बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

अंक ज्योतिष कितना सही?

अंक ज्योतिष कितना सही? 

अब ज्‍योतिष की  बात है और मैं यह बात लिख रहा हूं तो आप सोचेंगे कि आखिर आ ही गया अपनी औकात पर। आप कुछ ऐसा समझ सकते हैं। क्‍योंकि मैंने सीखने में कभी कंजूसी नहीं बरती सो हर ऐसे इंसान से सीखने की कोशिश की जिसके बारे में कहा जाता था कि इसे कुछ आता है। सही कहूं तो आज भी यही स्थिति है। जिस तरह कला के जवान होने तक कलाकार बूढा हो जाता है वैसे ही ज्‍योतिष की समझ आने तक फलादेश करने का महत्‍व भी खो सा जाता है। खैर में आता हूं विषय पर आज मित्रों में बात करना चाहता हूं Ank ज्योतिष पर फलित ज्योतिष हमारे ऋषि-मुनियों की देन है तो इस पर उन्होंने बहुत खोज की और रिसर्च की है और भारत से यह विघा विदेशों में भी में फेली लेकिन हम भारतीय अपनी विद्या को संभाल नहीं सके और जब तक उसमें पश्चिम ठप्पा नहीं लगता तब तक उसको हम मानते नहीं और पश्चिम में विकसित आधा अधूरा ज्ञान को हम भारतीय अपना लेते हैं अपने अपने ज्ञान को भूलकर, हमारा भारतीय संवत बिक्रम संवत हिजरी संवत शाखा संवत आदि पहले तो यही तय कर लिया जाय कि परम्परावादी भारतीयों को अपना जन्मदिन कि पद्धति से मानना चाहिए, पारंपरिक हिन्दू कैलेण्डर को (जो भिन्न-भिन्न हैं) या आधुनिक कैलेण्डर को. मेरे जीवन को वर्त्तमान में जो तिथियाँ नियंत्रित करती हैं वे आधुनिक है परन्तु मेरे घर में ही बहुत सी बातों के लिए पारंपरिक कैलेण्डर को आगे कर देते हैं. फिर यह लोचा कि जन्मतिथि मात्र मानी जाय या जन्मतिथि, महीने, और वर्ष के अंकों का जोड़, इसमें भी कई विधियाँ हैं जिनसे योग पृथक आता है. फिर इसमें वर्णमाला के अक्षरों को भी शामिल कर लेना पचड़े को और ज्यादा बढ़ा देता है.वैदिक ज्योतिष, जो महर्षि पराशर, जैमनी, कृष्णमूर्ति आदि की उत्कृष्ट परम्परा पर आधारित है, उसमें जातक के जन्म की तिथि, समय और स्थान को लेकर, एक वैज्ञानिक तरीके से जन्म के समय, आकाश में ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति का निर्धारण कर समय का आकलन किया जाता है। तत्पश्चात ज्योतिष के शास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर फलित कहा जाता है। ज्योतिषीय गणनाएँ पूर्णतः खगोलीय सिद्धांतों पर आधारित होती हैं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जिस तरह घर-घर अपनी पैठ बना ली है, उसका एक दुष्प्रभाव यह हुआ कि मदारी ज्योतिषियों की संख्या बढ़ी है। आप कोई भी चैनल देखें, इन मदारी ज्योतिषियों की एक पूरी जमात अपने लैपटॉप पर त्वरित समाधान बाँचती नज़र आयेगी।उपभोक्तावाद की इस रेलमपेल में कहीं तिलक चुटियाधारी खाँटी पंडित जी दिखते हैं, तो कहीं टाई-सूट में सजे फ़र्राटा अंग्रेज़ी बोलने वाले एस्ट्रोलोजर। इन सबके बीच एक प्रचलित विद्या है अंक ज्योतिष। इस प्रचलित अंक ज्योतिष में व्यक्ति की जन्मतिथि (ईसवी कलेंडर के अनुसार) के अंकों को जोड़कर एक मूलांक बना दिया जाता है और फिर उसे आधार बनाकर अधकचरा भविष्य बाँच दिया जाता है। इसी तरह अंग्रेजी के अक्ष्ररों (ए, बी, सी, डी आदि) को एक एक अंक दिया है. और लोगों के नाम के अंग्रेजी अक्षरों के अंकों के योग से उसका मूलांक निकाला जाता है. फिर उसी आधार पर उसका भी भविष्य बाँच दिया जाता है।अंक ज्योतिष ईसवी कलेंडर की तिथि के अनुसार चलता है जिसका एक सौर वर्ष मापने के अलावा कोई सार्वभौमिक आधार नहीं है। समय के अनंत प्रवाह में ईसवी कलेंडर मात्र 20 शताब्दी पुराना है। जिसमें अचानक एक दिन को 1 जनवरी लेकर वर्ष की शुरुआत कर दी गयी और शुरु हो गया 1 से 9 अंकों की श्रेणी में जातक को बाँटने का सिलसिला। यह सर्वविदित है कि इतिहास की धारा में अनेक सभ्यताओं तथा राजाओं ने अपने अपने कलेंडर विकसित किये जिन सबके वर्ष और तिथियों में कोई तालमेल नहीं है। तब सवाल यह उठता कि अंक ज्योतिष का आधार ईसवी कलेन्डर ही क्यों? अंग्रेज़ों ने चुँकि विश्व के एक बड़े हिस्से पर राज किया, इसलिये ईसवी कलेंडर का प्रचलन बढ़ गया। यहाँ तक कि विभिन्न गिरजाघरों ने इस कैलेंडर के दिनों की मान्यताओं पर प्रश्न चिह्न लगाए हैं. और तो और, जो सबसे अवैज्ञानिक बात इसकी सार्वभौमिकता को चुनौती देती है, वो यह है कि भिन्न भिन्न देशों ने इस कैलेंडर को भिन्न भिन समय पर अपनाया.