पूजा पाठ करने वाले लोग कई तरह की पूजा पाठ करते है कोई मन्दिर में जाता है,किसी ने अपने घर पर ही मन्दिर बना रखा है,कोई रामायण भागवत और तरह तरह के धार्मिक ग्रंथ पढता है कोई अपने गुरु को मानता है और गुरू की कही हुयी बात को लेकर चलता है कोई गुरु मंत्र को लगातार जपे जा रहा है कोई अपने सभी कामो को एक तरफ़ रखकर अपने में ही मस्त है और कोई समाधि लगा रहा है कोई ध्यान लगा रहा है कोई तीर्थ यात्रा में भटक रहा है कोई नदी का स्नान कर रहा है कोई जल चढा रहा है कोई प्रसाद बांट रहा है कोई अगरबत्ती जला रहा है कोई दीपक जलाकर हाथ जोड कर बैठा है,कोई किसी प्रकार से कोई किसी प्रकार से अपने को पूजा पाठ में लगाये है और कोई किसी में लेकिन सुख फ़िर भी नही मिल रहा है।जब जीवन में कष्ट संघर्ष आते हैं तो पूजा -पाठ ,मंदिर -गुरुद्वारा ,भगवान -देवी ,ज्योतिषी -तांत्रिक अधिक दिखाई देते हैं |हम जीवन में कष्टों का समाधान अक्सर वहां खोजते हैं जहाँ सीधा कष्ट का कोई मतलब नहीं होता |कष्ट -दुःख होने पर हम अपनी शक्ति बढाने ,कष्टों का कारण जान उन्हें हल करने की बजाय भगवान् की कृपा से उसे हटाने का प्रयास करते हैं पर अक्सर हमें असफलता मिलती है |बहुत प्रयास के बाद भी जब कोई अंतर नहीं आता तो हम अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं की इतनी पूजा –आराधना करते हैं किन्तु कोई लाभ नजर नहीं आता ,पता नहीं भगवान् है भी की नहीं ,या वह हमारी सुनता क्यों नहीं |हम तो रोज पूरे श्रद्धा से इतनी देर तक पूजा करते हैं |पर हमारे कष्ट कम होते ही नहीं |पाप करने वाले ,पूजा न करने वाले सुखी हैं और हम इतनी सदाचारिता से रहते हैं ,पूजा–पाठ करते हैं ,अपने घर में भगवान् को बिठाये हैं पर हम कष्ट ही कष्ट उठा रहे हैं |हमने अपने पिछले अंक में कुछ कारणों का विश्लेष्ण इस सम्बन्ध में किया है|
आचार्य राजेश (ज्योतिष,वास्तु , रत्न , तंत्र, और यन्त्र विशेषज्ञ ) जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक ,पारिवारिक विषयों पर वैदिक व लाल किताबकिताब के उपाय ओर और महाकाली के आशीर्वाद से प्राप्त करें07597718725-०9414481324 नोट रत्नों का हमारा wholesale का कारोबार है असली और लैव टैस्ट रत्न भी मंगवा सकते है
गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018
पुजा पाठ करने पर भी हम दुखी क्यो
पूजा पाठ करने वाले लोग कई तरह की पूजा पाठ करते है कोई मन्दिर में जाता है,किसी ने अपने घर पर ही मन्दिर बना रखा है,कोई रामायण भागवत और तरह तरह के धार्मिक ग्रंथ पढता है कोई अपने गुरु को मानता है और गुरू की कही हुयी बात को लेकर चलता है कोई गुरु मंत्र को लगातार जपे जा रहा है कोई अपने सभी कामो को एक तरफ़ रखकर अपने में ही मस्त है और कोई समाधि लगा रहा है कोई ध्यान लगा रहा है कोई तीर्थ यात्रा में भटक रहा है कोई नदी का स्नान कर रहा है कोई जल चढा रहा है कोई प्रसाद बांट रहा है कोई अगरबत्ती जला रहा है कोई दीपक जलाकर हाथ जोड कर बैठा है,कोई किसी प्रकार से कोई किसी प्रकार से अपने को पूजा पाठ में लगाये है और कोई किसी में लेकिन सुख फ़िर भी नही मिल रहा है।जब जीवन में कष्ट संघर्ष आते हैं तो पूजा -पाठ ,मंदिर -गुरुद्वारा ,भगवान -देवी ,ज्योतिषी -तांत्रिक अधिक दिखाई देते हैं |हम जीवन में कष्टों का समाधान अक्सर वहां खोजते हैं जहाँ सीधा कष्ट का कोई मतलब नहीं होता |कष्ट -दुःख होने पर हम अपनी शक्ति बढाने ,कष्टों का कारण जान उन्हें हल करने की बजाय भगवान् की कृपा से उसे हटाने का प्रयास करते हैं पर अक्सर हमें असफलता मिलती है |बहुत प्रयास के बाद भी जब कोई अंतर नहीं आता तो हम अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं की इतनी पूजा –आराधना करते हैं किन्तु कोई लाभ नजर नहीं आता ,पता नहीं भगवान् है भी की नहीं ,या वह हमारी सुनता क्यों नहीं |हम तो रोज पूरे श्रद्धा से इतनी देर तक पूजा करते हैं |पर हमारे कष्ट कम होते ही नहीं |पाप करने वाले ,पूजा न करने वाले सुखी हैं और हम इतनी सदाचारिता से रहते हैं ,पूजा–पाठ करते हैं ,अपने घर में भगवान् को बिठाये हैं पर हम कष्ट ही कष्ट उठा रहे हैं |हमने अपने पिछले अंक में कुछ कारणों का विश्लेष्ण इस सम्बन्ध में किया है|
मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018
सुर्य ग्रहण क्या आपकी कुंडली में भी ग्रहन दोष है,,?
