शनिवार, 1 सितंबर 2018

ज्योतिषी और उनके लक्षण

ज्योतिषी और उनके लक्षण ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने वाले व्यक्ति को ज्योतिषी, ज्योतिर्विद, कालज्ञ, त्रिकालदर्शी, सर्वज्ञ आदि शब्दों से संबोधित किया जाता है। सांवत्सर, गुणक देवज्ञ, ज्योतिषिक, ज्योतिषी, मोहूर्तिक, सांवत्सरिक आदि शब्द भी ज्योतिषी के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। ज्योतिष व ज्योतिषी के संबंध में सभी परिभाषाओं का सुन्दर समाहार हमें वराहमिहिर की वृहद संहिता से प्राप्त होता है। वराहमिहिर लिखते हैं

 ग्रह गणित (सिद्धांत) विभाग में स्थित पौलिश, रोमक, वरिष्ट सौर, पितामह इन पाँच सिद्धांतों में प्रतिपादित युग, वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, अहोरात्र, प्रहर, मुहूर्त, घटी, पल, प्राण, त्रुटि आदि के क्षेत्र का सौर, सावन, नक्षत्र, चन्द्र इन चारों मानों को तथा अधिक मास, क्षय मास, इनके उत्पत्ति कारणों के सूर्य आदि ग्रहों को शीघ्र तुन्द दक्षिणा उत्तर, नीच और उच्च गतियों के कारणों को सूर्य-चन्द्र ग्रहण में स्पर्श, मोक्ष इनके दिग्ज्ञान, स्थिति, विभेद वर्ग को बताने में दक्ष, पृथ्वी, नक्षत्रों के भ्रमण, संस्थान अक्षांश, चरखण्ड, राश्योदय, छाया, नाड़ी, करण आदि को जानने वाला, ज्योतिष विषयक समस्त प्रकार की शंकाओं व प्रश्न भेदों को जानने वाला तथा परीक्षा की काल की कसौटी में, आग और शरण से परीक्षित शुद्ध स्वर्ण की तरह स्वच्छ, साररूप वाणी बोलने वाला, निश्चयात्मक ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति ज्योतिषी कहलाता है। इस प्रकार से शास्त्र ज्ञान से सम्पन्न ज्योतिषी को होरा शास्त्र में भी अच्छी तरह से निष्णात होना चाहिए, तभी गुण सम्पन्न ज्योतिषी की वाणी कभी भी खाली नहीं जाती। ज्योतिषी के लक्षण एक ज्योतिषी के लक्षण बताते हुए आचार्य वराहमिहिर कहते हैं कि ज्योतिषी को देखने में प्रिय, वाणी में संयत, सत्यवादी, व्यवहार में विनम्र होना चाहिए। इसके अतिरिक्त वह दुर्व्यसनों से दूर, पवित्र अन्तःकरण वाला, चतुर, सभा में आत्मविश्वास के साथ बोलने वाला, प्रतिभाशाली, देशकाल व परिस्थिति को जानने वाला, निर्मल हृदय वाला, ग्रह शान्ति के उपायों को जानने वाला, मन्त्रपाठ में दक्ष, पौष्टिक कर्म को जानने वाला, अभिचार मोहन विद्या को जानने वाला, देवपूजन, व्रत-उपवासों को निरंतर, प्राकृतिक शुभाशुभों के संकेतों को समझाने वाला, ग्रहों की गणित, सिद्धांत संहिता व होरा तीनों में निपुण ग्रंथी के अर्थ को जानने वाला व मृदुभाषी होना चाह

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

क्या मैं राजनीति में जा सकती हूं?

एक जातिका का प्रश्न है कि वह क्या राजनीति में जा सकती है ? सभी को पता है कि राजनीति का कारक ग्रह सूर्य है,कुंडली में सूर्य को देखना बहुत जरूरी है।

 जातिका की कुण्डली तुला लगन और तुला ही राशि की है। लगनेश शुक्र का स्थान राहु के साथ कर्क राशि में लगन से दसवें भाव में है। कर्क राशि का स्वभाव जलीय कारणों के लिये जाना जाता है,कर्क राशि का राहु अगर शुक्र के साथ है तो वह जनता के लिये मनोरंजन का कारक जरूर बनता है,साथ ही जातिका के अन्दर एक भाव जो अधिक बलवती होता है कि वह लगातार मीडिया के सामने आकर सबके सामने प्रदर्शित हो,उसे ऊंचे स्थानों में रहने का हवाई यात्रायें करने का खुशबू और कन्डीसन्ड स्थानों में रहने की विशेष उत्कंठा मिलती है। शुक्र से बारहवें भाव में सप्तमेश और द्वितीयेश मंगल के साथ लाभेश सूर्य है,साथ में भाग्येश और व्ययेश बुध भी सूर्य और मंगल के साथ है। सूर्य का भाग्येश के साथ होना जातिका को राजनीति के लिये प्रेरित तो करता है,और राजकीय लोगों से मेल मिलाप भी रखता है,लेकिन शुक्र के साथ राहु होने से और कर्क का राहु होने से जातिका के दिमाग में सभी स्थानों में चमक दमक देखने की आदत है,शुक्र जब राहु के साथ हो और धन भाव का स्वामी और पति के स्थान का स्वामी मंगल बारहवें भाव में हो तो जातिका के लिये केवल खर्चा करने के लिये ही माना जा सकता है। सूर्य से शुक्र राहु का दूसरा होना जो भी राजनीति लोग होंगे उसे मनोरंजन के साधन के रूप में ग्रहण करेंगे,उसके बल पर अपने स्वार्थ की पूर्ति करेंगे और बदले में उसे कोई भ्रम में देने वाली बात को दे देंगे। जातिका के लिये सूर्य तभी अपनी गति को प्रकट करना माना जाता है जब उसके दिमाग से अपने को दिखाने वाली भावना को छोडा जा सके। बुध और मंगल की युति से सोफ़्ट और हार्ड की लडाई हो जाती है,बातों के अन्दर तीखापन आ जाता है,बातो को घुमाकर कहना बात की पुष्टि तकनीकी कारणों से प्रयोग करने की आदत होना,कमन्यूकेशन के साधनो को सोफ़्टवेयर आदि की जानकारी होना,आदि माना जा सकता है। जातिका का गुरु शनि दोनो ही बारहवें भाव में है,जातिका का स्वभाव भी धर्मी है,वह राजनीति में जाने के लिये अपनी धर्मी नीति को बेअसर नही कर सकती है। जातिका के नाना के लिये भी माना जा सकता है कि उन्होने सरकारी तकनीकी क्षेत्र को सही समझा था,लेकिन जातिका के पिता से राजनीति के कारण ही या उसी प्रकार के कारणॊं से हमेशा षडाष्टक योग बना रहा आदि बातें जानी जा सकती है। वर्तमान में गुरु का गोचर जन्म के गुरु के साथ चल रहा है,बुध लाभ भाव में है,और बुध की राजनीति से जातिका को राजनीति में पद प्राप्त करने का समय चल रहा है। जातिका को राजनीति में जाना हितकर भी होगा।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

