बहुत समय पहले की बात है. जापान में एक युवा समुराई रहता था जो अपनी मंगेतर से बहुत प्रेम करता था. एक दिन जब उसकी मंगेतर जंगल से गुज़र रही थी, तब एक आदमखोर बाघ ने उसपर प्राणघातक हमला कर दिया. समुराई ने अपनी प्रेयसी को बचाने के भरसक प्रयास किए उसकी मृत्यु हो गई.
दुःख में आकंठ डूबे समुराई ने यह संकल्प लिया कि वह अपनी प्रिया की असमय मृत्यु का प्रतिशोध लेगा और उस बाघ को खोजकर खत्म कर देगा.
इस प्रकार समुराई अपने धनुष-बाण लेकर गहरे जंगल में चला गया और बहुत लंबे समय तक उस बाघ की खोज करता रहा. एक दिन उसे वह एक बाघ कुछ दूरी पर सोता दिखाई दिया. समुराई उसे देखकर समझ गया कि उसी बाघ ने उसकी प्रेयसी के प्राण लिए थे.
उसने अपना धनुष उठाया और निशाना लगाकर बाण छोड़ दिया. बाण बिजली की गति से छूटकर बाघ के शरीर को भेद गया. प्रत्यंचा पर दूसरा बाण चढ़ाकर वह बाघ की मृत्यु सुनिश्चित करने के लिए सतर्कतापूर्वक उसकी ओर बढ़ा… लेकिन वह यह देखकर अचंभित था कि उसके तीर ने किसी बाघ को नहीं बल्कि उसके जैसे दिखनेवाले धारीदार पत्थर को भेद दिया था!
इस घटना का बाद गांव में हर ओर उसकी धनुर्विद्या की चर्चा थी… कि उसने किस तरह एक पत्थर को तीर से भेद दिया, और लोग उसकी परीक्षा लेना चाहते थे.
लेकिन अनेक बार प्रयास करने के बाद भी समुराई के तीर चट्टानों और पत्थरों से टकराकर टूटते रहे. वह उन्हें भेदने का करिश्मा दुहरा नहीं सका.
क्योंकि इस बार समुराई जानता था कि वह पत्थर पर तीर चला रहा है. विगत में उसका संकल्प इतना गहन था कि वह वास्तव में पत्थर को तीर से भेद सका. परिस्तिथियों के बदलते ही उसका अद्भुत कौशल लुप्त हो गया.
आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017
संकल्प की शक्ति
शनिवार, 2 दिसंबर 2017
मल मास का वैज्ञानिक रहस्य
आचार्य राजेश
ईस बार मलमास 15 दिसंबर से आरंभ हो रहा है जो 14 जनवरी 2018तक रहेगा। मलमास के चलते दिसंबर के महीने में अब केवल 5 दिन और विवाह मुहूर्त रहेंगे जो कि 8, 9,12,13 व 14 दिसंबर है। इसके बाद अगले महीने 23 जनवरी के बाद ही शादियां होंगी। 15 दिसंबर को ग्रहों का राजा सूर्य रात 8:53 पर धनु राशि में प्रवेश करेगा। इसी के साथ मलमास प्रारंभ हो जाएगा। मलमास प्रारंभ होते ही सभी प्रकार के शुभकार्य मसलन शादी-विवाह, मुंडन, जनेऊ, गृह प्रवेश जैसे कार्यों पर रोक लग जाएगी। 15 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही मलमास समाप्त हो जाएगा और शुभ कार्य पुनः आरंभ हो जाएंगे। हालांकि 15 से 22 जनवरी के बीच शादियों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं होने के कारण शहनाईयों की गूंज 23 जनवरी से ही सुनाई देगी।भारतीय ज्योतिष गणनाओं के आधार पर मलमास अधिक मास या तेरहवें मास के रूप में वर्णित है। सूर्य 12 राशियों में साल भर भ्रमण करते हैं, इसी क्रम में 32 महीना 16 दिन 4 घड़ी के बाद सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती है। जिस माह में सूर्य की संक्रांति नहीं होती है वह मलमास, अधिक मास कहलाता है। यानि लगभग हर तीन वर्ष बाद मलमास पड़ता है.
मान्यता है कि मलमास का वर्ष 396 दिन का होता है, जबकि अन्य वर्ष 365 दिन 5 घंटे 45 मिनट और 12 सैकंड का होता है। धर्माचार्यों के अनुसार भारत में मलमास में केवल राजगीर ही पवित्र रहता है इसीलिए इस अवधि में राजगीर में तैंतीस कोटिदेवी-देवता निवास करते हैं।
इस अवधि में शादी-विवाह, मुंडन, उपनयन आदि को छोड़कर सभी तरह के शुभ कार्य केवल राजगीर में ही होते हैं। आखिर खर मास में क्यों नहीं होते वैवाहिक शुभ कार्य
इस जगत की आत्मा का केंद्र सूर्य है। बृहस्पति की किरणें अध्यात्म नीति व अनुशासन की ओर प्रेरित करती हैं। लेकिन एक-दूसरे की राशि में आने से समर्पण व लगाव की अपेक्षा त्याग, छोड़ने जैसी भूमिका अधिक देती है। उद्देश्य व निर्धारित लक्ष्य में असफलताएं देती हैं। जब विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ आदि करना है तो उसका आकर्षण कैसे बन पाएगा? क्योंकि बृहस्पति और सूर्य दोनों ऐसे ग्रह हैं जिनमें व्यापक समानता हैं।
सूर्य की तरह यह भी हाइड्रोजन और हीलियम की उपस्थिति से बना हुआ है। सूर्य की तरह इसका केंद्र भी द्रव्य से भरा है, जिसमें अधिकतर हाइड्रोजन ही है जबकि दूसरे ग्रहों का केंद्र ठोस है। इसका भार सौर मंडल के सभी ग्रहों के सम्मिलित भार से भी अधिक है। यदि यह थोड़ा और बड़ा होता तो दूसरा सूर्य बन गया होता। पृथ्वी से 15 करोड़ किलोमीटर दूर सूर्य तथा 64 करोड़ किलोमीटर दूर बृहस्पति वर्ष में एक बार ऐसे जमाव में आते हैं कि सौर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के माध्यम से बृहस्पति के कण काफी मात्रा में पृथ्वी के वायुमंडल में पहुँचते हैं, जो एक-दूसरे की राशि में आकर अपनी किरणों को आंदोलित करते हैं।सूर्य जब बृहस्पति की राशि धनु या फिर मीन में होता है तो ये दोनों राशियां सूर्य की मलीन राशि मानी जाती है. वर्ष में दो बार सूर्य बृहस्पति की राशियों के संपर्क में आता है. प्रथम दृष्टा 15-16 दिसंबर से 14-15 जनवरी और द्वितीय दृष्टा 14 मार्च से 13 अप्रैल. द्वितीय दृष्टि में सूर्य मीन राशि में रहते हैं.
इस कारण धनु व मीन राशि के सूर्य को खरमास/मलमास की संज्ञा देकर व सिंह राशि के बृहस्पति में सिंहस्थ दोष दर्शाकर भारतीय भूमंडल के विशेष क्षेत्र गंगा और गोदावरी के मध्य (धरती के कंठ प्रदेश से हृदय व नाभि को छूते हुए) गुह्य तक उत्तर भारत के उत्तरांचल, उत्तरप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, राज्यों में मंगल कर्म व यज्ञ करने का निषेध किया गया है, जबकि पूर्वी व दक्षिण प्रदेशों में इस तरह का दोष नहीं माना गया है।
वनवासी अंचल में क्षीण चन्द्रमा अर्थात वृश्चिक राशि के चन्द्रमा (नीच राशि के चन्द्रमा) की अवधि भर ही टालने में अधिक विश्वास रखते हैं, क्योंकि चंद्रमा मन का अधिपति होता है तथा पृथ्वी से बहुत निकट भी है, लेकिन धनु संक्रांति खर मास यानी मलमास में वनवासी अंचलों में विवाह आयोजनों की भरमार देखी जा सकती है, किंतु सामाजिक स्तर पर उनका अनुसंधान किया जाए तो इस समय में किए जाने वाले विवाह में एक-दूसरे के प्रति संवेदना व समर्पण की अपेक्षा यौन विकृति व अपराध का स्तर अधिक दिखाई देता है।उत्तरभारत में यज्ञ-अनुष्ठान का बड़ा महत्व रहा है। इस महत्व पर संस्कार के निमित्त एक कथा इस प्रकार है कि पौष मास में ब्रह्मा ने पुष्य नक्षत्र के दिन अपनी पुत्री का विवाह किया, लेकिन विवाह समय में ही धातु क्षीण हो जाने के कारण ब्रह्मा द्वारा पौष मास व पुष्य नक्षत्र श्रापित किए गए।
इस तरह के विज्ञान की कई रहस्यमय बातों को कथानक द्वारा बताई जाने के पौराणिक आख्यानों में अनेक प्रसंग मिलते हैं, इसलिए धनु संक्रांति सूर्य पौष मास में रहने व मीन सूर्य चैत्र मास में रहने से यह मास व पुष्य नक्षत्र भी विवाह में वर्जित किया गया है।ह अधिक मास क्या है और क्यों आता है? यह जिज्ञासा स्वाभाविक है। अधिक मास से तात्पर्य है वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद आदि महीनों में किसी का दो बार उसी एक वर्ष में आ जाना यानी किसी वर्ष में दो आषाढ़ हो जाना या दो श्रावण हो जाना।
इस प्रकार उस वर्ष में बारह महीनों के बजाय तेरह महीने हो जाना यानी एक माह बढ़ जाना। यह घटना
(तेरह महीने आ जाने की) प्रति तीसरे वर्ष क्यों हो जाती है, यह जानना रोचक रहेगा। इसके पीछे के कुछ वैज्ञानिक कारण भी नजर आते हैं।
सूर्य-चंद्रमा हैं कारण
विज्ञानवेत्ता मानते हैं कि विश्वभर में वर्षगणना के कैलेंडर का महीनों वाला हिसाब विभिन्न धर्मों और विभिन्न क्षेत्रों में या तो सूर्य के या चंद्रमा के आधार पर होता है। इस प्रकार भारतीय कैलेंडर सूर्य, चंद्र तथा नक्षत्र तीनों को संतुलित करके चलता है, इसलिए इसे सौर-चांद्र वर्षमान या ल्यूनी सोलर कैलेंडर कहते हैं। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार सूर्य पूरे वर्ष मे 12 राशियों से गुजरता है. सूर्य का इन राशियों में भ्रमण 365 दिन में पूर्ण होता है. सूर्य के एक राशि में समय बिताकर दूसरी राशि में प्रवेश करने तक का काल सौर मास कहलाता है. अत: सूर्य की इस गति के आधार पर की जाने वाली वर्ष गणना सौर वर्ष कहलाती है. इसी प्रकार चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह होने से सूर्य के सापेक्ष गति बनाने के लिए 29 दिन 12 घंटे और 44 मिनट समय लेता है. चंद्रमा की गति का यह काल चंद्रमास कहलाता है.