.ज्योतिष में जब इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से प्रभावित होना मानते हैं . .पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र सिर है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .अब ग्रहण क्या होता है ?राहु व केतु का सूर्य या चन्द्र के साथ युति करना आमतौर पर ग्रहण मान लिया जाता है .किन्तु वास्तव में सूर्य ग्रहण मात्र राहु से बनता है व चन्द्र ग्रहण केतु द्वारा .ज्योतिष में बड़े जोर शोर से इसकी चर्चा होती है .बिना सोचे समझे इस दोष के निवारण बताये जाने लगते हैं .बिना यह जाने की ग्रहण दोष बन रहा है तो किस स्तर का और वह क्या हानि जातक के जीवन में दे रहा है या दे सकता है .बात अगर आकड़ों की करें तो राहु केतु एक राशि का भोग १८ महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे .वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है .यानी दुनिया की एक तिहाई आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है .अब कई ज्योतिषियों द्वारा राहु केतु की दृष्टि भी सूर्य चन्द्र पर हो तो ग्रहण दोष होता है .हम जानते हैं की राहु केतु अपने स्थान से पांच सात व नौवीं दृष्टि रखते हैं .यानी आधे से अधिक आबादी ग्रहण दोष से पीड़ित है .अब ये आंकड़ा कम से कम मुझे तो विश्वसनीय नहीं लगता मित्रों .इसी लिए फिर से स्पष्ट कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी जब दोनों ग्रह एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव में ग्रहण दोष से पीड़ित है ,और इस टर्मिनोलॉजी के अनुसार संसार के लगभग दस प्रतिशत से कम जातक ही ग्रहण दोष का कुफल भोगते हैं .हाँ आंकड़ा अब मेरी पसंद का बन रहा है. अन्य प्रकार की युतियाँ कुछ असर डाल सकती है जिनके बारे में आगे जिक्र करूँगा।किन्तु किसी भी भ्रमित करने वाले ज्योतिषी से सावधान रहें जो ग्रहण दोष के नाम पर आपको ठग रहा है .दोष है तो उपाय अवश्य है किन्तु यह बहुत संयम के साथ करने वाला कार्य है .मात्र तीस सेकंड में टी .वी पर बिना आपकी कुंडली देखे ग्रहण दोष सम्बन्धी यंत्र आपको बेचने वाले ठगों से सचेत रहें ,शब्दों पर मित्रों से थोडा रिआयत चाहूँगा ,बेचने वाले नहीं अपितु भेड़ने वाले महा ठगों से बचना दोस्तों.एक पाठक का पैसा भी बचा तो जो भी प्रयास आज तक ब्लॉग के जरिये कर रहा हूँ ,समझूंगा काम आया . जैसा की हमें ज्ञात है सूर्य हमारी कार्य करने की क्षमता का ग्रह है,हमारे सम्मान ,हमारी प्रगति का कारक है यह जगतपिता है,इसी की शक्ति से समस्त ग्रह चलायमान है,यह आत्मा कारक और पितृ कारक है,पुत्र राज्य सम्मान पद भाई शक्ति दायीं आंख चिकित्सा पितरों की आत्मा शिव और राजनीति का कारक है..राहु के साथ जब भी यह ग्रहण दोष बनाता है तो देखिये इसके क्या परिणाम होते हैं राहु की आदत को समझने के लिये केवल छाया को समझना काफ़ी है। राहु अन्दरूनी शक्ति का कारक है,राहु सीमेन्ट के रूप में कठोर बनाने की शक्ति रखता है,राहु शिक्षा का बल देकर ज्ञान को बढाने और दिमागी शक्ति को प्रदान करने की शक्ति देता है,राहु बिजली के रूप में तार के अन्दर अद्रश्य रूप से चलकर भारी से भारी मशीनो को चलाने की हिम्मत रखता है,राहु आसमान में बादलों के घर्षण से उत्पन्न अद्रश्य शक्ति को चकाचौन्ध के रूप में प्रस्तुत करने का कारक होता है,राहु जड या चेतन जो भी संसार में उपस्थित है और जिसकी छाया बनती है उसके अन्दर अपने अपने रूप में अद्रश्य रूप में उपस्थित होता है।.राहु जाहिर रूप से बिना धड का ग्रह है ,जिस के पास स्वाभाविक रूप से दिमाग का विस्तार है .यह सोच सकता है,सीमाओं के पार सोच सकता है .बिना किसी हद के क्योंकि यह बादल है ..जिस कुंडली में यह सूर्य को प्रभावित करता है वहाँ जातक बिना कोई सार्थक प्रयास किये ,कल्पनाओं के घोड़े पर सवार रहता है .बार बार अपनी बुद्धि बदलता है .आगे बढने के लिए हजारों तरह की तरकीबों को आजमाता है किन्तु एक बार भी सार्थक पहल उस कार्य के लिए नहीं करता, कर ही नहीं पाता क्योंकि प्लान को मूर्त रूप देने वाला धड उसके पास नहीं है .अब वह खिसियाने लगता है .पैतृक धन बेमतलब के कामों में लगाने लगता है .आगे बड़ने की तीव्र लालसा के कारण चारों तरफ हाथ डालने लगता है और इस कारण किसी भी कार्य को पूरा ही नहीं कर पाता .हाथ में लिए गए कार्य को (किसी भी कारण) पूरा नहीं कर पाता ,जिस कारण कई बार अदालत आदि के चक्कर उसे काटने पड़ते हैं
