आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शनिवार, 24 जून 2017
क्यों काम नहीं करते हैं ज्योतिष के अनुसार किए उपाय मित्रों हमारा उद्देश्य किसी भी विद्वान को आहत करने का नहीं है, अतः अनजाने में भी यदि किसी को कष्ट हो तो बात प्रारंभ करने से पहले ही क्षमा चाहेंग हम उस आदमी को धोखा देने का असफल प्रयास कर रहे हैं, जो देवता तुल्य हमें सम्मान दे रहा है, अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन भी, क्या हमें ऐसा करके हमेशा के लिए उसकी नजरों से गिरने का काम करना चाहिए, केवल पैसे की भूख हमारी छवि को हमेशा के लिए समाप्त करने के साथ ज्योतिष शास्त्र की आस्था को भी राहत न मिलने पर समाप्त कर देती है सामान्य परेशान लोगों में से अधिकतर की शिकायत होती है कि ,उनकी समस्या के लिए वे बहुतेरे ज्योतिषियो ,तांत्रिकों ,पंडितों से संपर्क करते हैं किन्तु उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता या बहुत कम लाभ दृष्टिगोचर होता है ,तथा उनकी परेशानी यथावत रहती है अथवा केवल कुछ समय राहत देकर फिर वैसी ही हो जाती है |वे यहाँ वहां अपनी समस्या का समाधान पाने के चक्कर में घूमते रहते हैं पर कोई सही समाधान नहीं मिलता अंततः थक हारकर मान लेते हैं की जो किस्मत में होता है वाही होता है ,या कोई उपाय काम नहीं करता ,यह सब बेकार हैकुछ तो यहाँ वहां घूमते हुए खुद थोड़ी बहुत ज्योतिष समझने लगते हैं ,टोने -टोटके आजमाते आजमाते ,शाबर मंत्र ,तांत्रिक मंत्र आदि पढ़कर , थोड़े बहुत टोने -टोटके जान जाते हैं ,कुछ मंत्र जान जाते हैं ,कुछ पूजा पाठ ,स्तोत्र आदि जान जाते हैं ,फिर ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र की कुछ सडक छाप किताबों को पढ़कर ,नेट पर खोज कर अपनी समस्या का समाधान ढूंढते हुए खुद को ज्योतिषी और तांत्रिक मान लेते हैं |समस्या उनकी ख़त्म हो न हो ,उन्हें खुद राहत मिले या न मिले पर लोगों को उपाय जरूर लता ने लग जाते हैं और लोग भी ऐसे हैं यहां मुफ़्त का चाहते हैं वुखार भी क्यों ना होऐक तरफ मेरे जैसे ठग ज्योतिषी तांत्रिक आचार्य वन कर और लोगों को टोटके ,उपाय ,मंत्र बांटने लगते हैं ,धन लेकर उनके लिए अनुष्ठान ,क्रिया करने को कहने लगते हैं और फिर इसे व्यवसाय बना लूटने का धंधा बना लेते हैं |यह काम सोसल मीडिया ,इंटरनेट ,वेबसाईट के माध्यम से खूब होता है सामान्य लोग समझ नहीं पाते अथवा वास्तविक ज्योतिषी ,तांत्रिक ,पंडित और इन छद्म नामो वाले ज्योतिषी ,पंडित ,तांत्रिक में अंतर नहीं कर पाते ,अंततः वे खुद के धन का नुक्सान' हानि पाते हैं ,खुद की किस्मत को कोसते हैं अथवा ज्योतिष ,तंत्र -मंत्र ,उपायों को ही बेकार मान लेते हैं |उनका विश्वास हिल जाता है ,कभी कभी भगवान् पर से भी विश्वास उठने लगता हएक समस्या लोगों की नासमझी से भी उत्पन्न होती है लोग कर्मकांड ,पूजा पाठ ,शादी विवाह ,कथा कराने वाले पंडित जी से .प्रवचन करने वाले व्यास या शास्त्री जी से ,भागवत ,रामायण कथा वाचकों से भविष्य जानने की कोशिश करते हैं और उपाय पूछते हैं उनकी विशेषज्ञता पूजा पाठ ,कर्मकांड ,प्रवचन ,कथा ,भाषण कला में है न की ज्योतिष ,तंत्र आदि भविष्य जानने वाली गूढ़ विद्याओं में इनके उपाय पूजा पाठ ,दान ,गौ ,नदी ,पीपल ,अनुष्ठान तक सीमित रहेंगे न की मूल समस्या को पकड़ वहां प्रतिक्रिया करने वाले उपायों पर आजकल ज्योतिष ,तंत्र को व्यसाय और लाभ का स्रोत मान ही अधिकतर लोग आकर्षित हो रहे |साधुओं ,मठाधीशों के आसपास भीड़ देखकर लोग आकर्षित हो रहेतो यह कितना लाभ पहुंचाएंगे सोचने की बात है जानने समझने की अतः रटे रटाये उपाय ,पूजा पाठ ,दान बता दिए |न क्षमता है समस्या पकड़ने की न रूचि है कुछ समझने में अतः अक्सर तीर तुक्के साबित होते हैं ,पर इनके प्रभामंडल के आगे व्यक्ति कुछ सोच भी नहीं पाता और अपने भाग्य को ही दोषी मानता रह जाता है |अब इतने बड़े आडम्बर वाले गुरु जी ,ज्योतिषी जी ,पंडित जी ,तांत्रिक अघोरी महाराज गलत थोड़े ही बोलेंगे ,हमारा ही भाग्य खराब है जो कोई उपाय काम नहीं कर रहा |ज्योतिष ,कर्मकांड ,पूजा पाठ ,साधना एक श्रम साध्य ,शोधोन्मुख कार्य है |इनमे समय ,एकाग्रता लगती है |गहन अध्ययन ,मनन ,चिन्तन और साधना करनी होती है |पुराने समय से देखें तो किसी गुरु के केवल एक दो शिष्य ही उनसे पर्याप्त ज्ञान ले पाते थे धीरे धीरे क्रमिक गुरु परम्परा में योग्य शिष्यों ,साधकों की कमी होती गयी ,जो थे वे चुपचाप अपनी साधना ,अध्ययन करते ,ज्ञान खोज में सुख पाते गुमनाम रहे और कम ज्ञान वाले अथवा स्वार्थी ,भौतिक लिप्सा युक्त शिष्यों की भरमार होती गयी |आज तक आते आते ,वास्तविक साधक खोजे नहीं मिलता ,सही गुरु की तलाश वर्षों करनी होती है जबकि हर गली और हर शहर में ढेरों गुरु और साधक मिल जाते हैं |बड़े बड़े नाम ,उपाधि वाले साधक ,ज्योतिषी ,गुरु मिल जाते हैं जिनके पास लाखों हजारों की भीड़ भी होती है ,अनुयायी होते हैं |फिर भी लोगों की समस्याएं बढती ही जा रही ,उनको सही उपाय नहीं मिल पा रहे ,वे भटक भटक कर अंततः ज्योतिष ,तंत्र ,पूजा पाठ ,कर्मकांड ,साधना को अविश्वसनीय मान लेते हैं ,ज्योतिष गलत होती है ,न कर्मकांड अनुपयोगी हैं ,यहाँ समस्या केवल इतनी होती है की सही समस्या पर सही पकड़ नहीं होती और सही उपाय नहीं किये अथवा बताये गए होते |तंत्र ,मंत्र ,ज्योतिष ,पूजा पाठ ,कर्मकांड का अपना एक पूरा विज्ञान होता है और यह शत प्रतिशत प्रभावी होते हैं |इनके पीछे हजारों वर्षों का शोध होता है |इनकी अपनी तकनिकी ,ऊर्जा और प्रतिक्रियाएं होती हैं ,पर यह सब पकड़ने और जानने के लिए कई वर्षों तक समझना पड़ता है ,खुद शोध करना पड़ता है ,खुद परीक्षित करना होता है खुद प्रेक्टिकल करना होता है |जाहिर है इन सबमे कई वर्ष लगते हैं |तब जाकर कुछ हाथ लगना शुरू होता हैसमस्या यह होती है की ज्योतिषी गहन विश्लेष्ण नहीं करता ,सूक्ष्म अध्ययन नहीं करता ,रटे रटाये और सरसरी तौर पर कुंडली देख घिसे पिटे उपाय घुमा फिराकर बता दिया |सब जगह शनी ,राहू केतु को ही समस्या का कारण मान लिया |काल सर्प ,साढ़ेसाती ,मांगलिक दोष का हौवा खड़ा किया और उपाय बता दिए |अब सूक्ष्म विश्लेषण में समय लगेगा ,ज्ञान चाहिए ,अनुभव चाहिए |समय कौन खर्च करे उतने में दुसरे क्लाइंट को देखेंगे |वर्षों का खुद का शोध ,अनुभव है नहीं ,जो रटा रटाया है बता दिया| कब दान करना चाहिए ,कब किसका रत्न पहनना चाहिए ,कब किस तरह का क्या हवन ,जप ,मन्त्र ,शक्ति आराधना करनी चाहिए ,किस शक्ति उपाय का कहाँ क्या प्रभाव होगा और उसका अन्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह समझे बिन उपाय काम नहीं करेगे |कितनी शक्ति से कौन ग्रह प्रभावित कर रहा ,उसके लिए कितनी शक्ति का उपाय करना करना चाहिए ,इस उपाय से अन्य ग्रहों के संतुलन पर क्या प्रभाव होगा देखना आवश्यक होता है |आज भी वास्तविक ज्ञानी ज्योतिषी पैसा नहीं कमा पाता क्योकि उसे विश्लेष्ण को समय चाहिए ,अध्ययन को समय चाहिए ,शोध को समय चाहिए ,चिंतन मनन समझने को समय चाहिए |इनके बिन उसे