गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

महामृत्युंजय मंत्र


महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का एक श्लोक है.शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित ये महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है.स्वयं या परिवार में किसी अन्य व्यक्ति के अस्वस्थ होने पर मेरे पास अक्सर बहुत से लोग इस मन्त्र की और इसके जप विधि की जानकारी प्राप्त करने के लिए आते हैं. इस महामंत्र के बारे में जहांतक मेरी जानकारी है,वो मैं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ महामृत्युंजय गायत्री संजीवनी मंत्र ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ त्रयंबकंयजामहे ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान ऊँ धियो योन: प्रचोदयात ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ अक्सर हम लोग घर मे ईसका पाठ करवाते है यातो विमारी से छुटकारा पाने के लिऐ या गृह पिङा शांत करने के लिऐ मित्रो पर वात फिर भी नही वनती कभी सोचा है आपने इस मंत्र का फल क्यो नही मिलता हजारो रुपऐ खर्च करने के वाद भी कई कारण है मित्रो यह विघा मुझे वहुत कठीन प्रयास के वाद ऐक पहुचे हुऐ सिद्ध तपस्वी योगी जी से मिली यह मेरी खुशाकिस्मती है पहला कारण इसमें ऐक वीज मंत्र- कम है यानी पासवर्ङ छुपा दिया गया जो जानकारी कर्मकांड करने वाले पंङित ओर पुजारी लोगो को पता नही दुसरा इसमें आचरन की शुद्धि तथा तपोवल की वहुँत जरुरत है तीसरा खुद की सिद्दि जी यह मंत्र जव तक किसा का सिद्द नही तव तक काम नही करेगा वस आपको तसल्ली हो जाती है कि आपने सवा लाख का जाप करवा लिया अव हमारे योगीयो ने वो वीज इस लिऐ छुपा दिया क्योकि इस मंत्र मे वहुँत शक्ति है ओर इसका गलत प्रयोग भी हो सकता है दुसरा कारण शांत वातावरन ओर ऐकान्त या घ्यान लग जाऐ ओर यह सव रात के समय ही संभव है पुजारी लोग सिर्फ कर्मकांङ पर ही घ्यान देते है वस ओर कुछ नही यह मंत्र जाप मानसिक ओर घ्यान से सम्वघित है पर कलयुग का वोलवाला है दोस्तो सच ना तो कोई सुनना चाहता है ना मानना पुरी पोस्ट पङ कर कुछ लोगो को वुरा लग सकता है पर सच तो सच ही है वाते तो ओर भी इसके सम्वन्घ मे पर आज नही आचार्य राजेश

सिद्धकुंजिकास्तोत्रम

: सिद्धकुंजिकास्तोत्रम ****** स्वयं बाबा भोलेनाथ ने इस भूलोक में ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए एक महाकुंजिका स्तोत्र की रचना अपने मुख से की । जो भक्त इस मंत्र को नित्य उनका ध्यान करके पढ़ेगा, उसे इस संसार में धन-धान्य, समृद्धि, सुख-शांति और निर्भय जीवन व्यतीत करने के समस्त साधन प्राप्त होंगे। यह एक गुप्त मंत्र है।

 इसके पाठ से भक्त के ऊपर किया हुआ समस्त व्यभिचार कर्म स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं | इसके पाठ से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि उद्देश्यों की भी पूर्ति होती है। इसके पाठ से सम्पूर्ण दुर्गाशप्तशती के पाठ का फल प्राप्त होता है | यह मंत्र कुछ इस तरह हैः--- शिव उवाच शृणु देवी प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम | येन मन्त्रप्रभावेण चंडीजापः शुभो भवेत || १ || न कवचं नार्गालास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम | न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम || २ || कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत | अति गुह्यतरं देवी देवानापि दुर्लभम || ३|| गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वती | मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम | पाठमात्रेण संसिद्ध्येत कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम || ४ || अथ मन्त्रः -- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चमुण्डायै विच्चे।। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।। नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी । नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ।। नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे । ऐंकारी सृष्टिरूपायै, ह्रींकारी प्रतिपालिका।। ३ || क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तु ते । चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ।। धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी । क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरू ।। हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नम: ।। अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरू कुरू स्वाहा ।। पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।। म्लां म्लीं, म्लूं मूल विस्तीर्ण कुन्जिकाए नमो नमः सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरूष्व मे ।। इदं तु कुंजिका स्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे | अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वती || यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् । न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ।।... कम से कम 20 बार पहले बोल चुका फिर कहता हूं इस मां के कुंजिका स्तोत्र के 21 पाठ रोज करना शुरू कर दें फिर इसका प्रभाव 3 महीने के बाद दिखना शुरु हो जाएगा जय माता दी

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

तंत्र-विद्या (Tantra)

https://youtu.be/rLabGPgeiFUतंत्र हमारे प्राचीन हिन्दु-शास्त्रों में कुंडलिनी साधना' का उल्लेख आता है। ऐसे प्राचीन ग्रंथों में साधना के कई मार्ग दिखाए गए हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने हमारे शरीर के भीतर छह चक्रों की खोज की थी। वे छह चक्र क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि तथा आज्ञा चक्र हैं। मूलाधार चक्र में एक सर्पिणी ढाई कुंडल मारकर बैठी रहती है, जिसे कुंडलिनी कहते हैं। हमारे मेरुदण्ड में तीन मुख्य नाडियाँ होती हैं, इडा, पिंगला और सुषुम्ना। जैसे-जैसे योगाभ्यास द्वारा जब कुंडलिनी जागृत होकर इन छह चक्रों का भेदन करती हुई आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे साधक को तरह-तरह की सिद्धियाँ प्राप्त होती जाती है। अंत में कुंडलिनी आज्ञा चक्र को भेदते हुए सहस्रार बिंदुजिसे कुछ साघक सातव चक्र पर पहुँच जाती है तो वहाँ साधक को आलौकिक ज्ञान की प्राप्ति होने लगती है. यही एक बार इंसान की ऊर्जा सहस्रार तक पहुँच जाती है,
www.acharyarajesh.in तो वह पागलों की तरह परम आनंद में झूमता है। अगर आप बिना किसी कारण ही आनंद में झूमते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी ऊर्जा ने उस चरम शिखर को छू लिया है।दरअसल, किसी भी आध्यात्मिक यात्रा को हम मूलाधार से सहस्रार की यात्रा कह सकते हैं। यह एक आयाम से दूसरे आयाम में विकास की यात्रा है, इसमें तीव्रता के सात अलग-अलग स्तर होते हैं। आपकी ऊर्जा को मूलाधार से आज्ञा चक्र तक ले जाने के लिए कई तरह की आध्यात्मिक प्रक्रियाएं और साधनाएं हैं, लेकिन आज्ञा से सहस्रार तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। कोई भी एक खास तरीका नहीं है। आपको या तो छलांग लगानी पड़ती है या फिर आपको उस गड्ढे में गिरना पड़ता है, जो अथाह है, जिसका कोई तल नहीं होता। इसे ही ‘ऊपर की ओर गिरना‘ कहते हैं। योग में कहा जाता है कि जब तक आपमें ऊपर की ओर गिरने’ की ललक नहीं है, तब तक आप वहां पहुँच नहीं सकते।यही वजह है कि कई तथाकथित आध्यात्मिक लोग इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि शांति ही परम संभावना है, क्योंकि वे सभी आज्ञा में ही अटके पडे़ हैं। वास्तव में शांति परम संभावना नहीं है। आप आनंद में मग्न हो सकते हैं, इतने मग्न कि पूरा विश्व आपके अनुभव और समझ में एक मजाक जैसा लगने लगता है। जो चीजें दूसरों के लिए बड़ी गंभीर है, वह आप के लिए एक मजाक होती है।लोग अपने मन को छलांग के लिए तैयार करने में लंबे समय तक आज्ञा चक्र पर रुके रहते हैं। यही वजह है कि आध्यात्मिक परंपरा में गुरु-शिष्य के संबधों को महत्व दिया गया है। उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि जब आपको छलांग मारनी हो, तो आपको अपने गुरु पर अथाह विश्वास होना चाहिए। 99.9 फीसदी लोगों को इस विश्वास की जरूरत पड़ती है, नहीं तो वे छलांग मार ही नहीं सकते। यही वजह है कि गुरु-शिष्य के संबंधों पर इतना महत्व दिया गया है, क्योंकि बिना विश्वास कोई भी कूदने को तैयार नहीं होगा।