इस अवधि के आधार पर पूरे वर्ष के दिनों की गणना करें तो एक चंद्रवर्ष 354 दिनों का होता है. जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का होता है. इस प्रकार चंद्रवर्ष में 11 दिन कम होते हैं. सनातन धर्म में प्राचीन ऋषि-मुनियों, ग्रह-नक्षत्रों और ज्योतिष विद्या के मनीषियों ने काल गणना त्रुटिरहित बनाने की दृष्टि से ही चंद्रवर्ष और सौरवर्ष की अवधि में इस अंतर को दूर करने के लिए 32 माह 16 दिन और चार घड़ी के अंतर से यानि हर तीसरे चंदवर्ष में एक ओर चंद्रमास जोड़कर 11 दिनों के अंतर को पूरा किया जाता है. सूर्य और चंद्र दोनों के समन्वय के कारण वर्ष में दिनों की गणना का जो अंतर आता है, वह प्रतिवर्ष लगभग ग्यारह दिन का होता है
इस प्रकार सूर्य और चंद्र दोनों की पूरी पड़ताल निरंतर रखने की वैज्ञानिक ललक का परिणाम है हर तीस महीनों के बाद एक अधिक मास की गणना द्वारा सौर-चांद्र गणना का समन्वय बिठाने क
े मार्ग की परिकल्पना।कि है2018 में 16 मई से अधिकमास शुरू होगा, जो 13 जून तक चलेगा। अधिकमास में ही 24 मई को गंगा दशहरा पर्व भी मनाया जाएगा। अधिकमास के कारण देवशयनी एकादशी 9 जुलाई को आएगी।
बुधवार, 29 नवंबर 2017
गंड मूल का सच ओर वैज्ञानिक आधार
वैसे तो बच्चे का जन्म किसी के भी घर में खुशियों को लाने वाला होता है, लेकिन अगर बच्चे का जन्म ‘गण्ड-मूल नक्षत्र’ में हुआ हो; तो लोगों की खुशियाँ ये सुनते ही काफ़ूर हो जाती हैं। क्या होते हैं गण्ड-मूल नक्षत्र? इनकी संख्या कितनी होती है? क्या ये वाकई इतने खतरनाक होते हैं? आज तक आप इन्हीं सब सवालों से जूझते आये होंगे। आइये, आज हम इन्हीं के बारे में बात करते हैं संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं। जैसे मार् इसी प्रकार गंड-मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से नाजुक और दुष्परिणाम देने वाले होते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य के लिए इन नक्षत्रों की शांति जरूरी है। मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं।
क्या हैं गंड मूल नक्षत्र
ये आप भी जानते हैं कि नक्षत्रों की संख्या 27 होती है; इनमें से ही 6 नक्षत्र गण्ड-मूल नक्षत्र माने जाते हैं, जो कि अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती हैं। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इन 6 गण्ड-मूल नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में जन्म लेने पर जातक को ‘गण्ड-मूल दोष’ से युक्त मान लिया जाता है; जबकि सच्चाई कुछ और है, जिससे हर कोई नावाकिफ़ है। इसी बात का फ़ायदा धूर्त ज्योतिषी और ढोंगी पण्डित उठाते हैं।सच तो ये है कि ये नक्षत्र पूरी तरह से खराब नहीं होते, बल्कि इनका एक छोटा सा अंश ही दोषयुक्त होता है। संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं। जैसे मार्ग संधि (चौराहे-तिराहे), दिन-रात का संधि काल, ऋतु, लग्र और ग्रह के संधि स्थल आदि को शुभ नहीं मानते हैं। इसी प्रकार गंड-मूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से नाजुक और दुष्परिणाम देने वाले होते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य लिए इन नक्षत्रों की शांति जरूरी है। मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं।राशि और नक्षत्र दोनों जब एक स्थान पर समाप्त होते हैं तब यह स्थित गण्ड नक्षत्र कहलाती है और इस समापन स्थिति से ही नवीन राशि और नक्षत्र के प्रारम्भ होने के कारण ही यह नक्षत्र मूल संज्ञक नक्षत्र कहलाते हैं।राशि चक्र में ऐसी तीन स्थितियां होती हैं जब राशि और नक्षत्र दोनों एक साथ समाप्त होते हैं। यह स्थिति ‘गंड नक्षत्र’ कहलाती है। इन्हीं समाप्ति स्थल से नई राशि और नक्षत्र की शुरूआत होती है। लिहाजा इन्हें ‘मूल नक्षत्र’ कहते हैं। इस तरह तीन नक्षत्र गंड और तीन नक्षत्र मूल कहलाते हैं। गंड और मूल नक्षत्रों को इस प्रकार देखा जा सकता है।
कर्क राशि जल राशि व अश्लेषा नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं। यहीं से मघा नक्षत्र और सिंह राशिअग्न का उद्गम होता है। लिहाजा अश्लेषा गंड और मघा मूल नक्षत्र है।
वृश्चिक राशि में ज्येष्ठा नक्षत्र एक साथ समाप्त होते हैं, यहीं से मूल नक्षत्र और धनु राशि की शुरूआत होने के कारण ज्येष्ठा ‘गंड’ और ‘मूल’ का नक्षत्र होगा।
मीन राशि और रेवती नक्षत्र का एक साथ समाप्त होकर यहीं से मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरूआत होने से रेवती, गंड तथा अश्विनी मूल नक्षत्र कहलाते हैं।
उक्त तीन गंड नक्षत्र अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती का स्वामी ग्रह बुध है तथा तीन मूल नक्षत्र मघा, मूल व अश्विनी का स्वामी ग्रह केतु हैसच तो ये है कि ये नक्षत्र पूरी तरह से खराब नहीं होते, बल्कि इनका एक छोटा सा अंश ही दोषयुक्त होता है। अश्विनी, मघा और मूल की प्रारम्भिक 2 घटी तथा रेवती, आश्लेषा और ज्येष्ठा की अन्तिम 2 घटी ही दोषयुक्त होती हैं। चूँकि 1 घटी 24 मिनट की होती है, इसलिए प्रत्येक नक्षत्र में 48 मिनट और इनकी सन्धि के दौरान कुल 96 मिनट अर्थात् 1 घण्टा 36 मिनट ही दोषपूर्ण होते हैं। जबकि कुछ पण्डित लोग दोनों नक्षत्रों के दौरान अर्थात् पूरे ्2 दिनों (48 घण्टे) के दौरान हुये जन्म को खराब बता कर लोगों को डराते हैं और पूजा-पाठ का जाल फ़ैलाकर उन्हें लूटते हैं।ज्योतिष में कुछ विशेष आधारों पर राशि और नक्षत्र को तीन-२ चक्रों में विभाजित किया गया है। ये चक्र एक विशेष सन्धि-स्थल पर आपस में जुड़े होते हैं। इस तरह इन तीन सन्धि-स्थलों पर जो 6 नक्षत्र आपस में जुड़ते हैं, उन्हें ही ‘गण्ड-मूल नक्षत्र’ कहा जाता है। चूँकि सन्धि या संक्रमण काल को सामान्य रूप से अशुभ या कष्टकारक माना जाता है, अत: ऐसा माना जाता है कि गण्ड-मूल दोष में उत्पन्न बच्चे पर कुछ ना कुछ नकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ता है।चूँकि नक्षत्र का प्रभाव नकारात्मक है, इसलिए 27 दिन पश्चात् पुन: उसी नक्षत्र के आने पर किसी विद्वान ब्राह्मण को बुलवा कर आप् शान्ति के लिए पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा आदि करने में कोई बुराई नहीं है; परन्तु 27 दिन तक पिता को अपने बच्चे का मुँह ना देखने देना एक बेकार की बात ही है। लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि ये शान्ति वगैरह तभी करवायें, जब बच्चे का जन्म उस विशेष 2 घटी में ही हुआ हो मतलव जल और आग का एक साथ मिलने का समय । वरना मेरे इस लेख को लिखने का कोई फ़ायदा नहीं होगा।शतपथ ब्राह्मण और तैत्तरीय ब्राह्मण नामक ग्रंथ में बताया गया है कि कुछ स्थितियों में यह दोष अपने आप समाप्त हो जाता है और इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति खुद के लिए भाग्यशाली होते हैं।व्यक्ति का जन्म अगर वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुंभ लग्न में हो, तब मूल नक्षत्र में जन्म होने पर भी इसका अशुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
गंडमूल नक्षत्र में जन्म लेने पर भी अगर लड़के का जन्म रात में और लड़की का जन्म दिन में हो, तब मूल नक्षत्र का प्रभाव समाप्त हो जाता है। गंडमूल नक्षत्र मघा के चौथे चरण में जन्म लेने वाला बच्चा धनवान और भाग्यशाली होतागंडमूल दोष 28 साल बाद अपने आप समाप्त हो जाता है। ऐसा हमारे जातक शास्त्रों में लिखा है E3। है।Gandmool गंडमूल दोष के बारे में यह article यदि आपको पसंद आया हो, तो इसे like और दूसरों को share करें। आप Comment box में Comment जरुर करें, ताकि यह जानकारी और लोगों तक भी पहुंच सके।
चलते-२ एक बात अवश्य कहूँगा कि बेवजह घबरायें नहीं। आपका बच्चा भी अन्य बच्चों की तरह भाग्यशाली है। उसका भविष्य उसकी कुण्डली के अन्य योगों पर निर्भर करेगा, ना कि केवल ‘गण्ड-मूल दोष’ में बँधकर रह जायेगा। हमेशा की तरह खुश रहिये।
सोमवार, 27 नवंबर 2017
अनुभव की वात
अनुभव की बात समझ-समझ की बात होती है। कुछ लोग हैं जो अपनी बुद्धि से भगवान को पकड़ना चाहते हैं। यह मन और बुद्धि से परे की चीज़ है। अगर हाथी को बाँधने वाली ज़ंजीर से हम चींटी को बाँधना चाहें तो कैसे बंधेगी?
