिमागी ताकत आजाती है और वह कानून या अन्य कारणों से दूसरों को अपने द्वारा जेल जाने की नौबत से दूर रखने में अपनी सहायता करता है। बारहवा भाव मोक्ष का भाव भी कहा जाता है,जातक की कुन्डली में वह जहां भी गोचर करेगा मोक्ष के भावों को प्रस्तुत करता चला जायेगा। शनि के साथ,शनि से पंचम नवम भाव में जो भी ग्रह होंगे वे शनि को सहायता देने वाले ग्रह होंगे,अगर वह अच्छे ग्रह है तो अच्छी सहायता करेंगे और खराब ग्रह है तो खराब सहायता करेंगे। जैसे शनि अगर बारहवां है और शनि से नवें भाव यानी अष्टम भाव में सूर्य है तो शनि को सरकारी और पिता सम्बन्धी सहायता मिलेगी,वह सरकारी कारणों में जो कि कानूनी भी हो सकते है,साथ ही शनि अगर बारहवें भाव में वृष राशि का है तो वह धन सम्बन्धी कारणों से लोगों को जेल जाने और पारिवारिक कारणॊं से जेल जाने और बडी मुशीबत से फ़ंसने में सहायता करेगा। इसी शनि के अगर नवें भाव में सूर्य है तो कार्यों के मामले में पिता और बडे सरकार से सम्बन्धित बडे अधिकारियों और राजनीतिक लोगों से लाभ देने के मामले में भी जाना जायेगा,पिता के द्वारा धन सम्बन्धी कारणों को सुलझाने के दिमागी कारणों को जातक ने अपने जन्म से ही सीखा होगा और वह पिता की छत्रछाया में ही बडे बडे अफ़सरों से मिलता रहा होगा तथा समय पर अपने लिये उन्ही लोगों और पिता से सम्बन्धित ज्ञान को समय समय पर प्रकट करने के बाद अपने कार्यों को करने में अपनी योग्यता को प्रकट करेगा। इसके साथ ही अगर इस शनि को अगर गुरु का प्रभाव भी शनि से नवें भाव से मिला होगा तो वह कानूनी रूप से अपने कार्यों को करने वाला होगा,वैसे साधारण ज्योतिष के अनुसार वृष राशि के नवें भाव में मकर राशि का स्थान है और यहां पर कई लोग गुरु को नीच का मान लेते है लेकिन गुरु अगर अष्टम में है तो वह नीचता को त्याग देगा,कारण बारहवें भाव में वृष राशि होने का मतलब होता है कि लगन मिथुन लगन की है और मिथुन लगन से अष्टम में गुरु का स्थान मकर राशि में होने से वह अपनी नीच प्रकृति को त्याग कर विपरीत राजयोग की श्रेणी को प्रस्तुत करेगा। इसके लिये कई विद्वानों ने अपने अपने भाव प्रदान किये है लेकिन नीच के गुरु की मान्यता तभी तक मान्य थी जब तक वर्ण व्यवस्था कायम थी और लोग अपने अपने वर्ण के अनुसार ही कार्य किया करते थे, आज किसी भी वर्ण का व्यक्ति कोई भी कार्य करने के लिये स्वतंत्र है,ब्राह्मण हरिजन के भी कार्य कर रहा है और हरिजन ब्राह्मण के भी कार्य कर रहा है,पानी भरने के लिये पहले भिस्ती का काम हुआ करता था आज कोई भी पानी भरने के लिये अपने कर्म को प्रदान कर सकता है,पहले राजपूतों का कार्य केवल रक्षा करना होता था तो आज राजपूत आराम से कृषि वाले कार्य भी कर रहे है और पूजा पाठ के कार्यों में भी लगे है। इस प्रकार से गुरु की नीचता का प्रभाव अब उस तरीके से नही माना जाता है। चूंकि मकर राशि का प्रभाव अष्टम में जाने से धन सम्बन्धी कार्यों की विवेचना करने से भी माना जाता है जो धन अनैतिक रूप से लोग अपने पास अण्डर ग्राउंड बेस में रखते है लेकिन किसी प्रकार के मंगल के दखल के कारण उस धन को सही रूप में साबित करने और धन के मामले में उचित सलाह देने तथा राजकीय अधिकारियों से जान पहिचान होने से और कानूनी बातों का पता होने से इस स्थान के गुरु और बारहवें भाव के बक्री शनि की ताकत से वह अपने दिमागी बल से अफ़सरों से जान पहिचान करने के बाद जो भी जेल जाने या बरबाद होने की स्थिति में आता है उसे जातक के द्वारा बचा लिया जाना माना जाता है। इसी प्रकार से अगर गुरु को बल देने के लिये अन्य ग्रह भी जैसे सूर्य भी है गुरु भी है और शुक्र भी है तो जातक की महिमा अपने समय के अनुसार आगे से आगे बढ जाती है। केवल सूर्य गुरु के कारण यह शनि कानूनी मान्यता को ही अपने जाल से निकालने में सहायता करता है लेकिन शुक्र के साथ हो जाने से सम्पत्ति से भी दूर करने में सहायता करता है जो भी सम्पत्ति है उसे जातक के प्रयास से दूसरी रास्ताओं के द्वारा सूचित किया जाता है और इस प्रयास से जातक खुद के अलावा