गुरुवार, 23 अगस्त 2018

एकादश भाव खाना नं 11

जीवन के आधारभूत तत्वों में से आय और व्यय महत्वपूर्ण होता है. हम सभी यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि हमारी आमदनी कैसी होगी तथा संचय की स्थिति क्या होगी. इन सभी बातों की जानकारी क्रमश: ग्यारहवें और बारहवें घर से मिलती है. ग्यारहवां भाव आय का घर माना जाता है तो बारहवां व्यय काएकादश भाव को आय का घर कहा जाता है .

 यह घर दशम भाव में किये गये कर्मों का फल होता है. यह भाव बलवान होने पर व्यक्ति को अपने किये कर्यों का पूरा लाभ मिलता है. व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है. व्यक्ति के मन में आशा का संचार होता रहता है. जीवन की सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करना आसान होता है.आज का युग अर्थ युग कहा जाता है. इसलिए जीवन में धन की अहमियत बढ़ गयी है., इसलिए आय भाव यानी ग्यारहवें घर का महत्व भी ज्यादा हो गया है. सभी लोग यह जानना चाहते हैं कि उनकी आय कैसी होगी. इस विषय की जानकारी ग्यारहवें भाव से ही मिलती है. हमारे शरीर में ग्यारहवें भाव का स्थान कान तथा पैर की पिण्डलियों को माना जाता है.छोटे-भाई बहनों की उच्च शिक्षा (high education) व विदेश यात्रा के लिये देखा जाता है. मां की लम्बी अवधि की बीमारी के विषय में इस स्थान से विचार किया जाता है क्योंकि एकादश भाव माता के स्थान यानी चतुर्थ भाव से आठवां घर होता है . माता के साथ होने वाली किसी प्रकार की दुर्घटना के विषय में भी इस घर से विचार किया जाता है. पिता की कम दूरी की यात्रा का संबन्ध भी इस भाव से होता है. वाहन को बदलने का विचार हो तो उस स्थिति में भी एकादश भाव का आंकलन किया जाता है. संतान की सफलता के विषय में जानने के लिए इस भाव को देख सकते हैं.बारहवें स्थान से बारहवां होने के कारण व्ययों में कमी के लिए भी देखा जाता है. बारहवें स्थान को अस्पताल का घर कहते है. मृत्युशैय्या के लिये बारहवें घर को देखा जाता है. परन्तु एकादश भाव से रोग से मुक्ति का विचार किया जाता है. कोई वस्तु खो गई हो अथवा कोई व्यक्ति घर छोड़कर चला गया हो तो इस विषय में सम्बन्धित बातों को जानने के लिए ग्यारहवें घर को देखा जाता है. बारहवां स्थान दु:ख का स्थान होता. इस भाव से मिलने वाले सभी विषयों में ग्यारहवां घर कमी लाता है.घर के बरामदे या टेरिस में स्थान दिया गया है. आय भाव के बाधित होने पर घर के बरामदे में रखी वस्तुओं में दिशा दोष आने की संभावना रहती है.एकादश भाव दशम स्थान(कर्म) से द्वितीय है| अतः कर्मों से प्राप्त होने वाले लाभ या आय एकादश भाव से देखे जाते हैं| मनुष्य को प्राप्त होने वाली प्राप्तियों के संबंध में एकादश भाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाव है| ये निज प्रयास या निजकर्मों द्वारा अर्जित व्यक्ति की उपलब्धियों की सूचना देता है फारसी में इस भाव को याप्ति खाने कहते हैं| यह भाव एक उपचय स्थान भी है| इस भाव की दिशा आग्नेय(South-East) है|द्वितीय भाव के साथ-साथ एकादश स्थान का भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति से घनिष्ठ संबंध है। जब भी किसी जन्मकुंडली में द्वितीय भाव के साथ-साथ एकादश भाव मजबूत स्थिति में होता है तो व्यक्ति धनवान, यशस्वी तथा अनेक प्रकार की भौतिक सुख- सुविधाओं को भोगने वाला होता है।पाप अकेला असर अकेला, तीन पांच नौ ग्यारह; शनि बली का साथ मिले तो, असर बढ़े गुणा ग्यारह।’’ कुण्डली के खाना नम्बर 11 को लाल किताब में गुरू अस्थान (जाये इन्साफ) इंसाफ की जगह या इन्सानी किस्मत की बुनियाद कहा गया है। इन्सान का जाती हाल (आमदन-कमाई-जन्म वक्त) या टेवे वाले का कुल दुनिया से ताल्लुक और सब की इकट्ठी (मुश्तर्का) किस्मत का मैदान हर शख्स अपने साथ लिए हुये है।

बुधवार, 22 अगस्त 2018

जातक ओर देवज्ञ

, एक ज्‍योतिषी के रूप में जब मैं तुम्‍हारे सामने आता हूं तब दैहिक दृष्टिकोण से यह हमारी पहली ही मुलाकात होती है। तुम्‍हें ऐसा लगता होगा कि तुम मुझसे पहली बार मिल रहे हो। मुझे भी कमोबेश पहली मुलाकात में ऐसा ही लगता है। 

हकीकत इससे कुछ जुदा होती है हमारे मिलने से कई क्षणों, मिनटों, घंटों, दिनों, हफ्तों, महीनों या कभी कभार सालों पहले तुमसे मिलने की तैयारी शुरू हो चुकी होती है। तुम्‍हारे साथ बिताए पल कुछ इस तरह होते हैं कि तुम मेरे चेहरे और कुण्‍डली के निर्जीव से खानों पर नजर गड़ाए देखते रहते हो और मैं समय के विस्‍तार में खो जाता हूं। जहां सितारों के संकेत पूरी शिद्दत से तुम्‍हारी कहानी कह रहे होते हैं। समय के फलक पर उन क्षणों में मैं तुम्‍हारे साथ विचरण करता हूं। हां, मैं यह दावा करता हूं कि भूत, वर्तमान और भविष्‍य के बीच समय ने जो पर्दा डाल रखा है, मैं उसके पार देखने जुर्रत करता हूं। मेरे गुरुओं ने मुझे सिखाया कि संकेतों को समझो और खुद को इतना पारदर्शी बनाओ कि जो जातक अपनी समस्‍याएं लेकर आए वह चाहे तो भी तुमसे अपने अतीत को छिपा न सके, ताकि तुम जातक की वर्तमान सुदशा या दुर्दशा का सही आकलन कर सको। हां, मैंने अभ्‍यास किया है, समय के पार झांकने का। मुझे खुद नहीं पता कि संकेत कहां से और कितनी मात्रा में आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो इतने स्‍पष्‍ट होते हैं कि मैं खुद आश्‍चर्यचकित रह जाता हूं। मैं उन्‍हें देखकर बोलता हूं और जातक को लगता है जैसे मैं कहीं नेपथ्‍य में लिखे उसके भूतकाल को पढ़कर सुना रहा हूं। संकेतों का विश्‍लेषण और जातक के जीवन की घटनाओं का तारतम्‍य इतना रोचक होता है कि मैं खुद भी मुग्‍ध हो जाता हूं और तुम्‍हें तो मैं आश्‍चर्यचकित होता हुआ देखता हूं।

ज्योतिष के उपाय पर कुछ जानकारी

 मित्रो उपाय के बारे में कुछ जानकारी। NOTE :---कृपया पूरा लेख पढ़ें तभी पता चलेगा की उपाय क्यों और कैसे करने चाहिए मित्रों वोहोत से लोग जो कुडली दिखने आते है वो कहते है