वारहवा भाव दा्दश भाव

कुंडली के बारहवें घर को व्यय स्थान अथवा व्यय भाव कहा जाता है तथा कुंडली का यह घर मुख्य रुप से जातक के द्वारा अपने जीवन काल में खर्च किए जाने वाले धन के बारे में बताता है तथा साथ ही  द्वारा खर्च किए जाने वाला धन आम तौर पर किस प्रकार के कार्यों में लगेगा। कुंडली के बारहवें घर के बलवान होने की स्थिति में आम तौर पर कमाई और व्यय में उचित तालमेल है तथा कुंडली धाहोतारक अपनी कमाई के अनुसार ही धन को खर्च करने वाला होता है, जिसके कारण उसे अपने जीवन में धन को नियंत्रित करने में अधिक कठिनाई नहीं होती जबकि कुंडली के बारहवें घर के बलहीन होने की स्थिति में जातक का खर्च आम तौर पर उसकी कमाई से अधिक होता है तथा इस कारण उसे अपने जीवन में बहुत बार धन की तंगी का सामना करना पड़ता है।द्वादश भाव कुंडली का अंतिम भाव होने से मनुष्य जीवन का भी अंतिम भाग है| प्रथम भाव(लग्न) से गणना करने पर द्वादश या 12 भाव सबसे आख़िरी भाव है अतः एक प्रकार से यह जीवनचक्र का अंत दर्शाता है| जो कुछ भी प्रारंभ हुआ है, उसे एक न एक दिन समाप्त होना है, क्योंकि लग्न जीवनारंभ का सूचक है इसलिए द्वादश वारहवाभाव जीवन की समाप्ति को प्रदर्शित करता है| लग्न मनुष्य की जीवन शक्ति है, उसकी उर्जा है तथा द्वादश भाव उस उर्जा का व्यय कारक है| इसलिए इस भाव को व्यय स्थान कहा जाता है| फारसी में इस भाव को ख़र्च खाने कहते हैं| मनुष्य द्वारा प्राप्त जीवन, धन, यश, प्रसिद्धि आदि की हानि या नाश द्वादश भाव कर देता है इसलिए इस भाव को हानि या नाश स्थान भी कहते हैं| यह भाव त्रिक(6,8,12) भावों में से एक है| इस भाव का स्वामी प्रायः अशुभ माना जाता है परंतु यदि कोई ग्रह सिर्फ द्वादश भाव का स्वामी हो तथा अन्य किसी भी भाव का स्वामी न हो तो वह भावेश तटस्थ(Neutral) रहता हैकुंडली का बारहवां भाव जीवन के सपने बुनता है वह सपने दिन के भी हो सकते है और रात के भी हो सकते है.चलते फ़िरते भी हो सकते है और बैठे ठाले हो भी हो सकते है यात्रा मे भी हो सकते है और धार्मिक स्थानो की यात्रा करने पर भी हो सकते है.लम्बी यात्रा मे भी हो सकते है और आखिरी नींद लेने मे भी हो सकते है। हकीकत मे देखा जाये तो जीवन को बनाने बिगाडने के लिये स्वपनो की बहुत बडी भूमिका होती है। द्वादश भाव मनुष्य के बाएँ नेत्र से संबंधित है| क्योंकि हमारी आँखें प्रकाश के माध्यम से ही देख पाती हैं इसलिए यदि द्वादश(हानि) भाव में सूर्य या चन्द्रमा जैसे प्रकाशकारक(Luminaries) ग्रह स्थित हों और पाप ग्रहों से पीड़ित हों तो व्यक्ति के नेत्रों में कष्ट होता है| जल द्वारा मृत्यु- किसी भी कुंडली में चतुर्थ, अष्टम तथा द्वादश भाव जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं| इसलिए द्वादश भाव एक जलीय भाव है| द्वादादेश तथा चतुर्थेश का प्रभाव जब भी अष्टम भाव(मृत्यु का स्वरुप) तथा अष्टमेश पर हो तो व्यक्ति की मृत्यु जल में डूबने से होती है| विपरीत राजयोग- किसी भी जन्मकुंडली में छठा, आठवाँ तथा बारहवाँ भाव अशुभ माने जाते हैं| द्वादश भाव हानि का है इसलिए जब भी द्वादश भाव का स्वामी छठे या आठवें भाव(अशुभ भावों में स्थित होकर अशुभता की हानि अर्थात शुभफल) में स्थिति होकर पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो विपरीत राजयोग का सृजन करता है| जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को असीम धन-संपति व भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है| जीवनसाथी का दूसरे विपरीत लिंग से प्रेम संबंध- जन्मकुंडली में छठा तथा ग्यारहवां भाव शत्रु व अन्यत्व(Enemy & Others) के प्रतीक होते हैं| द्वादश भाव सप्तम स्थान(जीवनसाथी) से छठा(शत्रु) होता है इसलिए यह वैवाहिक जीवन में किसी दूसरे व्यक्ति के प्रवेश(Entry) अर्थात घुसपैठ को दर्शाता है| द्वादश भाव शैय्या सुख(Bed Pleasures) का भी है| यदि व्यक्ति की कुंडली में छठे व ग्यारहवें भाव के स्वामी(शत्रु व अन्यत्व) तथा राहु(बाहरी तत्व) का संबंध द्वादश भाव(शय्या सुख व भोग) व उसके स्वामी हो जाए तो मनुष्य का जीवनसाथी बाहरी व्यक्ति (परस्त्री या परपुरुष) से प्रेम संबंध रखता है अर्थात बेवफ़ा होता है| मोक्ष- द्वादश भाव का कुंडली का अंतिम भाव होने से इसका संबंध मोक्ष से है| यदि लग्नेश का नवम भाव(धर्म स्थान) व नवमेश से शुभ संबंध हो और द्वादश भाव तथा द्वादादेश पर भी शुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ रहा हो तो मृत्यु के उपरांत मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है| यदि द्वादश भाव में केतु स्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ रहा हो तो यह भी मोक्ष का सूचक है| पाँव(पैर)- द्वादश भाव को कालपुरुष का पैर माना गया है| यदि, द्वादश भाव, द्वादादेश, मीन राशि तथा गुरु पर पाप व क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य को पैरों से संबंधित कष्ट जैसे पोलियो, लंगड़ापन आदि रोग होते हैं| व्यय- द्वादश भाव जन्मकुंडली का अंतिम भाव होने से इसका संबंध हानि, ख़र्च या व्यय से है| मनुष्य के व्यय की प्रकृति किस प्रकार की होगी इसकी सूचना हमे द्वादश भाव से ही मिलती है| यदि द्वादश भाव तथा द्वादशेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य का व्यय सत्कर्मों में(दान, धर्म, पुण्य) होता है इसके विपरीत यदि इन घटकों पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य अपने धन को गलत तरीके से ख़र्च करता है| निद्रा व अनिद्रा- द्वादश भाव का संबंध शयन सुख से है अतः इसका निद्रा(Sleep) से भी घनिष्ठ संबंध है| उत्तम स्वास्थ्य हेतु उचित निद्रा लेना अति आवश्यक माना गया है| यदि द्वादश भाव व द्वादादेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति गहरी व अच्छी नींद का आनंद लेता है इसके विपरीत यदि यह घटक पाप ग्रहों से पीड़ित हों तो मनुष्य को अनिद्रा(नींद न आना) की समस्या होती है| यह भाव निद्रा का होने के कारण स्वप्न(Dreams) से भी संबंधित है| विदेश यात्रा या विदेश वास- द्वादश भाव निवास स्थान से दूर विदेशी भूमि को दर्शाता है| वैसे भी यह भाव चतुर्थ स्थान(घर या निवास) से नवम(लंबी यात्रा) है इसलिए घर से दूरी का प्रतीक है| अतः यह भाव मनुष्य के विदेश में निवास करने का है

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

एकादश भाव खाना नं 11

जीवन के आधारभूत तत्वों में से आय और व्यय महत्वपूर्ण होता है. हम सभी यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि हमारी आमदनी कैसी होगी तथा संचय की स्थिति क्या होगी. इन सभी बातों की जानकारी क्रमश: ग्यारहवें और बारहवें घर से मिलती है. ग्यारहवां भाव आय का घर माना जाता है तो बारहवां व्यय काएकादश भाव को आय का घर कहा जाता है .