.सूर्य की सोने जैसी चमक होते हुए भी धूम्रवर्णी राहु के कारण उसकी काबिलियत समाज के सामने मात्र लोहे की रह जाती है. उसकी क्षमताओं का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता .अब अपनी इसी आग को दिल में लिए वह इधर उधर झगड़ने लगता है.पूर्व दिशा उसके लिए शुभ समाचारों को बाधित कर देती है .पिता से उसका मतभेद बढने लगता है .स्वयं को लाख साबित करने की कोशिश भी उसे परिवार की निगाह में सम्मान का हक़दार नहीं होने देती .घर बाहर दोनों जगह उसकी विश्वसनीयता पर आंच आने लगती है सूर्य के साथ राहु का होना भी पितामह के बारे में प्रतिष्ठित होने की बात मालुम होती है ,जातक के पास कानून से विरुद्ध काम करने की इच्छायें चला करती है,पिता की मौत दुर्घटना में होती है,या किसी दवाई के रियेक्सन या शराब के कारण होती है,या वीमारी सेजातक के जन्म के समय पिता को चोट लगती है,जातक को नर सन्तान भी कठिनाई से मिलती है,पत्नी के अन्दर गुप चुप रूप से सन्तान को प्राप्त करने की लालसा रहती है,पिता के किसी भाई को जातक के जन्म के बाद मौत जैसी स्थिति होती है।.वहीँ दूसरी और केतु (जिस के पास सिर नहीं है ) से सूर्य की युति होने पर जातक बिना सोचे समझे कार्य करने लगता है .यहां वहां मारा मारा फिरता है .बिना लाभ हानि की गणना किये कामों में स्वयं को उलझा देता है .लोगों के बहकावे में तुरंत आ जाता है . मित्र ही उसका बेवक़ूफ़ बनाने लगते हैं केतु और सूर्य का साथ होने पर जातक और उसका पिता धार्मिक होता है,दोनो के कामों के अन्दर कठिनाई होती है,पिता के पास कुछ इस प्रकार की जमीन होती है,जहां पर खेती नही हो सकती है,नाना की लम्बाई अधिक होती है,और पिता के नकारात्मक प्रभाव के कारण जातक का अधिक जीवन नाना के पास ही गुजरता है या नाना से ख़र्च में मदद मिलती है इसी प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं . चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं .चंद्रमा भावनाओं का प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना , लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके लिए किसी ख़ास नियम की जरुरत नहीं होती .यही भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति का फर्क होता है. ध्यान दीजिये की राहु आद्रा -स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है ,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है तो चन्द्र - केतु जलन का कारण बनती है .(यहाँ कुंडली में लग्नेश की स्थिति व कारक होकर गुरु का लग्न को प्रभावित करना समीकरणों में फर्क उत्पन्न करने में सक्षम है).जिस जातक की कुंडली में दोनों ग्रह ग्रहण दोष बना रहे हों वो सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रहों का दूषित होना वास्तव में दुखदायी हो जाता है .ध्यान दें की सूर्य -चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक- अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित होना मनुष्य के लिए कई प्रकारप की दुश्वारियों का कारण बनता है . अतः एक ज्योतिषी की जिम्मेदारी है की जब भी किसी कुंडली का अवलोकन करे तो इस दोष पर लापरवाही ना करे .उचित मार्गदर्शन द्वारा क्लाइंट को इस के उपचारों से परिचित कराये .किस दोष के कारण जातक को सदा जीवन में किन किन स्थितियों में क्या क्या सावधानियां रखनी हैं ताकि इस का बुरा प्रभाव कम से कम हो , इन बातों से परिचित कराये . यहां पर कुछ उपाय वता रहा हु जो आप कर सकते हैं अगर असल में आपकी कुंडली में ग्रहन दोष हो तो पहले यह कुंडली दिखाकर जानकारी हासिल कर ले कोशिश करूँगा की कभी भविष्य में इन योगों को कुंडलियों का उदाहरण देकर बताऊँ .उपाय :- 1) यह योग जन्मपत्रिका के जिस भाव में हो, उतनी ही मात्रा में सूर्य के शत्रु ग्रहो (शनि, राहू और केतु) का समान ले, और ग्रहण अवधि में मध्यकाल में अपने सिर से सात बार एंटीक्लॉक वाइज उसारा करके किसी भी नदी के तेज बहते जल में प्रवाहित दे। जैसे की इस पत्रिका में यह युति सप्तम भाव में है तो इसलिए जातक या जातिका को 700 ग्राम जौ को दुघ का छींटा लगाकर 700 ग्राम सरसो का तेल, 700 ग्राम साबुत बादाम, 700 ग्राम लकड़ी के कोयले, 700 ग्राम सफ़ेद व काले तिल मिलेजुले, 7 नारियल सूखे जटावले और बजने वाले तथा 70 सिगरेट बगैर फ़िल्टर वाली ले।
गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018
: भाग्यशाली रत्न या अमंगलकारी
सोमवार, 5 फ़रवरी 2018
तारे और ग्रह
रविवार, 4 फ़रवरी 2018
अंकों का खेल अंक ज्योतिष
शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018
वक्री मंगल ग्रह