 की किसी के कहने पर हम ने यह उपाय किया और हमारा नुकसान हो गया या टीवी पर कोई प्रोग्राम देख क्र हमने यह उपाय किया और हमारा नुकसान हो गया किसी ने कहा की मेरे मकान का कुछ हिंसा गिर गया और पंडित जी टीवी में बता रहे थे की अगर मकान गिर जाए तो शनि खराब होता है और उन्होंने जो उपाय बताया था हम ने किया और हमारे घर चोरी हो गई या कोई कहता है की हमारा बच्चा बीमार हो गया और तो और कई वार हमसे भी लोग सीधा फोन क्र के कहते है की हमारी गाड़ी खराब हो गई है क्या हम शनि को तेल चढ़ा सकते है या हम नीलम पहन ले आज कल कुछ लोग तो टीवी देख क्र ही खुद ज्योतिषी बन बैठे है दोस्तों टीवी पर जो पंडित जी प्रोग्राम देते है वो गलत नहीं है उन पंडित जी के उपाय भी गलत नहीं है वहां पर गलती आप लोग करते हो आप ने प्रोग्राम देखा और कुछ भी उसके साथ आपका मैच हो गया तो आप फौरन बताए गए उपाय क्र देते हो दोस्तों एक बात आप को बता रहा हूँ की कभी भी कोई दिक्कत परेशानी हो तो बगैर कुंडली दिखाए कभी कोई भी उपाय न करें क्यों की अगर आपकी गाडी खराब हो जाये तो आप कहोगे की मेरा शनि खराब हो गया मैं शनि की चीजे दान क्र दू तो यह गलत होगा अगर आपका शनि योगकारी है और अपने शनि का दान क्र दिया तो उल्टा नुकसान ही होगा इसी तरह किसी की शादी न हो तो लोग कहते है की जा भाई तेरा शुक्र खराब है जा शुक्र का उपाय क्र ले अगर शादी नहीं हो रही तो क्या कोई और वजह नहीं हो सकती हो सकता है कुंडली में कोई दोष हो उसका उपाय होगा न की शुक्र का आज कल लोग अपना काम खुद खराब करते है टीवी और अखवार की वजह से जो उसमे बताया उसी के हिसाब से उपाय क्र लिया नुकसान हुआ तो दोष टीवी या अखवार वालों का निकालेंगे भाई सबसे पहले अपनी कुंडली किसी अच्छे जानकारी वाले ज्योतिषी से दिखाएँ और उन्हें पूछे की मैं कोण कोण सी चीज दान क्र सकता हूँ कोण से रत्न पहन सकता हूँ ऐसी कोई चीज जो की आपके लिए दान करना मना हो वो भी जरूर पूछे तो देखिये की आपकी जिंदगी कैसे चलती है आज कल खास क्र शनि देव के वारे में लोग बहुत ही नेगेटिव सोचते है पता लगा की शनि का ढैया या साढ़ेसाती शुरू हुई तो शुरू क्र देंगे रोज़ रोज़ उपाय कभी तेल कभी तिल कभी काले उड़द कभी छाता काला कपडा लोहा तवा अंगीठी चिमटा पता नहीं क्या क्या चीज़े दान क्र देते है और नुकसान पे नुकसान होता जाता है और जब ज्योतिषी से कुंडली चेक करवाते है तब जाकर पता चलता है की हमारा तो शनि उच्च का था या हमारा शनि योगकारी था हमे तो दान करना ही नहीं था तब जाकर होश ठिकाने आते है की साढ़ेसाती तो आपको कुछ देने आई थी अपने उल्टा अपना नुकसान करवा लिया बहुत से लोग हमे भी गलत कह देते है क्योंकि जब हम किसी योग या दोष की जानकारी फेसबुक के माध्यम से पहुचाते है तो उस योग या दोष के कुछ साधारण से उपाए भी दिए होते है कई लोग अपनी कुंडली देखते है और देखा की यह दोष तो मेरी कुंडली में है मैं यह उपाय कर देता हूँ बहुत से लोगों को उस उपाय से फायदा होता है पर कुछेक लोगों को नुकसान भी उठाना पड़ता है फायदे वाले लोग तो बहुत कम बताते है पर जिनका कोई नुकसान होता है वह तुरंत फोन घुमा देता है पंडित जी को और लग जाता है शिकवे शिकायतें करने। उससे हमे गुस्सा नहीं आता हम उस जातक से उसकी डिटेल मांगते है और उस की कुंडली अच्छी तरह देखते है तो कारण मिल जाता है और हमारी शोध होती है कारण यह होता है की जो दोष उसकी कुंडली में है उसका उपाय तो वो करता नहीं है जैसे राहु आज कल सिंह राशि में है और जातक का लगन मेष कर्क सिंह बृश्चिक धनु या मीन हुआ और उस आदमी ने गलती से राहु का उपाय तो किया नहीं उल्टा पीली चीजों का दान कर दिया तो सोचो की उसका क्या होगा दोस्तों कोई भी लेख हम लिखते है किसी भी दोष या योग का तो सबसे पहले उस दोष का निवारण अवश्य करवाएं उसके बाद अपने ज्योतिषी की सलाह पर ही कोई दान या रत्न पहने बहुत से दोस्तों का सवाल होता है की हमारी कुंडली में तो इतने अच्छे अच्छे योग है फिर भी हमें तरक्की नहीं मिलती तो दोस्तों मैं आपको आज एक बात कह रहा हूँ की योग जितने मर्ज़ी अच्छे हो पर सभी कुंडलियों में वह अच्छे फल नहीं देते क्यों की एक तो हम यह नहीं देखते की वो योग किस घर में है या ओर योग पर किसी दुश्मन ग्रेह की दृस्टि तो नहीं है या किसी भयंकर दोष की दृष्टि तो नहीं है या वो योग पाप कर्त्री या कालसर्पदोष में तो नहीं है अगर सब कुछ ठीक होते हुए भी उसका फल नहीं मिल रहा तो अपनी जिंदगी की तरफ झांको की तुमने कौन कौन से पाप किये है या जो कर्म तुम कर रहे हो क्या वो ठीक है तो आपको आपकी सफलता के वरे में बहुत जल्द पता चल जायेगा दूसरा रही बात दोष या योग के उपाय की तो सही में वो उपाय वही करवा सकता है जिसने आपको उस दोष के बारे में बताया है। कुछ लोग जो अपनी कुंडली दिखने आते है अगर उनको किसी दोष क्र बारे में बताओ तो वो कहता है की हां पंडित जी मुझे पता है मैंने इसका उपाय 5 साल पहले करवा दिया था अब बस आप मुझे कोई उपाय बता दो जिससे काम हो जाये मुझे कोई रत्न बता दो। अरे भाई यही कुछ पूछना है तो उसी के पास जाओ जिससे उपाय करवाया हमे क्या पता की उसने क्या करवाया क्या नहीं इसको एक उदाहरण से समझाता हूँ।---------मान लो किसी को कोई भयानक रोग हो गया (यह जो कुंडली में दोष होते है वह भी भयानक रोग की तरह ही होते है )और वह हॉस्पिटल या डॉकटर के पास जाता है तो डॉकटर उसको टेस्ट लिख कर देता है वो आदमी टेस्ट करवाके दोबारा डॉकटर को मिलता है और टेस्ट दिखाता है डॉक्टर उसको दवाई लिख देता है और अपनी फ़ीस ले लेता है डॉक्टर उसे यह टेस्ट हर साल करवाने को कहता है और साथ में कुछ दवाई के बारे में बताता है की इसको चार पांच साल तक लेना है कुछ दिन दवाई लेने के बाद आदमी ठीक हो जाता है। और डॉक्टर की बताई बात को भुला देता है की हर साल टेस्टों पर कोण पैसा खर्च करें . 2 -3 साल जिंदगी अच्छी निकली और फिर से वो ही दिक्कत शुरू हो गई तो व्यक्ति फिर से उसी डॉक्टर के पास जाता है डॉक्टर फिर से उसे टेस्ट करवाने को कहता है और अपनी फ़ीस ले लेता है। व्यक्ति घर आकर सोचता है और वीवी बच्चों से सलाह करता है की इसी डॉक्टर से 3 साल पहले इलाज करवाया और टेस्ट करवाए आज फिर पहले से भी ज्यादा टेस्ट लिख दिए क्यों न किसी दुसरे सस्ते डॉक्टर की सलाह ली जाये इसकी तो फ़ीस भी बहुत है टेस्टों का खर्च भी बहुत है । वो व्यक्ति किसी दुसरे झोला छाप डॉक्टर के पास चला जाता है और बीमारी बताता है डॉक्टर ने खूब अच्छी तरह कभी आगे से कभी पीछे से कभी गला कभी नब्ज़ कभी लेटाकर कभी बैठाकर उसको चैक किया और उसको 10-12 रूपये की जेनेरिक दवाई दी और उससे 150 रुपये ले लिए। व्यक्ति बहुत खुश हुआ और घर आ कर सभी को बताया की इसने तो टोटल डेढ़ सौ रूपये लिए और आधा घंटा लगाया चेक करने को पहले वाले की तो फीस ही 300 थी दो मिनट चैक किया और 500 के टेस्ट लिख दिए और दवाई स्टोर से मिली 350 की। व्यक्ति एक दिन दवाई खाता है और सुबह तक ज्यादा बीमार हो जाता है सुबह उठते ही बच्चे आनन फानन में उसे किसी और अच्छे डॉक्टर के पास ले जाते है और होता क्या है की वहां पर भी सबसे पहले टेस्ट करवाने को ही बोल गया क्यों की जो टेस्ट तीन साल पहले हुए थे उसके हिसाब से दवाई खाई और वह ठीक हो गया और तीन साल बाद जब दोबारा बीमार हुआ तो डॉक्टर ने फिर से टेस्ट करवाने ही है और उसी के हिसाब से दवाई देनी है अगर वह वयक्ति हर साल बाद टेस्ट करवाता रहता तो आज वो ज्यादा बीमार न होता एक बार ठीक होने पर वह लापरवाह हो गया था इसी वजह से आज उसे ज्यादा दिक्कत आई है। दोस्तों ऐसे ही उपाय काम करते है जब हमारी कुंडली में कोई भयंकर दोष होता है तो उसका समय समय पर उपाय करना होता है कई दोष ऐसे होते है जिनका उपाय हम रूटीन में करवाते है जैसे की जातक को बता दिया जाता है की कौन कौन से रंग के कपड़े नहीं पहनने यह उस तरह है जैसे डॉक्टर रोगी को परहेज़ बताता है। वैसे ही कुछ दोष ऐसे होते है जिनका उपाय हर महीने करना पड़ता है और कुछ दोष ऐसे भी होते है जिनका उपाय हर साल करना पड़ता है जितनी देर उस ग्रेह की समय सीमा निकल नहीं जाती जिसके साथ वह दोष है। NOTE :--------पर किसी अच्छे ज्योतिषी से मिल कर कुंडली दिखा कर। घर बैठे बैठे टीवी ,अखवार या फेसबुक या किसी और माध्यम से जो जानकारी मिलती है वो जानकारी लेनी अच्छी बात है क्यों की अगर आपको किसी दोष की जानकारी होगी तभी तो आप ज्योतिषी से उस दोष पर चर्चा कर सकते हो। पर उसके हिसाब से उपाय किसी से पूछ कर ही करो तो फायदा मिलेगा दोस्तों डॉक्टर समय समय पर टेस्ट करवाते है और ज्योतिषी उपाय करवाते है अगर आपको पूरी जिंदगी अच्छी सफलता चाहिए तो समय रहते दोषों का उपाय बहुत जरूरी है। लाल किताब में तो साफ साफ लिखा है की अपने जन्म दिन से 10 -15 दिन पहले कुंडली अवश्य दिखाएँ क्योंकि जन्म दिन से पहले कुंडली दिखाने पर पूरे साल के जो भी बुरे ग्रेह है उनका उपाय हो जाता है। इसी तरह ही सभी उपाय काम करते है चाहे वो लाल किताब है या वैदिक है समय समय पर उपाय बहुत जरूरी है धन्यवाद