 यह घर दशम भाव में किये गये कर्मों का फल होता है. यह भाव बलवान होने पर व्यक्ति को अपने किये कर्यों का पूरा लाभ मिलता है. व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है. व्यक्ति के मन में आशा का संचार होता रहता है. जीवन की सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करना आसान होता है.आज का युग अर्थ युग कहा जाता है. इसलिए जीवन में धन की अहमियत बढ़ गयी है., इसलिए आय भाव यानी ग्यारहवें घर का महत्व भी ज्यादा हो गया है. सभी लोग यह जानना चाहते हैं कि उनकी आय कैसी होगी. इस विषय की जानकारी ग्यारहवें भाव से ही मिलती है. हमारे शरीर में ग्यारहवें भाव का स्थान कान तथा पैर की पिण्डलियों को माना जाता है.छोटे-भाई बहनों की उच्च शिक्षा (high education) व विदेश यात्रा के लिये देखा जाता है. मां की लम्बी अवधि की बीमारी के विषय में इस स्थान से विचार किया जाता है क्योंकि एकादश भाव माता के स्थान यानी चतुर्थ भाव से आठवां घर होता है . माता के साथ होने वाली किसी प्रकार की दुर्घटना के विषय में भी इस घर से विचार किया जाता है. पिता की कम दूरी की यात्रा का संबन्ध भी इस भाव से होता है. वाहन को बदलने का विचार हो तो उस स्थिति में भी एकादश भाव का आंकलन किया जाता है. संतान की सफलता के विषय में जानने के लिए इस भाव को देख सकते हैं.बारहवें स्थान से बारहवां होने के कारण व्ययों में कमी के लिए भी देखा जाता है. बारहवें स्थान को अस्पताल का घर कहते है. मृत्युशैय्या के लिये बारहवें घर को देखा जाता है. परन्तु एकादश भाव से रोग से मुक्ति का विचार किया जाता है. कोई वस्तु खो गई हो अथवा कोई व्यक्ति घर छोड़कर चला गया हो तो इस विषय में सम्बन्धित बातों को जानने के लिए ग्यारहवें घर को देखा जाता है. बारहवां स्थान दु:ख का स्थान होता. इस भाव से मिलने वाले सभी विषयों में ग्यारहवां घर कमी लाता है.घर के बरामदे या टेरिस में स्थान दिया गया है. आय भाव के बाधित होने पर घर के बरामदे में रखी वस्तुओं में दिशा दोष आने की संभावना रहती है.एकादश भाव दशम स्थान(कर्म) से द्वितीय है| अतः कर्मों से प्राप्त होने वाले लाभ या आय एकादश भाव से देखे जाते हैं| मनुष्य को प्राप्त होने वाली प्राप्तियों के संबंध में एकादश भाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाव है| ये निज प्रयास या निजकर्मों द्वारा अर्जित व्यक्ति की उपलब्धियों की सूचना देता है फारसी में इस भाव को याप्ति खाने कहते हैं| यह भाव एक उपचय स्थान भी है| इस भाव की दिशा आग्नेय(South-East) है|द्वितीय भाव के साथ-साथ एकादश स्थान का भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति से घनिष्ठ संबंध है। जब भी किसी जन्मकुंडली में द्वितीय भाव के साथ-साथ एकादश भाव मजबूत स्थिति में होता है तो व्यक्ति धनवान, यशस्वी तथा अनेक प्रकार की भौतिक सुख- सुविधाओं को भोगने वाला होता है।पाप अकेला असर अकेला, तीन पांच नौ ग्यारह; शनि बली का साथ मिले तो, असर बढ़े गुणा ग्यारह।’’ कुण्डली के खाना नम्बर 11 को लाल किताब में गुरू अस्थान (जाये इन्साफ) इंसाफ की जगह या इन्सानी किस्मत की बुनियाद कहा गया है। इन्सान का जाती हाल (आमदन-कमाई-जन्म वक्त) या टेवे वाले का कुल दुनिया से ताल्लुक और सब की इकट्ठी (मुश्तर्का) किस्मत का मैदान हर शख्स अपने साथ लिए हुये है।

बुधवार, 22 अगस्त 2018

जातक ओर देवज्ञ

, एक ज्‍योतिषी के रूप में जब मैं तुम्‍हारे सामने आता हूं तब दैहिक दृष्टिकोण से यह हमारी पहली ही मुलाकात होती है। तुम्‍हें ऐसा लगता होगा कि तुम मुझसे पहली बार मिल रहे हो। मुझे भी कमोबेश पहली मुलाकात में ऐसा ही लगता है। 

हकीकत इससे कुछ जुदा होती है हमारे मिलने से कई क्षणों, मिनटों, घंटों, दिनों, हफ्तों, महीनों या कभी कभार सालों पहले तुमसे मिलने की तैयारी शुरू हो चुकी होती है। तुम्‍हारे साथ बिताए पल कुछ इस तरह होते हैं कि तुम मेरे चेहरे और कुण्‍डली के निर्जीव से खानों पर नजर गड़ाए देखते रहते हो और मैं समय के विस्‍तार में खो जाता हूं। जहां सितारों के संकेत पूरी शिद्दत से तुम्‍हारी कहानी कह रहे होते हैं। समय के फलक पर उन क्षणों में मैं तुम्‍हारे साथ विचरण करता हूं। हां, मैं यह दावा करता हूं कि भूत, वर्तमान और भविष्‍य के बीच समय ने जो पर्दा डाल रखा है, मैं उसके पार देखने जुर्रत करता हूं। मेरे गुरुओं ने मुझे सिखाया कि संकेतों को समझो और खुद को इतना पारदर्शी बनाओ कि जो जातक अपनी समस्‍याएं लेकर आए वह चाहे तो भी तुमसे अपने अतीत को छिपा न सके, ताकि तुम जातक की वर्तमान सुदशा या दुर्दशा का सही आकलन कर सको। हां, मैंने अभ्‍यास किया है, समय के पार झांकने का। मुझे खुद नहीं पता कि संकेत कहां से और कितनी मात्रा में आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो इतने स्‍पष्‍ट होते हैं कि मैं खुद आश्‍चर्यचकित रह जाता हूं। मैं उन्‍हें देखकर बोलता हूं और जातक को लगता है जैसे मैं कहीं नेपथ्‍य में लिखे उसके भूतकाल को पढ़कर सुना रहा हूं। संकेतों का विश्‍लेषण और जातक के जीवन की घटनाओं का तारतम्‍य इतना रोचक होता है कि मैं खुद भी मुग्‍ध हो जाता हूं और तुम्‍हें तो मैं आश्‍चर्यचकित होता हुआ देखता हूं।

ज्योतिष के उपाय पर कुछ जानकारी

 मित्रो उपाय के बारे में कुछ जानकारी। NOTE :---कृपया पूरा लेख पढ़ें तभी पता चलेगा की उपाय क्यों और कैसे करने चाहिए मित्रों वोहोत से लोग जो कुडली दिखने आते है वो कहते है