ईसवी कलेंडर की शुरुआत 1 ए.डी. से होती है जो 1बी.सी. के समाप्त होने के तुरत बाद आ जाता है, यह तथ्य मज़ेदार है, क्योंकि इस बीच किसी ज़ीरो वर्ष का प्रावधान नहीं है। देखा जाये तो ईसवी कलेंडर की तिथियाँ, मूलत: सौर वर्ष को मापने का एक मोटा मोटा तरीका भर है। जब हम ईसवी कलेंडर के विकास पर दृष्टि डालतें हैं तो पाते हैं कि कलेंडर के बारह महीनों के दिन समान नहीं हैं और इनमें अंतर होने का कारण भी स्पष्ट नहीं है. यदि इस कलेंडर का इतिहास देखें तो इतनी उथल पुथल है कि इसकी सारी वैज्ञानिक मान्यताएँ समाप्त हो जाती हैं. इस कलेंडर पर कई राजघरानों का भी प्रभाव रहा, जैसे जुलियस और ऑगस्टस सीज़र. 13 वीं सदी के इतिहासकार जोहान्नेस द सैक्रोबॉस्को का कहना है कि कलेंडर के शुरुआती दिनों में अगस्त में 30 व जुलाई में 31 दिन हुआ करते थे। बाद में ऑगस्टस नाम के राजा ने (जिसके नाम पर अगस्त माह का नाम पड़ा) इस पर आपत्ति जतायी कि जुलाई (जो ज्यूलियस नाम के राजा के नाम पर था) में 31 दिन हैं, तो अगस्त में भी 31 दिन होने चाहिये. इस कारण फरवरी (जिसमें लीप वर्ष में 30 व अन्य वर्षॉं में 29 दिन होते थे) से एक दिन निकालकर अगस्त में डाल दिया गया। अब क्या वे अंक ज्योतिषी कृपा कर यह बताएँगे कि दिनों को आगे पीछे करने से कालांतर में तो सभी अंक बदल गये, तो इनका परिमार्जन क्या और कैसे किया गया?सारी सृष्टि एक चक्र में चलती है सारे अंक एक चक्र में चलते हैं जैसे 1 से 9 के बाद पुन: 1 (10=1+0=1) आता है. ईसवी कलेंडर के आधार पर अंक ज्योतिष में अजब तमाशा होता है जैसे 30 जून (मूलांक 3) के बाद 1 जुलाई (मूलांक 1) आता है। इसी तरह 28 फरवरी (2+8=10=1) के बाद 1 मार्च (1 अंक) आता है। नाम के अक्षरों के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणियाँ अंगरेज़ी (आजकल हिंदी वर्णमाला के अक्षरों को भी) के अक्षरों के अंकों को जोड़कर की जाती हैं. अब यह तो सर्वविदित है कि नाम के हिज्जे उस भाषा का अंग है जो जातक के देश या प्रदेश में बोली जाती है और जो साधारणतः निर्विवाद होता है. जैसे ही इसका अंगरेज़ी लिप्यांतरण किया जाता है, वैसे ही विरोध प्रारम्भ हो जाता है. ऐसे में सारे अंक बिगड़ सकते हैं और साथ ही जातक का भविष्य भी इसी अधूरे ज्ञान का सहारा लेकर आजकल लोग इन ज्योतोषियों की सलाह पर अपने नाम की हिज्जे बदलने लगे हैं.अंक ज्योतिष के यह अंतविरोध, इसके पूरे विज्ञान को तथाकथित की श्रेणी में ले आते हैं। एक सवाल यह भी रह जाता है कि क्या पूरी मानव सभ्यता को मात्र 9 प्रकार के व्यक्तियों में बांट कर इस प्रकार का सरलीकृत भविष्य बाँचा जा सकता है? ऐसे में इस नितांत अवैज्ञानिक सिद्धांत को, ज्योतिष के नाम पर चलाने के इस करतब को क्या कहेंगे आप? भारतीय अंक ज्योतिष अपने आप में एक विज्ञान है और हमारी वर्णमाला मैं बहुत से रहस्य छुपे है हमारी तिथियां अपने आप में संपूर्ण है उपरोक्त विचार मात्र अंक-ज्योतिष के विषय में हैं। ज्योतिष शास्त्र के विषय में नहीं क्योंकि उसके सिद्धांत और पद्धतियाँ, खगोल शास्त्र पर आधारित हैं और कई अर्थो में वैज्ञानिकता लिये हैं। ज्योतिष शास्त्र में अभी और गहन शोध होने बाकी हैं भक्ति सिर को भी इस पर बात जारी रहेगी दोस्तों हो सकते मेरी बातों से तो ताकत के दोषियों को नाराजगी पैदा हो पर मुझे इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता सच तो सच्च ही होता है आचार्य राजेश