शनि का रत्न नीलम

अगर आपकी कुंडली में शनि किसी मुख्य भाव का कारक है , तो उस भाव को मजबूत करने के लिए नीलम का प्रयोग किया जाता है , नीलम रत्न को पहनने से मन में , तीव्रता आती है

 , व्यवहार बदलाव करता है जिससे वह अपने आस पास को अच्छे से समझ सकता है , शनि रिसर्च का कारक होता है , तो जब आपका मन शांत और तीव्र होता है तो आप अच्छे से शोध करने में सक्षम हो जाते है । * नीलम में aluminium oxide और chromium पाया जाता है , तो रासायनिक तौर पर आपके दिमाग को मदद करता है कुछ खोज कर निकालने में अगर आपका दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है , जो भी आप निर्णय लेते है वह गलत पे गलत है , तो नीलम रत्न मन को शांत करता है । नीलम रत्न आपकी कुशलता बढ़ाता है , जिससे आप किसी भी कार्य को गम्भीरता से करने में सक्षम होते है । जब आपको लगे कि नौकरी में दुसरे लोग आपके ऊपर कुछ ज्यादा ही हावी होते जा रहे है , आपका पड़े में मन नहीं लग रहा , जिसे कहते है कि दिमाग का saturation point आ चूका है कि अब न तो कुछ सोचने कि क्षमता है और न ही समझने कि , तो नीलम रत्न आपके लिए है । * नीलम रत्न दूर-दृष्टि देने वाला है , अगर किसी व्यक्ति को नीलम उसकी कुंडली के अनुसार अनुकूल होता है तो वह व्यक्ति बोहोत मेधावी बन सकता है । * अगर नीलम रत्न को शनीवार को ही पहने अगर निलम आनुकुल है तो सपने अच्छे आऐगे अगर आपको सूट नही है तो सपने ङरावने किस्म के आऐगे हा कोई भी रतन दो या चार दिन मे ना तो विपरीत ना रातो रात पैसा दिला सकता है यानी तो मंदा ना चंगा कर सकता है कुछ दिन पहनने से ही पता चलेगा मैने ऐक मित्र को रतन घारन करवाया दो दिन वाद उसका eऐक्सीङेन्ट हो गया उसके साथ दो ओर लोग थे जिन को काफी चोटे लगी कई रोज तक उनका ईलाज चलता रहा पर मेरे मित्र को खरोच तक नही आई गाङी की हालत देख कर लगता था कि शायद ही कोई वचा हो वो मेरे पास आया उसने मुझे घन्यावाद दिया कि आज नीलम की वजह से मे वचा हु उसकी जगह कोई ओर होता तो यहउल्टा भी सोच सकता था कि रतन की वजह से हादसा हो गया मैरा कहना है पुरे विश्वास के साथ रतन को घारन करे ओर ऐक दो दिन के अन्दर कोई निर्णय ना ले कई वार हम वहम का शिकार हो जाते है ऐसा ना करे कई वार वजय कोई ओर होती है हम समझते है कि रतन पहना ईस लिऐ हुआ है हो सकता है नुकसान ज्यादा होना हो रतन कि वजह सै कम हो गया हो जातको गोचर के गृह भी हमे प्रभावित करते है जैसे ईस समय शनी मंगल की युती ओर राहु गुरु की युती कई लोगो की लुटिया ङवो सकती है यह समय थोङाखराव चल सकता है आचार्य राजेश

परा विद्या के द्वारा क्या होता है

परालौकिक शक्तिभूत-प्रेत, पिशाच, आत्माएं जरा सोचिए एक ऐसी ताकत जो आपको ना तो नुकसान पहुंचा रही है न ही आपके लिए कोई परेशानी खड़ी कर रही है 