रविवार, 7 अप्रैल 2019

नवरात्र

आज नवरात्रो के इस महान पुनीत पर आप सबको एक गुरु या मित्र् के नाते एक गुरु-मन्त्र दे रहा हूँ बस मात्र आप इतना करिये घर में पूजा के स्थान पर माँ दुर्गाजी का यन्त्र स्थापित कर जल से स्नान , हल्दी से तिलक , अक्षत-पुष्प अर्पित कर घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर प्रातः सूर्योदय के साथ नवरात्र भर निम्न मन्त्र का 1 माला जप क देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि में परम् सुखम् | रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जही || या दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो: स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि || दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या | सर्वोपकारकारणाय सदाSSर्दचित्ता || 9 दिन बाद इसका प्रभाव आप स्वयं अनुभव करेगे || मैं नववर्ष के उपलक्ष में आप सभी को स्वस्थ रहने दीर्घायु यशस्वी धन-धान्य ऐशर्व्य सम्पन्न होने सद्गृहस्थ अच्छे पुत्र अच्छे पति अच्छे भाई आदि होने की कामना करता हूँ मेरा आशीर्वाद आपके साथ है आचार्य राजेशwww.acharyarajesh.in

नव दुर्गा मां

https://youtu.be/rLabGPgeiFUआप भी पङे ओर लाभ उठाऐ दुर्गा दुखों का नाश करने वाली देवी है। दुर्गा की इन नौ शक्तियों को जागृत करने के लिए दुर्गा के 'नवार्ण मंत्र' का जाप किया जाता है।

इसलिए नवरात्रि में जब उनकी पूजा आस्था, श्रद्धा से की जाती है तो उनकी नौ शक्तियां जागृत होकर नौ ग्रहों को नियंत्रित कर देती हैं। फलस्वरूप प्राणियों का कोई अनिष्ट नहीं हो पाता। दुर्गा की इन नौ शक्तियों को जागृत करने के लिए दुर्गा के 'नवार्ण मंत्र' का जाप किया जाता है। नव का अर्थ 'नौ' तथा अर्ण का अर्थ 'अक्षर' होता है। अतः नवार्ण नौ अक्षरों वाला वह मंत्र है । नवार्ण मंत्र- 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चै ।' नौ अक्षरों वाले इस नवार्ण मंत्र के एक-एक अक्षर का संबंध दुर्गा की एक-एक शक्ति से है और उस एक-एक शक्ति का संबंध एक-एक ग्रह से है। नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों में पहला अक्षर ' ऐं ' है, जो सूर्य ग्रह को नियंत्रित करता है। ऐं का संबंध दुर्गा की पहली शक्ति शैलपुत्री से है, जिसकी उपासना 'प्रथम नवरात्रि' को की जाती है। दूसरा अक्षर ' ह्रीं ' है, जो चंद्रमा ग्रह को नियंत्रित करता है। इसका संबंध दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी से है, जिसकी पूजा दूसरे नवरात्रि को होती है। तीसरा अक्षर ' क्लीं ' है, जो मंगल ग्रह को नियंत्रित करता है।इसका संबंध दुर्गा की तीसरी शक्ति चंद्रघंटा से है, जिसकी पूजा तीसरे नवरात्रि को होती है। चौथा अक्षर 'चा' है जो बुध को नियंत्रित करता है। इनकी देवी कुष्माण्डा है जिनकी पूजा चौथे नवरात्री को होती है। पांचवां अक्षर 'मुं' है जो गुरु ग्रह को नियंत्रित करता है। इनकी देवी स्कंदमाता है पांचवे नवरात्रि को इनकी पूजा की जाती है। छठा अक्षर 'डा' है जो शुक्र ग्रह को नियंत्रित करता है। छठे नवरात्री को माँ कात्यायिनी की पूजा की जाती है। सातवां अक्षर 'यै' है जो शनि ग्रह को नियंत्रित करता है। इस दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। आठवां अक्षर 'वि' है जो राहू को नियंत्रित करता है । नवरात्री के इस दिन माँ महागौरी की पूजा की जाती है। नौवा अक्षर 'च्चै ' है। जो केतु ग्रह को नियंत्रित करता है। नवरात्री के इस दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

महिमा गुरु की

https://youtu.be/5QlK8Oa_lmkइस दुनिया में हर एक चीज़ जो दी जाती है, वह कम होती है, और सिर्फ ज्ञान ही देने से बढ़ता है! वैसा स्वभाव है। सिर्फ ज्ञान ही! दूसरा कुछ भी नहीं। दूसरा सबकुछ तो घटता है। मुझे एक मित्र कहता है कि, 'आप जितना जानते हैं उतना क्यों कह देते हैं? थोड़ा कुछ डिब्बी में नहीं रखते?' मैंने कहा, 'अरे, देने से तो बढ़ता है! मेरा बढ़ता है और उसका भी बढ़ता जाता है, तो क्या नुकसान होता है जी हां ज्ञान ज्ञान का कारक गुरु है तो फिर हम आज गुरु की ही बात करेंगे गुरु ही ब्रह्मा है गुरु ही विष्णु 