बुधवार, 23 जुलाई 2025

मैं कौन हूं

मेरेबरे में🌟 मैं कौन हूँ – , Acharya Rajesh की एक सीधी बात 🌟

मैं फिर से सबको एक बात साफ़ कर दूँ –मेरा मकसद किसी का पैसा  लूटने नहीं 
मैं कोई पैसा लेकर podcast करने वाला नहीं हूँ।
मेरे पास से consultation लेने के लिए
ना कोई 3-4 नंबर स्क्रीन पर घूमेंगे,
ना ही कोई "last 5 seats only" वाले जुमले होंगे।
मैं Jyotishi नहीं,
इंसान की आत्मा को जगाने वाला एक साधक हूँ।
मैं ना तो
Lal Kitab, Astrology, Vastu सीखाने के लिए
कोई seminar करवाता हूँ,
ना ही short course या महंगी fees रखता हूँ।
मैं किसी को
“शराब पीकर शुक्र ऊँचा करो” वाले उपाय नहीं बताता,
ना ही किसी के माथे या हाथ पे number लिखवाकर manifestation सिखाता हूँ।
ना ही कभी बिना तोड़फोड़ किए,
किसी के घर का Vastu ठीक करने का दिखावा किया।
मैंने कभी भी किसी केदुख या मजबूरी का फायदा उठाकर पैसे नहीं कमाए।
मैं सरेआम कहता हूँ —ज्ञान मैंने मुफ्त, नि:स्वार्थ भाव से दिया है।
उसे समझना, इस्तेमाल करना या ना करना —
ये आपकी चेतना पर निर्भर करता है।
हाँ, बहुत से
चालाक और लालची लोगों ने
मेरे ज्ञान का गलत इस्तेमाल भी किया,
लेकिन मैं आज भी उसी उम्मीद में हूँ —
कि इंसान एक दिन समझेगा:
सितारों के आगे जहाँ और भी हैं,
इश्क़ के इम्तिहान और भी हैं।"
💥 ज़िंदगी में न pen से लिखा कुछ बदलता है,
न अपने नाम की स्पेलिंग चेंज करने  सेअगर कुछ बदलता है –
तो या तो सच्चे इश्क़ से,या फिर ईश्वर से प्रेम करने से।
-🙏🏼💫

सोमवार, 7 जुलाई 2025

आचार्य जी, आपका राजा (सूर्य) इतना 'गरीब' क्यों है?"

ऑफिस डायरी / सत्य घटना

"

आचार्य जी, आपका राजा (सूर्य) इतना 'गरीब' क्यों है?" — जब एक 'लॉजिकल' दोस्त मेरे ऑफिस में ही फंस गया!

(एक मजेदार किस्सा: कैसे बिग-बैंग, मेडिकल साइंस और रिश्तों के सच ने ज्योतिष को सिद्ध किया)

1. एंट्री: एक डरा हुआ भक्त और एक अकड़ू दोस्त

कल दोपहर की बात है। मेरा पुराना क्लाइंट आर्यन अपने दोस्त विकास के साथ आया। विकास के चेहरे पर "मैं सब जानता हूँ" वाला भाव था। आते ही उसने ऐलान कर दिया, "आचार्य जी, मैं इन ग्रह-नक्षत्रों को नहीं मानता। यह सब अंधविश्वास है। अगर आपके पास लॉजिक है तो बात करें, वरना मैं अपने दोस्त को ले जा रहा हूँ।"

मैंने मुस्कुराकर कहा, "विकास बाबू! विराजिये। चाय पीजिये और अपने 'लॉजिकल' तीर चलाइये।"

2. पहला राउंड (सबसे बुनियादी सवाल): "सूर्य राजा और चंद्रमा रानी ही क्यों?"

विकास ने कुर्सी खींचते ही पहला सवाल दागा:

"आचार्य जी, बेसिक से शुरू करते हैं। आपने सूर्य को 'राजा' और चंद्रमा को 'रानी' बना दिया। बाकी सब नौकर। ऐसा क्यों? चंद्रमा तो पत्थर का टुकड़ा है, उसे रानी क्यों कहते हो?"

मैं गंभीर हो गया और कहा:

"विकास जी, यह पद 'साइज' देख कर नहीं, 'स्वभाव' (Nature) देख कर दिए गए हैं।

 * सूर्य (राजा) क्यों?

   पूरे सौरमंडल में केवल सूर्य के पास अपनी 'रोशनी' और 'ऊर्जा' है। वह 'देने वाला' (Giver) है। उसके बिना अंधेरा है। जैसे घर में पिता कमा कर लाता है, वैसे ही सूर्य सबको जीवन देता है। वह आत्मा है।

 * चंद्रमा (रानी) क्यों?

   विकास बाबू, सूर्य 'आग' (Fire) है, 11,000 वोल्ट का करंट है। अगर यह सीधी आग जनता (पृथ्वी) पर गिरे, तो सब जलकर राख हो जाएगा।

   रानी (चंद्रमा) का काम है राजा के उस भयानक 'तेज' (Heat) को सहन करना। चंद्रमा सूर्य की चिलचिलाती धूप को खुद पीता है, उसे अपने भीतर सोखता है और फिर उसे फिल्टर करके 'शीतलता' (चांदनी) के रूप में हमें देता है।

   यह बिल्कुल घर की माँ (रानी) जैसा है— पिता (सूर्य) का गुस्सा और दुनिया की तपन माँ खुद झेलती है, और बच्चों (हम) तक सिर्फ प्यार और ममता पहुँचाती है। जो आग को पीकर अमृत दे दे, वही तो रानी हो सकती है! इसलिए चंद्रमा रानी है।"*

विकास ने पहली बार सिर हिलाया, "हम्म... यह बात तो गहरी है।"

3. दूसरा राउंड: "तो फिर राजा-रानी के पास 1 BHK फ्लैट क्यों?"

विकास ने तुरंत अगला सवाल जोड़ा:


"अगर ये इतने ही खास हैं, तो कुंडली में इनके पास सिर्फ एक-एक घर (राशि) क्यों है? जबकि मंगल, गुरु, शनि सबके पास दो-दो घर हैं?"

मैंने हंसकर कहा, "विकास जी, शरीर में हाथ कितने हैं? दो। पैर? दो। लेकिन 'आत्मा' कितनी है?"

विकास: "एक।"

"और 'मन'?"

"वो भी एक।"

"बस! कुदरत का नियम है— काम करने वाले नौकर (हाथ-पैर/मंगल-शनि) दो हो सकते हैं, लेकिन मालिक (आत्मा/सूर्य) और मालकिन (मन/चंद्रमा) एक ही होते हैं। इसलिए राजा-रानी को एक-एक ही राशि मिली। यह गरीबी नहीं, उनकी 'पावर' (Singularity) है!"

4. तीसरा राउंड: "बिग बैंग, कलमा और वर्ड (मेष राशि का राज)"

विकास अब थोड़ा संभल गया था। उसने पूछा: "चलिए ठीक है। लेकिन मेष (Aries) ही पहली राशि क्यों? सूर्य को नंबर 1 क्यों नहीं मिला? या गुरु को?"