लेकिन फिर भी उसका दिखाई ना देना आपके लिए कितना भयामय है भूत-प्रेत, पिशाच, आत्माएं इन सब से जुड़ी बातें जितनी ज्यादा रोमांचित करती हैं उतनी ही सिहरन और भय का माहौल भी बनाती हैं. रात के समय इन आत्माओं का अगर जिक्र भी छिड़ जाए तो भी चारों तरफ डर और भय का माहौल बन जाता है. बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो इस अंधेरी दुनिया और काले साये जैसी बातों पर भरोसा नहीं करते लेकिन एक सच यह भी है कि अच्छे के साथ-साथ बुरा भी होता है. अगर हम ईश्वर पर विश्वास करते हैं तो हमें पिशाचों पर भी विश्वास करना होगा, नहीं तो सत्य से मुंह फेरने वाली बात ही होगी. आपने ऐसे बहुत से लोगों कोवो दिखाई भी देते है ओर वहुँत से लोग ईनकी पकङ मे फंस जाते है अपनी इच्छाओं और अधूरी आंकाक्षाओं को पूरा करने के लिए कुछ लोग मरने के बाद भी वापिस आते हैं. इसके अलावा अगर अपने संबंधियों या परिचितों के साथ उनका कोई सौदा बकाया रह जाता है तो भी उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती और वह उस लेन-देन को पूरा करने के लिए जीवित लोगों की दुनिया में कदम रखते हैं.अगर मरते हुऐ आदमी से कोई वायदा किया हो ओर आप उसे पुरा नही करते तो आत्मा जन्मो तक पिछा नही छोङती बिना शरीर के मृत आत्माएं अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकतीं इसीलिए उन्हें एक शरीर की आवश्यकता पड़ती है. वह किसी व्यक्ति के शरीर में वास कर अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करती हैं. यह उनकी इच्छा की गहराई और उसके पूरे होने की समय सीमा पर निर्भर करता है कि वह किसी व्यक्ति के शरीर में कितनी देर तक ठहरते हैं. यह अवधि कुछ घंटों या सालों की भी हो सकती है. कई बार तो जन्मों-जन्मों तक वह आत्मा उस शरीर का पीछा नहीं छोड़ती. ऐसा माना जाता है कि जानवर किसी आत्मा या पिशाच की उपस्थिति को सबसे पहले भांप सकता है. अगर रात के समय कोई कुत्ता बिना किसी कारण के भौंकने लगे या अचानक शांत होकर बैठ जाए तो इसका मतलब है उसने किसी पारलौकिक शक्ति का अहसास किया है.सुक्ष्मरुम मे भी आत्माऐ घुमती है झगड़े या विवाद के पश्चात किसी भूमि या इमारत का अधिग्रहण किया जाता है और इस झगड़े के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो वह जगह हॉंटेड बन जाती है. निश्चित तौर पर वहां बुरी आत्माएं अपना डेरा जमा लेती हैं. जीवित लोगों को बहुत चीजें प्यारी होती हैं. किसी को अपना मोबाइल प्यारा होता है तो कोई अपने कैमरे के बिना नहीं रह सकता. लेकिन अगर आप यह सोचते हैं कि मरने के बाद यह प्यार समाप्त हो जाता है तो आप गलत हैं. क्योंकि मरने के बाद भी चीजों के साथ यह लगाव बरकरार रहता है और जिन चीजों को मृत व्यक्ति अपने जीवन में बहुत प्यार करता था मरने के बाद भी उसे अपना ही समझता है. इसीलिए अगर कोई दूसरा व्यक्ति उस वस्तु को हाथ लगाए तो यह उन्हें बर्दाश्त नहीं होता.. भूत-प्रेत का नाम सुनते ही अचानक ही एक भयानक आकृति हमारे दिमाग में उभरने लगती है और मन में डर समाने लगता है। हमारे दैनिक जीवन में कहीं न कहीं हम भूत-प्रेत का नाम अवश्य सुनते हैं। कुछ लोग भूतों को देखने का दावा भी करते हैं जबकि कुछ इसे कोरी अफवाह मानते हैं। भूत-प्रेत से जुड़ी कई मान्यताएं व अफवाएं भी हमारे समाज में प्रचलित हैं। विभिन्न धर्म ग्रंथों में भी भूत-प्रेतों के बारे में बताया गया है। सवाल यह उठता है कि अगर वाकई में भूत-प्रेत होते हैं तो दिखाई क्यों नहीं देते या फिर कुछ ही लोगों को क्यों दिखाई देते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार जीवित मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना होता है-पृथ्वी, जल, वायु, आकाश व अग्नि। मानव शरीर में सबसे अधिक मात्रा पृथ्वी तत्व की होती है और यह तत्व ठोस होता है इसलिए मानव शरीर आसानी से दिखाई देता है। जबकि भूत-प्रेतों का शरीर में वायु तत्व की अधिकता होती है। वायु तत्व को देखना मनुष्य के लिए संभव नहीं है क्योंकि वह गैस रूप में होता है इसलिए इसे केवल आभास किया जा सकता है देखा नहीं जा सकता। यह तभी संभव है जब किसी व्यक्ति के राक्षण गण हो या फिर उसकी कुंडली में किसी प्रकार का दोष हो। मानसिक रूप से कमजोर लोगों को भी भूत-प्रेत दिखाई देते हैं जबकि अन्य लोग इन्हें नहीं देख पाते। धर्म शास्त्रों के अनुसार भूत का अर्थ है बीता हुआ समय। दूसरे अर्थों में मृत्यु के बाद और नए जन्म होने के पहले के बीच में अमिट वासनाओं के कारण मन के स्तर पर फंसे हुए जीवात्मा को ही भूत कहते हैं। जीवात्मा अपने पंच तत्वों से बने हुए शरीर को छोडऩे के बाद अंतिम संस्कार से लेकर पिंड दान आदि क्रियाएं पूर्ण होने तक जिस अवस्था में रहती है, वह प्रेत योनी कहलाती है। गरूण पुराण के अनुसार व्यक्ति की मृत्यु के बाद पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान देते हैं, इससे भी पापी प्राणी की तृप्ति नहीं होती क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस कारण भूख-प्यास से युक्त होकर प्राणी यमलोक को जाते हैं इसके बाद जो पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे मर के प्रेत रूप होते हैं और निर्जन वन में दु:खी होकर भटकते रहते हैं। प्रत्येक नकारात्मक व्यक्ति की तरह भी भूत भी अंधेरे और सुनसान स्थानों पर निवास करते हैं। खाली पड़े मकान, खंडहर, वृक्ष व कुए, बावड़ी आदि में भी भूत निवास कर सकते हैं। हमें कई बार ऐसा सुनने में आता है कि किसी व्यक्ति के ऊपर भूत-प्रेत का असर है। ऐसा सभी लोगों के साथ नहीं होता क्योंकि जिन लोगों पर भूत-प्रेत का प्रभाव होता है उनकी कुंडली में कुछ विशेष योग बनते हैं जिनके कारण उनके साथ यह समस्या होती है। साथ ही यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा नीच का हो या दोषपूर्ण स्थिति में हो तो ऐसे व्यक्ति पर भी भूत-प्रेत का असर सबसे ज्यादा होता है। प्रेत बाधा से ग्रस्त व्यक्ति की आंखें स्थिर, अधमुंदी और लाल रहती है। शरीर का तापमान सामान्य से अधिक होता है। हाथ-पैर के नाखून काले पडऩे के साथ ही ऐसे व्यक्ति की भूख, नींद या तो बहुत कम हो जाती है या बहुत अधिक। स्वभाव में क्रोध, जिद और उग्रता आ जाती है। शरीर से बदबूदार पसीना आता है। हमारे आस-पास कई ऐसी अदृश्य शक्तियां उपस्थित रहती है जिन्हें हम देख नहीं पाते। यह शक्तियां नकारात्मक भी होती है और सकारात्मक भी। सिर्फ कुछ लोग ही इन्हें देख या महसूस कर पाते हैं। राक्षस गण वाले लोगों को भी इन शक्तियों का अहसास तुरंत हो जाता है। ऐसे लोग भूत-प्रेत व आत्मा आदि शक्तियों को तुरंत ही भांप जाते हैं। राक्षस गण, यह शब्द जीवन में कई बार सुनने में आता है लेकिन कुछ ही लोग इसका मतलब जानते हैं। यह शब्द सुनते ही मन और मस्तिष्क में एक अजीब सा भय भी उत्पन्न होने लगता है और हमारा मन राक्षस गण वाले लोगों के बारे में कई कल्पनाएं भी करने लगता है। जबकि सच्चाई काफी अलग है। ज्योतिष शास्त्र के आधार पर प्रत्येक मनुष्य को तीन गणों में बांटा गया है। मनुष्य गण, देव गण व राक्षस गण। कौन सा व्यक्ति किस गण का है यह कुंडली के माध्यम से जाना जा सकता है। मनुष्य गण तथा देव गण वाले लोग सामान्य होते हैं। जबकि राक्षस गण वाले जो लोग होते हैं उनमें एक नैसर्गिक गुण होता है कि यदि उनके आस-पास कोई नकरात्मक शक्ति है तो उन्हें तुरंत इसका अहसास हो जाता है। कई बार इन लोगों को यह शक्तियां दिखाई भी देती हैं लेकिन इसी गण के प्रभाव से इनमें इतनी क्षमता भी आ जाती है कि वे इनसे जल्दी ही भयभीत नहीं होते। राक्षस गण वाले लोग साहसी भी होते हैं तथा विपरीत परिस्थिति में भी घबराते नहीं हैं।हा साघना सिद्दी करने वाले लोग भी ईनको देख सकते या ईन से वात कर सकते है मैने देखा है मन्दिर या कोई घर्म स्थानों मे आत्मा होती है। आओर वुरी आत्मा कावास यहा शराव जुआ या वुरे काम उनको वहा रहने मे तृप्ति मिलती है ।आज ईतना ही आचार्य राजेश