तो समझने की बात है- ज्ञान की बात, भगवान की बात, हम अपनी बुद्धि से नहीं पकड़ सकते हैं। हम सिर्फ अनुभव से इस चीज़ को पकड़ सकते हैं। लोग समझते हैं कि आज स्कूल में यह पढ़ा, परंतु जिस चीज़ का अनुभव नहीं किया, वह कैसे समझ में आ जाएगी? अंगूर मीठे होते हैं, यह सीखने के लिए किसी को स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं है। जिस दिन अंगूर मुँह में डालेंगे, अपने आप पता लग जायेगा कि अंगूर मीठे होते हैं।
हम भगवान की बात करते हैं, ज्ञान की बात करते हैं, मुक्ति की बात करते हैं। पर इसको अनुभव में बदलना ज़रूरी है। कोई दस घंटे तक भाषण दे सकता है, कि चीनी क्या होती है, मीठा क्या होता है, पर, अगर वह मिठास ज़बान पर रख दी जाये तो मनुष्य एक ही पल में समझ जायेगा। फिर उसके प्रश्न बाकी नहीं रहेंगे, फिर वह दुविधा में नहीं रहेगा, फिर उसको जगह-जगह भटकने की ज़रूरत नहीं रहेगी। वह उस चीज़ का अनुभव अपने जीवन में, अपने अंदर कर सकेगा।
ये है बात अनुभव की। इस संसार में ‘शांति-शांति’ कहने वालों की कोई कमी नहीं है, पर कोई बिरला ही मिलेगा जो शांति का अनुभव करा दे। और जबतक ये अनुभव नहीं होगा, तबतक हम पहचान नहीं पायेंगे कि हमको क्या मिला है।
अनुभव एक ऐसी चीज़ है कि उसके बाद फिर कुछ कहने के लिए बाकी नहीं रह जाता। अनुभव करो, अनुभव से वह चीज़ समझ में आएगी। अनुभव से इस चीज़ को पकड़ पाओगे, और तभी अपने जीवन को सफल कर पाओगे।
दुनिया में गुरु की महिमा भूल-भाल गये। भूल-भाल गये गुरु का महत्व! अंधविश्वास में फंसे रहते हैं। गुरु तो तुम्हारा कोई न कोई ज़रूर होगा। कोई न कोई तुमको पाठ ज़रूर पढ़ायेगा। पर इतनी बात है कि अगर सच्चा पाठ पढ़ गये तो यह जीवन की नैया उस पार लग जायेगी। अगर सच्चा पाठ नहीं पढ़ पाये तो यह डूबेगी। तो ऐसा गुरु चाहिए, जो अनुभव की बात करे।जिसने खुद अनुभव किया हो
रविवार, 26 नवंबर 2017
सवाल आपके

मित्रों आप वोहोत से मित्र राशीफल के वारे मे सवाल करते है अति ध्यातव्य बात यह है कि सार्वजनिक तौर पर राशिफल,ग्रहों का निवारण और उपचार आदि जो बतलाने और करने का प्रचलन आज कल चल पड़ा है,यह गम्भीर विचारणीय है। चिंता और चिन्तन का विषय भी। इतनी बड़ी आबादी है विश्व की।उसमें तरह-तरह के लोग हैं।भविष्य वक्ता के पास सिर्फ राशियों के आधार पर बारह पैमाने हैं- यानि पूरी मानवता को सिर्फ बारह भागों में बाँट दिया गया।विचारणीय है कि करोड़ों का भाग्य एक समान कैसे हो सकता है?
अब उपचार सम्बन्धी एक उदाहरण- राशि या लग्न के आधार पर किसी ने सुझाव दे दिया- अमुक वस्तु दान करें,अमुक रत्न धारण करें।अब यहाँ भी वही प्रश्न है।क्यों कि सबकी कुण्डली में ग्रहों की स्थिति एक समान नहीं हो सकती।ग्रहों की अवस्था,दृष्टि आदि अनेक बातों का सूक्ष्म विचार करके ही कुछ निर्णय लिया जाना चाहिए।सभी उपचार समय-स्थान-व्यक्ति सापेक्ष हैं।अतः सार्वजनिक सुझाव से व्यक्तिगत सुझाव की कोई तुलना नहीं हो सकती।इसमें वही अन्तर है जो दुकानदार से बुखार की दवा पूछ कर खाने और डॉक्टर से जाँच करा कर दवा लेने में अन्तर है।नब्बे प्रतिशत मामले में हो सकता है- दुकानदार की बतलायी दवा से रोग निवारण हो जाए; किन्तु इसका क्या अर्थ है? डॉक्टर व्यर्थ हैं? आपकी जन्मकुंडली ओर गोचर दोनो का मिलान हो
एक और बात – श्रद्धा, विश्वास और भक्ति बड़ी अच्छी बात है।किन्तु इन तीनों के आगे ‘अन्ध’ शब्द जुड़ जाए तो बड़ा ही घातक सिद्ध होता है।अतः अन्धश्रद्धा,अन्धविश्वास,और अन्धभक्ति से सदा परहेज करना चाहिए।अन्यथा लूटने वाले बैठे हैं,आप यदि लुटाने के लिए तैयार हैं।
ईश्वर सबको सदबुद्धि दें।
शुक्रवार, 1 सितंबर 2017
जन्मकुंडली से जाने अपना घर कव वनेगा
फिर भी भटकते हैं, जहाँ में।
कुटिया हो या घास-फूस का आशियाना,
अ
अपने घर से बढ़कर कुछ नहीं॥`
अपने घर मे रहने की सभी की चाहत होती है लेकिन घर किस्मत से ही बनता है जब योग बनता है योग के साथ अन्य कारको का संयोग बनता है तो घर बनना शुरु हो जाता है।घर बनने का समय अलग अलग जातक की जन्मकुंडली देख कर पता लगाया जाता है घर भी रोटी और कपडा की तरह से जरूरी है,मनुष्य अपने लिये रहने और व्यापार आदि के लिये घर बनाता है,पक्षी अपने लिये प्रकृति से अपनी बुद्धि के अनुसार घोंसला बनाते है,जानवर अपने निवास के लिये गुफ़ा और मांद का निर्माण करते है। जलचर अपने लिये जल में हवा मे रहने वाले वृक्ष आदि पर और जमीनी जीव अपने अपने अनुसार जमीन पर अपना निवास करते है। अपने अपने घर बनाने के लिये योग बनते है। गुरु का योग घर बनाने वाले कारकों से होता है तो रहने के लिये घर बनता है शनि का योग जब घर बनाने वाले कारकों से होता है तो कार्य करने के लिये घर बनने का योग होता है जिसे व्यवसायिक स्थान भी कहा जाता है। बुध किराये के लिये बनाये जाने वाले घरों के लिये अपनी सूची बनाता है तो मंगल कारखाने और डाक्टरी स्थान आदि बनाने के लिये अपनी अपनी तरह से बल देता है। लेकिन घर बनाने के लिये मुख्य कारक शुक्र का अपना बल देना भी मुख्य है,स्वयं की भूमि अथवा मकान बनाने के लिए चतुर्थ भाव का बली होना आवश्यक होता है,. भूमि का कारक ग्रह मंगल है। जन्मपत्री के चौथे भाव से भूमि व भवन सुख का विचार किया जाता है। वैसे तो चौथे भाव के स्वामी (चतुर्थेश) का केंद्र ( कुंडली का लग्न, चौथा, सातवां व दसवां घर) या त्रिकोण ( कुंडली का लग्न, पांचवां व नौवां घर) में होना उत्तम भवन प्राप्ति का योग बनाता है। मंगल के साथ चौथे भाव का स्वामी, पहले भाव का स्वामी व नौवे भाव का स्वामी अच्छी स्थिति में हो व शुभ ग्रहों के साथ हो तो भवन प्राप्ति का अच्छा संकेत है। इसलिए अपना मकान बनाने के लिए मंगल की स्थिति कुंडली में शुभ तथा बली होनी चाहिए.मकान सुख के लिये मंगल और चतुर्थ भाव का ही अध्ययन पर्याप्त नहीं है। भवन सुख के लिये लग्न व लग्नेश का बल होना भी अनिवार्य है। इसके साथ ही दशमेंश, नवमेंश और लाभेश का सहयोग होना भी जरूरी है।* मंगल को भूमि तो शनि को निर्माण का कारक माना गया है। इसलिए जब भी दशा/अन्तर्दशा में मंगल व शनि का संबंध चतुर्थ/चतुर्थेश से बनता है, तब व्यक्ति अपना घर बनाता है उसे भूमि , प्रापर्टी डीलिंग के कार्यों में श्रेष्ठ सफलता मिलती है ।आप अपनी जन्मकुण्डली में देखें और यहाँ दिए गए प्रमुख योगों की संरचना को पहचानें। आप स्वयं जान जायेंगे की घर बनाने का सामर्थ्य आप में कितना है-यदि भाव का स्वामी अकेले या किसी शुभ ग्रह के साथ 1,4,7,10 वें भाव में हो तो जातक माता-पिता द्वारा अर्जित जायदाद में भवन -निर्माण करता है।यदि चौथे भाव का स्वामी 1,5,9 वें भाव में हो तो जातक सरकार से प्राप्त या अपने पूण्य-प्रताप और भाग्य से प्राप्त भुमि पर भवन निर्माण करवाता है।अगर चौथे भाव का स्वामी 3,6,8,12 वें भाव में हो तो जातक अपनी संपदा को छोड़कर लंबी आयु के बाद अपने ही बलबूते पर मकान बनाता है।अ सबगर चौथे भाव का स्वामी लग्न में हो और लग्नेष चौथे भाव में हो तो जातक अपने ही धन संचय से मकान बनवाता है।उपरोक्त संकेतों के आधार पर कुंडली का विवेचन कर घर खरीदने या निर्माण करने की शुरुआत की जाए तो लाभ हो सकता है। इसी तरह पति, पत्नी या घर के जिस सदस्य की कुंडली में गृह-सौख्य के शुभ योग हों, उसके नाम से घर खरीदकर भी कई परेशानियों से बचा जा सकता है।आचार्य राजेश