आम तौर पर वक्री मंगल अपने सामान्य स्वभाव की तरह ही आचरण करते हैं।बृहज्जातक के ग्रह भक्तियोगाध्याय के ष्लोक 31 एवं 32 में कहा गया है कि मंगल के वक्र गमन से दूषित नक्षत्र पीड़ित होकर अपने वर्ग का नाष करता है मंगल अपने उदित नक्षत्र से सातवें आठवें अथवा नौवें नक्षत्र में वक्री होता है तो उसे उष्ण संज्ञक वक्री कहते है यदि 10वें 11वें अथवा 12वें नक्षत्र में वक्री हो तो उसे अश्रुमुख वक्री कहते है इस वक्री स्थिति से राष्ट्र में विपत्ति आती है तथा अकाल पड़ता है। रसों में दोष उत्पन्न होता है तथा रोगों में वृद्धि होती है। यदि अस्त नक्षत्र से 13 वें अथवा 14 वें नक्षत्र में मंगल वक्री हो तो उसे व्याल क्री वक्र कहा जाता है। इसमें खेती का उत्पादन उत्तम होता है साथ ही विष भय होता है। यदि अस्तकालिक नक्षत्र से 15वें या 16 वें नक्षत्र में मंगल वक्री होता है तो उसे रुधिरानन वक्री कहते हैं। इसका परिणाम सुभिक्ष होता है, परंतु प्रजा को भय तथा मुख के रोगों से पीड़ा होती है। यदि अस्त नक्षत्र से 17वें अथवा 18वें नक्षत्र में मंगल वक्री होता है तो उसे अतिमूसल वक्री कहते हैं। उसकी इस वक्री अवस्था में चोरों तथा ड़ाकुओं के कारण धन की हानि, अनावृष्टि तथा शस्त्र भय होता है। यदि मंगल पूर्वा फाल्गुनी अथवा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में उदित होकर उत्तराषाढ़ में वक्री हो तथा बाद में रोहिणी में अस्त हो जाए तो तीनों लोकों को पीड़ित करता है। यदि मंगल श्रवण नक्षत्र में उदित होकर पुष्य नक्षत्र में वक्री हो जाए तो शासकों, राष्ट्राध्यक्षों के लिए हानिकारक होता है। यदि मंगल मघा नक्षत्र के मध्य में उदित होकर मघा नक्षत्र में ही वक्री हो जाए तो पृथ्वी पर वर्षा का अभाव होता है तथा शस्त्र भय होता है। कई बार आपने बहुत छोटी आयु में बालक बालिकाओं को चरित्र से से भटकते हुए देखा होगा.विपरीत लिंगी की ओर उनका आकर्षण एक निश्चित आयु से पहले ही होने लगता है.कभी कारण सोचा है आपने इस बात का ?विपरीत लिंग की और आकर्षण एक सामान्य प्रक्रिया है,शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन के बाद एक निश्चित आयु के बाद यह आकर्षण होने लगना सामान्य सी कुदरती अवस्था है.शरीर में मंगल व शुक्र रक्त,हारमोंस,सेक्स ,व आकर्षण को नियंत्रित करने वाले कहे गए हैं.इन दोनों में से किसी भी ग्रह का वक्री होना इस प्रभाव को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है. यही प्रभाव जाने अनजाने उन्हें उम्र से पहले वो शारीरिक बदलाव महसूस करने को मजबूर कर देता है जो सामान्य रूप से उन्हें काफी देर बाद करना चाहिए था.मंगल का वक्री होना व्यक्ति के वैवाहिक जीवन, यौन सुख पर सबसे अधिक असर डालता है। चूंकि मंगल पुरुषत्व का प्रतिनिधि ग्रह है इसलिए यह व्यक्ति के ताकत, शक्ति, उत्साह, स्त्रियों के प्रति आकर्षण, झुकाव, संभोग की शक्ति एवं विवाह के प्रति रूझान के बारे में कथन देता है। जब मंगल वक्री होता है तब पुरुष सगाई, विवाह या अपने जीवनसाथी के प्रति गलत निर्णय ले बैठते हैं बाद में जीवनभर पछताते रहते हैं। यदि किसी स्त्री की कुंडली में मंगल वक्री है तथा गोचर में भी वह वक्री हो तो उस स्त्री की विवाह के प्रति, यौन संबंधों के प्रति इच्छाएं पूरी तरह खत्म हो जाती है। वह इन सब चीजों को बकवास मानने लगती है। यहां तक देखा गया है कि वक्री मंगल की स्थिति में महिलाएं विवाह की पूर्व रात्रि में ही भाग जाती हैं। वक्री मंगल के प्रभाव से व्यक्ति झूठे मुकदमों, पारिवारिक कलह में उलझ जाता है। इसी प्रकार वक्री ग्रह कुंडली में आपने भाव व अपने नैसर्गिक स्वभाव के अनुसार अलग अलग परिणाम देते हैं.अततः कुंडली की विवेचना करते समय ग्रहों की वक्रता का ध्यान देना अति आवश्यक है.अन्यथा जिस ग्रह को अनुकूल मान कर आप समस्या में नजरंदाज कर रहे हो होते हैं ,वही समस्या का वास्तविक कारण होता है,व आप उपाय दूसरे ग्रह का कर रहे होते हैं.परिणामस्वरूप समस्या का सही समाधान नहीं हो पाता. लेख के अंत में फिर बता दूं की वक्री होने से ग्रह के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता,बस उसकी शक्ति बढ़ जाती है.अब कुंडली के किस भाव को ग्रह की कितनी शक्ति की आवश्यकता थी व वास्तव में वह कितनी तीव्रता से उस भाव को प्रभावित कर रहा है,इस से परिणामो में अंतर आ जाता है व कुंडली का रूप व दिशा ही बदल जाती है.
गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018
,वाघक ग्रहअच्छा या वुरा
वेदो के अनुसार आत्मा को अजर-अमर कहा गया है। गीता में भी कहा गया है कि, जिस प्रकार मनुष्य फटे हुए जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण कर लेता है। ठीक उसी प्रकार यह जीवात्मा पुराने जीर्ण शरीर को त्यागकर नई देह को धारण कर लेती है। हमारे यहां पुनर्जन्म का सिद्धांत है।
हर जीवात्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार निश्चित मां-बाप के यहां जन्म लेती है और जन्म लेते समय आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों की जो स्थिति होती है उस आकाशीय नक्शे के अनुसार व्यक्ति का जीवन निर्धारण होता है। जिसे ज्योतिष शास्त्र जन्मांग या कुंडली का नाम देता है।