मैंने कहा: "क्योंकि ज्योतिष वही बात कहता है जो आपके धर्मग्रंथ और साइंस कहते हैं।"

 * बाइबिल: 'In the beginning was the Word' (शुरुआत में शब्द था)।

 * कुरान: कहती है सबसे पहले 'कलमा' (कुन) आया, गूंज हुई।

 * वेद: कहते हैं 'नाद' (ओम) से सृष्टि बनी।

 * साइंस: कहता है 'Big Bang' (महाविस्फोट) हुआ।

"जब धमाका (Big Bang) होता है, तो सबसे पहले क्या पैदा होती है? ऊर्जा और आग (Energy & Fire)। और ज्योतिष में आग का मालिक कौन है? मंगल (Mars)।

इसीलिए ऋषियों ने 'मेष राशि' (मंगल) को नंबर 1 पर रखा। सृष्टि 'शांति' से नहीं, 'धमाके' से शुरू हुई थी।"​विकास अब थोड़ा नरम पड़ गया था, लेकिन जिज्ञासा बाकी थी।

"तो बाकी ग्रहों का क्रम कैसे बना?"

​मैंने कागज पर गोला बनाया:


"विकास जी, जब 'बिग बैंग' (मंगल) हुआ और सूर्य (तारा) बना, तो धमाके से जो टुकड़े गिरे, वो अपनी 'वजन' (Density) के हिसाब से सेट हो गए:

  • बुध: सबसे भारी, इसलिए सूर्य के सबसे पास गिरा (मिथुन-कन्या)।
  • शुक्र: उससे हल्का, थोड़ा दूर (वृषभ-तुला)।
  • मंगल: और दूर (मेष-वृश्चिक)।
  • गुरु: भारी गैस, और दूर (धनु-मीन)।
  • शनि: सबसे हल्का (गैस का गोला), अंधेरे में सबसे दूर जा गिरा (मकर-कुंभ)।

​यह ऋषियों ने हजारों साल पहले अपनी 'दिव्य दृष्टि' से देख लिया था 

5. चौथा राउंड: "खून की गर्मी और जीवन-मृत्यु"

मैंने आगे जोड़ा:

*"विकास जी, जिंदा आदमी और मुर्दे में क्या फर्क है? सिर्फ 'गर्मी' का। जब तक खून गर्म है (मंगल), जीवन है। खून ठंडा पड़ा, खेल खत्म!

 

* मेष (मंगल): जीवन की शुरुआत (बच्चे का रोना/ऊर्जा)।

 * वृश्चिक (मंगल): जीवन का अंत (श्मशान/बदलाव)।

   आदि भी मंगल, अंत भी मंगल। इसलिए सूर्य (राजा) भी अपने महल में नहीं, बल्कि मंगल के घर (मेष) में जाकर ही 'उच्च' (Exalted) का होता है, क्योंकि राजा की असली शोभा युद्ध के मैदान में है।"*

6. पांचवां राउंड: "पत्थर का चाँद और मन का खेल"

विकास: "लेकिन चंद्रमा तो उपग्रह है, वो मेरे मन को कैसे कंट्रोल करेगा?"

मैंने पानी का गिलास उठाया:

"विकास बाबू, अगर चंद्रमा इतनी दूर से समंदर में ज्वार-भाटा (High Tide) ला सकता है, अरबों टन पानी हिला सकता है, तो क्या आपके शरीर का 70% पानी और खून नहीं हिलाएगा?

पूर्णिमा को पागलपन और बेचैनी बढ़ना जादू नहीं, Liquid Mechanics है!"

7. आखिरी वार: "राहु-केतु और परछाई"

जाते-जाते विकास ने पूछा: "और राहु-केतु? वो तो दिखते भी नहीं?"

मैंने कहा: "सड़क पर अपनी 'परछाई' देखी है? उसका वजन नहीं होता, पर वो साथ चलती है।

राहु वही 'छाया' है। जब सूर्य ग्रहण लगता है, तो कोई पत्थर बीच में नहीं आता, बस एक 'छाया' (राहु) आती है और भगवान सूर्य को ढक देती है। जो छाया सूरज को ढक दे, वो आपकी जिंदगी में अंधेरा तो कर ही सकती है।"

निष्कर्ष

विकास ने अपना लैपटॉप बैग उठाया और हाथ जोड़कर बोला, "गुरुदेव, मान गया! यहाँ तोता नहीं उड़ाया जाता, यहाँ तो ब्रह्मांड की फिजिक्स और रिश्तों की केमिस्ट्री पढ़ाई जाती है।"

तो दोस्तों,

ज्योतिष अंधविश्वास नहीं है। यह सूर्य की चमक, चंद्रमा के त्याग, मंगल की ऊर्जा और बिग-बैंग की गूंज का विज्ञान है।

आचार्य राजेश कुमार

(ज्योतिष, वास्तु और आध्यात्मिक अनुसंधान)

हनुमानगढ़, राजस्थान


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शनिवार, 2 नवंबर 2024

कर्म फल और ईश्वर

परमात्मा हमारे/मनुष्यों के कर्मों का फल स्वयं देने नहीं आता। वह ऐसी परिस्थिति और संयोग बनाता है, जहाँ मनुष्य को फल मिल जाता है। यूं कहें कि परमात्मा दिलवा देता है, किसी अन्य मनुष्यों के द्वारा। और उस मनुष्य को 9 ग्रहों और नक्षत्रों द्वारा प्रभावित करके परमात्मा, कर्मफल को घटित करता है, मनुष्य की निर्णय लेने की प्रक्रिया बदल कर!