संतुष्टि ही नहीं मिलेगी ,इसलिए अक्सर वह शांत और गुमनाम रह जाता हैइन सबका ठीक से विश्लेष्ण किये बिना उपाय बताना व्यक्ति को लाभ नहीं पहुचाता |जितनी शक्ति किसी समस्या के पीछे है उससे अधिक शक्ति अगर उसके विपरीत लगाईं जायेगी तभी वह समस्या समाप्त होगी |कम शक्ति लगाने पर समस्या समाप्त भी नहीं होगी ,और विपरीत प्रतिक्रया से और समस्या बढ़ा भी सकती है |सांप को छेड़ कर छोड़ देने पर वह काटेगा ही |कभी कभी समस्या किसी और कारण और उपाय किसी और का होने से भी उपाय काम नहीं करते या एक ही तरह की शक्ति ,देवता ,ऊर्जा से सभी को संतुलित करने का प्रयास भी काम नहीं करता |नकारात्मकता के उपयुक्त ऊर्जा लगाने पर ही परिणाम मिलता है |कभी कभी गलत उपाय एक नई समस्या उत्पन्न कर देते हैं |हर उपाय के पीछे ऊर्जा विज्ञानं होता है और अलग उर्जा असंतुलन उत्पन्न कर देती है |एक साथ कई उपाय करने से भी समस्या ठीक नहीं होती क्योकि कई तरह की उर्जायें असंतुलन उत्पन्न करती है और अलग अलग कार्य करती हैं जिससे उलझन बढने की सम्भावना होती है |कई शक्तियों का एक साथ प्रयोग भी असंतुलन उत्पन्न करता है ,कभी कभी प्रतिक्रिया भी मिलती है अधिक करने में गलतियों की सम्भावना भी अधिक होती है जिसके अधिक घातक दुस्परिनाम होते हैं हमारा सभी मित्रों से अनुरोध है कि जिस तरह हम बीमारी से ग्रस्त होने पर अच्छे डाक्टर का चुनाव करते हैं, वैसे ही जन्म कुंडली भी विद्वान को ही दिखाए,कुछ समय भी दे उसे उपचार के लिए,ज्योतिष उपाय अंग्रेजी दवा की भांति काम नहीं करते, फ्री सेवा लेने से बचें, तभी कल्याण सम्भव है आचार्य राजेश
शुक्रवार, 23 जून 2017
तंत्र क्या ऊर्जा को एक नकारात्मक रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे किसी पर काला जादू करना या तंत्र करना ? आपको यह समझना होगा कि ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह न तो दैवी होती है, न शैतानी। आप उससे कुछ भी बना सकते हैं – देवता या शैतान। यह बिजली की तरह होती है। क्या बिजली दैवी या शैतानी, अच्छी या बुरी होती है? जब वह आपके घर को रोशन करती है, तो वह दिव्य होती है। एक वेद, अथर्ववेद सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के लिए ऊर्जाओं के इस्तेमाल को ही समर्पित है। अगर वह एक इलेक्ट्रिक चेयर बन जाती है, तो वह शैतानी होती है। यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि उस पल उसे कौन संचालित कर रहा है। असल में, पांच हजार साल पहले, अर्जुन ने भी कृष्ण से यही सवाल पूछा था‘उनका यह कहना है कि हर चीज एक ही ऊर्जा से बनी है और हरेक चीज दैवी है तो , ‘ईश्वर निर्गुण है, दिव्यता निर्गुण है। उसका अपना कोई गुण नहीं है।’ इसका अर्थ है कि वह बस विशुद्ध ऊर्जा है। आप उससे कुछ भी बना सकते हैं। जो बाघ आपको खाने आता है, उसमें भी वही ऊर्जा है और कोई देवता, जो आकर आपको बचा सकता है, उसमें भी वही ऊर्जा है। बस वे अलग-अलग तरीकों से काम कर रहे हैं। जब आप अपनी कार चलाते हैं, तो क्या वह अच्छी या बुरी होती है? वह आपका जीवन बना सकती है या किसी भी पल आपका जीवन समाप्त कर सकती है, है नअगर ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल है, तो नकारात्मक इस्तेमाल भी है। एक वेद, अथर्ववेद सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के लिए ऊर्जाओं के इस्तेमाल को ही समर्पित है। मगर मैंने यह देखा है कि अक्सर ये चीजें मनोवैज्ञानिक या ज़हनी होती हैं। यह थोड़ी-बहुत मात्रा में हो सकती मगर केवल दस फीसदी असली चीज होगी। बाकी आप खुद ही अपने आप को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसी कला ।ऐसा विज्ञान जरूर है, जहां कोई अपनी ऊर्जा का नकारात्मक इस्तेमाल करके किसी और को नुकसान पहुंचा सकता है। क्यों होता है यह भगवान शिव ने तंत्र विद्या का प्रयोग करने के लिए कई शर्तें निर्धारित की हैं। यदि कोई किसी की हत्या कर देता है, किसी की संपत्ति का हरण करता है, किसी की पत्नी का हरण करता है या कुछ और, तब ही तंत्र विद्या का प्रयोग किया जा सकता है। महिलाओं पर तंत्र विद्या का प्रयोग करने की मनाही है। लेकिन, कुछ लोग इन विद्याओं का दुरुपयोग करते हैं। यदि कभी किसी का मजाक उड़ाया गया हो या उसके मां-बाप आदि से किसी की दुश्मनी है, तब भी कुछ लोग तंत्र विद्या का प्रयोग कर देते हैं। कई बार किसी के शरीर पर दूसरी आत्माओं का प्रवेश कराने के लिए भी ऐसा होता है। पूर्व जन्म की दुश्मनी या जमीन-जायदाद के झगड़े में भी ऐसा किया जाता है। हर व्यक्ति के आस-पास एक सुरक्षा घेरा होता है जिसे तेज या औरा कहते हैं। कई बड़े संतों की चित्रों में यह तेज स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। कई बार कुछ गलत काम करने से यह तेज समाप्त हो जाता है। यदि आप किसी ठग या पथभ्रष्ट तांत्रिक के पास जाते हैं तो उसके गलत प्रयोग से यह हो सकता है। अक्सर लोग परेशान होने के बाद मदद के लिए किसी के पास जाते हैं। यदि वह व्यक्ति योग्य नहीं है तो वह आपको और परेशानी में डाल सकता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी चीजों से निपटने के लिए हजारों तरीके मौजूद हैं। हर एक तरीके की अपनी विशेषता है। फिर भी कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखें तो यह समस्या दूर हो सकती है। सुरक्षित रहें, अंधविश्वास से बचें। अपने ईष्ट में पूरा विश्वास रखें। एक भगवान ही है जिसकी ताकत के सामने किसी की नहीं चलती। यदि आपकी पुकार उसके पास पहुंच गई तो फिर आपकी परेशानी हर हाल में दूर होगी। भगवान की पूजा कर उनका कोई प्रतीक जैसी मौली, माला आदि पहन लें। इससे आपका विश्वास जगेगा। यदि इन चीजों पर आपका भरोसा नहीं है तो जैसे ही कोई अंदेशा हो, अपने ईष्ट का नाम मन में जपना शुरू कर दें। - किसी दूसरे का दिया हुआ कुछ नहीं खाएं। खास कर मीठा, पान, लौंग-ईलायची, ईत्र आदि से परहेज करें। कुंवारी लड़कियों को अपने बाल खुले नहीं रखने चाहिए। मासिक धर्म के खून लगे कपड़े को ऐसी जगह नहीं फेंकें जहां से कोई उसे उठा ले।अपने पहने गए कपड़ों, बाल, नाखून या किसी भी वस्तु को दूसरे के हाथों में किसी कीमत पर नहीं जाने दें। इसी कारण यह नियम है कि रात में कपड़ों को बाहर सूखने के लिए नहीं छोड़ा जाता है। किसी का उपहास ना करें। किसी को कटु वचन नहीं बोले यदि आप शादीशुदा महिला हैं तो जिस साड़ी में आपकी शादी हुई है, उसका एक धागा भी किसी के पास नहीं जाने दें। रुद्राक्ष धारण करना भीइन चीजो से बचाव का एक अच्छा उपाय है घर में गोमूत्र का छिड़काव करना भी अच्छा रहता है कुछ जड़ी बूटियोंऐसी होती है जिन को मिला कर घुनी या घुप वना ले जिसे से जला लें जिस को जलाने से घर में यह शक्तियां अपना असर नहीं कर पाती आचार्य राजेश
बुधवार, 21 जून 2017