एक कुशल ज्योतिषी व्यक्ति के जन्मांग से ज्योतिष के द्वारा उसके भूत, भविष्य, प्रकृति और चरित्र को जान लेता है। जन्मांग व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है। कुंडली के बाहर भाव जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से संबंधित रहते हैं लेकिन मैं आज वाचक ग्रह की वात कर रहा हु ैंवैदिक ज्योतिष में बाधक ग्रह का जिक्र किया गया है लेकिन इन बातों का अध्ययन बिना सोचे समझे नहीं करना चाहिए. कुंडली की सभी बातों का बारीकी से अध्ययन करने के बात ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए.जन्म कुंडली मे बाधक ग्रहो और बाधक स्थानो के लिये कई प्रकार की डरावनी बाते कही जाती है। यह भाव बाधक यह ग्रह बाधक है और कार्य मे बाधा देगा आदि बाते बताकर लोग अपनी अपनी कथनी का विवेचन करते है।अभी बात करते है, बाधक ग्रह, इसे भी कॉमन सेन्सस से समझे,ज्योतिष के अन्तर्गत अनगिनत योगों का उल्लेख मिलता है. बहुत से योग अच्छे हैं तो बहुत से योग खराब भी हैं. जन्म कुंडली में अरिष्ट की व्याख्या भावों के आधार पर भी की जाती है. रुकावट होना और रुकावट के कारण कष्ट होना यह बात ग्रहों के भावो के अनुसार कथन किया जाता है। जन्म के बाद शरीर का पनपना और शरीर के पनपने के समय मे मिलने वाली कठिनाई बात करने मे अक्षरों का उच्चारण चलने मे पैरों का सही स्थान पर नही रखा जाना काम करते वक्त हाथ का सही काम नही कर पाना आदि कितने ही कारण शरीर की पनपाहट मे बाधक होते है और इस प्रकार की बाधकता को पार नही किया जाय तो वही अंग या अवयव नाकाम रह जायेगा जो लोग बाधकता से नही डरते है और अपने को लगातार प्रयास मे लगाये रहते है वह अन्य लोगो से अधिक लचीला और मजबूत अंग बनाने मे सफ़ल हो जाते है। कुंडली मे तीसरा स्थान सबसे पहले बाधक का काम करता है। तीसरा स्थान खुद के पहिचान बनाने के कारणो का भी होता है छोटे भाई बहिनो का भी होता है छोटी यात्रा करने के लिये भी माना जाता है मकान के बाहर रहने का कारण भी होता है पति या पत्नी के धर्म रिवाज समाज व्यवहार के लिये भी जाना जाता है जीवन साथी की ऊंची शिक्षा कानूनी प्रभाव विदेश आदि का रहना और विदेशी नीतियों को अपने परिवार आदि मे समायोजित करना भी होता है। अपनी पहिचान बोली भाषा आदि के लिये भी यही स्थान माना जाता है। शरीर मे बायें हिस्से का कारक भी माना जाता है। इस प्रकार से छोटे भाई बहिन को सम्भालना जीवन की बाधकता मे माना जाये तो यह कहना यथार्थ होगा कि व्यक्ति सामाजिकता से परे जा रहा है। रामायण मे भगवान श्रीराम की कथा में लक्षमण जी का आजीवन साथ रहना उनके तीसरे भाव का पराक्रम से जोडा गया रूप है माता सीता जी का आजीवन साथ रहना उनके सप्तम का सही रूप से विवेचित रूप है उनके बडे भाई होने का अहसास तथा उनके बडे भाई के कर्तव्यों का निर्वहन किया जाना उनके ग्यारहवे भाव के कारक को फ़लीभूत करने का साहस माना जाता है। जब बाधक ग्रह के प्रति लगातार चिंतन किया जाये और उसके ऊपर सफ़लता को प्राप्त कर लिया जाये तो वही विजय का रूप कहलाता है। कोर्ट केश दुश्मनी आदि बाते सप्तम भाव से देखी जाती है तथा जीवन साथी का भाव भी सप्तम स्थान के रूप मे ही समझा जाता है अगर कोर्ट केश को करने वाले व्यक्ति को बाधक के रूप मे लिया जाये तो यह कहना भी गलत नही होगा कि तीसरा भाव जब कमजोर है अपनी पहिचान और हिम्मत दिखाना नही आता है तो अपने आप ही सातवा भाव कमजोर हो जायेगा और सातवे के कमजोर होने से ग्यारहवा भाव अपने आप ही बजाय लाभ के हानि देना शुरु कर देगा।तीसरा सप्तम और ग्यारहवा भाव और इनके स्वामी काम नाम के पुरुषार्थ से जुडे होते है। किसी भी पौधे के बढने और पनपने के लिये दूसरा भाव और जैसे ही पौधे की पहिचान होती है तीसरा भाव सामने आता है। पौधे से मिलने वाले लाभ और हानि तथा पौधे का जलवायु के अनुसार पनपाहट चौथे भाव से देखी जाती है पौधे का अन्य पौधो के साथ पनपना और मजबूत होना पंचम से देखा जाता है पौधे मे लगने वाले रोग और जडो की गहराई का विवेचन छठे भाव से किया जाता है उसी प्रकार से पौधे मे जब पनपाहट के बाद फ़ूल खिलता है तो वह सप्तम की पहिचान तीसरे के अनुसार ही मिलती है और फ़ूल के अन्दर जब पराग कण का निषेचन होता है तो वह अष्टम का कारण बन जाता है। फ़ूल का बनना बन्द होना और फ़ल का रूप शुरु होना नवे भाव से जोडा जाता है कच्चे फ़ल का रूप दसवे भाव से और फ़ल के पकने और उसके द्वारा मिलने वाले लाभ हानि का कारण ग्यारहवे भाव से देखा जाता है फ़ल की समाप्ति और फ़ल के असर का रूप समाप्त होने का भाव बारहवा है। इस प्रकार से तीसरा सातवा और ग्यारहवां ही पौधे की पहिचान पौधे की सुन्दरता और पौधे से मिलने वाले फ़ल का रूप है बिना बाधक भाव के और बाधक ग्रह के जीवन मे पहिचान नही बन पाती है जीवन मे जीने के लिये कारण नही मिल पाता है और जीवन जब जिया जाता है तो जीवन लेने का उद्देश्य भी नही मिल पाता है यानी जैसे व्यक्ति पैदा हुआ था और उसी प्रकार से बिना कुछ किये चला जाये तो यह समझना चाहिये कि जातक के जीवन मे बाधक ग्रहों का असर बाधक भावो का प्रभाव नही था। मित्रों अगर आप अपनी कुंडली दिखाना या बनवाना चाहते हैं या कोई लैब टेस्ट रतन लेना चाहते हैं अपनी समस्या का कोई हल चाहते हैं तो आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं 7597718725/9414481324