इसलिए बहुत से अकाट्य मुहावरे और कहावतें हैं परमात्मा पर।
1-हानि-लाभ जीवन-मृत्यु मान-अपमान विधि हाथ'
2-होइहि सोइ जो राम रचि राखा। कौन करे तर्क बढ़ावे शाखा ।
3-करम प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।।"
4-राम मिलाई जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी ।।

विनाश काले विपरीत बुद्धि। 
विकास काले अनुकूल बुद्धि।

इसलिए मनुष्य वह कर सकता है, जो वह चाहता है। पर वह यह चाह नहीं सकता कि वह क्या चाहे!

रविवार, 29 सितंबर 2024

साल का आखिरी सूर्य ग्रहण

मित्रों 2024 के आखिरी चंद्र ग्रहण के 15 दिन बाद ही, साल का चौथा ग्रहण जो सूर्य ग्रहण होगा वो लगेगा। वैदिक पंचांग के अनुसार 2 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या है। इसे आश्विन अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होता है। प्रत्येक वर्ष आश्विन माह में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर अमावस्या तिथि तक पितृ पक्ष मनाया जाता है। इस दौरान सूर्य ग्रहण 2 अक्तूबर को रात्रि  9 बजकर 13 मिनट से शुरू होगा और इसकी समाप्ति रात 3 बजकर 17 मिनट पर होगी। भारत में इस समय रात रहेगी जिस वजह से आप सूर्य ग्रहण को नहीं देख पाएंगे।2 अक्तूबर को रात्रि के समय सूर्य ग्रहण लगेगा, जिसका असर भारत में नहीं दिखाई देगा। ऐसे में सूतक काल भी मान्य नहीं होगा। 
रवि29 तारीख को सूर्य और  केतु राहुकाल में एक ही डिग्रीपर कन्या राशि हस्त नक्षत्र पर 12° 26' 36" पर होगें  19अक्टूबर 2024 तक का समय बेहद संवेदनशील। राजनीतिक उथलपुथल व सत्ता पलटने के योग। नेता, सरकारी नौकर, बेरोक्रेट्स, रिस्टरोक्रेट्स व उच्च स्तर पर बैठे लोग सतर्क रहें। नौकरी जाने या किसी बड़े पर्दाफाश की संभावना। अभी से कुछ देशों के बीच चल रहा युद्ध बेहद हिंसक होगा। भारत व विश्व के वायव्य व उत्तर के क्षेत्र व समुद्र तटीय क्षेत्र में आपदा व आपातकालीन स्थिति के  इलावा लोगों के रोजगार को प्रभावित करेगा। आगे पूरे विश्व के युद्ध के हालात बन सकते हैं
2026 तक विश्व में युद्ध के हालात भयंकर हो सकते हैं कहीं पर भूचाल भूकंप और सुनामी के हालात बन सकते है

शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

jyotish Sutra

सूर्य 10 डिग्री का ही मेष में उच्च का रहता है क्योकि 10 डिग्री तक ही मेष राशि मे अश्वनी नक्षत्र रहता है

अश्वनी नक्षत्र का स्वामी केतु है केतु देव को मंगल के समकक्ष ही माना गया है

कुब्जवत केतु

👆🏻
अब कालपुरुष कुंडली के अनुसार मंगल सूर्य केतु तीनो का ही मेष राशि पर आधिपत्य हो गया

मंगलदेव की मूलत्रिकोण राशि मेष जहां सूर्यदेव उच्च के होते है 10 डिग्री तक,10 डिग्री तक ही अश्वनी नक्षत्र रहता है मेष में

मंगल देह है 
सूर्य आत्मा
केतु मोक्ष

आत्मा तो अजर अमर है यात्रा शरीर को करनी है

मंगल अग्नितत्व
सूर्य  अग्नितत्व
केतु अग्नितत्व

इसलिए हम कह सकते है कि जीव की उत्तपत्ति अग्नि से हुई है

और यही कारण है कि कालपुरुष कुंडली मे मेष राशि प्रथम भाव मे आई एवम मंगलदेव को मेष राशि का स्वामितत्व दिया गया

 एक राशि मे 9 चरण होते है 

आप इसे नवमांश भी कह सकते है 

चु चे चो ला अश्वनी -केतु

ली लू ले लो भरनी  -शुक्र

कृतिका का प्रथम चरण आ -सूर्य

👆🏻
अब आप लोग बताये की सूर्य 11 डिग्री या 15 डिग्री का मेष में हो तो क्या सूर्यदेव उच्च के होंगे ❓

सूर्यदेव जगत पिता है ऑथोरिटी के कारक है राजा है 10 से 20 डिग्री तक मेष राशि मे भरनी नक्षत्र रहेगा जिसके स्वामी शुक्रदेव है शुक्र भोग विलाश के कारक है

यदि एक राजा या पिता भोग विलाश में लिप्त हो जाये तो उस परिवार या जनता का हाल होगा❓

मतलब अंधेरी नगरी चौपट राजा वाली कहावत लागू हो जाएगी

जब सूर्य देव मेष राशी में 10 से 20 डिग्री तक रहेंगे तो उनकी शक्ति बहुत क्षीण हो जाएगी
वो अपना प्रभाव नही दे पाएंगे क्योकि यहां सूर्यदेव शुक्र के अधीन होंगे

"कृष्णमूर्ति पध्दति KP का भी यही नियम है"

ग्रह अपना प्रभाव ना देकर अपने नक्षत्र स्वामी का प्रभाव देते है

यही से तो कृष्णमूर्ति जी ने KP पध्दति शुरुवात की

Dasha Lord Then Stronger
 Sub Lord
 Sab Lord Then Stronger Sub Sub Lord

मतलब महादशा स्वामी से ज्यादा ताकतवर अंतर्दशा स्वामी है 
और अंतर्दशा स्वामी से भी ज्यादा शक्तिशाली प्रत्यंतरदशा स्वामी होता है
क्योकि फल तो आपको प्रत्यन्तर दशा मे ही मिलने वाले है