तंत्रहमारे प्राचीन हिन्दु-शास्त्रों में कुंडलिनी साधना' का उल्लेख आता है। ऐसे प्राचीन ग्रंथों में साधना के कई मार्ग दिखाए गए हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने हमारे शरीर के भीतर छह चक्रों की खोज की थी। वे छह चक्र क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि तथा आज्ञा चक्र हैं। मूलाधार चक्र में एक सर्पिणी ढाई कुंडल मारकर बैठी रहती है, जिसे कुंडलिनी कहते हैं। हमारे मेरुदण्ड में तीन मुख्य नाडियाँ होती हैं, इडा, पिंगला और सुषुम्ना। जैसे-जैसे योगाभ्यास द्वारा जब कुंडलिनी जागृत होकर इन छह चक्रों का भेदन करती हुई आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे साधक को तरह-तरह की सिद्धियाँ प्राप्त होती जाती है। अंत में कुंडलिनी आज्ञा चक्र को भेदते हुए सहस्रार बिंदुजिसे कुछ साघक सातव चक्र पर पहुँच जाती है तो वहाँ साधक को आलौकिक ज्ञान की प्राप्ति होने लगती है. यही एक बार इंसान की ऊर्जा सहस्रार तक पहुँच जाती है, तो वह पागलों की तरह परम आनंद में झूमता है। अगर आप बिना किसी कारण ही आनंद में झूमते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी ऊर्जा ने उस चरम शिखर को छू लिया है।दरअसल, किसी भी आध्यात्मिक यात्रा को हम मूलाधार से सहस्रार की यात्रा कह सकते हैं। यह एक आयाम से दूसरे आयाम में विकास की यात्रा है, इसमें तीव्रता के सात अलग-अलग स्तर होते हैं।आपकी ऊर्जा को मूलाधार से आज्ञा चक्र तक ले जाने के लिए कई तरह की आध्यात्मिक प्रक्रियाएं और साधनाएं हैं, लेकिन आज्ञा से सहस्रार तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। कोई भी एक खास तरीका नहीं है। आपको या तो छलांग लगानी पड़ती है या फिर आपको उस गड्ढे में गिरना पड़ता है, जो अथाह है, जिसका कोई तल नहीं होता। इसे ही ‘ऊपर की ओर गिरना‘ कहते हैं। योग में कहा जाता है कि जब तक आपमें ऊपर की ओर गिरने’ की ललक नहीं है, तब तक आप वहां पहुँच नहीं सकते।यही वजह है कि कई तथाकथित आध्यात्मिक लोग इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि शांति ही परम संभावना है, क्योंकि वे सभी आज्ञा में ही अटके पडे़ हैं। वास्तव में शांति परम संभावना नहीं है। आप आनंद में मग्न हो सकते हैं, इतने मग्न कि पूरा विश्व आपके अनुभव और समझ में एक मजाक जैसा लगने लगता है। जो चीजें दूसरों के लिए बड़ी गंभीर है, वह आप के लिए एक मजाक होती है।लोग अपने मन को छलांग के लिए तैयार करने में लंबे समय तक आज्ञा चक्र पर रुके रहते हैं। यही वजह है कि आध्यात्मिक परंपरा में गुरु-शिष्य के संबधों को महत्व दिया गया है। उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि जब आपको छलांग मारनी हो, तो आपको अपने गुरु पर अथाह विश्वास होना चाहिए। 99.9 फीसदी लोगों को इस विश्वास की जरूरत पड़ती है, नहीं तो वे छलांग मार ही नहीं सकते। यही वजह है कि गुरु-शिष्य के संबंधों पर इतना महत्व दिया गया है, क्योंकि बिना विश्वास कोई भी कूदने को तैयार नहीं होगा।
सोमवार, 19 जून 2017
मां काली ज्योतिष की आज की पोस्ट कुछ मित्रों के प्रश्न है । इन पर पहले भी हम कई बार प्रकाश डाल चुके हैं। यह पोस्ट किसी बहस के लिए नहीं है। यह सूचना है और मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को उसके भविष्य को बताने या समस्या सुधारने के लिए बाध्य नहीं हूँ, जो मेरी विवशता को नहीं समझते। ज्योतिष के दो रूप है। एक नक्षत्र विज्ञान से सम्बन्धित है, जिसका स्वरुप पंचांगों में देखा जा सकता है। दूसरा रूप ‘होरा’ का है। इसमें भविष्य कथन किया जाता है। दोनों में जड़ के सूत्रों का सम्बन्ध है ; पर ‘ होरा’ एक अलग विद्या है। दोनों ही विद्या जटिल गणितीय सूत्रों पर आधारित है, जो अलजेब्रा और स्टैटिक्स से भी अधिक जटिल है। दोनों के विद्वान भी अलग-अलग होते है। जो एक विद्या का जानकार , आवश्यक नहीं कि दूसरे का भी हो। जिस प्रकार गणित , फिजिक्स , कैमेस्ट्री आदि के प्रयोगों के निष्कर्ष के गणितीय समीकरणों के हल का रिजल्ट उस प्रयोग कर्त्ता की योग्यता पर निर्भर करता है ; उसी प्रकार इन दोनों विद्याओं का रिजल्ट ज्योतिषी की योग्यता पर निर्भर करता है। एक बात तो साफ़ है कि ज्योतिषी के लिए गणित का मास्टर होना जरूरी है वरना वह न तो ‘होरा’ का विशेषज्ञ हो सकता है , न ही नक्षत्र ज्योतिष का। यह अत्यंत कठिन विद्या है और सटीक गणितीय कैलकुलेशन करने वाला ही इसे समझकर इसे सीख सकता है। पर वर्तमान युग में हाल क्या है? गली- गली चन्दन टिका माला पहनकर ज्योतिषी बैठे हुए है । सामान्य जनता इस विद्या के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानती ; इसलिए ये राशी , खानों और ग्रहों और कुंडली में पहले से बने महादशा के चार्ट को देखकर सामान्य जानकारियों को भुनाते हैं । जिसका आडम्बर जितना बड़ा है , वह उतना ही बड़ा ज्योतिषी कहलाता है। आईये इस विद्या को और इसके नाम पर की जा रही व्यवसायिक चालाकी को समझें – लगभग हर चैनल , हर अखबार , हर पत्रिका में राशिफल बताने वालों की भरमार है ; परन्तु शास्त्रीय निर्देश क्या है? प्रत्येक ज्योतिषी को यह निर्देश दिया गया है कि फल पूरी कुंडली का होता है । कभी भी किसी को एक खाना , एक ग्रह , लग्न या चन्द्रमा की राशि के अनुसार फल न बताएं । इनसे भ्रम पैदा होता है और जातक का नुक्सान हो सकता है। चलिए शास्त्र को छोडिये। यदि आप पढ़े-लिखे हैं और गणित एवं विज्ञान के बारें में थोड़ा भी जानते है , तो निम्नलिखित गणितीय स्थिति को देखें। जन्मकुण्डली में यदि लग्न राशि में चन्द्रमा कि राशि कर्क (4) है, तो इसकी १० परिवर्तित स्थितियां बनती है , जिनका फल सर्वथा विपरीत भी हो सकता है। एक खाली होने की स्थिति में , शेष 9 , यहाँ 9 में से कोई एक ग्रह होने की स्थिति में। प्रत्येक राशि 30 डिग्री की होती है। प्रत्येक डिग्री पर परिवर्तन होता है; क्योंकि इस एक राशि के भोगकाल में सभी ग्रहों का भोग काल माना जाता है। इसी आधार पर नवांश कुंडली बनाई जाती है । पर यह केवल इतना ही नहीं है। प्रत्येक डिग्री पर परिवर्तन होता है। इस प्रकार यह 10 x 30 = 300 परिस्थितियाँ हो गयी।इसके बाद यह भी देखा जाएगा कि सातवें खाने में क्या है? क्योंकि खाना – 7 की पूरी दृष्टि इस पर पडती है ; जो लग्न की तरह 300 प्रकार की हो सकती है। अब यह 300 x 300 = 90,000 हो गये। फिर यह मान्य सिद्धांत है कि 1, 4, 7, 10 इन चारों का प्रभाव ज्योतिष विद्या में मूल रूप से एक माना जाता है। फिर तीसरी, पांचवी, सातवीं , नवमी – ये चार दृष्टियाँ भी होती है । ग्रहों का शत्रु और मित्र का समीकरण होता है , उच्च और नीच स्थिति का समीकरण होता है। अब कोई कैसे एक राशि के आधार पर दिन, मास या वर्ष का फल बता सकता है? नक्षत्र ज्योतिष में भी सम्पूर्ण पृथ्वी पर राशियों के प्रभाव एक जैसे ही होते। एक राशी में तीन नछत्तर इसी कारण जन्म कुंडली में बनाने में स्थान का महत्त्व होता है। पर ऐसा होता है । लोग राशि से ही वर्ष भर का फल बताने लगते है। एक दूसरी समस्या महादशा चक्र की है। यह केवल यह बताता है कि आपकी उम्र का कौन सा समय किस ग्रह के प्रभाव में रहेगा; पर उसका प्रभाव क्या होगा, यह तो कुंडली की गणना के बाद ही पता चलेगा। लेकिन कोई इस गणना को नहीं करता। आपको समस्या हुई। आप न जाकर बताया। ज्योतिष ने महादशा चार्ट देखा और बताया कि आपकी फलाने ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा है। इसी के कारण ऐसा हो रहा है। उपाय बताया, तो अर्थ का अनर्थ हो गया। त्रुटी ज्योतिष विद्या में नहीं है।