है गुरु ही महेश्वर है,गुरु ही साक्षात दिखाई देने वाला ब्रह्म है तो गुरु को क्यों नही माना जाये। वैसे पूजा गुरु की ब्रह्मा के रूप में की जाती है,और गुरु के रूप में चलते फ़िरते धार्मिक लोगों को उनकी जाति के अनुसार धर्म कर्म करवाने वाले लोग जिन्हे हिन्दू पंडित कहते है मुसलमान मौलवी कहते है ईशाई पादरी कहते है। गुरु कोई बनावटी काम नही करता है वह जन्म से ही रूहानी कार्य करने के लिये अपने को आगे रखता है। वह अपनी हवा को चारों तरफ़ फ़ैलाने की कार्यवाही करता है,पहला गुरु पिता होता है जिसने अपने बिन्दु को माता के गर्भ के द्वारा शरीर रूप में परिवर्तित किया है दूसरा गुरु संसार का हर रिस्ता है जो कुछ न कुछ सिखाने के लिये अपना धर्म निभाता है वह रिस्ता अगर दुश्मनी का भी है तो भी लाभकारी होता है कि उससे दुश्मनी के गुण धर्म भी सीखने को मिलते है,तीसरा गुरु अपना खुद का दिमाग होता है जो समय पर अपने ज्ञान की समिधा से जीवन के लिये अपनी सुखद या दुखद अनुभूति को प्रदान करता है। बाकी के गुरु स्वार्थ के लिये अपना काम करते है कोई घर्म को बढाने के लिये और कोई अपनी संस्था के विकास के लिये मायाजाल फ़ैलाने का काम करते है। गुरु के अन्दर की शक्ति एक हाकिम जैसी होती है यानी जैसा हुकुम गुरु ने दिया उसी के अनुसार सभी काम होने लगे,बिना गुरु के सांस लेना भी दूभर होता है कारण गुरु ही हवा का कारक है और सांस बिना गुरु के नही ली जा सकती है। धातुओं मे गुरु को उसी धातु को उत्तम माना जाता है

ज्योतिष में अगर गुरु को देखा जाता है तो पहले भाव में सिंहासन पर बैठा साधु ही माना जाता है उसके पास चाहे कुछ भी हो लेकिन उसके अन्दर अहम नही होता है और न ही वह दिखावा करता है,दूसरे भाव में संसार के लिये तो वह गुरु होता है लेकिन अपने लिये वह हमेशा फ़कीर ही रहता है तीसरा भाव गुरु को खानदान का मुखिया तो बना देता है लेकिन अपने ही बच्चे उसका आदर नही करते है,चौथा गुरु रखता तो राजा महाराजा की तरह से लेकिन अपन को कभी स्थिर नही रहने देता है,पांचवा गुरु स्कूल के मास्टर जैसा होता है कहीं भी गल्ती देखी और अपनी विद्या को बिखेरना शुरु कर देता है कितने ही गालियां देते जाते है और कितनी ही सिर को टेकते जाते है उसे गालियों से और सिर टेकने से कोई फ़र्क महसूस नही होता है। छठा गुरु जब भी बुलायेगा तो बुजुर्गों को ही मेहमान के रूप में बुलायेगा कभी भी जवान लोगों से दोस्ती नही करता है,सातवां गुरु रहेगा हमेशा निर्धन ही लेकिन वह कितना ही जवान हो अपने को बुजुर्गों जैसा ही शो करेगा,आठवां गुरु बच्चे को भी बूढों की बाते करते हुये देख कर खुस होने वाला होता है,नवां गुरु घर में सबसे बडा होगा मगर यह शर्त नही है कि वह अपने ही खून का रिस्तेदार है या कहीं से आकर टिका हुआ व्यक्ति है। दसवां गुरु खतरनाक होता है अपने बाप की खराब आदतों की बजह से दूसरे ही बचपन को जवानी तक खींच कर ले जाने वाले होते है,ग्यारहवा गुरु बिना बुलाये ही मेहमान बनकर आने वाला माना जाता है उसे मान अपमान की चिन्ता नही होती है उसे केवल अपने स्वार्थ से मतलब होता है,कहीं भी दिक्कत आने पर पतली गली से निकलने में अपनी भलाई समझता है,बारहवां गुरु अपने परिवार के लिये बेकार माना जाता है उसे अपने शरीर की भी चिन्ता नही रहती है और मिल जाये तो रोज लड्डू खाये नही तो नमक रोटी से भी गुजारा चला ले,बच्चे हो तो भी बिना बाप जैसे बच्चे दिखाई देते है।

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

महाशक्तिशाली बगलामुखी यन्त्र /कवच

https://youtu.be/rLabGPgeiFUमहाशक्तिशाली बगलामुखी यन्त्र /कवच महाविद्याओं में से एक प्रमुख महाविद्या और शक्ति हैं ,जिन्हें ब्रह्मास्त्र विद्या या शक्ति भी कहा जाता है |यह परम तेजोमय शक्ति है जिनकी शक्ति का मूल सूत्र -प्राण सूत्र है |प्राण सूत्र ,प्रत्येक प्राणी में सुप्त अवस्था में होता है जो इनकी साधना से चैतन्य होता है ,इसकी चैतन्यता से समस्त षट्कर्म भी सिद्ध हो सकते है ,,बगलामुखी को सिद्ध विद्या भी कहा जाता है ,मूलतः यह स्तम्भन की देवी है पर समस्त षट्कर्म इनके द्वारा सिद्ध होते है और अंततः यह मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है …