राजकीय अधिकारियों और जिसकी गल्ती पकडी गयी उसे भी फ़ायदा देने के लिये उत्तम माना जाता है। वक्री शनि का दूसरा प्रयास होता है दिमागी रूप से लगातार आगे बढना,कारण लगन को बल देने के लिये यह शनि बहुत अच्छे प्रयास करता है,शनि बालों का और चमडी का कारक भी है,अगर बारहवां शनि मार्गी है तो जातक की खोपडी में घने बाल होंगे और शनि बारहवें भाव में वक्री है तो जातक की खोपडी गंजी होती है। इस शनि का प्रभाव जातक की कुंडली में दूसरे भाव में भी होता है,दूसरा भाव जातक के लिये धन और अपने ही परिवार के लिये माना जाता है,इसके अलावा भी यह देखा जाता है कि जब भी जातक को किसी प्रकार से धन की जरूरत महसूस होती है तो जातक को गुप्त रूप से सूर्य और गुरु के साथ शुक्र की सहायता मिल जाती है,कारण इस शनि से नवें भाव में विराजमान ग्रह उसे वक्त पर सहायता देने के लिये हमेशा आगे रहते है।
शनि के कर्म भाव में यानी शनि से दसवें भाव में जो भी भाव होता है वह कानूनी और विदेश से सम्बन्धित होता है जातक के लिये वह भाव भाग्य वाली बातों के लिये भी जाना जाता है,जैसे शनि के दसवें भाव में अगर कुम्भ राशि है,तो जातक के लिये लाभ और मित्रों की सहायता कानूनी रूप से मिलनी जरूरी है,अगर उस भाव में चन्द्रमा है तो जातक जनता से जनता वाली मुशीबतों का कार्य करने के बाद अपने क्षेत्र में नाम करने के लिये माना जायेगा,इसके अलावा अगर मंगल है तो वह कानूनी रूप से लडी जाने वाली लडाइया और बडे रक्षा वाले पदों के लिये अपनी मान्यता को दिमागी रूप से रखेगा और अगर बुध है तो जातक के लिये कानून वाले काम तथा कमन्यूकेशन वाले काम और धर्म से सम्बन्धित लोगों को दान देने वाले काम हमेशा आगे बढाते रहने के लिये अपना योगदान करते रहेंगे,गुरु के होने से जातक के लिये जन्म स्थान से दूर जाकर बडे बडे कार्य करने का अवसर मिलता है,यात्राओं वाले कार्यों के लिये और रहने आदि के लिये स्थान प्रदान करवाने के लिये जातक की समय पर सहायता मिलती रहती है शुक्र के होने से जातक के पास पारिवारिक सम्पत्ति होती तो बहुत है लेकिन उसे प्रयोग करने के लिये उसे अपने पारिवारिक जनों से दिक्कत मिलती है,इस तरह से शनि को कर्म के रूप में मान्यता दी गयी है। आ ज इतना ही आचार्य राजेश
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां
‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...
-
https://youtu.be/hb9Ouf_rST4 मित्रों आज बात करेंगे बुध और शनि की युति जब एक ही भाव में एक साथ हो या किसी भी तरह की युति बन रही है, तो कल क्य...
-
लक्ष्मी योग शुभ ग्रह बुध और शुक्र की युति से बनने वाला योग है।बुध बुद्धि-विवेक, हास्य का कारक है तो शुक्र सौंदर्य, भोग विलास कारक है।अब ये द...
-
जब किसी के जीवन में अचानक परेशानियां आने लगे, कोई काम होते-होते रूक जाए। लगातार कोई न कोई संकट, बीमारी बनी रहे तो समझना चाहिए कि उसकी कुंडली...
-
दशम भाव ज्योतिष भाव कुडंली का सबसे सक्रिय भाव है| इसे कर्म भाव से जाना जाता है क्यूंकि ये भाव हमारे समस्त कर्मों का भाव है| जीवन में हम सब क...
-
https://youtu.be/I6Yabw27fJ0 मंगल और राहूजब राहु और मंगल एक ही भाव में युति बनाते हैं, तो वह मंगल राहु अंगारक योग कहलाता है। मंगल ऊर्जा का स...
-
मालव्य योग को यदि लक्ष्मी योगों का शिरोमणी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं। मालव्य योग की प्रशंसा सभी ज्योतिष ग्रन्थों में की गई है। यह योग शुक्...
-
https://youtu.be/9VwaX00qRcw ये सच है कि हर रत्न इस धरती पर मौजूद हर व्यक्ति को शोभा नहीं देता है. इसे पहनने के लिए ज्योतिष की सलाह आवश्यक ह...
-
-
आचार्य राजेश ईस बार मलमास 15 दिसंबर से आरंभ हो रहा है जो 14 जनवरी 2018तक रहेगा। मलमास के चलते दिसंबर के महीने में अब केवल 5 दिन और विवाह मुह...
-
मित्रों आज वात करते हैं फिरोजा रतन की ग्रहों के प्रभाव को वल देने के लिए या फिर उन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए ज्योतिष विज्ञान द्वारा विभि...