वक्री गुरु

मित्रो कल की पोस्ट से आगे वात करते श्चिक का सप्तम केतु और अष्टम का गुरु वक्री आपको बता दूँ कि वक्री गुरु उस जीव के सामाजिक व्यवहारिक धार्मिक आदि सभी क्रिया कलापों को बदल कर दिखाने वाला होता है,पिता अगर अपने धर्म को लेकर चलने वाला होता है तो पुत्र जिसका वक्री गुरु होता है वह अपनी भावना मे धर्म को केवल अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये ही प्रयोग मे लेता है,पिता अगर किसी मन्दिर मे जाकर प्रार्थना करता है कि हे ! प्रभु आपकी शरण मे हूँ,

आप ही रक्षा करना,तो पुत्र की कामना होगी कि हे प्रभु ! मेरे अमुक काम को पूरा कर दो,काम पूरा होते ही आपके मन्दिर मे वापस आऊंगा। यह सब केवल उन्ही कारणो के कारण होता है जिनके अन्दर सम्बन्ध और भौतिकता का बोलबाला होना होता है। एक साल मे तीन महिने के समय के लिये लगभग गुरु वक्री होता है और समाज मे एक चौथाई लोग इस वक्री गुरु के समय मे पैदा होकर समाज रिवाज नीति रीति से बिलग होकर चलने के लिये मजबूर होते है और इसी कारण से समाज के अन्दर विकृति भी पैदा होती है,विभिन्न प्रकार के बदलाव भी देखने को मिलते है। अगर राहु लगन मे बैठ जाये और केतु सप्तम मे वृश्चिक राशि का होकर पुरुष की कुंडली मे हो तथा गुरु वक्री होकर स्वगृही चन्द्रमा के साथ अष्टम मे बैठ जाये तो समझ लेना चाहिये कि कुल का समाप्ति का समय आ गया है। वक्री गुरु अक्सर अपने प्रभाव के कारण जो भी कारण बनायेगा वह समाज नियम कानून आदि की तरफ़ जाने वाला नही होगा,जातक अपने बचपन मे इतना तेज हो जायेगा कि उसे कठिन से कठिन से कारण बहुत जल्दी याद हो जायेंगे जो बालक साल भर मे शिक्षा को पूरा करने मे अपनी बुद्धि को प्रयोग मे लायेगा वक्री गुरु वाला जातक उसी शिक्षा को तीन महिने मे पूरी करने के बाद आगे के क्लास मे जाने की युति बना लेगा। वह जिस जगह पर समाज मे धर्म आठमे पैदा हुआ है वह बाहर के कारणो मे अपने को बहुत ही आगे ले जाने वाला बन जायेगा और विदेशी भाषा संस्कृति तथा केवल शारीरिक सुख धन का सुख और अपने को दिखाने का सुख ही प्राप्त करने मे लगा रहेगा उसे अपने वंश चलाने या अपने कुल को बढाने मे कोई मतलब नही होगा। अगर पत्नी किसी कारण से मर्यादा वाली मिल जाती है तो जातक के सप्तम मे वृश्चिक के केतु के कारण काम सुख से पूर्ण नही हो पायेगी और उसे हिस्टीरिया जैसे रोग पैदा हो जायेंगे.धीरे धीरे जातक अपने पत्नी वाले माहौल से सामाजिक या कानूनी तौर पर दूर होने की कोशिश करेगा और जैसे ही दूर हुआ वह अपने समाज से बहुत दूर चला जायेगा।मित्रो ज्योतिष मेरा profession है ओर वहुँत से मित्र दक्षिणा मांगने पर नाराज हो जाते है मित्रो हम कुंङली पर पुरी मेहनत करते है फिर ही फल कथन करते है ओर आपकी जो समस्या होती है उसका उपाय आपको वताते है अगर आप मुझे कुंङली दिखाना चाहते है तो मिले या online पर भी यह सुविधा ले सकते है maakaali jyotish hanumaangarh or dabwali 07597718725 09414481324 आचार्य राजेशअगर लेख अच्छा लगे तो like करे नही लगे तो कमी जरुर वताऐ

ज्योतिषीय योग और ऊपरी बाधा

मा काली ज्योतिष की पोस्ट मित्रो पिछले कुछ लेख के द्वारा मैने तंत्र से लेकर किये कराऐ पर चर्चा की वहुँत से मित्रो ने फोन पर घन्यावाद किया आज ईसी पर ज्योतिष मे यह योग जो उपरी वाघा दे सकते है आप अपने अनुभव से भी जाचे यह जरुरी नही की हर किसी की यह समस्या हो हा यह योग चलते यह हो सकती है

 ऐसा माने शाकिनी दोष के लिये हमेशा कुंडली में अष्टम भाव या वृश्चिक राशि के ग्रहों को देखा जाता है अगर इस भाव या इस राशि में कोइ गृह है और उस गृह को राहू की नजर लगी हुयी है तो शाकिनी दोष पिशाच दोष प्रेत बाधा या ऊपरी हवा का दोष कहा जाता है.एक जातक जिसकी कुंडली में वृश्चिक राशि है और चन्द्रमा के साथ शनि विराजमान है,राहू पंचम में अपने स्थान को बनाकर बैठा है मीन राशिका राहू है और केतु ग्यारहवे भाव में है.अलावा ग्रहों में मंगल धनु राशि का दूसरे भाव में है,गुरु वक्री होकर चौथे भाव में है,सूर्य और बुध दसवे भाव में है,शुक्र तुला राशि का होकर बारहवे भाव में है.वर्त्तमान में केतु की दशा चल रही है और केतु में राहू का अंतर चल रहा है,राहू का गोचर शनि और चन्द्रमा के साथ चल रहा है. शाकिनी दोष के लिए यह भी माना जाता है की जातक की पिछली जिन्दगी में कोइ ऐसा काम हो गया था जिसके द्वारा वह इस जीवन में अपने शरीर के दोष के कारण तरक्की नहीं कर पाता है जब तक माता पिता की सहायता रहती है जातक चलता रहता है और जैसे ही माता पिता की सहायता समाप्त होती है जातक का कूच करने का समय आजाता है. इस दोष को देने के लिए जीवन के प्रति पारिवारिक सदस्य अक्सर जिम्मेदार होते है,वह सदस्य भले ही परिवार में अच्छी मान्यता रखते होते है लेकिन उनकी सोच जातक के प्रति गलत ही हो जाती है,इस कारण से कुद्रष्टि का मामला भी माना जाता है.जातक को इस दोष के कारण भोजन पानी शरीर को पनपाने के उपाय सभी व्यर्थ हो जाते है.जो भी दवाईया दी जाती है या जो भी चैक अप आदि करवाए जाते है सभी किसी न किसी प्रकार से दोष पूर्ण हो जाते है और जो भी बीमारी या कारण है वह किसी भी प्रकार से समाझ में नहीं आता है.अक्सर राहू मीन राशि का होकर जब कर्क और वृश्चिक राशि पर अपना असर डालता है और इन भावो में विराजमान ग्रह वह भले ही शनि सूर्य मंगल आदि क्यों न हो वह अपनी दृष्टि से इन्हें बरबाद कर देता है और इनके गलत प्रभाव जीवन में मिलाने लगते है.मीन राशि का राहू आसमानी हवा यानी ऊपरी हवा का कारण माना जाता है,शनि वृश्चिक राशि में शमशानी जमीन के लिए और चन्द्रमा जब शनि के साथ हो तो शमशानी रूप में समझी जाने वाली आत्मा के रूप में माना जाता है.इस आत्मा के प्रभाव से जातक का शरीर कोप होने के समय ठंडा हो जाता है और कभी कभी ऐसा लगता है जातक का कूच करने का समय आ गया है या कोइ भी कार्य करने के लिए जातक अपनी रूचि को पैदा करता है वैसे ही यह राहू शनि चन्द्र का प्रभाव जातक को अचानक सर्दी वाली बीमारी या नाक का बहना अथवा मॉल त्याग के समय अधिक ताकत लगाने के कारण गुर्दों की खराबी जैसी बीमारिया पैदा कर देता है,किया गया भोजन पेट में जमा रह जाता है और उस जमे भोजन की बजह से शरीर में कई तरह के इन्फेक्सन पैदा होने लगते है,यह इन्फेक्सन खून के साथ मिलकर शरीर के तंत्रिका तंत्र पर अपना प्रभाव देते है.इन प्रभावों के कारण शरीर में कभी कभी बहुत अधिक गर्मी मिलती है कभी कभी शरीर बिलकुल ठंडा हो जाता है.अक्सर शरीर के जननांगो में कोइ चमड़ी वाला रोग या खाज खुजली वाली बीमारी भी होनी पायी जाती है. सूर्य का चन्द्रमा से दसवे भाव में होना और शनि के साथ रहने से जातक के पिता के लिए माना जाता है की उसका निवास किसी शमशानी स्थान में है जहां या तो पहले कोइ कब्र आदि बनी होती है या मुर्दे जलाने का स्थान होता है.इसके अलावा भी देखा जाता है की पिता के द्वारा रहने वाले स्थान के आसपास किसी ऐसे अस्पताल का होना या जहां कसाई वृत्ति से जुड़े कार्यों का होना,जैसे चमड़े का कारोबार होना या पशुओं को काटने के बाद उनका मांस आदि बेचा जाना भी माना जाता है.अधिकतर मामले में पिता का मानसिक क्षेत्र या तो इसी प्रकार के कार्यों से लाभ लेने का होता हो या जातक के पिता के द्वारा बाहरी लोगो को इसी प्रकार के सामानों का बेचना या कारोबार करना हो,जिससे अधिक से अधिक धन का कमाया जाना भी माना जाता है, मित्रो आप मे से कोई अपनी कुंङली दिखाना या विवेचना करवानी है तो हमारी दक्षिणा देनी होगी 09414481324 07597718725 माकाली ज्योतिष hanumaangarh or dabwali आचार्य राजेश