ताबीज आदि में एक बृहद उर्जा विज्ञानं काम करता है ,जो ब्रह्मांडीय उर्जा संरचना ,क्रिया ,तरंगों ,उनसे निर्मित भौतिक इकाइयों की उर्जा संरचना का विज्ञानं है ,,,इस उर्जा संरचना को ही तंत्र कहा जाता है |इसकी तकनीक प्रकृति की स्वाभाविक तकनीक है ,,,यही तकनीक तंत्र ,योग ,सिद्धि ,साधना में प्रयुक्त की जाती है ,-ताबीज में प्राणी के शारीर और प्रकृति की उर्जा संरचना ही कार्य करती है ,,इनका मुख्या आधार मानसिक शक्ति का केंद्रीकरण और भावना होता है ,,,,प्रकृति में उपस्थित वनस्पतियों और जन्तुओ में एक उर्जा परिपथ कार्य करता है ,मृत्यु के बाद भी इनमे तरंगे कार्य करती है ,,,,इनमे विभिन्न तरंगे स्वीकार की जाती है और निष्कासित की जाती है |जब किसी वास्तु या पदार्थ पर मानसिक शक्ति और भावना को केंद्रीकृत करके विशिष्ट क्रिया की जाती है तो उस पदार्थ से तरंगों का उत्सर्जन होने लगता है ,,,,जिस भावना से उनका प्रयोग जिसके लिए किया जाता है ,वह इच्छित स्थान पर वैसा कार्य करने लगता है,,ताबीज बनाने वाला जब अपने ईष्ट में सचमुच डूबता है तो वह अपने ईष्ट के अनुसार भाव को प्राप्त होता है ,,भाव गहन है तो मानसिक शक्ति एकाग्र होती है ,जिससे वह शक्तिशाली होती है ,यह शक्तिशाली हुई तो उसके उर्जा परिपथ का आंतरिक तंत्र शक्तिशाली होता है और शक्तिशाली तरंगे उत्सर्जित करता है |ऐसा व्यक्ति यदि किसी विशेष समय,ऋतू-मॉस में विशेष तरीके से ,विशेष पदार्थो को लेकर अपनी मानसिक शक्ति और मन्त्र से उसे सिद्ध करता है तो वह ताबीज धारक व्यक्ति को उस भाव की तरंगों से लिप्त कर देता है |यह समस्त क्रिया शारीर के उर्जा चक्र को प्रभावित करती है और तदनुसार व्यक्ति को उनका प्रभाव दिखाई देता है ,साथ ही इनका प्रभाव आस पास के वातावरण पर भी पड़ता है क्योकि तरंगों का उत्सर्जन आसपास भी प्रभावित करता है | बगलामुखी यन्त्र माता बगलामुखी का निवास माना जाता है जिसमे वह अपने अंग विद्याओ ,शक्तियों ,देवों के साथ निवास करती है ,अतः यन्त्र के साथ इन सबका जुड़ाव और सानिध्य प्राप्त होता है ,,यन्त्र के अनेक उपयोग है ,यह धातु अथवा भोजपत्र पर बना हो सकता है ,पूजन में धातु के यन्त्र का ही अधिकतर उपयोग होता है ,पर सिद्ध व्यक्ति से प्राप्त भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र बेहद प्रभावकारी होता है ,,धारण हेतु भोजपत्र के यन्त्र को धातु के खोल में बंदकर उपयोग करते है ,,जब व्यक्ति स्वयं साधना करने में सक्षम न हो तो यन्त्र धारण मात्र से उसे समस्त लाभ प्राप्त हो सकते है ,| यन्त्र /कवच धारण से लाभ ---------------------------------.. १. बगलामुखी की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है |, २. शत्रु पराजित होते है ,सर्वत्र विजय मिलती है | ३. ,मुकदमो में विजय मिलती है ,वाद विवाद में सफलता मिलती है | ४. अधिकारी वर्ग की अनुकूलता प्राप्त होती है ,| ५. विरोधी की वाणी ,गति का स्तम्भन होता है |, ६. शत्रु की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ,उसका स्वयं विनाश होने लगता है |,, ७. ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ,|हर कार्य और स्थान पर सफलता बढ़ जाती है | ८. व्यक्ति के आभामंडल में परिवर्तन होने से लोग आकर्षित होते है |, ९. प्रभावशालिता बढ़ जाती है ,वायव्य बाधाओं से सुरक्षा होती है |, १०. तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव समाप्त हो जाते है ,सम्मान प्राप्त होता है ,| ११. ,परीक्षा ,प्रतियोगिता आदि में सफलता बढ़ जाती है |, १२. भूत-प्रेत-वायव्य बाधा की शक्ति क्षीण होती है क्योकि इसमें से निकलने वाली सकारात्मक तरंगे उनके नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास करते हैं और उन्हें कष्ट होता है |, १३. मांगलिक और उग्र देवी होने से नकारात्मक शक्तियां इनसे दूर भागती हैं | १४. मांगलिक ,पारिवारिक कार्यों में आ रही रुकावट दूर होती है | १५. धारक पर से किसी भी तरह के नकारात्मक दोष दूर होते हैं | १६. शरीर में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह बढने से आत्मबल और कार्यशीलता में वृद्धि होती है | १७. आलस्य ,प्रमाद का ह्रास होता है |व्यक्ति की सोच में परिवतन आता है ,उत्साह में वृद्धि होती है | १८. किसी भी व्यक्ति के सामने जाने पर सामने वाला प्रभावित हो बात मानता है और उसका विरोध क्षीण होता है |, १९. घर -परिवार में स्थित नकारात्मक ऊर्जा की शक्ति क्षीण होती है | २०. नौकरी ,व्यवसाय ,कार्य में स्थायित्व प्राप्त होता है | यह समस्त प्रभाव यन्त्र धारण से भी प्राप्त होते है और साधना से भी ,साधना से व्यक्ति में स्वयं यह शक्ति उत्पन्न होती है |,यन्त्र धारण से यन्त्र के कारण यह उत्पन्न होता है |,यन्त्र में उसे बनाने वाले साधक का मानसिक बल ,उसकी शक्ति से अवतरित और प्रतिष्ठित भगवती की पारलौकिक शक्ति होती है जो वह सम्पूर्ण प्रभाव प्रदान करती है जो साधना में प्राप्त होती है |,अतः आज के समय में यह साधना अथवा यन्त्र धारण बेहद उपयोगी है |............................................................

सोमवार, 25 मार्च 2019

शुक्र ग्रह (Venus planet)

शुक्र ग्रह                                                  ग्रहों का असर जिस तरह प्रकृति पर दिखाई देता है ठीक उसी तरह मनुष्यों पर यह असर देखा जा सकता है। आपकी कुंडली में ग्रह स्थिति बेहतर होने से बेहतर फल प्राप्त होते हैं। वहीं ग्रह स्थिति अशुभ होने की दशा में अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं। बलवान ग्रह स्थिति स्वस्थ सुंदर आकर्षण की स्थितियों की जन्मदाता बनती हैं तो निर्बल ग्रह स्थिति शोक संताप विपत्ति की प्रतीक बनती हैं। लोगों के मध्य में आकर्षित होने की कला के मुख्य कारक शुक्र ग्रह हैं। कहा जाता है कि शुक्र जिसके जन्मांश लग्नेश केंद्र में त्रिकोणगत हों वह आकर्षक प्रेम सौंदर्य का प्रतीक बन जाता है।

https://youtu.be/imrKJp6BDkkhttps://youtu.be/imrKJp6BDkkह शुक्र जी क्या है और बनाने व बिगाड़ने में माहिर शुक्र देव का पृथ्वी लोक में कहां तक प्रभाव हैशुक्र मुख्यतः स्त्रीग्रह, कामेच्छा, वीर्य, प्रेम वासना, रूप सौंदर्य, आकर्षण, धन संपत्ति, व्यवसाय आदि सांसारिक सुखों के कारक है। गीत संगीत, ग्रहस्थ जीवन का सुख, आभूषण, नृत्य, श्वेत और रेशमी वस्त्र, सुगंधित और सौंदर्य सामग्री, चांदी, हीरा, शेयर, रति एवं संभोग सुख, इंद्रिय सुख, सिनेमा, मनोरंजन आदि से संबंधी विलासी कार्य, शैया सुख, काम कला, कामसुख, कामशक्ति, विवाह एवं प्रेमिका सुख, होटल मदिरा सेवन और भोग विलास के कारक ग्रह शुक्र जी माने जाते हैं।वैभव का कारक होने की वजह से शुक्र  राजा की तरह बर्ताव करता है। जनरली इसका फेवरेट कलर पिंक, ब्लू आदि होते हैं जो अमूमन स्त्रियों के मनपसंद कलर माने जाते हैं। अगर हम वाहनादि की बात करें तो कुण्डली में शुक्र की मजबूती चौपाए वाहन का सुख उपलब्ध कराता है जबकि कमजोर शुक्र होने से जीवन में इनका अभाव बना रहता है।सांसारिक व भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए मनुष्य की कुण्डली का शुक्र मजबूत व शुभ प्रभाव युक्त होना ही चाहिए। इसके अलावा शुक्र की विविध भावों में मौजूदगी भी उसकी किस्मत को खास ढंग से प्रभावित करती है। सांसारिक सुखों से है। यह रास, रंग, भोग, ऐश्वर्य, आकर्षण तथा लगाव का कारक है। शुक्र दैत्यों के गुरु हैं और कार्य सिद्घि के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद के प्रयोग से भी नहीं चूकते। सौन्दर्य में शुक्र की सहायता के बिना सफलता असंभव है।