 की किसी के कहने पर हम ने यह उपाय किया और हमारा नुकसान हो गया या टीवी पर कोई प्रोग्राम देख क्र हमने यह उपाय किया और हमारा नुकसान हो गया किसी ने कहा की मेरे मकान का कुछ हिंसा गिर गया और पंडित जी टीवी में बता रहे थे की अगर मकान गिर जाए तो शनि खराब होता है और उन्होंने जो उपाय बताया था हम ने किया और हमारे घर चोरी हो गई या कोई कहता है की हमारा बच्चा बीमार हो गया और तो और कई वार हमसे भी लोग सीधा फोन क्र के कहते है की हमारी गाड़ी खराब हो गई है क्या हम शनि को तेल चढ़ा सकते है या हम नीलम पहन ले आज कल कुछ लोग तो टीवी देख क्र ही खुद ज्योतिषी बन बैठे है दोस्तों टीवी पर जो पंडित जी प्रोग्राम देते है वो गलत नहीं है उन पंडित जी के उपाय भी गलत नहीं है वहां पर गलती आप लोग करते हो आप ने प्रोग्राम देखा और कुछ भी उसके साथ आपका मैच हो गया तो आप फौरन बताए गए उपाय क्र देते हो दोस्तों एक बात आप को बता रहा हूँ की कभी भी कोई दिक्कत परेशानी हो तो बगैर कुंडली दिखाए कभी कोई भी उपाय न करें क्यों की अगर आपकी गाडी खराब हो जाये तो आप कहोगे की मेरा शनि खराब हो गया मैं शनि की चीजे दान क्र दू तो यह गलत होगा अगर आपका शनि योगकारी है और अपने शनि का दान क्र दिया तो उल्टा नुकसान ही होगा इसी तरह किसी की शादी न हो तो लोग कहते है की जा भाई तेरा शुक्र खराब है जा शुक्र का उपाय क्र ले अगर शादी नहीं हो रही तो क्या कोई और वजह नहीं हो सकती हो सकता है कुंडली में कोई दोष हो उसका उपाय होगा न की शुक्र का आज कल लोग अपना काम खुद खराब करते है टीवी और अखवार की वजह से जो उसमे बताया उसी के हिसाब से उपाय क्र लिया नुकसान हुआ तो दोष टीवी या अखवार वालों का निकालेंगे भाई सबसे पहले अपनी कुंडली किसी अच्छे जानकारी वाले ज्योतिषी से दिखाएँ और उन्हें पूछे की मैं कोण कोण सी चीज दान क्र सकता हूँ कोण से रत्न पहन सकता हूँ ऐसी कोई चीज जो की आपके लिए दान करना मना हो वो भी जरूर पूछे तो देखिये की आपकी जिंदगी कैसे चलती है आज कल खास क्र शनि देव के वारे में लोग बहुत ही नेगेटिव सोचते है पता लगा की शनि का ढैया या साढ़ेसाती शुरू हुई तो शुरू क्र देंगे रोज़ रोज़ उपाय कभी तेल कभी तिल कभी काले उड़द कभी छाता काला कपडा लोहा तवा अंगीठी चिमटा पता नहीं क्या क्या चीज़े दान क्र देते है और नुकसान पे नुकसान होता जाता है और जब ज्योतिषी से कुंडली चेक करवाते है तब जाकर पता चलता है की हमारा तो शनि उच्च का था या हमारा शनि योगकारी था हमे तो दान करना ही नहीं था तब जाकर होश ठिकाने आते है की साढ़ेसाती तो आपको कुछ देने आई थी अपने उल्टा अपना नुकसान करवा लिया बहुत से लोग हमे भी गलत कह देते है क्योंकि जब हम किसी योग या दोष की जानकारी फेसबुक के माध्यम से पहुचाते है तो उस योग या दोष के कुछ साधारण से उपाए भी दिए होते है कई लोग अपनी कुंडली देखते है और देखा की यह दोष तो मेरी कुंडली में है मैं यह उपाय कर देता हूँ बहुत से लोगों को उस उपाय से फायदा होता है पर कुछेक लोगों को नुकसान भी उठाना पड़ता है फायदे वाले लोग तो बहुत कम बताते है पर जिनका कोई नुकसान होता है वह तुरंत फोन घुमा देता है पंडित जी को और लग जाता है शिकवे शिकायतें करने। उससे हमे गुस्सा नहीं आता हम उस जातक से उसकी डिटेल मांगते है और उस की कुंडली अच्छी तरह देखते है तो कारण मिल जाता है और हमारी शोध होती है कारण यह होता है की जो दोष उसकी कुंडली में है उसका उपाय तो वो करता नहीं है जैसे राहु आज कल सिंह राशि में है और जातक का लगन मेष कर्क सिंह बृश्चिक धनु या मीन हुआ और उस आदमी ने गलती से राहु का उपाय तो किया नहीं उल्टा पीली चीजों का दान कर दिया तो सोचो की उसका क्या होगा दोस्तों कोई भी लेख हम लिखते है किसी भी दोष या योग का तो सबसे पहले उस दोष का निवारण अवश्य करवाएं उसके बाद अपने ज्योतिषी की सलाह पर ही कोई दान या रत्न पहने बहुत से दोस्तों का सवाल होता है की हमारी कुंडली में तो इतने अच्छे अच्छे योग है फिर भी हमें तरक्की नहीं मिलती तो दोस्तों मैं आपको आज एक बात कह रहा हूँ की योग जितने मर्ज़ी अच्छे हो पर सभी कुंडलियों में वह अच्छे फल नहीं देते क्यों की एक तो हम यह नहीं देखते की वो योग किस घर में है या ओर योग पर किसी दुश्मन ग्रेह की दृस्टि तो नहीं है या किसी भयंकर दोष की दृष्टि तो नहीं है या वो योग पाप कर्त्री या कालसर्पदोष में तो नहीं है अगर सब कुछ ठीक होते हुए भी उसका फल नहीं मिल रहा तो अपनी जिंदगी की तरफ झांको की तुमने कौन कौन से पाप किये है या जो कर्म तुम कर रहे हो क्या वो ठीक है तो आपको आपकी सफलता के वरे में बहुत जल्द पता चल जायेगा दूसरा रही बात दोष या योग के उपाय की तो सही में वो उपाय वही करवा सकता है जिसने आपको उस दोष के बारे में बताया है। कुछ लोग जो अपनी कुंडली दिखने आते है अगर उनको किसी दोष क्र बारे में बताओ तो वो कहता है की हां पंडित जी मुझे पता है मैंने इसका उपाय 5 साल पहले करवा दिया था अब बस आप मुझे कोई उपाय बता दो जिससे काम हो जाये मुझे कोई रत्न बता दो। अरे भाई यही कुछ पूछना है तो उसी के पास जाओ जिससे उपाय करवाया हमे क्या पता की उसने क्या करवाया क्या नहीं इसको एक उदाहरण से समझाता हूँ।---------मान लो किसी को कोई भयानक रोग हो गया (यह जो कुंडली में दोष होते है वह भी भयानक रोग की तरह ही होते है )और वह हॉस्पिटल या डॉकटर के पास जाता है तो डॉकटर उसको टेस्ट लिख कर देता है वो आदमी टेस्ट करवाके दोबारा डॉकटर को मिलता है और टेस्ट दिखाता है डॉक्टर उसको दवाई लिख देता है और अपनी फ़ीस ले लेता है डॉक्टर उसे यह टेस्ट हर साल करवाने को कहता है और साथ में कुछ दवाई के बारे में बताता है की इसको चार पांच साल तक लेना है कुछ दिन दवाई लेने के बाद आदमी ठीक हो जाता है। और डॉक्टर की बताई बात को भुला देता है की हर साल टेस्टों पर कोण पैसा खर्च करें . 2 -3 साल जिंदगी अच्छी निकली और फिर से वो ही दिक्कत शुरू हो गई तो व्यक्ति फिर से उसी डॉक्टर के पास जाता है डॉक्टर फिर से उसे टेस्ट करवाने को कहता है और अपनी फ़ीस ले लेता है। व्यक्ति घर आकर सोचता है और वीवी बच्चों से सलाह करता है की इसी डॉक्टर से 3 साल पहले इलाज करवाया और टेस्ट करवाए आज फिर पहले से भी ज्यादा टेस्ट लिख दिए क्यों न किसी दुसरे सस्ते डॉक्टर की सलाह ली जाये इसकी तो फ़ीस भी बहुत है टेस्टों का खर्च भी बहुत है । वो व्यक्ति किसी दुसरे झोला छाप डॉक्टर के पास चला जाता है और बीमारी बताता है डॉक्टर ने खूब अच्छी तरह कभी आगे से कभी पीछे से कभी गला कभी नब्ज़ कभी लेटाकर कभी बैठाकर उसको चैक किया और उसको 10-12 रूपये की जेनेरिक दवाई दी और उससे 150 रुपये ले लिए। व्यक्ति बहुत खुश हुआ और घर आ कर सभी को बताया की इसने तो टोटल डेढ़ सौ रूपये लिए और आधा घंटा लगाया चेक करने को पहले वाले की तो फीस ही 300 थी दो मिनट चैक किया और 500 के टेस्ट लिख दिए और दवाई स्टोर से मिली 350 की। व्यक्ति एक दिन दवाई खाता है और सुबह तक ज्यादा बीमार हो जाता है सुबह उठते ही बच्चे आनन फानन में उसे किसी और अच्छे डॉक्टर के पास ले जाते है और होता क्या है की वहां पर भी सबसे पहले टेस्ट करवाने को ही बोल गया क्यों की जो टेस्ट तीन साल पहले हुए थे उसके हिसाब से दवाई खाई और वह ठीक हो गया और तीन साल बाद जब दोबारा बीमार हुआ तो डॉक्टर ने फिर से टेस्ट करवाने ही है और उसी के हिसाब से दवाई देनी है अगर वह वयक्ति हर साल बाद टेस्ट करवाता रहता तो आज वो ज्यादा बीमार न होता एक बार ठीक होने पर वह लापरवाह हो गया था इसी वजह से आज उसे ज्यादा दिक्कत आई है। दोस्तों ऐसे ही उपाय काम करते है जब हमारी कुंडली में कोई भयंकर दोष होता है तो उसका समय समय पर उपाय करना होता है कई दोष ऐसे होते है जिनका उपाय हम रूटीन में करवाते है जैसे की जातक को बता दिया जाता है की कौन कौन से रंग के कपड़े नहीं पहनने यह उस तरह है जैसे डॉक्टर रोगी को परहेज़ बताता है। वैसे ही कुछ दोष ऐसे होते है जिनका उपाय हर महीने करना पड़ता है और कुछ दोष ऐसे भी होते है जिनका उपाय हर साल करना पड़ता है जितनी देर उस ग्रेह की समय सीमा निकल नहीं जाती जिसके साथ वह दोष है। NOTE :--------पर किसी अच्छे ज्योतिषी से मिल कर कुंडली दिखा कर। घर बैठे बैठे टीवी ,अखवार या फेसबुक या किसी और माध्यम से जो जानकारी मिलती है वो जानकारी लेनी अच्छी बात है क्यों की अगर आपको किसी दोष की जानकारी होगी तभी तो आप ज्योतिषी से उस दोष पर चर्चा कर सकते हो। पर उसके हिसाब से उपाय किसी से पूछ कर ही करो तो फायदा मिलेगा दोस्तों डॉक्टर समय समय पर टेस्ट करवाते है और ज्योतिषी उपाय करवाते है अगर आपको पूरी जिंदगी अच्छी सफलता चाहिए तो समय रहते दोषों का उपाय बहुत जरूरी है। लाल किताब में तो साफ साफ लिखा है की अपने जन्म दिन से 10 -15 दिन पहले कुंडली अवश्य दिखाएँ क्योंकि जन्म दिन से पहले कुंडली दिखाने पर पूरे साल के जो भी बुरे ग्रेह है उनका उपाय हो जाता है। इसी तरह ही सभी उपाय काम करते है चाहे वो लाल किताब है या वैदिक है समय समय पर उपाय बहुत जरूरी है धन्यवाद