त्रुटी हममें है। कभी हम नकली होते है, कभी अनाड़ी होते है , कभी कामचोर और कभी बेईमान। इसके लिए जातक –जातिका भी जिम्मेदार होते है। शास्त्रों में निर्देश है कि ज्योतिष के पास जाएँ , तो फल-मिठाई-वस्त्र-दक्षिणा लेकर जाए अन्यथा आपका अभीष्ट पूरा नहीं होगा; हानि भी हो सकता अहि। स्पष्ट है कि वे विद्वान जानते थे कि तब ज्योतिष ध्यान नहीं देगा। आज की दशा यह है कि लोग जन्मदिन का डिटेल्स अपनी समस्या भेज देते है। कोई उपाय बता दीजिये। अब यदि बता दू , तो वह अनुमान का तीर-तुक्का होगा। हानि का पाप सिर चढ़ेगा। न बताऊं , तो ऐसे लोग कहने लगते है “ वे तो फीस मांगते है” न मांगे तो हम क्या करें? हम जानते है कि यह 1० घंटे का काम है। दिन में 12 घंटे लगे रहे , तो भी 5,,% व्यक्ति को भी नहीं बता सकते। क्योंकि ये प्रतिदिन 10-15 की संख्या में होते है और हमारे पास समय का हाल यह है कि जो फीस जमा करवाते है ; उनका फल भी समय पर नहीं जा पाता। कभी 14 दिन तो कभी महीना भी लग जाता है। वैसै भी कुछ मित्रों मेरे जो ज्योतिषी है और टीवी पर अपना प्रोग्राम करते हे वो नाराज़ हो ग्रे कि आप ऐसा ना कहे मित्रों एक तरफ हम ज्योतिष को विज्ञान कहते हैं फिर इसको सही से उसका प्रचार करना चाहिए ओर जो कमी है उसे दुर करना चाहिए मेरा किसी से कोई विशेष नहीं यह मेरी अपने विचार हैं
रविवार, 18 जून 2017
नक्षत्र,राशि तथा ग्रहो का आपसी संबंध--- ताराओ का समुदाय अर्थात तारों का समूह नक्षत्र कहलाता हैं |विभिन्न रूपो और आकारो मे जो तारा पुंज दिखाई देते हैं उन्हे नक्षत्रो की संज्ञा दी गयी हैं | सम्पूर्ण आकाश को 27 भागो मे बांटकर प्रत्येक भाग का एक नक्षत्र मान लिया गया हैं | पृथ्वी अपना घूर्णन करते समय जब एक नक्षत्र से दूसरे पर जाती हैं या होती हैं तो इससे यह पता चलता हैं की हमारी पृथ्वी कितना चल चुकी हैं अब चूंकि नक्षत्र अपने नियत स्थान मे स्थिर रहते हैं धरती पर हम यह मानते हैं की नक्षत्र गुज़र रहे हैं | गणितीय दृस्टी से कहे तो जिस मार्ग से पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती हैं उसी मार्ग के आसपास ही “नक्षत्र गोल”मे समस्त ग्रहो का भी मार्ग हैं,जो क्रांतिव्रत से अधिक से अधिक सात अंश का कोण बनाते हुये चक्कर लगाते हैं |इस विशिष्ट मार्ग का आकाशीय विस्तार “राशि” हैं जिसके 12 भाग हैं और प्रत्येक भाग 30 अंशो का हैं | यह 12 राशि भाग धरती से देखने पर जैसे नज़र आते हैं उसी आधार पर इनके नाम रखे गए हैं |इस प्रकार मेष से लेकर मीन तक राशिया मानी गयी हैं | रशिपथ एक अंडाकार वृत की तरह हैं जिसके 360 अंश हैं | इन अंशो को 12 भागो मे बांटकर(प्रत्येक 30 अंश) राशि नाम दिया गया हैं | अब यदि 360 अंशो को 27 से भाग दिया जाये तो प्रत्येक भाग 13 अंश 20 मिनट का होता हैं जिसे गणितिय दृस्टी से एक “नक्षत्र” माना जाता हैं |प्रत्येक नक्षत्र को और सूक्ष्म रूप से जानने के लिए 4 भागो मे बांटा गया हैं (13 अंश 20 मिनट/4=3 अंश 20 मिनट) जिसे नक्षत्र के चार चरण कहाँ जाता हैं | इस प्रकार सरल भाषा मे कहे तो पूरे ब्रह्मांड को 12 राशि व 27 नक्षत्रो मे बांटा गया हैं जिनमे हमारे 9 ग्रह भ्रमण करते रहते हैं | अब यदि इन 27 नक्षत्रो को 12 राशियो से भाग दिया जाये तो हमें एक राशि मे सवा दो नक्षत्र प्राप्त होते हैं अर्थात दो पूर्ण नक्षत्र तथा तीसरे नक्षत्र का एक चरण कुल 9 चरण, यानि ये कहाँ जा सकता हैं की एक राशि मे सवा दो नक्षत्र होते हैं या नक्षत्रो के 9 चरण होते हैं | हर राशि का एक स्वामी ग्रह होता हैं जिसे हम राशि स्वामी कहते हैं इस प्रकार कुल मिलाकर यह कहाँ जा सकता हैं की एक राशि जिसका स्वामी कोई ग्रह हैं उसमे 9 नक्षत्र चरण अर्थात सवा दो नक्षत्र होते हैं | किस राशि मे कौन से नक्षत्र व नक्षत्र चरण होते हैं और उनके स्वामी ग्रह कौन होते हैं इसको ज्ञात करने का एक सरल तरीका इस प्रकार से हैं | सभी 27 नक्षत्रो को क्रमानुसार लिखकर उनके स्वामियो के आधार पर याद करले | अब नक्षत्र चरण के लिए निम्न सूत्र याद करे | [नक्षत्र चरण – राशिया 4 4 1- { मेष,सिंह,धनु } 3 4 2 – { वृष,कन्या,मकर } 2 4 3- { मिथुन,तुला,कुम्भ } 1 4 4- { कर्क,वृश्चिक,मीन } आरंभ के 3 नक्षत्र केतू,शुक्र व सूर्य ग्रह के हैं ज़ो क्रमश; मेष,सिंह व धनु राशि मे ही आएंगे | इसके बाद तीसरा नक्षत्र (शेष 3 चरणो की वजह से ),चौथा व पांचवा नक्षत्र सूर्य,चन्द्र व मंगल के हैं जो क्रमश; वृष, कन्या व मकर राशि मे ही आएंगे |अब अगले(शेष)नक्षत्र मंगल,राहू व गुरु के हैं जो मिथुन,तुला व कुम्भ राशि मे ही आएंगे तथा अंत मे गुरु(शेष),शनि व बुध के नक्षत्र कर्क,वृश्चिक व मीन राशि मे ही आएंगे | जन्म नक्षत्र का व्यक्तित्व पर प्रभाव-- आकाश मंडल में 27 नक्षत्र और अभिजीत को मिलाकर कुल 28 नक्षत्र होते हैं। राशियों पर 27 नक्षत्रों का ही प्रभाव माना गया है। जन्म के समय हम किस नक्षत्र में जन्में हैं, उसका स्वामी कौन है व उसकी जन्म कुंडली में किस प्रकार की स्थिति है। जन्म के समय का नक्षत्र उदित है या अस्त, वक्री है या मार्गी किन ग्रहों की दृष्टि युति संबंध है व राशि स्वामी का संबंध कैसा है।नक्षत्र स्वामी का राशि स्वामी में बैर तो नही जन्म कुंडली में उन दोनों ग्रहों की स्थिति किस प्रकार है। यह सब ध्यान में रखकर हमारे बारे में जाना जा सकता है ज्योतिषशास्त्र के अन्तर्गत बताया गया है कि नक्षत्रों की कुल संख्या२7 है विशेष परिस्थिति में अभिजीत को लेकर इनकी संख्या २८ हो जाती है। गोचरवश नक्षत्र दिवस परिवर्तित होता रहता है। ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार हर नक्षत्र का अपना प्रभाव होता है। जिस नक्षत्र में व्यक्ति का जन्म होता है उसके अनुरूप उसका व्यक्तित्व, व्यवहार और आचरण होता है।