 अब ये दशा 
अंतर्दशा
प्रत्यन्तर दशा क्या है 

नवग्रहों की महादशा या आप कह सकते है कि
120 वर्ष की विंशोतरी दशा का कर्म है 

यही नवा भाग तो आपका Sub Sub लार्ड बनेगा

 इसे आप अन्य तरीके से समझिए
👇🏻

ग्रह से शक्तिशाली नक्षत्र स्वामी
   नक्षत्र स्वामी से पावरफुल उप नक्षत्र स्वामी 

मतलब दशा नाथ से ज्यादा 
अंतर्दशा नाथ और अंतर्दशा नाथ से ज्यादा शक्तिशाली प्रत्यंतर दशा नाथ जिसे हम सब लार्ड कहते है,

जैसे बच्चे की शादी करनी हो तो घर मे जो ज्यादा शक्तिशाली होगा  उसकी की चलेगी मतलब जब वो प्रॉमिस करेगा तब ही शादी होगी,

Example:- ग्रह जातक स्वयं
    नक्षत्र स्वामी पापा
ओर उपनक्षत्र स्वामी मम्मी

अब सबको पता है कि घर मे सबसे ज्यादा मम्मी की ही चलती है,

जैसे मानलो आप किसी विभाग में उच्च पद पर है तो आपका ऑडर वही चलेगा जहा आप पोस्टेड है ,दूसरी जगह नही example आप दिल्ली पोस्टेड है एवम आप हरिद्वार स्नान करने गए है तो हरिद्वार में आपका ऑर्डर नही चलेगा,लेकिन जैसे आप अपनी कुर्सी पर बैठते है, आपका ऑर्डर फिर से चलने लग जाएगा,

ऐसा ही इस पद्दति में है,

शादी (Marriege) के लिए इस पद्दति में 
2 7 11 भाव को मुख्य रूप से लिया जाता है,

अब 2,7,11 क्या है 

2 भाव कुटुम्भ का क्योकि शादी 2 इंसानों की होती है ,

7 भाव समाज के लोगो का आशीर्वाद क्योकि बिना आशीर्वाद के शादी नही होती ,

11 भाव लाभ का इच्छा पूर्ति का,

इन तीनो के माध्यम से ही शादी होती है,

अब इसमें 1 भी कनेक्ट होना चाहिए क्योंकि 1 भाव जातक स्वयं है बिना जातक के शादी कैसी शादी तो जातक को ही करनी है,

12 भी कनेक्ट होना चाहिए क्योंकि शादी कैसी होगी ये 12 वा भाव तय करता है 
मतलब की 12 भाव लग्जरी का है ,

5 भाव और 9 भाव

2 ,7,11 भावो के मित्र है 

क्योकि 5 भाव प्रेम का
9 भाव भाग्य का

कोर्ट मैरिज के लिए 6 भाव कनेक्ट होना चाहिए ,

3 ऒर 4 भाव ये एक्स्ट्रा है मतलब इनका महत्व कम है ,

अब बात करते है ,
No मैरिज या डिवोर्स

इनके फिक्स भाव है 
1 6 10 क्योकि ये भाव शादी के भावो से 12 th है मतलब की इनका व्यय करेंगे,

 1 भाव जातक अकेला है या रहना चाहता है,

6 भाव कोर्ट केश

10 भाव जज की स्टम्प जब लगेगी तब ही तलाक होगा अन्यथा नही 
12 th भाव कनेक्ट हो जाए तो सबको लता है ये लॉस का भाव है,मतलब की तलाक होगा लेकिन धूमधड़ाके से

जैसे 1,6,10,में 11 कनेक्ट हो जाये तो तलाक होना मुश्किल हो जाएगा ,क्योकि 11 भाव 2,7 भाव का मित्र है,

 12th भाव loss का है 
ओर 12 th से bhi 12th 11 भाव loss का भी लोस्स

12 वा घर अपने घर से 12 वे घर को घटाएगा मतलब की उसके महत्व को कम करेगा,

वही दूसरी ओर 

2nd हाउस अपने घर से दूसरे घर  के महत्व को बढ़ाएगा मतलब वृद्धि करेगा ,

"मेरे कहने का या इतना लिखने का मतलब यही है कि हमारी वैदिक ज्योतिष पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए बिना इसके सब व्यर्थ है"
 
       

रविवार, 31 मार्च 2024

लाल का किताब के अनुसार मंगल शनि

मंगल शनि मिल गया तो - राहू उच्च हो जाता है - 
            यह व्यक्ति डाक्टर, नेता, आर्मी अफसर, इंजीनियर, हथियार व औजार की मदद से काम करने वाला होगा, 
       कुण्डली में शनि अच्छा बैठा है  - जैसे 2,3,7,8,9,10,11,12 मे  है तो इस  व्यक्ति के बेटा  होगा - चाहे  बेटा देरी से होगा । 
      देश की सुरक्षा के लिए काम कर सकता है - सिक्युरिटी का काम कर सकता है , 
मंगल शनि: शनि रात, मंगल लाली मतलब छुपते हुए सूर्य की लाली पाता है, शान बुढ़ापे बढ़ती जो, बुढ़ापे में शान बढ़ेगी जिसकी कुण्डली में मंगल शनि एक साथ होगा, बुढ़ापा अच्छा बीतेगा, बचपन से जवानी तक हालत खराब होगीं , 
            अपने बेटे, भाईयों के सहारे ही बुढ़ापे में हालत अच्छी होगी लेकिन परेशानी जरूर होगी। बीमारी जब भी लगेगी बड़ी बीमारी ही लगेगी। ध्नन -दौलत भी उझड़ जायेगा। 
             मगर उम्र लम्बी होगी। मंगल शनि किसी भी तरह से मिल रहा हो या मंगल शनि एक साथ हो ऐसे व्यक्ति लाटरी चलाने वाले होते हैं, कोई ना कोई पैसे की स्कीम चलाने वालो होते हैं, वित्तीय काम करने वाले होते हैं। नुकसान भी होगा तो बहुत बड़ा होगा। 
              जिसका भी मंगल शनि किसी भी तरह से मिल रहा हो या एक साथ आ जाये तो ऐसे कुण्डली वाले को शेयर बाजार में पैसा ना लगाये। 
उपाय: साबुत बादाम और नारियल जल प्रवाह करें। बढ़ के पेड़ के उपर मीठा दूध् चढ़ाने। 
           मन्दी हालत के वक्त: जब माली हालत खराब चल रही हो उस समय उपाय के रूप में-घोड़ी ने जब बच्चा दिया हो उसके पहले दूध् को काँच के बर्तन में भरकर रखें, ध्न दौलत में वृद्धि  होगी।

