बुधवार, 14 दिसंबर 2016

अक्षरों से मिलकर शब्द बनते हैं शब्दों से मिलकर वाक्य। वाक्यों से मिलकर अहसास पुरे होते हैं और अहसासों से मिलकर जज्बात। जज्बातों से मिलकर ख़्याल बनता है और ख़्यालों से मिलकर बनती है रचना। जिन्हें हम कभी कविता कहते है तो कभी नज्म और कभी गज़ल कहकर पुकारते है तो कभी छंद कहकर। वास्तव में ये हमारी सोच और ख़्याल का ही तो प्रतिरूप है। अक्स है हमारी खुशी और ग़म का हमारे अकेलेपन और तन्हाईयों का। दिल की गहराईयों में दफ्न हो चुके गुजरे हुए कल का। हमारे आस-पास घटती हर अच्छाई और बुराई का। जिन्हें हम शब्दों की चाशनी में लपेट कर कोरे कागज की थाली में परोस कर आपके सामने रख देते हैं।

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