गुरुवार, 24 अगस्त 2017
ज्योतिष की वात एक ऐसा विषय है जिससे प्राचीन कोई और विषय नहीं।इतिहास गवाह है कि ऐसा कोई भी समय नहीं था जब ज्योतिष का अस्तित्व नहीं थाआधुनिक विज्ञान के कसौटी पर भी इस बात की पुष्टि हो जाती है। क्योंकि ईसा से भी 25 हजार वर्ष पूर्व की कुछ ऐसी अस्थियां मिली हैं जिन पर सूर्यादि ग्रहों के ज्योतिषीय चिह्नों का अंकन पाया गया है।प्रसन्नता की बात है कि आज जैसे -जैसे आधुनिक विज्ञान का विकास हो रहा है, उसकी पिछली धारणाओं का नयी धारणाओं से अपने आप खंडन होता जा रहा है। फलस्वरूप आज नौबत यहां तक आ पहुंची है कि वैज्ञानिकों का भी एक बड़ा वर्ग ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा दिये जाने का पक्षधर बनता जा रहा है। लेकिन ऐक सच यह भी है कि अध्यातिमक क्षेत्र मन्दिर गुरूद्वारा इत्यादि से जुड़े हुए अधिकतर सन्त ज्योतिष विधाा के प्रति नकारात्मक दृषिटकोण रखते हैं। आश्चर्य तो इस बात से होता है कि उन सन्त महापुरूषों वेद-पुराणों में पूर्ण आस्था एवं विश्वास होता है परन्तु वेदों के नेत्र माने जाने वाले ज्योतिष का अपनी बुद्धि के अनुसार खण्डन करते हैं इसके पीछे कौन सा कारण है। यह विचारणीय एवं। खोज का विषय है कि मेरे अपने जीवन में ऐसे कर्इ सन्तों से सामना हुआ है जिनका कहना है कि कुछ भी है सब परमात्मा है ज्योतिष बकवास है तथा इस मंत्र्र का जप करो सब ठीक हो जायेगा। अंगूर खट्टे हैं वाली कहावत याद आती हैसमाज में एक लोकोकित बहुत प्रचलित है कि नीम, हकीम खतरा ए जान संसार में जड़-चेतन जो कुछ भी है उसका अपना एक अर्थ तथा प्रभाव है लेकिन उसका लाभ किस प्रकार से लिया जा सकता है। इसे कोर्इ विरला ही जान पाता है परमात्मा का स्थान जीवन में सर्वोच्च है। इसमें शक करने का कोइ कारण नहीं परन्तु जो एक बात हम भूल जाते हैं वो यह है कि परमात्मा हम सबका स्वामी है, सेवक नहीं सांसार में जो कुछ भी घटित होता है वह परमात्मा की इच्छा से होता है।लेकिन परमात्मा अपनी इच्छा विशेष सेवकों को उत्पन्न करके उनके माध्यम से पूरी करता है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है फल देने का अधिकार केवल परमात्मा के हाथों में है। ज्योतिष शास्त्र एक ऐसा दर्पण है जिसमें मनुष्य अपने कर्मों के फल को देख सकता है तथा परमात्मा की इच्छा से नवग्रहों के माध्यम से मनुष्य अपने कर्मों का अच्छा या बुरा फल भोगता है।ज्योतिष शास्त्र बहुत ही गूढ और जटिल विज्ञान हैहमें यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ज्योतिष भाग्य या किस्मत बताने का कोई खेल-तमाशा नहीं है। यह विशुद्ध रूप से एक विज्ञान है। ज्योतिष शास्त्र वेद का अंग है। ज्योतिष शब्द की उत्पत्ति ‘द्युत दीप्तों’ धातु से हुई है। इसका अर्थ, अग्नि, प्रकाश व नक्षत्र होता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ज्योतिर्मय सूर्यादि ग्रहों की गति, ग्रहण इत्यादि को लेकर लिखे गए वेदांग शास्त्र का नाम ही ज्योतिष है।ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य आकाशीय-चमत्कारों से परिचित होता है। फलतः वह जनसाधारण को सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, ग्रहों की स्थिति, ग्रहों की युति, ग्रह युद्ध, चन्द्र श्रृगान्नति, ऋतु परिवर्तन, अयन एवं मौसम के बारे में सही-सही व महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है। इसलिए ज्योतिष विद्या का बड़ा महत्व है । हमारा मस्तिष्क शरीर के विभिन्न अंगों का संचालन करता है। यह बात सिद्ध की जा चुकी है कि शरीर में किसी अव्यव का संचालन मस्तिष्क का कौन-सा भाग करता है। यदि मस्तिष्क का वह भाग किन्हीं कारणों से कार्य करना बंद कर दे तो उससे संबंधित भाग भी कार्य करना बंद कर देता है। मस्तिष्क के विभिन्न भागों का संबंध व्यक्ति की आकांक्षाओं, काम-प्रवृत्तियों, इच्छाओं आदि पर भी होता है। इसी कारण से शरीर-लक्षण विशेष रुप से हस्त रेखाओं द्वारा व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं का भी पता चल जाता है। सामुद्रिक शास्त्र का संबंध नक्षत्र, पृथ्वी तथा उसके निवासियों पर उनके प्रभाव तथा उनकी दूर स्थित आभा से निकलने वाली चुम्बकीय दे्रव धारा से है। हमारा स्नायु तंत्र मस्तिष्क तथा हथेली के मध्य एक कड़ी का कार्य करता है और यह दोनों सूक्ष्मतम संवेदनाओं के भंडारागार हैं।चिकित्सा विज्ञान मानता है कि गर्भावस्था से ही बच्चा मुट्ठी बंद किए रहता है, इसलिए हथेली की त्वचा सिकुड़ने से उसमें रेखाएं बन जाती हैं। यह स्वाभाविक है और प्राकृतिक भी। परंतु यह धारणा मिथ्या है। यदि ऐसा होता तो रेखाओं का क्रम व्यवस्थित नहीं होता।नाखून, त्वचा का रंग, नाखून में उपस्थित चन्द्र स्थिति आदि का अध्ययन कर रोग बताने का उपक्रम करते आपने वरिष्ठ चिकित्सकों तक को देखा होगा। विज्ञान भी मानने लगा है कि ग्रह-नक्षत्र जन-जीवन पर प्रभाव डालते हैं। ज्योतिष का मूल है यद् ब्रह्मांडे तत्पिंडे अर्थात् जिन तत्वों से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है, उन्हीं तत्वों से ब्रह्मांडगत सभी पिण्डों का सृजन हुआ है। इसलिए वराहमिहिर ने लिखा है कि प्राणियों एवं जीव-जन्तुओं के अलावा पृथ्वी की प्रत्येक वस्तु पर भी ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव पड़ता है। कुमुदनी चन्द्रकिरणों से खिलती है तो सूर्यमुखी सूर्य से। पृथ्वी पर अन्य खगोलिय पिण्डों की तुलना में सूर्य और चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बलों के फलस्वरुप समुद्र का पानी ऊपर उठता है। ज्वार-भाटे उत्पन्न होते है। चन्द्रमा और सूर्य के सम्मिलित प्रभावों के फलस्वरुप ही पूर्णिमा और अमावस्या के दिन ज्वार अन्य दिनों की तुलना अधिक ऊंचा होता है। यही स्थिति शुक्ल और कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी के दिन सबसे कम होती है। दूसरे शब्दों में कहें कि चन्द्रमा की कलाओं के साथ ही ज्वार घटता या बढ़ता रहता है।