गुरु जीव का कारक

मित्रो मेरी यही कोशिश रहती है आपको ज्योतिष के वारे ज्यादा से ज्यादा जानकारी हो यही मेरा प्रयास रहता है आपमे से वहुँत मित्र मुझे फोन पर कहते है 

कि आपकी पोस्ट से हमे वहुँत सिखने को मिल रहा है तो वहुँत खुशी होती है कहा जाता है कि आत्मा जब अपने साकार रूप को प्रकट करती है और उस आत्मा के रूप को प्रकट करने का क्षेत्र शुद्ध और सात्विक होता है तो वह आत्मा अपने अन्दर उन्ही गुणो के शरीर को धारण करके आती है जैसा उस स्थान की धरती का प्रभाव होता है। यह प्रभाव भी उसी प्रकार से माना जाता है जैसे एक बीज को बोने के लिये अलग अलग जमीन का प्रयोग किया जाता है और जमीन के प्रभाव के अनुसार ही बीज की उत्पत्ति होती हैकुंडली मे गुरु जीव का अधिकारी होता है सूर्य आत्मा का अधिकारी माना जाता है मंगल आत्मीय शक्ति को बढाने वाला होता है बुध आत्मीय प्रभाव को प्रसारित करने का कारक होता है शुक्र जीव को सजाने और आत्मा के भावो को प्रकट करने मे अपनी सुन्दरता को प्रकट करता है तो चन्द्रमा आत्मीय मन को सृजित करने का भाव पैदा करता है.शनि भौतिक रूप को प्रकट करता है और जीव के कर्म को करने के लिये अपनी योग्यता को प्रकट करता है। यूरेनस दिमाग के संचार को प्रकट करने और भौतिक संचार को बनाने बिगाडने का काम करता है प्लूटो मिट्टी को मशीन मे परिवर्तित करने का कार्य करता है नेपच्यून आत्मा के विकास का अधिकारी माना जाता है.समय के अनुसार जीव का रूप परिवर्तन होता रहता है जैसे आदिम युग मे जीव का रूप कुछ और होता था पाषाण युग मे कुछ था मध्य युग मे कुछ और था और वर्तमान मे कुछ और है तथा आने वाले भविष्य मे जीव का रूप कुछ हो जायेगा। जीव वही रहता है रूप परिवर्तन मे सहायक प्लूटो को मुख्य माना गया है,जो आधुनिकता से लेकर अति अधुनिकता को विकसित करने के लिये लगातार अपने प्रभाव को बढाता जा रहा है और हम क्या से क्या होते जा रहे है,लेकिन जीव के विकास की कहानी के साथ आत्मा का रूप नही बदल पाता है जीव कितना ही आधुनिक हो जाये आत्मा वही रहती है। जो भी कर्म किये जाते है उनका प्रभाव आत्मा पर उसी प्रकार से पडता रहता है जैसे एक चिट्टी विभिन्न डाकघरो मे जाकर डाकघर की उपस्थिति को दर्शाने के लिये अपने ऊपर उन डाकघरो की मुहर अपने चेहरे पर लगाकर प्रस्तुत करती है। कुंडली सिंह लगन की है और सूर्य विद्या से प्राप्त बुद्धि के भाव मे विराजमान है,सूर्य का साथ देने के लिये बुध जो लगन का चेहरा और भौतिक प्राप्ति तथा कार्य के प्रभाव का नाम प्रस्तुत करने की भावना को भी देता है। सूर्य का प्रभाव धरती तक लाने के लिये सूर्य किरण ही जिम्मेदार होती है। बिना सूर्य किरण के सूर्य का प्रभाव धरती पर आ ही नही सकता है,बुध को किरण का रूप मानने पर यही पता चलता है कि बुध सूर्य की गरमी रोशनी जीवन की प्रस्तुति को धरती तक लाने के लिये संचार का काम करता है इसलिये बुध को संचार का ग्रह कहा गया है। पंचम भाव विद्या के भाव से दूसरा भाव होने से विद्या से प्राप्त बुद्धि को प्रयोग करने का भाव भी कहा गया है और जब इस भाव मे गुरु की धनु राशि का समागम होता है तो ऊंची शिक्षा वाली बुद्धि को प्राथमिक शिक्षा जैसा माना जाता है। कानून की कारक यह राशि विदेशो से भी सम्बन्ध रखती है धर्म और भाग्य से भी यह राशि जुडी होती है साथ ही यात्रा और धार्मिकता को फ़ैलाने या उस धार्मिकता से लोकहित के कार्य करने के लिये भी अपनी युति को प्रस्तुत करती है। इस राशि के प्रभाव को अगर पंचम मे लाया जाता है तो ऊंची जानकारी को खेल खेल मे प्रस्तुत करने की कला भी मानी जाते है,सूर्य भी हकीकत मे कालपुरुष की कुंडली के अनुसार इसी भाव का मालिक है,राज्य और राजनीति से भी सम्बन्ध रखता है। लेकिन उद्देश्य कुछ भी हो मतलब शिक्षा से ही होता है। पुराने जमाने की जो कहानी कही जाती है कि गुरुओं मे इतनी दम होती थी कि वे मिट्टी को चलाने फ़िराने लगते थे,वे कहानिया अविश्वसनीय लगती है,हम कभी कभी कह देते है कि यह सब कपोल कल्पित है,लेकिन आज जिधर भी नजर घुमाई जाती है उधर ही मरी हुयी मिट्टी दौड रही है जिस इंसान को देखो मरी मिट्टी से ही खेल रहा है काम कर रहा है उसी मिट्टी को प्रयोग मे लाकर कमा रहा खा रहा है उसी मिट्टी पर बैठ कर भागा जा रहा है उसी मिट्टी से एक दूसरे से संचार कर रहा है,लेकिन उस जमाने की बातें कपोल कल्पित लगती है ! पुराने गुरु पीले कपडे पहिन कर विद्या को प्रदान किया करते थे लेकिन आधुनिक गुरु कम कपडे पहिन कर कम काम करके अधिक बुद्धि का प्रयोग करके जो कारक पैदा कर रहे है उन्हे गुरु की उपाधि से दूर करने के बाद वैज्ञानिक की उपाधि दे रहे है,वास्तविकता भी है कि जब गुरु सुपर गुरु हो जाता है और मरी मिट्टी मे इतनी जान डाल देता है कि उसका जीवन बिना मरी मिट्टी के बेकार सा हो जाता है तो वह दिमाग को हर पल हर क्षण हर

कुंडली का चौथा भाव में शुक्र

चौथे घर का सम्बन्ध हमारी उम्र के दूसरे हिस्से से यानी पच्चीस साल की आयु से लेकर पचास साल की आयु तक,इसी हिस्से में हमारे गृहस्थ जीवन और जवानी के समय में हम कहां तक लाभ प्राप्त कर सकते है उसके बारे में भी इस घर से पूरी तरह जाना जा सकता है,यह घर हमारी किस्मत भाग्य से भी संबन्ध रखता है,लेकिन किस्मत के उस हिस्से से जो पूर्वजन्म से हम अपने साथ लाये हैं,यानी किस्मत किस हद तक हमारा साथ देगी इसक संबन्ध भी चौथे घर से है।कुन्ङली के चोथे भाव मे जव शुक्र होता है तो लालकिताव मे हिदायत है कि पती अपनी पत्तनी से दोवारा शादी करे आखीर ऐसा क्यो क्या कारन है यह क्यों कहा जाता है. जब भी कोई ऐसी जन्मपत्री देखने को मिलती है जिसमे जातक