सोमवार, 29 जनवरी 2018
मित्रो आप मे से वहुँत से मित्रमुझे फोन पर ज्योतिष की कितावो के वारे मे पुछते है तो सोचा आज आप को कुछ अच्छी books की जानकारीदेदु जो आप के काम आऐ ऐसी books के बारे में जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूं, जो किसी भी प्रशिक्षु ज्योतिषी एवं ज्योतिष में रूचि रखने वाले किसी भी प्राणी को अवश्य पढ़नी चाहिए। इन सभी पुस्तकों को मैंने बार बार पढ़ा है और आज भी पढ़ता रहता हूं। हर बार किसी नए कोण से कोई नई बात उभरकर सामने आती है। ऐसे में आप भी इन पुस्तकों को पढ़ें, तो इस क्षेत्र में अच्छा ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। बहुत बार नए ज्योतिषियों के सामने यह समस्या होती है कि कौनसी पुस्तक पढ़ें और कौनसी छोड़ें। आज ज्योतिष के क्षेत्र में पुस्तकों के सैकड़ों टाइटल मिल जाएंगे, लेकिन सटीक रूप से कौनसी पुस्तक आपको जानकारी दे सकती है, इस जानकारी का अभाव है। ऐसे में मेरी लाइब्रेरी का यह विवरण आपके जरूर काम आ सकता है। फण्डामेंटल प्रिंसीपल ऑफ एस्ट्रोलॉजी – इस किताब का हिन्दी अनुवाद भी बाजार में आ चुका है। काटवे की देव विचार माला – इसमें सत्रह छोटी पॉकेट साइज पुस्तकें शामिल हैं। पहले यह आउट ऑफ प्रिंट हो गई थी अब इसका रीप्रिंट वर्जन बाजार में आ चुका है। लाल किताब (Lal Kitab)- लेखक पंडित रामचंद्र शास्त्री, कालका वाले। भवन भास्कर (Bhawan Bhaskar)- यह किताब आउट ऑफ प्रिंट हो चुकी है, किसी एक व्यक्ति के पास उपलब्ध हो तो वह अन्य पाठकों को फोटो प्रति करके उपलब्ध करा सकता है, पहले यह गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होती थी। कुछ स्टॉलों पर अब भी मिल सकती है। (इस किताब का नया प्रिंट फिर से बाजार में आ चुका है। गीताप्रेस ने ही पुन: प्रकाशित किया है।) ज्योतिष रत्नाकर– देवीनन्दन सिंह की लिखी यह पुस्तक ज्योतिष आठ धाराओं में बांटकर सिखाती है। यह अपने आप में पूर्ण पुस्तक है लघु पाराशरी टीकाकार मेजर एसजी खोत – यह पुस्तक हर कहीं उपलब्ध नहीं है, लेकिन मिल सकती है, लघु पाराशरी सिद्धांतों को समझने के लिए यह अल्टीमेट पुस्तक है। फलित ज्योतिष रेडीरेकनर- शौकिया और प्रमाणिक ज्योतिष के पाठकों के लिए यह पुस्तक महल की बहुत अच्छी किताब है। इसे पढ़कर आप अपनी कुण्डली का फौरी तौर पर विश्लेषण कर सकते हैं। अच्छी बात यह है कि इस पुस्तक में नेगेटिव प्वाइंट बहुत कम हैं। एस्ट्रो सीक्रेट्स यह पुस्तक केवल अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। अगर इसका कोई हिन्दी संस्करण आया भी है तो मुझे उसकी जानकारी नहीं है। मेरी सलाह है कि इसे अंग्रेजी में ही पढ़ा जाए तो बेहतर है। प्रोफेसर केएस कृष्णामूर्ति के शिष्य के. शबुंगम की लिखी यह पुस्तक केपी एस्ट्रोलॉजी को समझने की एक नई दिशा देती है। तीन सौ महत्वपूर्ण योग- योगायोगों के बारे में बीवी रमन ने अपनी खुद की सोच रखी और प्राचीन योगों में से भी तीन सौ ऐसे योग निकालकर उनका संग्रह पेश किया कि बहुत से जातकों की कुण्डली में ये योग मिल जाते हैं। इन योगों के फलादेश भी बहुत कुछ सटीक पड़ते हैं। इसे जरूर पढ़ना चाहिए। ज्योतिष की कुछ अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकें (Astrology books की ऐक लिस्ट भारतीय ज्योतिष : नेमीचंद शास्त्री ज्योतिष रत्नाकर : देवकीनन्दन सिंह प्रिडिक्टिव स्टेलर एस्ट्रोलॉजी : केएस कृष्णामूर्ति काटवे सीरीज : देव विचार माला की सभी 17 किताबें अध्यात्म ज्योतिष : हेमवंता नेमासा काटवे योग विचार : हेमवंता नेमासा काटवे 300 महत्वपूर्ण योग : बीवी रमन भद्रबाहु संहिता : नेमीचंद्र शास्त्री मंत्र विद्या : करणीदान सेठिया लाल किताब : रामेश्वरचंद्र शास्त्री कालका वाले समरांगण सूत्रधार : भवन निवेश हॉरेरी एस्ट्रोलॉजी : केएस कृष्णामूर्ति कास्टिंग द होरोस्कोप : केएस कृष्णामूर्ति फलित ज्योतिष रेडीरेकनर : तिलक राज तिलक नवमांशा इन एस्ट्रोलॉजी : चंदूलाल एस पटेल उपचारीय ज्योतिष : के के पाठक सचित्र ज्योतिष शिक्षा : बाबूलाल ठाकुर भाग दो, चार, छह, आठ ज्योतिष कौमुदी बॉडी लैंग्वेज : एलन पीज द प्रोगेस्ड होरोस्कोप : एलन लियो जातक निर्णय : बीवी रमन नक्षत्र फल : के टी शुभाकरन दोनों भाग लघुपाराशरी : टीकाकार मेजर एसजी खोत न्यू टैक्नीक्स ऑफ प्रिंडिक्शन : एचआर शेषाद्री अय्यर भवन