मानसिक रुप से विक्षिप्त लोगों के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला गया कि पूर्णिमा के दिन ऐसे लोगों की स्थिति विकराल रुप ले लेती है। सैकड़ों वर्षो के शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि सूरज पर प्रत्येक ग्यारह वर्ष में आणविक विस्फोट होता है। इसके प्रभाव का व्यक्ति, देश, वनस्पति आदि पर स्पष्ट अध्ययन किया गया। स्विस चिकित्सक पैरासिलिसस ने अपने अनुसंधानों से यह सिद्ध किया कि कोई व्यक्ति तब ही बीमार होता है जब उसके और उसके जन्म नक्षत्र के साथ जुड़े हुए ग्रह-नक्षत्रों के बीच तारतम्य टूट जाता है। पाइथागोरस ने यह सिद्ध किया था कि प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र अपने निश्चित परिपथ पर चलते हुए एक ध्वनि पैदा करता है। इन सब ग्रह-नक्षत्रों की ध्वनि में एक ताल मेल है, एक संगीतबद्धता है। प्रत्येक व्यक्ति की इसी प्रकार की संगीतबद्धता और नक्षत्रों की संगीतबद्धता में भी एक व्यवस्था है। जब यह टूटती है तो व्यक्ति प्रभावित होता है। सन् 1950 में कॉस्मिक कैमिस्ट्री नाम की एक नई शाखा पैदा हुई। उसमें इस बात पर बल दिया गया कि पूरा ब्रह्मांड एक शरीर है। यदि एक कण भी प्रभावित होगा तो पूरा ब्रह्मांड तरंगित हो जाएगा।एक अन्य प्रयोग से यह सिद्ध किया गया कि सूर्य पर आणविक विस्फोट होते हैं तो मनुष्य का खून भी पतला हो जाता है। आप संभवतः नहीं जानते हों कि व्यक्ति का खून सदैव एक सा रहता है, परंतु स्त्रियों का खून उनके मासिक धर्म के दिनों में पतला हो जाता है। ज्योतिष को लोग अंधविश्वास इसलिए कहते हैं कि हम उसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों को स्पष्ट नहीं कर पाते। हम कार्य और कारण के बीच संबंध तलाश नहीं कर पाते। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। समयाभाव में, धन लोलुपता और अज्ञानतावश हम आगे नहीं बढ़ पा रहे। दरअसल विज्ञान किसी अतिविकसित सभ्यता द्वारा दिया हुआ अविकसित ज्ञान है जिसे हम आगे नहीं बढ़ा पाये। हमारा भविष्य हमारे अतीत से अलग नहीं हो सकता, उससे जुड़ा हुआ होगा। हम कल जो भी होगें, वह आज का ही जोड़ होगा। आज तक हम जो है वह बीते हुए कलों का जोड़ है। भविष्य सदा अतीत से निकलेगा। हमारा आज कल से ही निकलेगा और आने वाला कल आज से। इसलिए जो कल होने वाला है वह आज भी कहीं सूक्ष्म रुप से छुपा है। उसे खोजना ही विज्ञान है।एक छोटे बीज में उसके पेड़ बन कर फल देने और नष्ट हो जाने का पूरा प्रोग्राम लिखा है। वह अंकुरित होगा, पौध बनेगा, बड़ा होगा, फिर पेड़ बन जाएगा आदि। इसी प्रकार गर्भ से ही बच्चे का पूरा प्रोग्राम निश्चित हो जाता है। यह बात अलग है कि पुरूषार्थ से वह उस प्रोग्राम में थोड़ा बहुत परिवर्तन कर लें। प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र अपने स्वभाव और गुण अनुसार व्यक्ति को प्रभावित करता है, यह अकाट्य सत्य है। विज्ञान भी इसको मानता है। वह कहता है कि यह सत्य है कि ग्रह-नक्षत्र व्यक्ति, पशु-पक्षी, जल, वनस्पति, जलवायु आदि को प्रभावित अवश्य करते हैं, परन्तु यह अभी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि कोई व्यक्ति विशेष इनके प्रभाव से प्रभावित होगा ही। इस पर निरंतर शोध कार्य चल रहे है और एक दिन विज्ञान को झुकना ही होगा इस सत्य की ओर।मैं सोचता हूँ कि सरकार और बुद्धिजीवियों को आगे आकर इस विधा पर और खोज करना चाहिए, क्योंकि जो करना चाहते हैं उनके पास संसाधन नहीं हैं। केवल इसे धर्म से जोड़कर और भ्रम बोलकर इसका उपहास करना उचित नहीं है। आज अधिकतर ज्योतिषी इसे धन कमाने का साधन मात्र समझने लगे हैं, बहुत सी विधाएँ अपनी सुविधा अनुसार पैदा कर ली हैं, जिसके कारण इस महान विद्या का दिन प्रतिदिन ह्रास होता जा रहा है। आचार्य राजेश
सोमवार, 21 अगस्त 2017
,जेल मुकद्दमा ओर ज्योतिष
आचार्य राजेश
जेल मुकद्दमा ओर ज्योतिष
By acharyarajesh21/08/2017 No Comments
आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें
कानून दो प्रकार के होते है एक तो प्रकृति का कानून जिसे प्रकृति खुद बनाती बिगाडती है दूसरा इंसानी कानून जो इंसान खुद के बचाव और रक्षा के लिये बनाता है। प्रकृति का कानून सर्वोपरि है। प्रकृति को जो दंड देना है या बचाव करना वह स्वयं अपना निर्णय लेती है। अंत गति सो मति कहावत के अनुसार जीव उन कार्यों के लिये अपनी बुद्धि को बनाता चला जाता है जो उसे अंत समय मे खुद के अनुसार प्राप्त हों। कानून के अनुसार भी जीव को तीन तरह की सजाये दी जाती है पहली सजा मानसिक होती है जो व्यक्ति खुद के अन्दर ही अन्दर रहकर सोचता रहता है और वह अपने शरीर मन और दैनिक जीवन को बरबाद करता रहता है दूसरी सजा शारीरिक होती है जो प्रकृति के अनुसार गल्ती करने पर मिलती है और उस गल्ती की एवज मे अपंग हो जाना पागल हो जाना भ्रम मे आकर अपने सभी व्यक्तिगत कारको का त्याग कर देना और तीसरी सजा होती है जो हर किसी को नही मिलती है वह शारीरिक मानसिक और कार्य रूप से बन्धन मे डाल देना,इसे आज की भाषा मे जेल होना भी कहा जाता है। बन्धन योग के लिये एक बात और भी कही जाती है कि व्यक्ति अगर खुद को एक स्थान मे पैक कर लेता है या कोई सामाजिक पारिवारिक कारण सामने होता है वह अपनी इज्जत मान मर्यादा या लोगो की नजरो से बचाव के लिये अपना खुद का रास्ता एकान्त मे चुनता है तो वह भी स्वबन्धन योग की सीमा मे आजाता है किसी भी व्यक्ति के जीवन में कई बार दुखद स्थिति का सामना करना पड़ता है एवं पुलिसिया के जेल जाना कारावास और इस तरह के योग बनते हैं. इंद्रियों के पीछे ग्रहों का खेल होता है. शनि मंगल एवं राहु इन ग्रहों के बुरे योग एवं दृष्टि कारावास को इंगित करती है. लग्न कुंडली में छठे आठवें एवं बारहवें भाव वह उनके स्वामी ग्रह कारावास के लिए जिम्मेवार होते हयदि कोई शुभ ग्रहों की उपस्थिति या दृष्टि दशम भाव पर नव हो एवं शनि मंगल राहु शनि राहु मंगल का योग दशम स्थान पर होने से व्यक्ति को अपराध एवं और समाजिक कार्यों में लिप्त करता है कुंडली अथवा प्रश्न कुंडली में छठे स्थान एवं आठवें स्थान का स्वामी एवं राहु का बारहवे स्थान या 12 वे स्थान के स्वामी के साथ संबंध रहने पर व्यक्ति को जेल की सजा होती है.