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

आओ ज्योतिष विद्या सीखे

मैने अपनी पिछली पोस्ट
 मे तिथियों की जानकारी दी थी यह संख्या मे कुल तीस होती है और मास का आरम्भ सदा पड़ेवा या प्रतिपदा से होता है और उसके बाद दूज तीज चौथ तथा पंचमी होती है इनको ज्योतिष की भाषा मे नन्दा,,जया,,भद्रा,,रिक्ता और पूर्णा कहते है यह पांच पांच के साइकल मे पुनरावृत्ति होती है और पन्द्रहवीं तिथि या तो अमावश्या कहलाती है या पूर्णमाशी। इसमें अमावस्या से पहले की पांच तिथि और बाद की पांच तिथि कम बली होती है इसलिए आमतौर पर इनको महूर्त मे ग्रहण नहीं करते है,,यह साधारण नियम है सदा ऐक जैसा लागू नहीं होता है।यह जानकारी अधूरी है शेष अगले भाग मे।आप थोड़ा सा ध्यान देंगे तो काम चलाऊ पंचांग देखना सीख जाऐगे।सबका धन्यवाद।

सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

आओ ज्योतिष विद्या सीखे1

आज फिर अपनी पंचांग की जानकारी वाली पोस्ट पर आगे ,,मै इसको सरल शब्दो मे समझाने का प्रयास करूंगा और कुछ इसके माध्यम से ज्योतिष सीखना आरम्भ करने वालो को जानकारी देने का प्रयास रहेगा।मैने नक्षत्र के बारे मे और तिथि की जानकारी दी थी जिस खाने मे नक्षत्र लिखा है वह ऊपर से नीचे रहता है पर नक्षत्र के नाम से दाहिने हाथ की तरफ आपको दो खाने मिलेंगे ऐक मे घटी पल लिखा होगा और दूसरे मे घण्टा मिनट ,,यह उस नक्षत्र के समाप्त होने का समय रहता है।ऐक घटी 24 मिनट की होती है और ऐक घटी मे 60 पल होते है।आप घण्टा मिनट ग्रहण करें इससे आपको नक्षत्र के समाप्त होने का समय ज्ञात होगा इसी प्रकार तिथि के दाहिनी तरफ आपको घटी पल और घण्टा मिनट लिखा मिलेगा यह तिथि के समाप्त होने का समय होता है। दाहिनी तरफ ही आपको कुछ और जानकारी मिलेगी यदि उस दिन भद्रा है तो दाहिने तरफ उसके आरम्भ होने का समय लिखा रहता है और भद्रा के समाप्त होने का भी समय लिखा रहता है।
आज इतनी जानकारी इसको किसी पंचांग को लेकर चेक करना सीखे शेष अगली बार,,सबका धन्यवाद।

शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

आओ ज्योतिष विद्या सीखें

आज ज्योतिष पर बहुत छोटी सी पोस्ट,, ज्योतिष पढ़ना पढ़ाना और ज्योतिष सीख कर फलित करना दोनो मे ज़मीन आसमान का अन्तर रहता है ज्योतिष मे आपको जैसे जीने मे ऐक ऐक सीढ़ी चढ़ना सिखाया जाता है वैसे ऐकल ग्रह का फल पढ़ाते है और जब आप इस विषय को सीख लेते है तो अपनी उस जानकारी के आधार पर कुण्डली का फलित करते है यह अन्तर बहुत बड़ा हो जाता है।
फलित मे आपको 12 राशियो,,9 ग्रह और 12 भाव तथा 27 नक्षत्र के आधार पर सारे प्रश्नो के उत्तर देने होते है,,केवल ऐक ग्रह के आधार पर सीमित फलित तो कर सकते है फर सम्पूर्ण नहीं और इतनी मेहनत करने फर भी कभी उत्तर शत-प्रतिशत नही मिलता बल्कि ऐक की जगह दो या तीन उत्तर निकलते है उसमें से किसका चयन करें जो घटे इसमें इष्ट कृपा सहायक होती हैऔर आपका सात्विक आचरण यह इस ब्रह्म विद्या और अन्य विषय मे सबसे प्रमुख अन्तर‌है।
शनि मंगल को आम तौर पर पापी ग्रह माना गया है और सूर्य को क्रूर ग्रह कभी यह सोचा इसका क्या कारण है इसका कारण शनि और मंगल दोनो को 12 राशियों मे केवल 39 39 रेखा मिलना है सर्वाष्टक सारणी मे।सूर्य को 48 मिलती है और चन्द्रमा को सूर्य से ऐक अधिक 49 मिलती है और शुक्र,, गुरू तथा बुध को 50 से अधिक मिलती है।
आप इस अन्तर को समझे आपको टुकड़े-टुकड़े मे पढ़ाया गया है पर फलित आपको सम्पूर्ण करना है।आशा करता हूं यह छोटा सा अन्तर आपको सही लगा होगा।सबका धन्यवाद।