 की कुंडली मे शुक्र खाना नो 4 में हो तो लाल किताब वाले बिना किसी तार्किक विश्लेषण के और बिना कुछ सोचे तुरंत कहते है की पत्नी से दुबारा शादी कर लो. लाल किताब 1952 पेज नंबर 444 पर लिखा है ” औरते एक ही वक्त में दो जिंदा होंगी,एक बूढी माँ की तरह बढ़ी उम्र की दूसरी ऐश आराम की मालिक हरफन मौला ज़माना की बेगम होगी,मगर औलाद की फिर भी किल्लत ही होगी,बल्कि लावल्दी तक जायज़ होगी.यहाँ पर शर्त यह की खाना नंबर 2 – 7 खाली हो और शुक्र किसी दुसरे गृह का साथी गृह न बन रहा हो”. अब इसका क्या उपाय किया जाये कि दो औरते न हो या दुबारा शादी न हो तो इसके लिए भी लाल किताब के पेज नंबर 443/1952 पर लिखा है कि पहली ही औरत से पहला मर्द दो दफा शादी की रसम अदा कर ले तो शुकर की दो औरत होने की शर्त न रहेगी और औलाद ज़ल्दी होगी. तर्क का विषय यह है की ऐसा क्यों लिखा है दो औरते हो सकती है या दुबारा शादी हो सकती है,इसके लिए सबसे पहले खाना नंबर 4 को देखते है की यह खाना असल में है किसका. खाना नंबर 4 असल में चंद्र का है,इस घर पर हर तरह से चन्द्र का ही हक है,और चन्द्र असल में माता है,और अब यहाँ पर शुक्र आ गया है,जिस जातक की भी कुंडली में शुक्र खाना नंबर 4 में है वो देखे की उनकी पत्नी उन् पर माँ की तरह ही अधिकार जमाती है.असल में उस ने शादी तो पत्नी के लिए की है लेकिन आ गयी घर में माँ.उसकी पत्नी उसका हर समय धयान रखती है,जो की बुरी बात नहीं,लेकिन ध्यान व रख रखाव का तरीका जो है वो है एक माँ की तरह,जैसे ही यह व्यक्ति घर से निकलता है,खाने का डिब्बा त्यार मिलता है,खाना अभी खाया नहीं की दफ्तर में फ़ोन आ गया की खाना खा लिया क्या ?जैसे एक माँ को अपने बेटे की चिंता रहती है वैसे ही इसकी पत्नी को अपने पति की चिंता है.अब जन्म देने वाली माँ और पत्नी जिसने माँ की जगह ले ली आपस में वर्चस्व कि लड़ाई लड़ रही है कि इस पर मेरा अधिकार अधिक है न कि माँ का और माँ अपने बेटे पर अधिकार चाह रही है क्योकि वह मेरी संतान है |यही कारण घर में क्लेश उत्पन्न करदेता है सास बहु का अपनत्व खत्म और झगडा शुरू जैसे दो सौतन हों | अब ज़रा दूसरी तरह से इस पर दृष्टि डालते है कि अगर ऐसे जातक की माँ न हो तो क्या हो अब पत्नी को घर की चिंता है,रिश्तेदारों की चिंता है.पति के लिए पत्नी के पास वक़्त ही नहीं है ,अब यहाँ पर पति और पत्नी का झगडा शुरू हो गया है,जब पत्नी अपने पति को प्यार के लिए समय ही नहीं देगी तो ऐसे समय में पति का भटक जाना कोई बड़ी बात नहीं,पत्नी को पता चल जाये तो क्लेश ,बात फिर एक दुसरे से अलग हो जाने तक पहुँच जाती है. मतलब साफ़ है की शुकर 4 वाला घर में अपनी पत्नी को ब्याह कर नहीं लता बल्कि अपनी माँ को अपने घर लाता है,विवाह का मुख्य उदेश्य संतान कि प्राप्ति है जब माँ लेकर आया है तो संतान किसे पैदा होगी| और संतान कोई अपनी माँ से तो नही पैदा करेगा करेगा तो पत्नी से ही |पत्नी तो प्यार दे नहीं रही,बल्कि वो तो पति का धयान एक बच्चे की तरह रख रही है.पति प्यार के लिए बाहर भटक रहा है. अब कुछ लालकिताब का बेडागर्क करने वाले ज्योतिषी जो उपाय सूझाते है वो है कि ऐसा व्यक्ति अपनी पत्नी से दुबारा शादी कर ले,लेकिन शादी कैसे करनी है? अक्सर देखा जाता कि ऐसी शादी को मजाक के तौर पर लिया जाता है,लेकिन अगर हम लाल किताब को ध्यान से पढ़े तो यह समझ आता है की शादी को पूरी विधि से किया जाये तभी इसका सही फल मिल सकता है वर्ना नहीं. क्योंकि साफ साफ लिखा है कि शादी की पूरी रसम अदा करनी है न कि अपनी शादी की परम्परा का कोई मजाक बनाना है.इसके साथ एक सावधानी और है कि जैसे ही दुबारा शादी की जाये,तुरंत ही अपनी पत्नी का नाम बदल दें.तभी दूसरी शादी का फल मिलेगा,वर्ना नहीं. अब आपकी पत्नी के दो नाम हो गए,एक तो वो जो आपकी माँ की तरह है,दूसरा नाम आपकी पत्नी का है,जो आपको पत्नी का प्यार दे.जिस से आपके घर में औलाद आ सके. अब फिर चलते है लाल किताब 1952 पेज नंबर 443 जैसा कि पहले लिखा गया है कि दूसरी शादी करने से औलाद की किल्लत दूर होगी.अगर इतना करने से आपका घर परिवार बच है तो में नहीं समझता की इस में कोई नुकसान है,इन्सान किस लिए इतनी मेहनत करता है,क्यों इतनी भागदौड़ लगी हुई है,अगर इस से या इतना करने घर परिवार बच जाये तो फिर और क्या चाहिए,लाल किताब आपको सही रास्ता दिखाती है

पंच महापुरुष योग

मित्रो पञ्च महापुरूष योग की चर्चा करते हैयह किस प्रकार अलग-अलग लग्नों में घटित होते है :- १. हँस योग -यदि गुरू उच्च राशि कर्क अथवा स्वराशि धनु अथवा मीन राशि में केंद्र में होतो यह योग बनता है , यह योग स्थिर लग्नों अर्थात वृषभ , सिंह, वृश्चिक, या कुम्भ लग्नों की कुंडलियों में नहीं बनता है। निम्नानुसार लग्नों में स्थित भावों में गुरू होने से हँस नामक पञ्च महापुरूष नामक योग बनता है। १. मेष लग्न -चतुर्थ भाव में कर्क राशि में। २. मिथुन लग्न -धनु राशि या मीन राशि में स्थित गुरू से। ३. कर्क लगन में -कर्क राशि में लग्न में स्थित होने से। ४. कन्या लग्न- चतुर्थ भाव में धनु राशि अथवा सप्तम भाव में मीन राशि में हो तो. ५. तुला लग्न में - दशम भाव में कर्क राशि में। ६. धनु लग्न- लग्न में अथवा चतीर्थ भाव में गुरू हो तो। ७. मकर लग्न- सप्तम भाव में कर्क राशि का गुरू हो तो। ८. मीन लग्न- दशम में धनु का अथवा लग्न में मीन राशि का गुरू होतो यह योग होता है हँस योग का - फल जिस जातक की कुंडली में यह योग होता है वह जातक स्वस्थ, सुन्दर. प्रशंसित , न्यायप्रिय , आकर्षक, सफलता पाने वाला होता है। मृत्यु के बाद भी यह लोकप्रिय रहता है।आचार्य राजेश