दुष्प्रभावों अर्थात छठे आठवें एवं 12वें में शनि राहु एवं मंगल के अलावा केतु के साथ एवं शनि केतु का संबंध होने पर लंबी सजा होती है राहु ग्रह के 12 वे घर में होने या दृष्टि होने से एवं बारहवे घर के स्वामी के कमजोर होने से कारावास या बंधन योग बनता है बृहद जातक एवं जातक तत्व के अनुसार अगर लग्न स्वामी और छठे घर का स्वामी साथ में हो एवं शनि केंद्र या त्रिकोण में हो तो व्यक्ति को कैद की सजा होती है. कुंडली का षष्टम भाव व्यक्ति की आंतरिक क्षमता और निर्बलता को बताता है. मंगल इस भाव का नैसर्गिक कारक है. जब यह आंतरिक शक्ति प्रकृति की विघटनकारी और दुखद स्थितियों का सामना नहीं कर पाती तो व्यक्ति शत्रुओं और कानूनी दिक्कतों का शिकार हो जाता है. कब और कैसे वह इन शत्रुओं और कानूनी समस्याओं से मुक्ति पायेगा इसे षष्टम भाव और उसपर पड़ने वाले दूसरे ग्रहों के प्रभाव द्वारा जाना जाता है. अष्टम भाव का अध्ययन भी इस समस्या में किया जाता है. इस विषय में कौन से उपाय उसे राहत देंगे इसका विश्लेषण होता है. कृष्णमूर्ति पद्धति के अनुसार दूसरे तीसरे 8 वीं एवं 12 वे का उपनक्षत्र स्वामी एवं दूसरे तीसरे 8 वीं एवं 12 वे भाव का कार्य हो तो व्यक्ति को जीवन में कारावास की सजा होती है. दिल मिलना यदि छठे ग्यारहवें भाव का उपनक्षत्र स्वामी छठे और ग्यारहवें भाव का कार्य किया उसके स्वामी से जुड़ा हो तथा दशा एवं अंतर्दशा छठे एवं ग्यारहवें भाव में से किसी रूप में जुड़ा हो तो
गुरुवार, 17 अगस्त 2017
क्या काला जादू एक हकीकत है? हां और शायद नहीं। जो दूसरे लोग हम पर कर सकते हैं और साथ ही उसके बारे में भी, जो हम अपने आप पर करते हैं। अक्सर हम अपनी जान-पहचान के लोगों द्वारा तांत्रिक शक्तियों (काले जादू) के वशीकरण तथा मारण प्रयोगों के बारे में सुनते हैंअक्सर हम अपनी जान-पहचान के लोगों द्वारा तांत्रिक शक्तियों के वशीकरण तथा मारण प्रयोगों के बारे में सुनते हैं।तांत्रिकों तथा योगियों के अनुसार दुनिया की हर चीज चाहे वो सजीव हो या निर्जीव हो ब्रहमाण्ड की विशाल ऊर्जा का ही रूपांतरित रूप है। वे अक्सर शत्रुओं का बुरा करने के लिए नकारात्मक ऊर्जाओं को प्रयोग करते हैं जिसे पहचानना बेहद आसान होता है।यह सव खेल उर्जा का हैआपको यह समझना होगा कि ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह न तो दैवी होती है, न शैतानी। आप उससे कुछ भी बना सकते हैं – देवता या शैतान। यह बिजली की तरह होती है। क्या बिजली दैवी या शैतानी, अच्छी या बुरी होती है? जब वह आपके घर को रोशन करती है, तो वह दिव्य होती है। एक वेद, अथर्ववेद सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के लिए ऊर्जाओं के इस्तेमाल को ही समर्पित है। अगर वह एक इलेक्ट्रिक चेयर बन जाती है, तो वह शैतानी होती है। यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि उस पल उसे कौन संचालित कर रहा है।असल में, पांच हजार साल पहले, अर्जुन ने भी कृष्ण से यही सवाल पूछा था‘आपका यह कहना है कि हर चीज एक ही ऊर्जा से बनी है और हरेक चीज दैवी है, अगर वही देवत्व दुर्योधन में भी है, तो वह ऐसे काम क्यों कर रहा है?’ कृष्ण हंसे क्योंकि इतना उपदेश देने के बाद भी अर्जुन इस साधारण, बुनियादी और बचकाने सवाल पर अटका था। कृष्ण ने जवाब दिया, ‘ईश्वर निर्गुण है, दिव्यता निर्गुण है। उसका अपना कोई गुण नहीं है।’ इसका अर्थ है कि वह बस विशुद्ध ऊर्जा है। आप उससे कुछ भी बना सकते हैं किसीको वचाया भी जा सकता है ओर मारा भी जा सकता है तो फिर लोग काला जादू कर सकते हैं जी हा बिल्कुल कर सकते हैं। अगर ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल है, तो नकारात्मक इस्तेमाल भी है। एक वेद, अथर्ववेद सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के लिए ऊर्जाओं के इस्तेमाल को ही समर्पित है। नकारात्मक तंत्र-मंत्र को वो लोग अपनाते हैं जोकि दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करते हैं। इस तरह के व्यक्तियों के अंदर नकारात्मकता, ईर्ष्या, लालच, निराशा, कुंठा इस तरह से घर कर जाती है कि वे दूसरों की सफलता, उन्नति, समृद्धि को स्वीकार नहीं कर पाते हैं तथा वे उस व्यक्ति से प्रतिशोध लेने के लिए काले जादू के द्वारा उसके लिए परेशानियां पैदा कर आनंद का अनुभव करते हैं। काले जादू का प्रयोग दूसरे व्यक्ति को हानि पहुंचाने या चोट पहुंचाने के लिए कुछ विशेष तरह की क्रियाओं के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इस प्रथा का प्रभाव हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति पर भी देखा जा सकता है।र्म शास्त्रों में काले जादू को अभिचार के नाम से भी जाना जाता है अर्थात ऐसा तंत्र-मंत्र जिससे नकारात्मक शक्तियों को जागृत किया जाता है। काले जादू अर्थात नकारात्मक तंत्र-मंत्र का मुख्य उद्देश किसी व्यक्ति को उस स्थान से भगाना, उसे परेशान करना या उसे अपने वश में करके उसका इस्तेमाल करना या उसे बर्बाद करना होता है। काले जादू अर्थात नकारात्मक तंत्र-मंत्र से ग्रसित व्यक्ति के कुछ साधारण लक्षण हैं जैसे मानसिक अवरोध, श्वांसों में भारीपन तथा तेज चलना, गले में खिंचाव, जांघ पर नीले रंग के निशान बिना किसी चोट के, घर में बिना किसी विशेष कारण के कलह या लड़ाई-झगड़ा, घर के किसी सदस्य की अप्राकृतिक मृत्यु, व्यवसाय में अचानक हानि का होना आदि। कुछ और लक्षण भी हैं जैसे कि हृदय में भारीपन महसूस होना, निद्रा पर्याप्त न आना, किसी की मौजूदगी का भ्रम होना, कलह आदि साधारणतया देखने में आते हैं। व्यक्ति अशांत सा रहता है तथा उसको किसी भी तरह से शांति नहीं मिलती। निराशा, कुंठा तथा उत्साह की कमी भी इसी का परिणाम है। यदि काले जादू का समय रहते उपाय न किया जाए तो यह अत्यंत विनाशकारी, भयानक तथा घातक हो सकता है जिसके परिणामस्वरूप जातक की जिंदगी तबाह तथा बर्बाद हो सकती है या फिर उसे कोई भयानक बीमारी अपने अधिन कर सकती है। काले जादू का एक लक्षण ये भी होता है की आप चीड़ चिढ़े सभाव के हो जायेगे आपका किसी के साथ भी बाते करने का मन नहीं करेगासुख का अनुभव नहीं होगा अगर आपके पास भरपूर सुख है और फिरभी आप दुखी ह आपको किसी भी प्रकार का कोई भी सुख आनंद नहीं दे सकतायदि जीवन में अचानक उथल-पुथल मच जाए तो झट से उसे जादू-टोना समझने की बजाय, प्रारंभिक तौर पर कुंडली जांच अवश्य करवाएं। कभी-कभी ग्रह दोषों के कारण भी विपरीत समय का दौर प्रारंभ हो जाता है। यदि कुंडली दोषमुक्त हो तो निम्नलिखित लक्षणों पर ध्यान दें-मित्रों इस दुनिया में अस्तित्ववान सभी वस्तुएं सकारात्मक अथवा नकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित हैं। हम ऐसे किसी तत्व की कल्पना ही नहीं कर सकते जो इनसे परे हो। अभिप्राय यह है कि जादू-टोना भी नकारात्मक ऊर्जा का ही उत्सर्जन ही है, जो सायास दूसरों के अहित की कामना से किये जाते हैं। हम सभी जानते हैं, टोने-टोटके अपनी भलाई के साथ-साथ दूसरों का अहित करने के लिए भी किया जा सकता है। यद्यपि तंत्र शास्त्र में वर्णित समस्त अभिक्रियाएं आध्यात्मिक उत्कर्ष प्राप्त करने के निमित्त से ही प्रथम बार की गई होंगी। तथापि, गलत हाथों में पड़ जाने के कारण इनके घातक परिणाम सामने आने लगे। उसी प्रकार तंत्र विद्या में मार और सम्हाल दोनो उपलब्ध है। अर्थात इसमें तांत्रिक क्रियाओं से बचाव हेतु उसका काट भी मौजूद है। यदि आपको लगता है की किसी ने आपके ऊपर कला जादू का प्रयोग किया है तो फिकर मत करे कोई भी साधक यहाँ पर काला जादू करने वाले की पहचान और उसकी काट/तोड़ का समाधान प्राप्त कर सकता है| काला जादू खत्म करने हटाने तथा टोन टोटके से बचने का हर प्रकार समाधान है यहां पर| किसी भी काली परछाई और बुरी आत्माओ को भागने की सिद्धि का प्रयोग कर किसी भी तरह की समस्याओ का समाधान प्राप्त किया जा सकता है| काला जादू का प्रयोग प्रेम और दुश्मन दोनों के लिए कर सकते है| यदि किसी भी काला जादू समस्या का समाधान चाहते है तो अवश्य सलाह लेवे और उचित मार्गदर्सन प्राप्त कर सकते है
रविवार, 13 अगस्त 2017
आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक उपायों व लाल किताब के द्वारा समाधान प्राप्त करें, आप ऐहमें अपना जन्म की तारीख , समय और जन्म स्थान , के साथ हमारी फीस हमारे bank ac pnb babk 0684000100192356 ifc punb 0068400 मे जमा करानी होगी email maakaali46@gmail.com, Mo. 09414481324. 07597718725 paytm no 07597718725 मित्रों बाद बात करते हैं तो रोगों के बारे में प्राचीन काल में जीवन जीने के भौतिक सुख के साधन कम थे तब रोग व बीमारियां भी कम हुआ करती थीं। जैसे-जैसे मनुष्य ने उन्नति की, भौतिक सुख-सुविधाओं की वस्तुओं में भी वृद्धि हुई, जिससे व्यक्ति आरामदायक जीवन बिताने लगा। इसके परिणामस्वरूप मेहनत कम होने से कई बीमारियों जैसे- मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग, नेत्र रोग, कैंसर, अस्थमा आदि ने जन्म लिया। फिल्मी भाषाओं व माॅडलिंग, फैशन एवं बढ़ती भौतिक चीजों के कारण व्यक्ति की मानसिकता उŸोजित होने लगी जिससे कामुकता बढ़ने लगी परिणामस्वरूप यौन-अपराध बढ़ने लगे, जिससे यौन-रोगों में वृद्धि हुई। ये सभी आधुनिक युग के रोग कहलाते हैं अर्थात् प्राचीनकाल में ये रोग नहीं थे। चाहे आज विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली हैं।। सूक्ष्म से सूक्ष्म रोग को मशीन द्वारा पहचान लिया जाता हैं। परंतु फिर भी कई रोग एंव लक्षण आज भी रहस्य बने हुये हैं।। ज्योतिष शास्त्र द्वारा समस्त रोग पूर्व से ही जाने समझे जा सकते हैं, तथा उनका निदान किया जा सकता हैं।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लग्न कुण्डली के प्रथम भाव के नाम आत्मा, शरीर, होरा, देह, कल्प, मूर्ति, अंग, उदय, केन्द्र, कण्टक और चतुष्टय है। इस भाव से रूप, जातिजा आयु, सुख-दुख, विवेक, शील, स्वभाव आदि बातों का अध्ययन किया जाता है। लग्न भाव में मिथुन, कन्या, तुला व कुम्भ राशियाँ बलवान मानी जाती हैं।ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है। नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं। वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है-पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते अत: पाप जितना कम करेंगे, रोग उतने ही कम होंगे। अग्नि, पृथ्वी, जल, आकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है। यही पांच तत्व 360 की राशियों का समूह है। इन्हीं में मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व, वृष, कन्या और मकर पृथ्वी तत्व, मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तक, वृष का मुख, मिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट), कन्या का कमर, तुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है। इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर, धन, भाई, माता, पुत्र, ऋण-रोग, पत्नी, आयु, धर्म, कर्म, आय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती है, उसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।मनुष्य का जन्म ग्रहों की शक्ति के मिश्रण से होता है. यदि यह मिश्रण उचित मात्रा में न हो अर्थात किसी तत्व की न्यूनाधिकता हो तो ही शरीर में विभिन्न प्रकार के रोगों का जन्म होता है. शरीर के समस्त अव्यवों,क्रियाकलापों का संचालन करने वाले सूर्यादि यही नवग्रह हैं तो जब भी शरीर में किसी ग्रह प्रदत तत्व की कमी या अधिकता हो, तो व्यक्ति को किसी रोग-व्याधि का सामना करना पडता है. कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। जैसे आज कल सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हैं तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता। अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय, पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है। चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर, मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगत, शनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को माहवारी की समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है। चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं। योग-रत्नाकर में कहा है कि- औषधं मंगलं मंत्रो, हयन्याश्च विविधा: क्रिया। यस्यायुस्तस्य सिध्यन्ति न सिध्यन्ति गतायुषि।। अर्थात औषध, अनुष्ठान, मंत्र यंत्र तंत्रादि उसी रोगी के लिये सिद्ध होते हैं जिसकी आयु शेष होती है। जिसकी आयु शेष नहीं है; उसके लिए इन क्रियाओं से कोई सफलता की आशा नहीं की जा सकती। यद्यपि रोगी तथा रोग को देख-परखकर रोग की साध्या-साध्यता तथा आसन्न मृत्यु आदि के ज्ञान हेतु चरस संहिता, सुश्रुत संहिता, भेल संहिता, अष्टांग संग्रह, अष्टांग हृदय, चक्रदत्त, शारंगधर, भाव प्रकाश, माधव निदान, योगरत्नाकर तथा कश्यपसंहिता आदि आयुर्वेदीय ग्रन्थों में अनेक सूत्र दिये गए हैं परन्तु रोगी या किसी भी व्यक्ति की आयु का निर्णय यथार्थ रूप में बिना ज्योतिष की सहायता के संभव नहीं है।
गुरुवार, 10 अगस्त 2017
 आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वादिक उपायों के द्वारा समाधान प्राप्त करें, आप हमें अपना जन्म की तारीख , समय और जन्म स्थान , के साथ हमारी फीस हमारे bank ac pnb babk 0684000100192356 ifc punb 0068400 मे जमा करानी होगी email maakaali46@gmail.com, Mo. 09414481324. 07597718725 paytm no 07597718725 [ ज्योतिष विज्ञान नहीं सुपरै विज्ञानं है!! जीवन में मनुष्य जन्म लेते ही ज्योतिष शास्त्र से जुड़ जाता है। कुछ व्यक्ति ज्योतिष को कला शास्त्र और कुछ विज्ञान की संज्ञा देते हैं। वास्तव में ज्योतिष विज्ञान नहीं, अपितु सुपर विज्ञान है। आज सब देख रहे है की समाज में ज्योतिष की लोकप्रियता बढती जा रही है, मांग और पूर्ति का भी एक सिधांत है की जब किसी चीज की मांग ज्यादा बढ़ जाती है तो वहां कुछ न कुछ गलत होने लगता है इसी प्रकार आज जब ज्योतिष का प्रचार - प्रसार तथा लोकप्रियता बढ़ रही है तो कुछ लोग धन के लोभवश ज्योतिष के अधकचरे ज्ञान का उपयोग कर स्वयं तो अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं पर ज्योतिष जो वैदिकप्रामाणिक विज्ञान और सशक्त शास्त्र है। समूची ज्योतिष विद्या पर प्रश्न चिन्ह भारतीय संस्कृति पर प्रश्नचिन्ह है, .... नारद, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, पराशर, गर्गाचार्य, लोमश ऋषि, निबंकाचार्य, पृथुयश, कल्याण वर्मा, लल्लाचार्य, भास्कराचार्य (प्रथम), ब्रह्मगुप्त, श्रीधराचार्य, मुंजाल यह सिर्फ नाम नहीं है ज्योतिष शास्त्र में इनका अपना गौरवमयी यशस्वी योगदान रहा है। ज्योतिष ऋषियों तथा वेदों का अमूल्य ज्ञान है उसकी लोकप्रियता तथा विश्वसनीयता को छति हो रही है ! आज समाज में यह देखने को मिलता है की वैज्ञानिक तथा अन्य नास्तिक लोग देश के विख्यात ज्योतिषियों से टीवी के प्रोग्रामो में चुनौती देते हैं की वह ज्योतिष की विश्वसनीयता सिद्ध करें टीवी प्रोग्राम में पुरे जनमानस के सामने ज्योतिषी यह सिद्ध नहीं कर पाते की ज्योतिष विज्ञानं है क्यों कारण सिर्फ इतना सा है की उनके ज्ञान पर भौतिकता और लालच का पर्दा पड़ा है ! ज्योतिष धन उपार्जन का साधन हो सकती है पर ज्योतिष साधना का विषय है और साधना वातानुकूलित कमरों में रहकर नहीं हो सकती टीवी पर प्रोग्राम देखकर इन ज्योतिषियों को तो शरम नहीं आइ होगी पर प्रोग्राम देखकरमुझ जैसे या जो भी ज्योतिष प्रेमी हैं उनको जरुर दर्द होता होगा ,होना भी चाहिए , इस जगत में कोई भी विज्ञानं पूर्ण नहीं है पूर्ण सिर्फ परमात्मा है जिस तरह से मीडिया ज्योतिष को अंधविश्वास बताने पर तूला है लगता ही नहीं है कि यही वह मीडिया है जो नास्त्रेदेमस पर 6-6 एपिसोड चलाता है। दिन-दिन भर पंडितों को बैठा कर एस्ट्रो टिप्स बताने वाला मीडिया अचानक से स्मृति ईरानी के हाथ दिखाने भर से इसी विद्या के खिलाफ खड़ा हो जाता है। तो फिर ज्योतिष विज्ञानं की ही प्रमाणिकता क्यों मांगी जा रही है कारण ये जो भी कथाकथित ज्योतिष के विद्वान हैं सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में राशिफल , भविष्यवानियाँ टीवी , पत्रिकाओं, अखबारों आदि में करते है जिन्हें हल्दी का रंग मालूम नहीं है पंसारी बने धूम रहे है दस्तखत करना आता नहीं कलक्टर बनाने का फार्म भर रहे हैं ! अरे भाई एक राशी के करोडो लोग हैं आप एक लाठी से सभी को हांके जा रहे हो ..