 य, रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करने का शौकीन होता है। आजकल फैशन से वशीभूत ऐसे वस्त्रों का प्रचलन स्त्री वर्ग में बढ़ रहा है जो शरीर को ढंकने में अपर्याप्त होते हैं। यह संभवत: शीत प्रधान शुक्र-चन्द्र के प्रभाव क्षेत्रों की देन है। महिला वर्ग का चर्म परिधान शुक्र-चन्द्र एवं मंगल की परतों से बना होता है अर्थात् कोमलता तेज, रक्तिमा एवं सौन्दर्य का सम्मिश्रण ही उसकी विशेष आकर्षण शक्ति होती है।शुक्र ग्रह से प्रभावित युवतियां ही प्रतियोगिता के अंतिम राउंड तक पहुंच पाती है। कुछ ग्रह ऐसे भी होते हैं जो कुछ दूर तक तो युवतियों का सहयोग करते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे प्रतिभागियों के ग्रह भारी पड़ते हैं, कमजोर ग्रह वाली युवतियां पिछड़ने लगती है। यह भी ज्ञात हुआ है कि प्रतियोगिताओं के निर्णायक भी शनि, मंगल, गुरु जैसे ग्रहों से प्रभावित होते हैं। सौन्दर्य शास्त्र का विधान पूरी तरह से ज्योतिषकर्म और चिकित्सकों के पेशे जैसा ही है। अगर किसी निर्णायक को सौन्दर्य ज्ञान नहीं हो तो वह निर्णय भी नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक शुक्र से प्रभावित तो होते हैं लेकिन उन पर गुरु-चंद्रमा का भी प्रभाव होता है जो उन्हें विवेकवान बनाता है।

जन्म कुण्डली में तृतीय एवं एकादश भाव स्त्री का वक्षस्थल माना जाता है। गुरु-शुक्र इन भावों में बैठे हों या ये दोनों ग्रह इन्हें देख रहे हों, साथ में बली भी हों तो यह भाव सुन्दर, पुष्ट एवं आकर्षक होता है और आंतरिक सौन्दर्य परिधान सुशोभित करते हैं। पंचम एवं नवम भाव कटि प्रदेश से नीचे का होता है जो स्त्री को शनि गुरु प्रधान कृषता तथा स्थूलता सुशोभित करती है। अभिनय एवं संगीत में दक्षता प्रदान करने वाला ग्रह शुक्र ही है। शुक्र सौन्दर्य, प्रेम, कलात्मक अभिरुचि, नृत्य, संगीतकला एवं बुद्घि प्रदान करता है।

शुक्र यदि बली होकर नवम, दशम, एकादश भाव अथवा लग्न से संबंध करें तो जातक सौन्दर्य के क्षेत्र में धन-मान और यश प्राप्त करता है। लग्न जातक का रूप, रंग, स्वभाव एवं व्यक्तित्व को दर्शाता है। चोथाभाव  चन्द्रमा का जनता का प्रतिनिधित्व करता है। पंचम भाव बुद्घि, रुचि एवं मित्र बनाने की क्षमता को दर्शाता है। तुला राशि का स्वग्रही शुक्र मंच कलाकार या जनता के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन कर धन एवं यश योग देता है। मीन राशि के शुक्र कलात्मक प्रतिभा को पुष्ट करता है

तृतीय भाव सृजनात्मक योग्यता का सूचक है। इसका बली होना एवं लग्न से संबंध सौन्दर्यता में निपुणता लाता है। कुशल अभिनय के लिए चंद्रमा एवं संवाद अदायगी के लि

शनिवार, 23 मार्च 2019

क्या हीरा और गोमेद एक साथ पहिना जा सकता है ?

क्या हीरा और गोमेद एक साथ पहिना जा सकता है ?

किसी भी व्यक्ति के जीवन में रंगों और तरंगों का सर्वाधिक महत्व होता है। किसी भी व्यक्ति के शरीर में 7 चक्र होतें हैं और ये सातों चक्र रंगों और तरंगों कों ग्रहण करते हैं ।

https://youtu.be/3Uvq4Hc6BTMhttps://youtu.be/3Uvq4Hc6BTM रत्न भी इन्ही रंगों और तरंगों के माध्यम से व्यक्ति पर अपना प्रभाव डालतें हैं । रत्न का प्रभाव मानसिक स्थितिमें तुरन्त बदलावं लाता हैं उसके बाद शरीर पर प्रभाव डालता हैं फिर उसके बाद व्यक्ति के काम पर असर डालता हैं ।रत्नो का लाभ थोड़ी देर से होता हैं लेकिन नुकसान तुरंत हो जाता हैं। अलग - अलग रत्नो के अलग -अलग साइड इफेक्ट होतें हैं। अगर आपको रत्न धारण करनें के बाद लगे की रत्न  नुकसान कर रहा हैं तो रत्न कों तुरन्त निकाल दें।हीरा शुक्र का रत्न कहा जाता है और गोमेद राहु का रत्न कहा जाता है,राहु और शुक्र की युति अभी मैने आपके लिये लिखीहै और आप लोगों ने उसे फ़ेसबुक के माध्यम से सराहा भी है। पहले हीरा को समझना बहुत जरूरी है.

शुक्र का रत्न हीरा है और शुक्र के अलग अलग भाव और अलग अलग राशि से हीरे का रूप बदल जाता है,हीरे की कटिंग और उसकी धातु का परिवर्तन हो जाता है। मेष राशि के लिये हीरा जीवन साथी का और धन के क्षेत्र का मालिक है इसलिये हीरा १४४० धारी का सफ़ेद रंग का स्वर्ण धातु में अकेला पहिना जा सकता है।