शनि का रत्न नीलम

अगर आपकी कुंडली में शनि किसी मुख्य भाव का कारक है , तो उस भाव को मजबूत करने के लिए नीलम का प्रयोग किया जाता है , नीलम रत्न को पहनने से मन में , तीव्रता आती है

 , व्यवहार बदलाव करता है जिससे वह अपने आस पास को अच्छे से समझ सकता है , शनि रिसर्च का कारक होता है , तो जब आपका मन शांत और तीव्र होता है तो आप अच्छे से शोध करने में सक्षम हो जाते है । * नीलम में aluminium oxide और chromium पाया जाता है , तो रासायनिक तौर पर आपके दिमाग को मदद करता है कुछ खोज कर निकालने में अगर आपका दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है , जो भी आप निर्णय लेते है वह गलत पे गलत है , तो नीलम रत्न मन को शांत करता है । नीलम रत्न आपकी कुशलता बढ़ाता है , जिससे आप किसी भी कार्य को गम्भीरता से करने में सक्षम होते है । जब आपको लगे कि नौकरी में दुसरे लोग आपके ऊपर कुछ ज्यादा ही हावी होते जा रहे है , आपका पड़े में मन नहीं लग रहा , जिसे कहते है कि दिमाग का saturation point आ चूका है कि अब न तो कुछ सोचने कि क्षमता है और न ही समझने कि , तो नीलम रत्न आपके लिए है । * नीलम रत्न दूर-दृष्टि देने वाला है , अगर किसी व्यक्ति को नीलम उसकी कुंडली के अनुसार अनुकूल होता है तो वह व्यक्ति बोहोत मेधावी बन सकता है । * अगर नीलम रत्न को शनीवार को ही पहने अगर निलम आनुकुल है तो सपने अच्छे आऐगे अगर आपको सूट नही है तो सपने ङरावने किस्म के आऐगे हा कोई भी रतन दो या चार दिन मे ना तो विपरीत ना रातो रात पैसा दिला सकता है यानी तो मंदा ना चंगा कर सकता है कुछ दिन पहनने से ही पता चलेगा मैने ऐक मित्र को रतन घारन करवाया दो दिन वाद उसका eऐक्सीङेन्ट हो गया उसके साथ दो ओर लोग थे जिन को काफी चोटे लगी कई रोज तक उनका ईलाज चलता रहा पर मेरे मित्र को खरोच तक नही आई गाङी की हालत देख कर लगता था कि शायद ही कोई वचा हो वो मेरे पास आया उसने मुझे घन्यावाद दिया कि आज नीलम की वजह से मे वचा हु उसकी जगह कोई ओर होता तो यहउल्टा भी सोच सकता था कि रतन की वजह से हादसा हो गया मैरा कहना है पुरे विश्वास के साथ रतन को घारन करे ओर ऐक दो दिन के अन्दर कोई निर्णय ना ले कई वार हम वहम का शिकार हो जाते है ऐसा ना करे कई वार वजय कोई ओर होती है हम समझते है कि रतन पहना ईस लिऐ हुआ है हो सकता है नुकसान ज्यादा होना हो रतन कि वजह सै कम हो गया हो जातको गोचर के गृह भी हमे प्रभावित करते है जैसे ईस समय शनी मंगल की युती ओर राहु गुरु की युती कई लोगो की लुटिया ङवो सकती है यह समय थोङाखराव चल सकता है आचार्य राजेश

परा विद्या के द्वारा क्या होता है

परालौकिक शक्तिभूत-प्रेत, पिशाच, आत्माएं जरा सोचिए एक ऐसी ताकत जो आपको ना तो नुकसान पहुंचा रही है न ही आपके लिए कोई परेशानी खड़ी कर रही है 