मुर्खता करना अब भी बंद कर दो अपना नहीं तो कम से कम जिस ज्योतिष से तुम्हारी रोटी चल रही है उसकी ही खातिर सही . अरे भाई फल खाओ तो खाओ वृक्ष पर तो तरस खाओ प्यारे ! अब रही बात ज्योतिष की तो भई एक अस्पताल में एक ही मर्ज के पाँच मरीज भर्ती हुए एक ही कमरे में भर्ती किये गए एक ही डाक्टर इलाज करता है परिणाम ... एक मरीज दो दिन में , दूसरा तीन दिन में , चौथा चार दिन में ठीक हो जाते है पांचवा ठीक नहीं होता ओपरेशन करना पड़ता है फिर भी मर जाता है तो क्या अस्पताल की विश्वसनीयता पर या डाक्टर की विश्वसनीयता पर या दवाइयों की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाना चाहिए .. नहीं .. बिलकुल नहीं ,, प्रत्येक मरीज की अपनी रोग प्रतिकारक शक्तियां है जो की भिन्न भिन्न हैं ठीक उसी तरह ज्योतिष विद्या भी है जो की भिन्न भिन्न जातको की भिन्न भिन्न समस्याओं का इलाज़ ज्योतिष्य तरीके से करती है लेकिन किसी भी जातक के प्रारब्ध दुसरे जातक जैसे नहीं हो सकते और इसी विशेष कारण उसकी समस्या के निदान में समय लगना या कई बात लाइलाज भी रह जाना स्वाभाविक है ! यही कारण से ज्् ज्योतिष सवालों के कटघरे में खड़ा है!जब राजनीति विज्ञान हो सकता है, समाज विज्ञान हो सकता है मन का भी मनोविज्ञान हो सकता है तो ज्योतिष विज्ञान क्यों नहीं हो सकता? मैं स्मृति ईरानी का ज्योतिषी के पास जाना वैसा ही मानता हूं जैसे कोई डॉक्टर के पास जाता है। हर युग में हर किसी किसी के अपने ज्योतिषी और आचार्य रहे हैं। राजा-महाराजाओं के काल में भी, विदेशों में भी और भारत में भी। रेगन, बुश,क्लिंटन से लेकर हर दौर के मंत्री और नेताओं के ज्योतिषी थे और हैं। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, प्रधानमंत्री पं. नेहरू, डॉ. राधाकृष्णन से लेकर सभी बड़े राजनेता, क्रांतिकारी और समाजसेवी ज्योतिषाचार्य जी के पास आते रहे हैं। भारत की आजादी का मुहूर्त भी उन्हीं से पूछकर निकाला गया था। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति बिग बैंग से हुई या यह शुरू से ही ऐसा था, प्रकाश से तेज रफ्तार में क्या होता है, ब्लैक होल क्या है, हीरे की बाहरी संरचना में तीन-तीन फ्री कार्बन क्यों नहीं होते और अगर होते हैं तो वह अक्रिय कैसे होता है। सैकड़ों सवाल है जो अनुत्तरित हैं। फिर भी पश्चिम द्वारा थोपे गए विज्ञान को सिर पर बैठाया जाता है और हमारे ऋषियों द्वारा अर्जित ज्ञान को नीचा दिखाया जाता है। मेरी समझ में तो यह गुलामी की मानसिकता से अधिक और कुछ नहीं है। मैं निजी तौर पर योग सिखाने वाले बाबा रामदेव का फैन हूं। इसका कारण यह नहीं है कि वे अपनी योग कक्षाओं में बैठने की फीस लेते हैं बल्कि इसके बावजूद उन्होंने सहज योगासनों और सामान्य प्राणायामों से लोगों को सक्रिय कर दिया है। आज स्थिति यह है कि किसी चिकित्सक को जब यह कहा जाता है कि इस बीमारी का हल तो बाबा रामदेव ने इस योग में बताया है तो चिकित्सक मारने को दौड़ता है। पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव है कि चिकित्सक यह मानने को तैयार नहीं होता कि सांस लेने से भी कोई ठीक हो सकता है। श्वास के साथ जुड़े प्राण को अंग्रेजों ने नकारा तो भारतीयों ने भी नकार दिया। अब विदेशी लोग योग करते हैं और ग्लेज पेपर वाली मैग्जीन्स में भारतीय उनके फोटो देखते हैं।वापस विषय पर आता हूं ,इतिहास के संदर्भ में ही देखें तो प्रयोग, प्रेक्षण और परिणाम की कसौटी पर इतिहास के किसी तथ्य को नहीं रखा जा सकता। जैसी दुनिया आज है वैसी दस साल पहले नहीं थी और जैसी दस साल पहले थी वैसी सौ साल पहले नहीं थी। तो कैसे तो प्रयोग होगा, किस पर प्रेक्षण किया जाएगा और आने वाले परिणामों को किस कसौटी पर जांचा जाएगा। मेरा मानना है कि ज्योतिष के साथ भी कुछ ऐसा ही है। पूर्व में ग्रहों और राशियों की स्थिति की पुनरावृत्ति के साथ घटनाओं का तारतम्य देखकर उसके सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर योगों का निर्माण किया गया होगा। सालों, दशकों या शताब्दियों के निरन्तर प्रयास से योगों को स्थापित किया गया और आज के संदर्भ में इन योगों का इस्तेमाल भविष्य में झांकने के लिए किया जाता है। अब जो लैण्डमार्क पीछे से आ रहे रास्ते को दिखा रहे हैं उनसे आगे का रास्ता बता पाना न तो गणित के सामर्थ्य की बात है और न कल्पना के। ऐसे में ज्योतिषी के अवचेतन को उतरना पड़ता है। जैसा कि मौसम विभाग के सुपर कम्प्यूटर करते हैं। अब तक हुई भूगर्भीय गतिविधियों को लेकर आगामी दिनों में होने वाली घटनाओं की व्याख्या करने का प्रयास। इसके साथ ही बदलावों को तेजी से समझना और उन्हें आज के परिपेक्ष्य में ढालना भी एक अलग चुनौती होती है। पचास साल पहले कोई ज्योतिषी यह कह सकता था कि अमुक घटना हुई है या नहीं इसकी सूचना आपको एक सप्ताह के भीतर मिल जाएगी वहीं अब मोबाइल और इंटरनेट ने सूचनाओं के प्रवाह को इतना प्रबल बना दिया है कि घटना और सूचना में महज सैकण्डों का अन्तर होता है। अब देखें कि इससे क्या फर्क पड़ा। सबसे बड़ा फर्क पड़ा बुध के प्रभाव के बढ़ने का। दूसरा फर्क मोबाइल और इंटरनेट के इस्तेमाल के दौरान व्यक्ति पर आ रही किरणों के असर का। इसे बुध राहू के रूप में लेंगे या शनि चंद्रमा के रूप में, ये निर्णय होने से अभी बाकी है। ऐसे में कोई ज्योतिषी करीब-करीब सही फलादेश कर देता है तो उसे और उसके अवचेतन को धन्यवाद देना चाहिए् रही वात ज्योतिष की विज्ञान और ज्योतिष के सर्वमान्य सिद्धांत के अनुसार कोई भी ग्रह हमेशा किसी के ऊपर नहीं रहता बल्कि अपनी चाल के अनुसार अलग अलग राशियों में जाता रहता है| जब एक निश्चित समयानुसार ग्रहों की स्थिति बदलती रहती है आकाश में मौजूद 9 ग्रह अपनी अपनी गति से चलते है और गणित के अनुसार एक खास समय पर अलग अलग राशियों में प्रवेश करते हैं| एक खास समय तक उस राशि में रहते हैं और फिर अगली राशि में चले जाते हैं| अलग अलग राशि में उनके अलग अलग प्रभाव होते हैं| कैसे आइए जानते हैं : आचार्य लोंगों ने आकाश को समझने के लिए इसे 12 भागों में बाँट दिया| हर भाग को एक नाम दे दिया जिसे हम राशियों के नाम से जानते हैं| इस प्रकार हम आकाश के 12 भागों को 12 राशियों के नाम से जानते हैं| पूरा सौर मंडल इन्हीं 12 राशियों के अंदर आता है| सूर्य इन्हीं 12 भागों से होकर गुज़रता है| और जब कोई भी ग्रह किसी भी राशि में आता है तो उस पर सूर्य और अन्य ग्रहों की प्रकाश किरणें पड़ने लगती हैं| और ये प्रकाश किरणें प्रकाश के प्रत्यावर्तन सिद्धांतों के अनुसार विभिन्न कोणों से विभिन्न ग्रहों से टकराकर धरती मंडल में प्रवेश करती हैं और उस समय ये प्रकाश किरणें जिस राशि में से होकर धरती मंडल पर आती हैं उस राशि में जन्म पाने वाले लोगों के शरीर में मौजूद लाल रक्त कण उस राशि में प्रवेश कर रहीं राशिष्ठ किरणों को अपने में अवशोषित कर लेती है| और वह प्राणी उस ग्रह के कास्मिक किरणों के प्रभाव में आ जाता है| हर आदमी के शरीर में 12 तरह की किरणें होती हैं| अब अगर किसी के शरीर में 10 पॉइंट किसी खास ग्रह की ज़रूरत है और उसमें 8 पॉइंट ही हैं तो उसे 2 पॉइंट और चाहिए| अब अगर वह 4 पॉइंटस और ले लेगा तो 2 पायंट्स जो ज़्यादा हो जाएगा वह उसे नुकसान ही पहुँचाएगा न कि फायदा| इसी को लोग कहते हैं कि ग्रह दशा खराब हो गई है| अब हमें उपाय करने चाहिए जिससे कि ये 2 पायंट्स समाप्त हो जाएँ| कितने पायंट्स किरणों की ज़रूरत किसे है उसमें कितने पायंट्स उसमें हैं उसे और कितने पायंट्स और चाहिए इसकी जाँच ज्योतिष् और विज्ञान दोनों में है शेष अगले पोस्ट में:
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https://youtu.be/I6Yabw27fJ0 मंगल और राहूजब राहु और मंगल एक ही भाव में युति बनाते हैं, तो वह मंगल राहु अंगारक योग कहलाता है। मंगल ऊर्जा का स...
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आचार्य राजेश ईस बार मलमास 15 दिसंबर से आरंभ हो रहा है जो 14 जनवरी 2018तक रहेगा। मलमास के चलते दिसंबर के महीने में अब केवल 5 दिन और विवाह मुह...
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मित्रों आज वात करते हैं फिरोजा रतन की ग्रहों के प्रभाव को वल देने के लिए या फिर उन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए ज्योतिष विज्ञान द्वारा विभि...