वक्री ग्रह के फल

मित्रो वक्री ग्रह हो को लेकर पहले भी काफी पोस्ट fb पर post कर चुका हु वक्री ग्रह सदा हानी या वुरा नहीं करते वह कभी-कभी बहुत शुभ फल भी जातक को देते है खास स्थान में वक्री ग्रह जातक को उच्च शिखर पर पहुंचाने में अत्यंत सहायक होते हैं ऐसी स्थिति में जातक को धन, यश व अच्छी सेहत की प्राप्ति होती है किसी के जन्म में यदि कोई ग्रह वक्री होता है और जीवन में वह वक्री ग्रह जब गोचर में आता है, तो बहुत शुभ फल देता है। खास बात यह है कि सूर्य और चंद्रमा कभी वक्री नहीं होते मंगल : यह ग्रह यदि वक्री है तो व्यक्ति शीघ्र क्रोधी तथा उत्तेजित होने वाला हो सकता है जब मंगल का वक्रत्व समाप्त होता है, तभी उसके सभी कार्य पूर्ण होना माना जा सकता है वक्री मंगल वाले व्यक्ति प्राय: डॉक्टर, वैज्ञानिक या रहस्यमयी विधाओं के ज्ञाता देखे गऐ है वाकी योग भी कुंङली मे हो तो वैसे वक्री मंगल वाले मजदूर कार्यस्थल पर काम के बजाय हड़ताल पर रहना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसे जातक अधिकतर कामचोर होते हैंपुरा फल कथन पुरी कुंङली पर ही देखा जाता है यह सिर्फ जनरल जानकारी है हर ग्रह के लिऐ ऐसा ही माने क्योकि कोई भी ऐक ऐकल ग्रह से फल संभव नही बुध : जिनकी जन्मकुंडली में बुध वक्री होता है, वह कमजोर स्वाभाव वाले अथवा मुसीबत में घबरा जाने वाले व्यक्ति होते हैं। जब गोचर में बुध वक्री हो जाता है तो व्यक्ति तीक्ष्ण बुद्धि वाले होते हैं। समाज की विभिन्न समस्याओं को आश्चर्यजनक ढंग से सुलझाने में वे सक्षम होते हैं वुघ जव भी गोचर मे वक्री हो तव वो अपना लेपटोप या कम्प्यूटर मे ङाटा को संभाल कर रखे या backup वना कर रखे बृहस्पति : वक्री बृहस्पति भी शुभ फल देता है। इसके जातकों के पास अद्भुत क्षमता होती है और वे विलक्षण कार्यशैली वाले होते हैं। भले ही उनका कोई काम अधूरा रह जाए, पर आखिरकार वह अपने अधूरे कार्यों को पूरा जरूर करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि भवन निर्माण का कार्य रुका हुआ हो अथवा फैक्टरी बंद पड़ी हो, तो दोबारा गोचर में वक्री आने पर रुका हुआ काम पुन: शुरू हो जाता है और पूरा भी होता है शुक्र : जन्म के समय शुक्र के वक्री होने पर जातक धार्मिक स्वभाव का होता है। धर्म पर विश्वास रखने के कारण ऐसे जातकों को लोकप्रियता मिलती है। गोचर में शुक्र जब वक्री होता है, तो उस दौरान वह व्यक्ति सत्यवादी, पर क्रूर हो जाता है। यदि वक्री शुक्र वाले जातक को प्यार, स्नेह या सम्मान नहीं मिलता, तो वह विद्रोही हो जाता है। वक्री शुक्र वाले जातक यदि कलाकार, संगीतज्ञ, कवि या ज्योतिषी हैं, तो उनकी शक्ति बढ़ जाती है और अपने व्यवसायों में वे शिखर पर पहुंच जाते हैं। साथ ही वे काफी नाम भी कमाते हैं। शनि : जन्म में शनि जब वक्री होता है और युवा होने पर जब वह वक्री गोचर में आता है, तो व्यक्ति शक्की स्वभाव का हो जाता है और साथ ही स्वार्थी भी हो जाता है। ऐसे व्यक्ति दिखते कुछ और हैं, पर वास्तव में कुछ और होते हैं। ऐसे व्यक्ति ऊपर से साहसी, कठोर, सिद्धांतवादी और अनुशासनप्रिय होने का ढोंग करते हैं। हकीकत यह होती है कि वे अंदर से डरपोक, खोखले और लचीले स्वभाव के होते हैं। वैसे तो वक्री ग्रहों को अच्छा नहीं माना जाता, पर कुछ खास परिस्थितियों में इनका प्रभाव जातकों के लिए शुभ होता है। ज्योतिष शास्त्र में वक्री ग्रहों को भी शुभ की संज्ञा दी गई है, जिनसे जातकों का जीवन सुखमय हो सकता है।मै फिर यही कहुगा कोई फल पुरी कुंङली देख कर ही संभव हो सकता है वक्री ग्रह अगर कुंङली मे शुभ है या अशुभ है तो उसके फलो मे अघिकता होगी आचार्य राजेश

राहु की दे सकता है अच्छा फल

मित्रो यह जरूरी नहीं की राहू बुरा फल ही दे वेशक राहु पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है। इसकी अपनी कोई राशि नहीं होती है, इसलिए कुंडली में यह जिस राशि और ग्रह के साथ में होता है उसके अनुसार फल देता है। राहु पाप ग्रह होने के कारण हमेशा बुरा फल दे यह जरूरी नही है। कुंडली में धन प्राप्त हाने के योग भी राहु के द्वारा बन सकते हैं ऐक कहावत है जिसको मारे राहु उसको कौन तारे जिसको तारे राहु उसको कौन मारे अष्टलक्ष्मी योग- जब किसी कुंडली में राहु छठे भाव में होता है और 1, 4, 7, 10वें भाव में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग बनता है। पापी ग्रह राहु, गुरु के समान अच्छा फल देता है। यह योग जिसकी कुण्डली में होता है वह व्यक्ति धार्मिक, आस्तिक एवं शान्त स्वभाव वाला होता है और यश व सम्मान के साथ-साथ धनवान हो जाता है। लग्न कारक योग- अगर किसी का लग्र मेष, वृष या कर्क लग्न है तभी यह योग बनता है। कुण्डली में राहु दुसरे, 9वें या दसवें भाव में नहीं है तो उनकी कुंडली में ये योग होता है। कुंडली की इस स्थिति से राहु का अशुभ प्रभाव नही होता क्योंकि उपर बताए गए लग्र वालों के लिए राहु शुभ फल देने वाला होता है। ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है। राहुकोप मुक्त योग- राहु पहले भाव में हो या तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में होता है और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो यह योग बनता है। ऐसे में व्यक्ति पर राहु के अशुभ प्रभाव नही पड़ते। ऐसे व्यक्तियों के सभी काम आसानी से होते हैं और उनके जीवन में कभी पैसों की कमी नही होती। राहु की महादशा लगने पर मानते हैं कि जैसे सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन ऐसा नहीं है। राहु और उसकी महादशा हर समय नुकसानदायक नहीं होती। राहु रंक को भी राजा बनाने की क्षमता रखता है। राहु की महादशा में विदेश जाने से बहुत लाभ होता है। विदेश का मतलब है वर्तमान निवास से दूर जाकर कार्य करने से सफलता मिलती है। अगर कुंडली में राहु , चौथे, दसवें, ग्यारहवें या नवें स्थान में अपने मित्र ग्रहों की राशि यानी शनि और शुक्र की राशि (मकर, कुंभ, वृषभ या तुला) में स्थित होता है तो बहुत सफलता दिलाता है।वहीं राहु यदि मिथुन राशि में हो तो कई ज्योतिष विद्वानों द्वारा उच्च का माना जाता है। राहु एक छाया ग्रह है। यह किसी भी राशि का स्वामी नही है। लेकिन यह जिसके अनुकुल हो जाता है उसे जीवन मे बहुत मान सम्मान प्रतिष्ठा और पद प्राप्त होता है। राजनितिज्ञों के लिए तो राहु का अनूकुल होना अत्यधिक फायदेमंद होता है। आज कल राहु केतु या शनी को लेकर कुछ तथा कथित ज्योतिषी जातको ङरा रहे है तथा जाप या पुजा के नाम से पैसा ठगते है मैरा आप से अ निवेदन है कि आप अपने शहर के अच्छे ज्योतिषी को ही अपनी कुंङली दिखाऐ ओ अक्सर जातक मुफ्त कुंङली दिखाने के चक्कर मे रहते है ऐसा ना करे आप ज्योतिषी को उसकी उचित दक्षिणा दे अगर आप मुझ से अपनी कुंङली दिखाना याकिसी समस्या का उपाय जानना चाहते है तो सम्पर्क करे 09414481324 07597718725 मांकाली ज्योतिष आचार्य राजेश

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...