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2023

श्राद्धपक्ष या पितृपक्ष

श्राद्धपक्ष या पितृपक्ष: इस तरह पाएं पूर्वजों का आशीर्वा हिंदू धर्म को मानने वाले श्राद्धपक्ष में पूर्वजों का आशीर्वाद पाने के लिए तर्पण व उपाय करते हैं।संसारमें हमारे संबंध दो प्रकार के होते हैं १-स्थूल शरीरसे २-भावनात्मक शरीरसे । आजीवन हम, हमारे स्वजनों की इच्छापूर्ति व सेवा प्रत्यक्ष कर सकते हैं किन्तु मरणोपरान्त यह संभव नहीं है यथा भावनात्मक संबंध से उनकी इच्छाओंकी आपूर्ति करते हैं । यहांसे श्राद्धका प्रारम्भ होता हैं

 ।प्रकीर्तितम् भाव से कुछ समर्पित किया जाता हैं तो भावात्मक शरीर उसे अवश्य प्राप्त करता हैं । टैलीपथी यहीं तो हैं – हमारे विचारों का भावात्मक शरीर द्वारा आदान-प्रदान । वाचाहीन प्राणी भी इससे ही अपना व्यवहार करते हैं । श्रद्धया दीयते यत्‌ तत्‌ श्राद्धम्‌ पितरों की तृप्ति के लिए जो सनातन विधि से जो कर्म किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं । ऎसा नहीं है कि सूक्ष्म शरीर की ये अवधारणा सिर्फ भारतीय है बल्कि "Egyptian Book of the Dead " में भी सूक्ष्म शरीर के बारे में विचार प्रकट किए गए हैं । आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के डा. सेसिल ने भी प्रयोगों के आधार पर एक निष्कर्ष निकाला था कि स्थूल शरीर के समानान्तर किसी एक सूक्ष्म शरीर की सत्ता है,जो कि सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों के बावजूद कभी कभी शरीर को छोडकर दूर चली जाती है,हालांकि एक सुनहले रंग के सूक्ष्म तंतु(तार) के माध्यम से ये हर हाल में हमारे इस स्थूल शरीर की नाभी से जुडी रहती है। जब कभी यह सुनहला तंतु (तार) किसी कारणवश टूट जाता है तो उस सूक्ष्म सत्ता का स्थूल शरीर से फिर कोई संबंध नहीं रह जाता और यही किसी व्यक्ति की आकस्मिक मृ्त्यु का कारण बनता है। कुरानमें भी - फिर पुनर्जन्म के समय तुम उपर उठोगे पाक कुरआन 23-16 । अद्वैत वेदांत अनुसार कि "ब्रह्म सदैव विकासशील रहता है" । आधुनिक युग में इस स्थापना की सर्वप्रथम पुष्टि हुई आईंस्टीन के इस कथन द्वारा कि "यूनिवर्स निरन्तर प्रगति पर है"। वर्तमान समय में जीवन भागदौड़ से भरा है। इसलिए कई लोगों के लिए यह संभव नहीं हो पाता कि वे पितरों के लिए तर्पण आदि कर पाएं। ऐसे में हमारे शास्त्रों में कुछ छोटे.छोटे उपाय बताए गए हैं। ये उपाय ऐसे हैं जो किसी भी व्यक्ति की कुण्डली में शनि, राहु सूर्य और गुरु ग्रहों की युति और उनके साथ अन्य ग्रहों के बुरे प्रभावों से बने पितृदोष को भी दूर करते हैं। ये उपाय सुखी सफल और वैभवशाली जीवन की राह आसान बनाने वाले माने गए हैं। जानिए ये खास उपाय : श्राद्ध पक्ष में गरीब बच्चों को सफेद मिठाई का दान करें। -देवता और पितरों की पूजा स्थान पर जल से भरा कलश रखकर सुबह तुलसी या हरे पेड़ों में चढ़ाएं। -भोजन से पहले तेल लगी दो रोटी गाय को खिलाएं। -चिडिय़ा या दूसरे पक्षियों के खाने.पीने के लिए अन्न के दानें और पानी रखें। -पिता, गुरु व उम्र में बड़े लोगों का अपमान न करें। उनकी खुशी के लिए हरसंभव कोशिश करें। -सफेद कपड़ों व सफेद रूमाल का दान करने से भी पितृ दोष दूर होता है। -अनाज और फलों का दान करने से भी पितृ देवता खुश होते हैं। -हनुमानजी के मंदिर में नियमित रूप से घी का दीपक जलाएं। -शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर दूध अर्पित करें। उसके बाद 5 लीटर दूध गरीब बच्चों में बांटे। यह उपाय पूरे 16 दिन करें। जिन लोगों को भी पितृ दोष है उन्हें इस उपाय को करने से बेहतर परिणाम मिलेंगे। -हर शनिवार को पीपल या वट की जड़ों में दूध चढाएं। -रोज तैयार भोजन में से तीन भाग गाय, कुत्ते और कौए के लिए निकालें और उन्हें खिलाएं। -किसी तीर्थ पर जाएं तो पितरों के लिए तीन बार अंजलि में जल से तर्पण करना न भूलें। -रोज माता-पिता और गुरु के चरण छूकर आशीर्वाद लेने से पितरों की प्रसन्नता मिलती है। -जिस भी व्यक्ति की पुण्यतिथि है उसकी पसंद का पकवान बनाकर गरीबों को दान करें। अपने माता पिता की सेवा करे । पृथ्वी से ब्रह्माण्ड – नक्षत्र – ग्रह जिसे भी हम जानते हैं, हम अपना बनाते हैं, तो जो हमारे हैं उनको हम मरणोपरान्त कैसे भूल सकते हैं – कैसे उनसे नाता तोड सकते हैं । सूर्य-चंद्र-नक्षत्रों से हमे संबंध है, यथा हम सूर्योपासना या ग्रहशांति करते हैं वैसे हि पितरोसे भी हम श्राद्धद्वारा हमारा सम्बंध कायम करतै हैं ।
श्राद्ध के विषयमें यह पर्याप्त नहीं हैं, यद्यपि अवकाश एवं मेरे ज्ञानकी मर्यादाके कारण यहां विराम करते हैं.. आप विद्वज्जन के चरणों में समर्पित जय  माता दी

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...