लेकिन मेष राशि का शुक्र अगर लगन पंचम नवम मे है तो अन्यथा अन्य भावो में इस राशि के लिये हीरा अपनी प्रकृति को बेलेन्स नही कर पायेगा,और बजाय फ़ायदा के नुकसान देना शुरु हो जायेगा। जैसे इस राशि में शुक्र का स्थान अष्टम मे वृश्चिक राशि मे है तो हीरा किसी भी प्रकार से पहिनने के बाद खो जायेगा या चुरा लिया जायेगा या किसी प्रकार की दुर्घटना को दे कर वह चला जायेगा। इस बात के लिये कोहिनूर हीरे के इतिहास को देखकर समझा जा सकता है। महाराजा रंजीत सिंह तुला राशि के थे और उनका शुक्र वृश्चिक राशि का होकर दोसरे भाव में था। इस भाव मे शुक्र के होने के कारण उन्ही के हाथो से कोहिनूर का उनके हाथ से ही नही बल्कि देश से भी जाना हो गया,वह किसी प्रकार से मिल नही सकता है। इस शुक्र के लिये जो हीरा काम करता है वह कत्थई रंग का होने पर और लम्बे ओवल सेव का ही काम करेगा उसकी कटिंग भी ६४ धारी की होनी जरूरी है। इसी प्रकार से अगर राहु शुक्र के साथ है और शुक्र राहु की युति अगर पंचम स्थान में है तो मेष राशि का व्यक्ति राहु शुक्र के दोष को दूर करने के लिये तथा जातक की आदत जो हाथ मे दिल लेकर घूमने वाली होती है उसमे फ़ायदा देने के लिये पहिना जा सकता है, अथवा नहीं गोमेद का रंग भी सफ़ेद आभा वाला ही होना चाहिये और गोमेद को भी हीरे की कटिंग में ही कटा होना चाहिये। इसी प्रकार से अन्य राशियों के लिये अलग अलग तरह से हीरे को पहिना जा सकता है। अधिक जानकारी के लिये आप  अपनी कुंडली दिखा कर हम से सलाह लें सकते हैं आचार्य राजेश

मंगलवार, 19 मार्च 2019

#होली पर राहु का उतारा करे

होली जैसा उत्सव पृथ्वी पर खोजने से न मिलेगा। रंग गुलाल है। आनंद उत्सव है। तल्लीनता का, मदहोशी का, मस्ती का, नृत्य का, नाच  का—बड़ा सतरंगी  उत्सव है। हंसी के फव्वारों का, उल्लास का, एक महोत्सव है। ऐसा नृत्य करता उत्सव पृथ्वी पर कहीं भी नहीं  

      मित्रों लोग एक दूसरे से आपसी रंजिस मान लेते है कोई किसी बात पर कोई किसी बात पर इन सब बातो से दूर जाने के लिये राहु को उतारना जरूरी होता है। संवत की समाप्ति पर हिन्दू त्यौहारों में दुश्मनी को समाप्त करने के लिये भी एक त्यौहार का प्रचलन आदि काल से भारत मे चल रहा है जिसे होली के नाम से जाना जाता है। होली का शाब्दिक अर्थ हो +ली यानी जो होना था वह हो चुका,और जो हो चुका है उसे साथ लेकर चलने से कोई फ़ायदा नही है इसी बात को ध्यान मे रखकर रंगो का त्यौहार होली मनाया जाता है।होली का प्रचलन कब हुआ किसी को पता नही है लेकिन आदि काल से होली के लिये कई प्रकार के वृतांत लिखे और प्रचलन मे चलते हुये देखे जाते है। होली का एक रूप भगवान शिव के बदन पर उपस्थित भभूत को भी माना जा सकता है। साथ ही भक्त प्रहलाद की बुआ होलिका के द्वारा उन्हे जलाने के लिये किये जाने वाले प्रयास से भी माना जा सकता है। राहु का उदाहरण देखने के बाद पता चलता है कि जो अपने प्रभाव से ग्रहण में ले ले उसे राहु की उपाधि से विभूषित किया जाता है। होलिका को वरदान था कि वह अपने आंचल से जिसे ढक लेगी वह भस्म हो जायेगा और वह खुद बच जायेगी,इस बात को भी तांत्रिक रूप से देखा जा सकता है। दूसरे प्रकार को भी माना जाता है कि भगवान शिव अपने शरीर को भस्म से ढक कर रखते है,यह भस्म और कुछ नही बल्कि उनकी पूर्व पत्नी सती के शरीर की भस्म ही है जो उन्होने अपने पिता दक्ष की यज्ञ मे पिता के द्वारा अपमान के कारण आहुति देकर शरीर को जला डाला था। इस बात मे भी सती की ह्रदय से चाहत ही उन्हे सती की भस्म से विभूषित होने के लिये मानी जा सकती है। रंगो के द्वारा लोग एक दूसरे को रंगते है तो इसका भी मतलब होता है 

https://youtu.be/5QlK8Oa_lmkhttps://youtu.be/5QlK8Oa_lmkकि लोग अपने अपने अनुसार लोगों को अपने अपने पसंद के रंगो से रंगने के देखकर खुश होते है। भले ही जिसके रंग लगाया जा रहा है वह उसे पसंद नही हो लेकिन दूसरा व्यक्ति अपने रंग से रंगने के बाद देखकर खुश होता है। राहु के इस रंगो के रूप को देखकर भी एक प्रकार से जो व्यक्ति होली के रंगो से रंगने के पहले होता है वह रंगने के बाद उसकी शक्ल मे परिवर्तन होना भी इसी राहु की स्थिति से ग्रहण मे आया हुआ माना जाता है। आज के युग मे जब रंगो की उपलब्धि आराम से हो जाती है पुराने जमाने मे कैमिकल रंगो की अनुपस्थिति से और पेड पौधो की उपस्थिति से प्राकृतिक रंगो से संयोजन से जो होली मनाई जाती थी वह एक प्रकार से उपयुक्त भी होती थी और लोगो के लिये उनके शरीर से कोई दिक्कत नही देने वाली होती थी बल्कि उन रंगो से मौसम के अनुसार त्वचा और मन को पसंद करने वाले रंगो के कारण शरीर और मन को खुशिया देने के लिये भी मानी जा सकती थी। जब शरीर पर मल मल कर रंगो को पोता जाता है तो शरीर से उन रंगो को छुटाने के लिये शरीर को साफ़ भी करना होता है जब शरीर को साफ़ किया जाता है तो सर्दी के मौसम मे रोम कूपों मे जमा मैल भी छूटता है और त्वचा की बीमारिया तथा हर्षोल्लास के कारण मन् का ग्रहण भी कुछ समय के लिये दूर होता है यह बदलाव व्यक्ति के लिये चिन्ता आदि से दूर रहने का मुख्य कारण भी माना जाता है।

सोमवार, 18 मार्च 2019

ग्रहों की शांति के सरल उपाय भाग 2

https://youtu.be/1En3SQUPk_Eग्रहो की  शांति के सरल उपाय 2(चन्द्रमा)