लेकिन फिर भी उसका दिखाई ना देना आपके लिए कितना भयामय है भूत-प्रेत, पिशाच, आत्माएं इन सब से जुड़ी बातें जितनी ज्यादा रोमांचित करती हैं उतनी ही सिहरन और भय का माहौल भी बनाती हैं. रात के समय इन आत्माओं का अगर जिक्र भी छिड़ जाए तो भी चारों तरफ डर और भय का माहौल बन जाता है. बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो इस अंधेरी दुनिया और काले साये जैसी बातों पर भरोसा नहीं करते लेकिन एक सच यह भी है कि अच्छे के साथ-साथ बुरा भी होता है. अगर हम ईश्वर पर विश्वास करते हैं तो हमें पिशाचों पर भी विश्वास करना होगा, नहीं तो सत्य से मुंह फेरने वाली बात ही होगी. आपने ऐसे बहुत से लोगों कोवो दिखाई भी देते है ओर वहुँत से लोग ईनकी पकङ मे फंस जाते है अपनी इच्छाओं और अधूरी आंकाक्षाओं को पूरा करने के लिए कुछ लोग मरने के बाद भी वापिस आते हैं. इसके अलावा अगर अपने संबंधियों या परिचितों के साथ उनका कोई सौदा बकाया रह जाता है तो भी उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती और वह उस लेन-देन को पूरा करने के लिए जीवित लोगों की दुनिया में कदम रखते हैं.अगर मरते हुऐ आदमी से कोई वायदा किया हो ओर आप उसे पुरा नही करते तो आत्मा जन्मो तक पिछा नही छोङती बिना शरीर के मृत आत्माएं अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकतीं इसीलिए उन्हें एक शरीर की आवश्यकता पड़ती है. वह किसी व्यक्ति के शरीर में वास कर अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करती हैं. यह उनकी इच्छा की गहराई और उसके पूरे होने की समय सीमा पर निर्भर करता है कि वह किसी व्यक्ति के शरीर में कितनी देर तक ठहरते हैं. यह अवधि कुछ घंटों या सालों की भी हो सकती है. कई बार तो जन्मों-जन्मों तक वह आत्मा उस शरीर का पीछा नहीं छोड़ती. ऐसा माना जाता है कि जानवर किसी आत्मा या पिशाच की उपस्थिति को सबसे पहले भांप सकता है. अगर रात के समय कोई कुत्ता बिना किसी कारण के भौंकने लगे या अचानक शांत होकर बैठ जाए तो इसका मतलब है उसने किसी पारलौकिक शक्ति का अहसास किया है.सुक्ष्मरुम मे भी आत्माऐ घुमती है झगड़े या विवाद के पश्चात किसी भूमि या इमारत का अधिग्रहण किया जाता है और इस झगड़े के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो वह जगह हॉंटेड बन जाती है. निश्चित तौर पर वहां बुरी आत्माएं अपना डेरा जमा लेती हैं. जीवित लोगों को बहुत चीजें प्यारी होती हैं. किसी को अपना मोबाइल प्यारा होता है तो कोई अपने कैमरे के बिना नहीं रह सकता. लेकिन अगर आप यह सोचते हैं कि मरने के बाद यह प्यार समाप्त हो जाता है तो आप गलत हैं. क्योंकि मरने के बाद भी चीजों के साथ यह लगाव बरकरार रहता है और जिन चीजों को मृत व्यक्ति अपने जीवन में बहुत प्यार करता था मरने के बाद भी उसे अपना ही समझता है. इसीलिए अगर कोई दूसरा व्यक्ति उस वस्तु को हाथ लगाए तो यह उन्हें बर्दाश्त नहीं होता.. भूत-प्रेत का नाम सुनते ही अचानक ही एक भयानक आकृति हमारे दिमाग में उभरने लगती है और मन में डर समाने लगता है। हमारे दैनिक जीवन में कहीं न कहीं हम भूत-प्रेत का नाम अवश्य सुनते हैं। कुछ लोग भूतों को देखने का दावा भी करते हैं जबकि कुछ इसे कोरी अफवाह मानते हैं। भूत-प्रेत से जुड़ी कई मान्यताएं व अफवाएं भी हमारे समाज में प्रचलित हैं। विभिन्न धर्म ग्रंथों में भी भूत-प्रेतों के बारे में बताया गया है। सवाल यह उठता है कि अगर वाकई में भूत-प्रेत होते हैं तो दिखाई क्यों नहीं देते या फिर कुछ ही लोगों को क्यों दिखाई देते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार जीवित मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना होता है-पृथ्वी, जल, वायु, आकाश व अग्नि। मानव शरीर में सबसे अधिक मात्रा पृथ्वी तत्व की होती है और यह तत्व ठोस होता है इसलिए मानव शरीर आसानी से दिखाई देता है। जबकि भूत-प्रेतों का शरीर में वायु तत्व की अधिकता होती है। वायु तत्व को देखना मनुष्य के लिए संभव नहीं है क्योंकि वह गैस रूप में होता है इसलिए इसे केवल आभास किया जा सकता है देखा नहीं जा सकता। यह तभी संभव है जब किसी व्यक्ति के राक्षण गण हो या फिर उसकी कुंडली में किसी प्रकार का दोष हो। मानसिक रूप से कमजोर लोगों को भी भूत-प्रेत दिखाई देते हैं जबकि अन्य लोग इन्हें नहीं देख पाते। धर्म शास्त्रों के अनुसार भूत का अर्थ है बीता हुआ समय। दूसरे अर्थों में मृत्यु के बाद और नए जन्म होने के पहले के बीच में अमिट वासनाओं के कारण मन के स्तर पर फंसे हुए जीवात्मा को ही भूत कहते हैं। जीवात्मा अपने पंच तत्वों से बने हुए शरीर को छोडऩे के बाद अंतिम संस्कार से लेकर पिंड दान आदि क्रियाएं पूर्ण होने तक जिस अवस्था में रहती है, वह प्रेत योनी कहलाती है। गरूण पुराण के अनुसार व्यक्ति की मृत्यु के बाद पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान देते हैं, इससे भी पापी प्राणी की तृप्ति नहीं होती क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस कारण भूख-प्यास से युक्त होकर प्राणी यमलोक को जाते हैं इसके बाद जो पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे मर के प्रेत रूप होते हैं और निर्जन वन में दु:खी होकर भटकते रहते हैं। प्रत्येक नकारात्मक व्यक्ति की तरह भी भूत भी अंधेरे और सुनसान स्थानों पर निवास करते हैं। खाली पड़े मकान, खंडहर, वृक्ष व कुए, बावड़ी आदि में भी भूत निवास कर सकते हैं। हमें कई बार ऐसा सुनने में आता है कि किसी व्यक्ति के ऊपर भूत-प्रेत का असर है। ऐसा सभी लोगों के साथ नहीं होता क्योंकि जिन लोगों पर भूत-प्रेत का प्रभाव होता है उनकी कुंडली में कुछ विशेष योग बनते हैं जिनके कारण उनके साथ यह समस्या होती है। साथ ही यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा नीच का हो या दोषपूर्ण स्थिति में हो तो ऐसे व्यक्ति पर भी भूत-प्रेत का असर सबसे ज्यादा होता है। प्रेत बाधा से ग्रस्त व्यक्ति की आंखें स्थिर, अधमुंदी और लाल रहती है। शरीर का तापमान सामान्य से अधिक होता है। हाथ-पैर के नाखून काले पडऩे के साथ ही ऐसे व्यक्ति की भूख, नींद या तो बहुत कम हो जाती है या बहुत अधिक। स्वभाव में क्रोध, जिद और उग्रता आ जाती है। शरीर से बदबूदार पसीना आता है। हमारे आस-पास कई ऐसी अदृश्य शक्तियां उपस्थित रहती है जिन्हें हम देख नहीं पाते। यह शक्तियां नकारात्मक भी होती है और सकारात्मक भी। सिर्फ कुछ लोग ही इन्हें देख या महसूस कर पाते हैं। राक्षस गण वाले लोगों को भी इन शक्तियों का अहसास तुरंत हो जाता है। ऐसे लोग भूत-प्रेत व आत्मा आदि शक्तियों को तुरंत ही भांप जाते हैं। राक्षस गण, यह शब्द जीवन में कई बार सुनने में आता है लेकिन कुछ ही लोग इसका मतलब जानते हैं। यह शब्द सुनते ही मन और मस्तिष्क में एक अजीब सा भय भी उत्पन्न होने लगता है और हमारा मन राक्षस गण वाले लोगों के बारे में कई कल्पनाएं भी करने लगता है। जबकि सच्चाई काफी अलग है। ज्योतिष शास्त्र के आधार पर प्रत्येक मनुष्य को तीन गणों में बांटा गया है। मनुष्य गण, देव गण व राक्षस गण। कौन सा व्यक्ति किस गण का है यह कुंडली के माध्यम से जाना जा सकता है। मनुष्य गण तथा देव गण वाले लोग सामान्य होते हैं। जबकि राक्षस गण वाले जो लोग होते हैं उनमें एक नैसर्गिक गुण होता है कि यदि उनके आस-पास कोई नकरात्मक शक्ति है तो उन्हें तुरंत इसका अहसास हो जाता है। कई बार इन लोगों को यह शक्तियां दिखाई भी देती हैं लेकिन इसी गण के प्रभाव से इनमें इतनी क्षमता भी आ जाती है कि वे इनसे जल्दी ही भयभीत नहीं होते। राक्षस गण वाले लोग साहसी भी होते हैं तथा विपरीत परिस्थिति में भी घबराते नहीं हैं।हा साघना सिद्दी करने वाले लोग भी ईनको देख सकते या ईन से वात कर सकते है मैने देखा है मन्दिर या कोई घर्म स्थानों मे आत्मा होती है। आओर वुरी आत्मा कावास यहा शराव जुआ या वुरे काम उनको वहा रहने मे तृप्ति मिलती है ।आज ईतना ही आचार्य राजेश