ज्योतिष भविष्य में होने वाली घटनाओं तथा कार्यों की जानकारी प्राप्त करने की विद्या को ज्योतिष कहा जाता है । ज्योतिष के मुख्य दो आधार हैं नक्षत्र ज्ञान एंव सामुद्रिक शास्त्र । ज्योतिष शास्त्र के जानकारों द्वारा कई प्रकार की विधियों से भविष्य की जानकारियों का पता लगाने का प्रयास करा जाता है परन्तु नक्षत्र ज्ञान व सामुद्रिक शास्त्र के अतिरिक्त सभी विधियां अनुमानों पर आधारित होती हैं जिनका कोई ठोस प्रमाण नहीं होता । नक्षत्र ज्ञान व सामुद्रिक शास्त्र ज्योतिष विद्या के मुख्य स्तम्भ माने जाते हैं जिनके द्वारा किसी भी इन्सान के भविष्य की जानकारी सरलता से प्राप्त करी जा सकती है । ज्योतिष का उदय भी इन दोनों के कारण ही हुआ है । ज्योतिष में नक्षत्र ज्ञान सूर्य की कक्षा में भ्रमण करने वाले ग्रहों की स्थिति का ज्ञात होना एंव उनके प्रभाव से इन्सान के जीवन में होने वाले कार्यों तथा घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने की विद्या है । ज्योतिष ने कुल नौ ग्रहों को इंसानी जीवन के लिए प्रभावशाली माना है तथा इन नव ग्रहों की गणना से ही ज्योतिष की प्रत्येक भविष्यवाणी करी जाती है । ज्योतिष में सर्व प्रथम ग्रहों की स्थिति ज्ञात की जाती है जो वर्तमान में बहुत सरल कार्य है क्योंकि कम्प्यूटर ने ग्रहों की स्थिति स्पष्ट करने के अतिरिक्त ज्योतिष कुंडली बनाना तथा सभी प्रकार की गणना करना सरल कर दिया है । कोई भी कम्प्यूटर से अपनी ज्योतिष कुंडली सरलता से बना सकता है । नव ग्रह की गणना करना जितना सरल कार्य है ज्योतिष की भविष्य वाणी उतनी ही कठिन है क्योंकि ग्रहों का प्रभाव तथा उनकी शक्ति की परख हुए बगैर किसी भी प्रकार की भविष्य वाणी नादानी है । ग्रहों का प्रभाव इन्सान पर उनके द्वारा प्राप्त उर्जा से होता है तथा ग्रहों की दूरी व गति के कारण प्रतिपल उनके प्रभाव में परिवर्तन होता रहता है । हमारे सौर मंडल में सूर्य ही उर्जा का मुख्य श्रोत है जिसकी किरणें पूरे संसार को उर्जा प्रदान करती हैं परन्तु दूसरे ग्रहों से टकराकर किरणों के प्रभाव में परिवर्तन हो जाता है तथा उन्हें रश्मियाँ कहकर पुकारा जाता है । सभी ग्रहों की रश्मियों का प्रभाव भिन्न है जो इन्सान के शरीर व मस्तिक को प्रभावित करती हैं विभिन्न प्रभाव से इंसानी सोच व कार्य क्षमता भी विभिन्न प्रकार की होती है । सूर्य की उर्जा मस्तिक की याददास्त शक्ति को प्रभावित करती है इसी प्रकार चन्द्रमा मन को, मंगल भावनाओं को, बुध ग्रह बुद्धि को, गुरु विवेक को, शुक्र कल्पना शक्ति को, शनी इच्छा शक्ति को प्रभावित करते हैं । राहू केतु की नकारात्मक उर्जा सम्पूर्ण मस्तिक को प्रभावित करती है जो इन्सान के लिए संतुलित रूप में अति आवश्यक उर्जा है क्योंकि बुद्धि में नकारात्मक उर्जा ना हो तो किसी बुरे कार्य अथवा धोखे की परख करने की क्षमता नहीं होती जिसके फलस्वरूप कोई भी इन्सान मूर्ख बना कर अपना स्वार्थ सिद्ध कर सकता है । बुद्धि मानसिक तंत्र में जानकारियां प्राप्त करने की मुख्य भूमिका अदा करती है इसलिए सभी ग्रहों में बुद्ध ग्रह का नैसर्गिक बल सदा समान रहता है बाकि सभी ग्रहों का नैसर्गिक बल प्रतिपल कम व अधिक होता रहता है । सभी उर्जाएं संतुलित हों तो इन्सान सुख पूर्वक जीवन निर्वाह करता है परन्तु उर्जाओं का असंतुलन जीवन नर्क समान बना देता है । ज्योतिष द्वारा भविष्य जानने का कार्य कुछ महान आविष्कारकों के कारण सफल हो सका जिन्होंने नक्षत्र ज्ञान प्राप्त करके ज्योतिष शास्त्र की रचना की तथा ग्रहों के प्रभाव से संसार को अवगत कराया । ज्योतिष का दूसरा आधार सामुद्रिक शास्त्र इन्सान की शरीर की बनावट तथा हस्त रेखा विज्ञान उसके भविष्य को ज्ञात करने की ज्योतिष विद्या है । सभी इंसानों के शरीर की बनावट तथा रेखाओं में स्पष्ट अंतर होता है जो ग्रहों से प्राप्त उर्जा के प्रभाव से है और रेखाओं को देखकर अनुमान लगाया जाता है कि किस ग्रह के प्रभाव से इस इन्सान पर होने वाला असर इसके जीवन को प्रभावित करके सफल होने में बाधा उत्पन्न कर रहा है । ज्योतिष से कारणों का पता लगाकर निवारण करने की किर्या इन्सान को सफल जीवन प्रदान करे इसलिए असफल इन्सान ज्योतिष द्वारा अपने भविष्य की जानकारी और निवारण के लिए प्रयास करते रहते हैं । इन्सान द्वारा अपने जीवन सुधार के लिए ज्योतिष का सहारा लेना स्वाभाविक कार्य है तथा इसके लिए वह ज्योतिषियों के चक्कर लगाता है जहाँ उसे सिवाय लूट के कुछ प्राप्त नहीं होता क्योंकि नब्बे प्रति शत ज्योतिष के नाम पर सिर्फ लूट होती है । कोई भी विद्या बेकार नहीं होती परन्तु उसकी सम्पूर्ण जानकारी के बगैर उसका प्रयोग गलत अंजाम देता है इसलिए किसी भी निर्णय के लिए सावधानी आवश्यक होती है । किसी कार्य की सफलता के लिए गलत प्रकार के ज्योतिष शास्त्रियों के चक्कर में फंसकर नुकसान उठाने से अच्छा है खुद पर तथा अपनी कार्य क्षमता पर विश्वास किया जाए क्योंकि ज्योतिषी सिर्फ कुछ कारणों का अनुमान लगा सकता है परन्तु कार्य एवं कार्य की सफलता इन्सान को अपने परिश्रम से ही प्राप्त करनी पडती है । ज्योतिष द्वारा भविष्य के विषय में ऐसा होगा सोचना या कहना उचित हो सकता है परन्तु ऐसा ही होगा यह कहना सर्वदा अनुचित है क्योंकि जो होगा वह सिर्फ प्राकृति को ज्ञात है किसी इन्सान का खुद को प्राकृति का ज्ञाता समझना मूर्खता का कार्य है । आचार्य राजेश
शनिवार, 17 जून 2017
इच्छा शक्तिसंसार में प्रत्येक व्यक्ति सदैव यही कामना करता रहता है कि उसे मन फल मिले| उसे उसकी इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो| जो वह सोचता है कल्पना करता है, वह उसे मिल जाये| भगवान् से जब यह प्रार्थना करते है तो यही कहते हैं, कि हमें यह दे वह दे| प्रार्थना और भजनों में ऐसे भाव छुपे होते हैं, जिनमें इश्वर से बहुत कुछ मांगा ही जाता है| यह तो ठीक है कि कोई या आप इश्वर से कुछ मंगाते है; प्रार्थना करते हैं| लेकिन इसके साथ ही यदि आप उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न नहीं करते और अपनी असफलताओं; गरीबी या परेशानियों के विषय में सोच-सोचकर इश्वर की मूर्ती के सामने रोते-गिडगिडाते हैं उससे कुछ होने वाला नहीं है| क्योंकि आपके मन में गरीबी के विचार भरे हैं, असफलता भरी है, आपके ह्रदय में परेशानियों के भाव भरे हैं और उस असफलता को आप किसी दैवी चमत्कार से दूर भगाना चाहते हैं| जो कभी संभव नहीं है|आपके पास जो कुछ है, वह क्यों है? वह इसलिए तो हैं कि मन में उनके प्रति आकर्षण है| आप उन सब चीजों को चाहते हैं| जो आपके पास हैं| मन में जिन चीजों के प्रति आकर्षण होता है, उन्हें मनुष्य पा लेता है| किन्तु शर्त यह भी है कि वह मनुष्य उसी विषय पर सोचता है, उसके लिये प्रयास करता हो और आत्मविश्वास भी हो| जो वह पाना चाहता है उसके प्रति आकर्षण के साथ-साथ वह उसके बारे में गंभीरता से सोचता भी हो|जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिये, जिन गुणों की आवश्यकता होती है, उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण है—”दृढ़ इच्छा शक्ति।” अन्य गुण, जैसे ईमानदारी, साहस, परिश्रम और लगन आदि, दृढ़ इच्छा-शक्ति के अभाव में व्यर्थ हो जाते हैं। प्रायः ऐसा देखा गया है कि एक व्यक्ति के पास धन है, बल है और विद्या है परन्तु वह अपने जीवन-काल में कुछ भी नहीं कर पाता। यदि ऐसे व्यक्तियों के मानसिक जीवन का विश्लेषण किया जाय, तो स्पष्ट पता चल जायगा कि उनमें इसी दृढ़ इच्छा-शक्ति का अभाव था। इसके विपरीत ऐसे अनेक व्यक्ति इतिहास प्रसिद्ध हो गये हैं जो साधनविहीन थे परन्तु अपने मनोबल के कारण, वे कुछ का कुछ बन गये।