वैसे तो चन्द्र देव का स्वभाव स्वभाव बहुत शांत और ठंडा होता है और यही वजह है कि वो हम सभी को शीतलता प्रदान करते है किन्तु जब वे पीड़ित पाप ग्रह के प्रभाव में  आते है तो उसके परिणाम बहुत भयंकर और विनाशकारी होसकते है.चन्द्रमा को प्रभावित करने वाले ग्रह बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु मंगल है। बुध अगर चन्द्रमा को बुरा फ़ल देता है तो बुरे लोगों से सम्पर्क बढने लगते है और व्यवसाय आदि के लिये मानसिक कष्ट मिलने लगते है। चन्द्रमा स्त्री ग्रह है और भावुकता के लिये भी जाना जाता है। शिवजी ने चन्द्रमा को सिर पर धारण किया है इसलिये चन्द्रमा के लिये आराध्य देव शिवजी को ही माना जाता है। राहु केतु चन्द्रमा को ग्रहण देने वाले है जब भी राहु के साथ जन्म कुंडली में चन्द्रमा गोचर करता है किसी न किसी प्रकार की भ्रम वाली स्थिति पैदा हो जाती है और वही समय चिन्ता करने वाला समय माना जाता है। कुंडली के जिस भाव में राहु होता है उसी भाव की बाते दिमाग में तैरने लगती है,अक्सर इसी समय में बडी बडी अनहोनी होती देखी गयीं है। केतु के साथ गोचर करने पर एक तरह का नकारात्मक भाव दिमाग में आजाता है किसी भी साधन के लिये लम्बी सोच दिमाग में बन जाती है और जैसे ही चन्द्रमा केतु से दूर होता है वह सोच केवल ख्याली पुलाव की तरह से समाप्त हो जाती है। चन्द्रका का गोचर जैसे ही मंगल के साथ होता है दिमाग में तामसी विचार मंगल के स्थापित होने वाली राशि के अनुसार पनपने लगते है,अगर मंगल वृश्चिक राशि में है तो उस कारक को समाप्त करने के लडाई करने के झगडा करने के मारने के कत्ल करने के विचार दिमाग में आने लगते है,अगर मंगल धनु राशि में होता है तो न्याय कानून विदेश धर्म आदि के लिये उत्तेजना पनपने लगती है,अगर चन्द्रमा गुरु के साथ होता है तो सम्बन्धो के मामले में गुरु के स्थान वाले प्रभाव के अनुसार मिलने लगता है,बुध के साथ होने पर बुध जैसा और बुध के स्थान के अनुसार मिलता रहता है,जन्म के चन्द्रमा पर अगर राहु ग्रहण देने लगा है तो चन्द्रमा के बल को बढाना चाहिये और राहु के बल को समाप्त करना चाहिये। राहु अगर वायु राशि में है तो मन्त्रों के द्वारा जाप करने पर और अग्नि राशि में है तो हवन आदि के द्वारा भूमि राशि में है तो राहु के देवता सरस्वती की मूर्ति की पूजा करने के बाद जो मूर्ति पूजन में विश्वास नही रखते है उनके लिये शिक्षा स्थान या मिलकर इबादत करने वाले स्थान में राहु के रूप को नमन करना चाहिये,पानी वाली राशि में होने पर पानी के किनारे राहु का तर्पण करना चाहिये। केतु के द्वारा चन्द्रमा पर असर होने पर चन्द्रमा के बल को रत्न और वस्तुयों के द्वारा बढाकर केतु के बल को क्षीण करना चाहिये। चन्द्रमा की धातु चांदी है और रत्न मोती तथा चन्द्रमणि है। जडी बूटियों में चन्द्रमा के लिये करोंदा का कांटे वाला पेड माना जाता है।

नियम :-

1.   चंद्रमा पानी का कारक है। इसलिए कुएं, तालाब, नदी में या उसके आसपास गंदगी को न फैलाएं। घर में किसी भी स्थान पर पानी का जमाव न होने पाए ।

2.   अंडे, शराब, मांस, मछली, तम्बाकू, एवं धूम्रपान का सेवन न करें । नशा नहीं करें ।

3.   झूठ बोलने से परहेज करें, बेईमानी और लालच ना करें 

4.   दूध पीकर या कोई सफेद मिठाई खाकर किसी चौराहे पर नहीं जाये 

5.   चंद्रमा के बलहीन होने पर माता और माता पक्ष से सम्बंधित रिश्तेदारों की सेवा सेवा करें ।

6.   व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए।

7.   चंद्रमा पानी का संबन्ध माता से होता है, इसलिए मां की सेवा करें और किसी भी प्रकार से उनका दिल ना दुखाएं। माता के पांव छूकर आशीर्वाद लें ।

8.   6ठे भाव का चंद्रमा दोष होने पर भूलकर भी दूध या पानी की छवील लगा कर  दान ना करें। 

9.   यदि कुंडली में चंद्रमा केतु के साथ विराजित हो तब जीविकोपार्जन में बाधा डालता है अतः ऐसे जातको को गणेश जी की पूजा करनी चाहिए।

10. सफेद और स्लेटी रंग चंद्रमा का प्रतीक होते हैं इसके अलावा चमकीला नीला, हरा और गुलाबी रंग, आसमानी रंग भी लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर होता है उन्हें काले और लाल रंग से परहेज रखना चाहिए।

11. अपनी बेटी के पैसे और धन का उपयोग न करे

12चांदी का चोकोर टुकडा अपने पास रखें

13.   चारपाई के चारों पायों पर चांदी की कीले लगाएं

14   शरीर पर चांदी धारण करें , चांदी का कड़ा धारण करें

15  मकान की नीव में चांदी दबाएं

नोटचौथे भाव में स्थित चंद्रमा पर केवल चंद्रमा का ही पूर्णरूपेण प्रभाव होता है क्योंकि वह चौथे भाव और चौथी राशि दोनो का स्वामी होता है. यहां चन्द्रमा हर प्रकार से बहुत मजबूत और शक्तिशाली हो जाता है. चंद्रमा से संबन्धित वस्तुएं जातक के लिए बहुत फायदेमंद साबित होती हैं. मेहमानों को पानी की के स्थान पर दूध भेंट करें. मां या मां के जैसी स्त्रियों का पांव छूकर आशिर्वाद लें. चौथा भाव आमदनी की नदी है जो व्यय बढानें के लिए जारी रहेगी. दूसरे शब्दों में खर्चे आमदनी को बढाएंगे

2.   श्वेत तथा गोल मोती चांदी की अंगूठी में रोहिणी ,हस्त ,श्रवण नक्षत्रों में जड़वा कर सोमवार या पूर्णिमा तिथि में पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की अनामिका या कनिष्टिका अंगुली में धारण करें। धारण करने से पहले अच्छी तरह से प्राण प्रतिष्ठित शुद्ध व सिद्ध करके धारण करेंचंद्रमा की स्थिति को संतुलित करना हो या फिर उसकी ताकत को बढ़ाना हो, दोनों ही मामलों में रत्न उपयोगी सिद्ध होते हैं। मसलन अगर आपकी कुंडली में चंद्रमा कमजोर  है तो आपको कम से कम 11रत्ती का मोती धारण करना चाहिए।

रविवार, 17 मार्च 2019

ग्रहो की शांति के सरल उपाय

ग्रहो की शांति के सरल उपाय

ज्योतिषी मित्रों को अक्सर यह समस्या आती है कि कोई सरल उपाय जो सभी के लिये उपयोगी वह कैसे ग्रहों के प्रति बताया जाये ? 

https://youtu.be/QE0ad0pGkAUhttps://youtu.be/QE0ad0pGkAUक्सर जो समर्थ होते है वे तो अपने अनुसार ग्रहों की पीडा का निवारण कर लेते है या करवा लेते है लेकिन जो असमर्थ होते है वे एक तो परेशान होते है ऊपर से अगर उन्हे कोई रत्न या महंगी पूजा पाठ को बता दिया जाये तो कोढ में खाज जैसी हालत हो जाती है। ज्योतिष की मान्यता के अनुसार इसका क्षेत्र अथाह समुद्र की तरह से है,और मान्यताओं के अनुसार जो वैदिक जमाने से चली आ रही है अगर ग्रहों के उपाय किये जायें तो वे सचमुच में फ़लीभूत होते है। ज्योतिषी उपाय में रत्न एक अहम भूमिका रखते हैं