वक्री गुरु

मित्रो कल की पोस्ट से आगे वात करते श्चिक का सप्तम केतु और अष्टम का गुरु वक्री आपको बता दूँ कि वक्री गुरु उस जीव के सामाजिक व्यवहारिक धार्मिक आदि सभी क्रिया कलापों को बदल कर दिखाने वाला होता है,पिता अगर अपने धर्म को लेकर चलने वाला होता है तो पुत्र जिसका वक्री गुरु होता है वह अपनी भावना मे धर्म को केवल अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये ही प्रयोग मे लेता है,पिता अगर किसी मन्दिर मे जाकर प्रार्थना करता है कि हे ! प्रभु आपकी शरण मे हूँ,

आप ही रक्षा करना,तो पुत्र की कामना होगी कि हे प्रभु ! मेरे अमुक काम को पूरा कर दो,काम पूरा होते ही आपके मन्दिर मे वापस आऊंगा। यह सब केवल उन्ही कारणो के कारण होता है जिनके अन्दर सम्बन्ध और भौतिकता का बोलबाला होना होता है। एक साल मे तीन महिने के समय के लिये लगभग गुरु वक्री होता है और समाज मे एक चौथाई लोग इस वक्री गुरु के समय मे पैदा होकर समाज रिवाज नीति रीति से बिलग होकर चलने के लिये मजबूर होते है और इसी कारण से समाज के अन्दर विकृति भी पैदा होती है,विभिन्न प्रकार के बदलाव भी देखने को मिलते है। अगर राहु लगन मे बैठ जाये और केतु सप्तम मे वृश्चिक राशि का होकर पुरुष की कुंडली मे हो तथा गुरु वक्री होकर स्वगृही चन्द्रमा के साथ अष्टम मे बैठ जाये तो समझ लेना चाहिये कि कुल का समाप्ति का समय आ गया है। वक्री गुरु अक्सर अपने प्रभाव के कारण जो भी कारण बनायेगा वह समाज नियम कानून आदि की तरफ़ जाने वाला नही होगा,जातक अपने बचपन मे इतना तेज हो जायेगा कि उसे कठिन से कठिन से कारण बहुत जल्दी याद हो जायेंगे जो बालक साल भर मे शिक्षा को पूरा करने मे अपनी बुद्धि को प्रयोग मे लायेगा वक्री गुरु वाला जातक उसी शिक्षा को तीन महिने मे पूरी करने के बाद आगे के क्लास मे जाने की युति बना लेगा। वह जिस जगह पर समाज मे धर्म आठमे पैदा हुआ है वह बाहर के कारणो मे अपने को बहुत ही आगे ले जाने वाला बन जायेगा और विदेशी भाषा संस्कृति तथा केवल शारीरिक सुख धन का सुख और अपने को दिखाने का सुख ही प्राप्त करने मे लगा रहेगा उसे अपने वंश चलाने या अपने कुल को बढाने मे कोई मतलब नही होगा। अगर पत्नी किसी कारण से मर्यादा वाली मिल जाती है तो जातक के सप्तम मे वृश्चिक के केतु के कारण काम सुख से पूर्ण नही हो पायेगी और उसे हिस्टीरिया जैसे रोग पैदा हो जायेंगे.धीरे धीरे जातक अपने पत्नी वाले माहौल से सामाजिक या कानूनी तौर पर दूर होने की कोशिश करेगा और जैसे ही दूर हुआ वह अपने समाज से बहुत दूर चला जायेगा।मित्रो ज्योतिष मेरा profession है ओर वहुँत से मित्र दक्षिणा मांगने पर नाराज हो जाते है मित्रो हम कुंङली पर पुरी मेहनत करते है फिर ही फल कथन करते है ओर आपकी जो समस्या होती है उसका उपाय आपको वताते है अगर आप मुझे कुंङली दिखाना चाहते है तो मिले या online पर भी यह सुविधा ले सकते है maakaali jyotish hanumaangarh or dabwali 07597718725 09414481324 आचार्य राजेशअगर लेख अच्छा लगे तो like करे नही लगे तो कमी जरुर वताऐ

ज्योतिषीय योग और ऊपरी बाधा

मा काली ज्योतिष की पोस्ट मित्रो पिछले कुछ लेख के द्वारा मैने तंत्र से लेकर किये कराऐ पर चर्चा की वहुँत से मित्रो ने फोन पर घन्यावाद किया आज ईसी पर ज्योतिष मे यह योग जो उपरी वाघा दे सकते है आप अपने अनुभव से भी जाचे यह जरुरी नही की हर किसी की यह समस्या हो हा यह योग चलते यह हो सकती है

 ऐसा माने शाकिनी दोष के लिये हमेशा कुंडली में अष्टम भाव या वृश्चिक राशि के ग्रहों को देखा जाता है अगर इस भाव या इस राशि में कोइ गृह है और उस गृह को राहू की नजर लगी हुयी है तो शाकिनी दोष पिशाच दोष प्रेत बाधा या ऊपरी हवा का दोष कहा जाता है.एक जातक जिसकी कुंडली में वृश्चिक राशि है और चन्द्रमा के साथ शनि विराजमान है,राहू पंचम में अपने स्थान को बनाकर बैठा है मीन राशिका राहू है और केतु ग्यारहवे भाव में है.अलावा ग्रहों में मंगल धनु राशि का दूसरे भाव में है,गुरु वक्री होकर चौथे भाव में है,सूर्य और बुध दसवे भाव में है,शुक्र तुला राशि का होकर बारहवे भाव में है.वर्त्तमान में केतु की दशा चल रही है और केतु में राहू का अंतर चल रहा है,राहू का गोचर शनि और चन्द्रमा के साथ चल रहा है. शाकिनी दोष के लिए यह भी माना जाता है की जातक की पिछली जिन्दगी में कोइ ऐसा काम हो गया था जिसके द्वारा वह इस जीवन में अपने शरीर के दोष के कारण तरक्की नहीं कर पाता है जब तक माता पिता की सहायता रहती है जातक चलता रहता है और जैसे ही माता पिता की सहायता समाप्त होती है जातक का कूच करने का समय आजाता है. इस दोष को देने के लिए जीवन के प्रति पारिवारिक सदस्य अक्सर जिम्मेदार होते है,वह सदस्य भले ही परिवार में अच्छी मान्यता रखते होते है लेकिन उनकी सोच जातक के प्रति गलत ही हो जाती है,इस कारण से कुद्रष्टि का मामला भी माना जाता है.जातक को इस दोष के कारण भोजन पानी शरीर को पनपाने के उपाय सभी व्यर्थ हो जाते है.जो भी दवाईया दी जाती है या जो भी चैक अप आदि करवाए जाते है सभी किसी न किसी प्रकार से दोष पूर्ण हो जाते है और जो भी बीमारी या कारण है वह किसी भी प्रकार से समाझ में नहीं आता है.अक्सर राहू मीन राशि का होकर जब कर्क और वृश्चिक राशि पर अपना असर डालता है और इन भावो में विराजमान ग्रह वह भले ही शनि सूर्य मंगल आदि क्यों न हो वह अपनी दृष्टि से इन्हें बरबाद कर देता है और इनके गलत प्रभाव जीवन में मिलाने लगते है.मीन राशि का राहू आसमानी हवा यानी ऊपरी हवा का कारण माना जाता है,शनि वृश्चिक राशि में शमशानी जमीन के लिए और चन्द्रमा जब शनि के साथ हो तो शमशानी रूप में समझी जाने वाली आत्मा के रूप में माना जाता है.इस आत्मा के प्रभाव से जातक का शरीर कोप होने के समय ठंडा हो जाता है और कभी कभी ऐसा लगता है जातक का कूच करने का समय आ गया है या कोइ भी कार्य करने के लिए जातक अपनी रूचि को पैदा करता है वैसे ही यह राहू शनि चन्द्र का प्रभाव जातक को अचानक सर्दी वाली बीमारी या नाक का बहना अथवा मॉल त्याग के समय अधिक ताकत लगाने के कारण गुर्दों की खराबी जैसी बीमारिया पैदा कर देता है,किया गया भोजन पेट में जमा रह जाता है और उस जमे भोजन की बजह से शरीर में कई तरह के इन्फेक्सन पैदा होने लगते है,यह इन्फेक्सन खून के साथ मिलकर शरीर के तंत्रिका तंत्र पर अपना प्रभाव देते है.इन प्रभावों के कारण शरीर में कभी कभी बहुत अधिक गर्मी मिलती है कभी कभी शरीर बिलकुल ठंडा हो जाता है.अक्सर शरीर के जननांगो में कोइ चमड़ी वाला रोग या खाज खुजली वाली बीमारी भी होनी पायी जाती है. सूर्य का चन्द्रमा से दसवे भाव में होना और शनि के साथ रहने से जातक के पिता के लिए माना जाता है की उसका निवास किसी शमशानी स्थान में है जहां या तो पहले कोइ कब्र आदि बनी होती है या मुर्दे जलाने का स्थान होता है.इसके अलावा भी देखा जाता है की पिता के द्वारा रहने वाले स्थान के आसपास किसी ऐसे अस्पताल का होना या जहां कसाई वृत्ति से जुड़े कार्यों का होना,जैसे चमड़े का कारोबार होना या पशुओं को काटने के बाद उनका मांस आदि बेचा जाना भी माना जाता है.अधिकतर मामले में पिता का मानसिक क्षेत्र या तो इसी प्रकार के कार्यों से लाभ लेने का होता हो या जातक के पिता के द्वारा बाहरी लोगो को इसी प्रकार के सामानों का बेचना या कारोबार करना हो,जिससे अधिक से अधिक धन का कमाया जाना भी माना जाता है, मित्रो आप मे से कोई अपनी कुंङली दिखाना या विवेचना करवानी है तो हमारी दक्षिणा देनी होगी 09414481324 07597718725 माकाली ज्योतिष hanumaangarh or dabwali आचार्य राजेश