दृढ आत्मविश्वास और परिश्रम की शक्ति से आप भी सफलता को अपनी ओर खींच सकते हैं| ईश्वरीय प्रेरणाओं से आप शक्ति ले सकते हैं और अपनी अभिलाषाओं को पुरी कर सकते हैं|यह दृढ़ इच्छा-शक्ति क्या है? इसका अर्थ है—”मैं यह काम करूंगा और करके ही रहूँगा चाहे जो कुछ हो।” ऐसी बलवती इच्छा को जिसकी ज्योति अहर्निश कभी मंद न हो, दृढ़ इच्छा-शक्ति कहते हैं। यह ‘ढुलमुलयकीनी’ की विरोधी प्रवृत्ति है। बहुत से लोग ठीक से निश्चय नहीं कर पाते कि वे क्या करें। उनका मन हजार दिशाओं में दौड़ता है। वे दृढ़ इच्छा-शक्ति के चमत्कार को क्या समझ सकते हैं? इस शक्ति के अंतर्गत दृढ़ निश्चय, आत्मविश्वास कार्य करने की अनवरत चेष्टा और अध्यवसाय आदि गुण आ जाते हैं। यह शक्ति मनुष्य के मुखमंडल पर अपूर्व तेज उत्पन्न करती है और आँखों में सम्मोहन का जादू लाती है। यही कारण है कि दृढ़ इच्छा-शक्ति संपन्न व्यक्ति के संपर्क में आते ही निर्बल चित्त वाले मनुष्य उसी प्रकार उसकी ओर आकर्षित होते हैं जैसे चुँबक की शिला की ओर लौह कण। उसके मस्तिष्क से मानसिक तरंगें निकल कर वायुमंडल में लहराती हैं ओर आस-पास के व्यक्तियों को अज्ञात रूप से प्रभावित करती हैं। रूप-रंग, धन-यौवन में उतना आकर्षण नहीं होता जितना दृढ़ इच्छा-शक्ति में होता है।अब प्रश्न यह है कि ऐसी सम्मोहक दृढ़ इच्छाशक्ति को उत्पन्न कैसे किया जाय? उत्तर है-अभ्यास के द्वारा। अब से एक शताब्दी पूर्व तक मनोवैज्ञानिकों का विचार था, दृढ़ इच्छा-शक्ति एक सहज अर्थात् प्रकृति-प्रदत्त गुण है। आज यह विश्वास बदल रहा है। वह गुण मस्तिष्क के किसी अंग की सबलता या निर्बलता से संबन्धित नहीं है। वास्तव में यह मनुष्य की परिस्थितियों, आदतों और अभ्यास के अनुसार बनता अथवा बिगड़ता है। इस गुण का बीजारोपण जन्म से लेकर लालन-पालन के काल से ही हो जाता है। ऐसे परिवार में जो साधन संपन्न है, जिसमें बालक की प्रत्येक इच्छा पूरी की जाती है या जिसमें बालक माता-पिता की एक मात्र संतान होने के कारण प्रेम का भाजन होता है, पलने पर एक बालक में दृढ़-इच्छा शक्ति का उत्पन्न होना स्वाभाविक है, परन्तु हर दशा में ऐसा ही होता हो, यह नहीं कहा जा सकता। इच्छा शक्ति में दृढ़ता लाने के लिये यह आवश्यक है कि बालक कुछ अवरोधों का अनुभव करता रहे। साथ ही यह अवरोध ऐसे भी न हों जिन्हें बालक पार न कर सके और हतोत्साह हो जाय। अस्तु, बालक के लालन-पालन में माता-पिता को बहुत जागरुक रहना चाहिये। अज्ञानतावश या दुलार के कारण बालक की प्रत्येक इच्छा पूरी करने पर, उसमें ‘जिद’ करने का अवगुण पैदा हो जाता है। यह ठीक है कि बालक हर प्रकार से अपनी बात मनवाने का प्रयत्न करता है परन्तु ‘जिद’ के साथ अविवेक और स्वार्थ का अंश मिल जाने के कारण उसे दृढ़ इच्छाशक्ति कहना अनुचित है। दृढ़-इच्छाशक्ति के साथ विवेक सद्प्रयत्न और न्याय का संभोग होना चाहिये।आप अपने जीवन स्वप्न को पूरा करते की दिशा में प्रयास करें| उसे ईश्वरीय प्रेरणा मानकर आगे बढे|दृढ़ इच्छा-शक्ति के विकास में सबसे बड़ी बाधा भय और दुश्चिंता से उत्पन्न होती है। इसलिये बचपन से ही बच्चों को इन कुभावों से बचाना चाहिये। इच्छा की दृढ़ता से मनुष्य की ‘स्वतन्त्र सत्ता’ का बोध होता है, भय पराधीनता का सूचक है। जब बच्चों को हर प्रकार से भयग्रस्त रक्खा जाता है, तो उनमें दबने की आदत पैदा हो जाती है। वे दूसरों की इच्छा के आगे झुकने लगते हैं और उनकी स्वयं की इच्छाशक्ति निर्बल हो जाती है। इसी प्रकार चिंता भी एक दूषित मनोभाव है। यह चित्त में अस्थिरता और विभ्रम पैदा करती है। चिन्ता से मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ होकर किसी भी निर्णय पर पहुँचने में असमर्थ हो जाता है। बच्चों के लालन-पालन में इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उन्हें यथासंभव दुश्चिंता से दूर रक्खा जाय। दुश्चिंता का मूलकारण है बालक की शक्ति और उसकी सफलता के बीच समन्वय का न होना। जब बालक किसी वस्तु को प्राप्त करना चाहता है परन्तु इस कार्य में उसकी शक्ति अपर्याप्त होती है, तो वह चिंता से पीड़ित हो उठता है। यह बात मनोरंजन, पढ़ाई और घरेलू कामों के विषय में भी लागू होती है। जहाँ तक संभव हो, बालक को कोई भी ऐसा कठिन काम न देना चाहिये, जिसे पूरा करने में वह सर्वथा असमर्थ हो। इसके अतिरिक्त घर का वातावरण भी शुद्ध और पवित्र होना चाहिये। अभाव, गृह-कलह और अनैतिकता भी बालकों के मन में भीषण अन्तर्द्वन्द्व पैदा करते हैं और बालकों की दृढ़ इच्छाशक्ति को निर्बल बनाते हैं। बालकों को इनसे दूर रखना उचित है।वयस्क होने पर हम स्वयं अपनी आदतों के लिये जिम्मेदार होते हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति को बनाये रखना हमारे अपने हाथ में है। सर्वप्रथम हमें तुरंत निश्चय करने तथा लक्ष्य चुनने की आदत डालनी चाहिये। जब हमारे सामने दो या दो से अधिक प्रबल आकर्षण हों, तो हमें उनके बीच में लटके नहीं रहना चाहिये या तो स्वयं या अपने किसी अन्तरंग मित्र से सलाह लेकर यह निश्चय कर लेना चाहिये कि हमें कौन-सा मार्ग अपनाना है। दो घोड़ों पर एक साथ सवार होकर चलना असंभव है। हमें एक हमारे परम आत्मीयजन ने इस प्रकार की दुविधापूर्ण स्थिति से निकलने का एक बड़ा ही व्यावहारिक उपाय बताया। वे स्वयं एक ऐसी ही स्थिति में पड़ गये जिसमें उनके सामने दो प्रबल आकर्षण थे। उनका मन कभी एक ओर दौड़ता, कभी दूसरी ओर। उनका स्वास्थ्य गिरने लगा और वह बड़े संकट में फँस गये। अन्त में वह कागज-कलम लेकर बैठ गये। उन्होंने दोनों आकर्षणों के पक्ष और विपक्ष में सारे तर्क लिख डाले। बाद में दोनों की तुलना करने पर जो आकर्षण उन्हें न्यायोचित और उपयोगी जान पड़ा, उसी को मानकर वे चलने लगे। बस उनके मन में जो संघर्षण था, शाँत हो गया और वे अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल हो गये। उनकी इच्छाशक्ति भी सबल हो गई।किसी भी पक्ष को ग्रहण करने के पूर्व यह अवश्य सोचना चाहिये कि इस काम को करने में मेरी अधिक से अधिक कितनी हानि हो सकती है। फिर उस हानि को सहन करने के लिये तैयार हो जाना चाहिये और कार्य आरम्भ कर देना चाहिये। इससे मन में दृढ़ता उत्पन्न होती है और मनुष्य प्रलोभनों से बचा रहता है। प्रायः ऐसा भी होता है कि एक निश्चय पर पहुँचने के बाद कार्य आरम्भ किया गया, परन्तु कुछ समय बाद ही कोई अन्य प्रलोभन सामने आ जाती है। फिर वही पहले वाली अनिश्चय की स्थिति उत्पन्न हो गई। यदि मनुष्य इस नये प्रलोभन का शिकार हो गया तो उसकी इच्छाशक्ति निर्बल पड़ जाता है। अतः अपने प्रथम निश्चय से कभी भी डिगना नहीं चाहिये। प्रलोभनों के अतिरिक्त अपने निश्चय पर अटल रहने में दूसरे प्रकार की बाधाएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। वे हैं अप्रत्याशित कठिनाइयाँ। मनुष्य कितना ही दूरदर्शी एवं कल्पनाशील हो परन्तु किसी कार्य में सामने आने वाली कठिनाइयों का शतप्रतिशत अनुमान लगा लेना असंभव है। किसी निश्चय पर पहुँचने के बाद जब हम कार्य आरंभ करते हैं, तो अनेक ऐसी कठिनाइयाँ सामने आ जाती हैं, जिनकी हमने कल्पना भी न की थी। बस हमारा मन डाँवाडोल होने लगता है। हमें ऐसी स्थिति का सामना करने के लिये तैयार रहना चाहिये। कार्य सिद्धि के मार्ग में न जाने कौन बाधा कहाँ से आ जाय, अस्तु उसका सामना धैर्यपूर्वक करना चाहिये तभी दृढ़ इच्छा-शक्ति बनी रह सकती है।
शुक्रवार, 16 जून 2017