रत्न कब और कैसे धारण किये जायें

रत्न धारण करने के लिये पहले यह देख लेना चाहिये कि कौन सा ग्रह कुंडली में योगकारक और शुभ है किस क्रूर या पापी या त्रिक भाव के ग्रह से पीडित है,जो ग्रह पीडित है कुंडली में वो  ग्रह लग्न के हिसाब से योगकारक है शुभ है शुभ फलदाई है उसको बल देने के लिए उसके लिये तो रत्न धारण करना चाहिये और जो पीडा दे रहा है उसके लिये जाप और पाठ पूजा विधान तर्पण आदि से मुक्ति लेनी चाहिये। जैसे राहु सूर्य बुध कुंडली में लगन में है और चन्द्रमा ग्यारहवे भाव में विद्यमान है,केतु सप्तम में है,तो केतु सप्तम स्थान से ग्यारहवे चन्द्रमा को पीडित करेगा,लगन के सूर्य और बुध को भी पीडित करेगा,राहु भी सूर्य और बुध को पीडित करेगा सूर्य के आगे बुध वैसे ही नेस्तनाबूद हो जायेगा। इस युति में सूर्य बुध और चन्द्रमा के रत्नों को धारण करना चाहिये और राहु केतु के शांति के लिये पूजा पाठ और तर्पण आदि करना ठीक रहेगा। अगर मंगल किसी प्रकार से केतु को देख रहा है तो मंगल को शांत करने के उपाय करने चाहिये,अन्यथा मिलने वाले साधन समाप्त होते चले जायेंगे।

जाप करने के तरीके

जब मन में आया और जाप करना शुरु कर दिया या कभी जाप कर लिये और कभी नही किये तो फ़ल मिलना मुश्किल है,कुछ समय की शांति तो मानी जा सकती है लेकिन हमेशा के लिये शांति मिलनी असम्भव है।जिस ग्रह के जाप करने है उसके लिये पहले ग्रह के समय में संकल्प लेना जरूरी है उसके बाद नियमित रूप से निश्चित समय पर जाप करना चाहिये। भूमि तत्व वाले ग्रहों का जाप निश्चित स्थान पर करना होता है,वायु तत्व वाले ग्रहों का जाप किसी भी स्थान पर किये जा सकते है,अग्नि तत्व वाले जाप बिना आहुति के नही किये जा सकते तथा जल तत्व वाले ग्रहों के जाप जल स्थान के किनारे या पास में पानी रखकर ही किये जा सकते है,राहु केतु के जाप सुबह या शाम को ही किये जा सकते है।  इस प्रकार से राहु केतु शनि के लिये कितने ही जाप कर लिये जायें जब तक उनका जाप करने के साथ दान नही किया जायेगा वे शांत नही हो सकते है।         सूर्य

लाल किताब के अनुसार शुक्र और बुद्ध एक ही जगह हैं, तो वे सूर्य हैं। सूर्य गुरु के साथ है, तो चन्द्र है। सूर्य बुध के साथ है, तो मंगल नेक है। सूर्य शनि के साथ है, तो मंगल बद राहु होगा।सूर्य के लिये भगवान विष्णु की पूजा निश्चित की गयी है,जो मूर्ति पूजक नही है वे सुनहले अक्षरों में लिखे अपने शब्दों की पूजा मानसिक रूप से कर सकते है,जो लोग नास्तिक है वे लोगों को रोशनी का दान भी कर सकते है। रविवार को हरिवंश पुराण का पाठ या सत्यनारायण की कथा भी सूर्य पूजा के लिये श्रेष्ठ मानी गयी है,गायत्री मंत्र का जाप भी नियमित संकल्प करने के बाद ग्यारह माला या श्रद्धानुसार किया जा सकता है। सूर्य जब कुंडली में राहु केतु से ग्रसित हो तो मन्दिरों में दीपक का दान करना चाहिये,राजनीति में अपने कार्यों को दान के स्वरूप देकर लोगों का हित करना चाहिये,घर में मुख्य दरवाजे पर रोशनी का बन्दोबस्त करना चाहिये,घर के बीच का भाग खुला रखना चाहिये,दक्षिण पश्चिम के दरवाजे के घरों में नही रहना चाहिये। समर्थ है तो माणिक को स्वर्ण धातु में पहिनना चाहिये। अगर समर्थ नही है तो तेजपात जो मसाले में प्रयोग किया जाता है के सात पत्ते दोपहर के समय गुलाबी कपडे में तरीके से लपेट कर सिरहाने रखना चाहिये और एक पत्ते को गुलाबी कपडे में ही लपेट कर अपने दाहिने हाथ की भुजा में बांध लेना चाहिये। राहु के लिए तर्पण करना चाहिए,बिना राहु का तर्पण किये सूर्य का ग्रहण समाप्त नही हो सकता है,चाहे कितने ही रत्न और उपाय किये जायें। कारण जब सूर्य को राहु ग्रहण दे रहा होता है तो केतु भी अपनी युति को प्रदान कर रहा होता है। अगर सूर्य वायु राशि में है तो सूर्य मंत्र का जाप,अगर भूमि तत्व वाली राशि में है तो सूर्य से सम्बन्धित मूर्ति पूजा अगर अग्नि तत्व वाली राशि में है तो दीपदान रोशनी दान और हवन आदि से फ़ायदा होता है। अगर राहु बहुत ही बलवान है तो हवन आदि में भ्रम देगा और बजाय ज्वाला बनने के धुंआ ही प्रदान करेगा,इसलिये हवन करते समय धुंआ नही हो इसका भी ध्यान रखना चाहिये। जब सूर्य कमजोरहै तो  धारण करने की क्षमता है तो माणिक को सोने में पहिनना चाहिये। सूर्य जब बुरा फ़ल देता है तो योग्यता होने के बाद भी सरकारी क्षेत्र में नही जाने देता है,किसी भी सरकारी कारण से हानि देने लगता है,घर में पिता और पुत्र को कष्ट मिलने लगते है कारावास की सजा मिल जाती है आंखों में रोशनी कम हो जाती है,ह्रदय की बीमारी हो जाती है आत्मा कलुषित हो जाती है और लोगों के लिये थोथी राजनीति में मन लगने लगता है। पेट के अन्दर किसी न किसी प्रकार की गैस आदि बनने लगती है,शरीर में गर्मी बढने से बैचेनी होने लगती है रात को नींद भी नही आती है भोजन का पाचन सही नही हो पाता है हड्डियों वाली बीमारी हो जाती है दांतों में तकलीफ़ होने लगती है। सूर्य यंत्र  सिद्ध कीया हुआ पहन सकते हैं मित्रों कुछ उपाय ऐसे होते हैं जो यहा नहीं बताऐक जा सकते वह आपकी कुंडली के द्वारा ही देख कर आप को बताए जा सकते हैं

महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां

‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...