भास्कर : गीताप्रेस गोरखपुर भुवन दीपक : डॉ शुकदेव चतुर्वेदी गोचर विचार : जगन्नाथ भसीन वास्तुमुक्तावली : मास्टर खेलाड़ीलाल ज्योतिष बोध : पंडित धरणीधर शास्त्री प्रश्न चंद्रप्रकाश : चंद्रदत्त पंत हस्तरेखा विश्वकोष : हरिदत्त शर्मा मण्डेन एस्ट्रोलॉजी : मानिकचंद जैन राहू केतू : मानिकचंद जैन सत्य सिद्धांत ज्योतिष : प्रभुलाल शर्मा व्यापार रत्न : पंडित हरदेव शर्मा त्रिवेदी अर्घ मार्तण्ड : पंडित मुकुल वल्लभ मिश्र लघुपाराशरी एवं मध्य पाराशरी : पंडित केदारदत्त जोशी सर्वार्थ चिंतामणि : खेमराज श्रीकृष्णदास आकृति से रोग की पहचान : लुई कुने रमल नवरत्न : खेमराज श्रीकृष्णदास सुगम वैदिक ज्योतिष बुक ऑफ नक्षत्राज : प्राश त्रिवेदी सुनहरी किताब इसके साथ ही ज्योतिषियों को मोटीवेशनल मैनेजमेंट, साइकोलॉजी और स्वास्थ्य से संबंधित पुस्तकों का भी अध्ययन करना चाहिए।आचार्य राजेश
रविवार, 28 जनवरी 2018
राहु ओर रोग मे वाघा भाग _2
देने वाला छायाग्रह है I अत: यदि रोगी क्री राहु की महादशा अंतर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा चल रही हो, तो उसके शरीार में विद्यमान राहु की adrishya Paraवैगनी किरणे उनकें उपच्चार में बाधायें उत्पनकरती हैं, आरोग्य मे वाघा कर घोर निराशा उत्पन्न करती हैं, व साघय रोग को असघ्य कर देती हैं। Prakriti ke Niyam ke anusar कोइ भी वस्तु जिस रंग की होती हैं वह उस रंग की इसलिए दिखाई पड़ती है क्योंकि वह सवकिरणो कोअपने में सोख कर केवल उसी रंग को परावर्तित कर देती हे, जिस -रंग की वह दिखाई दे रही होती है t लाल रंग का गुलाब पुष्प हमे लाल रंग का इसलिये दिखाई देता है, क्योंकि वह अन्य सभी रंगों क्रो अवशोषित कर केवल लाल रंग क्रो बिकर्थित कर देता है । यह प्रकृति न्यूटन के नियम, ‘Similar poles repel each other.’ अर्थात् "समान घुव एक दूसरे को विकर्षिव्र करते है' पर आधारित है । अत: जब रोगी व्यक्ति का एक्स-रे किया जाता है, तो इस सिद्घान्त के आधार पर शरीर में पहले से ही मौजूद पराबैंगनी किरणे एक्स किरणों को विकर्षित कर देती हैं, और एक्स-रे की 'रिपोर्ट' साभान्य आती है, तथा रोगी की आंतरिक खराबी या तकलीफ का पता नही चलता, जबकि रोगी उस पीड़ा को भोग रहा होता है । इस्री प्रकार शरीर मे मोजूद पराबैगनी किरणे 'पेथोलॉंजिकल' जांचों को भी शरीर की आंतरिक गडबड्रियों क्रो उजागर नही करने देती, अत: ऐसी जांचों का परिणाम हमेशा 'नॉर्मल' अर्थात् सामान्य आता है । ऐसी स्थिति में व्यक्ति एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास तथा एक डायब्वनोस्टिक्र लेब से दूसरी डायज्जनौस्टिक लेब मे जाता रहता है, पर न तो उसके रोग का ही सही निदान हो पाता है, और न किसी प्रकार की औषधियों या उपचार पद्धतियों से उसके रोग का समापन ही हो पाता है जब व्यक्ति चिकित्सा बिज्ञान क्रो आजमाकर निराश हो जाता है, तो वह मंत्र-तंत्र अथवा ज्योतिष जैसे विज्ञानों की मदद लेता है । मंत्र-तंत्र विशेषज्ञ द्धारा मंत्र के निरन्तर जप से उत्पन्न मंत्रशक्तिमय किरणे और ब्रह्माण्ड से प्राप्त पराबैगनी किरणे, दोनो चूंकि एक ही तरंगन्देर्ध्व पर काम करती हैं, अत: पराबैगनी किरणे मंत्ररश्मियो क्रो भी रोक देती है, और मंत्र-तंत्र चिकित्सा से भी कोई बिशेष लाभ नहीं होता । मंत्ररस्मियां शरीर में
उपस्थित पराबैगनी किरणों से टकराती हैं, और समाप्त हो जाती है । ऐसे समय मे पीडित व्यक्ति ज्योतिषी देवज्ञ से परामर्श करता है जीवन मेंराहु की अन्तर्दशा पहले आती है, उसके बाद ही वृहस्पति (गुरु) की दशा का आगमन होता हे I राहु के समय के दौरान व्यक्ति धोखेबाजी और जालसाजी के ही संपर्क में आ पाता है, चाहे वे मंत्र-तंत्र. चिकित्सा, ज्योतिष किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो । और इस प्रकार व्यक्ति का समय व धन बर्बाद ही होता है
यद्यपि वह निराश हो चुका होता है, लेकिन समाधान की प्रबल आवश्यकता उसे एक के बाद दूसरा दरवाजा खटखटाने को बाध्य कर देती है I जब तक राहु का समय चल रहा होता है, तब तक वह लगातार यहां से वहां और इधर से उधर भटकता रहता है I इस समय के दौरान यदि यह किसी अच्छे ज्योतिषीके संपर्क में आ भी जाता है, जो पराबैगनी किरणों का अवरोधक प्रभाव उपाय के द्वारा उसकी जन्मकुषडली का भलीभांति विश्लेषण करने के वाद उसकी समस्या का समाधान कर सकता हो परन्तु राहु उसे सही ज्योतिषी से परामर्श लेने नहीं देता और वह गलत ज्योतिषीय निदान कर बैठता हे I ऐसे समय में उदाहरण के लिये यदि ईराक-अमेरिका युद्ध को देखें, तो हमे ज्ञात होगा कि जब 'स्कड' (Skud) नामक 'मिसाइल‘ या आग्नेयास्त्र चलाया जात्ता था, तो उसे 'पैट्रियांट' (Patriot) नामक आग्नेयास्त्र मारकर गिरा देता था । इसी प्रकार का विवरण रामायण, महाभारत व हमारे अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी है, जिसमे जब एक ओर से एक विनाशकारी वाण चलाया जाता था, तो उसे दूसरी ओर से एक विध्वंसक विपरीत वाण संधान द्वारा नष्ट कर दिया जाता था । एक प्रकार से देखा जाये, तो वर्तमान युग की मिसाइलें हमारी प्राचीन मिसाइलों (बाणों) का ही आधुनिक संस्करण है I