गुरु जीव का कारक

मित्रो मेरी यही कोशिश रहती है आपको ज्योतिष के वारे ज्यादा से ज्यादा जानकारी हो यही मेरा प्रयास रहता है आपमे से वहुँत मित्र मुझे फोन पर कहते है 

कि आपकी पोस्ट से हमे वहुँत सिखने को मिल रहा है तो वहुँत खुशी होती है कहा जाता है कि आत्मा जब अपने साकार रूप को प्रकट करती है और उस आत्मा के रूप को प्रकट करने का क्षेत्र शुद्ध और सात्विक होता है तो वह आत्मा अपने अन्दर उन्ही गुणो के शरीर को धारण करके आती है जैसा उस स्थान की धरती का प्रभाव होता है। यह प्रभाव भी उसी प्रकार से माना जाता है जैसे एक बीज को बोने के लिये अलग अलग जमीन का प्रयोग किया जाता है और जमीन के प्रभाव के अनुसार ही बीज की उत्पत्ति होती हैकुंडली मे गुरु जीव का अधिकारी होता है सूर्य आत्मा का अधिकारी माना जाता है मंगल आत्मीय शक्ति को बढाने वाला होता है बुध आत्मीय प्रभाव को प्रसारित करने का कारक होता है शुक्र जीव को सजाने और आत्मा के भावो को प्रकट करने मे अपनी सुन्दरता को प्रकट करता है तो चन्द्रमा आत्मीय मन को सृजित करने का भाव पैदा करता है.शनि भौतिक रूप को प्रकट करता है और जीव के कर्म को करने के लिये अपनी योग्यता को प्रकट करता है। यूरेनस दिमाग के संचार को प्रकट करने और भौतिक संचार को बनाने बिगाडने का काम करता है प्लूटो मिट्टी को मशीन मे परिवर्तित करने का कार्य करता है नेपच्यून आत्मा के विकास का अधिकारी माना जाता है.समय के अनुसार जीव का रूप परिवर्तन होता रहता है जैसे आदिम युग मे जीव का रूप कुछ और होता था पाषाण युग मे कुछ था मध्य युग मे कुछ और था और वर्तमान मे कुछ और है तथा आने वाले भविष्य मे जीव का रूप कुछ हो जायेगा। जीव वही रहता है रूप परिवर्तन मे सहायक प्लूटो को मुख्य माना गया है,जो आधुनिकता से लेकर अति अधुनिकता को विकसित करने के लिये लगातार अपने प्रभाव को बढाता जा रहा है और हम क्या से क्या होते जा रहे है,लेकिन जीव के विकास की कहानी के साथ आत्मा का रूप नही बदल पाता है जीव कितना ही आधुनिक हो जाये आत्मा वही रहती है। जो भी कर्म किये जाते है उनका प्रभाव आत्मा पर उसी प्रकार से पडता रहता है जैसे एक चिट्टी विभिन्न डाकघरो मे जाकर डाकघर की उपस्थिति को दर्शाने के लिये अपने ऊपर उन डाकघरो की मुहर अपने चेहरे पर लगाकर प्रस्तुत करती है। कुंडली सिंह लगन की है और सूर्य विद्या से प्राप्त बुद्धि के भाव मे विराजमान है,सूर्य का साथ देने के लिये बुध जो लगन का चेहरा और भौतिक प्राप्ति तथा कार्य के प्रभाव का नाम प्रस्तुत करने की भावना को भी देता है। सूर्य का प्रभाव धरती तक लाने के लिये सूर्य किरण ही जिम्मेदार होती है। बिना सूर्य किरण के सूर्य का प्रभाव धरती पर आ ही नही सकता है,बुध को किरण का रूप मानने पर यही पता चलता है कि बुध सूर्य की गरमी रोशनी जीवन की प्रस्तुति को धरती तक लाने के लिये संचार का काम करता है इसलिये बुध को संचार का ग्रह कहा गया है। पंचम भाव विद्या के भाव से दूसरा भाव होने से विद्या से प्राप्त बुद्धि को प्रयोग करने का भाव भी कहा गया है और जब इस भाव मे गुरु की धनु राशि का समागम होता है तो ऊंची शिक्षा वाली बुद्धि को प्राथमिक शिक्षा जैसा माना जाता है। कानून की कारक यह राशि विदेशो से भी सम्बन्ध रखती है धर्म और भाग्य से भी यह राशि जुडी होती है साथ ही यात्रा और धार्मिकता को फ़ैलाने या उस धार्मिकता से लोकहित के कार्य करने के लिये भी अपनी युति को प्रस्तुत करती है। इस राशि के प्रभाव को अगर पंचम मे लाया जाता है तो ऊंची जानकारी को खेल खेल मे प्रस्तुत करने की कला भी मानी जाते है,सूर्य भी हकीकत मे कालपुरुष की कुंडली के अनुसार इसी भाव का मालिक है,राज्य और राजनीति से भी सम्बन्ध रखता है। लेकिन उद्देश्य कुछ भी हो मतलब शिक्षा से ही होता है। पुराने जमाने की जो कहानी कही जाती है कि गुरुओं मे इतनी दम होती थी कि वे मिट्टी को चलाने फ़िराने लगते थे,वे कहानिया अविश्वसनीय लगती है,हम कभी कभी कह देते है कि यह सब कपोल कल्पित है,लेकिन आज जिधर भी नजर घुमाई जाती है उधर ही मरी हुयी मिट्टी दौड रही है जिस इंसान को देखो मरी मिट्टी से ही खेल रहा है काम कर रहा है उसी मिट्टी को प्रयोग मे लाकर कमा रहा खा रहा है उसी मिट्टी पर बैठ कर भागा जा रहा है उसी मिट्टी से एक दूसरे से संचार कर रहा है,लेकिन उस जमाने की बातें कपोल कल्पित लगती है ! पुराने गुरु पीले कपडे पहिन कर विद्या को प्रदान किया करते थे लेकिन आधुनिक गुरु कम कपडे पहिन कर कम काम करके अधिक बुद्धि का प्रयोग करके जो कारक पैदा कर रहे है उन्हे गुरु की उपाधि से दूर करने के बाद वैज्ञानिक की उपाधि दे रहे है,वास्तविकता भी है कि जब गुरु सुपर गुरु हो जाता है और मरी मिट्टी मे इतनी जान डाल देता है कि उसका जीवन बिना मरी मिट्टी के बेकार सा हो जाता है तो वह दिमाग को हर पल हर क्षण हर

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...