तंत्र मानव शरीर को संचरित रखने वाली दो मुख्य वस्तुएं हैं तन एवं प्राण। पांच तत्वों अग्रि, पृथ्वी, वायु, जल एवं आकाश के सामूहिक निश्चित अनुपात से बना यह पंच भौतिक शरीर-प्राण वायु से संचरित होने के कारण क्रियाशील रहता है अथवा निष्क्रिय होने पर मृत घोषित कर दिया जाता है। जब किसी कारणवश इन तत्वों के अनुपात में गड़बड़ आ जाए तो यह अस्वस्थ अथवा रोगी हो जाता है। इस पंच भौतिक शरीर को निरोग हृष्ट-पुष्ट एवं सक्रिय रखने के लिए हम जो भी उपयोग अथवा सेवन करते हैं उसी से शरीर के अवयव सुचारू रूप से क्रियाशील रहते हैं तथा प्राण वायु द्वारा हमारे शरीर में प्राण सुचारू रूप से संचरित रहते हैं। जो दुःख आया नहीं है उसे टाला जाना चाहिए | कोशिश करनी चाहिए उसे टालने की| जो दुःख वर्त्तमान में मिल रहा है उसे तो सहकर ही समाप्त किया जा सकता है| कर्म सिद्धांत के अनुसार भी जो कर्म परिपक्व हों दुःख देते हैं| उनसे किसी भी प्रकार से बच पाना संभव नहीं होता| उनसे छुटकारा पाने का एकमात्र रास्ता उन्हें भोग कर ही समाप्त करना होता है| परन्तु जो अभी आया नहीं है हम उसके आगमन को अवश्य रोक सकते हैं| जब तक शरीर विद्यमान है, दुःख तो लगे ही रहेंगे, परन्तु भविष्य को बदलना हमारे हाथ में होता है| उदाहरण के लिये आपने खेत में जो कुछ बोया है उसकी फसल तो काटना आनिवार्य है क्योंकि अब उसे बदल पाना आपके हाथ में नहीं होता| परन्तु जहां तक भविष्य की फसलों का सवाल है, आप पूरी तरह स्वतंत्र है कि किन परिस्थितियों में कैसी फसल हों| बन्दूक से एक बार छूटी गोली पुनः उसमें वापिस नहीं लाइ जा सकती| परन्तु अभी उसमें जो गोली बची है उसे न दागना आपके हाथ में होता है| इसके लिये अपने वर्त्तमान कर्मों को सही ढंग से इच्छित फल के अनुरूप करना आवश्यक होता है|मनुष्य जीवन में कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो अपना फल देना प्रारम्भ करने के निकट होते हैं| उनके फल को प्रारब्ध कहते हैं जिसे सुख अथवा दुःख के रूप में प्रत्येक को भोगना आनिवार्य होता है| तपस्या, विवेक और साधना द्वारा उनका सामना करना चाहिए| परन्तु ऐसे कर्म जो भविष्य में फल देंगे, आप उनसे बच सकते हैं| इसके लिये आपको वर्त्तमान में, जो आपके हाथ में है, सुकर्म करना होगा| कर्म के सिद्धांत के अनुसार कर्मों का एक समूह ऐसा है जिससे आप लाख उपाय करने पर भी बच नहीं सकते| परन्तु दुसरा समूह ऐसा है जिसे आप इच्छानुसार बदल अथवा स्थगित कर सकते हैं| इस प्रकार यह सूत्र घोषणापूर्वक बताता है कि आने वाले दुःख (कर्मफल) को रोकना व्यक्ति के अपने हाथ में होता हैं|आचार्य राजेश
गुरुवार, 15 जून 2017
तंत्र तत्र एक ऐसा कल्पवृक्ष है, जिससे छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी कामनाओं की पूर्ति संभव है। श्रद्धा और विश्वास के बल पर लक्ष्य की ओर बढ़ने वाला तंत्र साधक अतिशीघ्र निश्चित लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। भावों को प्रकट करने के साधनों का आदि स्त्रोत यंत्र-तंत्र ही है। यंत्र-तंत्र के विकास से ही अंक और अक्षरों की सृष्टि हुई। अत रेखा, अंक एवं अक्षरों का मिला-जुला रूप तंत्रों में व्याप्त हो गया। साधकों ने इष्टदेव की अनुकम्पा से बीज मंत्र तथा अन्य मंत्रों को प्राप्त किया और उनके जप से सिदि्धयां पायीं तो यंत्र-तंत्र में उन्हें भी अंकित कर लिया। तंत्र का विशाल प्राचीन साहित्य इसकी वैज्ञानिक सत्यता का प्रमाण है। भगवान शंकर की चार पत्नियां में से एक मां काली को सबसे जाग्रत देवी माना गया है। शिव की पहली पत्नी दक्ष-प्रसूति कन्या सती थी। दूसरी हिमालय पुत्री पार्वती थी। तीसरी उमा और चौथी कालिका।कालिका की उपासना जीवन में सुख, शांति, शक्ति, विद्या देने वाली बताई गई है, लेकिन यदि उनकी उपासना में कोई भूल होती है तो फिर इसका परिणाम भी भुगतना होता है।कालका के दरबार में जो एक बार चला जाता है उसका नाम-पता दर्ज हो जाता है। यहां यदि दान मिलता है तो दंड भी। आशीर्वाद मिलता है तो शाप भी। यदि मन्नत पूर्ण होने के बदले में जो भी वचन दिया है तो उसे तुरंत ही पूरा कर दें। जिस प्रकार अग्नि के संपर्क में आने के पश्चात् पतंगा भस्म हो जाता है, उसी प्रकार काली देवी के संपर्क में आने के उपरांत साधक के समस्त राग, द्वेष, विघ्न आदि भस्म हो जाते हैं।महाकाली की साधना को सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली मानते हैं, जो किसी भी कार्य का तुरंत परिणाम देती हैं। साधना को सही तरीके से करने से साधकों को अष्टसिद्धि प्राप्त होती है। काली की पूजा या साधना के लिए किसी गुरु या जानकार व्यक्ति की मदद लेना जरूरी है।मां काली के 4 रूप हैं:- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली। हालांकि मां कालिका की साधना के कई रूप हैं लेकिन भक्तों को केवल सात्विक भक्ति ही करना चाहिए। शमशान काली, काम कला काली, गुह्य काली, अष्ट काली, दक्षिण काली, सिद्ध काली, भद्र काली आदि कई मान से मां की साधना होती है। महाकाली को खुश करने के लिए उनकी फोटो या प्रतिमा के साथ महाकाली के मंत्रों का जाप भी किया जाता है। इस पूजा में महाकाली यंत्र का प्रयोग भी किया जाता है। इसी के साथ चढ़ावे आदि की मदद से भी मां को खुश करने की कोशिश की जाती है। अगर पूरी श्रद्धा से मां की उपासना की जाए तो आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। अगर मां प्रसन्न हो जाती हैं तो मां के आशीर्वाद से आपका जीवन पलट सकता है, भाग्य खुल सकता है और आप फर्श से अर्श पर पहुंच सकते हो।माँ दुर्गा' कि 'संहार' रुप हे माँ काली। देवी माँ काली विशेष रुप से शत्रुसंहार, विघ्ननिवारण, संकटनाश और सुरक्षा की अधीश्वरी देवी है।भक्त आपने ज्ञान, सम्पति, यश और अन्य सभी भौतिक सुखसमृद्धि के साधन प्राप्त ओर विशेष रुप से सुरक्षा, शौर्य, पराक्रम, युद्ध, विवाद और प्रभाव विस्तर के संदर्भ के माता कि पूजन, आराधना की जाती है। माँ काली की रुपरेखा भयानक है। पर वह उनका दुष्टदलन रुप है।माँ काली भक्तों के प्रति सदैव ही परम दयालु और ममतामयी रहती है। उनकी पूजा के द्वारा व्यक्ति हर प्रकार की सुरक्षा और समृद्धि प्राप्त कर सकता है।वैसे तो इस साधना के बहुतेरे गोपनीय पक्ष साधक समाज के सामने आ चुके है परन्तु आज भी हम इस महाविद्या के कई रहस्यों से परिचित नहीं है. काम कला काली, गुह्य काली, अष्ट काली, दक्षिण काली, सिद्ध काली आदि के कई गोपनीय विधान आज भी अछूते ही रह गए साधकों के समक्ष आने से,जितना लिखा गया है ये कुछ भी नहीं उन रहस्यों की तुलना में जो की अभी तक प्रकाश में नहीं आया है और इसका महत्वपूर्ण कारण है इन विद्याओं के रहस्यों का श्रुति रूप में रहना,अर्थात ये ज्ञान सदैव सदैव से गुरु गम्य ही रहा है,मात्र गुरु ही शिष्य को प्रदान करता रहा है और इसका अंकन या तो ग्रंथों में किया ही नहीं गया या फिर उन ग्रंथों को ही लुप्त कर दिया काल के प्रवाह और हमारी असावधानी और आलस्य ने. तीव्र साधनाओं का प्रकटीकरण भी,तभी तो साधक पशुभाव से ऊपर उठकर वीर और तदुपरांत दिव्य भाव में प्रवेश कर अपने जीवन को सार्थक कर पाता है.