यदि मंत्ररश्मियों क्रो 'स्कड' मिसाइल मान ले, तो राहु रश्मियां ‘पैट्रियॉट' का काम करती हे I यही कारण है, कि राहु की अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा में मंत्र-तंत्र का लाभ प्रतीत नहीं होता । वास्तव पे मंत्र तो अपना ज्योतिष विद्या उपायों फे बिना उसी प्रकार है, जिस प्रकार आत्मा के बिना शरीर । महर्षि पराशर ने उपायों पर बहुत अधिक बल दिया है । उन्होंने जो उपाय सुझाये, उनमें जरूरत्तमन्दो व याचकों को भोजन कराना, रत्न पहनना, यंत्र धारण करना, ग्रह विशेष के तांत्रोक्त मंत्र का जप करना व औषधीय ज़ड्रीडबूटियों से स्नान करना इत्यादि उपाय शामिल हैं I इन सभी का विस्तृत विवेचन किया है लाल किताब के अनुसार भी उपाय भी प्रभाव शाली है दान के पीछे तर्क यह है, कि इससे रोग क्रो आरोग्य न होने के लिये जिम्मेदार किरणों को विकर्षित किया जा सकता है तथा पीडित व्यक्ति को लाभ पहुंचाया जा सकता है ।हमारे महर्षिगण, जो उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे, उन्होंने विभिन्न तरंगदेथ्यों के प्रभाव का अध्ययन किया, और उसी आधार पर विभिन्न वस्तुओं की तरंगदेर्ध्व के निर्धारण मेँ समर्थ हुए तथा उन्होंने ऐप्ती विशिष्ट वस्तुओ का ही वितरण जरूरत्तमन्दो में करने का परामर्श दिया a दान की इस प्नब्रिज्या का दोहरा लाभ होता है
अर्थात् व्यक्ति पेट की क्षुधा को शांत करने के लिये कौन सा पाप नहीं कर सकता? अत: एक और भूखे व जरूरतमंद लोगों को भोजन कराकर, जहां व्यक्ति उन्हें चोरी, डकैती, हिंसा, छोना-झपटी, लूटमार व अन्य आपराधिक कृत्यों को करने से बचा सकता है, वही दूसरी ओर दान प्राप्त करने वाले की आत्मा का अवचेतन भाग, निश्चित रूप से दानी व्यक्ति को आशीर्वाद देता है, और उसकी तक्लीफ या पीडा कम होने जातीहै
अपने पास से पैसा निकालकर दूसरों पर खर्च करना बहुत मुश्किल है, परन्तु ऐसा करने वाला सदैव सुखी जीवन भोगता है लोक ओर परलोक के सुख पाता है
महाभारत कालीन 'अग्नि पंचक' 2026: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की बड़ी भविष्यवाणियां
‼️ महाभारत कालीन गोचर और आगामी विक्रमी संवत: 15 दिन में दो उग्र ग्रहण और 2028 तक की महा-भविष्यवाणियां ‼️ ब्रह्मांड में ग्रहों की चाल और ग्रह...
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https://youtu.be/hb9Ouf_rST4 मित्रों आज बात करेंगे बुध और शनि की युति जब एक ही भाव में एक साथ हो या किसी भी तरह की युति बन रही है, तो कल क्य...
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लक्ष्मी योग शुभ ग्रह बुध और शुक्र की युति से बनने वाला योग है।बुध बुद्धि-विवेक, हास्य का कारक है तो शुक्र सौंदर्य, भोग विलास कारक है।अब ये द...
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जब किसी के जीवन में अचानक परेशानियां आने लगे, कोई काम होते-होते रूक जाए। लगातार कोई न कोई संकट, बीमारी बनी रहे तो समझना चाहिए कि उसकी कुंडली...
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दशम भाव ज्योतिष भाव कुडंली का सबसे सक्रिय भाव है| इसे कर्म भाव से जाना जाता है क्यूंकि ये भाव हमारे समस्त कर्मों का भाव है| जीवन में हम सब क...
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https://youtu.be/I6Yabw27fJ0 मंगल और राहूजब राहु और मंगल एक ही भाव में युति बनाते हैं, तो वह मंगल राहु अंगारक योग कहलाता है। मंगल ऊर्जा का स...
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मालव्य योग को यदि लक्ष्मी योगों का शिरोमणी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं। मालव्य योग की प्रशंसा सभी ज्योतिष ग्रन्थों में की गई है। यह योग शुक्...
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https://youtu.be/9VwaX00qRcw ये सच है कि हर रत्न इस धरती पर मौजूद हर व्यक्ति को शोभा नहीं देता है. इसे पहनने के लिए ज्योतिष की सलाह आवश्यक ह...
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आचार्य राजेश ईस बार मलमास 15 दिसंबर से आरंभ हो रहा है जो 14 जनवरी 2018तक रहेगा। मलमास के चलते दिसंबर के महीने में अब केवल 5 दिन और विवाह मुह...
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मित्रों आज वात करते हैं फिरोजा रतन की ग्रहों के प्रभाव को वल देने के लिए या फिर उन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए ज्योतिष विज्ञान द्वारा विभि...