सोमवार, 12 जून 2017
अस्त गृह .............. सूर्य के निकट डिग्री वाले गृह अस्त माने जाते है। अस्त गृह को लेकर लोगो मे भ्रम है की इसके कारक तत्व कमजोर हो जाते है जबकी वास्तविकता ये है कि अस्त गृह राजा के खास मन्त्री और पिता का सबसे लाडला बेटा है। किन्तु जैसे वट वृक्ष के नीचे उगे वाले पोधे आसानी से अस्तित्व नही बना पाते वैसे ही अस्त गृह देर से फल देते है किन्तु जब देते है तो अच्छा फल देते है या यू कह सकते है की सूर्य राजा है और अस्त गृह के कारकतत्वो को समझ कर इस्तेमाल करना आये तो इनकी सरकार मे चलती बहुत है। ..................... ग्रहों के अस्त होने के अंश: --------------------------- आकाश मंडल में जब भी कोई ग्रह सूर्य से एक निश्चित दूरी में या उसके अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपना तेज व शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह आकाश मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है, उस समय इसे अस्त ग्रह की संज्ञा दी जाती है। प्रत्येक ग्रह की सूर्य से यह समीपता का मापन अंशों में किया जाता है तथा इस मापन के अनुसार प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखित दूरी के अंदर आने पर अस्त हो जाता है : १. चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। २. मंगल सूर्य के दोनों ओर 17 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। ३. बुध सूर्य के दोनों ओर 14 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि बुध अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। ४. गुरू सूर्य के दोनों ओर 11 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। ५. शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि शुक्र अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। ६. शनि सूर्य के दोनों ओर 15 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। ७. राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी भी अस्त नहीं होते हैं। अस्त ग्रह निर्बल हो जाता है और वह अपना फल सूर्य के माध्यम से प्रदान करता है। अस्त ग्रहो का अपना एक विशेष महत्व होता है। इसलिए अस्त ग्रहो की ओर ध्यान देना आवश्यक है अब बात करते है ग्रह अस्त कैसे होता है? कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दुरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपना तेज और शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह सौर मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है ऐसे ग्रह को अस्त ग्रह कहते है।प्रत्येक ग्रह की सूर्य से यह समीपता अंशो में मापी जाती है इस मापदंड के अनुसार हर एक ग्रह सूर्य से निम्नलिखित दुरी के अंदर आ जाने से अस्त हो जाता है: चंद्रमा सूर्य के दोनों और 12 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।बुध सूर्य के दोनों ओर 14 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।लेकिन बुध अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हो तो वह सूर्य के दोनों और 12 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त होता है।गुरु सूर्य के दोनों ओर 11 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।शुक्र सूर्य के दोनों और 10 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।बुध की तरह शुक्र भी यदि अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हो तो वह सूर्य के दोनों ओर 8 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाते है।शनि सूर्य के दोनों ओर 15 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जाता है।राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी अस्त नही होते।हमेशा वक्री रहते है। किसी भी ग्रह के अस्त हो जाने से उसके प्रभाव में कमी आ जाती है तथा वह ग्रह कुंडली में ठीक तरह से कार्य करने में सक्षम नही रह जाता।किसी भी अस्त ग्रह की प्रभावहीनता का सही अनुमान लगाने के लिए उस ग्रह का कुंडली में स्थिति के कारण बल, सूर्य का उसी कुंडली में विशेष बल व अस्त ग्रह की सूर्य से दुरी देखना आवश्यक होता है।उसके बाद ही उस ग्रह की कार्य क्षमता के बारे में सही जानकारी प्राप्त होती है।उदाहरण के लिए, किसी कुंडली में गुरु सूर्य से 11 अंश दूर होने पर अस्त ही कहलाएंगे तथा 1 अंश दूर पर भी अस्त कहलाएंगे लेकिन पहली स्थिति में कुंडली में गुरु का बल दूसरी स्थिति के मुकाबले अधिक होगा क्योंकि जितना ही कोई ग्रह सूर्य के पास आ जाता है उतना ही उसका बल कम होता जाता है।
माँ काली ज्योतिष की आज की पोस्ट पहले विवाह 20 से लेकर 25 साल तक हो जाता था पर आज समय मे वदलाव आ चुका है आज नोजवान पीङी जो शिक्षा गृहन करके जव तक अपने पैरो पर खङे नही होते तव तक विवाह नही करते हजारो कुन्ङलीया मेरे पास आती कई तरह के सवाल जातक जातिका पुछती है पर यह सवाल भी पुछा जाता है हमारा विवाह कौन सी दिशा में होगा जन्म कुंडली में प्रथम भाव लग्न को पूर्व दिशा ,सप्तम भाव को पश्चिम ,चतुर्थ भाव को उत्तर एवं दशम भाव को दक्षिण दिशा समझें , अतः इसी क्रम में शुक्र से सप्तमेश की जो दिशा हो ,उसी दिशा में प्रायः वर का घर होता है | चन्द्रमा एवं सप्तमेश जिस दिशा में हों इनमें जो बलवान हो जातक की ससुराल उसी दिशा में होगी | चन्द्रमा सातवें भाव में हो तथा चन्द्र राशि का स्वामी मंगल या अन्य पापग्रहों से दृष्ट हो अथवा पापग्रह चन्द्रमा से त्रिकोण में हों तो जातक का विवाह जन्म स्थान से दूर होता हैयदि पंचमेश ,सप्तमेश एवं शुक्र का शुभ संयोग हो अथवा पंचमेश और सप्तमेश एक साथ हो तो प्रेम विवाह होता है, यदि पराक्रमेश तृतीय भाव का स्वामी सप्तम भाव में हो तो भी जातक के प्रयत्न से विवाह होता है अर्थात प्रेम विवाह की संभावना होती है , नीच राशिस्थ सूर्य की शुक्र के साथ युति हो तो प्रेम विवाह होता है,मिथुन राशि में चन्द्र और बुध की युति हो या चन्द्रमा मिथुन राशि में शुक्र से युत हो तो प्रेम विवाह का योग बनता है, पंचमेश एवं सप्तमेश का राशि परिवर्तन राज योग एवं प्रेम का सूचक भी है वाकी आप अपने अनुभव से परखे मेरी यही कोशिश है की आप ज्योतिष का ज्यादा से ज्यादा ज्योतिष का ज्ञान हासिल करे मित्रो आप से अगर कोई कुंङली दिखाना या वनवाना या हमसे किसी भी समस्या का उपाय जानना चाहते है तो हमसे सम्पर्क करे हमारी सेवा दक्षिणा के साथ है 09414481324 07597718725 आचार्य राजेश
आओ ज्योतिष सीखें पूरी ज्योतिष नौ ग्रहों, बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों और बारह भावों पर टिकी हुई है। सारे भविष्यफल का मूल आधार इनका आपस में संयोग है। नौ ग्रह इस प्रकार हैं - ग्रहअन्य नामअंग्रेजी नामसूर्यरविसनचंद्रसोममूनमंगलकुजमार्सबुध मरकरीगुरूबृहस्पतिज्यूपिटरशुक्रभार्गववीनसशनिमंदसैटर्नराहु नॉर्थ नोडकेतु साउथ नोड आधुनिक खगोल विज्ञान (एस्ट्रोनॉमी) के हिसाब से सूर्य तारा और चन्द्रमा उपग्रह है, लेकिन भारतीय ज्योतिष में इन्हें ग्रहों में शामिल किया गया है। राहु और केतु गणितीय बिन्दु मात्र हैं और इन्हें भी भारतीय ज्योतिष में ग्रह का दर्जा हासिल है। भारतीय ज्योतिष पृथ्वी को केन्द्र में मानकर चलती है। राशिचक्र वह वृत्त है जिसपर नौ ग्रह घूमते हुए मालूम होते हैं। इस राशिचक्र को अगर बारह भागों में बांटा जाये, तो हर एक भाग को एक राशि कहते हैं। इसी तरह जब राशिचक्र को सत्ताईस भागों में बांटा जाता है, तब हर एक भाग को नक्षत्र कहते हैं। हम नक्षत्रों की चर्चा आने वाले समय में करेंगे। एक वृत्त को गणित में 360 कलाओं (डिग्री) में बाँटा जाता है। इसलिए एक राशि, जो राशिचक्र का बारहवाँ भाग है, 30 कलाओं की हुई। फ़िलहाल ज़्यादा गणित में जाने की बजाय बस इतना जानना काफी होगा कि हर राशि 30 कलाओं की होती है। आज आप ग्रह के नाम अच्छी तरह सेयाद कर ले ग्रह अन्य नाम अंग्रेजी नाम सूर्य रवि सन चंद्र सोम मून मंगल कुज मार्स बुध मरकरी गुरू बृहस्पति ज्यूपिटर शुक्र भार्गव वीनस शनि मंद सैटर्न राहु नॉर्थ नोड केतु साउथ नो्: ग्रह अन्य नाम अंग्रेजी नाम सूर्य रवि सन चंद्र सोम मून मंगल कुज मार्स बुध मरकरी गुरू बृहस्पति ज्यूपिटर शुक्र भार्गव वीनस शनि मंद सैटर्न राहु नॉर्थ नोड केतु साउथ नोड
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